शुक्रवार, 2 जून 2023

राज कपूर

जन्म
रणबीर राज कपूर
🎂14 दिसम्बर 1924
पेशावर, पश्चिमोत्तर सीमांत ब्रिटिश भारत (वर्तमान में खैबर पख्तूनख्वा, पाकिस्तान)
मृत्यु
⚰️2 जून 1988 (उम्र 63)
नयी दिल्ली, भारत
राष्ट्रीयता
भारतीय
अन्य नाम
शोमैन, भारतीय सिनेमा का महान् शोमैन, भारतीय सिनेमा का चार्ली चैप्लिन, राज साहब
नागरिकता
भारतीय
व्यवसाय
अभिनेता, फिल्म-निर्माता, निर्देशक
कार्यकाल
1935–1988
जीवनसाथी
कृष्णा मल्होत्रा (वि॰ 1946–88)
बच्चे
रणधीर कपूर
ऋतु नंदा
ऋषि कपूर
रीमा कपूर जैन
राजीव कपूर
संबंधी
द्रष्टव्य कपूर परिवार
पुरस्कार
फिल्म फेयर पुरस्कार सर्वश्रेष्ठ फिल्म
फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार
फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ निर्देशक पुरस्कार
फिल्म फेयर पुरस्कार सर्वश्रेष्ठ सम्पादक
राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार हिन्दी में सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म

आपको पता है भारत से दो लोग रूस में बहुत पॉपुलर थे। एक था नेहड़ु और दूसरा राजकपूर। राज कपूर का फेमस होना इसलिए था कि वो भी नेहड़ु की तरह ही एक घोर वामपन्थी था। आपने अक्सर देखा होगा कि रूस में राजकपूर की फिल्में और गाने बड़े फेमस हुए हैं। लेकिन उसका कारण राज कपूर का कोई कालजयी फ़िल्म बना डालना नही था बल्कि वो इकोसिस्टम था जिसका वो हिस्सा था। रूस जो "हाफ ग्लास वाटर" थ्योरी को दुनिया मे फैला उनकी संस्कृति खत्म करने में लगा था उसमें राज कपूर भारत मे उसका सबसे बड़ा एजेंट था।
हाफ ग्लास थ्योरी वही थी जिसे आज "फ्री सेक्स" कहा जाता है। अर्थात महिला को इतना चरित्रहीन कर दो कि वो यहां वहां हमबिस्तर होती रहे और उसे इसमे कुछ गलत न लग ये आधुनिकता लगे। यही काम रूस अमेरिका से लेकर भारत हर जगह कर रहा था।

दुनिया को गलतफहमी है कि अमेरिका कोल्ड वॉर जीता लेकिन हकीकत ये है कि रूस का तो कुछ क्षेत्रफल गया लेकिन रूस ने अमेरिका का सारा कल्चर ही वामपन्थी बना दिया। उसकी हॉलीवुड में वो गंदगी भरी गयी कि पूरा अमेरिकी समाज आज परिवारमुक्त हो गया है। यही काम राज कपूर जैसे बॉलीवुड के माध्यम से कर रहे थे। आज भी हो रहा है।
सोचिये न कि कितना गन्ध राज कपूर के अंदर था कि अपनी माँ के साथ नहाते हुए वो उसके यौनांग निहारता था और उन्हें इमेजिन कर कर ऑब्सेस्ड होता था। यही चीज तो फिर उसने फिल्मों के माध्यम से दिखाया जहां मेरा नाम जोकर(शायद यही फ़िल्म) में छोटा ऋषि कपूर, सिमी अग्रवाल को नहाते हुए देखता है। जीनत अमान से लेकर मंदाकिनी जैसों को न्यूड कराया जाता है। बहुत सी अन्य फिल्मों में भी इस तरह के नग्न चित्रण किसी भक्ति से लेकर मातृत्व के नाम पर डाल दिये गए।

यही वो दौर था जहां पर्दे पर ये सब हो रहा था और पीठ पीछे उसी तरह की अश्लील पार्टियां चल रही थी जिन्हें आज Rave Party कहते हैं जहां नशा और सेक्स खुलकर परोसा जाता है। आप अक्सर सुनते होंगे कि बॉलीवुड में तो पत्नी एक्सचेंज का रिवाज भी है.. तो ये कल्चर एकाएक नही बना। बॉलीवुड के शुरुआत जहां कोई लड़की भांड नही बनना चाहती थी वहां सबसे पहले वेश्याओं से काम शुरू किया गया। फिर इस इंडस्ट्री को पॉपुलर और अट्रैक्टिव बना आम घर की लड़कियों को यहां जाने को प्रेरित कराया गया। फिर धीरे धीरे ऑडिशन के नाम पर इनका कास्टिंग काउच हुआ।(गूगल में आपको तस्वीरे मिल जाएंगी जहां उस दौर में लड़की को अंतवस्त्र में खड़ा किया है फ़िगर चेक करने को)। धीरे धीरे फिर वही हुआ जो आज आपको टिकटोक से दिखता है। जैसे टिकटोक पर लड़कियां समझ गयी कि पुट्ठे दिखाने फॉलोवर बढाने का शॉर्टकट है वैसे ही तब बॉलीवुड एक शोहरत और पैसा बनाने का शॉर्टकट बन गया था, फिर क्या हो गया जो पर्दे के पीछे समझौते करने थे?

