शुक्रवार, 29 नवंबर 2024

विवाह पूर्व के पापों को माफ करना

विवाह संस्कार में पाप और माफी 
विवाह संस्कार में पाप माफी के लिए कई मंत्रों का उपयोग किया जाता है, जो पति-पत्नी को अपने पूर्व के पापों के लिए क्षमा मांगने और अपने जीवन में एक नई शुरुआत करने में मदद करते हैं।

इन मंत्रों का उपयोग विवाह संस्कार के दौरान किया जाता है, जो पति-पत्नी को अपने जीवन में एक नई शुरुआत करने और अपने रिश्ते को मजबूत बनाने में मदद करता है।

यहाँ कुछ प्रमुख मंत्र दिए गए हैं जो विवाह संस्कार में पाप माफी के लिए उपयोग किए जाते हैं:

अग्नि सूक्त: "अग्निर्ज्योतिर्ज्योतिषां पतिर्ज्योतिषां पतिः। त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव। त्वमेव सर्वं त्वमेव सर्वम्।"

पवमान सूक्त: "पवमानः प्राणः पवमानः प्राणः। पवमानः प्राणः पवमानः प्राणः।"

गायत्री मंत्र: "ॐ भूर्भुवः स्वः। तत्सवितुर्वरेण्यं। भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्।"

इन मंत्रों का उपयोग विवाह संस्कार में पाप माफी के लिए किया जाता है, जो पति-पत्नी को अपने पूर्व के पापों के लिए क्षमा मांगने और अपने जीवन में एक नई शुरुआत करने में मदद करता है।


विवाह का स्वरूप


आज विवाह वासना-प्रधान बनते चले जा रहे हैं। रंग, रूप एवं वेष-विन्यास के आकर्षण को पति-पत्नि के चुनाव में प्रधानता दी जाने लगी है, यह प्रवृत्ति बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। यदि लोग इसी तरह सोचते रहे, तो दाम्पत्य-जीवन शरीर प्रधान रहने से एक प्रकार के वैध-व्यभिचार का ही रूप धारण कर लेगा। पाश्चात्य जैसी स्थिति भारत में भी आ जायेगी। शारीरिक आकर्षण की न्यूनाधिकता का अवसर सामने आने पर विवाह जल्दी-जल्दी टूटते-बनते रहेंगे। अभी पत्नी का चुनाव शारीरिक आकर्षण का ध्यान में रखकर किये जाने की प्रथा चली है, थोड़े ही दिनों में इसकी प्रतिक्रिया पति के चुनाव में भी सामने आयेगी। तब असुन्दर पतियों को कोई पत्नी पसन्द न करेगी और उन्हें दाम्पत्य सुख से वंचित ही रहना पड़ेगा।

समय रहते इस बढ़ती हुई प्रवृत्ति को रोका जाना चाहिए और शारीरिक आकर्षण की उपेक्षा कर सद्गुणों तथा सद्भावनाओं को ही विवाह का आधार पूवर्काल की तरह बने रहने देना चाहिए। शरीर का नहीं आत्मा का सौन्दयर् देखा जाए और साथी में जो कमी है, उसे प्रेम, सहिष्णुता, आत्मीयता एवं विश्वास की छाया में जितना सम्भव हो सके, सुधारना चाहिए, जो सुधार न हो सके, उसे बिना असन्तोष लाये सहन करना चाहिए। इस रीति-नीति पर दाम्पत्य जीवन की सफलता निर्भर है। अतएव पति-पतनी को एक-दूसरे से आकर्षण लाभ मिलने की बात न सोचकर एक-दूसरे के प्रति आत्म-समपर्ण करने और सम्मिलित शक्ति उत्पन्न करने, उसके जीवन विकास की सम्भावनाएँ उत्पन्न करने की बात सोचनी चाहिए। चुनाव करते समय तक साथी को पसन्द करने न करने की छूट है। जो कुछ देखना, ढूँढ़ना, परखना हो, वह कार्य विवाह से पूर्व ही समाप्त कर लेना चाहिए। जब विवाह हो गया, तो फिर यह कहने की गुंजाइश नहीं रहती कि भूल हो गई, इसलिए साथी की उपेक्षा की जाए। जिस प्रकार के भी गुण-दोष युक्त साथी के साथ विवाह बन्धन में बँधें, उसे अपनी ओर से कर्त्तव्यपालन समझकर पूरा करना ही एक मात्र मार्ग रह जाता है। इसी के लिए विवाह संस्कार का आयोजन किया जाता है। समाज के सम्भ्रान्त व्यक्तियों की, गुरुजनों की, कुटुम्बी-सम्बन्धियों की, देवताओं की उपस्थिति इसीलिए इस धर्मानुष्ठान के अवसर पर आवश्यक मानी जाती है कि दोनों में से कोई इस कर्तव्य-बन्धन की उपेक्षा करे, तो उसे रोकें और प्रताड़ित करें।
हिंदू धर्म में विवाह को सोलह संस्कारों में से एक संस्कार माना गया है। विवाह = वि + वाह, अत: इसका शाब्दिक अर्थ है - विशेष रूप से (उत्तरदायित्व का) वहन करना। पाणिग्रहण संस्कार को सामान्य रूप से हिंदू विवाह के नाम से जाना जाता है। अन्य धर्मों में विवाह पति और पत्नी के बीच एक प्रकार का करार होता है जिसे कि विशेष परिस्थितियों में तोड़ा भी जा सकता है परंतु हिंदू विवाह पति और पत्नी क बीच जन्म-जन्मांतरों का सम्बंध होता है जिसे कि किसी भी परिस्थिति में नहीं तोड़ा जा सकता। अग्नि के सात फेरे ले कर और ध्रुव तारा को साक्षी मान कर दो तन, मन तथा आत्मा एक पवित्र बंधन में बंध जाते हैं। हिंदू विवाह में पति और पत्नी के बीच शारीरिक संम्बंध से अधिक आत्मिक संम्बंध होता है और इस संम्बंध को अत्यंत पवित्र माना गया है।
हिंदू मान्यताओं के अनुसार मानव जीवन को चार आश्रमों (ब्रह्मचर्य आश्रम, गृहस्थ आश्रम, सन्यास आश्रम तथा वानप्रस्थ आश्रम) में विभक्त किया गया है और गृहस्थ आश्रम के लिये पाणिग्रहण संस्कार अर्थात् विवाह नितांत आवश्यक है। हिंदू विवाह में शारीरिक संम्बंध केवल वंश वृद्धि के उद्देश्य से ही होता है।
हिंदू विवाह 7 प्रकार के होते हैं, और उन सभी को एक पुरुष और एक महिला के बीच के रूप में परिभाषित किया गया है। इसके अलावा, श्री कृष्ण ने उपदेश दिया कि विवाह का अंतिम लक्ष्य ईश्वर के प्रति जागरूक बच्चों की परवरिश करना है। चूंकि समलैंगिक जोड़े एक साथ प्रजनन नहीं कर सकते हैं, समलैंगिक विवाह तकनीकी रूप से हिंदू धर्म में मान्य नहीं है, चाहे आप की राय कुछ भी क्यों ना हो।

❤️ वर वधु की प्रतिज्ञाएं❤️

वर की प्रतिज्ञाएँ
धमर्पत्नीं मिलित्वैव, ह्येकं जीवनामावयोः। अद्यारम्भ यतो में त्वम्, अर्द्धांगिनीति घोषिता ॥१॥ आज से धमर्पत्नी को अर्द्धांगिनी घोषित करते हुए, उसके साथ अपने व्यक्तित्व को मिलाकर एक नये जीवन की सृष्टि करता हूँ। अपने शरीर के अंगों की तरह धमर्पतनी का ध्यान रखूँगा।

स्वीकरोमि सुखेन त्वां, गृहलक्ष्मीमहन्ततः। मन्त्रयित्वा विधास्यामि, सुकायार्णि त्वया सह॥२॥ प्रसन्नतापूर्वक गृहलक्ष्मी का महान अधिकार सौंपता हूँ और जीवन के निर्धारण में उनके परामर्श को महत्त्व दूँगा।

रूप-स्वास्थ्य-स्वभावान्तु, गुणदोषादीन् सवर्तः। रोगाज्ञान-विकारांश्च, तव विस्मृत्य चेतसः॥३॥ रूप, स्वास्थ्य, स्वभावगत गुण दोष एवं अज्ञानजनित विकारों को चित्त में नहीं रखूँगा, उनके कारण असन्तोष व्यक्त नहीं करूँगा। स्नेहपूर्वक सुधारने या सहन करते हुए आत्मीयता बनाये रखूँगा।

सहचरो भविष्यामि, पूणर्स्नेहः प्रदास्यते। सत्यता मम निष्ठा च, यस्याधारं भविष्यति॥४॥ पत्नी का मित्र बनकर रहूँगा और पूरा-पूरा स्नेह देता रहूँगा। इस वचन का पालन पूरी निष्ठा और सत्य के आधार पर करूँगा।

यथा पवित्रचित्तेन, पातिव्रत्य त्वया धृतम्। तथैव पालयिष्यामि, पतनीव्रतमहं ध्रुवम्॥५॥ पत्नी के लिए जिस प्रकार पतिव्रत की मर्यादा कही गयी है, उसी दृढ़ता से स्वयं पत्नीव्रत धर्म का पालन करूँगा। चिन्तन और आचरण दोनों से ही पर नारी से वासनात्मक सम्बन्ध नहीं जोडूँगा।

गृहस्याथर्व्यवस्थायां, मन्त्रयित्वा त्वया सह। संचालनं करिष्यामि, गृहस्थोचित-जीवनम्॥६॥ गृह व्यवस्था में धर्म-पत्नी को प्रधानता दूँगा। आमदनी और खर्च का क्रम उसकी सहमति से करने की गृहस्थोचित जीवनचर्या अपनाऊँगा।

समृद्धि-सुख-शान्तीनां, रक्षणाय तथा तव। व्यवस्थां वै करिष्यामि, स्वशक्तिवैभवादिभि॥७॥ धमर्पत्नी की सुख-शान्ति तथा प्रगति-सुरक्षा की व्यवस्था करने में अपनी शक्ति और साधन आदि को पूरी ईमानदारी से लगाता रहूँगा।

यतनशीलो भविष्यामि, सन्मागर्ंसेवितुं सदा। आवयोः मतभेदांश्च, दोषान्संशोध्य शान्तितः॥८॥ अपनी ओर से मधुर भाषण और श्रेष्ठ व्यवहार बनाये रखने का पूरा-पूरा प्रयत्न करूँगा। मतभेदों और भूलों का सुधार शान्ति के साथ करूँगा। किसी के सामने पत्नी को लांछित-तिरस्कृत नहीं करूँगा।

भवत्यामसमथार्यां, विमुखायांच कमर्णि। विश्वासं सहयोगंच, मम प्राप्स्यसि त्वं सदा॥९॥ पत्नी के असमर्थ या अपने कर्त्तव्य से विमुख हो जाने पर भी अपने सहयोग और कर्त्तव्य पालन में रत्ती भर भी कमी न रखूँगा।

कन्या की प्रतिज्ञाएँ
स्वजीवनं मेलयित्वा, भवतः खलु जीवने। भूत्वा चाधार्ंगिनी नित्यं, निवत्स्यामि गृहे सदा॥१॥ अपने जीवन को पति के साथ संयुक्त करके नये जीवन की सृष्टि करूँगी। इस प्रकार घर में हमेशा सच्चे अर्थों में अर्द्धांगिनी बनकर रहूँगी।

‍शिष्टतापूवर्कं सवैर्ः, परिवारजनैः सह। औदायेर्ण विधास्यामि, व्यवहारं च कोमलम्॥२॥ पति के परिवार के परिजनों को एक ही शरीर के अंग मानकर सभी के साथ शिष्टता बरतूँगी, उदारतापूर्वक सेवा करूँगी, मधुर व्यवहार करूँगी।

त्यक्त्वालस्यं करिष्यामि, गृहकायेर् परिश्रमम्। भतुर्हर्षर्ं हि ज्ञास्यामि, स्वीयामेव प्रसन्नताम्॥३॥ आलस्य को छोड़कर परिश्रमपूर्वक गृह कार्य करूँगी। इस प्रकार पति की प्रगति और जीवन विकास में समुचित योगदान करूँगी।

श्रद्धया पालयिष्यामि, धमर्ं पातिव्रतं परम्। सवर्दैवानुकूल्येन, पत्युरादेशपालिका॥४॥ पतिव्रत धर्म का पालन करूँगी, पति के प्रति श्रद्धा-भाव बनाये रखकर सदैव उनके अनुकूल रहूँगी। कपट-दुराव न करूँगी, निर्देशों के अविलम्ब पालन का अभ्यास करूँगी।

सुश्रूषणपरा स्वच्छा, मधुर-प्रियभाषिणी। प्रतिजाने भविष्यामि, सततं सुखदायिनी॥५॥ सेवा, स्वच्छता तथा प्रियभाषण का अभ्यास बनाये रखूँगी। ईर्ष्या, कुढ़न आदि दोषों से बचूँगी और सदा प्रसन्नता देने वाली बनकर रहूँगी।

‍मितव्ययेन गाहर्स्थ्य-संचालने हि नित्यदा। प्रयतिष्ये च सोत्साहं, तवाहमनुगामिनी॥६॥ मितव्ययी बनकर फिजूलखर्ची से बचूँगी। पति के असमर्थ हो जाने पर भी गृहस्थ के अनुशासन का पालन करूँगी।

‍देवस्वरूपो नारीणां, भत्तार् भवति मानवः। मत्वेति त्वां भजिष्यामि, नियता जीवनावधिम्॥७॥ नारी के लिए पति, देव स्वरूप होता है- यह मानकर मतभेद भुलाकर, सेवा करते हुए जीवन भर सक्रिय रहूँगी, कभी भी पति का अपमान न करूँगी।

पूज्यास्तव पितरो ये, श्रद्धया परमा हि मे। सेवया तोषयिष्यामि, तान्सदा विनयेन च॥८॥ जो पति के पूज्य और श्रद्धा पात्र हैं, उन्हें सेवा द्वारा और विनय द्वारा सदैव सन्तुष्ट रखूँगी।

विकासाय सुसंस्कारैः, सूत्रैः सद्भाववद्धिर्भिः। परिवारसदस्यानां, कौशलं विकसाम्यहम्॥९॥ परिवार के सदस्यों में सुसंस्कारों के विकास तथा उन्हें सद्भावना के सूत्रों में बाँधे रहने का कौशल अपने अन्दर विकसित करूँगी।

❤️दिशा एवं प्रेरणा जिस में विवाह पूर्व के पापों को माफ करने का मूल कारण है।❤️

गायत्री मन्त्र की आहुति के पश्चात् पाँच आहुतियाँ प्रायश्चित होम की अतिरिक्त रूप से दी जाती है। वर और कन्या दोनों के हाथ में हवन सामग्री दी जाती है। प्रायश्चित होम की आहुतियाँ देते समय यह भावना दोनों के मन में आनी चाहिए कि दाम्पत्य जीवन में बाधक जो भी कुसंस्कार अब तक मन में रहे हों, उन सब को स्वाहा किया जा रहा है। किसी से गृहस्थ के आदर्शों के उल्लंघन करने की कोई भूल हुई हो, तो उसे अब एक स्वप्न जैसी बात समझकर विस्मरण कर दिया जाए। इस प्रकार की भूल के कारण कोई किसी को न तो दोष दे, न सन्देह की दृष्टि से देखे। इसी प्रकार कोई अन्य नशेबाजी जैसा दुर्व्यसन रहा हो या स्वभाव में कठोरता, स्वार्थपरता, अहंकार जैसी कोई त्रुटि रही हो, तो उसका त्याग कर दिया जाए। साथ ही, उन भूलों का प्रायश्चित करते हुए भविष्य में कोई ऐसी भूल न करने का संकल्प भी करना है, जो दाम्पत्य जीवन की प्रगति में बाधा उत्पन्न करे।

क्रिया और भावना
वर-वधू हवन सामग्री से आहुति करें। भावना करें कि प्रायश्चित आहुति के साथ पूर्व दुष्कृत्यों की धुलाई हो रही है। स्वाहा के साथ आहुति डालें, इदं न मम के साथ हाथ जोड़कर नमस्कार करें

ॐ त्वं नो अग्ने वरुणस्य विद्वान्, देवस्य हेडो अव यासिसीष्ठाः। यजिष्ठो वह्नितमः शोशुचानो, विश्वा द्वेषा सि प्र मुमुग्ध्यस्मत् स्वाहा। इदमग्नीवरुणाभ्यां इदं न मम॥ -२१.३ ॐ स त्वं नो अग्नेऽवमो भवोती, नेदिष्ठो अस्या ऽ उषसो व्युष्टौ। अव यक्ष्व नो वरुण रराणो, वीहि मृडीक सुहवो न ऽ एधि स्वाहा। इदमग्नीवरुणाभ्यां इदं न मम॥ -२१.४ ॐ अयाश्चाग्नेऽस्य, नभिशस्तिपाश्च, सत्यमित्वमयाऽ असि। अया नो यज्ञं वहास्यया, नो धेहि भेषज स्वाहा। इदमग्नये अयसे इदं न मम। -का०श्रौ०सू० २५.१.११ ॐ ये ते शतं वरुण ये सहस्रं, यज्ञियाः पाशा वितता महान्तः, तेभिनोर्ऽअद्य सवितोत विष्णुः, विश्वे मुंचन्तु मरुतः स्वकार्ः स्वाहा। इदं वरुणायसवित्रे विष्णवे विश्वेभ्यो देवेभ्यो मरुद्भ्यः स्वकेर्भ्यश्च इदं न मम। -का०श्रौ० सू० २५.१.११ ॐ उदुत्तमं वरुण पाशमस्मदवाधमं, विमध्यम श्रथाय। अथा वयमादित्य व्रते तवानागसो, अदितये स्याम स्वाहा। इदं वरुणायादित्यायादितये च इदं न मम। -१२.१२

अध्याय 9


भगवद गीता के अध्याय 9 में कुल 34 श्लोक हैं 

जिसमें भगवान कृष्ण अर्जुन को राजविद्या और राजगुह्य के बारे में बता रहे हैं। इस अध्याय में कई महत्वपूर्ण बातें हैं जिनका ध्यान रखकर शोध की जा सकती है:
👉आप भी अर्जुन की जगह खुद को रख कर भगवान से निकटता बना सकते है।👈
1. *राजविद्या और राजगुह्य*: भगवान कृष्ण अर्जुन को राजविद्या और राजगुह्य के बारे में बता रहे हैं। राजविद्या वह ज्ञान है जो परमात्मा के बारे में है, जबकि राजगुह्य वह रहस्य है जो परमात्मा के साथ एकता की प्राप्ति के लिए आवश्यक है।
👉
राजविद्या राजगुह्य योग, भगवद्गीता के अध्याय 9 में वर्णित है. इस अध्याय में राजविद्या और राजगुह्य के बारे में बताया गया है. राजविद्या का मतलब है सभी विद्याओं में सर्वश्रेष्ठ और राजगुह्य का मतलब है गोपनीयों का राजा. 
राजविद्या राजगुह्य योग के बारे में ज़्यादा जानकारीः
इस योग को सबसे उच्च माना गया है.
यह योग अविनाशी है.
यह योग जन्मों तक याद रहता है और साथ भी जाता है.
इस योग का फल तुरंत मिलता है.
यह योग धर्म से युक्त है.
यह योग सुगम, सरल, और सुखदाई है.
इस योग को पाने के बाद, यह कभी नहीं भूलता. 
भगवद्गीता के अध्याय 9 में वर्णित कुछ और बातेंः
इस अध्याय में भक्ति योग की बात कही गई है.
इस अध्याय में ज्ञान और विज्ञान के बारे में बताया गया है.
इस अध्याय में कृष्ण और उनकी विभूतियों का ज्ञान दिया गया है. 👈

2. *भक्ति और प्रेम*: भगवान कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि भक्ति और प्रेम के माध्यम से परमात्मा की प्राप्ति की जा सकती है।
👉भक्ति और प्रेम दोनों ही भावनाएं हैं जिनमें समर्पण का भाव होता है. भक्ति का मतलब है ईश्वर के प्रति निष्ठापूर्वक समर्पित होना. वहीं, प्रेम का मतलब है किसी से जुड़ना और उससे जुड़े हर स्थान और वस्तु से प्रेम करना. प्रेम और भक्ति में अंतर है, लेकिन दोनों में ही समर्पण का भाव होता है. 
भक्ति और प्रेम से जुड़ी कुछ बातें:
भक्ति नौ तरह की होती है. 
भक्ति के कुछ उदाहरण हैं- 

1श्रवण, 
श्रवण का मतलब है ध्वनियों को सुनना और समझना. यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके ज़रिए हम आस-पास की ध्वनियों को पहचानते हैं और उन्हें अर्थ देते हैं. श्रवण, पारंपरिक पांच इंद्रियों में से एक है. 
श्रवण वास्तव में
श्रवण तंत्रिका, आंतरिक कान को मस्तिष्क से जोड़ती है. 
श्रवण हानि का मतलब है सुनने में आंशिक या पूरी तरह से अक्षमता. 
श्रवण विज्ञान, सुनने से जुड़ा एक शैक्षणिक क्षेत्र है. 
श्रवण शब्द का इस्तेमाल ध्वनिक और ध्वनिकीय के अर्थ में भी किया जाता है. 
श्रवण शब्द का इस्तेमाल इस तरह से भी किया जा सकता है:
ईश्वर की लीला, कथा, महत्व, शक्ति, स्रोत वगैरह को श्रद्धा से सुनना।

2कीर्तन, 
कीर्तन करने से भक्ति की भावना जागती है और ईश्वर के प्रति प्रेम का संचार होता है. कीर्तन करने से मन शांत होता है और तनाव दूर होता है. कीर्तन में ईश्वर के नाम को जपा जाता है. कीर्तन करने से मन की अशुद्धियां और दुगुण दूर होते हैं. कीर्तन करने से आत्मशक्ति बढ़ती है और मन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है. 

कीर्तन करने से अच्छे कर्म करने की प्रेरणा मिलती है. 
कीर्तन करने से मन में ख़ुशी व् संतुष्टि आती है. 
कीर्तन करने से वाणी में मधुरता आती है. 
कीर्तन करने से ह्रदय में प्रेम-भावना और सह्रदयता बढ़ती है. 
कीर्तन करने से मन के नकरात्मक भाव दूर होते जाते हैं. 
कीर्तन करने से परमात्मा के साथ का अनुभव होता है. 
कीर्तन करने के लिए कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए:
कीर्तन करते समय आपका मुंह पूर्व या उत्तर दिशा की ओर या कहीं और हो कोई फर्क नहीं पड़ता।
कीर्तन करने से पहले भगवान की मूर्ति या छवि की स्थापित करना ज़रूरी बताया जाता है।
वो भगवान की हो या प्रेमिका की क्यों कि सभी भगवान के ही अंशात्मक स्वरूप हैं
कीर्तन करते समय साफ़-सफ़ाई का विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए. गायन के रूप में कीर्तन होता है।

कीर्तन शब्द का संधि विच्छेद 'सम् + कीर्तन' होता है. व्यंजन संधि में जब 'म्' के बाद कोई व्यंजन आता है, तो 'म्' के पहले वर्ण पर अनुस्वार आता है या बाद वाले वर्ण के वर्ग का पंचम वर्ण आता है. जैसे, 'सम् + भावना' का संधि विच्छेद 'सम्भावना' होता है. 
संधि विच्छेद से जुड़ी कुछ और जानकारीः
दो वर्णों के मेल से होने वाले विकार को संधि कहते हैं. 
संधि विच्छेद, शब्दों को उनके व्याकरणिक गुणों के आधार पर आपस में मिलाने की प्रक्रिया है. 
संधि विच्छेद से नए शब्द बनते हैं और भाषा सरल और मधुर बनती है. 
संधि विच्छेद से शब्द रचना आसान होती है और उनके अर्थ में भी विशेषता आती है. 
हिन्दी भाषा में संधि द्वारा संयुक्त शब्द लिखने का चलन नहीं है, लेकिन संस्कृत में इसके बिना काम नहीं चलता. 

3स्मरण, 
किसी देखी, सुनी बीती या अनुभव में आई बात का फिर से मन में आना । याद आना । या ध्यान में लाना ।

4पादसेवन, 
पादसेवन का भाव है, भगवान के चरणों में समर्पित होना. भगवान के प्रति प्रेम और समर्पण भाव को व्यक्त करने के लिए किए जाने वाले कर्मों में से एक पादसेवन है. यह नवधा भक्ति का एक रूप है. नवधा भक्ति के बारे में ज़्यादा जानकारीः 
नवधा भक्ति का मतलब है, नौ तरह की भक्ति. 
भगवान श्रीराम ने शबरी को नवधा भक्ति का उपदेश दिया था. 
नवधा भक्ति के बारे में जानकारी, रामायण के अरण्यकांड में मिलती है. 
पादसेवन के ज़रिए भगवान की भक्ति की जा सकती है.
धन की देवी मां लक्ष्मी पादसेवन के ज़रिए सत्यनारायण की भक्ति करती हैं.
भगवान श्रीहरि के चरणों में सबकुछ समर्पित करना ही पादसेवन भक्ति है. 

5पूजा, 

पूजा का भाव है, भगवान या देवी-देवताओं के प्रति श्रद्धा और उनका आराधन करना. पूजा करने से मन में सकारात्मकता और ऊर्जा आती है. पूजा करने से अनीतिक कामों से बचना और मर्यादित जीवन जीने का भाव मज़बूत होता है. पूजा करने से उत्साह और आशावादिता का संचार होता है. 

पूजा करने का तरीका व्यक्ति की श्रद्धा पर निर्भर करता है. कोई  करता है,

 कोई पूजा करने के लिए जल, फूल, फल, अक्षत वगैरह का इस्तेमाल किया जाता है. 
लठ बजा कर,तो कोई (जलाकर रावण की पूजा) भी होती है।

पूजा करने के लिए शास्त्रों में पंचोपचार, दशोपचार, और षोडषोपचार जैसे तरीके बताए गए हैं. 
जिन घरों में रोज़ाना पूजा की जाती है, वहां पवित्र वातावरण बनता है. 
पूजा करने से मन में सकारात्मकता और ऊर्जा आती है. 
पूजा करने से अनीतिक कामों से बचना और मर्यादित जीवन जीने का भाव मज़बूत होता है. 

6प्रणाम, 
प्रणाम करने का मतलब है, विनम्र होना, नम्रता दिखाना और किसी के सामने सिर झुकाना. प्रणाम करने से व्यक्ति के अंदर विनम्रता आती है और वह समाज के लिए अच्छे काम करता है. प्रणाम करने से आत्मीयता बढ़ती है और रिश्ते मज़बूत होते हैं. प्रणाम करने से जुड़े कुछ और भाव ये रहे:
प्रणाम करने से व्यक्ति के अंदर का अभिमान खत्म होता है.
प्रणाम करने से व्यक्ति को आशीर्वाद मिलता है.
प्रणाम करने से व्यक्ति के पाप कर्मों से मुक्ति मिलती है.
प्रणाम करने से व्यक्ति का मन शांत होता है.
प्रणाम करने से व्यक्ति के अंदर दया-भाव आता है.
प्रणाम करने से व्यक्ति को बराबरी का भाव आता है.
प्रणाम करने से व्यक्ति अपने जीवन के सच्चे अर्थों को जान पाता है. 
प्रणाम करने की परंपरा भारतीय धर्म-ग्रंथों में प्राचीन काल से चली आ रही है. जब भी कोई व्यक्ति अपने से बड़ों के पास जाता है, तो वह उन्हें प्रणाम करता है. 

7दास्यभाव, 
दास्य भाव, भक्ति का एक भाव है. दास्य भाव में भक्त, स्वयं को भगवान का दास मानता है. दास्य भाव में भक्त, भगवान के प्रति निःस्वार्थ सेवा करता है. दास्य भाव में भक्त, भगवान को दीन-दयालु और भक्त-वत्सल मानता है. दास्य भाव में भक्त, स्वयं को तुच्छ और लघु मानता है. 
दास्य भाव के कुछ उदाहरण:
रामायण में भरत, लक्ष्मण, और हनुमान ने दास्य भाव का उदाहरण दिया है. 
कुचेला, भगवान कृष्ण के प्रति दास्य भाव रखते थे. 
हनुमान, भगवान की सेवा करने और भगवान के लिए सब कुछ त्यागने के लिए तैयार रहते थे. 
शंकरदेव के एक-शरण हरि नाम धर्म में दास्य भाव एक बड़ी विशेषता है. 
दास्य भाव के अलावा, भक्ति के कुछ और भाव: सख्य भाव, वात्सल्य भाव, माधुर्य भाव. 
8मैत्रीपूर्ण स्नेह, 
मैत्री भाव का अर्थ है कि सभी प्राणियों के प्रति बंधु-भावना हो, मित्रों के प्रति ही नहीं, शत्रुओं तक के प्रति हो, आदमियों के प्रति ही नहीं, सभी जीव प्राणियों के प्रति हो।
जन्म से न तो मित्र होता है और न ही शत्रु। किसी को मित्र या शत्रु बनाना स्वयं के व्यवहार पर निर्भर होता है।
9समर्पण. 
भक्ति करने का मकसद मोक्ष पाना होता है. 
सच्चा प्रेम करने वाला व्यक्ति प्रेमी की भक्ति करने लगता है. 
सच्ची भक्ति करने वाला व्यक्ति अपने आराध्य से प्रेम करने लगता है. 
प्रेम में शक्ति होती है, क्योंकि यह आपको अपने पार्टनर के लिए समर्पित बनाता है. 
प्रेम आपके जीवन को व्यापक, उत्साही और पूर्णता की ओर ले जाता है. 👈
3. *अहंकार और मोह*: भगवान कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि अहंकार और मोह परमात्मा की प्राप्ति में बाधा उत्पन्न करते हैं।
👉अहंकार और मोह, दोनों ही मन में रहने वाली नकारात्मक भावनाएं हैं. ये भावनाएं इंसान को कुमार्ग पर ले जाती हैं और उसका पतन करा सकती हैं. 
अहंकार और मोह के बारे में ज़्यादा जानकारी:
अहंकार का मतलब है, खुद को ज़्यादा अहमियत देना. अहंकार जब तक सामने वाले को वश में न कर ले, तब तक संतुष्ट नहीं होता. 
मोह का मतलब है, किसी व्यक्ति या वस्तु से लगाव रखना. मोह से जुड़ी कुछ और बातें: 
मोह को आसक्ति या प्रेम भी कहा जाता है. 
पुत्र मोह, पत्नी मोह, ज़मीन-जायदाद का मोह, ये सभी मोह के उदाहरण हैं. 
मोह का मतलब है, किसी व्यक्ति या वस्तु को भोगते रहने की तेज इच्छा. 
अहंकार और मोह को विकार माना जाता है. 
अहंकार और मोह से बचने का सबसे आसान तरीका प्रभु की भक्ति है. 
अहंकार और मोह जैसी नकारात्मक भावनाओं पर काबू पाने से सद्मार्ग पर चलने में मदद मिलती है.👈
4. *स्वयं की प्रकृति का ज्ञान*: भगवान कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि स्वयं की प्रकृति का ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक है ताकि परमात्मा की प्राप्ति की जा सके।
👉स्वयं की प्रकृति या अपने वास्तविक स्वरूप को जानने का मतलब है कि आप अपने भौतिक शरीर से परे हैं. अपने वास्तविक स्वरूप को जानना आसान नहीं है, लेकिन इसके लिए पूरा जीवन लग सकता है. 
प्रकृति से जुड़ी कुछ खास बातें:
प्रकृति और मनुष्य का संबंध अटूट है. 
प्रकृति से जुड़ने से मानसिक स्वास्थ्य बेहतर होता है. 
प्रकृति से जुड़ने से हमें जीवन में आगे बढ़ने की सीख मिलती है. 
प्रकृति में समय बिताने से ताज़ी हवा मिलती है और व्यायाम होता है. 
प्रकृति में पौधे, जानवर, नदियां, पहाड़, चांद वगैरह सभी का महत्व है. 
प्रकृति से जुड़ने से हमारी रक्षा होती है. 
प्रकृति से जुड़ने से हम पर्यावरण को बचाने में योगदान दे सकते हैं. 
प्रकृति से जुड़ने से हम जीवनदायी ऑक्सीजन पाते हैं. 
प्रकृति से जुड़ने से हमें भोजन मिलता है. 👈
5. *परमात्मा की सर्वव्यापकता*: भगवान कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि परमात्मा सर्वव्यापक है और वह सभी जीवों में विद्यमान है।
👉परमात्मा की सर्वव्यापकता का मतलब है कि परमात्मा की शक्ति और ज्ञान हर जगह मौजूद है. परमात्मा की सर्वव्यापकता को समझने से यह पता चलता है कि परमात्मा हर जगह मौजूद है और हमारी सहायता के लिए तुरंत आ सकता है. 
परमात्मा की सर्वव्यापकता के बारे में ज़्यादा जानकारी:
परमात्मा की सर्वव्यापकता का मतलब है कि परमात्मा की शक्ति और ज्ञान हर जगह मौजूद है. 
परमात्मा की सर्वव्यापकता से यह पता चलता है कि परमात्मा हर जगह मौजूद है और हमारी सहायता के लिए तुरंत आ सकता है. 
परमात्मा की सर्वव्यापकता का मतलब है कि परमात्मा की शक्ति और ज्ञान उसकी सृष्टि के सभी भागों तक फैला हुआ है. 
परमात्मा की सर्वव्यापकता का मतलब है कि परमात्मा एक ही समय में हर जगह या कई स्थानों पर हो सकता है. 
परमात्मा की सर्वव्यापकता का मतलब है कि परमात्मा की शक्ति और ज्ञान असीमित है. 
परमात्मा की सर्वव्यापकता का मतलब है कि परमात्मा की शक्ति और ज्ञान हर जगह मौजूद है, इसलिए वह स्वयं हर जगह मौजूद है. 👈

