रविवार, 16 फ़रवरी 2025

अध्याय दो (गीता जी)

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*गीता और मै में आज मैं दूसरे अध्याय पर पहुंचा हूं*

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*❖════❃≛⃝❈⬤🪷
*दूसरा अध्याय जिसमें पहली बार अर्जुन का वॉट्सएप यूनिवर्सिटी ज्ञान सुन कर श्री कृष्ण ने अपना मुंह खोला।*
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भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 1

श्लोक:
( अर्जुन की कायरता के विषय में श्री कृष्णार्जुन-संवाद )
 संजय उवाच
 तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्‌।
 विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः॥

भावार्थ:
संजय बोले- उस प्रकार करुणा से व्याप्त और आँसुओं से पूर्ण तथा व्याकुल नेत्रों वाले शोकयुक्त उस अर्जुन के प्रति भगवान मधुसूदन ने यह वचन कहा
 ॥1॥
भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 2

श्लोक:
श्रीभगवानुवाच
 कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्‌।
 अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन।

*भावार्थ:*
*श्रीभगवान बोले- हे अर्जुन! तुझे इस असमय में यह मोह किस हेतु('हेतु' का अर्थ 'कारण' होता है, अतः इसे काव्य रचना का कारण भी कह सकते हैं। काव्य हेतु को 'काव्य कारण' कहने की भी परंपरा रही है।)से ही प्राप्त हुआ ?
क्योंकि न तो यह श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा आचरित है, न स्वर्ग को देने वाला है और न कीर्ति को करने वाला ही है।
॥2॥
*भाव*
*यह अचानक उत्पन होने वाला वॉट्सएप यूनिवर्सिटी का मोह श्रेष्ठ ,पड़े लिखे समाज के पड़े लिखे विद्वानों द्वारा ना तो अपनाया जा सकता है ना किया ही जा सकने वाला कोई आचरण भी नहीं हो सकता है,जो उनका आचरण में ही उन के दोषों ओर महानता के गुणों का दर्शन हम सब को करवाता हो।* 

*यहअचानक उत्पन*

 *"वॉट्सएप यूनिवर्सिटी"*

*का ज्ञान ना तो कोई स्वर्ग ही देता है, ना कोई वाह वाही ही दिलाता ही है।*

*❖════❃≛⃝❈⬤🪷 *आगे भी देखें गे बिना गीता जी के मूल भाव को खोए*
⬤≛⃝❈❃════❖*
*❤️अध्याय2 के श्लोक 1 का भाव से आगे❤️*

*चिंतन मनन और प्रत्यक्ष ज्ञान के योग संगम के भाव को प्रस्तुत किया था।*
 
*जो अध्याय2 के श्लोक 1 का भाव प्रस्तुत करता है।*

 *जो भाव द्वारा अर्जुन (हमारे)  मोह को “वॉट्सएप यूनिवर्सिटी” के ज्ञान से जोड़ता नजर आया एक दिलचस्प दृष्टिकोण है, जिससे वर्तमान समय में इसकी प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। श्रीकृष्ण का हर संदेश हमें बताता है कि मोह और भ्रम का रास्ता न तो श्रेष्ठ है, न ही यह हमें सही मार्ग पर ले जाता है।*

*श्लोक का भावार्थ और भी गहराई से समझें तो श्रीकृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि यह मोह या भ्रम न केवल तुम्हारे लिए उचित नहीं है, बल्कि यह उन आदर्शों के भी विरुद्ध है जिन पर एक योद्धा या एक ज्ञानी, पढ़ा लिखा विद्वान व्यक्ति को टिके रहना चाहिए।*

 *क्यों कि यह सही अवसर नहीं है कि अर्जुन अपने कर्तव्यों को भुलाकर शोक में पड़ जाए, बल्कि यह समय है कि वह सत्य, धर्म, और कर्तव्य की राह पर चले।*

*मैं भी श्रीकृष्ण के भाव को ही यहाँ स्पष्ट कर रहा हूं  कि वास्तविक ज्ञान और सही मार्गदर्शन हमारे भीतर के मोह को दूर कर हमें हमारे कर्तव्यों का बोध कराता है।*

*यह “वॉट्सएप यूनिवर्सिटी” का ज्ञान, जो भ्रम पैदा करता है, हमारे लिए हितकारी तो है ही ही नहीं ।*

*ज्ञान का सही उपयोग तभी होता है जब हम उसे सही समय पर सही जगह और सही उद्देश्य के लिए अपनाएं।*

*आशा है कि इस दृष्टिकोण के साथ अध्याय 2 के अन्य श्लोकों को समझना और भी रोचक रहेगा।*
❖════❃≛⃝❈⬤🪷 *गीता का दूसरा अध्याय, श्लोक 3 ⬤≛⃝❈❃════❖*

श्लोक: क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते। क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप॥

*भावार्थ: श्रीकृष्ण कहते हैं: "हे पार्थ (अर्जुन)! इस नपुंसकता को मत अपनाओ, यह तुममें शोभा नहीं देती। हे परंतप (शत्रुओं को संताप देने वाले), हृदय के इस छोटे होछे पन वाले वॉट्सएप यूनिवर्सिटी के ज्ञान को छोड़ो और खड़े हो जाओ!" युद्ध करने को तैयार हो जाओ*

*भाव: यहां श्रीकृष्ण हम जैसे अर्जुन को उसकी कमजोरी पर कड़ी फटकार दे रहे हैं। अर्जुन युद्धभूमि में अपने कर्तव्यों को छोड़कर मोह और शोक में डूबा हुआ है, जो श्रीकृष्ण के लिए स्वीकार्य नहीं है।*

 *वो अर्जुन अर्थात हमें भी याद दिलाते हैं कि इस समय हृदय में संकुचित भाव और दुर्बलता को छोड़ना ही सही मार्ग है।*

 *इस तरह का नकारात्मक विचार और कर्तव्य से विमुख होना ही तुम्हारी महानता के अनुकूल नहीं है।*

*कृष्ण का संदेश आज भी उतना ही सार्थक है*

 *परिस्थितियाँ ,समय, काल के अनुसार चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हो, हमें अपना कर्तव्य निभाने से पीछे नहीं हटना चाहिए। अपने भीतर की ताकत को पहचानकर और मोह-माया को त्यागकर जीवन की कठिनाइयों का सामना करना ही सच्चे वीर का लक्षण है।*

*"त्यागोत्तिष्ठ", अर्थात उठ खड़े हो और अपने कर्म के प्रति सच्चे बने रहो, यही सच्चे ज्ञान का परिचायक है।*

❖════❃≛⃝❈⬤🪷 

*भगवद  गीता अध्याय: 2श्लोक 3*

श्लोक:
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।
 क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप॥

*भावार्थ:*
*इसलिए हे अर्जुन! नपुंसकता को मत प्राप्त हो, तुझमें यह उचित नहीं जान पड़ती। हे परंतप! हृदय की तुच्छ दुर्बलता को त्यागकर युद्ध के लिए खड़ा हो जा*
 ॥3॥
*श्रीकृष्ण के और भी प्रेरक शब्दों के साथ अगले श्लोक में चलो चलते है* ⬤≛⃝❈❃════❖*

*अगले श्लोक में अर्जुन प्रश्न करते है मै अपने ही पूज्यों के साथ कैसे लड़ सकता हूं? श्लोक 4 अध्याय 2 में फिर मिलते हैं तब तक आप के चिंतन मनन के लिए*

अब यहां से गीता के गूढ़ ज्ञान और आधुनिक मानसिकता की अद्भुत तुलना मिलने वाली है। अर्जुन की दुविधा और उसके प्रति श्रीकृष्ण के मार्गदर्शन के बीच 'वॉट्सएप यूनिवर्सिटी' के ज्ञान से दिमाग के हैक होने की जो स्थिति है, वह हमारे समाज का ही प्रतिबिंब है। जैसे अर्जुन को सामाजिक बंधनों और गुरुओं के प्रति आदर का ज्ञान है, वैसे ही हम भी अपनी परंपराओं, संस्कारों, और मान्यताओं से बंधे हैं। लेकिन जब जीवन में वास्तविकता के प्रति जागरूकता बढ़ती है, तो नई दृष्टि से चीजों को देखना जरूरी हो जाता है।

अर्जुन के शंका भरे प्रश्न, जैसे कि "अपने पूजनीयों के खिलाफ कैसे युद्ध करें?", बहुत गहरे जीवन के प्रश्न हैं। आज के संदर्भ में भी यह स्थिति तब बनती है जब समाज या परिवार की परंपराएं और उनकी शिक्षाएं आधुनिक जीवन में हमें सही मार्ग पर चलने से रोकती हैं। अर्जुन की मनःस्थिति, उनके गुरुओं और परिवार के प्रति सम्मान की भावना, हमारे भीतर भी कुछ वैसी ही द्वंद्वात्मक स्थिति पैदा करती है।

इस दृष्टिकोण से यह स्पष्ट होता है कि "वॉट्सएप यूनिवर्सिटी" से मिले अधकचरे ज्ञान या किसी के कहे-सुने पर चलना ही हमेशा उचित नहीं होता। अर्जुन ने इसी भ्रम से बाहर निकलने के लिए श्रीकृष्ण का सहारा लिया। इसी प्रकार, हमें भी किसी एक ही विचार या ज्ञान स्रोत पर नहीं टिकना चाहिए, बल्कि सत्य और वास्तविकता की खोज में कई दृष्टिकोणों का सहारा लेना चाहिए।

