बुधवार, 16 अगस्त 2023

पंडित जसराज

पंडित जसराज
प्रसिद्धि शास्त्रीय गायक
🎂जन्म 28 जनवरी, 1930
जन्म भूमि पिली मंडोरी, ज़िला हिसार (अब फ़तेहाबाद, हरियाणा)
⚰️मृत्यु 17 अगस्त, 2020
मृत्यु स्थान न्यू जर्सी, संयुक्त राज्य अमेरिका
अभिभावक पंडित मोतीराम जी
पति/पत्नी मधु जसराज
संतान पुत्र सारंग देव और पुत्री दुर्गा
कर्म भूमि भारत
पुरस्कार-उपाधि पद्म विभूषण (2000), पद्म भूषण (1990) और पद्मश्री (1975)
प्रसिद्धि शास्त्रीय गायक
विशेष योगदान इनके द्वारा अवधारित एक अद्वितीय एवं अनोखी जुगलबन्दी, जो 'मूर्छना' की प्राचीन शैली पर आधारित है। इसमें एक महिला और एक पुरुष गायक अपने-अपने सुर में भिन्न रागों को एक साथ गाते हैं।
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी पंडित जसराज ने बाबा श्याम मनोहर गोस्वामी महाराज के सान्निध्य में 'हवेली संगीत' पर व्यापक अनुसंधान कर कई नवीन बंदिशों की रचना भी की थी।
पंडित जसराज (अंग्रेज़ी: Pandit Jasraj, जन्म- 28 जनवरी, 1930, हिसार; मृत्यु- 17 अगस्त, 2020, न्यू जर्सी, संयुक्त राज्य अमेरिका) भारतीय शास्त्रीय संगीत के विश्वविख्यात गायक थे। हमारे देश में शास्त्रीय संगीत कला सदियों से चली आ रही है। इस कला को न केवल मनोरंजन का, अपितु ईश्वर से जुड़ने का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत माना गया है। ऐसे ही एक आवाज़ थे ख्यातिप्राप्त पंडित जसराज जी, जिन्होंने मात्र 3 वर्ष की अल्पायु में कठोर वास्तविकताओं की इस ठंडी दुनिया में अपने दिवंगत पिता से विरासत के रूप में मिले केवल सात स्वरों के साथ क़दम रखा था। उनका संबंध मेवाती घराने से था। शास्‍त्रीय संगीत के क्षेत्र में उल्‍लेखनीय योगदान के लिए उन्‍हें पद्म विभूषण (2000), पद्म भूषण (1990) और पद्मश्री (1975) जैसे सम्मान से नावाजा गया था।

जीवन परिचय
पंडित जसराज का जन्म 28 जनवरी, 1930 को हिसार के एक ऐसे परिवार में हुआ जिसे 4 पीढ़ियों तक हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत को एक से बढ़कर एक शिल्पी देने का गौरव प्राप्त है। उनके पिताजी पंडित मोतीराम जी स्वयं मेवाती घराने के एक विशिष्ट संगीतज्ञ थे। पं. जसराज को संगीत की प्राथमिक शिक्षा अपने पिता से ही मिली, परन्तु जब वे मात्र 3 वर्ष के थे, प्रकृति ने उनके सर से पिता का साया छीन लिया। पंडित मोतीराम जी का देहांत उसी दिन हुआ जिस दिन उन्हें हैदराबाद और बेरार के आखिरी निज़ाम उस्मान अली खाँ बहादुर के दरबार में राज संगीतज्ञ घोषित किया जाना था। उनके बाद परिवार के लालन-पालन का भार संभाला उनके बडे़ सुपुत्र अर्थात् पं. जसराज के अग्रज, संगीत महामहोपाध्याय पं. मणिराम जी ने। इन्हीं की छत्रछाया में पं. जसराज ने संगीत शिक्षा को आगे बढ़ाया तथा तबला वादन सीखा।
मणिराम जी अपने साथ बालक जसराज को तबला वादक के रूप में ले जाया करते थे। परंतु उस समय सारंगी वादकों की तरह तबला वादकों को भी क्षुद्र माना जाता था तथा 14 वर्ष की किशोरावस्था में इस प्रकार के निम्न बर्ताव से अप्रसन्न होकर जसराज ने तबला त्याग दिया और प्रण लिया कि जब तक वे शास्त्रीय गायन में विशारद प्राप्त नहीं कर लेते, अपने बाल नहीं कटवाएँगे। इसके पश्चात् उन्होंने मेवाती घराने के दिग्गज महाराणा जयवंत सिंह वाघेला से तथा आगरा के स्वामी वल्लभदास जी से संगीत विशारद प्राप्त किया। पंडित जी के परिवार में उनकी पत्नी मधु जसराज, पुत्र सारंग देव और पुत्री दुर्गा हैं।

आवाज़ की विशेषता
पं. जसराज के आवाज़ का फैलाव साढ़े तीन सप्तकों तक था। उनके गायन में पाया जाने वाला शुद्ध उच्चारण और स्पष्टता मेवाती घराने की 'ख़याल' शैली की विशिष्टता को झलकाता है। उन्होंने बाबा श्याम मनोहर गोस्वामी महाराज के सान्निध्य में 'हवेली संगीत' पर व्यापक अनुसंधान कर कई नवीन बंदिशों की रचना भी की थी। भारतीय शास्त्रीय संगीत में उनका सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। उनके द्वारा अवधारित एक अद्वितीय एवं अनोखी जुगलबन्दी, जो 'मूर्छना' की प्राचीन शैली पर आधारित है। इसमें एक महिला और एक पुरुष गायक अपने-अपने सुर में भिन्न रागों को एक साथ गाते हैं। पंडित जसराज के सम्मान में इस जुगलबन्दी का नाम 'जसरंगी' रखा गया।

अंटार्कटिका में गायन
दिग्गज शास्त्रीय गायक पंडित जसराज ने एक अनूठी उपलब्धि भी हासिल की थी। इस शास्त्रीय गायक ने अंटार्कटिका के दक्षिणी ध्रुव पर अपनी प्रस्तुति दी थी। इसके साथ ही वह सातों महाद्वीपों में कार्यक्रम पेश करने वाले पहले भारतीय बन गए थे। पद्म विभूषण से सम्मानित पंडित जसराज ने 8 जनवरी को अंटार्कटिका तट पर 'सी स्प्रिट' नामक क्रूज पर गायन कार्यक्रम पेश किया था। जसराज जी ने इससे पहले वर्ष 2010 में पत्नी मधुरा के साथ उत्तरी ध्रुव का दौरा किया था।

फ़िल्म में गायन
शास्त्रीय गायन के इतर पंडित जसराज ने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में भी गाने गाए थे। उन्होंने पहली बार साल 1966 में आई फिल्म 'लड़की सह्याद्रि' में अपनी आवाज दी थी। डायरेक्टर वी शांताराम की इस फिल्म में उन्होंने 'वंदना करो अर्चना करो' भजन को राग अहीर भैरव में गाया था। उन्होंने दूसरा गाना साल 1975 में आई फिल्म 'बीरबल माय ब्रदर' में गाया था। इसमें उन्होंने और भीमसेन जोशी ने राग मालकौन में जुगलबंदी की थी।

