बुधवार, 13 नवंबर 2024

कर्म प्रधान संसार

*जैसा यह लोक - वैसा ही है परलोक*

जिस को यहां धक्के 
वो वहां भी कैसे रुके 
राग देवेश है यहां 
वहां कोन सा नही 

कोन है जो इन्द्र को नहीं जानता 

भोग, विलास, शोक, सन्ताप, 
 
इधर भी उधर भी 
इधर का परिवार है सहार 
वहां का 
जिसका परिवार यहां नहीं 
 वहां क्या बनेगा 
श्राद्ध तपर्ण, 
मुक्ति करे गा क्या?
करे गा अच्छा कर्म हमारा
या पुत्र के किया श्राद्ध
अर्पण तर्पण
जीव की मुक्ती करेगा 
यह शुभ कर्म 
पुत्र ही कर पाता है
तो यह शुभ कर्म
केवल पुत्र का था
  नहीं करे गा 
 तो गया जीव 
अपने पित्रों सहित 
नरकों मे गिरेगा
राग द्वेष चला जैसा यहां,
 वहां भी वैसा ही चलेगा
 इस लोक और प्रलोक में 
केवल यही अन्तर है 
प्रायशचित कर्म होता है यहाँ 
वहां उसका का दरवाजा भी बन्द है।
उसका का दरवाजा भी बन्द है।

मंगलवार, 12 नवंबर 2024

गीता का तीसरा अध्याय

अध्याय 3 में प्रवेश
भगवद  गीता अध्याय: 3
भगवान् और महापुरुष में भी वो कामना है, क्रोध है, लोभ है। मामूली क्रोध नहीं, यहाँ जितने आप लोग बैठे हैं किसी ने शायद एक भी मर्डर नहीं किया होगा और अर्जुन ने देखो तो करोड़ों मर्डर कर डाले, हनुमान जी ने करोड़ों मर्डर ब्राह्मणों की हत्या कर डाली, लेकिन भगवान् के लोक में गये।

दण्ड मिलने की कौन कहे, पुरस्कार मिला। महापुरुष और भगवान् का कार्य योगमाया से होता है। 'योगमाया' माने भगवान् की एक पर्सनल पॉवर का नाम है। योग रहे अपनी पर्सनैलिटी में और माया का कार्य करे, वो योगमाया है। हम लोगों का काम 'माया' से होता है और भगवान् का काम योगमाया से होता है। और भगवान् और महापुरुष में अन्तर नहीं, इसलिये महापुरुष का कार्य भी योगमाया से होता है। इसलिये दिखाई तो पड़ता है कि मर्डर कर रहा है अर्जुन लेकिन उसने सर्वत्र श्यामसुन्दर को देखा। मर्डर करने की कौन कहे। और कुछ देखा ही नहीं। हनुमान जी ने सर्वत्र राम को देखा और कुछ देखा ही नहीं, मर्डर करते रहे लेकिन कुछ देखा नहीं और। अरे ! बड़ा आश्चर्य है। हाँ ऽऽ ! योगमाया का मतलब ही है जो बुद्धि से परे वर्क करे। काम नहीं है, काम का वर्क करे, क्रोध नहीं है, क्रोध का वर्क करे, लोभ नहीं है लोभ का वर्क करे। और तीस करोड़ सड़सठ लाख बीस हजार वर्ष तक प्रह्लाद ने राज्य किया। भगवत्प्राप्ति करने के बाद। ब्याह किया, बच्चे हुए। हम लोग भी थे उस समय। हम लोगों को बताया होगा किसी ने कि ये प्रह्लाद को भगवत्प्राप्ति हो चुकी है। हूँऽ ? ये करोड़ों वर्ष से राज्य कर रहे हैं इनका पेट नहीं भरा, वैराग्य नहीं हुआ। हैं! क्या ? भगवत्प्राप्ति हुई ! उस समय हम लोगों ने यह कह दिया।
लेकिन वो नित्य विरक्त हैं। नित्य विरक्त। और काम सब कर रहे हैं, बड़े-बड़े काम, युद्ध वगैरह। मर्डर कितने सारे होते हैं युद्ध में, सब कुछ कर रहे हैं, लेकिन माया से परे हैं, आनन्दमय हैं।
क्रोध से भ्रम पैदा होता है. भ्रम से बुद्धि व्यग्र होती है. जब बुद्धि व्यग्र होती है तब तर्क नष्ट हो जाता है. जब तर्क नष्ट नहीं होता है तब व्यक्ति का पतन होता ही जाता है।
मन की गतिविधियों, होश, श्वास, और भावनाओं के माध्यम से भगवान ओर उन की शक्ति सदा तुम्हारे साथ है; और लगातार तुम्हे बस एक साधन की तरह प्रयोग कर के सभी कार्य कर रही है। अध्याय 3 में प्रवेश
भगवद  गीता अध्याय: 3
श्लोक 1

श्लोक:
(ज्ञानयोग और कर्मयोग के अनुसार अनासक्त भाव से नियत कर्म करने की श्रेष्ठता का निरूपण) अर्जुन उवाच ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन।
 तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव॥

भावार्थ:
अर्जुन बोले- हे जनार्दन! यदि आपको कर्म की अपेक्षा ज्ञान श्रेष्ठ मान्य है तो फिर हे केशव! मुझे भयंकर कर्म में क्यों लगाते हैं?
 ॥1॥

भगवद  गीता अध्याय: 3
श्लोक 2

श्लोक:
व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे।
 तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम्‌॥

भावार्थ:
आप मिले हुए-से वचनों से मेरी बुद्धि को मानो मोहित कर रहे हैं। इसलिए उस एक बात को निश्चित करके कहिए जिससे मैं कल्याण को प्राप्त हो जाऊँ
 ॥2॥॥

तब भगवान श्री कृष्ण कहते है।

भगवद  गीता अध्याय: 3
श्लोक 3

श्लोक:
श्रीभगवानुवाच लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ।
 ज्ञानयोगेन साङ्‍ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्‌॥

भावार्थ:
श्रीभगवान बोले- हे निष्पाप! इस लोक में दो प्रकार की निष्ठा (साधन की परिपक्व अवस्था अर्थात पराकाष्ठा का नाम 'निष्ठा' है।) मेरे द्वारा पहले कही गई है। उनमें से सांख्य योगियों की निष्ठा तो ज्ञान योग से (माया से उत्पन्न हुए सम्पूर्ण गुण ही गुणों में बरतते हैं, ऐसे समझकर तथा मन, इन्द्रिय और शरीर द्वारा होने वाली सम्पूर्ण क्रियाओं में कर्तापन के अभिमान से रहित होकर सर्वव्यापी सच्चिदानंदघन परमात्मा में एकीभाव से स्थित रहने का नाम 'ज्ञान योग' है, इसी को 'संन्यास', 'सांख्ययोग' आदि नामों से कहा गया है।) और योगियों की निष्ठा कर्मयोग से (फल और आसक्ति को त्यागकर भगवदाज्ञानुसार केवल भगवदर्थ समत्व बुद्धि से कर्म करने का नाम 'निष्काम कर्मयोग' है, इसी को 'समत्वयोग', 'बुद्धियोग', 'कर्मयोग', 'तदर्थकर्म', 'मदर्थकर्म', 'मत्कर्म' आदि नामों से कहा गया है।) होती है
 ॥3॥
निष्ठा:.अवस्था, दशा।दृढ़ निश्चय, निश्वास से है।

सांख्य योग:सांख्य योग, भगवद् गीता से लिया गया एक हिंदू दार्शनिक शब्द है. इसका मतलब है, ज्ञान, आत्म-साक्षात्कार, और वास्तविकता की प्रकृति को समझने का मार्ग.जो आत्म साक्षात्कार से प्राप्त होता है।ना कि वॉट्सएप यूनिवर्सिटी जिस   के ज्ञान से आत्म साक्षात्कार ज्ञान भी नष्ट हो जाता है।।
सारांश में: इस अध्याय की शुरुआत इस विचार से होती है कि आम व्यक्ति और ईश्वर में भले ही कुछ क्रियाएं समान प्रतीत हों, परंतु वे असल में योगमाया से किए गए कार्य होते हैं। जैसे अर्जुन की शंका के समाधान में श्रीकृष्ण कर्म और ज्ञान योग के बीच संतुलन बनाते हैं और यही संदेश देते हैं कि संसार में रहते हुए हमें भगवान के प्रति अर्पित कर्म करना चाहिए, ताकि हमारे कर्म भी योगमाया के अंतर्गत रह ते हे।
यह भूमिका अध्याय 3 के विचारों को जीवंत रूप से उद्घाटित करती है और अध्याय को सरल तरीके से समझाती है बिना कोई मूल भाव के साथ छेड़ छाड़ किए

कर्म: तत्त्वज्ञानी पुरुषोंने संचित, वर्तमान और प्रारब्धके भेदसे कर्मकी तीन गतियाँ बतलायी हैं। अनेक जन्मों से संचय किये हुए 'पुराने कर्म को 'संचित' कर्म कहते हैं। फिर कर्म भी तीन प्रकारके होते हैं- सात्त्विक, राजस और तामस।

भगवद  गीता अध्याय: 3
श्लोक 4

श्लोक:
न कर्मणामनारंभान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते।
 न च सन्न्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति॥

भावार्थ:
मनुष्य न तो कर्मों का आरंभ किए बिना निष्कर्मता (जिस अवस्था को प्राप्त हुए पुरुष के कर्म अकर्म हो जाते हैं अर्थात फल उत्पन्न नहीं कर सकते, उस अवस्था का नाम 'निष्कर्मता' है।) को यानी योगनिष्ठा को प्राप्त होता है और न कर्मों के केवल त्यागमात्र से सिद्धि यानी सांख्यनिष्ठा को ही प्राप्त होता है
 ॥4॥
योग निष्ठा: कर्म और ज्ञान इन्हीं दो निष्ठाओं के अंतर्गत है।

सांख्यनिष्ठा:गीता में तीसरे अध्याय के अट्ठाईसवें और पांचवें अध्याय के आठवें, नवें और तेरहवें श्लोकों में सांख्यनिष्ठा की दृष्टि से कर्म करने की बात कही गई है. इसको देख कर फिर दुबार
 (🔴तीसरे अध्याय का पाँच वाँ श्लोक देखे गे🔴)
भगवद  गीता अध्याय: 3
श्लोक 28

श्लोक:
तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः।
 गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते॥

भावार्थ:
परन्तु हे महाबाहो! गुण विभाग और कर्म विभाग (त्रिगुणात्मक माया के कार्यरूप पाँच महाभूत और मन, बुद्धि, अहंकार तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ और शब्दादि पाँच विषय- इन सबके समुदाय का नाम 'गुण विभाग' है और इनकी परस्पर की चेष्टाओं का नाम 'कर्म विभाग' है।) के तत्व (उपर्युक्त 'गुण विभाग' और 'कर्म विभाग' से आत्मा को पृथक अर्थात्‌ निर्लेप जानना ही इनका तत्व जानना है।) को जानने वाला ज्ञान योगी सम्पूर्ण गुण ही गुणों में बरत रहे हैं, ऐसा समझकर उनमें आसक्त नहीं होता।
 ॥28॥
अब अध्याय 5का 8नंबर का श्लोक देखते हैं 

भगवद  गीता अध्याय: 5
श्लोक 8-9

श्लोक:
नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्ववित्‌।
 पश्यञ्श्रृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपंश्वसन्‌॥
 प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि॥
 इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्‌॥

भावार्थ:
तत्व को जानने वाला सांख्ययोगी तो देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूँघता हुआ, भोजन करता हुआ, गमन करता हुआ, सोता हुआ, श्वास लेता हुआ, बोलता हुआ, त्यागता हुआ, ग्रहण करता हुआ तथा आँखों को खोलता और मूँदता हुआ भी, सब इन्द्रियाँ अपने-अपने अर्थों में बरत रही हैं- इस प्रकार समझकर निःसंदेह ऐसा मानें कि मैं कुछ भी नहीं करता हूँ
 ॥8-9॥
(एक सांस आए एक जाए प्रभु चिंतन राम राम चलता ही रहे)

