ग्रेट गामा
*🎂जन्म तिथि: 22-मई -1878*
*😁जन्म स्थान: अमृतसर, पंजाब, भारत*
*मृत्यु तिथि: 23-मई-1960*
*पाकिस्तानी पेशेवर पहलवान*
*पेशा: पेशेवर पहलवान, शौकिया पहलवान*
*राष्ट्रीयता: पाकिस्तान*
*पत्नी: वज़ीर बेगम*
*वज़न: 113 kg*
*बच्चे: असलम पहलवान*
*लंबाई: 1.71 मी*
*माता-पिता: मुहम्मद अज़ीज़ बक्ष*
गुलाम मोहम्मद बख्श बट (22 मई 1878 - 23 मई 1960), जिन्हें द ग्रेट गामा के नाम से जाना जाता है, एक पाकिस्तानी पहलवान थे जो विश्व के अपराजित चैंपियन बने रहे।
वह अपने बाकी दिनों में लाहौर में रहे। अमृतसर में पैदा हुए, फिर ब्रिटिश भारत के पंजाब प्रांत में, 1878 में, उन्हें 15 अक्टूबर 1910 को विश्व हैवीवेट चैम्पियनशिप के भारतीय संस्करण से सम्मानित किया गया, और मुक्त हार गए। दुनिया भर में शैली कुश्ती चैंपियन।
52 साल से अधिक के करियर में अपराजित, उन्हें अब तक के सबसे महान पहलवानों में से एक माना जाता है।
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दुनिया में अजेय गामा पहलवान का जन्म 22 मई 1878 ई. को अमृतसर, पंजाब में हुआ था, हालांकि इनके जन्म को लेकर विवाद है। इनके बचपन का नाम ग़ुलाम मुहम्मद था। इन्होंने 10 वर्ष की उम्र में ही पहलवानी शुरू कर दी थी। इन्होंने पत्थर के डम्बल से अपनी बॉडी बनाई थी। उस समय दुनिया में कुश्ती के मामले में अमेरिका के जैविस्को का बहुत नाम था। गामा ने इसे भी परास्त कर दिया था। पूरी दुनिया में गामा को कोई नहीं हरा सका था,बस एक बार कलकत्ता के दंगल में मथुरा के पहलवान "चंद्रसेन टिक्की वाले" ने कुश्ती का दांव मार बेहोश कर हराया था । इस कुश्ती की बहुत चर्चा न जाने क्यों नहीं हुई? हा बाकी उन्हें वर्ल्ड चैंपियन का ख़िताब मिला था। भारत-पाक बटवारे के समय ही ये अपने परिवार के साथ लाहौर चले गए। मई 1960 को लाहौर में ही उनकी मृत्यु हो गई।
गामा ने पहलवानी की शिक्षा अपने मामा इड़ा पहलवान से प्रारंभ की। आगे चलकर इनके अभ्यास में काफी बदलाव आए। जैसे कि, यूँ तो बाकी पहलवानों कि तरह उनका अभ्यास भी सामान्य ही था,परंतु इस सामान्यता में भी असामान्यता यह थी कि वे प्रत्येक मैच एक से नहीं बल्कि चालिस प्रतिद्वंदीयों के साथ एक-साथ लड़ते थे और उन्हें पराजित भी करते थे । गामा रोज़ तीस से पैंतालीस मिनट में, सौ किलो कि हस्ली पहन कर पाँच हजार बैठक लगाते थे, और उसी हस्ली को पहन कर उतने ही समय में तीन हजार दंड लगाते थे । वे रोज़
डेढ़ पौंड बादाम मिश्रण (बादाम पेस्ट)
दस लीटर दूध
मौसमी फलों के तीन टोकरे
आधा लीटर घी
दो देसी मटन
छः देसी चिकन
छः पौंड मक्खन
फलों का रस
एवं अन्य पौष्टिक खाद्य पदार्थ अपनी रोज़ कि खुराक के रुप में लिया करते थे ।
🔛जाने-माने कराटे योद्धा और अभिनेता ब्रूस ली गामा पहलवान के बहुत बड़े फैन थे । वे प्रायः अखबार में उन पर लिखे हुए लेख पढ़ा करते थे कि किस तरह से गामा पहलवान ने अपनी शक्ति का विस्तार किया, अपने शरीर को सुदृढ़ बनाया और किस तरह से उन्होंने अपनी शक्ति में वृद्धि की। इन सभी को ब्रूस ली ने भी अपने जीवन में अपनाया और वह भी कसरत के समय दंड बैठक लगाया करते थे। गामा पहलवान की 100 किलो की हस्ली आज भी पटियाला के राष्ट्रीय खेल संस्थान में संभाल कर, सुरक्षित रूप से रखी हुई है। 22 मई 2022 को, सर्च इंजन गूगल ने गामा को डूडल के साथ उनकी 144वीं जयंती पर याद किया।गूगल ने टिप्पणी की: "गामा की विरासत आधुनिक समय के सेनानियों को प्रेरित करती है। यहां तक कि ब्रूसली भी एक प्रसिद्ध प्रशंसक हैं और गामा की कंडीशनिंग के पहलुओं को अपने स्वयं के प्रशिक्षण दिनचर्या में शामिल करते हैं।
