रविवार, 23 जुलाई 2023

उत्तम कुमार

अभिनेता फ़िल्म निर्देशक, निर्माता, गायक और संगीतकार उत्तम कुमार
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अरुण कुमार चटर्जी
प्रसिद्ध नाम उत्तम कुमार
🎂जन्म 03 सितम्बर, 1926
जन्म भूमि कोलकाता, बंगाल
⚰️मृत्यु 24 जुलाई, 1980
मृत्यु स्थान पश्चिम बंगाल
पति/पत्नी गौरी चटर्जी
संतान गौतम कुमार चटर्जी
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र बांग्ला और हिन्दी सिनेमा
मुख्य फ़िल्में 'छोटी सी मुलाक़ात', 'अमानुष', 'आनंद आश्रम', 'क़िताब', 'दूरियां' आदि।
विद्यालय 'साउथ सबर्बन स्कूल (मेन)', कोलकाता; 'गोयेनका कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स एंड बिजनेस ऐडमिनिस्ट्रेशन'
प्रसिद्धि अभिनेता, निर्माता-निर्देशक, संगीतकार
नागरिकता भारतीय
संबंधित लेख सुचित्रा सेन, सिनेमा
अन्य जानकारी अभिनेता उत्तम कुमार की बतौर नायक पहली फ़िल्म 'दृष्टिदान' थी, जिसे मशहूर निर्देशक नितिन बोस ने निर्देशित किया था। कोलकाता में हाजरा अंचल में उनके नाम पर 'उत्तम थियेटर' है।
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उत्म कुमार हिंदी बांग्ला फ़िल्मों के प्रसिद्ध अभिनेता थे। 
उनका मूल नाम 'अरुण कुमार चटर्जी' था। मुख्य रूप से बंगाली सिनेमा में काम करने वाले उत्तम कुमार एक अभिनेता होने के साथ-साथ फ़िल्म निर्देशक, निर्माता, गायक और संगीतकार भी थे। जिस तरह हिन्दी सिनेमा में राज कपूर और नरगिस की जोड़ी याद की जाती है, उसी तरह बंगाली सिनेमा में उत्तम कुमार और सुचित्रा सेन का कोई मुकाबला नहीं था। बंगाली सिनेमा में उत्तम कुमार को 'महानायक' की पदवी दी गई है।
अभिनेता उत्तम कुमार की बतौर नायक पहली फ़िल्म 'दृष्टिदान' थी, जिसे मशहूर निर्देशक नितिन बोस ने निर्देशित किया था। सुचित्रा सेन के साथ उनकी जोड़ी खूब पसंद की गई। सुचित्रा के साथ उनकी 'सप्तपदी', 'पौथे होलो देरी', 'हारानो सुर', 'चावा पावा', 'बिपाशा', 'जीवन तृष्णा' और 'सागरिका' जैसी फ़िल्में बेहद लोकप्रिय रहीं। बंगाली के साथ-साथ उन्होंने कई हिन्दी फ़िल्मों में भी अभिनय किया, जैसे-

