बुधवार, 20 दिसंबर 2023

सुहेल खान


#20dic 
नये जमाने के अभिनेता निर्माता सोहेल खान के जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामनाएं
🎁जन्म 20 दिसंबर 1969 
सोहेल खान एक भारतीय फिल्म अभिनेता और फिल्म निर्माता हैं। सोहेल खान का जन्म 20 दिसंबर 1969 को मुंबई, महाराष्ट्रा में हुआ था, अरबाज बॉलीवुड के मशहूर लेखक सलीम खान के बेटे हैं। उनकी माँ का नाम सलमा खान है और वह गृहणी हैं। उनकी सतौली माँ हेलेन अपने जमाने की बॉलीवुड डांसिंग डिवा रह चुकीं हैं। उनके दो भाई हैं- सलमान खान और अरबाज खान जोकि फिल्म अभिनेता हैं।सोहेल की दो बहनें भीं हैं। अलविरा अग्निहोत्री, और अर्पिता खान शर्मा। सोहेल के जीजा अतुल अग्निहोत्री भारतीय फिल्म निर्माता निर्देशक हैं।  
सोहेल खान ने अपनी प्रारम्भिक पढ़ाई अपने बड़े भाई सलमान खान के साथ सिंधिया स्कूल ग्वालियर से की है। 
सोहेल खान की शादी सीमा सचदेवा से हुई है। उनके दो बेटे हैं- योहान और निर्वान। 
वर्ष 1997 में सोहेल  ने अपने फ़िल्मी करियर की शुरुआत बतौर फिल्म निर्माता और निर्देशक फिल्म औजार से की थी। इस फिल्म में उनके बड़े भाई सलमान खान और संजय कपूर मुख्य भूमिका में नजर आये थे। उसके बाद उन्होंने अपने दोनों बड़े भाई सलमान और अरबाज को फिल्म प्यार किया तो डरना क्या में निर्देशित किया। यह फिल्म उस साल की सबसे अच्छी और हिट फिल्म साबित हुई थी। इस फिल्म में सलमान के अपोजिट काजोल नजर आयीं थी। उसके बाद वर्ष 1999 में उन्होंने एक बार फिर अपने दोनों भाईयों को लेकर फिल्म हेलो ब्रदर निर्देशित की। इस फिल्म में दोनों के अपोजिट रानी मुखर्जी नजर आयीं थीं। इस फिल्म ने भी बॉक्स-ऑफिस पर काफी अच्छा व्यापार किया था।  

साल 2002 में उन्होंने अपने अभिनय करियर की शुरुआत फिल्म मेने दिल तुझको दिया से की। उन्होंने इस फिल्म में अभिनय ही नहीं किया बल्कि इस फिल्म की कहानी, निर्देशन और निर्माण भी किया। हालांकि यह फिल्म बॉक्स-ऑफिस पर औंधे मुंह गिरी थी। उनकी बतौर अभिनेता पहली सफल फिल्म मेने प्यार क्योँ किया थी। इस फिल्म में उनके बड़े भाई सलमान खान,कैटरीना कैफ और सुष्मिता सेन मुख भूमिका में नजर आये थे। इसके बाद उन्होंने पार्टनर और आर्यन जैसी फ़िल्में बनाई। इतना सारा टैलेंट एक फिल्म में दिखाने के बाद भी सोहैल की पहली फिल्म बॉक्स-ऑफिस पर कुछ खास कमाल नहीं कर सकी। लेकिन पार्टनर नें बॉक्स-ऑफिस पर औसतन व्यापार किया था। इस फिल्म में उनके भाई सलमान खान, गोविंदा, कैटरीना कैफ और लारा दत्ता मुख्य भूमिका में नजर आएं थे। साल 2010 में वह फिल्म वीर में अपने भाई सलमान के साथ नजर आएं। हालंकि फिल्म खान होने बावजूद भी फिल्म बुरी फ्लॉप साबित हुई। उसके बाद उन्होंने साल 2014 फिर निर्देशन की दुनिया में फिल्म जय हो से वापसी की। हर फिल्म की तरह उन्होंने इस फिल्म में अपने बड़े भैय्या यानि सलमान खान को कास्ट किया। उनके अपोजिट इस फिल्म में डेजी शाह नजर आयीं थी।फिल्म हिट तो नहीं लेकिन बॉक्स-ऑफिस पर औसतन साबित हुई थी।

