शनिवार, 28 अक्टूबर 2023

अर्जुन बिजलानी

अर्जुन बिज्लानी 
एक भारतीय फिल्म अभिनेता हैं। यह लेफ्ट राइट लेफ्ट, नागिन, मोहे रंग दे, रिमिक्स, कार्तिका, बॉक्स क्रिकेट लीग, मिले जब हम तुम, यह है आशिक़ी, परदेस में मिला कोई अपना, रोड डायरिस, तेरी मेरी लव स्टोरी, काली - एक पुनर अवतार, जो बीवी से करे प्यार और परदेस में है मेरा दिल आदि में कार्य कर चुके हैं।

🎂जन्म : 31 अक्तूबर 1982 , मुम्बई

पत्नी: नेहा स्वामी (विवा. 2013)
माता-पिता: सुदर्शन बिजलानी, शक्ति बिजलानी
अर्जुन और नेहा की शादी को 10 साल हो चुके हैं. दोनों ने 20 मई 2013 को एक दूजे संग सात फेरे लिए थे. कपल का एक बेटा है.
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2004 कार्तिका
2005 रिमिक्स
2006-2008 लेफ़ राइट लेफ्ट
2008 मोहे रंग दे
2008–2010 मिले जब हम तुम
2011 परदेस में मिला कोई अपना
2012 रोड डायरिस
2012 तेरी मेरी लव स्टोरी
2013 काली - एक पुनर अवतार
2013 चिंटू बन गया जैंटलमेन
2013 जो बीवी से करे प्यार
2014 यह है आशिक़ी
2014-2015 बॉक्स क्रिकेट लीग
2015 सीआईडी 
2015 मेरी आशिकी तुम से ही
2015 नागिन 1
2016 परदेस में है मेरा दिल
जिसे एकता कपूर ने बनाया
 लिखा रितु भाटिया ने
आयुष अग्रवाल
निर्देशक  रहे

वास्तविक भाषा हिंदी
एपिसोड की संख्या 170

अनन्या पांडे

अनन्या पांडे 
🎂जन्म 30 अक्टूबर 1998 
एक भारतीय फिल्म अभिनेत्री हैं जो हिन्दी फिल्मों में काम करती हैं।अभिनेता चंकी पांडे की बेटी, उन्होंने 2019 में किशोर फिल्म स्टूडेंट ऑफ़ द ईयर 2 और कॉमेडी पति पत्नी और वो में प्रमुख भूमिकाओं के साथ अभिनय किया।

अनन्या पांडे

पांडे ने 2017 में धीरूभाई अंबानी इंटरनेशनल स्कूल से स्नातक किया। उन्हें 2017 में ला विले लुमिएर, पेरिस में वैनिटी फेयर के ले बाल डेस डेब्यूटेंट्स इवेंट में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया था और वह इस कार्यक्रम की सदस्य थीं।इनके पिता का नाम चंकी पांडे है तथा इनकी माँ का नाम भावना पांडे है। अनन्या पांडे की एक छोटी बहन है जिनका नाम रायसा पांडे है।

हिंदी फिल्म उद्योग में

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उद्योग में भाई-भतीजावाद के लाभार्थी होने के कारण पांडे ने अक्सर नकारात्मक ध्यान और ऑनलाइन ट्रोलिंग का मुकाबला किया है।उन्होंने कहा, "यह उतना आसान नहीं है जितना लोग कहते हैं। यदि आपके पास पहुंच है और इसे समर्थन देने की प्रतिभा नहीं है, तो लोग आप में अपना पैसा निवेश नहीं करेंगे। ऐसा कहने के बाद, मैं मेरा मानना ​​है कि भाई-भतीजावाद मौजूद है और यह सिर्फ बॉलीवुड ही नहीं बल्कि सभी उद्योगों में मौजूद है।"  2019 में, उन्होंने सोशल मीडिया बुलिंग के बारे में जागरूकता पैदा करने, नकारात्मकता को रोकने और एक सकारात्मक समुदाय का निर्माण करने के लिए सो पॉजिटिव नामक एक पहल शुरू की।

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शुक्रवार, 27 अक्टूबर 2023

सौमित्र चटर्जी

सौमित्र चटर्जी 
🎂जन्म: 19 जनवरी, 1935; ⚰️मृत्यु- 15 नवंबर, 2020, कोलकाता, पश्चिम बंगाल) प्रसिद्ध बांग्ला अभिनेता थे। सन 2001 में राष्ट्रीय पुरस्कार को ठुकराने वाले प्रख्यात बांग्ला अभिनेता सौमित्र चटर्जी को सन 2011 में भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान 'दादा साहब फाल्के पुरस्कार' से सम्मानित किया गया था। उन्हें अभिनेता प्राण, मनोज कुमार और अभिनेत्री वैजयंती माला पर वरीयता देते हुए इस पुरस्कार के लिए चुना गया था।सौमित्र चटर्जी प्रथम बांग्ला व्यक्ति थे, जिन्हें दादा साहब फाल्के पुरस्कार मिला था। चटर्जी को राजनेता और साथी कलाकार एक महान सांस्कृतिक प्रतीक, भरोसेमंद दोस्त और विविध क्षेत्रों में रुचि रखने वाले दिग्गज के तौर पर याद कर रहे हैं।