लड़की सोचती थी कि पर्दे पर तो एक सुंदर हीरोइन दिख रही हूँ। हर कोई मेरे दीवाने हैं। लड़कियां मुझ जैसा बनना चाहती हैं। पुरुष मुझसे शादी करने के सपने देखता है। जहां जाती हूँ भीड़ ठहर जाती है मेरे दीदार को। ये सब की चाहत ने घर घर मे सपने पनपा दिए कि मैं भी तो सुंदर हूँ.. मैं भी हीरोइन बनूंगी। तो कर लेंगे पर्दे के पीछे के समझौते।

शुरुआत में सारे अय्याशी-अश्लीलता के काम पर्दे के पीछे इसलिए थे क्योंकि पर्दे पर अश्लीलता देखने को अधिकतर समाज तैयार नही था लेकिन धीरे धीरे भाँडो ने एक एक पत्थर चला समाज की गहराई नापनी शुरू की। नतीजा ये हुआ कि "साला मैं तो साहब बन गया" पर जिस समाज मे बवाल हो गया था कि साला कैसे बोल दिया गाने में, वो धीरे धीरे कर भाग DK बोस तक बना दिया गया। ऐसे ही जहां रोमांस के नाम पर पेड़ के इर्द गिर्द घुमा जाता था। किसिंग के नाम पर दो फूल मिलते थे। वहां राज कपूर से शुरू हुआ... आज इस कदर बन चुका है कि खुलकर न्यूडिटी चलती है। धक्के वाले शॉट्स तक दिखाए जाते हैं सेक्स सीन के नाम पर वो भी पूरे साउंड इफेक्ट(moaning) के साथ। और क्या कहा जाता है कि क्रिएटिविटी है। ये सीन डालना जरूरी था। जैसे पुरानी फिल्में बिना इन सीन के तो अधूरी ही रह जाती थी.. लोग कहानी समझ ही नही पाते थे।

इसलिए आज जो बॉलीवुड की हकीकत है जहां सेक्स, ड्रग्स, वैश्यावृत्ति सब चलती है.. वो सब इस राज कपूर की देन है। लोग कहते भी हैं कि ये इतना श्याना था कि इसने इन सब चीजों से अपने घर की महिलाएं दूर रखी.. इसके परिवार में पहले तो किसी की शादी फिल्मी हीरोइन से नही होती थी लेकिन हो गयी तो ये उससे भी फ़िल्म छुड़वा देता था... लेकिन दूसरों की लड़कियों का इसने जो शोषण किया था उसी की हाय इसे ऐसी लगी कि फिर इसकी पोतियां आज तैमूर पैदा कर रही हैं। इमैजिन जिस खानदान में नाम पृथ्वीराज के नाम पर पड़ते थे, उस खानदान से आज तैमूर और जहांगीर जैसे निकल रहे हैं। ये इसको लगा श्राप ही है।

आज इसका पूरा खानदान कमजोर हो चुका है। एक समय जिनका सिक्का बॉलीवुड में चलता था, आज वहां कपूर खानदान के नाम पर गिने चुने बचे हैं जिनमे से बड़ा एक्टर या डायरेक्टर है ही कौन?? बस रणबीर कपूर जैसे तैसे चल रहा है जिसका भी करियर सलमान खान ने खराब कर दिया था कटरीना के चक्कर मे। आज बॉलीवुड में D गैंग की चलती है जो तेजी से इसका इस्लामीकरण कर रहा है। राज कपूर ने इसका वामीकरण किया था। नतीजा आज इसके अंदर सिर्फ ये दो प्रजाति के लोग हैं और अगर यहां काम करना है तो इनके शर्तो पर करना होगा। एक आपसे शरीर बिक़वायेगा तो दूसरा आपसे या अल्ला, या खुदा बिक़वायेगा। इसीलिए कथित राष्ट्रवादी भी भले ही कितना भारत भारत करते रहें लेकिन इन मामलों में उनका स्टैंड बाकी के भाँडो जैसा ही होता है।

अगर मना करोगे तो आप वहां काम ही नही कर पाओगे और हो सकता है आपका सुशांत भी बना दिया जाए और फिर ये लोग आपको कहें कि आप मानसिक रूप से बच्चे थे.. वहां की पॉलिटिक्स नही झेल पाए।

गुरुवार, 1 जून 2023

सोनाक्षी सिन्हा

सोनाक्षी सिन्हा

भारतीय फिल्म अभिनेत्री


जन्म तिथि: 02जून-1987

जन्म स्थान: मुंबई, महाराष्ट्र, भारत

पेशा: अभिनेता, गायक, फैशन मॉडल, मॉडल, फिल्म अभिनेता

राष्ट्रीयता: भारत


  • सोनाक्षी सिन्हा (उच्चारण [so?na?k?i? s?n?a?]; जन्म 2 जून 1987) एक भारतीय फिल्म अभिनेत्री और गायिका हैं।
  • अपने शुरुआती करियर में एक कॉस्ट्यूम डिजाइनर के रूप में काम करने के बाद, सिन्हा ने एक्शन-ड्रामा फिल्म दबंग (2010) में अभिनय की शुरुआत की, जिसने उन्हें सर्वश्रेष्ठ महिला पदार्पण के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार जीता। सिन्हा ने कई फिल्मों में पुरुष नायक की रोमांटिक रुचि निभाई है। राउडी राठौर (2012), सन ऑफ सरदार (2012), दबंग 2 (2012) और हॉलिडे: ए सोल्जर इज नेवर ऑफ ड्यूटी (2014) सहित टॉप-ग्रॉसिंग एक्शन-ड्रामा, हालांकि उन्हें भूमिका निभाने के लिए उनकी आलोचना की गई थी। कम कार्य क्षेत्र।
  • उन्हें रोमांटिक ड्रामा लुटेरा (2013) में तपेदिक से पीड़ित एक महिला के चित्रण के लिए आलोचनात्मक प्रशंसा मिली, जिसके लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार के लिए नामांकन मिला।
  • उन्होंने मिशन मंगल (2019) के अपवाद के साथ व्यावसायिक असफलताओं की एक श्रृंखला में अभिनय करके इस शुरुआती सफलता का अनुसरण किया, जिसमें उनकी सहायक भूमिका थी। फिल्मों में अभिनय के अलावा, सिन्हा ने इमरान खान के गीत में एक छोटा सा हिस्सा गाया है। उनकी फिल्म तेवर (2015) में "लेट्स सेलिब्रेट"।
  • उन्होंने एकल "आज मूड इश्कोलिक है" भी गाया है और उनकी कुल चार फिल्मों में गाया है।