अब  तेरहवें श्लोक को भी देखते है।

भगवद  गीता अध्याय: 5
श्लोक 13

श्लोक:
(ज्ञानयोग का विषय ) 
 सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी।
 नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्‌॥

भावार्थ:
अन्तःकरण जिसके वश में है, ऐसा सांख्य योग का आचरण करने वाला पुरुष न करता हुआ और न करवाता हुआ ही नवद्वारों वाले शरीर रूप घर में सब कर्मों को मन से त्यागकर आनंदपूर्वक सच्चिदानंदघन परमात्मा के स्वरूप में स्थित रहता है
 ॥13॥

चलिए अब छूटे हुए तीसरे अध्याय का पाँच वाँ श्लोक देखे गे।

भगवद  गीता अध्याय: 3
श्लोक 5

श्लोक:
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्‌।
 कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः॥

भावार्थ:
निःसंदेह कोई भी मनुष्य किसी भी काल में क्षणमात्र भी बिना कर्म किए नहीं रहता क्योंकि सारा मनुष्य समुदाय प्रकृति जनित गुणों द्वारा परवश हुआ कर्म करने के लिए बाध्य किया जाता है
 ॥5॥
खुद को ओर समाज के साथ धोखे का वर्णन सरलता पूर्वक भगवान ने कर दिया है देखे।

भगवद  गीता अध्याय: 3
श्लोक 6

श्लोक:
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्‌।
 इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते॥

भावार्थ:
जो मूढ़ बुद्धि मनुष्य समस्त इन्द्रियों को हठपूर्वक ऊपर से रोककर मन से उन इन्द्रियों के विषयों का चिन्तन करता रहता है, वह मिथ्याचारी अर्थात दम्भी कहा जाता है
 ॥6॥
इसे पाखंड से भी जोड़ कर आगे देखने को मिले गा।
भगवद  गीता अध्याय: 3
श्लोक 7

श्लोक:
यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन।
 कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते॥

भावार्थ:
किन्तु हे अर्जुन! जो पुरुष मन से इन्द्रियों को वश में करके अनासक्त हुआ समस्त इन्द्रियों द्वारा कर्मयोग का आचरण करता है, वही श्रेष्ठ है
 ॥7॥॥

भगवद  गीता अध्याय: 3
श्लोक 8

श्लोक:
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
 शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मणः॥

भावार्थ:
तू शास्त्रविहित कर्तव्यकर्म कर क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करने से तेरा शरीर-निर्वाह भी नहीं सिद्ध होगा
 ॥8॥
शास्त्रविहित: का मतलब है, जो शास्त्रों में कथित या अनुमोदित हो. शास्त्रों में मुख्य रूप से दो तरह के कर्मों का वर्णन किया गया है: विहित कर्म, निषिद्ध कर्म. 
 
जिन कर्मों को करने के लिए शास्त्रों में उपदेश दिया गया है, उन्हें विहित कर्म कहते हैं. वहीं, जिन कर्मों को करने के लिए शास्त्रों में मनाही की गई है, उन्हें निषिद्ध कर्म कहते हैं. 
 
शास्त्रों के मुताबिक, कर्मों का फल उसी को भोगना पड़ता है, दूसरा व्यक्ति उसे नहीं भोग सकता. इसलिए, हर कर्म को दूसरों के हित का भाव रखते हुए बड़ी सावधानी से करना चाहिए. 
(यह मूल भाव है पर इसको वाट्सअप यूनिवर्सिटी वाले कहकर गुमराह कर सकते है हर कर्म दूसरे के हित को ध्यान में रखना है तो भाईचार का ध्यान क्यों नहीं रखते हिंदू मुस्लिम क्यों करते हो आदि आदि पर सब का साथ सब के विकास को नहीं समझ सकते। तो यहां व्यवहारिक कर्म उत्पन हो के कहता है "जैसे को तैसा")
महाभारत: के अपने भाईचारे का युद्ध होने का प्रमुख कारण जर,जोरू,जमीन बना अब भी वही जर,जोरू,जमीन, ही क्या कारण नहीं बन सकता अगर आपसी भाई बंधु महाभारत कर सकते है तो ऐसे दूसरे धर्मो के साथ "धर्म युद्ध क्यों नहीं हो सकता विचारणीय विषय आप को नहीं लगता क्या?
इसी लिए भगवान भी कहते है उठ युद्ध कर। ज्ञान से अपना कर्म कर।

भगवद  गीता अध्याय: 3
श्लोक 9

श्लोक:
( यज्ञादि कर्मों की आवश्यकता का निरूपण ) यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबंधनः।
 तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसंगः समाचर॥

भावार्थ:
यज्ञ के निमित्त किए जाने वाले कर्मों से अतिरिक्त दूसरे कर्मों में लगा हुआ ही यह मुनष्य समुदाय कर्मों से बँधता है। इसलिए हे अर्जुन! तू आसक्ति से रहित होकर उस यज्ञ के निमित्त ही भलीभाँति कर्तव्य कर्म कर।

इस भाव के अर्थ के साथ भी बिना छेड़ छाड़ किए ऐसे भी समझ सकते है।

सरल भाषा में यह कहा जा सकता है:

"लोग धर्मयज्ञ के अलावा अन्य कामों में लगकर कर्मों से बंध जाते हैं। इसलिए, हे अर्जुन! तू धर्म यज्ञ के लिए ही अपने कर्तव्य कर्मों को कर, और इसमें आसक्ति नहीं रख।"

इसका भाव यह है:

लोग अपने कर्मों से बंध जाते हैं यदि वे धर्मयज्ञ के अलावा अन्य कामों में लगते हैं तो।
धर्म यज्ञ के लिए किए जाने वाले कर्म ही सही कर्म हैं।
इन कर्मों को आसक्ति  से नहीं, बल्कि कर्तव्य की भावना से करना चाहिए।
 ॥9॥
भगवद  गीता अध्याय: 3
श्लोक 10

श्लोक:
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्टा पुरोवाचप्रजापतिः।
 अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक्‌॥

भावार्थ:
प्रजापति ब्रह्मा ने कल्प के आदि में यज्ञ सहित प्रजाओं को रचकर उनसे कहा कि तुम लोग इस यज्ञ द्वारा वृद्धि को प्राप्त होओ और यह यज्ञ तुम लोगों को इच्छित भोग प्रदान करने वाला हो
 ॥10॥
भगवद  गीता अध्याय: 3
श्लोक 11

श्लोक:
देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः।
 परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ॥

भावार्थ:
तुम लोग इस यज्ञ द्वारा देवताओं को उन्नत करो और वे देवता तुम लोगों को उन्नत करें। इस प्रकार निःस्वार्थ भाव से एक-दूसरे को उन्नत करते हुए तुम लोग परम कल्याण को प्राप्त हो जाओगे
 ॥11॥
भगवद  गीता अध्याय: 3
श्लोक 11

श्लोक:
देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः।
 परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ॥

भावार्थ:
तुम लोग इस यज्ञ द्वारा देवताओं को उन्नत करो और वे देवता तुम लोगों को उन्नत करें। इस प्रकार निःस्वार्थ भाव से एक-दूसरे को उन्नत करते हुए तुम लोग परम कल्याण को प्राप्त हो जाओगे
 ॥11॥
इस बात को दशानंद बखूबी जानता था कि यदि तुम लोग इस यज्ञ द्वारा देवताओं को उन्नत करो गे तो देवताओं की शक्ति बड़े गी जो स्वर्ग में रह कर भी तुम्हारा अनिष्ट नहीं होने देगे।

इस लिए उसने यज्ञों को दूषित करने का कार्य किया ताकि आप द्वार किए यज्ञ द्वारा दी सामग्री उन तक ना पहुंचे रणनीति के अनुसार रसद पहुंचाने की लाइन ही काटनी शुरू करदी।

📚अन्य सनातनी पवित्र पुस्तकों में 

तासामत्रास्ति का हानिर्यया कुप्यन्ति देवताः।। पाराशर्योऽथ ममः यत्पृष्ठं श्रृणु वत्स तत् ।।8।।

उनकी इसमें क्या हानि है, जो वे देवता क्रोध करते हैं। यह सुनकर व्यासजी मुझसे बोले हे वत्स ! तू अपने प्रश्न का उत्तर सुन।।8।।

नित्याग्निहोत्रिनो विप्राः सन्ति ये गृहमेधिनः।। त एव सर्वफलदाः सुराणां कामधेनवः ॥य॥

जो ब्राह्मण नित्य अग्निहोत्र (यज्ञ आदि) करते और गृहस्थाश्रममें रहते हैं वही सब फलों के देनेहारे देवताओं के लिए कामधेनु  9॥ के समान है।।

भक्ष्यं भोज्यं च पेयं च यद्यदिष्टं पर्यवेक्षकम्।। अग्नौ हुतेन हविषा तत्सर्वं लभते दिवि॥ 10॥

भक्ष्य, भोज्य, पान करने योग्य, जो कुछ पर्वोंमें यज्ञ किया गया है, सो हविद्वारा अग्निमें आहुती दी गई है, वह सब स्वर्ग में मिलती है॥10॥

नान्यदस्ति सुरेशानामिष्टसिद्धिप्रदं दिधि ॥ दोग्धि धेनुर्यथा नीता दुःखदा गृहमेधिनाम् ॥11॥

देवताओंको स्वर्गमें इष्टसिद्धि देनेवाला और कुछ नहीं है जैसे गृहस्थी पुरुषों को दुही गई गाय को कोई ले जाए तो उससे उसे  केवल दुःखही होता है॥ 

तथैवं ज्ञानवान्विप्रो देवाना दुःखदो भवेत् ॥ विदशास्तेन विघ्नति प्रविस्ता विषयं नृणाम् ॥12॥

इसी प्रकार जो ज्ञानवान् ब्राह्मण(यज्ञ , होम और भोग भी नहीं देता)
 जगतको दुःखदाता ही है क्योंकि वह कर्म नहीं करता है इस कारण इसके विषय में भार्या पत्नी, पुत्रादि में प्रवेश करने के देवता भी विघ्न पैदा करते हैं।॥12॥
(और हम क्या सोचते है 😀?देवता का प्रवेश हो ही गया है। जिन्हें ने कभी अपने घर जो एक मंदिर ही है में कभी झाड़ू पूछा नहीं लगाया यहां वह सब कुछ करने को लाइन में खड़े नजर आएं गे दरियाँ बिछाएंगे और हमारे घर के बाहरी अन्य काम भी करें गे यह इसे वरदान समझ लेते है)

ततो न जायते भक्तिः शिवे कस्यापि देहिनः।। तस्मादविदुषां नैव जायते शूलपाणिनः ॥13॥ इससे किसी भी प्रकार की देहधारी शिव में भक्ति नहीं होती, इस कारण मुरखो को शिव का प्रसाद नहीं मिलता।॥ 13॥ 
कायौ कि ज्यादातर लोग काम में फंस जाते हैं।

यथाकथनचिज्जतापि मध्ये विच्छिद्यते नृणाम् ॥ जातं वापि शिवज्ञानं न विश्वासं भजत्यलम् ॥14॥ 
यथा कथा और जो यथा कथा जानता है वह किसी कारण मध्यमें ही खंडित हो जाता है और जिसे भी ज्ञान हुआ तो वह विश्वास नहीं कर पाता।।14।। 

यद्येवं देवता विघ्नमाचरन्ति तनुभृतम्।।
पौरुषं तत्र करस्यास्ति येन मुक्तिर्भविष्यति ॥15॥

ऋषि बोले जब इस प्रकार से देवता शरीरधारियों को विघ्न करते हैं तं फिर इसमें किसका पराक्रम है जो मुक्तिको प्राप्त हो सके॥ 15॥
अब आप ही सत्य कहिये कि, इनका उपाय है या नहीं है।।

इसका उपाय भी गीता जी में ही आगे चल कर मिलने वाला है।

तब तक इस पर भी विचार करले कि

यंत्र, मंत्र, तंत्र, सिद्धि , पाठ , धागा, ताबीज, जप, तप, रतन, नग धारण करने जैसे सभी कर्म जिनको मनुष्य अपने भले का साधन समझ कर करने लगता है। उसे कोई यज्ञ की उपाधि या उसका विकल्प कह नहीं सकते।

