गुरुवार, 19 अक्टूबर 2023

बेबी नाज

कुमारी नाज़़
प्रसिद्ध नाम बेबी नाज़
अन्य नाम सलमा बेग 

🎂जन्म 20 अगस्त, 1944
⚰️मृत्यु 19 अक्टूबर, 1995

कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र हिन्दी सिनेमा
प्रसिद्धि अभिनेत्री
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी बेबी नाज़ ने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में बाल कलाकार के रूप में क़दम रखा। उन्होंने महज 8 साल की उम्र में फिल्म 'रेशम' में अभिनेत्री सुरैया के बचपन का किरदार निभाया था।
कुमारी नाज़़ या 'बेबी नाज़' या 'सलमा बेग'  हिन्दी फ़िल्म अभिनेत्री थीं। उन्होंने सिने जगत में बतौर एक बाल कलाकार प्रवेश किया। महज 8 साल की उम्र में फिल्म 'रेशम' में अभिनेत्री सुरैया के बचपन का रोल किया था।
बेबी नाज ने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट कदम रखा था। माता-पिता ने नाज का नाम सलमा बेग रखा था। सलमा ने महज 8 साल की उम्र में फिल्म रेशम में एक्ट्रेस सुरैया के बचपन का रोल किया था। सलमा के पिता लेखक थे, जो स्ट्रगल करते रहे। पिता के दोस्त प्रोड्यूसर लेखराज ने पहली बार सलमा को फिल्म में काम करने का मौका दिया था। हालांकि पहले पिता नहीं चाहते थे कि वह फिल्मों में काम करें लेकिन आर्थिक तंगी की वजह से वह सलमा के काम करने के लिए तैयार हो गए थे। चलिए आज हम आपको सलमा बेग से जुडा एक रोचक किस्सा बताते हैं। जब सेट पर ही सलमा बेग की मांग भर दी गई थी।

दरअसल यह वाकया साल 1963 में रिलीज हुई फिल्म देखा प्यार तुम्हारा की शूटिंग के दौरान का है। डायरेक्टर के. परवेज के निर्देशन बनी इस फिल्म के हीरो थे पृथ्वीराज कपूर के भांजे सुबीराज। सुबीराज को फिल्मों में अधिक्तर पुलिस ऑफिसर से लेकर बिजनेसमैन की भुमिका में देखा जाता था। वहीं फिल्म की हीरोइन थीं सलमा बेग, उस वक्त तक सलमा को बेबी नाज से जाना जाता था।
फिल्म देखा प्यार तुम्हारा की शूटिंग प्रतापगढ़ के एक किले में चल रही थी। सुबीराज और बेबी नाज काफी घुल-मिलने लगे थे। धीरे-धीरे यह मुलाकात प्यार में बदल गई। सुबीराज को यह मालूम था कि मुंबई जाते ही वह नाज से दूर हो जाएंगे। इन दोनों की शादी के बीच दो अड़चन थीं पहली अलग-अलग धर्म और दूसरी नाज की इनकम से ही परिवार चलता था।
सुबीराज नाज से दूर नहीं होना चाहते थे। एक दिन सुबीराज ने शूटिंग के दौरान ही बेबी नाज की मांग में सिंदूर भरकर उनसे शादी कर ली थी। उस वक्त इस खबर ने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में तहलका मचा दिया था।

राय चन्द ब्रोल

राय चन्द बोराल
(अंग्रेज़ीमें: R. C. Boral;

🎂जन्म 19 अक्टूबर, 1903कलकत्ता, ब्रिटिश भारत
⚰️मृत्यु 25 नवम्बर, 1981
मृत्यु स्थान कोलकाता (भूतपूर्व कलकत्ता)

अभिभावक लालचन्द बोराल
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र संगीत निर्देशन
मुख्य फ़िल्में 'मोहब्बत के आँसू', 'धूप छाँव', 'डाकू मंसूर', 'चंडीदास', 'पूरन भगत', 'विद्यापति', 'अभागिन', 'प्रेसिडेंट' आदि।
पुरस्कार-उपाधि 'सारस्वत महामंडल उपाधि' (1930), 'संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार' (1978), 'दादा साहब फाल्के पुरस्कार' (1979)
प्रसिद्धि फ़िल्म संगीतकार
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी आर. सी. बोराल, नितिन बोस और पंकज मलिक ने मिलकर भारतीय फ़िल्मी संगीत में पार्श्वगायन की शुरुआत की थी।

