गुरुवार, 25 जनवरी 2024

एस डी नारंग

#18jun
#25jan 
S.D. Narang 
 🎂18 जून 1918 
⚰️25 जनवरी 1986
को हुआ था।S.D. Narang एक निदेशक और निर्माता थे, जो Dilli Ka Thug (1958), Anmol Moti (1969) और Shehnai (1964) के लिए मशहूर थे।उनकी मृत्यु  को हुई थी।
प्रतिष्ठित और कल्पनाशील सिने-शिल्पकार डॉ. सत्य देव नारंग एक बहुआयामी व्यक्तित्व थे, जिन्होंने लाहौर, कोलकाता और मुंबई से संचालित होकर एक अग्रणी व्यक्ति, निर्माता, निर्देशक, लेखक, गीतकार और स्टूडियो मालिक के रूप में भारतीय सिनेमा में योगदान दिया। उनका जन्म 18 जून 1918 को लायलपुर (अब फैसलाबाद, पाकिस्तान) में हुआ था। उन्होंने गवर्नमेंट कॉलेज, लाहौर से जीव विज्ञान में स्नातक किया और किंग एडवर्ड मेडिकल कॉलेज, लाहौर से एमबीबीएस किया। इसके बाद, उन्होंने दृष्टि के दूरबीन सिद्धांत पर शोध किया और उन्हें पीएच.डी. से सम्मानित किया गया। डिग्री। इन अलंकृत योग्यताओं के साथ, वह चिकित्सा में एक उज्ज्वल करियर बना सकते थे और एक शानदार जीवन जी सकते थे। लेकिन नियति ने उसके लिए एक अलग रास्ता तय कर रखा था। टॉकीज़ के शुरुआती दौर में यह बेहद योग्य युवक सिनेमा की दुनिया में आया।
उन्होंने ग्लैमरस के विपरीत एक प्रमुख व्यक्ति के रूप में अपनी शुरुआत कीरमोलाभारत की पहली गोल्डन जुबली हिट फिल्म मेंखजांची (1941) द्वारा निर्मित Dalsukh M. Pancholi. मास्टर द्वारा रचित मधुर धुनों से युक्तगुलाम हैदर, एक प्रभावशाली कहानी और एसडी नारंग और की प्यारी अग्रणी जोड़ीरमोला, खजांची 'उपमहाद्वीप में कई रिकॉर्ड बनाए. फिर उन्हें अपोजिट कास्ट किया गया Raginiपंजाबी फिल्म में Patwari (1942) द्वारा निर्देशित B. S. Rajhans. उनकी अगली फिल्म रवि पार (1942) भी प्रदर्शित हुई Raginiउनकी नायिका के रूप में. उन दिनों उन्हें लाहौर का सबसे कम उम्र का सफल नायक बताया गया था।

की अभूतपूर्व सफलता के बादखजांची 'वह जैसी हिंदी फिल्मों में हीरो के तौर पर नजर आएजमींदार (1942), डरबन (1946), औरसहारा (1943) (साथ) रेणुका देवी), आदि। काफी प्रसिद्धि प्राप्त करने के बाद, उन्होंने ट्रैक बदलने का फैसला किया और फिल्म निर्माण में कदम रखा। जैसी फिल्मों का निर्माण और निर्देशन किया Yeh Hai Zindagi (1947) उनके अपने अपर इंडिया स्टूडियो, लाहौर में। भारत के विभाजन ने उनके सपनों को चकनाचूर कर दिया और उन्हें शरणार्थी बना दिया। भारत पहुंचकर उन्होंने कलकत्ता में अपना बंगाल नेशनल स्टूडियो स्थापित करने के लिए कड़ा संघर्ष किया। उन्होंने अपने स्टूडियो में चटगांव शस्त्रागार छापे पर भारत की पहली क्रांतिकारी फिल्म - चट्टोग्राम एस्ट्रागर लुनथन (बंगाली-1949) का निर्माण किया।