हम अपने शास्त्रों में नजर डाले जब जब कोई कठोर तप किसी ने किया तो इंद्र देव का सिंहासन डोलने लगता है तब उस व्यक्ति पर इंद्र द्वार वज्र प्रहार किए जाने लगते है।जो हमारे लिए शुभ संकेत नहीं कहे जाते। चलो इसको छोड़ आगे बढ़ते है।नहीं तो गीता जी का भाव ही बिगड़ जाए गा।

भगवद  गीता अध्याय: 3
श्लोक 12

श्लोक:
इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः।
 तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुंक्ते स्तेन एव सः॥

भावार्थ:
यज्ञ द्वारा बढ़ाए हुए देवता तुम लोगों को बिना माँगे ही इच्छित भोग निश्चय ही देते रहेंगे। इस प्रकार उन देवताओं द्वारा दिए हुए भोगों को जो पुरुष उनको बिना दिए स्वयं भोगता है, वह चोर ही है
 ॥12॥
(जो अपना ही कमाता ओर खुद ही खाता है उसको तो भगवान ने चोर बता दिया)
भगवद  गीता अध्याय: 3
श्लोक 13

श्लोक:
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः।
 भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्‌॥

भावार्थ:
यज्ञ से बचे हुए अन्न को खाने वाले श्रेष्ठ पुरुष सब पापों से मुक्त हो जाते हैं और जो पापी लोग अपना शरीर-पोषण करने के लिए ही अन्न पकाते हैं, वे तो पाप को ही खाते हैं
 ॥13॥
(आज कल एक स्लोगन वाट्सअप ब्यूनिवर्सिटी द्वार वायरल किया गया है "उतना लो थाली में जो ना जाए नाली में")
जो हमें हर घर के जीव की रोटियां भी गिन कर बनवाने लग गया है ऐसा हमारी बहु बेटियां अक्सर पूछती देखी गई है आप की कितनी रोटी बनाऊं 😀
अपना कमाना अपना खाना तो गली की गो , कुत्ते की भी नहीं सोचते कि उसने कुछ खाया या नहीं!अपना पकाओ अपना खाओ।

गीता में ही आगे चल कर दान का भी चेप्टर खुले गा जिस में कच्चा अन या पके अन के दान पर भी चर्चा हो सकती है अभी हम श्री कृष्ण के अगले आदेश को देखे।
भगवद  गीता अध्याय: 3
श्लोक 14-15

श्लोक:
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः।
 यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः॥
 कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्‌।
 तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्‌॥

भावार्थ:
सम्पूर्ण प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं, अन्न की उत्पत्ति वृष्टि से होती है, वृष्टि यज्ञ से होती है और यज्ञ विहित कर्मों से उत्पन्न होने वाला है। कर्मसमुदाय को तू वेद से उत्पन्न और वेद को अविनाशी परमात्मा से उत्पन्न हुआ जान। इससे सिद्ध होता है कि सर्वव्यापी परम अक्षर परमात्मा सदा ही यज्ञ में प्रतिष्ठित है
 ॥14-15॥
भगवद  गीता अध्याय: 3
श्लोक 16

श्लोक:
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः।
 अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति॥

भावार्थ:
हे पार्थ! जो पुरुष इस लोक में इस प्रकार परम्परा से प्रचलित सृष्टिचक्र के अनुकूल नहीं बरतता अर्थात अपने कर्तव्य का पालन नहीं करता, वह इन्द्रियों द्वारा भोगों में रमण करने वाला पापायु पुरुष व्यर्थ ही जीता है
 ॥16॥
भगवद  गीता अध्याय: 3
श्लोक 17

श्लोक:
( ज्ञानवान और भगवान के लिए भी लोकसंग्रहार्थ कर्मों की आवश्यकता ) यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः।
 आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते॥

भावार्थ:
परन्तु जो मनुष्य आत्मा में ही रमण करने वाला और आत्मा में ही तृप्त तथा आत्मा में ही सन्तुष्ट हो, उसके लिए कोई कर्तव्य नहीं है
 ॥17॥
यहां ध्यान दे आपको अपनी आत्मा के लिए नहीं कहा गया!

भगवद  गीता अध्याय: 3
श्लोक 18

श्लोक:
संजय उवाच: नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन।
 न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः॥

भावार्थ:
उस महापुरुष का इस विश्व में न तो कर्म करने से कोई प्रयोजन रहता है और न कर्मों के न करने से ही कोई प्रयोजन रहता है तथा सम्पूर्ण प्राणियों में भी इसका किञ्चिन्मात्र भी स्वार्थ का संबंध नहीं रहता
 ॥18॥
भगवद  गीता अध्याय: 3
श्लोक 19

श्लोक:
तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर।
 असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पुरुषः॥

भावार्थ:
इसलिए तू निरन्तर आसक्ति से रहित होकर सदा कर्तव्यकर्म को भलीभाँति करता रह क्योंकि आसक्ति से रहित होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परमात्मा को प्राप्त हो जाता है
 ॥19॥
(इस से भी सरल सुगम मार्ग भी गीता के आगे आनेवाले चेप्टर में मिल सके गा)
भगवद  गीता अध्याय: 3
श्लोक 20

श्लोक:
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः।
 लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि॥

भावार्थ:
जनकादि ज्ञानीजन भी आसक्ति रहित कर्मद्वारा ही परम सिद्धि को प्राप्त हुए थे, इसलिए तथा लोकसंग्रह को देखते हुए भी तू कर्म करने के ही योग्य है अर्थात तुझे कर्म करना ही उचित है
 ॥20॥
भगवद  गीता अध्याय: 3
श्लोक 21

श्लोक:
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
 स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥

भावार्थ:
श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, अन्य पुरुष भी वैसा-वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण कर देता है, समस्त मनुष्य-समुदाय उसी के अनुसार बरतने लग जाता है (यहाँ क्रिया में एकवचन है, परन्तु 'लोक' शब्द समुदायवाचक होने से भाषा में बहुवचन की क्रिया लिखी गई है।)
 ॥21॥

(भगवद गीता अध्याय 3, श्लोक 21 का सरल भाव यह है:

"जो व्यक्ति अपने कर्तव्य को जानता है और उसे करता है, वह दूसरों को भी प्रेरित करता है। इसलिए, हे अर्जुन! तू अपने कर्तव्य को जानकर उसे कर, ताकि दूसरे भी तेरा अनुसरण करें।"

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि:

अपने कर्तव्य को जानना और उसे करना महत्वपूर्ण है।
 दूसरों को प्रेरित करने के लिए अपना उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए।
 अपने कर्तव्य को करने से दूसरे भी प्रेरित होते हैं और सही मार्ग पर चलते हैं।

भगवद  गीता अध्याय: 3
श्लोक 22

श्लोक:
न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन।
 नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि॥

भावार्थ:
हे अर्जुन! मुझे इन तीनों लोकों में न तो कुछ कर्तव्य है और न कोई भी प्राप्त करने योग्य वस्तु अप्राप्त है, तो भी मैं कर्म में ही बरतता हूँ
 ॥22॥

भगवद  गीता अध्याय: 3
श्लोक 23

श्लोक:
यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः।
 मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥

भावार्थ:
क्योंकि हे पार्थ! यदि कदाचित्‌ मैं सावधान होकर कर्मों में न बरतूँ तो बड़ी हानि हो जाए क्योंकि मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं
 ॥23॥

भगवद  गीता अध्याय: 3
श्लोक 24

श्लोक:
यदि उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्‌।
 संकरस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः॥

भावार्थ:
इसलिए यदि मैं कर्म न करूँ तो ये सब मनुष्य नष्ट-भ्रष्ट हो जाएँ और मैं संकरता का करने वाला होऊँ तथा इस समस्त प्रजा को नष्ट करने वाला बनूँ
 ॥24॥
*जब पत्ता भी नहीं हिलता बिना प्रभु की मर्जी के तो बन्दा गुनहगार क्यों?*
समझ में आने लगा हमारे ही कर्मों का योगदान है।

भगवद  गीता अध्याय: 3
श्लोक 25

श्लोक:
( अज्ञानी और ज्ञानवान के लक्षण तथा राग-द्वेष से रहित होकर कर्म करने के लिए प्रेरणा ) सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत।
 कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम्‌॥

भावार्थ:
हे भारत! कर्म में आसक्त हुए अज्ञानीजन जिस प्रकार कर्म करते हैं, आसक्तिरहित विद्वान भी लोकसंग्रह करना चाहता हुआ उसी प्रकार कर्म करे
 ॥25॥

भगवद  गीता अध्याय: 3
श्लोक 26

श्लोक:
न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङि्गनाम्‌।
 जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन्‌॥

भावार्थ:
परमात्मा के स्वरूप में अटल स्थित हुए ज्ञानी पुरुष को चाहिए कि वह शास्त्रविहित कर्मों में आसक्ति वाले अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम अर्थात कर्मों में अश्रद्धा उत्पन्न न करे, किन्तु स्वयं शास्त्रविहित समस्त कर्म भलीभाँति करता हुआ उनसे भी वैसे ही करवाए
 ॥26॥

भगवद  गीता अध्याय: 3
श्लोक 27

श्लोक:
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।
 अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥

भावार्थ:
- वास्तव में सम्पूर्ण कर्म सब प्रकार से प्रकृति के गुणों द्वारा किए जाते हैं, तो भी जिसका अन्तःकरण अहंकार से मोहित हो रहा है, ऐसा अज्ञानी 'मैं कर्ता हूँ' ऐसा मानता है
 ॥27॥

भगवद  गीता अध्याय: 3
श्लोक 28

श्लोक:
तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः।
 गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते॥

भावार्थ:
परन्तु हे महाबाहो! गुण विभाग और कर्म विभाग (त्रिगुणात्मक माया के कार्यरूप पाँच महाभूत और मन, बुद्धि, अहंकार तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ और शब्दादि पाँच विषय- इन सबके समुदाय का नाम 'गुण विभाग' है और इनकी परस्पर की चेष्टाओं का नाम 'कर्म विभाग' है।) के तत्व (उपर्युक्त 'गुण विभाग' और 'कर्म विभाग' से आत्मा को पृथक अर्थात्‌ निर्लेप जानना ही इनका तत्व जानना है।) को जानने वाला ज्ञान योगी सम्पूर्ण गुण ही गुणों में बरत रहे हैं, ऐसा समझकर उनमें आसक्त नहीं होता।
 ॥28॥
भगवद  गीता अध्याय: 3
श्लोक 29

श्लोक:
प्रकृतेर्गुणसम्मूढ़ाः सज्जन्ते गुणकर्मसु।
 तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत्‌॥

भावार्थ:
प्रकृति के गुणों से अत्यन्त मोहित हुए मनुष्य गुणों में और कर्मों में आसक्त रहते हैं, उन पूर्णतया न समझने वाले मन्दबुद्धि अज्ञानियों को पूर्णतया जानने वाला ज्ञानी विचलित न करे 
 ॥29॥

उनके अनुकूल ही कार्य करे। तभी तो यह गुरु समुदाय शिष्यों को राम राम जपते रहो कह अपने चेले के पति किए जाने कर्म से खुद को मुक्त कर लेते है।
अर्थात पिंड छुड़ा लेते है।पर चेला एबीसी एबीसी ही रटता रहता है उस से आगे बढ़ ही नहीं पाता राम राम जपो यह तो हम बचपन से ही जानते आरहे हैं। हम में और गीता के अर्जुन में यही अंतर है गीता का अर्जुन सवाल पर सवाल करता है।अगर हम कोई प्रश्न करें तो टोक दिए जाते है।तो आगे कैसे बढ़े यह प्रश्न तो है ही। और रहेगा भी।
भगवद  गीता अध्याय: 3
श्लोक 30

श्लोक:
मयि सर्वाणि कर्माणि सन्नयस्याध्यात्मचेतसा।
 निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः॥

