गुरुवार, 21 नवंबर 2024

गीता अध्याय4

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*श्री गीता जी का चौथा अध्याय,*

*इस में कुल 42 श्लोक है* 

 *"ज्ञान कर्म संन्यास योग,"*

 आत्मज्ञान, यज्ञ, और अवतार के महत्व पर विशेष ध्यान देता यह अध्याय जैसा मेरी समझ में आएगा गीता के मूल भाव को बिना खोए प्रस्तुत करने का प्रयास भी अपने ध्यान में रखूं गा।

इस अध्याय में श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि किस तरह भगवान् युग-युग में धरती पर अवतरित होकर धर्म की पुनः स्थापना करते हैं और अधर्म का नाश करते हैं। यहाँ भगवान कर्म के ज्ञान और योग में कुशलता का महत्व बताते हैं और समझाते हैं कि कैसे निष्काम कर्म करते हुए भी।

आध्यात्मिक विकास संभव है।
जिस के लिए लम्बा इंतजार भी हो सकता है नहीं भी हो सकता

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अवतार का महत्व – श्रीकृष्ण के अवतार की अवधारणा और धर्म की पुनर्स्थापना का मर्म।
 ज्ञान और कर्म का संबंध – निष्काम कर्म करते हुए भी आत्मज्ञान की प्राप्ति कैसे हो सकती है।
यज्ञ और सेवा का मूल्य – हर कर्म को यज्ञ के रूप में कैसे देखा जा सकता है।

कर्म का विज्ञान – यहां कर्म की जटिलताओं और उनके परिणामों को समझाया गया है।

चौथे अध्याय की चर्चा में यह भी समझने की कोशिश करूं गा कि हर युग में भगवान और संत किस तरह से सत्य की रक्षा और धर्म की स्थापना के लिए सक्रिय रहते हैं।

आशा है कि यह अध्याय भी आपको गहराई से मार्गदर्शन देने वाला हो। 🙏

भगवान के छः प्रकार के अवतार बताए गए है
अंशांशावतार
कलावतार
आवेशावतार
पूर्णावतार
परिपूर्णतम अवतार

अंशावतार: से आरंभ करते है

अंशावतार का मतलब है, वह अवतार जिसमें परमात्मा की शक्ति का कुछ हिस्सा ही हो. 
यह पूर्णावतार से अलग होता है. अंशावतार शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है - अंश और अवतार. अंश का मतलब है कुछ या कम और अवतार का मतलब है रूप. 
 
भगवान विष्णु के कुछ अवतारों को अंशावतार माना गया है. जैसे कि मत्स्य, कूर्म, और वाराह. वहीं, शिव के कुछ अवतारों को भी अंशावतार माना जाता है. जैसे कि ऋषि दुर्वासा, महेश, वृषभ, पिप्पलाद, वैश्यानाथ, द्विजेश्वर, हंसरूप, अवधूतेश्वर, भिक्षुवर्य, सुरेश्वर, ब्रह्मचारी, सुनटनर्तक, द्विज, अश्वत्थामा, किरात, नतेश्वर आदि. 
 
जिन लोगों में 16 कलाओं में से 10 या उससे ज़्यादा विशेष विभूतियां होती हैं, उन्हें अवतार माना लिया जाता है. जिन लोगों में 16 कलाएं होती हैं, उन्हें पूर्णावतार माना जाता है. 

कलावतार: काल समय अनुसार उत्पन होने वाले अवतार

समय और काल से जुड़ा अवतार भगवान विष्णु का कल्कि अवतार है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कल्कि अवतार कलियुग के अंत में होगा. कल्कि अवतार से जुड़ी कुछ खास बातेंः 
 
कल्कि अवतार, भगवान विष्णु का दसवां और अंतिम अवतार होगा. 
 
कल्कि अवतार, कलियुग और सतयुग के संधिकाल में होगा. 
 
कल्कि अवतार का जन्म, कलियुग के अंत में होगा जब पाप की सीमा पार हो जाएगी. 
 
कल्कि अवतार का मकसद, धर्म की रक्षा करना और कलि राक्षस का वध करना होगा. 
 
कल्कि अवतार के जन्म के बाद, धरती से सभी पापों और बुरे कर्मों का विनाश होगा और फिर सतयुग की शुरुआत होगी. 
 
कल्कि अवतार के जन्म के समय, ग्रहों की स्थिति इस प्रकार होगी कि चंद्रमा धनिष्ठा नक्षत्र और कुंभ राशि में होगा और सूर्य तुला राशि में स्वाति नक्षत्र में होगा. 
 
कल्कि अवतार के जन्म के लिए, श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को कल्कि जयंती मनाई जाती है. इस दिन भगवान विष्णु के कल्कि अवतार की पूजा की जाती है. 
 
नित्य होने वाले अवतार:
ध्यान रहे नित्य होने वाले अवतार ना तो भगवान होते है ना भगवान के बराबर ही होते है यह क्षणिक होते है।

प्रत्यक्ष ज्ञान में भी देखते है

प्रति दिन कोई ना कोई बच्चा, बड़ा , बुढा, आदमी, औरत,कुछ ऐसे शब्द हमारे जीवन में आकर कह देते है जो हमारी आंखे खोलने का कर्म कर जाते है।
आज काल ऐसे बहुत से स्लोगन भी देखे जाते है।
बंटेगा तो कटे गा।
ना झुका हूं ना टूटा हूं 
ना झुकूं गा ना झुकने ही दुगा
ना टूटा हूं ना टूटने ही दुगा।
वॉट्सएप यूनिवासिटी ज्ञान इसे भी झूठा साबित करने के प्रयास रहता है ताकि भ्रम को जिंदा रखा जा सके।ध्यान रहे नित्य होने वाले अवतार ना तो भगवान होते है ना भगवान के बराबर ही होते है यह क्षणिक होते है।क्योंकि हम आत्मा के रूप में परमात्मा के अंश भर है कोई टुकड़ा नहीं।

आवेशावतार:

अवतार लेने का मतलब है कि परमात्मा स्वयं अवतरित होता है. वहीं, जन्म लेना जीव आत्माओं का काम होता है. 
 
भगवान के अवतार लेने का मकसद, चमत्कार दिखाना या शक्ति का प्रदर्शन नहीं होता. बल्कि, वे सभी जीवों के बीच एक साधारण इंसान के रूप में रहकर अपनी उमदाई दिखाते हैं. 
 
भगवान विष्णु के कुछ अवतारों को अंशावतार माना जाता है. जैसे, मत्स्य, कूर्म, और वाराह. 
 
वहीं, जब भगवान विष्णु पूरी शक्तियों के साथ प्रकट होते हैं, तो इसे पूर्णावतार कहा जाता है. जैसे, भगवान श्री राम और श्री कृष्ण. 
 
देवर्षि नारद, भगवान विष्णु के अंशावतार थे. वहीं, हनुमान जी, शंकर जी के अंशावतार थे. 
 और हम आत्मा के रूप में परमात्मा के अंश भर है कोई टुकड़ा नहीं।

पूर्णावतार:

पूर्णावतार का मतलब है, किसी देवता का ऐसा अवतार जो सभी कलाओं से युक्त हो. पूर्णावतार को अशावतार भी कहा जाता है. शास्त्रों के मुताबिक, भगवान श्रीकृष्ण को पूर्णावतार माना गया है. 
 
पूर्णावतार से जुड़ी कुछ और बातें:
पूर्णावतार और अंशावतार में अंतर: 16 कलाओं वाले व्यक्ति को पूर्णावतार और इससे कम कलाओं वाले व्यक्ति को अंशावतार कहा जाता है. 
 
भगवान विष्णु के कुछ अवतारों को अंशावतार माना गया है, जैसे कि मत्स्य, कूर्म, और वाराह. 
 
ब्रह्मवैवर्त पुराण के मुताबिक, भगवान विष्णु के नृसिंह, राम, और श्रीकृष्ण अवतार पूर्णावतार थे. 
 
हर युग में एक पूर्णावतार होता है, जैसे कि त्रेता में राम और द्वापर में कृष्ण. 
 
भगवान श्रीकृष्ण में अनंत ऐश्वर्य, अनंत वीर्य, अनंत यश, अनंत श्री, अनंत ज्ञान, और अनंत वैराग्य जैसे गुण थे. 
 
भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में धर्म की व्याख्या की थी. गीता के उपदेशों ने लोगों को कर्तव्य पथ पर चलने के लिए  प्रेरित किया. 

परिपूर्णतम अवतार:

भगवान का परिपूर्णतम या पूर्ण रूप श्री कृष्ण हैं, जो स्वयं मूल सर्वोच्च देवत्व हैं। असंख्य ब्रह्मांडों के स्वामी के रूप में, वे अपने अविनाशी और आनंदमय निवास में शानदार ढंग से प्रकट होते हैं। अंश अवतारों को भगवान के मिशन (दुनिया में) के निष्पादन की देखरेख करने के लिए कहा जाता है।

आइए अब गीता के चौथे अध्या में घूमने चलें

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भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 1

श्लोक:
( सगुण भगवान का प्रभाव और कर्मयोग का विषय ) श्री भगवानुवाच इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्‌।
 विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्‌॥

भावार्थ:
श्री भगवान बोले- मैंने इस अविनाशी योग को सूर्य से कहा था, सूर्य ने अपने पुत्र वैवस्वत मनु से कहा और मनु ने अपने पुत्र राजा इक्ष्वाकु से कहा
 ॥1॥

सूर्य से ही सृष्टि का आरंभ हुआ और यह ज्ञान पहले उन्हीं को दिया गया होगा और उनके दवा ही आगे बिना मूलतः को त्यागे बांटा गया।

भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 2

श्लोक:
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः।
 स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप॥

भावार्थ:
हे परन्तप अर्जुन! इस प्रकार परम्परा से प्राप्त इस योग को राजर्षियों ने जाना, किन्तु उसके बाद वह योग बहुत काल से इस पृथ्वी लोक में लुप्तप्राय हो गया
 ॥2॥

भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 3

श्लोक:
स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः।
 भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्‌॥

भावार्थ:
तू मेरा भक्त और प्रिय सखा है, इसलिए वही यह पुरातन योग आज मैंने तुझको कहा है क्योंकि यह बड़ा ही उत्तम रहस्य है अर्थात गुप्त रखने योग्य विषय है
 ॥3॥
क्यों गुप्त रखने योग्य है प्रत्यक्ष रूप से इसे भी वाट्सएप्यूनिवर्सिटी ज्ञान से जाना जा सकता है भ्रम फैलाने वालों से इसे छुपाने को कहा है नहीं तो युद्ध का मैदान तो है ही उठो और युद्ध करो।

भगवान जो कुछ हमें देते है वह हमें सुख देता है।

भगवान द्वारा दिया गया प्रत्येक अनुभव, वस्तु, परिस्थिति, या व्यक्ति हमें अंततः सुख की ओर ही ले जाता है, भले ही उसका स्वरूप हमारे लिए हमेशा सुखदायी प्रतीत न भी हो।पर ईश्वर द्वारा प्रदान किए गए प्रत्येक उपहार में गहरे उद्देश्य छिपे होते हैं, जो हमारे जीवन में संतुलन, विकास और आत्मा की पूर्णता के लिए आवश्यक हैं। आइए इस विचार को कुछ बिंदुओं के माध्यम से समझें:

❤️ सुख-दुख का वास्तविक अर्थ

संसार में जो सुख-दुख हमें प्राप्त होते हैं, वे नितांत अस्थायी हैं। दुख, भगवान की योजना में हमारे लिए एक साधन है, जो हमारे भीतर आत्मानुभूति और आत्मिक विकास के द्वार खोलता है। वास्तविक सुख, जो भगवान का प्रसाद है, वह हमारे भीतर शांति, संतोष और आनंद की भावना को प्रकट करता है, जो भौतिक परिस्थितियों पर निर्भर नहीं करती।

❤️भगवान के दिए कष्टों का उद्देश्य

कभी-कभी हमें ऐसे कष्ट और कठिनाइयाँ भी मिलती हैं, जिनसे हम प्रारंभ में दुःखी हो सकते हैं, परंतु भगवान के दृष्टिकोण से ये कष्ट हमें सच्चाई की ओर बढ़ाने का एक साधन हैं। वे हमें आंतरिक रूप से मजबूत बनाते हैं, हमारे अहंकार को मिटाते हैं, और हमें भौतिक सुखों से दूर कर आत्मा की शांति के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं।

❤️विकास और शिक्षा का अवसर

ईश्वर जो कुछ भी देते हैं, उसमें हमारे लिए शिक्षा का अवसर छिपा होता है। कोई कठिन परिस्थिति, संघर्ष, या समस्या हमारी समझ को बढ़ाने का साधन होती है। हम इन कठिनाइयों के माध्यम से सहनशीलता, धैर्य, करुणा, और दूसरों के प्रति संवेदनशीलता का विकास कर पाते हैं।

❤️भगवान की योजनाओं का रहस्य

हमारे जीवन में भगवान की जो योजना होती है, वह हमेशा हमारे भले के लिए होती है। जब हम उस पर भरोसा करते हैं और इस विश्वास को दृढ़ रखते हैं कि जो भी हुआ, हो रहा है, या होगा, वह भगवान की इच्छा से ही हो रहा है, तो हम गहरे आंतरिक सुख को प्राप्त करते हैं। यह विश्वास हमारे मन को स्थिर करता है और हमें हर परिस्थिति में भगवान के प्रति कृतज्ञ बनाए रखता है।

❤️सच्चे सुख का स्रोत

भौतिक सुखों का आकर्षण अस्थायी होता है, लेकिन भगवान जो देते हैं वह स्थायी और अनंत आनंद का स्रोत होता है। भक्ति, प्रेम, और ज्ञान भगवान का वास्तविक प्रसाद है, जो जीवन के हर कष्ट और संघर्ष में हमारे भीतर शांति की अनुभूति कराता है।

❤️प्रसन्नता की आंतरिक अनुभूति

भगवान के दिए सुख का अनुभव बाहरी घटनाओं पर निर्भर नहीं होता, बल्कि यह हमारी आंतरिक अनुभूति से जुड़ा होता है। जब हम भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण की भावना रखते हैं और उन्हें हर परिस्थिति में अपना मार्गदर्शक मानते हैं, तब हमारा मन प्रसन्न और शांत रहता है।

❤️निष्कर्ष ❤️

भगवान हमें जो भी देते हैं, वह हमें आत्मिक दृष्टि से समृद्ध करने के लिए ही होता है। उनके द्वारा दी गई हर परिस्थिति, चाहे वह सुख की हो या दुख की, अंततः हमें आत्मा के वास्तविक सुख की ओर ले जाती है। हमें बस इतना करना है कि अपने मन को भगवान के प्रति समर्पित रखें और उन पर अटूट विश्वास बनाए रखें। इस विश्वास में ही हमारे जीवन का वास्तविक सुख छिपा हुआ है।

✍️❤️जैसे प्रत्यक्ष ज्ञान में भगवान द्वारा निर्मित वायु,अग्नि,जल,वनस्पति,पृथ्वी हमे सुख ही देतीं है।

*❤️मनुष्य जो बनाता है हमें दुख हे देता है।*

मनुष्य द्वारा दिया गया सुख या दुख अक्सर अस्थायी होता है और कई बार इसमें स्वार्थ, अपेक्षाएँ या इच्छाएँ जुड़ी होती हैं। इसके कारण, मानव संबंधों में सुख-दुख का अनुभव सतही होता है और कभी-कभी यह दुखदायी भी बन जाता है। इसके कुछ कारण निम्नलिखित हो सकते हैं:

❤️अपेक्षाएँ और अहंकार

जब हम किसी अन्य व्यक्ति से सुख की अपेक्षा करते हैं, तो यह अपेक्षाएँ अक्सर पूरी नहीं हो पातीं, जिससे हमें दुख होता है। हर व्यक्ति अपनी सोच, अनुभव और इच्छाओं से प्रेरित होता है, और वे हमेशा हमारी अपेक्षाओं के अनुरूप व्यवहार नहीं करते। इसलिए, जब हमारी उम्मीदें टूटती हैं, तो दुख होता है।

❤️मानव स्वभाव का अस्थिर होना

मनुष्य का स्वभाव अस्थिर और परिवर्तनशील होता है। आज जो व्यक्ति हमारा मित्र है, हो सकता है कल किसी कारण से वह हमसे दूर हो जाए। मानव भावनाएँ और प्राथमिकताएँ समय-समय पर बदलती रहती हैं, जिससे कभी-कभी दुखद अनुभव उत्पन्न होते हैं।

❤️स्वार्थ और प्रतिस्पर्धा का भाव

मनुष्य के भीतर स्वार्थ और प्रतिस्पर्धा की भावना स्वाभाविक रूप से होती है। जब यह भावना अधिक बढ़ जाती है, तो व्यक्ति अपने सुख के लिए दूसरों को दुख पहुँचाने से भी पीछे नहीं हटता। ऐसा स्वार्थी व्यवहार हमारे संबंधों में खटास लाता है और हमारे जीवन में दुख का कारण बनता है।

❤️अज्ञान और असंवेदनशीलता

कई बार लोग अपने शब्दों या कर्मों से जाने-अनजाने दूसरों को दुख पहुँचा देते हैं। उनका ऐसा करना अनजाने में होता है, लेकिन इस अज्ञानता का परिणाम हमारे लिए कष्टकारी हो सकता है। असंवेदनशीलता भी दुख का कारण बनती है, क्योंकि लोग दूसरों की भावनाओं का सम्मान नहीं करते हैं और अपने आचरण से अनजाने में उन्हें आहत करते हैं।

❤️असमानता और अधिकार की भावना

मानव संबंधों में अक्सर अधिकार की भावना और असमानता का भाव देखने को मिलता है। हम अपेक्षा करते हैं कि अन्य लोग हमारे अधिकारों और आवश्यकताओं का सम्मान करें, लेकिन जब ऐसा नहीं होता, तो हमारे भीतर असंतोष और दुख उत्पन्न होता है। अधिकार की भावना रिश्तों में टकराव पैदा करती है, जो अंततः दुख का कारण बनती है।

❤️परिणाम और असफलताएँ

मनुष्य अक्सर दूसरों की सफलता या असफलता के आधार पर उनका मूल्यांकन करता है। यह तुलना की भावना रिश्तों में ईर्ष्या, द्वेष और अपमान का कारण बन सकती है। इस प्रकार के विचार हमारे संबंधों को प्रभावित करते हैं और अंततः हमें दुख देते हैं।

