मंगलवार, 9 जनवरी 2024

राहत फतेह अली खान

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🎂09 दिसंबर 1974  फ़ैसलाबाद, पाकिस्तान

पत्नी: निदा राहत (विवा. 2001)
अंकल: नुसरत फ़तेह अली ख़ान
बच्चे: Shazmaan Khan, फ़िल्ज़ा खान, महीन खान
माता-पिता: फर्रुख फतेह अली खान
भाई: वजाहत अली खान

राहत फ़तह अली ख़ान एक पाकिस्तानी संगीतकार हैं। वह विश्व प्रसिद्ध सूफी गायक नुसरत फतह अली खान के भतीजे है । राहत भी मुख्य रूप से सूफी गीतकार हैं। कव्वाली के अलावा वह गजल भी गाते हैं। राहत भारतीय फिल्म उद्योग बालीवुड के एक जाने माने पार्श्वगायक हैं।
उनके परिवार में क़व्वाली गाने की परंपरा पीढी-दर-पीढी चली आ रही है। राहत के पूरे घर में ही संगीत का माहौल था। उनके वालिद फर्रुख फतेह अली ख़ान साहेब को भी संगीत का शौक था। राहत ने संगीत की शिक्षा अपने तायाजी नुसरत फ़तेह अली ख़ान से प्राप्त की। राहत ने अपना पहला स्टेज शो 07वर्ष की उम्र में किया था
बालीवुड में राहत की गायकी का सफर 2003में पूजा भट्ट निर्देशित पाप फिल्म के गाने ‘लागी तुझ से मन की लगन’ से शुरु हुआ। इस गाने के बाद से राहत की प्रसिद्धि दिन प्रतिदिन बढती गयी। तब से आज तक उनके गाये हुये गीतों ने लोकप्रियता की नयी ऊँचाइयों को छुआ है। राहत ने हालीवुड की फिल्मों के लिये भी काम किया है। 1995में उन्होने उस्ताद नुसरत फतह अली खान और अपने वालिद के साथ मिलकर डेड मैन वाकिंग का संगीत देने में सहायता की थी। इसके बाद 2002में उन्होने फ़ोर फ़ेदर्स के साउंड ट्रेक पर काम किया। 2006 में आई एपोकैलिप्सो मूवी के साउंड ट्रैक में भी राहत ने आवाज़ दी है
दिल्ली के इंदिरा गांधी हवाई अड्डे पर राहत और उनके ग्रुप उस समय रोक लिया गया जब उनके पास से क़रीब सवा लाख डॉलर नगद मिले। अधिकारियों के अनुसार उन्होने इमीग्रेशन जांच के दौरान विदेशी मुद्रा के बारे में जानकारी नहीं दी थी। राहत और उनके मैनेजर मारुफ़ पर विदेशी मुद्रा विनिमय अधिनियम (फ़ेमा) और कस्टम कानून के तहत मामला चलाया गया था। जाँच के बाद राहत फ़तह अली ख़ान और उनके मैनेजर मारुफ़ अली पर 15-15 लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया गया।

सोमवार, 8 जनवरी 2024

फरहा नाज हाशमी

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फराह नाज़ हाशमी

🎂09 दिसंबर 1968
  हैदराबाद, तेलंगाना , भारत

पेशा
अभिनेत्री
सक्रिय वर्ष
1984-2005
जीवन साथी
विंदू दारा सिंह
​( एम.  1996; प्रभाग.  2002 )
सुमीत सहगल ​( एम.  2003 )
बच्चे
1 (विन्दु दारा सिंह के साथ)
फराह नाज़ हाशमी , जिन्हें आमतौर पर फराह के नाम से जाना जाता है, 1980 के दशक के मध्य और 1990 के दशक की शुरुआत की एक प्रमुख बॉलीवुड अभिनेत्री हैं। वह तब्बू की बड़ी बहन हैं ।
फराह ने 1985 में यश चोपड़ा फिल्म्स के बैनर तले फिल्म फासले से डेब्यू किया । अस्सी के दशक के अंत और नब्बे के दशक की शुरुआत में वह बॉलीवुड की प्रमुख अभिनेत्रियों में से एक थीं। 1989 की बंगाली फिल्म आमार तुमी में उनकी जोड़ी प्रोसेनजीत चटर्जी के साथ थी । फरहा की ऐतिहासिक फिल्में थीं नसीब अपना-अपना (1986), ईमानदार (1987), वो फिर आएगी , नकाब (1989),  यतीम (1988), बाप नंबरी बेटा दस नंबरी (1990), बेगुनाह (1991), भाई हो तो ऐसा (1995) और सौतेला भाई (1996)। उन्होंने राजेश खन्ना के साथ तीन फिल्में भी कीं ।