जीवन परिचय
सौमित्र चटर्जी का जन्म 19 जनवरी, 1935 में बंगाल में हुआ था। उन्होंने लंबे समय तक सत्यजीत रे के साथ भी काम किया। सत्यजीत रे की 14 फ़िल्मों में उन्होंने अभिनय किया। सौमित्र चटर्जी ने 1959 में सत्यजीत रे की फ़िल्म ‘अपूर संसार’ से अपना कैरियर शुरू किया था। इसके बाद उन्होंने सत्यजीत रे की फ़िल्म ‘देवी,’ ‘चारुलता’ और ‘घरे बाइरे’ में भी अभिनय किया। फ़िल्मकार सत्यजित रे और अभिनेता सौमित्र चटर्जी की जोड़ी की तुलना हॉलीवुड के प्रसिद्ध अभिनेता-निर्देशक जो़डी अकीरा कुरोसोवा-तोशिरो मिफ्यून और मार्केलो मास्ट्रोइयान्नी-फेडेरिको फेलिनो से की जानी लगी थी।

सौमित्र चटर्जी ने सत्यजित रे के अलावा मृणाल सेन, तपन सिन्हा और तरुण मजुमदार सहित कई अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त निर्देशकों के साथ भी काम किया। 2004 में पद्म भूषण से सम्मानित अभिनेता सौमित्र चटर्जी अपर्णा सेन, गौतम घोष और ऋतुपर्णो घोष जैसे प्रसिद्ध निर्देशकों के साथ भी काम कर चुके थे। वह रंगमंच से भी जु़डे रहे। उनको कला के क्षेत्र का फ्रांस का सर्वोच्च पुरस्कार "द ऑफिसर डेस आर्ट्स एट मेटियर्स" तथा इटली से लाइफ टाइम अचीवमेंट पुस्कार भी मिला।

नाटक मंच से स्नेह
बीबीसी बांग्ला को दिए एक साक्षात्कार में सौमित्र चटर्जी ने कहा था कि कृष्णानगर में बचपन में ही उन्होंने नाटकों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया था। बचपन में हम घर में तख्तों से मंच बनाते थे और बेड शीट से पर्दे बनाते थे। हम भाई-बहनों और दोस्तों के साथ मिलकर नाटक करते थे। इसके लिए घर के बुज़ुर्गों ने भी हमें बहुत हौसला दिया। नाटकों का उनका शौक बाद में भी उनके साथ रहा और वो फ़िल्मों के साथ-साथ मंच पर नज़र आते। बाद में उनके पिता काम के लिए कलकत्ता चले गए, फिर कॉलेज में पढ़ाई करने के लिए सौमित्र भी कलकत्ता चले आए।

सत्यजीत रे से मित्रता
कॉलेज के अपने दिनों के दौरान उनके एक मित्र ने उनका परिचय सत्यजीत रे से करवाया था। उस वक़्त हुई ये छोटी-सी मुलाक़ात बाद में दोनों के बीच गहरी दोस्ती में बदल गई। सत्यजीत रे की फ़िल्म के साथ शुरुआत करने के बाद उन्होंने उनके साथ कई और फ़िल्मों में काम किया। फ़िल्म आलोचक जीवनी लेखिका मैसी सेटॉन को एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था, "जब सत्यजीत रे ने मुझसे पूछा कि मैं क्या करना चाहता हूं तो मेरे पास कोई उत्तर नहीं था। मुझे उस वक़्त स्टेज पर और फ़िल्मों में ऐक्टिंग के फ़र्क़ के बारे में अधिक जानकारी नहीं थी। मुझे डर था कि मैं ओवरऐक्ट न करूं।" सौमित्र चटर्जी ने फ़िल्मों में कई तरह के किरदार निभाए। 'शोनार किल्ला' में वो शरलॉक होम्स की तरह के एक जासूस के किरदार में नज़र आए, 'देवी' में वो नियमों का पालन करने वाला दूल्हा बने, 'अभिजान' में ग़ुस्से में रहने वाला उत्तर भारतीय टैक्सी ड्राइवर बने तो 'अशनि संकट' में एक शांत रहने वाले पुजारी के किरदार में दिखे। नोबल सम्मान पाने वाले रवींद्रनाथ टैगोर की कहानी 'चारूलता' पर बनी सत्यजीत रे की फ़िल्म में भी उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