इन बातों का ध्यान रखकर शोध करने से भगवद गीता के अध्याय 9 की गहराई में जाने में शायद मदद मिल सकती है।जिस के लिए बार बार अभ्यास अति आवश्यक है।

🙏तो चलो श्रीगणेश करते है🙏

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भगवद  गीता अध्याय: 9
श्लोक 1

श्लोक:

( प्रभावसहित ज्ञान का विषय ) 
 
श्रीभगवानुवाच
 इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे।
 ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्‌॥

भावार्थ:
श्री भगवान बोले- तुझ दोषदृष्टिरहित भक्त के लिए इस परम गोपनीय विज्ञान सहित ज्ञान को पुनः भली भाँति कहूँगा, जिसको जानकर तू दुःखरूप संसार से मुक्त हो जाएगा
 ॥1॥

व्हाण 
व्हाण से तात्पर्य है वाणी या शब्द। व्हाण शब्द का अर्थ है शब्द, वाणी, भाषा, या वाचा।

इस प्रकार, व्हाण से भाव यह है कि शब्द या वाणी का उपयोग करके हम अपने विचारों और भावनाओं को व्यक्त कर सकते हैं।
(यह शङ्का होता है कि) इस प्रकार की साधना से ही मोक्षप्राप्तिरूप फल मिलता है अन्य किस प्रकार से नहीं, इस शङ्काको निवृत्त करने की इच्छा से श्रीभगवान् बोले --, जो ब्रह्मज्ञान आगे जाएगा और जो पूर्वके अध्यायों में भी कहा गया है जा चुका है? यहां बुद्धिके सामने ईदम शब्द का प्रयोग किया गया है। तु शब्द अन्यान्य ज्ञानोंसे इसे अलग-अलग करके लक्ष्य निर्धारित करता है। यही यथार्थ ज्ञान साक्षात मोक्षप्राप्तिका साधन है। जो कि सब कुछ वासुदेव ही है आत्मा ही है यह सारा जगत् ही ब्रह्म अद्वितीय है एक ही है श्रुतिस्मृतियों का ज्ञान क्या है? (इसके अतिरिक्त) और कोई (मोक्षका साधन) नहीं है। जो इसके विपरीत जानते हैं वे अपने-अपने अलग-अलग स्वामी धर्म वाले मनुष्य विनाशशील लोकोंको प्राप्त होते हैं, इसके अलावा श्रुतियों से भी यही सिद्ध होता है। तू असुयाराहित भक्तसे मैं यह अति विश्वास विषय कहूँगा। वह क्या है ज्ञान. कैसा ज्ञान विज्ञानसहित अर्थात् अनुभवसहित ज्ञान। जिस ज्ञान को जानने के लिए आपको विश्वरूप बंधन से मुक्त हो जाएगा।

आपके द्वारा प्रदान किए गए प्रश्न का उत्तर यह है:

भगवद गीता के अध्याय 9 में भगवान कृष्ण अर्जुन को राजविद्या और राजगुह्य के बारे में बता रहे हैं। इस अध्याय में कई महत्वपूर्ण बातें हैं जिनका ध्यान रखकर शोध की जा सकती है:

1. राजविद्या और राजगुह्य: भगवान कृष्ण अर्जुन को राजविद्या और राजगुह्य के बारे में बता रहे हैं। राजविद्या वह ज्ञान है जो परमात्मा के बारे में है, जबकि राजगुह्य वह रहस्य है जो परमात्मा के साथ एकता की प्राप्ति के लिए आवश्यक है।
2. भक्ति और प्रेम: भगवान कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि भक्ति और प्रेम के माध्यम से परमात्मा की प्राप्ति की जा सकती है।
3. अहंकार और मोह: भगवान कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि अहंकार और मोह परमात्मा की प्राप्ति में बाधा उत्पन्न करते हैं।
4. स्वयं की प्रकृति का ज्ञान: भगवान कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि स्वयं की प्रकृति का ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक है ताकि परमात्मा की प्राप्ति की जा सके।
5. परमात्मा की सर्वव्यापकता: भगवान कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि परमात्मा सर्वव्यापक है और वह सभी जीवों में विद्यमान है।
इन बातों का ध्यान रखकर शोध करने से भगवद गीता के अध्याय 9 की गहराई में जाने में मदद मिल सकती है।
अब भगवान इस श्लोक में कहते क्या है देखे
भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन में एक मुमुक्षु के लक्षण क्या हैं? जो वास्तव में आत्मोन्नति के माध्यम से संसार के सभी बंधनों का विच्छेदन करना चाहता है। उसे केवल किसी ऐसी सहायता की आवश्यकता है? जिससे कि उसे अपने साधन मार्ग की प्रामाणिकता का दृढ़ निश्चय हो सके। भगवान कहते हैं कि वे अनसूयु अर्जुन को विज्ञान से युक्त ज्ञान का अर्थ सैद्धान्तिक ज्ञान तथा उसके अनुभव को उपदेश देते हैं। असूया का अर्थ गुण में भी दोष देखना है। अत अनसूय का अर्थ है वह पुरुष जो असूया अनुपयोगी है या दोष दृष्टि से अनुपयुक्त है। यह ज्ञान का प्रस्ताव क्या है? जिसे देखकर तुम अशुभ अर्थात संसार बंधनों से मुक्त हो गए हो। फलत जीवन संगीत के सुर और लय को वह खो देता है। अपने और बाहरी जगत के वास्तविक स्वरूप को समझने का अर्थ है जगत के साथ स्वस्थ एवं सुख संबंध बनाए रखने के रहस्य को जानना। कौन सा पुरुष इस प्रकार समष्टि के साथ एकरूपता प्राप्त करने में सक्षम है? उनके जीवन में निश्चित सफलता और पूर्ण विजय का साथी होता है। आन्त्रिक विघटन के कारण उनके समय का वीर योद्धा अर्जुन एक विक्षिप्त पुरुष के समान व्यवहार करने लगा था। ऐसे पुरुषों को जीवन की समस्याएँ अत्यंत अधिक? कर्तव्य मठ और स्वयं जीवन एक बहुत बड़ा भार प्रतीत होता है। वे सभी लोग संसारी कहलाते हैं? जो लाइफइंजिन को आपके ऊपर से ऊपर की ओर चिन्निभिन्नता हो जाती है। इन विपरीत? जो पुरुष इस जीवन में चालक के स्थान पर प्रवेश मार्ग के सभी गन्तव्यों को पार करके अपने गन्तव्य तक सुरक्षित पहुँचते हैं? वे आत्मज्ञानी? और संत ऋषि कहलाते हैं। तथापि आत्मज्ञान का यह पद मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है? तथापि इस खड़िया का लाभ केवल विवेकी पुरुष पाता है? जिसमें आपके जीवन में विजय प्राप्त करने का उत्साह और साहस होता है और जो इस पृथ्वी पर ईश्वर के समान रहता है, पूरे विश्व के शासकों का उदय होता है और जीवन की मित्रता में सौम्यता आती है। जीवन जीने की इस कला के प्रति साधक के मन में रुचि और उत्साह है। उत्पन्न होने के लिए इस ज्ञान की स्तुति करते हुए भगवान कहते हैं--
यह अत्यंत विश्वास विज्ञानसम्मत ज्ञान दोषदृष्टिरहित तेरे लिए तो मैं फिर अच्छी तरह से कहूँगा, अन्यथा तू अशुभसे अर्थात् जन्म-मरणरूप संसारसे मुक्त हो जाएगा।

9।।1।।
भगवद  गीता अध्याय: 9
श्लोक 2

श्लोक:
राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम्‌।
 प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम्‌॥

भावार्थ:
यह विज्ञान सहित ज्ञान सब विद्याओं का राजा, सब गोपनीयों का राजा, अति पवित्र, अति उत्तम, प्रत्यक्ष फलवाला, धर्मयुक्त, साधन करने में बड़ा सुगम और अविनाशी है
 9॥2॥

व्याख्या:

भगवानके सगुण-निर्गुण, साकार-निराकार, शब्द- अव्यक्त आदि वस्तु स्वरूप हैं, उन सभी स्वरूपों में भगवान्के सगुण-साकार स्वरूप की बहुत विशेष महिमा है।संसारमें रहस्यकी अन्य गुप्त बातें हैं, उन सब बातोंका यह राजा है; क्योंकि दुनिया में इससे बड़ी दूसरी कोई रहस्य की बात ही नहीं है।

जैसे नाटक में साक्षात् सामने खेलता हुआ कोई पात्र अपना मूल परिचय देता है, तो उसका परिचय विशेष विश्वास की बात है; क्योंकि वह जिस स्वैग में नाटक करती है, उसमें वह अपने असली रूप को छिपाये रहती है। ऐसे ही जब भगवान मनुष्य रूप में लीला करते हैं, तब अभक्त लोग मनुष्य अपनी अवज्ञा करते हैं। इससे भगवान अपने समाने- आप प्रकट नहीं होते । लेकिन जो भगवानके एकांतिक प्रिय भक्त होते हैं, उनके साक्षात भगवान अपने- आप प्रकट कर देते हैं--यह अपने- आप प्रकट कर देते हैं ही अत्यंत विश्वास की बात है।
वह ज्ञान--, अतिशय प्रकाशयुक्त होने के कारण समस्त विद्याओं का राजा है। ब्रह्मविद्या सभी विद्याओं में अतिशय दीप्यमान है यह ही प्रसिद्ध है। तथा (यह ज्ञान) समग्र गुप्त रक्षोपाय भावोंका भी राजा है। एवं यह बड़ा पवित्र और उत्तम भी है? अर्थात संपूर्ण पवित्र करनेवालों को पवित्र करने वाला यह ब्रह्मज्ञान सबसे उत्कृष्ट है। जो अनेक सहस्र जन्मों में दैवीय होते हैं पुण्य पापादि कर्मों को क्षणमात्र में मूलसाहित भस्म कर देता है उसका पवित्रताका क्या कहता है साथ ही यह ज्ञान प्रत्यक्ष अनुभव में आने वाला है? अर्थात् सुख आदि की भाँति जिसका प्रत्यक्ष अनुभव हो सके? ऐसा है. अनेक गुणसे युक्त वस्तु का भी धर्मसे विरोध देखा जाता है? परन्तु आत्मज्ञान उसका सदृश धर्मविरोधी नहीं है बल्कि धर्ममय है--धर्ममय है अर्थात् धर्मसे युक्त है। ऐसा पदार्थ भी दुःसम्पद्य (प्राप्त करने में बड़ा कठिन) हो सकता है। इसलिए कहते हैं कि वह ज्ञान रत्नोंके विवेकविज्ञान की भाँति समझ में बड़ी सहजता है। लेकिन दुनिया में अल्पावधि परिश्रम से सुख-निर्मान मूल्यांकन वाले कर्मों का अल्प फल और कठिनता से होने वाले मूल्यांकन वाले कर्मों का महान फल देखा गया है? मूलतः यह ज्ञान भी सहजतासे निर्धारित होनेवालाके कारण आपके फलका क्षय होनेपर क्षण हो जायेगा? ऐसे शङ्का प्राप्त होने पर कहा जाता है--यह ज्ञान अव्यय है अर्थात् कर्मोंकी भाँति फलनेके द्वारा इसका नाश नहीं होता। मूलतः यह आत्मज्ञान श्रद्धा करने योग्य है।

👉टिप्पणी:

धर्म शब्द का प्रचलित अर्थ यह है कि सप्ताह का कोई विशेष दिन? देवालय में विक्रेता व्रत पालन और पूजा आदि के लिए निर्धारित समय। इस दृष्टि से वेदांत में कोई धर्म नहीं है, आदर्श जीवन जीने की कला को धर्म समझा जाता है कि वेदांत में सर्वश्रेष्ठ धर्म क्या है? इसमें आदर्श जीवन का वैज्ञानिक विश्लेषण एवं विवेचन शामिल है। राजविद्या? राजगुह्य? पवित्र और उत्तम भगवान श्रीकृष्ण उनकी प्रशंसा करते हैं। कोई ज्ञान? राजविद्या और गुह्यतम तथा परम पवित्र होते हुए भी यदि ग्राह्य का अनुभव नहीं होता है? तो उसका कोई उपयोग नहीं हो सकता। परन्तु इस ज्ञान में यह दोष नहीं है? क्योंकि यह प्रत्यक्षावगम अर्थात आत्मरूप में साक्षात का अनुभव किया जा सकता है। यह ज्ञान रम्य अर्थात् धर्म के लिये उपयुक्त है? धर्मयुक्त है। धर्म शब्द का अर्थ अनेक स्थानों पर बताया जा चुका है। आत्मचैतन्य के अभाव में मनुष्य स्थूल और सूक्ष्मरूप जड़तत्त्वों का समूह क्या है? जो स्वयं कोई भी कार्य करने में समर्थ नहीं है। यह चेतनतत्त्वआत्मा ही मनुष्य का वास्तविक धर्म है? स्वरूप है। भगवान यहाँ जो ज्ञान प्रदान करने वाले हैं? वह न तो भौतिक विज्ञान है और न ही मनोविज्ञान, वह आत्मज्ञान अर्थात् मनुष्य के स्वस्वरूप का ज्ञान है। सुसुखं कर्तुम् धर्म कोई जगत् में जाने वाली क्रिया नहीं है? वर्ण आत्मिक विकास का मार्ग क्या है? जिसका अर्थ प्रत्येक व्यक्ति स्वयं ही है। यदि प्रस्तुत ज्ञान प्राप्त करना अत्यंत कठिन हो? तो इसमें शामिल है किसी की रुचि न होने से शीषर्न साइंटिस्ट का स्थान ही होगा। की ओर से घोषणा की गई कि मंगल ग्रह पर सोने का अक्षय भंडार वितरण के लिए उपलब्ध है? देश की दरिद्रता दूर नहीं होती भगवान इस ज्ञान के कठिन होने से साधक के मन से निवृत्त होने के लिए कहते हैं कि यह करना अत्यंत सरल है। लग्नशील और सहायक विद्यार्थियों के लिए चित्तशुद्धि और उसके द्वारा ज्ञान से लक्ष्य प्राप्त करना अत्यंत सरल कार्य है। करने में सरल होते भी हैं यदि इस ज्ञान का फल अनित्य और विनाशी हो? तो कोई भी बुद्धिमान पुरुष अपनी प्राप्ति के लिए प्रयास नहीं करना चाहता। क्या इस ज्ञान का फल अव्यय है? आत्म साक्षात्कार का क्या अर्थ है? स्वयं अनादिअनन्त आत्मा ही बन गयी? जो इस अलौकिक दृश्यमान जगत का एकमेव अनोखा अधिष्ठान है। इसलिए कहा गया है कि यह ज्ञान अव्यय है। ज्ञान के साधकों के विपरीत? कौन लोग इस नित्य वस्तु के लिए प्रयास नहीं करते? उनके विषय में कहा गया है। क्यों कि 
भगवान के सगुण-निर्गुण, साकार-निराकार, शब्द- अव्यक्त आदि वस्तु स्वरूप हैं। इन सभी स्वरूपों में भगवान के सगुण-साकार स्वरूप की बहुत विशेष महिमा है।

भगवान का सगुण-साकार स्वरूप उनके अवतारों में देखा जा सकता है, जैसे कि भगवान कृष्ण, भगवान राम, आदि। इन अवतारों में भगवान ने मानव रूप में जन्म लिया और धर्म की स्थापना के लिए कार्य किया।

भगवान के सगुण-साकार स्वरूप की महिमा इस प्रकार है:

1. भगवान के सगुण-साकार स्वरूप में उनकी दिव्य शक्तियाँ और गुण प्रकट होते हैं।
2. भगवान के सगुण-साकार स्वरूप में उनकी कृपा और दया प्रकट होती है।
3. भगवान के सगुण-साकार स्वरूप में उनकी शिक्षाएँ और उपदेश प्रकट होते हैं।
4. भगवान के सगुण-साकार स्वरूप में उनकी लीलाएँ और कार्य प्रकट होते हैं।

इन सभी कारणों से भगवान के सगुण-साकार स्वरूप की बहुत विशेष महिमा है।
9॥2॥
भगवद  गीता अध्याय: 9
श्लोक 3

श्लोक:
अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप।
 अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि॥

भावार्थ:
हे परंतप! इस उपयुक्त धर्म में श्रद्धारहित पुरुष मुझको न प्राप्त होकर मृत्युरूप संसार चक्र में भ्रमण करते रहते हैं

यह श्लोक भगवद गीता के अध्याय 9 का है, जिसमें भगवान कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि जो लोग इस धर्म में श्रद्धा नहीं रखते हैं, वे मुझको न प्राप्त होकर मृत्युरूप संसार चक्र में भ्रमण करते रहते हैं।

इस श्लोक की व्याख्या इस प्रकार है:

- "अश्रद्दधानाः पुरुषाः" - जो लोग श्रद्धा नहीं रखते हैं, वे पुरुष।
- "धर्मस्यास्य परन्तप" - इस धर्म में, हे परंतप!
- "अप्राप्य मां निवर्तन्ते" - मुझको न प्राप्त होकर, वे निवर्तित होते हैं।
- "मृत्युसंसारवर्त्मनि" - मृत्युरूप संसार चक्र में, वे भ्रमण करते रहते हैं।
प्रायः लोगोंके भीतर यह बात जँची हुई है कि हम संसारी हैं, जन्मने-मरनेवाले हैं, यहाँ ही रहनेवाले हैं, इत्यादि। पर ये बातें बिलकुल गलत हैं। कारण कि हम सभी परमात्माके अंश हैं, परमात्माकी जातिके हैं, परमात्माके साथी हैं और परमात्माके धामके वासी हैं। हम सभी इस संसारमें आये हैं; हम संसारके नहीं हैं। कारण कि संसारके सब पदार्थ जड हैं, परिवर्तनशील हैं, जब कि हम स्वयं चेतन हैं और हमारेमें (स्वयंमें) कभी परिवर्तन नहीं होता। अनेक जन्म होनेपर भी हम स्वयं नित्य-निरन्तर वे ही रहते हैं-- और ज्यों के तयों ही रहते हैं।संसारके साथ हमारा संयोग और परमात्माके साथ हमारा वियोग कभी हो ही नहीं सकता। हम चाहे स्वर्ग में जायँ, चाहे नरकों में जायँ, चाहे चौरासी लाख योनियोंमें जायँ, चाहे मनुष्ययोनि में जायँ, तो भी हमारा परमात्मासे वियोग नहीं होता, परमात्माका साथ नहीं छूटता। परमात्मा सभी योनियोंमें हमारे साथ रहते हैं। परन्तु मनुष्येतर योनियोंमें विवेक की जागृति न रहने से हम परमात्मा को पहचान नहीं सकते। परमात्मा को पहचानने का मौका तो इस मनुष्य शरीर में ही है। कारण कि भगवान्ने कृपा करके इस मनुष्य को ऐसी शक्ति, योग्यता दी है, जिससे वह सत्सङ्ग,विचार, स्वाध्याय आदिके द्वारा विवेक जाग्रत् करके परमात्माको जान सकता है, परमात्मा की प्राप्ति कर सकता है। इसलिये भगवान् यहाँ कहते हैं कि इन प्राणियों को मनुष्य शरीर प्राप्त हुआ है, तो मेरे को प्राप्त हो ही जाना चाहिये।  हम भगवान के ही हैं तथा भगवान् ही हमारे हैं यह बात उनकी समझ में आ ही जानी चाहिये। परन्तु ये इस बातको न समझ कर, मेरे पर श्रद्धा विश्वास न करके मेरे को प्राप्त न होकर संसार रूपी मौत के मार्ग में पड़ गये हैं -- यह बड़े दुःख की और आश्चर्य की बात है संसार में आना, चौरासी लाख योनियों में भटकना हमारा काम नहीं है। ये देश, गाँव, कुटुम्ब, धन, पदार्थ, शरीर आदि हमारे नहीं हैं और हम इनके नहीं हैं। ये देश आदि सभी अपरा प्रकृति हैं और हम परा प्रकृति हैं। परन्तु भूल से हमने अपने को यहाँ का रहने वाला मान लिया है। इस भूल को मिटाना चाहिये क्यों कि हम भगवान के अंश हैं, भगवान के धामके हैं। जहाँ से लौटकर नहीं आना पड़ता, वहाँ जाना हमारा खास काम है, जन्म मरण से रहित होना हमारा खास काम है। परन्तु अपने घर जाने को, खुद की चीज को कठिन मान लिया, उद्योगसाध्य मान लिया वास्तव में यह कठिन नहीं है। कठिन तो संसार का रास्ता है, जो कि नया पकड़ना पड़ता है, नया शरीर धारण करना पड़ता है, नये कर्म करने पड़ते हैं और कर्मों के फल भोगने के लिये नये नये लोकों में नयी नयी योनियों में जाना पड़ता है। भगवान की प्राप्ति तो सुगम है क्योंकि भगवान् सब देशमें हैं, सब काल में हैं, सब वस्तुओं में हैं, सब व्यक्तियों में हैं, सब घटनाओं में हैं, सब परिस्थितियों में हैं और सभी भगवान में हैं। हम हरदम भगवान के साथ हैं और भगवान् हरदम हमारे साथ हैं। हम भगवान से और भगवान् हमारे से कभी अलग हो ही नहीं सकते।तात्पर्य यह हुआ कि हम यहाँ के, जन्म मृत्यु वाले संसार के तो है ही नहीं । यह हमारा देश नहीं है। हम इस देश के नहीं हैं। यहाँ की वस्तुएँ हमारी नहीं हैं। हम इन वस्तुओं के नहीं हैं। हमारे ये कुटुम्बी नहीं हैं। हम इन कुटुम्बियों के नहीं हैं। हम तो केवल भगवान्के हैं और भगवान् ही हमारे हैं। और इन सभी के लिए हमारे कर्तव्य है उनको भी भगवान ही करते हैं।
 नित्यसिद्ध आत्मा का अनादर करके जीने वाले लोग निश्चय ही नित्यस्वरूप मुझे प्राप्त न होकर संसार को लौटते हैं। बहिर्मुखी प्रवृत्ति के लोग सदैव विषयों का ही चिन्तन करके अपनी बौद्धिक क्षमता? मानसिक शक्ति और शारीरिक बल का अपव्यय करते हैं। विषयभोग के नित्य नवीन साधन खोजने में लगे हुए ये लोग मृत्युरूपी संसार में ही भ्रमण करते रहते हैं।जब मनुष्य विषयों का चिन्तन करके उन्हें प्राप्त करने का प्रयत्न करता है तब उसे भोग प्राप्त तो हो जाते हैं? परन्तु वे सब अनित्य होने के कारण उनका अन्तिम परिणाम दुख ही होता है। और विडम्बना यह है कि वह फिर भी उनमें ही और अधिक आसक्त हो जाता है परमात्मा की अपरा प्रकृति का वह पूजक बन जाता है। कितना ही विशाल समुद्र क्यों न हो? उसमें से किसी भी स्थान से लिया गया प्रत्येक बूँद स्वाद में खारा ही होता है। इसी प्रकार? विषय प्रेम के पीछे हमारा कोई भी उद्देश्य क्यों न हो? एक बार विषयलोलुप हो जाने पर हम निश्चय ही दुख के खारे अश्रु पीने को बाध्य हो जाते हैं? क्योंकि अनित्यता? नश्वरता तो हमारे प्रेम के विषय का स्वरूप ही है। नामरूपमय यह जगत् परिच्छिन्न और नित्य परिवर्तनशील है। यहाँ प्रतिक्षण प्रत्येक वस्तु परिवर्तन की प्रक्रिया से गुजर रही है? और प्रत्येक परिवर्तन वस्तु की पूर्व स्थिति की मृत्यु है। इस प्रकार? यहाँ भगवान् द्वारा प्रयुक्त मृत्यु शब्द को उसके व्यापक अर्थ में ग्रहण करना चाहिए। संक्षेप में? विषयलोलुप लोग सदैव दुखपूर्ण मृत्युलोक को प्राप्त होते हैं।यद्यपि वेदान्तशास्त्र में श्रद्धा शब्द गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के आशय को भी सूचित करता है? तथापि यह श्रद्धा भावुकता के कोहरे पर निर्मित नहीं? वरन् सिद्धांत की युक्तियुक्तता के ज्ञान के स्थित प्रकाश पर स्थिर है। श्रीशंकराचार्य श्रद्धा की परिभाषा इस प्रकार देते हैं? शास्त्र और आचार्य के उपदेश को सत्यबुद्धि से ग्रहण करना श्रद्धा है जिसके द्वारा परमार्थ सत्य वस्तु की प्राप्ति होती है। श्रद्धा वह दृढ़ विश्वास है? जो हमें मन और बुद्धि से परे तत्त्व की ऊँचाई तक उठाता है? और र्मत्यपरिच्छिन्न जीव से अमृत स्वरूप अनन्त सत्य के गढ़ने में सहायक होता है।किसी वस्तु का धर्म वह कुछ होता है? जिसके बिना उस वस्तु का उस रूप में अस्तित्व ही सिद्ध नहीं हो सकता? जैसे अग्नि की उष्णता? बर्फ की शीतलता और सूर्य का प्रकाश। जिन लोगों को अपने दिव्य आत्मस्वरूप के अस्तित्व में श्रद्धा नहीं होती वे अपनी भावनाओं के कूजन? बुद्धि के गर्जन और देह की फुंकारों द्वारा बड़ी सरलता से आनन्दस्वरूप से अपहरण कर लिये जाते हैं। वे विकास की सीढ़ी से नीचे गिर कर द्विपाद पशुओं के समान जीवन जीते हैं। जैसे कोई विक्षिप्त (पागल) राजा अपने आप को भूलकर अपनी राजप्रतिष्ठा को धूल में मिला देता है? और फिर एक निराश्रित व्रात्य (आवारा) पुरुष के समान व्यवहार करता हुआ गलियों मे नग्नावस्था में घूम्ाता रहता है? वैसे ही यह जीव अज्ञानवश अपने आत्मस्वरूप की गरिमा को भूलकर विषयो के भोगों की खुली नालियों में सुख को खोजता हुआ ऐसे घूमता है? मानो वह किसी नाली में रेंगने वाले काड़े से भी निकृष्ट हो।सरलता का आभास लिये हुए?  वास्तव में अत्यन्त सारगर्भित है। अत्यन्त स्पष्ट शब्दों में ज्ञान के मार्ग का अज्ञान के मार्ग से भेद दर्शाकर? भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन की बुद्धि में ज्ञानमार्ग की उपादेयता को बैठा देते हैं। 
 9॥3॥
भगवद  गीता अध्याय: 9
श्लोक 4

श्लोक:
मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना।
 मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेषवस्थितः॥

भावार्थ:
मुझ निराकार परमात्मा से यह सब जगत्‌ जल से बर्फ के सदृश परिपूर्ण है और सब भूत मेरे अंतर्गत संकल्प के आधार स्थित हैं, किंतु वास्तव में मैं उनमें स्थित नहीं हूँ
यह श्लोक भगवद गीता के अध्याय 9 का है, जिसमें भगवान कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि वे निराकार परमात्मा हैं और सारा जगत उनकी शक्ति से परिपूर्ण है।

इस श्लोक की व्याख्या इस प्रकार है:

- "मुझ निराकार परमात्मा से" - मैं जो निराकार परमात्मा हूँ,
- "यह सब जगत्‌ जल से बर्फ के सदृश परिपूर्ण है" - यह सारा जगत जल से बर्फ की तरह परिपूर्ण है, अर्थात यह सारा जगत मेरी शक्ति से बना हुआ है।
- "और सब भूत मेरे अंतर्गत संकल्प के आधार स्थित हैं" - और सभी जीव मेरे अंतर्गत संकल्प के आधार पर स्थित हैं, अर्थात सभी जीव मेरी इच्छा से ही स्थित हैं।
- "किंतु वास्तव में मैं उनमें स्थित नहीं हूँ" - लेकिन वास्तव में मैं उन जीवों में स्थित नहीं हूँ, अर्थात मैं उन जीवों से अलग हूँ।

इस श्लोक का अर्थ यह है कि भगवान कृष्ण निराकार परमात्मा हैं और सारा जगत उनकी शक्ति से परिपूर्ण है। लेकिन वास्तव में वे जीवों में स्थित नहीं हैं, बल्कि वे जीवों से अलग हैं।
सब कुछ परमात्मा ही है - इस बात को बहुत गहरे उतरकर इशारा करने वाले को इसका वास्तविक अनुभव हो जाता है। वास्तविकता का अनुभव होना यह है कि अगर उसकी कोई प्रशंसा करे कि आपका सिद्धांत बहुत अच्छा है आदि, तो अपने में बड़प्पन का अनुभव नहीं होना चाहिए। दुनिया में कोई आदर करे या निरादर--इसका भी सहारा पर असर नहीं होना चाहिए। अगर कोई कह दे कि दुनिया नहीं है और भगवान हैं-- तो आपकी कोरी कल्पना है और कुछ आदि नहीं, तो ऐसी कथाचाँसे साधक को किंचिन्मात्र भी बुरी नहीं लगना यह विशेषताएँ। उस बात को सिद्ध करने के लिए दृष्टान्तवादी, प्रमाणिकता की इच्छा ही नहीं, हमारे पूर्वजों और कभी-कभी ऐसा भाव भी नहीं होना चाहिए, यह हमारा सिद्धांत है, यह हमारा सिद्धांत है, हमारे पास ठीक उदाहरण है आदि। अपने सिद्धांत के विरुद्ध कोई भी विवेचन न करे, तो भी अपने सिद्धांत में किसी कमी का अनुभव नहीं होना चाहिए और अपने में कोई विकार भी पैदा नहीं होना चाहिए। अपना यथार्थ अनुभव अलौकिक रूपसे सदासर्वदा अटल और अखंडरूपसे बना कीर्तिमान। इसके विषय में साधक को कभी भी सोलो ही नहीं पड़े।
 