अपनी पहली शादी के बाद 1996 में उन्होंने अभिनय से संन्यास ले लिया,  हालांकि बाद में उन्होंने कुछ टेलीविजन धारावाहिकों में काम किया। उन्होंने अपने समय के लगभग सभी शीर्ष अभिनेताओं के साथ काम किया, जिनमें राजेश खन्ना , ऋषि कपूर , संजय दत्त , सनी देओल , अनिल कपूर , जैकी श्रॉफ , आमिर खान , मिथुन चक्रवर्ती , गोविंदा और आदित्य पंचोली शामिल हैं ।
फराह का जन्म जमाल अली हाशमी और रिजवाना के घर एक हैदराबादी मुस्लिम परिवार में हुआ था ।उसके माता-पिता का जल्द ही तलाक हो गया।  उनकी माँ एक स्कूल-अध्यापिका थीं और उनके नाना-नानी सेवानिवृत्त प्रोफेसर थे जो एक स्कूल चलाते थे। उनके दादा, मोहम्मद अहसान, गणित के प्रोफेसर थे, और उनकी दादी अंग्रेजी साहित्य की प्रोफेसर थीं।

वह शबाना आजमी , तन्वी आजमी और बाबा आजमी की भतीजी और तब्बू की बड़ी बहन हैं ।
फराह ने 1985 में महेंद्र कपूर के बेटे रोहन कपूर के साथ यश चोपड़ा की फासले से अपनी शुरुआत की थी  हालांकि फासले एक आपदा थी, फराह को कई अन्य बड़े प्रस्ताव मिले जैसे शक्ति सामंत की पाले खान , केसी बोकाडिया की नसीब अपना अपना और प्राण लाल मेहता की लव 86 ।

वह मरते दम तक , नसीब अपना अपना , लव 86 ,  ईमानदार , घर घर की कहानी , दिलजला , रखवाला , वो फिर आएगी , वीरू दादा , बाप नंबरी बेटा दस नंबरी और बेगुनाह जैसी हिट फिल्मों का हिस्सा थीं।

जेपी दत्ता की यतीम को आलोचकों की प्रशंसा मिली, और यह उनकी प्रदर्शन-उन्मुख भूमिकाओं में से एक थी, साथ ही हमारा खानदान , कारनामा , नकाब , खतरानाक और पति पत्नी और तवायफ जैसी फिल्में भी थीं, हालांकि वे व्यावसायिक रूप से असफल रहीं। हिट फिल्मों - वो फिर आएगी और बेगुनाह में उनके अभिनय को समीक्षकों द्वारा सराहा गया।

1990 के दशक में, उन्होंने आमिर खान के साथ दो फिल्मों में काम किया; जवानी जिंदाबाद और इसी का नाम जिंदगी , लेकिन दोनों ही बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप रहीं। उन्हें खुदा गवाह के लिए साइन किया गया था और उन्होंने कुछ दृश्यों की शूटिंग भी की थी, लेकिन निर्माण में देरी के कारण बाद में उनकी जगह शिल्पा शिरोडकर को ले लिया गया । हालाँकि, आज तक, राजेश खन्ना के साथ वो फिर आएगी और बेगुनाह में उनकी भूमिका को उनका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन माना जाता है। उसी दौरान उन्होंने दारा सिंह के बेटे विंदू दारा सिंह से शादी कर ली ।

इसके बाद फराह ने मुकाबला , धरतीपुत्र और इज्जत की रोटी जैसी फिल्मों में सहायक भूमिकाएं निभानी शुरू कर दीं । मुक़ाबला बहुत सफल रही, लेकिन बाद में, 1993 और 1996 के बीच उनकी अन्य फ़िल्में सफल नहीं रहीं, हालाँकि सौतेला भाई एक व्यावसायिक हिट थी और समीक्षकों द्वारा प्रशंसित थी।

बाद में उन्होंने टेलीविजन की ओर रुख किया और अमर प्रेम , अंदाज , अहा (तीनों हिमेश रेशमिया द्वारा निर्मित ), विलायती बाबू , आंगन, अर्धांगिनी, औरत तेरी यही कहानी और पापा जैसे धारावाहिकों में काम किया । फराह तकदीर नामक एक मेगा धारावाहिक की भी योजना बना रही थीं , लेकिन उन्होंने इस परियोजना को स्थगित कर दिया। इसके बाद उन्होंने 2004 में हलचल में अभिनय किया।
फराह ने 1996 में अभिनेता विंदू दारा सिंह से शादी की , जिनसे उनका एक बेटा फतेह रंधावा (जन्म 1997) है। 2002 में दोनों का तलाक हो गया। बाद में उन्होंने 2003 में साथी बॉलीवुड और टेलीविजन अभिनेता सुमीत सहगल से दोबारा शादी की
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2005 शिखर कुसुम हिंदी
2004 हलचल गोपी हिंदी
2002 भारत भाग्य विधाता नगमा हिंदी
2000 भाई नंबर 1 नेहा हिंदी
1998 अचानक मधु हिंदी
1997 लहू के दो रंग संगीता बी. श्रीवास्तव हिंदी
1996 hukamnama हिंदी
रब डायन राखन संध्या पंजाबी
माहिर पारो हिंदी
नमक डॉ. अंजू हिंदी
सौतेला भाई बिंदिया हिंदी
1995 भाई हो तो ऐसा हिंदी
सरहद: अपराध की सीमा संध्या माथुर हिंदी
ताक़त सावित्री हिंदी
फौजी रूपा हिंदी
1994 जनम से पहले गीता भारद्वाज हिंदी
चौराहा नर्तकी हिंदी
इन्साफ अपने लहू से रानी हिंदी
1993 इज्जत की रोटी कनिष्ठा हिंदी
धरतीपुत्र कर्मा हिंदी
मुकाबला वन्दना हिंदी
जीवन की शतरंज राधा वी. शर्मा हिंदी
कुंदन शन्नो हिंदी
ज़ख्मों का हिसाब बिंदिया हिंदी
1992 इसी का नाम जिंदगी चुमकी हिंदी
नसीबवाला हिंदी
1991 पाप की आँधी निरीक्षण किरण गुप्ता हिंदी
बेगुनाह गुड्डु/निर्मला 'निम्मो'/बुलबुल हिंदी
बलिदान नर्तक/गायक हिंदी
1990 पति पत्नी और तवायफ श्रीमती शांति सक्सैना हिंदी
बाप नंबरी बेटा दस नंबरी रोज़ी डिसूज़ा हिंदी
हार जीत हिंदी
जवानी जिंदाबाद सुगंधा श्रीवास्तव हिंदी
जीने दो चंदा हिंदी
कारनामा माला हिंदी
मजबूर (1989 फ़िल्म) प्रिया हिंदी
Khatarnaak डॉ. संगीता जोशी हिंदी
वीरू दादा रेखा हिंदी
रखवाला रामतकी हिंदी
क़ैदी करो मीनू हिंदी