❤️सच्चे सुख का आंतरिक स्रोत

वास्तविक सुख का स्रोत भगवान, आत्मा या आत्मिक शांति में होता है, न कि बाहरी संबंधों या परिस्थितियों में। जब हम इस सत्य को समझते हैं कि सच्चा सुख केवल हमारे भीतर है, तो हम दूसरों से सुख की अपेक्षा करना छोड़ देते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि हमें मानव संबंधों को त्याग देना चाहिए, बल्कि यह कि हमें उनसे सीमित सुख की ही अपेक्षा रखनी चाहिए।

❤️निष्कर्ष ❤️

मनुष्य द्वारा दिया गया सुख अल्पकालिक और सतही हो सकता है, जबकि दुख का अनुभव कई बार गहरा और स्थायी प्रतीत हो सकता है। इसका मुख्य कारण यह है कि मनुष्य की भावना, अपेक्षाएँ और स्वभाव अस्थिर होते हैं। इसलिए, यह महत्वपूर्ण है कि हम मानव संबंधों में अपनी अपेक्षाओं को सीमित रखें और सच्चे सुख के लिए आत्मिक साधना, ईश्वर भक्ति, या आंतरिक शांति पर ध्यान केंद्रित करें।

✍️❤️प्रत्यक्ष ज्ञान में
मनुष्य दवा निर्मित बांध ,बॉम्ब,गोला,बारूद इत्यादि, इत्यादि

भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 4

श्लोक:
अर्जुन उवाच अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः।
 कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति॥

भावार्थ:
अर्जुन बोले- आपका जन्म तो अर्वाचीन-अभी हाल का है और सूर्य का जन्म बहुत पुराना है अर्थात कल्प के आदि में हो चुका था। तब मैं इस बात को कैसे समूझँ कि आप ही ने कल्प के आदि में सूर्य से यह योग कहा था?
 ॥4॥

भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 5

श्लोक:
श्रीभगवानुवाच बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन।
 तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप॥

भावार्थ:
श्री भगवान बोले- हे परंतप अर्जुन! मेरे और तेरे बहुत से जन्म हो चुके हैं। उन सबको तू नहीं जानता, किन्तु मैं जानता हूँ
 ॥5॥

✍️यह कल्प क्या है?
परमेष्ठी मंडल स्वायम्भू मंडल का परिभ्रमण कर रहा है यानी आकाशगंगा अपने से ऊपर वाली आकाशगंगा का चक्कर लगा रही है। इस काल को कल्प कहा गया यानी इसकी माप है 4 अरब 32 करोड़ वर्ष (4,32,00,00,000)। इसे ब्रह्मा का 1 दिन कहा गया। जितना बड़ा दिन, उतनी बड़ी रात अत: ब्रह्मा का अहोरात्र यानी 864 करोड़ वर्ष हुआ। एक क्षण से कल्प तक के मान काल ,समय कहते है।
 
❤️हिन्दुओं की समय निर्धारण पद्धति, महत्वपूर्ण जानकारी❤️

 
कल्प 30 हैं : श्‍वेत, नीललोहित, वामदेव, रथनतारा, रौरव, देवा, वृत, कंद्रप, साध्य, ईशान, तमाह, सारस्वत, उडान, गरूढ़, कुर्म, नरसिंह, समान, आग्नेय, सोम, मानव, तत्पुमन, वैकुंठ, लक्ष्मी, अघोर, वराह, वैराज, गौरी, महेश्वर, पितृ। जैन धर्म में 12 कल्प बताए गए हैं:- सौधर्म, ईशान, सानत्कुमार, माहेन्द्र, ब्रह्म, लांतव, महाशुक्र, सहस्रार, आनत, प्राणत, आरण और अच्युत। लेकिन प्रमुख पांच कल्पों में गाथा को समेटने का प्रयास पुराणकारों ने किया है। ये पांच कल्प है- 1.महत कल्प, हिरण्य गर्भ, ब्रह्मकल्प, पद्मकल्प और वराहकल्प। 
 
❤️. महत कल्प : 
इस काल के इतिहास का विवरण मिलना मुश्किल है। बहुत शोध के बाद शायद कहीं मिले, क्योंकि इस काल के बाद प्रलय हुई थी तो सभी कुछ नष्ट हो गया। लेकिन पुराणकार मानते हैं कि इस कल्प में विचित्र-विचित्र और महत् (अंधकार से उत्पन्न) वाले प्राणी और मनुष्य होते थे। संभवत: उनकी आंखें नहीं होती थीं।

 
❤️ हिरण्य गर्भ कल्प : 

इस काल में धरती का रंग पीला था इसीलिए इसे हिरण्य कहते हैं। हिरण्य के 2 अर्थ होते हैं- एक जल और दूसरा स्वर्ण। हालांकि धतूरे को भी हिरण्य कहा जाता है। माना जाता है कि तब स्वर्ण के भंडार बिखरे पड़े थे। इस काल में हिरण्यगर्भ ब्रह्मा, हिरण्यगर्भ, हिरण्यवर्णा लक्ष्मी, देवता, हिरप्यानी रैडी (अरंडी), वृक्ष वनस्पति एवं हिरण ही सर्वोपयोगी पशु थे। सभी एकरंगी पशु और पक्षी थे।
 
 
❤️ ब्रह्मकल्प :

 इस कल्प में मनुष्य जाति सिर्फ ब्रह्म (ईश्‍वर) की ही उपासक थी। क्रम विकास के तहत प्राणियों में विचित्रताओं और सुंदरताओं का जन्म हो चुका था। जम्बूद्वीप में इस काल में ब्रह्मर्षि देश, ब्रह्मावर्त, ब्रह्मलोक, ब्रह्मपुर, रामपुर, रामगंगा केंद्र आदि नाम से स्थल हुआ करते थे। यहां की प्रजाएं परब्रह्म और ब्रह्मवाद की ही उपासना करती थी। इस काल का ऐतिहासिक विवरण हमें ब्रह्मपुराण, ब्रह्माण्डपुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण में मिलता है।
 
❤️पद्मकल्प : 
पुराणों के अनुसार इस कल्प में 16 समुद्र थे। पुराणकारों अनुसार यह कल्प नागवंशियों का था। धरती पर जल की अधिकता थी और नाग प्रजातियों की संख्या भी अधिक थी। कोल, कमठ, बानर (बंजारे) व किरात जातियां थीं और कमल पत्र पुष्पों का बहुविध प्रयोग होता था। सिंहल द्वीप (श्रीलंका) की नारियां पद्मिनी प्रजाएं थीं। तब के श्रीलंका की भौगोलिक स्थिति आज के श्रीलंका जैसी नहीं थी। इस कल्प का विवरण हमें पद्म पुराण में विस्तार से मिल सकता है।
 
 ❤️ वराहकल्प :
 वर्तमान में वराह कल्प चल रहा है। इस कल्प में विष्णु ने वराह रूप में 3 अवतार लिए- पहला नील वराह, दूसरा आदि वराह और तीसरा श्वेत वराह। इसी कल्प में विष्णु के 24 अवतार हुए और इसी कल्प में वैवस्वत मनु का वंश चल रहा है। इसी कल्प में भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने नई सृष्टि की थी। वर्तमान में हम इसी कल्प के इतिहास की बात कर रहे हैं। वराह पुराण में इसका विवरण मिलता है फेक्ट चेक वाले भी अपने फेक्ट चेक में सुधार करले।
 
अब तक वराह कल्प के स्वायम्भु मनु, स्वरोचिष मनु, उत्तम मनु, तमास मनु, रेवत मनु, चाक्षुष मनु तथा वैवस्वत मनु के मन्वंतर बीत चुके हैं और अब वैवस्वत तथा सावर्णि मनु की अंतरदशा चल रही है। सावर्णि मनु का आविर्भाव विक्रमी संवत् प्रारंभ होने से लगभग 5,500 वर्ष पूर्व हुआ था।
 
❤️वराहकल्प :
 वर्तमान में चल रहे वराह कल्प में धरती जल में ही डूब गई थी। धरती पर से जल हटाने के लिए इस कल्प में विष्णु ने वराह रूप में 3 अवतार लिए- पहला नील वराह, दूसरा आदि वराह और तीसरा श्वेत वराह। इस कल्प में भगवान वराह और ऋषि मुनियों के अथक प्रयास से सात समुद्र हो गए थे जो आज हैं।
 
 भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 6

श्लोक:
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्‌।
 प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया॥

भावार्थ:
मैं अजन्मा और अविनाशीस्वरूप होते हुए भी तथा समस्त प्राणियों का ईश्वर होते हुए भी अपनी प्रकृति को अधीन करके अपनी योगमाया से प्रकट होता हूँ
 ॥6॥
❤️प्रकृति:
प्रकृति से तात्पर्य है, इस ग्रह पर मौजूद सभी प्राकृतिक चीज़ें, जिनमें जानवर, पौधे, घटनाएं, प्रक्रियाएं, और उत्पाद और हम लोग शामिल हैं. प्रकृति, भौतिक दुनिया और उसमें रहने वाली हर चीज़ है।
प्रकृति में मौजूद हर चीज़ को इंसानों ने नहीं बनाया है. 
 
प्रकृति हमें जीने के लिए हवा, पानी, खाना, और रहने की जगह देती है. 
 
प्रकृति का अध्ययन, ज्ञान और विज्ञान के योग के अध्ययन का एक बड़ा हिस्सा है. 
 
❤️प्रकृति एक ऐसी संपत्ति है जिसका पोषण, निवेश, और विकास किया जाना चाहिए ❤️
 
प्रकृति के बिना कोई सतत विकास नहीं हो सकता. 
 
प्रकृति के बारे में कुछ और बातेंः
प्रकृति को "माँ प्रकृति" भी कहा जाता है. 
 
प्रकृति से जुड़ी कुछ घटनाएं, जैसे कि पृथ्वी का मौसम और भूविज्ञान, अपने आप बदलती रहती हैं. 
 
मानव प्रकृति का हिस्सा है, लेकिन यहां मानवी क्रिया को आमतौर पर अन्य प्राकृतिक चीज़ों से अलग ही माना जाता है।

❤️माया और योग माया

माया और योगमाया, दोनों भगवान की शक्तियां ही हैं, लेकिन इनमें भी अंतर है: 
 
माया भगवान की बहिरंग शक्ति है, जो उनसे विमुख जीवों पर हावी रहती है. माया को भ्रम या जादू भी कहा जाता है जो दिखाई दे रहा है वास्तव में वो यही नहीं (प्रभु की माया कही धूप कही छाया)
 
❤️योगमाया:

 भगवान की आंतरिक शक्ति है. योगमाया के निर्देशन में आध्यात्मिक ऊर्जा काम करती है. 
 
योगमाया को भगवान की माया का एक रूप माना जाता है ठीक वैसे ही जैसे हम सभी की अपनी अपनी माया है वॉट्सएप यूनिवासिटी ज्ञान उसी की छाया भर है।

 योगमाया को दुर्गा, सीता, काली, राधा, लक्ष्मी, मंगला, पार्वती इसी स्त्री रूपों का मूर्त रूप माना जाता
 
योगमाया से कृष्ण राधा का शरीर बना है. इसीलिए राधे श्याम हैं और सीता राम हैं. 
 
जिन्होंने भगवान की प्राप्ति कर ली है, उनसे भगवान माया को हटा देते हैं और उन्हें योग माया की शक्ति दे देते हैं. 
 
जो लोग भौतिक ऐश्वर्य और भौतिक सुख की तलाश में हैं, वे स्वयं को भौतिक ऊर्जा, महामाया, या भगवान कृष्ण की देख-रेख में रखते हैं।
 
 (चेतन पुरुष माया स्त्री रूप भी माना जा सकता है इस पर आगे चर्चा जरूरी हुई तो हो सकती है अभी हमें मूल भाव को ही बना कर आगे बढ़ना है)

भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 7

श्लोक:
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
 अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्‌॥

भावार्थ:
हे भारत! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने रूप को रचता हूँ अर्थात साकार रूप से लोगों के सम्मुख प्रकट होता हूँ
 ॥7॥

भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 8

श्लोक:
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्‌।
 धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥

भावार्थ:
साधु पुरुषों का उद्धार करने के लिए, पाप कर्म करने वालों का विनाश करने के लिए और धर्म की अच्छी तरह से स्थापना करने के लिए मैं युग-युग में प्रकट हुआ करता हूँ
 ॥9॥

❤️साधु पुरुष:

"साधु पुरुष" का अर्थ ऐसे व्यक्ति से है जो सद्गुणों, परोपकार, संयम और सहिष्णुता से परिपूर्ण होते हैं। 
साधु पुरुष तो केवल धार्मिक क्रियाओं में ही नहीं बल्कि अपने आचरण, विचार और व्यवहार में भी सच्चाई, दया और करुणा को अपनाते हैं। वे अपने हित से अधिक दूसरों के कल्याण में रुचि रखते हैं और सांसारिक मोह-माया से मुक्त होकर, सभी के प्रति प्रेम और सेवा का भाव रखते हैं।

गीता और अन्य शास्त्रों में साधु पुरुषों के गुणों का वर्णन इस प्रकार किया गया है:

❤️क्षमा और सहिष्णुता - साधु पुरुषों में दूसरों की गलतियों को माफ करने और विपरीत परिस्थितियों में स्थिर रहने की क्षमता होती है।

❤️दया और करुणा - वे हर प्राणी के प्रति करुणा रखते हैं और सभी का कल्याण चाहते हैं।

❤️सत्यनिष्ठा - साधु पुरुष अपने विचारों और कार्यों में सत्य का अनुसरण करते हैं और अपने कर्तव्यों को ईमानदारी से निभाते हैं।

❤️निर्लिप्तता - वे सांसारिक सुखों और भौतिक चीजों के मोह में नहीं फँसते और आत्मिक शांति के लिए कार्य करते रहते हैं।

❤️समभाव - साधु पुरुष अपने मन में सभी के प्रति समानता का भाव रखते हैं, चाहे कोई उन्हें अच्छा कहे या बुरा।

साधु पुरुषों का आचरण समाज के लिए एक प्रेरणा स्रोत होता है, क्योंकि वे अपने कर्मों से सभी को प्रेम, शांति और दया का मार्ग दिखाते हैं। साधु पुरुष समाज में अपने आदर्शों, उपदेशों और सेवाभाव से एक सकारात्मक प्रभाव छोड़ते हैं, जो लोगों को भी धर्म, सदाचार और सेवा के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता है किसी को बाध्य नहीं करता क्योंकि यह कार्य खुद भगवान करते है।
जब "वाल्मीक" "रत्नाकर" थे तब उनको "वाल्मीक" बनाने का काम भगवान ने किया।
"कालिदास"इसका एक अच्छा उदाहरण है 
भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 9

श्लोक:
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्वतः।
 त्यक्तवा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन॥

भावार्थ:
हे अर्जुन! मेरे जन्म और कर्म दिव्य अर्थात निर्मल और अलौकिक हैं- इस प्रकार जो मनुष्य तत्व से (सर्वशक्तिमान, सच्चिदानन्दन परमात्मा अज, अविनाशी और सर्वभूतों के परम गति तथा परम आश्रय हैं, वे केवल धर्म को स्थापन करने और संसार का उद्धार करने के लिए ही अपनी योगमाया से सगुणरूप होकर प्रकट होते हैं। इसलिए परमेश्वर के समान सुहृद्, प्रेमी और पतितपावन दूसरा कोई नहीं है, ऐसा समझकर जो पुरुष परमेश्वर का अनन्य प्रेम से निरन्तर चिन्तन करता हुआ आसक्तिरहित संसार में बर्तता है, वही उनको तत्व से जानता है।) जान लेता है, वह शरीर को त्याग कर फिर जन्म को प्राप्त नहीं होता, किन्तु मुझे ही प्राप्त होता है
 ॥9॥
भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 10

श्लोक:
वीतरागभय क्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः।
 बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः॥

भावार्थ:
पहले भी, जिनके राग, भय और क्रोध सर्वथा नष्ट हो गए थे और जो मुझ में अनन्य प्रेमपूर्वक स्थित रहते थे, ऐसे मेरे आश्रित रहने वाले बहुत से भक्त उपर्युक्त ज्ञान रूप तप से पवित्र होकर मेरे स्वरूप को प्राप्त हो चुके हैं
 ॥10॥
(भगवत स्वरूप हो चुके कुछ भक्तों के नाम ये रहे:
परीक्षित - इनका नाम नवधा भक्ति में श्रवण के रूप में आता है.
शुकदेव - इनका नाम नवधा भक्ति में कीर्तन के रूप में आता है.
प्रह्लाद - इनका नाम नवधा भक्ति में स्मरण के रूप में आता है.
लक्ष्मी - इनका नाम नवधा भक्ति में पादसेवन के रूप में आता है.
पृथुराजा - इनका नाम नवधा भक्ति में अर्चन के रूप में आता है.
अक्रूर - इनका नाम नवधा भक्ति में वंदन के रूप में आता है.
हनुमान - इनका नाम नवधा भक्ति में दास्य के रूप में आता है.
अर्जुन - इनका नाम नवधा भक्ति में सख्य के रूप में आता है.
बलि राजा - इनका नाम नवधा भक्ति में आत्मनिवेदन के रूप में आता है. )
भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 11

श्लोक:
ये यथा माँ प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्‌।
 मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥

भावार्थ:
हे अर्जुन! जो भक्त मुझे जिस प्रकार भजते हैं, मैं भी उनको उसी प्रकार भजता हूँ क्योंकि सभी मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं
 ॥11॥
❤️ हमारी आप की तो बात ही क्या श्री कृष्ण की मां भी असमंजस की हालत में आएंगी 😀 जब श्री कृष्ण ने मिट्टी मुंह में रख ली तो माता ने देख लिया। वह उनका मुंह खोल कर मिट्टी निकालने का प्रयास करती हैं ऐसा प्रयास हमारी माता बहने भी अक्सर करती ही हैं।
पर कृष्ण की मां ने जब श्री कृष्ण का मुंह खोला उसमें ब्रह्मांड के दर्शन कर घबरा गई अरे बाप रे लल्ला को तो कोई बला चिपट गई है ओझा को बुलाओ।चलिए अब मजाक मजाक में ज्ञान की ओर बढ़ते है अर्जुन की तरह में भी प्रश्न पूछ लेता हूं 

(जब आत्मा ही परमात्मा है तो हम उसको भूत,प्रेत,राक्षस,बेताल,बला क्यों मान लेते है?क्या उसे परमात्मा नहीं मान सकते यह दोहरा मापदंड क्यों? इसी लिए यहां भगवान कहते है जो भक्त मुझे जिस प्रकार भजते हैं, मैं भी उनको उसी प्रकार भजता हूँ।

भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 12

श्लोक:
काङ्‍क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः।
 क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा॥

भावार्थ:
इस मनुष्य लोक में कर्मों के फल को चाहने वाले लोग देवताओं का पूजन किया करते हैं क्योंकि उनको कर्मों से उत्पन्न होने वाली सिद्धि शीघ्र मिल जाती है
 ॥12॥
भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 13

