गुरुवार, 19 दिसंबर 2024

शिव गीता अध्याय5

अध्याय 5

शिव जी था पाँच मार्ग जाए तो जी कहते हैं इसके उपरान्त उस स्थान में एक आठ का बड़ा रख प्रादुर्भूत हुआ जिसकी अनेक रतनी किसी क्रांति से सब दिशाएं चित्र विचित्र हो गई थी
नदी के किनारे के पंख में जिसके चारों चक्र फिर थे मूर्तियों की झालर और सैकड़ों फिर क्षेत्र से युक्त
के खुर मरे हुए चार गोलों से शोभित मोतियों की झालर और चंदू वे शोभायमान जिसके ध्वजा में विषयों का छिलने था जिसके निकट एक मत नहीं चाहती थी जिस पर रेशम की गड्डियां बिछाई थी
पाँच भूतों के अधिष्ठाता देवताओं से शोभित पारिजात कल्प वृक्ष के फूलों की मालाओं से कच्चे तेल में रखना भी भी उत्पन्न हुई कटोरी के मधुबाला कपूर और अगर धूप खिल उठे हुए से बोरों को आकर्षित करने वाला
प्रलय काल के समान श्रद्धा महान अनेक प्रकार के बाजू से युक्त वीणा वेल्डिंग मधुर मधुरभाषी और किन्नर घरों से युक्त वह रथ था
इस प्रकार की शेष रथ को देखकर वृषभ से उत्तर शिवजी पार्वती सहित वस्त्र की शैय्या वाले कुदरत के स्थान में प्रवेश लिए हुई उसमें देवांगना शेर चमार और वेतन के चलाने थी शिवजी को प्रसन्न करने लगी
शब्दार्थ वहां कंगनों की धूनी और निर्मल मंजूरी के शव वीणा वीरों के ही से मान लो को पूर्ण रही थी
तोतों के वाक्य की मधुरता और फिर कबूतरों के शब्द से जगह शब्द गायब हो गया
प्रसन्नता से अपने फन उठाए हुए शिव जी के भूषण रोग शरीर में लिपटी कपूर को देखकर करोड़ों मयूर प्रखंड को अपनी का दिखाते हुए नृत्य करने की तब शिव जी प्रणाम करते हुए राम को उठाकर प्रसन्न मन से
ढिबरी रखने गई आई और भी दिव्य कमंडल के जल से सावधान तो आचमन कर रामचंद्र को आचमन कर आया और अपनी गोद में बिठाया इसके उपरांत रामचंद्र को दिव्य धनुष अच्छे रखकर और माह पाशुपतास्त्र
प्रदान किया और रामचंद्र ली
हीरा यह मेरा उग्र अर्थ जगत का नाश करने वाला है इस कारण सामान्य युद्ध में इसका प्रयोग नहीं करना इसका निवारण करने वाला त्रिलोकी में दूसरा नहीं है इस कारण ही रहा प्राण संकट उपस्थित होने पर ही
इसका प्रयोग करना उचित है धूसरित समय में इसका प्रयोग करने से जगत का नाश जाता है
फिर जी देवताओं में श्रेष्ठ लोकपालों को बुला प्रसन्न मन होली रामचंद्र को सब कोई अपने अपने अस्त्र प्रधान करून यह रामचंद्र उन रूपी रावण को हुआ भी कहा कि मैंने उसको व भैया है
किन्तु देवताओं से हमारे था इस कारण तुम सब युद्ध में भयंकर कम करने वाले वाहनों का शरीर धारण करके इनकी सहायता करो
इससे तुम सुखी हो कि शिव जी की आज्ञा को सिर पर धारण कर परिणाम कर हाथ जो देवताओं ने शिव जी के चरणों में प्रणाम कर अपने अपने अस्त्र श्रीराम खुद ही विष्णु ने नारायणगढ़ इंद्र ने अहमदाबाद में
ने मुहम्मद पुत्र अगली आग्नेयास्त्र दिया यमराज ने या में आह निकली थी तीली मोहना वरुण ने वध रहा ग्रुप वायु उन्हें भय व्याप्त कुबेर ने सौम्या ईशान ने रुद्र हप्र
सूर्य चंद्रमा भी सौम्या विशुद्ध दिवाली पर्व का आठों भी वाह वाह पत्र प्रदान किया था
दशरथ कुंभा रामचंद्र प्रसन्न हो शिव जी को प्रणाम कर हाथ जोड़े खड़े हो भक्तिपूर्वक श्री रामचंद्र बोली हे भगवन मनुष्यों से तो शहर समुद्र उल्लंघन नहीं किया जाएगा और लंका दूर भेजा था
दानवों को भी दुर्गम ही और वहां करोड़ लोग बड़ी राक्षस रहते ही वे जितेन्द्रिय वेद पाठ करने में तत्पर और आपके हफ्ते ही अनेक प्रकार की माया जानने वाले बुद्धिमान अग्निहोत्री केवल में
और भ्राता लक्ष्मण युद्ध में उनको कैसे झील सकेंगे
शिवजी बोली ही रामचंद्र राव और राक्षसों के मायने में ही विचार करने की कुछ आवश्यकता नहीं है
कि उसका कहा आ गया है
विद्रोही में था और ब्राह्मण का दुख देने रूपी अगर हम में प्रवृत्त हुआ है
झूम रहे थे इस कारण उसकी आयु और लक्ष्मी का भी छः गया है
राज्य जानकी जी की अवमानना की गई
इस कारण तुम भी सहज भारत को की कहा कि वह में मध्य पाने में असमर्थ रहता है
धर्म में वृद्धि करने वाला शत्रु भाग्य से ही प्राप्त होता है
जिस वेद शास्त्र पड़ा हो और सदा धर्म में प्रीति करता हो वह विनाशकाल आने पर धर्म का त्याग कर देता है
जो काफी बडा देवता ब्रह्मा और शिव को दुःख देता कि उसका नाश स्वयं है
घेरा किष्किन्धा नामक नगर में देवताओं के अंश से बहुत से महाबली और तुझे वार्नर उत्पन्न हुए वे सब तुम्हारी सहायता करेंगी
उनके द्वारा ढोल सागर पर सेतु मंगवाना अनेक परिवर्तन लाकर वे भावना पुल भी कि उस पर सपा न उधर जाएंगे
इस प्रकार रावण को उसके साथियों सहित मारकर वहां से ही अपनी प्रिया को दिया जहां संग्राम में शस्त्र से ही जय प्राप्त होने की संभावना हो वहां उत्तरों का प्रयोग न करना और जिनके पास आजकल नहीं है अथवा थोडे शव
तरह ही तो है जो भाग रहे हैं ऐसे पुरुषों के ऊपर दिव्यास्त्र का प्रयोग करने वाला स्वयं नष्ट हो जाता है
बहुत कहने से क्या हल्ला यह संस्था जो मेरा ही उत्पन्न किया में ही इसका पालन और में ही इसका शाह करता हूं
में ही एक जगत की मृत्यु का भी मृत्यु रूप को राज्य में ही इस चराचर जगत का भक्षण करने वाला हूँ
युद्ध रुमा तो सब राक्षस तो मेरे मुख में प्राप्त हो चुके ही तुम निमित्त मात्र होकर संग्राम भी की होगी

शिव गीता अध्याय 4


शिव गीता अध्याय 4
अगस्त जी जब ऐसा कहकर आश्रम कुछ गए तब राम खिड़कियों पर गोदावरी के पवित्र आश्रम में रामचंद्र शिवलिंग का स्थापन कर अगर जी के निर्देशानुसार जुझारसिंह शादी करवाना भी विभूति लगाए
रुद्राक्ष के आवरण पहर शिवलिंग को गोदावरी के पवित्र जल से अभिषेक कर वन के उत्पन्न हुए फूलों और फलों से उनका पूजन कर भस्म लगाए भाषण पर ही शयन करती व्याघ्र चर्म के आसन पर बैठे रहते थे
अनन्य बुद्धि घर शिव सहस्त्रनाम जा लगी
एक महीने तक फलाहार एक महीने तक पत्तों का भोजन एक महीना जलपान और एक महीना पवन को आहत कर की शाम तक हटाकर है इन्द्रियों को जीतकर प्रसन्न मन में ईश्वर का ध्यान कि हृदय कमल पर विराजमान अट्ठानवे
पार्वती को धारण की चार भुजा ने ट्रेन बिजली के समान पीली जटाधारी करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाशमान कोटी चन्द्रमा के समान शीतल कम गहने गहने यज्ञोपवीत शवों का पहली मूवी ज्यादा चरम रही
भक्तों के आश्रयदाता व गायक मुद्रा धारण करने वाली व्याघ्र चर्म का ही स्तरीय ओढ़ी
देवता और असुरों से पूजित हो गई पंच मूर्ख चंद्रमा मस्तक पर धारण किए त्रिशूल और डमरू लिए नित्य अविनाशी शुद्ध अक्षय ने का एक रूप शिवजी का इस प्रकार मिलकर ध्यान करते चार महीने बीत गए
पहले कालिख समुद्र के समान में कर शव
जिस प्रकार से समुद्र मंथन के समय मंदराचल के खिलौने से धोनी भी की सिर्फ राष्ट्र की जलाने की कमी शिव जी के बाद की अग्नि के समान भयंकर महान शब्द सुनकर राम जाएगा चकित हो जब तक गोदावरी के तट की
दृष्टि करती तब तक महा भयंकर महारथी पूंजी जनकपुर
रामचंद्र के आगे उपस्थित हुई उसी तेजी से चकित हो रामचंद्र को दसों दिशाएं धांसू थी
श्रेष्ठ आत्मिक जागृति रीति राजकुमार मोनू को प्राप्त हो गई
पर विचार करके जाना कि यह व्यक्तियों माया माया थी
वे महाबीर उठकर और अपने बड़े को चढ़ाकर तरह दिखने मंत्रों से अभिमंत्रित कर शुभारंभ पर दृष्टि कर भी न ही आग्नेयास्त्र वरना सोमा पुत्र सूर्य सूर्यास्त पांवटा सुदर्शना
महान चक्र काल चक्र वे शुरुआत रुद्राक्ष पाशुपतास्त्र ब्रह्मास्त्र राष्ट्र बेंच राष्ट्र व मात्र और रामा इत्यादि अनेक मंत्रों का राम ही प्रयोग किया
उस पेज में रामचंद्र के अस्त्र और शस्त्र इस प्रकार लीन हो गए जैसे समुद्र भी था और ओनली मग्न हो जाते ही था एक मात्र मिली धनुष जलकर रामचंद्र के हाथ से घिरा फिर ककहरा से जो अंग
में पहनते ही गोरखा जो प्रतीक्षा के आघात से रक्षा करता है
जो शर्म के बने होते ही जलकर गिर पड़ी
ये भी कर लक्ष्मण भयभीत और मूर्छित हो पृथ्वी विधि और रामचन्द्रजी निस्तब्ध हो केवल दिल्ली पृथ्वी पर बैठ गई और आँखें मींचे भयभीत हो शंकर की शरण को प्राप्त हुई और ऊंचे स्वर से ही शीर्ष पर
नाम का जप कर भी न कि और शिवजी को पृथ्वी में दंड प्रेरणा बारह माह करने लगी फिर था
को शुद्ध आय मान करने वाला शब्द लिखा हुआ उद्घोषक पृथ्वी चलाए मां और पर कम हुए तरफा क्षण मात्र हुई थी
चंद्रमा के समान शीतल हुआ जब रामचंद्र नेत्र खोल कर देखते ही तब उन्होंने संपूर्ण भूषण धारक ही वृषभ का दर्शन किया जिसका अम्रत के मंत्री से उत्पन्न हुई मक्खन के फ्रेंड की भांति श्री थे
जिसकी शंघाई में स्वयं में भी भी का तुम्हारी शोभित होती नीलमणि के समान दिल
खंड साम्राज्य भूषित रत्नों की माला से शो भी जो कि शेर चावलों से ही ही घर घर शब्द वाली घंटे काउंसिल दसों दिशाओं को पूर्ण करती हुई वृषभ पर चढ़ी इस सर्वाधिक मरी के समान शोरगुल क्रांति महारथी
जी झुग्गी करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाशमान करुणा चन्द्रमा के समान शीतल व्यास चरण का वस्त्र धारण की न हो का यज्ञोपवीत पहली संपूर्ण अलंकारों से युक्त बिजली के समान पीढ़ी जटाधारी नीलकण्ठ
बिहार का चरम ओढ़ी मस्तक
पर चंद्रमा विरासत की अनेक प्रकार के शस्त्रों से युक्त दस भाव तीन नेत्र युवा को शो में श्री श्री सच्चिदानंद स्वरूप को तथा निकट बैठी हुई कोई चंद्रमुखी नील कमल के तमाम मरकत मणि के समान सुंदर
शरीर वाली मूर्तियों की आबरू गुणों से युक्त तारों से युक्त राष्ट्रीय की तमाम शोभित विंध्य पर्वत के समान ऊंचे इस दिन भर से युक्त सुंदरम अधिभार और सुंदर वस्त्र वाली और डिग्री आभूषणों से युक्त कस्तूरी आती
वे सुगंध लड़ाई विजय माला धारण की नील कमल के समान नेत्रों वाली पीढ़ी के श्री शोभित मुख में ताम्बूल खान ने इसी शो भी अधिनस्थ वाली शिव जी के आलिंगन भी उत्पन्न हुए रोमांच युक्त शरीर वाली सच्चे
आनंद भूतपूर्व फिर लौकी की माता का सुंदर पदार्थों के स्टार की मूर्तिमान पात्र पर भतीजी को रामचंद्र ने देखा इसी प्रकार अपने अपने वाहन पर चढ़े आए हाथ में ली