मशहूर शास्त्रीय गायक पंडित जसराज ने पहली बार सन 2008 में रिलीज़ किसी हिंदी फ़िल्म के एक गीत को अपनी आवाज दी थी। विक्रम भट्ट निर्देशित फ़िल्म ‘1920’ के लिए उन्होंने अपनी जादुई आवाज में एक गाना गाया। पंडित जसराज ने इस फ़िल्म के प्रचार के लिए बनाए गए वीडियो के गीत ‘वादा तुमसे है वादा’ को अपनी दिलकश आवाज दी थी। गाने की शूटिंग मुम्बई के जोगेश्वरी स्थित विसाज स्टूडियो में हुई। इस गाने को संगीत से सजाया अदनान सामी ने और बोल लिखे समीर ने। वीडियो के गानों की कोरियोग्राफी की थी राजू खान ने। ए.एस.ए. प्रोडक्शन एंड एंटरप्राइजेज लिमिटेड के निर्माण में बनाई जा रही फ़िल्म ‘1920’ में नए कलाकार काम कर रहे थे। वर्ष 1920 के दौर में सजी यह फ़िल्म एक भारतीय लड़के और एक अंग्रेज़ लड़की की प्रेम कहानी है। ये दोनों लोगों के भारी विरोधों के बावजूद दोनों एक-दूसरे से शादी कर लेते हैं।

इनके अलावा उन्होंने दो भक्ति गीत श्री मधुराष्टकम् और गोविन्द दामोदर माधवेति भी गाए, जिन्हें बेहद पसंद किया गया।
पंडित जसराज की ⚰️मृत्यु 17 अगस्त, 2020 को दिल का दौरा पड़ने से न्यू जर्सी, अमेरिका में हुई।
गीत - वादा तुमसे है वादा
फ़िल्म - 1920
गीतकार - समीर
संगीत निर्देशक अदनान सामी -
कलाकार - रजनीश दुग्गल, अदा शर्मा
म्यूजिक ऑन - टी-सीरीज़

नया
पंडित जसराज

🎂 जन्म 28 जनवरी, 1930
जन्म भूमि पिली मंडोरी, ज़िला हिसार (अब फ़तेहाबाद, हरियाणा)
⚰️मृत्यु 17 अगस्त, 2020
मृत्यु स्थान न्यू जर्सी, संयुक्त राज्य अमेरिका

अभिभावक पंडित मोतीराम जी
पति/पत्नी मधु जसराज
संतान पुत्र सारंग देव और पुत्री दुर्गा
कर्म भूमि भारत
पुरस्कार-उपाधि पद्म विभूषण (2000), पद्म भूषण (1990) और पद्मश्री (1975)
प्रसिद्धि शास्त्रीय गायक
विशेष योगदान इनके द्वारा अवधारित एक अद्वितीय एवं अनोखी जुगलबन्दी, जो 'मूर्छना' की प्राचीन शैली पर आधारित है। इसमें एक महिला और एक पुरुष गायक अपने-अपने सुर में भिन्न रागों को एक साथ गाते हैं।
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी पंडित जसराज ने बाबा श्याम मनोहर गोस्वामी महाराज के सान्निध्य में 'हवेली संगीत' पर व्यापक अनुसंधान कर कई नवीन बंदिशों की रचना भी की थी।
हमारे देश में शास्त्रीय संगीत कला सदियों से चली आ रही है। इस कला को न केवल मनोरंजन का, अपितु ईश्वर से जुड़ने का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत माना गया है। ऐसे ही एक आवाज़ थे ख्यातिप्राप्त पंडित जसराज जी, जिन्होंने मात्र 3 वर्ष की अल्पायु में कठोर वास्तविकताओं की इस ठंडी दुनिया में अपने दिवंगत पिता से विरासत के रूप में मिले केवल सात स्वरों के साथ क़दम रखा था। उनका संबंध मेवाती घराने से था। शास्‍त्रीय संगीत के क्षेत्र में उल्‍लेखनीय योगदान के लिए उन्‍हें पद्म विभूषण (2000), पद्म भूषण (1990) और पद्मश्री (1975) जैसे सम्मान से नावाजा गया था।
मणिराम जी अपने साथ बालक जसराज को तबला वादक के रूप में ले जाया करते थे। परंतु उस समय सारंगी वादकों की तरह तबला वादकों को भी क्षुद्र माना जाता था तथा 14 वर्ष की किशोरावस्था में इस प्रकार के निम्न बर्ताव से अप्रसन्न होकर जसराज ने तबला त्याग दिया और प्रण लिया कि जब तक वे शास्त्रीय गायन में विशारद प्राप्त नहीं कर लेते, अपने बाल नहीं कटवाएँगे। इसके पश्चात् उन्होंने मेवाती घराने के दिग्गज महाराणा जयवंत सिंह वाघेला से तथा आगरा के स्वामी वल्लभदास जी से संगीत विशारद प्राप्त किया। पंडित जी के परिवार में उनकी पत्नी मधु जसराज, पुत्र सारंग देव और पुत्री दुर्गा हैं।

आवाज़ की विशेषता
पं. जसराज के आवाज़ का फैलाव साढ़े तीन सप्तकों तक था। उनके गायन में पाया जाने वाला शुद्ध उच्चारण और स्पष्टता मेवाती घराने की 'ख़याल' शैली की विशिष्टता को झलकाता है। उन्होंने बाबा श्याम मनोहर गोस्वामी महाराज के सान्निध्य में 'हवेली संगीत' पर व्यापक अनुसंधान कर कई नवीन बंदिशों की रचना भी की थी। भारतीय शास्त्रीय संगीत में उनका सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। उनके द्वारा अवधारित एक अद्वितीय एवं अनोखी जुगलबन्दी, जो 'मूर्छना' की प्राचीन शैली पर आधारित है। इसमें एक महिला और एक पुरुष गायक अपने-अपने सुर में भिन्न रागों को एक साथ गाते हैं। पंडित जसराज के सम्मान में इस जुगलबन्दी का नाम 'जसरंगी' रखा गया।
फ़िल्म में गायन
शास्त्रीय गायन के इतर पंडित जसराज ने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में भी गाने गाए थे। उन्होंने पहली बार साल 1966 में आई फिल्म 'लड़की सह्याद्रि' में अपनी आवाज दी थी। डायरेक्टर वी शांताराम की इस फिल्म में उन्होंने 'वंदना करो अर्चना करो' भजन को राग अहीर भैरव में गाया था। उन्होंने दूसरा गाना साल 1975 में आई फिल्म 'बीरबल माय ब्रदर' में गाया था। इसमें उन्होंने और भीमसेन जोशी ने राग मालकौन में जुगलबंदी की थी।

मशहूर शास्त्रीय गायक पंडित जसराज ने पहली बार सन 2008 में रिलीज़ किसी हिंदी फ़िल्म के एक गीत को अपनी आवाज दी थी। विक्रम भट्ट निर्देशित फ़िल्म ‘1920’ के लिए उन्होंने अपनी जादुई आवाज में एक गाना गाया। पंडित जसराज ने इस फ़िल्म के प्रचार के लिए बनाए गए वीडियो के गीत ‘वादा तुमसे है वादा’ को अपनी दिलकश आवाज दी थी। गाने की शूटिंग मुम्बई के जोगेश्वरी स्थित विसाज स्टूडियो में हुई। इस गाने को संगीत से सजाया अदनान सामी ने और बोल लिखे समीर ने। वीडियो के गानों की कोरियोग्राफी की थी राजू खान ने। ए.एस.ए. प्रोडक्शन एंड एंटरप्राइजेज लिमिटेड के निर्माण में बनाई जा रही फ़िल्म ‘1920’ में नए कलाकार काम कर रहे थे। वर्ष 1920 के दौर में सजी यह फ़िल्म एक भारतीय लड़के और एक अंग्रेज़ लड़की की प्रेम कहानी है। ये दोनों लोगों के भारी विरोधों के बावजूद दोनों एक-दूसरे से शादी कर लेते हैं।