सौमित्र चटर्जी, सत्यजीत रे के पसंदीदा एक्टर थे और सत्यजीत उन्हें सिनेमा पर लिखी किताबें पढ़ने के लिए देते थे। रविवार को दोनों साथ मिलकर हॉलीवुड की फ़िल्में देखते थे और चर्चा करते थे। सौमित्र चटर्जी ने एक बार कहा था, "वो जो भी करते थे वो बिना कारण नहीं था, ऐसे नहीं था कि रविवार को मुझे एंटरटेंमेन्ट के लिए साथ में लेकर जाते थे।" सत्यजीत रे का कहना था कि सौमित्र बेहतरीन एक्टर हैं लेकिन अगर उन्हें "बुरी कहानी दी जाएगी तो उनका अभिनय भी वैसा ही होगा।" साल 1992 में सत्यजीत रे की मौत हो गई। उस दौरान सौमित्र ने एक इंटरव्यू में कहा था, "एक भी दिन ऐसा नहीं गुज़रा, जब मैंने सत्यजीत रे को याद न किया हो या उनके बारे में बात न की हो। प्रेरणा के तौर पर मेरी ज़िंदगी में वो हमेशा ही मौजूद रहे हैं। मैं जब भी उनके बारे में सोचता हूं मुझे प्रेरणा मिलती है।"

मृत्यु
सौमित्र चटर्जी की मृत्यु 15 नवंबर, 2020, कोलकाता, पश्चिम बंगाल में हुई। उन्हें 6 अक्टूबर को अस्पताल में कोविड-19 से संक्रमित पाए जाने पर भर्ती कराया गया था। वह संक्रमण से उबर गए लेकिन उनकी सेहत में सुधार नहीं हुआ। न्यूरोलॉजी, नेफ्रोलॉजी, कार्डियोलॉजी, क्रिटिकल केयर मेडिसिन के विशेषज्ञों की एक बड़ी टीम पिछले 40 दिनों में सौमित्र चटर्जी के स्वास्थ्य को फिर पटरी पर लाने का प्रयास कर रही थी, लेकिन कोई भी कोशिश सफल नहीं हो पा रही थी।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सौमित्र चटर्जी के निधन पर शोक प्रकट करते हुए कहा कि- "उनका निधन विश्व सिनेमा के साथ-साथ पश्चिम बंगाल और पूरे देश के सांस्कृतिक जीवन के लिए बहुत बड़ी क्षति है"। मोदी जी ने ट्वीट कर कहा, "श्री सौमित्र चटर्जी का निधन विश्व सिनेमा के साथ-साथ पश्चिम बंगाल और पूरे देश के सांस्कृतिक जीवन के लिए बहुत बड़ी क्षति है। उनके निधन से अत्यंत दु:ख हुआ है। परिजनों और प्रशंसकों के लिए मेरी संवेदनाएं। ओम शांति"।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने वयोवृद्ध अभिनेता के निधन को बंगाल के लिये बड़ी क्षति बताते हुए कहा कि- "सौमित्र चटर्जी एक योद्धा थे, जिन्हें उनके काम के लिये याद किया जाता रहेगा। यह बंगाल और दुनिया भर में उनके प्रशंसकों के लिये दु:खद दिन है"। ममता बनर्जी ने ट्विटर पर उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए लिखा, "फेलूदा नहीं रहे। ‘अपु’ ने अलविदा कह दिया। विदाई, सौमित्र (दा) चटर्जी। वह अपने जीवनकाल में दिग्गज रहे"।

कुणाल कोहली

कुणाल कोहली
🎂जन्म 28 अक्टूबर 1970
व्यवसाय निर्देशक, पटकथा लेखक, निर्माता, अभिनेता
जीवनसाथी रवीना कोहली
बच्चे 1 (बेटी)
रिश्तेदार डेविड धवन (मामा)
वरुण धवन (चचेरा भाई)
रोहित धवन (चचेरा भाई)
कुणाल कोहली बॉलीवुड में एक भारतीय फिल्म निर्देशक, निर्माता, अभिनेता और लेखक हैं । उन्हें हम तुम (2004) और फना (2006) के निर्देशक के रूप में जाना जाता है । वह कुणाल कोहली प्रोडक्शंस के प्रोडक्शन हाउस के भी मालिक हैं , जिसकी पहली फिल्म थोड़ा प्यार थोड़ा मैजिक (2008) थी।
कुणाल कोहली एक भारतीय फिल्म निर्देशक/निर्माता और लेखक हैं, जो हिंदी सिनेमा में अपने बेहतरीन काम के लिए जाने जाते हैं। कुणाल हिंदी सिनेमा में फिल्म हम तुम, फना,आदि के लिए जाने जाते हैं। कुनाल कोहली का अपना प्रोडक्शन हाउस है, जिसके तहत उन्होंने फिल्म थोड़ा प्यार थोड़ा मेजिक निर्देशित की।

 
निजी जीवन 
कुणाल कोहली का जन्म 28 अक्टूबर 1970 को हुआ था।  कुणाल की शादी रवीना कोहली से हुई है, रवीना कॉफी विद करण की निर्देशक रह चुकी हैं। दोनों के एक बेटी भी है- राधा।

