शनिवार, 12 अगस्त 2023

सारा अली खान

सारा अली खान
सारा अली
जन्म 12 अगस्त 1995) एक भारतीय अभिनेत्री हैं जो हिंदी फिल्मों में काम करती हैं।
पटौदी परिवार की सदस्य, वह अभिनेता अमृता सिंह और सैफ अली खान की बेटी और मंसूर अली खान पटौदी और शर्मिला टैगोर की पोती हैं।
कोलंबिया विश्वविद्यालय से स्नातक होने के बाद, खान ने 2018 की फिल्मों केदारनाथ और सिम्बा में मुख्य महिला की भूमिका निभाकर अभिनय में कदम रखा।
दोनों फ़िल्में व्यावसायिक रूप से सफल रहीं और पहली फ़िल्म के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ नवोदित अभिनेत्री का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला।
सारा अली खान पटौदी
12 अगस्त 1995 (उम्र 27)
बम्बई , महाराष्ट्र , भारत
अल्मा मेटर
कोलंबिया विश्वविद्यालय ( बीए )
पेशा
अभिनेत्री
सक्रिय वर्ष
2018–वर्तमान
अभिभावक
सैफ अली खानअमृता सिंह
परिवार
पटौदी परिवारसिंह-विर्क परिवार

गुलशन कुमार

गुलशन कुमार दुआ
🎂जन्म 5 मई, 1956; 
⚰️ मृत्यु- 12 अगस्त, 1997
जन्म भूमि दिल्ली
मृत्यु 12 अगस्त, 1997
मृत्यु स्थान मुंबई, महाराष्ट्र
संतान पुत्र- भूषण कुमार, पुत्री- तुलसी कुमार, खुशाली कुमार
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र हिन्दी सिनेमा व भक्ति संगीत
विद्यालय देशबंधु कॉलेज, दिल्ली विश्‍वविद्यालय
प्रसिद्धि निर्माता-निर्देशक, टी-सीरीज़ के संस्थापक
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी निजी जिंदगी के अलावा गुलशन कुमार दान-पुण्य के लिए भी काफी चर्चा में रहते थे। उन्होंने वैष्णो देवी में एक भंडारे की स्थापना की जो आज भी वहां आने वाले श्रद्धालुओं और तीर्थयात्रियों को नि: शुल्क भोजन उपलब्ध करवाता है।
गुलशन कुमार दुआ (अंग्रेज़ी: Gulshan Kumar Dua, जन्म- 5 मई, 1956; मृत्यु- 12 अगस्त, 1997) प्रसिद्ध निर्माता-निर्देशक और व्यवसायी थे। वह 'टी-सीरीज़' के संस्थापक थे। गुलशन कुमार का नाम फिल्मी दुनिया की उन हस्तियों में शुमार हैं जिन्होंने काफी कम समय में ही शोहरत की उन बुलंदियों को हासिल कर लिया था, जहां पहुंचना हर किसी का सपना होता है। संघर्षपूर्ण जीवन बिताने के बाद अपने संगीत और उसके प्रति लगन से उन्होंने एक खास मुकाम हासिल किया। गुलशन कुमार के बेटे भूषण कुमार बॉलीवुड के जाने-माने फिल्म निर्माता हैं और अब टी-सीरीज़ उनके द्वारा ही संचालित है। यह कहा जा सकता है कि गुलशन कुमार ने पूरे भारत में भक्ति की लहर ला दी। उन्होंने टी-सीरीज़ कैसेट्स के माध्यम से अधिकांश देवी-देवताओं के भजन व गीत जनता के बीच ला दिये। इनमें से अधिकांश गीत बेहद ही सफल रहे हैं।