विशाल आदित्य सिंह

#25jan 
विशाल आदित्य सिंह

🎂25 जनवरी 1988
आरा , बिहार , भारत

पेशाअभिनेता
सक्रिय वर्ष 2010-वर्तमान
के लिए जाना जाता है
बेगूसराय
चंद्रकांता
नच बलिए 9
बिग बॉस 13
फियर फैक्टर: खतरों के खिलाड़ी 11
ऊंचाई06 फीट 3 इंच (191 सेमी)
सिंह ने स्कूल और राज्य टूर्नामेंटों में क्रिकेट खेलने में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया ।उन्होंने अपना करियर एक मॉडल के रूप में शुरू किया , और कुछ मॉडलिंग असाइनमेंट करने के बाद, वह अपने अभिनय करियर को आगे बढ़ाने के लिए मुंबई आ गए।
सिंह ने 2010 में सागर फिल्म्स प्रोडक्शन जय जय शिव शंकर , महुआ टीवी पर एक भोजपुरी धारावाहिक में मुख्य भूमिका वाले अवधेश ठाकुर के रूप में अपनी शुरुआत की । उनकी पहली हिंदी टीवी भूमिका 2011 में ऐतिहासिक नाटक चंद्रगुप्त मौर्य में थी जिसमें वह शशांक के रूप में दिखाई दिए। 2012 से 2013 तक, सिंह ने कलर्स टीवी पर रश्मि शर्मा की लोकप्रिय श्रृंखला ससुराल सिमर का में वीरू की भूमिका निभाई । 2014 में, उन्होंने धमाल टीवी पर कॉमेडी बच्चन पांडे की टोली में एक पुलिस वाले की भूमिका निभाई । 2015 में, उन्होंने एपिक टीवी पर मिनी सीरीज़ टाइम मशीन में देवेन्द्र सिंह राणा की भूमिका निभाई
सिंह की मुलाकात 2017 में चंद्रकांता के सेट पर अभिनेत्री मधुरिमा तुली से हुई और बाद में उन्होंने उन्हें डेट किया। एक साल की डेटिंग के बाद 2018 में उनका ब्रेकअप हो गया।
📺
2011 Chandragupta Maurya 
2012–2013 Sasural Simar Ka
15_2016 Begusarai
2016 Pyar Tune Kya Kiya
17_2018 Chandrakanta
2018 Kullfi Kumarr Bajewala
2019 Nach Baliye 9
2019–2020 Bigg Boss 13
2021 Fear Factor: Khatron Ke Khiladi 11
2022 Parashuram
2023–present Chand Jalne Laga

कविता कृष्णा मूर्ति

#25jan
कविता कृष्णमूर्ति सुब्रमणियम
प्रसिद्ध नाम कविता कृष्णमूर्ति
अन्य नाम शारदा कृष्णमूर्ति

🎂जन्म 25 जनवरी, 1958
जन्म भूमि दिल्ली, भारत

अभिभावक पिता- टी.एस. कृष्णमूर्ति
पति/पत्नी एल. सुब्रमण्यम
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र गायिकी
पुरस्कार-उपाधि 'पद्मश्री' (2005), फ़िल्मफेयर पुरस्कार (चार बार, सर्वश्रेष्ठ महिला पार्श्वगायिका)
प्रसिद्धि पार्श्वगायिका
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी साल 1980 में कविता कृष्णमूर्ति ने अपना पहला पार्श्व गीत 'काहे को ब्याही' (फ़िल्म 'मांग भरो सजना') गाया। यह गाना बाद में फ़िल्म से हटा दिया गया था।
कविता कृष्णमूर्ति का जन्म 25 जनवरी सन 1958 को नई दिल्ली में हुआ था। उनका का असल नाम 'शारदा' है। उनके पिता 'एजुकेशन एंड कल्चर अफेयर्स मिनिस्ट्री' में कर्मचारी थे। भारत की विविधता का ही कमाल है कि उत्तर भारत के सबसे बड़े शहर में एक तमिल अय्यर परिवार की लड़की ने सबसे पहले जो संगीत सीखा, वह था बंगाल का रबींद्र संगीत। कविता महज 9 साल की थीं, जब उन्होंने लता मंगेशकर के साथ गाना गाया। साल था 1967। तब लता मंगेशकर किवदंती बनने की राह पर काफी आगे निकल चुकी थीं। लता मंगेशकर और कविता कृष्णमूर्ति ने एक टैगोर गीत रिकॉर्ड किया था। इसमें संगीत था हेमंत कुमार का।