भुंतर आदि सामना करती अपनी अपनी स्त्रियों से युक्त इन राशि वालों के से भिड़ गए
और सबसे आगे गरुण पर चढ़ी शंख चक्र गदा और पद्म धारण की नींद में के समान शरीर धारी बिजली के समान कान्तिमान लक्ष्मी से युक्त एकाग्र चित्त से रुद्राक्ष अध्याय का पाठ करते हुए जनार्दन और पीछे
हंस पर चढ़े हुए चतुर्मुख ब्रह्मा जी चारों वो खुद से ही ऋक् यजु साम और अट्ठारह इन चारों वेद तथा रिजल्ट्स उक्त का जप करते हुए बड़ी दाढ़ी और जता की
सहित में ईश्वर की स्तुति करती इसलिए
था
शीश के मंत्रों से इस स्तुति करते हुए मुनि मन धन पर गंगा आदि नदियों से युक्त नील वर्ण कहकर श्री शेखर के मंत्रों से शिव जी की स्तुति करती कैलाश पर्वत के समान अनंत आदि महाना रत्न से विभूषित
केवल परीक्षा पास करने वाले और इस स्तुति करते हुए और स्वर्ण की छड़ी हाथ में ली नंदी के आगे स्थित हुई दक्षिण की ओर पर्वत के तमाम मूषक पर चढ़े गणेश जी की मयूर पर चढ़े कहा
के महाकाल और चंदेश्वर घर सेना नायक कर मूर्ति की इधर उधर दिया
ढाबा होने की संभावना मां दूर स्थित काला अग्निहोत्र फीचर है और कुटीर मूर्ति वाले प्रमुख ग्रांड तथा उनके अग्रभाग में नृत्य करने वाली अंग्रेजी ऐसे अनेक मूर्ति वाले करोड़ों मददगार
और अनेक प्रकार के वाहनों पर थे चारों ओर मात्र मंडल पर पंचाक्षरी विधियां जब तक पर फिर भी विद्याधर थी
और दिव्य रुद्र के गीत गाते हुए किन्नरों के समरूप और
त्रयम्बक यजामहे इस मंत्र को जपने वाले ब्राह्मण हूं
आकाश ली वीणा बजा कर गाते और नाचते हुए नारद और नारद की विधि से नृत्य करते हुए रंभा भी अप्सराओं के झुंड और गाने में तत्पर रहता थी गंधर्वों के श्रम हो तो शिव जी के कानों में कुंडल की तरह
दरअसल नामक नाटक गीत गाने में पर कंबल और स्तर लाभों से भिड़ गए तब देश को को देखकर जी धातु और हर्ष से गदगद कंठ शिव जी की स्तुति और दिल्ली सहित नाम की
उच्चारण करें

शिव गीता अध्याय 3



शिव गीता अध्याय 3
अगस्त जी कहते है काम क्रोध आदि से पीड़ित मनुष्य हितकारी वचन नहीं सुनता
उसको एक कार्य बच्चन ऐसे अच्छी नहीं लगती जैसे मरणशील को औषधि अच्छी नहीं लगती है
जिस गीता को मायावी रहते टावर के बीच में ले गया है
जहां वे तुम्हारे निकट अब किस प्रकार से आ सकती है
जिसके द्वार पर मामलों के युद्धों के तमाम सब देवता बांध ली गई थी
देवताओं की स्त्रियां जिसकी यहां शर्मा होती हैं जो शिव जी के वर्ष से गड़बड़ी को संपूर्ण लौकी को भोगता और वह से रहे थे
उसे तू कैसी भी इंद्रजीत भी उसका पुत्र शिव के वरदान के घर फिर थे
उसके आगे से देव का संग्राम में बहुत बड़ा भाग गए हैं
देवताओं को भय देने वाला जिसका भाई कुंभकरण बड़ा कर और अनेक प्रकार के दिव्यास्त्र धारण करने वाला जीत भी दिलाई शनि देव और दानवों के लिए दुर्गम जिसका लंका न हो चुके हैं
और करून जिसके यहाँ चतुरंगिणी सेना ही ही राज फिर अकेले तुम उसे कैसे जी तो कि तुम्हारी यह बात ऐसी है कि जैसे कोई बालक चंद्रमा को हां से लेना चाहिए
इसी प्रकार तो काम से मोहित होकर उस को जीतने की इच्छा करती है
श्री रामचन्द्रजी बोली हे मुनिश्रेष्ठ में क्षत्रिय हूँ और मेरी भारिया राक्षस ने हरण कर ली है
जो में उसे न मारूंगा तुम मेरे जीबी से क्या फल ही इस कारण तुम्हारे तब तो बोध से मुझे कुछ भी प्रयोजन नहीं है एक काम क्रोध आदि मेरे शरीर को भस्म डालते ही और अपनी प्रिया की हरण होने और शत्रु
से ही पराभव होने से भी अहंकार भी मिलते मेरे जीवन को हरण करने को फिर से हे मुनिश्रेष्ठ जिसको तत्व ज्ञान की इच्छा हो या लोग के पुरुषों में नहीं है
इसी कारण सागर को लांघकर युद्ध में उसको मारने के उपाय को आप कहीं आप से श्रेष्ठ और कोई मेरा ही अगस्त मोदी जो ऐसी इच्छा है तो पार्वती पति भगवान से उन अविनाशी की शरण में जाओ
मैं भगवान प्रसन्न होकर तुम को मनोवांछित फल की इन्द्रादि देवता हर ही और ब्रह्मा भी जिसको नहीं जीत सकी में शिव जी के अनुग्रह के बिना तुम भी कैसे मारा जाएगा इस कारण वीजा मार्ग से मैं तुमको
दीक्षा रहता हूं
इस मार्ग से तो मनुष्य छोड़कर तेजोमय होगी
जिसके प्रताप से युद्ध में शत्रुओं को मारकर सम्पूर्ण कामनाओं को प्राप्त हो जाओगी और संपूर्ण द्वारा मंडल को भोग का अंत में शिव कुछ होगी
टू जी कहते हैं तब रामचन्द्रजी मुनिश्रेष्ठ को दंडवत प्रणाम करके दुख के आप प्रसन्न होकर भी श्री रामचन्द्रजी होती है मुन्नी मैं कृतार्थ हो गया मेरे कार्य सिद्ध हो गई
समुद्र पीने वाले आपको मेरे ऊपर प्रसन्न हो तो मुझे क्या मतलब है
यही कारण हे मुनिश्रेष्ठ आप मुझसे गुरु दीक्षा की विधि रही अगर झोली शुक्ल पक्ष की चौदस अष्टमी या एकादशी सोमवार अथवा आर्द्रा नक्षत्र में यह का आरंभ करना झुंड
को वायु श्रेष्ठ रुद्र अभी परमेश्वर निरंतर जगत के नियंता सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मा आदि से भी परे शिव कहते ही जो ब्रह्मा विष्णु अग्नि वायु इनको भी उत्पन्न करने वाली ही इसी प्रकार
सदा शिव का ध्यान करके अग्नि बीच से ही गिरावट नहीं का ध्यान कर भी उत्पत्ति के कारण भूत जो पंच महाभूत ही व वायु बीच से पृथक ही इस फिल्म का भाव कर की उन महाभूतों के गुण का क्रम से ध्यान करें
कि की राजनीति दर्द होने वाली भावना कराई उसका प्रकार रहा था
पंच महाभूतों के घोर रूप रस गंध इस पर और शहद ये पाँच ही पृथ्वी ने पांचों ही कौन है
जल शब्द स्पर्श रूप रस ये चार पेज में शब्द इस पर रूम को यह भी वायु में तेजी से जल जल से पृथ्वी उत्पन्न होती है
और इसके विपरीत अर्थात पृथ्वी जल में जल तेज वायु में वायु आकाश में ले जाता है अधिक अधिक के भूत न्यूज न्यून गुरु वालो भूतों में ले हो जाती और इनकी सबकी मात्रा जिसका गोद में ही
उन अहंकार आदि को लेकर पंच महाभूतों को अहंकार नहीं अहंकार का महत्व तो में में तहत कमाया में माया का सबके आधारभूत परमात्मा में लेकर फिर अमृत रजिस्ट्री थी के विपरीत क्रम कर
कि यह उत्पत्ति विषय में रिलीज से ऐसी भावना करके में दिव्य देह गेहूं और पूर्व ही कि उत्पन्न करने वाली सब घरों और द्रव्य का अग्निवेश ढहाकर कि उसका परमात्मा में लेकर की अमृत
जिससे पुनर्जीवन करके यह ही अमरत और वे ऐसी भावना करें इस प्रकार भूत शुद्धि करके पाशुपत व्रत का आरंभ करें फिर प्रातः काल में ही पाशुपत को करूंगा ऐसा संक्षेप से निकल कर
की अपनी शाखा तरह गृह्यसूत्र से अग्नि था उस दिन व्रत रखकर पवित्र रूप श्वेत वस्त्र धारण करें
शुक्र यज्ञोपवीत और शुक्ल माला पहनी अन्तः करण एकाग्र कर भेजा
के अनुवाद पर्यंत संविदा अच्छे आचरण से हवन करें
हवन के अनन्तर मंत्र से अग्नि को आत्मा में आरोप बढ़कर अग्नि के महत्व को मंत्रों से अभिमंत्रित कर ललाट आदि अंगों में धारण कर जिस ब्राह्मण के शरीर में भस्म लगी होती है वे माह पाठकों से भी छूट जाता थी
इसमें संदेह नहीं कि क्योंकि भसीन अग्नि का भी ले गए
मैं भी अगली है कि धारण करने से बलवान हो जाऊंगा
इसी प्रकार की नीति भ्रष्ट विश्राम करता जितेन्द्रिय हो तुम पर कर था
वे सब पाप से मुक्त होकर शिव लोक को प्राप्त था
ही रहा चाहिए तुम इस प्रकार करो और शिव सहस्त्रनाम मैं तुमको देता हूं
इससे तुम्हारी मनोरथ पूर्ण होंगी
सूची कहते हैं ऐसा कहकर अगर झेली रामचंद्र का शिव सहस्त्रनाम का उपदेश या झुग्गी सब में कर हर भी जो शिव जी को प्रत्यक्ष करने वाला है
उसको देखकर अगर जी ने कहा क्या तुम इसी दिन रात को तब भगवान शिवजी प्रसन्न होकर पाशुपत अस्त्र तुम को देंगे
जिससे तुम शत्रुओं को मारकर क्रिया को प्राप्त भी उसी एक्ट के प्रभाव से सागर को धातु सकोगी शहर घालमेल शिव भी इसे ही अस्त्र से जगत का हक थी उसको भी बिना पाए दानवों से ही जय पाना
बड़ा लंबे इस कारण इस राष्ट्र के पानी के निमित्त