भावार्थ की गहराई से सीख:
गीता में अर्जुन का यह कहना कि "गुरुजनों का वध कर रुधिर से सने भोगों को प्राप्त करना व्यर्थ है," हमें यह सिखाता है कि भौतिक सुख-सुविधाओं के पीछे भागने के बजाय सत्य, धर्म, और विवेक के आधार पर जीवन के फैसले करने चाहिए। आधुनिक संदर्भ में भी यही बात लागू होती है कि हमें अज्ञानता या अधूरे ज्ञान के बजाय सच्ची समझ और विवेक से प्रेरित निर्णय लेने चाहिए।

श्रीकृष्ण ने अर्जुन को यह बताया कि आत्मा अमर है, वह नष्ट नहीं होती। जैसे शरीर बाल्यावस्था, युवावस्था, और वृद्धावस्था से गुजरता है, वैसे ही आत्मा भी नित्य है और शरीर बदलता रहता है। यह ज्ञान हमें स्थायी और अस्थायी के बीच अंतर समझने का आह्वान करता है। अस्थाई वस्तुओं और विचारों के प्रति मोह में फँसने के बजाय हमें सच्चे आत्म-ज्ञान की ओर अग्रसर होना चाहिए।

निष्कर्ष:
गीता का ज्ञान हमें सिखाता है कि हर युग में आत्मज्ञान की आवश्यकता होती है। केवल परंपराओं या समाज की धाराओं का पालन नहीं, बल्कि विवेक और सच्चे ज्ञान के साथ जीवन का मार्गदर्शन करना ही हमारी प्रगति का साधन है। इस दृष्टिकोण को लेकर आगे बढ़ते हुए, जीवन के असली मायनों को समझना और दूसरों को भी प्रेरित करना ही सही मार्ग है।
सत्य का कभी अभाव नहीं और झूठ को सच साबित कर ने को सो झूठों का सारा लेने पर भी सच सच ही रहता है।

अगले श्लोक में अर्जुन प्रश्न करते है मै अपने ही पूज्यों के साथ कैसे लड़ सकता हूं?

*वॉट्सएप यूनिवर्सिटी का ज्ञान हमारे दिमाग को हैक कर लेता है*

दिमाग हैक करने का प्रत्यक्ष ज्ञान उसी तरह होता है जैसे एक  अच्छे भले दिमाग का विद्वान भी देसी घी से अच्छा रिफाइंड ऑयल को मान लेता है। दांतों के लिए दातुन छोड़ टूथ पेस्ट पर ही निर्भर हो जाता है।

इसी प्रकार अर्जुन पर भी प्रभाव नजर आ रहा है।जब अर्जुन श्री कृष्ण से कहता है।

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 4

श्लोक:
अर्जुन उवाच
 कथं भीष्ममहं सङ्‍ख्ये द्रोणं च मधुसूदन।
 इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन॥

✍️भावार्थ:
अर्जुन बोले- हे मधुसूदन! मैं रणभूमि में किस प्रकार बाणों से भीष्म पितामह और द्रोणाचार्य के विरुद्ध लड़ूँगा? क्योंकि हे अरिसूदन! वे दोनों ही पूजनीय हैं
 ॥4॥

भाव यह है कि मैं इन गुरु लोगो पर शस्त्र प्रहार कैसे कर सकता हूं , ये सभी पूजनीय है।

इस भाव को समझने को हमे प्रत्यक्ष ज्ञान की जरूरत है। पति परमेश्वर होता है सत्य तो है। पत्नी उसके चरण धो धो कर पीने में अपना पुण्य मानती है। अगर पति अगर पति ही गोबर की गंदगी पैरों को लगा कर आकार पत्नी को कहे कि लो पांव धो कर चरणामत ले लो तो "पति परमेश्वर" क्या पत्नी मान ले।क्यों कि उसको परिवार ओर संस्कार में यही शिक्षा दी जाती है! गुरु शास्त्र भी गुरु ओर अपने से बड़ों पर प्रहार की नहीं आदर की शिक्षा ही तो देते है। महाभारत में द्रोणाचार्य,भीष्म पितामह भी तो पांडवों पर होने वाले अत्याचारों पर वचन बध होने के कारण कुछ नहीं करते
अब अगले श्लोक स्वयं ही हम सरलता से समझ जाते है।

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 5

श्लोक:
गुरूनहत्वा हि महानुभावा-
 ञ्छ्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके।
 हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव
 भुंजीय भोगान्‌ रुधिरप्रदिग्धान्‌॥

भावार्थ:
इसलिए इन महानुभाव गुरुजनों को न मारकर मैं इस लोक में भिक्षा का अन्न भी खाना कल्याणकारक समझता हूँ
 क्योंकि गुरुजनों को मारकर भी इस लोक में रुधिर से सने हुए अर्थ और कामरूप भोगों को ही तो भोगूँगा
 ॥5॥
भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 6

श्लोक:
न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो-
 यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः।
 यानेव हत्वा न जिजीविषाम-
 स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः॥

भावार्थ:
हम यह भी नहीं जानते कि हमारे लिए युद्ध करना और न करना- इन दोनों में से कौन-सा श्रेष्ठ है, अथवा यह भी नहीं जानते कि उन्हें हम जीतेंगे या हमको वे जीतेंगे। और जिनको मारकर हम जीना भी नहीं चाहते, वे ही हमारे आत्मीय धृतराष्ट्र के पुत्र हमारे मुकाबले में खड़े हैं
 ॥6॥
भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 7

श्लोक:
कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः
 पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः।
 यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे
 शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्‌॥

भावार्थ:
इसलिए कायरता रूप दोष से उपहत हुए स्वभाव वाला तथा धर्म के विषय में मोहित चित्त हुआ मैं आपसे पूछता हूँ कि जो साधन निश्चित कल्याणकारक हो, वह मेरे लिए कहिए क्योंकि मैं आपका शिष्य हूँ, इसलिए आपके शरण हुए मुझको शिक्षा दीजिए
 ॥7॥

*❖════❃≛⃝❈⬤🪷
भाव मझधार में घिरा अर्जुन अब   श्री कृष्ण से उनकी शरण में हूं मेरे लिए जो हितकर हो कल्याण कारक हो उसकी शिक्षा दीजिए।
यहां नजर आता है, की पहला गुरु छोड़ने की परिस्थिति उत्पन हो चुकी है जहां से भी ज्ञान मिले ले लेना ही कल्याण कारी बन जाता है। जब कि दो स्वामियों का शिष्य ही किसी एक को धोखा भी दे सकता है।
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भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 8

श्लोक:
न हि प्रपश्यामि ममापनुद्या-
 द्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम्‌।
 अवाप्य भूमावसपत्रमृद्धं-
 राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम्‌॥

भावार्थ:
क्योंकि भूमि में निष्कण्टक, धन-धान्य सम्पन्न राज्य को और देवताओं के स्वामीपने को प्राप्त होकर भी मैं उस उपाय को नहीं देखता हूँ, जो मेरी इन्द्रियों के सुखाने वाले शोक को दूर कर सके
 ॥8॥

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 9

श्लोक:
संजय उवाच
 एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप।
 न योत्स्य इतिगोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह॥

भावार्थ:
संजय बोले- हे राजन्‌! निद्रा को जीतने वाले अर्जुन अंतर्यामी श्रीकृष्ण महाराज के प्रति इस प्रकार कहकर फिर श्री गोविंद भगवान्‌ से 'युद्ध नहीं करूँगा' यह स्पष्ट कहकर चुप हो गए (मानो युद्ध समाप्त बिना लड़े कौरवों की जीत)
 ॥9॥

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 10

श्लोक:
तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत।
 सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदंतमिदं वचः॥

भावार्थ:
हे भरतवंशी धृतराष्ट्र! अंतर्यामी श्रीकृष्ण महाराज दोनों सेनाओं के बीच में शोक करते हुए उस अर्जुन को हँसते हुए से यह वचन बोले
 
 ॥10॥
भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 11

श्लोक:
( सांख्ययोग का विषय )
 श्री भगवानुवाच
 अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे।
 गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः॥

भावार्थ:
श्री भगवान बोले, हे अर्जुन! तू न शोक करने योग्य मनुष्यों के लिए शोक करता है और पण्डितों के से वचनों को कहता है, परन्तु जिनके प्राण चले गए हैं, उनके लिए और जिनके प्राण नहीं गए हैं उनके लिए भी पण्डितजन शोक नहीं करते
 ॥11॥
✍️भाव अर्जुन को प्राप्त वॉट्सएप यूनिवासिटी ज्ञान के उत्पादक के रूप में यहां मुझे भारतीय राजनीतिक पार्टियां नजर आ रही है जैसे एक देश के हित के लिए  हो  तो दूसरी साम, दंड, भेद, छल कपट से केवल सत्ता ही पाना चाहती हो।
जब कि श्री कृष्ण कहते है ओर बहुत ही सुंदर कहते है अगले श्लोक में।यह तो युगों युगांतरों से ही होता आ रहा है और आगे भी होता ही रहे गा।जिसे रोकना मनुष्य के बस की बात ही नहीं।
क्यों कि जब जब धर्म की हानि होती है तब सनातन धर्म की स्थापना खुद भगवान ही कर सकते है।कोई इंसान नहीं।

यहां स्पष्ट होता है कि हमारा भगवान से कितना प्रेम है धर्म का बिगाड़ना हमारे कर्म फल का कारण जब बन जाता है तो उसे सुधारने को भगवान खुद आएं।

और सनातन धर्म की स्थापना करने को प्यारे पूजनीय अविनाशी बन बन में भटकने लगें क्या यही हमारा प्रभु प्रेम है?