इनके अलावा उन्होंने दो भक्ति गीत श्री मधुराष्टकम् और गोविन्द दामोदर माधवेति भी गाए, जिन्हें बेहद पसंद किया गया।

जीवन के 75वें सोपान पर

पं. जसराज
"रानी तेरो चिरजियो गोपाल...." 28 जनवरी, 2005 की भोर से ही "रसराज" कहे जाने वाले संगीत मार्तण्ड पं. जसराज के चाहने वालों के होठों पर उनके इस भजन के बोल तैर रहे थे। "रसराज" जसराज ने ऋतुराज की दस्तक के साथ ही अपने जीवन के 75 सोपान तय किए थे। 75 दीपों की मालिका के साथ दिल्ली के कमानी सभागार में पंडित जसराज के ज्योतिर्मय जीवन की कामना की गई। जब पंडित जी के हृदय की शल्य चिकित्सा हुई थी, तब सबको लगता था कि पता नहीं, उनके मधुर स्वरों की गंगा उसी प्रकार प्रवाहित होती रहेगी या फिर....। पंडित जी के शब्दों में -

"वह तो बिल्कुल वैसा ही था, जैसे किसी सितार के तारों में जंग लग जाए और फिर आप उन तारों को बदल दें या मिट्टी के तेल में रुई डुबोकर साफ कर दें। "बाईपास सर्जरी" से पहले कुछ तकलीफें रहती थीं, उसके बाद सब एकदम निर्मल जल-सा हो गया।"

29 जनवरी को पंडित जसराज अपने अभिनंदन में आयोजित समारोह के लिए दिल्ली पधारे थे। इस अवसर पर प्रशंसकों से घिरे पंडित जी से उनकी जीवन-यात्रा के अनुभव जानने चाहे तो थोड़ा गंभीर होकर बोले, "सोचता हूं कि आज अगर 35 बरस का होता और 75 बरस के ये अनुभव साथ होते, और उससे आगे 35 बरस की यात्रा करता तो कितना फ़र्क़ होता। संगीत के प्रति यही भावनाएं, श्रद्धा और भक्ति होती तो जीवन कितना धन्य होता।

सम्मान और पुरस्कार
पंडित जसराज नीचे दिये गये सम्मान और पुरस्कारों से सम्मानित हो चुके हैं।

पद्म विभूषण (2000)
पद्म भूषण (1990)
पद्म श्री (1975)
संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार
मास्टर दीनानाथ मंगेशकर अवार्ड
लता मंगेशकर पुरस्कार
महाराष्ट्र गौरव पुरस्कार
मृत्यु
पंडित जसराज की मृत्यु 17 अगस्त, 2020 को दिल का दौरा पड़ने से न्यू जर्सी, अमेरिका में हुई। जनवरी 2020 में अपना 90वां जन्मदिन मनाने वाले पंडित जसराज ने आखिरी प्रस्तुति 9 अप्रैल, 2020 को हनुमान जयंती पर फेसबुक लाइव के जरिये वाराणसी के संकटमोचन हनुमान मंदिर के लिए दी थी। कोरोना वायरस महामारी के कारण लॉकडाउन के बाद से वह न्यूजर्सी में ही थे।

राष्‍ट्रपति रामनाथ कोविंद ने पंडित जसराज के निधन पर शोक जताते हुए कहा, 'संगीत दिग्‍गज और अद्वितीय शास्त्रीय गायक पंडित जसराज के निधन से दु:खी हूं। 8 दशकों से भी अधिक समय के करियर में पद्म विभूषण पंडित जसराज ने जीवंत व भावपूर्ण प्रस्तुतियां दीं। उनके परिवार, दोस्तों और संगीत गुणज्ञ के प्रति मेरी संवेदना।'

पीएम मोदी ने ट्वीट कर कहा, 'पंडित जसराज जी के निधन से भारतीय सांस्कृतिक क्षेत्र में एक गहरी रिक्‍तता आ गई है। न केवल उनकी प्रस्तुतियां उत्कृष्ट थीं, बल्कि वह कई अन्य गायकों के लिए भी एक असाधारण गुरु साबित हुए। उनके परिवार और दुनिया भर में उनके प्रशंसकों के प्रति मैं संवेदना व्‍यक्त करता हूं। ओम शांति।'

गृहमंत्री अमित शाह ने पंडित जसराज को श्रद्धांजलि देते हुए ट्वीट किया, 'संगीत मार्तंड पंडित जसराज जी एक असाधारण कलाकार थे, जिन्होंने अपनी जादुई आवाज से भारतीय शास्त्रीय संगीत को समृद्ध किया। उनका निधन व्यक्तिगत क्षति की तरह लगता है। वह अपनी बेमिसाल रचनाओं के माध्यम से हमारे दिलों में हमेशा रहेंगे। उनके परिवार और समर्थकों के प्रति संवेदना। ओम शांति।'

रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने अपने ट्वीट में कहा, 'सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक पंडित जसराज के निधन से मुझे गहरा दुःख हुआ है। मेवाती घराना से जुड़े पंडितजी का सम्पूर्ण जीवन सुर साधना में बीता। सुरों के संसार को उन्होंने अपनी कला से नए शिखर दिए। उनके जाने से संगीत का बड़ा स्वर मौन हो गया है। ईश्वर उन्हें अपने श्रीचरणों में स्थान दें।'

गायिका हेम लता

प्रसिद्ध पार्श्वगायिका हेमलता के जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामनाएं
🎂जन्म 16 अगस्त, 1954
⚰️25 जनवरी, 1988
अपनी मधुर मखमली आवाज से सभी पर जादू बिखेरने वाली पाश्र्वगायिका हेमलता को भारतीय सिनेमा में गाए उनके अनूठे गीत उन्हें अन्य कलाकारों से अलग पहचान दिलाते हैं। उनके गीत आज भी कानों में रस घोल देते हैं।

उन्होंने 5000 से अधिक गीत गाए, जिसमें क्षेत्रीय, राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय हर तरह के गीत शामिल हैं।हेमलता ने 13 साल की उम्र में ही गायकी के क्षेत्र में कदम रखा। उनका असली नाम लता भट्ट है, लेकिन उन्हें हेमलता या हेमलता बाली के नाम से जाना जाता है। उनका पहला विवाह अभिनेत्री योगिता बाली के भाई योगेश बाली से हुआ था।

हेमलता का जन्म 16 अगस्त, 1954 को हैदराबाद में हुआ था, लेकिन उनका परिवार मूल रूप से राजस्थान के चुरू जिले के सेहला गांव का निवासी है। गाने का शौक उन्हें बचपन से ही था, मगर रूढ़िवादी मारवाड़ी ब्राह्मण परिवार में होने के कारण उन्हें गाने का मौका नहीं मिलता था। वह पूजा पंडाल में पीछे छुपकर गाया करती थीं।

हेमलता के पिता का नाम पंडित जयचंद भट्ट और मां का अंबिका भट्ट है। हेमलता के तीन भाई भी हैं। उनके वर्तमान पति का नाम दिलीप सेनगुप्ता है। हेमलता ने वर्ष 1977 में फिल्म ‘चितचोर’ के शास्त्रीय संगीत पर आधारित गीत ‘तू जो मेरे सुर में’ के लिए सर्वश्रेष्ठ पाश्र्वगायिका का पुरस्कार जीता था। 1977 से 1980 के बीच वह पांच बार फिल्मफेयर पुरस्कार के लिए नामित हुई थीं।