राबिन शा पुष्प

कथाकार, उपन्यासकार, नाटककार और पटकथा लेखक रॉबिन शॉ के जन्मदिन पर हार्दिक श्रद्धांजलि

रॉबिन शॉ पुष्प 
🎂जन्म: 20 दिसंबर, 1936;
 ⚰️मृत्यु: 30 अक्टूबर, 2014

 मशहूर कथा, उपन्यास, नाटक और पटकथा लेखक थे। आजीवन स्वतंत्र लेखक रहे रॉबिन शॉ पुष्प की पचास से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हैं। इनमें उपन्यास, कहानियां, कविताएं, लेख, नाटक और बाल साहित्य आदि शामिल है। अन्याय को क्षमा, दुल्हन बाज़ार जैसे उपन्यास, अग्निकुंड, घर कहां भाग गया कहानी संग्रह और फणीश्वर नाथ रेणु पर लिखी संस्मरण पुस्तक 'सोने की कलम वाला हिरामन' उनकी चर्चित कृतियां हैं।

जीवन परिचय

रॉबिन शॉ पुष्प का जन्म मुंगेर में 20 दिसंबर, 1936 को हुआ था। उनकी पहली कहानी धर्मयुग में छपी थी। रेडियो और टीवी के लिए भी उन्होंने कई नाटक, कहानियां लिखी थीं। उनकी कहानियों पर बनी टीवी फिल्में रांची, मुजफ्फरपुर, रायपुर और दिल्ली दूरदर्शन पर कई बार प्रसारित हो चुकी हैं। पटना से प्रकाशित फिल्म पत्रिका ‘चित्र साधना’ और ‘महादेश’ से भी वह लंबे अरसे तक जुड़े रहे थे। उनकी कहानियां उर्दू, बांग्ला, पंजाबी, मलयालम, गुजराती, मराठी और मैथिली में भी अनुवादित हुई हैं। रेडियो पर प्रसारित उनका लिखा नाटक ‘दर्द का सुख’ तो आज भी लोकप्रिय है।

रॉबिन शॉ उन गिने-चुने इसाइयों में हैं, जिन्होंने हिन्दी साहित्य के संसार में भरपूर नाम कमाया। नि:संदेह श्री पुष्प आज हिन्दी के एक प्रतिष्ठित कथाकार हैं-नुकीले अनुभव, खंडों के कुशल शब्द शिल्पी, संवेदनाओं की जटिल ग्रंथियों के अनूठे कथाकार।
- फ़ादर कामिल बुल्के

साहित्यिक परिचय

रॉबिन शॉ ने अपनी साहित्यिक जीवन की शुरुआत पत्रिका धर्मयुग से की थी। उसके बाद उनके कई कहानियां विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहीं। शॉ ने बिहार के गांव कस्बों पर भी कहानियां लिखीं हैं। उनकी कई अनूदित रचनाएं भी आई हैं। रॉबिन शॉ पुष्प की आत्म संस्मरणात्मक रचना यात्रा "एक वेश्या नगर" को पाठकों ने खूब सराहा। उन्होंने कई डॉक्यूमेंटरी फिल्में भी बनाईं और कुछ फिल्मों के लिए पटकथाएं भी लिखीं। इसी वर्ष उनके संपूर्ण रचनाकर्म को समेटती सात खंडों में रॉबिन शॉ पुष्प रचनावली प्रकाशित हुई थी। उनकी कहानियों के अंग्रेजी के अलावा तमाम भारतीय भाषाओं में अनुवाद छपे और सराहे गये। उन्हें शिवपूजन सहाय, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद का विशेष साहित्य सेवा सम्मान, फणीश्वरनाथ रेणु पुरस्कार, महिषी हिन्दी साहित्य रत्न सम्मान जैसे अनेक पुरस्कार और सम्मान पाने वाले रॉबिन शॉ पुष्प आजीवन आम आदमी के सुख, दुख, प्रेम और संघर्ष के लेखक रहे। उनकी पत्नी गीता शॉ पुष्प भी प्रख्यात लेखिका हैं।