कविता कृष्णमूर्ति का बचपन लुटियंस दिल्ली की सरकारी कॉलोनी में बीता। वह बड़े होकर आईएफएस अधिकारी बनना चाहती थीं। लेकिन फिर संगीत में ऐसी लौ लगी कि बलरामपुरी से क्लासिकल सीखने लगीं और आधी पढ़ाई में ही मुम्बई शिफ्ट हो गईं। कविता कृष्णमूर्ति ने मुंबई के मशहूर सेंट जेवियर्स कॉलेज से इकॉनमिक्स में बीए किया। इस दौरान वह हेमंत कुमार की बेटी रानू मुखर्जी से मिलीं। एक बार फिर से संगीत की राह खुली। मन्ना डे ने उनसे रेडियो के लिए कई जिंगल्स गवाए। फिर मुलाकात हुई हेमा मालिनी की माता जया चक्रवर्थी से। उन्होंने कविता को लक्ष्मीकांत तक पहुंचाया। लक्ष्मीकांत ने कविता को अपने संरक्षण में ले लिया।
कविता कृष्णमूर्ति वायलिन वादक एल. सुब्रमण्यम की पत्नी हैं। एक साक्षात्कार में उन्होंने बताया था कि- "एक बार उन्हें गायक हरिहरन के साथ मिलकर सुब्रमण्यम के लिए गाना गाना था, तब उनका विवाह नहीं हुआ था। सुब्रमण्यम का बहुत नाम था और इसलिए कविता उनसे बहुत घबराई हुई थीं, लेकिन उन्होंने बहुत धैर्य के साथ गाना पूरा किया। इसके बाद साथ काम करने के दौरान दोनों करीब आए और विवाह बंधन में बंध गए।

पसंदीदा अभिनेता व अभिनेत्री

एक बार एक साक्षात्कार में कविता कृष्णमूर्ति ने बताया था कि- "बचपन में उनको अभिनेता दिलीप कुमार बहुत पसंद थे। वह जब बड़ी हो रही थीं, तब अभिनेताओं में संजीव कुमार को पसंद करती थीं। उन्हें अमिताभ बच्चन और आमिर ख़ान भी पसंद हैं। अभिनेत्रियों में श्रीदेवी, रानी मुखर्जी और काजोल पसंद हैं। शबाना आज़मी को वह बेहतरीन अभिनेत्री मानती हैं। कविता कृष्णमूर्ति ने शबाना आज़मी, श्रीदेवी, माधुरी दीक्षित, मनीषा कोइराला और ऐश्वर्या राय सरीखी शीर्ष अभिनेत्रियों के लिए गाने गाए हैं।"

🎧गीत
✍️कविता कृष्णमूर्ति ने पहला गाना कन्नड़ में गाया था। यदि किसी को ये लगता है कि वे सिर्फ 90 के दशक की टॉप गायिका रही हैं, तो यह गलत है। उनका आखिरी गाना 2011 में आई फ़िल्म 'रॉकस्टार' में सुना गया। 'तुमको जो पाया...' गाना कविता कृष्णमूर्ति की ही आवाज में है और साथ ही 2017 में फ़िल्म 'तुम्हारी सुलु' में उनका गाना 'हवा-हवाई...' लिया गया। अच्छी बात यह है कि इसमें उनकी आवाज को वैसा ही लिया गया है और उनकी आवाज में कोई बदलाव नहीं है। अपने इस लंबे सफर में कविता कृष्णमूर्ति ने कई गाने गाए हैं, जिनमें टॉप गानों पर निम्न गीत आते हैं-

क्रमांक गीत फ़िल्म वर्ष
1. निंबुड़ा-निंबुड़ा-निंबुड़ा हम दिल दे चुके सनम 1999
2. बोले चूड़ियां, बोले कंगना कभी खुशी कभी गम 2001
3. हवा-हवाई मिस्टर इंडिया 1987
4. नींद चुराई मेरी, किसने ओ सनम इश्क 1987
5. तू ही रे-तू ही रे बॉम्बे 1995
6. साजनजी घर आए, साजनजी घर आए कुछ-कुछ होता है 1998
7. ऐ वतन तेरे लिए कर्मा 1986
8. तू चीज बड़ी है मस्त-मस्त मोहरा 1994
9. आई लव माई इंडिया परदेस 1997
10. डोला रे डोला रे डोला रे देवदास 2002
11. हम पे ये किसने हरा रंग डाला देवदास 2002
12. आंखों की गुस्ताखियां माफ हों हम दिल दे चुके सनम 1999

पद्मा रानी

#25jan 
पद्मरानी

🎂जन्म25 जनवरी 1937
पुणे , महाराष्ट्र
मृत
⚰️25 जनवरी 2016 (आयु 79 वर्ष)
मुंबई , महाराष्ट्र

पेशा अभिनेत्री
जीवन साथी  नामदार ईरानी
बच्चे डेज़ी ईरानी (टेलीविजन व्यक्तित्व) (बेटी)
रिश्तेदार सरिता जोशी (बहन)
पद्मरानी , ​​जिसे पद्मा रानी भी कहा जाता है , (25 जनवरी 1937 - 25 जनवरी 2016) एक भारतीय अभिनेत्री थीं, जिन्होंने गुजराती नाटकों , गुजराती फिल्मों और हिंदी फिल्मों में अभिनय किया ।