परिचय
गुलशन कुमार का जन्म 5 मई, 1956 को दिल्ली के एक पंजाबी अरोड़ा परिवार में हुआ था। उनका मूल नाम गुलशन दुआ था। उनके पिता दिल्ली के दरियागंज बाजार में फलों के जूस की दुकान चलाते थे। जहां गुलशन कुमार भी अपने पिता का काम में हाथ बटाते थे। वहां से शुरू हुई उनकी यात्रा एक अलग मुकाम तक पहुंची। गुलशन कुमार के संघर्ष की कहानी जीरो से हीरो बनने तक की है। उन्होंने धीरे-धीरे इंडियन म्यूजिक इंडस्ट्री में कदम रखा और मशहूर होते चले गए।

टी-सीरीज़ की स्थापना
गुलशन कुमार ने सोनू निगम सहित कई गायकों को ब्रेक देकर उनके कॅरियर में अहम योगदान दिया था। गुलशन कुमार ने 'सुपर कैसेट्स इंडस्ट्रीज लिमिटेड' नाम की एक कंपनी बनायी जो भारत में सबसे बड़ी संगीत कंपनी बन गई। उन्होंने इसी संगीत कंपनी के तहत 'टी-सीरीज' की स्थापना की। 'टी-सीरीज' आज हिंदी सिनेमा की संगीत और फिल्म निर्माण की बड़ी कंपनियों में से एक है।

नये गायकों को मौका
गुलशन कुमार बेहतरीन फिल्म निर्माता के साथ ही एक शानदार गायक भी थे। उन्होंने ढेर सारे भक्ति गाने गाए जिन्हें लोग आज भी खूब पसंद करते हैं। गुलशन कुमार की आवाज में भक्ति संगीत 'मैं बालक तू माता शेरा वालिये' को लोगों ने हमेशा पसंद किया है। इतना ही नहीं गुलशन कुमार ने कई गायकों के कॅरियर को भी बनाया। उन्होंने सोनू निगम, अनुराधा पौडवाल और कुमार सानू जैसे सदाबहार गायक लॉन्च किए। गुलशन कुमार ने टी सीरीज के जरिए संगीत को लोगों के घर-घर पहुंचाने का काम किया

वैष्णो देवी भंडारा
निजी जिंदगी के अलावा गुलशन कुमार दान-पुण्य के लिए भी काफी चर्चा में रहते थे। उन्होंने वैष्णो देवी में एक भंडारे की स्थापना की जो आज भी वहां आने वाले श्रद्धालुओं और तीर्थयात्रियों को नि: शुल्क भोजन उपलब्ध करवाता है।

हत्या
दरियादिली से भरपूर गुलशन कुमार की मौत काफी दर्दनाक थी। मुंबई के अंडरवर्ल्ड के लोगों ने उनसे फिरौती थी, लेकिन गुलशन कुमार ने उनकी मांग के आगे झुकने से मना कर दिया। जिसकी वजह से 12 अगस्त, 1997 को मुंबई में एक मंदिर के बाहर गोली मारकर उनकी हत्या कर दी गयी।

गुलशन कुमार वैष्णो देवी के भक्त थे। वैष्णो देवी में उनकी गहरी आस्था थी। उन्होंने वैष्णों देवी में श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए काफी सारे काम करवाए। इसके अलावा वो हर रोज पश्चिमी मुंबई के अंधेरी इलाके में जीतनगर के जीतेश्वर महादेव मंदिर जाया करते थे। 12 अगस्त, 1997 को सुबह करीब आठ बजे गुलशन कुमार पूजा करने मंदिर पहुंचे थे। करीब साढ़े दस बजे का वक्त रहा होगा। गुलशन कुमार मंदिर में पूजा करके बाहर निकल रहे थे। तभी उन्हें अपनी पीठ पर बंदूक की नाल महसूस हुई। उन्होंने सामने एक शख्स को हाथ में बंदूक लिए देखा। इसके पहले की गुलशन कुमार कुछ कह पाते उसके पहले ही उन पर ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी।