उन्होंने विभिन्न भारतीय फिल्मों, संगीत, टीवी धारावाहिकों, संगीत अलबम को अपनी मधुर आवाज दी। इसके साथ ही उन्होंने ‘अंखियों के झरोखों से’, ‘कौन दिशा में लेके चला रे बटोहिया’, ‘तू इस तरह से मेरी जिंदगी में’ जैसे यादगार गीत गाए हैं, जो आज भी युवाओं के सिर चढ़कर बोलते हैं।

उन्होंने अपने करियर की शुरुआत में एसडी बर्मन, एन. दत्ता, सलिल चौधरी, चित्रगुप्त, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, कल्याणजी आनंदजी, राजकमल, उषा खन्ना और रवींद्र जैन सहित कई प्रसिद्ध संगीतकारोंके साथ काम किया। वह बॉलीवुड की कई अभिनेत्रियों -जैसे नूतन, शबाना अजमी, रेखा, हेमा मालिनी, रामेश्वरी, योगिता बाली, सारिका व माधुरी दीक्षित की आवाज भी बनीं।

हेमलता ने श्री माताजी निर्मला देवी को समर्पित रविन्द्र जैन के कैसेट एल्बम सहज धारा (1991) में गाया, और जुलाई 1992 में बेल्जियम के ब्रुसेल्स में दो संगीत समारोहों में इस एल्बम के गाने गाए।

वह एकमात्र भारतीय पार्श्व गायिका हैं जिन्होंने के जे येसुदास के साथ सबसे अधिक हिंदी गाने रिकॉर्ड किए हैं।

उन्होंने रामानंद सागर के महाकाव्य टीवी सीरियल रामायण के लिए अपनी आवाज दी है (वह पारंपरिक मीरा भजन पायोजी मैने राम रतन धन पायोजी को गाने के लिए एक एपिसोड में दिखाई दी थी) साथ ही साथ उत्तर रामायण (लव कुश) और श्री कृष्ण श्रृंखला में भी उन्होंने गाया

उन्होंने ईस्टर 1992 के दौरान इटली में संगीत कार्यक्रम में इतालवी गीत ओ सोल मियो का प्रदर्शन किया। 

उन्होंने भारत के 14 अलग-अलग मूल लोकगीतों को उनके मूल और बोली रूप में कुछ मौलिक रचनात्मक और अभिनव शोध पर कार्य भी किया था।

वह पूरी दुनिया में लाइव कॉन्सर्ट भी कर चुकी हैं।  उन्होंने मोहम्मद रफ़ी और महेंद्र कपूर के साथ कई लाइव कॉन्सर्ट किए।

हाल के वर्षों में वह भारत और विदेशों में बहुत सारे चैरिटी शो कर रही हैं।  उन्होंने इमरान खान के कैंसर अस्पताल की सहायता के लिए लंदन में एक चैरिटी शो में अताउल्लाह खान के साथ प्रस्तुति दी थी।  पाकिस्तान के लिए किसी भारतीय गायक की ओर से यह पहला प्रयास था।  लंदन की यात्रा पर, हेमलता ने अताउल्लाह खान के साथ दो एल्बम रिकॉर्ड किए।  पहला सरहदें और दूसरा अट्टा दूसरे एल्बम में हेमलता के ग़ज़ल और गीत हैं।  फिर, उन्होंने इश्क नामक एक पॉप एल्बम भी रिकॉर्ड किया, जिसमें हिंदी और पंजाबी लोक का मेल है।

इन तीन एल्बमों में, टिप्स द्वारा केवल सरहदें जारी किया गया था अन्य दो एल्बम जारी नहीं किए गए हैं।

वह एकमात्र बॉलीवुड गायिका थीं, जिन्हें सिखों के विश्व समुदाय और पंजाब सरकार के साथ-साथ पवित्र अकाल तख्त ने सिख खालसा पंथ के 300 साल के उत्सव के लिए मूल रागों में रचित गुरमत संगीत लाइव करने के लिए चुना है यह कार्यक्रम 13 अप्रैल 1999 को श्री आनंदपुर साहिब अकाल तख्त में हुआ था किनी तेरा अंत ना पाया सिख संगीत का एकमात्र एल्बम था जो विशेष रूप से उनकी आवाज में था 

हेमलता का व्यक्तिगत जीवन रूपहले पर्दे की तरह ही है। उनकी पहली शादी योगेश बाली के साथ हुई, जो बाल कलाकार के रूप में प्रसिद्ध थे। लीवर की बीमारी के कारण उनकी मौत 25 जनवरी, 1988 को हो गई। वह कुछ दिनों रवींद्र जैन के संपर्क में रहीं, फिर किन्हीं कारणों से दोनों के बीच अलगाव हो गया। इसके बाद उनकी शादी दिलीप सेनगुप्ता के साथ हुई।

उल्लेखनीय है कि 38 भाषाओं में गाना गा चुकीं हेमलता न सिर्फ अपने करियर का, बल्कि अपनी जिंदगी का भी दूसरा दौर जी रही हैं। वह दिलीप से शादी करने के बाद बेहद सुखी जीवन व्यतीत कर रही हैं। उनका आदित्य बाली नामक एक बेटा भी है,

हाल के वर्षो में गुमनाम रहीं हेमलता इन दिनों अपने पति दिलीप की संगीत कंपनी के सहारे अपने करियर की दूसरी पारी के लिए काम कर रही हैं।

मनोरमा

अभिनेत्री मनोरमा के जन्मदिन पर हार्दिक श्रद्धांजलि

मनोरमा 
🎂16 अगस्त 1926 
 ⚰️15 फरवरी 2008
बॉलीवुड में एक भारतीय चरित्र अभिनेत्री थीं जिन्होंने सीता और गीता (1972) एक फूल दो माली (1969) और दो कलियां (  1968) जैसी फिल्मों में काम किया उन्होंने 1936 में बेबी आइरिस नाम से बाल कलाकार के रूप में अपना करियर लाहौर से शुरू किया।  इसके बाद, उन्होंने 1941 में एक वयस्क अभिनेत्री के रूप में अपनी शुरुआत की, और 2005 में वाटर में अपनी अंतिम भूमिका निभाई, उनका करियर 60 साल से अधिक का रहा।  अपने करियर के माध्यम से उन्होंने 160 से अधिक फिल्मों में अभिनय किया। 1940 के दशक की शुरुआत में नायिका की भूमिकाएँ निभाने के बाद, वह खलनायक या हास्य भूमिकाएँ निभाने लगीं।  उन्होंने किशोर कुमार और महान मधुबाला के साथ हाफ टिकट जैसी सुपरहिट फिल्मों में हास्य भूमिकाएँ निभाईं।  उन्होंने दस लाख, झनक झनक पायल बाजे, मुझे जीने दो, महबूब की मेंहदी, कारवां, बॉम्बे टू गोवा और लावारिस जैसी फिल्मों में यादगार भूमिकायें निभाई