पद्मरानी का जन्म 25 जनवरी 1937 को पुणे , महाराष्ट्र में एक महाराष्ट्रीयन परिवार में हुआ था। उनका पालन-पोषण गुजरात के वडोदरा में राजमहल रोड पर कनाबी वड, ऊंची पोल में हुआ था ।उनके पिता, भीमराव भोसले, एक बैरिस्टर थे, और उनकी माँ, कमलाबाई राणे, गोवा से थीं । वह छोटी थीं, जब उनके परिवार को आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा और उन्होंने और उनकी बहन, जो बाद में अनुभवी अभिनेत्री रहीं , सरिता जोशी के साथ मदद के लिए मंच पर प्रदर्शन करना शुरू किया।उन्होंने अपनी प्राथमिक शिक्षा वडोदरा के डांडिया बाजार स्थित गोविंदराव सेंट्रल स्कूल से पूरी की।

वडोदरा में रमनलाल मूर्तिवाला के एक नाटक में अभिनय करते समय वह अपनी बहन के साथ अरुणा ईरानी के पिता फरीदून ईरानी की नज़र में आईं। वह उन्हें मुंबई ले गया। अठारह साल की उम्र में, पद्मरानी ने अरुणा ईरानी के चाचा नामदार ईरानी से शादी की, जो एक जमींदार और पारसी परिवार के सदस्य और एक थिएटर निर्देशक थे।

पद्मरानी का उनके 79वें जन्मदिन, 25 जनवरी 2016 को मुंबई में वायरल संक्रमण के कारण फेफड़ों में जटिलताओं के कारण निधन हो गया।

बुधवार, 24 जनवरी 2024

पंडित भीमसेन गुरुराज जोशी

#04feb
#24jan 
पंडित भीमसेन गुरुराज जोशी
🎂जन्म 04 फ़रवरी, 1922
जन्म भूमि गडग, कर्नाटक
⚰️मृत्यु 24 जनवरी, 2011
मृत्यु स्थान पुणे, महाराष्ट्र
अभिभावक गुरुराज जोशी
संतान श्रीनिवास जोशी (पुत्र)
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र शास्त्रीय गायन
मुख्य रचनाएँ 'मिले सुर मेरा तुम्हारा'
विषय शास्त्रीय संगीत
पुरस्कार-उपाधि भारत रत्‍न, पद्म विभूषण, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, पद्म भूषण, पद्म श्री
प्रसिद्धि हिन्दुस्तानी शास्त्रीय गायक
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी पंडित जोशी किराना घराने के गायक हैं। उन्हें उनके ख़्याल शैली और भजन गायन के विशेष रूप से जाना जाता है।

उन्होंने 19 साल की उम्र से गायन शुरू किया था और वे सात दशकों तक शास्त्रीय गायन करते रहे। भीमसेन जोशी ने कर्नाटक को गौरवान्वित किया है। भारतीय संगीत के क्षेत्र में इससे पहले एम. एस. सुब्बुलक्ष्मी, उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ान, पंडित रविशंकर और लता मंगेशकर को 'भारत रत्न' से सम्मानित किया जा चुका है। उनकी योग्यता का आधार उनकी महान् संगीत साधना है। देश-विदेश में लोकप्रिय हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के महान् गायकों में उनकी गिनती होती थी। अपने एकल गायन से हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में नए युग का सूत्रपात करने वाले पंडित भीमसेन जोशी कला और संस्कृति की दुनिया के छठे व्यक्ति थे, जिन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्‍न' से सम्मानित किया गया था। 'किराना घराने' के भीमसेन गुरुराज जोशी ने गायकी के अपने विभिन्‍न तरीकों से एक अद्भुत गायन की रचना की। देश का सबसे बड़ा नागरिक सम्मान मिलने के बारे में जब उनके पुत्र श्रीनिवास जोशी ने उन्हें बताया था तो भीमसेन जोशी ने पुणे में कहा था कि-

"मैं उन सभी हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायकों की तरफ से इस सम्मान को स्वीकार करता हूं जिन्होंने अपनी ज़िंदगी संगीत को समर्पित कर दी।"
वर्ष 1941 में भीमसेन जोशी ने 19 वर्ष की उम्र में मंच पर अपनी पहली प्रस्तुति दी। उनका पहला एल्बम 20 वर्ष की आयु में निकला, जिसमें कन्नड़ और हिन्दी में कुछ धार्मिक गीत थे। इसके दो वर्ष बाद वह रेडियो कलाकार के तौर पर मुंबई में काम करने लगे। अपने गुरु की याद में उन्होंने वार्षिक 'सवाई गंधर्व संगीत समारोह' प्रारम्भ किया था। पुणे में यह समारोह हर वर्ष दिसंबर में होता है। भीमसेन के पुत्र भी शास्त्रीय गायक एवं संगीतकार हैं।