 राय चन्द बोराल

फ़िल्मों के प्रसिद्ध संगीतकार थे। उन्हें भारतीय सिनेमा में 'पार्श्वगायन' की शुरुआत करने का श्रेय दिया जाता है। इसके साथ ही बोराल जी को पहली संगीतमय कार्टून फ़िल्म बनाने का भी श्रेय प्राप्त है। उनके द्वारा निर्मित तीन कार्टून कथाचित्रों में 'भुलेर शेषे', 'लाख टाका' एवं 'भोला मास्टर' हैं। आर. सी. बोराल को कार्टून फ़िल्म बनाने की प्रेरणा मशहूर हास्य कलाकार चार्ली चैपलिन की फ़िल्म 'ए सिटी लाइट्स' से मिली थी, जिसे उन्होंने 40 बार देखा था। सुप्रसिद्ध गायक कुंदनलाल सहगल की प्रतिभा को तराशने, निखारने एवं उसे भारत की जनता से रू-ब-रू करवाने का श्रेय भी आर. सी. बोराल को ही जाता है। हिन्दी फ़िल्मों में दिये हुए विशिष्ट योगदान के लिए आर. सी. बोराल को वर्ष 1978 में 'संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार' और 1979 में 'दादा साहब फाल्के पुरस्कार' से भी सम्मानित किया गया था।

जन्म तथा शिक्षा

आर. सी. बोराल  का जन्म 19 अक्टूबर, 1903 को कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) के एक मशहूर संगीत परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम लालचन्द बोराल था, जो शास्त्रीय संगीतकार थे। उन्हें संगीत वाद्य पखावज में प्रसिद्धि प्राप्त थी। घर का माहौल संगीतमय था, इसीलिए बोराल को बचपन से ही सांगीतिक वातावरण मिला था। उन्होंने पंडित विश्वनाथ राव से धमार एवं ग्वालियर घराने के मशहूर सरोद के उस्ताद हाफ़िज़ अली ख़ाँ की सलाह पर उस्ताद माजिद ख़ाँ से तबला बजाने की शिक्षा प्राप्त की।

कैरियर की शुरुआत
आर. सी. बोराल के कैरियर के प्रारंभ से ही संगीतकार पंकज मलिक उनके नजदीकी मित्र बन गये थे। इन दोनों ने सन 1928 से ही फ़िल्मों में प्रवेश किया और उस समय की बनने वाली मूक फ़िल्मों के लिए संगीत देने का कार्य किया। बाद में जब हिन्दुस्तान का सवाक सिनेमा 1931 से प्रारंभ हुआ, तो उन्होंने धुनें बनाना भी प्रारंभ कर दिया और गायन के लिए पार्श्वगायन के अवसर उपलब्ध कराए। बतौर संगीतकार बोराल साहब कितने सम्मानित व्यक्ति थे, इसका अंदाज़ा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि एस. के. पाल, खेमचंद्र प्रकाश एवं पन्नालाल घोष जैसे संगीतकार उनसे संगीत की शिक्षा ग्रहण करते थे।

नये प्रयोग
कोलकाता के 'न्यू थियेटर्स' में काम करते हुए आर. सी. बोराल ने वहाँ के साउंड इंजीनियर मुकुल बोस, जो कि नितिन बोस के भाई थे, के साथ एम्पलीफ़्लायर का प्रयोग भी संगीत में प्रारंभ किया। इसी श्रंखला में उन्होंने एक और उपलब्धि हासिल की, वह थी- संगीत वाद्य यंत्रों के साथ ध्वनि प्रभाव देना। वर्ष 1932 में आयी फ़िल्म 'मोहब्बत के आँसू' आर. सी. बोराल की संगीतबद्ध पहली फ़िल्म तो थी ही, इसके साथ ही यह मशहूर कुंदनलाल सहगल के अभिनय से भी सजी थी। सहगल द्वारा ही अभिनीत फ़िल्म 'चंडीदास' (1934) बोराल जी की सबसे कामयाब फ़िल्मों में गिनी जाती है। फ़िल्म 'प्रेसीडेंट' (1937) में कुंदनलाल सहगल द्वारा गाया गया गीत "एक बंगला बने न्यारा" आज तक आर. सी. बोराल और सहगल की सर्वश्रेष्ठ रचनाओं में गिना जाता है।

पार्श्वगायन की शुरुआत
संगीतकार आर. सी. बोराल, पंकज मलिक और नितिन बोस को भारतीय सिनेमा में पार्श्वगायन की शुरुआत करने का श्रेय दिया जाता है। हिन्दी फ़िल्मों में पार्श्वगायन की शुरुआत से सम्बन्धित एक रोचक घटना है-