उन्होंने 1941 से मनोरमा नाम से फिल्मों में अभिनय किया।  उसका असली नाम एरिन इस्साक डेनियल था।  वह आधी आयरिश थी, एक आयरिश मां और एक भारतीय ईसाई पिता, उनके पिता इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रोफेसर थे वह एक प्रशिक्षित शास्त्रीय गायिका और नर्तकी थी वह 1940 के दशक में नौ साल की उम्र में लाहौर में रेड क्रॉस के लिए स्टेज शो करती थी उन्हें रूप कुमार शोरे ने लाहौर में एक स्कूल कॉन्सर्ट में देखा था  उन्होंने खजांची (1941) में एक बाल कलाकार के रूप में शुरुआत की, स्क्रीन नाम मनोरमा (शौरी द्वारा दिया गया) के तहत, वह जल्द ही लाहौर की एक बहुत ही सफल और उच्च-भुगतान वाली अभिनेत्री बन गईं  विभाजन के बाद वह मुंबई शिफ्ट हो गई।  अभिनेता चंद्रमोहन ने उनकी कई निर्माताओं से सिफारिश की  उन्होंने सुपरहिट पंजाबी फिल्म लच्छी में अभिनय किया, लेकिन उन्हें घर की इज़्ज़त (1948) में दिलीप कुमार की बहन की भूमिका निभाने का अवसर मिला 
अभिनेता राजन हक्सर के साथ शादी के बाद, उन्हें चरित्र भूमिकाओं और फिर खलनायक या हास्य भूमिकाओं में लिया जाने लगा शादी के कई सालों बाद उसका तलाक हो गया।  उनकी आखिरी हिंदी फिल्म अकबर खान की हादसा (1983) थी

वह टीवी सीरियलों में चली गईं और पांच साल के लिए दिल्ली चली गईं, जहां उन्होंने टीवी श्रृंखला दस्तक में काम किया जिसमें शाहरुख खान भी थे।  उन्होंने महेश भट्ट की फिल्म जूनून (1992) के लिए भी शूटिंग की, लेकिन एडिटिंग में उनकी भूमिका को हटा दिया गया 2001 में उन्होंने बालाजी टेलीफिल्म्स के साथ धारावाहिकों काशी और कुंडली के लिए काम किया।  उन्होंने धारावाहिक कुटुम्ब में हितेन तेजवानी की दादी की भूमिका भी निभाई।

उनकी आखिरी फिल्म दीपा मेहता का वाटर(2005) थी, जहां उन्होंने अपने प्रदर्शन से हॉलीवुड आलोचकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।  उनके अनुसार, फिल्म में मधुमती का किरदार निभाने वाली वह पहली और अंतिम पसंद थीं।  फिल्म का निर्माण वाराणसी में रोक दिया गया था, और पांच साल बाद इसे फिर से शुरू किया गया था, मनोरम को छोड़कर इस फ़िल्म की पूरी स्टार कास्ट बदल दी गई थी। 

उनकी शादी राजन हक्सर से हुई, जो एक अभिनेता भी थे और 1947 में भारत के विभाजन के बाद, दोनों  बंबई में स्थानांतरित हो गए, जहाँ राजन एक निर्माता बन गए, जबकि मनोरमा ने अपने अभिनय करियर को फिर से स्थापित किया

मनोरमा को 2007 में स्ट्रोक का सामना करना पड़ा, हालांकि वह इससे उबर गई, लेकिन उन्हें बोलने में गड़बड़ी और अन्य जटिलताओं का सामना करना पड़ा।  15 फरवरी 2008 को चारकोप, मुंबई में उनका निधन हो गया उनकी एक बेटी रीता हक्सर है।  रीता फिल्म  सूरज और चंदा में संजीव कुमार के साथ नायिका के रूप में किया, लेकिन बाद में एक इंजीनियर से शादी करके गल्फ कंट्री में बस गईं।

महेश वामन मांजरेकर

फ़िल्म अभिनेता, निर्माता, निर्देशक एवं पटकथा लेखक महेश मांजरेकर के जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामनाएं

महेश वामन मांजरेकर
🎂 जन्म 16 अगस्त 1958
  एक भारतीय अभिनेता, फिल्म निर्देशक, पटकथा लेखक और निर्माता हैं, जो मुख्य रूप से मराठी और तेलुगु फिल्मों के साथ हिंदी फिल्मों में काम करते हैं उन्हें समीक्षकों द्वारा प्रशंसित फिल्मों वास्तव: द रियलिटी (1999), अस्तित्व (2000) और विरुद्ध... फैमिली कम्स फर्स्ट (2005) का निर्देशन करने का श्रेय दिया जाता है।  उन्होंने अस्तित्व के लिए मराठी में सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और दो स्टार स्क्रीन पुरस्कार जीते हैं।  उन्हें 2018 से रियलिटी शो, बिग बॉस मराठी के होस्ट के रूप में भी जाना जाता है।

मांजरेकर ने कई फिल्मों में अभिनय किया है, जिसमें उनकी कुछ प्रस्तुतियां भी शामिल हैं।  उन्हें पहली बार क्षितिज नामक दूरदर्शन मराठी श्रृंखला में देखा गया था, जिसमें उन्होंने एक कुष्ठ रोगी की भूमिका निभाई थी।  उन्होंने पहली बार 2002 की फिल्म कांटे में अपने प्रदर्शन के लिए एक अभिनेता के रूप में प्रशंसा प्राप्त की, और बाद में तमिल फिल्म अररामबम (2013), तेलुगु फिल्म ओक्कादुन्नाडु (2007) और स्लमडॉग मिलियनेयर (2008) में गैंगस्टर जावेद के रूप में नकारात्मक भूमिकाएँ निभाईं।  उन्होंने मराठी फिल्म मी शिवाजीराजे भोसले बोल्तॉय में छत्रपति शिवाजी महाराज की भूमिका निभाई।  उन्होंने भारतीय टीवी श्रृंखला सी.आई.डी. में आखिरी चुनौती श्रृंखला के एपिसोड में हरपीज़ डोंगरा की भूमिका भी निभाई। मांजरेकर ने फ़िल्म वांटेड में इंस्पेक्टर डी.आर.तलपड़े की बेहतरीन भूमिका निभाई

वह 2014 के लोकसभा चुनावों में मुंबई उत्तर पश्चिम से मनसे के उम्मीदवार थे, लेकिन शिवसेना के गजानन कीर्तिकर से हार गए।

 मांजरेकर की शादी एक कॉस्ट्यूम डिजाइनर दीपा मेहता से हुई थी, लेकिन उनका तलाक हो गया था जिससे उनके दो बच्चे सत्या और अश्वमी हैं। बाद में उन्होंने मेधा मांजरेकर से शादी कर ली।  उनकी एक बेटी, सई मांजरेकर है, जो एक अभिनेत्री है उनकी पत्नी मेधा मांजरेकर के पहले पति से उनकी एक सौतेली बेटी गौरी इंगवाले हैं

 2011 में, उन्होंने अनिरुद्ध देशपांडे के साथ ग्रेट मराठा एंटरटेनमेंट एलएलपी प्रोडक्शंस नामक अपनी खुद की प्रोडक्शन कंपनी लॉन्च की। 

इस बैनर के तले बनी पहली फिल्म फकता लध महाना थी जो सबसे महंगी मराठी फिल्मों में से एक है।