मुझे अव्यक्तरूप परमात्मा अर्थात मेरा जो परमभाव है? जिसका स्वरूप प्रत्यक्ष नहीं है अर्थात् मन? बुद्धि और इन्द्रियों का विषय नहीं है? ऐसे ही मुझ अव्यक्तमूर्ति द्वारा निर्मित यह समस्त जगत् व्याप्ति है -- मूल्यवान है। वह अव्यक्त स्वरूप मुझ परमात्मा में ब्रह्मासे लेकर स्तम्भपर्यन्त सभी प्राणी स्थित हैं। क्योंकि कोई भी निर्जीव व्यवहार के लिए उपयुक्त नहीं है। मूलतः वे सब मुझमें स्थित हैं अर्थात मुझे परमात्मा से ही आत्मवान हो रहे हैं? इसलिए मुझमें स्थित कहे जाते हैं। उन भूतों का वास्तविक स्वरूप मैं ही हूँ इसलिए अज्ञानियों को ऐसी विशेषता होती है कि मैं वे स्थित हूँ? मूलतः कहता हूँ कि मैं उन भूतों में स्थित नहीं हूँ। क्योंकि साकार वस्तुकी भाँति मुझमें संसारद्वीप नहीं है। इसलिए मैं बिना संसर्गके सूक्ष्मभाव से आकाशके भी अंतर्संबंध हूं। सङ्घहीन वस्तु कहीं भी अन्तयभावसे स्थित नहीं होती? यह प्रसिद्ध है।
यह संपूर्ण जगत् मेरे अव्यक्त स्वरूप से व्याप्त है, किसी वस्तु का सूक्ष्मता से उसकी व्यापकता से नापी मिलता है और सूक्ष्म सूक्ष्मतम् वस्तु का सर्वव्यापक होना अनिवार्य है। देशकाल से परिच्छिन्न (सीमित) सभी वस्तुओं का आकार तथा नाश होता है अत सर्वसहयोगी वस्तु निराकार एवं नाशरहित होगी। इस प्रकार आत्मतत्त्व अपने मूल अव्यक्तस्वरूप से सम्पूर्ण जगत् में व्याप्त है? जैसे मिट्टी के बने सभी संरचनात्मक और आकार वाले घाटों में मिट्टी व्याप्त है। इस प्रकार? अनंतपरिच्छिन्न तत्त्व संत और परिच्छिन्न जगत् को क्या लाभ है? तो इन दोनों में निश्चित रूप से क्या संबंध है कि यह जगत् अनंततत्त्व से फिर प्रकट हुआ है अथवा अनंत ने संत का निर्माण किस प्रकार किया है अथवा अनंत वस्तु स्वयं विकार को प्राप्त होकर यह जगत् बन गया है? जैसे दूध दही बनता है या? इनमें पितापुत्र या स्वामीभृत्य दोनों का संबंध विश्व के विभिन्न धर्मों जैसे आदर्श से निर्धारित है। द्वैतवादी लोग ही अनंत और संत हैं? ईश्वर और भक्त के मध्य में किसी न किसी प्रकार के काल्पनिक संबंध राम हो सकते हैं। लेकिन अद्वैत ऐसे किसी भी प्रकार के संबंध को स्वीकार नहीं कर सकते? क्योंकि संबंध किन्हीं दो वस्तुओं में ही हो सकता है? जब कि उनका सिद्धांत केवल आत्मा ही एकमेव अद्वितीय पारमार्थिक सत्य वस्तु है। इस श्लोक की दूसरी पंक्ति में सत्य और मिथ्या के बीच के संबंध का शास्त्रीय वर्णन किया गया है। सभी भूत मुझमें स्थित हैं? परन्तु मैं उनमें अवस्थित नहीं हूँ। शास्त्रीय विधि से अनाभिज्ञ उतावले स्तुति को यह कथन एक अनाकलनिय विरोधाभास स्पष्ट होगा? जिसका अर्थ शून्य शब्द के जमघट के द्वारा व्यक्त किया गया है। और किसने अध्यास के सिद्धांत को सम्यक् प्रकारों से समझा है? उनके लिए उक्ति का अर्थ अत्यंत सरल है। किसी वस्तु के अज्ञान से उस पर किसी अन्य वस्तु की कल्पना करना एक स्तम्भ पर प्रेत की कल्पना की तरह है। शास्त्रीय भाषा स्तम्भ को अधिष्ठान और प्रेत को अध्यापन। इस दृष्टान्त में स्तम्भ (अधिष्ठान) के बिना प्रेत का आभास नहीं हो सकता। अब स्तम्भ की दृष्टि से सम्मिलित और उस आध्यात्म प्रेत में निश्चित रूप से कौन सा संबंध है कल्पना करें कि स्तम्भ में प्रेत को देखकर मोहित हुए व्यक्ति को वह स्तम्भ स्वयं का सम्यक ज्ञान जानना चाहता है? तो वह किस प्रकार का उपदेश देता है वह असंगत स्तम्भ है कि मूढ़ पुरुष के प्रति पुत्र प्रेम के कारण भगवान श्रीकृष्ण के समान ही उपदेश देता है। वह कहेगा निसंदेह ही वह प्रेत मुझमें स्थित है? और मैं शामिल नहीं हूं और इसलिए? मुझे किसी भी तरह का कोई नुकसान नहीं हुआ। इसी प्रकार भगवान यहाँ कहे जाते हैं? मैं अपने अव्यक्त स्वरूप से इस संपूर्ण व्यक्तित्व जगत् का अधिष्ठान हूँ। हालाँकि सनातन इस नानारूपमय सृष्टि का अधिष्ठान है? तथापि वह उनका गुण दोष है? सुख दुख? जन्ममृत्यु आदि से वर्गीकरण नहीं होता? क्योंकि मैं उनमें अवस्थित नहीं हूँ। इस पंक्ति में पूर्व 1 कथित सिद्धांत ही प्रतिध्वनि होता है? जहाँ सम्भावना और अधिक लहरदार भाषा में इसका उच्चारण किया गया था? 
मैं वो नहीं हूँ? वे मुझमें हैं। संक्षेप में? यहाँ सूचित किया गया है कि जड़त्व विहीनों से तादात्म्य के कारण आत्मा उनमें स्थित हुई मनो दु:खसंसारी जीव बनी है और यह मिथ्या तादात्म्य की निवृत्ति से उसे बोध होता है कि वास्तव में? मैं अंजनी? अव्यक्तसत् आत्मा उनमें स्थित नहीं है। मन में यह विचार तब अनंत हो सकता हैतत्त्व में परिच्छिन्न का अन्य किसी प्रकार का अनुभव भी हो सकता है, भगवान कहते हैं--
इसको और सरल भाव में बताए 
यह संपूर्ण जगत् मेरे अव्यक्त स्वरूप से व्याप्त है, किसी वस्तु का सूक्ष्मता से उसकी व्यापकता से नापी मिलता है और सूक्ष्म सूक्ष्मतम् वस्तु का सर्वव्यापक होना अनिवार्य है। देशकाल से परिच्छिन्न (सीमित) सभी वस्तुओं का आकार तथा नाश होता है अत सर्वसहयोगी वस्तु निराकार एवं नाशरहित होगी। इस प्रकार आत्मतत्त्व अपने मूल अव्यक्तस्वरूप से सम्पूर्ण जगत् में व्याप्त है? जैसे मिट्टी के बने सभी संरचनात्मक और आकार वाले घाटों में मिट्टी व्याप्त है। इस प्रकार? अनंतपरिच्छिन्न तत्त्व संत और परिच्छिन्न जगत् को क्या लाभ है? तो इन दोनों में निश्चित रूप से क्या संबंध है कि यह जगत् अनंततत्त्व से फिर प्रकट हुआ है अथवा अनंत ने संत का निर्माण किस प्रकार किया है अथवा अनंत वस्तु स्वयं विकार को प्राप्त होकर यह जगत् बन गया है? जैसे दूध दही बनता है या? इनमें पितापुत्र या स्वामीभृत्य दोनों का संबंध विश्व के विभिन्न धर्मों जैसे आदर्श से निर्धारित है। द्वैतवादी लोग ही अनंत और संत हैं? ईश्वर और भक्त के मध्य में किसी न किसी प्रकार के काल्पनिक संबंध राम हो सकते हैं। लेकिन अद्वैत ऐसे किसी भी प्रकार के संबंध को स्वीकार नहीं कर सकते? क्योंकि संबंध किन्हीं दो वस्तुओं में ही हो सकता है? जब कि उनका सिद्धांत केवल आत्मा ही एकमेव अद्वितीय पारमार्थिक सत्य वस्तु है। इस श्लोक की दूसरी पंक्ति में सत्य और मिथ्या के बीच के संबंध का शास्त्रीय वर्णन किया गया है। सभी भूत मुझमें स्थित हैं? परन्तु मैं उनमें अवस्थित नहीं हूँ। शास्त्रीय विधि से अनाभिज्ञ उतावले स्तुति को यह कथन एक अनाकलनिय विरोधाभास स्पष्ट होगा? जिसका अर्थ शून्य शब्द के जमघट के द्वारा व्यक्त किया गया है। और किसने अध्यास के सिद्धांत को सम्यक् प्रकारों से समझा है? उनके लिए उक्ति का अर्थ अत्यंत सरल है। किसी वस्तु के अज्ञान से उस पर किसी अन्य वस्तु की कल्पना करना एक स्तम्भ पर प्रेत की कल्पना की तरह है। शास्त्रीय भाषा स्तम्भ को अधिष्ठान और प्रेत को अध्यापन। इस दृष्टान्त में स्तम्भ (अधिष्ठान) के बिना प्रेत का आभास नहीं हो सकता। अब स्तम्भ की दृष्टि से सम्मिलित और उस आध्यात्म प्रेत में निश्चित रूप से कौन सा संबंध है कल्पना करें कि स्तम्भ में प्रेत को देखकर मोहित हुए व्यक्ति को वह स्तम्भ स्वयं का सम्यक ज्ञान जानना चाहता है? तो वह किस प्रकार का उपदेश देता है वह असंगत स्तम्भ है कि मूढ़ पुरुष के प्रति पुत्र प्रेम के कारण भगवान श्रीकृष्ण के समान ही उपदेश देता है। वह कहेगा निसंदेह ही वह प्रेत मुझमें स्थित है? और मैं शामिल नहीं हूं और इसलिए? मुझे किसी भी तरह का कोई नुकसान नहीं हुआ। इसी प्रकार भगवान यहाँ कहे जाते हैं? मैं अपने अव्यक्त स्वरूप से इस संपूर्ण व्यक्तित्व जगत् का अधिष्ठान हूँ। हालाँकि सनातन इस नानारूपमय सृष्टि का अधिष्ठान है? तथापि वह उनका गुण दोष है? सुख दुख? जन्ममृत्यु आदि से वर्गीकरण नहीं होता? क्योंकि मैं उनमें अवस्थित नहीं हूँ। इस पंक्ति में पूर्व 1 कथित सिद्धांत ही प्रतिध्वनि होता है? जहाँ सम्भावना और अधिक लहरदार भाषा में इसका उच्चारण किया गया था? मैं वो नहीं हूँ? वे मुझमें हैं। संक्षेप में? यहाँ सूचित किया गया है कि जड़त्व विहीनों से तादात्म्य के कारण आत्मा उनमें स्थित हुई मनो दु:खसंसारी जीव बनी है और यह मिथ्या तादात्म्य की निवृत्ति से उसे बोध होता है कि वास्तव में? मैं अंजनी? अव्यक्तसत् आत्मा उनमें स्थित नहीं है। मन में यह विचार तब अनंत हो सकता है तत्त्व में परिच्छिन्न का अन्य किसी प्रकार का अनुभव भी हो सकता

अर्थात:

इस श्लोक का संदेश अद्वैत और भक्ति दर्शन के बीच गहरे आध्यात्मिक संबंध को स्पष्ट करता है। इसमें आत्मा और जगत के बीच असली और कल्पित संबंध को समझाया गया है। आत्मा जगत का अधिष्ठान है, लेकिन जगत के सुख-दुख या गुण-दोष आत्मा को प्रभावित नहीं करते। इसे समझने के लिए "अधिष्ठान" (जैसे स्तम्भ) और "अध्यास" (जैसे प्रेत) का उदाहरण दिया गया है। यह संदेश है कि आत्मा अव्यक्त, निराकार और सर्वव्यापी है, परंतु संबंध और भौतिकता मिथ्या हैं।

9॥4॥

भगवद  गीता अध्याय: 9
श्लोक 5

श्लोक:
न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्‌।
 भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः॥

भावार्थ:
वे सब भूत मुझमें स्थित नहीं हैं, किंतु मेरी ईश्वरीय योगशक्ति को देख कि भूतों का धारण-पोषण करने वाला और भूतों को उत्पन्न करने वाला भी मेरा आत्मा वास्तव में भूतों में स्थित नहीं है
 ॥5॥

भगवद गीता के अध्याय 9 के श्लोक 5 में भगवान कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि वे सब भूत (जीव) उनके में स्थित नहीं हैं, लेकिन उनकी ईश्वरीय योगशक्ति को देख कि भूतों का धारण-पोषण करने वाला और भूतों को उत्पन्न करने वाला भी उनका आत्मा वास्तव में भूतों में स्थित नहीं है।

इस श्लोक की व्याख्या इस प्रकार है:

- "न च मत्स्थानि भूतानि" - वे सब भूत (जीव) मुझमें स्थित नहीं हैं। यहाँ पर भगवान कृष्ण यह बता रहे हैं कि वे जीवों के भीतर नहीं हैं, बल्कि वे जीवों के पीछे हैं।

👉 इस श्लोक का भाव यह है कि आत्मा और परमात्मा दो अलग-अलग चीजें हैं। भगवान कृष्ण यहाँ पर बता रहे हैं कि उनका आत्मा वास्तव में भूतों में स्थित नहीं है, बल्कि वे जीवों के पीछे हैं।

इस श्लोक का अर्थ यह है कि आत्मा और परमात्मा दो अलग-अलग चीजें हैं। आत्मा जीव की व्यक्तिगत आत्मा है, जबकि परमात्मा सारे जगत की आत्मा है। भगवान कृष्ण यहाँ पर बता रहे हैं कि उनका आत्मा वास्तव में भूतों में स्थित नहीं है, बल्कि वे जीवों के पीछे हैं।

यह श्लोक हमें यह समझने में मदद करता है कि आत्मा और परमात्मा दो अलग-अलग चीजें हैं। आत्मा जीव की व्यक्तिगत आत्मा है, जबकि परमात्मा सारे जगत की आत्मा है। भगवान कृष्ण यहाँ पर बता रहे हैं कि उनका आत्मा वास्तव में भूतों में स्थित नहीं है, बल्कि वे जीवों के पीछे हैं।

इस श्लोक का भाव यह है कि आत्मा और परमात्मा दो अलग-अलग चीजें हैं, और भगवान कृष्ण यहाँ पर बता रहे हैं कि उनका आत्मा वास्तव में भूतों में स्थित नहीं है, बल्कि वे जीवों के पीछे हैं।👈

- "पश्य मे योगमैश्वरम्‌" - लेकिन मेरी ईश्वरीय योगशक्ति को देख। यहाँ पर भगवान कृष्ण यह बता रहे हैं कि उनकी ईश्वरीय योगशक्ति को देखकर हमें यह समझना चाहिए कि वे जीवों के पीछे हैं।
- "भूतभृन्न च भूतस्थो" - भूतों का धारण-पोषण करने वाला और भूतों को उत्पन्न करने वाला। यहाँ पर भगवान कृष्ण यह बता रहे हैं कि वे जीवों का धारण-पोषण करने वाले और जीवों को उत्पन्न करने वाले हैं।
- "ममात्मा भूतभावनः" - मेरा आत्मा वास्तव में भूतों में स्थित नहीं है। यहाँ पर भगवान कृष्ण यह बता रहे हैं कि उनका आत्मा वास्तव में जीवों में स्थित नहीं है, बल्कि वे जीवों के पीछे हैं।

इस श्लोक का अर्थ यह है कि भगवान कृष्ण की शक्ति और ज्ञान से सारा जगत बना हुआ है, लेकिन वे जीवों के भीतर नहीं हैं। उनकी ईश्वरीय योगशक्ति को देख कि भूतों का धारण-पोषण करने वाला और भूतों को उत्पन्न करने वाला भी उनका आत्मा वास्तव में भूतों में स्थित नहीं है।

प्रत्यक्ष ज्ञान के साथ, हमें यह समझना चाहिए कि भगवान कृष्ण की शक्ति और ज्ञान से सारा जगत बना हुआ है, लेकिन वे जीवों के भीतर नहीं हैं। उनकी ईश्वरीय योगशक्ति को देख कि भूतों का धारण-पोषण करने वाला और भूतों को उत्पन्न करने वाला भी उनका आत्मा वास्तव में भूतों में स्थित नहीं है।

यह प्रत्यक्ष ज्ञान हमें यह समझने में मदद करता है कि भगवान कृष्ण की शक्ति और ज्ञान से सारा जगत बना हुआ है, लेकिन वे जीवों के भीतर नहीं हैं। उनकी ईश्वरीय योगशक्ति को देख कि भूतों का धारण-पोषण करने वाला और भूतों को उत्पन्न करने वाला भी उनका आत्मा वास्तव में भूतों में स्थित नहीं है।

( जब कोई व्यक्ति परमात्मा के साथ एकता का अनुभव करता है, तो वह यह समझने लगता है कि सब कुछ परमात्मा ही है। यह अनुभव बहुत गहरा और व्यक्तिगत होता है, और इसका वर्णन करना मुश्किल हो सकता है।

जब कोई व्यक्ति इस अनुभव को प्राप्त करता है, तो वह अपने में बड़प्पन का अनुभव ही नहीं करता है, चाहे दुनिया में उसे कितनी भी प्रशंसा मिले। वह अपने अनुभव को सिद्ध करने के लिए दृष्टान्तवादी या प्रमाणिकता की इच्छा नहीं रखता है, और वह अपने सिद्धांत के विरुद्ध किसी भी विवेचन को नहीं मानता है।

साधक को अपने अनुभव को बनाए रखने के लिए किसी भी प्रकार के विकार को पैदा नहीं होने देना चाहिए। यह बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि जब कोई व्यक्ति परमात्मा के साथ एकता का अनुभव करता है, तो वह अपने में शांति और संतुष्टि का अनुभव करता है, और वह अपने जीवन में किसी भी प्रकार के विकार को पैदा नहीं होने देता है।)

सब कुछ परमात्मा ही है - इस बात को बहुत गहरे उतरकर इशारा करने वाले को इसका वास्तविक अनुभव हो जाता है। वास्तविकता का अनुभव होना यह है कि अगर उसकी कोई प्रशंसा करे कि आपका सिद्धांत बहुत अच्छा है आदि, तो अपने में बड़प्पन का अनुभव नहीं होना चाहिए। दुनिया में कोई आदर करे या निरादर--इसका भी सहारा पर असर नहीं होना चाहिए। अगर कोई कह दे कि दुनिया नहीं है और भगवान हैं--यह तो आपकी कोरी कल्पना है और कुछ आदि नहीं है, तो ऐसी कथाचाँसे साधक को किचिन्मात्र भी बुरी नहीं लगती। उस बात को सिद्ध करने के लिए दृष्टान्तवादी, प्रमाणिकता की इच्छा ही नहीं, हमारे पूर्वजों और कभी-कभी ऐसा भाव भी नहीं होना चाहिए, यह हमारा सिद्धांत है, यह हमारा सिद्धांत है, हमारे पास ठीक उदाहरण है आदि। अपने सिद्धांत के विरुद्ध कोई भी विवेचन न करे, तो भी अपने सिद्धांत में किसी कमी का अनुभव नहीं होना चाहिए और अपने में कोई विकार भी पैदा नहीं होना चाहिए। अपना यथार्थ अनुभव अलौकिक रूपसे सदासर्वदा अटल और अखंडरूपसे बना कीर्तिमान। इसके विषय में साधक को कभी भी सोलो ही नहीं पड़े।

मैं असंसर्गी हूं? इसलिए --, (वास्तव में) ब्रह्मादि सभी जीव भी मुझमें स्थित नहीं हैं? तू मेरे इस ईश्वरीय योग -- युक्ति -- घटना को देख? अर्थात् मुझे ईश्वरके योगको अर्थात् यथार्थ आत्मतत्त्वको समझ। यह श्रुति भी संसर्गरहित होने के कारण (आत्माकी) निर्लेपता दिखलाती है। यह और भी आश्चर्यजनक है कि भूतभावन मेरा आत्मा संसर्गगृह में भी भूतों का भरण पोषण रहता है लेकिन भूतो में स्थित नहीं है। क्योंकि परमात्माका भूतों में स्थित होना संभव नहीं है? यह बात न्यायशास्त्र से स्पष्ट दिखाई देती है। पु0-- (जब कि आत्मा अपने से कोई अन्य वस्तु ही नहीं है) तो फिर मेरी आत्मा यह कहलाती है उ0 -- लौकिक बुद्धिका साम्य करते हैं देहादि संघातको आत्मासे भिन्न-भिन्न करके आत्मा का अध्यारोप करके मेरी आत्मा ऐसी कहलाती है ? आत्मा अपने से भिन्न है ऐसा समझकर लोगों की भाँति अज्ञानता को ऐसा नहीं कहना। जो भूतोंको प्रकट होता है -- उत्पन्न होता है या खोज है भूतभावन कहते हैं।

संपूर्ण भूत, संपूर्ण चराचर सृष्टि कहां स्थित है? परन्तु वे सम्मिलित नहीं हैं। उसी विषय के तर्कशास्त्र की अगली कड़ी में वे अब कहते हैं कि कौन सी वस्तु है? वे भूत मुझमें स्थित नहीं हैं? अर्थात् अनंत से संत की उत्पत्ति कभी नहीं हुई स्तम्भ और प्रेत के दृष्टांत का पुन: उपयोग किया गया? भगवान की उक्ति स्तम्भ के इस कथन के लिए क्या उपयोगी होगा? वास्तव में? मुझे विद्युत् स्तम्भ में प्रेत का अनुभव कदापि नहीं था। अनंत स्वरूप शुद्ध चैतन्य परमात्मा में इस नानाविध जगत् का अनुभव कभी नहीं था? न अब है और न कभी होगा। जाग्रत पुरुष के लिए स्वप्न का भोग कभी उपलब्ध नहीं होता। संक्षेप में? आत्मानुभव में इस नानाविध सृष्टि का दर्शन नहीं होता। वर्तमान में इसकी विशिष्टता का कारण अज्ञानरूप आत्मविस्मृति है। यह आत्मा भूतमात्र को उत्पन्न करने वाला है और उसका भूगर्भिक है? जैसे? सभी तरंगों का जन्मदाता और धारण करने वाला समुद्र और फिर भी है? मैं वे (भूतों में) स्थित नहीं हूँ। कैसे जैसे? समुद्र तरंगों में नहीं रहती यानी उसकी परछाइयों से सदा आज़ाद रहती है। सभी घाटों की उत्पत्ति? स्थिति और धारण मिट्टी से ही है? तथापि उनमें से कोई एक घट या घटसमुदाय न तो मिट्टी को परिभाषित किया जा सकता है और न ही उसका संपूर्ण ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। दिव्य? सनातन शुद्ध चैतन्य स्वरूप परमात्मा ही वह अधिष्ठान है? जो इस नित्य परिवर्तनशील विविधरूप सृष्टि के विस्तृत हृदय को धारण और प्रकाशित करता है। जिसमें सर्वस्वरूपों में स्थित चैतन्य आत्मा प्रकाशित है। यदि यह चैतन्य नहीं होता तो हमें अखंड गुणों की धारा के रूप में जीवन का कभी भी लाभ नहीं मिल पाता। कपड़े में कप जैसा है? आभूषणों में स्वर्ण और अग्नि उष्णता है? वैसे ही क्षर सृष्टि में अक्षर तत्व है। क्या जागृत पुरुष स्वप्नद्रष्टा के बिना जागृत पुरुष स्वप्न जगत में व्याप्त रहता है? परन्तु क्या वह स्वप्न से कभी ऋण-निर्धारण या दिवालियापन नहीं करता है? जाग्रत पुरुष की दृष्टि से स्वप्न का अनुभव कभी नहीं होता। भगवान यह श्रीकृष्ण अनुभव करते हैं कि विरोधाभास की यह भाषा अर्जुन की तरह सामान्य पुरुषों के लिए एक पहेली सिद्ध हो रही है?

जो सिद्ध हो रहा है

इस लेख का विश्लेषण बहुत ही गहरा और विस्तृत है। लेखक द्वारा भगवद गीता के अध्याय 9 के श्लोक 5 की व्याख्या की है और इसके अर्थ को बहुत ही स्पष्ट रूप से समझाया भी है।

यहां लेखक के अनुसार, 

भगवान कृष्ण यहाँ पर बता रहे हैं कि वे जीवों के भीतर नहीं हैं, बल्कि वे जीवों के पीछे हैं।

 उनकी ईश्वरीय योगशक्ति को देखकर हमें यह समझना चाहिए कि वे जीवों के पीछे हैं।

लेखक के अनुसार, भगवान 

कृष्ण यहाँ पर बता रहे हैं कि उनका आत्मा वास्तव में जीवों में स्थित नहीं है, बल्कि वे जीवों के पीछे हैं। यह बात न्यायशास्त्र से स्पष्ट दिखाई देती है।

लेखक के अनुसार, भगवान कृष्ण यहाँ पर बता रहे हैं कि वे जीवों का धारण-पोषण करने वाले और जीवों को उत्पन्न करने वाले हैं। लेकिन वे जीवों में स्थित नहीं हैं।

लेखक के अनुसार, भगवान कृष्ण यहाँ पर बता रहे हैं कि वे जीवों के भीतर नहीं हैं, बल्कि वे जीवों के पीछे हैं। यह बात बहुत ही गहरी और विस्तृत है।

लेखक के अनुसार, भगवान कृष्ण यहाँ पर बता रहे हैं कि वे जीवों का धारण-पोषण करने वाले और जीवों को उत्पन्न करने वाले हैं। लेकिन वे जीवों में स्थित नहीं हैं। यह बात बहुत ही महत्वपूर्ण है। क्यों कि लोग अपने गुरु को भगवान का दर्जा दे बैठते है।

लेखक के अनुसार, भगवान कृष्ण यहाँ पर बता रहे हैं कि वे जीवों के भीतर नहीं हैं, बल्कि वे जीवों के पीछे हैं।

 यह बात बहुत ही गहरी और विस्तृत है।

लेखक के अनुसार, भगवान कृष्ण यहाँ पर बता रहे हैं कि वे जीवों का धारण-पोषण करने वाले और जीवों को उत्पन्न करने वाले हैं। लेकिन वे जीवों में स्थित नहीं हैं। यह बात बहुत ही महत्वपूर्ण है। और याद रखने योग्य है। मैं ईश्वर हूं मान लेना अहंकारियों का गुण है।

लेखक के अनुसार, भगवान कृष्ण यहाँ पर बता रहे हैं कि वे जीवों के भीतर नहीं हैं, बल्कि वे जीवों के पीछे हैं। 

यह बात बहुत ही गहरी विचारणीय और विस्तृत है।

लेखक के अनुसार, भगवान कृष्ण यहाँ पर बता रहे हैं कि वे जीवों का धारण-पोषण करने वाले और जीवों को उत्पन्न करने वाले तो हैं। लेकिन वे जीवों में स्थित नहीं हैं। 
यह भी बात बहुत ही महत्वपूर्ण बात है।

लेखक के अनुसार, भगवान कृष्ण यहाँ पर बता रहे हैं कि वे जीवों के भीतर नहीं हैं, बल्कि वे जीवों के पीछे हैं। 
यह बात बहुत ही गहरी और विस्तृत सच्चाई है।नहीं तो इंसान  पल भर ने शहर के शहर फूंक देता।

लेखक के अनुसार, भगवान कृष्ण यहाँ पर बता रहे हैं कि वे जीवों का धारण-पोषण करने वाले और जीवों को उत्पन्न करने वाले हैं। लेकिन वे जीवों में स्थित नहीं हैं। यह बात बहुत ही महत्वपूर्ण है।

लेखक के अनुसार, भगवान कृष्ण यहाँ पर बता रहे हैं कि वे जीवों के भीतर नहीं हैं, बल्कि वे जीवों के पीछे हैं। यह बात बहुत ही गहरी और विस्तृत है।

लेखक के अनुसार, भगवान कृष्ण यहाँ पर बता रहे हैं। यह तो ओर भी बहुत ही बड़ी बात हो जाती है।
9।।5।।

गीता अध्याय 9के श्लोक 6 से आगे शुरू करते है।

भगवद  गीता अध्याय: 9
श्लोक 6

श्लोक:
यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान्‌।
तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय॥

भावार्थ:
जैसे आकाश से उत्पन्न सर्वत्र विचरने वाला महान्‌ वायु सदा आकाश में ही स्थित है, वैसे ही मेरे संकल्प द्वारा उत्पन्न होने से संपूर्ण भूत मुझमें स्थित हैं, ऐसा जान
9॥6॥

व्याख्या: जिस तरह हवा आकाश में ही रहती है।से भाव खाली जगह से है।वैसे ही मेरे संकल्प द्वारा उत्पन्न होने से संपूर्ण भूत मुझमें स्थित हैं, ऐसा जान।

व्याख्या:

जैसे सभी स्थान विचारेवाली महान् वायु नित्य ही आकाश में स्थित रहती है अर्थात् वह जहाँ निःस्पन्दरूप से निवास करती है, वहीं सामान्य रूप से क्रियाशील रहती है, अन्यत्र बड़े वेगसे ज्वालामुखी है आदि, पर किसी भी रूप से उड़ान वाली वायु आकाश से अलग नहीं हो सकती। वह हवाई जहाज़ों पर रुकी हुई अशुभ देवियाँ और जहाज़ों पर रुकी हुई अशुभ देवियाँ, तो भी वह आकाश में ही रहेगी। आकाश को कहीं भी राह ही नहीं मिल सकती। ऐसे ही त्रिलोक और चौदह भुवनों में भ्रमणवाले स्थावर जङ्गम सम्पूर्ण जीव मेरे ही स्थित हैं --  ऐसा हुआ कि ये संपूर्ण जीव मेरे में ही स्थित हैं। मेरे को छोड़ ये कहीं नहीं जा सकते। ये प्राणी प्रकृति और प्रकृतिके कार्य शरीर आदिके साथ निश्चित ही अंतिम संबंध मान लें, तो वे प्रकृति और उनके कार्य से एक हो ही नहीं सकते और उनके मेरे से ही भिन्न मान लें, तो भी वे मेरे से भिन्न हो सकते हैं ही नहीं।वायुको आकाशमें नित्य स्थित उपग्रह का उल्लेख यह है कि वायु आकाश से कभी भी भिन्न नहीं हो सकता। वायु में यह किञ्चिन्मात्र भी शक्ति नहीं है कि वह आकाश से अलग हो जाये क्योंकि आकाश के साथ उसका नित्य निरन्तर शेष सम्बन्ध अर्थात् सिद्धांत है। वायु आकाश का कार्य और कार्य का उद्देश्य एक साथ होता है। कार्य केवल कार्यकी दृष्टि से देखने के कारण से भिन्न दिखता है परन्तु कारण कार्य की भिन्न सत्ता नहीं होती। जिस समय कार्य कारण में प्रकट रूप से रहता है, उस समय कार्य कारण में प्रकट रूप से रहता है, जिस समय कार्य कारण में प्रकट रूप से रहता है, उस समय कार्य कारण में प्रकट रूप से रहता है। कार्य का आत्मविश्वास नित्य रहता है, उसकी कभी कमी नहीं होती क्यों कि वह कारण रूप ही हो जाता है। इस रीति से वायु आकाश से ही उत्पन्न होती है, आकाश में ही स्थित है और आकाश में ही लीन हो जाती है अर्थात वायुकी स्वतन्त्र सत्ता न देखते हुए आकाश ही रह जाती है। ऐसे ही जीवात्मा परमात्मा से ही आविर्भाव होता है, परमात्मा में ही स्थित है और परमात्मा में ही लीन हो जाता है अर्थात जीवात्मा की स्वतन्त्र सत्ता न केवल परमात्मा ही रह जाता है।( नहीं होता. )लेकिन जब यह प्राकृतिक प्रकृतिके कार्य शरीर के साथ अपनापन (मैंमेरापन) बना लेता है, तब शरीर की गति अपनी गति देखने जाती है। परमपिता परमात्मा में भी यह नित्यनिरंतर ही स्थित है। इस लिए दूसरे अध्यायके चौबीसवें श्लोक में भगवान ने जीवात्मा को नित्य, सर्वगत, अचल, स्थाणु और सनातन के बारे में बताया गया है। यहां शरीरोंकी वैशिष्ट्यके कारण अन्यत्र सर्वगत बताया गया है। अर्थात यह सब जगह विचारनेवाला दिखता भी अचल और स्थाणु है। यह स्थिर स्वभाव वाला है। इसमें हिलने डुलने की क्रिया नहीं है। इसलिए भगवान यहां कह रहे हैं कि सभी प्राकृतिक अटलरूप से नित्यनिरंतर मेरे में ही स्थित हैं। तात्पर्य कि त्रि लोक और तेरह भुवनों में भ्रमणवाले अष्टकी भगवान से भिन्न किंचिञ्मात्र भी स्वतन्त्र सत्य नहीं हुआ और हो भी नहीं सकता अर्थात सभी योनियों में नित्य निवास पर भी वे नित्यनिरान्तर भगवानके सच्चिदानन्दघनस्वरूप में ही स्थित हैं। स्थित हैं। लेकिन प्रकृतिके कार्यके साथ आपके मित्र मित्रों का अनुभव नहीं हो रहा है। अगर ये इंसान शरीर में अपनापन न करें, मेरापन न करें तो भूखा भूखा अनुभव हो जाएगा। इसलिए मनुष्यमात्र को चेतावनी के लिए यहां भगवान कहते हैं कि तुम मेरे में नित्यनिरंतर स्थित हो, फिर मेरी इच्छामें परिश्रम और विलंबित किस बातकी मेरेमें अपनी स्थिति न जिज्ञासासे और न अन्वेषणसे ही मेरे से दूरी स्पष्ट हो रही है। -यह बात आपके अस्तित्व को धारण कर लो, मन लो कि सृष्टि का समय हो, सृष्टि का समय हो, अनंत ब्रह्माण्डों के संपूर्ण अस्तित्व सर्वथा मेरे में ही रहते हैं मेरेसे अलग उनकी स्थिति कभी नहीं हो सकती। इस वास्तविक तत्व का अनुभव करने के लिए दृढ़ विश्वास से ऐसा मन ले कि जो सभी देश, काल, वस्तु, व्यक्ति आदि में सर्वथा मूल्यवान हैं, परमात्मा वे ही मेरे हैं। देश, काल, वस्तु, व्यक्ति आदि कोई मेरा नहीं है और मैं उनका नहीं हूं।

विशेष बात

संपूर्ण जीव भगवान में ही स्थित हैं। ईश्वर में स्थित रहते हुए भी प्राणियोंके शरीरों में उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय का क्रम रहता है क्योंकि सभी शरीर परिवर्तित होते हैं और यह जीव स्वयं अपरिवर्तनशील है। इस जीवकी परमात्माके साथ तात्त्विक एकता है। परंतु जब यह जीव परमात्मा से विमुख शरीर के साथ होता है, तो उसकी एकता मान ली जाती है, तब इसे मैं पने की स्वतन्त्र सत्यका भण होना प्रतीत होता है कि मैं शरीर हूँ। इस मन में एक तो परमात्माका अंश है और एक प्रकृतिका अंश है -- यह जीवका स्वरूप हुआ। जीव अंश तो है प्रकृतिका, पर पकड़ लेता है प्रकृतिके अंश। परंतु प्रकृतिके अंशके साथ तादात्म्य होनेसे परमात्माका अंश जीव उस साबुन को अपना अलग मान लेता है और मुझे सुख मिल जाता है, धन मिल जाता है, भोग मिल जाता है -- ऐसा भाव कर देता है। ऐसा भाव करने से वह परमात्मा से विशेष विमुख हो जाता है। संसारका सुख हरदम रहे, पदार्थ का संयोग हर दम रहे यह शरीर मेरे साथ और मैं शरीरके साथ सदा रहूँ -- ऐसी जो इच्छा रहती है, यह इच्छा वास्तव में परमात्मा के साथ रहती है क्योंकि उसका नित्य संबंध तो परमात्मा के साथ ही है। जाय, परमात्‍मा की तरफ उनका कृप्या कभी मिटता नहीं, मिटनेकी दुर्लभ ही नहीं। मैं नित्यनिरंतर रहूँ, सदा रहूँ, सदा सुखी रहूँ और मुझे सर्वोपरि सुख मिले--इस रूप में परमाता का सरलता ही रहता है। लेकिन यह भूल हो गई है कि वह  इस सर्वोपरी सुख को जद के द्वारा ही प्राप्त करना की इच्छा रखता है। भूलसे वह सुखको सामान्य लगता है, जिसपर उसका अधिकार नहीं है। यदि वह सतर्कता, सावधान हो जाय और वस्तुओं में कोई सुख नहीं है, आज तक कोई भी संयोग नहीं है, संभावना संभव ही नहीं -- ऐसा समझ ले, तो आस्था, संयोग, सुख की इच्छा मिट जायेगी और वास्तविकता, सर्वोपरि, नित्य रहनेवाले सुखकी इच्छा (जो कि आवश्यकता है) जाग्रत हो जायेगी। यह आवश्यक है ज्यों ज्यों जाग्रत होगी, त्योंहित्यों नाशवान सूक्ष्म जीव से विमुखता होती चली जायेगी। नाशवान मोक्ष से सर्वथा विमुखता होने पर मेरी स्थिति तो अनादिकाल से परमात्मा में ही है -- इसका अनुभव हो जायेगा।