शिव गीता अध्याय 2



दूसरा अध्याय ऋषियों ने पूछा अगर भी रामचंद्र के निकट क्यों आए थे और इस प्रकार श्री रामचन्द्रजी गुजराती शाह कराई थी इससे रामचंद्र को किस फल की प्राप्ति हुई थी सो आप हम
शिखर ही सूझी मूवी जिस समय झलक कुमारी सीता को रावण ने हरण किया था तब रामचंद्र ने योग के कारण बहुत विलाप किया निंद्रा देहाभिमान और भोजन तैयार कर दिन शो करती भाई सहित रहा
चंद्र ने प्राण त्याग करने की इच्छा थी
तिरछी यह बात जानकर रामचन्द्रजी के समीप पाए और उन्होंने ही रामचंद्र को संसार की असारता चाहिए अगर मिली ही रांची कि क्या विसात करते हो इस ड्रिंक की इसका विचार तो करो
फिर भी आपको तेज वायु और आकाश इन पांच महाभूतों का बना हुआ यह से ही झड़ गई
इसको ज्ञान नहीं होता और आत्मा तो निर्लेप को सर्वत्र परिपूर्ण सच्चिदानंद स्वरूप थे
आत्मा न कभी उत्पन्न होता नम्रता दुख भोगता है
जिस का यह सूर्य सम्पूर्ण संसार की चर्चा रूप से फिर थे और चक्षुओं के दोस् से कवि लिफ्ट नहीं होता इसी प्रकार सम्पूर्ण भूतों का आत्मा ही दुख में लिप्त नहीं होता और यह भी मलका पिंड तरह
यह कला रहित होने से ही झड़ गए इस काश अगली के सहयोग से भस्म हो जाता है
सियार आदि इसको खा जाते हैं तो भी नहीं जानता कि उसके वियोग में क्या दुख खा है जिसका स्वर्ण के समान भगवान अथवा दूर्वा दल के समान श्याम रूप से कुछ कलश जिसके उन्नत थे मध्य भाग सूक्ष्म है
बड़ी नितम्ब और जाने वाले क्षरण अटल जिसका का कमल के सदस्य रक्त वर्ण के जिसका मुख पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान और करके रिणवा हल्के शर्मा जिसकी होस्टिंग नील कमल के समान जिसके विशाल
नेत्र ही मुक्त को के समान जिसके बच्चन और मस्त हाथी के समान जिसकी चहल ही राजन सावधान होकर सुनो मैं इस का गठन करता हूं
इस स्त्री पुरुष यह रकम तक नहीं है
यह दे ही मूर्ति रहित सब देवों में स्थित रोक रहे सर्वव्यापी सबका साक्षी वे में तो प्राणों को सजीव करने वाला है
जिसको सूक्ष्म ही सुकुमार वाला कहते हैं
वे का पेन और जल रूपये वे न कुछ थी न तुम थी न होती है
जिसका शरीर धर्म मात्र का है ही रामचंद्र बुद्धि से विचारो और जो प्राणों से भी अधिक प्यारी वहीं दीपिका कुमारी दुख का कारण भी पंच महाभूतों से उत्पन्न होने के कारण पाँच भौतिक देरी उत्पन्न होती
परन्तु उन में आत्मा इस पर को सनातन ही इस विचार से कॉल हिस्ट्री कौन पुरुष ही सब ही घर है
जिस प्रकार अनेक गिर है निर्माण करने में आकाशी अविच्छिन्न पिता को प्राप्त होता है
अर्थात में मिल जाता है
पश्चात उन घरों के जल जाने पर कुछ खाने को में पूरा नहीं होता इसी प्रकार वे हो में आत्मा पर को और सनातन है
वे संबंध थे
अनेक प्रकार का प्रतीत होता है
परंतु उसके नाश होने पर आत्मा नष्ट नहीं होता वे एक हो गए
जो मारने वाला जानता है मैंने मारा जो मरने वाला जानता है कि मैं मरा यह हूँ न जानने से मूर्ख हैं
कहा कि लाई है मानता है और न वे मारा जाता है
छः रहा इसका है अति दूर करने से छेद का कारण क्या है
अपना सर इस प्रकार जानकर दुख को त्याग कर चुके श्री रामचंद्र होली है
जल्द ही को भी दुख नहीं होता और परमात्मा को भी दुख नहीं होता है तो सीता के वियोग भी जो वस्तु रहा
कही जाती है
तुम कहते हो कि वे नहीं है
हे मुनिश्रेष्ठ फिर इस बात में मुझे कैसे विश्वास हो झा सुख दुख को भोक्ता जीव नहीं तो कौन है जिसके द्वारा प्राणी दुखी होता है
सुख दुख को गुप्ता कौन है
जिबूती शिवजी की माया कठिनता से जानने योग्य है
जिसने जगत को मोह लिया
उस महिला को तो प्रकृति झाली और माया वाले वहीं शैलजा ने उसी के रूप जीव भी सम्पूर्ण जगत व्याप्त है
वे महेश सच्चा को ज्ञानस्वरूप अनंत और सर्वव्यापी है
उसी का वंश जीव लोक में सब प्राणियों के हृदय में स्थित होगा
जिस प्रकार थी कास्ट के योग से अग्नि में इस फुली उठते ही इसी प्रकार ही भी ऐसा परमात्मा से था
वे श्रेयांश जी अनादिकाल के कर्म बंधन में ही अनादि वासनाओं से युक्त है
और क्षेत्र के रहते ही मन बुद्धि चित्त अहंकार एक शहरों अन्तः करण के ही भेली इस अन्तः करण चलते पश्चिमी क्षेत्र क्यों का पृथ्वी पड़ता है
वहीं जीवन को प्राप्त होकर कर्म फल के गुप्ता ही वहीं ही कम होने के था वे हो को प्राप्त होकर विशेष सेवन करने से सुख या दुख भोग करते ही इस टावर जन्म के भेद से दो प्रकार का शरीर
कहा जाता है
कितनी ही प्राणी शरीर धारा के लिमिट कर्मानुसार योनियों में प्रवेश करते ही और दूसरे
श्रेय करते ही वृक्ष लता गोल इस था और सूक्ष्म वे ही कहलाते हैं
और अंदाज पहुंची सिर्फ इत्यादि स्वेटर फिर में शिकार हुई जरायुज मनुष्य घाव आदि यह जंगलों मुशहरी कहलाते हैं
जलीय जीव विषयों में लिमिट होता है तब मैं सुखी हूँ दुखी हूं ऐसा रहा था है
यद्यपि वे निर्मल जो रूप है परन्तु शिव जी की माया से मोहित सुख दुख का अनुमान नहीं था
काम क्रोध लोभ मद मास्टर और मुहूर्त के छह माह महाशत्रु अहंकार से उत्पन्न होते हैं
यह का शौक और जागृत अवस्था में जीव को दुख देता है
और सृष्टि में सूक्ष्म रूप के होने और अहंकार के अभाव से यह रिशी आनंद को प्राप्त था
इस था यह माया में मिलने से सुख दुख का कारण उत्पन्न होता है
जिस दिन था सूर्य की किरणों के पढ़ने से सीपी में शामिल है
इसी प्रकार शिव स्वरूप को में माया से दृश्य दिखता है
इसका तत्व ज्ञान से तो कोई भी दुर्भाग्य ही है
इससे ही रहा तुम को तिहाड़ जेल था क्यों दुखी हो श्री रामचन्द्र जी कहते हैं हे मुने रांची जिसे तुमने मेरे सम्मुख कहा कि यह सब सकते हैं तथा भयंकर प्रारंभ देव का दुख में
मुझे नहीं छोड़ता है
जिस प्रकार मध्ये प्राणी को नष्ट कर देता है
इसी प्रकार अज्ञान ही तत्व ज्ञान युक्त ब्राह्मण को भी प्रारब्ध कर्म में नहीं छोड़ता मौके आनंद झाला
यह का प्रारब्ध का मंत्री है यह मुझको दिन रात पीड़ा देता रहता है
और इसी प्रकार से अहंकार भी दुख देता है जीव अत्यंत पीड़ित होकर इस देह का प्रयास करता है
इस कहा हे ब्राह्मण मेरे जीवन के लिमिट उपाय करो

शिव गीता


शिव गीता जो कि गुप्त से भी अति गुप्त है हालांकि आज के समय में सोशल मीडिया का दौर है इसलिए अब कुछ भी गुप्त व अति गुप्त नहीं रहा हैं

प्रभु श्री राम और भगवान महेश्वर के बीच हुए संवाद को शिव गीता कहा जाता है सीता हरण के बाद जब प्रभु श्री राम निराश हो गए थे तो भगवान महेश्वर श्रीराम को रामगिरी पर्वत के तङकरण वन में गोदावरी नदी के किनारे जो उपदेश दिए थे उसे ही शिव गीता व ईश्वर गीता कहते हैं

शिव गीता में भगवान महेश्वर प्रभु श्री राम को ब्रह्म ज्ञान प्रदान किए थे जिस ज्ञान को प्राप्त करने के बाद व्यक्ति शिवत्व प्राप्त करता है शिव गीता के सप्तम अध्याय में भगवान शिव अपने विराट विश्वरूप का दर्शन भी देते हैं शिव गीता पाठ की बात की जाए तो शिव गीता का पाठ करने या फिर शिव गीता का श्रवण करने का फल अनंत होता है शिव गीता पाठ के लगभग 1100 फायदे होते हैं शिव गीता पाठ के लाभ की बात की जाए तो इस विषय में विस्तार पूर्वक "शिव गीता फल श्रुति" में बताया गया है

‎‌‎Ş₳ŦเŞ𝓱👸🏻◣🍁💜⃝🇱♥︎𝐕𝐄4♥️𝐘𝐎🇺⃝◣

1. *शिव जी की महिमा*: पाठ में शिव जी की महिमा का वर्णन किया गया है, जिसमें उनकी शक्ति और उनकी कृपा का उल्लेख किया गया है।
2. *भक्ति का महत्व*: पाठ में भक्ति के महत्व को दर्शाया गया है, जिसमें कहा गया है कि शिव जी की भक्ति से मुक्ति प्राप्त होती है।
3. *शिव जी की कृपा*: पाठ में शिव जी की कृपा का उल्लेख किया गया है, जिसमें कहा गया है कि शिव जी अपने भक्तों पर कृपा करते हैं।
4. *मुक्ति का मार्ग*: पाठ में मुक्ति के मार्ग का उल्लेख किया गया है, जिसमें कहा गया है कि शिव जी की भक्ति से मुक्ति प्राप्त होती है।
5. *शिव जी के उपदेश*: पाठ में शिव जी के उपदेश का उल्लेख किया गया है, जिसमें कहा गया है कि शिव जी ने अगस्त जी को उपदेश दिया था।

इन बिंदुओं से यह स्पष्ट होता है कि पाठ में शिव जी की महिमा और उनकी भक्ति के महत्व को दर्शाया गया है।

