बुधवार, 3 जनवरी 2024

अब्दुल हलीम जाफ़र ख़ाँ

#18feb
#04jan 
पूरा नाम अब्दुल हलीम जाफ़र ख़ाँ
🎂जन्म 18 फ़रवरी, 1927
जन्म भूमि इन्दौर, मध्य प्रदेश
⚰️मृत्यु 04 जनवरी, 2017
मृत्यु स्थान मुम्बई, महाराष्ट्र
अभिभावक उस्ताद जाफ़र खाँ (पिता)
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र सितार वादक
पुरस्कार-उपाधि पद्मभूषण, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, पद्मश्री, शिखर सम्मान
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी अब्दुल हलीम जाफ़र ख़ाँ के सितार वादन की अपनी अलग शैली है, जिसे लोग 'जाफ़रखानी बाज' कहने लगे हैं।
इनका चमत्कारिक सितार वादन संगीत से अनभिज्ञ श्रोताओं को भी रसमग्न कर देता है। इनके वादन की अपनी अलग शैली है, जिसे लोग 'जाफ़रखानी बाज' कहने लगे हैं। इसमें मिज़राव का काम कम तथा बाएँ हाथ का काम ज़्यादा होता हैं। कण, मुर्की, खटका आदि का काम भी अधिक रहता है। प्रस्तुतीकरण में बीन तथा सरोद अंग का आभास होता है।

जीवन परिचय

हलीम साहब का जन्म इन्दौर, मध्य प्रदेश के निकटस्थ जावरा नामक गाँव में सन् 1929 में हुआ था। कुछ समय बाद इनका परिवार बंबई चला गया। अब्दुल हलीम के पिता उस्ताद जाफ़र खाँ भी सितार के अच्छे ज्ञाता थे। बचपन से ही सांगीतिक वातावरण मिलने से संगीत के प्रति लगाव हो जाना स्वाभाविक था।

शिक्षा
प्रारंभिक सितार-शिक्षा अब्दुल हलीम जाफ़र ख़ाँ ने प्रसिद्ध बीनकार उस्ताद बाबू खाँ से शुरू हुई। तत्पश्चात् उस्ताद महबूब खाँ से सितार की उच्च स्तरीय तालीम हासिल की। अब तक आप अपने फन में पूरी तरह माहिर हो चुके थे।

फ़िल्मी जीवन
पिता का इन्तकाल होने की वजह से हलीम साहब के सामने आर्थिक समस्या खड़ी हो गई, परिणामतः आपको फ़िल्मी क्षेत्र में जाना पड़ा। यहाँ आपको काफ़ी कामयाबी मिली, साथ ही सारे भारत में आपके सितार वादन की धूम मच गई। आकाशवाणी के राष्ट्रीय कार्यक्रमों तथा अखिल भारतीय संगीत सम्मेलनों में अपने सितार वादन से आपने लाखों श्रोताओं की आनन्द-विभोर तथा आश्चर्यचकित किया है। आपने चकंधुन, कल्पना, मध्यमी तथा खुसरूबानी जैसे मधुर राग निर्मित किए हैं। कुछ दक्षिणी रागों को भी उत्तर भारत में लोकप्रिय बनाया है। सांस्कृतिक प्रतिनिधिमण्डल के माध्यम से कई बार विदेश भ्रमण कर चुके हैं।

सम्मान और पुरस्कार

पद्मभूषण (2006)
शिखर सम्मान (मध्य प्रदेश सरकार, 1991)
गौरव पुरस्कार (महाराष्ट्र सरकार, 1990)
संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1987)
पद्मश्री (1970)