भावार्थ:
मुझ अन्तर्यामी परमात्मा में लगे हुए चित्त द्वारा सम्पूर्ण कर्मों को मुझमें अर्पण करके आशारहित, ममतारहित और सन्तापरहित होकर युद्ध कर
 ॥30॥
भगवद  गीता अध्याय: 3
श्लोक 31

श्लोक:
ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः।
 श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽति कर्मभिः॥

भावार्थ:
जो कोई मनुष्य दोषदृष्टि से रहित और श्रद्धायुक्त होकर मेरे इस मत का सदा अनुसरण करते हैं, वे भी सम्पूर्ण कर्मों से छूट जाते हैं
 ॥31॥

भगवद  गीता अध्याय: 3
श्लोक 32

श्लोक:
ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम्‌।
 सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः॥

भावार्थ:
परन्तु जो मनुष्य मुझमें दोषारोपण करते हुए मेरे इस मत के अनुसार नहीं चलते हैं, उन मूर्खों को तू सम्पूर्ण ज्ञानों में मोहित और नष्ट हुए ही समझ
 ॥32॥
(यह भगवान की धमकी ही मान कर अभी से गीता पड़ो उसे समझते हुए आगे बढ़ो गीता के चिंतन में आप हर बार कुछ नया ही संदेश पाएंगे जब तक आप का ज्ञान स्थिर एक जगह रुक नहीं जाता क्यो कि जीवन के उतार चढ़ाव में गीता नित्य गीता के भावों में परिवर्तन आकर अगले ज्ञान के दर्शन करवाए गी यह मेरा निजी अनुभव है इस लिए गीता पड़ो आगे बढ़ो
भगवान भी वही बता रहे है)

भगवद  गीता अध्याय: 3
श्लोक 33

श्लोक:
सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि।
 प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति॥

भावार्थ:
सभी प्राणी प्रकृति को प्राप्त होते हैं अर्थात अपने स्वभाव के परवश हुए कर्म करते हैं। ज्ञानवान्‌ भी अपनी प्रकृति के अनुसार चेष्टा करता है। फिर इसमें किसी का हठ क्या करेगा
 ॥33॥

भगवद  गीता अध्याय: 3
श्लोक 34

श्लोक:
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ।
 तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ॥

भावार्थ:
इन्द्रिय-इन्द्रिय के अर्थ में अर्थात प्रत्येक इन्द्रिय के विषय में राग और द्वेष छिपे हुए स्थित हैं। मनुष्य को उन दोनों के वश में नहीं होना चाहिए क्योंकि वे दोनों ही इसके कल्याण मार्ग में विघ्न करने वाले महान्‌ शत्रु हैं
 ॥34॥

भगवद  गीता अध्याय: 3
श्लोक 35

श्लोक:
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्‌।
 स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥

भावार्थ:
अच्छी प्रकार आचरण में लाए हुए दूसरे के धर्म से गुण रहित भी अपना धर्म अति उत्तम है। अपने धर्म में तो मरना भी कल्याणकारक है और दूसरे का धर्म भय को देने वाला है
 ॥35॥

❤️जिस धर्म में आपको भगवान ने जन्म दिया उसी में रहो उसी के बने रहे तभी ज्ञान की प्रगति हो गी अगर आप को अपने सनातन धर्म से कोई दूसरा धर्म अच्छा लगता है तो उस धर्म में जाकर स्थापित होने की जगह उसमें जन्म क्यों नहीं ले लेते वो इंसान ही क्या जो कठिन से कठिन काम ना कर सके!तुम में शक्ति है पहाड़ का सीना चीरने की हवा, अग्नि, पानी के वेग को बदलने की तो दूसरे मन पसंद धर्म में स्थापित क्यों होते हो सीधे वही जन्म क्यों नहीं ले लेते।जानने को अगले श्लोक पर चलते है❤️

भगवद  गीता अध्याय: 3
श्लोक 36

श्लोक:
( काम के निरोध का विषय ) अर्जुन उवाचः अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पुरुषः।
 अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः॥

भावार्थ:
अर्जुन बोले- हे कृष्ण! तो फिर यह मनुष्य स्वयं न चाहता हुआ भी बलात्‌ लगाए हुए की भाँति किससे प्रेरित होकर पाप का आचरण करता है
 ॥36॥
भगवद  गीता अध्याय: 3
श्लोक 37

श्लोक:
श्रीभगवानुवाच काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः।
 महाशनो महापाप्मा विद्धयेनमिह वैरिणम्‌॥

भावार्थ:
श्री भगवान बोले- रजोगुण से उत्पन्न हुआ यह काम ही क्रोध है। यह बहुत खाने वाला अर्थात भोगों से कभी न अघानेवाला और बड़ा पापी है। इसको ही तू इस विषय में वैरी जान
 ॥37॥
भगवद  गीता अध्याय: 3
श्लोक 38

श्लोक:
धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च।
 यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम्‌॥

भावार्थ:
जिस प्रकार धुएँ से अग्नि और मैल से दर्पण ढँका जाता है तथा जिस प्रकार जेर से गर्भ ढँका रहता है, वैसे ही उस काम द्वारा यह ज्ञान ढँका रहता है
 ॥38॥

भगवद  गीता अध्याय: 3
श्लोक 39

श्लोक:
आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा।
 कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च॥

भावार्थ:
और हे अर्जुन! इस अग्नि के समान कभी न पूर्ण होने वाले काम रूप ज्ञानियों के नित्य वैरी द्वारा मनुष्य का ज्ञान ढँका हुआ है
 ॥39॥
भगवद  गीता अध्याय: 3
श्लोक 40

श्लोक:
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते।
 एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम्‌॥

भावार्थ:
इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि- ये सब इसके वासस्थान कहे जाते हैं। यह काम इन मन, बुद्धि और इन्द्रियों द्वारा ही ज्ञान को आच्छादित करके जीवात्मा को मोहित करता है।
 ॥40॥
भगवद  गीता अध्याय: 3
श्लोक 41

श्लोक:
तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ।
 पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्‌॥

भावार्थ:
इसलिए हे अर्जुन! तू पहले इन्द्रियों को वश में करके इस ज्ञान और विज्ञान का नाश करने वाले महान पापी काम को अवश्य ही बलपूर्वक मार डाल
 ॥41॥

भगवद  गीता अध्याय: 3
श्लोक 42

श्लोक:
इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः।
 मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः॥

भावार्थ:
इन्द्रियों को स्थूल शरीर से पर यानी श्रेष्ठ, बलवान और सूक्ष्म कहते हैं। इन इन्द्रियों से पर मन है, मन से भी पर बुद्धि है और जो बुद्धि से भी अत्यन्त पर है वह आत्मा है
 ॥42॥

भगवद  गीता अध्याय: 3
श्लोक 43

श्लोक:
एवं बुद्धेः परं बुद्धवा संस्तभ्यात्मानमात्मना।
 जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्‌॥

भावार्थ:
इस प्रकार बुद्धि से पर अर्थात सूक्ष्म, बलवान और अत्यन्त श्रेष्ठ आत्मा को जानकर और बुद्धि द्वारा मन को वश में करके हे महाबाहो! तू इस कामरूप दुर्जय शत्रु को मार डाल
 ॥43॥ 
 ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मयोगो नाम तृतीयोऽध्यायः
 ॥3॥
तीसरा कर्म योग का अध्याय समाप्त
जाए श्री कृष्णा जय श्री राम

शनिवार, 9 नवंबर 2024

गीता और मै (गीता को जैसा मैने देखा या समझा)

*❖════❃≛⃝❈⬤🪷
प्रथम अध्याय परिचय,संवाद,व्याख्या
⬤≛⃝❈❃════❖*
यह श्लोक भगवद गीता के भीष्म पर्व से लिया गया है, जिसमें अर्जुन को अपनी सेना के सेनापतियों के बारे में बताया जा रहा है।
संजय के माध्यम से धृतराष्ट्र को बताया गया है, जो युद्ध की परिस्थिति और कौरव पक्ष की शक्ति को रेखांकित करता है। इससे यह भी समझ आता है कि कौरव पक्ष में कैसे कई अद्वितीय योद्धा थे, जो विभिन्न कारणों से उनके पक्ष में लड़ रहे थे।

अस्माकं तु विशिष्टा ये तन्निबोध द्विजोत्तम |
नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तानब्रवीमि ते || 7 ||

हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! मेरी सेना में जो विशिष्ट वीर हैं, उन्हें आप भी जानें | मेरी सेना के जो-जो सेनापति हैं, उन्हें आपको बताता हूं |

(हे ब्राह्मणश्रेष्ठ, मेरी सेना में जो विशिष्ट वीर हैं, उन्हें मैं बताता हूँ।" - दुर्योधन, द्रोणाचार्य को अपनी सेना की शक्ति और प्रमुख योद्धाओं का परिचय देकर उन्हें प्रभावित करना चाहता है। यह उसके आत्मविश्वास और रणनीतिक दृष्टिकोण को दर्शाता है।)

भवन्भीष्मश्च कर्णश्च कृपाश्च समितिञ्जयः |
अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तस्तथैव च || 8 ||

आप, द्रोणाचार्य और पितामह भीष्म, कर्ण, कृपाचार्य, विजयी अश्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्त के पुत्र भूरिश्रवा |

🔴 श्लोक 8 अध्याय 1 के  द्रोणाचार्य

द्रोणाचार्य ऋषि भारद्वाज तथा घृतार्ची नामक अप्सरा के पुत्र तथा थे।कुरू प्रदेश में पांडु के पुत्रों तथा धृतराष्ट्र पुत्रों के वे गुरु थे। महाभारत युद्ध के समय वह कौरव पक्ष के सेनापति थे। गुरु द्रोणाचार्य के अन्य शिष्यों में एकलव्य का नाम उल्लेखनीय है। उसने द्रोणाचार्य द्वारा गुरु दक्षिणा माँगे जाने पर अपने दाएं हाथ का अंगूठा काट कर दे दिया। एकलव्य निषाद राज का पुत्र था और एक राजकुमार भी। कौरवों और पांडवों ने द्रोणाचार्य के आश्रम मे ही अस्त्रों और शस्त्रों की शिक्षा पाई थी। अर्जुन द्रोणाचार्य के प्रिय शिष्य थे। वे अर्जुन को विश्व का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनाना चाहते थे।आज अर्जुन के यही गुरु अर्जुन के विरोध में रण भूमि में नजर आ रहे है (गुरु शिष्य की परम्परा का गुरु द्वारा शिष्य के शोषण को तो दर्शाता ही है) 
परशुराम के शिष्य बन कर द्रोण अस्त्र-शस्त्रादि सहित समस्त विद्याओं के अभूतपूर्व ज्ञाता हो गये।
गुरु द्रोणाचार्य कई विद्याओं के ज्ञाता थे: 
 वेद-वेदागों में पारंगत थे 
 वे एक महान धनुर्धारी थे 
 उन्हें दिव्यास्त्रों का ज्ञान परशुराम से मिला था 
 उन्हें शस्त्रों के आह्वान और प्रत्याहार का मंत्र भी परशुराम ने ही दिया था 
 उनके पास ब्रह्मास्त्र, ब्रह्मशिरा, नारायणास्त्र, रुद्र, आग्नेय, वज्र जैसे कई अस्त्र थे शास्त्रआह्वान और प्रत्याहार का मंत्र के भी जाता होन के साथ साथ वे उनमें प्रवीण भी थे।

द्रोणाचार्य  दोनों पक्षों के गुरु होते हुए भी कौरवों के पक्ष में लड़ने का निर्णय क्यों लिया?