(भाव अर्जुन को प्राप्त वॉट्सएप यूनिवासिटी ज्ञान के उत्पादक के रूप में यहां मुझे भारतीय राजनीतिक पार्टियां नजर आ रही है जैसे एक देश के हित के लिए  हो  तो दूसरी साम, दंड, भेद, छल कपट से केवल सत्ता ही पाना चाहती हो।
जब कि श्री कृष्ण कहते है ओर बहुत ही सुंदर कहते है अगले श्लोक में।यह तो युगों युगांतरों से ही होता आ रहा है और आगे भी होता ही रहे गा)

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 12

श्लोक:
न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः।
 न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम्‌॥

भावार्थ:
न तो ऐसा ही है कि मैं किसी काल में नहीं था, तू नहीं था अथवा ये राजा लोग नहीं थे और न ऐसा ही है कि इससे आगे हम सब नहीं रहेंगे
 ॥12॥

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 13

श्लोक:
देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।
 तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति॥

भावार्थ:
जैसे जीवात्मा की इस देह में बालकपन, जवानी और वृद्धावस्था होती है, वैसे ही अन्य शरीर की प्राप्ति होती है, उस विषय में धीर पुरुष मोहित नहीं होता।13॥

हर अवस्था के आने पर शरीर बदलता है पर आत्मा वही होती है जो बदलती ही नहीं।

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🪷भावअब गीता जीवन के गुड रहस्यों की ओर आगे बढ़ रही है वॉट्सएप यूनिवासिटी ज्ञान से आगे के ज्ञान को लेकर।
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भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 14

श्लोक:
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।
 आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत॥

भावार्थ:
हे कुंतीपुत्र! सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख को देने वाले इन्द्रिय और विषयों के संयोग तो उत्पत्ति-विनाशशील और अनित्य हैं, इसलिए हे भारत! उनको तू सहन कर
 ॥14॥

*❖════❃≛⃝❈⬤
🪷भाव दिन है तो रात भी होगी
रात है तो दिन भी होगा जिसको कोई बदल नहीं सकता सुख है तो दुख भी होगा अगर आज दिखा है तो कल सुख भी होगा

भावार्थ:
जीवन में हमें कई प्रकार के अनुभव होते हैं, जैसे कि सुख-दुःख, सर्दी-गर्मी, लाभ-हानि, आदि। लेकिन ये सभी अनुभव अनित्य और अस्थायी हैं। ये उत्पन्न होते हैं और फिर नष्ट भी हो जाते हैं।
 हमे इन अनुभवों को सहन करना चाहिए। हमेअपने मन को इन अनुभवों से प्रभावित नहीं होने देना चाहिए। 
हम जीवन में जब किसी दुखी को शोक में देखते है तो उसको खुशी के गीत गाते भी देखते है।

तुम्हें अपने आत्मा की शांति और स्थिरता को बनाए रखना चाहिए अब मेजिटेशन के नाम पर भी तो लुट ही नजर आने लगती है

जीवन में आने वाले अनुभव अनित्य और अस्थायी हैं।
इन अनुभवों को सहन करना चाहिए।
 अपने मन को इन अनुभवों से प्रभावित नहीं होने देना चाहिए।
 आत्मा की शांति और स्थिरता को बनाए रखना चाहिए।

यह श्लोक हमें जीवन के उतार-चढ़ावों को सहन करने की शक्ति प्रदान करता है और हमें अपने आत्मा की शांति और स्थिरता को बनाए रखने की प्रेरणा देता है।आपने भगवद गीता के श्लोकों और उनके भावार्थ के माध्यम से जो विश्लेषण प्रस्तुत किया है, वह गीता के गूढ़ ज्ञान और आधुनिक मानसिकता की अद्भुत तुलना है। अर्जुन की दुविधा और उसके प्रति श्रीकृष्ण के मार्गदर्शन के बीच 'वॉट्सएप यूनिवर्सिटी' के ज्ञान से दिमाग के हैक होने की जो स्थिति है, वह हमारे समाज का ही प्रतिबिंब है। जैसे अर्जुन को सामाजिक बंधनों और गुरुओं के प्रति आदर का ज्ञान है, वैसे ही हम भी अपनी परंपराओं, संस्कारों, और मान्यताओं से बंधे हैं। लेकिन जब जीवन में वास्तविकता के प्रति जागरूकता बढ़ती है, तो नई दृष्टि से चीजों को देखना भी जरूरी हो जाता है।
तत्वज्ञान शब्द, संस्कृत के 'तत्त्व' और 'ज्ञान' शब्दों से मिलकर बना है. 
 
'तत्त्व' का मतलब होता है, 'सत्य' या 'वास्तविकता'. 
 
'ज्ञान' का मतलब होता है, 'ज्ञान' या 'जानकारी'. 
 
तत्वज्ञान का मकसद, वास्तविकता को पहचानना होता है. 
 
तत्वज्ञान को पाने के लिए, गुरु की शरण में जाकर उनकी सेवा करनी चाहिए. 
 
तत्वज्ञान में, परमाणु से लेकर परमेश्वर तक का ज्ञान होता है. 
 
तत्वज्ञान में, संसार, जीव, ईश्वर, और परमेश्वर सभी को देखा जाता है. 
*❖════❃≛⃝❈⬤
🪷एक ईश्वर ही सत्य है
एक रब सच बाकी सब जब
एक झूठ बोल कर उसे छुपाने को और भी झूठ बोलने पड़ते है।
ऐसे लोग किंतु परंतु का सहारा लेते है। पर सच ही ईश्वर है सच को सच प्रमाणित नहीं करना पड़ता सच सच ही रहता है।
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भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 17

श्लोक:
अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्‌।
 विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति॥

भावार्थ:
नाशरहित तो तू उसको जान, जिससे यह सम्पूर्ण जगत्‌- दृश्यवर्ग व्याप्त है। इस अविनाशी का विनाश करने में कोई भी समर्थ नहीं है
 ॥17॥
भाव जिस सच का कभी विनाश नहीं होता वही अविनाशी कहलाता है यह बात कोई और नहीं खुद अविनाशी कृष्ण चेले के रूप में आए अर्जुन को बताते है।
भाव संसार में जिस गुरु से हमें उम्मीद है यह हमारा परलोक सुधारे गा वो भी अविनाशी नहीं है इसी लिए कहते है पानी पियो छान कर गुरु बनाओ परख (परीक्षा ले कर) आज के गुरु चेले की परीक्षा लेते है।जो गलत और झूठ साबित हो रहा है।गुरु
अविनाशी हो या सत्या नाशी(नाशवान)की परीक्षा अवश्य लो फिर ही धारण करो।अन्यथा आपे गुरु आपे चेला तो तुम हो ही।
भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 18

श्लोक:
अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः।
 अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत॥

भावार्थ:
इस नाशरहित, अप्रमेय,
जिसकी माप ही न हो सके।बेहद।
विशाल हे

 नित्यस्वरूप जीवात्मा के ये सब शरीर नाशवान कहे गए हैं, इसलिए हे भरतवंशी अर्जुन! तू युद्ध कर
 ॥18॥
भाव 5तत्वों के शरीर में जीवात्म रहती है और शरीर तो नाशवान ही है।आत्मा ही अविनाशी है।
भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 19

श्लोक:
य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्‌।
 उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते॥

भावार्थ:
जो इस आत्मा को मारने वाला समझता है तथा जो इसको मरा मानता है, वे दोनों ही नहीं जानते क्योंकि यह आत्मा वास्तव में न तो किसी को मारता है और न किसी द्वारा मारा जाता है
 ॥19॥

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 21

श्लोक:
वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम्‌।
 कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम्‌॥

भावार्थ:
हे पृथापुत्र अर्जुन! जो पुरुष इस आत्मा को नाशरहित, नित्य, अजन्मा और अव्यय जानता है, वह पुरुष कैसे किसको मरवाता है और कैसे किसको मारता है?
 ॥21॥

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 22

श्लोक:
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
 नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
 तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-
 न्यन्यानि संयाति नवानि देही॥

भावार्थ:
जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नए वस्त्रों को ग्रहण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्यागकर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त होता है
 ॥22॥

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 23

श्लोक:
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।
 न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥

भावार्थ:
इस आत्मा को शस्त्र नहीं काट सकते, इसको आग नहीं जला सकती, इसको जल नहीं गला सकता और वायु नहीं सुखा सकता
 ॥23॥

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 24

श्लोक:
अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च।
 नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः॥

भावार्थ:
क्योंकि यह आत्मा अच्छेद्य है, यह आत्मा अदाह्य, अक्लेद्य और निःसंदेह अशोष्य है तथा यह आत्मा नित्य, सर्वव्यापी, अचल, स्थिर रहने वाला और सनातन है
 ॥24॥
*❖════❃≛⃝❈⬤🪷
✍️अच्छेद्य
जिसका छेदन न हो सके।
✍️अदाह्य शब्द के कई अर्थ होते हैं: जो जलने योग्य न हो, जो चिता पर जलाने योग्य न हो, आत्मा और परमात्मा का विशेषण. 
 