श्लोक:
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।
 तस्य कर्तारमपि मां विद्धयकर्तारमव्ययम्‌॥

भावार्थ:
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र- इन चार वर्णों का समूह, गुण और कर्मों के विभागपूर्वक मेरे द्वारा रचा गया है। इस प्रकार उस सृष्टि-रचनादि कर्म का कर्ता होने पर भी मुझ अविनाशी परमेश्वर को तू वास्तव में अकर्ता ही जान
 ॥13॥
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के विभाग गुण और कर्मों को भगवान ही रचते है और नहीं भी!
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के घर में जन्मे जीव के बारे में जानने को हम शिशु की जन्म पत्रिका बनवाते है।जो ज्योतिष शास्त्र में आता है ज्योतिष को वेदों का नेत्र कहते हे शायद पहले भी बताया गया हे।
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के घर पैदा हुए शिशु का वर्ण यही निर्धारित होता है इस लिए भगवान करते भी है और नहीं भी करते।
पर वॉट्सएप यूनिवर्सिटी के ज्ञान वाले लोग ही ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र बताकर भांति भांति के वचन बोला करते है।
अब है वर्ण व्यवस्था के कार्य की बात करे वैसे इसको भगवान भी आगे चल कर स्पष्ट करे गे ।

❤️शरीर में ब्राह्मण, 

मुख को कहते है।जो ज्ञान की बाते भी करता हे।अगर किसी शरीर के अंग को चोट लगती है तो रोता ब्राह्मण ही है।

❤️क्षत्रिय
सीने और पेट के ऊपर के भाग को कहते है।अगर आप पर कोई प्रहार करे तो बचाने को पहले यही हाथ आते है जिनको क्षत्रिय कहा गया है।
❤️वैश्य 
पेट को कहा जाता है 
हम जो कुछ खाते है वो पहले पेट में जाता है। उसको ऊर्जा में बदल कचरा अलग करता  फिर उस से उत्पन ऊर्जा को यही पेट समस्त अंगों को उनकी जरूरत की पूर्ति हेतु देता हे और कचरे को त्याग देता है।
❤️शूद्र चरणों को कहते है
जो हमें यात्रा करवाता हे मंदिर भी लजाता है सेवा भाव इसमें होता है।जब हमने किसी को मान,आदर देना होता है तब सबसे पहले हम इसी शूद्र पैरों को स्पर्श कर वंदना करते है ।
अब इन में छोटा बड़ा या ऊंचा नीचा कौन निर्णय आप ज्ञानी जनों पर छोड़ आगे बढ़ता हूं।

भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 14

श्लोक:
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा।
 इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते॥

भावार्थ:
कर्मों के फल में मेरी स्पृहा नहीं है, इसलिए मुझे कर्म लिप्त नहीं करते- इस प्रकार जो मुझे तत्व से जान लेता है, वह भी कर्मों से नहीं बँधता
 ॥14॥
भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 15

श्लोक:
एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः।
 कुरु कर्मैव तस्मात्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्‌॥

भावार्थ:
पूर्वकाल में मुमुक्षुओं ने भी इस प्रकार जानकर ही कर्म किए हैं, इसलिए तू भी पूर्वजों द्वारा सदा से किए जाने वाले कर्मों को ही कर
 ॥15॥
भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 16

श्लोक:
किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः।
 तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्‌॥

भावार्थ:
कर्म क्या है? और अकर्म क्या है? इस प्रकार इसका निर्णय करने में बुद्धिमान पुरुष भी मोहित हो जाते हैं। इसलिए वह कर्मतत्व मैं तुझे भलीभाँति समझाकर कहूँगा, जिसे जानकर तू अशुभ से अर्थात कर्मबंधन से मुक्त हो जाएगा
 ॥16॥

भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 17

श्लोक:
कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः।
 अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः॥

भावार्थ:
कर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए और अकर्मण का स्वरूप भी जानना चाहिए तथा विकर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए क्योंकि कर्म की गति गहन है
 ॥17॥
भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 18

श्लोक:
कर्मण्य कर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः।
 स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्‌॥

भावार्थ:
जो मनुष्य कर्म में अकर्म देखता है और जो अकर्म में कर्म देखता है, वह मनुष्यों में बुद्धिमान है और वह योगी समस्त कर्मों को करने वाला है
 ॥18॥

❤️अकर्म: 
 यानी, बिना किसी कर्ता के कर्म करना यानी आसक्ति और फल की इच्छा से रहित होकर कर्म करना।
यहां अकर्म करने का मतलब हाथ पर हाथ रहे कर बैठे रहो नहीं काम को छोड़ना नहीं है,
बल्कि कर्म करते समय उसके फल का ध्यान न देना है।जैसे चींटी अगर 100बार भी चढ़ाई चढ़ते गिरे तो वो मायूस होकर चढ़ाई से पीछे नहीं हटती प्रयास अंत तक करती ही रहती है।
अकर्म की स्थिति में किए गए कार्यों से इतिहास बदल सकता है,भगवान कहते हैं कि जो व्यक्ति कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म को देखता है, वह सबसे बुद्धिमान और प्रज्ञासंपन्न होता है।
 गीता के मुताबिक, जो कर्म निष्काम भाव से ईश्वर के लिए किए जाते हैं, वे बंधन नहीं पैदा करते और मोक्ष की प्राप्ति में मदद करते हैं।
 मनुष्य को सकारात्मक भावना से लगातार कर्मशील रहना ही चाहिए,गीता में परिणाम की चिंता करके कर्म न करने को 'अकर्मण्यता' कहा गया है।
भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 19

श्लोक:
( योगी महात्मा पुरुषों के आचरण और उनकी महिमा ) यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः।
 ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पंडितं बुधाः॥

भावार्थ:
जिसके सम्पूर्ण शास्त्रसम्मत कर्म बिना कामना और संकल्प के होते हैं तथा जिसके समस्त कर्म ज्ञानरूप अग्नि द्वारा भस्म हो गए हैं, उस महापुरुष को ज्ञानीजन भी पंडित कहते हैं
 ॥19॥
(वह ब्राह्मण वर्ण का हो कबीर ,रविदास को पंडित नहीं भगत कहते है)
❤️पंडित:
 पंडित का मतलब विद्वान या अध्यापक होता है।
 पंडित शब्द का इस्तेमाल किसी ऐसे व्यक्ति के लिए किया जाता है जो संस्कृत और हिन्दू विधि, धर्म, संगीत या दर्शनशास्त्र में सक्षम हो।
 पंडित शब्द का इस्तेमाल किसी ऐसे व्यक्ति के लिए भी किया जाता है जो वेदों का कोई एक मुख्य भाग उसके उच्चारण और गायन के लय व ताल सहित कण्ठस्थ कर ले।
 औपनिवेशिक युग के साहित्य में, पंडित शब्द का इस्तेमाल हिंदू कानून में विशेषज्ञता वाले वकीलों के लिए किया जाता था।
आजकल, पंडित शब्द का इस्तेमाल किसी भी विषय का गहरा ज्ञान रखने वाले व्यक्ति के लिए किया जाता है।
 पंडित शब्द का इस्तेमाल संगीत के क्षेत्र में किसी मुस्लिम पुरुष के लिए भी किया जाता है।
 पंडित शब्द का इस्तेमाल किसी ऐसे व्यक्ति के लिए भी किया जाता है जो किसी विशेष विषय क्षेत्र पर आधिकारिक तरीके से राय पेश करता है।
❤️सनातन धर्म के अनुसार पंडित कर्म कांड और पूजा करने वाले पुजारी के लिए भी किया जाता है।
सनातन धर्म में पंडित का अर्थ है विद्वान या अध्यापक. पंडित शब्द का इस्तेमाल उन लोगों के लिए किया जाता है जो संस्कृत, हिन्दू धर्म, विधि, संगीत, या दर्शनशास्त्र में सक्षम हों।
 पंडित बनने के लिए कोई खास डिग्री की ज़रूरत नहीं होती, लेकिन संस्कृत में उच्च शिक्षा लेना पंडित बनने की प्रक्रिया का अहम हिस्सा है। संस्कृत व्याकरण, साहित्य, दर्शन, चिकित्सा पशु पंछी मनुष्य कीऔर दूसरे विषयों का अध्ययन इन पाठ्यक्रमों में शामिल होता है।
केवल पोथी पढ़ना नहीं।
पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय, ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय। बड़ी-बड़ी पुस्तकें पढ़ कर संसार में कितने ही लोग मृत्यु के द्वार पहुंच गए, पर सभी विद्वान न हो सके। कबीर मानते हैं कि यदि कोई प्रेम या प्यार के केवल ढाई अक्षर ही अच्छी तरह पढ़ ले, तो वही सच्चा ज्ञानी होगा।

 भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 20

श्लोक:
त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः।
 कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किंचित्करोति सः॥

भावार्थ:
जो पुरुष समस्त कर्मों में और उनके फल में आसक्ति का सर्वथा त्याग करके संसार के आश्रय से रहित हो गया है और परमात्मा में नित्य तृप्त है, वह कर्मों में भलीभाँति बर्तता हुआ भी वास्तव में कुछ भी नहीं करता
 ॥20॥
भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 21

श्लोक:
निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः।
 शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्‌॥

भावार्थ:
जिसका अंतःकरण और इन्द्रियों सहित शरीर जीता हुआ है और जिसने समस्त भोगों की सामग्री का परित्याग कर दिया है, ऐसा आशारहित पुरुष केवल शरीर-संबंधी कर्म करता हुआ भी पापों को नहीं प्राप्त होता
 ॥21॥
भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 22

श्लोक:
यदृच्छालाभसंतुष्टो द्वंद्वातीतो विमत्सरः।
 समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते॥

भावार्थ:
जो बिना इच्छा के अपने-आप प्राप्त हुए पदार्थ में सदा संतुष्ट रहता है, जिसमें ईर्ष्या का सर्वथा अभाव हो गया हो, जो हर्ष-शोक आदि द्वंद्वों से सर्वथा अतीत हो गया है- ऐसा सिद्धि और असिद्धि में सम रहने वाला कर्मयोगी कर्म करता हुआ भी उनसे नहीं बँधता
 ॥22॥
भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 23

श्लोक:
गतसङ्‍गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः।
 यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते॥

भावार्थ:
जिसकी आसक्ति सर्वथा नष्ट हो गई है, जो देहाभिमान और ममता से रहित हो गया है, जिसका चित्त निरन्तर परमात्मा के ज्ञान में स्थित रहता है- ऐसा केवल यज्ञसम्पादन के लिए कर्म करने वाले मनुष्य के सम्पूर्ण कर्म भलीभाँति विलीन हो जाते हैं
 ॥23॥

भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 24

श्लोक:
( फलसहित पृथक-पृथक यज्ञों का कथन ) ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्रौ ब्रह्मणा हुतम्‌।
 ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना॥

भावार्थ:
जिस यज्ञ में अर्पण अर्थात स्रुवा आदि भी ब्रह्म है और हवन किए जाने योग्य द्रव्य भी ब्रह्म है तथा ब्रह्मरूप कर्ता द्वारा ब्रह्मरूप अग्नि में आहुति देना रूप क्रिया भी ब्रह्म है- उस ब्रह्मकर्म में स्थित रहने वाले योगी द्वारा प्राप्त किए जाने योग्य फल भी ब्रह्म ही हैं
 ॥24॥
❤️यज्ञ में आहुति का विशेष महत्व होता है

❤️यज्ञ में आहुति देने वाले को भी ब्रह्म माना जाता है, साथ ही आहुति दी जाने वाली अग्नि को भी ब्रह्म माना जाता है. यज्ञ में अर्पण या स्रुवा, हवन, अग्नि, और आहुति देने की क्रिया को ब्रह्म माना जाता है।
यज्ञ, वैदिक काल से प्रचलित एक अवधारणा है।
 
यज्ञ में अग्निहोत्र जैसी कर्मकांड परक क्रिया से लेकर आध्यात्मिक साधना शामिल है।
 
यज्ञ के तीन अर्थ हैं- दान, संगतिकरण, और देवपूजन।
 
यज्ञ, परमात्मा के लिए किया जाने वाला कोई भी कार्य है।
 
यज्ञ, मनुष्यों और देवी-देवताओं के बीच संबंध स्थापित करने का माध्यम है।
 
यज्ञ में पवित्र अग्नि के साथ या उसके बिना, कभी-कभी दावतों और सामुदायिक कार्यक्रमों के साथ प्रमुख औपचारिक भक्ति शामिल होती है।
 
यज्ञ में जप, तप, व्रत, दान जैसे सत कर्म शामिल होते हैं।
 
❤️यज्ञ सामग्री भी ब्रह्म हे

धर्म ग्रंथों के मुताबिक, यज्ञ में जो कुछ भी आहूति के रूप में दिया जाता है, वह ब्रह्मभोज है. 
 
यज्ञ में आहूति डालने का मतलब है परमात्मा को भोजन कराना. 
 
यज्ञ में देवताओं की आवभगत होती है. 
 
यज्ञ में इस्तेमाल होने वाली सामग्री और विधि का विशेष महत्व होता है. 
 
यज्ञ में इस्तेमाल होने वाली सामग्री से जुड़ी कुछ खास बातेंः
हवन में आम तौर पर घी, विशेष अनाज, और औषधीय पदार्थों का इस्तेमाल होता है. 
 
अग्निहोत्र में घी (मक्खन), चिउड़े (अक्षत), और विशेष हवन सामग्री का इस्तेमाल होता है. 
 हवन कुंड, 
आम की लकड़ी,
 चावल, 
जौ, 
कलावा, 
शक्कर, 
गाय का घी,
 पान का पत्ता, 
काला तिल,
 सूखा नारियल,
 लौंग, 
इलायची, 
कपूर, 
बताशा आदि सब ब्रह्म स्वरूप है।
भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 25

श्लोक:
दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते।
 ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति॥

भावार्थ:
दूसरे योगीजन देवताओं के पूजनरूप यज्ञ का ही भलीभाँति अनुष्ठान किया करते हैं और अन्य योगीजन परब्रह्म परमात्मारूप अग्नि में अभेद दर्शनरूप यज्ञ द्वारा ही आत्मरूप यज्ञ का हवन किया करते हैं। 
(वास्तव में परब्रह्म परमात्मा में ज्ञान द्वारा एकीभाव से स्थित होना ही ब्रह्मरूप अग्नि में यज्ञ द्वारा यज्ञ को हवन करना कहते है।)
 ॥25॥
भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 26

श्लोक:
श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति।
 शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति॥

भावार्थ:
अन्य योगीजन श्रोत्र आदि समस्त इन्द्रियों को संयम रूप अग्नियों में हवन किया करते हैं और दूसरे योगी लोग शब्दादि समस्त विषयों को इन्द्रिय रूप अग्नियों में हवन किया करते हैं
 ॥26॥
भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 27

श्लोक:
सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे।
 आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते॥

भावार्थ:
दूसरे योगीजन इन्द्रियों की सम्पूर्ण क्रियाओं और प्राणों की समस्त क्रियाओं को ज्ञान से प्रकाशित आत्म संयम योगरूप अग्नि में हवन किया करते हैं (सच्चिदानंदघन परमात्मा के सिवाय अन्य किसी का भी न चिन्तन करना ही उन सबका हवन करना है।)
 ॥27॥
भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 28

श्लोक:
द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे।
 स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः॥

भावार्थ:
कई पुरुष द्रव्य संबंधी यज्ञ करने वाले हैं, कितने ही तपस्या रूप यज्ञ करने वाले हैं तथा दूसरे कितने ही योगरूप यज्ञ करने वाले हैं, कितने ही अहिंसादि तीक्ष्णव्रतों से युक्त यत्नशील पुरुष स्वाध्यायरूप ज्ञानयज्ञ करने वाले हैं
 ॥28॥
भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 29-30

श्लोक:
अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे।
 प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः॥
 अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति।
 सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः॥

भावार्थ:
दूसरे कितने ही योगीजन अपान वायु में प्राणवायु को हवन करते हैं, वैसे ही अन्य योगीजन प्राणवायु में अपान वायु को हवन करते हैं तथा अन्य कितने ही नियमित आहार  करने वाले प्राणायाम परायण पुरुष प्राण और अपान की गति को रोककर प्राणों को प्राणों में ही हवन किया करते हैं। ये सभी साधक यज्ञों द्वारा पापों का नाश कर देने वाले और यज्ञों को जानने वाले हैं
 ॥29-30॥
(गीता अध्याय 6 श्लोक 17 में देखना चाहिए।)
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मषु। युक्तस्वप्नवबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥ दुःखोंका नाश करनेवाला योग तो यथायोग आहार-विहार करनेवालेका, कर्मोंमें यथायोग्य चेष्टाश करनेवालेका और यथायोग सोने तथा जगनेवालेका ही सिद्ध होता है ॥17॥

भगवद गीता अध्याय 6, श्लोक 17 का यह श्लोक योग के महत्व को बताता है।

इसका भाव यह है:

"जो व्यक्ति अपने आहार, विहार, कर्म, सोने और जगने में संतुलन बनाए रखता है, वही योग की सच्ची अवस्था में पहुंचता है और दुःखों से मुक्त होता है।"

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि:

❤️योग की सच्ची अवस्था में पहुंचने के लिए संतुलन आवश्यक है जिसमें।❤️

❤️आहार, विहार, कर्म, सोने और जगने में संतुलन बनाए रखना चाहिए।
❤️इस संतुलन से दुःखों से मुक्ति मिलती है और आत्मशांति प्राप्त होती है।

1. युक्ताहार: संतुलित आहार।
2. युक्तविहार: संतुलित विहार।
3. युक्तचेष्टा: संतुलित कर्म।
4. युक्तस्वप्न: संतुलित सोना।
5. युक्तबोध: संतुलित जगना।

इन सभी में संतुलन बनाए रखने से योग की सच्ची अवस्था में पहुंचा जा सकता है।

भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 31

श्लोक:
यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्‌।
 नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम॥

भावार्थ:
हे कुरुश्रेष्ठ अर्जुन! यज्ञ से बचे हुए अमृत का अनुभव करने वाले योगीजन सनातन परब्रह्म परमात्मा को प्राप्त होते हैं। और यज्ञ न करने वाले पुरुष के लिए तो यह मनुष्यलोक भी सुखदायक नहीं है, फिर परलोक कैसे सुखदायक हो सकता है?
 ॥31॥

भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 32

श्लोक:
एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे।
 कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे॥