बंदूक से उन पर 16 राउंड फायरिंग की गई। उनकी गर्दन और पीठ में 16 गोलियां लगी थीं। बचने के लिए वो आसपास के घरों के दरवाजे पीटते रहे। लेकिन किसी ने दरवाजा नहीं खोला। उस वक्त गुलशन कुमार के साथ सिर्फ उनका ड्राइवर था। ड्राइवर ने अपने मालिक को बचाने के लिए हत्यारों पर कलश फेंकना शुरू कर दिया। लेकिन हत्यारे नहीं रुके वो गोलियां बरसाते रहे। उन्होंने ड्राइवर के पैर पर भी गोली चलाई, जिससे वो वहीं जख्मी हो गया। गुलशन कुमार को सुरक्षा उपलब्ध करवाई गई थी लेकिन उन्हें मुंबई पुलिस के बजाए यू.पी. पुलिस ने सुरक्षा मुहैया करवाई थी। जिस दिन गुलशन कुमार की हत्या हुई, उस रोज उनका बॉडीगार्ड बीमार था। इसलिए वो उनके साथ नहीं था। मारिया ने अपनी किताब में लिखा है कि क्राइम ब्रांच ने उन्हें सुरक्षा उपलब्ध करवाई थी, लेकिन जब यूपी पुलिस ने उन्हें कमांडो सिक्योरिटी उपलब्ध करवाई तो मुंबई क्राइम ब्रांच ने अपनी सुरक्षा वापस ले ली। गुलशन कुमार की हत्या में अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम और अबू सलेम का नाम लिया जाता है। कहा जाता है कि दाऊद इब्राहिम ने गुलशन कुमार से 10 करोड़ की फिरौती मांगी थी। गुलशन ने ये रकम देने से मना कर दिया था। उन्होंने कहा था कि पैसे उसे (दाऊद) देने के बजाए वो उन पैसों से वैष्णो देवी में भंडारा करवाना पसंद करेंगे। इसी के बाद उनकी हत्या कर दी गई।

गुरुवार, 10 अगस्त 2023

सोनू कक्कड़

सोनू कक्कड़
जन्म11 अगस्त 1987
ऋषिकेश, उत्तराखण्ड
जीवनसाथी
नीरज (2006-अब तक)
संबंधी
नेहा कक्कड़ (बहन)
टोनी कक्कड़ (भाई)
उनका जन्म ऋषिकेश,उत्तराखंड में हुआ था। उन्होंने 5वर्ष की आयु से जागरण में गाना शुरू कर दिया था, जब उनके माता-पिता दिल्ली स्थानान्तरित हुए। वह बाद में मुंबई स्थानांतरित हो गयी जहां बॉलीवुड संगीत निर्देशक संदीप चौटा ने उन्हें एक गायन प्रतियोगिता में गाते हुए सुना और उन्हें 'गीत बाबू जी जरा धीरे चलो' गाने का मौका दिया।वह गायिका नेहा कक्कड़ की बड़ी बहन है जो एक प्रमुख बॉलीवुड गायिका है

जैकलीन फर्नांडिस

🎂जन्म : 11 अगस्त 1985 मनामा, बहरीन
माता-पिता: एलरॉय फेर्नान्सेज़, किम
भाई: वारेन फ़र्नांडिज़, गेराल्डाइन वॉकर, रयान फ़र्नांडिज़
जैकलिन फ़र्नांडीस श्रीलंकाई मूल की, भारतीय अभिनेत्री व मॉडल है जो हिन्दी फ़िल्मों में कार्यरत है। वे 2006 की मिस श्रीलंका यूनिवर्स रह चुकी है। उन्हें 2010 का सर्वश्रेष्ठ नई अभिनेत्री का आईफ़ा और स्टारडस्ट पुरस्कार फ़िल्म अलादीन के लिए प्रदान किया गया था।
जैकलिन फ़र्नांडीस श्रीलंकाई मूल की, भारतीय अभिनेत्री व मॉडल है जो हिन्दी फ़िल्मों में कार्यरत है। वे 2006 की मिस श्रीलंका यूनिवर्स रह चुकी है। उन्हें 2010 का सर्वश्रेष्ठ नई अभिनेत्री का आईफ़ा और स्टारडस्ट पुरस्कार फ़िल्म अलादीन के लिए प्रदान किया गया था। इन्होंने अपने कैरियर की अलादीन फ़िल्म से 2009 से की थी जबकि इन्होंने कई सुपर हिट फ़िल्मों में भी कार्य किया है जिसमें सलमान ख़ान के साथ किक (2014फ़िल्म) ,रॉय जैसी फ़िल्मों में कार्य किया है। ये डेविड धवन की निर्देशित फ़िल्म जुड़वा 2 में वरुण धवन के साथ भी दिखाई दीं।