प्रदीप कुमार

#04jan
#27oct 
प्रदीप कुमार
🎂जन्म 4 जनवरी, 1925
जन्म भूमि पश्चिम बंगाल
⚰️मृत्यु 27 अक्टूबर, 2001
मृत्यु स्थान कोलकाता
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र अभिनेता
मुख्य फ़िल्में 'श्री फरहाद', 'जागते रहो', 'दुर्गेश नंदिनी', 'बंधन', 'हीर', 'क्रांति' (1981), 'रजिया सुल्तान' आदि।
प्रसिद्धि अभिनेता
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी प्रदीप कुमार के सिने कॅरियर में उनकी जोड़ी मीना कुमारी के साथ खूब जमी। उनकी और मीना कुमारी की जोड़ी वाली फ़िल्मों में 'अदले जहांगीर', 'बंधन', 'चित्रलेखा', 'बहू बेगम', 'भींगी रात', 'आरती' और 'नूरजहां' शामिल हैं।
हिन्दी एवं बंगाली फ़िल्मों के प्रसिद्ध अभिनेता थे। हिन्दी सिनेमा में उनको ऐसे अभिनेता के तौर पर याद किया जाता है, जिन्होंने 1950 और 60 के दशक में अपने ऐतिहासिक किरदारों के ज़रिये दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया। उस जमाने में फ़िल्मकारों को अपनी फ़िल्मों के लिए जब भी किसी राजा, महाराजा, राजकुमार अथवा नवाब की भूमिका की ज़रूरत होती थी तो वह प्रदीप कुमार को याद किया जाता था। उनके उत्कृष्ट अभिनय से सजी 'अनारकली', 'ताजमहल', 'बहू बेगम' और 'चित्रलेखा' जैसी फ़िल्मों को दर्शक आज भी नहीं भूले हैं।

प्रदीप कुमार बचपन से ही फ़िल्मों में बतौर अभिनेता काम करने का सपना देखा करते थे। इसी सपने को पूरा करने के लिए वह अपने जीवन के शुरूआती दौर में रंगमंच से जुड़े। हांलाकि इस बात के लिए उनके पिताजी राजी नहीं थे। 17 वर्ष की उम्र में प्रदीप कुमार अपने सपने को साकार करने के लिए मुंबई आ गए। मुंबई आने के बाद वह कैमरामैन धीरेन डे के सहायक के तौर पर काम करने लगे। वर्ष 1947 में उनकी मुलाकात निर्देशक देवकी बोस से हुई। देवकी बोस को प्रदीप कुमार में एक उभरता हुआ सितारा दिखाई दिया और उन्होंने अपनी बांग्ला फ़िल्म 'अलखनंदा' में काम करने का मौका दिया। इस फ़िल्म के जरिए प्रदीप कुमार बतौर अभिनेता पहचान बनाने में भले ही सफल नहीं हुए, लेकिन एक अभिनेता के रूप में उन्होंने सिने कैरियर के सफर की शुरूआत कर दी। इस बीच प्रदीप कुमार ने एक और बंगला फ़िल्म 'भूली नाय' में अभिनय किया। फ़िल्म भूली नाय ने बॉक्स ऑफिस पर अपनी सिल्वर जुबली पूरी की। इसके बाद प्रदीप कुमार ने हिंदी फ़िल्म की ओर भी अपना रुख़कर लिया