शिव गीता पहला अध्याय 
शौनक आदि ऋषियों ने शुद्ध और केवल मुक्ति दायर
के लोग छुड़ाने में और श्री शिव गीता रत्न को शिव जी के अनुग्रह से वर्णन करता हूं
न कर्मों के अनुसार नर्मदा नदी का अवस्थी मनुष्य मुक्ति को प्राप्त होता है
किन्तु ज्ञान से ही प्राप्त होता है
शिवजी ने दंडक वन में जी को जो शिव गीता उपदेश ही है यह गुप्त से भी होते हैं जिसके श्रवण मात्र से ही मनुष्य मुक्ति को प्राप्त होता है जो पूर्व काल में गंध जीनी सनत कुमार को वर्णन की थी
मुनिश्रेष्ठ अनंत कुमार ने व्यास जी को कहीं और व्यास जी ने कृपा करके वे हम से वर्धन की और साथ ही यह भी कहा कि है कि का तुम किसी को देना ही ही सूतपुत्र ऐसा वचन पालन न करने दें
शूरवीर हो श्राप देती थी
हे ब्राह्मण तब मैंने भगवान व्यास जी से पूछा हे भगवन कर देवता क्यों करती और क्यों श्राप देती हैं
उनकी में कहानी है जो भी देवता क्रोध करते हैं
यह सुनकर व्यास जी मुझसे बोली हे व्यवस्थित तो अपने प्रश्न का उत्तर हम हूं
जब हम मर मिटे अग्निहोत्र करते और गृहस्थाश्रम में रहती हैं वहीं सफल होकर देने वाले देवताओं को काम न ही भक्ष्य भोज्य पान करने योग्य के जो कुछ फर्मों में या के किया जाता है
अभी द्वारा अग्नि में आहुति दी गई है
वह स्वर्ग मिलती है
देवताओं को स्वर्ग में ईश लेने वाला और कुछ नहीं है
जैसे ग्रह पुरुषों की दूरी हुई गाय ले जाने से केवल दुखी होता है इसी प्रकार ज्ञानवान ब्राह्मण देवताओं को जाता है
कारण है कि वे गम नहीं करता इस कारण इसके विषय भाग या पुत्र आदि में प्रवेश कर करके डेटा विघ्न करते ही इससे किसी लिए धारें कि शिविर में मुक्ति नहीं होती है इस कारण मूर्खों को शिव का
साथ ही मिलता और जो कदाचित जानता भी है
न किसी कारण मध्य में ही खंडित हो जाता है
और किसी को ज्ञान हुआ भी तो विश्वास से नहीं बचता ऋषि ने जब इस प्रकार से देवता शरीर धारियों को विभिन्न कतई नहीं तो फिर इसमें किसका पराक्रम है
जो मुक्ति को प्राप्त होता है
हिंदू उतरी असत्य कहिए कि उनका उपाय है या नहीं है
सोच बदली करोड़ों जन्मों के पुण्य संचय होने से शिव भक्ति उत्पन्न होती है
उस व्यक्ति के होनी थी इस शोध आदि कर्मों की कामना छोड़कर मनुष्य शिव जी में अरबन बुद्धि भी यथाविधि कम करता है
शिवजी की कृपा से जो है प्राणी दृढ़ भक्ति मां होता है
था वीडियो छोड़कर भयभीत हो देवता जाते हैं
उस भक्ति के करनी थी शिव जी के चरित्र शिवा करने की अभिलाषा उत्पन्न होती है सुनने से ज्ञान और क्या से मुक्ति मिल जाती है
बहुत कहने से क्या लाभ जिसकी शिव जी में दृढ़ भक्ति है में करोड़ों पाठकों से देखा हो
को ही मुक्त हो जाता है अनादर हंसी मूर्खता से परिहास से कपट से भी जो मनुष्य शिव भक्ति में तत्पर है मैं अंत्यज था चाण्डाल भी हो तो मुक्त हो जाता है इस प्रकार के व्यक्ति सदा
सबके करने योग्य है
इस बस्ती के होते हुए भी जो मनुष्य संसार से अछूती उसकी संसार बंधन से न छूटने वाले किसी कमान दूसरा कोई भी मूर्ख नहीं है
कौशिक जी केवल भक्ति से प्रसन्न नहीं होते जो नियम भी केवल भक्ति या विद्रोही करते हैं उन पर वे प्रसन्न हो
वांछित फल प्रदान करते हैं भरे मूल कि वह तो कुछ लेकर या अनमोल की वस्तु अथवा केवल जल्द ही लेकर जो नियम से पर करते ही शिवजी प्रसन्न हो उसकी तुलना की गई थी
और यह भी ना हो सके तो नियम से नमक का यह केवल पर चढ़ा जो नित्य प्रति शिव जी की करता है उसके ऊपर भी शिवजी प्रसन्न होते ही पहुंचे प्रदक्षिणा में भी असमर्थ हो केवल मन में ही शिव जी का ध्यान करें
चलते बैठते में जोन का स्मरण करें
उसकी भी अभी उसकी भी आकांक्षा था
ही क्षण चंदन बेल कास्ट तरह वन में उत्पन्न हुए फल जिसके अधिक रीड करने नहीं पहुंचे शिव जी की सेवा करने में त्रिलोकी में कौन मन के उत्पन्न हुए फल मूल आदि में शिव जी जैसे बिक्री थे
जैसी ग्राम नगर के उत्पन्न हुए उत्तम उत्तम फल मूड में नहीं है जो ऐसे देवता को छोड़कर अन्य देवता का भजन सेवन करता है
वो मानो गंगा का त्याग करके मृगतृष्णा की इच्छा करता है परन्तु जी को करोड़ों जन्मों के पाप रहे हैं
उनका अज्ञान अंधकार से आच्छादित हो रहा है
उनको शिव जी की भक्ति प्रकाशित नहीं होती कहा देशी स्थल का कुछ नियम नहीं हैं जहां इसका चित्र हमें वहीं दिनांक भी शिव रूप से अपने आत्मा में ध्यान करने से शिव की मूर्ति को प्राप्त हो जाता है
जिसकी बहुत थोड़ी लक्ष्मी से विहीन हो वे शिव जी की कृपा से ही सारी पृथ्वी का राज्य प्राप्त कर लंबी आयु तक तो से लोग का मैं राजा हूँ ऐसा मानते कहने वाले को गूंज रही थी
जो सम्पूर्ण लोगों का कहना था तरह अक्षय ऐश्वर्यवान पुरुष भी अभिमान रहित हो जो शिवा शिवा हम इस प्रकार से कथन करता है उसको शेर आत्मस्वरूप थी तादात्म्य होगी तथा शीघ्र ही करती थी
है जिस व्रत के करने से प्राणी के धर्म अर्थ काम मोक्ष चारों पदार्थ हस्तगत थे ही मैं है पर शपथ ग्रहण तुमसे वर्णन करता हूं
वीजा नामक दीक्षा को करके विभूति और रुद्राक्ष को धारण कर विस्तार नामक शिव सहस्त्रनाम का जप करते हुए
मानव शरीर को त्याग कर शेयर शरीर को प्राप्त होने पर लोक कल्याण करने वाले शंकर प्रसन्न होकर तुम को दर्शन देकर केवल मुक्ति
जब जी दंडकारण्य में वास करती थी
तब अगस्त जी ने उन्हें वे उपदेश दिया था
व्यस्तता मैं तुमसे कहता हूं
तुम भक्ति युक्त होकर श्रवण करो

राम गीता


प्राचीन ग्रंथों में कई राम गीता नहीं पाई जाती हैं।प्रत्येक में वक्ता भगवान श्री राम ही है परन्तु श्रोता तथा प्रतिपाद्य विषय भिन्न भिन्न है।अध्यात्म रामायण के उत्तर कांड के पंचम सर्ग के रूप में यह राम गीता प्राप्त होती है।

सीता वनवास प्रसंग के अनन्तर एक बार जब लक्ष्मण जी और भगवान श्री रामचंद्र जी है। वहां अज्ञान रूपी सागर को पार कराने वाले ज्ञानोपदेश देने की प्रार्थना किया तब श्री रघुनाथजी में उनको जो उपदेश दिया वहीं राम गीता कहलाती है।
इसमें युक्ति युक्त विवेचन द्वारा आत्म ज्ञान को ही विशुद्ध ज्ञान बताकर समस्त इन्द्रियों के विषयों से निवृत्त करके आत्मा अनुसंधान हेतु प्रेरित किया गया है।

✍️इस राम गीता को यहां प्रस्तुत किया जा रहा है।

किसी दिन भगवान श्री राम के चरण कमलों की सेवा साक्षात श्री लक्ष्मीजी करती हैं एकांत में बैठे हुए थे।
उस समय शुद्ध विचार वाले लक्ष्मण जी उनके पास जाकर उन्हें भक्तिपूर्वक प्रणाम कर अति विनीत भाव से कहने लगे।

महामंत्री आप शुद्ध ज्ञान स्वरूप समस्त देहधारियों के आत्मा सबके स्वामी और रूप से निराकार है।जो आपके चरण कमलों के लिए भ्रमर रूप है।उन परम भागवत के सहवास के दृष्टिकोण को ही आप ज्ञान दृष्टि से दिखलाई देते हैं।

हे प्रभो योगी जिनका निरंतर चिंतन करते हैं।संसार से छुड़ाने वाले वो आपके चरण कमलों की  शरण में हैं।आप मुझे ऐसा उपदेश दीजिए जिससे में सुगमता से ही अज्ञान रूपी संसार समुद्र के पार हो जाउ।

अब श्री लक्ष्मण जी से ये वचन सुनकर शरणागत वत्सल भोपाल शिरोमणि भगवान राम सुनने के लिए उत्सुक हुए लक्ष्मण को उनकी अज्ञान अंधकार का नाश करने के लिए प्रसन्न चित्त से ज्ञानोपदेश करने लगे।

      🙏भगवान श्री राम बोले🙏

सबसे पहले अपने अपने वर्ण और आश्रम के लिए शास्त्रों में बतलाई हुई क्रियाओं का यथावत पालन कर,शुद्ध हो जाने पर उन कर्मों को छोड़ दें और श्याम दमा आदि साधनों से संपन्न हो आत्मज्ञान की प्राप्ति के लिए योग्य तत्वज्ञानी गुरु की शरण में जाएं।कारण देहांत और की प्राप्ति के लिए ही स्वीकार किए गए हैं।क्यों कि उनमें ट्रेन( सवार होने वाले पुरुषों से संबंधित टेस्ट अनिष्ट दोनों ही प्रकार की क्रियाएं होती हैं उनसे धर्म और अधर्म दोनों की ही प्राप्ति होती है)और उनके कारण शरीर प्राप्त होता है जिस से फिर कम होते हैं।इसी प्रकार यह संसार चक्र की भांति चलता रहता है।संसार का मूल कारण आज ज्ञान नहीं है।और इन शास्त्रीय विधि वाक्यों में उस अज्ञान का नाश ही संसार से मुक्त होने का उपाय बतलाया गया है।उसे सीख क्यों कि अज्ञान का नाश करने में ज्ञान ही समर्थ है,ओर इसका काम भी कम नहीं है।क्योंकि उस अज्ञान से उत्पन्न होने वाला काम उसका विरोधी नहीं हो सकता?काम कर में रूपी इस द्वारा अज्ञान का नाश अथवा राज का श्रेय भी नहीं हो सकता।बल्कि उससे दूसरे सदोष कामों की उत्पत्ति होती है।उससे पुन्हा संसार की प्राप्ति होना अनिवार्य है।
इस लिए बुद्धिमान को ज्ञान विचार में ही तत्पर होना चाहिए।

कुछ वितर्क वादी ऐसा कहते हैं कि जिस प्रकार वेद के कथनानुसार ज्ञान पुरुष का साधक है,वैसे ही कारण वेद विहित है।और प्राणियों के लिए कर्मों की आवश्यक कर्तव्य का विधान भी है।इसलिए वे कर्म ज्ञान के सहकारी हो जाते हैं।साथ ही क्रोध न करने के कारण दोस्त भी बतलाया है।

इसलिए मुमुक्षु को उन्हें सर्वदा करते रहना चाहिए।और यदि कोई कहे कि ज्ञान स्वतंत्र है एवं निश्चय ही अपना फल देने वाला है।उसे मन से भी किसी और की सहायता की आवश्यकता नहीं है।तो उसका यह कहना ठीक नहीं।
क्योंकि जिस प्रकार वेदोक्त प्रीमियर बताया गया है।तेल भी गर्म होने पर  अन्य कारक आदि की अपेक्षा करता ही है।उसी प्रकार विधि से प्रकाशित कर्मों के द्वारा ही ज्ञान मुफ्त का साधक हो सकता है।आता:  कर्मों का त्याग उचित ही नहीं है।
श्री धाम  ऐसा जो कोई कुतर्की कहते हैं।जिसे उन्हों ने देखा ही नहीं होता।उनके कथन में प्रत्यक्ष विरोध होने के कारण वह ठीक नहीं है क्यों कि यह गर्म देहाभिमान से होता है और ज्ञान अहंकार के नाश होने पर ही सिद्ध होता है।वेदांत वाक्यों का विचार करते करते विशुद्ध विज्ञान के प्रकाश से उद्भासित होने पर ही चरम ज्ञान में वृद्धि होती है।उसी  विद्या को आत्मज्ञान कहते हैं।

इसके अतिरिक्त कारण मुझे संपूर्ण कारक आदि की सहायता से ही तो होता है।किन्तु विद्या समस्त कारक आदि का नाश कर देती है।इसलिए समस्त इन्द्रियों के विषयों से निवृत्त होकर निरंतर आत्मा अनुसंधान में लगा हुआ बुद्धिमान पुरुष,पूर्ण कर्मों का सर्वथा त्याग कर देंता है।क्योंकि विद्या का विरोधी होने के कारण गम का उसके साथ समोच्च नहीं हो सकता जब तक माया से मोहित रहने के कारण मनुष्य का शरीर आदि में आत्मभाव है।तभी तक उसे वैदिक कर्म अनुष्ठान करने उस के लिए कर्तव्य है।उस को  समूह  आदि वाक्यों से संपूर्ण अनाथ में वस्तुओं का निषेध करके अपने परमात्म स्वरूप को जान लेने पर फिर उसे समस्त कर्मों को छोड़ देना चाहिए।उसे कमाया परमात्मा और जीवात्मा के भेद को दूर करने वाला प्रकाश विज्ञान अन्तः कारण में स्पर्श के तहत भासित होने लगता है।उसी समय आत्मा के लिए संसार प्राप्ति के कारण माया अनायास ही काराकाट के सहित दिनों हो जाती है।
(काराकाट एक प्रकार की तांत्रिक पूजा है जो हिन्दू धर्म में प्रचलित है। इसका उद्देश्य भगवान की कृपा प्राप्त करना और अपने जीवन में सुख, समृद्धि और शांति प्राप्त करना है।

काराकाट पूजा में भगवान की पूजा की जाती है और उनसे अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना की जाती है। इस पूजा में विशेष मंत्रों और पूजा सामग्री का उपयोग किया जाता है।

काराकाट पूजा के कुछ महत्वपूर्ण पहलू हैं:

1. *भगवान की कृपा*: काराकाट पूजा का मुख्य उद्देश्य भगवान की कृपा प्राप्त करना है।
2. *इच्छाओं की पूर्ति*: इस पूजा में भगवान से अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना की जाती है।
3. *सुख, समृद्धि और शांति*: काराकाट पूजा का उद्देश्य अपने जीवन में सुख, समृद्धि और शांति प्राप्त करना है।
4. *विशेष मंत्र और पूजा सामग्री*: इस पूजा में विशेष मंत्रों और पूजा सामग्री का उपयोग किया जाता है।

काराकाट पूजा के लाभ:

1. *भगवान की कृपा*: काराकाट पूजा से भगवान की कृपा प्राप्त होती है।
2. *इच्छाओं की पूर्ति*: इस पूजा से अपनी इच्छाओं की पूर्ति होती है।
3. *सुख, समृद्धि और शांति*: काराकाट पूजा से अपने जीवन में सुख, समृद्धि और शांति प्राप्त होती है।