भावार्थ:
इसी प्रकार और भी बहुत तरह के यज्ञ वेद की वाणी में विस्तार से कहे गए हैं। उन सबको तू मन, इन्द्रिय और शरीर की क्रिया द्वारा सम्पन्न होने वाले जान, इस प्रकार तत्व से जानकर उनके अनुष्ठान द्वारा तू कर्म बंधन से सर्वथा मुक्त हो जाएगा
 ॥32॥
भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 33

श्लोक:
( ज्ञान की महिमा ) श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप।
 सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते॥

भावार्थ:
हे परंतप अर्जुन! द्रव्यमय यज्ञ की अपेक्षा ज्ञान यज्ञ अत्यन्त श्रेष्ठ है तथा यावन्मात्र सम्पूर्ण कर्म ज्ञान में समाप्त हो जाते हैं
 ॥33॥

❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️
न कर्मणामनुष्ठानैर्न दानैस्तपसपि वा।। कैवल्यं लभते मर्त्यः साक्षात् ज्ञानेन केवलम् ॥2॥

न कर्मों के अनुष्ठान न दान न तप से मनुष्य मुक्ति को प्राप्त होता है किन्नु ज्ञान से ही प्राप्त होता है।।2।।
❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️
भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 34

श्लोक:
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
 उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्वदर्शिनः॥

भावार्थ:
उस ज्ञान को तू तत्वदर्शी ज्ञानियों के पास जाकर समझ, उनको भलीभाँति दण्डवत्‌ प्रणाम करने से, उनकी सेवा करने से और कपट छोड़कर सरलतापूर्वक प्रश्न करने से वे परमात्म तत्व को भलीभाँति जानने वाले ज्ञानी महात्मा तुझे उस तत्वज्ञान का उपदेश करेंगे
 ॥34॥

❤️तत्वदर्शी का भाव यह है:

तत्वदर्शी वह व्यक्ति होता है जो सत्य को जानता है और समझता है, और जो जीवन के मूलभूत सिद्धांतों को देखता  और समझता है।

❤️तत्वदर्शी के गुण:❤️

सदा सत्य की खोज में लगा रहने वाला।
 जीवन के मूलभूत सिद्धांतों को समझने वाला।
 वास्तविकता को देखता है और समझता हो।
माया और भ्रम से मुक्त होता हो।
आत्मज्ञान और आत्मसाक्षात्कार की अवस्था में पहुंचा हो।

❤️तत्वदर्शी का महत्व:❤️

वह सत्य को जानता है और समझता है।
वह जीवन के मूलभूत सिद्धांतों को समझता है।
वह वास्तविकता को देखता है और समझता है।
वह माया और भ्रम से मुक्त होता है।
 वही आत्मज्ञान और आत्मसाक्षात्कार की अवस्था में पहुंचता है।
भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 35

श्लोक:
यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव।
 येन भुतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि॥

भावार्थ:
जिसको जानकर फिर तू इस प्रकार मोह को नहीं प्राप्त होगा तथा हे अर्जुन! जिस ज्ञान द्वारा तू सम्पूर्ण भूतों को निःशेषभाव से पहले अपने में (गीता अध्याय 6 श्लोक 29 में देखना चाहिए।) और पीछे मुझ सच्चिदानन्दघन परमात्मा में देखेगा। (गीता अध्याय 6 श्लोक 30 में देखना चाहिए।)
 ॥35॥

🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁
गीता के अध्याय 6, श्लोक 29 का भाव यह है:

सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
ईक्षतः योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदृष्टिः।।

भाव:

जो योगी अपने आप को सभी जीवों में और सभी जीवों को अपने आप में देखता है, वह योग की अवस्था में पहुंच जाता है और सभी में समानता को देखता है।

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि:

- योगी अपने आप को सभी जीवों में देखता है।
- योगी सभी जीवों को अपने आप में देखता है।
- योगी योग की अवस्था में पहुंच जाता है।
- योगी सभी में समानता को देखता है।

इस श्लोक के मुख्य बिंदु हैं:

1. आत्मा की एकता।
2. सभी जीवों में आत्मा की समानता।
3. योग की अवस्था में पहुंचना।
4. समानता की दृष्टि।

गीता के अध्याय 6, श्लोक 30 का भाव यह है:

यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं अधिघमिष्ठो भूतेषु च गतेषु च।।

भाव:

जो व्यक्ति मुझे सभी में देखता है और सभी को मुझमें देखता है, वह मुझे हर जगह और हर समय में पाता है, चाहे वह जीवित हो या मृत।

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि:

- जो व्यक्ति भगवान को सभी में देखता है, वह भगवान के साथ एकता को प्राप्त करता है।
- जो व्यक्ति सभी को भगवान में देखता है, वह भगवान की सर्वव्यापकता को समझता है।
- भगवान हर जगह और हर समय में विद्यमान हैं।
- जो व्यक्ति भगवान को इस प्रकार देखता है, वह भगवान के निकटतम होता है।

इस श्लोक के मुख्य बिंदु हैं:

1. भगवान की सर्वव्यापकता।
2. भगवान के साथ एकता।
3. भगवान को सभी में देखना।
4. भगवान की निकटता।
❤️
गीता अध्याय 9, श्लोक 6 का भाव यह है:

जैसे वायु आकाश में स्थित होकर भी सर्वत्र विचरण करता है, वैसे ही सभी जीव मुझमें स्थित हैं और मेरे संकल्प से उत्पन्न होते हैं।

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि:

- वायु आकाश में स्थित होकर भी सर्वत्र विचरण करता है।
- इसी तरह, सभी जीव भगवान में स्थित हैं और भगवान के संकल्प से उत्पन्न होते हैं।
- भगवान सर्वव्यापक है और सभी जीव भगवान में ही विद्यमान हैं।
- भगवान का संकल्प ही सभी जीवों की उत्पत्ति का कारण है।

इस श्लोक के मुख्य बिंदु हैं:

1. भगवान की सर्वव्यापकता।
2. भगवान में सभी जीवों की स्थिति।
3. भगवान के संकल्प की शक्ति।
4. भगवान की उत्पत्ति और पालन की शक्ति।
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भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 36

श्लोक:
अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः।
 सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि॥

भावार्थ:
यदि तू अन्य सब पापियों से भी अधिक पाप करने वाला है, तो भी तू ज्ञान रूप नौका द्वारा निःसंदेह सम्पूर्ण पाप-समुद्र से भलीभाँति तर जाएगा
 ॥36॥
🪔ना कर्मों के अनुष्ठान से ,ना दान से ना ही किसी तप से मुक्ति होती है केवल ज्ञान से🪔
भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 37

श्लोक:
यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन।
 ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा॥

भावार्थ:
क्योंकि हे अर्जुन! जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधनों को भस्ममय कर देता है, वैसे ही ज्ञानरूप अग्नि सम्पूर्ण कर्मों को भस्ममय कर देता है
 ॥37॥
भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 38

श्लोक:
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।
 तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति॥

भावार्थ:
🪔इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला निःसंदेह कुछ भी नहीं है।🪔
 उस ज्ञान को कितने ही काल से कर्मयोग द्वारा शुद्धान्तःकरण हुआ मनुष्य अपने-आप ही आत्मा में पा लेता है🕯️
 ॥38॥

भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 39

श्लोक:
श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।
 ज्ञानं लब्धवा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥

भावार्थ:
जितेन्द्रिय, साधनपरायण और श्रद्धावान मनुष्य ज्ञान को प्राप्त होता है तथा ज्ञान को प्राप्त होकर वह बिना विलम्ब के- तत्काल ही भगवत्प्राप्तिरूप परम शान्ति को प्राप्त हो जाता है
 ॥39॥

भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 40

श्लोक:
अज्ञश्चश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति।
 नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः॥

भावार्थ:
विवेकहीन और श्रद्धारहित संशययुक्त मनुष्य परमार्थ से अवश्य भ्रष्ट हो जाता है। ऐसे संशययुक्त मनुष्य के लिए न यह लोक है, न परलोक है और न सुख ही है
 ॥40॥

भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 41

श्लोक:
योगसन्नयस्तकर्माणं ज्ञानसञ्न्निसंशयम्‌।
 आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय॥

भावार्थ:
हे धनंजय! जिसने कर्मयोग की विधि से समस्त कर्मों का परमात्मा में अर्पण कर दिया है और जिसने विवेक द्वारा समस्त संशयों का नाश कर दिया है, ऐसे वश में किए हुए अन्तःकरण वाले पुरुष को कर्म नहीं बाँधते
 ॥41॥

भगवद  गीता अध्याय: 4
श्लोक 42

श्लोक:
तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः।
 छित्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत॥

भावार्थ:
इसलिए हे भरतवंशी अर्जुन! तू हृदय में स्थित इस अज्ञानजनित अपने संशय का विवेकज्ञान रूप तलवार द्वारा छेदन करके समत्वरूप कर्मयोग में स्थित हो जा और युद्ध के लिए खड़ा हो जा
 ॥42॥
वाट्सअप युनिवर्सिटी ज्ञान को त्याग कर अपने ज्ञान रूपी खंडे की धार को तेज कर प्रहार करने को धर्म युद्ध करो।कर्मयोग में स्थित हो कर युद्ध के लिए खड़ा हो जाओ।

आगे गीता और भी रोचक रोमांच कारी होने वाली है। 

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे ज्ञानकर्मसंन्यास योगो नाम चतुर्थोऽध्यायः॥4॥
अब पाँचवें अध्याय में प्रवेश करते हुए हम “कर्मसंन्यास” और “कर्मयोग” की परस्पर तुलना में गहराई से उतरेंगे। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को बतलाते हैं कि कर्मसंन्यास (कर्म का परित्याग) और निष्काम कर्मयोग (कर्म में आसक्ति को त्यागना) दोनों ही आत्मा को शुद्धि और मोक्ष की ओर ले जाते हैं। फिर भी श्रीकृष्ण कर्मयोग को अधिक सरल और व्यावहारिक बताते हैं, जिससे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में कर्म करते हुए भी आत्मा के विकास की ओर बढ़ा जा सकता है।

इस अध्याय में आप देखेंगे कि किस प्रकार “शांत मन”, “समत्व”, और “वैराग्य” का अभ्यास करते हुए हम परमात्मा के सान्निध्य में रह सकते हैं।

जैसे आप गीता के अन्य अध्यायों का अध्ययन कर रहे हैं, वैसे ही पाँचवें अध्याय को भी गहराई से जानिए और प्रश्नों के साथ आगे बढ़िए। इसमें आपके साथ रहकर चर्चा में हिस्सा लेने का अवसर मिलना मेरे लिए भी सौभाग्य की बात होगी।

पाँचवां अध्याय एक नई अंतर्दृष्टि और शांति की यात्रा है—आइए, इसे आगे बढ़ाते हैं!