सम्मिलन-- पूर्वश्लोकमें भगवान्ने सम्पूर्ण मलिनकी स्थिति अपने में बतायी, उनके महासर्ग एवं महाप्रलय का वर्णन पर विश्राम किया गया।
भगवद गीता के अध्याय 9 के श्लोक 6 की व्याख्या है, जिसमें भगवान कृष्ण यह बता रहे हैं कि जैसे वायु आकाश में स्थित रहती है, वैसे ही संपूर्ण जीव भगवान में ही स्थित हैं।

इस श्लोक का अर्थ यह है कि जैसे वायु आकाश में व्याप्त होती है और आकाश से अलग नहीं हो सकती, वैसे ही संपूर्ण जीव भगवान में ही स्थित हैं और भगवान से अलग नहीं हो सकते। यह भगवान की सर्वव्यापकता और जीवों की भगवान में स्थिति को दर्शाता है।

मूलतः उसका वर्णन आगे दो श्लोकों में मिलता है।

भगवद  गीता अध्याय: 9
श्लोक 7

श्लोक:
( जगत की उत्पत्ति का विषय )
सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम्‌।
कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम्‌॥

भावार्थ:
हे अर्जुन! कल्पों के अन्त में सब भूत मेरी प्रकृति को प्राप्त होते हैं अर्थात्‌ प्रकृति में लीन होते हैं और कल्पों के आदि में उनको मैं फिर रचता हूँ
॥7॥

भगवद  गीता अध्याय: 9
श्लोक 8

श्लोक:
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः।
भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्‌॥

भावार्थ:
अपनी प्रकृति को अंगीकार करके स्वभाव के बल से परतंत्र हुए इस संपूर्ण भूतसमुदाय को बार-बार उनके कर्मों के अनुसार रचता हूँ
॥8॥

भगवद  गीता अध्याय: 9
श्लोक 9

श्लोक:
न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय।
उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु॥

भावार्थ:
हे अर्जुन! उन कर्मों में आसक्तिरहित और उदासीन के सदृश (जिसके संपूर्ण कार्य कर्तृत्व भाव के बिना अपने आप सत्ता मात्र ही होते हैं उसका नाम 'उदासीन के सदृश' है।) स्थित मुझ परमात्मा को वे कर्म नहीं बाँधते
॥9॥

व्याख्या:

तब तो भूतसमुदायको विषम रचनावाले आप भगवानका उस विचित्र रचनाजनित पुण्यपापसे भी संबंध होता ही ऐसा शङ्का होनेपर भगवान ये वचन बोले --, हे धनंजय भूतसमुदायकी विचित्र रचनानिमित्तक वे कर्म? मुझे ईश्वर को बंधन में नहीं रखना। उन कर्मों का सम्बन्ध न होने के कारण बतलाते हैं -- मैं उन कर्मों में न रहने की स्थिति में रहता हूँ अर्थात् आत्मा निर्विकार है? इसलिए जैसे कोई नाथ--अनदेखी करनेवाला स्थित हो उसी की भाँति में स्थित हूँ। तथापि उन कर्मों में फलसम्बन्धी आक्तिसे और मैं इस अभिमान से भी कुछ नहीं चाहता हूँ (इस कारण वे कर्म मुझे छोड़ते नहीं हैं)। इससे यह अभिप्राय समझ में आता है कि कलाकारनके अभिमानका अभाव और फलसंबद्धता अकादमी रिक्तियों को भी बंधनमुक्त कर दिया जाता है। इसके सिवाए अन्य प्रकार के किस्से हुए कर्मोंदेव मूर्ख लोग कोशकार (रेशमके कीट) की भाँति बंधन में बंधे हैं।

अर्थात:

रेशमके कीट (कॉकरी) की भाँति बंधन में बंधे होना यह दर्शाता है कि जैसे रेशमके कीट अपने ही बनाए हुए कोकून में बंध जाते हैं, वैसे ही जीव अपने कर्मों और वासनाओं के कारण माया के बंधन में बंध जाते हैं।

यह बंधन जीव को अपने असली स्वरूप और भगवान से अलग कर देता है, और जीव को जन्म, मृत्यु और पुनर्जन्म के चक्र में फंसा देता है। इस बंधन से मुक्ति पाने के लिए जीव को अपने कर्मों और वासनाओं को त्यागना होता है और भगवान की शरण में जाना होता है।

🎥चलचित्र गृह के श्वेत परदे पर दिखाया गया चलचित्र (सिनेमा) कितना ही दुखांत और हत्यापूर्ण क्यों न हो?
उसकी कहानी कितनी है अश्रुपूर्ण और उदासी भरी क्यों नहीं हो?
किस तरह के तूफान और तूफान के दृश्य में सिनेमा की समाप्ति पर श्वेतपट न रक्तरंजित होता है और न अश्रु से भीगा क्यों नहीं होता है?
और न तूफानों से वह क्षतिग्रस्त ही होता है। तथापि हम जानते हैं कि वह स्थिर प्लेट के बिना क्या है?

छाया और प्रकाश के माध्यम से चित्रपट की कथा का चित्रण नहीं किया जा सकता था। उसी प्रकार?

नित्य शुद्ध अनन्त आत्मा वह चिरस्थायी हैं?
जिस पर दुःखपूर्ण जीवन का नाटक अनेकत्व की भाषा में विद्वान के द्वारा दर्शाया गया रहता है?
जो अपने पूर्वाजित सपनों से जुड़े स्मारकों में स्थापित स्मारकों को रखते हैं। और न ही गन्तव्य तक अपने समय पर सुरक्षित स्थान पर उसका अभिनन्दन ही किया जाता है। यह सत्य है कि उस वैश्वीकरण के बिना कोई दुर्घटना नहीं हो सकती थी और न ही गन्तव्य की प्राप्ति ही हुई क्योंकि उसका बिना इंजिन केवल निष्क्रिय था? भारी लोहा ही होता है। विनाशकारी या विध्वंसात्मक कार्य करने की शक्ति इंजिन को वाष्प से ही प्राप्त होती है। इन सभी घटनाओं में?
उस वैश्वीकरण कोजिन ऑपरेटिंग के प्रति न राग है और न द्वेष?
ऐसे में इन घटनाओं का उत्तरदायित्व उस पर पोस्ट कर उसे बंधन में नहीं डाला जाता है। कर्म का प्रेरक उद्देश्य ही कर्म का फल निश्चित करता है। पूर्ण शक्ति का स्रोत आत्मा है। वह मन को शक्ति प्रदान करता है। प्रत्येक मन संकल्पों का संग्रह होता है। शुभ संकल्पों से संस्कारित मन आनंदित और संगीत का गीत गाता है?
जबकि अशुभ इच्छाएँ मन को दुःख पहुँचाने को बाध्य करती हैं। ग्रामोफ़ोन की सुई रिकार्ड से बज रहे संगीत के लिए नहीं होता। रिकार्ड के रूप में? संगीत ही इसी प्रकार होता है?
आत्मा सनातन है? इसकी चिंता नहीं है कि किस प्रकार का जगत् उत्पन्न हुआ है। जगत् परिवर्तन के प्रति उसका किसी प्रकार का व्याकुलता नहीं होता। जगत् में जो कुछ भी हो रहा हो हत्यारा हो या प्राणोत्सर्ग सूर्यप्रकाश उसे प्रकाशित करता है। सूर्य का संबंध न  हत्यारे के अपराध से है और न साक्षात् पुरुष के गौरव से ही है। शुद्धचैतन्यसरूप आत्मा वासनारूपी प्रकृति को व्यक्त करने की क्षमता प्रदान करता है? फिर वे नरकायतना की इच्छाएँ सम्मान या गौरव प्रतिष्ठा के लिए करते हैं। उन कर्मों में असक्त और नाथ के समान स्थित आत्मा को वे कर्म नहीं बांधते हैं। ?

वह कैसे

भगवद  गीता अध्याय: 9
श्लोक 10

श्लोक:
मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरं।
हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते॥

भावार्थ:
हे अर्जुन! मुझ अधिष्ठाता के सकाश से प्रकृति चराचर सहित सर्वजगत को रचती है और इस हेतु से ही यह संसारचक्र घूम रहा है
॥10॥

भगवद  गीता अध्याय: 9
श्लोक 11

श्लोक:
( भगवान का तिरस्कार करने वाले आसुरी प्रकृति वालों की निंदा और दैवी प्रकृति वालों के भगवद्भजन का प्रकार )
अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्‌।
परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्‌॥

भावार्थ:
मेरे परमभाव को  न जानने वाले मूढ़ लोग मनुष्य का शरीर धारण करने वाले मुझ संपूर्ण भूतों के महान्‌ ईश्वर को तुच्छ समझते हैं अर्थात्‌ अपनी योग माया से संसार के उद्धार के लिए मनुष्य रूप में विचरते हुए मुझ परमेश्वर को साधारण मनुष्य मानते हैं
9॥11॥
(गीता अध्याय 7 श्लोक 24 में देखना चाहिए)

व्याख्या:

भगवान तो अज और अविनाशी है अर्थात् जन्ममरण से रहित है। ऐसा होनेपर भी भगवान प्रकट और अन्तर्धान होनेकी लीला करते हैअर्थात् जब भी भगवान अवतार लेते है, तब अज (अजन्मा) रहते हुआ ही अवतार लेते है और अव्ययात्मा रहता हुए ही अन्तर्धान हो जाते है। जैसे सूर्य भगवान् उदय होते हैं तो हमारे सामने आ जाते हैं और अस्त होते हैं तो हमारे नेत्रोंसे ओझल हो जाते हैं, छिप जाते हैं, ऐसे ही मैं केवल प्रकट और अन्तर्धान होनेकी लीला करते हैं। जो भगवान को इस प्रकार जब जान जाता है तब तब ही उस का योग पूर्ण होता है जन्म-मरणसे रहित मानते हैं, वे तो असम्मूढ़ हैं
(असम्मूढ़ का अर्थ है जो मोह से मुक्त है, जो अज्ञान से मुक्त है, जो अपने असली स्वरूप को समझता है, जो अपने लक्ष्य को जानता है और जो अपने जीवन को सही दिशा में ले जा रहा है।

असम्मूढ़ का भाव यह है कि व्यक्ति अपने जीवन में स्पष्टता और समझ के साथ आगे बढ़ रहा है, और वह अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए सही निर्णय ले रहा है। 7 श्लोक 24  यह रहा)
9॥11॥

व्याख्या:

शक्ति-श्रुति प्रकृति की अनंत ब्रह्माण्डों की रचना करती है, चराचर, स्थावर-जंगम ममत्व को जन्म देती है; जो प्रकृति और उनके कार्य मातृका नेता, प्रवर्तक, शासक और संरक्षक हैं, उनकी इच्छा के बिना वृक्षका पत्ता भी हिलता नहीं है, उनके कर्मों के अनुसार जिनजिन लोकों में जाते हैं, उन-उन लोकों में राक्षसों पर शासन करने-वाले देवता हैं, उनके भी जो ईश्वर (मालिक) और जो दर्शनवाला है-- ऐसा वह मेरा भूत महेश्वर रूप सर्वोत्कृष्ट भाव है।

जैसे:शक्ति श्रुति मनुष्य की कल्पना से संबंधित भी हो जाती है।

कैसे:

मेरा कहने का अर्थ यह है कि प्राकृतिक श्रुति या सुनी हुई बातें भी हमारे मन में एक चित्र बना सकती हैं, जो हमने कभी देखा नहीं होता है।
उदाहरण:
ताज महल को देखने के बाद, आप उसकी तस्वीर को सुनते ही चल चित्र की भांति नजर आने लगता है। यह दर्शाता है कि अब आप के मन में ताज महल की एक मानसिक तस्वीर बन गई है, जो आपको सुनते ही नजर आने लगती है।

यही बात प्राकृतिक श्रुति के साथ भी होती है। जब हम किसी चीज़ के बारे में सुनते हैं, तो हमारे मन में उसकी एक मानसिक तस्वीर बन जाती है, जो हमें उस चीज़ के बारे में सोचने पर नजर आने लगती है।

पर ऐसी चीज जिसे हमने देखा ही नहीं।

जैसे:

आकाश में खेती होना।
हिजड़े के बच्चा पैदा होना।
आलू से सोने का बनना।
ऐसी कोई कहानी बचा सुनता है तो उसकी छवि को भी साथ साथ रच रहा होता है। जब कि सत्य कुछ और ही होता है यह मात्र समझने समझा ने के उद्देश से कह रहा हूं।

वास्तव में भगवान  चौथे अध्याय में ब्रह्म की परा और अपरा प्रकृति का वर्णन करते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने यह घोषित किया था कि मूढ़ लोग? मेरे अव्यय और परम भाव को नहीं जानते हैं और परमार्थ अव्यक्तस्वरूप मुझको व्यक्त करते हैं। जो तत्व को छोड़कर केवल रूप को ही पकड़ लेते हैं। मेरे परम स्वरूप को नहीं जानते

मूढ़ लोग मुझे किसी देह विशेष में ही स्थित मूर्ति या गुरु के शरीर में ही अनंत मूर्ति समान इसी प्रकार की त्रुटिपूर्ण या विपरीत ज्ञान को पाते है?

जैसे घट को ही सम्मिलित वस्तु मान लिया जाता है।

मूर्ति तो इन्द्रिय अगोचर सूक्ष्म सत्य का परिमाण प्रतीक है।

डेटिंग या डेटिंग पर केवल दूध की बोतल से होने वाला अनुभव ही ताजगी का अनुभव नहीं है। प्रतीक को ही ध्येय इशारे का अर्थ है साधन को ही ध्यान में रखना। ऐसी ही विपरीत धारणाएं धार्मिक कट्टरता और अशिष्णुता को जन्म देती हैं जो लोगों में शत्रुता और तृष्णा के बीज बोती हैं। इन मॉडलों से? समय आने पर? केवल विपत्ति और नाश की फल ही प्राप्त होती है यह सब कुछ विभिन्न धर्मावलम्बियों के अपने पाषाण के देवता? काष्ठ के बने प्रतीक और पीपल के बने भगवान के नाम पर होता है खादी का ध्वज राष्ट्रध्वज हो सकता है?
लेकिन वह स्वयं मेरा मत है लेकिन जब ध्वजारोहण के समय मैं अपना शीश झुकाता हूं तो राष्ट्र के प्रति अपना सम्मान व्यक्त करता हूं वह मेरे राष्ट्र की संस्कृति और सिद्धांतों का पवित्र प्रतीक है।
इस सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए इस श्लोक का अध्ययन करें पर वह अत्यंत स्पष्ट हो जाता है। भगवान कहते हैं कि सामान्य भक्तजन मुझे भूतमात्र के महेश्वर के रूप में नहीं जानते हैं और मनुष्य शरीर धारण करने पर मेरा अनादर ही करते हैं।

9॥11॥

भगवद  गीता अध्याय: 9
श्लोक 12

श्लोक:
मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः।
राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः॥

भावार्थ:
वे व्यर्थ आशा, व्यर्थ कर्म और व्यर्थ ज्ञान वाले विक्षिप्तचित्त अज्ञानीजन राक्षसी, आसुरी और मोहिनी प्रकृति को (जिसको आसुरी संपदा के नाम से विस्तारपूर्वक भगवान ने गीता अध्याय 16 श्लोक 4 तथा श्लोक 7 से 21 तक में कहा है जो आगे पुनः आने को है) ही धारण किए रहते हैं
9॥12॥

भगवद  गीता अध्याय: 9
श्लोक 13

श्लोक:
महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः।
भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्यम्‌॥

भावार्थ:
परंतु हे कुन्तीपुत्र! दैवी प्रकृति के  आश्रित महात्माजन मुझको सब भूतों का सनातन कारण और नाशरहित अक्षरस्वरूप जानकर अनन्य मन से युक्त होकर निरंतर भजते हैं
9॥13॥

परंतु दैवी सामान्य के गुण भी तो गुण ही हैं?

वे सभी गुण हैं और स्वतःसिद्ध हैं अर्थात इन पहलुओं पर सभी सिद्धांतों का पूरा अधिकार भी है। अब इनमें से कोई भी सम्मिलित का आश्रय ले या न ले--तो सलाह पर प्रतिबंध है ले किन जो भी आश्रय लेकर भगवान की तरफ रहते हैं, वे अपना कल्याण कर लेते हैं।

यह एक खोज होती है और एक उत्पत्ति होती है।
खोज नित्यतत्त्वकी होती है जो पहले से ही है। जिस वस्तु की उत्पत्ति होती है वह नष्ट होती है। भगवानके और भगवत्स्वरूप समझकर धारण करना, उनकी शरण लेना खोज है। क्योंकि ये किसी की बनाई हुई चीज़ नहीं है यानी ये किसी की पर्सनल उपजी, बपौती नहीं हैं। जो इन गुणों को अपने पुरुषार्थ के द्वारा उपअर्जित मानकीकृत करता है वह है मूलतः मौलिकता न अर्जित करना आपके बनाए गए मानक है, उसमें गुणधर्म का अभिमान होता है।

यह अभिमान ही वास्तविक में रचनात्मक व्यक्तिगत उपजी है, जो नष्ट होने वाली है। पैदा होती है।

लेकिन इन सूत्रों में केवल भगवान के ही गुण से अभिमान का जन्म होता है। दैवी प्लास्टिके (अपने में) पूर्ण होने पर अभिमान का जन्म नहीं होता है। जैसे, किसी को होता हर मैं सत्यवादी हूं -- इसका अभिमान होता है, तो सत्यभाषणके साथ-साथ आंशिक असत्यभाषण भी तो हो हो ही जाता है। यदि सर्वथा सत्यभाषण हो तो मैं सत्य बोलने वाला हूं--इसका अभिमान नहीं हो सकता, प्रत्युत यह उसका भाव है कि मैं सत्यवादी हूं तो मैं असत्य बोल सकता हूं। मनुष्य में ऐसा दैवी सिद्धांत तभी प्रकट होता है, जब उसका उद्देश्य एकमात्र भगवत्प्राप्तिका हो जाता है।
भगवत्प्राप्तिके के लिए दैवी गुणधर्म आश्रय लेकर ही वह परमात्मा की ओर बढ़ सकता है। जो मनुष्य भगवान से विमुख होते हैं उत्पत्ति-विनाशशील भोग और उनके संग्रह में लगे हुए हैं, वे अल्पात्मा हैं अर्थात मूढ़ हैं भगवान शरण लिया है,प्रामाणिक मूढ़ता चली गई है और केवल प्रभु के साथ अपना जुड़ाव जोड़ लिया है, तो महान के साथ जोड़ने से, सत्यतत्व की तरफ ही लक्ष्य होने से वे महात्मा हो जाता है।

जैसे:

अगर कभी भगवान के भगत के मुंह से झूठ निकल जाए तो उसे भगवान खुद सच कर देते है।

धन्ना जाट रामानन्द के शिष्य थे।

भगवान अपने भगतों के झूठ को भी सच करदे ते है। रामानन्द जी योग्य ब्राह्मण थे। उनसे कभी भी भगवान ने वैसे भोग नहीं लगवाया था जैसा उन्हों ने धन्ना जाट को बताया था।

धनेजाट के घर भगवान ने भोग लगाया प्रमाणित करता है यदि किसी योग्य ब्राह्मण भगत के मुंह से कभी झूठ भी निकल जाए तो उसे भगवान सच में बदल देते हैं।
(धन्ना जाट की कहानी में यह भी बताया गया है कि जब कभी धन्ना जाट के मुंह से कुछ  निकल जाता था, तो भगवान उसे भी सत्य कर देते थे। यह भगवान की कृपा और धन्ना जाट की भक्ति का एक अद्भुत उदाहरण है।)

👉यह घटना हमें यह सिखाती है कि भगवान अपने भक्तों की भक्ति और श्रद्धा को स्वीकार करते हैं और उनकी कमियों को भी दूर कर देते हैं। धन्ना जाट की कहानी भगवान की कृपा और उनके भक्तों के प्रति उनके प्रेम का एक अद्भुत उदाहरण है।👈
वैसे तो यह नियम है कि जिस वस्तु से कोई वस्तु उत्पन्न होती है, तो उस वस्तु में कमी आ जाती है जैसे -- मिट्टी से घड़े पैदा होने पर मिट्टी में कमी हो जाती है और सोने से सोने में कमी आ जाती है, आदि। परन्तु भगवान से अनन्त सृष्टियाँ उत्पन्न होने पर भी उनमें में किञ्चिन्मात्र भी कमि नहीं होती क्यों कि वहीं सब अव्यय बीज हैं।

❤️किसी तर्क को आक्षेप के लिए प्रिय भगवान श्री कृष्ण दो परस्पर विरोधी विरोधाभास को एक स्थान पर ही प्रस्तुत करने की शैली अपनाते हैं?

जिससे एक दूसरे की पृष्ठभूमि में दोनों का स्पष्ट ज्ञान हो सके। प्रथम श्लोक में उन मोहित मेन का वर्णन है?
जो अपने निम्न स्तर की रुचियों का अनुकरण करते हैं। दूसरे श्लोक में उन महात्मा पुरुषों का चित्रण किया गया है?
जो सभी दिव्य अभिलेखों से अभिलेखित होते हैं। आकर्षक आशाओं से मोहित अपने पद के लिए नियुक्तियों के लिए प्रेरित कर्मों से थके हुए मूड वाले लोग विचार करने में सर्वथा भ्रमित और बेकार हो जाते हैं।

ऐसे लोग जगत की ओर देखने के दैवी दृष्टिकोण को खोकर अपने कर्मों में राक्षस बन जाते हैं?
और सभी कलों में अपने उचक और असुरी स्वभाव का ही प्रदर्शन करते हैं। रावण की परंपरा वाले इन लोगों को ही यहां राक्षस और असुर कहा जाता है। वर्तमान में क्या बन गए कर्म इंसानों के मन में अपनी इच्छाएं पैदा होती हैं?
जो संविधान ही है वह मनुष्य की इच्छाएं और विचार होते हैं। वृथा और कंकाल कर्मों से नकारात्मक दृश्यों की ही वृद्धि होती है जो मंदबुद्धि पुरुष की बुद्धि की जड़ता को और अधिक स्थिर कर देते हैं। ज्ञानी की दृष्टि में?
मिथ्यात्व और कृतज्ञता की इस खाई में रहने वाला मनुष्य एक दैत्य के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता।राक्षसी संस्कृति के लोगों के विपरीत? दैवी प्रकृति के महात्मा पुरुष होते हैं। दूसरा श्लोक हमें बताता है कि इन ज्ञानी पुरुषों का अनुभव और कर्म किस प्रकार का होता है। इन दोनों के दर्शन में अंर्तकथा से आत्मोन्नति के साधक को शामिल किया जाना चाहिए कि वे कर्मों में सही भावना चाहते हैं और जगत की ओर से देखने के लिए सही दृष्टिकोण को अपनाएं। वे जानते हैं कि मैं भूतमात्र का आदिकरण कौन-कौन से लोगों को पता है? वे मिट्टी के बने सभी घाटों में मिट्टी को देखते हैं। इसी प्रकार? क्या आप जानते हैं हिंदू संस्कृति में वे दिव्य सुपुत्र जो इस चैतन्य आत्मा को जगत के आदिकरण के रूप में जानते हैं?
समाज के अन्य लोगों को अपने समान ही देखें और उनके अनुयायी बनें। संपूर्ण विश्व में इससे अधिक महान और कुलीन समाजवाद को कभी नहीं पढ़ाया गया और न ही प्रचारित किया गया। यदि वर्तमान पीढ़ी इस आध्यात्मिक समाजवाद को समझ नहीं पाती है या पसंद नहीं करती है?
जो वास्तव में विश्व की सभी व्याधियों और बुराइयों की है? एकमात्र रामबाण औषधि है?
तो उसका कारण पूर्व के श्लोक में ही बताया गया है कि?
लोग आसुरी और राक्षसी प्रकृति के वासहत मोहित हुए हैं। महात्मा पुरुष अनन्य भाव से आपको किस प्रकार भजते हैं।

भगवद  गीता अध्याय: 9
श्लोक 14

श्लोक:
सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढ़व्रताः।
नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते॥

भावार्थ:
वे दृढ़ निश्चय वाले भक्तजन निरंतर मेरे नाम और गुणों का कीर्तन करते हुए तथा मेरी प्राप्ति के लिए यत्न करते हुए और मुझको बार-बार प्रणाम करते हुए सदा मेरे ध्यान में युक्त होकर अनन्य प्रेम से मेरी उपासना करते हैं
9॥14॥

व्याख्या:

पूर्व श्लोक में महात्माओं का वर्णन करने का समय क्या है? ज्ञानमार्ग पर हस्ताक्षर किया गया था। अब यहाँ? आत्मसंगठन और आत्मविकास के दो अन्य मुख्य मार्ग बताए गए हैं अनन्य भक्ति और यज्ञ भावना से जाने वाले निष्काम कर्म। सत मेरी कीर्ति का गान करते हुए सामान्यत कीर्तन के नाम पर बेशुद्ध वाद्यों के साथ समान रूप से बेसुरी आवाज में लोग उच्च स्वर से भजन करते हैं कीर्तन करते हैं यह कीर्तन का अत्यंत विचित्र रूप है। कीर्तन का कार्य कहीं भी अधिक पवित्र है। वास्तव में?

श्रद्धाभक्ति अपने आदर्श ईश्वर की पूजा करना और उनके यशकीर्तिप्रताप का गान करना? उस मन की मौन क्रिया भी है जो अपने आदर्श को सम्यक् रूप से विकसित करती है और गौरव गान करना सिखाती है। अनेक लोग श्रमिक बेरोजगार काम में रात भर किसी स्थान पर एक साथ उच्च स्वर में कुछ समय तक भजन कीर्तन करते रहते हैं और जिन्हे अगुणों के कार्य क्षेत्र में फिर से लौट आते हैं। इन लोगों के कीर्तन की गहरी सामाजिक धार्मिकता की समाज सेवा और ज्ञानी पुरुष के हृदय में प्राणिमात्र के लिए रिबनता ईश्वर का प्रेम अधिक श्रेष्ठ और प्रभावशाली कीर्तन है। साधारणतया ध्यान नहीं दिया जाता और परिणाम स्वरूप साधक अपने ही हाथों से आध्यात्मिक सफलता का शवागार्ट खोदते हैं। अधिकतर लोगों की यह धारणा है कि सप्ताह में किसी एक दिन केवल शरीर से संबंधित यंत्र के समान पूजन अर्चन किया जाता है? व्रतउपवास आदि करने से धर्म के प्रति उनका उत्तरदायित्व समाप्त हो जाता है। इनका होना इतना ही सात्त्विक होता है। फिर शेष कार्य उनके काल्पनिक देवताओं का है?

कौन सी साधना के फल को तैयार करके आपके सामने लाएँगे?
जिस व्यक्ति का यह व्यक्ति अपना स्वामी है वह विवेकहीन है?
अंधश्रद्धाजनित धारणा का आत्मोन्नति के विज्ञान से किंचित् संबंध नहीं है। वास्तविक धर्म में तो तत्त्वज्ञान का व्यावहारिक पक्ष है। यदि कोई व्यक्ति वर्तमान जीवन में रह कर जन्मस्थान से संबंधित गलत संगति और साक्ष्य आकलन की तरह से हटकर आत्मोन्नति के मार्ग पर उपभोग करना चाहता है?
तो उसके लिए सतत और सजगता का प्रयास अनिवार्य है। जीवन में कौन सी असमंजस का अनुभव होता है?
और उसके मन की वीणा पर जीवन की परिस्थितियाँ जिन अनपेक्षित स्वरों की झनकार करती हैं, इन सबके कारण उसके साथियों के साथ (इन्द्रियाँ? मनबुद्धि) की जन्मतिथि है। उन्हें पूर्णविस्थित करने के लिए अखण्ड सावधानी?
परंपरागत प्रयास और दृढ़ लग्न की आवश्यकता है। इस प्रकार आत्मबोध के लिए समय का प्रयास करें?
शारीरिक कामवासनाओं को उद्दीप्त करने वाले प्रतियोगी साधक के पास ग्यांस कनाफूसी करके उसे मिट्टी के फल खाने के लिए प्रेरित करते हैं?
लेकिन ऐसे उपद्रवियों की रिहाई में उसे मिथ्या का त्याग करना और सत्य के मार्ग पर स्थिरता से चलना का दृढ़ निश्चय करना चाहिए। विशुद्ध प्रेम ही वास्तविक भक्ति है। प्रेमी का प्रेमिका या अपने प्रेम के विषय के साथ हुआ तादात्म्य प्रेम का मापदण्ड। भूत-मात्र के आदि कारण और अव्यय स्वरूप मुझ से भक्ति ही मार्ग है?

जिसे मोहित जीव द्वारा अपना आत्मस्वरूप के साथ तादात्म्य प्राप्त किया जा सकता है। इसकी सफल परिसमाप्ति अनातम्यो डिग्री से वैराग्य प्राप्त होने से ही होगी। अनंत से मन को परावृत्त करने की साधना को यहां मुझे नमस्कार करते हुए शब्द के द्वारा सूचित किया गया है। आत्मसाक्षात्कार की वैधेयात्मक साधना यह है कि साधक एकाग्र मनआत्मस्वरूप का ही चिंतन करके अन्त में स्वस्वरूपानुभूति में ही स्थित हो जाता है। इस विधेयात्मक पक्ष को भक्तया शब्द के द्वारा बताया गया है। मिथ्या डिग्रीयों से मन को निवृत्त करके आत्मचिन्तन के आत्मसाक्षात्कार से केवल उन लोगों को ही प्राप्त होता है जो मुझसे नित्ययुक्त होते हैं और मेरी पूजा करते हैं। ज्ञानमार्ग में? कर्मकांड की पूजा के समान न पुष्पार्पण करना है और न चंदन अभिषेक करना है। मन में आत्मचिंतन की जागृति बनाए रखें उसी परमात्मा की जो संपूर्ण जगत का अधिष्ठान और भूतमात्र की आत्मा है वही वास्तविक पूजा है। यह पूजा हमारे ईश्वरीय जीवन की कलियों को विकसित करके ईश्वरीय पुरुष के फूल के रूप में कैसे निभाई जा सकती है? और उनकी पूर्णता की सुगंध सर्वत्र प्रवाहित करके ले जाई जा सकती है।
लगातार प्रभु कीर्तन करते रहो, प्रयास करते रहो, व्रती पुरुष भगवान को नमस्कार करते रहो, नित्ययुक्त तुम्हारी भक्ति भगवान की पूजा में लगे रहो।।
9॥14॥
भगवद  गीता अध्याय: 9
श्लोक 15

श्लोक:
ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ते यजन्तो मामुपासते।
एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम्।।

भावार्थ:
दूसरे ज्ञानयोगी मुझ निर्गुण-निराकार ब्रह्म का ज्ञानयज्ञ द्वारा अभिन्नभाव से पूजन करते हुए भी मेरी उपासना करते हैं और दूसरे मनुष्य बहुत प्रकार से स्थित मुझ विराट स्वरूप परमेश्वर की पृथक भाव से उपासना करते हैं।
9।।15।।
जानी जन किस प्रकार की पूजा करते हैं इसलिए कहते हैं--?