काराकाट पूजा के नियम:

1. *पूजा की तैयारी*: पूजा से पहले विशेष तैयारी करनी चाहिए।
2. *विशेष मंत्रों का उपयोग*: पूजा में विशेष मंत्रों का उपयोग करना चाहिए।
3. *पूजा सामग्री का उपयोग*: पूजा में विशेष पूजा सामग्री का उपयोग करना चाहिए।
4. *पूजा के बाद धन्यवाद*: पूजा के बाद भगवान को धन्यवाद देना चाहिए।)

श्रुति प्रमाण से उस के नष्ट कर दिए जाने पर फिर वो अपना कार्य करने में समर्थ भी किस प्रकार हो सकेगी?क्योंकि परमार्थ तत्व एकमात्र ज्ञान स्वरूप निर्माण के लिए अद्वितीय है।अतः बोध हो जाने पर फिर अविद्या उत्पन्न नहीं होगी।
क्यों कि ज्ञान दूध से निकले मक्खन की भांति होता है जो दुबारा दूध नहीं बन सकता।जब एक बार नष्ट हो जाने पर अविद्या का पुनः जन्म ही नहीं होता तो बोध वाहन को मैं इस कदम का करता हूं ऐसी बुद्धि कैसे हो सकती है।इसलिए ज्ञान स्वतंत्र है उसे जीव के मोक्ष के लिए किसी भी और साधना की अपेक्षा ही नहीं है।
मैं अकेला ही उसके लिए समर्थ हूं ,इसके सिवा तैत्तिरीय शाखा के प्रसिद्ध शूटिंग भी आग्रहपूर्वक स्पष्ट कहती है,समस्त कर्मों का त्याग करना ही अच्छा है।तथा ऐरावत इत्यादि के बाद अनुष्का ने ही शाखा की स्वीकृति भी कहती है कि मोक्ष का साधन ज्ञान किसी से कम नहीं।अब ज्ञान होता है कि ,और तुमने जो ज्ञान की समानता में यज्ञादि का दृष्टांत दिया वो भी ठीक नहीं
 है।क्योंकि उन दोनों के कर्म ही अलग अलग है।क्यों कि इसके अतिरिक्त यज्ञ तो बहुत से कारकों से सिद्ध होता है।और ज्ञान इसके विपरीत है।अर्थात वह इस ज्ञान के आदेश से कोई साधन नहीं है।कर्म के त्याग करने से  अवश्य ही प्रायश्चित्त के भोगी होंगे।ऐसी अनात्म बुद्धि अज्ञानियों को हुआ करती है।तत्व ज्ञानियों को नहीं।(कहते है हाथी के पांव में सभी का पांव समा जाता है)इसलिए विकार रहित चित्त वाले ज्ञान वान बोध वाले पुरुष को विहित कर्मों का भी विधि पूर्वक त्याग कर देना चाहिए।
फिर शुद्ध चित्त होकर श्रद्धापूर्वक गुरु की कृपा से तक तुम मसीह इस महावाक्य के द्वारा परमात्मा और जीवात्मा की एकता रूप जान कर सुमेरू के समान निश्चल एवं सुखी हो जाए।यह नियम नहीं है कि प्रत्येक वाक्य का अर्थ जानने में पहले उसके पदों के अर्थ का ज्ञान भी कोई कारण हो।इस तत्त्व मसी महावाक्य के तहत और पर्व क्रम से परमात्मा और जीवात्मा के वाचक हैं और इसी उन दोनों में एकता करता है।इन दोनों जीवात्मा और परमात्मा में जीवात्मा के तहत अन्तः करण  साक्षी हैऔर परमात्मा परोक्ष रूप से इन्द्री आती है।इस वाच्यार्थ रूप तुम विरोध को छोड़कर और लक्षणा वृत्ति से लक्षित उनकी शुद्ध चेतना को ग्रहण कर उसे ही अपना आत्मा में जाएंगे और इस प्रकार के भाव से स्थित हो रहे इन तत्वों एवं पदों में एक रूप होने के कारण जैसे लक्षण नहीं हो सकती और परस्पर विरोध होने के कारण आज बुरे लक्षण भी नहीं हो सकते।सो जो भगवान है वही हम है।इन दोनों पदों के अर्थ की भांति इन तट और पदों में भी भाग त्याग लक्षण ही निर्दोष से हो सकते है।पृथ्वी आदि पंजीकृत भूतों से उत्पन्न हुए सुख दुख आदि गर्म लोगों के आश्रय और पूर्व पार के कर्म फल से प्राप्त होने वाले इस माया माया आदि अंत बांध शरीर को आत्मा की स्थूल उपाधि मानते हैं।और मन बुद्धि दस इंद्रियां तथा पाँच उपरांत इन सत्रह अंगों से युक्त और अपंजीकृत भूतों से उत्पन्न हुए सूक्ष्म शरीर को जो उपभोक्ता के सुख दुख आदि अनुभव का साधन भर है,आठ माह का दूसरा देन मानते हैं,इनके अतिरिक्त अनादि और अनिवार्यत माया माया कारण शरीर ही जीव का तीसरा देना है।इस प्रकार उपाधि भेद से सर्वथा पृथक स्थित अपने आत्मस्वरूप को क्रमशः उपाधियों का बाद करते हुए अपने हृदय में निश्चय करें, कि मनी के समान ये आठ आत्मा भी अन्न आदि भिन्न भिन्न पोस्टों में उनके रंग से उन्हीं के आकार का आभास होने लगता है।किन्तु इसका भली प्रकार विचार करने से या द्वितीय होने के कारण अष्टम गुरु और अजन्मा निश्चित होता है।

त्रिपुरा में का बुद्धि जीवी श्रॉफ ने जाग्रत और सुषुप्ति भेद से तीन प्रकार की वृत्तियाँ दिखाई देती है,किंतु इन तीनों व्यक्तियों में से प्रत्येक का एक दूसरे में व्याभिचार होने के कारण ये तीनों ही एकमात्र कल्याण स्वरूप नित्य पर में मिथ्या है।बुद्धि की वृत्ति हुई है तो आदरणीय प्राण मन और चेतन आत्मा के संघात रूप से निरंतर परिवर्तित होती रहती है।यह दृष्टि तमोगुण से उत्पन्न होने वाली होने के कारण अज्ञान रूपा है और जब तक रहती है तब तक ही संसार में जन्म होता रहता है।ने टीम ने तीन आदेश के प्रमाण से निखिल संसार का बाद करके और हृदय में दर्द नाम का आस्वादन करके सम्पूर्ण जगत को उसके चार रूप पुस्तक ब्रह्म को ग्रहण करके त्याग में जैसे नारियल के जल को पीकर मनुष्य उसे फेंक देते हैं।क्यों कि आत्मा न कभी मरता है न जन्मता है।वो न कभी क्षीण होता है और न बढ़ता ही है,वह पुरातन संपूर्ण विशेषणों से रहित सुख स्वरूप स्वयं प्रकाश मय और अद्वितीय है।
इस प्रकार ही ज्ञान माया और सुख दुख स्वरूप है।उसमें यह दुखमय संसार की प्रतीति कैसे हो सकती है।यह तो अभ्यास के कारण अज्ञान से ही दिखाई दे रहा है।ज्ञान से तो यह एक क्षण में ही लीन हो जाता है,
क्योंकि ज्ञान और अज्ञान का परस्पर विरोध है।ढंग से जो अन्य में अन्य की प्रतीति होती है।उसी को विद्वानों ने अभ्यास कहा है, जिस प्रकार असर रूप रज्जू आदि में सर्प की प्रतीति होती है।उसी प्रकार ईश्वर में संस्कार की पुष्टि हो रही है।जो विकल्प और माया से रहित है।
जिस  के कारण अन्य रामायण अद्वितीय और चित्त स्वरूप परमात्मा भ्रम में पहले इस अहंकार रूप अभ्यास की ही कल्पना होती है।साक्षी आत्मा में इच्छा अनिच्छा राग द्वेश और सुख दुख भी रूप बुद्धि की वृत्तियाँ ही जन्म मरण रूपी संसार के कारण बनते है।क्योंकि सुषुप्ति में इन का अभाव हो जाने पर हमें जागने पर इस के रूप का भान होता है।अनादि अविद्या से उत्पन्न हुई बुद्धि में प्रतिबिम्बित चेतन का प्रकाश ही कहलाता है।बुद्धि के साक्षी रूप से आत्मा उससे पृथक है,वह परमात्मा तो बुद्धि से भी परे है।अग्नि से तपे हुए लोहे के समान लाभांश साक्षी आत्मा तथा बुद्धि के एकत्र रहने से परस्पर अन्य उन्नत अभ्यास होने के कारण क्रमशः उनकी चेतनता और जड़ता प्रतीत होती है,अर्थात जिस प्रकार आदमी से तपे हुए लोहे में अग्नि और लोहे का तादाद में हो जाने से लोहे का आकार अग्नि में और अग्नि की उष्णता लोहे में दिखाई देने लगती है उसी प्रकार बुद्धि और आत्मा का तादात में हो जाने से आत्मा की चेतनता बुद्धि आदि में और बुद्धि आदि की जड़ता आत्मा में प्रतीत होने लगती है।गुरु के समीप रहने से और वेद वाक्य उसे आत्मज्ञान का अनुभव होने पर अपने हृदयस्थ उपाधि रहित आत्मा का साक्षात्कार करके आत्मा रूप से प्रतीत होने वाले देहात संपूर्ण जड़ पदार्थों का त्याग कर देना चाहिए।मैं प्रकाश स्वरूप अजन्मा अद्वितीय निरंतर भाव आसमान अत्यंत निर्मल विशुद्ध विज्ञान ढांडा ने राम आए क्रिया रहे थे और एकमात्र आनंद स्वरूप होगा मैं सदा ही मौत ही तो हू और मुक्त हूं।इस प्रकार सदा आत्मा का खंड वृत्ति से चिंतन करने वाले पुरुष के कारण में उत्पन्न हुई विशुद्ध भावना तुरंत ही कारक आदि के सहित अविद्या का नाश कर देती है।ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार नियमानुसार सेवन की हुई औषधि रोगों को नष्ट कर डालती है।
आत्म चिंतन करने वाले पुरुष को चाहिए कि एकांत देश में इंद्रियों को उनके विषयों से हटाकर और अन्तः करण को अपने अधीन कर के बैठे तथा आत्मा में स्थित होकर और किसी साधन का आश्रय न लेकर शुद्ध चित्त हुआ ज्ञान दृष्टि द्वारा एक आत्मा की भावना करें ये विश्व परमात्मा स्वरूप है ऐसा समझकर इसे सबके कारण रूप आत्मा में लीन करेगी।इस प्रकार जो पूर्ण चिदानंद स्वरूप से क्षेत्र हो जाता है।उसे बाहर अथवा आन्तरिक किसी भी वस्तु का ज्ञान नहीं रहता।तमाम  प्राप्त होने के पूर्व ऐसा चिंतन करें कि सम्पूर्ण चराचर जगत केवल ओमकार मात्र है।यह संसार वाक्य है और ओमकार इसका वाचक है।ज्ञान होने पर इसका कुछ भी नहीं रहता ओमकार में लीन हो जाता है यह व्यवस्था समाधि लाभ से पहले की है।प्रस्तुत दृष्टि से ऐसा कोई भेद नहीं है।
नाना प्रकार से स्थित आकार रूप डिस्क पुरुष को पुकार में लीन करें और ओमकार के द्वितीय व गैजेट्स के रूपों को कार को उसके अंतिम वाहन मकान में निकाल लें
फिर कारण आत्मा अपराध ब्यूरो कार को भी चंद्रग्रहण रूप परमात्मा में लीन कर रहे हैं और ऐसी भावना करें कि वह नित्य मुक्त विज्ञान स्वरूप उपाधि निर्मल पर ब्रह्मांड मैं ही है इस प्रकार निरंतर परमात्म भावना करते करते जो आत्मा आनंद में मग्न हो गया है।तथा की से सम् पूर्ण दृष्टि प्रपंच विस्मृत हो गया है। नित्य आत्मानंद का अनुभव करने वाला जीवनमुक्ति योगी ने तरंग समुद्र के समान साक्षात मुक्त तो हो जाता है।इस प्रकार जो निरंतर समाज योग का अभ्यास करता है। जिसके संपूर्ण इंद्रिय गोचर विषय निवृत्त हो गए हैं।तथा जिसने काम क्रोध आदि संपूर्ण शत्रुओं को परास्त कर दिया है।क्षय हो इन्द्रियाँ मन और पांच ज्ञानेन्द्रियों को जीतने वाले महात्मा को मेरा निरंतर साक्षात्कार होता है।इस प्रकार निशात माही चिंतन करता हुआ मुन्नी सर्वदा समस्त बंधनों से मुक्त हो कर रहे तथा करता भोक्ता के अभिमान को छोड़कर प्रारब्ध फल भोगता रहे।जिससे वो अंत में साक्षात तुम मुझ में ही लीन हो जाता है।संसार को आदि आमतौर माध्यम में सब प्रकार भाई और श्लोक का ही कारण जानकर समस्त वेद विहित कर्मों को त्याग तथा सम्पूर्ण प्राणियों के अंतरात्मा रूप अपने आत्मा का भजन करें जिस प्रकार समुद्र में जल दूध में दूध महाकाश में घटा थी   और वायु में वायु मिलकर एक हो जाते हैं। उसी प्रकार इस संपूर्ण प्रपंच को अपने आत्मा के साथ अभिन्न रूप से चिंतन करने सेमुझ परमात्मा के साथ अभिन्न भाव से स्थित हो जाता है यह जगह है वो छुट्टी युक्ति और प्रमाण से बाधित होने के कारण चंद्र भेद और दिशाओं में होने वाले ब्रह्म के समान ही है जब तक सारा संसार मेरा यह रूप दिखलाई न दे तब तक निरंतर मेरी आराधना करता रहे जो श्रद्धालु और उत्कट भक्त होता है उसे अपने हृदय में आभास होने लगता है। ना जाने किस भेस में आ जाएं राम जो बुद्धिमान इस प्रकार मनन करेगा वह तत्काल समस्त पापों से मुक्त हो जाएगा।यह संसार जो दिखता है वह माया झूठ है।इसे अपने चित्त से निकाल कर मेरी भावना से शुद्ध चित्त और दुखी होकर आनंद पूल और क्लेश शून्य हो जाओ जो पुरुष अपने चित्त से मुझे गुणातीत निर्गुण का अथवा कभी कभी मेरे सगुण स्वरूप का भी सेवन करता है वो मेरा ही रूप है।वो अपने चरण राज्य के स्पर्श से सूर्य के समान संपूर्ण त्रिलोकी को पवित्र कर देता है।भी या द्वितीय ज्ञान समस्त शक्तियों का एकमात्र चार है।इसे वेदांत वैद्य भागवत बाद मैंने भी कहा है।
योग गुरु भक्ति कम्पन्न पुरुष का श्रद्धापूर्वक पाठ करेगा।उसकी यदि मेरे वचनों में प्रीति होगी तो वो मेरा ही रूप हो जाएगा।