नरगिस दत्त

प्रसिद्ध अभिनेत्री नरगिस के जन्मदिन पर हार्दिक श्रद्धांजलि।  🎂।                       ⚰️
नर्गिस दत्त हिन्दी सिनेमा की महान् अभिनेत्रियों में से एक है। नर्गिस मशहूर गायिका जद्दनबाई की पुत्री थीं। कला नर्गिस को विरासत में मिली थी और सिर्फ छह साल की उम्र में नर्गिस ने फ़िल्म 'तलाशे हक़' (1935) से अभिनय की शुरुआत कर दी थी। फ़िल्म मदर इंडिया में राधा की भूमिका के जरिए भारतीय नारी को एक नया और सशक्त रूप देने वाली नर्गिस हिंदी सिनेमा की महानतम अभिनेत्रियों में से एक थीं, जिन्होंने लगभग 2 दशक लंबे फ़िल्मी सफर में दर्ज़नों यादगार एवं संवदेनशील भूमिकाएँ की और अपने सहज अभिनय से दर्शकों का मनोरंजन किया।

नर्गिस दत्त का जन्म फ़ातिमा अब्दुल रशीद के रूप में 1 जून, 1929 को कलकत्ता में हुआ था। हालांकि उनके जन्मस्थान को लेकर विवाद है, कुछ लोग उनका जन्म इलाहबाद में होना मानते है। नर्गिस के पिता उत्तमचंद मूलचंद, रावलपिंडी से ताल्लुक रखने वाले समृद्ध हिन्दू थे एवं माता जद्दनबाई, एक हिंदुस्तानी क्लासिकल गायिका थीं। उनके दो भाई, अख्तर व अनवर हुसैन थे। नर्गिस की माता भारतीय सिनेमा से सक्रियता से जुड़ी हुई थीं।

कला नर्गिस को विरासत में मिली थी और सिर्फ छह साल की उम्र में नर्गिस ने फ़िल्म 'तलाशे हक़' (1935) से अभिनय की शुरुआत कर दी थी। नर्गिस ने मदर इंडिया के अलावा आवारा, श्री 420, बरसात, अंदाज, लाजवंती, जोगन परदेशी, रात और दिन सहित दर्ज़नों कामयाब फ़िल्मों में बेहतरीन अभिनय किया। राजकपूर के साथ उनकी जोड़ी विशेष रूप से सराही गई और दोनों की जोड़ी को हिंदी फ़िल्मों की सर्वकालीन सफल जोड़ियों में से गिना जाता है।

1940 और 50 के दशक में नर्गिस ने कई फ़िल्मों में काम किया और 1957 में प्रदर्शित महबूब ख़ान की फ़िल्म 'मदर इंडिया' नर्गिस की सर्वाधिक चर्चित फ़िल्मों में रही। इस फ़िल्म को ऑस्कर के लिए नामित किया गया था। उनके कुछ प्रमुख फ़िल्में इस प्रकार हैं- मदर इंडिया, अंदाज़, अनहोनी, जोगन, आवारा, रात और दिन, अदालत, घर संसार, लाजवंती, परदेशी, चोरी चोरी।

नर्गिस को पद्मश्री सहित कई प्रतिष्ठित पुरस्कार मिले। इनमें फ़िल्मफेयर पुरस्कार के अलावा फ़िल्म 'रात और दिन' के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनय का राष्ट्रीय पुरस्कार शामिल है।

1957 - फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार (फ़िल्म- मदर इंडिया)
1958 - कार्लोवी (अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव वरी) में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के लिए पुरस्कार (फ़िल्म- मदर इंडिया)
1958 - पद्मश्री
1968 - राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री (फ़िल्म- रात और दिन)

अभिनय से अलग होने के बाद नर्गिस सामाजिक कार्य में जुट गईं। नर्गिस ने पति सुनील दत्त के साथ अजंता आर्ट्स कल्चरल ट्रूप की स्थापना की। यह दल सीमाओं पर जाकर जवानों के मनोरंजन के लिए स्टेज शो करता था। इसके अलावा वे स्पास्टिक सोसाइटी से भी जुड़ी रहीं। बाद में नर्गिस को राज्यसभा के लिए भी नामित किया गया, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। वे अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकीं। इसी कार्यकाल के दौरान वे गंभीर रूप से बीमार हो गईं और 3 मई 1981 को कैंसर के कारण उनकी मौत हो गई।

नर्गिस की याद में 1982 में नर्गिस दत्त मेमोरियल कैंसर फाउंडेशन की स्थापना की गई। इस प्रकार निधन के बाद भी नर्गिस लोगों के दिल में बसी हुई हैं।

ख़्वाजा अहमद अब्बास मुल्क़

महान फ़िल्म निर्देशक, पटकथा लेखक, निर्माता एवं पत्रकार ख्वाजा अहमद अब्बास की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि
*🎂जन्म 07जून*
*⚰️01जून*
ख़्वाजा अहमद अब्बास मुल्क़ के उन गिने चुने लेखकों में शामिल हैं जिन्होंने अपने लेखन से पूरी दुनिया को मुहब्बत, अमन और इंसानियत का पैग़ाम दिया। अब्बास ने न सिर्फ फ़िल्मों, बल्कि पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र में भी नए मुक़ाम कायम किए। तरक्क़ीपसंद तहरीक से जुड़े हुए कलमकारों और कलाकारों की फ़ेहरिस्त में ख़्वाज़ा अहमद अब्बास का नाम बहुत अदब से लिया जाता है। आज उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें खिराज़-ऐ-अक़ीदत ~ 🌷

ख्वाज़ा अहमद अब्बास का जन्म 7 जून, 1914 को हरियाणा के पानीपत में हुआ था। उनके दादा ख़्वाजा ग़ुलाम अब्बास 1857 स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख सेनानियों में से एक थे और वह पानीपत के पहले क्रांतिकारी थे, जिन्हें तत्कालीन अंग्रेज़ हुक़ूमत ने तोप के मुँह से बाँधकर शहीद किया था। इस बात का भी शायद ही बहुत कम लोगों को इल्म हो कि ख़्वाज़ा अहमद अब्बास, मशहूर और मारूफ़ शायर मौलाना अल्ताफ हुसैन हाली के परनवासे थे। यानी वतन के लिए कुछ करने का जज्बा और जोश उनके ख़ून में ही था। अदब से मुहब्बत की तालीम उन्हें विरासत में मिली थी।