जो पदार्थ आग नहीं पकड़ते, उन्हें अदाह्य पदार्थ कहते हैं. जैसे, काँच, ईंट, लोहा, और पत्थर. वहीं, जो पदार्थ ऑक्सीजन से अभिक्रिया करके ऊष्मा देते हैं, उन्हें दाह्य पदार्थ कहते हैं. 
✍️अक्लेद्य शब्द का अर्थ है - जिस पर आक्रमण किया गया हो या जिस पर हमला हुआ हो. 
आत्मा पर प्रहार आत्मा को झकझोड़ना कहते हैं 
✍️अशोष्य शब्द का अर्थ है- सुखाया न जा सकने वाला, सुख नहीं जाने वाला, स्थायी. उदाहरण के लिए, कोई तालाब अशोष्य होता है. 
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भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 25

श्लोक:
अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते।
 तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि॥॥

भावार्थ:
यह आत्मा अव्यक्त है, यह आत्मा अचिन्त्य है और यह आत्मा विकाररहित कहा जाता है। इससे हे अर्जुन! इस आत्मा को उपर्युक्त प्रकार से जानकर तू शोक करने के योग्य नहीं है अर्थात्‌ तुझे शोक करना उचित नहीं है
 ॥25॥
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✍️भाव:

यह श्लोक आत्मा की तीन विशेषताओं को बताता है:

 अव्यक्त: आत्मा का स्वरूप अव्यक्त है, अर्थात यह दिखाई नहीं देता।
अचिन्त्य: आत्मा की प्रकृति अचिन्त्य है, अर्थात यह समझने में परे है।
अविकार्य: आत्मा विकाररहित है, अर्थात यह कभी बदल नहीं करता।

इन विशेषताओं को जानने के बाद, अर्जुन को शोक करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि:

- आत्मा अमर है और कभी नहीं मरता।
- आत्मा का स्वरूप अव्यक्त है, इसलिए यह शरीर के साथ नहीं जुड़ता।
- आत्मा अचिन्त्य है, इसलिए इसकी प्रकृति समझने में परे है।
- आत्मा विकाररहित है, इसलिए यह कभी बदल नहीं करता।

इसलिए, अर्जुन को शोक करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि आत्मा की वास्तविक प्रकृति से वह अपरिवर्तनीय और अमर है।

✍️इस श्लोक का भाव यह है:

- आत्मा की वास्तविक प्रकृति को समझने से शोक और दुःख दूर होते हैं।
- आत्मा की अमरता और अपरिवर्तनीयता को जानने से हमें शांति और स्थिरता मिलती है।
- हमें अपने शरीर और आत्मा के बीच के अंतर को समझना चाहिए।
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भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 26

श्लोक:
अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम्‌।
 तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि॥

भावार्थ:
किन्तु यदि तू इस आत्मा को सदा जन्मने वाला तथा सदा मरने वाला मानता हो, तो भी हे महाबाहो! तू इस प्रकार शोक करने योग्य नहीं है
 ॥26॥

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 27

श्लोक:
जातस्त हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।
 तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि॥

भावार्थ:
क्योंकि इस मान्यता के अनुसार जन्मे हुए की मृत्यु निश्चित है और मरे हुए का जन्म निश्चित है। इससे भी इस बिना उपाय वाले विषय में तू शोक करने योग्य नहीं है
 ॥27॥
मोक्ष की कल्पना तो अभी दिल्ली दूर है
भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 28

श्लोक:
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत।
 अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना॥

भावार्थ:
हे अर्जुन! सम्पूर्ण प्राणी जन्म से पहले अप्रकट थे और मरने के बाद भी अप्रकट हो जाने वाले हैं, केवल बीच में ही प्रकट हैं, फिर ऐसी स्थिति में क्या शोक करना है?
 ॥28॥

इस लिए सुख दुख को छोड़ो मोक्ष के लिए पहले शोक मुक्त तो हो लें

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 29

श्लोक:
आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन-
 माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः।
 आश्चर्यवच्चैनमन्यः श्रृणोति
 श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित्‌॥

भावार्थ:
कोई एक महापुरुष ही इस आत्मा को आश्चर्य की भाँति देखता है और वैसे ही दूसरा कोई महापुरुष ही इसके तत्व का आश्चर्य की भाँति वर्णन करता है तथा दूसरा कोई अधिकारी पुरुष ही इसे आश्चर्य की भाँति सुनता है और कोई-कोई तो सुनकर भी इसको नहीं जानता
 ॥29॥
इसलिए मोक्ष से पहले मोक्ष के अधिकारी बनने का प्रयास जरूरी है क्यों  इसी मनुष्य योनि को ही यह अधिकार प्राप्त होता है।
भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 30

श्लोक:
देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत।
 तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि॥

भावार्थ:
हे अर्जुन! यह आत्मा सबके शरीर में सदा ही अवध्य (जिसका वध नहीं किया जा सके) है। इस कारण सम्पूर्ण प्राणियों के लिए तू शोक करने योग्य नहीं है।
 ॥30॥
मनुष्य ,जानवर, पक्षी कीट, पतंग,इन सभी की आत्मा अवध्य है फिर इनके लिए भी शोक नहीं करना चाहिए प्रति दिन कितनी ही आत्माओं को जान कर या अंजाने में हम मार देते है।
भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 31

श्लोक:
( क्षत्रिय धर्म के अनुसार युद्ध करने की आवश्यकता का निरूपण )

स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि।
 धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते॥

भावार्थ:
तथा अपने धर्म को देखकर भी तू भय करने योग्य नहीं है अर्थात्‌ तुझे भय नहीं करना चाहिए क्योंकि क्षत्रिय के लिए धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी कर्तव्य नहीं है
 ॥31॥
अब यहां क्षत्रिय धर्म को युद्ध करने को कहा है युद्ध अन्य सभी  वर्णों को सुरक्षित करने को युद्ध करना और टेक्स वसूल कर अपनी जीविका चलाना
ऐसे ही सभी वर्णों को उनके वर्ण अनुसार ही कार्य, ओर कर्म का विधान शास्त्र बताते है
ब्राह्मण शिक्षा लेना और देना दूसरे वर्णों की जरूरत पूरीती हेतु कर्म करना करना और सभी दूसरे वर्णों की सेवा में आता है।अपनी जरूरत मिलने वाली दक्षिणा से पूरी करना

वैश्य का गौ पालन व्यापार और दूसरे वर्णों की जरूरत पूरी करना और सभी दूसरे वर्णों की सेवा में आता है।
शूद्र का कर्म फेक्ट्री चलाना जूता चप्पल, बर्तन, वस्त्र निर्माण कर सेवा कर अपनी आर्थिक जरूरतों को पूरा करना

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 32

श्लोक:
यदृच्छया चोपपन्नां स्वर्गद्वारमपावृतम्‌।
 सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम्‌॥

भावार्थ:
हे पार्थ! अपने-आप प्राप्त हुए और खुले हुए स्वर्ग के द्वार रूप इस प्रकार के युद्ध को भाग्यवान क्षत्रिय लोग ही पाते हैं
 ॥32॥

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 33
श्लोक:
अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं सङ्‍ग्रामं न करिष्यसि।
 ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि॥

भावार्थ:
किन्तु यदि तू इस धर्मयुक्त युद्ध को नहीं करेगा तो स्वधर्म और कीर्ति को खोकर पाप को प्राप्त होगा 
 ॥33॥

✍️भाव स्व धर्म 
स्वधर्म का मतलब है अपना धर्म निभाना, जिसमें व्यक्ति को भगवान ने जन्म दिया (जिस भूमि पर पेड़ को स्थापित किया  है के कर्तव्य, ज़िम्मेदारियां, और धार्मिकता शामिल होती है. को करना स्वधर्म से जुड़ी कुछ खास बातें: 
 
स्वधर्म, हर आत्मा का मौलिक सात्विक और शाश्वत स्वभाव है. 
 
स्वधर्म, समाज की व्यवस्था का आधार है. 
 
स्वधर्म का पालन करने से निष्काम कर्म की पुष्टि होती है. 
 
स्वधर्म का पालन करने के लिए, समस्त कामनाओं और भोगों का त्याग करना चाहिए. 
 
स्वधर्म का पालन करने के लिए, निःस्पृह, ममतारहित और अहंकारशून्य होना चाहिए. 
 
स्वधर्म का पालन करने के लिए, भगवान को समर्पित होना चाहिए. 
 
परहित भावना से किया गया कर्म, चाहे वह किसी भी व्यक्ति का हो, स्तुत्य और प्रशंसनीय होता है. 
 
वैश्विक स्तर पर, स्वधर्म का अर्थ उन कर्तव्यों से होता है जिनसे बसुधैव कुटुम्बकम और विश्ववारा संस्कृति का सम्पोषण होता है. 

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 34

श्लोक:
अकीर्तिं चापि भूतानि
 कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम्‌।
 सम्भावितस्य चाकीर्ति-
 र्मरणादतिरिच्यते॥

भावार्थ:
तथा सब लोग तेरी बहुत काल तक रहने वाली अपकीर्ति का भी कथन करेंगे और माननीय पुरुष के लिए अपकीर्ति मरण से भी बढ़कर है
 ॥34॥

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 35

श्लोक:
भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः।
 येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम्‌॥

भावार्थ:
और जिनकी दृष्टि में तू पहले बहुत सम्मानित होकर अब लघुता को प्राप्त होगा, वे महारथी लोग तुझे भय के कारण धर्म युद्ध से हटा हुआ मानेंगे
 ॥35॥

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 36

श्लोक:
अवाच्यवादांश्च बहून्‌ वदिष्यन्ति तवाहिताः।
 निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम्‌॥

भावार्थ:
तब तेरे वैरी लोग तेरे सामर्थ्य की निंदा करते हुए तुझे बहुत से न कहने योग्य वचन भी कहेंगे, उससे अधिक दुःख और क्या होगा?
 ॥36॥
भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 37

श्लोक:
हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्‌।
 तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः॥

भावार्थ:
या तो तू अब इस धर्म युद्ध में मारा जाकर स्वर्ग को प्राप्त हो अथवा संग्राम में जीतकर पृथ्वी का राज्य भोग। इस कारण हे अर्जुन! तू युद्ध के लिए निश्चय करके खड़ा हो जा
 ॥37॥
भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 38