📽️२००९ अलादीन जैसमीन 
२०१० जाने कहाँ से आयी है तारा 
२०१० हाउसफ़ुल (2010 फ़िल्म) धन्नो "आपका क्या होगा (धन्नो)" गीत में विशेष उपस्थिति
२०११ मर्डर 2 
२०१२ हाउसफ़ुल २ 
२०१३ रेस 2 ओमिषा 
२०१३ रमैया वस्तावैया अज्ञात "जादू की झप्पी" गीत में विशेष उपस्थिति
२०१४ किक डॉ. शायना मेहरा 
२०१५ रॉय आयशा/टिया दो किरदार
२०१५ बेनगिस्तान रोजन्ना 
२०१५ ब्रदर्स जेनि फ़र्नन्डेस 
२०१५ डेफ़िनेशन अफ़ फ़ियर सराह फोर्द्लिङ हॉलिवुड फिल्म
२०१६ हाउसफ़ुल 3
२०१६ डिशूम इशिका 
२०१६ ए फ़्लाइंग जट्ट कृति 
२०१७ जुड़वा 2 अलीशा 
२०१८ बाग़ी २ स्वयं गीत "एक दो तीन" में विशेष उपस्थिति
2018 रेस 3 जेसिका 
2019 ड्राइव तारा 
2020 मिसेज सीरियल किलर
2021 भूत पुलिस

तापस रेलिया

तापस रेलिया 
गुजरात के सूरत के संगीत रचयिता है
🎂जन्म11 अगस्त 1978 
सूरत , गुजरात, भारत
शैलियां
फ़िल्म स्कोर, पॉप, लोक, नया युग, भारतीय शास्त्रीय, फ़्यूज़न
व्यवसाय
संगीतकार, संगीत निर्माता, गायक, गीतकार
तापस रेलिया का जन्म सूरत , गुजरात में एक गुजराती जोड़े के यहाँ हुआ था जो मूल रूप से सूरत के थे

 *(लेकिन NRI वॉट्सएप ग्रुप के एडमिन मोटा भाई के शहर अहमदाबाद में रहते थे)*

 उन्होंने अपना पूरा बचपन और किशोरावस्था अहमदाबाद में बिताई और सेंट जेवियर्स हाई स्कूल, लोयोला हॉल, अहमदाबाद से उच्च माध्यमिक विद्यालय की पढ़ाई पूरी की । 1996 में वह आगे की शिक्षा और संगीत में अपना करियर बनाने के लिए मुंबई चले गए।उन्होंने पियानो को अपने प्रमुख वाद्ययंत्र के रूप में लेकर पश्चिमी शास्त्रीय संगीत सीखना शुरू किया और लंदन में ट्रिनिटी लाबान संगीत एवं नृत्य संगीतविद्यालय की 7वीं कक्षा पूरी की। इसके साथ ही, उन्होंने व्यावसायिक संगीत के क्षेत्र में भी प्रयोग किया और खुद को सिंथेसाइज़र और सीक्वेंसर पर संगीत प्रोग्रामिंग सिखाई।वर्ष 2000 में वह अमेरिका गए, और ग्रीष्मकालीन पाठ्यक्रम के रूप में न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय , न्यूयॉर्क शहर में फिल्म और मल्टीमीडिया के लिए कंपोज़िंग का अध्ययन किया , और इसके पूरा होने के बाद उसी वर्ष भारत लौट आए।