वर्ष 1946 से वर्ष 1952 तक प्रदीप कुमार फ़िल्म इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष करते रहे। प्रदीप कुमार में फ़िल्मों में बतौर अभिनेता बनने का नशा कुछ इस कदर छाया हुआ था कि उन्होंने हिंदी और उर्दू भाषा की तालीम हासिल करनी शुरू कर दी। फ़िल्म अलखनंदा के बाद उन्हें जो भी भूमिका मिली वह उसे स्वीकार करते चले गए। इस बीच उन्होंने कृष्णलीला, स्वामी, विष्णुप्रिया, संध्या बेलार रूपकथा जैसी कई फ़िल्मों में अभिनय किया, लेकिन इनमें से कोई भी फ़िल्म बॉक्स आफिस पर सफल नहीं हुई। वर्ष 1952 में प्रदर्शित फ़िल्म आंनद मठ में प्रदीप कुमार पहली बार मुख्य अभिनेता की भूमिका में दिखाई दिए। हालांकि इस फ़िल्म में पृथ्वीराज कपूर जैसे महान् अभिनेता भी थे फिर भी प्रदीप कुमार पृथ्वीराज की उपस्थिति में भी दर्शकों के बीच अपने अभिनय की छाप छोड़ने में कामयाब रहे। इस फ़िल्म की सफलता के बाद प्रदीप कुमार बतौर अभिनेता फ़िल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने में सफल हो गए।
📽️यादगार फ़िल्में
वर्ष 1956 प्रदीप कुमार के सिने कैरियर का सबसे अहम वर्ष साबित हुआ। इस वर्ष उनकी 10 फ़िल्में प्रदर्शित हुई, जिनमें श्री फरहाद, जागते रहो, दुर्गेश नंदिनी, बंधन, राजनाथ और हीर जैसी फ़िल्में शमिल है। इसके बाद प्रदीप कुमार ने एक झलक (1957), अदालत (1958), आरती (1962), चित्रलेखा (1964), भींगी रात (1965), रात और दिन, बहू बेगम (1967) जैसी कई फ़िल्मों में अपने अभिनय का जौहर दिखाकर दर्शको का भरपूर मनोरजंन किया। अभिनय में एकरूपता से बचने और स्वंय को चरित्र अभिनेता के रूप में भी स्थापित करने के लिए प्रदीप कुमार ने अपने को विभिन्न भूमिकाओं में पेश किया। इस क्रम में वर्ष 1969 में प्रदर्शित अजय विश्वास की सुपरहिट फ़िल्म संबध में उन्होंने चरित्र भूमिका निभाई बावजूद इसके उन्होंने अपने सशक्त अभिनय से दर्शको की वाहवाही लूट ली। इसके बाद प्रदीप कुमार ने महबूब की मेहंदी (1971), समझौता (1973), दो अंजाने (1976), धरमवीर (1977), खट्ठामीठा (1978), क्रांति (1981), रजिया सुल्तान (1983), दुनिया (1984), मेरा धर्म (1986), वारिस (1988) जैसी कई सुपरहिट फ़िल्मों के जरिए दर्शको के दिल पर राज किया। प्रदीप कुमार के सिने कैरियर में उनकी जोड़ी मीना कुमारी के साथ खूब जमी। प्रदीप कुमार और मीना कुमारी की जोड़ी वाली फ़िल्मों में अदले जहांगीर, बंधन, चित्रलेखा, बहू बेगम, भींगी रात, आरती और नूरजहां शामिल है। 

निधन
लगभग चार दशक तक अपने सशक्त अभिनय से दर्शकों के बीच ख़ास पहचान बनाने वाले प्रदीप कुमार 27 अक्टूबर 2001 को इस दुनिया को अलविदा कह गए।

निरूपा रॉय

#04jan
#13oct

निरूपा राय

कोकिला किशोरचंद्र बुलसारा

🎂04 जनवरी 1931
बुलसर , बॉम्बे प्रेसीडेंसी , ब्रिटिश भारत , अब यह वलसाड , गुजरात है
⚰️मृत13 अक्टूबर 2004 (आयु 73 वर्ष)
मुंबई , महाराष्ट्र , भारत
राष्ट्रीयता भारतीय

यह अभिनेत्री दुख की रानी के नाम से जानी जाती थी.उन्होंने 15 साल की उम्र में कमल रॉय से शादी की और मुंबई चली गईं । जब उन्होंने फिल्म उद्योग में प्रवेश किया तो उन्होंने अपना विवाहित नाम निरूपा रॉय इस्तेमाल किया।
निरूपा रॉय 
1946-1999 तक सक्रिय रही
जीवनसाथी कमल रॉय (जन्म 1946)
बच्चे2
पुरस्कार
मुनीमजी के लिए फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री पुरस्कार (1956) छाया के लिए
फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री का पुरस्कार (1962) शहनाई के लिए फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री का पुरस्कार (1965) फ़िल्मफ़ेयर लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार (2004)