"जिस रास्ते से नितिन बोस प्रतिदिन अपने घर से 'न्यू थियेटर्स' जाते थे, उसी रास्ते में संगीतकार पंकज मलिक का घर पड़ता था। इसीलिए नितिन बोस प्रतिदिन पंकज मलिक को उनके घर के पास से उन्हें अपनी कार में बैठाकर स्टूडियो ले जाते और छोड़ जाते। यह सिलसिला चलता रहता था। रोज़ की ही भाँति नितिन बोस पंकज मलिक के दरवाज़े पर अपनी कार का हॉर्न बजा कर उन्हें बुला रहे थे, परन्तु पंकज मलिक पर इसका कोई असर नहीं हो रहा था। नितिन बोस को लगा कि शायद घर में कोई नहीं है। तभी लगातार कार के हॉर्न की आवाज सुन कर पंकज मलिक के पिता ने उनको कमरे में जा कर बताया की गेट पर नितिन बोस बहुत देर से तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं। इतना सुनते ही पंकज मलिक दौड़ते हुए नितिन बोस के पास पहुँचे और कहा- "माफ़ी चाहूँगा, मैं ज़रा अपने पसंदीदा अंग्रेज़ी गानों का रिकॉर्ड सुनते हुये उसके साथ गाने में मशगूल हो गया था। इसीलिए आपके कार के हॉर्न को नहीं सुन सका।

नितिन बोस ने इस घटना की चर्चा 'न्यू थियेटर्स' में आर. सी. बोराल से की और उनसे चर्चा करते हुये उन्हें अपना एक सुझाव दिया- "कि क्यूँ ना हम कुछ नया प्रयोग करें। जैसे पंकज उस गाने के साथ गाये जा रहे थे, उसी तरह गाने को भी पहले रिकॉर्ड किया जा सकता है। इससे हमें अभिनेताओं और अभिनेत्रियों की आवाज़ों के साथ समझौता नहीं करना पड़ेगा। हमारे पास विकल्प यह होगा की हम किसी सुरीले प्रशिक्षित गायक, गायिकायों की आवाज़ में गाने रिकॉर्ड कर सकते हैं और बाद में शूटिंग के समय फ़िल्म में अभिनय कर रहे चरित्र पर चित्रांकन कर सिनेमा को और रोचक बना सकते हैं। आर. सी. बोराल इस विचार से पूरी तरह सहमत हुये। फलस्वरूप उस समय नितिन बोस के ही निर्देशन में बन रही फ़िल्म 'धूप छावँ' (1935) के लिये उन्होंने पहला गाना "मैं खुश होना चाहूँ, खुश हो न सकूँ" रिकॉर्ड किया, जिसमें मुख्य स्वर के. सी. डे का था तथा कोरस में पारुल घोष, सुप्रवा सरकार एवं हरिमति के स्वर थे। इसके रिकोर्डिस्ट मुकुल बोस थे, जो नितिन बोस के ही भाई थे। मुकुल बोस भी 'न्यू थियेटर्स' में बतौर ध्वनि मुद्रक कार्यरत थे। इस प्रकार संगीतकार के तौर पर हिन्दी सिनेमा में पार्श्वगायन की परम्परा का श्रीगणेश करने का श्रेय आर. सी. बोराल को जाता है, जबकि प्रथम पार्श्वगायक होने का श्रेय के. सी. डे दिया गया।

📽️प्रमुख फ़िल्में
आर. सी. बोराल द्वारा संगीत निर्देशित प्रमुख फ़िल्में
वर्ष फ़िल्म वर्ष फ़िल्म
1932 मोहब्बत के आँसू 1932 जिन्दा लाश
1933 सुबह का सितारा 1933 पूरन भगत
1933 मीराबाई 1934 चंडीदास
1934 डाकू मंसूर 1934 मोहब्बत की कसौटी
1935 कारवाँ-ए-हयात 1935 धूप छाँव
1935 इंकलाब 1936 मंजिल
1937 अनाथ आश्रम 1937 विद्यापति
1937 प्रेसिडेंट 1938 अभागिन
1938 स्ट्रीट सिंगर 1939 सपेरा
1940 हार जीत 1941 लगन
1942 नारी 1942 सौगन्ध
1943 वापस 1945 हमरीही
1945 वसीयतनामा 1948 अंजानगढ़
1950 पहला आदमी 1950 स्वामी विवेकानन्द
1953 दर्द-ए-दिल 1953 श्री चैतन्य महाप्रभु
संगीत के भीष्म पितामह
संगीतकार अनिल विश्वास ने आर. सी. बोराल को भारतीय फ़िल्म जगत् में संगीत के भीष्म पितामह की संज्ञा दी थी। बोराल जी 'न्यू थियेटर्स' के साथ-साथ 'ऑल इंडिया रेडिओ कंपनी' (आकाशवाणी) में भी संगीत के विभागाध्यक्ष नियुक्त थे। उन्होंने मूक सिनेमा के अंतर्गत 'चोशेर मेय' तथा 'चोर काँटें' फ़िल्मों में भी स्टेज आर्केष्ट्रा का संचालन किया था। इन आर्केष्ट्रा में हारमोनियम और वायलिन के साथ-साथ चेलो, बाँसुरी, तथा ऑर्गन का प्रयोग कर उन्होंने स्टेज आर्केष्ट्रा को भी एक नया और आकर्षक रूप प्रदान कर दिया था।