सम्मान एवं पुरस्कार

रॉबिन शॉ पुष्प की कहानियां मैने हिन्दी की श्रेष्ठ पत्रिकाओं में पढ़ी हैं और उनमें देर तक डूबा रहा हूं। उनमें कलात्मक निपुणता के साथ मर्म पर चोट करने की क्षमता है। पात्रों के मानसिक द्वंद्वों का उद्घाटन करने में माहिर हैं। मैं उनसे मिलने उनके घर मुंगेर गया था। वह जिस शालीनता से मेहमानों का सत्कार करते हैं, उसी शालीनता से लिखते भी हैं।
- गोपाल दास नीरज

1965 में उदीयमान साहित्यिक पुरस्कार, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, बिहार सरकार
1980 में कला एवं साहित्यिक सेवा के लिए विशेष सम्मान, मंथन कला परिषद्, खगौल
1976 में हिंदी सेवा तथा श्रेष्ठ साहित्यिक सृजन के लिए सारस्वत सम्मान
1987 में शिव पूजन सहाय पुरस्कार, राजभाषा विभाग, बिहार सरकार
1994 में विशेष साहित्य सेवी सम्मान पुरस्कार, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, बिहार सरकार
1994 में बिहार के साहित्यकारों की कृतियों को सम्म्पादित एवं प्रकाशित करने की दिशा में किये गए कार्यों के लिए ह्यमुरली सम्मान, शब्दांजलि, पटना
1994 में हिंदी कथा-साहित्य की संमृद्धि में महत्त्वपूर्ण योगदान के लिए राजभाषा विभाग, बिहार सरकार द्वारा फणीश्वर नाथ रेणु पुरस्कार
2002 में मसीही हिंदी साहित्य-रतन-सम्मान से काथलिक हिंदी साहित्य समिति (भारत के काथलिक की हिंदी समिति) द्वारा इलाहाबाद में

निधन

अस्सी वर्षीय रॉबिन शॉ का 30 अक्टूबर, 2014 को दोपहर तकरीबन 2 बजे पटना स्थित अपने आवास पर निधन हो गया।

आज सोचता हूँ, ज़िंदगी को किसी ने डॉक्टर ने नुस्खे की तरह नहीं लिखा, कि सुबह यह, दोपहर यह, रात में यह। यह तो आसमान में, बहुत ऊँचाई तक उड़नेवाली चिड़ियाँ जैसी है... या पानी के भीतर, बहुत भीतर तक तैरती हुई कोई मछली... ज़िंदगी की ऊँचाई या गहराई को नापना इतना आसान नहीं। -रॉबिन शॉ पुष्प

मंगलवार, 19 दिसंबर 2023

नलिनी जयंत

नलिनी जयवंत 
#18feb
#20dic 
🎂18 फ़रवरी 1926 
⚰️ 20 दिसम्बर 2010 1940-50 के दशक की एक बॉलीवुड फिल्म अभिनेत्री थीं।

नलिनी जयवंत
नलिनी का जन्म 1926 मे बंबई (अब मुंबई) मे हुआ था। नलिनी के पिता और अभिनेत्री शोभना समर्थ (नूतन और तनुजा की माँ) की माँ रतन बाई आपस मे भाई बहन थे, इस नाते नलिनी, शोभना समर्थ की ममेरी बहन थीं। 1983 से नलिनी एकाकी जीवन जी रहीं।

नलिनी ने निर्देशक वीरेन्द्र देसाई से 1940 के दशक मे विवाह किया था। उनके और अभिनेता अशोक कुमार के प्यार की अफवाहें भी इस दौरान उड़ती रहीं।. बाद मे उन्होने अभिनेता प्रभु दयाल से दूसरा विवाह कर लिया, उन्होने प्रभु के साथ कई फिल्में भी कीं। अभिनेत्री नलिनी जयवंत (84 वर्ष) का मंगलवार, 21 दिसम्बर 2010 को मुंबई में निधन हो गया। तीन दिन तक उनकी मौत की खबर किसी को नहीं लगी। दिलीप कुमार, अशोक कुमार और देव आनंद के साथ उन्होंने कई हिट फिल्में दी थीं।
📽️

1983 नास्तिक 
1980 बंदिश 
1958 काला पानी 
1957 शेरू 
1957 मिस्टर एक्स 
1956 फिफ्टी फिफ्टी 
1955 रेलवे प्लेटफ़ॉर्म 
1955 लगन 
1955 मुनीम जी 
1954 नाज़ 
1954 नास्तिक 
1954 बाप बेटी 
1954 लकीरें 
1954 कवि 
1953 शिकस्त 
1953 राही 
1952 सलोनी 
1952 नौ बहार 
1950 संग्राम 
1950 समाधि