सुनील शेट्टी

सुनील शेट्टी

🎂जन्म: 11 अगस्त 1961, मुल्की
पत्नी: मना शेट्टी (विवा. 1991)
बच्चे: अथिया शेट्टी, आहान शेट्टी
बहन: सुनीता तरुण प्रताप, सुजाता शेट्टी
माता-पिता: वीरपा शेट्टी
सुनील शेट्टी राजपूत भारतीय फ़िल्मों के एक अभिनेता, निर्माता और व्यापारी हैं, जो खास कर बॉलीवुड फिल्मों में सक्रिय रहते हैं। इन्हें इस काम को करते हुए 25 साल से भी ज्यादा हो चुका है और अब तक ये 110 से ज्यादा फिल्मों में काम कर चुके हैं। इन्होंने सबसे ज्यादा काम मारधाड़ और हँसाने वाली फिल्मों में किया है।
सुनील शेट्टी ने फिल्मों में अभिनय की शुरुआत बलवान (1992) फिल्म से की थी, जिसमें उनके साथ दिव्या भारती थी। ये फिल्म हिट रही और इन्हें एक्शन हीरो के रूप में पहचान मिली। इसके बाद इन्होंने कई सफल फिल्मों में मुख्य किरदार निभाया है, जिसमें वक्त हमारा है (1993), दिलवाले (1994), अंत (1994), मोहरा (1994), गोपी किशन (1994), कृष्णा (1996), सपूत (1996), रक्षक (1996), बॉर्डर (1997), भाई (1997), हेरा फेरी (2000), धड़कन (2000), ये तेरा घर ये मेरा घर (2001), मैं हूँ ना (2004) आदि।
सुनील शेट्टी का जन्म तुलु भाषी बन्त परिवार में 11 अगस्त 1961 को मुल्की, मंगलोर, भारत में हुआ था। इन्होंने माना शेट्टी से शादी कर ली। जिसके बाद 5 नवम्बर 1992 को अथिया शेट्टी का, और 15 जनवरी 1996 को आहान शेट्टी का जन्म हुआ।

खेम चंद परकाश

महान संगीतकाऱ खेमचंद प्रकाश की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि
🎂जन्म 12 दिसम्बर
⚰️10 अगस्त 1949
खेमचन्द प्रकाश का जन्म 12 दिसम्बर 1907 में सुजानगढ़ बीकानेर राजपूताना में हुआ था

जितनी जिज्ञासा गंगा और यमुना हमारे अवचेतन या चेतन मन में जगाती हैं, उतनी ही दिलचस्पी हमें इनके उद्गम यानी गंगोत्री और यमनोत्री ग्लेशियरों को लेकर भी रही है. कहना ग़लत नहीं होगा कि ये ग्लेशियर न होते तो नदियां न होतीं. यानी उद्गम है, तो प्रवाह है और प्रवाह है तो जीवन है. क्या यह तथ्य गुरू और शिष्य या गॉडफ़ादर और प्रोटीज के सन्दर्भ में कायम रहता है? रमाकांत आचरेकर न होते या फिर राजसिंह डूंगरपुर न होते तो सचिन तेंदुलकर को सामने कौन और कैसे लाता? महमूद न होते तो अमिताभ बच्चन कब या कभी ‘अमिताभ बच्चन’ बनते? ठीक इसी तरह जिस शख्स की हम बात कर रहे हैं, अगर वे न होते तो सोचिये, महान किशोर कुमार और महानतम लता मंगेशकर को कौन दुनिया के सामने लाता?