'छोटी सी मुलाक़ात' - 1967 (स्वयं निर्माता)
'अमानुष' - 1975
'आनंद आश्रम' - 1977
'क़िताब' - 1979
'दूरियां' - 1979
उत्तम कुमार और सुचित्रा सेन का कोई मुकाबला नहीं था। प्रेम को इस तीव्रता से वे अपने अभिनय में व्यक्त करते थे कि दर्शक दंग रह जाते थे। यही वजह रही कि दर्शक इस जोड़ी से कभी बोर नहीं हुए। दो दशक तक तीस फ़िल्मों में दोनों ने अपने अभिनय के रंग बिखेरे और इनमें से ज्यादातर फिल्में बॉक्स ऑफिस पर सफल रहीं। उत्तम कुमार और सुचित्रा सेन बंगाली सिनेमा के व्यवसाय को एक बार फिर ऊपर की ओर ले गए, क्योंकि जब उन्होंने बंगाली सिनेमा में कदम रखा था, तब वहां के फ़िल्म उद्योग की हालत खस्ता थी। ऐसे में उत्तम कुमार और सुचित्रा सेन के स्टारडम ने दर्शकों के बीच पहचान बनाई और बंगाली फ़िल्में फिर सफल होने लगीं। फ़िल्म 'अग्निपरीक्षा' से उत्तम कुमार और सुचित्रा सेन की जोड़ी सफल हुई थी। दोनों ने फ़िल्म में इस कदर डूब कर रोमांस किया कि कई लोग उन्हें पति-पत्नी मानने लगे। फ़िल्मी पर्दे पर जिस तरह से वे रोमांस करते थे, उस कारण आज भी कई लोग मानते हैं कि उत्तम कुमार और सुचित्रा सेन में प्रेम था। पर्दे पर दर्शक दोनों को खुशहाल जोड़ी के रूप में देखना पसंद करते थे। फ़िल्म 'शिल्पी' में उत्तम कुमार के किरदार की आखिर में मौत दिखाई गई और इस कारण फ़िल्म फ्लॉप हो गई थी। सु‍चित्रा और उत्तम कुमार बेहतरीन कलाकार थे। दोनों साथ काम करते तो उनका अभिनय और निखर जाता था। उन्होंने कई अलग-अलग भूमिकाएँ अभिनीत कीं और अपने बेहतरीन अभिनय से यादगार बनाया। बिना कहे दोनों बहुत कुछ कह जाते थे और दोनों के रोमांटिक सीन में पर्दा जगमगाने लगता था। उन पर फ़िल्माए गए गीत सुपरहिट रहे।

अभिनेता मनोज कुमार

अभिनेता मनोज कुमार 
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🎂जन्म की तारीख और समय: 24 जुलाई 1937 (आयु 85 वर्ष), ऐब्टाबाद, पाकिस्तान
बच्चे: कुणाल गोस्वामी, विशाल गोस्वामी
पत्नी: शशि गोस्वामी
इनाम: फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार - सर्वश्रेष्ठ अभिनेता, ज़्यादा
पोते या नाती: कर्म गोस्वामी, मुस्कान गोस्वामी, वंश गोस्वामी
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मनोज कुमार एक हिन्दी फिल्म अभिनेता हैं। उनका पूर्व नाम हरिकिशन गिरि गोस्वामी था। भारतीय सिनेमा के प्रसिद्ध अभिनेता, फिल्म निर्माता व निर्देशक हैं। अपनी फ़िल्मों के जरिए मनोज कुमार ने लोगों को देशभक्ति की भावना का गहराई से एहसास कराया। 
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देश भागती की फिल्मों में काम करने वाले अभिनेता मनोज कुमार का जन्मदिन 24 जुलाई को मनाया जाता है।

❤️मनोज कुमार की पहली फिल्म फैशन (1957) थी। उसके बाद शहीद (1965) से उन्हें लोकप्रियता मिलनी प्रारम्भ हो गई। उन्होंने अधिकतर देशभक्ति फिल्मों में अभिनय किया। वो एक फिल्म निर्माता एवं निर्देशक भी थे। उन्होने कई देशभक्ति फिल्में भी बनाईं। कुमार ने भूतपूर्व भारतीय प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के कहने पर उपकार बनाईं जो शास्त्री जी के दिए हुए नारे जय जवान जय किसान पर आधारित थी। मनोज कुमार की फिल्मों में 'हरियाली और रास्ता' (1962), 'वो कौन थी' (1964), 'शहीद' (1965), 'हिमालय की गोद में' (1965), 'गुमनाम' (1965), 'पत्थर के सनम' (1967), 'उपकार' (1967), 'पूरब और पश्चिम' (1969), 'रोटी कपड़ा और मकान' (1974), 'क्रांति प्रमुख हैं। फिल्म 'उपकार' के लिए मनोज कुमार को नेशनल अवॉर्ड से नवाजा गया था।
उनका जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था.
मनोज कुमार अकसर बंद गले के कपड़े पहनना पसंद करते हैं। फिर चाहे वह कुर्ता हो या शर्ट। इसके अलावा आप मनोज कुमार के एक हाथ को अकसर उनके अपने मुंह पर रखा पाएंगे। मनोज कुमार को फ़िल्मों में रोमांस के बजाय देशभक्ति फ़िल्में करना ज्यादा भाया। मनोज कुमार ने वर्ष 1957 में बनी फ़िल्म 'फ़ैशन' के जरिए बड़े पर्दे पर क़दम रखा। प्रमुख भूमिका की उनकी पहली फ़िल्म 'कांच की गुडि़या' (1960) थी। बाद में उनकी दो और फ़िल्में पिया मिलन की आस और रेशमी रुमाल आई लेकिन उनकी पहली हिट फ़िल्म 'हरियाली और रास्ता' (1962) थी। मनोज कुमार ने वो कौन थी, हिमालय की गोद में, गुमनाम, दो बदन, पत्थर के सनम, यादगार, शोर, संन्यासी, दस नम्बरी और क्लर्क जैसी अच्छी फ़िल्मों में काम किया। उनकी आखिरी फ़िल्म मैदान-ए-जंग (1995) थी। बतौर निर्देशक उन्होंने अपनी अंतिम फ़िल्म ‘जय हिंद’ 1999 में बनाई थी।