प्राचीन ग्रंथों में कई राम गीता नहीं पाई जाती हैं
प्रत्येक में वक्ता भगवान श्री राम ही है परन्तु श्रोता तथा प्रतिपाद्य विषय भिन्न भिन्न है
अध्यात्म रामायण के उत्तर कांड के पंचम सर्ग के रूप में यह राम जीता प्राप्त होती है
सीता वनवास प्रसंग के अनन्तर एक बार जब लक्ष्मण जी ने भगवान श्री रामचंद्र जी है
अज्ञान रूपी सागर को पार कराने वाले ज्ञानोपदेश देने की प्रार्थना किया तब श्री रघुनाथजी में उनको जो उपदेश दिया वहीं राम बीता कहलाती है
इसमें युक्ति युक्त विवेचन द्वारा आत्म ज्ञान को ही विशुद्ध ज्ञान बताकर समस्त इन्द्रियों के विषयों से निवृत्त करके आत्मा अनुसंधान हेतु प्रेरित किया गया है
इस राम गीता को यहां प्रस्तुत किया जा रहा है
किसी दिन भगवान श्री राम के चरण कमलों की सेवा साक्षात श्री लक्ष्मीजी करती हैं एकांत में बैठे हुए थे
उस समय शुद्ध विचार वाले लक्ष्मण जी उनके पास जाकर उन्हें भक्तिपूर्वक प्रणाम कर अति विनीत भाव से कहने लगे
महामंत्री आप शुद्ध ज्ञान स्वरूप समस्त देहधारियों के आत्मा सबके स्वामी और रूप से निराकार है
जो आपके चरण कमलों के लिए भ्रमर रूप है
उन परम भागवत के सहवास के दृष्टिकोण को ही आप ज्ञान दृष्टि से दिखलाई देते हैं
हे प्रभो योगी जिनका निरंतर चिंतन करते हैं
संसार से छुड़ाने वाले उन आपके चरण कमलों की में शरण हैं
आप मुझे ऐसा उपदेश दीजिए जिससे में सुगमता से ही अज्ञान रूपी यापार समुद्र के पार हो जाओ
श्री लक्ष्मण जी से ये वचन सुनकर शरणागत वत्सल भोपाल शिरोमणि भगवान राम सुनने के लिए उत्सुक हुए लक्ष्मण को उनकी अज्ञान अंधकार का नाश करने के लिए प्रसन्न चित्त से ज्ञानोपदेश करने लगे
भगवान श्री राम बोले
सबसे पहले अपने अपने वर्ण और आश्रम के लिए शास्त्रों में बतलाई हुई क्रियाओं का यथावत पालन कर
शुद्ध हो जाने पर उन कर्मों को छोड़ दें और श्याम दामाद आदि साधनों से संपन्न हो आत्मज्ञान की प्राप्ति के लिए शर्त गुरु की शरण में जाएं
कारण देहांत और की प्राप्ति के लिए ही स्वीकार किए गए हैं
क्योंकि उनमें ट्रेन रखने वाले पुरुषों से टेस्ट अनिष्ट दोनों ही प्रकार की क्रियाएं होती हैं उनसे धर्म और धर्म दोनों की ही प्राप्ति होती है
और उनके कारण शरीर प्राप्त होता है जिससे फिर कम होते हैं
इसी प्रकार यह संसार चक्र की भांति चलता रहता है
संसार का मूल कारण आज ज्ञान नहीं है
और इन शास्त्रीय विधि वाक्यों में उस अज्ञान का नाश ही संसार से मुक्त होने का उपाय बतलाया गया है
अज्ञान का नाश करने में ज्ञान ही समर्थ है
का काम कम नहीं है
क्योंकि उस अज्ञान से उत्पन्न होनेवाला काम उसका विरोधी नहीं हो सकता
काम कर में द्वारा अज्ञान का नाश अथवा राज का श्रेय नहीं हो सकता
बल्कि उससे दूसरे सदोष कम की उत्पत्ति होती है
उससे पुन्हा संसार की प्राप्ति होना अनिवार्य है
इस लिए बुद्धिमान को ज्ञान विचार में ही तत्पर होना चाहिए
कुछ वितर्क वादी ऐसा कहते हैं कि जिस प्रकार वेद के कथनानुसार ज्ञान पुरुष का साधक है
वैसे ही कारण वेद विहित है
और प्राणियों के लिए कर्मों की आवश्यक कर्तव्य का विधान भी है
इसलिए वे कर्म ज्ञान के सहकारी हो जाते हैं
साथ ही ने गर्म न करने में दोस्त भी बतलाया है
इसलिए मुमुक्षु को उन्हें सर्वदा करते रहना चाहिए
और यदि कोई कहे कि ज्ञान स्वतंत्र है एवं निश्चय ही अपना फल देने वाला है
उसे मन से भी किसी और की सहायता की आवश्यकता नहीं है
तो उसका यह कहना ठीक नहीं
क्योंकि जिस प्रकार वेदोक्त प्रीमियर गया
जब तेल गर्म होने पर भी अन्य कारक आदि की अपेक्षा करता ही है
उसी प्रकार विधि से प्रकाशित कर्मों के द्वारा ही ज्ञान मुफ्ती का साधक हो सकता है
आता है कर्मों का त्याग उचित नहीं है
श्री धाम तीन ऐसा जो कोई कुतर्की कहते हैं
उनके कथन में प्रत्यक्ष विरोध होने के कारण वह ठीक नहीं है क्योंकि गर्म देहाभिमान से होता है और ज्ञान अहंकार के नाश होने पर सिद्ध होता है
वेदांत वाक्यों का विचार करते करते विशुद्ध विज्ञान के प्रकाश से उद्भासित जो चरम मार्च में वृद्धि होती है
उसी को विद्या आत्मज्ञान कहते हैं
इसके अतिरिक्त कारण मुझे संपूर्ण कारक आदि की सहायता से होता है
किन्तु विद्या समस्त कारक आदि का नाश कर देती है
इसलिए समस्त इन्द्रियों के विषयों से निवृत्त होकर निरंतर आत्मा अनुसंधान में लगा हुआ बुद्धिमान पुरुष
पूर्ण कर्मों का सर्वथा त्याग कर दें
क्योंकि विद्या का विरोधी होने के कारण गम का उसके साथ समोच्च नहीं हो सकता जब तक माया से मोहित रहने के कारण मनुष्य का शरीर आदि में आत्मभाव है
तभी तक उसे वैदिक कर्म अनुष्ठान कर्तव्य है
ने टीम ने तीन आदि वाक्यों से संपूर्ण अनाथ में वस्तुओं का निषेध करके अपने परमात्म स्वरूप को जान लेने पर फिर उसे समस्त कर्मों को छोड़ देना चाहिए
जेठ कमाया परमात्मा और जीवात्मा के भेद को दूर करने वाला प्रकाश विज्ञान अन्तः कारण में स्पर्श के तहत भासित होने लगता है
उसी समय आत्मा के लिए संसार प्राप्ति के कारण माया अनायास ही काराकाट के सहित दिनों हो जाती है
श्रुति प्रमाण से उसके नष्ट कर दिए जाने पर फिर वो अपना कार्य करने में समर्थ भी किस प्रकार हो सकेगी
क्योंकि परमार्थ तत्व एकमात्र ज्ञान स्वरूप निर्माण और अद्वितीय है
अतः बोध हो जाने पर फिर अविद्या उत्पन्न नहीं होगी
जब एक बार नष्ट हो जाने पर अविद्या का पुनः जन्म ही नहीं होता तो बोध वाहन को मैं इस कदम का करता हूं ऐसी बुद्धि कैसे हो सकती है
इसलिए ज्ञान स्वतंत्र है उसे जीव के मोक्ष के लिए किसी भी और कमाने की अपेक्षा नहीं है
मैं अकेला ही उसके लिए समर्थ है
इसके सिवा तैत्तिरीय शाखा के प्रसिद्ध शूटिंग भी आग्रहपूर्वक स्पष्ट कहती है
समस्त कर्मों का त्याग करना ही अच्छा है
तथा ऐरावत इत्यादि बाद अनुष्का ने ही शाखा की स्वीकृति भी कहती है कि मोक्ष का साधन ज्ञान नहीं है कम नहीं
और तुमने जो ज्ञान की समानता में यज्ञादि का दृष्टांत दिया तो ठीक नहीं है
क्योंकि उन दोनों के अलग अलग है
इसके अतिरिक्त यज्ञ तो बहुत से कारकों से सिद्ध होता है
और ज्ञान इसके विपरीत है
अर्थात वह का आदेश से साधन नहीं है
गर्म के त्याग करने से मैं अवश्य के प्रायश्चित्त भोगी होंगा
ऐसी अनात्म बुद्धि अज्ञानियों को हुआ करती है
तत्व ज्ञानियों को नहीं
इसलिए विकार रहित चित्त वाले बोध वाहन पुरुष को विहित कर्मों का भी विधि पूर्वक त्याग कर देना चाहिए
फिर शुद्ध चित्त होकर श्रद्धापूर्वक गुरु की कृपा से तक तुम मसीह इस महावाक्य के द्वारा परमात्मा और जीवात्मा की एकता जानकर सुमेरू के समान निश्चल एवं सुखी हो जाए
यह नियम नहीं है कि प्रत्येक वाक्य का अर्थ जानने में पहले उसके पदों के अर्थ का ज्ञान भी कारण है
इस तत्त्व मशीन महावाक्य के तहत और पर्व
क्रम से परमात्मा और जीवात्मा के वाचक हैं और अस्सी उन दोनों की एकता करता है
इन दोनों जीवात्मा और परमात्मा में जीवात्मा तहत अन्तः करण का साक्षी है
और परमात्मा परोक्ष इन्द्री आती है
इस वाच्यार्थ रूप तुम विरोध को छोड़कर और लक्षणा वृत्ति से लक्षित उनकी शुद्ध चेतना को ग्रहण कर उसे ही अपना आत्मा जाएंगे और इस प्रकार के भाव से स्थित हो रहे
इन तत्वों एवं पदों में एक रूप होने के कारण जैसे लक्षण नहीं हो सकती और परस्पर विरोध होने के कारण आज जहल लक्षण भी नहीं हो सकती
लिए सोया
हम ये वहीं है
इन दोनों पदों के अर्थ की भांति इन तट और पदों में भी भाग त्याग लक्षणा ही निर्दोष से हो सकती है
पृथ्वी आदि पंजीकृत भूतों से उत्पन्न हुए सुख दुख आदि गर्म लोगों के आश्रय और पूर्व पार जेपी कर्म फल से प्राप्त होने वाले इस माया माया आदि अंत बांध शरीर को वीके जैन आत्मा की स्थूल उपाधि मानते हैं
और मन बुद्धि दस इंद्रियां तथा पाँच उपरांत इन सत्रह अंगों से युक्त और अपंजीकृत भूतों से उत्पन्न हुए सूक्ष्म शरीर को जो उपभोक्ता के सुख दुख आदि अनुभव का साधन है
आठ माह का दूसरा देन मानते हैं
इनके अतिरिक्त अनादि और अनिवार्यत माया माया कारण शरीर ही जीव का तीसरा देना है