1946 में, रॉय और उनके पति ने एक गुजराती अखबार में अभिनेताओं की तलाश के एक विज्ञापन का जवाब दिया। उनका चयन हो गया और उन्होंने गुजराती फिल्म रणकदेवी (1946) से अपने अभिनय करियर की शुरुआत की। उसी वर्ष उन्होंने अपनी पहली हिंदी फिल्म अमर राज में अभिनय किया । उनकी लोकप्रिय फिल्मों में से एक दो बीघा ज़मीन (1953) थी। उन्होंने 1940 और 50 के दशक की फिल्मों में बड़े पैमाने पर पौराणिक किरदार निभाए। हर हर महादेव में उन्होंने त्रिलोक कपूर के साथ पार्वती देवी की भूमिका निभाई, जिन्होंने शिव की भूमिका निभाई और यह फिल्म साल की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म थी। उनकी देवी की छवि बहुत मजबूत थी और लोग उनके घर आते थे और उनका आशीर्वाद लेते थे। उनके सह-कलाकारों में त्रिलोक कपूर (जिनके साथ उन्होंने अठारह फिल्मों में अभिनय किया),भारत भूषण , बलराज साहनी और अशोक कुमार थे ।

1970 के दशक में, अमिताभ बच्चन और शशि कपूर द्वारा निभाए गए पात्रों की मां की भूमिका ने उनके नाम को गरीब पीड़ित मां का पर्याय बना दिया। दीवार (1975) में उनकी भूमिका और माँ और बेटे के संदर्भ में इसके संवाद घिसी-पिटी बातों की तरह इस्तेमाल किये जाते हैं।
कमल रॉय के साथ उनकी शादी से उनके दो बच्चे हुए, जिनका नाम योगेश और किरण रॉय है।उनकी मृत्यु के बाद के वर्षों में, वे रॉय की संपत्ति और सामान पर विवाद में उलझ गए, जिसने पूरे समाचार और मीडिया में बहुत ध्यान आकर्षित किया है।
13 अक्टूबर 2004 को, रॉय को मुंबई में दिल का दौरा पड़ा और 73 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया । 

रॉय की स्मृति में कई श्रद्धांजलि और लेख बनाए गए हैं।  फिल्म दीवार से उनके संवाद प्रतिष्ठित हो गए,  और फिल्म में उनके अभिनय के साथ-साथ उनकी अन्य उल्लेखनीय फिल्मों को हिंदी सिनेमा में एक मील का पत्थर माना जाता है
📽️
1946 रणकदेवी
1946 अमर राज 
1949 उद्धार
1950 गडानो बेल 
1951 राम जन्म 
1953 दो बिगहा जमीन 
नौलखा हार 
1954 चक्रधारी 
दुर्गा पूजा 
1955 गरम कोट 
मुनीमजी 
तांगा-वाली 
1956 भाई-भाई 
1957 मोहिनी 
मुसाफिर 
1958 चालबाज़ 
दुल्हन 
1960 आंचल 
1961 छाया 
1962 बेज़ुबान 
1963 कौन अपना कौन पराया 
मुझे जीने दो 
ग्रहस्थि 
1964 बेनजीर 
शहनाई 
फूलों की सेज 
1965 शहीद 
1967 राम और श्याम 
जाल 
1968 आबरू 
एक कली मुस्काई 
राजा और रंक 
1969 आंसू बन गए फूल 
प्यार का मौसम 
राहगीर 
1970 अभिनेत्री 
माँ और ममता 
घर घर की कहानी 
महाराजा (1970 फ़िल्म) 
आन मिलो सजना 
पूरब और पश्चिम 
1971 गंगा तेरा पानी अमृत 
1972 जवानी दीवानी 
1973 कच्चे धागे 
1975 दीवार 
1976 मां 
1977 अमर अकबर एंथोनी 
अनुरोध 
1978 आँख का तारा 
1979 सुहाग 
1981 आस पास 
1982 बदले की आग 
1982 [[तीसरी आंख
(1982 फ़िल्म)|तीसरी आंख]] ||

1983 बेताब 
1985 सरफ़रोश 
गिरफ्तार 
मर्द 
1986 अंगाराय 
1988 गंगा जमुना सरस्वती 
इन्तेक़म 
1991 Pratikar 
1993 आसू बने अंगारे 
1996 नमक 
1999 जहां तुम ले चलो 
लाल बादशाह