शायद इनको नयी पीढ़ी तो भूल चुकी होगी. यहां बात राजस्थान के सुजानगढ़ क़स्बे में जन्मे संगीतकार खेमचंद प्रकाश की हो रही है. वे खेमचंद प्रकाश जिन्होंने लता मंगेशकर से फ़िल्म ‘महल’ (1949) का गाना ‘आएगा आने वाला’ और किशोर कुमार से ‘जिद्दी’ (1948) का ‘मरने की दुआएं क्यूं मांगूं, जीने की तम्मना कौन करे’ गवाकर दुनिया को दो सितारे दे दिए. आप कहेंगे, प्रतिभाएं किसी शख्स या परिस्थिति की मोहताज नहीं होतीं. तो यह बात बहस का मुद्दा हो सकती है कि अगर नूरजहां पाकिस्तान न गई होतीं या उनको खेमचंद प्रकाश, नौशाद या मदन मोहन जैसे संगीतकार मिले होते तो क्या वे लता को पीछे छोड़ देतीं?

खेमचंद प्रकाश को संगीत विरसे में मिला था. उनके पिता पंडित गोवर्धन प्रसाद जयपुर के महाराज माधो सिंह (द्वितीय) के दरबारी गायक थे. खेमचंद 19 बरस की उम्र में यहीं दरबारी गायक और कथक नृत्यकार बन गए. क़िस्मत में बॉम्बे (मुंबई) आना बदा था. पर देखिये, वही क़िस्मत पहले कहां-कहां लेकर गयी. बीसवीं सदी में भारत के राजाओं-महाराजाओं की स्थिति ख़राब थी. जयपुर से निकलकर खेमचंद प्रकाश कुछ दिनों के लिए राजा गंगा सिंह के बुलावे पर बीकानेर चले गए. वहां मन नहीं लगा तो नेपाल के राजदरबार में गायक हो गए. कुछ समय बाद वहां से कलकत्ता आकर रेडियो कलाकार बन गए. यहां उनकी मुलाकात संगीतकार तिमिर बरन से हुई जिन्होंने खेमचंद को ‘न्यू थिएटर्स’ के लिए अनुबंधित कर लिया. 1935 में आई पहली ‘देवदास’ का संगीत तिमिर बरन का ही था. कहते हैं कि इसके गाने ‘बालम आये बसो मेरे मन में’ और ‘दुःख के दिन अब बीतत नाहीं’ खेमचंद ने ही कंपोज़ किये थे. हालांकि, इनके गीतकार केदार शर्मा इनका क्रेडिट महान कुंदन लाल सहगल को देते हैं.

1938 में ‘न्यू थिएटर्स’ की एक और फ़िल्म आई थी ‘स्ट्रीट सिंगर’. वही जिसमें केएल सहगल ने ‘बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाए’ गाया था. इस फ़िल्म में एक हल्का-फुल्का गाना था ‘लो मैडम खा लो खाना’. यह खेमचंद पर फ़िल्माया गया था.

उन दिनों पृथ्वीराज कपूर अपनी थिएटर कंपनी ‘पृथ्वी थिएटर्स’ लेकर शहर-शहर घूमते थे. उन्होंने कलकत्ते में ये फ़िल्म देखी. ‘पापाजी’ खेमचंद की प्रतिभा पहचान गए और उन्हें बॉम्बे आने के लिए कह दिया. 1939 के आसपास खेमचंद प्रकाश सामान उठाकर मायानगरी चले आये.

1939 से लेकर 1943 तक खेमचंद ने कभी अच्छा और कहीं दरमियाना संगीत जिन फ़िल्मों में दिया था वे ‘गाज़ी सलाउद्दीन’, ‘फ़रियाद’ ‘खिलौना’, ‘चिराग’ आदि थीं. इस दौरान वे ‘सुप्रीम पिक्चर्स’ और ‘रणजीत मूवीटोन’ के साथ जुड़े. फिर 1943 में आई ‘तानसेन’ ने सब कुछ हमेशा के लिए बदल दिया. केएल सहगल से उन्होंने राग दीपक में ‘दिया जलाओ जगमग जगमग’ गवाकर तहलका मचा दिया. बताते हैं कि इस गीत के लिए खेमचंद ने महीने भर मेहनत की थी!