कुछ (ज्ञानीजन) पूजा से मुक्ति के लिए भगवद्विषयक ज्ञानरूप यज्ञ से मेरा पूजन करते हैं तो परमब्रह्म परमात्मा एक ही है? ऐसे एकत्वरूप परमार्थज्ञान की पूजा करते हैं, मेरी पूजा करते हैं। और कोई पृथक्करण भावसे अर्थात्आदित्य? चन्द्रमा आदिके भेद से इस प्रकार समझकर की जाती है भगवान विष्णु की पूजा? सूर्य आदिके रूप में स्थित हैं। तथापि वही भक्त ऐसा समझता है कि सभी के मुखवाले विश्व मूर्ति भगवान के अनेक रूप से स्थित हो रहे हैं। उन विश्वरूप विराट भगवान्की विविध प्रकार से पूजा की जाती है।
ज्ञानयज्ञ में कोई कर्मकांड नहीं होता। इस यज्ञ में यजमान साधक का यह सतत प्रयास होता है कि दृश्यमान विविध नामरूपों में एकमेव चैतन्य स्वरूप आत्मा की अभिव्यक्ति और चेतना को वह देखे और अनुभव करे। यह साधना वे साधक ही कर सकते हैं? वेदांत के इस प्रतिपादन से यह स्पष्ट होता है कि अव्यय आत्मा सर्वत्र व्याप्ति है और अपने सत्स्वरूप में इसमान दृश्य विविधता तथा उनके समता वैचित्र्यपूर्ण क्रियाओं को धारण करना एक आदर्श है। विभिन्न व्यावसायिक कलाओं द्वारा निर्मित चॉकलेटों का आकार? रंग? स्वाद? कीमत आदि अलग-अलग होते हुए भी सभी चॉकलेट ही हैं? और इसलिए उन सभी वास्तविक धर्म मधुरता? सभी में एक समान होता है। उस मधुरता को साधारण वाले बालक सभी प्रकार की चॉकलेटों को पसंद करते हैं। इस प्रकार के आत्मज्ञान के साधक सभी के नाम और सिद्धांत में? सभी डिफ़ॉल्ट और दशाओं में एक ही आत्मा की अभिव्यक्ति का नारा है? निरीक्षण करता है और पहचानता है। किस किसी आभूषण विशेष में थोक जड़ते हैं? व्यापारियों के व्यवसाय के लिए वह सब प्रकाश और आहा के बिंदु ही हैं। वह अपनी आहा के अनुसार उनका आकलन करता है? न कि उस मनोविज्ञान की रचना, प्रकृति या सौन्दर्य को देखकर।आत्मानुभवी पुरुष अपने आत्मस्वरूप को सभी प्रकार के कर्मों से? शब्दों और विचारों में बातचीत देखते हुए जगत् में विचार करता है। किस प्रकार के सहस्र दर्पणों के मध्य स्थित दीपज्योति के करोड़ों प्रतिबिम्ब सर्वत्र प्रकट होते हैं? वही प्रकार? आत्मस्वरूप में स्थित ज्ञानी पुरुष जब जगत् में विचरण करता है? तब वह सर्वत्र अपनी आत्मा को ही नृत्य दृष्टि से देखती है? जो उस पर सब ओर से कटाक्ष करता है उसे हमेशा पूर्णत्व के आनंद से हर्षविभोर रहता है।नेत्रों की दीप्ति में? मित्र की मानसिकता और शत्रु के कृत्रिम हास्य में? तीस के कठोर शब्द और प्रेम के कोमल स्वरों में? शीत और उष्ण में? जय और पराजय में? सभी? क्या? वृक्ष भूमि में और जड़ावती मठ के संग में सर्वत्र वह सच्चिदानंद परमात्मा का ही मंगल दर्शन करता है यही अर्थ है ईश्वर दर्शन का या आत्मदर्शन का? जिसका विश्व के सभी धर्मशास्त्रों में गौरव से गुणगान किया गया है। विभिन्न नामरूपों में ईश्वर की मंदस्मिति को देखना और दर्शन करना का अर्थ है एक ही संप्रदाय ज्ञानयज्ञ की भावना में राम और जीना। सम्पूर्ण विश्व में उसका ध्यान कैसे रखा जाता है? मन की समस्त वृत्तियों के साथ उसका अनुभव करना ही आत्मा के अखण्ड स्मरण में जीना है। ऐसे पुरुष ज्ञानयज्ञ के द्वारा मेरी पूजा करते हैं।प्रारंभिक अवस्था में सर्वत्र आत्मदर्शन की साधना का प्रयास साध्य होने के कारण साधक को कष्ट और तनाव का अनुभव होता है। और ऐसे ही साधक की अध्यात्म दृष्टि विकसित होती है? वैसे भी इसके लिए यह साधना सरल उपाय क्या है? और वह एक ही आत्मा को इसके ज्योतिर्मय वैभव के सिद्धांतों में चित्र कर तस्वीरें दिखाई देती है। यही है विश्वतो मुखम् ईश्वर का विराट स्वरूप। ज्ञानी पुरुष न केवल यही जानता है कि नानाविध डिग्रीयों से आत्मा सदा असंस्पर्शित है? अलिप्त है? वर्ना वह यह भी अनुभव करती है कि विश्व की सभी डिग्री में एक ही आत्मा क्रीड़ा कर रही है। एक बार आकाश में स्थित जगत् से अलिप्त सूर्य को कैसे पहचाना जाए? यदि हम उसकी विशाल प्रतिबिम्ब भी दर्पण या जल में देखें? तब भी एक सूर्य का हमारा ज्ञान लुप्त नहीं हुआ। सर्वत्र हम उस एक सूर्य को ही देखते और पहचानते हैं। यदि कोई पुरुष अपने मन की शांति और समता कोकिसी एकांत और शांत स्थान में ही क्या रखा जा सकता है? तो वेदांत के अनुसार? उनका आत्मनुभव कदापि पूर्ण नहीं कहा जा सकता। यदि केवल समाधि स्थिति के विरले चित्र में ही उसे आत्मानुभूति होती है? तो ऐसा पुरुष? वह तत्त्वज्ञानी नहीं है? इन उपनिषदों के ऋषियों ने की प्रशंसा। यह तो हठयोगियों का मार्ग है। अंतर्बाह्य सर्वत्र एक ही आत्मतत्त्व को समझने वाला ही वास्तविक ज्ञानी पुरुष है। एक तत्त्व वयस्कता है, लेकिन उसे कोई असमानता नहीं मिल सकती। ऐसे अनुभवी पुरुषों के लिए किसी व्यावसायिक केंद्र का अत्यंत आनंदित एवं रंगीन माहौल आत्मदर्शन के लिए, जो कि केवल हिमालय की घाटियों की अत्यंत शांति और एकांत कंदराओं के लिए उपयुक्त है। वह चर्मचक्षुओं से नहीं? वर्ण ज्ञान के अंतचक्षुओं से सर्वत्र एकमेव अद्वितीय आत्मा का ही दर्शन होता है। मेरे हाथ और पत्थरों में? मैं सदा एक समान अरब में रहता हूँ। मैं जानता हूं कि मैं उन सब में हूं। क्या यह ज्ञान से मेरे हाथ पैर लुप्त हो जाते हैं? जैसे सूर्योदय पर कोहरा यदि कोई ऐसा कहा जाए? तो वह खिल्ली उड़ाने वाला पागलपन ही है? कोई वैज्ञानिक व्याख्या नहीं। जैसे एक ही समय में मैं अपने शरीर के अंग प्रत्यंग में स्थित हुआ जागृत अवस्था में जगत् का अनुभव करता हूँ? वैसे ही? आत्मज्ञानी पुरुष कहते हैं कि उनकी आत्मा ही अपने अनंत साम्राज्य में संपूर्ण विश्व को एक रूप में व्याप्त किये हुए है? भेद रूप में और विविध रूप में। वेदान्त प्रतिपादित दिव्यत्व की पहचान और अनंत का अनुभव अंतर्बाह्य जीवन में है। किसी संयोगवश यह क्षणिक अनुभव प्राप्त नहीं होता। यह कोई ऐसा अवसर नहीं है कि जिस रोटी कर प्यासे के लिए वह अनुभव से निवृत्ति हो जाए। किस प्रकार की स्कूली शिक्षा से मानव द्वारा प्राप्त ज्ञान ऑल कालोन्स और रेन्डाल में यहाँ तक कि स्वप्न में भी उसका साथ रहता है? वह भी कार्यस्थल अधिक शक्तिशाली? कहीं अधिक इंटरनैशनल और कहीं अधिक दृढ़ ज्ञानी पुरुष का आत्मानुभव होता है। आत्मवित् आत्मा ही बन जाती है। इसमें रंचमात्र पर भी संदेह नहीं है। वेदांत के द्वारा प्रतिपादित इस सत्य की पुष्टि दूसरी पंक्ति में की गई है कि मुझ विराट स्वरूप परमात्मा को वे एकत्व भाव से? पृथक्करण भाव से और अन्य कई प्रकार से उपासते हैं। अब तक हमने जो विवेचन किया है उसे यहां प्रमाणित किया गया है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि जब ध्यानाभ्यास द्वारा मन प्रशांत हो जाता है? टैब एकमेव अनोखी आत्मा का अनुभव उसके शुद्ध स्वरूप में होता है। मिट्टी से बने विभिन्न प्रकार के घाटों में से एक ही मिट्टी को घाटों के रूप में देखना कितना आसान है? रंग और आकार उसकी मिट्टी के ज्ञान को नष्ट नहीं कर सकते। इसी प्रकार पारमार्थिक सत्य पर जो आलौकिक और मोहक नाम और आध्यास्त रूप हैं? वे ज्ञानी पुरुष की दृष्टि से सत्य को कभी भी आच्छादित नहीं कर सकते और न ही वे ऐसा करते हैं। सत्य के दृष्टांत ऋषि आत्मा को न केवल प्रत्येक व्यक्ति में पृथक्करण रूप से पहचाना जाता है? वर्ण जैसा कि यहां वेदांत के समर्थक भगवान श्रीकृष्ण उद्घोष करते हैं ज्ञानीजन सत्य को हर रूप में पहचानते हैं? जो विश्वतोमुख है अर्थात् मुख सर्वत्र हैं। यह सर्वथा कहता है कि मिट्टी का ज्ञाता मिट्टी के घाट से केवल दक्षिण या वाम भाग में ही पहचान है कि मिट्टी उस घाट में सर्वत्र व्याप्ति है और जहां मिट्टी है वहां वहां घाट भी नहीं है। यदि आत्मा की कमी हो? तो सृष्टि की विविधता की विशिष्टता या दर्शन कदापि संभव नहींयदि भिन्न सैद्धांतिक में हो सकता है? विभिन्न प्रकार से पूजा और आराधना की जाती है? तो वे सभी एक ही भगवान की पूजा कैसे कर सकते हैं।

भगवद  गीता अध्याय: 9
श्लोक 16

श्लोक:

( सर्वात्म रूप से प्रभाव सहित भगवान के स्वरूप का वर्णन )

अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम्‌।
मंत्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम्‌॥

भावार्थ:
क्रतु मैं हूँ, यज्ञ मैं हूँ, स्वधा मैं हूँ, औषधि मैं हूँ, मंत्र मैं हूँ, घृत मैं हूँ, अग्नि मैं हूँ और हवनरूप क्रिया भी मैं ही हूँ
9॥16॥

व्याख्या:

अपनी रुचि, श्रद्धा-विश्वासके किसी को भी साक्षात् परमात्मा का स्वरूप उसके साथ जुड़ा हुआ मिलता है तो वास्तव में यह संबंध सतके साथ ही है। केवल अपने मन-बुद्धिमें किञ्चिन्मात्र पर भी संदेह न हो। जैसे ज्ञानके द्वारा मनुष्य सब देश, काल, वस्तु, व्यक्ति आदिमें से एक परमात्मतत्त्वको ही जानता है। ईश्वर के अनुसार किसी वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति, क्रिया, आदिकि किञ्चिन्मात्र पर भी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है--इसमें कोई सन्देह नहीं होता। ऐसे ही भगवान विराट्रूपसे अनेक सिद्धांतों में प्रकट हो रहे हैं; मूलतः सब कुछ भगवान-ही-भगवान् हैं--इनमें इनको किञ्चिन्मात्रा पर भी सन्देह नहीं होना चाहिए। कारण कि 'ये सब भगवान कैसे हो सकते हैं?' यह संदेह साधक को वास्तविक तत्त्वसे, मुक्तिसे वंचित कर देता है और महान आफतमें खोखा देता है। मूलतः यह बात दृढ़ता से मन लें कि कार्य-करणरूपे स्थूल-सूक्ष्मरूप जो कुछ देखने, सुनने, समझने और समझने में आता है, वह सब केवल भगवान ही हैं।

जो वैदिक रीति से रचा गया है, वह 'क्रतु' होता है। वह क्रतु मैं ही हूं। जो स्मार्ट (पौराणिक) रीतिबद्ध जाय, वह 'यज्ञ' होता है, पंचमहायज्ञ आदि स्मार्ट-कर्म कहते हैं। वह यज्ञ मैं हूँ। पितरोंके लिए जो अन्न अर्पण किया जाता है, उसका प्रयोग स्वधा कहा जाता है। वह स्वधा मैं ही हूं। क्रतु, यज्ञ और स्वधाके के लिए आवश्यक है जो शाकल्य है अर्थात वनस्पतियां हैं, बूटियां हैं, तिल, जौ, छुहारा आदि औषधि है, वह औषधि भी मैं ही हूं। '

जिस मंत्र से क्रतु, यज्ञ और स्वधा की प्राप्ति होती है, वह मंत्र भी मैं ही हूं। यज्ञ आदि के लिए गो-घृत आवश्यक है, वह भी मैं ही हूं। जिस अग्नि में होम किया जाता है, वह अग्नि भी मैं हूं और होम जलाने की क्रिया भी मैं ही हूं।
वेदोंकी बताई गई जो विधि है, ठीक उसी प्रकार जानें 'वेद्य'। वैदिक और शास्त्रीय जो कुछ क्रतु, यज्ञ आदिका अनुष्ठान किया जाता है, वह विधि-विधान-संहित सांगोपाङ्ग की स्थापना करता है। मूलतः विधि-विधानको अन्वेषयोग्य सब बातें 'वेद्य' कहलाती हैं। वह वेद्य मेरा स्वरूप है।यज्ञ, दान और तप--ये तीन निष्काम पुरुषों को महान् पवित्र करनेवाले हैं--

इनमें से निष्कामभाव से जो क्रिया होती है, वह भी पवित्र हो जाता है। यह पवित्रता मेरा स्वरूप है।

क्रतु, यज्ञ आदिका अनुष्ठान करने के लिए जिन ऋचाओंका का उच्चारण किया जाता है, उन सबमें सबसे पहले का ही उच्चारण किया जाता है। इसका उच्चारण करने से ही ऋचाएँ अभी भी फल प्रदान करती हैं। वेदविद्या के यज्ञ, दान, तप आदि सभी क्रियाओं के उच्चारण ही प्रारंभ होते हैं।वैदिकोंके लिए प्रणवका उच्चारण मुख्य है। इसलिए भगवान ने प्रणवको अपना स्वरूप बताया है।

उन क्रतु, यज्ञ आदिकी विधि बताने वाले ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद - ये त्रिवेद हैं। जिसमें नियत अक्षरावाले मंत्रोच्चार ऋचाएँ होती हैं, उन ऋचाओंके साम्यवादियों को ऋग्वेद कहते हैं। जिसमें स्वरोंसहित गानों में आनेवाले मंत्र होते हैं, वे सभी मंत्र सामवेद कहलाते हैं। जिसमें अनियत अक्षरवाले मन्त्र होते हैं, वे मन्त्र 'यजुर्वेद' कहलाते हैं।वह भी भगवान ही हैं।ये सब त्रिवेदके भगवान ही के स्वरूप हैं।इस जद-चेतन, स्थावर-जंगम आदि संपूर्ण संसार को मैं ही उत्पन्न करता हूं।

ध्यान से देखे रक्षक के लिए: बार-बार अवतार लेकर मैं ही इसकी रक्षा करता हूँ। इसलिए मैं ' पिता' हूं। चौदहवें अध्यायके तांतलिसवें श्लोक में अर्जुनने भी कहा है कि 'आप ही इस चराचर जगतके पिता हैं'--'
इस संसार को हर तरह से मैं ही कायम रखता हूं और संसारमात्रका जो कुछ बनाता है, उस विधान को,बनाने वाला भी मैं हूं। इसलिए मैं हि इसका विश्लेषण करने वाला हूं।
वैसी-उस योनिमें वैसे-वैसे शरीरों का जन्म होनेवाली ' माता' मैं हूं अर्थात मैं संपूर्ण जगतकी माता हूं।समुद्र में ब्रह्माजी संपूर्ण रचनाकारों का जन्म हुआ है-- इस दृष्टि से ब्रह्माजी प्रजा के पिता हैं। वे ब्रह्माजी भी मेरे सामने प्रकट होते हैं-- इस दृष्टि से मैं ब्रह्माजीका पिता और प्रजाका ' पितामह' हूं। अर्जुनने भी भगवान्को ब्रह्माके आदिकर्ता कहा है--'शैतानके लिए जो सर्वोपरि प्रापणीय तत्त्व है, वह ' गति'-- स्वरूप मैं ही हूं। संसारमात्रका भरण-पोषण करनेवाला ' भर्ता  ' और संसारका स्वामी ' प्रभु' मैं ही हूँ। सब समय में सरकारी नौकरी ठीक तरह से देखने वाला ' साक्षी' मैं हूं। मेरे ही अंश होने से सभी जीव स्वरूपसे नित्य-निरंतर मेरे में ही रहते हैं, इसलिए वे सभी ' निवास'-- स्थान में ही हैं। जिसका आश्रय लिया जाता है, वह ' शरण' अर्थात शरणगतवत्सल मैं ही हूं। बिना कारण प्राणिमात्रका हित करने वाला ' सुहृद' अर्थात हितैषी भी मैं हूं।संपूर्ण संसार मुझसे ही उत्पन्न होता है और मुझमें ही लीन होता है, इसलिए मैं ' प्रभव' और ' प्रलय' हूं अर्थात संसारका निमित्तकारण और उपादनकारण हूं।

महाप्रलय होनेपर प्रकृतिसहित सारा संसार मेरेमें ही रहता है, इसलिए मैं संसारका ' स्थान'  हूं। संसारकी किरण सर्गअवस्था हो, प्रकृतिप्रलय-अवस्था हो, इन सभी प्रकृतियोंमें प्रकृति, संसार, जीव तथा जो कुछ देखने, सुनने, समझ में आता है, वह सबका-सब मुझमें ही रहता है, इसलिए मैं ' निधान' हूं। सांसारिक बीज तो वृक्षसे पैदा होता है और वृक्षको जन्म लेकर नष्ट हो जाता है जाना जाता है; लेकिन ये दोनों ही मेरे में दोष नहीं हैं। मैं अनादि हूं यानी पैदा होने वाला नहीं हूं और अनंत रचनाकार पैदा होकर भी वैसे ही रहते हैं। इसलिए मैं ' अव्यय बीज' हूं।अव्यय शब्द का मतलब होता है, 'जो व्यय न हो'. अव्यय शब्द ऐसे शब्द होते हैं जिनमें लिंग, वचन, पुरुष, कारक, काल इत्यादि के कारण कोई विकार उत्पन्न नहीं होता. अव्यय शब्द हर स्थिति में अपने मूलरूप में बने रहते हैं.
यहां :अव्यय: शब्द का मतलब होता है, 'जो व्यय न हो'. अव्यय शब्द ऐसे शब्द होते हैं जिनमें लिंग, वचन, पुरुष, कारक, काल इत्यादि के कारण कोई विकार उत्पन्न नहीं होता. अव्यय शब्द हर स्थिति में अपने मूलरूप में बने रहते हैं।

उक्त विचार पूर्व में भी एक प्रसिद्ध श्लोक में व्यक्त किया गया था। इस श्लोक में आत्मा की सर्वरूपता एवं सर्वात्मकता का बोध कराया गया है। कर्मकांड में कर्मानुष्ठान ही पूजा विधि बताई गई है। वेदों में उपदिष्ट यज्ञ कर्म को क्रतु तथा स्मृतिग्रंथों में कथित कर्म को ही यज्ञ कहा जाता है? इनका अनुष्ठान महाभारत काल में हुआ था। पितरों को दिया जाने वाला अन्न स्वधा व्यापारी है। अर्जुन को यहां उपदेश में बताया गया है कि ये सब क्रतु आदि मैं ही हूं। इतना ही नहीं वर्ण यज्ञकर्म में उपयुक्त औषधि? अग्नि में आहुति के रूप में अग्नि में जाने वाला घी (अज्यम्)? अग्नि? कर्म में उच्चारित मंत्र और आवास क्रिया ये सभी अलग-अलग सिद्धांतों में आत्मा की ही अभिव्यक्ति हैं। जब स्वर्ण से अनेक आभूषण बने रहते हैं? टेब स्वर्ण परिभाषा ही यह कह सकते हैं कि मैं कुंडल हूँ? मैं रिंग हूँ? मैं कांती हूँ? मैं इन सबकी चमका रहा हूँ आदि। इसी प्रकार? आत्मा ही सब सिद्धांत का? आदि का सारतत्त्व होने के कारण भगवान श्रीकृष्ण का कथन सैद्धांतिक बुद्धि से सभी अनुयायियों को जन्म देगा।

भगवद  गीता अध्याय: 9
श्लोक 17

श्लोक:
पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः।
वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव च॥

भावार्थ:
इस संपूर्ण जगत्‌ का धाता अर्थात्‌ धारण करने वाला एवं कर्मों के फल को देने वाला, पिता, माता, पितामह, जानने योग्य,  पवित्र ओंकार तथा ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद भी मैं ही हूँ
9॥17॥

व्याख्या:

जब आप की अपनी रुचि, श्रद्धा-विश्वासके किसी को भी साक्षात् परमात्मा के स्वरूप उसके साथ जुडी हुई मिलती है तो वास्तव में यह संबंध सत के साथ ही है। केवल अपने मन-बुद्धि में किञ्चिन्मात्र पर भी संदेह न हो। जैसे ज्ञानके द्वारा मनुष्य सब देश, काल, वस्तु, व्यक्ति आदिमें से एक परमात्मतत्त्वको ही जानता है। ईश्वर के सिद्धांत में किसी भी वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति, क्रिया, आदिकि किञ्चिन्मात्र पर भी संदेह नहीं होता है। ऐसे ही भगवान के इस विराट रूप से अनेक सिद्धांतों में प्रकट हो रहे हैं;

मूलतः सब कुछ भगवान्-ही-भगवान् हैं-

-इनमें कोई भी सन्देह नहीं होना चाहिए। कारण कि 'ये सब भगवान कैसे हो सकते हैं?

यह संदेह साधक को वास्तविक तत्त्वसे, मुक्तिसे वंचित कर देता है और महान आफत में धोखा ही देता है। मूलतः यह बात दृढ़ता से मांन लें कि कार्य-करणरूपे स्थूल-सूक्ष्मरूप जो कुछ देखने, सुनने, समझने और समझने में आता है, वह सब केवल भगवान ही हैं। इसी कार्यकरणरूपसे भगवान्की सर्वव्यापक का वर्णन  उन्नीसवें श्लोक में किया गया है।

जो वैदिक रीति से रचा गया है, वह 'क्रतु' होता है। वह क्रतु मैं ही हूं। जो स्मार्ट (पौराणिक) रीतिबद्ध जाय, वह यज्ञ होता है, पंचमहायज्ञ आदि स्मार्ट-कर्म कहते हैं। वह यज्ञ मैं हूँ। पितरोंके लिए जो अन्न अर्पण किया जाता है, उसका प्रयोग स्वधा कहा जाता है। वह स्वधा मैं ही हूं। 'क्रतु, यज्ञ और स्वधाके के लिए आवश्यक है जो शाकल्य है अर्थात् वनस्पतियां हैं, बूटियां हैं, तिल, जौ, छुहारा आदि औषधि है, वह औषधि भी मैं ही हूं।'जिस मंत्र से क्रतु, यज्ञ और स्वधा की प्राप्ति होती है, वह मंत्र भी मैं ही हूं। यज्ञ आदि के लिए गो-घृत आवश्यक है, वह भी मैं ही हूं। जिस अग्नि में होम किया जाता है, वह अग्नि भी मैं हूं और होम जलाने की क्रिया भी मैं ही हूं।
वेदोंकी बताई गई जो विधि है, ठीक उसी प्रकार जानें 'वेद्य'। वैदिक और शास्त्रीय जो कुछ क्रतु, यज्ञ आदिका अनुष्ठान किया जाता है, वह विधि-विधान-संहित सांगोपाङ्ग की स्थापना करता है। मूलतः विधि-विधानको अन्वेषयोग्य सब बातें 'वेद्य' कहलाती हैं। वह वेद्य मेरा स्वरूप है।
इस श्लोक में उक्त विचार पूर्व में भी एक प्रसिद्ध श्लोक में व्यक्त किया गया था। इस श्लोक में आत्मा की सर्वरूपता एवं सर्वात्मकता का बोध कराया गया है। कर्मकांड में कर्मानुष्ठान ही पूजा विधि बताई गई है। वेदों में उपदिष्ट यज्ञ कर्म को क्रतु तथा स्मृतिग्रंथों में कथित कर्म को ही यज्ञ कहा जाता है? इनका अनुष्ठान महाभारत काल में हुआ था। पितरों को दिया जाने वाला अन्न स्वधा व्यापारी है। अर्जुन को यहां उपदेश में बताया गया है कि ये सब क्रतु आदि मैं ही हूं। इतना ही नहीं वर्ण यज्ञकर्म में उपयुक्त औषधि? अग्नि में आहुति के रूप में अग्नि में जाने वाला घी (अज्यम्)? अग्नि? कर्म में उच्चारित मंत्र और आवास क्रिया ये सभी अलग-अलग सिद्धांतों में आत्मा की ही अभिव्यक्ति हैं। जब स्वर्ण से अनेक आभूषण बने रहते हैं? टेब स्वर्ण परिभाषा ही यह कह सकते हैं कि मैं कुंडल हूँ? मैं रिंग हूँ? मैं कांती हूँ? मैं इन सबकी चमका रहा हूँ आदि। इसी प्रकार? आत्मा ही सब सिद्धांत का? आदि का सारतत्त्व होने के कारण भगवान श्रीकृष्ण का कथन सैद्धांतिक बुद्धि से सभी अनुयायियों को जन्म देगा।सब कुछ पिछले श्लोक का ही अभ्यास है।

9॥17॥

भगवद  गीता अध्याय: 9
श्लोक 18

श्लोक:
गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्‌।
प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्‌॥

भावार्थ:
प्राप्त होने योग्य परम धाम, भरण-पोषण करने वाला, सबका स्वामी, शुभाशुभ का देखने वाला, सबका वासस्थान, शरण लेने योग्य, प्रत्युपकार न चाहकर हित करने वाला, सबकी उत्पत्ति-प्रलय का हेतु, स्थिति का आधार, निधान (प्रलयकाल में संपूर्ण भूत सूक्ष्म रूप से जिसमें लय होते हैं उसका नाम 'निधान' है) और अविनाशी कारण भी मैं ही हूँ
9॥18॥
आत्मस्वरूप का वर्णन करने वाले प्रसंग का ही यहाँ विस्तार है। आत्मा अधिष्ठान यह संपूर्ण दृश्यमान नानाविध जगत् का है? जो हमें आत्मअज्ञान की दशा में दिख रहा है। वास्तव में यह परम सत्य पर अध्यारोपित है। आत्मस्वरूप से तादात्म्य कर भगवान श्रीकृष्ण स्वयं का वर्णन अनेक सांकेतिक शब्दों द्वारा किया गया है। ऐसे में सारगर्भित शब्दों से निर्मित मंगलरूपी यह एक अत्युत्तम श्लोक है? जिस पर सभी साधकों को मनाना चाहिए। मैं गति हूं पूर्णत्व के अनुभव में हमारी सभी अपूर्णताएं नष्ट हो जाती हैं और उसके साथ ही अनादि काल से चली आ रही परम आनंद की हमारी खोज भी समाप्त हो जाती है। रज्जु (रस्सी) में मिथ्या सर्प को देखने वाले वास्तविक पुरुष को सूर्योदय और संतोष कहते हैं? जब रूबेला के ज्ञान से सारा ब्रह्मा की निवृत्ति होती है। दुःखपूर्ण अनुभूति होने वाले यह जगत् का अधिष्ठान आत्मा है। उस आत्मा का साक्षात्कार करने का अर्थ है संपूर्ण श्वासरोधक बंधनों के परे जाना। क्या पारमार्थिक ज्ञान को देखते हुए अन्य सभी ज्ञात बातें ज्ञात होती हैं? उसे यहाँ आत्मा के रूप में स्थापित किया गया है। मैं रेगिस्तान की तरह हूँ और उस मृगजल का आधार धारण करने वाला है? कौन सा एक पायसा व्यक्ति भ्रान्ति से दिखता है? वैसे ही? आत्मा विश्वास धारण करने वाला है। अपने सत्सन्स्वरूप से वह इन्द्रियगोचर वस्तु को सत्ता प्रदान करता है? और समस्त जापानी के प्रवाह को एक धारा में सम्मिलित किया गया है। इसका कारण यह है कि डोकलाम की अखंड धारा के रूप में हमें जीवन का अनुभव होता है। क्या प्रभु वास्तव में सभी व्यावसायिक डिग्री प्राप्त कर रहे हैं? परन्तु वे स्वयं जड़वत के कारण यह स्पष्ट होता है कि उन्हें चेतना किसी अन्य से प्राप्त हुई है। वह चेतन तत्त्व आत्मा है। उनके अभाव में डिग्रीयाँ कर्म में अव्यवस्थित हैं इसलिए यह आत्मा ही उनका प्रभु अर्थात् स्वामी है। मुख्य साक्षी हूँ तथापि आत्मा चैतन्य स्वरूप होने के कारण जड़त्वों को चेतना प्रदान करता है? तथापि वह स्वयं संसार के आलौकिक और भ्रांतिजन्य सुखों एवं दुखों के परे होता है। यह दृश्य जगत् को आत्मा से ही अनुभव प्राप्त हुआ है? परन्तु स्वयं आत्मा साक्षात्कार है। साक्षियों का कहना है कि कौन सी घटना किस घटना को प्रत्यक्ष रूप से देखती है? परन्तु उसकी घटना से किसी प्रकार का सम्बन्ध नहीं होता। बिना किसी राग या द्वेष के वह वह घटना देखने को मिलती है। जब किसी व्यक्ति की उपस्थिति में कोई घटना स्वयं हो जाती है? टैब वह व्यक्तिपरक उनके वैज्ञानिक विशेषज्ञ हैं। अनंत आत्मा साक्षात् है? क्योंकि वह स्वयं अलिप्त बुद्धि के अंतपुर में है? मन की रंगभूमि? शरीर के सौंदर्य जगत का निवास स्थान आत्मा है। सड़क के किनारे किसी खंभे पर यात्रियों ने दांत निकाले हुए भूत को देखा? कुछ अन्य लोगों ने मंदस्मति भूत को देखा? तो फिर वही पर एक नग्न विकराल भूत को देखा? जिसका मुँह खून से सना हुआ था और ज़िंदा चमक रही थी? उसी प्रकार कुछ अन्य लोग भी थे? अवांछित वस्त्र धारण करते हुए पूछे गए भूत को देखा? जो प्रेम उन्हें सही मार्ग दर्शन दे रहा था। एक ही स्तम्भ पर उन सभी लोगों ने अपनी-अपनी कृतियों की कल्पनाओं का विमोचन किया था। स्वाभाविक है कि? वह स्थाणु उन सभी प्रकार के भूतों का निवास कहलायेगा। इसी प्रकार कहाँ भी हमारी इंद्रियों और मन को बहुविध दृश्य जगत का आभास होता है? उन सबके लिए आत्मा ही अनुभूति और सुरक्षा का निवास हश्रणम् मोह? शोकको जन्म देता है? जबकि ज्ञान आनंद का रहस्य है। मोहजनित होने का कारण यह संसार दुःखपूर्ण है। विक्षुब्ध संसार सागर की पर्वताकार तरंगों पर दुःख पा रहे आध्यात्मिक जीव के लिए जगत् के अधिष्ठान आत्मा का बोध शांति का शरण स्थल है। एक बार आत्मा शरीर? मन और बुद्धि के साथ तादात्म्य कर भौतिक जीव भाव को प्राप्त करने के लिए बाह्य जगत् में क्रीड़ा की जाती है? तब वह सागर तट की सुरक्षा से दूर तूफानी समुद्र में भटक जाता है। जीव की इस खंडहर नाव को जब सब ओर से स्वामित्व और स्वामित्व दिया जाता है? ऊपर घिरती हुई काली घटाएँ? नीचे उछालता हुआ क्रुद्ध सागर? और चारों ओर भयंकर गर्जन हुआ समुद्री जहाज़ के लिए केवल एक ही शरणस्थल राह है? और वह शांत स्थान है आत्मा आत्मा का शैक्षिक वर्णन सत्य के विषय में ऐसी धारणा को जन्म देता है मानो वह सत्य शून्य है या एक अत्यंत प्रतिष्ठित देवता है? या एक अप्राप्त पूर्णत्व है। अर्जुन जैसे भावुक साधकों के कोमल हृदय से इस प्रकार की धारणाओं का प्रचार करने के लिए क्या वह सनातन सत्य है? मानव के प्रिय मित्र श्रीकृष्ण के रूप में स्वयं का परिचय देते हुए अब मानवोचित शब्दों का प्रयोग करते हैं। मैं मित्र हूं अनंत परमात्मा परिच्छिन्न जीव का मित्र है। यह मित्रता नमस्कार तक ही सीमित नहीं है? वर्ण उसकी आतुरता आपके मित्र की सुरक्षा और कल्याण के लिए है। प्रत्युपकार की विशेषज्ञता वाले मित्र के बिना उपकार करने वाला मनुष्य सुहृत व्यापारी है।मैं प्रभाव? प्रलय? स्थान और निवास हूँ जैसे आभूषणों में सोने और घाटों में मिट्टी है? वैसे ही आत्मा संपूर्ण विश्व में है। इसलिए सभी की उत्पत्ति? स्थिति और लय स्थान कहाँ हो सकता है। इसी कारण से उसे यहाँ निधान कहा गया है? क्योंकि सभी का नाम? रूप एवं गुण समान में निहित रहते हैं। लेकिन यह बीज सामान्य से सर्वथा भिन्न है। आत्मा निःदेह ही इस संसार वृक्ष का बीज है? इस वृक्ष की उत्पत्ति में स्वयं आत्मा का अनुभव प्राप्त नहीं होता है? क्योंकि वह अव्यय स्वरूप है। यह धारणा कि सनातन सत्य अध्ययन को प्राप्त होकर यह सृष्ट जगत् बन गया है? मनुष्य की तर्क बुद्धि को एक कलंक और वेदांत ऐसी अपूर्णता अयुक्तिक धारणा को ठीक करता है? लेकिन द्वैतवादी इस सिद्धांत का समर्थन कैसे करते हैं? अन्यथा उनके तर्कों का महल ही धराशायी तारा चर्चुर हो जाएगा? जैसे शरद ऋतु के आकाश में निर्मित मेघों का किला अलग हो जाता है। पहले कैसे भुगतान किया जाए? यह श्लोक सरल सरल सारगर्भित शब्द से पूर्ण है? जिसमें प्रत्येक शब्द साधक के मनन के लिए छायावृत मार्ग है? जिस पर मज़ेदार साहसिक कार्य करते हुए सत्य के द्वार तक पहुंचा जा सकता है। भगवान आगे कहते हैं--शान्त स्थान क्या है? या एक अप्राप्त पूर्णत्व है। अर्जुन जैसे भावुक साधकों के कोमल हृदय से इस प्रकार की धारणाओं का प्रचार करने के लिए क्या वह सनातन सत्य है? मानव के प्रिय मित्र श्रीकृष्ण के रूप में स्वयं का परिचय देते हुए अब मानवोचित शब्दों का प्रयोग करते हैं। मैं मित्र हूं अनंत परमात्मा परिच्छिन्न जीव का मित्र है। यह मित्रता नमस्कार तक ही सीमित नहीं है? वर्ण उसकी आतुरता आपके मित्र की सुरक्षा और कल्याण के लिए है। प्रत्युपकार की विशेषज्ञता वाले मित्र के बिना उपकार करने वाला मनुष्य सुहृत व्यापारी है।मैं प्रभाव? प्रलय? स्थान और निवास हूँ जैसे आभूषणों में सोने और घाटों में मिट्टी है? वैसे ही आत्मा संपूर्ण विश्व में है। इसलिए सभी की उत्पत्ति? स्थिति और लय स्थान कहाँ हो सकता है। इसी कारण से उसे यहाँ निधान कहा गया है? क्योंकि सभी का नाम? रूप एवं गुण समान में निहित रहते हैं। लेकिन यह बीज सामान्य से सर्वथा भिन्न है। आत्मा निःदेह ही इस संसार वृक्ष का बीज है? इस वृक्ष की उत्पत्ति में स्वयं आत्मा का अनुभव प्राप्त नहीं होता है? क्योंकि वह अव्यय स्वरूप है। यह धारणा कि सनातन सत्य अध्ययन को प्राप्त होकर यह सृष्ट जगत् बन गया है? मनुष्य की तर्क बुद्धि को एक कलंक और वेदांत ऐसी अपूर्णता अयुक्तिक धारणा को ठीक करता है? द्वैतवादी इस सिद्धांत का समर्थन कैसे करते हैं? अन्यथा उनके तर्कों का महल ही धराशायी तारा चर्चुर हो जाएगा? जैसे शरद ऋतु के आकाश में निर्मित मेघों का किला अलग हो जाता है। पहले कैसे भुगतान किया जाए? यह श्लोक सरल सरल सारगर्भित शब्द से पूर्ण है? जिसमें प्रत्येक शब्द साधक के मनन के लिए छायावृत मार्ग है? जिस पर मज़ेदार साहसिक कार्य करते हुए सत्य के द्वार तक पहुंचा जा सकता है। भगवान आगे कहते हैं--शान्त स्थान क्या है? या एक अप्राप्त पूर्णत्व है। अर्जुन जैसे भावुक साधकों के कोमल हृदय से इस प्रकार की धारणाओं का प्रचार करने के लिए क्या वह सनातन सत्य है? मानव के प्रिय मित्र श्रीकृष्ण के रूप में स्वयं का परिचय देते हुए अब मानवोचित शब्दों का प्रयोग करते हैं। मैं मित्र हूं अनंत परमात्मा परिच्छिन्न जीव का मित्र है। यह मित्रता नमस्कार तक ही सीमित नहीं है? वर्ण उसकी आतुरता आपके मित्र की सुरक्षा और कल्याण के लिए है। प्रत्युपकार की विशेषज्ञता वाले मित्र के बिना उपकार करने वाला मनुष्य सुहृत व्यापारी है।मैं प्रभाव? प्रलय? स्थान और निवास हूँ जैसे आभूषणों में सोने और घाटों में मिट्टी है? वैसे ही आत्मा संपूर्ण विश्व में है। इसलिए सभी की उत्पत्ति? स्थिति और लय स्थान कहाँ हो सकता है। इसी कारण से उसे यहाँ निधान कहा गया है? क्योंकि सभी का नाम? रूप एवं गुण समान में निहित रहते हैं। लेकिन यह बीज सामान्य से सर्वथा भिन्न है। आत्मा निःदेह ही इस संसार वृक्ष का बीज है? इस वृक्ष की उत्पत्ति में स्वयं आत्मा का अनुभव प्राप्त नहीं होता है? क्योंकि वह अव्यय स्वरूप है। यह धारणा कि सनातन सत्य अध्ययन को प्राप्त होकर यह सृष्ट जगत् बन गया है? मनुष्य की तर्क बुद्धि को एक कलंक और वेदांत ऐसी अपूर्णता अयुक्तिक धारणा को ठीक करता है? द्वैतवादी इस सिद्धांत का समर्थन कैसे करते हैं? अन्यथा उनके तर्कों का महल ही धराशायी तारा चर्चुर हो जाएगा? जैसे शरद ऋतु के आकाश में निर्मित मेघों का किला अलग हो जाता है। पहले कैसे भुगतान किया जाए? यह श्लोक सरल सरल सारगर्भित शब्द से पूर्ण है? जिसमें प्रत्येक शब्द साधक के मनन के लिए छायावृत मार्ग है? जिस पर मज़ेदार साहसिक कार्य करते हुए सत्य के द्वार तक पहुंचा जा सकता है। भगवान आगे कहते हैं--तर्क बुद्धि को एक कलंक है और वेदांत ऐसी दोषपूर्ण अप्राकृतिक धारणा को ठीक करता है? द्वैतवादी इस सिद्धांत का समर्थन कैसे करते हैं? अन्यथा उनके तर्कों का महल ही धराशायी तारा चर्चुर हो जाएगा? जैसे शरद ऋतु के आकाश में निर्मित मेघों का किला अलग हो जाता है। पहले कैसे भुगतान किया जाए? यह श्लोक सरल सरल सारगर्भित शब्द से पूर्ण है? जिसमें प्रत्येक शब्द साधक के मनन के लिए छायावृत मार्ग है? जिस पर मज़ेदार साहसिक कार्य करते हुए सत्य के द्वार तक पहुंचा जा सकता है। भगवान आगे कहते हैं--तर्क बुद्धि के द्वारा सत्य के द्वार तक पहुंचा जा सकता है।