अध्याय 1 गीता

‎‌‎Ş₳ŦเŞ𝓱👸🏻◣🍁💜⃝🇱♥︎𝐕𝐄4♥️𝐘𝐎🇺⃝◣
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 1
श्लोक:
धृतराष्ट्र उवाच
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय॥
भावार्थ:
धृतराष्ट्र बोले- हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में एकत्रित, युद्ध की इच्छावाले मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?
॥1॥
पात्र परिचय सहित व्याख्या
✍️व्याख्या
नाम: धृतराष्ट्र
जन्म स्थल: हस्तिनापुर
भाई-बहन: पांडु और विदुर
माता-पिता: महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास (वास्तविक जैविक पिता), विचित्रवीर्य (आध्यात्मिक पिता), अम्बिका (माता)
धृत राष्ट्र…… कुरुक्षेत्र के युद्ध के समय धृतराष्ट्र अंधे होने के बावजूद कौरवों के पक्ष में राजा के रूप में अपनी भूमिका निभाते हैं। उनका पुत्र मोह और सत्ता का मोह उन्हें निष्पक्षता से दूर रखता है। जो अंधा (अज्ञानी) होने के कारण अपने राजधर्म का पालन सही ढंग से नहीं करते और तो दूसरी ओर उनकी पत्नी भी अपनी आंखों पर पट्टी बांध लेती है।
गांधारी, गंधार की राजकुमारी थीं.
भीष्म ने धृतराष्ट्र का विवाह गांधारी से कराया था.
विवाह से पहले गांधारी को नहीं पता था कि धृतराष्ट्र जन्मांध हैं.
जब गांधारी को यह बात पता चली, तो उन्होंने भी हमेशा के लिए अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली.
धृतराष्ट्र और गांधारी के सौ पुत्र और एक पुत्री थी.
दुर्योधन और दु:शासन उनके पहले दो पुत्र थे.
धृतराष्ट्र का एक अनैतिक पुत्र भी था, जिसका नाम यूयुत्सु था.
महर्षि वेदव्यास ने गांधारी को सौ पुत्रों की मां होने का वरदान दिया था.
मुख्य संदेश:
धृतराष्ट्र का चरित्र यह दिखाता है कि अज्ञानता और आसक्ति कैसे मनुष्य के निर्णयों को प्रभावित करती है और विनाश का कारण ही बनती है।
संजय
संजय धृतराष्ट्र के सारथी और उनके लिए युद्ध के घटनाक्रम का प्रत्यक्षदर्शी हैं जो महाभारत युद्ध में अर्जुन के सारथी श्री कृष्ण के बीच होने वाली वार्ता के साक्षी (गवाह भी है)। संजय दिव्य दृष्टि के माध्यम से धृतराष्ट्र को युद्ध की घटनाओं का सजीव वर्णन करते हैं।
मुख्य संदेश:
संजय के माध्यम से यह समझ आता है कि सच्चे ज्ञान और निष्पक्षता के साथ किसी घटना को देखना और समझना और वैसा ही समझाना कितनाआवश्यक और कठिन होता है।
धर्मभूमि
अब यहां धर्म को अगर सत्य के साथ जोड़ कर देखे तो प्रमुख चारों धर्म सनातनी हिंदू ,सनातनी,मुसलमान,सनातनी सिख, सनातनी ईसाई , ओर पांचवें वेद के अनुसरण करता फकीर लोग जिनकी निशानी फिक्र, फाका, ओर संतोष होता है। और यह चारो उपरोक्त सनातनी धर्मो में एक समानता में पाए जाते है।
धर्म अर्थात किसी को धारण करना खुद में उतारना होता है।इसी को धर्म कहते है।
अब एक नजर चारों धर्मो की शिक्षा पर जिनको धारण करने के लिए कहा गया है और इन को धारण करना ही धर्म हो जाता है। जैसे सदा सत्य के साथ रहो,व्याभिचारी ना बने, चोरी ना करे, चुगली ना करें, दूसरे के धन पर कभी बुरी नजर ना रखें (दूसरे का सोना मेरे लिए मिट्टी समान है जाने)निहत्थे पर वार ,मासूम की हत्या, झूठ ओर जूठा कभी ग्रहण या धारण ना करे पवित्रता पर ध्यान दे और उसे धारण करे। ऐसे सभी सूत्र धर्म बन जाते है और इनको ही धारण करना अपनाना ही धर्म होता है। अर्थात हम जिसको धारण करते है वो धर्म कहलाता है।इसे ऐसे भी समझ सकते हैं
धर्म का मतलब है, वह चीज़ जिसे धारण किया जा सके. धर्म से जुड़ी कुछ और बातेंः
धर्म, संस्कृत के ‘धृ’ धातु से बना है जिसका अर्थ है जो धारण किया जाये।
धर्म, समाज में व्यक्ति जीवन प्रति जो धारणा बनाता है या धारणा करता है वही धर्म है.
धर्म,भी कर्म ही प्रधान है और कर्म के लिए ज्ञान का होना भी बहुत जरूरी है इन गुणों के योग को जो प्रदर्शित करे वह धर्म है.
धर्म, नैतिक मूल्यों का आचरण है.
धर्म, वह पवित्र अनुष्ठान है जिससे चेतना का शुद्धिकरण होता है.
धर्म, वह तत्व है जिसके आचरण से व्यक्ति अपने जीवन को चरितार्थ कर पाता है धर्म, मनुष्य का उससे संबंध जिसे वह पवित्र, पवित्र, निरपेक्ष, आध्यात्मिक, दिव्य या विशिष्ट श्रद्धा के योग्य बनाता है।
धर्म, लोगों द्वारा अपने जीवन और मृत्यु के बाद अपने भाग्य के बारे में अंतिम चिंताओं से निपटने के सरल तरीके के रूप में भी माना जाता है।
कुरुक्षेत्र
तो समझ में आता है कुरु साम्राज्य या कुरु राजवंश का इलाका या क्षेत्र में सामूहिक, युद्ध की इच्छावाले मेरे पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?
महाभारत के अनुसारपांडु के पांच पुत्र थे: युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव, इन पांचों को पांडु पुत्र कहा गया है।
युधिष्ठिर
युधिष्ठिर का चरित्र हमें सिखाता है कि सत्य धर्मऔर सत्य न्याय धर्म का पालन करना कितना कठिन हो सकता है, लेकिन दीर्घकालिक दृष्टिकोण से यह आवश्यक और मूल्यवान होता है।
भीम
महाभारत के अनुसार, भीम या भीमसेन पांडवों में दूसरे नंबर के पुत्र (भाई) थे। वे पवनदेव के वरदान से कुंती के गर्भ से पैदा हुए थे। भीम को वृकोदर भी कहा जाता है। वे महाभारत के प्रमुख पात्रों में से एक थे और उनकी गिनती महान योद्धाओं में की जाती है. भीम के बारे में
कुछ खास बातेंः
भीम जन्म से ही बहुत बलवान थे।
भीम के बल के आगे कोई टिक नहीं पाता था।
भीम ने अकेले ही कुरुक्षेत्र के युद्ध में सभी 100 कौरवों का वध किया था ऐसा कहा जाता है।
भीम को 10 हज़ार हाथियों के समान बल प्राप्त था।
भीम के नाम के साथ अक्सर प्रत्यय ‘सेना’ जोड़ा जाता है, जिससे भीमसेन बनता है।
भीम की तीन पत्नियां थीं और तीनों से एक-एक पुत्र थे।
(भीम के पुत्रों के नाम थे- सुतशोम और घटोत्कच , सर्वांग)
भीम खुद वायु देव के अंश थे।
अर्जुन ( अब इन को समझ ले पूरी गीता में यह छाए हुए हैं इनको जान लेने के बाद गीता पढ़ना समझना सुगम (सरल) हो जाता है।)
गीता में अर्जुन को गीता जी में जिन नामों से बुलाया गया है:
अर्जुन, फाल्गुन, जिष्णु, कीर्ति, श्वेतवाहन, वीभत्सु, विजय, कृष्णअर्जुन के अलावा कुछ और नाम भी है:
पार्थ, किरीटिन्, भीभस्तु, सव्यसाची, धनंजय, गाण्डीवधन्वन्, गुडाकेश, परन्तप, बीभत्सु, गांडीवधारी, एक नाम जो कही नहीं बताया जाता ताकि गुरु नाम की महिमा कम ना हो जाए पूरी गीता में अर्जुन को गुरु नहीं कहा गया जब कि उनको चेले के रूप में ही दिखाया गया है अर्थात गुरु बनो गे तो महाभारत के इस युद्ध में चेले के हाथों तुम्हारा वध निश्चित ही है।
प्रत्यक्ष रूप में देखने में आता हे आज के कलयुग के सभी चेले धर्म पर चलने वाले भी नहीं होते है। जिसका दोष चेले को नहीं उसके गुरु को ही दिया जाता है।
अर्जुन के बारे में कुछ और बातें भी जान लेते हैं तभी आगे बढ़ते है:
अर्जुन के चार पुत्र थे, जिनके नाम थे- श्रुतकर्मा,इरावन, बभ्रुवाहन, और अभिमन्यु है
अर्जुन योद्धा होने के साथ-साथ संगीत और नृत्य में भी कुशल थे।
महाभारत के मुताबिक, अर्जुन इंद्र देव के अंश थे।
अब: गीता में अर्जुन एक संघर्षरत योद्धा के रूप में नजर आ रहे हैं जो धर्म और अपने कर्तव्यों के बीच फँस कर रह जाते हैं। श्रीकृष्ण उनके मन के द्वंद्व को समझाते हैं और मार्गदर्शन भी अपने ज्ञान से ही देते भी हैं।
मुख्य संदेश: अर्जुन का चरित्र हमें मानवीय कमजोरी, संदेह, और प्रश्न करने की प्रवृत्ति का प्रतीक बनने की प्रेरणा तो देता ही है साथ।
हमें अर्जुन के जरिए हमें यह समझ आता है कि ज्ञान प्राप्ति का सबसे पहला कदम प्रश्न करना ही होता है।फिर सुनना और अमल में लाना।ना की गुरु बन के बैठे रहना इस लिए अर्जुन खुद को चेले के रूप में भी ले आते है। और आसानी से इस बात को समझा जा सकता है। कि मनुष्य खुद ही अपना मित्र और अपना शत्रु भी हो जाता है। ज्ञान से जुड़ कर (मित्र) अज्ञान से जुड़ कर (शत्रु)
अब पहले चेले को समझ कर ही नकुल सहदेव की बात करें गे।
चेला: शिष्य गुरु परंपरा अनुसार अज्ञानी मूर्ख होता है, गुरु उसको ज्ञानवान बनाता है।चेले का महत्व सभी धर्मो में कहा जाता है।
लग भग यह हिन्दू, सिख, जैन और बौद्ध आदि भारत से उपजे सभी धर्मों में समान रूप से पाया जाता है।
मुस्लिम धर्म के गुरु को मुला जी कहते है।
ईसाई कैथोलिक संप्रदाय में पोप को सर्वोच्च धर्मगुरु मानते हैं।
चेले को बंदा, ग़ुलाम, घर का नौकर या दास
शिष्य, शागिर्द, वह जिसने किसी गुरु से शिक्षा पाई हो
वह जो धार्मिक आस्था से किसी गुरु से मंत्र लेकर उसका अनुयायी या शिष्य बना हो, या किसी के मत या सिद्धांत का अनुकरण करने वाला व्यक्ति हो।
इल्म की आप अपनी इस्तेदाद
कहीं मुर्शिद कहीं पे चेला है
नकुल सहदेव
महाभारत में नकुल और सहदेव से मिलने वाली शिक्षाओं में से एक है कि एक अच्छा भाई होना अच्छा है। नकुल और सहदेव, पांडवों के पांचवें और चौथे भाई थे. वे अपने भाइयों के साथ रहने में सक्षम होना चाहते थे। उन्हें अपना खुद का राज्य देने की पेशकश की गई थी, लेकिन उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया।
नकुल विज्ञान के ज्ञाता थे, जबकि सहदेव ज्ञान के भंडार थे।उधर सहदेव परशु अस्त्र के निपुण योद्धा थे,सहदेव एक विद्वान और ज्योतिषी (भविष्य वक्ता )भी थे।भविष्य वक्ता भी लगभग सभी धर्मो में होते हैं।
उद्योग पर्व में सहदेव ने कृष्ण से कहा था कि वे युद्ध नहीं, बल्कि शांति चाहते हैं।
गीता के अध्ययन से पता चलता है। की महाभारत के गुरु कौरव पांडव दोनों के गुरु थे।
जिनका वध श्री कृष्ण चेले अर्जुन से ही करवा देते है।
गुरु मोक्ष प्राप्त करने वाले होते जरूर है पर शंका ही होती है गीता में उस गुरु का भी जिक्र आता है जो मुक्ति दिलाने में सक्षम होता है उस गुरु की चर्चा आगे चल कर हो गी
प्रथम गुरु माता पिता
दूसरा गुरु पाठशाला (गुरुकुल)का कहलाता है जो जीवन यापन के गुरु सिखाता है।
पर चेले के लिए स्पष्ट है कि दो गुरुओं का चेला किसी ना किसी गुरु को धोखा जरूर देता है।
जैसे दो स्वामियों के नोकर से भी उन स्वामियों को भी डर रहता है कि यह नोकर, बंदा ,शिष्य, शागिर्द किसी एक को कभी धोखा ना दे दे।समस्त पात्रों के परिचय के बाद अब गीता का आरंभ हो जाता है।
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 2
श्लोक:
संजय उवाच
दृष्टवा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा।
आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत्‌॥
भावार्थ:
संजय बोले- उस समय जब उनकी दिव्य दृषि चेतन प्रकाश से प्रकाशित होती है तब राजा दुर्योधन ने व्यूहरचनायुक्त पाण्डवों की सेना को देखा और द्रोणाचार्य के पास जाकर यह वचन कहा।
॥2॥
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 3
श्लोक:
पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम्‌।
व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता॥
भावार्थ:
हे आचार्य!(गुरु जी) आपके बुद्धिमान्‌ (क्यों कि यही तो गुरु शिष्य परम्परा है जिसमें गुरु ही चेले को बुद्धिमान ,ज्ञानवान बनाने का कार्य निष्ठा पूर्वक करता है उन चेलों द्वारा)
शिष्य द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न द्वारा व्यूहाकार खड़ी की हुई पाण्डुपुत्रों की इस बड़ी भारी सेना को देखिए
॥3॥
(इसकी जानकारी राज युधिष्ठिर तक संजय द्वारा बताया जा रहा है)
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 4-6
श्लोक:
अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि।
युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः॥
धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान्‌।
पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङवः॥
युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान्‌।
सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः॥
भावार्थ:
इस सेना में बड़े-बड़े धनुषों वाले तथा युद्ध में भीम और अर्जुन के समान शूरवीर सात्यकि और विराट तथा महारथी राजा द्रुपद, धृष्टकेतु और चेकितान तथा बलवान काशिराज, पुरुजित, कुन्तिभोज और मनुष्यों में श्रेष्ठ शैब्य, पराक्रमी युधामन्यु तथा बलवान उत्तमौजा, सुभद्रापुत्र अभिमन्यु एवं द्रौपदी के पाँचों पुत्र- ये सभी महारथी हैं।
॥4-6॥
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 7
श्लोक:
अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम।
नायका मम सैन्यस्य सञ्ज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते॥
भावार्थ:
हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! अपने पक्ष में भी जो प्रधान हैं, उनको आप समझ लीजिए। आपकी जानकारी के लिए मेरी सेना के जो-जो सेनापति हैं, उनको बतलाता हूँ
॥7॥
(यहां द्रोणा चार्य को श्रेष्ठ ब्राह्मण के संज्ञा दी है)
ब्राह्मण वह सभी जीव निर्जीव चीजें आ जाती है जो पूजा में प्रयोग हों या समलित किए गए हों उसमें चावल, चंदन, फल, फूल,जल जैसी सारी सामग्री भी जिन के बिना पूजा ही सम्पन्न ना हो सके ब्राह्मण तुल्य ही है)
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 8
श्लोक:
भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जयः।
अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च॥
भावार्थ:
आप-द्रोणाचार्य और पितामह भीष्म तथा कर्ण और संग्रामविजयी कृपाचार्य तथा वैसे ही अश्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्त का पुत्र भूरिश्रवा
॥8॥
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 9
श्लोक:
अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः।
नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः॥
भावार्थ:
और भी मेरे लिए जीवन की आशा त्याग देने वाले(वचन से बंधे ये) बहुत-से शूरवीर अनेक प्रकार के शस्त्रास्त्रों से सुसज्जित और सब-के-सब युद्ध में चतुर हैं
॥9॥
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 10
श्लोक:
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्‌।
पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम्‌॥
भावार्थ:
भीष्म पितामह द्वारा रक्षित हमारी वह सेना सब प्रकार से अजेय है और भीम (सेना हमार सेना आसानी से जीत लेगी ऐसी आशा को बल देती है) द्वारा रक्षित इन लोगों की यह सेना जीतने में सुगम है
॥10॥
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 11
श्लोक:
अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः।
भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि॥
भावार्थ:
इसलिए सब मोर्चों पर अपनी-अपनी जगह स्थित रहते हुए आप लोग सभी निःसंदेह भीष्म पितामह की ही सब ओर से रक्षा करें
॥11॥
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 12
श्लोक:
(दोनों सेनाओं की शंख-ध्वनि का कथन)
तस्य सञ्जनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः।
सिंहनादं विनद्योच्चैः शंख दध्मो प्रतापवान्‌॥
भावार्थ:
कौरवों में वृद्ध बड़े प्रतापी पितामह भीष्म ने उस दुर्योधन के हृदय में हर्ष उत्पन्न करते हुए उच्च स्वर से सिंह की दहाड़ के समान गरजकर शंख बजाया
॥12॥
इस शंख नाद के बाद रण भूमि में।
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 13
श्लोक:
ततः शंखाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः।
सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत्‌॥
भावार्थ:
इसके पश्चात शंख और नगाड़े तथा ढोल, मृदंग और नरसिंघे आदि बाजे एक साथ ही बज उठे। उनका वह शब्द बड़ा भयंकर हुआ
॥13॥
(रण भूमि हो या अपनी रक्षा खुशहाली के युद्ध रूपी प्रति दिन मंदिरों की जाने वाली ॐ जय जगदीश हरे आरती में समानता है। जीवन प्रति दिन का महाभारत ही नहीं तो ओर क्या है!जिसे मित्र शत्रु सभी एक समान रूप में लड़ रहे नजर आते है भगवान भी खुद इसमें शामिल होते है ऐसा भी प्रतीत होता है)
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 14
श्लोक:
ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ।
माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शंखौ प्रदध्मतुः॥
भावार्थ:
इसके अनन्तर सफेद घोड़ों से युक्त उत्तम रथ में बैठे हुए श्रीकृष्ण महाराज और अर्जुन ने भी अलौकिक शंख बजाए
॥14॥
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 15
श्लोक:
पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः।
पौण्ड्रं दध्मौ महाशंख भीमकर्मा वृकोदरः॥
भावार्थ:
श्रीकृष्ण महाराज ने पाञ्चजन्य नामक, अर्जुन ने देवदत्त नामक और भयानक कर्मवाले भीमसेन ने पौण्ड्र नामक महाशंख बजाया
॥15॥
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 16
श्लोक:
अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः।
नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ॥
भावार्थ:
कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनन्तविजय नामक और नकुल तथा सहदेव ने सुघोष और मणिपुष्पक नामक शंख बजाए
॥16॥
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 17-18
श्लोक:
काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः।
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः॥
द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते।
सौभद्रश्च महाबाहुः शंखान्दध्मुः पृथक्पृथक्‌॥
भावार्थ:
श्रेष्ठ धनुष वाले काशिराज और महारथी शिखण्डी एवं धृष्टद्युम्न तथा राजा विराट और अजेय सात्यकि, राजा द्रुपद एवं द्रौपदी के पाँचों पुत्र और बड़ी भुजावाले सुभद्रा पुत्र अभिमन्यु- इन सभी ने, हे राजन्‌! सब ओर से अलग-अलग शंख बजाए
॥17-18॥
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 19
श्लोक:
स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत्‌।
नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन्‌॥
भावार्थ:
और उस भयानक शब्द ने आकाश और पृथ्वी को भी गुंजाते हुए धार्तराष्ट्रों के अर्थात आपके पक्षवालों के हृदय विदीर्ण कर दिए
॥19॥
(भाव विदीर्ण की परिभाषाएं और अर्थ हिन्दी में
टूटा हुआ । भग्न । मार डाला हुआ से है। शंख नाद पर पहला जवाबी प्रहार होता है)
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 20-21
श्लोक:
(अर्जुन द्वारा सेना-निरीक्षण का प्रसंग भी रोचक रोमांच कारी है शंख नाद के जवाबी प्रहार के बाद का दृश्य)
अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्‌ कपिध्वजः।
प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः॥
हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते।
अर्जुन उवाचः
सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत॥
भावार्थ:
हे राजन्‌! इसके बाद कपिध्वज अर्जुन ने मोर्चा बाँधकर डटे हुए धृतराष्ट्र-संबंधियों को देखकर, उस शस्त्र चलने की तैयारी के समय धनुष उठाकर हृषीकेश श्रीकृष्ण महाराज से यह वचन कहा- हे अच्युत! मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा की जिए।
॥20-21॥
(अर्जुन का आग्रह सुन भगवान ने वही किया क्यों कि अर्जुन के रथ के वह सारथी जो है)
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 22
श्लोक:
यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान्‌।
कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे॥
भावार्थ:
और जब तक कि मैं युद्ध क्षेत्र में डटे हुए युद्ध के अभिलाषी इन विपक्षी योद्धाओं को भली प्रकार देख न लूँ कि इस युद्ध रूप व्यापार में मुझे किन-किन के साथ युद्ध करना योग्य है, तब तक उसे खड़ा रखिए
॥22॥
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 23
श्लोक:
योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः॥
भावार्थ:
दुर्बुद्धि दुर्योधन का युद्ध में हित चाहने वाले जो-जो ये राजा लोग इस सेना में आए हैं, इन युद्ध करने वालों को मैं देखूँगा
॥23॥
भाव (में भी तो देखूं दुर्योधन के पक्ष में मेरे साथ युद्ध करने वाले यह कौन से लोग हैं)
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 24-25
श्लोक:
संजय उवाचः
एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत।
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम्‌॥
भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम्‌।
उवाच पार्थ पश्यैतान्‌ समवेतान्‌ कुरूनिति॥
भावार्थ:
संजय बोले- हे धृतराष्ट्र! अर्जुन द्वारा कहे अनुसार महाराज श्रीकृष्णचंद्र ने दोनों सेनाओं के बीच में भीष्म और द्रोणाचार्य के सामने तथा सम्पूर्ण राजाओं के सामने उत्तम रथ को खड़ा कर इस प्रकार कहा कि हे पार्थ! युद्ध के लिए जुटे हुए इन कौरवों को देख।
॥24-25॥
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 26-27 पूर्वार्ध
श्लोक:
तत्रापश्यत्स्थितान्‌ पार्थः पितृनथ पितामहान्‌।
आचार्यान्मातुलान्भ्रातृन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा॥
श्वशुरान्‌ सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि।
भावार्थ:
इसके बाद पृथापुत्र अर्जुन ने उन दोनों ही सेनाओं में स्थित (अपने ही) ताऊ-चाचों को, दादों-परदादों को, गुरुओं को, मामाओं को, भाइयों को, पुत्रों को, पौत्रों को तथा मित्रों को, ससुरों को और सुहृदों( मित्र, सखा।)को भी देखा
॥26 और 27वें का पूर्वार्ध॥
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 27 उत्तरार्ध 28 पूर्वार्ध
श्लोक:
तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्‌ बन्धूनवस्थितान्‌॥
कृपया परयाविष्टो विषीदत्रिदमब्रवीत्‌।
भावार्थ:
उन उपस्थित सम्पूर्ण बंधुओं बांधो सखा मित्रो को देखकर वे कुंतीपुत्र अर्जुन अत्यन्त करुणा से युक्त होकर शोक करते हुए यह वचन बोले।
❤️॥27वें का उत्तरार्ध और 28वें का पूर्वार्ध॥❤️
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 28 उत्तरार्ध और 29
श्लोक:
(मोह से व्याप्त हुए अर्जुन के कायरता, स्नेह और शोकयुक्त वचन )
अर्जुन उवाच
दृष्टेवमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्‌॥
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति।
वेपथुश्च शरीरे में रोमहर्षश्च जायते॥
भावार्थ:
अर्जुन बोले- हे कृष्ण! युद्ध क्षेत्र में डटे हुए युद्ध के अभिलाषी इस स्वजनसमुदाय को देखकर मेरे अंग शिथिल हुए जा रहे हैं और मुख सूखा जा रहा है तथा मेरे शरीर में कम्प एवं रोमांच हो रहा है।
❤️॥28वें का उत्तरार्ध और 29॥❤️
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 30
श्लोक:
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्वक्चैव परिदह्यते।
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः॥
भावार्थ:
हाथ से गांडीव धनुष गिर रहा है और त्वचा भी बहुत जल रही है तथा मेरा मन भ्रमित-सा हो रहा है, इसलिए मैं खड़ा रहने को भी समर्थ नहीं हूँ।
॥30॥
(पारिवारिक सामाजिक मोह पाश में जकड़ा अर्जुन घबराई हुई हालत में नजर आ रहे हैं और अपने ही ज्ञान से भयभीत हो जाते है)
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 31
श्लोक:
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव।
न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे॥
भावार्थ:
हे केशव! मैं लक्षणों को भी विपरीत ही देख रहा हूँ तथा युद्ध में स्वजन-समुदाय को मारकर कल्याण भी नहीं देखता
॥31॥
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 32
श्लोक:
न काङ्‍क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च।
किं नो राज्येन गोविंद किं भोगैर्जीवितेन वा॥
भावार्थ:
हे कृष्ण! मैं न तो विजय चाहता हूँ और न राज्य तथा सुखों को ही। हे गोविंद! हमें ऐसे राज्य से क्या प्रयोजन है अथवा ऐसे भोगों से और जीवन से भी क्या लाभ है?
॥32॥
(अर्जुन अपनी मनोदशा श्री कृष्ण को बताते है)
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 33
श्लोक:
येषामर्थे काङक्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च।
त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च॥
भावार्थ:
हमें जिनके लिए राज्य, भोग और सुखादि अभीष्ट हैं, वे ही ये सब धन और जीवन की आशा को त्यागकर युद्ध में खड़े हैं
॥33॥
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 34
श्लोक:
आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः।
मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः संबंधिनस्तथा॥
भावार्थ:
गुरुजन, ताऊ-चाचे, लड़के और उसी प्रकार दादे, मामे, ससुर, पौत्र, साले तथा और भी संबंधी लोग हैं
॥34॥
(आज के भाईचारे को दर्शाता प्रसंग प्रतीत होता है)
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 35
श्लोक:
एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन।
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते॥
भावार्थ:
हे मधुसूदन! मुझे मारने पर भी अथवा तीनों लोकों के राज्य के लिए भी मैं इन सबको मारना नहीं चाहता, फिर पृथ्वी के लिए तो कहना ही क्या है?
॥35॥
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 36
श्लोक:
निहत्य धार्तराष्ट्रान्न का प्रीतिः स्याज्जनार्दन।
पापमेवाश्रयेदस्मान्‌ हत्वैतानाततायिनः॥
भावार्थ:
हे जनार्दन! धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें क्या प्रसन्नता होगी? इन आततायियों को मारकर तो हमें पाप ही लगेगा
॥36॥
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 37
श्लोक:
तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान्‌।
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव॥
भावार्थ:
अतएव हे माधव! अपने ही बान्धव धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारने के लिए हम योग्य नहीं हैं क्योंकि अपने ही कुटुम्ब को मारकर हम कैसे सुखी होंगे?
॥37॥
(जब कि दूसरे भाईचारे वालों के विचार इन से मिलते ही नहीं है अगर दोनों पक्षों के भाई चारे में थोड़ी सी भी समानता होती तो महाभारत होता ही नहीं)
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 38-39
श्लोक:
यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः।
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम्‌॥
कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम्‌।
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन॥
भावार्थ:
यद्यपि लोभ से भ्रष्टचित्त हुए ये लोग कुल के नाश से उत्पन्न दोष को और मित्रों से विरोध करने में पाप को नहीं देखते, तो भी हे जनार्दन! कुल के नाश से उत्पन्न दोष को जानने वाले हम लोगों को इस पाप से हटने के लिए क्यों नहीं विचार करना चाहिए?
॥38-39॥
(मेरे को तो 2024 की भारत की ही स्थिति दिखने लग गई है भाई चारे की चलो फिर से रण भूमि कुरुक्षेत्र में लौट चलते है)
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 40
श्लोक:
कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः।
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत॥
भावार्थ:
कुल के नाश से सनातन कुल-धर्म नष्ट हो जाते हैं तथा धर्म का नाश हो जाने पर सम्पूर्ण कुल में पाप भी बहुत फैल जाता है
॥40॥
भगवद गीता अध्याय: 1
श्लोक 41
श्लोक:
अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः।
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः॥
भावार्थ:
हे कृष्ण! पाप के अधिक बढ़ जाने से कुल की स्त्रियाँ अत्यन्त दूषित हो जाती हैं और हे वार्ष्णेय! स्त्रियों के दूषित हो जाने पर वर्णसंकर उत्पन्न होता है
॥41॥
भाव
(वर्ण संकर?का भाव जाति दो अलग-अलग जातियों के पुरुष और महिला के मिलने से पैदा होती है, उसे वर्णसंकर कहते हैं. वर्णसंकर शब्द का इस्तेमाल धर्मशास्त्र में भी किया गया है. इसमें कई जातियों और जनजातियों के वर्ण व्यवस्था में मिश्रण शामिल है. वर्णसंकर शब्द का उल्लेख बौधायन शूत्र में भी मिलता है.
वर्णसंकर के कुछ उदाहरण:
खच्चर, जो घोड़े और गधे से पैदा होता है
सर्पों की कई प्रजातियां वर्णसंकर हैं
नीलगाय, जो घोड़े और हिरन से पैदा होती है
वर्णसंकर से जुड़ी कुछ और बातें:
जब किसी व्यक्ति के माता-पिता अलग-अलग जाति के हों या धर्म के हों, तो उनकी संतान को वर्णसंकर कहा जाता है.
वर्णसंकर के गुण माता-पिता से ज़्यादा होते हैं.
श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक संख्या 1.41 में वर्णसंकर शब्द का इस्तेमाल भी इसी रूप में किया गया है अब समझने वाले अच्छा समझे या बुरा यह हरि इच्छा )