ख़्वाज़ा अहमद अब्बास की शुरूआती तालीम हाली मुस्लिम हाई स्कूल में और आला तालीम अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में हुई। उनके अंदर एक रचनात्मक बैचेनी नौजवानी से ही थी। 
अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद अब्बास जिस सबसे पहले अख़बार से जुड़े, वह ‘बॉम्बे क्रॉनिकल’ था। इस अखबार में बतौर संवाददाता और फ़िल्म समीक्षक उन्होंने साल 1947 तक काम किया। अपने दौर के मशहूर साप्ताहिक ‘ब्लिट्ज’ से उनका नाता लंबे समय तक रहा। इस अखबार में प्रकाशित उनके कॉलम ‘लास्ट पेज’ ने उन्हें देश भर में काफी शोहरत प्रदान की।
तेज़ी से काम करना, लफ्फाजी और औपचारिकता से परहेज, नियमितता और साफ़गोई ख़्वाजा अहमद अब्बास के स्वभाव का हिस्सा थे। विनम्रता उनकी शख्सियत को संवारती थी। 

कथाकार राजिंदर सिंह बेदी ने अब्बास की शख्सियत के बारे में लिखा है ~

"एक चीज जिसने अब्बास साहब के सिलसिले में मुझे हमेशा विर्त-ए-हैरत (अचंभे का भंवर) में डाला है, वह है उनके काम की हैरतअंगेज ताकतो-कूव्वत। कहानी लिख रहे हैं और उपन्यास भी। कौमी या बैनुल-अकवामी (अंतरराष्ट्रीय) सतह पर फिल्म भी बना रहे हैं और सहाफत को भी संभाले हुए हैं। आगे लिखते हैं, फिर पैंतीस लाख कमेटियों का मेंबर होना सामाजिक जिम्मेदारियों का सबूत है और यह बात मेंबरशिप तक ही महदूद नहीं। हर जगह पहुंचेंगे भी, तकरीर भी करेंगे। पूरे हिंदुस्तान में मुझे इस किस्म के तीन आदमी दिखाई देते हैं-एक पंडित जवाहर लाल नेहरू, दूसरे बंबई के डॉक्टर बालिगा और तीसरे ख्वाजा अहमद अब्बास। जिनकी यह कूव्वत और योग्यता एक आदमी की नही।"

अपनी स्थापना के कुछ ही दिन बाद, इप्टा का सांस्कृतिक आंदोलन जिस तरह से पूरे मुल्क़ में फैला, उसमें ख़्वाजा अहमद अब्बास का अहम हाथ है। अब्बास ने इप्टा के लिए खूब नाटक भी लिखे, कई नाटकों का निर्देशन भी किया। ‘यह अमृता है’, ‘बारह बजकर पांच मिनिट’, ‘जुबैदा’ और ‘चौदह गोलियां’ उनके मक़बूल नाटक हैं।

इप्टा द्वारा साल 1946 में बनाई गई पहली फिल्म ‘धरती के लाल’ ख्वाजा अहमद अब्बास ने ही निर्देशित की थी। कहने को यह फिल्म इप्टा की थी, लेकिन इस फ़िल्म में मुख्य भूमिका अब्बास ने ही निभाई थी। बंगाल के अकाल पर बनी यह फिल्म कई अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में समीक्षकों द्वारा सराही गई। इस फिल्म में जो प्रमाणिकता दिखलाई देती है, वह अब्बास की कड़ी मेहनत का ही नतीजा है। बंगाल के अकाल की वास्तविक जानकारी इक्कट्ठा करने के लिए उन्होंने उस वक़्त बाकायदा अकालग्रस्त इलाक़ों का दौरा भी किया। इस फ़िल्म की कहानी और संवाद ख्वाजा अहमद अब्बास ने ही लिखे थे। 

‘धरती के लाल’ ऐसी फ़िल्म थी जिसमें देश की मेहनतकश अवाम को पहली बार केन्द्रीय हैसियत में पेश किया गया है। पूरे सोवियत यूनियन में यह फिल्म दिखाई गई और कई देशों ने अपनी फ़िल्म लाइब्रेरियों में इसे स्थान दिया है। इंग्लैंड की प्रसिद्ध ग्रंथमाला पेंग्विन ने अपने एक अंक में उसे फिल्म-इतिहास में एक महत्वपूर्ण फिल्म कहा। सच बात तो यह है ‘धरती के लाल’ फिल्म से प्रेरणा लेकर ही विमल राय ने अपनी फिल्म ‘दो बीघा जमीन’ और सत्यजीत रॉय ने ‘पाथेर पांचाली’ में यथार्थवाद का रास्ता अपनाया।  

इसके बाद साल 1951 में उन्होंने ‘नया संसार’ नाम से अपनी खुद की फ़िल्म कंपनी खोल ली। ‘नया संसार’ के बैनर पर उन्होंने कई उद्देश्यपूर्ण और सार्थक फ़िल्में बनाईं। मसलन ‘राही’ (1953), मशहूर अंग्रेजी लेखक मुल्क राज आनंद की एक कहानी पर आधारित थी, जिसमें चाय के बागानों में काम करने वाले श्रमिकों की दुर्दशा को दर्शाया गया था। मशहूर निर्देशक वी. शांताराम की चर्चित फिल्म ‘डॉ. कोटनिस की अमर कहानी’ अब्बास के अंग्रेजी उपन्यास ‘एंड वन डिड नॉट कम बैक’ पर आधारित है।
‘अनहोनी’ (1952) सामाजिक विषय पर एक विचारोत्तेजक फिल्म थी। फिल्म ‘शहर और सपना’ (1963) में फुटपाथ पर जीवन गुजारने वाले लोगों की समस्याओं का वर्णन है, तो ‘दो बूँद पानी’ (1971) में राजस्थान के रेगिस्थान में पानी की विकराल समस्या को दर्शाया गया है।