मानव कोल

#19dic

मानव कोल
19 दिसंबर 1976 (आयु 46)
बारामूला, जम्मू और कश्मीर, भारत
व्यवसायों
थिएटर निर्देशक
नाटककार
लेखक,अभिनेता ,फिल्म निर्माता,

उल्लेखनीय कार्य
शक्कर के पांच दाने (चीनी के पांच दाने)
नेल पॉलिश
तुम्हारी सुलु
इल्हाम (ज्ञानोदय)
पार्क
पुरस्कार
सर्वश्रेष्ठ पटकथा के लिए महिंद्रा एक्सीलेंस इन थिएटर अवार्ड (एमईटीए), 2006
एचटी मुंबई का सबसे स्टाइलिश थिएटर पर्सनैलिटी अवार्ड, 2017
भारत के काश्मीर में, एक कश्मीरी पंडित परिवार में। बाद में उनका परिवार होशंगाबाद, मध्य प्रदेश चला गया, जहां उनका पालन-पोषण हुआ। .

वह अपनी किशोरावस्था के अंत में एक प्रतिस्पर्धी तैराक थे और उन्होंने राज्य और राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में भाग लिया था। उन्होंने तैराकी में 14 राष्ट्रीय पदक जीते हैं
2012 में, कौल ने हंसा से फिल्म निर्देशक के रूप में डेब्यू किया, जिसके लिए उन्होंने पटकथा लिखी. उन्होंने हिंदी सिनेमा में अपने अभिनय करियर की शुरुआत फंतासी फिल्म जजंतरम ममंतरम से की। 2003, और गुजरात-आधारित हिंदी नाटक Kai में एक दक्षिणपंथी राजनेता के रूप में उनके प्रदर्शन के लिए सराहना की गई। 
कौल एक लेखक हैं जो अलगाव, उदासीनता, जड़हीनता आदि विषयों पर लिखते हैं।उनकी कुछ उल्लेखनीय पुस्तकों में शामिल हैं उनकी खोई हुई मातृभूमि, कश्मीर में वापस लौटने की उनकी यात्रा का वर्णन करता है।रूह कौल'हाल ही में प्रकाशित उपन्यास चलता फिरता, अंतिमा, बहुत दूर कितना दूर होता है, ठीक तुम्हारे पीछे।

उनकी यह सभी पुस्तकें हिन्दी में मिल जाती हैं।

ठीक तुम्हारे पीछे (2016): लघु कहानी संग्रह।
प्रेम कबूतर (2017): लघु कहानी संग्रह।अंग्रेजी अनुवाद:  (2019)ए नाइट इन द हिल्स
तुम्हारे बारे में. अंग्रेजी अनुवाद: मेरी खिड़की पर एक पक्षी (2023).
बहुत दूर, कितना दूर होता है: यात्रा वृतांत
चलता फिरता प्रेत
अंतिमा: उपन्यास
करता ने कर्म से
शर्ट का तीसरा बटन (2022)
रूह (2022): यात्रा वृतांत। अंग्रेजी अनुवाद: रूह (2023).
तितली (2023): उपन्यास
पतझड़ (2023): उपन्यास
📽️
2003 जजन्तरम् ममन्तरम्
2004 साचच्य आत घरात
2006 सातत्य
2007 1971
2010 दायें या बायें 
2010मैं हूँ
2013 काई पो चे!
2014 शहर की रोशनी
2016 वज़ीर 
2016 गंगा जल
2016 लाल रंग -
2016 एक घोटाला

ज्योति आमगे

#16dic 
Jyoti Amge
🎂16 दिसंबर 1993
 की पहचान महाराष्ट्र के नागपुर की रहने वाली दुनिया की सबसे छोटे कद की लड़की के रूप में होती है।

उनकी ऊंचाई सिर्फ 2 फीट 0.6 इंच (0.62 मी॰) है।

उनका वजन मात्र 5.5 किलोग्राम है।

वह अपने छोटी काया की बदौलत पूरी दुनिया में पहचान बना चुकी हैं।

2009 से लगातार 2019 तक ज्योति का नाम ‘गिनीज बुक ऑफ रिकार्ड्स’ में तथा इसके अतरिक्त ‘लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड’ में भी उनका नाम अपनी छोटी काया के लिए दर्ज हुआ हैं।

 