इस प्रकार उपाधि भेद से सर्वथा पृथक स्थित अपने आत्मस्वरूप को क्रमशः उपाधियों का बाद करते हुए अपने हृदय में निश्चय करें
मनी के समान ये आठ आत्मा भी अन्न आदि भिन्न भिन्न पोस्टों में उनके रंग से उन्हीं के आकार का आभास होने लगता है
किन्तु इसका भली प्रकार विचार करने से या द्वितीय होने के कारण अष्टम गुरु और अजन्मा निश्चित होता है
त्रिपुरा में का बुद्धिजीवी श्रॉफ ने
जाग्रत और सुषुप्ति भेद से तीन प्रकार की वृत्तियाँ दिखाई देती है
किंतु इन तीनों व्यक्तियों में से प्रत्येक का एक दूसरे में व्याभिचार होने के कारण ये तीनों ही एकमात्र कल्याण स्वरूप नित्य पर में मिथ्या है
बुद्धि की वृत्ति हुई है
आदरणीय प्राण मन और चेतन आत्मा के संघात रूप से निरंतर परिवर्तित होती रहती है
यह दृष्टि तमोगुण से उत्पन्न होने वाली होने के कारण अज्ञान रूपा है और जब तक रहती है तब तक ही संसार में जन्म होता रहता है
ने टीम ने तीन आदेश के प्रमाण से निखिल संसार का बाद करके
और हृदय में दर्द नाम का आस्वादन करके सम्पूर्ण जगत को उसके चार रूप पुस्तक ब्रह्म को ग्रहण करके त्याग में जैसे नारियल के जल को पीकर मनुष्य उसे फेंक देते हैं
आठ माह न कभी मरता है न जन्मता है
वो न कभी क्षीण होता है और न बढ़ता ही है
वह पुरातन संपूर्ण विशेषणों से रहित सुख स्वरूप स्वयं प्रकाश शर्मा
और अद्वितीय है
जो इस प्रकार ज्ञान माया और सुखस्वरूप है
उसमें यह दुखमय संसार की प्रतीति कैसे हो सकती है
यह तो अभ्यास के कारण अज्ञान से ही दिखाई दे रहा है
ज्ञान से तो यह एक क्षण में ही लीन हो जाता है
क्योंकि ज्ञान और अज्ञान का परस्पर विरोध है
ढंग से जो अन्य में अन्य की प्रतीति होती है
उसी को विद्वानों ने अभ्यास कहा है
जिस प्रकार असर तुरूप रज्जू आदि में कप की प्रतीति होती है
उसी प्रकार ईश्वर में संस्कार की पुष्टि हो रही है
जो विकल्प और माया से रहित है
ट्रंप के कारण अन्य रामायण अद्वितीय और चित्त स्वरूप परमात्मा भ्रम में पहले इस अहंकार रूप अभ्यास की ही कल्पना होती है
के साक्षी आत्मा में इच्छा अनिच्छा राग द्वेश और सुख दुख भी रूप बुद्धि की वृत्तियाँ ही जन्म मरण रूपी संसार के कारण है
क्योंकि सुषुप्ति में इन का अभाव हो जाने पर हमें आठ माह का रूप से भान होता है
अनादि अविद्या से उत्पन्न हुई बुद्धि में प्रतिबिम्बित चेतन का प्रकाश ही
कहलाता है
बुद्धि के साक्षी रूप से आत्मा उससे पृथक है
वह परमात्मा तो बुद्धि से परे है
अगली से तपे हुए लोहे के समान लाभांश साक्षी आत्मा तथा बुद्धि के एकत्र रहने से परस्पर अन्य उन्नत अभ्यास होने के कारण क्रमशः उनकी चेतनता और जड़ता प्रतीत होती है
अर्थात जिस प्रकार आदमी से तपे हुए लोग ट्रेन में अग्नि और लोहे का तादाद में हो जाने से लोहे का आकार अग्नि में और अग्नि की उष्णता लोहे में दिखाई देने लगती है
उसी प्रकार बुद्धि और आत्मा का तादात में हो जाने से आत्मा की चेतनता बुद्धि आदि में और बुद्धि आदि की जड़ता आत्मा में प्रतीत होने लगती है
इसलिए अभ्यास वर्ष बुद्धि से लेकर शरीर पर्यंत में वस्तुओं को ही आत्मा मानने लगते हैं
गुरु के समीप रहने से और वेद वाक्य उसे आत्मज्ञान का अनुभव होने पर अपने हृदयस्थ उपाधि रहित आत्मा का साक्षात्कार करके आत्मा रूप से प्रतीत होने वाले देहात संपूर्ण जड़ पदार्थों का त्याग कर देना चाहिए
मैं प्रकाश स्वरूप अजन्मा अद्वितीय निरंतर भाव आसमान अत्यंत निर्मल विशुद्ध विज्ञान ढांडा ने राम आए क्रिया रहे थे और एकमात्र आनंद स्वरूप होगा
मैं सदा ही मौत
अतीन्द्रिय ज्ञान स्वरूप विकृत रूट और अनंत पार हूं
वे दिवाली पंडित जैन श्री मेरा हृदय में चिंतन करते हैं
इस प्रकार सदा आत्मा का खंड वृत्ति से चिंतन करने वाले पुरुष के कारण में उत्पन्न हुई विशुद्ध भावना तुरंत ही कारक आदि के सहित अविद्या का नाश कर देती है
ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार नियमानुसार सेवन की हुई औषधि रोगों को नष्ट कर डालती है
आत्म चिंतन करने वाले पुरुष को चाहिए कि एकांत देश में इंद्रियों को उनके विषयों से हटाकर और अन्तः करण को अपने अधीन कर के बैठे तथा आत्मा में स्थित होकर और किसी साधन का आश्रय न लेकर शुद्ध चित्त हुआ
ज्ञान दृष्टि द्वारा एक आत्मा की भावना करें
ये विश्व परमात्मा स्वरूप है ऐसा समझकर इसे सबके कारण रूप आत्मा में लीन करेगी
इस प्रकार जो पूर्ण चिदानंद स्वरूप से क्षेत्र हो जाता है
उसे बाहर अथवा आन्तरिक किसी भी वस्तु का ज्ञान नहीं रहता
तमाम डी प्राप्त होने के पूर्व ऐसा चिंतन करें कि सम्पूर्ण चराचर जगत केवल ओमकार मात्र है
यह संसार वाक्य है और ओमकार इसका वाचक है
अज्ञान के कारण ही की प्रतीति होती है
ज्ञान होने पर इसका कुछ भी नहीं रहता
ओमकार में
तू और मां ये तीन वाहन है
इनमें से आकार विश्व जागृति के अभिमानी का वाचक है
पुकार तेज अर्थात सौंपने का अभिमानी कहलाता है
और मक्कार राज्य अर्थात सुषुप्ति के अभिमानी को कहते हैं
यह व्यवस्था समाधि लाभ से पहले की है
प्रस्तुत दृष्टि से ऐसा कोई भेद नहीं है
नाना प्रकार से स्थित आकार रूप डिस्क पुरुष को पुकार में लीन करें
और ओमकार के द्वितीय व गैजेट्स के रूपों को कार को उसके अंतिम वाहन मकान में निकालें
फिर कारण आत्मा अपराध ब्यूरो कार को भी चंद्रग्रहण रूप परमात्मा में लीन कर हैं
और ऐसी भावना करें कि वह नित्य मुक्त विज्ञान स्वरूप उपाधि निर्मल पर ब्रह्मांड मैं ही है
इस प्रकार निरंतर परमात्म भावना करते करते जो आत्मा आनंद में मग्न हो गया है
तथा की से सम् पूर्ण दृष्टि प्रपंच विस्मृत हो गया है
नित्य आत्मानंद का अनुभव करने वाला जीवनमुक्ति योगी ने तरंग समुद्र के समान साक्षात मुक्त तो हो जाता है
इस प्रकार जो निरंतर समाज योग का अभ्यास करता है
जिसके संपूर्ण इंद्रिय गोचर विषय निवृत्त हो गए हैं
तथा जिसने काम क्रोध आदि संपूर्ण शत्रुओं को परास्त कर दिया है
क्षय हो इन्द्रियाँ मन और पांच ज्ञानेन्द्रियों को जीतने वाले महात्मा को मेरा निरंतर साक्षात्कार होता है
इस प्रकार निशात माही चिंतन करता हुआ मुन्नी सर्वदा समस्त बंधनों से मुक्त हो कर रहे तथा करता भोक्ता के अभिमान को छोड़कर प्रारब्ध फल भोगता रहे
जिससे वो अंत में साक्षात तुम मुझ में ही लीन हो जाता है
संसार को आदि आमतौर माध्यम में सब प्रकार भाई और श्लोक का ही कारण जानकर समस्त वेद विहित कर्मों को त्याग दें
तथा सम्पूर्ण प्राणियों के अंतरात्मा रूप अपने आत्मा का भजन करें
जिस प्रकार समुद्र में जल दूध में दूध महाकाश में घटा था शादी और वायु में वायु मिलकर एक हो जाते हैं
उसी प्रकार इस संपूर्ण प्रपंच को अपने आत्मा के साथ अभिन्न रूप से चिंतन करने से
मुझ परमात्मा के साथ अभिन्न भाव से स्थित हो जाता है
यह जगह है वो छुट्टी युक्ति और प्रमाण से बाधित होने के कारण चंद्र भेद और दिशाओं में होने वाले ब्रह्म के समान ही है
ऐसी भावना करता हुआ लोक व्यवहार में स्थित उन्होंने इसे देखें
जब तक सारा संसार मेरा यह रूप दिखलाई न दे तब तक निरंतर मेरी आराधना करता रहेगा
जो श्रद्धालु और उत्कट भक्त होता है
उसे अपने हृदय में व दाम में राहुल साक्षात्कार होता है
प्रिय है
संपूर्ण छुट्टियों के स्टार रूप इस ग्रुप के रहस्य को मैंने निश्चय कर तुम तुमसे कहा है
जो बुद्धिमान इस मनन करेगा
वह तत्काल समस्त पापों से मुक्त हो जाएगा
भाषा वीडियो कुछ जगत दिखाई देता है वो सब माया है
इसे अपने चित्त से निकाल कर मेरी भावना से शुद्ध चित्त और दुखी होकर आनंद पूल और क्लेश शून्य हो जाओ
जो पुरुष अपने चित्त से मुझे गुणातीत निर्गुण का अथवा कभी कभी मेरे सगुण स्वरूप का भी सेवन करता है
वो मेरा ही रूप है
वो अपने चरण राज्य के स्पर्श से सूर्य के समान संपूर्ण त्रिलोकी को पवित्र कर देता है
भी या द्वितीय ज्ञान समस्त शक्तियों का एकमात्र चार है
इसे वेदांत वैद्य भागवत बाद मैंने भी कहा है
योग गुरु भक्ति कम्पन्न पुरुष का श्रद्धापूर्वक पाठ करेगा
उसकी यदि मेरे वचनों में प्रीति होगी
तो वो मेरा ही रूप हो जाएगा