गोवा की आजादी पर आधारित ‘सात हिंदुस्तानी’ भी उनकी एक उल्लेखनीय फिल्म है। मशहूर निर्माता-निर्देशक राज कपूर के लिए ख्वाजा अहमद अब्बास ने जितनी भी फिल्में लिखी, उन सभी में हमें एक मजबूत सामाजिक मुद्दा मिलता है। चाहे वो ‘आवारा’ हो, ‘जागते रहो’ या फिर ‘श्री 420’। पैंतीस वर्षों के अपने फ़िल्मी करियर में अब्बास ने तेरह फिल्मों का निर्माण किया। लगभग चालीस फिल्मों की कहानी और पटकथाएँ लिखीं, जिनमें ज़्यादातर राज कपूर की फ़िल्में हैं। अब्बास को भले ही फ़िल्मकार के रुप में अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली हो लेकिन बुनियादी तौर पर वे एक अफ़सानानिगार थे। अब्बास एक बेहतरीन अदीब थे। उन्होंने साहित्य की लगभग सभी विधाओं कहानी, उपन्यास, नाटक, रिपोर्ताज में जमकर लिखा। अब्बास की कहानियों की तादाद कोई एक सैंकड़े से ऊपर है। उन्होंने अंग्रेजी, उर्दू और हिंदी तीनों भाषाओं में जमकर लिखा।  

अब्बास की कहानियां अपने दौर के उर्दू के चर्चित रचनाकारों कृष्ण चंदर, इस्मत चुगताई, राजेन्द्र सिंह बेदी और सआदत हसन मंटो के साथ छपतीं थीं। हालांकि उनकी कहानियों में कहानीपन से ज्यादा पत्रकारिता हावी होती थी, लेकिन फिर भी पाठक उन्हें बड़े शौक से पढ़ा करते थे। अब्बास का अफ़साना ‘जिंदगी’ पढ़ने के बाद पाठक बखूबी उनकी सोच के दायरे और नज़रिए तक पहुंच सकते हैं। ख्वाजा अहमद अब्बास के कई कहानी संग्रह प्रकाशित हुए। जिनमें ‘एक लड़की’, ‘जाफरान के फूल’, ‘पांव में फूल’, ‘मैं कौन हूं’, ‘गेंहू और गुलाब’, ‘अंधेरा-उजाला’, ‘कहते हैं जिसको इश्क’, ‘नई धरती नए इंसान’, ‘अजंता की ओर’, ‘बीसवीं सदी के लैला मजनू’, ‘आधा इंसान’, ‘सलमा और समुद्र’, और ‘नई साड़ी’ प्रमुख कहानी संग्रह हैं। ‘इंकलाब’, ‘चार दिन चार राहें’, ‘सात हिंदुस्तानी’, ‘बंबई रात की बांहों में’ और ‘दिया जले सारी रात’ उनके प्रमुख उपन्यास हैं। ख्वाजा अहमद अब्बास के समस्त लेखन को यदि देखें, तो यह लेखन स्वछन्द, स्पष्ट और भयमुक्त दिखलाई देता है। 

उनकी कहानियों का दायरा पांच दशक तक फैला हुआ है। अब्बास की पहली कहानी ‘अबाबील’ साल 1935 में छपी और उसके बाद यह सिलसिला बीसवीं सदी के आठवें दशक तक चला। जब अब्बास ने अपनी पहली कहानी लिखी, तो उस वक्त उनकी उम्र महज उन्नीस साल थी। उन्नीस साल कोई अधिक उम्र नहीं होती लेकिन जो कोई भी इस कहानी को एक बार पढ़ लेगा, वह अब्बास के जेहन और उनके कहन का दीवाना हुए बिना नहीं रहेगा। इस एक अकेली कहानी से अब्बास रातों-रात देश-दुनिया में मशहूर हो गए।
कई जबानों में इस कहानी के अनुवाद हुए। अंग्रेजी, रूसी, जर्मन, स्वीडिश, अरबी, चीनी वगैरह-वगैरह। जर्मन ज़ुबान में दुनिया की बेहतरीन कहानियों का जब एक संकलन निकला, तो उसमें ‘अबाबील’ को शामिल किया गया।

कहानी में अब्बास ने किसान की जिंदगी का जिस तरह से खाका खींचा है, वह बिना गांव और किसानों की जिंदगी को जिये बिना मुमकिन नहीं। ताज्जुब की बात यह है कि अब्बास को गांव और किसान की जिंदगी का कोई जाती तजुर्बा नहीं था। कहानी लिखते समय किसानों के बारे में उनका इल्म न के बराबर था। एक इंटरव्यू में जब कृष्ण चंदर ने इसके मुतआल्लिक उनसे पूछा, तो अब्बास का बेबाक जवाब था ~

'कोई ज़रूरी नहीं कि हर कहानी अनुभव पर आधारित हो। जिस प्रकार क़ातिल के विषय में लिखने से पहले क़त्ल करना ज़रूरी नहीं। या एक वेश्या के जीवन का वर्णन करने के लिए यह ज़रूरी नहीं है कि लेखक स्वयं भी किसी वेश्या के साथ सो चुका हो।'

शहर और महानगरों का कड़वा यथार्थ अब्बास की कई कहानियों में सामने आया है। ‘अलिफ लैला' और ‘सुहागरात’ ऐसी ही संघर्षों और उसके बीच चल रही जिंदगी की कहानियां हैं। इन्हीं कहानियां का विस्तार उनकी फिल्म ‘शहर और सपना’ है। जो उस वक्त कई अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में सराही गई थी।  