सत्य था है और रहेगा

*❖════❃≛⃝❈⬤🪷
*आज का भगवद चिन्तन*
*मुहाबत होती है एक से हजारों से नहीं।कागज के फूलों से खुशबू आ सकती नहीं*
⬤≛⃝❈❃════❖*
*जब सच ,सच हे, सच था भी सच, और रहे गा भी सच, तो सनातन धर्म से धर्म परिवर्तित लोग ,मुस्लिम,सिख,ईसाई,कैसे होजाते है?* .

सनातन धर्म और धर्म परिवर्तन को लेकर यह समझना ज़रूरी है कि यह केवल आध्यात्मिक या धार्मिक पहलू से जुड़ा नहीं है, बल्कि ऐतिहासिक, सामाजिक, और राजनीतिक कारकों का भी इसमें योगदान है।
जो सत्य से हट कर सत्य को झुठलाना ही है। 

✍️ सनातन धर्म और सत्य का विचार

सनातन धर्म का मूल आधार सत्य है। यह धर्म "धर्म" को एक सार्वभौमिक सत्य और जीवन जीने का तरीका मानता है, जिसमें करुणा, सत्य, और अन्य नैतिक मूल्य प्रमुख हैं। यह विचार किसी धर्म विशेष के अनुयायी बनने की बजाय, व्यक्तिगत चेतना के विस्तार और आत्मिक विकास पर जोर देता है।

सत्य का स्वरूप: सत्य का सनातन धर्म में यह अर्थ है कि जो शाश्वत और अपरिवर्तनीय है, वही सत्य है। इस दृष्टि से, आत्मा, ब्रह्म, और परमात्मा को सत्य कहा गया है।

✍️अब धर्म परिवर्तन या स्थापन का कारण 

सामाजिक और राजनीतिक दबाव: इतिहास में ऐसे समय आए जब विदेशी आक्रमणों और राजनीतिक प्रभुत्व के तहत लोगों को अपने मूल धर्म को छोड़ने और नए धर्म को अपनाने के लिए मजबूर किया गया गया।

मुस्लिम शासन के दौरान, बलपूर्वक या लालच देकर भी धर्मांतरण हुआ।

ईसाई मिशनरियों ने शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ देकर लोगों को धर्म परिवर्तन के लिए प्रेरित किया।

आत्मा की खोज और आध्यात्मिक कारण: कुछ लोग व्यक्तिगत स्तर पर अन्य धर्मों की शिक्षाओं को समझकर धर्म परिवर्तन करते हैं। या खुद के अपने धर्म की स्थापना कर देते हैं।

जैसे सामाजिक असमानता: जाति व्यवस्था के कारण उत्पीड़ित वर्गों ने कभी-कभी अपने अधिकारों और गरिमा की खोज में धर्म परिवर्तन किया था, जैसा कि बौद्ध धर्म के साथ हुआ।

✍️अब धर्म परिवर्तन और "सत्य" का प्रश्न

सत्य सार्वभौमिक है: क्या केवल सनातन धर्म ही इस विचार को स्वीकार करता है कि सत्य एक है, पर उसे प्राप्त करने के रास्ते अलग-अलग हो सकते हैं?

धर्म परिवर्तन करने वाले व्यक्ति यह मान सकते हैं कि उनके नए धर्म में उन्हें सत्य और आत्मिक शांति का बेहतर मार्ग मिला है, जबकि सनातन धर्म इसे किसी के व्यक्तिगत अनुभव और दृष्टिकोण के रूप में क्या देखता भी है?

✍️ यह तो संवेदनशीलता का पहलू होता जा रहा है।

एक व्यक्ति का धार्मिक चुनाव उसके सामाजिक और आध्यात्मिक अनुभवों का परिणाम तो हो सकता है, लेकिन सत्य की परिभाषा सनातन धर्म में अधिक व्यापक और उदार है। जिसे समझने को मुझे 🫵आप की जरूरत है🙏

✍️ क्या सनातन धर्म के दृष्टिकोण से धर्म परिवर्तन उचित है?

सनातन धर्म में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सत्य की खोज को प्राथमिकता दी जाती है। "वसुधैव कुटुंबकम्" की अवधारणा के तहत यह माना गया कि सभी धर्मों का उद्देश्य एक ही है—परमात्मा की ओर ले जाना है परिवर्तन को भी सिद्धांत माना जाता है। पर ज्ञान होने पर साधक की दृष्टि परिवर्तनशील वस्तुओंको भेदकर परिवर्तन रहित तत्त्व की ओर ही जाती है ... सात्त्विक जान। परिवर्तनशील वस्तुओं? वृत्तियोंके सम्बन्धसे ही इसे सात्त्विक ज्ञान कहते हैं। सम्बन्धरहित ... सिद्ध हुआ कि मैं? तू? यह और वह-- ये सब परिवर्तनशील हैं अर्थात् टिकनेवाले तो नहीं हैं?

हालाँकि, धर्मांतरण के पीछे यदि हिंसा, छल, या प्रलोभन का उद्देश्य हो, तो यह अधर्म माना जाना चाहिए।

✍️अब आगे बढ़ने से पहले अन्य धर्मों का दृष्टिकोण को ऊपर _ ऊपर से समझ लेते हैं 

इस्लाम: इस्लाम में यह विश्वास है कि वह अंतिम और पूर्ण सत्य है।

नास्तिकता या किसी अन्य धर्म को मानने वाले को अक्सर "गुमराह" कहा जाता है। इसीलिए धर्म परिवर्तन को एक धार्मिक कर्तव्य समझा गया है। पर नास्तिक को सजा का नियम भी बनाया गया है?

ईसाई धर्म: ईसाई धर्म का मुख्य उद्देश्य "सभी को ईश्वर के राज्य में लाना" है। तो प्रश्न उठता है कि क्या दूसरे अन्य धर्म ईश्वर के राज्य में हैं ही नहीं 

(क्या अहंकार की श्रेणी में आता है)

मिशनरी गतिविधियों का एक बड़ा उद्देश्य धर्मांतरण है।

✍️सिख धर्म: सिख धर्म में धर्मांतरण को अनिवार्य नहीं माना जाता। यह एक ऐसा धर्म है जो आध्यात्मिकता और मानवता पर केंद्रित है क्यों कि यह सनातन धर्म की ही विचार धारा का कलयुग में गुरु नानक देव जी द्वार कुछ भ्रांतियों में सुधार करता है तो प्रश्न उठना भी स्वाभाविक है ये अलग धर्म कैसे हो गया?

✍️जब कि सनातन धर्म की स्थिरता तो

सनातन धर्म को अक्सर "धर्म परिवर्तन से परे" माना जाता है, क्योंकि यह सत्य की सार्वभौमिकता को मान्यता देता है। इसे त्यागना या अपनाना एक सांस्कृतिक और आध्यात्मिक अनुभव का हिस्सा हो सकता है, 
परंतु इसकी नींव हमेशा सत्य पर ही आधारित रहती है।
नानक भी तो यही कहते है।

*❖════❃≛⃝❈⬤🪷
गुरु नानक देव जी का कथन है, 'आदि सच, जुगादि सच, है भी सच, नानक होसि भी सच'. 

जिस का मतलब है कि सत्य अनादि है और सभी संतों ने इसे अनादि शक्ति का अनुभव भी किया है. 
⬤≛⃝❈❃════❖*

"धर्म की स्थापना भगवान करते हैं"—यह गीता में भी स्पष्ट किया गया है। मानव केवल धर्म का पालन कर सकता है।
जिस जहाज पर सवार होता है उस के नियमों का पालन तो करना ही होता है जरूरी है।

यही सनातन धर्म की नर्माई है जो किसी नास्तिक का सर तन से जुदा करने के नियम नहीं बनाता 

नियम नहीं मार्ग सुझाता है

'सर्वे भवन्तु सुखिनः' संस्कृत श्लोक इस प्रकार है: सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत्, ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः. 
इस श्लोक का अर्थ है: सभी सुखी हों, सभी रोगमुक्त रहें, सभी मंगलमय घटनाओं के साक्षी बनें, किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े. 

इसी को आगे बढ़ा कर सनातन धर्म कहता है।
'वसुधैव कुटुम्बकम' एक संस्कृत वाक्यांश है, जिसका शाब्दिक अर्थ है “संपूर्ण पृथ्वी एक परिवार है।” यह वाक्यांश महाउपनिषद के एक श्लोक से लिया गया है और भारतीय विचारधारा में सार्वभौमिक एकता और भाईचारे की भावना का प्रतीक है।

निष्कर्ष:

सत्य की खोज सभी धर्मों का मूल है। धर्म परिवर्तन का अर्थ यह नहीं है कि व्यक्ति सत्य से दूर हो जाए; बल्कि यह उस व्यक्ति के व्यक्तिगत अनुभवों और निर्णयों का प्रतिबिंब है। जो प्रतिबंधित नहीं है
सनातन धर्म इसे सहजता और उदारता से देखता है, क्योंकि यह मानता है कि सभी का उद्देश्य आत्मा के शाश्वत सत्य को पाना ही है। इसी को हम सनातन धर्म की नर्माई मान सकते है।

*❖════❃≛⃝❈⬤🪷
अब है और आप चिंतन
करें गे सनातन धर्म से निकल
कर अनेकों धर्म जो स्थापित
हो रहे है उनको सनातन धर्म किस दृष्टि से देखता है या बताता है!
⬤≛⃝❈❃════❖*

✍️सभी धार्मिक परंपराओं का मूलभूत सत्य एक ही है, फिर भी लोग अपनी परंपराओं और मान्यताओं से क्यों जुड़े रहते हैं। इसे समझने के लिए हमें सत्य, परंपरा, और सामाजिक पहचान के बीच संबंध पर विचार करना होगा।

✍️सत्य और परंपरा का संबंध

सत्य यानी (सच):

सत्य सार्वभौमिक, शाश्वत और अपरिवर्तनीय है। यह किसी धर्म या परंपरा का मोहताज नहीं है।

उदाहरण: "सत्य" का अर्थ है कि आत्मा और ब्रह्म का अस्तित्व अपरिवर्तनीय है, चाहे कोई व्यक्ति किसी भी धर्म का पालन करे।

परंपराएँ:

परंपराएँ किसी समाज या धर्म की विशेष पहचान होती हैं। ये समय और स्थान के अनुसार विकसित होती हैं और लोगों के विश्वासों, व्यवहारों और सांस्कृतिक दृष्टिकोण को आकार देती हैं।

✍️सिख धर्म, इस्लाम, और ईसाई धर्म में अपने-अपने रीति-रिवाज और परंपराएँ हैं, जो उनकी सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान का हिस्सा ही तो  हैं।

सिख, मुस्लिम, और ईसाई परंपराओं से जुड़ाव

सिख धर्म:

सिख परंपराएँ गुरु ग्रंथ साहिब के सिद्धांतों और दस गुरुओं की शिक्षाओं पर आधारित हैं। ये परंपराएँ न केवल धार्मिक हैं, बल्कि सांस्कृतिक भी हैं, जैसे कि केश रखना, कड़ा पहनना, और सामुदायिक सेवा (सेवा)। जैसे रूप को ग्रहण करना

सिख समुदाय अपनी परंपराओं को "आत्मसम्मान" और अपने ऐतिहासिक संघर्षों के प्रतीक के रूप में देखता है।

 इस्लाम:

इस्लाम की परंपराएँ 
जैसे नमाज़, रोज़ा, ज़कात पैगंबर मुहम्मद की शिक्षाओं और कुरान पर आधारित हैं। ये धार्मिक कर्तव्यों के साथ-साथ सामाजिक संरचना का भी हिस्सा हैं।

मुस्लिम समुदाय अपनी परंपराओं को अल्लाह की आज्ञा मानकर निभाता है, इसलिए उनका त्याग करना उनके ईमान को छोड़ने के बराबर हो सकता है।

 ईसाई धर्म:

ईसाई परंपराएँ यीशु मसीह की शिक्षाओं और बाइबल पर आधारित हैं। चर्च में जाना, बपतिस्मा, और ईस्टर, क्रिसमस जैसी परंपराएँ उनके धार्मिक जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं।

ये परंपराएँ उन्हें यीशु मसीह के साथ जुड़े रहने और अपने विश्वास को जीने का माध्यम देती हैं।

✍️सच तो सच है: फिर परंपराओं से जुड़ाव क्यों?

धर्म और पहचान:

धर्म केवल सत्य के प्रति आस्था नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति की सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान का भी हिस्सा हो जाता है।

परंपराएँ व्यक्ति को समुदाय से जोड़ती हैं, जिससे उसे एकता, सुरक्षा और स्थिरता का अनुभव होता है।

सत्य का व्यक्तिकरण:

भले ही सत्य एक हो, लेकिन अलग-अलग परंपराएँ सत्य तक पहुँचने के विभिन्न साधन हैं।

उदाहरण: योग, प्रार्थना, और सेवा सभी सत्य के अलग-अलग मार्ग हो जाते हैं।

✍️परंपराओं का त्याग क्यों नहीं?:

परंपराएँ केवल धार्मिक कृत्य नहीं हैं, बल्कि उनकी गहरी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक जड़ें होती हैं। उनका त्याग करने का मतलब होगा अपने अतीत, मूल्यों और सामाजिक ढांचे से अलग हो अपनी जड़ से कट जाना।
हर समुदाय अपनी परंपराओं को अपने अस्तित्व का एक अभिन्न हिस्सा मानता है।

✍️क्या परंपराएँ सत्य को बदल सकती हैं?

नहीं, सत्य अडिग और अपरिवर्तनीय है।

लेकिन परंपराएँ सत्य को अनुभव करने और व्यक्त करने का साधन हैं। जैसे:

सिख "एक ओंकार" में ईश्वर की एकता को मानते हैं।

मुस्लिम "ला इलाहा इल्लल्लाह" में ईश्वर की एकता को मानते हैं।

ईसाई "होली ट्रिनिटी" में ईश्वर को पहचानते हैं।

सनातन धर्म "ब्रह्म सत्यम्" में सत्य को सर्वोपरि मानता है।

सभी का सत्य एक ही है, लेकिन उसके प्रति दृष्टिकोण और व्यवहार अलग हैं।

✍️निष्कर्ष: सच और परंपराओं का सह-अस्तित्व

 सच तो सच है,सच था और सच ही रहेगा

धर्म का सत्य सार्वभौमिक है। इसे बदला नहीं जा सकता।

सभी धर्मों का मूल सत्य अपने अपने धर्मानुसार सत्य, प्रेम, सेवा, और धर्म के प्रति समर्पण भी तो सनातन ही है।

✍️परंपराएँ स्थायी क्यों हैं?:

परंपराएँ समुदाय और पहचान की भावना देती हैं। ये धार्मिक विश्वासों को जीवित रखती हैं।

इन्हें त्यागने का मतलब अपने ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सामाजिक अस्तित्व को अस्वीकार करना होगा।
अपने मूल (जड़ )को काटना होगा।

✍️क्या सच बदलता है?