महत्त्वपूर्ण तथ्य

शायद बहुत कम लोग ही यह जानते हैं कि सन 1935 में बनी फ़िल्म 'आफ़्टर द अर्थक्वेक' जो 1934 ई. में बिहार में आये भयानक भूकम्प पर आधारित फ़िल्म थी, इसके संगीतकार आर. सी. बोराल ही थे। इस फ़िल्म के एक गीत को बोराल जी ने केदार शर्मा से गवाया था, जो उन्हीं के लिखे हुये थे। गीत के बोल थे- "आओ री चमेली एक बात बतायें..."। तत्कालीन समय में इस गीत को बहुत प्रसिद्धि मिली थी। यह गीत बिहार की लोक शैली को स्पर्श करता महसूस किया गया था। इस फ़िल्म में एक और ख़ास बात यह थी, की इसमें प्रसिद्ध अभिनेता राजकपूर ने बाल कलाकार की एक रोचक भूमिका अदा की थी।
इसी प्रकार वर्ष 1937 में 'न्यू थियेटर्स' के बैनर तले निर्मित फ़िल्म 'विद्यापति' का संगीत भी आर. सी. बोराल ने तैयार किया था, जो बिहार के मिथिला प्रक्षेत्र के राजा शिवसिंह, उनकी पत्नी रानी लक्ष्मी एवं कविवर विद्यापति के बीच प्रेम त्रिकोण पर आधारित थी। इस फ़िल्म के सभी गीत केदार शर्मा ने लिखे थे, जिसे आर. सी. बोराल ने अपने संगीत रस से सजाया था। फ़िल्म 'विद्यापति' के गीत उस समय के सबसे सफल संगीत की श्रेणी में रखे गए थे। यह वही फ़िल्म थी, जिसने कानन देवी को अभिनेत्री से साथ-साथ एक सफल गायिका के रूप में भी स्थापित किया था।
पुरस्कार व सम्मान
भारतीय सिनेमा में आर. सी. बोराल के अभूतपूर्व योगदान के लिए उन्हें सन 1930 में लखनऊ में हुए संगीत सम्मलेन में 'सारस्वत महामंडल' की उपाधि दी गई थी। वर्ष 1978 में उन्हें 'संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार' तथा 1979 भारतीय सिने संसार के सर्वोच्च सम्मान 'दादा साहब फाल्के पुरस्कार' से भी नवाजा गया था।

निधन
भारतीय सिनेमा में बहुमूल्य योगदान देने वाले और एक संगीतकार के रूप में प्रसिद्धि पाने वाले आर. सी. बोराल का निधन कोलकाता में ही 25 नवम्बर, 1981 को हुआ।

बुधवार, 18 अक्टूबर 2023

कुंदन शाह

एक भारतीय फिल्म निर्देशक और लेखक थे।

कुंदन शाह 
🎂जन्म 19 अक्टूबर 1947
बम्बई , बम्बई राज्य , भारत
⚰️मृत 07 अक्टूबर 2017
मुंबई , महाराष्ट्र , भारत
व्यवसाय निर्देशक, पटकथा लेखक
सक्रिय वर्ष 1983–2014
पुरस्कार 1983 किसी निर्देशक की सर्वश्रेष्ठ पहली फिल्म के लिए इंदिरा गांधी पुरस्कार - जाने भी दो यारो
1994 सर्वश्रेष्ठ फिल्म के लिए फिल्मफेयर क्रिटिक्स अवार्ड - कभी हां कभी ना
कुन्दन शाह (19 अक्टूबर 1947 - 7 अक्टूबर 2017) एक भारतीय फ़िल्म निर्देशक और लेखक थे। उन्हें उनकी कॉमेडी क्लासिक जाने भी दो यारो (1983) और सईद अख्तर मिर्जा के साथ उनकी 1986-1987 की टीवी श्रृंखला नुक्कड़ के लिए जाना जाता है ।

जीवनी 
कुन्दन शाह का जन्म एक गुजराती परिवार में हुआ था। 

शाह ने पुणे में भारतीय फिल्म और टेलीविजन संस्थान में निर्देशन का अध्ययन किया और उन्होंने कॉमेडी शैली में रुचि विकसित की ।

उनके निर्देशन की पहली फिल्म 1983 में कॉमेडी फिल्म जाने भी दो यारो (उर्फ हू पेज़ द पाइपर) थी। वह सतीश कौशिक के साथ फिल्म के सह-लेखक भी थे। इस फिल्म ने पहली बार भारतीय सिनेमा को व्यंग्यपूर्ण कॉमेडी से परिचित कराया और इसे थप्पड़ न मारने वाले के रूप में अच्छी तरह से स्वीकार किया गया ।