शनिवार, 22 जुलाई 2023

शिव कुमार बटालवी

शिव कुमार बटालवी
अन्य नाम बिरह का सुल्तान (उपनाम)
🎂जन्म 23 जुलाई, 1936
जन्म भूमि बड़ा पिंड लोहतियाँ, सियालकोट (अविभाजित भारत
⚰️मृत्यु 6 मई, 1973
मृत्यु स्थान पंजाब
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र कवि, लेखक, नाटककार
मुख्य रचनाएँ 'पीड़ां दा परागा', 'लाजवंती', 'आटे दीयां चिड़ियां', 'मैनूं विदा करो', 'दरदमन्दां दीआं आहीं', 'लूणां', 'मैं ते मैं' 'आरती' और 'बिरह दा सुल्तान' आदि।
प्रसिद्धि पंजाबी कवि व शायर
नागरिकता भारतीय
शिव कुमार बटालवी 
🎂जन्म- 23 जुलाई, 1936; ⚰️मृत्यु- 6 मई, 1973)
 पंजाबी भाषा के एक विख्यात कवि थे, जो उन रोमांटिक कविताओं के लिए सबसे ज्यादा जाने जाते हैं, जिनमें भावनाओं का उभार, करुणा, जुदाई और प्रेमी के दर्द का बखूबी चित्रण है। शिव कुमार बटालवी ऐसे शायर और कवि थे जो एक छोटी-सी जिंदगी में इतना नाम बना गये कि आज भारत में हर नौजवां के सीने में धड़कते हैं। उनके गीतों में ‘बिरह की पीड़ा’ इस कदर थी कि उस दौर की प्रसिद्ध कवयित्री अमृता प्रीतम ने उन्हें बिरह का सुल्तान नाम दे दिया। शिव कुमार बटालवी यानी पंजाब का वह शायर, जिसके गीत हिंदी में न आकर भी वह बहुत लोकप्रिय हो गया। उसने जो गीत अपनी गुम हुई महबूबा के लिए बतौर इश्तहार लिखा था, वो जब फ़िल्मों तक पहुंचा तो मानो हर कोई उसकी महबूबा को ढूंढ़ते हुए गा रहा था- "इक कुड़ी जिहदा नाम मोहब्बत गुम है"।
शिव कुमार का जन्म 23 जुलाई 1936 को गांव बड़ा पिंड लोहटिया, शकरगढ़ तहसील (अब पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में) राजस्व विभाग के ग्राम तहसीलदार पंडित कृष्ण गोपाल और गृहिणी शांति देवी के घर में हुआ। भारत के विभाजन के बाद उनका परिवार गुरदासपुर जिले के बटाला चला आया, जहां उनके पिता ने पटवारी के रूप में अपना काम जारी रखा और बाल शिव ने प्राथमिक शिक्षा पाई।