मंगलवार, 15 अगस्त 2023

गुरदयाल सिंह

गुरदयाल सिंह
जन्म
🎂10 जनवरी 1933
मौत
⚰️16 अगस्त 2016 (उम्र 83)
भाषा
पंजाबी
राष्ट्रीयता
भारतीय
विधा
उपन्यास
उल्लेखनीय काम
मढ़ी दा दीवा
एक पंजाबी साहित्यकार थे जो उपन्यास और कहानी लेखक थे। इन्हें 1999 में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उन्होंने अपनी प्रथम कहानी भागों वाले प्रो.मोहन सिंह के साहित्य मैगजीन पंज दरिया में प्रकाशित की थी।  उनके पंजाबी साहित्य में आने से पंजाबी उपन्यास में बुनियादी तबदीली आई थी।उनके उपन्यास मढ़ी दा दीवा , अंधे घोड़े का दान का सभी पंजाबी भाषाओँ में अनुवाद हो चुक्का है और इन की कहाँनीयों पर अधारत फ़िल्में भी बनी हैं।
श्री गुरदयाल सिंह का जन्म 10 जनवरी 1933 को उनके नानका गाँव भैनी फत्ता जिला बरनाला में हुआ।उनके पिता का नाम श्री जगत सिंह और माता का नाम निहाल कौर था।वो पंजाब के जैतो गाँव के रहने वाले थे।उनके तीन भाई और एक बहन थी।घरेलू कारणों की वजह के कारण उन्होंने बचपन में अपनी पढ़ाई छोड़ अपना पुश्तैनी बढई काम करना शुरू कर दिया।बाद में उन्होंने कड़ी मेहनत करके उच्च विद्या हासिल करके युनिवर्सटी में प्राध्यापक की पदवी प्राप्त की।उनका बलवंत कौर के साथ विवाह हुआ और उनके घर एक बेटा और एक बेटी हुई।ज्ञानपीठ पुरस्कारविजेता श्री गुरदयाल सिंह का 16 अगस्त 2016 को निधन हो गया।

अटल बिहारी बाजपेई

जन्म
अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म 25 दिसम्बर, 1924 को लश्कर, ग्वालियर, मध्य प्रदेश में हुआ था। उनके पिता का नाम पंडित कृष्ण बाजपेयी था जो अध्यापन का कार्य करते थे और अटल बिहारी की माता का नाम कृष्णा देवी था जो कि गृहणी थी।
अटल जी अपने माता- पिता की सातवीं संतान थी। उनसे पहले उनके तीन बड़े भाई और तीन बहने थी। अटल बिहारी वाजपेयी के बड़े भाइयों को ‘अटल बिहारी वाजपेयी‘, ‘सदा बिहारी वाजपेयी’ तथा ‘प्रेम बिहारी वाजपेयी’ के नाम से जाना जाता है।

वाजपेयी अपने पूरे जीवन अविवाहित रहे। उन्होंने लंबे समय से दोस्त राजकुमारी कौल और बी॰एन॰ कौल की बेटी नमिता भट्टाचार्य को उन्होंने दत्तक पुत्री के रूप में स्वीकार किया। राजकुमारी कौल की मृत्यु वर्ष 2014 में हुई थी । अटल जी के साथ नमिता और उनके पति रंजन भट्टाचार्य रहते थे।
मांस और अल्कोहल को छोड़ने वाले शुद्धवादी ब्राह्मणों के विपरीत, वाजपेयी को व्हिस्की और मांस का शौकीन माना जाता था। वह हिंदी में लिखते हुए एक प्रसिद्ध कवि थे। उनके प्रकाशित कार्यों में काइडी कविराई कुंडलियन शामिल हैं, जो 1975-77 आपातकाल के दौरान कैद किए गए कविताओं का संग्रह था, और अमर आग है।
अपनी कविता के संबंध में उन्होंने लिखा, “मेरी कविता युद्ध की घोषणा है, हारने के लिए एक निर्वासन नहीं है। यह हारने वाले सैनिक की निराशा की ड्रमबीट नहीं है, लेकिन युद्ध योद्धा की जीत होगी। यह निराशा की इच्छा नहीं है लेकिन जीत का हलचल चिल्लाओ। ”
शिक्षा
बिहारी वाजपेई की प्रारंभिक शिक्षा बड़नगर के ‘गोरखी विद्यालय’ से पूरी हुई। इस विद्यालय में अटल जी ने 8वीं तक की शिक्षा प्राप्त की। उन्हे एक अच्छे वक्ता के रूप में इसी स्कूल से पहचान मिली थी। जब वे कक्षा 5 में पढ़ते थे। तो पाठयक्रम गतिविधियों के चलते उन्होंने  पहली बार भाषण दिया था, लेकिन बड़नगर में उच्च शिक्षा व्यवस्था न होने के कारण उन्हें ग्वालियर जाना पड़ा। उनका नामांकन विक्टोरिया कॉलेजिएट स्कूल में हुआ और नौवीं कक्षा से इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई इसी स्कूल में की।

इंटरमीडिएट करने के बाद अटल जी ने ‘विक्टोरिया कॉलेज’ में स्नातक स्तर की शिक्षा ग्रहण करने के लिए प्रवेश लिया। स्नातक स्तर की शिक्षा के लिए उन्होंने तीनों विषय भाषा पर आधारित लिए जो संस्कृत, हिन्दी और अंग्रेज़ी थे। अटल जी की साहित्यिक प्रकृति थी, जिससे वह तीनों भाषाओं के प्रति आकृष्ट हुए। कॉलेज जीवन में ही उन्होंने राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया था। शुरूआत में वे ‘छात्र संगठन’ से जुड़े। नारायण राव  ने इन्हें काफ़ी प्रभावित किया, जो राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख कार्यकर्ता थे।

ग्वालियर में रहते हुए अटल बिहारी वाजपेयी ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के शाखा प्रभारी के रूप में अपने दायित्वों की पूर्ति की। कॉलेज जीवन में उन्होंने कविताओं की रचना करना शुरू कर दिया था। इनकी साहित्यिक अभिरुचि उसी समय काफ़ी परवान चढ़ी। उनके कॉलेज में अखिल भारतीय स्तर के कवि सम्मेलनों का भी आयोजन होता था। इस कारण से कविता की गहराई समझने में उन्हें काफ़ी मदद मिली। 1943 में वाजपेयी जी कॉलेज यूनियन के सचिव रहे और 1944 में उपाध्यक्ष भी बने।
ग्वालियर की स्नातक उपाधि प्राप्त करने के बाद अटल बिहारी जी कानपुर आ गए ताकि राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर स्तर की शिक्षा प्राप्त कर सकें। वहाँ उन्होंने एम. ए. तथा एलएल. बी. में एक साथ प्रवेश लिया। चूंकि स्नातक परीक्षा इन्होंने प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की थी, इस कारण इन्हें छात्रवृत्ति भी प्राप्त हो रही थी। कानपुर के डी. ए. वी. महाविद्यालय से इन्होंने कला में स्नातकोत्तर उपाधि भी प्रथम श्रेणी में प्राप्त की।