बुलंद आवाज़ तथा संवेदनशीलता
पंडित भीमसेन जोशी को बुलंद आवाज़, सांसों पर बेजोड़ नियंत्रण, संगीत के प्रति संवेदनशीलता, जुनून और समझ के लिए जाना जाता था। उन्होंने 'सुधा कल्याण', 'मियां की तोड़ी', 'भीमपलासी', 'दरबारी', 'मुल्तानी' और 'रामकली' जैसे अनगिनत राग छेड़ संगीत के हर मंच पर संगीत प्रमियों का दिल जीता। पंडित मोहनदेव ने कहा, "उनकी गायिकी पर केसरबाई केरकर, उस्ताद आमिर ख़ान, बेगम अख़्तर का गहरा प्रभाव था। वह अपनी गायिकी में सरगम और तिहाईयों का जमकर प्रयोग करते थे। उन्होंने हिन्दी, कन्नड़ और मराठी में ढेरों भजन गाए थे।
Pt. Bhimsen Joshi
भीमसेन जोशी को 1972 में 'पद्म श्री' से सम्मानित किया गया।
'भारत सरकार' द्वारा उन्हें कला के क्षेत्र में सन 1985 में 'पद्म भूषण' पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
पंडित जोशी को सन 1999 में 'पद्म विभूषण' प्रदान किया गया था।
4 नवम्बर, 2008 को देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्‍न' भी जोशी जी को मिला। कला और संस्कृति के क्षेत्र से संबंधित उनसे पहले सत्यजीत रे, कर्नाटक संगीत की कोकिला एम.एस.सुब्बालक्ष्मी, पंडित रविशंकर, लता मंगेशकर और उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ाँ को 'भारत रत्न' मिल चुका था। भीमसेन जोशी दूसरे शास्त्रीय गायक रहे, जिन्हें 'भारत रत्न' प्रदान किया गया था।
'संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार' से भी उन्हें सम्मानित किया जा चुका था।
अविस्मरणीय संगीत
पंडित भीमसेन जोशी को मिले सुर मेरा तुम्हारा के लिए याद किया जाता है, जिसमें उनके साथ बालमुरली कृष्णा और लता मंगेशकर ने जुगलबंदी की। 1985 से ही वे ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ के जरिये घर-घर में पहचाने जाने लगे थे। तब से लेकर आज भी इस गाने के बोल और धुन पंडित जी की पहचान बने हुए हैं।

फ़िल्मों के लिए गायन
पंडित भीमसेन जोशी ने कई फ़िल्मों के लिए भी गाने गाए। उन्होंने ‘तानसेन’, ‘सुर संगम’, ‘बसंत बहार’ और ‘अनकही’ जैसी कई फ़िल्मों के लिए गायिकी की। पंडित जी शराब पीने के शौकीन थे, लेकिन संगीत कैरियर पर इसका प्रभाव पड़ने पर 1979 में उन्होंने शराब का पूरी तरह से त्याग कर दिया।

भीमसेन जोशी बड़े सादे इंसान थे। उन्हें कार चलाने का शौक था। मर्सिडीज की कारें उनकी कमज़ोरी थीं। जवान थे तो तैराकी, योग और फ़ुटबॉल खेलने का शौक रखते थे। शराब पीना उनका शौक था, लेकिन कहते हैं कि कॅरियर पर असर होते देखकर उन्होंने पीना छोड़ दिया था। संगीतज्ञों के बीच एक कहावत है- "जब तक कला जवान होती है, तब तक कलाकार बूढ़ा हो चुका होता है।" जोशी जी भी तन से बूढ़े हुए और उनका निधन 24 जनवरी, 2011 को पुणे, महाराष्ट्र में हुआ। आज के संगीत जगत् में भीमसेन जोशी घर के एक बड़े बुजुर्ग की तरह थे। बुजुर्ग, जिनके रूप में एक पूरा का पूरा युग हमारे बीच मौजूद रहता है, जिनकी उपस्थिति ही शुभ का, सुरक्षा का अहसास देती है, बताती है कि हम अनाथ नहीं हुए हैं। जोशी जी के जाने के साथ ही समकालीन संगीत के सिर से एक बड़े-बुजुर्ग का हाथ उठ गया।