करियर 
कोहली ने अपने करियर की शुरुआत बतौर फिल्म क्रिटिक्स से वर्ष 1990 के आखिरी में की थी। फिल्मी दुनिया में बतौर निर्देशक कदम रखने से पहले कुणाल कई म्यूजिक वीडियो को डायरेक्ट कर चुके हैं। कुणाल ने बतौर निर्देशक डेब्यू टीवी शो त्रिकोण से की, इसके बाद उन्होंने यश राज फिल्मस के तहत चार फ़िल्में निर्देशित की, कुनाल की पहली फिल्म मुझसे दोस्ती करोगे थी, जो बॉक्स-ऑफिस पर कुछ खास कमाल ना दिखा सकी। इसके बाद उन्होंने हम तुम निर्देशित की, इस फिल्म के लिए बेस्ट डायरेक्टर के अवार्ड से भी नवाजा गया, साथ ही इस फिल्म ने अन्य 5 अवार्ड भी अपने नाम किये।  इसके बाद कुनाल ने फना, थोड़ा प्यार थोड़ा मेजिक, ब्रेक के बाद जैसी फ़िल्में निर्देशित की।

प्रसिद्ध फिल्में 
मुझसे दोस्ती करोगे, हम तुम, थोड़ा प्यार थोड़ा मेजिक,ब्रेक के बाद, तेरी मेरी कहानी, फिर से

गीतकार अंजान

अंजान (गीतकार)
अंजान
पूरा नाम लालजी पाण्डेय
प्रसिद्ध नाम अंजान
🎂जन्म 28 अक्टूबर, 1930
जन्म भूमि बनारस, उत्तर प्रदेश
⚰️मृत्यु 13 सितम्बर, 1997
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र शेरो-शायरी तथा गीत लेखन
मुख्य फ़िल्में 'मुकद्दर का सिकंदर', 'डॉन', 'खून पसीना', 'बहारें फिर भी आएँगी', 'लावारिस', 'याराना', 'हेराफेरी' आदि।
प्रसिद्धि गीतकार
नागरिकता भारतीय
कॅरियर की शुरुआत अंजान ने अपने कॅरियर की शुरूआत वर्ष 1953 में अभिनेता प्रेमनाथ की फ़िल्म 'गोलकुंडा का कैदी' से की थी। इस फ़िल्म के लिए सबसे पहले उन्होंने 'लहर ये डोले कोयल बोले...' और 'शहीदों अमर है तुम्हारी कहानी...' गीत लिखे थे।
अन्य जानकारी अंजान के पसंदीदा संगीतकार के तौर पर कल्याणजी-आनंदजी का नाम सबसे ऊपर आता है। कल्याणजी-आनंदजी के संगीत निर्देशन में अंजान के गीतों को नई पहचान मिली।
भारतीय हिन्दी फ़िल्मों के मशहूर गीतकार तथा अपने समय के ख्याति प्राप्त शायर थे। इनका वास्तविक नाम 'लालजी पाण्डेय' था। अंजान के लिखे हुए गीत आज भी लोगों की जुबां पर चढ़े हुए हैं। 'खइके पान बनारस वाला', 'ओ साथी रे तेरे बिना भी क्या जीना' और 'रोते हुए आते हैं सब' जैसे न जाने कितने ही सदाबहार गीत अंजान ने लिखे और प्रसिद्धि की ऊँचाईयों को छुआ। अमिताभ बच्चन पर फ़िल्माये गए उनके गीत काफ़ी लोकप्रियता हासिल करते थे। अंजान के पसंदीदा संगीतकार के तौर पर कल्याणजी-आनंदजी का नाम सबसे ऊपर आता है। इनके संगीत निर्देशन में अंजान के गीतों को नई पहचान मिली थी। अंजान साहब के पुत्र समीर भी पिता के समान ही प्रसिद्ध गीतकार हैं।

जन्म
हिन्दी भाषा और साहित्य के करिश्माई व्यक्तित्व अंजान का जन्म 28 अक्टूबर, 1930 को उत्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी बनारस में हुआ था। बचपन के दिनों से ही उन्हें शेरो-शायरी के प्रति गहरा लगाव था।

कवि सम्मेलन तथा मुशायरा
शेरो-शायरी के अपने शौक को पूरा करने के लिए अंजान बनारस में आयोजित सभी कवि सम्मेलनों और मुशायरों में हिस्सा लिया करते थे। हालांकि मुशायरों में वह उर्दू का इस्तेमाल कम ही किया करते थे। जहां हिन्दी फ़िल्मों में उर्दू का इस्तेमाल एक पैशन की तरह किया जाता था, वही अंजान अपने रचित गीतों में हिन्दी पर ही अधिक जोर दिया करते थे।

फ़िल्मी शुरुआत
एक गीतकार के रूप में अंजान ने अपने कॅरियर की शुरूआत वर्ष 1953 में अभिनेता प्रेमनाथ की फ़िल्म 'गोलकुंडा का कैदी' से की। इस फ़िल्म के लिए सबसे पहले उन्होंने 'लहर ये डोले कोयल बोले...' और 'शहीदों अमर है तुम्हारी कहानी...' गीत लिखे थे, लेकिन इस फ़िल्म के जरिये वह कुछ ख़ास पहचान नहीं बना पाए। उन्होंने अपना संघर्ष जारी रखा। इस बीच उन्होंने कई छोटे बजट की फ़िल्में भी कीं, जिनसे उन्हें कुछ ख़ास फायदा नहीं हुआ।