ग़ुलाम हैदर के साथ-साथ खेमचंद प्रकाश ने भी लता मंगेशकर की प्रतिभा को बहुत पहले ही भांप लिया था, तब, जब वे रणजीत मूवीटोन के लिए संगीत रचते थे. खेमचंद ने लता को गानों के लिए अनुबंधित करने की बात रणजीत के मालिक चंदूलाल शाह से की. शाह को लता की आवाज़ पसंद नहीं आई. खेमचंद और शाह में झगड़ा हो गया. लता को गवाने की ज़िद पर उन्होंने रणजीत मूवीटोन छोड़कर बॉम्बे टाकीज़ पकड़ लिया.

यह वही स्टूडियो था जिसकी स्थापना देविका रानी के पति हिमांशु रॉय ने की थी और उनके पार्टनर थे संगीतकार मदन मोहन के पिता रायबहादुर चुन्नीलाल. इसी स्टूडियो से अशोक कुमार निकले और देवानंद की पहली हिट फ़िल्म ‘जिद्दी’ भी इसी का प्रोडक्शन थी. किशोर कुमार का पहला हिट गीत यहीं से आया. फ़िल्म के डुएट ‘ये कौन आया करके सोलह सिंगार’ की वजह से लता और किशोर एक साथ आये.

इस फ़िल्म के दौरान इन दोनों से जुड़ा हुआ एक बेहद दिलचस्प क़िस्सा है. हुआ यह कि एक रोज़ लता रिकॉर्डिंग के लिए लोकल ट्रेन से बॉम्बे टाकीज़ के स्टूडियो गोरेगांव जा रहीं थीं. उनके साथ एक दुबला सा लड़का भी उतरा और उनके पीछे हो लिया. लता घबराई सी स्टूडियो पंहुचीं और खेमचंद को क़िस्सा बताया. यह बताने के बाद जैसे ही वे मुड़ीं तो उस लड़के को खड़ा पाकर लगभग बदहवास हो गयीं. अब तक खेमचंद पूरा माजरा समझ गए थे. हंसते-हंसते पूरी यूनिट लोट-पोट हो गयी और तब लता को मालूम हुआ कि वह लड़का मशहूर अभिनेता अशोक कुमार का छोटा भाई किशोर कुमार है.

साल 1949 में बॉम्बे टाकीज़ ने अपनी सबसे बड़ी और शानदार फ़िल्म ‘महल’ प्रोड्यूस की. इसका संगीत खेमचंद की ज़िम्मेदारी था. लता उनके कैंप का स्थायी हिस्सा बन चुकी थीं. फ़िल्म के डायरेक्टर थे कमाल अमरोही. नक्शब के गीत ‘आएगा आनेवाला’ की शुरुआती लाइनें कमाल अमरोही ने लिखी थीं जिन्हें खेमचंद गाने में शामिल करना नहीं चाहते थे. पर अमरोही के इसरार के आगे हार गए. इन्ही दो पंक्तियों से गाने में ज़बरदस्त प्रभाव पैदा हो गया.

खेमचंद ने लता को इन्हें गाते हुए माइक से दूर जाकर फिर पास आने को कहा था. ‘धुनों की यात्रा में पंकज राग लिखते हैं, ‘खेमचंद प्रकाश इस गीत की धीमी लय को लेकर इतने आशंकित थे कि उन्होंने इसको फ़िल्म से निकालने का मन बना लिया था’. पर इस गीत की वजह से लता समकालीन गायिकाओं से मीलों आगे निकल गयीं और फिर बाकी इतिहास हो गया. इस गीत के मुखड़े में सिर्फ़ दो लफ्ज़ हैं-‘आएगा’ और ‘आनेवाला’ और शायद यह सबसे छोटे मुखड़े वाला गीत है. इसके बाद भी इसका कंपोज़िशन कमाल का है. ऐसी ही एक कोशिश आनंद बख्शी और एसडी बर्मन ने ‘इश्क़ पर ज़ोर नहीं’(1970) के गीत ‘ये दिल दीवाना है, दिल तो दीवाना है, दीवाना दिल है ये, दिल दीवाना’ बनाकर की थी, पर वह बात नहीं बनी’. ‘महल’ के गाने के बिना लता अधूरी हैं, खेमचंद प्रकाश अधूरे हैं और अधूरा रहेगा यह लेख ग़र वह गीत न बजाया.