सुभाष घई

#24jan
सुभाष घई

🎂जन्म 24 जनवरी, 1945
जन्म भूमि नागपुर, महाराष्ट्र
पति/पत्नी मुक्ता घई
संतान दो पुत्री- मेघना घई, मुस्कान घई
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र हिंदी सिनेमा
मुख्य फ़िल्में 'कालीचरण', 'विश्वनाथ', 'कर्ज़', 'विधाता', 'कर्मा', 'हीरो', 'सौदागर', 'राम-लखन', 'ताल', 'खलनायक', 'परदेश' और 'ऐतराज़' आदि।
विद्यालय फ़िल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया, पुणे
प्रसिद्धि फ़िल्म निर्माता-निर्देशक
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी बॉलिवुड को नए ऐक्टर्स देने के लिए सुभाष घई ने एक ऐक्टिंग स्कूल की स्थापना भी की है। इसे दुनिया के टॉप-10 ऐक्टिंग स्कूलों में गिना जाता है।
24 जनवरी, 1945 को नागपुर में जन्मे सुभाष घई बचपन के दिनों से ही फ़िल्मों में काम करना चाहते थे। अपने इसी सपने को साकार करने के लिए उन्होंने पुणे के 'फ़िल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया' में प्रशिक्षण लिया और अपने सपनों को पूरा करने के लिए मुंबई आ गए। सुभाष घई ने अपने जीवन में महज 16 फ़िल्मों का निर्देशन किया है। इनमें से 13 फ़िल्में बॉक्स ऑफिस पर ब्लॉकबस्टर रही हैं। उनकी पहली फ़िल्म 'कालीचरण' खूब सफल रही थी। इस फ़िल्म की कहानी भी घई ने ही लिखी थी।

सुभाष घई ने साल 1970 में मुक्ता घई से विवाह किया। उनकी दो बेटियां हैं। इनमें से एक बेटी मेघना को उन्होंने गोद लिया था। बॉलिवुड को नए ऐक्टर्स देने के लिए सुभाष घई ने एक ऐक्टिंग स्कूल की स्थापना भी की है। इसे दुनिया के टॉप-10 ऐक्टिंग स्कूलों में गिना जाता है।
अपने कॅरियर के शुरुआती दौर में सुभाष घई ने कुछ फ़िल्मों में अभिनय किया, लेकिन बतौर अभिनेता अपनी पहचान बनाने में कामयाब नहीं हो सके। बतौर निर्देशक सुभाष घई ने अपने कॅरियर की शुरुआत वर्ष 1976 में प्रदर्शित फ़िल्म 'कालीचरण' से की। फ़िल्म टिकट खिड़की पर सुपरहिट साबित हुई। वर्ष 1978 में उन्होंने एक बार फिर से शत्रुघ्न सिन्हा को लेकर 'विश्वनाथ' बनाई। इस फ़िल्म में शत्रुघ्न सिन्हा ने एक तेजतर्रार वकील की भूमिका निभाई थी। फ़िल्म टिकट खिड़की पर सुपरहिट साबित हुई। इस फ़िल्म में शत्रुघ्न सिन्हा का बोला गया यह संवाद जली को आग कहते हैं, बुझी को राख कहते हैं, जिस राख से बारूद बने, उसे विश्वनाथ कहते हैं दर्शकों के बीच आज भी लोकप्रिय है।
वर्ष 1980 में प्रदर्शित फ़िल्म 'कर्ज' सुभाष घई के कॅरियर की एक और सुपरहिट फ़िल्म साबित हुई। पुनर्जन्म पर आधारित इस फ़िल्म में ऋषि कपूर, टीना मुनीम, सिमी ग्रेवाल, प्राण, प्रेमनाथ और राजकिरण ने मुख्य भूमिकाएं निभाई थीं। इस फ़िल्म में सिमी ग्रेवाल ने नेगेटिव किरदार निभाकर दर्शकों को रोमांचित कर दिया था। 'कर्ज' टिकट खिड़की पर सुपरहिट फ़िल्म साबित हुई।

वर्ष 1982 में प्रदर्शित फ़िल्म 'विधाता' सुभाष घई के करियर की महत्वपूर्ण फ़िल्मों में शुमार की जाती है। इस फ़िल्म के जरिए सुभाष घई ने अभिनय सम्राट दिलीप कुमार, शम्मी कपूर, संजीव कुमार, संजय दत्त जैसे मल्टी सितारों को एक साथ पेश किया। फ़िल्म ने सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित किए।
वर्ष 1982 में सुभाष घई ने अपनी प्रोडक्शन कंपनी 'मुक्ता आर्ट्स' की स्थापना की, जिसके बैनर तले उन्होंने वर्ष 1983 में प्रदर्शित फ़िल्म 'हीरो' का निर्माण-निर्देशन किया। इस फ़िल्म के जरिए सुभाष घई ने फ़िल्म इंडस्ट्री को जैकी श्रॉफ और मीनाक्षी शेषाद्रि के रूप में नया सुपरस्टार दिया।