करियर
वे भारतीय जनसंघ की स्थापना करने वालों में से एक थे और वर्ष 1968 से 1973 तक वह उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रह चुके थे।
वर्ष 1952 में उन्होंने पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ा, परन्तु सफलता नहीं मिली। लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और वर्ष 1957 में बलरामपुर (जिला गोण्डा, उत्तर प्रदेश) से जनसंघ के प्रत्याशी के रूप में विजयी होकर लोकसभा में पहुँचे।
1957 से 1977 तक जनता पार्टी की स्थापना तक वे बीस साल तक लगातार जनसंघ के संसदीय दल के नेता रहे।
मोरारजी देसाई की सरकार में वर्ष 1977 से 1979 तक विदेश मन्त्री रहे और विदेशों में भारत की छवि बनायी।
1980 में जनता पार्टी से अवर्षतुष्ट होकर इन्होंने जनता पार्टी छोड़ दी और भारतीय जनता पार्टी की स्थापना में मदद की।
6 अप्रैल,1980 में बनी भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष पद का दायित्व भी वाजपेयी को सौंपा गया।
 वे दो बार राज्यसभा के लिये भी निर्वाचित हुए।
लोकतन्त्र के सजग प्रहरी अटल बिहारी वाजपेयी ने वर्ष 1996 में प्रधानमन्त्री के रूप में देश की बागडोर संभाली।
19 अप्रैल,1998 को दोबारा प्रधानमन्त्री पद की शपथ ली और उनके नेतृत्व में 13 दलों की गठबन्धन सरकार ने पाँच वर्षों में देश के अन्दर प्रगति के अनेक आयाम छुए।
वर्ष 2004 में कार्यकाल पूरा होने से पहले भयंकर गर्मी में सम्पन्न कराये गये लोकसभा चुनावों में भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबन्धन ने वाजपेयी के नेतृत्व में चुनाव लड़ा और भारत उदय ( इण्डिया शाइनिंग) का नारा दिया। इस चुनाव में किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला। ऐसी स्थिति में वामपंथी दलों के समर्थन से काँग्रेस ने भारत की केन्द्रीय सरकार पर कायम होने में सफलता प्राप्त की और भाजपा विपक्ष में बैठने को मजबूर हुई।
 कार्यकाल
भारत को परमाणु शक्ति सम्पन्न राष्ट्र बनाना
अटल सरकार ने 12 और 13 मई 1998 को पोखरण में पाँच भूमिगत परमाणु परीक्षण विस्फोट करके भारत को परमाणु शक्ति संपन्न देश घोषित कर दिया। इस कदम से उन्होंने भारत को निर्विवाद रूप से विश्व मानचित्र पर एक सुदृढ वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित कर दिया।
यह सब इतनी गोपनीयता से किया गया कि अति विकसित जासूसी उपग्रहों व तकनीक से संपन्न पश्चिमी देशों को इसकी भनक तक नहीं लगी। यही नहीं इसके बाद पश्चिमी देशों द्वारा भारत पर अनेक प्रतिबंध लगाए गए लेकिन वाजपेयी सरकार ने सबका दृढ़तापूर्वक सामना करते हुए आर्थिक विकास की ऊँचाईयों को छुआ।
पाकिस्तान से संबंधों में सुधार की पहल

19 फ़रवरी 1999 को सदा-ए-सरहद नाम से दिल्ली से लाहौर तक बस सेवा शुरू की गई। इस सेवा का उद्घाटन करते हुए प्रथम यात्री के रूप में वाजपेयी जी ने पाकिस्तान की यात्रा करके नवाज़ शरीफ से मुलाकात की और आपसी संबंधों में एक नयी शुरुआत की।

कारगिल युद्ध
इसके कुछ ही समय बाद पाकिस्तान के तत्कालीन सेना प्रमुख परवेज़ मुशर्रफ की शह पर पाकिस्तानी सेना व उग्रवादियों ने कारगिल क्षेत्र में घुसपैठ करके कई पहाड़ी चोटियों पर कब्जा कर लिया। अटल सरकार ने पाकिस्तान की सीमा का उल्लंघन न करने की अंतर्राष्ट्रीय सलाह का सम्मान करते हुए धैर्यपूर्वक किंतु ठोस कार्यवाही करके भारतीय क्षेत्र को मुक्त कराया।
इस युद्ध में प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण भारतीय सेना को जान माल का काफी नुकसान हुआ और पाकिस्तान के साथ शुरु किए गए संबंध सुधार एकबार फिर शून्य हो गए।

स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना
भारत भर के चारों कोनों को सड़क मार्ग से जोड़ने के लिए स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना (अंग्रेजी में- गोल्डन क्वाड्रिलेट्रल प्रोजैक्ट या संक्षेप में जी॰क्यू॰ प्रोजैक्ट) की शुरुआत की गई। इसके अंतर्गत दिल्ली, कलकत्ता, चेन्नई व मुम्बई को राजमार्गों से जोड़ा गया। ऐसा माना जाता है कि अटल जी के शासनकाल में भारत में जितनी सड़कों का निर्माण हुआ इतना केवल शेरशाह सूरी के समय में ही हुआ था।

 अन्य कार्य
  एक सौ साल से भी ज्यादा पुराने कावेरी जल विवाद को सुलझाया।
संरचनात्मक ढाँचे के लिये कार्यदल, सॉफ्टवेयर विकास के लिये सूचना एवं प्रौद्योगिकी कार्यदल, विद्युतीकरण में गति लाने के लिये केन्द्रीय विद्युत नियामक आयोग आदि का गठन किया।
राष्ट्रीय राजमार्गों एवं हवाई अड्डों का विकास; नई टेलीकॉम नीति तथा कोकण रेलवे की शुरुआत करके बुनियादी संरचनात्मक ढाँचे को मजबूत करने वाले कदम उठाये।
राष्ट्रीय सुरक्षा समिति, आर्थिक सलाह समिति, व्यापार एवं उद्योग समिति भी गठित कीं
आवश्यक उपभोक्ता सामग्रियों की कीमतें नियन्त्रित करने के लिये मुख्यमन्त्रियों का सम्मेलन बुलाया।
उड़ीसा के सर्वाधिक गरीब क्षेत्र के लिये सात सूत्रीय गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम शुरू किया।
आवास निर्माण को प्रोत्साहन देने के लिए अर्बन सीलिंग एक्ट समाप्त किया।
ग्रामीण रोजगार सृजन एवं विदेशों में बसे भारतीय मूल के लोगों के लिये बीमा योजना शुरू की।
सरकारी खर्चे पर रोजा इफ़्तार शुरू किया
कवि
अटल बिहारी वाजपेयी राजनीतिज्ञ होने के साथ-साथ एक कवि भी थे। ‘मेरी इक्यावन कविताएँ’ अटल जी का प्रसिद्ध काव्यसंग्रह थे। वाजपेयी जी को काव्य रचनाशीलता एवं रसास्वाद के गुण विरासत में मिले हैं। उनके पिता कृष्ण बिहारी वाजपेयी ग्वालियर रियासत में अपने समय के जाने-माने कवि थे।
वे ब्रजभाषा और खड़ी बोली में काव्य रचना करते थे। पारिवारिक वातावरण साहित्यिक एवं काव्यमय होने के कारण उनकी रगों में काव्य रक्त-रस अनवरत घूमता रहा है। उनकी सर्व प्रथम कविता ‘ताजमहल’ थी। इसमें शृंगार रस के प्रेम प्रसून न चढ़ाकर “एक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताजमहल, हम गरीबों की मोहब्बत का उड़ाया है मजाक” की तरह उनका भी ध्यान ताजमहल के कारीगरों के शोषण पर ही गया। वास्तव में कोई भी कवि हृदय कभी कविता से वंचित नहीं रह सकता।

अटल जी ने किशोर वय में ही एक अद्भुत कविता लिखी थी – ”हिन्दू तन-मन (कविता) हिन्दू जीवन, रग-रग हिन्दू मेरा परिचय”, जिससे यह पता चलता है कि बचपन से ही उनका रुझान देश हित की तरफ था।