1953 में उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय से मैट्रिक किया और बटाला के बैरिंग यूनियन क्रिश्चियन कॉलेज में एफ एससी कार्यक्रम में नामांकित हुए। अपनी डिग्री पूरी करने से पहले उन्होंने कादियाँ के एस एन कॉलेज के कला विभाग में दाखिला लिया, जो उनके व्यक्तित्व से ज्यादा मेल खाता था, हालांकि दूसरे साल में उन्होंने उसे भी छोड़ दिया। उसके बाद वह हिमाचल प्रदेश के बैजनाथ के एक स्कूल में सिविल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा लेने के लिए दाखिल हुए, पर फिर उन्होंने इसे भी बीच में ही छोड़ दिया।  इसके बाद उन्होंने नाभा के सरकारी रिपुदमन कालेज में अध्ययन किया। उन्हें विख्यात पंजाबी लेखक गुरबख्श सिंह प्रीतलड़ी की बेटी से प्यार हो गया, जिन्होंने दोनों के बीच जाति भेद होने के कारण एक ब्रिटिश नागरिक से शादी कर ली। वह प्यार में दुर्भाग्यशाली रहे और प्यार की यह पीड़ा उनकी कविता में तीव्रता से परिलक्षित होती है।

बाद की जिंदगी में उनके पिता को कादियां में पटवारी की नौकरी मिली और इसी अवधि के दौरान उन्होंने अपना सबसे अच्छा साहित्यिक अवदान दिया। 1960 में उनकी कविताओं का पहला संकलन पीड़ां दा परागा (दु:खों का दुपट्टा) प्रकाशित हुआ, जो काफी सफल रहा। 1965 में अपनी महत्वपूर्ण कृति महाकाव्य नाटिका लूणा (1965) के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार पाने वाले वे सबसे कम उम्र के साहित्यकार बन गये। काव्य पाठ और अपनी कविता को गाने की वजह से लोगों में वे और उनका काम काफी प्रसिद्ध हुआ।

5 फ़रवरी 1967 को उनका विवाह गुरदासपुर जिले के किरी मांग्याल की ब्राह्मण कन्या अरुणा से हुआ और बाद में दंपती को दो बच्चे मेहरबां (1968) और पूजा (1969) हुए। 1968 में चंडीगढ़ चले गये, जहां वे स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में जन संपर्क अधिकरी बने। बाद के वर्षों में वे खराब स्वास्थ्य से त्रस्त रहे, हालांकि उन्होंने बेहतर लेखन जारी रखा।
उनके लेखन में उनकी चर्चित मौत की इच्छा हमेशा से स्पष्ट रही है।और 7 मई 1973 में 36 साल की उम्र में शराब की दुसाध्य लत के कारण हुए लीवर सिरोसिस के परिणामस्वरूप पठानकोट के किरी मांग्याल में अपने ससुर के घर पर उनका निधन हो गया।

एल सुब्रह्मण्यम

लक्ष्मीनारायण सुब्रमण्यम
🎂जन्म 23 जुलाई, 1947
जन्म भूमि चेन्नई, तमिलनाडु
⚰️9 फ़रवरी, 1995
अभिभावक माता- सीतालक्ष्मी
पिता- वी. लक्ष्मीनारायण

पति/पत्नी विजी सुब्रमण्यम, कविता कृष्णमूर्ति
संतान दो पुत्री- गिंगेर शंकर, बिंदु
दो पुत्र- नारायण, अम्बी

कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र शास्त्रीय वाद्य वादक
शिक्षा एम.बी.बी.एस. (मद्रास मेडिकल कॉलेज)
पश्चिमी संगीत में स्नातकोत्तर (कैलिफ़ोर्निया इंस्टीच्यूशन ऑफ आर्ट्स)