वर्ष 1986 में सुभाष घई ने दिलीप कुमार को लेकर अपनी महत्वाकांक्षी फ़िल्म 'कर्मा' का निर्माण किया। दिलीप कुमार, नूतन, जैकी श्रॉफ, अनिल कपूर, नसीरुद्दीन शाह, श्रीदेवी, पूनम ढिल्लो और अनुपम खेर जैसे सुपर सितारों से सजी इस फ़िल्म के जरिए सुभाष घई ने दर्शकों के बीच देशभक्ति की भावना का संचार किया।

मंगलवार, 23 जनवरी 2024

नक्श लायलपुरी

महान गीतकार शायर नक़्श लायलपुरी
#24feb 
#22jan 
🎂24 फरवरी, 1928
⚰️22 जनवरी 2017अंधेरी
 लायलपुरी के वालिद मोहतरम जगन्नाथ ने उनका नाम जसवंत राय शर्मा रखा था। शायर बनने के बाद उन्होंने अपना नाम बदल लिया और बन गए नक्श लायलपुरी। साहित्य में उनकी दिलचस्पी उनके स्कूल के दिनों में ही दिख गई, जब उनकी स्कूल टीचर साल के अंत में उनकी कॉपी इसलिए खरीदती थीं, क्योंकि उनमें उनकी कविताएं लिखी होती थीं। साल 1947 में भारत और पाकिस्तान के विभाजन के बाद उनका परिवार शरणार्थियों के एक काफिले के साथ उस पार के पंजाब से भारत में लखनऊ आ गया। पान खाने और मुस्कराने की आदत उनको लखनऊ से ही मिली। उनकी शख़्सियत में वही नफ़ासत और तहज़ीब है जो लखनऊ वालों में होती है। लखनऊ की अदा और तवस्सुम उनकी इल्मी और फ़िल्मी शायरी में मौजूद है-

कई बार चाँद चमके तेरी नर्म आहटों के
कई बार जगमगाए दरो-बाम बेख़ुदी में

भारत और पाकिस्तान के विभाजन के दर्द को उन्होंने अपनी आंखों से देखा था और बंटवारे के दर्द को बहुत ही करीब से महसूस किया था और यह उनकी शायरी में बखूबी नजर आया-

हमने क्या पा लिया हिंदू या मुसलमां होकर
क्यूं न इंसा से मोहब्बत करें इंसा होकर

नक्श लायलपुरी के ग़ज़ल का चेहरा दर्द के शोले में लिपटे हुए शबनमी एहसास की लज़्ज़त से तरबतर है। शायरी के इस समंदर में एक तरफ़ फ़िक्र की ऊँची-ऊँची लहरें हैं तो दूसरी तरफ़ इंसानी जज़्बात की ऐसी गहराई है जिसमें डूब जाने को मन करता है। कहते हैं नाम भले भूल जाए, लफ्ज बचे रहते हैं, और अगर लफ्ज इतने पाकीजा हों तो तो वे सिर्फ बचे ही नहीं रहते, हर दिल का राग बन जाते हैं। नक़्श साहब की शायरी में पंजाब की मिट्टी की महक, लखनऊ की नफ़ासत और मुंबई के समंदर का धीमा-धीमा संगीत है-

मेरी पहचान है शेरो-सुख़न से
मैं अपनी क़द्रो क़ीमत जानता हूं

ज़िंदगी के तजुरबात ने उनके लफ़्ज़ों को निखारा संवारा और शायरी के धागे में इस सलीक़े से पिरो दिया कि उनके शेर ग़ज़ल की आबरू बन गए। फ़िल्मी नग़मों में भी जब उनके लफ़्ज़ गुनगुनाए गए तो उनमें भी अदब बोलता और रस घोलता दिखाई दिया–

ये मुलाक़ात इक बहाना है
प्यार का सिलसिला पुराना है
धड़कने धड़कनों में खो जायें
दिल को दिल के क़रीब लाना है
ख़्वाब तो कांच से भी नाज़ुक है
टूटने से इन्हें बचाना है
मन मेरा प्यार का शिवाला है
आप को देवता बनाना है
मैं हूँ अपने सनम के बाहों में
मेरे क़दमों तले ज़माना है

नक़्श लायलपुरी 1951 में रोज़गार की तलाश में मुंबई आए और यहीं के होकर रह गए। लाहौर में तरक़्क़ीपसंद तहरीक का जो जज़्बा पैदा हुआ था उसे मुंबई में एक माहौल मिला-