जन्म
🎂ज्योति आम्गे का जन्म 16 दिसंबर 1993 को नागपुर, महाराष्ट्र में हुआ था।

उनके पिता का नाम किशन आमगे और उनकी माता का नाम रंजना आमगे हैं।
ज्योति को एकॉन्ड्रोप्लेसिया यानि बौनेपन की बीमारी थी। इसी की वजह से उनका कद छोटा रह गया था।

ज्योति आमगे ने अपनी बीमारी को ही अपनी ताकत बना लिया है और उनका कहना है कि मैं बहुत खुश हूं कि आज मुझे दुनिया की सबसे छोटी महिला होने का खिताब मिला हुआ है।

शिक्षा – ज्योति आम्गे की जीवनी
जब ज्‍योति आमगे एक टीन एजर की तरह नागपुर के स्‍कूल में पढऩे गई तो वहां पर उनके हिसाब से सारे अरेजमेंट किए गए। उनकी ड्रेस, चेयर, डेस्‍क, सारी चीजें अलग से बनवाई गई थीं।

उनके बर्तन और बिस्‍तर भी उनके हिसाब से ही हैं।

उन्होने अपने मेहनत के बल पर स्नातक की पढाई पूरी की है।

करियर
2009 में ज्योति के ऊपर ‘बॉडी शॉक, टू फीट टॉल टीन’ नाम की एक डॉक्युमेंट्री भी बन चुकी है।

वह ‘बिग बॉस-6’ में भी बतौर गेस्ट नजर आ चुकी हैं।

इसके अतरिक्त उन्हें अमेरिकन हॉरर स्टोरी ‘फ्री शो’ के चौथे सीजन में काम करने का मौका मिला था।

इस शो से वह पूरे अमेरिका में बहुत पॉपुलर हो गई थीं। इसके अलावा वह एक इटैलियन शो भी होस्ट कर चुकी हैं।

ज्योति ने हॉलीवुड की फिल्म ‘लेग जिंडो’ में भी काम किया है। अब उन्हें बॉलीवुड से ऑफर का इंतजार है।

इनके फेवरेट एक्टर सलमान खान हैं। इनसे मिलने का मौका बिग बॉस-6 में मिला था।

 

ऊंचाई और वजन
उनकी ऊंचाई सिर्फ 2 फीट 0.6 इंच (0.62 मी.) है। उनका में वजन मात्र 5.5 किलोग्राम है।

रिकॉर्ड – ज्योति आम्गे की जीवनी
उनके 18वें जन्म दिन पर मिला सबसे बड़ा उपहार एक ख़िताब के रूप में दुनिया की सबसे छोटी महिला होने का और यह अवार्ड गिनीज बुक ऑफ़ वर्ड रिकार्ड के अधिकारियो के द्वारा दिया गया, इससे पहले यह ख़िताब अमेरिकी महिला ब्रिजेट जॉर्डन के नाम था। इससे पहले ज्योति आमगे को 2009 में भी टीनएजर में ही ख़िताब मिल चूका हैं। दुनिया की सबसे की छोटी लड़की होने का उस वक़्त इनकी लम्बाई 61.95 सेंटीमीटर थी।
2009 से लगातार 2019 तक ज्योति का नाम ‘गिनीज बुक ऑफ रिकार्ड्स’ में तथा इसके अतरिक्त ‘लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड’ में भी उनका नाम अपनी छोटी काया के लिए दर्ज हुआ हैं।

माही गिल

Mahie Gill
Born as Rimpy Kaur Gill
🎂Date of Birth
 19 December 1975
🎂19 दिसंबर 1975 चण्डीगढ़
भाई: नवनित गिल, शिवेंदर गिल

माही गिल भारतीय अभिनेत्री है। फलस्वरूप, साहेब, बीवी और गैंगस्टर, साथ ही इसके सीक्वल, साहेब, बीवी और गैंगस्टर रिटर्न्स में यौन रूप से कुंठित पत्नी माधवी देवी को चित्रित करने के बाद उन्हें पहचान मिली।
गिल का जन्म चंडीगढ़ पंजाबी जाट में हुआ था सिख परिवार 19 दिसंबर 1975 को उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की 1998 में पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़ से थिएटर में मास्टर डिग्री ली
गिल को पहला ब्रेक पंजाबी आधारित बॉलीवुड फिल्म हवाएं और थिएटर के साथ-साथ उन्होंने कुछ पंजाबी फिल्में भी की हैं। . अनुराग ने पहली बार उन्हें एक पार्टी में देखा और तुरंत उन्हें फिल्म देव डी में पारो का किरदार निभाने के लिए फाइनल कर लिया।उन्होंने राम गोपाल वर्मा की नॉट ए लव स्टोरी में काम किया, जो पर आधारित थी 2008 का नीरज ग्रोवर मर्डर केस।उन्होंने साहेब, बीवी और गैंगस्टर में भी काम किया था। जिम्मी शेरगिल और रणदीप हुडा के साथ, जो था 30 सितंबर 2011 को रिलीज़ हुई। इस फ़िल्म ने उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के लिए फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार में नामांकन दिलाया।