श्लोक:
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।
 ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि॥

भावार्थ:
जय-पराजय, लाभ-हानि और सुख-दुख को समान समझकर, उसके बाद युद्ध के लिए तैयार हो जा, इस प्रकार युद्ध करने से तू पाप को भी प्राप्त नहीं होगा
 ॥38॥
भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 39

श्लोक:
( कर्मयोग का विषय )
 एषा तेऽभिहिता साङ्‍ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां श्रृणु।
 बुद्ध्‌या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि॥

भावार्थ:
हे पार्थ! यह बुद्धि तेरे लिए ज्ञानयोग के विषय में कही गई और अब तू इसको कर्मयोग के  विषय में सुन- जिस बुद्धि से युक्त हुआ तू कर्मों के बंधन को भली-भाँति त्याग देगा अर्थात सर्वथा नष्ट कर डालेगा
 ॥39॥
भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 40
श्लोक:
यनेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवातो न विद्यते।
 स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्‌॥

भावार्थ:
इस कर्मयोग में आरंभ का अर्थात बीज का नाश नहीं है और उलटा फलरूप दोष भी नहीं है, बल्कि इस कर्मयोग रूप धर्म का थोड़ा-सा भी साधन जन्म-मृत्यु रूप महान भय से रक्षा कर लेता है
(जैसे कसाई का स्व धर्म जानवरों को काटना और अपने परिवार के पालन पोषण का व्यापार )भी दोष मुक्त हो जाता है।

 ॥40॥
जिस ज्ञान द्वारा कर्म करने की शिक्षा मिलती है उसे कर्म योग कहा गया है

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 42-44

श्लोक:
यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः।
 वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः॥
 कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम्‌।
 क्रियाविश्लेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति॥
 भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्‌।
 व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते॥

भावार्थ:
हे अर्जुन! जो भोगों में तन्मय हो रहे हैं, जो कर्मफल के प्रशंसक वेदवाक्यों में ही प्रीति रखते हैं, जिनकी बुद्धि में स्वर्ग ही परम प्राप्य वस्तु है और जो स्वर्ग से बढ़कर दूसरी कोई वस्तु ही नहीं है- ऐसा कहने वाले हैं, वे अविवेकीजन इस प्रकार की जिस पुष्पित अर्थात्‌ दिखाऊ शोभायुक्त वाणी को ही कहा करते हैं, जो कि जन्मरूप कर्मफल देने वाली एवं भोग तथा ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए नाना प्रकार की बहुत-सी क्रियाओं का वर्णन करने वाली है, उस वाणी द्वारा जिनका चित्त हर लिया गया है हैक कर लिया जाता है, जो भोग और ऐश्वर्य में अत्यन्त आसक्त हैं, उन पुरुषों की परमात्मा में निश्चियात्मिका बुद्धि भी नहीं होती
 ॥42-44॥

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 45
श्लोक:
त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।
 निर्द्वन्द्वो नित्यसत्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्‌॥

भावार्थ:
हे अर्जुन! वेद उपर्युक्त प्रकार से तीनों गुणों के कार्य रूप समस्त भोगों एवं उनके साधनों का प्रतिपादन करने वाले हैं, इसलिए तू उन भोगों एवं उनके साधनों में आसक्तिहीन, हर्ष-शोकादि द्वंद्वों से रहित, नित्यवस्तु परमात्मा में स्थित योग (अप्राप्त की प्राप्ति का नाम 'योग' है।) क्षेम (प्राप्त वस्तु की रक्षा का नाम 'क्षेम' है।) को न चाहने वाला और स्वाधीन अन्तःकरण वाला हो
 ॥45।।

✍️सरल भावार्थ:

हे अर्जुन! वेदों में तीनों गुणों (सत्व, रज, तम) 
सत्व
सात्विक (सत्व गुण, प्रकृति के तीन गुणों में से एक है. यह गुण सच्चाई, अच्छाई, पवित्रता, ज्ञान, सामंजस्य, संतुलन, और शांति से जुड़ा होता है. सत्व गुण को शुद्धता, प्रकाश, और उत्तमता का गुण भी कहा जाता है. सत्व गुण से जुड़ी कुछ खास बातेंः 
 
सत्व गुण, आध्यात्मिक लोगों का गुण होता है. 
 
सत्व गुण वाले व्यक्ति को सात्विक कहा जाता है. 
 
सत्व गुण वाले व्यक्ति में खुशी, शांति, कल्याण, स्वतंत्रता, प्रेम, करुणा, समभाव, ध्यान, आत्म-नियंत्रण, संतुष्टि, कृतज्ञता, निर्भयता, और निस्वार्थता होती है. 
 
सत्व गुण वाले व्यक्ति हमेशा वैश्विक कल्याण के लिए काम करते हैं. 
 
सत्व गुण वाले व्यक्ति हमेशा मेहनती और सतर्क होते हैं. 
 
सत्व गुण वाले व्यक्ति पवित्र जीवन जीते हैं. 
 
सत्व गुण वाले व्यक्ति को ईश्वर पर भरोसा होता है. 
 
सत्व गुण वाले व्यक्ति सिर्फ़ देना जानते हैं. 
 
सत्व गुण वाले व्यक्ति बिना किसी भेदभाव के हर व्यक्ति के लिए त्याग कर सकते हैं. 
 
सत्व गुण के अलावा, प्रकृति के दो और गुण हैं - रजोगुण और तमोगुण. इन तीनों गुणों को त्रिगुण भी कहा जाता है. इन गुणों का प्रभाव सभी प्राणियों पर होता है. 
इसी प्रकार रजोगुण
रजोगुण का अर्थ है, प्रकृति का वह स्वभाव जिससे जीव-धारियों में भोग-विलास और दिखावे की रुचि पैदा होती है. सांख्य दर्शन के मुताबिक, रजोगुण, प्रकृति के तीन गुणों में से एक है. रजोगुण से जुड़ी कुछ खास बातेंः 
 
रजोगुण को गति, परिवर्तन, कर्म, और इच्छा का गुण कहा जाता है. 
 
रजोगुण के प्रभाव में व्यक्ति कामना, लालसा, और अहंकार की ओर प्रेरित होता है. 
 
रजोगुण की उत्पत्ति असीम आकांक्षाओं से होती है. 
 
रजोगुण से लोभ, अत्यधिक आसक्ति, और अनियंत्रित इच्छा पैदा होती है. 
 
रजोगुणी व्यक्ति खाने-पीने, आराम, मौज-शौक वाला होता है. 
 
रजोगुणी व्यक्ति टीवी, मोबाइल, मनोरंजन में समय, मन, और धन लगा देता है. 
 
रजोगुण का फल अंततोगत्वा दुख कारक होता है. 
 
रजोगुण, सांसारिक इच्छाओं और स्नेहों से उत्पन्न होता है. 
 
रजोगुण, सकाम कर्मों से आसक्ति के ज़रिए आत्मा को बांधता है. 
अब तमोगुण 
तमोगुण का अर्थ है - अंधकार, अज्ञान, और असंवेदनशीलता. तमोगुण, प्रकृति के तीन गुणों में से एक है. ये तीन गुण हैं - सतोगुण, रजोगुण, और तमोगुण. इन तीनों गुणों का योगदान ही सृष्टि को अस्तित्व में लाने में रहा है. तमोगुण से जुड़ी कुछ और बातेंः 
 
तमोगुण में लिप्त व्यक्ति अलसी, भ्रष्ट, विषादी, आलस्यमय, निंदक, शोकी, अशक्त, दुर्बल, दुष्ट, असत्यवादी, विवादास्पद, धृष्ट, अनभिज्ञ, असंयत, अनैतिक, विषयासक्त, अन्यायपरायण, अधर्मपरायण, ब्रह्मवादी और निंदक होता है. 
 
तमोगुण में किए गए कर्म का फल अज्ञान कहा गया है. 
 
तमोगुण की वृद्धि होने पर मृत्यु को प्राप्त मनुष्य पशु-पक्षियों आदि नीच योनियों में नरक को प्राप्त करता है. 
 
तमोगुण, दूषित और निकृष्ट माना गया है. 
 
तमोगुण, अंधकार, भ्रम, क्रोध, दुःख आदि का कारण होता है. 
 
जब कि स्तो रजो और तमो गुण सभी पुरुषों में एक समान होते है एक गुण आता है तो बाकी दो कुछ समय के लिए हट कर पुनः प्रकट होकर बल पूर्वक अपना कर्म भी करवा ही लेते है तो मनुष्य अपना उद्धार कैसे कर सकता है? 