काला बाज़ार कामिनी संपत हिंदी
मजबूर हिंदी
मेरी ज़बान बच्चा हिंदी
नकाब आसिया हिंदी
1988 पाप को जला कर राख कर दूंगा पूजा सक्सैना/पूजा डी. मल्होत्रा हिंदी
हलाल की कमाई हिंदी
घर घर की कहानी आशा धनराज हिंदी
मोहब्बत के दुश्मन रेशमा हिंदी
हमारा खानदान रूबी मिरांडा हिंदी
यतीम गौरी एस.यादव हिंदी
महाकाली हिंदी
वो फिर आएगी आरती हिंदी
दिलजला ममता आर गुप्ता/मादुरी हिंदी
इमानदार रेनू एस राय हिंदी
7 साल बाद हिंदी
मार्टे डैम तक ज्योति आर दयाल हिंदी
1986 प्रेम 86 लीना हिंदी
नसीब अपना अपना राधा हिंदी
पलय खान हेलेन बोन्ज़ हिंदी
1985 फासले चांदनी हिंदी
1984 नसबंदी हिंदी

कमल मित्रा

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कमल मित्रा 
🎂जन्म की तारीख और समय: 09 दिसंबर 1912, बर्धमान
⚰️मृत्यु की जगह और तारीख: 02 अगस्त 1993, कोलकाता

एक भारतीय अभिनेता थे, जिन्होंने चार दशकों से अधिक समय में 90 से अधिक फिल्मों में अभिनय किया। छबी बिस्वास और पहाड़ी सान्याल के साथ उन्होंने एक चरित्र अभिनेता के रूप में बंगाली सिल्वर स्क्रीन पर अपना दबदबा बनाया। मित्रा ने पौराणिक और सामाजिक फिल्मों में कई प्रमुख भूमिकाएँ निभाईं। 
कमल मित्रा 
 स्नातक स्तर की पढ़ाई के तुरंत बाद वह सेना में शामिल हो गए। बर्द्धमान के प्रसिद्ध मित्रा परिवार से आने वाले, वह एक उत्सुक खिलाड़ी और एक अच्छे फुटबॉलर थे। अभिनय में कदम रखने से पहले, उन्होंने बर्द्धमान में जिला मजिस्ट्रेट और कलेक्टर कार्यालय में काम किया था । वह एक शौकीन पाठक और दुर्लभ पुस्तकों के संग्रहकर्ता थे। उन्होंने अपनी पुस्तकों का विशाल संग्रह कोलकाता में फिल्म, फिल्म अध्ययन और फिल्म-संग्रह के केंद्र नंदन को दान कर दिया। उन्होंने रेडियो-नाटकों में भी प्रदर्शन किया। उनकी आत्मकथा, 'फ्लैशबैक', बंगाली सिनेमा की दुनिया के बारे में जानकारी प्रदान करती है। 1980 के दशक की शुरुआत में उन्होंने अभिनय से संन्यास ले लिया।
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नीलांगुरियो (1943)
कंस (1944)
महिषासुर बध (1945)
अभिजात्री (1949)
सब्यसाची (1948)
विद्यासागर (1950)
आनंद मठ (1952)
जिघांसा (1951)
अग्निपरीक्षा (1954)
शाप मोचन (1955)
सिल्पी (1956)
सात नंबर बारी (1946)
बधू (1962)
पारस पत्थर (1958)
एकती रात (1956)
नबा बिधान (1954)
लौहा कपाट (1958)
सागरिका (1956)
साबर उपारे (1955)
अस्पताल (1960)
जमलाये जिबंता मानुष (1958)
सूर्यतोरण (1958)
आशित आशियोना (1967)
बिभास (1964)
भानु पेलो लॉटरी (1958)
दिया नेया (1964)
थाना थेके अस्ची (1965)
शेष अंका (1963)
चिरोडिनर (1969)
बरनाली (1963)
परिणीता (1969)
काल तुमी आलेया (1966)
मोनिहार (1966)
जीबन मृत्यु (1967)
साबरमती (1969)
पितापुत्र (1969)
तीन भुबनेर पारे (1969)
हारमोनियम (1976)
फुलु ताकुरमा (1974)
रौद्रछाया (1973)
आरो एकजोन (1980)
असाधरण (1976)
दक्ष यज्ञ (1980)
खेलर पुतुल (1981)