चांद उस्मानी

#03jan
#26nov 
चांद उस्मानी

 🎂03 जनवरी 1933 
🎂 26 नवंबर 1989

 1950 से 1980 के दशक तक हिंदी फिल्मों की एक भारतीय अभिनेत्री थीं। उन्होंने 1971 में सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार जीता । उन्हें आत्म-बलिदान करने वाली पत्नियों और माताओं की भूमिका निभाने के लिए सबसे ज्यादा याद किया जाता है।
चांदबीबी खानम उस्मानी का 🎂जन्म 3 जनवरी 1933 को आगरा , उत्तर प्रदेश में एक पश्तून परिवार में हुआ था।  उन्होंने मुकुल दत्त ( आन मिलो सजना के निर्देशक ) से शादी की,  जिनसे उन्हें एक बेटा रोशन हुआ। वह माहिम में अपने घर में उन भागी हुई लड़कियों के लिए एक आश्रम चलाती थीं जो फिल्मों में करियर की तलाश में मुंबई आई थीं। ⚰️ 26 नवंबर 1989 को मुंबई में उनकी मृत्यु हो गई।
चांद उस्मानी 1949 में 'कारदार-कोलीनोस-टेरेसा कॉन्टेस्ट' नामक एक प्रतिभा प्रतियोगिता में भाग लेकर दूसरे स्थान पर जीतकर सुर्खियों में आए।शम्मी कपूर (उनकी भी पहली फिल्म) के साथ जीवन ज्योति में नायिका के रूप में शुरुआत की ।उन्होंने बाराती , बाप रे बाप और सम्राट पृथ्वीराज चौहान में भी अभिनय किया और रंगीन रातें , नया दौर , प्रेम पत्र और पहचान सहित कई अन्य फिल्मों में प्रमुख भूमिकाएँ निभाईं । उन्हें बहुत आलोचनात्मक प्रशंसा मिली: रंगीन रैटन (1956) की समीक्षा में कहा गया कि वह "शानदार प्रदर्शन करती हैं; उनका चरित्र सबसे अच्छा विकसित है, और परिणामस्वरूप वह फिल्म की जान और आत्मा बन जाती हैं।"  बाप रे बाप में , एक मुख्य दृश्य "स्क्रीन पर उस्मानी द्वारा प्रदर्शित खुशी" के लिए जाना जाता है। फिल्म हेरिटेज फाउंडेशन ऑफ इंडिया ने उन्हें "दिल को छू लेने वाली मुस्कान वाली जोशीली चांद उस्मानी" के रूप में वर्णित किया है। 1970 की फिल्म पहचान में एक वेश्या चंपा के किरदार के लिए उन्होंने 1971 में सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री का फिल्मफेयर पुरस्कार जीता । लगभग 40 साल बाद लिखते हुए, द हिंदू के फिल्म समीक्षक ने माना कि "चांद उस्मानी ने एक ऐसी भूमिका में संयम, शिष्टता और शालीनता प्रदर्शित करते हुए चंपा की भूमिका के साथ न्याय किया है जिसने आसानी से शीर्ष पर जाने का पर्याप्त अवसर प्रदान किया।" लंबे करियर के बावजूद, उन्होंने तबस्सुम के साथ एक साक्षात्कार में कहा कि उन्हें एक एजेंट/प्रबंधक नहीं होने का अफसोस है, जिसके कारण उन्हें विविध भूमिकाएँ नहीं मिलीं और अधिक सफलता नहीं मिली।अपनी कई भूमिकाओं में, उन्होंने एक आत्म-त्यागी पत्नी, माँ, प्रेमिका या बहन की भूमिका निभाई, जैसा कि महाश्वेता देवी ने अपनी 1986 की लघु कहानी 'द वेट-नर्स' में बताया है :

"जशोदा भारतीय नारीत्व का एक सच्चा उदाहरण थीं। वह एक पवित्र और प्यार करने वाली पत्नी और समर्पित माँ की विशिष्ट थीं, जिनके आदर्श बुद्धिमत्ता और तर्कसंगत व्याख्या को अस्वीकार करते हैं, जिनमें कल्पना की सीमाओं तक फैले त्याग और समर्पण शामिल हैं, और जिन्हें आज भी जीवित रखा गया है। सदियों से लोकप्रिय भारतीय मानस, सती-सावित्री-सीता से लेकर हमारे समय में निरूपा रॉय और चंद उस्मानी तक।"