अब्बास एक सच्चे वतनपरस्त और सेक्युलर इंसान थे। उनके सबसे करीबी दोस्तों में शामिल थे, इन्दर राज आनन्द, मुनीष नारायण सक्सेना, वी.पी. साठे, आर. के. करंजिया, राज कपूर, कृष्ण चंदर, अली सरदार जाफ़री आदि। अपनी वसीयत में उन्होंने लिखा था ~

‘मेरा जनाजा यारों के कंधों पर जुहू बीच स्थित गांधी के स्मारक तक ले जाएं, लेजिम बैंड के साथ। अगर कोई खिराज-ए-अकीदत पेश करना चाहे और तकरीर करे तो उनमें सरदार जाफ़री जैसा धर्मनिरपेक्ष मुसलमान हो, पारसी करंजिया हों या कोई रौशनख्याल पादरी हो वगैरह, यानी हर मजहब के प्रतिनिधि हों।’  

ख़्वाजा अहमद अब्बास ने अपनी आखिरी सांस माया नगरी मुंबई में ली। 1 जून 1987 को वे इस दुनिया से जिस्मानी तौर पर दूर चले गए। उन्होंने अपनी वसीयत में लिखा, ‘जब मैं मर जाऊंगा तब भी मैं आपके बीच में रहूंगा। अगर मुझसे मुलाक़ात करनी है तो मेरी किताबें पढ़ें और मुझे मेरे ‘आखिरी पन्नों’, ‘लास्ट पेज’ में ढूंढे, मेरी फिल्मों में खोजें। मैं और मेरी आत्मा इनमें है। इनके माध्यम से मैं आपके बीच, आपके पास रहूँगा, आप मुझे इनमें पायेंगे।’

मोहन कुमार


बॉलीवुड के जानेमाने प्रोड्यूसर डायरेक्टर स्क्रीन राइटर मोहन कुमार के जन्मदिन पर हार्दिक श्रद्धांजलि
मोहन का जन्म 1 जून,1934 को ब्रिटिश इंडिया के दौर में सियालकोट में हुआ था. देश का बंटवारा होने के बाद वो भारत लौट आए और मुंबई आकर उन्होंने अपने करियर की शुरुआत की मोहन कुमार ने  फ़िल्म आस का पंछी 1961,अनपढ़ 1962,आयी मिलन की बेला 1964, आप की परछाईयाँ 1964,अमन 1967, अनजाना 1969, आप आये बहार आयी1971,मोम की गुड़िया, अमीर गरीब 1974, आप बीती 1976, अवतार 1983,आल राउंडर 1984,अमृत 1986 एवं अम्बा 1990 जैसी फिल्में निर्देशित की मोहन ने बॉलीवुड की कई सारी प्रसिद्ध हस्तियों के साथ काम किया.

10 नवंबर 2017 में मोहन कुमार का निधन हो गया

संगीतकार भाईयों की जोड़ी साजिद वाजिद के वाजिद अली खान

वाजिद खान 🎂जन्म: 10 मार्च दिसंबर81, मंदसौर, मध्य प्रदेश, एक अंत ...
जन्म: वाजिद अली खान; 10 मार्च 1981
कुछ लोगो के अनुसार
वाजिद अली खान 7 अक्टूबर 1977-पैदा हुए
1 जून 2020⚰️सपुर्देखाक किया गया
प्रसिद्ध संगीतकार भाईयों की जोड़ी साजिद वाजिद के वाजिद अली खान की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रधांजलि

वाजिद अली ख़ान भारतीय हिन्दी सिनेमा की प्रसिद्ध संगीतकार जोड़ी 'साजिद-वाजिद' में से एक थे। वाजिद ख़ान कलात्मक जोड़ी 'साजिद-वाजिद' बनाने के लिए अपने बड़े भाई साजिद ख़ान के साथ जुड़ गए थे। उनका एकल अभिनय के रूप में एक अलग गायन कॅरियर भी था और एक पार्श्व कलाकार के रूप में उन्हें कई पुरस्कारों के लिए नामांकित किया गया था। बॉलीवुड में साजिद-वाजिद की जोड़ी काफी मशहूर थी। उन्होंन सबसे पहले 1998 में सलमान ख़ान की फिल्म 'प्यार किया तो डरना क्या' के लिए संगीत दिया था। 1999 में उन्होंने सोनू निगम की एल्बम 'दीवाना' के लिए संगीत दिया, जिसमें "दीवाना तेरा", "अब मुझे रात दिन" और "इस कदर प्यार है" जैसे गाने शामिल थे। उसी साल उन्होंने फिल्म 'हैलो ब्रदर' के लिए संगीत निर्देशकों के रूप में काम किया और 'हटा सावन की घाटा', 'चुपके से कोई और' तथा 'हैलो ब्रदर' जैसे गाने लिखे थे। इसके अलावा वाजिद ख़ान ने कई शो भी जज किये थे।

परिचय

वाजिद अली ख़ान का जन्म 7 अक्टूबर, 1977 को हुआ था। साजिद-वाजिद मशहूर तबला वादक उस्ताद शराफ़त अली ख़ान के बेटे हैं। साजिद-वाजिद की जोड़ी ने सोनू निगम की सुपरहिट ऐल्बम 'दीवाना' का संगीत दिया था। इसके बाद इस जोड़ी ने कई सुपरहिट फिल्मों का संगीत दिया। इनकी जोड़ी को बॉलिवुड के सबसे सफल संगीत डायरेक्टरों की जोड़ी में गिना जाता था। उन्होंने 'दबंग' सहित सलमान ख़ान की कई सुपरहिट फिल्मों में संगीत दिया। वाजिद केवल एक सफल संगीत डायरेक्टर ही नहीं थे बल्कि बेहतरीन गायक भी थे। उन्होंने कई सुपरहिट गानों को अपनी आवाज़ दी थी।