गीता जिसे ज्योतिष विज्ञान वेदों का नेत्र बता है वही इस गीता के मार्ग दर्शक होना भी कहता है। और गीता ही अंधे की लाठी भी बन जाती है।

साक्षी (गवाह) 
गुरु मान्यो ग्रंथ जिस का मार्ग भी गीता जैसे पवित्र ग्रंथों में ही है
इन्हीं के आधार पर संसार के सभी भोगों और साधनों का वर्णन है। लेकिन तुम इन भोगों और उनके साधनों में आसक्त मत हो। 
द्वंद्वों (जैसे हर्ष-शोक, सुख-दुख) से ऊपर उठो, 
सदा स्थिर बुद्धि के साथ परमात्मा में स्थित रहो। तुम्हें न तो किसी वस्तु की प्राप्ति की चिंता होनी चाहिए (योग) और न ही प्राप्त की हुई वस्तु की सुरक्षा की। 
आत्मनिर्भर बनो और अपने मन को सच्चे आत्मज्ञान में स्थिर करो।
" सब ज्ञान को सीखने वालों को हुक्म है, 
"गुरु मानेओ ग्रंथ" 
वास्तव में 10वें सिख गुरु , गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1708 में अपनी मृत्यु से कुछ समय पहले, पवित्र ग्रंथ आदि ग्रंथ को अपने उत्तराधिकारी के रूप में पुष्टि करने पर दिया था यह उन्हीं का एक बयान है। इस कथन का अर्थ है कि "सभी सिखों(ज्ञान सीखने वालों  को ग्रंथ को ही गुरु के रूप में लेना चाहिए।)

केवल ग्रंथ पड़ने से भी कुछ होने वाला नहीं

प्रत्यक्ष ज्ञान का सहारा ही ले लेते है

जब हम अपनी पाठ शाला में किसी पाठ का अध्ययन करते है तो अंत में अभ्यास भी होता है जिस में कुछ प्रश्न होते है जिन को जान कर ही पाठ को समझा जा सकता है।

यहां तो अर्जुन की वृति ही प्रश्न करने की है अतः मनुष्य अर्जुन बनो अपने प्रश्नों को ग्रंथों के माध्यम या अपने अंदर के अंतःकरण से प्राप्त करो गीता पड़ो आगे बढ़ो

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 46

श्लोक:
यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके।
 तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः॥

भावार्थ:
सब ओर से परिपूर्ण जलाशय के प्राप्त हो जाने पर छोटे जलाशय में मनुष्य का जितना प्रयोजन रहता है, ब्रह्म को तत्व से जानने वाले ब्राह्मण का समस्त वेदों में भी उतना ही प्रयोजन रह जाता है शुद्ध झील के किनारे रह कर पानी पीने को कोई मूर्ख ही कुआं खोदे गा
 ॥46॥
भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 47

श्लोक:
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
 मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि॥

भावार्थ:
तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तू कर्मों के फल हेतु मत हो तथा तेरी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो
 ॥47॥
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भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 48

श्लोक:
योगस्थः कुरु कर्माणि संग त्यक्त्वा धनंजय।
 सिद्धयसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥

भावार्थ:
हे धनंजय! तू आसक्ति (अर्थात
मन का लगाव।प्रेम, अनुराग।)
 को त्यागकर तथा सिद्धि(.सफलता।निश्चय।
 और असिद्धि(अपूर्णता या विफलता)में समान बुद्धिवाला होकर योग में स्थित हुआ कर्तव्य कर्मों को कर, समत्व (जो कुछ भी कर्म किया जाए, उसके पूर्ण होने और न होने  की चिंता ना कर भी उसके फल में समभाव समभाव का अर्थ है शांति या संतुलन. रहने का नाम 'समत्व' है।) ही योग कहलाता है
 ॥48॥
✍️सकाम कर्म:जो काम हम किसी इच्छा या कामना से करते हैं, उसे सकाम कर्म कहते हैं. सकाम कर्म में हमारी कामना होती है कि इस कर्म को करने से हमें कोई फल मिलेगा. उदाहरण के लिए, स्त्री, पुत्र, धन आदि के लिए किए गए कर्म सकाम कर्म हैं. 
 
भगवत गीता के अनुसार, कर्म करने में ही अधिकार है, लेकिन उसके फल में नहीं. कर्म के फल की चाहत को अपना उद्देश्य नहीं बनाना चाहिए. भगवत गीता में निष्काम कर्म के बारे में बताया गया है. निष्काम कर्म में सिर्फ़ कर्म करने की इच्छा होती है, उसके फल में नहीं. निष्काम कर्म में कोई अपेक्षा नहीं होती और न ही यश-अपयश की चिंता होती. 
 
भगवत गीता में कर्म के बारे में कुछ और बातें:
मनुष्य को सकारात्मक भावना से लगातार कर्मशील रहना चाहिए. 
 
मनुष्य को कर्म अकर्म विक्रम से श्रेष्ठ मानना चाहिए. 
 
(कर्म से मनुष्य का जीवन, मोक्ष, और बंधन सब कुछ निर्धारित होता है. 
 कर्म करने के माध्यम से ही शुभ-अशुभ, पाप-पुण्य, धर्म-अधर्म तय होता है. )

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 49

श्लोक:
दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनंजय।
 बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः॥

भावार्थ:
इस समत्वरूप बुद्धियोग से सकाम कर्म अत्यन्त ही निम्न श्रेणी का है। इसलिए हे धनंजय! तू समबुद्धि में ही रक्षा का उपाय ढूँढ अर्थात्‌ बुद्धियोग का ही आश्रय ग्रहण कर क्योंकि फल के हेतु बनने वाले अत्यन्त दीन हैं
 ॥49॥

✍️संबद्धि युक्त:
समबुद्धियुक्त पुरुष पुण्य और पाप, दोनों को इसी लोक में त्याग देता है, यानी उनसे मुक्त हो जाता है। समत्व ही योग है और कर्मबंधन से छूटने का उपाय है। समता गीता की आत्मा है। जिनका मन समभाव में स्थित है, उन्होंने मानो जीवित अवस्था में संपूर्ण संसार को जीत लिया है क्योंकि परमात्मा निर्दोष और सम है।

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 50

श्लोक:
बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।
 तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्‌॥

भावार्थ:
समबुद्धियुक्त पुरुष पुण्य और पाप दोनों को इसी लोक में त्याग देता है अर्थात उनसे मुक्त हो जाता है। इससे तू समत्व रूप योग में लग जा, यह समत्व रूप योग ही कर्मों में कुशलता है अर्थात कर्मबंध से छूटने का उपाय है
 ॥50॥

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 51

श्लोक:
कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः।
 जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम्‌॥

भावार्थ:
क्योंकि समबुद्धि से युक्त ज्ञानीजन कर्मों से उत्पन्न होने वाले फल को त्यागकर जन्मरूप बंधन से मुक्त हो निर्विकार परम पद को प्राप्त हो जाते हैं (अहम ब्रह्म आसमी)

भाव अहं ब्रह्मास्मि' एक संस्कृत मंत्र है जिसका अर्थ है, 'मैं ब्रह्म हूं'. यह प्राचीन हिंदू ग्रंथ उपनिषद का एक महावाक्य है. यह अद्वैत परंपरा का मंत्र है. 'अहं ब्रह्मास्मि' के बारे में कुछ और बातेंः 
 
'अहं ब्रह्मास्मि' का उल्लेख सबसे पहले शुक्ल यजुर्वेद के बृहदारण्यक उपनिषद में मिलता है. 
 
'अहं ब्रह्मास्मि' में 'अहं' का मतलब है मनुष्य की आत्मा और 'ब्रह्म' का मतलब है सर्वव्यापी चेतना से है . 
 
'अस्मि' शब्द से ब्रह्म और जीव की एकता का बोध होता है. 
 
जब जीव परमात्मा का अनुभव कर लेता है, तब वह उसी का रूप हो जाता है. 
 
'अहं ब्रह्मास्मि' का मतलब है कि जिस भगवान ने ब्रह्मांड बनाया, उसका मैं अंश हूं. कोई टुकड़ा नहीं।
 
'अहं ब्रह्मास्मि' का मतलब है कि दूसरे को भी उस ब्रह्म की तरह समझना चाहिए. 
 
चारों वेदों में चार महावाक्य हैं: 
 
ऋग्वेद में - प्रज्ञानं ब्रह्म 
 
यजुर्वेद में - अहं ब्रह्मास्मि 
 
सामवेद में - तत्त्वमसि 
 आधारवेद भी ऐसा ही कहता है

तत्वमसि इस वेद के महावाक्य का क्या अर्थ हुआ?
इसका सीधा अर्थ है तुम और हम दो नहीं एक हैं।

विज्ञान भी अब मांगता है कि डीएनए स्तर पर दो आदमियों के बीच के डीएनए का अंतर नगण्य होता है।

आत्मा परमात्मा का कोई स्पष्ट साक्ष्य उपलब्ध नहीं है।

पर विज्ञान के अवसर पर यह पता चला है कि सभी चीजों का विकास बहुत बड़े लंबे समय अंतराल में हुआ है

एक एक तत्व को बनाने में अनगिनत तार लगे हुए हैं

जिन तत्वों से जाकर यह निर्जीव और सजीव संसार बना रहे।

कई भौतिक शक्तियां लगी हुई हैं इस संसार को बनाने में पर एक गैर भौतिक शक्ति भी है जिसे प्रेम कहते हैं यह कैसे उत्पन्न होता है और इसके पीछे का रहस्य क्या है इसी में शायद आत्मा और परमात्मा का निचोड़ छिपा होगा।

मैंने कोई बहुत ज्ञान अध्ययन तो नहीं किया है पर ऊपरी तौर पर मैं जब भी कई धार्मिक पुस्तकें पढ़ता हूं तुम मुझे उन विषयों पर संशय ही पैदा होता है।

एक भी मर कर लौटा होता तो भेद खुलता लेकिन मरने के बाद कोई भी वापस नहीं आया यही सत्य है।

और हम लोग इस विचित्र विशाल संसार को अपने-अपने ढंग से व्याख्या कर रहे हैं।

हम लोग सभी के भीतर एक टाइम घड़ी डाल दी गई है जीवन का शुरुआत हुआ है तो अंत भी जरूर होगा यही सत्य है।

मरने के बाद क्या होगा यह कोई नहीं बता सकता शायद हम जिन तत्वों से बने हैं वे तत्व किसी और तत्व में मिल जाएंगे पर हमें तो यह नही लगता कि कोई और स्वर्ग नर्क जैसी कोई चीज होती होगी