आत्मस्वरूप का वर्णन करने वाले प्रसंग का ही यहाँ विस्तार है। आत्मा अधिष्ठान यह संपूर्ण दृश्यमान नानाविध जगत् का है? जो हमें आत्मअज्ञान की दशा में दिख रहा है। वास्तव में यह परम सत्य पर अध्यारोपित है। आत्मस्वरूप से तादात्म्य कर भगवान श्रीकृष्ण स्वयं का वर्णन अनेक सांकेतिक शब्दों द्वारा किया गया है। ऐसे में सारगर्भित शब्दों से निर्मित मंगलरूपी यह एक अत्युत्तम श्लोक है? जिस पर सभी साधकों को मनाना चाहिए। मैं गति हूं पूर्णत्व के अनुभव में हमारी सभी अपूर्णताएं नष्ट हो जाती हैं और उसके साथ ही अनादि काल से चली आ रही परम आनंद की हमारी खोज भी समाप्त हो जाती है। रज्जु (रस्सी) में मिथ्या सर्प को देखने वाले वास्तविक पुरुष को सूर्योदय और संतोष कहते हैं? जब रूबेला के ज्ञान से सारा ब्रह्मा की निवृत्ति होती है। दुःखपूर्ण अनुभूति होने वाले यह जगत् का अधिष्ठान आत्मा है। उस आत्मा का साक्षात्कार करने का अर्थ है संपूर्ण श्वासरोधक बंधनों के परे जाना। क्या पारमार्थिक ज्ञान को देखते हुए अन्य सभी ज्ञात बातें ज्ञात होती हैं? उसे यहाँ आत्मा के रूप में स्थापित किया गया है। मैं रेगिस्तान की तरह हूँ और उस मृगजल का आधार धारण करने वाला है? कौन सा एक पायसा व्यक्ति भ्रान्ति से दिखता है? वैसे ही? आत्मा विश्वास धारण करने वाला है। अपने सत्सन्स्वरूप से वह इन्द्रियगोचर वस्तु को सत्ता प्रदान करता है? और समस्त जापानी के प्रवाह को एक धारा में सम्मिलित किया गया है। इसका कारण यह है कि डोकलाम की अखंड धारा के रूप में हमें जीवन का अनुभव होता है। क्या प्रभु वास्तव में सभी व्यावसायिक डिग्री प्राप्त कर रहे हैं? परन्तु वे स्वयं जड़वत के कारण यह स्पष्ट होता है कि उन्हें चेतना किसी अन्य से प्राप्त हुई है। वह चेतन तत्त्व आत्मा है। उनके अभाव में डिग्रीयाँ कर्म में अव्यवस्थित हैं इसलिए यह आत्मा ही उनका प्रभु अर्थात् स्वामी है। मुख्य साक्षी हूँ तथापि आत्मा चैतन्य स्वरूप होने के कारण जड़त्वों को चेतना प्रदान करता है? तथापि वह स्वयं संसार के आलौकिक और भ्रांतिजन्य सुखों एवं दुखों के परे होता है। यह दृश्य जगत् को आत्मा से ही अनुभव प्राप्त हुआ है? परन्तु स्वयं आत्मा साक्षात्कार है। साक्षियों का कहना है कि कौन सी घटना किस घटना को प्रत्यक्ष रूप से देखती है? परन्तु उसकी घटना से किसी प्रकार का सम्बन्ध नहीं होता। बिना किसी राग या द्वेष के वह वह घटना देखने को मिलती है। जब किसी व्यक्ति की उपस्थिति में कोई घटना स्वयं हो जाती है? टैब वह व्यक्तिपरक उनके वैज्ञानिक विशेषज्ञ हैं। अनंत आत्मा साक्षात् है? क्योंकि वह स्वयं अलिप्त बुद्धि के अंतपुर में है? मन की रंगभूमि? शरीर के सौंदर्य जगत का निवास स्थान आत्मा है। सड़क के किनारे किसी खंभे पर यात्रियों ने दांत निकाले हुए भूत को देखा? कुछ अन्य लोगों ने मंदस्मति भूत को देखा? तो फिर वही पर एक नग्न विकराल भूत को देखा? जिसका मुँह खून से सना हुआ था और ज़िंदा चमक रही थी? उसी प्रकार कुछ अन्य लोग भी थे? अवांछित वस्त्र धारण करते हुए पूछे गए भूत को देखा? जो प्रेम उन्हें सही मार्ग दर्शन दे रहा था। एक ही स्तम्भ पर उन सभी लोगों ने अपनी-अपनी कृतियों की कल्पनाओं का विमोचन किया था। स्वाभाविक है कि? वह स्थाणु उन सभी प्रकार के भूतों का निवास कहलायेगा। इसी प्रकार कहाँ भी हमारी इंद्रियों और मन को बहुविध दृश्य जगत का आभास होता है? उन सबके लिए आत्मा ही अनुभूति और सुरक्षा का निवास हश्रणम् मोह? शोकको जन्म देता है? जबकि ज्ञान आनंद का रहस्य है। मोहजनित होने का कारण यह संसार दुःखपूर्ण है। विक्षुब्ध संसार सागर की पर्वताकार तरंगों पर दुःख पा रहे आध्यात्मिक जीव के लिए जगत् के अधिष्ठान आत्मा का बोध शांति का शरण स्थल है। एक बार आत्मा शरीर? मन और बुद्धि के साथ तादात्म्य कर भौतिक जीव भाव को प्राप्त करने के लिए बाह्य जगत् में क्रीड़ा की जाती है? तब वह सागर तट की सुरक्षा से दूर तूफानी समुद्र में भटक जाता है। जीव की इस खंडहर नाव को जब सब ओर से स्वामित्व और स्वामित्व दिया जाता है? ऊपर घिरती हुई काली घटाएँ? नीचे उछालता हुआ क्रुद्ध सागर? और चारों ओर भयंकर गर्जन हुआ समुद्री जहाज़ के लिए केवल एक ही शरणस्थल राह है? और वह शांत स्थान है आत्मा आत्मा का शैक्षिक वर्णन सत्य के विषय में ऐसी धारणा को जन्म देता है मानो वह सत्य शून्य है या एक अत्यंत प्रतिष्ठित देवता है? या एक अप्राप्त पूर्णत्व है। अर्जुन जैसे भावुक साधकों के कोमल हृदय से इस प्रकार की धारणाओं का प्रचार करने के लिए क्या वह सनातन सत्य है? मानव के प्रिय मित्र श्रीकृष्ण के रूप में स्वयं का परिचय देते हुए अब मानवोचित शब्दों का प्रयोग करते हैं। मैं मित्र हूं अनंत परमात्मा परिच्छिन्न जीव का मित्र है। यह मित्रता नमस्कार तक ही सीमित नहीं है? वर्ण उसकी आतुरता आपके मित्र की सुरक्षा और कल्याण के लिए है। प्रत्युपकार की विशेषज्ञता वाले मित्र के बिना उपकार करने वाला मनुष्य सुहृत व्यापारी है।मैं प्रभाव? प्रलय? स्थान और निवास हूँ जैसे आभूषणों में सोने और घाटों में मिट्टी है? वैसे ही आत्मा संपूर्ण विश्व में है। इसलिए सभी की उत्पत्ति? स्थिति और लय स्थान कहाँ हो सकता है। इसी कारण से उसे यहाँ निधान कहा गया है? क्योंकि सभी का नाम? रूप एवं गुण समान में निहित रहते हैं। लेकिन यह बीज सामान्य से सर्वथा भिन्न है। आत्मा निःदेह ही इस संसार वृक्ष का बीज है? इस वृक्ष की उत्पत्ति में स्वयं आत्मा का अनुभव प्राप्त नहीं होता है? क्योंकि वह अव्यय स्वरूप है। यह धारणा कि सनातन सत्य अध्ययन को प्राप्त होकर यह सृष्ट जगत् बन गया है? मनुष्य की तर्क बुद्धि को एक कलंक और वेदांत ऐसी अपूर्णता अयुक्तिक धारणा को ठीक करता है? लेकिन द्वैतवादी इस सिद्धांत का समर्थन कैसे करते हैं? अन्यथा उनके तर्कों का महल ही धराशायी तारा चर्चुर हो जाएगा? जैसे शरद ऋतु के आकाश में निर्मित मेघों का किला अलग हो जाता है। पहले कैसे भुगतान किया जाए? यह श्लोक सरल सरल सारगर्भित शब्द से पूर्ण है? जिसमें प्रत्येक शब्द साधक के मनन के लिए छायावृत मार्ग है? जिस पर मज़ेदार साहसिक कार्य करते हुए सत्य के द्वार तक पहुंचा जा सकता है। भगवान आगे कहते हैं--शान्त स्थान क्या है? या एक अप्राप्त पूर्णत्व है। अर्जुन जैसे भावुक साधकों के कोमल हृदय से इस प्रकार की धारणाओं का प्रचार करने के लिए क्या वह सनातन सत्य है? मानव के प्रिय मित्र श्रीकृष्ण के रूप में स्वयं का परिचय देते हुए अब मानवोचित शब्दों का प्रयोग करते हैं। मैं मित्र हूं अनंत परमात्मा परिच्छिन्न जीव का मित्र है। यह मित्रता नमस्कार तक ही सीमित नहीं है? वर्ण उसकी आतुरता आपके मित्र की सुरक्षा और कल्याण के लिए है। प्रत्युपकार की विशेषज्ञता वाले मित्र के बिना उपकार करने वाला मनुष्य सुहृत व्यापारी है।मैं प्रभाव? प्रलय? स्थान और निवास हूँ जैसे आभूषणों में सोने और घाटों में मिट्टी है? वैसे ही आत्मा संपूर्ण विश्व में है। इसलिए सभी की उत्पत्ति? स्थिति और लय स्थान कहाँ हो सकता है। इसी कारण से उसे यहाँ निधान कहा गया है? क्योंकि सभी का नाम? रूप एवं गुण समान में निहित रहते हैं। लेकिन यह बीज सामान्य से सर्वथा भिन्न है। आत्मा निःदेह ही इस संसार वृक्ष का बीज है? इस वृक्ष की उत्पत्ति में स्वयं आत्मा का अनुभव प्राप्त नहीं होता है? क्योंकि वह अव्यय स्वरूप है। यह धारणा कि सनातन सत्य अध्ययन को प्राप्त होकर यह सृष्ट जगत् बन गया है? मनुष्य की तर्क बुद्धि को एक कलंक और वेदांत ऐसी अपूर्णता अयुक्तिक धारणा को ठीक करता है? द्वैतवादी इस सिद्धांत का समर्थन कैसे करते हैं? अन्यथा उनके तर्कों का महल ही धराशायी तारा चर्चुर हो जाएगा? जैसे शरद ऋतु के आकाश में निर्मित मेघों का किला अलग हो जाता है। पहले कैसे भुगतान किया जाए? यह श्लोक सरल सरल सारगर्भित शब्द से पूर्ण है? जिसमें प्रत्येक शब्द साधक के मनन के लिए छायावृत मार्ग है? जिस पर मज़ेदार साहसिक कार्य करते हुए सत्य के द्वार तक पहुंचा जा सकता है। भगवान आगे कहते हैं--शान्त स्थान क्या है? या एक अप्राप्त पूर्णत्व है। अर्जुन जैसे भावुक साधकों के कोमल हृदय से इस प्रकार की धारणाओं का प्रचार करने के लिए क्या वह सनातन सत्य है? मानव के प्रिय मित्र श्रीकृष्ण के रूप में स्वयं का परिचय देते हुए अब मानवोचित शब्दों का प्रयोग करते हैं। मैं मित्र हूं अनंत परमात्मा परिच्छिन्न जीव का मित्र है। यह मित्रता नमस्कार तक ही सीमित नहीं है? वर्ण उसकी आतुरता आपके मित्र की सुरक्षा और कल्याण के लिए है। प्रत्युपकार की विशेषज्ञता वाले मित्र के बिना उपकार करने वाला मनुष्य सुहृत व्यापारी है।मैं प्रभाव? प्रलय? स्थान और निवास हूँ जैसे आभूषणों में सोने और घाटों में मिट्टी है? वैसे ही आत्मा संपूर्ण विश्व में है। इसलिए सभी की उत्पत्ति? स्थिति और लय स्थान कहाँ हो सकता है। इसी कारण से उसे यहाँ निधान कहा गया है? क्योंकि सभी का नाम? रूप एवं गुण समान में निहित रहते हैं। लेकिन यह बीज सामान्य से सर्वथा भिन्न है। आत्मा निःदेह ही इस संसार वृक्ष का बीज है? इस वृक्ष की उत्पत्ति में स्वयं आत्मा का अनुभव प्राप्त नहीं होता है? क्योंकि वह अव्यय स्वरूप है। यह धारणा कि सनातन सत्य अध्ययन को प्राप्त होकर यह सृष्ट जगत् बन गया है? मनुष्य की तर्क बुद्धि को एक कलंक और वेदांत ऐसी अपूर्णता अयुक्तिक धारणा को ठीक करता है? द्वैतवादी इस सिद्धांत का समर्थन कैसे करते हैं? अन्यथा उनके तर्कों का महल ही धराशायी तारा चर्चुर हो जाएगा? जैसे शरद ऋतु के आकाश में निर्मित मेघों का किला अलग हो जाता है। पहले कैसे भुगतान किया जाए? यह श्लोक सरल सरल सारगर्भित शब्द से पूर्ण है? जिसमें प्रत्येक शब्द साधक के मनन के लिए छायावृत मार्ग है? जिस पर मज़ेदार साहसिक कार्य करते हुए सत्य के द्वार तक पहुंचा जा सकता है। भगवान आगे कहते हैं--तर्क बुद्धि को एक कलंक है और वेदांत ऐसी दोषपूर्ण अप्राकृतिक धारणा को ठीक करता है? द्वैतवादी इस सिद्धांत का समर्थन कैसे करते हैं? अन्यथा उनके तर्कों का महल ही धराशायी तारा चर्चुर हो जाएगा? जैसे शरद ऋतु के आकाश में निर्मित मेघों का किला अलग हो जाता है। पहले कैसे भुगतान किया जाए? यह श्लोक सरल सरल सारगर्भित शब्द से पूर्ण है? जिसमें प्रत्येक शब्द साधक के मनन के लिए छायावृत मार्ग है? जिस पर मज़ेदार साहसिक कार्य करते हुए सत्य के द्वार तक पहुंचा जा सकता है। भगवान आगे कहते हैं--तर्क बुद्धि को एक कलंक है और वेदांत ऐसी दोषपूर्ण अप्राकृतिक धारणा को ठीक करता है? द्वैतवादी इस सिद्धांत का समर्थन कैसे करते हैं? अन्यथा उनके तर्कों का महल ही धराशायी तारा चर्चुर हो जाएगा? जैसे शरद ऋतु के आकाश में निर्मित मेघों का किला अलग हो जाता है। पहले कैसे भुगतान किया जाए? यह श्लोक सरल सरल सारगर्भित शब्द से पूर्ण है? जिसमें प्रत्येक शब्द साधक के मनन के लिए छायावृत मार्ग है? जिस पर मज़ेदार साहसिक कार्य करते हुए सत्य के द्वार तक पहुंचा जा सकता है। भगवान आगे कहते हैं--


भगवद  गीता अध्याय: 9

श्लोक 19


श्लोक:

तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्‌णाम्युत्सृजामि च।

 अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन॥


भावार्थ:

मैं ही सूर्यरूप से तपता हूँ, वर्षा का आकर्षण करता हूँ और उसे बरसाता हूँ। हे अर्जुन! मैं ही अमृत और मृत्यु हूँ और सत्‌-असत्‌ भी मैं ही हूँ

 9॥19॥

मैं तपता हूँ विद्युत् का यह कथन उपयुक्त होगा कि वह उष्णता (हीटर) में है? बल्ब में लाइट और कोल्ड (फ्रीज़) में शीतलता बाजार है क्योंकि इन उपकरणों में विद्युत् ही उष्णता आदि के रूप में प्रयोग किया जाता है। इसी प्रकार? एक सत्सरूप आत्मा दृश्य प्रकृति की एक सूर्य वस्तु के साथ तादात्म्य कर समस्त जगत की उष्णता का स्रोत बन गया है। सूर्य के प्रभाव को समझना है। प्राचीन ऋषियों को भी प्रकृति के स्वभाव एवं व्यवहार का पूर्ण ज्ञान था। क्या आप जानते हैं कि सूर्य की स्थिति क्या है? दशा प्रारूप जलवायु को निश्चित करता है? जो जगत के लिए कभी शोभा या अभिशाप बनकर आता है। पृथ्वी के प्रत्येक प्राणी के अनुभव क्षेत्र को सूर्य नियन्त्रित एवं प्रभावित करता है? क्योंकि वह जलवायु का नियामक है। यदि सूर्य की उष्णता में कुछ अंशों की वृद्धि हो जाये? तो विश्व की संपूर्ण वनस्पति और पशु जीवन में परिवर्तन हो जाएगा। वही प्रकार? यदि सूर्य अपनी कैलोरी ऊर्जा को कम कर दे? तो उसका होने वाला परिवर्तन इतना अधिक होगा कि वर्तमान जगत का रूप ही सर्वथा परिवर्तित हो जायेगा। आख़िर ही? उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव से गति टैटू रेखा की ओर होगी और नायिका को बलात पृथ्वी के मध्य भाग में खींच कर ले आएगी? जहाँ पर संविधान के दबाव और पर्याप्त मात्रा में अन्न के अभाव में दुःख ही दुःख होगा मैं अमृत और मृत्यु हूँ मृत्यु का अर्थ परिवर्तन है। चैतन्य के बिना इस परिवर्तनशील जगत् की न सत्ता है और न भान। अत: यहां कहा गया है कि मैं मृत्यु पर हूं। पुन्न? इन जर्मन का कौन सा प्रकाशक आत्मा है? इसका उल्टा होना ही चाहिए। वह आत्मा अमृत है। आत्मा स्वयं अमृत जीवित मृत्यु को प्रकाशित करती है। उसका कोई अनुभव नहीं हो सकता। आत्यंतिक अभाव को जानना या अनुभव करना असंभव है? जहां कहीं हमें अभाव का ज्ञान होता है, उसी रूप में होता है कि अमुक वस्तु का अभाव है, इस अत्यंत सूक्ष्म सिद्धांत के अतिरिक्त इन दो शब्दों में सत् और असत् का सरल अभिप्राय भी है। इंद्रियगोचर? स्थिर व्यक्ति वस्तु को सत् तथा सूक्ष्म? अव्यक्त वस्तु को असत् कहा जाता है। या सत और असत् शब्द से जुड़े कार्य और कारण को भी वेदांत में सूचित किया जाता है। प्रकाशक चैतन्य आत्मा के बिना सत् (बाह्य विषय) और असत् (मन की विचार धारा) का ज्ञान नहीं हो सकता। यहाँ कहा गया है कि इन दोनों का मूल स्वरूप आत्मा है। मिट्टी के बिना घाटों का कोई अनुभव नहीं होता? क्या यह दावा सभी आकारों का हो सकता है? मैं ही हूं। ध्यान के आसन पर साधकों के लिए श्लोक जीवनपर्यंत प्रेरणादायक बन सकते हैं। क्या यह अज्ञानी लोग सकाम भावना से ईश्वर की पूजा करते हैं? वे अपने इष्टफल को प्राप्त करते हैं। भगवान् कैसे कहते हैं -- आगे

9॥19॥


भगवद  गीता अध्याय: 9

श्लोक 20


श्लोक:

( सकाम और निष्काम उपासना का फल) 

 त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापायज्ञैरिष्ट्‍वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते।

 ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकमश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान्‌॥


भावार्थ:

तीनों वेदों में विधान किए हुए सकाम कर्मों को करने वाले, सोम रस को पीने वाले, पापरहित पुरुष (यहाँ स्वर्ग प्राप्ति के प्रतिबंधक देव ऋणरूप पाप से पवित्र होना समझना चाहिए) मुझको यज्ञों के द्वारा पूजकर स्वर्ग की प्राप्ति चाहते हैं, वे पुरुष अपने पुण्यों के फलरूप स्वर्गलोक को प्राप्त होकर स्वर्ग में दिव्य देवताओं के भोगों को भोगते हैं

 9॥20॥


व्याख्या:


संसार के मानव कल्याण यहां के भोगों में ही लगे रहते हैं वे जो भी विशेष बुद्धि कहलाते हैं, उनके हृदयमें भी उत्पत्ति-विनाशशील पदार्थका महत्वपूर्ण जीव के कारण जब वे रुक, साम और यजुः--इन तीनों वेदों में कहे हुए सकाम कर्मों का तथा उनके फल का वर्णन करते हैं, तब वे (वेदों में आस्तिकभाव होने के कारण) यहां के भोगों की इतनी चिंता न करके स्वर्ग के भोगों के लिए ललचा गए हैं और स्वर्ग प्राप्ति के लिए वेदों में कहे गए यज्ञों के अनुष्ठानमें लग जाते हैं। ऐसे सिद्धांत के लिए यहां 'त्रैविद्याः' पद आया है।


सोमलता या सोमवल्ली नामकी एक लता है। उनके विषय में शास्त्रों में बताया गया है कि प्रतिदिन चन्द्रमा की एक-एक कला बढ़ती-बढ़ती पूर्णिमा को कलाएँ पूर्ण हो जाती हैं। एक-एक फूल-निकलते पूर्णिमातक फूल-पत्ते निकल जाते हैं और कृष्णपक्ष में प्रतिदिन एक-एक पत्ता-पत्थर-गिरते पूर्णिमातक पूरे पत्ते गिर जाते हैं।

वहीं सोमलता के रसको सोमरस भी कहते हैं। यज्ञ करनेवाले ने कहा कि सोमरस को वैदिक मंत्रोंके द्वारा अभिमंत्रित किया जाता है, इसलिए 'सोमपाः' कहा गया है।

सोमपाः का अर्थ है "सोमरस पीने वाला" या "सोमरस का सेवन करने वाला"। यह शब्द वैदिक यज्ञों में सोमरस के महत्व को दर्शाता है।


सोमपाः शब्द का भाव यह है कि जो व्यक्ति सोमरस को पीता है या उसका सेवन करता है, वह वैदिक मंत्रों और यज्ञों के माध्यम से परमात्मा के साथ जुड़ता है और आध्यात्मिक शक्ति और ज्ञान प्राप्त करता है।

वेदों में वर्णित यज्ञों का अनुष्ठान करनेवाले और वेदमंत्रों से अभिमंत्रित सोमरस को पीने वाले, स्वर्गके प्रतिबन्धक पाप नष्ट हो जाते हैं। इसलिए 'पूतपापाः' कहा गया है।(पूतपापाः एक संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ है "पुत्र द्वारा पापों का नाश"।


इस शब्द का भाव यह है कि एक पुत्र के जन्म से माता-पिता के पाप नष्ट हो जाते हैं। यह एक पारंपरिक हिंदू विश्वास है कि एक पुत्र के जन्म से माता-पिता को पापों से मुक्ति मिलती है और उनके पाप धुल जाते हैं।


इस शब्द का उपयोग अक्सर पुत्र के जन्म के अवसर पर किया जाता है, जब माता-पिता अपने पुत्र के जन्म को एक पवित्र और शुभ अवसर के रूप में मनाते हैं। अंतिम संस्कार में मोक्ष प्राप्ति के लिए पुत्र सहाय होता है ऐसा भी सुनते है)


 भगवान्ने पूर्वश्लोक में कहा गया है कि सत्-असत् सब कुछ मैं ही हूं, तो इंद्र भी भगवत्स्वरूप ही है। मूलतः यहाँ 


'माँ' पदसे इन्द्रको ही लिया हुआ नक्षत्र; क्योंकि सकाम यज्ञ अनुष्ठान करने वाले मनुष्य स्वर्ग-प्राप्ति की इच्छा से स्वर्गके अधिपति इंद्रका ही पूजन करते हैं और इंद्रसे ही स्वर्गप्राप्तिकी प्रार्थना करते हैं।


स्वर्गप्राप्ति इच्छा से स्वर्गके अधिपति इंद्र की स्तुति करना और उस इंद्र से स्वर्गलोक की याचना करना-- दोनों का नाम प्रार्थना है। वैदिक और पौराणिक विधि-विधान से पूछे गए साकम यज्ञोंके द्वारा इंद्रका पूजन और प्रार्थना करने के बाद वे लोग स्वर्ग में देवताओं के दिव्य भोगोंको भोगते हैं। वे दिव्य भोग मनुष्यलोक के भोगों की संभावनाएं बहुत ही लुप्त हैं। वहाँ वे दिव्य शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध - इन पाँचों विषयों का भोग (अनुभव) करते हैं। इनमें से एक दिव्य नंदनवन आदि में घूमना, सुखराम लेना, दर्शन पाना, महिमा पाना आदि भोगों को भी भोगते हैं।


अर्थात 


जो विषयवासनायुक्त अज्ञानी--, ऋक्? यजु और सैम -- इन तीन वेदोंको दर्शनवाले? सोमरस पान करनेवाले और पापरहित हुए अर्थात् सोमरस पान करने से पाप नष्ट हो गए हैं ऐसे सकाम पुरुष वासु आदि देवोंके रूप में स्थित हैं, मुझ परमात्माका अग्निष्टोमादि यज्ञों का पूजन करके स्वर्ग प्राप्तकी कामना करते हैं। वे अपने पुण्यके गहनों वाले इंद्रके स्थानों को स्वर्ग में स्थित देवताओं के भोगते हैं।

9॥20॥


भगवद  गीता अध्याय: 9

श्लोक 21


श्लोक:

ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालंक्षीणे पुण्य मर्त्यलोकं विशन्ति।

 एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते॥


भावार्थ:

वे उस विशाल स्वर्गलोक को भोगकर पुण्य क्षीण होने पर मृत्यु लोक को प्राप्त होते हैं। इस प्रकार स्वर्ग के साधनरूप तीनों वेदों में कहे हुए सकामकर्म का आश्रय लेने वाले और भोगों की कामना वाले पुरुष बार-बार आवागमन को प्राप्त होते हैं, अर्थात्‌ पुण्य के प्रभाव से स्वर्ग में जाते हैं और पुण्य क्षीण होने पर मृत्युलोक में आते हैं