गिल पान सिंह तोमर में इरफान खान के साथ नजर आए . यह एक एथलीट की सच्ची कहानी है जो डकैत बन गया। इसमें उन्होंने शीर्षक किरदार की पत्नी की भूमिका निभाई। गिल ने अपूर्वा लाखिया' की फिल्म तूफान से डेब्यू किया था। , एक साथ हिंदी संस्करण, ज़ंजीर के साथ शूट किया गया। उन्होंने अपना पहला आइटम नंबर तिग्मांशु धूलिया' एस फिल्म बुलेट राजा.

माही गिल अगली बार आगामी वेब सीरीज '1962 द वॉर इन द हिल्स'' में नजर आएंगी, जिसका निर्देशन महेश मांजरेकर. श्रृंखला में अभय देओल, सुमीत व्यास,आकाश ठोसर.
📽️
2021 जोरा: दूसरा अध्याय पंजाबी
2020 दुर्गामती सताक्षी गांगुली 
दूरदर्शन
2019 ठाकुरगंज का परिवार शरबती हिंदी 
पोशम पा
2018 प्रसिद्ध हिंदी 
साहेब, बीवी और गैंगस्टर 3
2017 शादी की सालगिरह
2016 आतिशबाजी इश्क
2015 अरे भाई
2014 ट्रैफिक जाम में बुद्ध
और शरीफ
2013 
ज़ंजीर मोना 
बुलेट राजा
2012 पान सिंह तोमर हिंदी 
कैरी ऑन जट्टा माही कौर पंजाबी 
दबंग 2

वेद पाल वर्मा

वेदपाल का कल्पनाशील पार्श्वसंगीत : ‘ओ मेरे हमराही क्यूं तेरा मन घबराए’...|रसरंग,Rasrang - Dainik Bhaskar
'ओ बेवफ़ा' मूवी में हेमलता के गाए गीत 'अब वफ़ा का नाम न ले कोई' का संगीत निर्देश वेदपाल ने ही किया था।

आज अधिकांश लोग वेदपाल वर्मा का नाम भी नहीं जानते होंगे, लेकिन एक ज़माना था जब उन्होंने फ़िल्म संगीत को कुछ दिलकश धुनें दी थीं। सिरसा (हरियाणा) के आर्यसमाजी परिवार में जन्मे वेदपाल वर्मा को बचपन में पिता अकसर भजन सुनाने मंदिर में ले जाते थे। संगीत के मूल तत्व उन्हें यहीं से प्राप्त हुए। बाद में संगीत की शिक्षा ली, कुछ दिनों तक मैकेनिक भी रहे, फिर ऑल इंडिया रेडियो में संगीतकार बने और मोतीराम जी तथा जीतूराम जी जैसे संगीतज्ञों से सीखते भी रहे। उनके काम से प्रभावित होकर एस.एस. ओबेराॅय और गीतकार मधुकर ने उन्हें बम्बई में काम का न्योता दिया। छठे दशक में अन्य कई संगीतकारों की तरह वे बम्बई गायक बनने चले गए। संघर्ष करते रहे, पर उन्हें सही अवसर नहीं मिला। तभी एक बार गीतकार रमेश शास्त्री ने निर्माता राधेश्याम झुनझुनवाला और निर्देशक सत्येन बोस की 'परिचय' (1954) में शैलेष के साथ संगीतकार के रूप में काम दिलवाया। इस फ़िल्म में वेदपाल ने 'मेरा घोड़ा बड़ा है निगोड़ा' (किशोर), 'देखा जो बालमा ने मेरी तरफ' (शमशाद) और 'मैं जनम जनम से हूं दुखिया' (आशा) की धुनें बनाई थीं पर गीत खास लोकप्रिय नहीं हुए। वैसे इससे पहले वेदपाल ने 'आई फिर से बहार' नाम की एक फ़िल्म में संगीत दिया था। ज्यादा गीत फ़िल्म के तमिल वर्ज़न से ही डब थे और फ़िल्म रिलीज़ न हो सकी थी। वैसे इस फ़िल्म में भी लता और साथियों के स्वर में 'शर्मीली शाम है' एक अच्छी मेलोडी थी, जिसमें कोरस का सुंदर प्रयोग किया गया था। 'परिचय' की असफलता के बाद फ़िल्म 'सारंग' भी रिलीज़ नहीं हुई। वेदपाल ने बांग्ला फ़िल्म 'साॅरी मैडम' (1962) में मुकेश से एक बांग्ला गीत 'साॅरी मैडम साॅरी सिस्टर' इसी दरमियान गवाया और पंजाबी फ़िल्म 'छोरियां दी टोली' में भी संगीत दिया।