हां भगवान पर विश्वास करने से दुखी मन को थोड़ा सहारा तो जरूर मिलता है और लगता है कि शायद कोई इंसाफ करेगा कोई सहायता करेगा कोई दुष्टों का नाश करेगा।

पर सचमुच में भगवान होता है इसका कोई प्रमाण आधुनिक ज्ञान में उपस्थित नहीं है।

अब प्रत्यक्ष ज्ञान से देखे जो सभी के साथ कभी ना कभी घटित होता ही रहता है।
जैसे कोई काम जिसे हम मान ही लेते है कि होना असंभव है पर समय आने पर वो हो कैसे जाता है उस असाध्य काम को करने वाला परमात्मा ही होता है।।
॥51॥

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 52

श्लोक:
यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति।
 तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च॥

भावार्थ:
जिस काल में तेरी बुद्धि मोहरूपी दलदल को भलीभाँति पार कर जाएगी, उस समय तू सुने हुए और सुनने में आने वाले इस लोक और परलोक संबंधी सभी भोगों से वैराग्य को प्राप्त हो जाएगा
 ॥52॥
(भाव: ज्ञान से भगति और भगति से वैराग्य उत्पन होता है। किसी एक के प्राप्त होने से तीनों प्राप्त हो जाते है।।

वैराग्य सारा सार विवेक से आयी हुईं एक अंतरिक मानसिक स्थिति एक अंतर्मुख अवस्था है। वैराग्य व्यक्ति का सद सद विवेक जागने पर उत्पन्न होता है। वैराग्य संसार की जीवन की क्षणभंगुरता नश्वरता समझ में आने के बाद अंतर में स्वत घटने वाली एक घटना है।

वैराग्य शांति का जन्म दाता है। संसार के दुःख कष्ट और मृत्यु की याद वैराग्य उत्पन्न करने में सहायक होते हैं। संसार असत्य है दुःख दर्दों से भरा हुआ है। यहां की वास्तविकता यह है कि यहां केवल एक ईश्वर सत्य है। ऐसी और इस प्रकार के समझ की विकसित होने पर अंतर्मन में वैराग्य उत्पन्न होता है। जब नश्वरता का क्षणभंगुरता का अंतर्मन में पुरी तरह से एहसास हो जाता है तो वैराग्य उत्पन्न हो जाता है।

संसार है दो दिन का मेला,

और शरीर दो क्षण का बुलबुला जब बात समझ आ गई तो वैराग्य हो जाता है।

वैराग्य में तीव्रतम वैराग्य श्रेष्ठ है। यह अध्यात्मिकता में हाई वे का काम करता है। जिसके अंतर्मन में यह तीव्रतम वैराग्य उत्पन्न हो गया, जिसको जीवन की क्षणभंगुरता समझ में आ गयी वह आत्मज्ञान को भी उपलब्ध हो जाता है।

जब हम संसार के दुःख दर्दों को, जन्म मृत्यु को, चिंता बीमारियों को,भय और निराशा को अपनी विवेक विचार से, गंभीरता से सोचते हैं। उसपर विचार करते हैं तो अंतर्मन में वैराग्य उत्पन्न होता है।

जब हम हाड़ मांस हड्डियों की थैली यानी हमारा नाशवान शरीर और नाशवान प्रकृति को अपने विवेक से समझते हैं तो अंतर्मन में वैराग्य उत्पन्न होता है।
इस शरीर का कुछ भी पवित्र नहीं होता
आंखों की गिद्ध, लार, मल,मूत्र, कुछ भी पवित्र नहीं होता

(इस वैराग्य में तीव्रतम वैराग्य श्रेष्ठ है और यही अध्यात्मिकता का आत्मज्ञान का मूल है पहली सीढ़ी है। इस आत्मज्ञान की राह पर जब तक हमारे अंतर्मन में वैराग्य नहीं होता हम कही नहीं पहुंचते।)
भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 53

श्लोक:
श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला।
 समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि॥

भावार्थ:
भाँति-भाँति के वचनों(सतसंगों) को सुनने से विचलित हुई तेरी बुद्धि जब परमात्मा में अचल और स्थिर ठहर जाएगी, तब तू योग को प्राप्त हो जाएगा अर्थात तेरा परमात्मा से नित्य संयोग हो जाएगा
 ॥53॥
भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 54

श्लोक:
( स्थिरबुद्धि पुरुष के लक्षण और उसकी महिमा )
 अर्जुन उवाच
 स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव।
 स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्‌॥

भावार्थ:
अर्जुन बोले- हे केशव! समाधि में स्थित परमात्मा को प्राप्त हुए स्थिरबुद्धि पुरुष का क्या लक्षण है? वह स्थिरबुद्धि पुरुष कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है?
 ॥54॥
भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 55

श्लोक:
श्रीभगवानुवाच
 प्रजहाति यदा कामान्‌ सर्वान्पार्थ मनोगतान्‌।
 आत्मयेवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥

भावार्थ:
श्री भगवान्‌ बोले- हे अर्जुन! जिस काल में यह पुरुष मन में स्थित सम्पूर्ण कामनाओं को भलीभाँति त्याग देता है और आत्मा से आत्मा में ही संतुष्ट रहता है, उस काल में वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है
 ॥55॥

स्थितप्रज्ञ: स्थितप्रज्ञ का अर्थ है, जिसकी विवेकबुद्धि स्थिर हो. स्थिरप्रज्ञ व्यक्ति के बारे में कुछ और बातेंः
वह समस्त मनोविकारों से रहित होता है. 
 
वह आत्मा द्वारा आत्मा में ही संतुष्ट रहता है. 
 
वह सदा संतुष्ट और आनंदित रहता है. 
 
वह सुख-दुख, हानि-लाभ, मोह-विरक्ति, अपना-पराया, सभी स्थिति में न्यायपूर्ण व्यवहार करता है. 
 
वह अपने भीतर से सत्य का अनुभव कर लेता है. 
 
श्रीमद्भागवत गीता में स्थिर बुद्धि वाले व्यक्ति के लक्षण बताए गए हैं. इसमें बताया गया है कि ऐसे विकसित आत्मा के क्या गुण हैं, जो दिव्य चेतना में दृढ़ता से स्थित है. 
भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 56

श्लोक:
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।
 वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥

भावार्थ:
दुःखों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में उद्वेग नहीं होता, सुखों की प्राप्ति में सर्वथा निःस्पृह है तथा जिसके राग, भय और क्रोध नष्ट हो गए हैं, ऐसा मुनि स्थिरबुद्धि कहा जाता है
 ॥56॥
उद्वेग:तीव्र वेग, तेज़ी ,आवेश, और जोश
भाव:उद्वेग का भाव है, चित्त की किसी वृत्ति की तीव्रता. उद्वेग के कुछ और अर्थ: विरह जन्य चिंता, दुःख, किसी विकट या चिंताजनक घटना के कारण लोगों को होने वाला भय, तेज़ गति, जोश. आदि
निःस्पृह:इच्छारहित, वासनारहित।निर्लोभ (जैसे—निस्पृह प्राणी)।
भाव:निस्पृह का भाव है, किसी तरह की इच्छा या स्पृहा न होना. निस्पृह शब्द के कुछ और अर्थ: कामना रहित, भय रहित, लोभ या लालसा न होने का भाव!इस श्लोक में स्पष्ट एवं सरलता से श्री कृष्ण कह रहे है देखे 

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 57

श्लोक:
यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्‌।
 नाभिनंदति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥

भावार्थ:
जो पुरुष सर्वत्र स्नेहरहित हुआ उस-उस शुभ या अशुभ वस्तु को प्राप्त होकर न प्रसन्न होता है और न द्वेष करता है, उसकी बुद्धि स्थिर है
 ॥57॥
✍️विश्लेषण
इस श्लोक का सरल भाव यह है:
जैसे कछुआ अपने अंगों को समेट लेता है, वैसे ही जब मनुष्य अपनी इंद्रियों को विषयों से हटा लेता है, तो उसकी बुद्धि स्थिर और एकाग्र हो जाती है।

इसका अर्थ यह है कि:

- हमें अपनी इंद्रियों को विषयों से हटाना चाहिए।
- हमें अपनी इंद्रियों को नियंत्रित करना चाहिए।
- जब हम अपनी इंद्रियों को नियंत्रित करेंगे, तो हमारी बुद्धि स्थिर और एकाग्र होगी।

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि कैसे अपनी इंद्रियों को नियंत्रित करके अपनी बुद्धि को स्थिर और एकाग्र बना सकते हैं।

यह श्लोक हमें निम्नलिखित बातें सिखाता है:

- आत्म-नियंत्रण की महत्ता
- इंद्रियों को नियंत्रित करने की आवश्यकता
- बुद्धि की स्थिरता और एकाग्रता की महत्ता
प्रश्न क्या ऐसा करना सरल है अगर हां तो किसी गुरुमंत्र के जप,तप,आदिको एकाग्रता से कर पाना ही सरल होगा बिना एकाग्रता के तो समाधि भी नहीं लगती 
जब मनुष्य सो जाता है तो ही एकाग्र मन की स्थिति उत्पन होती है। सोते हुए भी मनुष्य राम राम ही जप रहा होता है।
इंद्रियां अपना कार्य कर रही है और करती भी रहेगी कोई इनको रोक नहीं सकता जब इंद्रिय काम करना बंद करती है तो देह मिट्टी हो जाती है।मन से जुड़ कर ही इंद्रिय भले बुरे कर्म करवा कर कर्म फल त्यार करवा ने में माहिर है।