सफलता
कुछ समय बाद अचानक ही उनकी मुलाकात जी. एस. कोहली से हुई, जिनके संगीत निर्देशन में उन्होंने फ़िल्म 'लंबे हाथ' के लिए 'मत पूछ मेरा है मेरा कौन...' गीत लिखा। इस गीत के जरिये वह काफ़ी हद तक अपनी पहचान बनाने में सफल हो गए। लगभग दस वर्ष तक मायानगरी मुंबई में संघर्ष करने के बाद वर्ष 1963 में पंडित रविशंकर के संगीत से सजी प्रेमचंद के उपन्यास गोदान पर आधारित फ़िल्म 'गोदान' में उनके रचित गीत 'चली आज गोरी पिया की नगरिया...' की सफलता के बाद अंजान ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। अंजान को इसके बाद कई अच्छी फ़िल्मों के प्रस्ताव मिलने शुरू हो गए, जिनमें 'बहारें फिर भी आएंगी', 'बंधन', 'कब क्यों और कहां', 'उमंग', 'रिवाज', 'एक नारी एक ब्रह्मचारी', 'हंगामा' जैसी कई फ़िल्में शामिल थीं। इसके बाद अंजान ने सफलता की नई बुलंदियों को छुआ और एक से बढ़कर एक गीत लिखे।

अंजान के सिने कॅरियर पर यदि नजर डाली जाए तो सुपरस्टार अमिताभ बच्चन पर फ़िल्माये गए उनके रचित गीत काफ़ी लोकप्रिय हुआ करते थे। वर्ष 1976 में प्रदर्शित फ़िल्म 'दो अंजाने' के 'लुक छिप लुक छिप जाओ ना...' गीत की कामयाबी के बाद अंजान ने अमिताभ बच्चन के लिए कई सफल गीत लिखे, जिनमें 'बरसों पुराना ये याराना...', 'खून पसीने की जो मिलेगी तो खाएंगे...', 'रोते हुए आते हैं सब...', 'ओ साथी रे तेरे बिना भी क्या जीना...' जैसे कई सदाबहार गीत शामिल हैं।

प्रमुख फ़िल्में
अंजान के पसंदीदा संगीतकार के तौर पर कल्याणजी-आनंदजी का नाम सबसे ऊपर आता है। कल्याणजी-आनंदजी के संगीत निर्देशन में अंजान के गीतों को नई पहचान मिली। सबसे पहले इस जोड़ी का गीत वर्ष 1969 में प्रदर्शित फ़िल्म 'बंधन' में पसंद किया गया। इसके बाद अंजान द्वारा रचित फ़िल्मी गीतों में कल्याणजी-आनंदजी का ही संगीत हुआ करता था। इन दोनों की जोड़ी ने जिन फ़िल्मों के लिए अपना योगदान दिया, वे इस प्रकार थीं-

दो अनजाने - 1976
हेराफेरी - 1976
खून पसीना - 1977
गंगा की सौगंध - 1978
डॉन - 1978
मुकद्दर का सिकंदर - 1978
लावारिस - 1981
याराना - 1981
ईमानदार - 1987
दाता - 1989
जादूगर - 1989
थानेदार - 1990
प्रसिद्ध गीत
गीतकार अंजान द्वारा लिखे गए कुछ प्रसिद्ध गीत निम्नलिखित हैं-

आपके हसीं रुख पे - बहारें फिर भी आएँगी
खइके पान बनारस वाला - डॉन
दिल तो है दिल - मुकद्दर का सिकंदर
रोते हुए आते हैं सब - मुकद्दर का सिकंदर
ओ साथी रे तेरे बिना भी क्या जीना - मुकद्दर का सिकंदर
प्यार जिंदगी है - मुकद्दर का सिकंदर
मुझे नौलक्खा मंगा दे रे - शराबी
खून पसीने की जो मिलेगी तो खाएंगे - ख़ून पसीना
बरसों पुराना ये याराना
पंसदीदा संगीतकार तथा गायक
वर्ष 1989 में सुल्तान अहमद की फ़िल्म 'दाता' में कल्याणजी-आनंदजी के संगीत निर्देशन में अंजान का रचित यह गीत 'बाबुल का ये घर बहना कुछ दिन का ठिकाना है', आज भी श्रोताओं की आंखों को नम कर देता है। कल्याणजी-आनंदजी के अलावा अंजान के पसंदीदा संगीतकारों में बप्पी लाहिरी, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, ओ. पी. नैयर, राजेश रोशन तथा आर. डी. बर्मन प्रमुख रहे। वहीं उनके गीतों को किशोर कुमार, आशा भोंसले, मोहम्मद रफ़ी तथा लता मंगेशकर जैसे चोटी के गायक कलाकारों ने अपने स्वर से सजाया।