वर्षों खोए रहने के उपरान्त नानाभाई भट्ट निर्देशित 'भूतनाथ' (1963) में उन्हें फिर मौका मिला। यह फ़िल्म कुछ चली भी थी, पर हम इसे याद करेंगे लता के दो अत्यंत मेलोडियस नगमों के लिए। वैसे तो उषा मंगेशकर का गाया 'मेरे महबूब सुन' भी हिट रहा था, पर लता के 'तुम न आए सनम शमा जलती रही' का पहाड़ी आधारित अनुकम्पन और 'भूले से कर लिया प्यार, हो गई नादानी' की झूमती धुन आज भी प्रभावित किए बिना नहीं रहती। 'संत तुकाराम' (1965) के गीत भी कुछ चले थे विशेषकर 'राम जिसे तारे तो कौन उसे मारे' (मन्ना डे, साथी), 'अब तो बना दे अवगुण मेरे' (रफ़ी), 'ओ भोले जोगी सुन मेरी पायलिया' (मन्ना डे, साथी)। 'संत तुकाराम' में वेदपाल ने बहुत कल्पनाशील पार्श्वसंगीत दिया था तथा जहां भी आवश्यकता देखी, वहां स्थानीय वाद्ययंत्रों का भी बखूबी इस्तेमाल किया। 'गुनहगार' (1967) में भी वेदपाल ने अच्छा ही संगीत दिया था, भले ही आधुनिक आॅर्केस्ट्रा वाला 'नई-नई हैं मंज़िलें नए नए हैं रास्ते' (महेन्द्र, उषा मंगेशकर) या 'शाम ढली, शमा जली, झूम उठी जिं़दगी' (आशा) जैसे गीत न चले।

फ़िल्मों में अच्छे अवसर न मिलने से वेदपाल गै़रफ़िल्मी गीतों की ओर भी मुड़े और एचएमवी के लिए भी उन्होंने कुछ गीत रेकाॅर्ड कराए जो रेडियो पर बजे भी। वेदपाल ने ढेर सारे जिंगल, वृत्तचित्रों और नाटकों में भी संगीत दिया। उनका 'निरमा' का विज्ञापन तो बेहद मशहूर हुआ। वेदपाल को गीत लिखने का भी शौक था और कल्याणजी-आनंदजी संगीतबद्ध 'सुनहरी नागिन' में उनका लिखा भी एक गीत था 'लेते लेते तेरा नाम मैं तो हो गई रे बदनाम'। 'माया सुंदरी' (1967) में संगीत देने के अलावा उन्होंने गीत लेखन में भी सहयोग किया था, हालांकि नाम सिर्फ सरस्वती कुमार 'दीपक' का ही रहा। हरमिंदर सिंह 'हमराज़' के हिंदी फ़िल्म गीतकोश, खण्ड 4 के अनुसार मूल तमिल से डब की गई इस फ़िल्म की डबिंग कलकत्ता में हुई थी और शायद इसी कारण 'किरणों की डोरी चांद का पलना', 'आज मिले हैं दो प्यार भरे दिल' जैसे सुंदर, नाजुक गीतों को आरती मुखर्जी, मानवेंद्र मुखर्जी जैसे बंगाली गायक-गायिकाओं से वेदपाल ने गवाया। इसी दौर में वेदपाल वर्मा ने कुछ तमिल और मलयालम फ़िल्मों में भी संगीत दिया।