संघर्ष भरा समय

वाजिद ख़ान ने अपने संघर्ष की कहानी खुद ही एक शो के दौरान सुनाई थी। जब इस शो के मेजबान ने संगीतकार जोड़ी साजिद-वाजिद से पूछा कि उन्होंने अपना सफर कैसे शुरू किया तो सवाल के जवाब में वाजिद ने एक घटना बताई। जब उन्होंने एक प्रसिद्ध संगीत निर्देशक के साथ रिहर्सल की थी। इस दौरान उन्हें बेहद अपमानित महसूस हुआ था। वाजिद ने बताया, 'संगीत निर्देशक बनने के हमारे निर्णय के पीछे एक बहुत ही अजीब कहानी है। मैं गजल, जिंगल और एल्बम में गिटार बजाता था। एक दिन, मैं एक लोकप्रिय संगीत निर्देशक के सामने कुछ साज बजाने वाला था और हमारी टीम के किसी व्यक्ति ने गलती की। लेकिन हमारे एक साथी गिटारवादक, जिन्हें मुझसे कुछ समस्या थी उन्होंने संगीत निर्देशक से कहा, वाजिद ने एक गलती की है'।

आगे वाजिद ख़ान ने बात को पूरा करते हुए कहा, 'मैं परेशान हो गया और उनसे कहा, 'सर, मैंने गलती नहीं की, अगर आपको ऐसा लगता है तो सिर्फ मैं आपको बजा के बता सकता हूं'। उन्होंने कहा, 'आपको बहुत कुछ सीखना है, अब आप इस गीत को नहीं चलाएंगे'। मेरे पिता बाहर बैठे थे। यह मेरे लिए बहुत बड़ा अपमान था और मैं बहुत अपमानित महसूस कर रहा था। मैंने अपने साधन को पैक किया, अपने पिता को उनकी आंखों में देखा और मैं चला गया'।

वाजिद ख़ान ने बताया था कि वो इस घटना से परेशान थे और उन्होंने अपने भाई साजिद को इस बारे में बताया कि कैसे इस तरह के लोग किसी व्यक्ति की बात नहीं मानते या उन्हें मौका नहीं देते। साजिद ने उनसे पूछा, 'क्या संगीत निर्देशक एक बड़ी बात है?' जब वाजिद ने सकारात्मक जवाब दिया, तो साजिद ने जवाब दिया, 'ठीक है, फिर हम भी संगीत निर्देशक बन जाते हैं।' बस इस तरह से दोनों की जोड़ी टॉप संगीत डायरेक्टर्स में शुमार हो गई

मुख्य फ़िल्में

साजिद-वाजिद की जोड़ी ने 'प्यार किया तो डरना क्या', 'तुमको ना भूल पाएंगे', 'तेरे नाम', 'गर्व', 'मुझसे शादी करोगी', 'पार्टनर', 'हेलो', 'गॉड तुसी ग्रेट हो', 'वॉन्टेड', 'मैं और मिसेज खन्ना', 'वीर', 'नो प्रॉब्लम' और 'एक था टाइगर' जैसी सुपरहिट फिल्मों में संगीत दिया।

मृत्यु

वाजिद ख़ान का निधन 1 जून, 2020 को हुआ। कहा जा रहा था कि उनका निधन कोरोना वायरस के कारण हुआ था। वाजिद ख़ान के निधन की वजह उनके किडनी की समस्या बताई जा रही थी। इसके साथ ही कहा जा रहा था कि इलाज के दौरान उनका कोरोना टेस्ट भी पॉजिटिव आया था। लेकिन इन खबरों पर वाजिद ख़ान के परिवार ने एक स्टेटमेंट जारी कर विराम लगा दिया था। स्टेटमेंट में बताया गया कि वाजिद ख़ान का निधन कार्डियक अरेस्ट के चलते हुआ।

वाजिद ख़ान के भाई साजिद ख़ान ने अपने इंस्टाग्राम एकाउंट पर एक पोस्ट लिखा था, जिसमें उन्होंने इस बात का खुलासा किया। उन्होंने लिखा- 'हमारे प्यारे वाजिद का निधन 47 साल की उम्र में कार्डियक अरेस्ट के चलते 1 जून को रात साढ़े बारह बजे सुराना सेठिया अस्पताल में हुआ। उनका पिछले साल सफल किडनी ट्रांसप्लांट हुआ था और वह थ्रोट इन्फेक्शन का इलाज करवा रहे थे'। साजिद ख़ान द्वारा लिखी गई पोस्ट में कहीं भी इस बात का जिक्र नहीं था कि उनका निधन कोरोना वायरस के चलते हुआ।

अभिनेता,लेखक,निर्माता आर माधवन

प्रसिद्ध अभिनेता,लेखक,निर्माता आर माधवन के जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामनाएं

आर.माधवन उर्फ़ माधवन एक भारतीय फिल्म अभिनेता,लेखक,निर्माता और टीवी प्रस्तोता हैं। वह दो बार हिंदी सिनेमा में फिल्मफेयर पुरुस्कार जीत चुके हैं। साथ ही उन्हें तमिलनाडु स्टेट अवार्ड्स से भी नवाजा जा चुका है।  

आर.माधवन का जन्म 1 जून 1970 को जमशेदपुर में हुआ था। उनके पिता का नाम रंगनाथन हैं-जोकि टाटा स्टील एक्सिक्यूटिव हैं। उनकी माँ का नाम सरोजा है, जो बैंक ऑफ़ इंडिया में मैनेजर के पद पर कार्यरत हैं। उनकी एक छोटी बहन है- देविका रंगनाथन जोकि यूके में सॉफ्टवेयर इंजीनियर के पद पर कार्यरत हैं।  
माधवन शुरुआत से ही पढ़ाई में बेहद अव्वल थे। उन्हें साल 1988 में अपने स्कूल को बतौर कल्चरल एम्बैसडर के तौर पर कनाडा में रिप्रेजेंट करने का अवसर मिला था। इतना ही नहीं वह अपने कॉलेज के दिनों के दौरान काफी अच्छे कैडेट भी रह चुके हैं, उन्हें महाराष्ट्र बेस्ट कैडेट से नवाजा भी जा चुका है। माधवन कभी भी एक अभिनेता बनने की ख्वाइश नहीं रखते थे, वह एक आर्मी ऑफिसर बनना चाहते थे, वह एक बेस्ट कैडेट भी रह चुके हैं लेकिन जब आर्मी ज्वाइन करने का मौका आया तो उनकी उम्र छ महीने काम निकली उसके बाद उन्होंने अपना रुख पब्लिक स्पीकिंग की और कर दिया।   
वर्ष 1999 में माधवन की शादी उनकी कथित प्रेमिका सरिता बिर्जे से हुई। उनके एक बेटा है-वेदांत। 