पुरस्कार-उपाधि विश्व कला भारती’ पुरस्कार (2004), पद्म भूषण (2001), पद्म श्री (1988), लोटस फेस्टिवल’ पुरस्कार (1988), राष्ट्रपति पुरस्कार (1963) आदि।
प्रसिद्धि वायलिन वादक
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी एल. सुब्रमण्यम ने बर्नार्डो बेर्तोलुकि की फिल्मों ‘लिटिल बुद्धा’ और ‘कॉटन मैरी ऑफ मर्चेंट-आइवरी’ के निर्माण में एकल वायलिन वादक के रूप में भी अपनी प्रस्तुति दी।
❤️परिचय
बचपन में ही एल. सुब्रमण्यम ने शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में विशेष योग्यता हासिल कर ली थी। ये एकमात्र ऐसे व्यक्ति हैं जिन्हें ‘वायलिन चक्रवर्ती’ (यानि वायलिन सम्राट) के नाम से बचपन में जाना जाता था। ये केवल वायलिन संगीत के पेशे से बंधे नहीं रहे, अपितु इन्होंने सैकड़ों धुनों को बनाया, सुसज्जित किया और पुराने धुनों में सुधार भी किया। ये कर्नाटक संगीत के साथ-साथ पश्चिमी शास्त्रीय संगीत, जाज, फ्यूज़न, ऑर्केस्ट्रा और विश्व संगीत के भी जानकर हैं। इन्हें न केवल भारत अपितु विश्व के कई देशों में सम्मानित किया जा चुका है। इन्होंने संसार के कई प्रतिष्ठित संगीतकारों के अनुरोध पर उनके साथ अनेकों अंतर्राष्ट्रीय संगीत कार्यक्रमों में अपनी प्रस्तुति भी दी है। एल. सुब्रमण्यम ने 150 से अधिक रिकॉर्डिंग की हैं और साथ ही यहूदी मेनुहिन, स्टीफन ग्राप्पेल्ली एवं रगइएरो रिक्की आदि जैसे कई बड़े संगीतकारों के साथ भी काम किया है। इन्हें अपने संगीत के धुनों को आर्केस्ट्रा के साथ संयोजन (मिक्सिंग) के लिए विशेष प्रसिद्ध मिली है।

जन्म
एल. सुब्रमण्यम का जन्म 23 जुलाई, 1947 को चेन्नई, तमिलनाडु में प्रतिष्ठित संगीतकार परिवार में हुआ था। इनका सम्बन्ध एक दक्षिण भारतीय तमिल परिवार से है। इन्होंने मात्र छ: वर्ष की अल्पायु में ही संगीत के अपने पहले सार्वजनिक कार्यक्रम का रंगमंच पर प्रदर्शन किया था। संगीत बचपन से ही इनके रग-रग में भरा हुआ था, जो इनकी मां सीतालक्ष्मी और पिता वी. लक्ष्मीनारायण से वरदान के रूप में मिला था क्योंकि वे दोनों भी प्रसिद्ध संगीतकार थे।

शिक्षा
एल. सुब्रमण्यम का बचपन जाफना (श्रीलंका) में व्यतीत हुआ। प्रतिष्ठित संगीतकार परिवार से होने की वजह से इन्होंने बचपन में ही अपने कदम इस दिशा में आगे बढ़ाना प्रारम्भ कर दिया था। इन्होंने संगीत की प्रारम्भिक शिक्षा अपने माता-पिता से ही प्राप्त की थी, जिन्होंने इन्हें संगीत के मूल बारीकियों का ज्ञान दिया था।

संगीत के अलावा एल. सुब्रमण्यम ने कॉलेज के दिनों में चिकित्सा विज्ञान का भी अध्ययन किया था। इन्होंने मद्रास मेडिकल कॉलेज से एम.बी.बी.एस. की डिग्री प्राप्त की थी। इनका डॉक्टर के रूप में कार्यकाल अल्प समय का ही रहा और कुछ दिनों बाद इन्होंने संगीत का अध्ययन फिर से आरम्भ कर दिया। इस दौरान इन्होंने पश्चिमी संगीत में स्नातकोत्तर की शिक्षा कैलिफ़ोर्निया इंस्टीच्यूशन ऑफ आर्ट्स से प्राप्त की। इस दौरान इन्हें अनेक समकालीन प्रतिष्ठित संगीतकारों के साथ रियाज करने का सुनहरा अवसर मिला। हालांकि इन्होंने चिकित्सा के क्षेत्र में अपना अध्ययन करके डॉक्टर की उपाधि प्राप्त की थी, फिर भी इन्होंने एक वायलिन वादक के रूप में संगीत को अपने पेशे के रूप में अपनाया। इनके चाहने वाले प्रेम से इन्हें ‘मणि’ कहकर पुकारते हैं।