वेदपाल मानते थे कि फ़िल्मों में संगीतकार को निर्बाध स्वतंत्रता नहीं रहती - उसे कहानी, चरित्र और निर्माता-निर्देशकों की मांग का बहुत ध्यान रखना पड़ता है। वेदपाल का दुर्भाग्य यह था कि उनको मिलने वाली अधिकांश फिल्में बाॅक्स आॅफिस पर इतनी असफल थीं कि उसके गीत सुने ही नहीं जा सके, जैसे 'भीमा मेरा हाथी' (1973) के स्वलिखित 'हजार दिल में हों तो ऐसे निकले वो अरमां' (मुकेश, हेमलता) और 'नन्ही, मुन्नी मेरी कलियन की अंखियन में मीठी नींद सजा ले' (मन्ना डे), 'हम जंगली हैं' (1973) का भी खुद का ही लिखा हुआ 'बातों बातों में मेरे दिल को चुराया तुम ने' (रफ़ी, उषा मंगेशकर), 'कोरा बदन' (1974) का 'झुरमुट बोले' (मनहर, कृष्णा बोस), 'वफ़ादार' (1976) का मुकेश का दुर्लभ गीत 'रोने को तो रात पड़ी है' एवं इसी फ़िल्म के 'ऐ मेरी जाने वफ़ा ऐ मेरी जाने हयात' (महेंद्र, कृष्णा बोस) और 'कभी दिल और कभी शमा जलकर रोए' (उषा मंगेशकर)। 1970 की भारतीय और ऐफ्रो कैरीबियन मजदूरों को लेकर बनाई गई फ़िल्म 'द राइट एंद द रांग' में वेदपाल वर्मा ने मुकेश से एक लाज़वाब गीत गवाया था - 'ओ मेरे हमराही क्यूं तेरा मन घबराए'। यह आज भी मुकेश के खूबसूरत गीतों में स्थान रखता है।

वेदपाल को पहली बार एक बड़े निर्माता के साथ काम करने का अवसर मिला 1980 में जब सावन कुमार ने अपनी पत्नी उषा खन्ना से सम्भवतः मनमुटाव के कारण 'ओ बेवफ़ा' का संगीत उन्हें सौंपा। 'ओ बेवफ़ा' में कहानी की सिचुएशन के हिसाब से धुन और वाद्य-संयोजन क़ाबिलेतारीफ़ था तथा धुनों में एक ताज़गी भी थी, जो शोरगुल के आ चुके दौर में और भी आकर्षक लगती है, विशेषकर हेमलता के गाए पीलू पर आधारित 'भरी बरसात में दिल जलाया' तथा 'अब वफ़ा का नाम न ले कोई' में। वहीं 'प्रीत न करियो मन ने कहा था' (हेमलता) और 'मेरा दिल किसने लिया' (हेमलता, सुरेश वाडकर) में लोक धुनों और खय्याम की शैली का प्रभाव साफ नज़र आता है। 'ज़ख्मी दिल' (1984) तथा 'गर्ल फ्राॅम इंडिया' जैसी फ़िल्मों से वेदपाल को कोई विशेष फ़ायदा नहीं हुआ, पर सावन कुमार ने पुनः उन्हें 'सौतन की बेटी' (1988) में लिया। गीतों को 'सौतन' की तुलना में तो कुछ भी लोकप्रियता नहीं मिली, पर यह निर्विवाद है कि इस फ़िल्म में वेदपाल ने लता से 'भूतनाथ' की तरह फिर दो बड़े मीठे मेलोडी प्रधान गीत गवाए थे - 'हम भूल गए रे हर बात' और 'कहां थे आप'। 'मेरा पति मेरी ज़िंदगी' (1993) और 'पिया का घर' (1997) में भी वेदपाल का संगीत था। पर कुल मिलाकर वेदपाल कामयाब संगीतकारों की श्रेणी में नहीं ही आ पाए। गोरेगांव के प्रसाद शाॅपिंग सेंटर के तीसरे माले के एक छोटे-से कमरे में वे रहते थे और अंततः 19 दिसम्बर, 1996 को अपनी गुमनाम-सी ज़िंदगी की तरह ही गुमनामी में उनका निधन हो गया।

मनुस्मृति

. ................मनुस्मृति.................... जरा सोचिए, अगर आज भारत का कानून यह तय कर दे कि— "एक आम आदमी चोरी करे तो उसे...