वर्ष 1997 में माधवन ने अपने करियर की शुरुआत एक चन्दन के टीवी कमर्शियल ऐड से की थी। उसके बाद निर्देशक मणि रत्नम ने उन्हें अपनी एक फिल्म का ऑफर देकर स्क्रीन टेस्ट के लिये कहा, लेकिन बाद में उन्हें फिल्म से यह कहकर निकल दिया की वो उस रोल के लिए फिट नहीं बैठते। फिर माधवन ने छोटे पर्दे का सहारा लिया कई टेली शोज़ में काम किया। लोगों को उनका काम बेहद पसंद आया और 1998 में माधवन एक इंग्लिश फिल्म इन्फर्नो में इंडियन पुलिस ऑफिसर की भूमिका में नजर आये। लेकिन उन्हें कोई खास प्रसिद्ध नहीं मिली, ना ही वह दर्शकों की ही नजर में आये। उसके बाद माधवन ने कई साउथ की फिल्मों में काम किया। जिसके लिए उन्हें साउथ फिल्म फेयर अवार्ड से भी सम्मानित किया गया।   

माधवन को हिंदी सिनेमा में पहचान फिल्म रहना है तेरे दिल से मिली। यह फिल्म एक लव स्टोरी थी। इस फिल्म में माधवन के अपोजिट दिया मिर्जा नजर आयीं थीं। इस फिल्म ने उस साल बॉक्स-ऑफिस पर काफी व्यापार भी किया था। उसके बाद माधवन को हिंदी सिनेमा में फिल्मों के ऑफर की झड़ी लग गयी। उसके बाद वह फिल्म गुरु में नजर आए। इस फिल्म में अभिषेक बच्चन और ऐश्वर्या राय बच्चन मुख्य भूमिका में नजर आये थे। फिल्म ने बॉक्स-ऑफिस पर काफी अच्छा बिजनस किया था।आलोचकों ने इस फिल्म में माधवन के अभिनय की बेहद तारीफ भी की थी। 

साल 2010 में माधवन राजू हिरानी निर्देशित फिल्म 3 इडियट्स में नजर आये। यह फिल्म चेतन भगत के नॉवेल थ्री मिस्टेक्स ऑफ़ माय लाइफ पर आधारित थी। इस फिल्म में माधवन के अलावा आमिर खान, शरमन जोशी और करीना कपूर मुख्य भूमिका में नजर आई थीं। इस फिल्म ने बॉक्स-ऑफिस पर रिकॉर्ड-तोड़ कमाई की थी।  

इसके बाद साल 2011 में वह फिल्म तनु वेड्स मनु में नजर आये, इस फिल्म में उनके अपोजिट नेशनल अवार्ड विनिंग एक्ट्रेस कंगना राणावत नजर आई थीं । इस फिल्म ने बॉक्स-ऑफिस पर खूब धूम मचाई थी। जिस तरह यह फिल्म हिट हुई, उसी तरह इस फिल्म का सीक्वल भी लोगों को बहुत पसंद आया फिल्म ने बॉक्स-ओफ़िस करोड़ो कमाकर झंडे गाढ़ दिए।  

माधवन के बारे में अनसुनी बातें 

1- माधवन का जन्म 1 जून 1970 को झारखण्ड के जमशेदपुर में हुआ था। इनका पूरा नाम रंगनाथन माधवन है जिसमें 'रंगनाथन' उनके पिता का नाम है। 
2- माधवन को भारत में 'मैडी भाई', 'मैडी पाजी', 'मैडी भाईजान', 'मैडी सर', 'मैडी चेट्टा', 'मैडी अन्ना' के नाम से बुलाया जाता है। 
3- पढ़ाई पूरी करने के बाद माधवन ने एक टीचर के तौर पर कोल्हापुर में काम किया और मुंबई के 'के सी कॉलेज' से माधवन ने 'पब्लिक स्पीकिंग' में पोस्ट ग्रेजुएशन की। 
4- माधवन ने 1996 की शुरुआत में एक चन्दन के पाउडर का विज्ञापन किया था जिसके बाद मशहूर डायरेक्टर मणि रत्नम की फिल्म 'इरुवर' के लिए स्क्रीन टेस्ट भी दिया लेकिन मणि रत्नम ने इस फिल्म में उनका चयन नहीं किया लेकिन बाद में माधवन ने मणि रत्नम के साथ कई फिल्में की जिनमें से एक फिल्म 'गुरु' भी थी। 
5- फिल्मों में आने से पहले माधवन ने 'बनेगी अपनी बात' 'तोल मोल के बोल' और 'घर जमाई' जैसे टीवी सीरियल में काम भी किया था। माधवन की पहली फिल्म थी 'इस रात की सुबह नहीं'।
6- माधवन ने 2001 में रिलीज हुई तमिल फिल्म 'मिनाले' में साउथ की एक्ट्रेस रीमा सेन के साथ काम किया।  यह फिल्म डायरेक्टर मेनन की डेब्यू फिल्म थी और बाद में इसी फिल्म की हिंदी रीमेक फिल्म बनी 'रहना है तेरे दिल में'  जिसमें फिर से माधवन लीड रोल में नजर आए और उनके साथ दिया मिर्जा, और सैफ अली खान मुख्य भूमिका में दिखे। 
7- माधवन ने 'रंग दे बसंती', '3 इडियट्स', 'तनु वेड्स मनु' और हाल ही में 'तनु वेड्स मनु रिटर्न्स' में भी अहम भूमिका निभाई है।

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भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...