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1990 अमीरी गरीबी
1988 मर मिटेंगे 
1985 पत्थर दिल 
1985 महक 
1985 आँधी तूफान 
1985 उल्टा सीधा 
1984 राजा और राना 
1983 पु्कार 
1983 लाल चुनरिया 
1982 दौलत 
1982 अर्थ 
1981 दहशत 
1981 याराना 
1981 साजन की सहेली 
1980 जल महल 
1979 एहसास 
1978 परमात्मा 
1977 अब क्या होगा 
1977 हत्यारा शान्ता 
1977 परवरिश 
1976 कादम्बरी 
1974 उजाला ही उजाला 
1971 हलचल 
1970 पहचान 
1970 खिलौना
1969 दो भाई 
1967 अनीता 
1967 अमन 
1964 शहनाई 
1958 संस्कार 
1957 नया दौर 
1955 बाप रे बाप 
1954 बाराती 
1953 जीवन ज्योति

नरेश अय्यर

#03jan 
नरेश अय्यर
 🎂जन्म 03 जनवरी 1981 भारत के मुंबई शहर से एक पार्श्वगायक हैं।

 नरेश अय्यर ने कई भारतीय भाषाओं में फ़िल्मी गाने गाए हैं और कई चार्ट हिट गानों का श्रेय उन्हें जाता है। ए.आर.रहमान द्वारा संगीतबद्ध फ़िल्म रंग दे बसंती में उनके द्वारा गाया रूबरू गीत 2006 में कई सप्ताह म्यूज़िक चार्टों की चोटी पर बना रहा और उन्होंने इस गीत के लिए सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायक का राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार जीता. उन्होंने आर.डी. बर्मन संगीत प्रतिभा श्रेणी में फ़िल्मफेयर पुरस्कार भी जीता. वे उन चंद पार्श्वगायकों में से हैं जिन्होंने अपने पहले ही पेशेवर गायन वर्ष में फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार और राष्ट्रीय पुरस्कार, दोनों जीते.
नरेश अय्यर का जन्म तमिल ब्राह्मण परिवार में और पालन-पोषण मुंबई के माटुंगा में हुआ। उन्होंने SIES कॉलेज ऑफ़ मैनेजमेंट स्टडीज़ में पढ़ाई की जहां उन्होंने वाणिज्य में स्नातक की डिग्री हासिल की. स्नातक स्तर की पढ़ाई के बाद वे चार्टर्ड एकाउंटेंट बनने का इरादा रखते थे, लेकिन इसके बजाय कर्नाटक संगीत और शास्त्रीय हिंदुस्तानी संगीत सीखने का निर्णय लिया। अय्यर को ए.आर. रहमान ने एक रियॉलिटी टैलेंट शो, चैनल V के सुपर सिंगर में देखा. हालांकि वे शो जीत नहीं पाए, लेकिन ए.आर.रहमान ने बाद में नरेश से संपर्क किया और उन्होंने अनबे आरुइरे के लिए अपना पहला गाना मयिलिरागे गाया. उन्होंने अन्य संगीतकारों के लिए तमिल, तेलुगू और हिंदी में भी गाने गाए हैं।

नरेश मुंबई में अवस्थित ध्वनि नामक एक फ़्यूशन बैंड के गायक भी हैं।उन्होंने अपने बैंड के साथ कई कार्यक्रम और चैरिटी संगीत कार्यक्रमों में प्रदर्शन दिया है।

उन्होंने सर्वश्रेष्ठ नवोदित गायक के रूप में आर.डी. बर्मन पुरस्कार भी जीता.