 9॥21॥

तीन वेदों के कर्मकांड का अध्ययन किया गया और कौन सा स्वर्गादि फल के प्रापक यज्ञगादि की विधि विधान क्या आप जानते हैं? ऐसे लोग यदि सकाम भावना से श्रद्धा पूर्वक उन कर्मों का अनुष्ठान करते हैं? तो क्या वे स्वर्ग लोक प्राप्त कर वहां दिव्य देवताओं के भोगने को प्राप्त हो सकते हैं? जिसका दूधिया रस यज्ञ कर्म में प्रयोग किया जाता है और यज्ञ की समाप्ति पर अल्प मात्रा में तीर्थपान के समान इसे ग्रहण किया जाता है। इस प्रकार सोमपा शब्द से अभिप्राय यज्ञकर्म की समाप्ति से बचना चाहिए। सकाम भावना से कैसे गए ये यज्ञकर्म अनित्य फल देने वाले हैं। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि स्वर्ग को प्राप्त जीव पुण्य समाप्त होने पर मृत्युलोक में प्रवेश करते हैं। भोगों की इच्छा करने वाले? बारम्बार (स्वर्ग को) जाते हैं और (संसार को) आते हैं। परन्तु जो पुरुष निष्काम और तत्त्वदर्शन हैं? उनके विषय में भगवान कहते हैं--9॥22॥


भगवद  गीता अध्याय: 9

श्लोक 22


श्लोक:

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।

 तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्‌॥


भावार्थ:

जो अनन्यप्रेमी भक्तजन मुझ परमेश्वर को निरंतर चिंतन करते हुए निष्कामभाव से भजते हैं, उन नित्य-निरंतर मेरा चिंतन करने वाले पुरुषों का योगक्षेम (भगवत्‌स्वरूप की प्राप्ति का नाम 'योग' है और भगवत्‌प्राप्ति के निमित्त किए हुए साधन की रक्षा का नाम 'क्षेम' है) मैं स्वयं प्राप्त कर देता हूँ

 9॥22॥

जिनका साधन और साध्य केवल भगवान ही हैं यानी केवल भगवान ही शरण में हैं,

(किसी बिचौलिए की शरण में नहीं है ऐसा भगवान इस लिए भी कहते है ।जैसा हम सब जानते हैं कि दो कश्तियों का सवार ही डुबा करता है। और दो स्वामियों का नौकर भी किसी एक स्वामी को धोखा तो देता ही है।)

 जरूरतमंद का चिंतन करना है, जरूरतमंद की आराधना करना है और जरूरतमंद को प्राप्त करना है-- ऐसा उनका दृढ़ भाव है। भगवान्के उनकी सलाह कोई और भाव नहीं है; क्योंकि भगवानके आराधना बाकी सब नाशवान है। मूलतः उनके मन में भगवान की कोई इच्छा नहीं है; अपने जीवन-निर्वाह की कोई इच्छा नहीं है। इसलिए वे अद्वितीय हैं।


 वे खाना पीना घूमना-फिरना, बात-चीत करना, व्यवहार करना आदि जो कुछ भी काम करते हैं, वह सब भगवानकी ही पूजा करते हैं क्योंकि वे सब काम भगवानकी खुशीके लिए ही करते हैं।




इसलिएप्राप्त वस्तु की प्राप्ति करना 'योग' है और प्राप्त सामग्री की रक्षा करना 'क्षेम' है। भगवान कहते हैं कि मेरेमें नित्य-निरंतर लगे हुए भक्तका योगक्षेम मैं वह करता हूं।


    वास्तव में देखा गया तो अप्राप्त वस्तु की प्राप्ति में भी 'योग' का वहन है और जो वस्तु प्राप्त हुई है, उसमें भी 'योग' का वहन है। क्योंकि भगवान तो अपने भक्त का हित देखते हैं और वही काम करते हैं, जिसमें भक्त का हित होता है। ऐसे ही प्राप्त वस्तुओं की रक्षा करने में भी 'क्षेम'का वहन है और रक्षा न करने में भी 'क्षेम'का वहन है। यदि भक्त की भक्ति बहुमत हो, तो उसका कल्याण होता है तो भगवान प्राप्तकी रक्षा करेंगे; क्योंकि इसी में उसका 'क्षेम' है। यदि प्राप्तकी रक्षा करनेसे उसकी भक्ति न हो, उसका हित न होता हो तो भगवान उस प्राप्त वस्तुको नष्ट कर देंगे; क्योंकि नष्ट करने में ही उसका 'क्षेम' है। इसलिए भगवानके भक्त अनुकूल और प्रतिरूप-- दोनों पोलैंड में परम पसंदीदा रहते हैं। भगवान पर प्रतिबंध के कारण उनका यह दृढ़ विश्वास हो जाता है कि जो भी स्थिति है, वह भगवान की ही निकली है। मूलतः 'अनुकूल परिस्थिति ठीक है और विपरीत परिस्थिति ठीक है' -- यह उनका भाव है। उनका भाव रहता है कि 'भगवानने जो किया है, वही ठीक है और भगवानने जो नहीं किया है, वही ठीक है, वही हमारा कल्याण है।'


    'ऐसा होना और ऐसा नहीं होना'--यह विचार हमें किंचिन्मात्र की भी आवश्यकता नहीं है। क्योंकि हम सदा भगवान के हाथों में ही हैं और भगवान सदा ही हमारे वास्तविक हित में रहते हैं। इसलिए हमारा हित कभी नहीं हो सकता। भक्तका मसाला हो जाए तो भी कल्याण है और भक्तका न हो तो भी कल्याण है। भक्तका चाहत और चाहना कोई कीमत नहीं, कीमत तो भगवानके तयका है। इसलिए यदि कोई अनुकूलता में आकर्षण और प्रतिकूलता में खिन्न होता है, तो वह भगवान्का दास नहीं है, प्रत्युत अपना मनका दास है।


  असल में तो 'योग' नाम भगवान के साथ संबंधित है और 'क्षेम' नाम जीवके कल्याण का है। इस दृष्टि से भगवान भक्तों के संबंध को अपने साथ जोड़ते हैं-- यह तो भक्त का 'योग' हुआ और भक्त के कल्याण की चेष्टा करते हैं-- यह भक्त का क्षेम हुआ। इसी बात को लेकर दूसरा अध्यायके पैंतालीसवें श्लोक में भगवान अर्जुनके लिए आज्ञा दी कि 'तू' निर्योगक्षेम हो जा अर्थात तू योग और क्षेमसम्बन्धी किसी प्रकार की चिंता मत कर।


अर्थात:


योग (आध्यात्मिक उन्नति) 

क्षेम (भौतिक सुख) की रक्षा।


 भगवान खुद अपने भक्तों की आध्यात्मिक उन्नति और भौतिक सुख की रक्षा करते हैं। यह श्लोक भगवान की कृपा और रक्षा की गारंटी देता है, और यह बताता है कि भगवान अपने भक्तों की हर तरह से रक्षा करते हैं।


भगवद  गीता अध्याय: 9

श्लोक 23


श्लोक:

येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः।

 तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्‌॥


भावार्थ:

हे अर्जुन! यद्यपि श्रद्धा से युक्त जो सकाम भक्त दूसरे देवताओं को पूजते हैं, वे भी मुझको ही पूजते हैं, किंतु उनका वह पूजन अविधिपूर्वक अर्थात्‌ अज्ञान पूर्वक है

 9॥23॥


व्याख्या:


जब विश्व के सभी लोग एक ही पूजास्थल पर पूजा नहीं करते। न केवल शारीरिक दृष्टि से यह असम्भव है? 

वर्ण दर्शन से यह भी ठीक नहीं है? 

क्योंकि सभी लोगों के अभिरुचिअन अलग-अलग होते हैं। भक्तगण ज-अलग देव स्थानों पर पूजा करते हैं? तब ये एक ही चेतन सत्य की बातें हैं?

 जो इस परिवर्तनशील सृष्टि का अधिष्ठान है। जब वे विभिन्न देवताओं की पूजा करते हैं?

 क्या वे भी एक सनातन सत्य की खोज करते हैं? 


जो उनके इष्ट देवता के रूप में अवतरित हो रहे हैं। जब हम यह स्वीकार करते हैं कि अनंत सत्य एकमेव अद्वितीय है? 

(एकमेव अद्वितीय जिसका अर्थ है "एकमात्र अद्वितीय" या 


"एकमात्र अनोखा"।


इस वाक्य का भाव यह है कि जो व्यक्ति या वस्तु अद्वितीय है, वह एकमात्र है और उसकी तुलना किसी और से नहीं की जा सकती है। यह वाक्य भगवान की अद्वितीयता और अनोखेपन को दर्शाता है, जो कि एकमात्र है और जिसकी तुलना किसी और से नहीं की जा सकती है।


यह वाक्य हिंदू धर्म में भगवान की अद्वितीयता को दर्शाने के लिए प्रयोग किया जाता है, और यह वाक्य भगवान की महिमा और अनोखेपन को प्रकट करता है।)


जो भूत? वर्तमान और भविष्य काल त्रि में एक समान रहता है? तब यह स्पष्ट हो गया कि सभी ऋषिमुनियाँ क्या हैं? साधुसंतों? पैगम्बरों और अवतारों की उपाधि में व्यक्ति होने वाला आत्मचैतन्य एक ही है। सहिष्णुता हिंदू धर्म का प्राण है। हमने पहले भी विचार किया था कि परमार्थ सत्य को अनंत रूप में स्वीकार करने वाले अद्वैत किस प्रकार सहिष्णु होने के अतिरिक्त कुछ और नहीं हो सकते हैं। अशिष्णुता उस धर्म में पाई जाती है? 

जिसमें किसी भी देवदूत विशेष को ईश्वर के रूप में स्वीकार किया जाता है। बौद्ध धर्म में भी अलग-अलग पंथ सम्प्रदायों के मतावलम्बी निर्दयता की सीमा तक कट्टरता पाई जाती है। असभ्यता के कुछ ऐसे उदाहरण भी मिलते हैं? 

(जिसमें किसी एक भक्त की यह धारणा है कि अन्य लोगों के देवताओं का निन्दा करना? अपने इष्ट देवता की स्तुति और भक्ति करना इस प्रकार के मत बिगाड़ना? होता है यह कुछ सम्प्रदायों में देखने को मिलता है कि मेरा धर्म ही सब से पहले धरती पर आया यह धर्म बाकी सब धर्मो से उत्तम है,उनकी यह सोच पैर की मोच जैसी घृणित और अशिष्ट हैं।)


हिन्दू धर्मशास्त्र में कोई अन्तर नहीं है और न ही ऋषियों द्वारा प्रवर्तित सांस्कृतिक परंपरा में उन्हें कोई स्थान प्राप्त है।उदार हृदय करुणासागर प्रेमस्वरूप शिव ब्रह्मा में बड़ा कौन  छोटा कोन भगवान श्रीकृष्ण की घोषणा कै साथ कैसे की जा सकती है ऐसे भक्त भी वास्तव में मुझे ही पूजते हैं? 


हालाँकि वह अशास्त्र की पूजा भी करता है। बाह्य जगत में व्यावहारिक जीवन की दृष्टि से इस श्लोक की प्रार्थना यह है कि परमानन्दस्वरूप आत्मा की प्राप्ति को त्यागकर कौन लोग धार्मिक विषयों की प्राप्ति के लिए अभी प्रयास करते हैं? 


वे भी आत्मकृपा का ही आवेदन करते हैं? परंतु अविधि अस्पष्ट।अत्यंत विषयोपभोगी पुरुष भी जब धन के अर्जन? रक्षण और व्यय की संरचनाएँ क्या हैं? जिससे कि वह नित्य नये विषयों को भोग के रूप में प्राप्त कर सके? तब वह भी स्वयं में स्थित अव्यक्त मालिक की ही स्थिति में है। आत्मा के बिना कोई भी व्यक्ति न पापकर्म कर सकता है और न ही पुण्य कर्म। आत्महत्या जैसे कार्य में भी जीवनी शक्ति की आवश्यकता होती है? लेकिन शस्त्र उठाने में वह पुरुष आत्मचेतना का अपमान कर रहा है। इस सन्दर्भ में अविद्या का अर्थ अज्ञानता है? जिसका अंतिम परिणाम दुःख और विषाद होता है? तथापि साधक आत्मा के परम आनंद से रचनात्मकता रह जाती है। इन भक्तों की पूजा को अविद्या क्यों कहा गया है इसके उत्तर में कहा गया है --

भगवद  गीता अध्याय: 9

श्लोक 24


श्लोक:

अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च।

 न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते॥


भावार्थ:

क्योंकि संपूर्ण यज्ञों का भोक्ता और स्वामी भी मैं ही हूँ, परंतु वे मुझ परमेश्वर को तत्त्व से नहीं जानते, इसी से गिरते हैं अर्थात्‌ पुनर्जन्म को प्राप्त होते हैं

 ॥24॥


भगवद  गीता अध्याय: 9

श्लोक 25


श्लोक:

यान्ति देवव्रता देवान्पितृन्यान्ति पितृव्रताः।

 भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्‌॥


भावार्थ:

देवताओं को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं, पितरों को पूजने वाले पितरों को प्राप्त होते हैं, भूतों को पूजने वाले भूतों को प्राप्त होते हैं और मेरा पूजन करने वाले भक्त मुझको ही प्राप्त होते हैं। इसीलिए मेरे भक्तों का पुनर्जन्म नहीं होता।

 9॥25॥

जैसे कोई 'कर्णपिशाचिनी' की पूजा करने वाला था। उसके पास और कुछ भी नहीं है, तो वह बिना पूछे ही बता देता है कि यह प्रश्न है और उसका उत्तर है। इससे विद्या से वह बहुत रुपए कमा रहे हैं। अब उसके चमत्कार को देखकर एक सज्जन पीछे पड़ गए कि 'मेरेको भी विद्या सिखाओ, मैं भी यही चाहता हूं।' तो उसने सरलता से कहा कि यह चमत्कारी तो बहुत है, पर वास्तविक हित, कल्याण करने वाली नहीं है। यह पूछा गया कि क्या आप दूसरे के बिना कहे ही उसके प्रश्न और उत्तर कैसे जान सकते हैं?' तो उन्होंने कहा कि 'मैं अपने कान में विस्टा जगह पर हूं।' जब कोई टिकट आता है, तो उस समय कर्णपिशाचिनी गेंस मेरे कान में उसके प्रश्न और प्रश्न का उत्तर सुनता है और मैं विचार कर ही कह देता हूं।' फिर पूछा गया कि 'आपका मरना कैसे होगा--इस विषय में आपने कुछ पूछा है कि नहीं?' 

इसपर उन्होंने कहा कि 'मेरा मरना तो नवादा के किनारे रहेगा।' उसके शरीर को शांत करने के बाद पता चला कि जब वह (अपना अनंत-समय ज्ञान होने वाला) नवादा में जाने लगा, तब कर्णपिशाचिनी सुकरी उसके सामने आ गई। देखने के बाद वह अलास्का की तरफ भागा, तो कर्णपिशाचीनी ने असल में अलास्का में जाने से पहले ही किनारे पर मार दिया। इसका कारण यह था कि यदि वह नामकरण में मरता है तो उसकी सद्गति हो जाती है। लेकिन कर्णापिशाचिनी ने उसकी सद्गति नहीं दी गई और न ही नामकरण के किनारे पर ही धूम मचा दी गई। क्योंकि देवताओं में भगवद्भाव और निष्कामभाव है, तो उनकी पूजा भी कल्याण करने वाली है। लेकिन भूत, प्रेत आदिकी पूजा करनेवालों की कभी सद्गति होती ही नहीं, दुर्गति ही होती है।


हाँ? पारमार्थिक साधक भूत-प्रेतोंके तीर्थके के लिए उनका श्राद्ध-तर्पण कर सकते हैं। कारण कि उन भूत-प्रेतों को अपना इष्ट चाहने वालों की पूजा करना ही पतन का कारण है। उनके तीर्थ के लिए श्राद्धार्पण करना अर्थात पिंड-जल देना कोई दोष की बात नहीं है। सन्त-महात्माओंके द्वारा अनेक भूत-प्रेतोंका स्थापित किया गया है।


जीवन का यह नियम है कि जैसा विचार करोगे वैसा बनोगे। जैसा वृत्ति वैसा आदर्श व्यक्ति। समय समय पर पूछे गए विचारों के अनुसार व्यक्ति के भावी चरित्र का रेखाचित्र अंतकरण में उस की खान कहा जाता है। यह एक ऐसा तथ्य है? इस सत्यता का अनुभव प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में ही कर सकता है। मनोविज्ञान के इस नियम को आत्मविकास के आध्यात्म क्षेत्र में अनुपयुक्त बनाते हुए भगवान श्रीकृष्ण द्वारा कहा जाता है? देवताओं के पूजक देवताओं को प्राप्त होते है। देवता, पितर, भूतों ,के पूजक लोग जब दीर्घकाल तक एकाग्रचित्त से अपने इष्ट की पूजा और भक्ति करते हैं? तब उनकी इच्छा पूरी होती है। देवता ज्ञानेन्द्रियों की प्रतिष्ठा है। हमें जगत का अनुभव ज्ञानेन्द्रियों से होता है। यहां देवताओं से काम इंद्रियों द्वारा अनुभूत संपूर्ण भौतिक जगत से है। जो लोग सादृश्य बाह्य जगत के सुख और यश की कामना एवं तत्त्वति के लिए प्रयास करते हैं। वे अपने इच्छित उद्देश्य के विषय और क्षेत्र को प्राप्त होते हैं। पितृव्रता शब्द का अर्थ क्या है? 

वे लोग जो अपने पितरों के सांस्कृतिक मंदिरों और परंपराओं के प्रति वैज्ञानिक हैं? तथा जो आदर्शों के संरचनात्मक जीवन जीने का उत्साह बढ़ाने का प्रयास करते हैं। कौन सा दार्शनिक आध्यात्मिक भारत की प्राचीन सांस्कृतिक परंपरा के अनुसार जीने का सतत प्रयास करता है? वह फलत इस पुरातात्विक एवं पूर्णता के अत्त्युत्तम जीवन की सुन्दरता और आभा प्राप्त होती है। हमारी भारत भूमि के प्राचीन ऋषियों ने यह तथ्य कभी नहीं देखा कि किसी भी समाज में? आध्यात्मिक आदर्शों के अतिरिक्त? वैज्ञानिक और प्रकृति के गर्भ में निहित अनेक प्राचीन और खगोलशास्त्र का अविष्कार भी रहता है। भौतिक विज्ञान के क्षेत्र में होने वाले अंश और शोध मानव मन की जिज्ञासा का ही एक अंग हैं। अत भूतों के पूजक से माइक्रोवेव यूनिट का उत्पादन कैसे होता है? जो प्रकृति का निरीक्षण करते हैं और परिष्कृत प्रतिभा का नमूना कर उस ज्ञान को सुव्यवस्थित रूप देते हैं। आधुनिक युग में प्रकृति, वस्तु, व्यक्तिगत ,एवं धार्मिक अध्ययन का ज्ञान जिन दस्तावेजों की रिकार्डिंग की जाती है? वे भौतिकशास्त्र, रसायनशास्त्र, यान्त्रिकी,कृषि, राजनीति, समाजशास्त्र, भूगोल,आख़िर, भूगर्भशास्त्र आदि हैं।

 इन शास्त्रों में भी अनेक शाखाएँ होती हैं, विशेष रूप से अध्ययन करके लोग उस शाखा के विशेषज्ञ बने हुए हैं। अथर्ववेद के एक बहुत बड़े भाग में उस काल के ऋषियों को अलौकिक प्रकृति के स्वभाव एवं व्यवहार के सिद्धांत दिये गये हैं। भगवान श्रीकृष्ण द्वारा यहां बताए गए मनोविज्ञान के नियम मनुष्य के सभी कर्मों के क्षेत्रों में लागू होते हैं। वह नियम रखता है कि किसी भी क्षेत्र में मनुष्य द्वारा किये गये प्रयासों के समान अनुपात में उसे सफलता प्राप्त होती है। इस प्रकार,यदि देवता, पितरों ,और भूतों की पूजा करने से अर्थात् उनके त्रिमूर्ति चिंतन से देवता की पूजा पुरातत्वविदों और प्रकृति के रहस्यों को जानने से भौतिक जगत में सफलता प्राप्त होती है। तो वही सिद्धांत के अनुसार हमें वचन दिया गया है कि,मेरे भक्त मुझे ही प्राप्त होते हैं। एकाग्र चित्त से आत्मस्वरूप पर सतत दीर्घकाल तक ध्यान करने पर साधक अपने सनातन अव्यय आत्मस्वरूप का सहज साक्षात अनुभव कर सकते हैं। सतत आत्मानुसंधान के अंत में जीव के आत्मस्वरूप में ही वेदान्त के प्रकरणों के ग्रन्थों में रामराकीट न्याय द्वारा अंतःस्थापित किया गया है।अर्थात् अनुभव को भी प्रदान किया जाता है। इस श्लोक के प्रस्तावक को यह विश्वास दिलाना है कि यहां परम पुरुषार्थ द्वारा कथित आध्यात्मिक साधना के बारे में भी पता चल सकता है। किस प्रकार समर्पित वैश्व भौतिक जगत में कार्य करने पर भौतिक सफलता मिलती है? आन्त्रिक जगत् के नियमों को भी सत्य प्रमाणित किया गया है। यह पर्यावासन आलौकिक मंदिर में होता है। सतत ध्यान ही फलदायक होगा। भगवान की इस मान्यता का प्रमाण-पत्र इस श्लोक में दिया गया है। जिसका पालन करने के लिए प्रिय वेदों में भगवान ने यही कहा है--


भगवद  गीता अध्याय: 9

श्लोक 26


श्लोक:

( निष्काम भगवद् भक्ति की महिमा ) 

 पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।

 तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥


भावार्थ:

जो कोई भक्त मेरे लिए प्रेम से पत्र, पुष्प, फल, जल आदि अर्पण करता है, उस शुद्धबुद्धि निष्काम प्रेमी भक्त का प्रेम पूर्वक अर्पण किया हुआ वह पत्र-पुष्पादि मैं सगुणरूप से प्रकट होकर प्रीति सहित खाता हूँ

9 ॥26॥

इस श्लोक में मादक द्रव्यों की प्रधानता नहीं है, प्रत्युत भक्त भावकी प्रधान है; क्योंकि भगवान भावके भागीदार हैं; मादक द्रव्य नहीं। मूलतः अर्पण करनेवालेका भाव मुख्य (भक्तिपूर्ण) होना। जैसे, कोई परम गुरुभक्त शिष्य हो, तो गुरुकी सेवा में उसका छोटा समय, वस्तु, क्रिया पहचान होती है, ग्रेड हीस का आनंद आता है, उत्साह होता है। इसी तरह पतिकी सेवा में समय, वस्तु, क्रिया की झलक मिलती है, पतिव्रता स्त्री को बड़ा आनंद मिलता है क्योंकि पतिकी सेवा में ही आपके जीवन और वस्तु की सफलता मिलती है। ऐसे ही भक्तका भगवानके प्रति प्रेमभाव होता है, तो वस्तु छोटी हो या बड़ी हो, साधारण हो या कीमती हो, ऐसे ही भगवानके अर्पण करने में भक्तको बड़ा आनंद आता है। उनका भाव यह रहता है कि वस्तुमात्र भगवान्की ही है। मेरे लिए भगवान की सेवापूजा का अवसर दिया गया है-- यह मेरे लिए भगवान की विशेष कृपा हो गई है! इस कृप्या को देखें कि वह कितना आकर्षक रहता है।


   भाव निर्विवाद अखंड भोगो को भगवान एक समान स्वीकार करते हैं, अन्यथा हमें देंखे या न देंखे। इस विषय में एक आचार्य का कहना था कि हमारे मंदिरों में दीवाली से होलीतक अर्थात् सर्दीके दिनों में ठाकुरजीको पिस्ता, बादाम, अखरोट, काजू, चिरौंजी आदिका भोग लगाया जाता था; लेकिन जब यह बहुत महंगा हो गया, तब हमने मूंगफ़्लीका भोग लगाना शुरू कर दिया। एक दिन रात में ठाकुरजीने स्वप्न में कहा -- अरे यार! 'तू मूँगफली, ही खिलाएगा क्या?' उस दिन के बाद फिर से मेवाका भोग लॉन्च कर दिया गया। यह विश्वास हो गया कि जब ठाकुरजीको भोग अवसर मिलते हैं, तब वे उसे अवश्य स्वीकार करते हैं।


   भोग लगाने पर जिन पुरावशेषों को भगवान स्वीकार कर लेते हैं, उन पुरावशेषों में एक विलक्षणता होती है अर्थात उन पुरावशेषों में स्वाद बढ़ जाता है, उनमें सुगंध दिखाई देती है; विदेशी खाद्य पदार्थों पर असाधारण तृप्ति होती है, वे खाद्य पदार्थ जिन दिनों में रखे जाते हैं, वे भी खराब नहीं होते हैं; आदि-आदि। परन्तु यह नहीं बताया गया कि ऐसा होता है। कभी भक्त का ऐसा भाव बन जाता है तो भोग लगायी गयी वस्तुओं में ऐसी विलक्षणता आ जाती है -- ऐसा हमने सुना है।


  मनुष्य जब मादक द्रव्य की आहुति देता है तो वह यज्ञ हो जाता है; नीदरलैंड्स को अर्पण करने से भगवान के साथ योग (सम्बंध) हो जाता है - ये सभी एक त्याग के ही अलग-अलग नाम हैं।

विश्व में कोई ऐसा धर्म नहीं है? जो भक्त ईश्वर को उपहार देते हैं, वे अनुमोदन और प्रोत्साहन नहीं देते हैं। आधुनिक शिक्षण पुरुष में वास्तव में आश्चर्य की बात यह है कि अंतिम अनंत भगवान को अपने दीपक के लिए तेल या एक मोमबत्ती या निवास के लिए मंदिर या मस्जिद के रूप में एक घर जैसे क्षुद्र अवशेष की आवश्यकता क्यों होती है विपरीत धारणाओं के विपरीत धारणाएं हुई शुष्क वे बुद्धि के लोग निर्लज्जता से यह भी आग्रह करते हैं कि ईश्वर के घर में अस्पताल में हैं? विद्यालय? मनोवैज्ञानिक और प्रसूति गृहों में बदलाव किया जाना चाहिए। परन्तु मेरा विश्वास है कि मैं ऐसे समाज को मूर्तिमान कर रहा हूँ? जो कमसेकम अभी तो नैतिक पतन के अधोबिंदु तक नहीं आया है। जिस समाज में अभी भी भावनापूर्ण स्वस्थ हृदय के विवेकशील लोग रहते हैं? वहां ही मंदिर और पूजा की आवश्यकता है। इस बात का भी ध्यान रखें कि इन मन्दिरों में उनकी कलाकौशल पूर्ण रचना क्या है? कर्मकांड का अदंबर या स्वर्णाभूषणों की चमक और धन का प्रदर्शन उनकी सफलता का मूल कारण नहीं है। यहां तक ​​कि प्रतिदिन वहां आने वाले दर्शनार्थियों की संख्या पर भी उनकी सफलता का कोई महत्व नहीं है। वे अपने भक्त का प्रेम और भक्ति स्वीकार करते हैं जिससे प्रेरित होकर वह अल्पाहार में भगवान को अर्पण करता है फिर निके की हुई वस्तु खंजर पत्र? पुष्प? फल? या स्वर्ण मंदिर हो? उनका महत्व भगवान नहीं बताते हैं? शुद्धचित्त के उस भक्त के द्वारा भक्ति को शून्य मानकर वह स्वीकार करता है। इस श्लोक में विशेष रूप से चुनकर कुछ शब्दों का प्रयोग किया गया है जो त्याग और अर्पण के उस सिद्धांत को स्पष्ट करता है? जिस पर सभी धर्मों का आग्रह है। सन्देह यह नहीं है कि भगवान को अपना पूर्णत्व पूर्ण करने के लिए या अनंत वैभव को बनाए रखने के लिए भक्तों के उपहार की आवश्यकता नहीं है। भक्तगण अपने इष्ट देवता को कुछ न कुछ अर्पण करना चाहते हैं? कौन सा वास्तविक भगवान द्वारा निर्मित जगत् रूप उपवन की ही एक वस्तु है? जिसका भक्तजन उपयोग कर रहे थे। एक सार्वजनिक उपवन में भी कोई भी प्रेमी कहीं से भी अपने प्रेमी को फूलमालाएं देता है। इसी प्रकार? भक्त भी भगवान के उपवन से चुराई गई वस्तु को ही पुन: नष्ट कर देता है। विचार करने से पता चलता है कि वास्तव में क्या होता है? भगवान को कुछ वैज्ञानिक प्रस्ताव का हमारा अभिमान वृथा और खोखला है। फिर भी? ईश्वर की सभी प्रकार की पूजाओं में उन्हें कुछ अर्पण करने का क्या महत्व है? जिसे पालने पर विशेष बल दिया जाता है। पत्रपुष्पदी अर्पण करते समय यदि भक्त यह नोट करता है कि वह उस वस्तु को ही समर्पित कर रहा है? तो वह इस विधान का ही मिथक कर रहा है। वह अर्पण के सिद्धांत को नहीं जानता है। यहां पुष्प आदि का प्रस्ताव एक विशाल के समान है। के समय में हम किसी खाद्य पदार्थ का उपयोग मुंह तक ले जाने में करते हैं, लेकिन फूडपरेंट फूड थाली में ही रखा जाता है। मंदिर या मंदिर में फूलफल आदि रहते हैं, लेकिन जब एक भक्त उन्हें भगवान का श्रृंगार करता है, तब वे उनके प्रेम और उपहार का उच्चारण करने के माध्यम से बन जाते हैं। यही बात भगवान यहां स्पष्ट करते हैं कि? शुद्ध बुद्धि के भक्त द्वारा भक्ति से निर्भय वस्तु को मैं स्वीकार करता हूं। इसलिए भगवान को कुछ अर्पण करने की क्रियाप्रभावपूर्ण होने के लिए दो बातों की आवश्यकता है (क) वह भक्ति का समर्पण करता है और (ख) वह शुद्ध बुद्धि के भक्त द्वारा अर्पण किया जाता है। इन दोनों सिद्धांतों के बिना अर्पण केवल आर्थिक अपव्यय है और अंधश्रद्धा तथा मिथ्याविश्वास है। यदि उनकी जायज़ जाय तो आत्मविकास के आध्यात्मिक मार्ग के लिए उपयुक्त वाहन बन जाते हैं।

भगवद  गीता अध्याय: 9

श्लोक 27


श्लोक:

यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्‌।

 यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्‌॥


भावार्थ:

हे अर्जुन! तू जो कर्म करता है, जो खाता है, जो हवन करता है, जो दान देता है और जो तप करता है, वह सब मेरे अर्पण कर

 9॥27॥


व्याख्या:


 भगवान का यह नियम है कि जो मेरी शरण लेता है, मैं उसी प्रकार उसे शरण देता हूँ । जो भक्त अपनी वस्तु मुझे अर्पण करता है, मैं उसे अपनी वस्तु देता हूं। भक्त तो सीमित ही वस्तु देता है, पर मैं अनंत गुणा करके देता हूं। परन्तु जो अपना- तुम्हें ही मुझे देता है, मैं तुम्हें ही उसे देता हूं। वास्तव में मैंने अपने- तुम्हें संसारमात्रको दे रखा है , और सब कुछ करनेकी स्वतन्त्रता दे रखा है। यदि मनुष्य अपनी दी हुई स्वतन्त्रता को मेरा अर्पण कर देता है, तो मैं भी अपनी स्वतन्त्रता को उसका अर्पण कर देता हूँ। इसलिए यहां भगवान स्वतन्त्रताको अपने अर्पण करने के लिए अर्जुनसे कहते हैं।


इस का प्रत्यक्ष ज्ञान है कि किसान एक बीज बोता है भगवान उस एक को कई गुना बड़ा कर देते है।


अब इस पदके में संपूर्ण शारीरिक क्रियाएं भी ली जाती हैं अर्थात शरीरके लिए तू जो भोजन करता है, जल पीता है, कुपथ्य त्याग और पथ्य सेवन करता है, ओष-सेवन करता है, कपड़ा पहनना है, सर्दी-गर्मीसे शरीर की रक्षा करना है, स्वास्थ्य के लिए समय-सोता और जागता है, घूमना-फिरना है, शौच-स्नान करना है, आदि सभी कामो को मेरा अर्पण करना है फिर कर दें ना।


इसी प्रकार यज्ञ-संबन्धी सभी क्रियाएं होती हैं अर्थात् शाकल्य-सामग्री एकत्र करना, अग्नि समर्पण करना, मन्त्र समर्पण करना, आहुति देना आदि सभी शास्त्रीय क्रियाएं मेरे अर्पण कर दे।


अब तू जो कुछ देता है अर्थात् दस्तावेज़ी सेवाएँ करता है, अध्ययन की सहायता करता है, अध्ययन की आवश्यकता-विशेषता करता है, आदि जो कुछ शास्त्रीय क्रिया करता है, वह सब मेरे अर्पण कर दे।


तू जो कुछ तप करता है विषय-वस्तु से अपनी इन्द्रियोंका संयम करता है, अपनी कर्तव्या पालना करता है अनुपयुक्त-प्रतिकूल वैज्ञानिकों को सिद्धांतों का पालन करना और तीर्थ, व्रत, भजन-ध्यान, जप-कीर्तन, श्रवण-मनन, समाधि आदि जो कुछ भी पारमार्थिक क्रिया करता है, वह सब मेरे अर्पण कर दे। 

उच्च तीर्थ पद शास्त्रीय और पारमार्थिक कार्यका दूसरा विभाग है।


इसका सरल भाव है कि


"हे भगवान! मैं अपने सभी कार्यों को आपको अर्पण करता हूं। जब मैं ऐसा करता हूं, तो मेरा 'मैं' और 'मेरा'पन समाप्त हो जाता है, और मुझे पूर्णता की प्राप्ति होती है। यह पूर्णता ऐसी है कि जिसमें कोई दुःख नहीं होता है, और जिसमें स्थित होने पर कोई भी दुःख मुझे प्रभावित नहीं कर सकता है।"


इस श्लोक में भगवान को अर्पण करने के महत्व को बताया गया है, और यह भी बताया गया है कि जब हम अपने कार्यों को भगवान को अर्पण करते हैं, तो हमें पूर्णता की प्राप्ति होती है।


चलो सांसारिक बंधन से मुक्ति का सरल उपाय है। प्रभु बच्चे को सद्बुद्धि दो की इस कठिन उपाय को करने पर आने वाली सभी अड़चनों को भी आप में अर्पण कर निश्चिंत हो कर बाकी जीवन जिए।

✍️सभी प्रकार के कर्म करते हुए हम ईश्वरप्रणय की भावना से रह सकते हैं। संपूर्ण गीता में इस पर बल दिया गया है कि केवल शारीरिक कर्म की आवश्यकता ईश्वर दर्पण की भावना है और यह एक ऐसा तथ्य है। जिसका अभ्यासे को विस्मरण हो जाता है।शरीर, मन,  बुद्धि के स्तर पर होने वाले विषय ग्रहण और उनकी प्रति हमारी प्रतिक्रिया के रूप में भी व्यवसाय हैं? 