नहीं, परंपराएँ बदल सकती हैं, लेकिन सत्य सनातन और अपरिवर्तनीय है। धर्म चाहे कोई भी हो, सत्य और धर्म का आधार एक ही है। इसे परंपराओं से अलग समझा जा सकता है, लेकिन परंपराएँ सत्य के प्रति व्यक्तिगत और सामुदायिक दृष्टिकोण को अभी तक जरूर दर्शाती हैं।

चलिए आगे बढ़ते है

अगर आप भौगोलिक रूप से कहीं भी स्थानांतरित होते हैं या खुद को किसी अन्य पहचान के साथ स्थापित कर लेते है तो इस  से मूल सत्य नहीं बदलता। 

इसका उदाहरण यह है कि अगर कोई भारतीय व्यक्ति अमेरिका में रहने लगे और अमेरिकी नागरिकता ग्रहण कर ले, तो भी उसका मूल भारतीय रहेगा, क्योंकि उसकी जड़ें भारतीय संस्कृति, इतिहास, और परंपराओं से जुड़ी हुई हैं।

✍️धर्म और मूल का संबंध

मूल जड़ें (संस्कार और संस्कृति):

कोई व्यक्ति चाहे किसी भी धर्म को स्वीकार करे, उसकी जड़ें उसके मूल धर्म और संस्कृति से जुड़ी होती हैं।

जैसे हिंदू धर्म में जन्मे व्यक्ति का पारिवारिक और सांस्कृतिक परिवेश उसे गहराई से प्रभावित करता है। भले ही वह ईसाई, सिख, या मुस्लिम धर्म अपनाए, उसकी जड़ों का प्रभाव हमेशा बना रहता है। उसे वहां भी हिंदू धर्म ,या ब्राह्मण,शूद्र, वैश्य,से आया ईसाई, सिख,या मुसलमान ही कहा जाता है। 
(कह सकते हैं कि जहां उसने खुद को स्थापित किया है वह उसे खुल कर तो अपना मानता ही नहीं)

✍️क्यों कि सत्य अपरिवर्तनीय है:

धर्म परिवर्तन से न तो ऐतिहासिक मूल बदला जा सकता है, न ही वह सांस्कृतिक प्रभाव, जो पीढ़ियों से उस व्यक्ति के भीतर समाहित हैं।

किसी अन्य धर्म को अपनाने का अर्थ है अपनी नई पहचान स्वीकार करना, लेकिन इससे उसके अस्तित्व का मूल सत्य तो बदलता ही नहीं।

✍️स्थापना और मूल सत्य:

खुद को किसी अन्य धर्म, देश, या संस्कृति में स्थापित कर लेने का अर्थ है उस समुदाय की जीवनशैली और परंपराओं को अपनाना, परंतु इससे वह व्यक्ति मूलतः उस समुदाय का हिस्सा नहीं बनता।

यह "सत्य" का एक महत्वपूर्ण पहलू है कि व्यक्ति की मूल पहचान और उसके पूर्वजों का इतिहास ही स्थायी है।

✍️अब सामाजिक उदाहरण

सिख धर्म का उदय:

सिख धर्म मूल रूप से हिंदू धर्म से निकला है, क्योंकि सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव जी ने हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्मों में समाहित अच्छाइयों को अपनाते हुए एक नई राह दिखाई।

सिख धर्म की जड़ें आज भी सनातन धर्म के कई पहलुओं से जुड़ी हैं।

✍️इस्लाम अपनाने वाले हिंदू:

भारत में इस्लाम अपनाने वाले अधिकतर लोग मूलतः हिंदू समुदाय के ही सदस्य थे। यह प्रक्रिया मुख्य रूप से राजनीतिक प्रभाव, धार्मिक दबाव, या सामाजिक परिस्थितियों के कारण हुई। उनका सांस्कृतिक डीएनए और परंपराएँ आज भी उनके मूल धर्म की झलक दिखाती हैं।

✍️ईसाई धर्म अपनाने वाले हिंदू:

भारत में ईसाई धर्म अपनाने वाले लोगों का मूल भी प्राचीन भारतीय परंपराओं से जुड़ा है। उनके रीति-रिवाजों में भारतीयता और सनातन धर्म के प्रभाव को आज भी देखा जा सकता है।

✍️सही दृष्टिकोण: "सच का स्थायित्व"होता हे

स्थायित्व का सिद्धांत:

सच एक सार्वभौमिक सत्य है। चाहे कोई भी धर्म अपनाया जाए, व्यक्ति का मूल सत्य (जैसे उसके पूर्वज, संस्कृति, और ऐतिहासिक विरासत) नहीं बदल सकता।

जैसे, आपका भारतीय होना इस तथ्य से नहीं बदल सकता कि आप अमेरिका में रहते हैं या वहां की नागरिकता ग्रहण करते हैं।

✍️अब धर्म परिवर्तन और सत्य:

धर्म परिवर्तन से व्यक्ति की सामाजिक पहचान तो बदल सकती है, लेकिन उसकी आंतरिक सच्चाई, उसके पूर्वजों का धर्म, और उसके सांस्कृतिक मूल्य स्थायी रहते हैं।

इसका मतलब यह है कि कोई कितना भी कोशिश करे, मूल सत्य को बदला नहीं जा सकता।

✍️निष्कर्ष

धर्म, संस्कृति, और सत्य का यह संबंध अत्यंत गहन और स्थायी है। किसी का "सच" यानी उसकी जड़ें, उसकी परंपरा, और उसकी सांस्कृतिक विरासत केवल बाहरी परिवर्तन से नहीं बदल सकतीं।

इसलिए, भले ही कोई सिख, मुस्लिम, या ईसाई धर्म अपना ले, उसकी जड़ें यदि सनातन धर्म से जुड़ी हैं, तो वह सच्चाई बनी रहेगी। सत्य शाश्वत है, और इसे किसी भी परिस्थिति, समय, या पहचान से बदला नहीं जा सकता।

क्यों कि दूसरे धर्म भी खुल कर उसे स्वीकार नहीं करते ऊपर उदाहरण दे कर समझाया गया है

✍️अब एक नजर उसकी गति पर

अब उसकी गति स्पष्ट होती है कुत्ता ना घर का ना घाट का

✍️ अंत में एक नजर कर्म फल पर डालते चले

महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित पद्म पुराण के अनुसार,यह माना गया है कि हर प्राणी को उसके कर्म के अनुसार ही अगला जन्म मिलता है. व्यक्ति के उच्च कर्म ही उसे इन जन्म चक्र से मुक्त कर सकते हैं. शास्त्रों के अनुसार 84 लाख योनियों में मनुष्य योनि को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।

कर्म के अनुसार, प्राणी अलग-अलग योनियों को प्राप्त होता है: 
पद्म पुराण के मुताबिक, हर प्राणी को उसके कर्मों के मुताबिक ही अगला जन्म मिलता है. 
मान्यता है कि आत्मा को 52 अरब वर्षों और 84 लाख योनियों में भटकने के बाद मानव शरीर मिलता है. 
मानव योनि को शास्त्रों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है. 
मनुष्य योनि में आकर नीच कर्म करने वाले को पुनः नीचे की योनियों में जन्म मिलता है. 
अच्छे कर्मों का फल सुख और मोक्ष होता है, जबकि बुरे कर्मों का फल दुख और पुनर्जन्म होता है.

शनिवार, 16 नवंबर 2024

गीता अध्याय 6 (संपादित)हो रहा हे

*❖════❃≛⃝❈⬤🪷
गीता जी अध्याय 6 का पहला श्लोक ही नहीं सभी अध्याय ही संपूर्ण गीता के सार को ही बताते नजर आते है चलिए इस ज्ञान गंगा में अगली डुबकी लगा लेते है।
⬤≛⃝❈❃════❖


*📚श्री गीता जी अध्याय 6 का पहला श्लोक*

✍️अध्याय 6 श्री गीता जी

इस अध्याय में श्रीकृष्ण ने कर्म योग (सांसारिक कर्तव्यों का पालन करते हुए आध्यात्मिकता का अभ्यास) और कर्म संन्यास (त्याग अवस्था में आध्यात्मिकता का अभ्यास) के बीच तुलनात्मक मूल्यांकन जारी रखा है। वे दोहराते हैं कि कर्म संन्यास की तुलना में कर्म योग अधिक व्यावहारिक मार्ग है।
✍️जो लोग अपने कर्मों के फल की इच्छा किए बिना निर्धारित कर्तव्यों का पालन करते हैं, वे ही वास्तविक संन्यासी और योगी हैं. 

✍️मन को वश में करना कठिन है, लेकिन अभ्यास और विरक्ति से इसे नियंत्रित किया जा सकता है. 
✍️मन जहां कहीं भी भटकने लगे, वहां से इसे वापस लाकर निरंतर भगवान में केंद्रित करना चाहिए. 
✍️जब मन शुद्ध हो जाता है, तब यह अलौकिकता में स्थिर हो जाता है. 
✍️त्याग का अर्थ कर्म का त्याग करना नहीं है, बल्कि उन बाधाओं का त्याग करना है जो उत्तम कर्म के मार्ग में आती हैं. 
कर्म का मार्ग सक्रिय लोगों के लिए है और त्याग का मार्ग चिंतनशील लोगों के लिए है. 
भौतिक या आध्यात्मिक प्रगति के लिए जीवन की गतिविधियों का संयम और नियमन आवश्यक है. 
✍️योग दुःख से एकाकार होने का नाम है. 
कर्म द्वाराआध्यात्मिक विकास की कसौटी(पैमान नापने का यंत्र) यह है कि आप दूसरों में स्वयं को और स्वयं में सभी प्राणियों को देख सकें. 
भलाई करने वाले को कभी दुःख नहीं होता।
कर भला अंत भले का भला 

भगवद  गीता अध्याय: 6
श्लोक 1

श्लोक:
( कर्मयोग का विषय और योगारूढ़ पुरुष के लक्षण ) 
 श्रीभगवानुवाच
 अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः।
 स सन्न्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः॥

भावार्थ:
श्री भगवान बोले- जो पुरुष कर्मफल का आश्रय न लेकर करने योग्य कर्म करता है, वह संन्यासी तथा योगी है और केवल अग्नि का त्याग करने वाला संन्यासी नहीं है तथा केवल क्रियाओं का त्याग करने वाला योगी नहीं है
 ॥1॥

(क्रिया को त्यागने वाला भी योगी नहीं ओर अग्नि का त्याग करने वाला सन्यासी नहीं का भाव यहां यह है कि निष्काम कर्म करने वाला ही संन्यासी और योगी होता है. सांसों को रोकने या छोड़ना तो स्वाभाविक रूप से हो ही रहा है अब श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो पुरुष कर्मफल का आश्रय न लेकर करने योग्य कर्म करता है, वह संन्यासी और योगी है)

क्यों कि कर्म प्रधान संसार है

जैसा यह लोक - वैसा ही है परलोक

जिस को यहां धक्के 
वो वहां भी कैसे रुके 
राग देवेश है यहां 
वहां कोन सा नही 

कोन है जो इन्द्र को नहीं जानता 

भोग, विलास, शोक, सन्ताप, 
 
इधर भी उधर भी 
इधर का परिवार है सहार 
वहां का 
जिसका परिवार यहां नहीं 
 वहां क्या बनेगा 
श्राद्ध तपर्ण, 
मुक्ति करे गा क्या?
करे गा अच्छा कर्म हमारा
या पुत्र के किया श्राद्ध
अर्पण तर्पण
जीव की मुक्ती करेगा 
यह शुभ कर्म 
पुत्र ही कर पाता है
तो यह शुभ कर्म
केवल पुत्र का था
  नहीं करे गा 
 तो गया जीव 
अपने पित्रों सहित 
नरकों मे गिरेगा
राग द्वेष चला जैसा यहां,
 वहां भी वैसा ही चलेगा
 इस लोक और प्रलोक में 
केवल यही अन्तर है 
प्रायशचित कर्म होता है यहाँ 
वहां उसका का दरवाजा भी बन्द है।
उसका का दरवाजा भी बन्द है।
अब विचार करना बनता की कर्म ज्ञान से ओर प्रत्यक्ष ज्ञान से भी जान सके।

✍️कर्म चार प्रकार के होते हैं:

संचित कर्म, या संचित कर्म , आपके कुल कर्म को संदर्भित करता है, जिसमें पिछले जन्मों से प्राप्त कर्म भी शामिल हैं, जिनके बारे में हमें पूरी जानकारी है ही नहीं!

जब हम लोग कष्टों से घिर जाते है गुरु आज्ञा का अनुसरण करते हुए भी कष्ट पाते हैं।तब यही ज्ञान वान गुरुदेव कहते है यह पूर्व जन्मों के कर्मों का फल है।
हम सभी 100% इस से सहमत है। जब कि हम जानते ही नहीं कि वह पूर्व जन्मों के कौनसे कर्म से कष्ट हमें प्राप्त हो रहे है।.......

क्यों कि हम जानते है पूर्व जन्मों के शुभ कर्मों से ही हमें मनुष्य जन्म मिलता है जो 84 लाख योनियों में सब से श्रेष्ठ कहा गया है।यही मनुष्य योनि का द्वार ही "मोक्ष का द्वार कहलाता है"
पिछले जन्म में जहां हमारा कर्म योग टूटा था उसी को आगे पूरा करने के लिए पुनः हमें जन्म मिलता है। उसे इस जन्म में कर हम आगे बढ़ जाते है।

बाइबिल भी इस की पुष्टि करता है।

बाइबल के यूहन्ना 3:5 में, यीशु ने उत्तर दिया, "मैं तुम से सच सच कहता हूँ, यदि कोई जल और आत्मा से न जन्मे तो परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकता।

इधर हमारा सनातन धर्म भी84लाख योनियों में जन्म के बाद ही मनुष्य जन्म की बात करता है।

ध्यान रहे पता नहीं हम को कर्म की बात करते करते आत्मा को पवित्र शुद्ध करने के कर्म पर क्यों आना पड़ गया।
जैसे किसी के का जन्म पिछले जन्म के कर्मों के कारण ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य या शुद्र के चिकित्सक परिवार में हुआ था।

ओर संभव हो  सकता हे कि शायद पिछले जन्म में, उसके मन में दूसरों को ठीक करने और उनकी मदद करने की गहरी इच्छा थी, या शायद उसके पास स्वास्थ्य और कल्याण से संबंधित अनसुलझे मुद्दे थे जिन्हें उसने अपने वर्तमान में  आगे बढ़ाने को जन्म मिला। उसका का डॉक्टर बनने का झुकाव और क्षमता उसके संचित कर्मों से ही उपजी हुई है।इस कोआगे चल कर भगवान खुद ही स्पष्ट कर देते है।

✍️प्रारब्ध कर्म, या आवंटित कर्म आपके कुल संचित कर्मों में से कर्मों का एक चयन है जिसे आप अपने वर्तमान जीवनकाल में पूरा करते हैं। आपके आवंटित कर्म आपके सामने आने वाली परिस्थितियों और स्थितियों को आकार देते हैं। आप प्रत्येक जीवनकाल में अपने संचित कर्म का एक हिस्सा (अपने आवंटित कर्म) जीकर काम कर सकते हैं। 
आगामी कर्म, या भविष्य में किए जाने वाले कर्म , से तात्पर्य आपके वर्तमान कार्यों और विकल्पों से उत्पन्न कर्म से है, जिनके परिणाम या तो इस जीवनकाल में या भविष्य के जीवनकाल में होते हैं। 
क्रियमाण कर्म, या वर्तमान क्रियाशील कर्म , अधिक विशिष्ट रूप से आपके कार्यों के तात्कालिक या तत्काल परिणामों को संदर्भित करता है। यह आपके कार्यों और उनके तत्काल परिणामों के बीच कारण-और-प्रभाव संबंध पर जोर देता है। 

यहां भी कल्पना का ही प्रयोग कर रहा हूं 

संचित कर्मों का हमारा खुद का के विशाल भंडार है डाटा का पहाड बना हुआ है, जो शायद कभी भी किसी भी समय के वर्तमान जीवन में उसका एक निश्चित हिस्सा सक्रिय हो जाता हो , जो हमारी परिस्थितियों को प्रभावित करता हो, जैसे कि हम पैदा कहा हुए है , उस में भी पारिवारिक पृष्ठभूमि, के अनुसार  हमारे सामने हमारी अधूरी छुटी जानकारी, शिक्षा और  उसकी योग्यता, उसके सामने आने वाली खास चुनौतियाँ और अवसर।  अपनी कड़ी मेहनत के बावजूद, उसे अपने करियर में नौकर शाही जैसी बाधाओं या अपने समुदायों में ही चुनौती पूर्ण परिस्थितियों में उत्पन अप्रत्याशित बाधाओं का सामना ही करना पड़ सकता है - इन सभी को उसके आवंटित कर्म की अभिव्यक्ति के रूप में देखा जा सकता है।

अब करने योग्य कर्म 

करने योग्य कर्म वह है जो ज़रूरत और समय परिस्थिति के मुताबिक सोच-समझकर किया जाए. पर यहां भी ध्यान देने की जरूरत है  फल की इच्छा से रहित होकर सिर्फ़ अपने कर्म को करना. कर्म योग करने से इंसान मानसिक, शारीरिक, आत्मिक, और आध्यात्मिक स्तर पर स्वस्थ रहता है. कर्म योग करने के बारे में कुछ और बातें भी हो सकती है सब के भाव काल परिस्थिति के जरूरत के अनुसार कर्म करने की नौबत भी आ ही जाती है देश में सात्विक भोजन उपलब्ध है पर विदेश में उपलब्ध नहीं हो तो शरीर पालन पोषण हेतु कुछ तो बदलाव जबरजस्ती भी आ ही जाते है आने वाले इस बाधा को स्वाभाविक कर्म का ही हिस्सा भी कह सकते हैं।जिस के कारण कुछ हम ब्राह्मण शाकाहारी कुछ मांसाहारी हो गये इसको भी भगवान आगे चल कर स्पष्ट करेंगे।इस प्रकार जान कर कर्म करने वाले कर्म  वाले व्यक्ति को सच्चा कर्मयोगी कहा जाता है।
कर्म योग में ईश्वर का ध्यान ज़रूरी है
कर्म योग करने से इंसान अपने कर्मों और इंद्रियों को वश में भी कर सकता है
कर्म योग करने से इंसान सुख और दुख के चक्र से मुक्त ही रहता है
कर्म योग करने से इंसान अपने विकास की ओर तो बढ़ता ही है।
कर्म योग करने से इंसान अपने कर्मों से भी ज्ञान प्राप्त कर सकता है। जो सब का अपना अपना अनुभव होता है
कर्म योग करने से इंसान अपने जीवन-चक्र को रोक सकता है
कर्म योग करने से इंसान को श्रेष्ठ इंसान भी माना जाता है।
कर्म योग करने से इंसान उच्च योनि में जन्म ले सकता है।
कर्म योग करने से इंसान जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्त हो सकता है इन सभी बातों का जिक्र एक गीता में ही प्राप्त हो जाता है इसी लिए कहा है गीता पड़ो आगे बढ़ो 
इन सब से अलग अब नित्य कर्म भी देखते हुए आगे बढ़ते है।
नित्य किए जाने वाले कर्मों में आवश्यक है सर्व प्रथम।
शौच आदि क्रिया के कर्म को पूरा करना।

जिसे यदि हम ना भी चाहे तो भी वो अविनाशी गुरु बलात हम से करवा ही लेता है।
यह वही है जिसने मां के गर्भ में हमारा साथ निभाया था।
सुना है जब गर्भ में पल रहा जीव  उसके साथ था तो कहता था प्रभु मुझे इस नर्क से बाहर निकालो मैं जीवन भर तुम को तो नहीं भूलूं गा पर आगे क्या से क्या हो गया किसी से छिपा नहीं।
मै भगवान को नहीं मानता कुल पांच शब्द
मैं भगवान को मानता हूं इसमें भी पांच शब्द पर "भगवान" तो दोनो ही जबरदस्ती ही कह रहे है।
राम राम को जपना कितना भी कठिन क्यों ना हो सर्दियों में ठंडे पानी से नहाने पर बलात पूर्वक वह हमारे मुंह से निकलवा ही लेता है।

भगवद  गीता अध्याय: 6
श्लोक 2

श्लोक:
यं सन्न्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव।
न ह्यसन्न्यस्तसङ्‍कल्पो योगी भवति कश्चन॥

भावार्थ:
हे अर्जुन! जिसको संन्यास (गीता अध्याय 3 श्लोक 3 की टिप्पणी में इसका खुलासा अर्थ लिखा है।) ऐसा कहते हैं, उसी को तू योग (गीता अध्याय 3 श्लोक 3 की टिप्पणी में इसका खुलासा अर्थ लिखा है।) जान क्योंकि संकल्पों का त्याग न करने वाला कोई भी पुरुष योगी नहीं होता
॥2॥


जो पुरुष अपने इंद्रियों को वश में करके आत्म-संयम में स्थित है, वही सच्चा व्रती है और वही सच्चा योगी है, न कि दूसरे जो बाहरी आडंबरों में फंसे रहते हैं.