🔛अमेरिकी और यूरोपीय पहलवानों के विरुद्ध द्वंद्वों की विजययात्रा
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अपनी इस विजय यात्रा के दौरान गामा ने कई प्रसिद्ध और आदरणीय पहलवानों को हराया जैसे कि:-
संयुक्त राज्य के डॉक्टर बेंजामिन रोलर
स्विट्जरलैंड के मॉरिस डेरियस
स्विट्जरलैंड के जॉन लेम
स्वीडन के जेस पीटरसन (विश्व चैंपियन)
टैरो मियाके (जापानी जूडो चैंपियन)
जॉर्ज हेकेनस्किमित
संयुक्त राज्य के फ्रैंक गॉच
रहीम बक्श सुल्तानीवाला से अंतिम सामना
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इंग्लैंड से लौटने के तुरंत बाद ही गामा पहलवान का सामना रहीम बक्श सुल्तानी वाला से अलाहाबाद में हुआ । काफी देर तक चलने वाले इस द्वंद्व में अंततः गामा पहलवान को विजय प्राप्त हुई और साथ ही साथ रुस्तम-ए-हिंद का खिताब भी जीत लिया ।जीवन में बहुत समय बाद एक साक्षात्कार में जब उनसे यह पूछा गया कि गामा पहलवान को सबसे मुश्किल टक्कर किसने दी है तो उन्होंने कहा "रहीम बक्श सुल्तानीवाला" ।
ज़ैविस्को से पुनः द्वंद
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रहीम बक्श सुल्तानीवाला पर विजय प्राप्त करने के बाद सन 1916 में गामा पहलवान ने पहलवान पंडित बिद्दु (जो कि उस समय भारत के जाने-माने पहलवानों में से एक थे) का सामना किया और उन पर विजय प्राप्त की।
सन 1922 में वेल्स के राजकुमार भारत के दौरे पर आए और उन्होंने गामा पहलवान को चांदी की एक गदा भेंट की ।
जब 1927 तक गामा पहलवान को चुनौती देने वाला कोई भी पहलवान नहीं बचा तो यह घोषणा हुई की गामा और ज़ैविस्को फिर एक बार आमना- सामना करेंगे । उनकी मुलाकात 1928 में पटियाला में हुई। अखाड़े में आते ही ज़ैविस्को ने अपना सुदृढ़ शरीर और बड़ी-बड़ी मांसपेशियां दिखाई, परंतु गामा पहलवान पहले से काफी दुबले-पतले लग रहे थे । फिर भी गामा पहलवान ने केवल 1 मिनट में ही ज़ैविस्को को धराशाई कर दिया जिससे उन्हें भारतीय-विश्व स्तरीय कुश्ती प्रतियोगिता का विजयी घोषित कर दिया गया और ज़ैविस्को ने भी उन्हें बाघ कहकर संबोधित किया।
जब तक गामा पहलवान 48 वर्ष के हुए तब तक वह भारत के महान पहलवानों में से एक गिने जाने लगे।
बलराम हीरामण सिंह यादव के साथ द्वंद
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ज़ैविस्को पर विजय प्राप्त करने के बाद गामा ने जेज़ पीटरसन पर 1929 को विजय प्राप्त की। यह द्वंद डेढ़ मिनट चला। यह अंतिम द्वंद था जो गामा ने अपने करियर में लड़ा । सन 1940 को हैदराबाद के निज़ाम ने गामा को निमंत्रण दिया जिसमें गामा ने सभी पहलवानों को हरा दिया। निज़ाम ने उसके बाद पहलवान बलराम हीरामण सिंह यादव को गामा से सामना करने के लिए भेजा, जोकि स्वयं कभी भी नहीं हारा था। यह द्वंद बहुत समय तक चला परंतु इसका कोई भी निष्कर्ष नहीं निकला। बलराम हीरामण सिंह यादव उन पहलवानों में से था जिनका सामना करना गामा के लिए भी बहुत मुश्किल था।
भारत की स्वतंत्रता के बाद 1947 को गामा पहलवान पाकिस्तान की तरफ चले गए। जिस समय हिंदू-मुसलमान भाई आपस में लड़ रहे थे, तब भीड़ से कितने ही हिंदू भाइयों को गामा ने बचाया था । अंततः सन 1952 तक गामा ने संन्यास ले लिया। संन्यास लेने के बाद उन्होंने अपने भतीजे भोलू पहलवान को पहलवानी सिखाई, जिन्होंने लगभग 20 साल तक पाकिस्तान में होने वाले सभी कुश्ती प्रतियोगिताओं में भाग लिया।


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