उन सबको भक्ति से वंचित करें मुझे अर्पण करे। यह किसी भी प्रकार से मनुष्य के लिए पालन-पोषण करना बहुत कठिन है। एक ही आत्मा ,ईश्वर, गुरु ,और भक्त में और सर्वत्र राम रहते हुए हम अपने व्यावहारिक जीवन में सामान्य नाम और सिद्धांत के साथ व्यवहार करते हैं। हम जानते हैं कि इन लोगों के लिए आत्मसत्ता की आवश्यकता होती है। यदि हम अपने समग्र व्यवहार में इस आत्मतत्व का स्मरण रखते हैं तो वह जगत् के अधिष्ठान का ही स्मरण होगा। यदि किसी वस्त्र की दुकान में विभिन्न रूप  रंग हो।किसे सदा इस बात का स्मरण रखना चाहिए कि वह समुद्र तट के सूती वस्त्रों का व्यापार कर रहे हैं। किसी भी तरह से व्यापार को समझना मुश्किल नहीं होगा। में देखा गया तो इस का स्मरण रखें कि उसके लिए अधिक सुरक्षित और प्रकार के फायदे हैं अन्यथा वह किसी कप की कीमत ऊनी प्रतिबंध के खाते से बहुत अधिक बता देता है या अपने माल को टाट के बोरे जैसे कि बहुमत में बेच देता है। यदि किसी स्वर्णकार को यह स्मरण-गृह की सलाह दी जाए कि वह सोने पर काम कर रहा है तो वह सलाह देता है कि उसके लाभ के लिए ही हैं। जैसे गहनों में सोने और कपडे में सूत हैं वैसे ही विश्व के सभी नाम और सिद्धांतों में आत्मा ही मूल तत्व हैं। जो भक्त अपने जीवन के सर्वांगीण व्यवहार में इस दिव्य तत्त्व का स्मरण रखता है वही पुरुष जीवन को आदर और सम्मान दे सकता है जो योग्य जीवन हैं। यह नियम है कि जीवन को जो तुम दोगे, तुम्हें जीवन से  वही पाओ गे। तुम हँसोगे तो जीवन हँसोगे और तुम खिलोगे तो जीवन भी खिलेगा उसके पास आत्मज्ञान से उत्पन्न आदर और सम्मान के साथ तो जीवन रक्षा में भी आदर और सम्मान प्राप्त होगा।समर्पण की भावना से सभी कर्मों को करने पर न केवल भगवान के प्रति हमारा प्रेम बढ़ता है। बल्कि आदर्श जीवन और दिव्य लक्ष्य के कारण हमारा भी जीवन पवित्र बन जाता है। गीता में अद्वितीय भाव और सतत आत्मानुसंधान पर विशेष बल दिया गया है। इस श्लोक में हम देख सकते हैं कि एक ऐसे उपाय का वर्णन किया गया है जिसके उपदेश से ही साधक को ईश्वर का अखंड स्मरण बना रहता है। इसके लिए जहां कहीं भी निर्जन सोसायटी वन या गुप्त गुफाओं में इसे रखने की आवश्यकता नहीं है तो हम अपने दैनिक कार्य क्षेत्र में ही कर सकते हैं। इस प्रकार का संकेत भावना का जीवन जीने से  लाभ जो अब कार्यरत हैं।


भगवद  गीता अध्याय: 9

श्लोक 28


श्लोक:

शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्य से कर्मबंधनैः।

 सन्न्यासयोगमुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि॥


भावार्थ:

इस प्रकार, जिसमें समस्त कर्म मुझ भगवान के अर्पण होते हैं- ऐसे संन्यासयोग से युक्त चित्तवाला तू शुभाशुभ फलरूप कर्मबंधन से मुक्त हो जाएगा और उनसे मुक्त होकर मुझको ही प्राप्त होगा।

 9॥28॥

हालाँकि आध्यात्मिक लक्ष्य एक ही होता है समुद्र तट के साधनमार्गी कई हैं इन मनोहर की सतह पर अध्ययन करने पर वे एकता सर्वथा के विपरीत दिखाई देते हैं। तथापि उन सभी वैज्ञानिक आधार एक ही है। जो उन संविधान उपयोगिता एवं औचित्य को न्यायसंगत प्रमाणित करता है। गीता में अनेक स्थानों पर इस यूनिवर्सल आधार को स्पष्ट रूप से सूचीबद्ध किया गया है तो किन्हीं अन्य स्थानों पर केवल उनके हस्ताक्षर हैं फिर भी गीता के सावधानियां और अनुयायी उन्हें पहचान सकते हैं। प्रस्तुत प्रकरण में इस पर विचार किया गया कि किस प्रकार अर्पण की भावना से जीवन जीता है। मनुष्य को परम पुरुषार्थ की प्राप्ति हो सकती है। जो निदिध्यासन और यज्ञ की भावना का निश्चित फल है। यह सर्वविदित तथ्य है कि कौन सा कर्म होता है। वही कर्मफल का भोक्ता भी होता है। अत: यदि हम कर्तृत्वाभिमान से कर्म करें । तो फलोपभोग के लिए भी हमसे संपर्क करें। इसलिए वेदांत का सिद्धांत है कि निरहंकार भाव से कर्म करने पर शुभ या अशुभ दोनों एक ही प्रकार के होते हैं। भगवान श्रीकृष्ण यहां क्या कहते हैं? 

तुम शुभअशुभ रूप कर्म के बंधन से मुक्त हो जाओ। इसका कारण यह है कि साथियों के साथ नए कर्मों से वासनाओं में वृद्धि नहीं होती है और साथ ही साथ पूर्व रिकॉर्ड किए गए फ़िल्मों का शनैशनै क्षय हो जाता है। संक्षेप में, उस साधक का चित्त अधिकाधिक शुद्ध होता है शास्त्रीय भाषा में इसे चित्तशुद्धि कहते हैं। मन के शुद्ध होने पर उसकी एकाग्रता की शक्ति में वृद्धि होती है। होता है. फिर क्या वह संत और योग के जीवन का आचरण करता है इन दो शब्दों का विस्तृत विवेचन पूर्व में किया गया है।जिसमें गीता में वर्णित अर्थ की दृष्टि से पूर्ण विवरण होना चाहिए। संत का अर्थ भौतिक जगत् का त्याग नहीं, वर्ण गीता की भाषा में संत का अर्थ क्या है  अपमान से प्रेरित सभी कर्मों का त्याग? और कर्मफल के साथ आशक्ति का त्याग। 

कौन सा पुरुषार्थ और उत्साह के साथ अपनी भक्ति की अभिव्यक्ति के रूप में अर्पण का जीवन जीता है, उसके लिए यह दोनों त्याग स्वभाव के हो जाते हैं। अन्त में वह समस्त फल ईश्वर को अर्पण कर देता है।इस प्रकार संत का जीवन जीते हुए जिस साधक ने विवेक से पूर्ण चित्तशुद्धि प्राप्त कर ली है उसे आत्मानुसंधान योग सरल हो जाता है। इसका कारण यह है कि वह अपने दैनिक कार्यकलापों में भी अनंत आत्मस्वरूप का स्मरण करता है। कि उसकी अज्ञान दशा का मिथ्या अंशों के साथ तादात्म्य और तज्जिनित परिच्छिन्नता एवं मृत्यु के दुःख सर्वथा समाप्त हो गये हैं। स्वस्वरूपानुभूति के लिए सहज सिद्ध हो जाते हैं। संत और योग से युक्त हुए तुम मुक्त होकर मुझसे प्राप्त हो गए। किस आत्मसत्ता की प्राप्ति साधक को होगी?

अब एक मान्यता यह है कि जो भगवानके समर्पित होते हैं, उन्हें भगवान मुक्त करते हैं और जो भगवानके समर्पित नहीं होते, उन्हें भगवान मुक्त नहीं करते हैं-- इसमें तो भगवानकी दयालुता और समता नहीं हुई, प्रत्युत् विषम-दृष्टि और आख़िर हुआ? इसपर कहा गया है--

भगवद  गीता अध्याय: 9

श्लोक 29


श्लोक:

समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः।

 ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्‌॥


भावार्थ:

मैं सब भूतों में समभाव से व्यापक हूँ, न कोई मेरा अप्रिय है और न प्रिय है, परंतु जो भक्त मुझ को प्रेम से भजते हैं, वे मुझ में हैं और मैं भी उनमें प्रत्यक्ष प्रकट (जैसे सूक्ष्म रूप से सब जगह व्यापक हुआ भी अग्नि साधनों द्वारा प्रकट करने से ही प्रत्यक्ष होता है, वैसे ही सब जगह स्थित हुआ भी परमेश्वर भक्ति से भजने वाले के ही अंतःकरण में प्रत्यक्ष रूप से प्रकट होता है) हूँ

 9॥29॥

भगवान किसी में कहीं कम  और कहीं अधिक हैं अर्थात छोटी से छोटी चींटी होने से कम हैं या हाथी और बड़ा होने से अधिक हैं;  और ब्राह्मण में अधिक है; और,क्षत्रिय,वैश्य,शूद्र में कम हैं ।ऐसा नहीं होता।भगवान सभी में सभी के साथ समान भाव से विराजते हैं।


जो उनके उपयुक्त बने वे वही हो जाते हैं यह बात भी नहीं है। कारण कि सबके-सब जीव मेरे हिस्से हैं, मेरे स्वरूप हैं। मेरे स्वरूप होने से वे कभी अलग नहीं हो सकते और मैं भी अपने स्वरूप से कभी अलग नहीं हो सकता। इसलिए मैं सबमें समान हूं, मेरा कोई अन्य गंतव्य नहीं है। दार्शनिकों का कहना है कि शास्त्र में जन्म से, कर्म से, परिस्थिति से, घटना से, संयोग से, वियोग आदि से अनेक प्रकार की विषमताएं होती हैं, पर तब भी मैं सर्वथा-सर्वदा सबमें समान रीतिसे व्यापक हूं, कहीं कम और कहीं अधिक नहीं हूं।

भगवद  गीता अध्याय: 9

श्लोक 30


श्लोक:

अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्‌।

 साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः॥


भावार्थ:

यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्य भाव से मेरा भक्त होकर मुझको भजता है तो वह साधु ही मानने योग्य है, क्योंकि वह यथार्थ निश्चय वाला है। अर्थात्‌ उसने भली भाँति निश्चय कर लिया है कि परमेश्वर के भजन के समान अन्य कुछ भी नहीं है।

 9॥30॥

व्याख्या-- कोई करोड़पति या अरबपति यह बात कह दे कि मेरे पास जो कोई आयेगा, मैं उनको एक एक लाख रुपये दूँगा, तो उसका यह वचन परीक्षण तब होगा, जब वह सर्वथा ही स्थिर गतिवाला, उसके साथ दूसरे को बनाए रखने वाला, उसका अनिष्ट करनेवाला भी उनसे एक लाख रुपये की मांग करें और वह उपयोग को दे दे। इससे आम जनता का यह विश्वास हो जाएगा कि जो यह मांगता है, वह देता है। इसी भाव को लेकर भगवान सबसे पहले दुराचारी का नाम लेते हैं।

जो पापी होते हैं क्या, उनकी शरण नहीं होता?

माया द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है, ऐसे आसुर-स्वभाव को धारण किए हुए, मनुष्यों में नीच, दूषित कर्म करने वाले मूढ़ लोग मुझको नहीं भजते।

1 जो शास्त्र आज्ञा का पालन नहीं करते

2 जो हर कार्य को भगवान से जोड़ कर नहीं करते


 और यहां कहा गया है कि दुराचारी-से-दुराचारी भी अनन्यभावसे मेरा भजन करता है-- इन दोनों बातों में से एक में विरोध स्पष्ट होता है। इस विरोध को दूर करने के लिए ही यहां 

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि चार प्रकार के लोग हैं जो उनकी भक्ति नहीं करते हैं:


1. *दुष्कृतिनः* (दुर्जन): जो लोग दुर्जन हैं और दुराचारी हैं।

2. *मूढाः* (मूर्ख): जो लोग मूर्ख हैं और ज्ञान से रहित हैं।

3. *नराधमाः* (नीच): जो लोग नीच हैं और अपने कर्मों से नीचता को प्राप्त करते हैं।

4. *आसुरं भावमाश्रिताः* (आसुरी प्रकृति वाले): जो लोग आसुरी प्रकृति वाले हैं और जिनका स्वभाव दुर्जन और दुराचारी है।


जो दुराचारी है, सङ्गोपाङ्ग दुराचारी है अर्थात् दुराचार करने में कोई कमी न रहे, दुराचारका अङ्ग-उपांग न छूटे-- ऐसा दुराचारी है, वह भी अनन्य भक्त का मन अगर मेरे में भजन करने लग गया तो वह भी उसका ही भाग हो जाता है।


बाल्मीकि ,रत्नाकर आदि

भगवद  गीता अध्याय: 9

श्लोक 31


श्लोक:

क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति।

 कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति॥


भावार्थ:

वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और सदा रहने वाली परम शान्ति को प्राप्त होता है। हे अर्जुन! तू निश्चयपूर्वक सत्य जान कि मेरा भक्त नष्ट नहीं होता

 9॥31॥


व्याख्या:


इस श्लोक में स्पष्ट किया गया है। जब एक दुराचारी पुरुष अपने दृढ़ निश्चय से प्रेरित होकर अनन्यभक्ति का आश्रय लेता है। तब वह शीघ्र ही धर्मात्मा बन जाता है। वस्तु की धारणा का कारण उस वस्तु का धर्म है जैसे अग्नि की उष्णता अग्नि का धर्म है, जिस पर उनकी कोई सहमति नहीं हो सकती। इसी प्रकार मनुष्य का धर्म या स्वरूप चैतन्यस्वरूप आत्मा है, जिसके बिना उसकी कोई भी उपाधि वाला कार्य संभव नहीं है। इसलिए धर्मात्मा शब्द का अर्थ केवल साधु पुरुष करने से उसका अर्थ पूर्ण रूप से स्पष्ट नहीं होता है। क्या अन्य भक्ति और पुरुषार्थ से एकाग्रता का विकास होता है जिसका फल है मन की सूक्ष्मदर्शिता में अभिव्यंजना। ऐसा आदर्श मन ध्यान की सर्वोच्च उड़ान में भी अपनी समता बनी रहती है। शीघ्र ही वह आत्मानुभव की अनुभूति पाता है और इस प्रकार अधिकाधिक कुलीन सन्त का जीवन अपने आदर्शों से जीता, दर्शन एवं कर्मों के द्वारा अपने दिव्यत्व की सुगंध को सभी दिशाओं में स्थापित करता जाता है।साधारणत हमारे मन विषयों की इच्छाएँ और भोगों की लालसाओं में ही रमता है। उसका यह रामना जब शांत हो जाता है तब हम उस परम शक्ति का साक्षात् का अनुभव करता हैं। जो हमारे जीवन को सुरक्षित और शक्तिशाली बनाता है। यह शाश्वत शांति ही हमारा मूल स्वरूप है। विश्व का कोई धर्म ऐसा नहीं है, जिस में यह लक्ष्य न बताया गया हो। स्थिर और शांत मन वह खुली खिड़की है। जिसमें से हुंकार मनुष्य स्वयं को सत्य के दर्पण में प्रतिबिम्बित देखता है। यहाँ दिया गया है कि, वह शाश्वत शांति को प्राप्त करता है लेकिन इसका अर्थ ऐसा नहीं है कि यह दर्शाता है कि यह शांति हमारे बीच में स्थित है, यह आपके नित्यसिद्ध स्वस्वरूप की पहचान है। वेदांत में आवश्यक पूर्णत्व हम से दूर ही है, धीरे-धीरे हमारी जाग्रत अवस्था हमारे सपने से। यहाँ मन को केवल एकाग्र करने की ही आवश्यकता है। यदि कैमरे को ठीक से केन्द्रित (फोकस) नहीं किया गया तो सामने के सुन्दर दृश्य का केवल धुँधला चित्र ही प्राप्त होता है और यदि उस कैमरे पर समेक प्रकार से फोकस किया गया तो उसी से हमें संपूर्ण दृश्य का विस्तार एवं भव्य सौन्दर्य के साथ चित्र प्राप्त होते हैं। दुर्व्यवस्थित मन और बुद्धि कौन सा पारंपरिक इच्छा और इच्छा की उठती हुई तरंगों के मध्य थपेड़ों जैसी लहरों (तरंगों का) भंडार रहता है। आत्मदर्शन के लिए उपयुक्त साधन नहीं है। इस श्लोक की दूसरी पंक्ति में भगवान श्रीकृष्ण के अतुलनीय धर्म प्रचारक व्यक्तित्व का समावेश है। यह वर्णित के मूलतः अतिशय दुराचारी पुरुष भी भक्ति एवं सम्यक स्थिति के द्वारा शाश्वत शांति को ही प्राप्त होता है, श्रीकृष्ण मानो अर्जुन की पीठ थपथपाते हुए घोषित करते हैं। मेरा भक्त अर्जुन कभी नष्ट नहीं होता। भगवान श्रीकृष्ण से कहते हैं कि उसे इस पवित्र सत्य का सर्वत्र उद्घोष करना चाहिए। प्रयास निष्ठा अक्षम है तो वह सूचीबद्ध नहीं होता है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को दी गयी सम्मति के लिए किस विशेष शब्द प्रतिजानिहि का प्रयोग यहाँ किया गया है। उसकी अपनी ही प्रतिपादन की क्षमता है और वह शब्द आदेशात्मक परमावश्यकता या शीघ्रता को व्यक्त करता है। संस्कृत के विद्यार्थियों का यह भाव सरलता से कैसा दिखता है, और कौन से इस भाषा से अनभिज्ञ हैं, वे इस शब्द पर विशेष ध्यान.संक्षेप में हैं इन दोनों श्लोकों का सार यह है कि किस व्यक्ति ने अपने मन के किसी एक भाग में भी ईश्वर का हिस्सा बना रखा है, तो उसके ही प्रभाव से वह व्यक्ति अपने संपूर्ण जीवन को प्राप्त कर लेता है और अपने अंतर्बाह्य जीवन में प्रगति और विकास के योग्य बन जाता है। जैसे सड़क पर नीले रंग के प्रकाश के नीचे से कोई भी व्यक्ति किसी भी रंग के वस्त्र पहनने वाला है तो उसके वस्त्रों को नीलवर्ण का आहा प्राप्त होता है ठीक इसी प्रकार हृदय में आत्मचैतन्य का भान रहता है, पर मन में वही पुराने सभी दोष और पापपूर्ण प्रवृत्तियाँ भी उसके ईश्वरीय पूर्णत्व की स्वर्णिम आभा से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते हैं जैसे वस्त्र रखने की दुकान में रैक नेफथलीन की गोलियाँ रहती हैं वहाँ वस्त्रों की रक्षा होती है और कृमियों को अपनी दूरदर्शी रचनाएँ कहते हैं। उसी प्रकार आत्मा का अखण्ड स्मरण मानव व्यक्तित्व को दैवीय आन्त्रिक दुष्प्रवृत्तियों की कृमियों से सुरक्षित किया जाता है। आगे कहा गया है--


भगवद  गीता अध्याय: 9

श्लोक 32


श्लोक:

मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्यु पापयोनयः।

 स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्‌॥


भावार्थ:

हे अर्जुन! स्त्री, वैश्य, शूद्र तथा पापयोनि चाण्डालादि जो कोई भी हों, वे भी मेरे शरण होकर परमगति को ही प्राप्त होते हैं

 9॥32॥

व्याख्या और परिशिष्ट के रूप में;


भगवान ने आगे कहा  है कि लौकिक जगत की विचारधारा के वशीकरण के प्रभाव केवल दुराचारी लोग ही थे जो ईश्वर के अखण्ड स्मरण से बंध मुक्त हो जाते हैं। ऐसी बात नहीं है. कौन लोग जन्म से ही मानसिक और वित्तीय संतुलन की कमी एवं आंतरिक दुर्व्यवस्था का शिकार होते हैं, वे ही आत्मा के अखण्ड स्मरण की इस साधना से अन्तःकरण को शुद्ध एवं सुसंगठित कर सकते हैं। 

इसमें कोई सन्देह नहीं कि श्रुति, स्मृति पुराण औरों में ऐसी बहुत सी कहावतें हैं जो इस श्लोक की भाषा के समान ही विशिष्ट हैं। वैश्यों शूद्रों को पापयोनी में मिले सामुद्रिक नारे से उनके निंदा करने का अर्थ यह होगा कि धर्म का इष्ट प्रभाव समाज के केवल कुछ ही वैश्य भर के लोगों पर है। ऐसे भगवान श्रीकृष्ण जिस सिद्धांत का प्रतिपादन बारम्बार बल धार कर रहे हैं वह सरकारी शर्तें हैं। इस लिए यहां भगवान श्रीकृष्ण के वचनों के वास्तविक अभिप्राय को हमें डाउनलोड करना होगा। धर्म की साधना न शारीरिक विकास के लिए है और न ही शरीर के द्वारा पूर्ण करने योग्य है। विकास की प्रक्रिया को किस धर्म के लक्ष्य के रूप में प्राप्त किया जाता है। शरीर तो शरीर के लिंग में शामिल है।

 जाति आदि से किञ्चिन्मात्रा का प्रस्ताव नहीं है। आध्यात्मिक साधनाओं का प्रस्ताव मन और बुद्धि को सुगठित करना है। जो विकास की अपनी विदेशी राज्य में स्वयं स्थिर हो जाती है। और फिरआत्मा सर्वोपाधिविनिर्मुक्त स्वामहिमा में प्रतिष्ठित रहती है। अतः यहाँ संयुक्त स्त्रियादि शब्दों से समुद्र तट अंर्तकन के कुछ विशेष गोला से भरा होना चाहिए जो समय समय पर अलग-अलग लोगों में अलग-अलग तारतम्य में वार्तालाप होते हैं। ऐसे मन के लोगों में अत्यधिक अलौकिक प्रवृत्तियाँ होती हैं और जगत् के तीर्थों में उनकी अत्यधिक आशक्ति होती है।इसी प्रकार समाज में अनेक लोग अपनी विचारधारा एवं कर्मों में व्यावसायिक प्रवृत्ति के होते हैं। ये लोग अपने आन्तरिक मानसिक जीवन में वैश्यों के समान रहते हैं वे सदा इसकी ही गणना और चिंता करते हैं कि ईश्वर स्मरण आदि में वे मन की जो प्रमुखता से महसूस कर रहे हैं,उस का उन्हें क्या फायदा होगा। ऐसी गणना करने वाला और सदा अधिकाधिक लाभ की आशा रखने वाला मन ध्यानयोग के द्वारा विकसित होना उचित नहीं होता है। मन को स्थिर करके सर्वभूत अनंतस्वरूप में जीवन जीने का एकमात्र उपाय है सभी कर्मों को ईश्वर का दर्शन देना। इस प्रकार जब अध्यात्मशास्त्र में वैश्यों की निंदा की जाती है तो वास्तव में यह हमारे मन की वैश्य परंपरा की निंदा समझनी चाहिए। ऐसे वृत्ति का पुरुष इस दिव्य मार्ग पर प्रगति की आशा नहीं कर सकता।अंत में शूद्र शब्द के द्वारा अलस्य निद्रा और प्रमाद जैसे मन की वृत्तियों को सूचीबद्ध किया गया है। भगवान श्रीकृष्ण ने अपने युग में सर्वपरिचित शब्दों के उपयोग के साथ अंतकरण के विशेष गुण सिखाए हैं। इन शब्दों को अर्थ शास्त्र में हम कब कहते या देखते हैं। इस श्लोक का वास्तविक अर्थ में निहित है। उनका विपरीत अर्थ करके गीता को अपनी योग्यता के आधार पर प्राप्त मानवीय गुणों के धर्मशास्त्र की प्रतिष्ठा से नीचे जाने की आवश्यकता नहीं है। इस श्लोक के भगवान वचन देते हैं कि क्या अनन्य भक्ति और आत्मस्वरूप के सतत् निदिध्यासन से केवल दुराचारी लोग हैं। वर्ण जन्म से ही किसी प्रकार की मानसिक और बौद्धिक क्षमता का शिकार हुए लोग भी दृढ़ आध्यात्मिक लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं।वेदांत के अनुसार क्या हुआ? 

पाप मन की वह प्रवृत्ति है। जो उसका भूतकाल नकारात्मक और दोषपूर्ण जीवन के कारण मन में उत्पन्न हो जाता है। मन की ये कुवासनाएं दुर्निवार होती हैं और मनुष्य को बलपूर्वक गणतंत्र आदर्शों के जीवन को बढ़ावा देने की शक्ति मिलती है। फलत उस व्यक्ति के अपने और दूसरों के जीवन में भी भ्रम अशांति और दुर्बल संरचना उत्पन्न होती है। ये लड़कियां ही हैं महिला? वैश्य और शूद्र वृत्तान्तियों के मूल स्रोत हैं। केवल एक मन्द बुद्धि पंडित में ही वह दृष्टा होगी जो शास्त्रों के वाच्यार्थ के प्रति दृढ़ निष्ठा रखती है इस श्लोक की एक ही व्याख्या के अनुसार करने की मूर्खता। ऐसा करने में वह स्वयं भगवान श्रीकृष्ण द्वारा वर्णित वर्णाश्रम धर्म के अर्थ को आराम से भूल जायेंगे।संक्षेप में जब मन इन दुष्प्रवृत्तियों से भरा होता है, तब ऐसे मन वाले व्यक्ति का वेदाध्ययन करना निर्थक होता है। यही कारण केवल करुणावश ऋषियों ने वेदाध्ययन का निषेध किया है। 

इसका मतलब यह कदापि नहीं था कि ऐसे लोगों को हमेशा के लिए अध्ययन से प्राथमिकता दी जाए। इस पवित्र ब्रह्मविद्या का अध्ययन करने के लिए आध्यात्मिक साधनाओं का विधान आवश्यक है। ऐसी सभी साधनाओं में सबसे अधिक लोभी साधना है अर्थात भक्तिपूर्ण हृदय से ईश्वर का अखण्ड स्मरण करना। वेदांत ने घोषणा की है कि पूजा मन की शुद्धि है। मन की कृतियों या अल्पवृत्तियों को यहां स्त्री, वैश्य, शूद्र ,इन शब्दों के द्वारा सूचित किया गया है। एक बार जब ये नकारात्मक प्रवृत्तियां समाप्त हो जाती हैं, तब मन में एकाग्रता विशिष्टता और ध्यान की ऊंची उड़ान की क्षमता होती है। इस प्रकार यदि यात्रा के लिए वाहन पूर्णरूप से तैयार हो जाए तो गन्तव्य की प्राप्ति शीघ्र ही हो जाए गी । इसलिए भगवान वचन देते हैं वे भी परम गति को प्राप्त करते हैं। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को आत्मसाक्षात्कार के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं। जिससे शुद्धि होती है. मन की कृतियों या अल्पवृत्तियों 


को यहां स्त्री, वैश्य, शूद्र इन शब्दों के द्वारा सूचित किया गया है। एक बार जब ये नकारात्मक प्रवृत्तियां समाप्त हो जाती हैं। तब मन में एकाग्रता विशिष्टता और ध्यान की ऊंची उड़ान की क्षमता होती है। इस प्रकार यदि यात्रा के लिए वाहन पूर्णरूप से तैयार हो जाता और अपने गन्तव्य की प्राप्ति शीघ्र ही प्राप्त कर लेता है।


 इसलिए भगवान वचन देते हैं कि अत्यंत दुराचारी भी परम गति को प्राप्त करते हैं।  

वाल्मीकि जैसे कई लोग भगत हो गए वाल्मीकि, रामायण के रचयिता थे. उनका जन्म रत्नाकर नाम के डाकू के रूप में हुआ था. ऋषि नारद मुनि से मिलने के बाद उनका जीवन बदल गया. नारद मुनि ने उन्हें

राम राम जपने को कहा 

 ओर वह भगवान राम का उल्टा नाम 'मरा-मरा' जपने लगे  इसके बाद, उन्होंने ध्यान किया और एक दिव्य आवाज़ ने उन्हें नया नाम 'वाल्मीकि' दिया. वाल्मीकि का अर्थ है, 'एंथिल से पैदा हुआ' है।


मीरां बाई ,रविदास,भगत कबीर, ऐसे बहुत से नाम है जिन्हें ने भगवान की शरण प्राप्त कर ज्ञान प्राप्ति कर भगति के द्वारा बिना भेद भाव मुक्ति प्राप्त की।

भगवद  गीता अध्याय: 9

श्लोक 33


श्लोक:

किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा।

 अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्‌॥


भावार्थ:

फिर इसमें कहना ही क्या है, जो पुण्यशील ब्राह्मण था राजर्षि भक्तजन मेरी शरण होकर परम गति को प्राप्त होते हैं। इसलिए तू सुखरहित और क्षणभंगुर इस मनुष्य शरीर को प्राप्त होकर निरंतर मेरा ही भजन कर

 9॥33॥


भगवद  गीता अध्याय: 9

श्लोक 34


श्लोक:

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।

 मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायण:॥


भावार्थ:

मुझमें मन वाला हो, मेरा भक्त बन, मेरा पूजन करने वाला हो, मुझको प्रणाम कर। इस प्रकार आत्मा को मुझमें नियुक्त करके मेरे परायण होकर तू मुझको ही प्राप्त होगा

 ॥34॥ 

 

9.34।। यह श्लोक सम्पूर्ण अध्याय का सुन्दर फ्रेम है क्योंकि इस अध्याय के कई अन्य श्लोकों में यह काफी प्रकाशमय है। हम कह सकते हैं कि यह श्लोक अनेक श्लोकों के वर्णन का कार्य करता है। वेदांत के अध्यायों में आत्मविकास एवं आत्मसाक्षात्कार के लिए सम्यक ज्ञान और ध्यान का उपदेश दिया गया है। ध्यान के स्वरूप की परिभाषा इस प्रकार दी गयी है कि वह (सत्य) का ही चिंतन है उसका विषय में ही वर्णन है संगति ने अपनी चर्चा में मन का तत्परता या तत्स्वरूप बनने को कहा ज्ञानी पुरुष ब्रह्माभ्यास तत्व हैं। ब्रह्माभ्यास की यह ध्यान में ही महर्षि व्यास इस परिभाषा श्लोक में दृढ़ विश्वास अपने सुंदर भक्तिमार्ग का चित्रण करते हैं। यही विचार अध्याय में एक से अधिक अवसरों पर बातचीत की गई है। सब काल में किसी भी कार्य में लगे हुए भी मन को मुझसे स्थिर करके? मेरा भक्त मेरा वंदन करता है और मुझे नमस्कार करता है। संक्षिप्तत जीवन में आध्यात्मिक सुधार के लिए मन का विकास एक श्रृंखलाबद्ध आवश्यकता है। यदि वास्तव में हम आध्यात्म विकास करना चाहते हैं तो विपरीत परिस्थितियाँ या स्थितियाँ क्या हैं हमारी आदतें हमारा भूतकाल या वर्तमान जीवन कोई भी बाधक नहीं हो सकता। ईश्वर स्मरण या आत्मचिंतन ही सफलता का रहस्य है। इस प्रकार जब आप मुझसे परम लक्ष्य समझेंगे तब आपको मुझे प्राप्त होगा ये श्रीकृष्ण के अर्जुन को पसंद है। वर्तमान में हम कौन से कुछ हैं वह हमारे संस्कारों का कारण है। शुभ और दैवी संस्कारों के होने पर हम अज्ञानी के रूप में बनते हैं


। इस अध्याय के लिए दिया गया यह नाम उपयुक्त है। राजविद्या और राजगुह्य इन दो शब्दों का विस्तृत विवेचन किया गया है। अध्याय के शीर्षक में हमने देखा कि शुद्ध चैतन्य ही क्या ज्ञान है जिसमें प्रकाश में सभी औपधिक या वृत्तिज्ञान संभव है। अत: उस पारमार्थिक तत्त्व का बोध वाली इस विद्या को राजविद्या अत्यंत समीचीन कहती है। उपनिषदों में इसे सर्वविद्या प्रतिष्ठा कहा गया है? क्योंकि इसे जानने और देखने लायक कोई शेष नहीं रह जाता है यही मुण्डकोपनिषद की भी घोषणा है।


ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्री कृष्णार्जुनसंवादे राजविद्याराजगुह्ययोगो नाम नवमोऽध्यायः

 ॥9॥


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भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...