शत्रुघ्न सिन्हा

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शत्रुघ्न सिन्हा
अन्य नाम बिहारी बाबू, शॉटगन

🎂जन्म 9 दिसंबर, 1945

जन्म भूमि पटना, बिहार
अभिभावक भुवनेश्वरी प्रसाद सिन्हा और श्यामा देवी
पति/पत्नी पूनम सिन्हा
संतान पुत्री- सोनाक्षी सिन्हा; पुत्र- लव सिन्हा और कुश सिन्हा
कर्म भूमि मुम्बई, पटना
कर्म-क्षेत्र अभिनेता, राजनीतिज्ञ
मुख्य फ़िल्में ‘रामपुर का लक्ष्मण’, ‘कालीचरण’, ‘काला पत्थर’, ‘दोस्ताना’, क्रांति, नरम-गरम, नसीब आदि।
शिक्षा स्नातक
विद्यालय फ़िल्म एवं टेलीविजन संस्थान, पुणे
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी शत्रुघ्न सिन्हा बॉलीवुड से निकलने वाले पहले नेता हैं,
शत्रु के पिता पेशे से चिकित्सक थे, इस वजह से उनकी इच्छा थी कि बेटा शत्रु भी डॉक्टर बने। लेकिन शॉटगन को ये मंजूर नहीं था। अपने चार भाईयों में सबसे छोटे शत्रुघ्न सिन्हा को घर में सभी लोग छोटका बबुआ कहा करते थे। शत्रुघ्न भारतीय फ़िल्म एवं टेलीविजन संस्थान, पुणे से स्नातक हैं।
शत्रुघ्न सिन्हा की इच्छा बचपन से ही फ़िल्मों में काम करने की थी। अपने पिता की इच्छा को दरकिनार कर वे फ़िल्म एण्ड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ पुणे में प्रवेश लिया। वहाँ से ट्रेनिंग लेने के बाद वे फ़िल्मों में कोशिश करने लगे। लेकिन कटे होंठ के कारण किस्मत साथ नहीं दे रही थी। ऐसे में वे प्लास्टिक सर्जरी कराने की सोचने लगे। तभी देवानंद ने उन्हें ऐसा करने से मना कर दिया था। उन्होंने वर्ष 1969 में फ़िल्म ‘साजन’ के साथ अपने कैरियर की शुरूआत की थी। पचास-साठ के दशक में के.एन. सिंह, साठ-सत्तर के दशक में प्राण, अमजद ख़ान और अमरीश पुरी। और इन्हीं के समानांतर फ़िल्म एण्ड टीवी संस्थान से अभिनय में प्रशिक्षित बिहारी बाबू उर्फ शॉटगन उर्फ शत्रुघ्न सिन्हा की एंट्री हिन्दी सिनेमा में होती है। यह वह दौर था जब बहुलसितारा (मल्टी स्टारर) फ़िल्में बॉक्स ऑफिस पर धन बरसा रही थीं।

बिहारी बाबू उर्फ शॉटगन

अपनी ठसकदार बुलंद, कड़क आवाज और चाल-ढाल की मदमस्त शैली के कारण शत्रुघ्न जल्दी ही दर्शकों के चहेते बन गए। आए तो वे थे वे हीरो बनने, लेकिन इंडस्ट्री ने उन्हें खलनायक बना दिया। खलनायकी के रूप में छाप छोड़ने के बाद वे हीरो भी बने। जॉनी उर्फ राजकुमार की तरह शत्रुघ्न की डॉयलाग डिलीवरी एकदम मुंहफट शैली की रही है। यही वजह रही कि उन्हें 'बड़बोला एक्टर' घोषित कर दिया गया। उनके मुँह से निकलने वाले शब्द बंदूक की गोली समान होते थे, इसलिए उन्हें 'शॉटगन' का टाइटल भी दे दिया गया। शत्रुघ्न की पहली हिंदी फ़िल्म डायरेक्टर मोहन सहगल निर्देशित 'साजन' (1968) के बाद अभिनेत्री मुमताज़ की सिफारिश से उन्हें चंदर वोहरा की फ़िल्म 'खिलौना' (1970) मिली। इसके हीरो संजीव कुमार थे। बिहारी बाबू को बिहारी दल्ला का रोल दिया गया। शत्रुघ्न ने इसे इतनी खूबी से निभाया कि रातों रात वे निर्माताओं की पहली पसंद बन गए। उनके चेहरे के एक गाल पर कट का लम्बा निशान है। यह निशान उनकी खलनायकी का प्लस पाइंट बन गया। शत्रुघ्न ने अपने चेहरे के एक्सप्रेशन में इस 'कट' का जबरदस्त इस्तेमाल कर अभिनय को प्रभावी बनाया है।