इसके बाद शाह ने टेलीविजन में काम करना शुरू कर दिया। वह लोकप्रिय सिटकॉम ये जो है जिंदगी के निर्देशकों में से एक थे, जिसका प्रसारण अगस्त 1984 में शुरू हुआ था। वह सईद अख्तर मिर्जा , अजीज मिर्जा और अन्य द्वारा स्थापित कंपनी इस्क्रा के भागीदार बन गए। 1985-1986 में उन्होंने सईद अख्तर मिर्जा के साथ टीवी श्रृंखला नुक्कड़ (स्ट्रीट) का निर्देशन किया । यह धारावाहिक सड़क पर रहने वाले युवाओं के नियमित जीवन से संबंधित एक और लोक कॉमेडी थी। 1987 में उन्होंने "मनोरंजन" नामक एक और टेलीविजन धारावाहिक का निर्देशन किया, यह कॉमेडी धारावाहिक फिल्म उद्योग पर आधारित था और तुरंत हिट हो गया। 1988 में, उन्होंने कार्टूनिस्ट, आरके लक्ष्मण के चरित्र, आम आदमी, अंजन श्रीवास्तव अभिनीत, पर आधारित सिटकॉम, वागले की दुनिया का निर्देशन शुरू किया । 

कई धारावाहिकों का निर्देशन करने के बाद शाह ने सिनेमा से 7 साल का लंबा ब्रेक लिया।

शाह ने 1993 में सिनेमा में वापसी की। उन्होंने प्रसिद्ध कभी हां कभी ना का निर्देशन किया और फिल्म के लिए पटकथा लिखी। यह फिल्म एक और हास्य प्रेम कहानी थी, लेकिन इसने अपने श्रेय के नए पहलुओं को भी प्रदर्शित किया - यह पहली बार था कि फिल्म में नायक पूरी तरह से हारा हुआ था। इस फिल्म में शाहरुख खान ने अपनी पहली भूमिका निभाई। फिल्म को काफी सराहना मिली और शाह और खान दोनों को उनके काम के लिए सराहा गया। 1994 में, शाह ने फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ फिल्म का फिल्मफेयर क्रिटिक्स अवॉर्ड जीता । वह यह पुरस्कार जीतने वाले पहले फिल्म निर्माता थे।

1998 में, शाह ने एक और प्रशंसित फिल्म, क्या कहना का निर्देशन किया । देरी के कारण फिल्म 2000 में रिलीज़ हुई और साल की आश्चर्यजनक हिट बन गई। यह फिल्म एकल माता-पिता बनने और विवाह पूर्व गर्भावस्था के सामाजिक रूप से विवादास्पद मुद्दे से निपटती है। प्रीति जिंटा ने एक किशोर एकल माँ की मुख्य भूमिका में समीक्षकों द्वारा सराहनीय प्रदर्शन किया, जो अपने समाज के मूल्यों पर काबू पाने की कोशिश करती है। यह उनकी पहली फिल्म थी, लेकिन रिलीज में देरी के कारण उन्होंने दिल से... और उसके बाद सोल्जर से डेब्यू किया । फिल्म में सैफ अली खान और चंद्रचूड़ सिंह भी थे ।

शाह की अगली रिलीज़ थीं 2000 में हम तो मोहब्बत करेगा , जिसमें बॉबी देओल और करिश्मा कपूर ने अभिनय किया , 2002 में दिल है तुम्हारा , जिसमें रेखा , प्रीति जिंटा , अर्जुन रामपाल , महिमा चौधरी और जिमी शेरगिल ने अभिनय किया , और 2004 में एक से बढ़कर एक , जिसमें सुनील ने अभिनय किया। शेट्टी और रवीना टंडन . जबकि दूसरी फिल्म को आम तौर पर सकारात्मक समीक्षा मिली, लेकिन किसी भी फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर अच्छा प्रदर्शन नहीं किया।

चंद्र बती देवी

चंद्र बती देवी
🎂19 अक्टूबर 1909
बिहार,भारत
⚰️मृत29 अप्रैल 1992
कोलकाता,भारत

अभिनेत्री
के लिए जाना जाता है
पुजारीन (1936)
अग्नि परीक्षा (1954)
राजा-सजा(1960)
प्यार
बिमल पाल
चन्द्रबती देवी ने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत 1929 में मूक फिल्म प्यारी से की थी और देबाकी बोस की क्लासिक क्लासिक मीराबाई से की थी। (1933) में की थी ।मीरामुख्य भूमिका के बाद उन्हें स्टारडम मिला।
📽️