समझें (प्राण जाए पर वचन नहीं जाए) के आधार पर,महाभारत के युद्ध में कई योद्धा ऐसे थे जो पांडवों की विजय चाहते थे लेकिन उन्होंने अपनी विवशता के कारण कौरवों पक्ष में युद्ध लड़ा । इनमें कुछ योद्धा थे : -

भीष्म पितामह - भीष्म पितामह कौरव और पांडव दोनों के पितामह थे। हस्तिनापुर सिंहासन की सदैव रक्षा का वचन उन्होंने दिया था । उस वचन को निभाने के लिए उन्होंने कौरवों के पक्ष में युद्ध लड़ा ।

द्रोणाचार्य - द्रोणाचार्य कौरव और पांडव दोनों के गुरु थे । साथ ही वह हस्तिनापुर के राजगुरु भी थे । हस्तिनापुर के प्रति राजधर्म का पालन करने के लिए उन्होंने कौरवों के पक्ष में युद्ध लड़ा।
❤️ इसी श्लोक के पितामह भीष्म,
भीष्म पितामह
भूमिका: कौरवों की ओर से युद्ध में भाग लेने वाले भीष्म पितामह नैतिकता और आदर्शों का प्रतीक हैं, फिर भी वे कौरवों का पक्ष लेते हैं। वो भी एक प्रतिज्ञा के कारण आज तो हम भी प्रतिज्ञा लेते ओर तोड़ते रहते है भीष्म तोड़ते नहीं इस लिए “भीष्म प्रतिज्ञा” नाम पढ़ जाता है ।
मुख्य संदेश: भीष्म का जीवन कर्तव्य और नैतिकता के बीच संघर्ष को दर्शाता है। वे धर्म और अधर्म के बीच फँसते हैं, जिससे समझ आता है कि सही कर्तव्य का चुनाव आसान नहीं होता।क्यों कि उनकी प्रतिज्ञा ही सामने आ खड़ी होती है।

❤️इसी श्लोक के कृपाचार्य - कृपाचार्य हस्तिनापुर के कुल गुरु थे । उन्हें भी राजधर्म निभाने के लिए हस्तिनापुर के पक्ष में युद्ध करना पड़ा।
कृपाचार्य महाभारत युद्ध में कौरवों की ओर से लड़े थे। महाभारत युद्ध के कृपाचार्य, गुरु द्रोणाचार्य और भीष्म पितामह की जोड़ी थी। युद्ध में द्रोणाचार्य, कृपाचार्य और अश्वत्थामा तीनों  ही भयंकर योद्धा थे।
कृपाचार्य महर्षि गौतम शरद्वान्‌ के पुत्र। शरद्वान की तपस्या भंग करने के लिए इंद्र ने जानपदी नामक एक देवकन्या भेजी थी, जिसके गर्भ से दो यमज भाई-बहन हुए। पिता-माता दोनों ने इन्हें जंगल में छोड़ दिया जहाँ महाराज शांतनु ने इनको देखा। इनपर कृपा करके दोनों को पाला पोसा जिससे इनके नाम कृप तथा कृपी पड़ गए।
कृप भी धनुर्विद्या में अपने पिता के समान ही पारंगत हुये। भीष्म जी ने इन्हीं कृप को पाण्डवों और कौरवों की शिक्षा-दीक्षा के लिये नियुक्त किया और वे कृपाचार्य के नाम से विख्यात हुये।

❤️शल्य - शल्य पांडु की दूसरी पत्नी माद्री के भाई थे अर्थात नकुल और सहदेव के मामा थे । दुर्योधन ने महाभारत युद्ध में धोखे से शल्य को अपने पक्ष में कर लिया था। और अपनी सहायता का वचन ले लिया था।
*❖════❃≛⃝❈⬤🪷
जिस से हमें शिक्षा मिलती है कि कभी किसी को बंधन में बंधने वाला कोई वचन ही ना दे।काल परिस्थिति कभी भी बदल सकती है।
विवाह संस्कार है
उसमें दिए गए वचन धारण कर के अपनाना धर्म कहा जाता है।
⬤≛⃝❈❃════❖*

द्रोणाचार्य के बारे में कुछ और बातें:
वे कौरव और पांडवों दोनो ही पक्षों के गुरु थे।
 वे हस्तिनापुर के राजगुरु भी थे 
 उनका विवाह कृपाचार्य की बहन कृपि से हुआ था 
 उनके पुत्र का नाम अश्वत्थामा था 
 अर्जुन उनके प्रिय शिष्य थे !
 एकलव्य भी उनके शिष्य थे ।।
 

🔴अन्ये च बहवः शूरा मद्रते त्यक्तजीविताः |
नानाशास्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविषारदाः || 9 ||

और भी मेरे लिए जीवन की आशा त्याग देने वाले बहुत से शूरवीर हैं, जो विभिन्न शस्त्रों के जानकार और सभी युद्धों में चतुर हैं |

यह श्लोक भगवद गीता के अध्याय 1, श्लोक 7-9 में है।

वचनों में ही बंध कर उन बाहु बालियों को महा भारत युद्ध में कौरव पक्ष में युद्ध करना पड़ा जब कि वह सभी पांडवों की जीत ही चाहते थे।
इसे ऐसे भी समझा जा सकता है

शल्य राजा पाण्डू की छोटी रानी माद्री का भाई था, यानि कि नकुल और सहदेव का मामा था। शल्य कुशल युोद्धा और महा रथी था। महाभारत युद्ध में पाण्डवों के पक्ष में युद्ध करने की इच्छा से वह भी मद्र देश की राजधानी से कुरुक्षेत्र की ओर अपनी सेना सहित चल पडा था।

मार्ग में वह जहां जहां शल्य अपनी सैना समेत रुका, उस का भव्य स्त्कार किया गया जिस से वह बहुत प्रसन्न हुआ। उस ने समझा कि उस का सत्कार उस के भांजों ने किया है। उस ने अपने स्त्कारक को धन्यवाद देने की इच्छा से मिलने के लिये और वर देने के लिये आमन्त्रित किया। लेकिन वह यह देख कर हैरान रह गया कि सत्कार का पूरा आयोजन दुर्योद्धन ने किया था। दुर्योद्धन पहले से ही चुपचाप शल्य की सैना के साथ ही चल रहा था।

शल्य ने आभार प्रगट करते हुये दुर्योद्धन को वर मांगने के लिये कहा तो दुर्योद्धन ने आग्रह किया कि वह युद्ध में उस के पक्ष की ओर से लडें। दुर्योद्धन की इस कूटनीति के कारण शल्य कौरवों की ओर से लडे थे।

शल्य ऐक कुश्ल रथ चालक थे। जब कर्ण और अर्जुन का युद्ध हुआ तो कर्ण ने दुर्योद्धन से कहा कि इन्द्र से प्राप्त शक्ति घटोद्कच्च के वध में प्रयोग होने के कारण नष्ट हो चुकी है और उस के कवच और कुण्डल भी इन्द्र ने दान में ले लिये हैं। अब कम से कम उसे कृष्ण जैसा ऐक रथचालक ही दे दिया जाये - और उस ने शल्य को रथ चालक के तौर पर मांग लिया था।

युद्ध में शल्य ने हर समय कर्ण का मनोबल गिराने का प्रयत्न किया। जब अर्जुन प्रहार करता था तो शल्य उस की तारीफों के पुल बांधता था और जब कर्ण बाण चलाता था तो शल्य उस में आलोचना कर के कर्ण का मनोबल गिरा देता था। श्राप के कारण जब कर्ण का रथ गढे में फंस गया तो शल्य ने उस का पहिया निकालने में भी कर्ण की कोई सहायता नहीं करी थी और वह काम कर्ण को को खुद ही लडते लडते करना पडा था जिस के करते उस का वध किया गया था।

कर्ण की मृत्यु के बाद स्त्रहवें दिन मध्यान्ध तक शल्य कौरव सैना का सैनापति बना था क्यों कि अब कोई विकल्प ही नहीं बचा था और उसी दिन शल्य मारा गया था।

युद्ध में मनोबल का कितना महत्व है यह पाठ कर्ण अर्जुन युद्ध में शल्य की भूमिका से प्राप्त होता है।

✍️अब अत्यंत संक्षिप्त लेख
संजय अपने दिव्य दृष्टि द्वार धृतराष्ट्र को बताते है।
भीष्म पितामह: वे कौरव और पांडव दोनों के पितामह हैं और अपने प्रतिज्ञा के कारण कौरवों का पक्ष ले रहे हैं। भीष्म की भूमिका में नैतिकता और प्रतिज्ञा का विशेष महत्त्व है, जो उन्हें एक आदर्श योद्धा बनाती है।

द्रोणाचार्य: वे कौरव और पांडव दोनों के गुरु और हस्तिनापुर के राजगुरु हैं। राजधर्म का पालन करते हुए, वे कौरवों का पक्ष लेते हैं। उनकी महानता उनकी तपस्या और युद्ध कौशल में है, जो उन्होंने परशुराम से सीखा था।

कृपाचार्य: हस्तिनापुर के कुलगुरु कृपाचार्य, जो महर्षि गौतम के वंशज हैं, भी राजधर्म निभाते हुए कौरवों के पक्ष में युद्ध में भाग लेते हैं।

कर्ण: जन्म से सूर्यपुत्र कर्ण कौरव पक्ष के प्रति निष्ठावान हैं, जिन्हें अपनी योग्यता और युद्ध कौशल के बावजूद सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ा। उनकी भूमिका में मित्रता और वीरता का प्रदर्शन करने की क्षमता रखने वाल भी कौरव पक्ष में है।

शल्य: नकुल-सहदेव के मामा शल्य को दुर्योधन ने कूटनीति से अपने पक्ष में सम्मिलित किया। युद्ध के दौरान, वे कर्ण के रथ-सारथी बने, लेकिन उनकी भूमिका में पांडव पक्ष की ओर झुकाव स्पष्ट है।

जैसे श्लोक 7 में, 
हर पात्र से जो शिक्षा मिलती है, उसे संक्षेप में इस तरह समझ सकते है:

भीष्म: द्वारा वचन और धर्म की रक्षा के लिए किसी भी परिस्थिति का सामना करना।

द्रोणाचार्य:द्वारा अपने संकल्प और धर्म का पालन करना।

कृपाचार्य और शल्य:का अपने दायित्वों का पालन और संधियों के प्रति निष्ठा हैं।
शल्य की भूमिका: शल्य के चरित्र से यह स्पष्ट होता है कि मानसिक समर्थन और मनोबल की भूमिका युद्ध में कितनी महत्वपूर्ण होती है।

द्रोणाचार्य और अन्य योद्धाओं की विस्तृत जानकारी है ताकि उनको भी जान सके कि महायोद्धाओं को किन कारणों से श्री कृष्ण महाभारत में अर्जुन के हाथों पराजय दिलवा देते है
✍️🌹प्रस्तावित संशोधित विश्लेषण युक्त संस्करण

श्लोक 7-9 में दुर्योधन द्वारा अपनी सेना का परिचय देते संजय द्वारा धृतराष्ट्र से कहा।

अर्जुन की सेना को देखकर, दुर्योधन अपनी सेना के प्रमुख योद्धाओं का परिचय देते हैं और द्रोणाचार्य से कहते हैं:

श्लोक 7:
"हे ब्राह्मणश्रेष्ठ, मेरी सेना के जो प्रमुख योद्धा हैं, उन्हें आप भी जानें।"
दुर्योधन यह संकेत दे रहे हैं कि कौरव पक्ष में भी अत्यंत शक्तिशाली योद्धा हैं, जिनके नेतृत्व में उनकी सेना दृढ़ और सक्षम है।

श्लोक 8-9:
दुर्योधन भीष्म, कर्ण, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, विकर्ण और अन्य वीर योद्धाओं का नाम लेते हुए अपनी सेना की शक्ति का बखान करते हैं। ये सभी योद्धा, भिन्न-भिन्न कारणों से कौरवों के पक्ष में हैं, फिर भी उनका युद्ध कौशल अति उत्कृष्ट है।

संक्षिप्त परिचय और शिक्षा:
भीष्म पितामह: वचनबद्धता के प्रतीक। भीष्म कौरवों के प्रति अपनी प्रतिज्ञा के कारण धर्मसंकट में रहते हैं, परंतु वे अपनी प्रतिज्ञा का पालन करते हैं।
द्रोणाचार्य: राजगुरु और आचार्य के रूप में राजधर्म निभा रहे हैं। वे श्रेष्ठ धनुर्धर अर्जुन के गुरु हैं, किंतु आज परिस्थितिवश कौरवों का पक्ष ले रहे हैं।
कृपाचार्य: महर्षि गौतम के वंशज कृपाचार्य भी हस्तिनापुर के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए युद्ध में भाग लेते हैं।
शल्य: नकुल-सहदेव के मामा शल्य ने दुर्योधन के कूटनीतिक राजनीति युक्ति में फँसकर कौरवों के पक्ष से युद्ध का निर्णय लिया, परंतु युद्ध में उनका मानसिक झुकाव पांडवों की ओर ही था।