शत्रुघ्न और अमिताभ बच्चन

उस दौर के एंग्री यंग मैन अमिताभ बच्चन के साथ शत्रुघ्न की एक के बाद एक अनेक फ़िल्में रिलीज होने लगीं। 1979 में यश चोपड़ा के निर्देशन की महत्वाकांक्षी फ़िल्म 'काला पत्थर' आई थी। इसके नायक अमिताभ थे। यह फ़िल्म 1975 में बिहार की कोयला खदान चसनाला में पानी भर जाने और सैकडों मज़दूरों को बचाने की सत्य घटना पर आधारित थी। इस फ़िल्म में शत्रुघ्न ने मंगलसिंह नामक अपराधी का रोल किया था। इन दो महारथियों की टक्कर इस फ़िल्म में आमने-सामने की थी। काला पत्थर तो नहीं चली लेकिन अमिताभ-शत्रु की टक्कर को दर्शकों ने खूब पसंद किया। आगे चलकर अमिताभ-शत्रुघ्न फ़िल्म दोस्ताना (निर्देशक- राज खोसला), शान (निर्देशक- रमेश सिप्पी) तथा नसीब (निर्देशक- मनमोहन देसाई) जैसी फ़िल्मों में साथ-साथ आए।

प्रसिद्ध फ़िल्में

लगभग चार दशकों में शत्रुघ्न सिन्हा ने कम से कम 200 हिन्दी फ़िल्मों में काम किया है। सिन्हा फ़िल्मों में अपने नकारात्मक चरित्र के लिए जाने गये। उनकी प्रसिद्ध फ़िल्मों में ‘रामपुर का लक्ष्मण’, ‘कालीचरण’ मिलेनियम स्टार अमिताभ बच्चन के साथ की फ़िल्मों में ‘दोस्ताना’, ‘काला पत्थर’, ‘शान’ और ‘नसीब’ इत्यादि हैं। फ़िल्म 'क्रांति' (1981-मनोज कुमार), वक्त की दीवार (1981-रवि टंडन), नरम-गरम (1981-ऋषिकेश मुखर्जी), कयामत (1983-राज सिप्पी), चोर पुलिस (1983-अमजद खान), माटी माँगे ख़ून (1984-राज खोसला) और खुदगर्ज (1987- राकेश रोशन) का उल्लेख करना पर्याप्त होगा। उन्होंने पंजाबी फ़िल्म ‘पुत्त जट्टां दे’ और ‘सत श्री अकाल’ में भी अभिनय किया है। अभिनय के अलावा उन्होंने ‘कशमकश’, ‘दोस्त’ और ‘दो नारी’ जैसी फ़िल्मों में गाने में भी हाथ आजमाया। हाल में रिलीज हुई रामगोपाल वर्मा की फ़िल्म ‘रक्तचरित्र’ में उन्होंने आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एन. टी. रामाराव की भूमिका निभाई जिसके लिए उन्होंने पहली बार अपनी मूछें साफ़ करवाई।

रविवार, 7 जनवरी 2024

पंकज बेरी

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पंकज बैरी

🎂 08 Jan 1956 
Ambala, Punjab

पंकज बैरी एक भारतीय फिल्मटीवीअभिनेता हैं। पंकज को एक्टिंग की दुनिया में सबसे बड़ा और पहला ब्रेक वर्ष 1987 में  दूरदर्शन के टीवी सीरिज गुल गुलशन गुलफाम से मिला। पंकज ने हिंदी सिनेमा में कदम फिल्म कॉलेज गर्ल से रखा। पंकज ने अपने अभिनय करियर में कई बेहतरीन फिल्मों और टीवी शोज में काम किया है।
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2006 विद लव तुम्हारा 
2005 नेताजी सुभाष चन्द्र बोस 
2002 घाव
2002 अंश 
2002 हथियार
2001 मुझे कुछ कहना है 
1996 चाहत
2004 हत्या 
1995 स्वाभिमान दूरदर्शन धारावाहिक फ़िल्म
1993 दिव्य शक्ति
1993 कन्या दान 
1993 गेम 
1993 सैनिक 
1992 बलवान 
1992 दिलवाले कभी ना हारे
2003 दिल का रिश्ता

सईद जाफरी

#08jan
#15nov 

सईद जाफ़री, भारतीय अभिनेता

🎂जन्म08 जनवरी 1929
मलेरकोटला, पंजाब, ब्रिटिश इंडिया (आज का पंजाब, भारत)
⚰️मौत15 नवम्बर 2015 (उम्र 86)
लंदन, इंग्लैंड, यूनाइटेड किंगडम
समाधि
गनर्सबरी कब्रिस्तान

नागरिकता ब्रिटिश
भारतीय (formerly)
शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय (BA,MA)
अमेरिका का कैथोलिक विश्वविद्यालय (MFA)
पेशाअभिनेता