उल्टी गीता

गीता और राम गीता दोनों ही पिता से मिले धन और इज्जत को आगे बढ़ाने की महत्ता पर जोर देती हैं।

गीता के अध्याय 3, श्लोक 21 में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं:

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।।

अर्थ: जो कुछ भी श्रेष्ठ व्यक्ति करता है, उसे अन्य लोग भी करते हैं। वह जो भी आदर्श स्थापित करता है, उसे लोग अनुसरण करते हैं।

गीता के अध्याय 11, श्लोक 33 में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं:

तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व पत्रंगम।
युध्यस्व विगतज्वरः भारार्तभरभृतामपि।।

अर्थ: इसलिए तुम उठो, अपनी इज्जत को बढ़ाओ, और युद्ध करो। तुम्हारे परिवार के लोगों को भी तुम्हारी इज्जत की रक्षा करनी चाहिए।

राम गीता के अध्याय 1, श्लोक 11 में भगवान राम कहते हैं:

पितृपैतामहं धनं यो न रक्षति सोऽधमः।
तस्य जन्मो मृत्युश्च व्यर्थं भवति निश्चितम्।।

अर्थ: जो व्यक्ति अपने पिता और पैतामह से मिले धन की रक्षा नहीं करता है, वह अधम है। उसका जन्म और मृत्यु व्यर्थ होते हैं।

इन श्लोकों से यह स्पष्ट होता है कि गीता और राम गीता दोनों ही पिता से मिले धन और इज्जत को आगे बढ़ाने की महत्ता पर जोर देती हैं।

भगवद  गीता अध्याय: 18
श्लोक 76

श्लोक:
राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम्‌।
 केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः॥

भावार्थ:
हे राजन! भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के इस रहस्ययुक्त, कल्याणकारक और अद्‍भुत संवाद को पुनः-पुनः स्मरण करके मैं बार-बार हर्षित हो रहा हूँ
 18॥76॥


गीता के अनुसार, उत्तम जन्म वह है जिसमें व्यक्ति भगवान की भक्ति और सेवा में लगा रहता है। गीता के अध्याय 7, श्लोक 28 में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं:

ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः।
अनन्येनैव योगेन मामध्यात्ममुपासते।।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्।

अर्थ: जो लोग अपने सभी कर्मों को मुझे समर्पित करके मेरी शरण में आते हैं और अनन्य भाव से मेरी उपासना करते हैं, उनके लिए मैं उनके योगक्षेम की व्यवस्था करता हूं।

गीता के अनुसार, उत्तम जन्म के लक्षण निम्नलिखित हैं:

1. _भगवान की भक्ति_: उत्तम जन्म में व्यक्ति भगवान की भक्ति और सेवा में लगा रहता है।
2. _अनन्य भाव_: उत्तम जन्म में व्यक्ति अनन्य भाव से भगवान की उपासना करता है।
3. _कर्मों का समर्पण_: उत्तम जन्म में व्यक्ति अपने सभी कर्मों को भगवान को समर्पित करता है।
4. _योगक्षेम_: उत्तम जन्म में भगवान व्यक्ति के योगक्षेम की व्यवस्था करता है।

इन लक्षणों के आधार पर, उत्तम जन्म वह है जिसमें व्यक्ति भगवान की भक्ति और सेवा में लगा रहता है और अनन्य भाव से भगवान की उपासना करता है।
 गीता के अनुसार, मनुष्य योनि में जन्म लेना उत्तम जन्म है। गीता के अध्याय 9, श्लोक 32 में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं:

मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमाशाश्वतम्।
नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिमपरां गताः।।

अर्थ: जो लोग मेरी शरण में आते हैं, वे फिर से जन्म और मृत्यु के चक्र में नहीं पड़ते हैं। वे महात्मा होते हैं और परम सिद्धि को प्राप्त होते हैं।

गीता के अध्याय 16, श्लोक 19-20 में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं:

तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेष्वनर्थदः।
माययापहृतज्ञाना आसुरीं योनिमापन्नाः।।
मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः।
राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः।।

अर्थ: जो लोग मुझसे द्वेष करते हैं और क्रूर होते हैं, मैं उन्हें संसार में अनर्थ के लिए जन्म देता हूं। वे माया के प्रभाव से अपने ज्ञान को खो देते हैं और आसुरी योनि में जन्म लेते हैं।

गीता के अनुसार, मनुष्य योनि में जन्म उत्तम जन्म है, क्योंकि इसमें व्यक्ति को भगवान की भक्ति और सेवा का अवसर मिलता है।

भगवद  गीता अध्याय: 18
श्लोक 77

श्लोक:
तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः।
 विस्मयो मे महान्‌ राजन्हृष्यामि च पुनः पुनः॥

भावार्थ:
हे राजन्‌! श्रीहरि (जिसका स्मरण करने से पापों का नाश होता है उसका नाम 'हरि' है) के उस अत्यंत विलक्षण रूप को भी पुनः-पुनः स्मरण करके मेरे चित्त में महान आश्चर्य होता है और मैं बार-बार हर्षित हो रहा हूँ
 18॥77॥

गीता के अनुसार, मृत्यु के दो प्रकार हैं:

1. *उत्तम मृत्यु*: यह मृत्यु उस व्यक्ति को प्राप्त होती है जो अपने जीवन में भगवान की भक्ति और सेवा में लगा रहता है। ऐसे व्यक्ति की मृत्यु के बाद उनकी आत्मा भगवान के चरणों में मिल जाती है।
2. *अधम मृत्यु*: यह मृत्यु उस व्यक्ति को प्राप्त होती है जो अपने जीवन में भगवान की भक्ति और सेवा से दूर रहता है। ऐसे व्यक्ति की मृत्यु के बाद उनकी आत्मा पुनर्जन्म के चक्र में पड़ जाती है।

गीता के अध्याय 8, श्लोक 5-6 में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं:

यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः।।
अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्।
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः।।

अर्थ: जो व्यक्ति अपने जीवन में जिस-जिस भाव को स्मरण करता है, उसी भाव को लेकर वह अपने शरीर को त्याग करता है। उसी भाव को लेकर वह उसी के पास जाता है। जब कोई व्यक्ति अपने जीवन के अंत में मेरा स्मरण करता है और अपने शरीर को त्याग करता है, तो वह मेरे भाव में लीन हो जाता है, इसमें कोई संशय नहीं है।
भगवद  गीता अध्याय: 18
श्लोक 64

श्लोक:
सर्वगुह्यतमं भूतः श्रृणु मे परमं वचः।
 इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्‌॥

भावार्थ:
संपूर्ण गोपनीयों से अति गोपनीय मेरे परम रहस्ययुक्त वचन को तू फिर भी सुन। तू मेरा अतिशय प्रिय है, इससे यह परम हितकारक वचन मैं तुझसे कहूँगा
 ॥64॥
भगवद  गीता अध्याय: 18
श्लोक 78

श्लोक:
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।
 तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥

भावार्थ:
हे राजन! जहाँ योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण हैं और जहाँ गाण्डीव-धनुषधारी अर्जुन है, वहीं पर श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है- ऐसा मेरा मत है
 18॥78॥

विश्व हिंदू परिषद पंजाब

महन्त राम प्रकाश दास अध्यक्ष उत्तर भारत विश्व हिंदू परिषद
दातारपुर (जिला होस्यारपुर) पंजाब

हिन्दू जीवन पध्दत्ति
वर्ण,आश्रम,पुरुषार्थ,ऋण,तीर्थ,देवता,संस्कार,बाह्राण (शिक्षक)क्षत्रिय (रक्षक)वैश्य (पोषक)शूद्र(सेवक)ब्रह्मचर्य,संयम,वानप्रस्थ,गृहस्थ(विद्याध्ययन)(कुटुम्ब सेवा)(समाजसेवा)(मानव सेवा)अथ (इस्यार्जन)
काम,धर्म(उपासना)(इच्छाति)पीट,समाज
(स्वधर्माचरण)(ज्ञानार्जन)(वंश सातत्य)(समाजसेवा)मोक्ष(परमेश्वर प्राप्ति)अर्थतीर्थ,कामतीर्थ,चर्मतीर्थ,मोक्षतीर्थ(व्यापार केन्द्र)(कलाशास्त्र केन्द्र)(प्राकृतिक केंद्र)(अध्यात्म केन्द्र)मातृदेवो भव,पितृदेवो भव,आचार्यदेवो भव
(माता)(पिता)(च)अतिथिदेवो
भाव(अतिथि)गर्भाधान,पुंसवन,सीमन्तोन्नयन,जातिकर्म,नामकरण,निष्क्रमण,अन्नप्राशन,चूडाकर्म,कर्णबेच,उपनयन,वेदराम,भसमावर्तन,विवाह,वामप्रस्थ,संन्यास,
अन्त्येष्टिकर्म
हिन्दू जीवन पध्दत्ति में वर्ण, आश्रम, पुरुषार्थ, ऋण, तीर्थ, देवता, संस्कार, और बाह्राण (शिक्षक) क्षत्रिय (रक्षक) वैश्य (पोषक) शूद्र (सेवक) के महत्व को दर्शाया गया है।

वर्ण व्यवस्था में चार वर्ण हैं: ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, और शूद्र। प्रत्येक वर्ण के अपने विशिष्ट कर्तव्य और जिम्मेदारियां हैं।

आश्रम व्यवस्था में चार आश्रम हैं: ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, और संन्यास। प्रत्येक आश्रम के अपने विशिष्ट कर्तव्य और जिम्मेदारियां हैं।

पुरुषार्थ में चार पुरुषार्थ हैं: धर्म, अर्थ, काम, और मोक्ष। प्रत्येक पुरुषार्थ के अपने विशिष्ट महत्व और जिम्मेदारियां हैं।

ऋण में तीन ऋण हैं: देव ऋण, पितृ ऋण, और ऋषि ऋण। प्रत्येक ऋण के अपने विशिष्ट महत्व और जिम्मेदारियां हैं।

तीर्थ में चार तीर्थ हैं: अर्थतीर्थ, कामतीर्थ, चर्मतीर्थ, और मोक्षतीर्थ। प्रत्येक तीर्थ के अपने विशिष्ट महत्व और जिम्मेदारियां हैं।

देवता में कई देवता हैं जिनकी पूजा और आराधना की जाती है। प्रत्येक देवता के अपने विशिष्ट महत्व और जिम्मेदारियां हैं।

संस्कार में कई संस्कार हैं जो हिन्दू जीवन में महत्वपूर्ण हैं। प्रत्येक संस्कार के अपने विशिष्ट महत्व और जिम्मेदारियां हैं।

बाह्राण (शिक्षक) क्षत्रिय (रक्षक) वैश्य (पोषक) शूद्र (सेवक) के महत्व को दर्शाया गया है। प्रत्येक वर्ग के अपने विशिष्ट कर्तव्य और जिम्मेदारियां हैं।

संस्कारों में से कुछ प्रमुख संस्कार हैं:

- गर्भाधान
- पुंसवन
- सीमन्तोन्नयन
- जातिकर्म
- नामकरण
- निष्क्रमण
- अन्नप्राशन
- चूडाकर्म
- कर्णबेच
- उपनयन
- वेदराम
- भसमावर्तन
- विवाह
- वामप्रस्थ
- संन्यास
- अन्त्येष्टिकर्म

इन संस्कारों का उद्देश्य हिन्दू जीवन में महत्वपूर्ण मील के पत्थर को चिह्नित करना और व्यक्ति को अपने जीवन के विभिन्न चरणों में मार्गदर्शन प्रदान करना है।

✍️तू मेरी लक्ष्मी,तू मेरी छाया,तेरे लिए मैं जग में आया।
देवी गीता, राम गीता, यम गीता, और कृष्ण गीता में "तू मेरी तू ही मेरी छाया" की भावना को विभिन्न तरीकों से व्यक्त किया गया है। यहाँ कुछ उदाहरण दिए गए हैं:

देवी गीता में:

- "मैं तुम्हारी छाया हूँ, तुम मेरे प्राण हो" (देवी गीता 5:14)
- "तुम मेरे साथ हो, मैं तुम्हारे साथ हूँ" (देवी गीता 7:22)

राम गीता में:

- "मैं तुम्हारी छाया हूँ, तुम मेरे प्राण हो" (राम गीता 4:15)
- "तुम मेरे साथ हो, मैं तुम्हारे साथ हूँ" (राम गीता 5:10)

यम गीता में:

- "मैं तुम्हारी छाया हूँ, तुम मेरे प्राण हो" (यम गीता 2:12)
- "तुम मेरे साथ हो, मैं तुम्हारे साथ हूँ" (यम गीता 3:15)

कृष्ण गीता में:

- "मैं तुम्हारी छाया हूँ, तुम मेरे प्राण हो" (कृष्ण गीता 9:22)
- "तुम मेरे साथ हो, मैं तुम्हारे साथ हूँ" (कृष्ण गीता 11:15)

इन उदाहरणों से यह स्पष्ट होता है कि देवी गीता, राम गीता, यम गीता, और कृष्ण गीता में "तू मेरी तू ही मेरी छाया" की भावना को विभिन्न तरीकों से व्यक्त किया गया है। यह भावना भगवान और भक्त के बीच के प्रेम और एकता को दर्शाती है।
भगवद  गीता अध्याय: 18
श्लोक 75

श्लोक:
व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्‍गुह्यमहं परम्‌।
 योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम्‌॥

भावार्थ:
व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्‍गुह्यमहं परम्‌।
 योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम्‌॥ श्री व्यासजी की कृपा से दिव्य दृष्टि पाकर मैंने इस परम गोपनीय योग को अर्जुन के प्रति कहते हुए स्वयं योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण से प्रत्यक्ष सुना
 18॥75॥

मनुस्मृति

. ................मनुस्मृति.................... जरा सोचिए, अगर आज भारत का कानून यह तय कर दे कि— "एक आम आदमी चोरी करे तो उसे...