कर्ण: मित्रता और स्वाभिमान के प्रतीक कर्ण, अपने स्वाभिमान और दुर्योधन के साथ मित्रता निभाते हुए कौरवों के लिए लड़े।

मुख्य संदेश: इन श्लोकों से यह शिक्षा मिलती है कि प्रत्येक योद्धा का एक कर्तव्य और धर्म है, जिसे निभाने के लिए वह बंधन में हैं। चाहे भीष्म की प्रतिज्ञा हो, द्रोणाचार्य का राजधर्म, या शल्य का दिया हुआ वचन—इनमें से प्रत्येक अपनी प्रतिज्ञाओं का पालन करते हुए भी, अपनी व्यक्तिगत भावनाओं और मूल्यों के साथ खुद ही संघर्ष कर रहे हैं।
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✍️गीता आरम्भ
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समस्त पात्रों के परिचय के बाद अब गीता का आरंभ हो जाता है।
भगवद  गीता अध्याय: 1
श्लोक 2

श्लोक:
संजय उवाच

दृष्टवा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा।
 आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत्‌॥

भावार्थ:
संजय बोले- उस समय जब उनकी दिव्य दृषि चेतन प्रकाश से प्रकाशित होती है तब राजा दुर्योधन ने व्यूहरचनायुक्त पाण्डवों की सेना को देखा और द्रोणाचार्य के पास जाकर यह वचन कहा।
 ॥2॥
भगवद  गीता अध्याय: 1
श्लोक 3

श्लोक:
पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम्‌।
 व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता॥

भावार्थ:
हे आचार्य!(गुरु जी) आपके बुद्धिमान्‌ (क्यों कि यही तो गुरु शिष्य परम्परा है जिसमें गुरु ही चेले को बुद्धिमान ,ज्ञानवान बनाने का कार्य निष्ठा पूर्वक करता है उन चेलों द्वारा)
 शिष्य द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न द्वारा व्यूहाकार खड़ी की हुई पाण्डुपुत्रों की इस बड़ी भारी सेना को देखिए
 ॥3॥
(इसकी जानकारी राज युधिष्ठिर तक संजय द्वारा बताया जा रहा है)

भगवद  गीता अध्याय: 1
श्लोक 4-6

श्लोक:
अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि।
 युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः॥
 धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान्‌।
 पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङवः॥
 युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान्‌।
 सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः॥

भावार्थ:
इस सेना में बड़े-बड़े धनुषों वाले तथा युद्ध में भीम और अर्जुन के समान शूरवीर सात्यकि और विराट तथा महारथी राजा द्रुपद, धृष्टकेतु और चेकितान तथा बलवान काशिराज, पुरुजित, कुन्तिभोज और मनुष्यों में श्रेष्ठ शैब्य, पराक्रमी युधामन्यु तथा बलवान उत्तमौजा, सुभद्रापुत्र अभिमन्यु एवं द्रौपदी के पाँचों पुत्र- ये सभी महारथी हैं।
 ॥4-6॥
भगवद  गीता अध्याय: 1
श्लोक 7

श्लोक:
अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम।
 नायका मम सैन्यस्य सञ्ज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते॥

भावार्थ:
हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! अपने पक्ष में भी जो प्रधान हैं, उनको आप समझ लीजिए। आपकी जानकारी के लिए मेरी सेना के जो-जो सेनापति हैं, उनको बतलाता हूँ
 ॥7॥

(यहां द्रोणा चार्य को श्रेष्ठ ब्राह्मण के संज्ञा दी है)
ब्राह्मण वह सभी जीव निर्जीव चीजें आ जाती है जो पूजा में प्रयोग हों या समलित किए गए हों उसमें चावल, चंदन, फल, फूल,जल जैसी सारी सामग्री भी जिन के बिना पूजा ही सम्पन्न ना हो सके ब्राह्मण तुल्य ही है)

भगवद  गीता अध्याय: 1
श्लोक 8

श्लोक:
भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जयः।
 अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च॥

भावार्थ:
आप-द्रोणाचार्य और पितामह भीष्म तथा कर्ण और संग्रामविजयी कृपाचार्य तथा वैसे ही अश्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्त का पुत्र भूरिश्रवा
 ॥8॥
भगवद  गीता अध्याय: 1
श्लोक 9

श्लोक:
अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः।
 नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः॥

भावार्थ:
और भी मेरे लिए जीवन की आशा त्याग देने वाले(वचन से बंधे ये)   बहुत-से शूरवीर अनेक प्रकार के शस्त्रास्त्रों से सुसज्जित और सब-के-सब युद्ध में चतुर हैं
 ॥9॥

भगवद  गीता अध्याय: 1
श्लोक 10

श्लोक:
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्‌।
 पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम्‌॥

भावार्थ:
भीष्म पितामह द्वारा रक्षित हमारी वह सेना सब प्रकार से अजेय है और भीम (सेना हमार सेना आसानी से जीत लेगी ऐसी आशा को बल देती है) द्वारा रक्षित इन लोगों की यह सेना जीतने में सुगम है
 ॥10॥
भगवद  गीता अध्याय: 1
श्लोक 11

श्लोक:
अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः।
 भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि॥

भावार्थ:
इसलिए सब मोर्चों पर अपनी-अपनी जगह स्थित रहते हुए आप लोग सभी निःसंदेह भीष्म पितामह की ही सब ओर से रक्षा करें
 ॥11॥

भगवद  गीता अध्याय: 1
श्लोक 12

श्लोक:

(दोनों सेनाओं की शंख-ध्वनि का कथन) 
 
तस्य सञ्जनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः।
 सिंहनादं विनद्योच्चैः शंख दध्मो प्रतापवान्‌॥

भावार्थ:
कौरवों में वृद्ध बड़े प्रतापी पितामह भीष्म ने उस दुर्योधन के हृदय में हर्ष उत्पन्न करते हुए उच्च स्वर से सिंह की दहाड़ के समान गरजकर शंख बजाया
 ॥12॥
इस शंख नाद के बाद रण भूमि में।
भगवद  गीता अध्याय: 1
श्लोक 13

श्लोक:
ततः शंखाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः।
 सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत्‌॥

भावार्थ:
इसके पश्चात शंख और नगाड़े तथा ढोल, मृदंग और नरसिंघे आदि बाजे एक साथ ही बज उठे। उनका वह शब्द बड़ा भयंकर हुआ
 ॥13॥
(रण भूमि हो या अपनी रक्षा खुशहाली के युद्ध रूपी प्रति दिन मंदिरों की जाने वाली ॐ जय जगदीश हरे आरती में समानता है। जीवन प्रति दिन का महाभारत ही नहीं तो ओर क्या है!जिसे मित्र शत्रु सभी एक समान रूप में लड़ रहे नजर आते है भगवान भी खुद इसमें शामिल होते है ऐसा भी प्रतीत होता है)

भगवद  गीता अध्याय: 1
श्लोक 14

श्लोक:
ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ।
 माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शंखौ प्रदध्मतुः॥

भावार्थ:
इसके अनन्तर सफेद घोड़ों से युक्त उत्तम रथ में बैठे हुए श्रीकृष्ण महाराज और अर्जुन ने भी अलौकिक शंख बजाए
 ॥14॥

भगवद  गीता अध्याय: 1
श्लोक 15

श्लोक:
पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः।
 पौण्ड्रं दध्मौ महाशंख भीमकर्मा वृकोदरः॥

भावार्थ:
श्रीकृष्ण महाराज ने पाञ्चजन्य नामक, अर्जुन ने देवदत्त नामक और भयानक कर्मवाले भीमसेन ने पौण्ड्र नामक महाशंख बजाया
 ॥15॥

भगवद  गीता अध्याय: 1
श्लोक 16

श्लोक:
अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः।
 नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ॥

भावार्थ:
कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनन्तविजय नामक और नकुल तथा सहदेव ने सुघोष और मणिपुष्पक नामक शंख बजाए
 ॥16॥

भगवद  गीता अध्याय: 1
श्लोक 17-18

श्लोक:
काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः।
 धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः॥
 द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते।
 सौभद्रश्च महाबाहुः शंखान्दध्मुः पृथक्पृथक्‌॥

भावार्थ:
श्रेष्ठ धनुष वाले काशिराज और महारथी शिखण्डी एवं धृष्टद्युम्न तथा राजा विराट और अजेय सात्यकि, राजा द्रुपद एवं द्रौपदी के पाँचों पुत्र और बड़ी भुजावाले सुभद्रा पुत्र अभिमन्यु- इन सभी ने, हे राजन्‌! सब ओर से अलग-अलग शंख बजाए
 ॥17-18॥

भगवद  गीता अध्याय: 1
श्लोक 19

श्लोक:
स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत्‌।
 नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन्‌॥

भावार्थ:
और उस भयानक शब्द ने आकाश और पृथ्वी को भी गुंजाते हुए धार्तराष्ट्रों के अर्थात आपके पक्षवालों के हृदय विदीर्ण कर दिए
 ॥19॥
(भाव विदीर्ण की परिभाषाएं और अर्थ हिन्दी में
टूटा हुआ । भग्न । मार डाला हुआ से है। शंख नाद पर पहला जवाबी प्रहार होता है)

भगवद  गीता अध्याय: 1
श्लोक 20-21

श्लोक:

(अर्जुन द्वारा सेना-निरीक्षण का प्रसंग भी रोचक रोमांच कारी है शंख नाद के जवाबी प्रहार के बाद का दृश्य)
 
अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्‌ कपिध्वजः।
 प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः॥ 
 हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते। 
 
 अर्जुन उवाचः 
 सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत॥

भावार्थ:
हे राजन्‌! इसके बाद कपिध्वज अर्जुन ने मोर्चा बाँधकर डटे हुए धृतराष्ट्र-संबंधियों को देखकर, उस शस्त्र चलने की तैयारी के समय धनुष उठाकर हृषीकेश श्रीकृष्ण महाराज से यह वचन कहा- हे अच्युत! मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा की जिए।
 ॥20-21॥
(अर्जुन का आग्रह सुन भगवान ने वही किया क्यों कि अर्जुन के रथ के वह सारथी जो है)
भगवद  गीता अध्याय: 1
श्लोक 22

श्लोक:
यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान्‌।
 कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे॥

भावार्थ:
और जब तक कि मैं युद्ध क्षेत्र में डटे हुए युद्ध के अभिलाषी इन विपक्षी योद्धाओं को भली प्रकार देख न लूँ कि इस युद्ध रूप व्यापार में मुझे किन-किन के साथ युद्ध करना योग्य है, तब तक उसे खड़ा रखिए
 ॥22॥

भगवद  गीता अध्याय: 1
श्लोक 23

श्लोक:
योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः।
 धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः॥

भावार्थ:
दुर्बुद्धि दुर्योधन का युद्ध में हित चाहने वाले जो-जो ये राजा लोग इस सेना में आए हैं, इन युद्ध करने वालों को मैं देखूँगा
 ॥23॥
भाव (में भी तो देखूं दुर्योधन के पक्ष में मेरे साथ युद्ध करने वाले यह कौन से लोग हैं)

भगवद  गीता अध्याय: 1
श्लोक 24-25

श्लोक:
संजय उवाचः
 एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत।
 सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम्‌॥
 भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम्‌।
 उवाच पार्थ पश्यैतान्‌ समवेतान्‌ कुरूनिति॥