जीवनसाथी
Madhur Jaffrey (वि॰ 1958; वि॰वि॰ 1966)
Jennifer Sorrell (वि॰ 1980)
बच्चे 3, शामिल सकीना जाफ़री
संबंधी
किआरा अडवाणी (पोती)
उन्होंने विभिन्न ब्रितानी और हिन्दी फ़िल्मों में अभिनय किया। उनका जन्म मलेरकोटला, पंजाब में एक पंजाबी मुस्लिम परिवार में हुआ। उन्होंने द मैन हू वूड बी किंग (1975), शतरंज के खिलाड़ी (1977), गाँधी (1982), ए पैसेज टू इंडिया (1965बीबीसी संस्करण एवं 1984 फ़िल्म), द फार पैविलियंस (1984) और माय ब्यूटीफुल लौन्ड्रेट (1985) सहित विभिन्न फ़िल्मों में अभिनय किया। उन्होंने 1980 और 1990 के दशक में विभिन्न बॉलीवुड फ़िल्मों में भी काम किया।
⚰️अनुभवी अभिनेता की 14 नवंबर 2015 की सुबह लंदन के एक अस्पताल में मृत्यु हो गई। वह 86 वर्ष के थे। वह ब्रेन हैमरेज के कारण अपने लंदन स्थित आवास पर गिर गए थे और फिर कभी होश में नहीं आए। उनका अंतिम संस्कार 7 दिसंबर को लंदन में किया गया।

सईद जाफरी का जन्म मलेरकोटला में एक भारतीय शिया मुस्लिम परिवार में हुआ था , जो हामिद हुसैन जाफरी और उनकी पत्नी हमीदा बेगम की चार संतानों में सबसे बड़े थे। उनके दो भाई, वहीद और हमीद और एक बहन, शगुफ्ता थीं। उनके पिता सरकारी सेवा में एक डॉक्टर थे, जो संयुक्त प्रांत के कई ग्रामीण इलाकों में तैनात थे और परिवार हमेशा उनके साथ रहता था। उनके जन्म के समय, जाफरी के नाना मालेरकोटला राज्य के दीवान (प्रथम मंत्री) थे ।

उनकी पहली पत्नी, मधुर बहादुर , पुरानी दिल्ली के एक पुराने और समृद्ध हिंदू कायस्थ परिवार से थीं । वह एक प्रसिद्ध चरित्र अभिनेत्री हैं, जो कई भारतीय और ब्रिटिश फिल्मों में दिखाई दीं और खाद्य और यात्रा टेलीविजन व्यक्तित्व के रूप में उनका सफल करियर रहा। जाफरी और बहादुर की शादी सितंबर 1958 में वाशिंगटन डीसी में हुई और 1966 में मैक्सिको में उनका तलाक हो गया । उनकी तीन बेटियां थीं: जिया, मीरा और सकीना जाफरी । बाद में उन्होंने मर्चेंट-आइवरी की फिल्म द परफेक्ट मर्डर में अपनी मां के साथ अभिनय की शुरुआत की । तलाक के बाद, बच्चों को दिल्ली में बहादुर के माता-पिता और बहन की देखभाल के लिए भारत भेज दिया गया। बहादुर ने 1969 में अमेरिकी शास्त्रीय वायलिन वादक सैनफोर्ड एलन से शादी की, लेकिन पेशेवर तौर पर वह अपने पहले पति के नाम से ही जानी गईं।
1980 में, जाफरी ने एक एजेंट और फ्रीलांस कास्टिंग डायरेक्टर जेनिफर सोरेल से शादी की। जाफरी ने ईसाई धर्म अपना लिया और दक्षिण ईलिंग के सेंट मैरी चर्च में अपनी पत्नी के साथ रविवार की सेवा में भाग लिया, जहां उनका अंतिम संस्कार हुआ।
1998 में, जाफरी ने अपनी आत्मकथा, सईद: एन एक्टर्स जर्नी प्रकाशित की

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जाफरी कई बॉलीवुड और हॉलीवुड फिल्मों में दिखाई दिए, और शॉन कॉनरी , माइकल केन और पियर्स ब्रॉसनन सहित अभिनेताओं के साथ दिखाई दिए । उन्होंने सत्यजीत रे , जेम्स आइवरी , रिचर्ड एटनबरो और जॉन हस्टन द्वारा निर्देशित सिनेमा में अभिनय किया ।

उनके फिल्म क्रेडिट में द विल्बी कॉन्सपिरेसी (1975), 
द मैन हू विल बी किंग (1975), शतरंज के खिलाड़ी ( द चेस प्लेयर्स ) (1977), 
स्फिंक्स (1981), 
गांधी में सरदार पटेल की भूमिका (1982), 
ए पैसेज टू शामिल हैं। इंडिया (1965 बीबीसी संस्करण और 1984 फ़िल्म), द फार पवेलियन्स (1984), 
द रेज़र्स एज (1984), 
और माई ब्यूटीफुल लॉन्ड्रेट (1985)।

1980 और 1990 के दशक में वह कई बॉलीवुड फिल्मों में भी नजर आये। टेलीविज़न के लिए उन्होंने द प्रोटेक्टर्स (1973), 
द पर्सुएडर्स में अभिनय किया! गैंगस्टर्स (1975-1978), द ज्वेल इन द क्राउन (1984), तंदूरी नाइट्स (1985-1987) और लिटिल नेपोलियन्स (1994)। 
वह कोरोनेशन स्ट्रीट में रवि देसाई के रूप में और माइंडर में सीरीज 1 एपिसोड द बंगाल टाइगर में मिस्टर मुखर्जी के रूप में भी दिखाई दिए