अमी रतन (1979)
प्राणेर ठाकुर रामकृष्ण (1977) भैरबी माँ के रूप में
रोदनभारा बसंता (1974)
कायाहिनेर काहिनी (1973)
अग्निभ्रम (1973)
अमी सिराथेर प्यार (1973)
बिग्यान ओ बिधाता (1973)
छिन्नपात्रा (1972)
नाया मिशेल (1972)
जिबन जिज्ञासा (1971)
अत्तार दिन पारे (1971)
शिकायत (1971)
राजकन्या(1965)
कन्टाटर (1964)
सखेर चोर(1960)
राजा साजा(1960)
इन्द्रधनु (1960)
बिचारक(1959)
मरुतीर्था हिंगलाज(1959) जोगिनी माँ के रूप में
दीप ज्वेले जय (1959)
ई जहर से जहर नोय (1959)
रातेर अँधेरा (1959)
शशिबाबुर दुनिया (1959)
इंद्राणी(1958)
पारस पत्थर(1958) स्वयं के रूप में (अतिथि भूमिका)
लीलांका (1958)
मर्मबानी (1958)
जीबन तृष्णा(1957)
पाथे होलो डेरी(1957)
चन्द्रनाथ (1957)
हरानो सूर(1957)
तसर घर (1957)
पृथ्वीबी अमरे चाय (1957)
अभिषेक (1957)
मधबीर ज़ीने (1957)
पंचतप (1957)
श्रीमतिर दुनिया (1957)
तमासा (1957)
तापसी (1957)
पुत्रबधू(1956)
त्रिजामा(1956)
एकती रात(1956)
लक्ष्य हीरा(1956)
दुइ पुरुष (1945)
प्रियो बंधोबी (1943)
प्रोतिश्रुति(1941) - एक सामाजिक महिला सुमित्रा के रूप में
शुकतारा (1940)
देवदास(1935)- चंद्रमुखी के रूप में
मीराबाई(1933)-मीरा के रूप में

सन्नी दियोल

अजय सिंह देओल, जिन्हे सनी देओल के नाम से भी जाना जाता ह। सनी देओल हिंदी सिनेमा के मसहूर अभिनेता है और वर्तमान में पंजाब के गुरदासपुर से लोकसभा सांसद हैं। 
🎂जन्म : 19 अक्तूबर 1957 साहनेवाल
पत्नी: पूजा देओल (विवा. 1984)
भाई: बॉबी देओल, एशा देओल, अजीता देओल, अहाना देओल, विजेता देओल
माता-पिता: धर्मेन्द्र, प्रकाश कौर
बच्चे: राजवीर देओल, करण देओल

नाम :-सनी देयोल
जन्म नाम :-अजय सिंह देयोल
जन्म तिथि :- 19 अक्टूबर 1956
ऊँचाई :- 1.71 मी
जीवनसाथी :- ऐरे
ट्रेड मार्क :- गहरी, शक्तिशाली आवाज
, अक्सर ऐसे करतब करते हुए देखा जाता है जिसके लिए अत्यधिक शारीरिक शक्ति की आवश्यकता होती है, जैसा कि घातक, गदर और बॉर्डर में देखा गया है।
, अक्सर ऐसे किरदार निभाते हैं जो बदला लेने की तलाश में पूरे समुदाय का प्रतिनिधि बन जाते हैं।
*—*–* :- सनी देओल के नाम से मशहूर अजय सिंह देओल का जन्म अभिनेता धर्मेंद्र और प्रकाश कौर के घर हुआ था। सनी ने सुपरहिट फिल्म बेताब (1983) से अभिनय शुरू किया, जो एक प्रेम कहानी थी जिसमें एक और नवागंतुक अमृता सिंह भी थीं; यह फिल्म एक बड़ी सफलता थी और इसके बाद वह ऐसी फिल्में बनाते रहे जिन्होंने उन्हें बॉलीवुड के सर्वश्रेष्ठ एक्शन हीरो के रूप में चित्रित किया। अर्जुन (1985), त्रिदेव (1989), घायल (1990) सहित अन्य फिल्में इतनी हैं कि उल्लेख करना मुश्किल है। घायल एक बड़ी सफल एक्शन फिल्म थी जिसने सनी को पहला पुरस्कार दिलाया; फिर वह दामिनी (1993) में एक शराबी वकील के रूप में सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता के रूप में प्रदर्शित हुए और उसके बाद घटक (1996), ज़िद्दी (1997), बॉर्डर (1997) आदि फ़िल्में आईं। सनी ने दिल्लगी (1999) के साथ निर्देशक बनने का भी प्रयास किया जो इतनी सफल नहीं रही; फिल्म में उन्होंने अपने छोटे भाई बॉबी देओल के साथ काम किया था। हम डर (1993) को नहीं भूल सकते जिसमें उन्होंने शाहरुख खान के साथ अभिनय किया था; वह फ़िल्म जिसे हम सभी उन्हें न केवल एक अच्छे दिखने वाले बल्कि रोमांटिक युवक के रूप में जानते हैं। 2000 के दशक में सनी ने कुछ उल्लेखनीय हिट फिल्में भी दीं, फिल्म गदर (2001) जिसमें उनके अभिनय कौशल का प्रदर्शन हुआ, 'अपने' (2007) और 'यमला पगला दीवाना' (2011) में उन्होंने अपने भाई बॉबी और अपने पिता धर्मेंद्र के साथ अभिनय भी किया। और हीरोज़ (2008) को भी नहीं भूलना चाहिए जिसमें हम सभी सीखते हैं कि अगर हर कोई जीवन में प्रयास करे तो कोई भी विकलांग नहीं है। कुल मिलाकर सनी एक उल्लेखनीय व्यक्तित्व हैं और उन्होंने अपने लिए नाम कमाया है; आशा है कि वह भविष्य में भी प्रगति करता रहेगा।
सनी देओल ने काफी फ़िल्मों में अभिनय किया है इनकी पहली फ़िल्म बेताब थी जो 1983में प्रदर्शित हुई थी। 2016में सम्भवतः फ़रवरी माह में इनकी घायल वन्स अगैन फ़िल्म प्रदर्शित हुई थी , इस फ़िल्म को सनी देओल ने खुद ने लिखी है। इस फ़िल्म का सीक्वल घायल फ़िल्म है जो 1990में बनी थी।