निधन
अंजान ने अपने तीन दशक से भी ज्यादा लंबे सिने कॅरियर में लगभग 200 फ़िल्मों के लिए गीत लिखे। लगभग तीन दशकों तक हिन्दी सिनेमा को अपने गीतों से संवारने वाले अंजान का 67 वर्ष की आयु में 13 सितम्बर, 1997 को निधन हुआ। इनके निधन से फ़िल्मी दुनिया का एक बड़ा सितारा डूब गया। आज भी उनके लिखे गीत दिल को सकूँ देते हैं और हर कोई उन्हें गुनगुनाता है।

सत्यन कप्पू

चरित्र अभिनेता सत्येन कप्पू की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि

सत्येन कप्पू 
सत्येन्द्र कप्पू (जन्म सत्येन्द्र शर्मा ; जिन्हें सत्येन कप्पू के नाम से भी जाना जाता है ; 
🎂जन्म- 07 फरवरी1931, पानीपत; 
⚰️मृत्यु- 27 अक्टूबर, 2007, मुम्बई, महाराष्ट्र) 

भारतीय हिंदी सिनेमा के चरित्र अभिनेता थे। उन्होंने 390 फ़िल्मों में अभिनय किया।

सत्येन कप्पू का जन्म 1931 को पानीपत में हुआ था।
इनका नाम सत्येन्द्र कपूर है।
यह भारतीय सिनेमा के चरित्र अभिनेता थे।
सत्येन कप्पू ने 390 फ़िल्मों में अभिनय किया है।
सत्येन कप्पू ने अपने करियर की शुरूआत 1952 में इंडियन पीपल थियेटर एसोसिएशन से की थी।
इन्होंने अपने समय के सभी नामी गिरामी निर्देशकों और ऐक्टर्स के साथ काम किया था।
राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन, जितेन्द्र के नेतृत्व में कई फ़िल्मों में उनका काम उल्लेखनीय था।
सत्येन कप्पू को 27 अक्टूबर, 2007 शनिवार शाम 4 बजे मुम्बई में दिल का दौरा पड़ने के कारण निधन हो गया।