पारिवारिक जीवन
एल. सुब्रमण्यम का पहला विवाह विजी सुब्रमण्यम के साथ वर्ष 1976 में हुआ था, परंतु दुर्भाग्यवश 9 फ़रवरी, 1995 को उनकी मृत्यु हो गयी। इसके बाद वर्ष 1999 में इन्होंने अपना दूसरा विवाह लोकप्रिय भारतीय पार्श्वगायिका कविता कृष्णमूर्ति के साथ किया। पहली शादी से इन्हें चार बच्चे हुए, जिन्होंने अपने पिता सुब्रमण्यम के संगीत शिक्षा का अनुकरण किया और कई संगीत के कार्यक्रमों में अपने प्रस्तुत भी देते रहे हैं। इनकी बड़ी बेटी गिंगेर शंकर इस समय लॉस एंजिल्स में संगीत कंपोजर के रूप में कार्य कर रही हैं। इनकी दूसरी बेटी बिंदु (सीता) एक प्रसिद्ध गायिका और गीतकार हैं। इनके बड़े बेटे नारायण एक सर्जन (डॉक्टर) हैं जो गायक भी हैं। जबकि इनके छोटे बेटे अम्बी एक वायलिन वादक हैं जिन्हें बहुत ही प्रसिद्धि मिली है।
2007 में, सुब्रमण्यम फाउंडेशन, जो सुब्रमण्यम और उनकी पत्नी द्वारा संचालित एक चैरिटी है, ने भारत के बैंगलोर में सुब्रमण्यम एकेडमी ऑफ परफॉर्मिंग आर्ट्स (SAPA) नामक एक संगीत विद्यालय की स्थापना की
↔️संगीतकार

सुरभि (1988) (संगीतकार, संगीत संयोजक, संगीतकार: वायलिन वादक)
सलाम बॉम्बे! (1988) (संगीतकार, संगीत संयोजक, संगीतकार: वायलिन वादक)
मिसिसिपी मसाला (1991) (संगीतकार, संगीतकार: वायलिन, वायलिन सिंथेसाइज़र, परकशन)
जयते (1997) (संगीतकार)
ई स्नेहथीराथु (2004) (संगीतकार)
बनज़: ए लव स्टोरी (2012) (संगीतकार: वायलिन)
गौर हरि दास्तान (2013) (संगीतकार)
हे राम (2000) (संगीतकार, पूरा होने से पहले परियोजना छोड़ दी) 
↔️एकल कलाकार

लिटिल बुद्धा (1993) (वायलिन वादक)
कामसूत्र: ए टेल ऑफ़ लव (1996) (वायलिन वादक)
कॉटन मैरी (1999) (वायलिन वादक)
↔️अतिरिक्त साउंडट्रैक
पीस वन डे (2004) (संगीतकार, कलाकार: "जिप्सी ट्रेल")
बराका (1992) (कलाकार: "वांडरिंग सेंट")
राग मोहनम (2012) (कलाकार: "समर्पणम")
↔️सुब्रमण्यम पर

एल. सुब्रमण्यम: वायलिन फ्रॉम द हार्ट (1999)। जीन हेनरी म्युनियर द्वारा निर्देशित।

महमूद

महमूद अली 

🎂29 सितम्बर,1932

⚰️23 जुलाई, 2004

जीवनसाथी मधु (तलाक)नान्सी क्रोल अका ट्रेसी अली (ताहिरा)

बच्चे मसूद अली,मक़्सूद महमूद अली (लक्की अली),मक़्दूम अली,मासूम अली,मन्ज़ूर अली,मन्सूर अली,जिन्नी अली

माता-पिता

मुम्ताज़ अली

लतीफ़ुन्निसा अली

संबंधी

मीनू मुमताज़ (बहन)

मीना कुमारी (साली, मधु की बहन)