गुल पनाग

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गुल पनाग
पूरा नाम-गुलकीरत कौर पनाग
🎂03 जनवरी 1979
चण्डीगढ़, भारत
गुल के पिता एचएस पनाग (हरचरणजीत सिंह पनाग) इंडियन आर्मी के रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल । 2014 लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने इन्हें चंड़ीगढ़ से प्रत्याशी घोषित किया। जहाँ इनका मुकाबला किरण खेर व पवन बंसल से था।
पेशाअभिनेत्री, स्वर अभिनेत्री, मॉडल

विवाह ऋषि अट्टारी (13 मार्च 2011- )
हिन्दी फ़िल्मों की एक अभिनेत्री हैं। 

पनाग ने अपनी शिक्षा पंजाब के संगरूर में शुरू की। उनके पिता, लेफ्टिनेंट जनरल पनाग सेना में थे और परिवार भारत और विदेशों में विभिन्न स्थानों पर चला गया। उन्होंने पंजाबी विश्वविद्यालय, पटियाला से गणित में स्नातक और पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ से राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर किया। एक छात्र के रूप में, पनाग की खेल और सार्वजनिक बोलने में रुचि थी। उन्होंने वार्षिक राष्ट्रीय अंतर विश्वविद्यालय वाद-विवाद प्रतियोगिता में दो स्वर्ण पदक सहित कई राज्य और राष्ट्रीय स्तर की वाद-विवाद प्रतियोगिताएं जीतीं।

पनाग ने 1999 में मिस इंडिया का खिताब जीता था, और उसी प्रतियोगिता में उन्हें मिस ब्यूटीफुल स्माइल का ताज पहनाया गया था। उन्होंने मिस यूनिवर्स 1999 प्रतियोगिता में भाग लिया था।
गुल पनाग कर्नल शमशेर सिंह फाउंडेशन चलाती हैं, जो एक गैर सरकारी संगठन है जो लैंगिक समानता, शिक्षा और आपदा प्रबंधन सहित विभिन्न कारणों की दिशा में काम करता है। उन्होंने वॉकहार्ट फाउंडेशन के सलाहकार बोर्ड में काम किया। उन्होंने इंडिया अगेंस्ट करप्शन आंदोलन में भी भाग लिया। वह नवंबर 2010 में दिल्ली हाफ मैराथन में दौड़ी, लेकिन कार्यक्रम में पुरुष धावकों से ईव टीजिंग (यौन उत्पीड़न) सहा। उन्होंने कहा कि दिल्ली के पुरुषों को अपना नजरिया बदलने की जरूरत है। यदि भारत को विकसित होना है तो हमें एक समावेशी शहरी समाज की आवश्यकता है।
बुलेट में ली थी विदाई
शादी वाले दिन सुंदर लहंगे और इंडियन जूलरी से सजी दुल्हन। माथे पर लटकता मांग टीका, होठों पर मुस्कान वुस्कान नहीं, पूरी खिलखिलाहट। आंखों पर एविएटर्स।गुल पनाग जब मॉडर्न बहू बनकर  ‘बुलेट’ पर हाथ लहराते हुए ससुराल विदा हुई तो दुनिया इस अदा पर फिदा हो गई थी। जाहिर है बुलेट को उनके पति ऋषि अत्री चला रहे थे और गुल साथ में सटी साइड कार में बैठी थीं। जय-वीरू वाले स्टाइल में ये तस्वीरें सोशल मीडिया पर खूब शेयर की गईं थी। गुल की बारात में भी कारें नहीं, बुलेट ही बुलेट थीं।
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2006 डोर
2003 धूप

नवनीत कौर राणा

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नवनीत कौर

🎂 03 जनवरी 1986 

 नवनीत कौर एक भारतीय फिल्म अभिनेत्री हैं जो मुख्य रूप से तेलुगु फिल्मों में काम करती हैं। कौर मुंबई में जन्मीं और पली बढ़ी हैं।
कौर मुंबई में जन्मीं और पली बढ़ी हैं। जबकि, उनके माता-पिता पंजाबी मूल के हैं। उनके पिता सेना में अधिकारी थे।वे वर्तमान में अमरावती से लोकसभा सांसद हैं।