प्रमुख फ़िल्मों की सूची-
📽️
2002 अखियों से गोली मारे
2000 बेटी नम्बर वन
2000 खौफ़
1999 अनाड़ी नम्बर वन
1999 मन
1999 गैर
1998 मैं सोलह बरस की
1998 दंड नायक
1998 हिटलर
1998 विनाशक
1997 आँखों में तुम हो
1997 मेरे सपनों की रानी
1997 विरासत
1997 दिल के झरोखे में
1997 उफ़ ! ये मोहब्बत
1996 रंगबाज़
1996 शोहरत
1995 तकदीरवाला
1995 हम दोनों
1995 हकीकत
1995 हथकड़ी
1995 राजा
1995 पापी देवता
1994 वादे इरादे
1994 ब्रह्म
1994 गोपी किशन
1994 घर की इज्जत
1994 इंसानियत
1994 अमानत
1993 दिव्य शक्ति
1993 इंसानियत के देवता
1993 साहिबाँ
1993 तहकीकात
1993 दलाल
1993 गुरुदेव
1993 संतान
1993 बड़ी बहन
1993 संग्राम
1992 दिल का क्या कसूर
1992 इन्तेहा प्यार की
1992 हीर राँझा
1992 बेटा
1992 खुले आम
1991 गुनहगार
1991 खेल
1991 कुरबानी रंग लायेगी
1991 फूल और काँटे
1991 प्रतिकार
1991 झूठी शान
1991 कर्ज़ चुकाना है
1991 फ़तेह
1991 पाप की आँधी
1990 दीवाना मुझ सा नहीं
1990 दिल
1990 घर हो तो ऐसा
1990 जवानी ज़िन्दाबाद
1990 प्यार का देवता
1989 नाचे नागिन गली गली
1989 गैर कानूनी
1989 जोशीले
1989 मोहब्बत का पैगाम
1989 जायदाद
1989 अनजाने रिश्ते
1989 तुझे नहीं छोड़ूँगा
1989 जादूगर
1989 कानून अपना अपना
1989 घराना
1989 तौहीन
1989 दाता
1988 घरवाली बाहरवाली
1988 चरणों की सौगन्ध
1988 प्यार मोहब्बत
1988 मोहब्बत के दुश्मन
1988 मर मिटेंगे
1988 तमाचा
1988 सागर संगम
1988 अग्नि
1988 दो वक्त की रोटी
1988 जीते हैं शान से
1988 सोने पे सुहागा
1988 खतरों के खिलाड़ी
1988 ज़ख्मी औरत
1988 बीवी हो तो ऐसी
1987 कुदरत का कानून
1987 जवाब हम देंगे
1987 मजाल
1987 ईमानदार
1987 हिम्मत और मेहनत
1987 मुकद्दर का फैसला
1987 खुदगर्ज़
1986 नसीब अपना अपना
1986 तन बदन
1986 कृष्णा-कृष्णा
1986 प्यार किया है प्यार करेंगे
1986 सवेरे वाली गाड़ी
1986 प्यार के दो पल
1986 चमेली की शादी
1986 पाले ख़ान
1986 मुद्दत
1986 स्वर्ग से सुन्दर
1986 जीवा
1985 पैसा ये पैसा
1985 तेरी मेहरबानियाँ
1985 वफ़ादार
1985 मेरा जवाब
1985 ज़माना
1985 मर्द
1985 बेपनाह
1985 सरफ़रोश
1985 रामकली
1985 साहेब
1985 गिरफ्तार
1985 सत्यमेव जयते
1985 फाँसी के बाद
1985 युद्ध
1985 अलग अलग
1984 एक नया इतिहास
1984 कामयाब
1984 आज का एम एल ए राम अवतार
1984 लैला
1984 नया कदम
1984 ज़मीन आसमान
1984 गृहस्थी
1984 इंकलाब
1984 दुनिया
1984 लव मैरिज
1984 मेरा फैसला
1984 डिवोर्स
1984 शराबी
1984 यह देश
1983 कैसे कैसे लोग
1983 चोर पुलिस
1983 शुभ कामना
1983 हिम्मतवाला
1983 दो गुलाब
1983 वो जो हसीना
1983 कुली
1983 सौतन
1983 जस्टिस चौधरी
1983 मैं आवारा हूँ
1982 तेरी माँग सितारों से भर दूँ
1982 अनोखा बंधन
1982 नमक हलाल
1982 तीसरी आँख
1982 जॉनी आई लव यू
1982 अशान्ति
1982 सम्राट
1982 धर्म काँटा
1981 मैं और मेरा हाथी
1981 वक्त की दीवार
1981 शाका
1981 लावारिस
1981 कुदरत
1981 रॉकी
1981 रक्षा
1981 एक दूजे के लिये
1980 पत्थर से टक्कर
1980 ज्योति बने ज्वाला
1980 द बर्निंग ट्रेन
1979 मंज़िल
1979 सरकारी मेहमान
1979 मिस्टर नटवरलाल
1979 ढ़ोंगी
1979 दिल का हीरा
1979 काला पत्थर
1979 झूठा कहीं का
1978 काला आदमी
1978 सावन के गीत
1978 भोला भाला
1978 नालायक
1978 डॉन
1978 फंदेबाज़
1978 विश्वनाथ
1978 दरवाज़ा
1977 विश्वासघात
1977 दूसरा आदमी
1977 धूप छाँव
1977 चला मुरारी हीरो बनने
1977 जय विजय
1977 ईमान धर्म
1976 ख़ान दोस्त
1976 संतान
1976 उधार का सिंदूर
1976 लगाम
1976 फकीरा
1975 मौसम
1975 कैद
1975 आखिरी दाव
1975 शोले
1975 दीवार
1975 धर्मात्मा
1975 धोती लोटा और चौपाटी
1975 प्रतिज्ञा
1975 रानी और लालपरी
1974 विदाई
1974 हाथ की सफाई
1974 मज़बूर
1974 बेनाम
1974 दूसरी सीता सत्येन कप्पू नाम से
1974 खोटे सिक्के
1974 कसौटी
1974 ईमान
1973 यादों की बारात
1973 कीमत
1973 अनहोनी
1973 अविष्कार
1973 हिन्दुस्तान की कसम
1972 सीता और गीता
1972 रास्ते का पत्थर
1972 अपना देश
1972 अनुराग
1971 अमर प्रेम
1971 जाने अनजाने
1971 लाल पत्थर
1963 बन्दिनी

लक्ष्मीकांत बेर्डे

हास्य अभिनेता लक्ष्मीकांत बेर्डे के जन्मदिवस पर हार्दिक श्रद्धांजलि

लक्ष्मीकांत बेर्डे 
🎂26 अक्टूबर 1954 
⚰️16 दिसंबर 2004

 एक भारतीय अभिनेता थे जो मराठी और कई हिंदी फिल्मों में दिखाई दिए बेर्डे ने प्रोडक्शन कंपनी मराठी साहित्य संघ में एक कर्मचारी के रूप में अपना करियर शुरू किया और फिर कुछ मराठी स्टेज नाटकों में सहायक भूमिकाएँ निभाईं।  1983-84 में, वह पहली बार मराठी प्ले टूर टूर से प्रसिद्ध हुए

मराठी फिल्मों के अलावा, उनकी हास्य मंच भूमिकाएं जैसे शांततेचा कर्ता चालु आहे और बीघाडले स्वर्गेश द्वार भी सफल रहीं।  बेर्डे ने कई बॉलीवुड फिल्मों में अभिनय किया और कॉमिक रोल में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के लिए फिल्मफेयर अवार्ड के लिए चार नामांकन प्राप्त किए।  उन्होंने लगभग 185 हिंदी और मराठी फिल्मों में अभिनय किया।