सनी देओल की बॉर्डर तथा ग़दर इत्यादि फ़िल्में काफी हिट हुई है। सनी देओल डायलाग डिलीवरी के लिए भी जाने जाते है, सनी देओल के डायलॉग्स आज भी लोगों के जुबाँ पर आ जाते है।11 अगस्त 2023 को सनी देओल की नयी फिल्म ग़दर 2 सिनेमाघरों में लगी थी
सनी देओल 23 मई 2019 से गुरदासपुर(पंजाब) से भाजपा के सांसद हैं

मंगलवार, 17 अक्टूबर 2023

मिलन सिंह

मिलन सिंह 
🎂जन्म 15 मई 1992
एक भारतीय फुटबॉलर हैं जो इंडियन सुपर लीग में केरला ब्लास्टर्स के लिए सेंट्रल मिडफील्डर के रूप में खेलते हैं। लडके और लड़की दोनो की आवाज में गाते है

वैसे मिलन सिंह... किसी परिचय की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वह गायन की अपनी अनूठी शैली, एक साथ कई आवाजों के अद्भुत मिश्रण के साथ मनोरंजन की दुनिया में अग्रणी रही हैं...चाहे वह पुरुष हो या महिला....उसके ऊपर उनकी अपनी मूल आवाज अद्वितीय है। संगीत और फ़िल्मों की पूरी दुनिया…….

अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर, ऊंची कूद और फुटबॉल में खिलाड़ी। स्वर्गीय श्री मोहम्मद के प्रबल प्रशंसक । रफी साहब, मिलन सिंह को उनके शानदार अभिनय के लिए कई पुरस्कार मिले हैं, जिनमें से उत्तर प्रदेश सरकार का "यश भारती '95' सबसे प्रतिष्ठित है, जिसे तत्कालीन राज्यपाल श्री मोतीलाल वोरा और मुख्यमंत्री श्री मुलायम सिंह यादव ने प्रदान किया था।

उनके गृह नगर इटावा (यूपी) में उन्हें सम्मानित करने के लिए गर्व से "मिलन सिंह मार्ग" नाम की एक सड़क है। प्रकृति के आश्चर्य मिलन सिंह ने गायन के क्षेत्र में एक लंबा सफर तय किया है। उनकी समृद्ध सुरीली आवाज दोहरी आवाज में गाने की असाधारण कला के साथ जादू करती है। मिलन सिंह की एक सुरीली यात्रा....जो साढ़े तीन साल की उम्र में शुरू हुई और तब से अपनी दमदार आवाज से गायन के कई चमत्कारों के मील के पत्थर स्थापित किए... मिलन सिंह आराम से मोहम्मद रफ़ी की शानदार ऊंचाइयों और लता मंगेशकर की अद्वितीय धुन तक पहुँच जाते हैं।

मिलन सिंह एक स्थापित ब्रांड है जो पूरे भारत और विदेश में जाना जाता है। मिलन...... जादुई सुरों का एक अनूठा मिश्रण... एक व्यक्तित्व जो भारतीय फिल्म और संगीत के विविध पहलुओं को सामने लाने की परिकल्पना करता है...