मेरी इवान्स या मेरी इवान्स वाडिया या फ़ीयरलेस नाडिया

#08jan
#10jan 
मेरी इवान्स या मेरी इवान्स वाडिया या फ़ीयरलेस नाडिया 

🎂जन्म- 08 जनवरी, 1908, ऑस्ट्रेलिया;
⚰️मृत्यु- 10 जनवरी, 1996, मुम्बई

 भारतीय सिनेमा की ख्यातिप्राप्त अभिनेत्रियों में से एक थीं। सिर्फ़ हिन्दी ही नहीं, किसी भी भारतीय भाषा के सिनेमा के इतिहास में इतनी दबंग, निर्भीक, बहादुर, स्टंटबाज, टारजन या रॉबिनहुड स्टॉइल की नायिका आज तक दूसरी नहीं हुई। नाडिया ने हिन्दुस्तानी सिनेमा के तीस और चालीस के दशक में एक दिलेर-जांबाज अभिनेत्री के रूप में ऐसा जीवटभरा प्रदर्शन किया कि उसने पारम्परिक भारतीय समाज की अनेक मान्यताओं को ध्वस्त कर दिया। अपने समय में नाडिया बहुत बड़ी स्टार थीं। उन्होंने अपने बलबूते पर कई हिट फ़िल्में दी थीं। किंतु नाडिया को वह मान-सम्मान नहीं मिल सका, जिसकी वह हकदार थीं।
नाडिया का जन्म 8 जनवरी, सन 1908 को पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के 'पर्थ' शहर में हुआ था। उनके पिता का नाम हर्बर्ट इवान्स था, जो ब्रिटिश सेना में सैनिक थे। माता का नाम ग्रीक मार्गरेट था। पहले नाडिया का नाम 'मेरी इवान्स' रखा गया था, किंतु एक अमेरिकी ज्योतिष की सलाह पर वह 'मेरी इवान्स' से 'नाडिया' हो गईं।

भारत आगमन
जब नाडिया केवल पाँच साल की थीं, तब उनके पिता का तबादला बम्बई (वर्तमान मुम्बई) हो गया, और पूरा परिवार भारत आ गया। प्रथम विश्वयुद्ध में उन्हें फ़्राँस के मोर्चे पर भेजा गया था, जहाँ वे मारे गए। पिता की मृत्यु के बाद नाडिया की माँ बम्बई में ही बस गईं।
जब नाडिया ने होश संभाला तो माँ की मदद के लिए नौसेना के स्टोर्स में सेल्स गर्ल बन गईं। फिर सेक्रेटरी का दायित्व निभाया। इसी दौरान रशियन बैले नर्तकी मैडम एस्ट्रोव से उनकी मुलाकात हुई। बैले सीखने के लिए नाडिया ने अपन वजन भी घटाया। कुछ समय 'झाको रशियन सर्कस' में भी काम किया और अपनी कलाबाजियाँ दिखाईं। वे ब्रिटिश-भारतीय दर्शकों का मनोरंजन बैले के प्रदर्शन से करने लगीं। इसी दौरान एक शो में होमी वाडिया ने नाडिया को देखा तो उन पर मंत्रमुग्ध हो गए। स्क्रीन टेस्ट के बाद 'वाडिया मूवीटोन' के लिए नाडिया ऐसे अनुबंधित हुईं कि होमी वाडिया के 'होम' की मालकिन बनीं।
अभिनय
नाडिया ने सन 1933 में पहली बार हिन्दी फ़िल्म 'लाल ए यमन' में अभिनय किया था, जिसका निर्माण 'वाडिया मूवीटोन' के जेबीएच वाडिया ने किया था। भारत में 'हंटरवाली' के नाम से मशहूर हुई नाडिया ने 1930 और 1940 के दशक में 35 से भी अधिक फ़िल्मों में काम किया। पूरी ऊँची और गोरी-चिट्टी नाडिया के लिए नायक ढूँढना मुश्किल काम था। 'ऑल इण्डिया बॉडी ब्यूटीफुल कॉम्पिटिशन' के विजेता जॉन कावस का व्यक्तित्व शानदार था। वे हट्टे-कट्टे कदकाठी के कद्दावर व्यक्ति थे। इसलिए उन्हें नाडिया का हीरो बना दिया गया। नाडिया की सफलता के पीछे जॉन कावस का बहुत बड़ा योगदान था।
आरंभिक दो-तीन फ़िल्मों में छोटे रोल करने के बाद जेबीएच वाडिया ने सन 1935 में फ़िल्म "हंटरवाली" की पटकथा लिखी। इस दौर में गूंगा सिनेमा अपने धार्मिक, पौराणिक और ऐतिहासिक गुफ़ाओं से बाहर आ रहा था। प्रभात फ़िल्म कंपनी, न्यू थिएटर्स, बाम्बे टॉकिज अपने स्टाइल की फ़िल्में बना रहे थे। वाडिया भाइयों ने अपना अलग चलन शुरू किया। यह अमेरिकन टार्जन मूवीज, वेस्टनर्स, काऊबॉय स्टाइल से प्रेरित था। नाडिया को स्टंट फ़िल्मों का ऑफ़र दिया गया।