‘लता सुर गाथा’ में यतींद्र मिश्र लिखते हैं कि ‘महल’ लता मंगेशकर के संघर्ष के शुरुआती दिनों की फ़िल्म है और इसके गानों के लिए उन्हें क्रेडिट न देकर रिकॉर्ड पर मधुबाला के किरदार ‘कामिनी’ का नाम दिया गया था!. उनके साथ एक बातचीत में वे कहती हैं, ‘खेमचंद जी का संगीत इतना दुरुस्त होता था कि उसकी रिहर्सल भी हम लोग न जाने कितनी बार करते’. शायद यही कारण है कि राजू भारतन लता मंगेशकर की जीवनी ‘अ बायोग्राफी’ में लिखते हैं, ‘रिकॉर्डिंग रुम में जाने से पहले यह धुन लता के पूरे अंतर्मन का हिस्सा बन चुकी थी’. लता मंगेशकर ने खेमचंद के साथ तीन फ़िल्मों के लिए गाने गाये थे. तीसरी फ़िल्म थी आशा (1948).

ठीक इसी प्रकार कुंदनलाल सहगल और खेमचंद प्रकाश की बात की जा सकती है. जानकरों के मुताबिक़ यह सवाल बेमानी है कि सहगल की गायकी ने ऐसे गीतों को हिट बनाया या खेमचंद प्रकाश की भावपूर्ण तर्ज़ों ने. दोनों ही एक दूसरे के पूरक थे. पंकज राग लिखते हैं कि खेमचंद सहगल के बिना भी माधुर्य रच सकते थे और यह बात उन्होंने ‘भर्तृहरि’(1944) के गानों को अन्य गायकों से गवाकर सिद्ध कर दी थी. वहीं 40 के दशक की गायिका ख़ुर्शीद के ज़्यादातर लोकप्रिय गाने खेमचंद प्रकाश ने ही रचे थे. एक बात और. मन्ना डे और नौशाद भी खेमचंद प्रकाश की निगहबानी में पले-बढ़े और पके.

खेमचंद प्रकाश ने कई फ़िल्मों में शानदार संगीत दिया. पर वे ‘महल’ के पार नहीं जा पाए. शायद क़िस्मत की बात थी कि इस फिल्म के रिलीज़ होने के चंद महीनों बाद, महज़ 42 साल की उम्र में 10 अगस्त, 1950 को वे चल बसे. ‘महल’ का संगीत उनका ‘स्वान सांग’ (अंतिम रचना) नहीं था, पर यकीनन यह उनकी, लता मंगेशकर की और बॉलीवुड की सर्वश्रेष्ठ रचनाओं में से एक है. अफ़सोस! वे अपनी सबसे बड़ी कामयाबी न देख पाए.

सुजानगढ़ में एक हवेली है, जो खेमचंद प्रकाश ने अपनी बेटी के नाम पर ख़रीदी थी. मुफ़लिसी के दिनों में यह गिरवी रखी गयी. अब कोई और ही इसका मालिक है. कुछ समय पहले खबर आई थी कि मध्य प्रदेश की सरकार ने किशोर कुमार की खंडवा के बॉम्बे बाज़ार स्थित हवेली को गिराकर रास्ता बड़ा करने का फ़ैसला किया है. गिरा दीजिये. यादें हवेलियों में नहीं, ज़हनों में पलती हैं.

मनुस्मृति

. ................मनुस्मृति.................... जरा सोचिए, अगर आज भारत का कानून यह तय कर दे कि— "एक आम आदमी चोरी करे तो उसे...