मैं अपने परिवार से प्यार करता हूँ । मेरे परिवार में न केवल मेरी माँ, बहनें और भतीजियाँ शामिल हैं, बल्कि कुछ मित्र भी शामिल हैं, जो मेरे जीवन के हर सुख-दुख में मेरे साथ रहे हैं। मेरा मानना ​​है कि रिश्ता तभी टिकता है जब वह पारदर्शी, ईमानदार और वफादार हो। मेरे जीवन में सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति मेरी दिवंगत बहन की बेटी "शिल्पी" है, जो केवल 11 घंटे की थी जब उसने अपनी माँ को खो दिया। तब से मैं उसकी मां, पिता और दोस्त हूं, मेरी पूरी दुनिया उसके इर्द-गिर्द घूमती है। वह एक परी है जो मेरे लिए भगवान का सबसे खूबसूरत उपहार है। मेरी छोटी भतीजी बाबूशा बहुत चंचल और जीवन से भरपूर है।

हमारी परंपरा और संस्कृति का सम्मान करें और भारतीय विचारधारा में पूर्ण विश्वास रखें। गीता दर्शन मेरा आदर्श है। साथ ही रामायण में भी अधिक आस्था रखते हैं. बिस्तर पर जाने से पहले और बिस्तर से उठने से पहले मंत्रों का जाप करना मेरी दिनचर्या है। बिना पूजा किए घर से बाहर जाना अत्यंत आपातकालीन स्थिति में ही हो सकता है।

घनिष्ठ परिवारों और उन लोगों की प्रशंसा करें जो इस व्यावसायिक दुनिया में अभी भी संयुक्त परिवारों में रहते हैं और बड़ों का सम्मान करते हैं। जो लोग वरिष्ठ नागरिकों और नेत्रहीन लोगों के प्रति नरम रुख रखते हैं। अच्छे आचरण वाले बच्चे.

प्रकृति को वैसे ही प्यार करें जैसे वह है और ऐसी प्राकृतिक रूप से सुंदर जगहों पर महीनों तक रहना पसंद करते हैं।

खेल- कूद सभी आउटडोर खेल जैसे रिले, बाधा दौड़, फुटबॉल, स्नो स्कीइंग, बैडमिंटन और शतरंज मेरी पसंद का एकमात्र इनडोर खेल है।

सादा और बिना मसालेदार भोजन पसंद है लेकिन कोई सख्त और तेज़ नियम नहीं । मैं अंडेटेरियन हूं और कुछ साल पहले नॉनवेज खाना छोड़ दिया था। मुझे बेक्ड खाना सबसे ज्यादा पसंद है, इटालियन और मैक्सिकन व्यंजन मेरे सबसे पसंदीदा हैं। लीची, संतरा, आड़ू और अंजीर मेरे पसंदीदा फल हैं।

बुरे व्यवहार वाले लोगों और उन लोगों से नफरत करें जिनके पास स्वच्छता के कोई मानक नहीं हैं। हालाँकि मैं ईश्वर से डरने वाला और सरल व्यक्ति हूँ लेकिन मुझे छोटे बच्चों के साथ बलात्कार करने के दोषी पाए गए बलात्कारी को छोटे टुकड़ों में काटने में कोई हिचकिचाहट नहीं होगी।

भगवंत मान

भगवंत सिंह मान 

जन्म 17 अक्टूबर 1973

 एक भारतीय राजनीतिज्ञ,cm पंजाब सामाजिक कार्यकर्ता, पूर्व हास्य अभिनेता, गायक और अभिनेता हैं, जो वर्तमान में 2022 से पंजाब के 17वें मुख्यमंत्री के रूप में कार्यरत हैं। वह 2022 से पंजाब विधानसभा में धुरी विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। और 2019 से आम आदमी पार्टी, पंजाब के राज्य संयोजक के रूप में भी कार्यरत हैं।  इससे पहले, वह 2014 से 2022 तक संगरूर लोकसभा क्षेत्र से लोकसभा सदस्य थे ।

मान का जन्म भारत के पंजाब के संगरूर जिले की सुनाम तहसील के सतोज गांव में पिता मोहिंदर सिंह और मां हरपाल कौर के घर एक जट सिख परिवार में हुआ था । उन्होंने शहीद उधम सिंह गवर्नमेंट कॉलेज, सुनाम में बैचलर ऑफ कॉमर्स पाठ्यक्रम का पहला वर्ष पूरा किया

मान ने युवा कॉमेडी उत्सवों और अंतर-कॉलेज प्रतियोगिताओं में भाग लिया। उन्होंने शहीद उधम सिंह गवर्नमेंट कॉलेज, सुनाम के लिए पंजाबी विश्वविद्यालय , पटियाला में एक प्रतियोगिता में दो स्वर्ण पदक जीते ।
2015 में भगवंत मान ने पहली पत्नी इंदरजीत कौर से तलाक ले लिया था। इस शादी से उनके दो बच्चे भी हैं।
 वहीं उनकी दूसरी पत्नी गुरप्रीत कौर है जिसको को वह लंबे समय से जानते हैं। दोनों की शादी परिवार वालों को मर्जी और पसन्द से हुई हैं। गुरप्रीत कौर डाक्टर है

मनुस्मृति

. ................मनुस्मृति.................... जरा सोचिए, अगर आज भारत का कानून यह तय कर दे कि— "एक आम आदमी चोरी करे तो उसे...