ये अंजुमन, ये क़हक़हे, ये महवशों की भीड़
फिर भी उदास, फिर भी अकेली है ज़िंदगी 

गीतकार के रूप में उन्हें पहला मौका 1952 में मिला था, लेकिन 1970 के दशक के प्रारंभ तक उन्हें खास सफलता नहीं मिल पाई। बाद में उन्होंने कई शीर्ष फिल्म निर्देशकों, संगीत निर्देशकों और गायकों के साथ काम किया और सुमधुर, रूमानी और भावनात्मक गीत लिखे, जो लाखों दिलों को छू गया। लायलपुरी के लिखे कुछ सर्वश्रेष्ठ गीतों में 'मैं तो हर मोड़ पर', 'ना जाने क्या हुआ, जो तूने छू लिया', 'उल्फत में जमाने की हर रस्म को ठुकरा' और 'दो दीवाने शहर में' शामिल हैं। नौशाद के साथ 'ताजमहल' और खय्याम के साथ 'यात्रा' जैसी फिल्मों के लिए गीत लिखे थे। नक्श लायलपुरी कहते हैं कि गीतकार के रूप में उन्हें बुलंदी बी.आर. इशारा की फिल्म 'चेतना' से मिली और उसमें उनकी नज्म 'मैं तो हर मोड़ पर तुमको दूंगा सदा' को अधिक सराहा गया। नक्श लायलपुरी के फिल्मी गानों की बहुत दिनों तक धूम रही। उन्होंने जयदेव, खैय्याम, मदन मोहन और रोशन के साथ खूब काम किया, लेकिन मदन मोहन से काफी प्रभावित थे। उनका कहना था कि मदन मोहन जी का जजमेंट काफी अच्छा था। सुरों के साथ गीत की भी उन्हें अच्छी परख थी। एक बार नक्श जी उन्हें एक गीत लिखकर दिया-
 
आपकी बातें करें या अपना अफसाना कहें,
होश में दोनों नहीं हैं, किसको दीवाना कहें।।

इस गीत को सुनकर वह खुशी से उछल पड़े और नक्श को गले लगाते हुए कहा कि यह तो लाजवाब मुखड़ा है। इसे हम चाहें तो कव्वाली बना लें, गीत बना लें या फिर गजल बना लें। गायकी की हर विधा में नक्श यह बेजोड़ हैं. उनके गीतों को सभी ने सराहा- 

माना तेरी नज़र में तेरा प्यार हम नहीं
कैसे कहें के तेरे तलबगार हम नहीं
सींचा था जिस को ख़ूने तमन्ना से रात दिन
गुलशन में उस बहार के हक़दार हम नहीं
हमने तो अपने नक़्शे क़दम भी मिटा दिए
लो अब तुम्हारी राह में दीवार हम नहीं

हिंदी फिल्मों में कितने ही कालजयी गीत लिखने वाले नक्श लायलपुरी साहब का 22 जनवरी 2017 को मुंबई में 89 वर्ष की उम्र में इंतकाल हो गया। ये फ़नकार अपनी उम्र के अंतिम दिनों में लगभग गुमनामी की ज़िंदगी जीता रहा-

बोझ होता जो ग़मों का तो उठा भी लेते
ज़िंदगी बोझ बनी हो तो उठाएं कैसे

उनकी गजल
शाख़ों को तुम क्या छू आए
काँटों से भी ख़ुशबू आए

देखें और दीवाना कर दें
गोया उनको जादू आए

कोई तो हमदर्द है मेरा
आप न आए आँसू आए

इश्क़ है यारो उनके बस का
जिन को दिल पर काबू आए

उन कदमों की आहट पाकर
फूल ही फूल लबे –जू आए

गूँज सुनी तेरे चरख़े की
पर्बत छोड़ के साधू आए

‘नक्श़’ घने जंगल में दिल के
फ़िर यादों के जुगनू आए

आंखो पर उनका अंदाज
तुझको सोचा तो खो गईं आँखें
दिल का आईना हो गईं आँखें
 
ख़त का पढ़ना भी हो गया मुश्किल
सारा काग़ज़ भिगो गईं आँखें
 
कितना गहरा है इश्क़ का दरिया
उसकी तह में डुबो गईं आँखें
 
कोई जुगनू नहीं तसव्वुर का
कितनी वीरान हो गईं आँखें
 
दो दिलों को नज़र के धागे से
इक लड़ी में पिरो गईं आँखें
 
रात कितनी उदास बैठी है
चाँद निकला तो सो गईं आँखें
 
'नक़्श' आबाद क्या हुए सपने
और बरबाद हो गईं आँखें


मनुस्मृति

. ................मनुस्मृति.................... जरा सोचिए, अगर आज भारत का कानून यह तय कर दे कि— "एक आम आदमी चोरी करे तो उसे...