एक भारतीय अभिनेता और फ़िल्म निर्देशक थे। हिन्दी फ़िल्मों में उनके हास्य कलाकार के तौर पर किये गये अदभुत अभिनय के लिये वे जाने और सराहे गये है। तीन दशक लम्बे चले उनके करीयर में उन्होने 300 से ज़्यादा हिन्दी फ़िल्मों में काम किया। महमूद अभिनेता और नृत्य कलाकार मुम्ताज़ अली के नौ बच्चों में से एक थे।जुलाई 23, 2004 को अमरीका में पेनसिल्वेनिया शहर में नींद में ही गुज़र गये। वे बरसों से ह्रदयरोग से पीड़ित थे। पिछले बरसों में उनकी सेहत बहुत खराब रहती थी।

महमूद का जन्म 29 सितम्बर 1932 को मुम्बई में हुआ था। अपने माता-पिता की आठ में से दूसरे नम्बर की संतान महमूद ने शुरुआत में बाल कलाकार के तौर पर कुछ फ़िल्मों में काम किया था।


उनकी भाषा में हैदराबादी जुबान का पुट दर्शकों को बेहद पसंद आया और उनकी संवाद अदायगी और अभिनय के लाजवाब अंदाज ने जल्द ही करोड़ों लोगों को अपना दीवाना बना लिया। महमूद ने जिस वक्त फ़िल्मों को गम्भीरता से लेना शुरू किया तब भारतीय फ़िल्मों पर किशोर कुमार की कॉमेडी का जादू छाया था।


लेखक मनमोहन मेलविले ने अपने एक लेख में महमूद और किशोर के दिलचस्प किस्से को बयान किया है। इसमें कहा गया है कि महमूद ने अपने कॅरियर के सुनहरे दौर से गुजर रहे किशोर से अपनी किसी फ़िल्म में भूमिका देने की गुजारिश की थी लेकिन महमूद की प्रतिभा से पूरी तरह वाकिफ किशोर ने कहा था कि वह ऐसे किसी व्यक्ति को मौका कैसे दे सकते, जो भविष्य में उन्हें चुनौती देने का माद्दा रखता हो। इस पर महमूद ने बड़े दिलचस्प जवाब में कहा एक दिन मैं भी बड़ा फ़िल्मकार बन जाउूंगा और आपको अपनी फ़िल्म में भूमिका दे दूंगा। महमूद अपनी बात के पक्के साबित हुए और आगे चलकर अपनी होम प्रोडक्शन फ़िल्म पड़ोसन में किशोर को रोल दिया। इन दोनों महान कलाकारों की जुगलबंदी से यह फ़िल्म बॉलीवुड की सबसे विलक्षण कॉमेडी फ़िल्म बनकर उभरी।


अपने जीवन के आखिरी दिनों में महमूद का स्वास्थ्य खराब हो गया। वह इलाज के लिए अमेरिका गए जहां 23 जुलाई 2004 को उनका निधन हो गया।


महमूद ने अभिनेत्री मीना कुमारी की बहन मधु से शादी की थी।


आठ संतानों के पिता महमूद के दूसरे बेटे लकी अली जाने-माने गायक और अभिनेता हैं।


राज मंगल सिंह चौधरी

राजमंगल सिंह चौधरी
🎂23 जुलाई 1975
दार्जिलिंग , पश्चिम बंगाल , भारत
अल्मा मेटर
बीएमएस कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग , बीएमएस इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एंड मैनेजमेंट
व्यवसायों
अभिनेतापटकथा लेखकफ़िल्म निर्देशक
चौधरी का जन्म दार्जिलिंग, भारत में हुआ था। मॉडलिंग में अपना करियर बनाने और बीएमएस कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग से सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग में डिग्री हासिल करने के बाद, उन्होंने बैंगलोर में अपनी खुद की कंपनी खोली । जब चौधरी को उनके व्यापारिक साझेदारों ने धोखा दिया तो उन्होंने अभिनय में नया करियर बनाने के लिए मुंबई जाने का अवसर लिया। अनुराग कश्यप द्वारा लिखित फिल्म सत्या को देखने के बाद चौधरी को अपनी स्क्रिप्ट लिखने की प्रेरणा मिली । अपने कॉलेज के दिनों के अनुभवों के आधार पर, उन्होंने अपनी स्क्रिप्ट पर काम किया जो रैगिंग की प्रथा पर केंद्रित थी, शैक्षणिक संस्थानों में छात्रों का शारीरिक और मानसिक शोषण। जिस फिल्म में वह दिखाई देने वाले थे, उसके असफल होने के बाद, चौधरी अपनी स्क्रिप्ट निर्देशक कश्यप के पास ले गए, जो उनके गुरु बन गए। कश्यप ने चौधरी की मूल पटकथा के आधार पर एक नई पटकथा लिखी, जो अंततः गुलाल फिल्म बनी ।गुलाल पर अपने काम के अलावा , चौधरी ने एक छोटी भूमिका निभाते हुए ब्लैक फ्राइडे के सेट पर भी सहायता की और लघु कहानी लिखी, जिस पर नो स्मोकिंग आधारित है। वह 2003 की फिल्म कुछ ना कहो में दिखाई दिए , जिसमें ऐश्वर्या राय और अभिषेक बच्चन ने अभिनय किया था. इसके बाद वह सुशील राजपाल की फिल्म अंटर्डवंड में दिखाई दिए , जिसने 2007 में सामाजिक मुद्दों पर सर्वश्रेष्ठ फिल्म का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीता और 2010 में रिलीज़ हुई; उनका आगामी प्रोजेक्ट इरफान खान, अभय देओल स्टारर कर्मया है ।