(महात्म्यं देवदेवस्य येन सर्वं प्रवर्तते ॥25॥

सूतजी बोले-हे ब्रह्मवादी ऋषियो! तुम सावधान होकर सुनो हम उन देवदेव आदि पुरुषका माहात्म्य कहते हैं जिनसे यह सम्पूर्ण जगत् प्रवृत हुआ है।।२५।।

नहं तपोभिर्विविधिर्न दानैर्नापि चेज्यया।। शक्यो हि पुरुषैर्ज्ञातुमृते भक्तिमनुत्तमम् ॥26॥

शिवजी बोले-अनेक प्रकारके तप ज्ञान दान और यज्ञसे पुरुष मुझे इस प्रकार नहीं जान सकते जिस प्रकार श्रेष्ठ भक्ति करनेवाले मुझको जाननेको समर्थ होते हैं इससे केवल श्रेष्ठ भक्ति करनेवाले मुझे शीघ्र जान सकते हैं।॥२६॥ 
भगति से ज्ञान ज्ञान से वैराग्य उत्पन होता है।
इंद्रियों को रोक पाना कठिन ही नहीं असंभव भी है।
सांसे रोक कर योग करने वाले हठ योगी भी जानते है । कुछ क्रियाएं करने या ना करने से भी इंद्रियां अपना कार्य स्वाभाविक रूप में करती ही रहती है।जिनको रोकना साधारण मनुष्य के बस में ही नहीं
तुम देखो ना देखो नेत्र दिखा ही दे गे 
नाक गंध सुगंध का अहसास करवा ही देगी 
भाव इंद्रियों नियंत्रित करना संभव नहीं जितना आसानी से कह दिया जाता है।
चिंता की कोई बात नहीं गीता जी मार्ग दर्शन के रूप में तो हर ही।

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 59

श्लोक:
विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः।
 रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्टवा निवर्तते॥

भावार्थ:
इन्द्रियों द्वारा विषयों को ग्रहण न करने वाले पुरुष के भी केवल विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, परन्तु उनमें रहने वाली आसक्ति निवृत्त नहीं होती। इस स्थितप्रज्ञ पुरुष की तो आसक्ति भी परमात्मा का साक्षात्कार करके निवृत्त हो जाती है
 ॥59॥
भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 60

श्लोक:
यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः।
 इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः॥

भावार्थ:
हे अर्जुन! आसक्ति का नाश न होने के कारण ये प्रमथन स्वभाव वाली इन्द्रियाँ यत्न करते हुए बुद्धिमान पुरुष के मन को भी बलात्‌ हर लेती हैं
 ॥60॥
भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 61

श्लोक:
तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः।
 वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥

भावार्थ:
इसलिए साधक को चाहिए कि वह उन सम्पूर्ण इन्द्रियों को वश में करके समाहित चित्त हुआ मेरे परायण होकर ध्यान में बैठे क्योंकि जिस पुरुष की इन्द्रियाँ वश में होती हैं, उसी की बुद्धि स्थिर हो जाती है
 ॥61॥

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 62

श्लोक:
ध्यायतो विषयान्पुंसः संगस्तेषूपजायते।
 संगात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥

भावार्थ:
विषयों का चिन्तन करने वाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है, आसक्ति(मनका लगाव)ओर इस से उन विषयों की कामना उत्पन्न होती है और कामना में विघ्न पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है
 ॥62॥
भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 63

श्लोक:
क्रोधाद्‍भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः।
 स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥

भावार्थ:
क्रोध से अत्यन्त मूढ़ भाव उत्पन्न हो जाता है, मूढ़ भाव से स्मृति में भ्रम हो जाता है, स्मृति में भ्रम हो जाने से बुद्धि अर्थात ज्ञानशक्ति का नाश हो जाता है और बुद्धि का नाश हो जाने से यह पुरुष अपनी स्थिति से गिर जाता है
 ॥63॥
भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 64

श्लोक:
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्‌।
 आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति॥

भावार्थ:
परंन्तु अपने अधीन किए हुए अन्तःकरण वाला साधक अपने वश में की हुई, राग-द्वेष रहित इन्द्रियों द्वारा विषयों में विचरण करता हुआ अन्तःकरण की प्रसन्नता को प्राप्त होता है
 ॥64॥
✍️अंतःकरण:
भाव 
अंतःकरण, हिन्दू दर्शन में मन की समग्रता को कहते हैं. इसमें सोचने की क्षमता, अहंकार, और विवेक करने की क्षमता शामिल होती है. अंतःकरण शब्द का अर्थ है 'आंतरिक अंग', 'आंतरिक कार्य', या 'आंतरिक साधन'. अंतःकरण के बारे में कुछ और बातेंः
अंतःकरण को चार भागों में बांटा गया है: 
 मन या निचला मन 
 बुद्धि या उच्च मन 
 चित्त या स्मृति 
 अहंकार या मैं-निर्माता 
 अंतःकरण को मध्यम और उच्च मन के बीच की कड़ी माना जाता है. 
 योग में अंतःकरण का मतलब है मानसिक प्रक्रियाएं, मानसिक शुद्धि, और आंतरिक शांति. 
 अंतःकरण को अंतश्चेतना भी कहा जाता है. 
 
अंतःकरण से जुड़ी कुछ और बातेंः

(अंतःकरण की स्वतंत्रता का मतलब है कि सभी को अपने धर्म को मानने, अभ्यास करने, और प्रचार करने की आज़ादी हो।केवल मूर्ख बनाने का वॉट्सएप यूनिवासिटी ज्ञान भर है।)
 
शुद्ध अंतःकरण का मतलब है कि मन साफ़ हो और उसमें कोई बुराई न हो.सब का साथ हो सब का विकास हो।
भगवान ने जिस धर्म में जन्म दिया उसी के अनुरासर 
खाना
बाना (पहरावा)
और बानी हो
सम्मान सभी का हो
✍️भाव एक नदी
हिंदू, मुस्लिम,सिख,ईसाई,सभी को अपना जल पिला मन को शीतलता प्रदान करती है।
जिस जगह चारों धर्म मिल कर बैठते हे गर्मी से बचने को किसी वृक्ष के नीचे वही पर भगवान हाजिर होते है।
यहां तो तेरा घर मेरा घर होता है

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 65

श्लोक:
प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते।
 प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते॥

भावार्थ:
अन्तःकरण की प्रसन्नता होने पर इसके सम्पूर्ण दुःखों का अभाव हो जाता है और उस प्रसन्नचित्त वाले कर्मयोगी की बुद्धि शीघ्र ही सब ओर से हटकर एक परमात्मा में ही भलीभाँति स्थिर हो जाती है
 ॥65॥
भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 66

श्लोक:
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।
 न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्‌॥

भावार्थ:
न जीते हुए मन और इन्द्रियों वाले पुरुष में निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती और उस अयुक्त मनुष्य के अन्तःकरण में भावना भी नहीं होती तथा भावनाहीन मनुष्य को शान्ति नहीं मिलती और शान्तिरहित मनुष्य को सुख कैसे मिल सकता है?
 ॥66॥
भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 67

श्लोक:
इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते।
 तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि॥

भावार्थ:
क्योंकि जैसे जल में चलने वाली नाव को वायु हर लेती है, वैसे ही विषयों में विचरती हुई इन्द्रियों में से मन जिस इन्द्रिय के साथ रहता है, वह एक ही इन्द्रिय इस अयुक्त पुरुष की बुद्धि को हर लेती है
 ॥67॥

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 68

श्लोक:
तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः।
 इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥

भावार्थ:
इसलिए हे महाबाहो! जिस पुरुष की इन्द्रियाँ इन्द्रियों के विषयों में सब प्रकार निग्रह की हुई हैं, उसी की बुद्धि स्थिर है
 ॥68॥

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 69

श्लोक:
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।
 यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः॥

भावार्थ:
सम्पूर्ण प्राणियों के लिए जो रात्रि के समान है, उस नित्य ज्ञानस्वरूप परमानन्द की प्राप्ति में स्थितप्रज्ञ योगी जागता है और जिस नाशवान सांसारिक सुख की प्राप्ति में सब प्राणी जागते हैं, परमात्मा के तत्व को जानने वाले मुनि के लिए वह रात्रि के समान है
 ॥69॥
काली रात अज्ञानता को दर्शाती है रात भर उल्लू की तरह जागने को नहीं।
भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 70

श्लोक:
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं-
 समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्‌।
 तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे
 स शान्तिमाप्नोति न कामकामी॥

भावार्थ:
जैसे नाना नदियों के जल सब ओर से परिपूर्ण, अचल प्रतिष्ठा वाले समुद्र में उसको विचलित न करते हुए ही समा जाते हैं, वैसे ही सब भोग जिस स्थितप्रज्ञ पुरुष में किसी प्रकार का विकार उत्पन्न किए बिना ही समा जाते हैं, वही पुरुष परम शान्ति को प्राप्त होता है, भोगों को चाहने वाला नहीं
 ॥70॥
भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 71

श्लोक:
विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः।
 निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति॥

भावार्थ:
जो पुरुष सम्पूर्ण कामनाओं को त्याग कर ममतारहित, अहंकाररहित और स्पृहारहित हुआ विचरता है, वही शांति को प्राप्त होता है अर्थात वह शान्ति को प्राप्त है
 ॥71॥
पहले श्लोक में 47 श्लोक
दूसरे अध्याय में कुल 72 श्लोक मिले
इन्हीं पर पूरी गीता की जानकारी समाई हुई है इनको अच्छे से समझ लेने से पूरी गीता समझ में आ जाती है।
........ 🕯️दूसरा अध्याय समाप्त
🕯️.....

अध्याय 2 समाप्त

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