'हंटरवाली' नायिका प्रधान फ़िल्म थी। उन दिनों साठ हज़ार रुपयों में फ़िल्म बन जाया करती थी। जेबीएच वाडिया ने 'हंटरवाली' का बजट अस्सी हज़ार किया। जब वितरकों ने फ़िल्म देखी, तो हिरोइन के हाथों में हंटर और तलवार देखकर पीछे हट गए। मजबूर होकर वाडिया भाइयों ने अपने दोस्त बिलिमोरिया की भागीदारी में 'हंटरवाली' फ़िल्म रिलीज की। दर्शकों ने अब तक या तो स्वर्ग की अप्सराओं या देवियों को फूल बरसाते देखा था या फिर घरों में कैद हमेशा रोने-धोने-कलपने वाली औरत को देखा था। इतनी दिलेर स्त्री को परदे पर हैरतअंगेज करतब करते देख वे चकित रह गए। फ़िल्म 'हंटरवाली' ने बॉक्स ऑफ़िस पर ऐसा धमाल किया कि नाडिया रातोंरात सुपर स्टार बन गईं। इस प्रकार स्टंट फ़िल्मों का कारवाँ चल पड़ा।
नाडिया सचमुच में एक बहादुर स्त्री थीं। इसका प्रमाण फ़िल्म "जंगल प्रिंसेस" से मिलता है। इस फ़िल्म के एक दृश्य में नाडिया चार शेरों से लड़ती हैं। हिन्दी उच्चारण ठीक नहीं होने के बावजूद भी फ़िल्म "पहाड़ी कन्या" में नाडिया ने लम्बे संवाद बोले थे। मारधाड़ में माहिर नाडिया ने कई भावुक दृश्य भी बड़ी खूबी के साथ दिए थे। फ़िल्म "मौज" में भावना प्रधान संवाद बोलकर उन्होंने दर्शकों को रुला दिया था।

उस समय तकनीक इतनी उन्नत नहीं थी कि स्टंट वाले दृश्य आसानी से किए जा सकते। स्टंट दृश्य करने में जान का जोखिम बना रहता था। नाडिया स्टंट करने में पारंगत थीं। उनकी कई बार हड्डियाँ भी टूटीं, लेकिन वह हमेशा अपने स्टंट खुद करती थीं। उनके स्टंट दृश्य देखकर दर्शक चकरा जाते थे। आज के स्पाइडरमैन और सुपरमैन की तरह नाडिया की भी एक छवि थी। परदे पर वह बहादुर और सच्चाई की राह पर चलने वाली महिला का किरदार निभाती थीं। नकाबपोश, हाथ में हंटर और पैरों में लम्बे जूते पहने जब वह दुश्मनों को सबक सिखाती थीं तो सिनेमा हॉल दर्शकों की तालियों और सीटियों से गूँज उठता था। फ़िल्मों में घोड़ा और कुत्ता नाडिया के साथी थे। कुश्ती, तलवारबाजी, घुड़सवारी, कहीं से भी छलाँग लगाना, चलती ट्रेन पर लड़ाई करना, ट्रेन से घोड़े पर बैठ जाना जैसे स्टंट करना नाडिया को बेहद पसंद थे। नाडिया और जॉन कावस को चलती ट्रेन पर स्टंट करने का शौक़ था। इसलिए ट्रेन फ़िल्मों की सीक्वल बनाई गईं, जिनके नाम थे- फ्रंटियर मेल, 'पंजाब मेल' और 'दिल्ली एक्सप्रेस'।
अन्तिम फ़िल्म
उनकी आखिरी स्टंट फ़िल्म "सरकस क्वीन" थी। सन 1959 में उन्होंने अपने निर्माता-निर्देशक होमी वाडिया से विवाह कर फ़िल्मों से सन्न्यास ले लिया। 1968 में "खिलाड़ी" फ़िल्म में छोटी भूमिका में वह आखिरी वार परदे पर आई थीं। सिनेमा हॉल में जो लोग आगे बैठते थे, उन्हें उस समय 'चवन्नी क्लास' कहा जाता था। नाडिया के वे दीवाने थे। नाडिया के हैरतअंगेज करतब देखने में उन्हें खूब आनंद आता था। उस जमाने में जब नारी हमेशा पुरुषों के पीछे ही खड़ी होती थी। उसे अत्यंत कमज़ोर माना जाता था, नाडिया की सफलता वास्तव में आश्चर्यचकित कर देने वाली थी।
📽️
प्रमुख फ़िल्में
नाडिया की कुछ मुख्य फ़िल्मों के नाम इस प्रकार हैं.

लाल ए यमन - 1933
हंटरवाली - 1935
मिस फ्रंटियर मेल - 1936
पंजाब मेल - 1939
डायमंड क्वीन - 1940
हंटरवाली की बेटी - 1943
स्टंट क्वीन - 1945
हिम्मतवाली - 1945
लेडी रॉबिनहुड - 1946
तूफान क्वीन - 1947
दिल्ली एक्सप्रेस - 1949
कार्निवल क्वीन - 1955
सर्कस क्वीन - 1959
खिलाड़ी - 1968
⚰️निधन
सन 1935 से 1968 तक नाडिया ने कुल 42 फ़िल्मों में काम किया। 10 जनवरी, 1996 को मुम्बई, भारत में उनका देहांत हुआ।

मनुस्मृति

. ................मनुस्मृति.................... जरा सोचिए, अगर आज भारत का कानून यह तय कर दे कि— "एक आम आदमी चोरी करे तो उसे...