लक्ष्मीकांत बेर्डे का जन्म 26 अक्टूबर 1954 को बॉम्बे (मुंबई) में हुआ था उनके पांच बड़े भाई-बहन थे और परिवार की आय बढ़ाने के लिए बेर्डे बचपन में ही लॉटरी टिकट बेचने लगे गिरगांव में किए गए गणेश उत्सव समारोह के लिए सांस्कृतिक गतिविधियों के दौरान मंचीय नाटकों में उनकी भागीदारी से उन्हें अभिनय में रुचि मिली उन्होंने इंटर-स्कूल और इंटर-कॉलेज ड्रामा प्रतियोगिताओं में भाग लेने के लिए पुरस्कार जीते।  इसके बाद, बेर्दे ने मुंबई मराठी साहित्य संघ में काम करना शुरू कर दिया

मराठी साहित्य संघ में एक कर्मचारी के रूप में काम करते हुए, लक्ष्मीकांत बेर्डे ने मराठी मंचीय नाटकों में छोटी भूमिकाओं में अभिनय करना शुरू किया।  1983-84 में, उन्होंने पुरुषोत्तम बेर्दे के मराठी स्टेज प्ले टूर टूर में अपनी पहली प्रमुख भूमिका हासिल की जो हिट बन गई और बेर्डे की कॉमेडी की शैली को सराहा गया।

बेर्डे ने अपनी फिल्म की शुरुआत 1984 की मराठी फिल्म लेक चलली ससरला से की इसके बाद, उन्होंने और अभिनेता महेश कोठारी ने फिल्म धूम धड़ाका (1984) और दे दनादन (1987) में एक साथ अभिनय किया।  ये दोनों फिल्में प्रसिद्ध हुईं और बेर्डे ने अपनी ट्रेडमार्क कॉमेडी शैली स्थापित करने में मदद की

ज्यादातर फिल्मों में, उन्होंने कोठारी के साथ या अभिनेता अशोक सराफ के साथ अभिनय किया लक्ष्मीकांत बेर्डे  अशोक सराफ की जोड़ी को भारतीय सिनेमा में एक सफल मुख्य अभिनेता के रूप में पहचाना जाता है बेर्डे ने अशोक सराफ, सचिन पिलगांवकर और महेश कोठारी के साथ मिलकर 1989 की मराठी फिल्म ऐश ही बनवा बनवी में एक साथ अभिनय करने के बाद मराठी फिल्मों में एक सफल चौकड़ी बनाई

उस दशक को मराठी फिल्म उद्योग द्वारा "अशोक-लक्ष्य" युग के रूप में याद किया जाएगा।  बेर्ड की मृत्यु तक दोनों कलाकार सबसे अच्छे दोस्त बने रहे।  ज्यादातर फिल्मों में, बेर्डे की अभिनेत्री उनकी भावी पत्नी प्रिया अरुण ही रही

बेर्डे की पहली हिंदी फिल्म 1989 में सलमान ख़ान द्वारा अभिनीत सूरज बड़जात्या की मैंने प्यार किया थी। उनकी कुछ अन्य लोकप्रिय हिंदी फ़िल्मों में हम आपके हैं कौन ..!, मेरे सपनों  की रानी, ​​आरज़ू, साजन, बेटा, 100 डेज और अनाड़ी शामिल हैं।  बेर्दे हिट मराठी मंच नाटकों जैसे शांता कर्ता चालु आहे और अन्य में मुख्य अभिनेता के रूप में भी काम करते रहे।

1992 में, बेर्डे ने अपने कॉमेडी मोल्ड से अलग होने की कोशिश की और फिल्म एक होता विदुषक में एक गंभीर भूमिका निभाई फिल्म को सफलता नहीं मिलने पर बेर्डे कॉमेडी में वापस आ गए, हालांकि वे फिल्म की असफलता से निराश थे।

1985 से 2000 तक, बेर्डे ने कई अन्य मराठी ब्लॉकबस्टर्स जैसे आमि दोगे राजा रानी, ​​हमाल दे धमाल, बलचे बाप ब्रह्मचारी, एक पेक्सा एक, भूतच चू, थरथराहट धड़ाकेबाज़ और ज़ापाटेला में अभिनय किया। 

बेर्डे ने मराठी टीवी धारावाहिक नस्ती आफत में अभिनय किया था।

16 दिसंबर 2004 को किडनी की बीमारी के कारण मुंबई में लक्ष्मीकांत बेर्डे की मृत्यु हो गई उनके अंतिम संस्कार में महेश कोठारी अशोक सराफ और सचिन पिलगांवकर जैसी मराठी फिल्म उद्योग की कई उल्लेखनीय हस्तियों ने भाग लिया

अपने जीवन के अंतिम वर्षों में, बेर्डे ने अपना प्रोडक्शन हाउस 'अभिनय आर्ट्स' चलाया, जिसका नाम उनके बेटे अभिनय बेर्डे के नाम पर रखा गया।  बहुत कम लोग जानते हैं कि लक्ष्मीकांत बेर्डे बहुत अच्छे वेंट्रिलक्विस्ट और गिटारवादक थे।

मनुस्मृति

. ................मनुस्मृति.................... जरा सोचिए, अगर आज भारत का कानून यह तय कर दे कि— "एक आम आदमी चोरी करे तो उसे...