12 वीं पास होने के बाद नवनीत ने पढ़ाई छोड़ एक मॉडल के रूप में काम करना शुरू कर दिया। इस दौरान उन्होंने छह म्यूजिक एलबम में काम किया। कौर ने कन्नड़ फिल्म दर्शन से अपने फिल्मी सफ़र की शुरुआत की। इसके अलावा उन्होंने तेलुगु फिल्म सीनू, वसंथी और लक्ष्मी (2004) में भी अभिनय किया। 2005 में तेलुगु फिल्म चेतना (2005), जग्पथी, गुड बॉय और 2008 में भूमा में भी उन्होंने बतौर ऐक्ट्रेस काम किया। जेमिनी टीवी के रियलिटी शो हुम्मा-हुम्मा में भी उन्होंने बतौर प्रतियोगी हिस्सा लिया। नवनीत ने मलयालम फिल्म लव इन सिंगापुर के अलावा पंजाबी फिल्म लड़ गए पेंच में भी अभिनय किया।

अभिनेत्री नवनीत कौर और महाराष्ट्र के विधायक रवि राणा का शादी समारोह अमरावती के साइंस कोर ग्राउंड में हुआ था। यह सामूहिक विवाह समारोह था जिसमें गेस्ट के तौर पर 5 लाख मेहमानों ने हिस्सा लिया। इस शादी में फिल्म जगत से लेकर राजनीति की दिग्गज हस्तियों ने हिस्सा लिया था। यह पहली बार हुआ जब एक अभिनेत्री और एक विधायक ने सामूहिक विवाह समारोह में शादी की। बड़नेरा के विधायक रवि राना एक अभिनेत्री के हुस्न पर ऐसे फिदा हुए कि उन्होंने उनसे शादी करने का फैसला कर लिया। चौंकाने वाली बात ये हैं कि इस बेहद हॉट बाला ने भी नेताजी के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। जी हां, हम बात कर रहे हैं 'नवनीत कौर' की। यह नाम मुंबई फिल्म इंडस्ट्री में भले ही उतना जाना पहचाना न हो लेकिन तमिल फिल्म इंडस्ट्री में इन्हें सबसे हॉट अदाकारा का तमगा मिला हुआ है। 2 फ़रवरी 2011 को राजनीती और ग्लैमर का यह संगम हुआ। नेताजी इस मौके पर भी लोगों का भला करने से चूके नहीं, उन्होंने लगभग 3000 जोड़ों को इस मौके पर विवाह के बंधन में बंधने में मदद की। ये शादी भी कोई आम शादी नहीं थी इस मौके पर जो 3000 लोग विवाह के बंधन में बंधे वो या तो शारीरिक रूप से अक्षम थे या किसी अल्पसंख्यक वर्ग से थे। गौर करने वाली बात है कि इस सामूहिक विवाह समारोह को विश्व की सबसे बड़ी शादी के रूप में माना जा रहा है। दुनिया के इस सबसे बड़े शादी समारोह के लिए 1 लाख वर्ग फुट वाला एक विशाल मंच तैयार किया गया था जिसे 4 लाख वर्ग फुट वाले विशाल ग्राउंड में बनाया गया था। इस समरोह में नवविवाहित जोड़ों को आशीर्वाद देने के लिए संन्यासी, मौलवियों सहित आध्यात्मिक गुरु बाबा रामदेव और श्री श्री रवि शंकर भी पहुंचे थे। शादी की इस घटना का गवाह बनने के लिए गिनीज बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्डस और लिम्का बुक ऑफ़ रिकॉर्डस के अधिकारी भी मौजूद थे।[4] गौरतलब है कि इससे पहले दुनिया की सबसे बड़ी सामूहिक शादी में 1350 जोड़े एक ही दिन और एक ही जगह शादी के बंधन में बंधे थे। इस शादी समारोह में विवाह के बंधन में बंधे जोड़ों में 350 जोड़े नेत्रहीन और 470 जोड़े शारीरिक रूप से विकलांग लोगों का था।
पंजाबी और साउथ इंडियन फिल्मों में एक्ट्रेस रही नवनीत कौर ने अपनी राजनीतिक पारी की शुरूआत साल 2014 में की थी। जहां वह एनसीपी के टिकिट पर पहली बार 2014 में लोकसभा का चुनाव भी लड़ी थीं, लेकिन हार गईं थीं। फिर वह 2019 के लोकसभा चुनाव में युवा स्वाभिमान पार्टी से चुनाव लड़कर जीत हासिल कर सांसद बनी हैं।

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