मिलिंद गुनाजी

मिलिंद गुनाजी 
हिन्दी फ़िल्मों के एक अभिनेता हैं।
🎂जन्म: 23 जुलाई 1961, मुम्बई
पत्नी: रानी गुनाजी
बच्चे: अभिषेक गुनाजी
भाई: प्रल्हाद गुनाजी
लंबाई: 1.88 मी
गुनाजी का जन्म 23 जुलाई 1961 को बॉम्बे (वर्तमान मुंबई), महाराष्ट्र में हुआ था। गुणाजी ने शुरुआत में 1993 की फिल्म पपीहा से अभिनय शुरू किया और पहली बार 1996 की फरेब में इंस्पेक्टर इंद्रजीत सक्सेना की भूमिका से उन्हें व्यापक पहचान मिली।इस भूमिका के लिए उन्हें फिल्मफेयर पुरस्कार के लिए नामांकन मिला नकारात्मक भूमिका में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन मिला ।

2009 में उन्हें नोवेल इंस्टीट्यूट ग्रुप के एनआईबीआर कॉलेज ऑफ होटल मैनेजमेंट का ब्रांड एंबेसडर नामित किया गया था। मिलिंद ने एवरेस्ट फतह किया , जो नवंबर 2014 में स्टार प्लस पर प्रसारित हुआ । उन्होंने दक्षिण भारतीय सिनेमा में भी दो फिल्मों आलवंदन ( तमिल ) और कृष्णम वंदे जगद्गुरुम ( तेलुगु ) में महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाईं।

गुनाजी ने एक फोटोग्राफर के रूप में बालगंधर्व पुणे, नासिक में कालिदास हॉल, विले पार्ले में प्रबोधंकर ठाकरे हॉल सहित कई एकल फोटो प्रदर्शनियों का आयोजन किया है।

उन्होंने एक यात्रा लेखक , इंतियामतकट टूर्स के ब्रांड एंबेसडर और मराठी दैनिक लोकसत्ता के लोकप्रभा पूरक में एक साप्ताहिक कॉलम लिखने के रूप में काम किया है । एक लेखक के रूप में गुनाजी ने 12 किताबें लिखी हैं। 1998 में उन्होंने अपनी पहली पुस्तक माझी मुलुखगिरि प्रकाशित की, जो उनके लोकप्रभा स्तंभों का संकलन थी । गुणाजी ने यह कहते हुए मॉडलिंग की है कि यह "मेरे अहंकार को संतुष्ट करता है और अच्छा मौद्रिक रिटर्न देता है।" 
पुरुस्कार
1997: नामांकित: फरेब के लिए फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ खलनायक पुरस्कार
1998: नामांकित: विरासत के लिए फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ खलनायक पुरस्कार

मनुस्मृति

. ................मनुस्मृति.................... जरा सोचिए, अगर आज भारत का कानून यह तय कर दे कि— "एक आम आदमी चोरी करे तो उसे...