भावार्थ:
संजय बोले- हे धृतराष्ट्र! अर्जुन द्वारा कहे अनुसार महाराज श्रीकृष्णचंद्र ने दोनों सेनाओं के बीच में भीष्म और द्रोणाचार्य के सामने तथा सम्पूर्ण राजाओं के सामने उत्तम रथ को खड़ा कर इस प्रकार कहा कि हे पार्थ! युद्ध के लिए जुटे हुए इन कौरवों को देख।
 ॥24-25॥
भगवद  गीता अध्याय: 1
श्लोक 26-27 पूर्वार्ध

श्लोक:
तत्रापश्यत्स्थितान्‌ पार्थः पितृनथ पितामहान्‌।
 आचार्यान्मातुलान्भ्रातृन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा॥
 श्वशुरान्‌ सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि।

भावार्थ:
इसके बाद पृथापुत्र अर्जुन ने उन दोनों ही सेनाओं में स्थित (अपने ही) ताऊ-चाचों को, दादों-परदादों को, गुरुओं को, मामाओं को, भाइयों को, पुत्रों को, पौत्रों को तथा मित्रों को, ससुरों को और सुहृदों( मित्र, सखा।)को भी देखा
 ॥26 और 27वें का पूर्वार्ध॥

भगवद  गीता अध्याय: 1
श्लोक 27 उत्तरार्ध 28 पूर्वार्ध

श्लोक:
तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्‌ बन्धूनवस्थितान्‌॥
 कृपया परयाविष्टो विषीदत्रिदमब्रवीत्‌।

भावार्थ:
उन उपस्थित सम्पूर्ण बंधुओं बांधो सखा मित्रो को देखकर वे कुंतीपुत्र अर्जुन अत्यन्त करुणा से युक्त होकर शोक करते हुए यह वचन बोले। 
 ❤️॥27वें का उत्तरार्ध और 28वें का पूर्वार्ध॥❤️

भगवद  गीता अध्याय: 1
श्लोक 28 उत्तरार्ध और 29

श्लोक:
(मोह से व्याप्त हुए अर्जुन के कायरता, स्नेह और शोकयुक्त वचन ) 
 अर्जुन उवाच
 दृष्टेवमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्‌॥
 सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति। 
 वेपथुश्च शरीरे में रोमहर्षश्च जायते॥

भावार्थ:
अर्जुन बोले- हे कृष्ण! युद्ध क्षेत्र में डटे हुए युद्ध के अभिलाषी इस स्वजनसमुदाय को देखकर मेरे अंग शिथिल हुए जा रहे हैं और मुख सूखा जा रहा है तथा मेरे शरीर में कम्प एवं रोमांच हो रहा है।
 ❤️॥28वें का उत्तरार्ध और 29॥❤️

भगवद  गीता अध्याय: 1
श्लोक 30

श्लोक:
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्वक्चैव परिदह्यते।
 न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः॥

भावार्थ:
हाथ से गांडीव धनुष गिर रहा है और त्वचा भी बहुत जल रही है तथा मेरा मन भ्रमित-सा हो रहा है, इसलिए मैं खड़ा रहने को भी समर्थ नहीं हूँ।
 ॥30॥
(पारिवारिक सामाजिक मोह पाश में जकड़ा अर्जुन घबराई हुई हालत में नजर आ रहे हैं और अपने ही ज्ञान से भयभीत हो जाते है)

जिस का प्रमुख कारण
ही माया रूपी वॉट्सएप यूनिवर्सिटी से प्राप्त ज्ञान है




भगवद  गीता अध्याय: 1
श्लोक 31

श्लोक:
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव।
 न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे॥

भावार्थ:
हे केशव! मैं लक्षणों को भी विपरीत ही देख रहा हूँ तथा युद्ध में स्वजन-समुदाय को मारकर कल्याण भी नहीं देखता
 ॥31॥
भगवद  गीता अध्याय: 1
श्लोक 32

श्लोक:
न काङ्‍क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च।
 किं नो राज्येन गोविंद किं भोगैर्जीवितेन वा॥

भावार्थ:
हे कृष्ण! मैं न तो विजय चाहता हूँ और न राज्य तथा सुखों को ही। हे गोविंद! हमें ऐसे राज्य से क्या प्रयोजन है अथवा ऐसे भोगों से और जीवन से भी क्या लाभ है?
 ॥32॥
(अर्जुन अपनी मनोदशा श्री कृष्ण को बताते है)
भगवद  गीता अध्याय: 1
श्लोक 33

श्लोक:
येषामर्थे काङक्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च।
 त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च॥

भावार्थ:
हमें जिनके लिए राज्य, भोग और सुखादि अभीष्ट हैं, वे ही ये सब धन और जीवन की आशा को त्यागकर युद्ध में खड़े हैं
 ॥33॥
भगवद  गीता अध्याय: 1
श्लोक 34

श्लोक:
आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः।
 मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः संबंधिनस्तथा॥

भावार्थ:
गुरुजन, ताऊ-चाचे, लड़के और उसी प्रकार दादे, मामे, ससुर, पौत्र, साले तथा और भी संबंधी लोग हैं 
 ॥34॥
(आज के भाईचारे को दर्शाता प्रसंग प्रतीत होता है)
भगवद  गीता अध्याय: 1
श्लोक 35

श्लोक:
एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन।
 अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते॥

भावार्थ:
हे मधुसूदन! मुझे मारने पर भी अथवा तीनों लोकों के राज्य के लिए भी मैं इन सबको मारना नहीं चाहता, फिर पृथ्वी के लिए तो कहना ही क्या है?
 ॥35॥
भगवद  गीता अध्याय: 1
श्लोक 36

श्लोक:
निहत्य धार्तराष्ट्रान्न का प्रीतिः स्याज्जनार्दन।
 पापमेवाश्रयेदस्मान्‌ हत्वैतानाततायिनः॥

भावार्थ:
हे जनार्दन! धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें क्या प्रसन्नता होगी? इन आततायियों को मारकर तो हमें पाप ही लगेगा
 ॥36॥
भगवद  गीता अध्याय: 1
श्लोक 37

श्लोक:
तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान्‌।
 स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव॥

भावार्थ:
अतएव हे माधव! अपने ही बान्धव धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारने के लिए हम योग्य नहीं हैं क्योंकि अपने ही कुटुम्ब को मारकर हम कैसे सुखी होंगे?
 ॥37॥
(जब कि दूसरे भाईचारे वालों के विचार इन से मिलते ही नहीं है अगर दोनों पक्षों के भाई चारे में थोड़ी सी भी समानता होती तो महाभारत होता ही नहीं)
भगवद  गीता अध्याय: 1
श्लोक 38-39

श्लोक:
यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः।
 कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम्‌॥
 कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम्‌।
 कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन॥

भावार्थ:
यद्यपि लोभ से भ्रष्टचित्त हुए ये लोग कुल के नाश से उत्पन्न दोष को और मित्रों से विरोध करने में पाप को नहीं देखते, तो भी हे जनार्दन! कुल के नाश से उत्पन्न दोष को जानने वाले हम लोगों को इस पाप से हटने के लिए क्यों नहीं विचार करना चाहिए?
 ॥38-39॥
(मेरे को तो 2024 की भारत की ही स्थिति दिखने लग गई है भाई चारे की चलो फिर से रण भूमि कुरुक्षेत्र में लौट चलते है)

भगवद  गीता अध्याय: 1
श्लोक 40

श्लोक:
कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः।
 धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत॥

भावार्थ:
कुल के नाश से सनातन कुल-धर्म नष्ट हो जाते हैं तथा धर्म का नाश हो जाने पर सम्पूर्ण कुल में पाप भी बहुत फैल जाता है
 ॥40॥

भगवद  गीता अध्याय: 1
श्लोक 41

श्लोक:
अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः।
 स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः॥

भावार्थ:
हे कृष्ण! पाप के अधिक बढ़ जाने से कुल की स्त्रियाँ अत्यन्त दूषित हो जाती हैं और हे वार्ष्णेय! स्त्रियों के दूषित हो जाने पर वर्णसंकर उत्पन्न होता है
 ॥41॥
भाव
(वर्ण संकर?का भाव जाति दो अलग-अलग जातियों के पुरुष और महिला के मिलने से पैदा होती है, उसे वर्णसंकर कहते हैं. वर्णसंकर शब्द का इस्तेमाल धर्मशास्त्र में भी किया गया है. इसमें कई जातियों और जनजातियों के वर्ण व्यवस्था में मिश्रण शामिल है. वर्णसंकर शब्द का उल्लेख बौधायन शूत्र में भी मिलता है. 
 
वर्णसंकर के कुछ उदाहरण:
खच्चर, जो घोड़े और गधे से पैदा होता है
सर्पों की कई प्रजातियां वर्णसंकर हैं
नीलगाय, जो घोड़े और हिरन से पैदा होती है 
 
वर्णसंकर से जुड़ी कुछ और बातें:
जब किसी व्यक्ति के माता-पिता अलग-अलग जाति के हों या धर्म के हों, तो उनकी संतान को वर्णसंकर कहा जाता है. 
 
वर्णसंकर के गुण माता-पिता से ज़्यादा होते हैं. 
 
श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक संख्या 1.41 में वर्णसंकर शब्द का इस्तेमाल भी इसी रूप में किया गया है अब समझने वाले अच्छा समझे या बुरा यह हरि इच्छा )

‎‌‎Ş₳ŦเŞ𝓱👸🏻◣🍁💜⃝🇱♥︎𝐕𝐄4♥️𝐘𝐎 गीता और मैं◣
गीता को सुनने की अभी मेरे द्वारा कोई व्यवस्था नहीं की गई है।




सोमवार, 10 जून 2024

मंगल सिंह ढीलों

*मंगल सिंह ढिल्लों*

*🎂जन्म18 जून 1958*

*⚰️11 जून 2023*
 
*मंगल सिंह ढिल्लों की शादी कलाकार रीता ढिल्लों से हुई थी, जिनसे उन्होंने 1994 में शादी की थी।इस जोड़े के एक बेटा और एक बेटी है।*

*ढिल्लों का 11 जून 2023 को लुधियाना , पंजाब में कैंसर से लंबी लड़ाई के बाद निधन हो गया। वह 64 वर्ष के थे।*

*मंगल ढिल्लों का जन्म भारतीय राज्य पंजाब के फरीदकोट जिले के वांडर जटाना गाँव में एक सिख परिवार में हुआ था । उन्होंने पंज ग्रामीण कलां सरकारी स्कूल में चौथी कक्षा तक पढ़ाई की। इसके बाद वे अपने पिता के खेत के पास उत्तर प्रदेश चले गए। उन्होंने लखीमपुर खीरी जिले के निघासन में जिला परिषद हाई स्कूल से स्नातक किया । इसके बाद वे पंजाब लौट आए जहां उन्होंने कोटकपूरा से अपनी उच्च माध्यमिक शिक्षा पूरी की । उन्होंने मुक्तसर गवर्नमेंट कॉलेज से स्नातक किया।*

*ढिल्लों ने दिल्ली में रंगमंच में काम किया और 1979 में पंजाब विश्वविद्यालय , चंडीगढ़ में भारतीय रंगमंच विभाग में शामिल हुए और 1980 में अभिनय में स्नातकोत्तर डिप्लोमा पाठ्यक्रम पूरा किया।*

*टेलीविजन*

कथा सागर 1986 
बुनियाद लुभया राम 1986 
जूनून सुमेर राजवंश 1993 
किस्मत 
द ग्रेट मराठा दत्ताजी सिंधिया 1994-1995 
तेंदुआ तेंदुआ 1996-1998 
घुटन 
साहिल 
मौलाना आजाद मौलाना आजाद 
मुजरिम हाज़िर 
रिश्ता 
लहू के फूल डकैती 
परम वीर चक्र कर्नल होशियार सिंह 1988 
अपने पराये 
" युग (टीवी श्रृंखला) " राजा 1996-1998 
नूरजहाँ (टीवी श्रृंखला) बादशाह अकबर 2000