राजनीति के साथ-साथ समष्टि एवं राष्ट्र के प्रति उनकी वैयक्तिक संवेदनशीलता आद्योपान्त प्रकट होती ही रही है। उनके संघर्षमय जीवन, परिवर्तनशील परिस्थितियाँ, राष्ट्रव्यापी आन्दोलन, जेल-जीवन आदि अनेक आयामों के प्रभाव एवं अनुभूति ने काव्य में सदैव ही अभिव्यक्ति पायी। विख्यात गज़ल गायक जगजीत सिंह ने अटल जी की चुनिंदा कविताओं को संगीतबद्ध करके एक एल्बम भी निकाला था।

अटल जी की प्रमुख रचनायें
उनकी कुछ प्रमुख प्रकाशित रचनाएँ इस प्रकार हैं –
उनकी कुछ प्रमुख प्रकाशित रचनाएँ इस प्रकार हैं –

  रग-रग हिन्दू मेरा परिचय
मृत्यु या हत्या
अमर बलिदान (लोक सभा में अटल जी के वक्तव्यों का संग्रह)
कैदी कविराय की कुण्डलियाँ
संसद में तीन दशक
अमर आग है
  कुछ लेख: कुछ भाषण
  सेक्युलर वाद
  राजनीति की रपटीली राहें
बिन्दु बिन्दु विचार, इत्यादि।
  मेरी इक्यावन कविताएँ
पुरस्कार
राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने  27 मार्च, 2015 को पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को उनके घर जाकर भारत रत्न से सम्मानित किया।

वाजपेयी जी के स्वास्थ्य को देखते हुए राष्ट्रपति ने उनके घर जाकर देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान प्रदान किया। इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अरुण जेटली, नितिन गडकरी और राजनाथ सिंह भी वाजपेयी के घर मौजूद रहे। प्रधानमंत्री के पद पर रहे हों या नेता प्रतिपक्ष। बेशक देश की बात हो या क्रान्तिकारियों की, या फिर उनकी अपनी ही कविताओं की। अटल बिहारी वाजपेयी की बरारबरी कोई नहीं कर सकता।
भारत रत्न से उन्हें सम्मानित किए जाने की घोषणा भारत सरकार ने दिसम्बर 2014 में कर दी गई थी। वाजपेयी भारत रत्न ग्रहण करने वाले देश के सातवें प्रधानमंत्री बने । इससे पहले जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, मोरारजी देसाई, लाल बहादुर शास्त्री और गुलजारीलाल नंदा को यह सम्मान मिल चुका है।
अन्य पुरस्कार

1992 में पद्म विभूषण
1993 में डी. लिट (कानपुर विश्वविद्यालय)
1994 में लोकमान्य तिलक पुरस्कार
1994 में श्रेष्ठ सासंद पुरस्कार
1994 में भारत रत्न पंडित गोविंद वल्लभ पंत पुरस्कार।
मृत्यु
वाजपेयी को 2009 में एक दौरा पड़ा था, जिसके बाद वह बोलने में अक्षम हो गए थे। उन्हें 11 जून, 2018 में किडनी में संक्रमण और कुछ अन्य स्वास्थ्य समस्याओं की वजह से अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में भर्ती कराया गया था, जहाँ 16 अगस्त 2018  की शाम 05 : 05 बजे उनकी मृत्यु हो गयी।

उन्हें अगले दिन17 अगस्त को हिंदू रीति रिवाज के अनुसार उनकी दत्‍तक पुत्री नमिता कौल भट्टाचार्या मुखाग्नि दी। उनका समाधि स्थल राजघाट के पास शान्ति वन में बने स्मृति स्थल में बनाया गया है।
उनकी अंतिम यात्रा बहुत भव्य तरीके से निकाली गयी। जिसमे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत सैंकड़ों नेता गण पैदल चलते हुए गंतव्य तक पहुंचे। वाजपेयी के निधन पर भारत भर में सात दिन के राजकीय शोक की घोषणा की गयी। अमेरिका, चीन, बांग्लादेश, ब्रिटेन, नेपाल और जापान समेत विश्व के कई राष्ट्रों द्वारा उनके निधन पर दुःख जताया गया। अटल जी की अस्थियों को देश की सभी प्रमुख नदियों में विसर्जित किया गया

डेविड धवन

डेविड धवन 
हिन्दी फ़िल्मों के एक निर्देशक हैं। 
जन्म की तारीख और समय: 16 अगस्त 1951 (आयु 71 वर्ष), अगरतला
बच्चे: रोहित धवन, वरुण धवन
पत्नी: करुणा धवन
भाई: अनिल धवन
भांजा या भतीजा: सिद्धार्थ धवन
16 अगस्त 1951 को राजिंदर धवन के रूप में अगरतला , त्रिपुरा में एक पंजाबी परिवार में हुआ था। उनके पिता, यूको बैंक में प्रबंधक थे, उनका तबादला उत्तर प्रदेश के कानपुर में हो गया । उन्होंने बारहवीं कक्षा तक क्राइस्ट चर्च कॉलेज और बीएनएसडी इंटर कॉलेज में पढ़ाई की , और फिर अभिनय के लिए एफटीआईआई में शामिल हो गए , जहां उन्होंने अपना नाम बदलकर डेविड धवन रख लिया, जो कि उनके द्वारा दिया गया नाम था। अगरतला में उनके ईसाई पड़ोसी। सतीश शाह और सुरेश ओबेरॉय जैसे अन्य अभिनेताओं को देखकर धवन को एहसास हुआ कि वह अभिनय नहीं कर सकते। इसलिए उन्होंने संपादन को एक विकल्प के रूप में चुना। वह मनमोहन देसाई के प्रशंसक बन गयेऔर हृषिकेश मुखर्जी . ऋत्विक घटक द्वारा निर्देशित बंगाली फिल्म मेघे ढाका तारा देखने से उनकी फिल्म निर्माण में रुचि जगी और उन्होंने स्वर्ण पदक के साथ उत्तीर्ण की।  धवन के दो भाई हैं, अभिनेता अनिल और अशोक।

धवन की शादी करुणा चोपड़ा से हुई है, जिनसे उनके दो बेटे हैं, रोहित धवन और वरुण धवन । उनके भाई अभिनेता अनिल धवन और भतीजे अभिनेता सिद्धार्थ धवन हैं। 

डेविड धवन (जन्म राजिंदर धवन ; 16 अगस्त 1951) हिंदी फिल्मों के एक भारतीय निर्देशक हैं । धवन परिवार के सदस्य , उन्होंने 42 से अधिक फिल्मों का निर्देशन किया है । 1993 की एक्शन थ्रिलर आंखें और 1999 की कॉमेडी बीवी नंबर 1 ने उन्हें सर्वश्रेष्ठ निर्देशक के लिए दो फिल्मफेयर पुरस्कार नामांकन दिलाए। उनकी उल्लेखनीय कृतियों में स्वर्ग (1990), शोला और शबनम (1992), बोल राधा बोल (1992), राजा बाबू (1994), कुली नंबर 1 (1995), साजन चले ससुराल (1996), जुड़वा (1997), हीरो शामिल हैं। नंबर 1(1997), दीवाना मस्ताना (1997), बड़े मियां छोटे मियां (1998), हसीना मान जाएगी (1999), दुल्हन हम ले जाएंगे (2000), जोड़ी नंबर 1 (2001), मुझसे शादी करोगी (2004), पार्टनर ( 2007), चश्मे बद्दूर (2013), मैं तेरा हीरो (2014) और जुड़वा 2 (2017)।

मनुस्मृति

. ................मनुस्मृति.................... जरा सोचिए, अगर आज भारत का कानून यह तय कर दे कि— "एक आम आदमी चोरी करे तो उसे...