*विशेष फिल्मे*

खून भारी मांग वकील 1988 
ज़ख़्मी औरत मेहता 
दयावान छोटे अन्ना 
कहां है कानून पीटर 1989 
अपना देश पराये लोग एडवोकेट शर्मा 
भ्रष्टाचार मंगल 
नाका बंदी पुलिस इंस्पेक्टर सत्यप्रकाश 1990 
आज़ाद देश के गुलाम मंगल 
अंबा ठाकुर शमशेर सिंह 
न्याय अन्य इंस्पेक्टर खान 
प्यार का देवता मुरली एम राय 1991 
रणभूमि चंदन अनुचर 
अकायला वकील 
स्वर्ग यहां नरक यहां इंस्पेक्टर असलम 
लक्ष्मणरेखा जब्बार खान 
विश्वात्मा मदन भारद्वाज 1992 
जिंदगी एक जुआ मंगल जगजीत सिंह जे जे सहायक 
युगंधर गोरा ठाकुर 1993 
साहिबान पुलिस इंस्पेक्टर/दरोगा 
दिल तेरा आशिक मिस्टर जेम्स 
दलाल जग्गा सेठ 
निशाना पुलिस अधिकारी 1995 
यश विक्रम राय 1996 
नागमणि जीवित रहने की दर 
पाकिस्तान को ट्रेन पंजाब पुलिस ए.एस.आई 1998 
जानशीन जयचन्द 2003 
तूफान सिंह लखिया 2017

*✍️एक भारतीय अभिनेता, लेखक, निर्देशक और फिल्म निर्माता थे। उनका जन्म पंजाब के फरीदकोट जिले के कोटकपुरा के पास वांडर जटाना में हुआ था ।*

टेलीविज़न धारावाहिक जूनून में उनकी भूमिका के लिए , उन्होंने 1998 में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के लिए RAPA (रेडियो एंड टेलीविज़न एडवरटाइजिंग प्रैक्टिशनर्स एसोसिएशन) का पुरस्कार जीता।
उन्हें फिल्म खालसा के लिए पंजाब सरकार द्वारा बाबा फरीद पुरस्कार से सम्मानित किया गया था
2006 में मुख्यमंत्री पंजाब की ओर से एक उत्कृष्ट उपलब्धि पुरस्कार के साथ-साथ पूरे पंजाब और विदेशों में संगठनों से कई अन्य मान्यताएँ।
उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के लिए मोहन राकेश स्वर्ण पदक से सम्मानित किया गया।

मीरा पाकिस्तानी

जन्म
इरतिज़ा रुबाब
*12 मई 1977*
शेखुपुरा, पंजाब, पाकिस्तान
आवास
लाहोर, पंजाब, पाकिस्तान
जातीयता
पंजाबी
नागरिकता
पाकिस्तान
व्यवसाय
अभिनेत्री
कार्यकाल
वर्तमान
पुरस्कार
पाकिस्तान मीडिया पुरस्कार
निगार पुरस्कार पाकिस्तार सरकार द्वारा बहतरीन काम का पुरस्कार

मीरा ने अपनी पहली फिल्म भारत में की, जिसका नाम नज़र था, जो उन्हें बेगम पारा की तरह भारत में दिखाई देने वाली पहली पाकिस्तानी अभिनेत्री थी, साथ ही यह भारत पाकिस्तान शांति वार्ता की शुरुआत थी। नज़र सोनी राजदान द्वारा निर्देशित एक फिल्म थी और यह 50 वर्षों में पहला इंडो-पाकिस्तानी संयुक्त फिल्म उद्यम था। उनकी दूसरी फिल्म लसा अली अभिनीत कसाक [19] थी। हालांकि कसाक समीक्षकों और व्यावसायिक रूप से विफल रहे, लेकिन मीरा अभी भी बॉलीवुड में काम कर रही हैं। उनकी तीसरी फिल्म पाँचे घन्टे में प्यांच करोड़ बॉक्स ऑफिस पर औसत कमाई करने वाली फिल्म थी। फिल्म को प्रेस और आलोचकों के लिए प्रदर्शित नहीं किया गया था क्योंकि निर्देशक फैसल सैफ फिल्म को सीधे दर्शकों को दिखाना चाहते थे। इस फिल्म ने अपने सीमित सिनेमा रिलीज़ के साथ 50% की शानदार शुरुआत की। हालांकि, द टाइम्स ऑफ इंडिया ने 2012 की बॉलीवुड की शीर्ष 10 बोल्ड फिल्म्स श्रेणी में फिल्म को सूचीबद्ध किया।

2015 में, उन्होंने एक और भारतीय फिल्म बम्पर ड्रॉ में एक आइटम गीत का प्रदर्शन किया।

मीरा का एक सेक्स टेप 2014 में इंटरनेट पर जारी किया गया था। वीडियो में मीरा को अपने पति कैप्टन नावेद के साथ सेक्स करते हुए दिखाया गया था।पाकिस्तान की एक सत्र अदालत ने अभिनेत्री मीरा और उनके पति के खिलाफ सेक्स टेप के लिए मामला चलाने का आदेश दिया।

रविवार, 9 जून 2024

अमृता विर्क

*अमृता विर्क*
*अमरता वारिक*
*जन्म*
*🎂11 जून 1975*
*व्यवसाय*
*गायन*
विर्क का जन्म 11 जून 1975 को हुआ था। उन्होंने बहुत कम उम्र में ही स्कूल के कार्यक्रमों में गाना शुरू कर दिया था। उन्होंने 1997 में पेशेवर गायन शुरू किया जब उद्योग में पुरुष गायकों का वर्चस्व था। जुलाई 1998 में, उन्होंने अपना पहला एल्बम, कल्ली बेह के रो लैनी आन रिलीज़ किया , जिसने उन्हें संगीत उद्योग में एक मान्यता प्राप्त गायिका बना दिया।

*उसने अब तक 56 एल्बम जारी किए हैं। उनके कुछ एल्बम हैं:*

कल्ली बेह के रो लनी आन (जुलाई 1998)
सादा पाई गिया विछोरा (जनवरी 1999)
मस्ती भारिया अखाड़ा (मार्च 1999)
यारी टूटी टन (मई 1999)
दिल टूटता लगदा (मई 1999)
मस्ती भारिया दूजा अखाड़ा (जून 1999)
डोली हुने ही तुरी आ (अगस्त 1999)
तैनु प्यार नी करदी मैं (अक्टूबर 1999)
हाए तौबा (फ़रवरी 2000)
प्यार हो गया (अप्रैल 2000)
टूट के शारिक बन गया (नवंबर 2000)
तू मैनु भुल जावेंगा (फरवरी 2001)
स्टेगी धमाका (जून 2001)
तेरी याद सतौंदी ऐ (सितंबर 2001)
पै ना जान पूरे (नवंबर 2002)
पानी दियां छल्लन (फरवरी 2004)
टिमटिमाउंडे तारे (मार्च 2004)
दिल दी वही (दिसंबर 2004)
तोहर अमृता दी (दिसंबर 2007)
टेरियन निशानिया (फरवरी 2009)

जन्म   11 जून 1975 (उम्र 47) ( 1975-06-11 )
एल्बम   टिम तिमुंडे तारे, मस्ती भरे अखाड़ा
इसी तरह के लोग   देबी मखसूसपुरी, jasvindr , बलकार सिद्धू, दिलशाद अख्तर, जस्सी सिद्धू

डीजे अमृता विर्क आधिकारिक वीडियो 2013 आनंद संगीत

मंगलवार, 16 अप्रैल 2024

जी एस नेपाली

प्रसिद्ध गीतकार जी एस नेपाली उर्फ गोपाल सिंह नेपाली के जन्मदिन पर हार्दिक श्रधांजलि
🎂जन्म 11 अगस्त 1911 ई॰ को बिहार के पश्चिमी चंपारण के बेयियास में हुआ था।

⚰️17 अप्रैल 1963 ई॰ को इनका निधन बिहार के भागलपुर रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म संख्या पांच पर हो गया था।

कलम की स्वाधीनता के लिए आजीवन संघर्षरत रहे 'गीतों के राजकुमार' गोपाल सिंह नेपाली लहरों की धारा के विपरीत चलकर हिन्दी साहित्य, पत्रकारिता और फिल्म उद्योग में ऊंचा स्थान हासिल करने वाले छायावादोत्तर काल के विशिष्ट कवि और गीतकार थे।

बिहार के पश्चिम चम्पारण जिले के बेतिया में 11 अगस्त 1911 को जन्मे गोपाल सिंह नेपाली की काव्य प्रतिभा बचपन में ही दिखाई देने लगी थी। एक बार एक दुकानदार ने बच्चा समझकर उन्हें पुराना कार्बन दे दिया जिस पर उन्होंने वह कार्बन लौटाते हुए दुकानदार से कहा- 'इसके लिए माफ कीजिएगा गोपाल पर, सड़ियल दिया है आपने कार्बन निकालकर'। उनकी इस कविता को सुनकर दुकानदार काफी शर्मिंदा हुआ और उसने उन्हें नया कार्बन निकालकर दे दिया।

साहित्य की लगभग सभी विधाओं में पारंगत नेपाली की पहली कविता 'भारत गगन के जगमग सितारे' 1930 में रामवृक्ष बेनीपुरी द्वारा संपादित बाल पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। पत्रकार के रूप में उन्होंने कम से कम 4 हिन्दी पत्रिकाओं- रतलाम टाइम्स, चित्रपट, सुधा और योगी का संपादन किया।

युवावस्था में नेपालीजी के गीतों की लोकप्रियता से प्रभावित होकर उन्हें आदर के साथ कवि सम्मेलनों में बुलाया जाने लगा। उस दौरान एक कवि सम्मेलन में राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' उनके एक गीत को सुनकर गद्गनद् हो गए। वह गीत था-

सुनहरी सुबह नेपाल की, ढलती शाम बंगाल की
कर दे फीका रंग चुनरी का, दोपहरी नैनीताल की
क्या दरस-परस की बात यहां, जहां पत्थर में भगवान है
यह मेरा हिन्दुस्तान है, यह मेरा हिन्दुस्तान है...

नेपालीजी के गीतों की उस दौर में धूम मची हुई थी लेकिन उनकी माली हालत खराब थी। वे चाहते तो नेपाल में उनके लिए सम्मानजनक व्यवस्था हो सकती थी, क्योंकि उनकी पत्नी नेपाल के राजपुरोहित के परिवार से ताल्लुक रखती थीं लेकिन उन्होंने बेतिया में ही रहने का निश्चय किया।

वर्ष 1944 में मुंबई में उनकी मुलाकात फिल्मीस्तान के मालिक सेठ तुलाराम जालान से हुई जिन्होंने नेपाली को 200 रुपए प्रतिमाह पर गीतकार के रूप में 4 साल के लिए अनुबंधित कर लिया। फिल्मीस्तान के बैनर तले बनी ऐतिहासिक फिल्म 'मजदूर' के लिए नेपाली ने सर्वप्रथम गीत लिखे।

फिल्मों में बतौर गीतकार नेपालीजी 1944 से 1962 तक गीत लेखन करते रहे। इस दौरान उन्होंने 60 से अधिक फिल्मों के लिए लगभग 400 से अधिक गीत लिखे। दिलचस्प बात यह है कि इनमें से अधिकतर गीतों की धुनें भी खुद उन्होंने बनाईं। नेपालीजी ने हिमालय फिल्म्स और नेपाली पिक्चर्स फिल्म कंपनी की स्थापना कर नजराना (1949), सनसनी (1951) और खुशबू (1955) जैसी कुछ फिल्मों का निर्माण भी किया।

नेपालीजी को जीते-जी वह सम्मान नहीं मिल सका जिसके वे हकदार थे। अपनी इस भावना को उन्होंने कविता में इस तरह उतारा था-

अफसोस नहीं हमको जीवन में कुछ कर न सके
झोलियां किसी की भर न सके, संताप किसी का हर न सके
अपने प्रति सच्चा रहने का जीवनभर हमने यत्न किया
देखा-देखी हम जी न सके, देखा-देखी हम मर न सके ।

17 अप्रैल 1963 को अपने जीवन के अंतिम कवि सम्मेलन से कविता पाठ करके लौ टते समय बिहार के भागलपुर रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर 2 पर गोपालसिंह नेपाली का अचानक निधन हो गया।

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...