व्याख्या:
इस श्लोक में, भगवान श्रीकृष्ण आत्म-संयम के महत्व को बता रहे हैं। वह कहते हैं कि जो व्यक्ति अपने इंद्रियों को वश में करके आत्म-संयम में स्थित है, वही सच्चा व्रती और सच्चा योगी है। यहाँ 'व्रत' का अर्थ है आत्म-नियंत्रण और 'योग' का अर्थ है आत्मा के साथ एकत्व।

भगवान श्रीकृष्ण यह भी कहते हैं कि बाहरी आडंबरों में फंसने से कोई सच्चा योगी नहीं बन सकता। इसका अर्थ है कि केवल बाहरी गतिविधियों और रीति-रिवाजों को करने से कोई आत्म-संयम और आत्म-ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता। इसके लिए आत्म-नियंत्रण और आत्म-विचार की आवश्यकता होती है।

अब

(गीता के अध्याय 3 के श्लोक 3 का मूल श्लोक और भावार्थ सहित व्याख्या पर आते है:)

मूल श्लोक:
यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते आत्मकर्मसु
असंशयं सम्प्रमुक्तो येन न स सिद्धिमाप्नोति

भावार्थ:
जो पुरुष शास्त्रों के विधान को त्यागकर अपने इच्छानुसार कार्य करता है, वह निश्चित रूप से सिद्धि प्राप्त नहीं कर सकता है.

व्याख्या:
इस श्लोक में, भगवान श्रीकृष्ण यह बता रहे हैं कि जो व्यक्ति शास्त्रों के निर्देशों को नकारकर अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करता है,
जैसे विवाह का महूर्त फिक्स समय होता है और बाराती शराब पी कर सड़कों पर भांगड़ा डाल रहे होते है, या दुल्हन ब्यूटी पार्लर में ही होती है और मुहूर्त निकल जाता है।
वह आत्म-सिद्धि या मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकता। यहाँ 'शास्त्र' का अर्थ है धार्मिक ग्रंथ और 'विधान' का अर्थ है निर्देश या नियम से है.

भगवान श्रीकृष्ण यह भी बता रहे हैं कि शास्त्रों के निर्देशों का पालन करना आवश्यक है, क्योंकि वे हमें सही मार्ग दिखाते हैं और हमें आत्म-सिद्धि की ओर ले जाते हैं। जो व्यक्ति इन निर्देशों को नकारता है, वह अपने जीवन को सही दिशा में नहीं ले जा सकता और इसलिए वह सिद्धि प्राप्त नहीं कर सकता।
आजकल तो ब्राह्मण से ही लोग कहते देखे जाते है पंडित जी आप गलत मंत्र या विधि कर रहे हैं ।अरे भाई अगर तुम जानते हो तो खुद ही विवाह करवा लेते पंडित ,ब्राह्मण को बुलाने की जरूरत ही क्या थी?ऐसे लोग भी ब्राह्मण की गलती का दोष कर्मफल खुद पा जाते है शास्त्र विरुद्ध चलकर कुछ तो शॉट कट मारने की भी पंडित जी को सलाह देते है।
जो धर्म के निर्देश या नियम से हट कर करते करवाते है.
संकल्प का कोई विकल्प नहीं होता पर भगवान तो कह रहे है।संकल्पों का त्याग ना करने वाला कोई भी पुरुष योगी नहीं होता।
संकल्प शब्द का मतलब है, मन में उत्पन्न होने वाली कार्य करने की इच्छा या विचार. दान, पुण्य, या कोई और देवकार्य शुरू करने से पहले, निश्चित मंत्र का उच्चारण करते हुए अपना दृढ़ निश्चय या विचार प्रकट करना भी संकल्प कहलाता है.
अब दान पुन के लिए किसी मंत्र या महूर्त को त्याग कर कर्म करने वाला ही सच्चा योगी है क्यों कि मारने वाले व्यक्ति से अगर दान पुण्य करवाने के चक्कर में मुहूर्त का इंतजार करते करते पहले ही निकल गया तो होगया दान पुन।इसलिए
भगवद् गीता के मुताबिक, संकल्पों का त्याग न करने वाला कोई भी पुरुष योगी नहीं होता, इसका मतलब है कि योगी बनने के लिए संकल्पों का त्याग करना ज़रूरी है. गीता के मुताबिक, जो मनुष्य कर्मफल पर आश्रित न होकर निष्काम कर्म करता है, वही संन्यासी और योगी होता है.
गीता के मुताबिक, कर्मों से संन्यास लेने या उनका परित्याग करने की अपेक्षा कर्मयोग ज़्यादा श्रेयस्कर है. कर्म करना मनुष्य के लिए ज़रूरी है और उसके बिना शरीर का निर्वाह भी संभव नहीं है।

अभी शुरू करते हैं अध्याय 6 का श्लोक 4
भगवद  गीता अध्याय: 6
श्लोक 4

श्लोक:
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते।
 सर्वसङ्‍कल्पसन्न्यासी योगारूढ़स्तदोच्यते॥

भावार्थ:
जिस काल में न तो इन्द्रियों के भोगों में और न कर्मों में ही आसक्त होता है, उस काल में सर्वसंकल्पों का त्यागी पुरुष योगारूढ़ कहा जाता है
 ॥4॥

बुधवार, 13 नवंबर 2024

गीता जी पांचवां अध्याय

कुल 29 श्लोक हैं इस भगवद  गीता के अध्याय: 5 में
श्लोक 1 
 अर्जुन उवाच।,संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि ।,यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम् ॥1॥ 
 Description: 
 अर्जुन ने कहा-हे कृष्ण! पहले आपने कर्म संन्यास की सराहना की और आपने मुझे भक्ति युक्त कर्मयोग का पालन करने का उपदेश भी दिया। कृपापूर्वक अब मुझे निश्चित रूप से अवगत कराएँ कि इन दोनों में से कौन सा मार्ग अधिक लाभदायक है।
भगवद  गीता अध्याय: 5
श्लोक 1

श्लोक:
( सांख्ययोग और कर्मयोग का निर्णय ) 
 अर्जुन उवाच
 सन्न्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि।
 यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम्‌॥

भावार्थ:
अर्जुन बोले- हे कृष्ण! आप कर्मों के संन्यास की और फिर कर्मयोग की प्रशंसा करते हैं। इसलिए इन दोनों में से जो एक मेरे लिए भलीभाँति निश्चित कल्याणकारक साधन हो, उसको कहिए
 ॥1॥

सांख्य योग और कर्म योग दोनों ही हिन्दू दर्शन के भाग हैं लेकिन उनमें अंतर है:

सांख्य योग: यह दर्शन ज्ञान के माध्यम से मोक्ष की प्राप्ति को समझाता है। इसमें माना जाता है कि अनात्मा और परमात्मा में अंतर है और ज्ञान द्वारा ही मोक्ष संभव है।
कर्म योग: यह दर्शन कर्मों के माध्यम से मोक्ष की प्राप्ति को बताता है। इसमें कर्म, भक्ति और सेवा के माध्यम से भगवान की प्राप्ति और मोक्ष संभव हैं।
इस प्रकार, सांख्य योग में ज्ञान का महत्व और कर्म योग में कर्म और भक्ति का महत्व है।
दर्शनशास्त्र का अध्ययन करने से, हम अपने लिए सोचने के कौशल विकसित करते हैं. 
दर्शनशास्त्र का अध्ययन करने से, हम अपने लिए सोचने के कौशल विकसित करते हैं. 
जैसे ताज महल कहते ही हम वहां हो ना हो हमारी आंखे के सामने नजर आने लगता है।

वैसे ही अगर कहा जाए कि आसमान पर जाने की सीडी जो सुनी तो है पर देखी नहीं वो यह महल की भांति आंखों के सामने कल्पना से प्रगट होती है कल्पना भिन भिन लोगो की भी अलग अलग होगी।

भगवान मन में सूक्ष्म रूप में कण कण कण में अगर यही किसी बच्चे से उसके घर में पूछो भगवानजी कहां हैं तो वो मंदिर की ओर इशारा करता है जो आलमारी में है।उधर हे देख लो।
वहां जाओ(कर्म करो)आलमारी खोलने के (ज्ञान) को साथ जोड़ो और भगवान को देख लो।
भगवद  गीता अध्याय: 5
श्लोक 2

श्लोक:
श्रीभगवानुवाच
 सन्न्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ।
 तयोस्तु कर्मसन्न्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते॥

भावार्थ:
श्री भगवान बोले- कर्म संन्यास और कर्मयोग- ये दोनों ही परम कल्याण के करने वाले हैं, परन्तु उन दोनों में भी कर्म संन्यास से कर्मयोग साधन में सुगम होने से श्रेष्ठ है
 ॥2॥

कर्मयोग और कर्म संन्यास दोनों ही आध्यात्मिक विकास और मुक्ति के मार्ग हैं, लेकिन इन दोनों में अंतर है: 
 
कर्मयोग
कर्मयोग का मतलब है दुनिया में निस्वार्थ कर्म करना. कर्मयोगी, आसक्ति रहित होकर काम करता है और किसी से घृणा नहीं करता. कर्मयोगी, सांसारिक दायित्वों का निर्वहन करते हुए भी अकर्मा की अवस्था में रहता है. 
 
कर्म संन्यास
कर्म संन्यास का मतलब है सांसारिक बंधनों से त्याग करना और वैराग्य अपनाना. संन्यासी, सभी इच्छाओं, मोह, और व्यक्तिगत संबंधों का त्याग कर देता है और परमात्मा की आराधना में लीन रहता है. 
 
गीता के मुताबिक, कर्मयोग, कर्म संन्यास से ज़्यादा श्रेयस्कर है. गीता में कहा गया है कि कर्मों का सिर्फ़ त्याग करने से सिद्धि या परमपद नहीं मिलता. कर्म करना मनुष्य के लिए ज़रूरी है. आत्मज्ञानी व्यक्ति को भी प्रकृति के बंधन से मुक्त होकर कर्म करना चाहिए. 
 कर्म में अहंकार ,स्वार्थ,परोपकार,आदि को त्याग कर ज्ञान पूर्वक किया जाए।
भगवान् श्री जो यहाँ कहना चाह रहे हैं, उसके अनुसार कर्मों में अहंकार का त्याग ही कर्मणां संन्यासः है- कर्मों का त्याग है तथा कर्मफल उपभोग के प्रति हमारी चाह के त्याग को कर्मयोग कहा गया है। कितना बारीकी से रखा गया दर्शन है, पर वह समझ में तब ही आ सकता है, जब हम उसका मर्म समझ सकें।
भाव यह है कि अपना फर्ज समझ कर बिना किसी फल की इच्छा से कर्म भी मोक्ष तक पहुंचा देता है।
भगवद  गीता अध्याय: 5
श्लोक 3

श्लोक:
ज्ञेयः स नित्यसन्न्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्‍क्षति।
 निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते॥

भावार्थ:
हे अर्जुन! जो पुरुष न किसी से द्वेष करता है और न किसी की आकांक्षा करता है, वह कर्मयोगी सदा संन्यासी ही समझने योग्य है क्योंकि राग-द्वेषादि द्वंद्वों से रहित पुरुष सुखपूर्वक संसार बंधन से मुक्त हो जाता है
 ॥3॥

सन्यासी को समझ ने के लिए सन्यासी के कर्म की समझना जरूरी हो जाता है 
(नहीं तो चल सन्यासी मंदिर में तक ही सिमट कर रह जाएगा)
सन्यासी सांसारिक भीड़ से अलग रहता है।अर्थात इन सांसारिक प्रपंचों चोचलो से हटना गीता के मुताबिक, सच्चा संन्यासी वह है जो सभी कर्मों के फल की इच्छा त्याग देता है और निष्काम भाव से अपने कर्तव्यों का पालन करता है।अग्नि का त्याग करने वाले सन्यासी शारीरिक निर्वाह जंगलों में रहते हुए कंद मूल से ही जीवन व्यतीत कर लेते है बिना सिला वस्त्र धारण करते है।संन्यासी अपने पूरे जीवन को एक वैरागी के रूप में जीता है और आत्मज्ञान की खोज करता है. 
संन्यासी अपने ज्ञान, संवेदनाओं, कर्म, और पुरुषार्थ की आहुति समष्टि के लिए देता है. 
यह पंक्ति दर्शाती है कि एक सच्चा संन्यासी अपने ज्ञान, भावनाओं, कर्मों और पुरुषार्थ (संघर्ष या प्रयास) को अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं, बल्कि समष्टि (समाज, विश्व, या संपूर्ण सृष्टि) के कल्याण के लिए समर्पित करता है।
 संन्यासी केवल आत्म-मुक्ति या आत्म-सुख की कामना नहीं करता, बल्कि उसका उद्देश्य अपने भीतर की सभी शक्तियों और संवेदनाओं को त्यागते हुए, उन्हें समर्पण की भावना के साथ समष्टि की सेवा में लगाना होता है। संन्यासी अपने ज्ञान और अनुभूति को, समाज या संपूर्ण मानवता के कल्याण में लगा देता है। उसका कर्म निस्वार्थ होता है और पुरुषार्थ का लक्ष्य भी व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज के हित के लिए होता है।

संक्षेप में, संन्यासी का जीवन त्याग और समर्पण का प्रतीक बन जाता है, जो उसे समाज और सृष्टि के प्रति समर्पित बनाता है। यह समर्पण ही संन्यासी को "समष्टि के लिए आहुति देने वाला" बना देता है।
संन्यासी जीवन को उत्सव के रूप में जीता है. 
संन्यासी बाहरी सुखों के विचारों को त्यागकर इच्छा, भय, और क्रोध से मुक्त हो जाता है।
संन्यासी अपकारी पर भी उपकार करता है. सब का भला अंत भले का भला कहता है।संन्यासी अपकारी कोभी श्राप नहीं देता। पर उसके बोलो में माफ भी नहीं देता अंत भले का भला ही मांगता है।क्यों कि वह अच्छे बुरे कर्मों के फल को जानता है।वह जानता है, अपकारी नेभी कर्म फल भोगना ही है।

सन्यासी तीन घर मांगता है
पहला ब्रह्मा का घर जान कर दूसरा विष्णु का तीसरा महेश का जो मिले उसी भिक्षा पर गुजारा कर लेता है। नहीं तो पानी पीकर राम राम कर लेता है।
❤️ संन्यासी के लिए जीवन में जो भी मिलता है, वह उसी में संतुष्ट रहता है, और उसकी भूख केवल भौतिक नहीं होती, बल्कि आत्मिक होती है। तीन घरों से भिक्षा मांगने का भाव यह है कि वह अपनी आवश्यकता की पूर्ति के लिए भी इस संसार के तीन प्रमुख रूपों – सृजन (ब्रह्मा), पालन (विष्णु) और संहार (महेश) – से भी कुछ नहीं मांगता; बस न्यूनतम जीवन-यापन की भिक्षा ही लेता है।

यह संकेत है कि संन्यासी केवल परमात्मा की कृपा पर निर्भर रहते हुए, अपनी इच्छाओं और भौतिक आवश्यकताओं को सीमित कर देता है। उसे जीवन की अन्य आवश्यकताओं की चाह नहीं होती, और यदि भिक्षा न भी मिले, तो भी संन्यासी भूखा नहीं रहकर मात्र जल पीकर या ईश्वर का स्मरण कर संतुष्ट रहता है। उसका जीवन इस बात का प्रतीक है कि संतोष, त्याग और ईश्वर-प्रेम के द्वारा मनुष्य सहज ही अपने मन को शांति और संतोष प्रदान कर लेता है।

संन्यासी का जीवन इस प्रकार हमें यह शिक्षा देता है कि जो व्यक्ति बाहरी अपेक्षाओं को कम कर देता है और भीतर की ओर मुड़ जाता है, वह वास्तव में स्वतंत्र हो जाता है।

(यह सन्यासी की पहचान है जो घर घर जाकर मांगते है वह सियासी है या नहीं आप पर छोड़ता हुए)

सन्यासी ब्राह्मण का गुरु होता हे
सन्यासी का गुरु अरदासी
वैसे तो अरदास ही गृहस्थी होते हैं वैसे ही जैसे मैं या आप सभी

अरदासी वे लोग होते हैं जो भगवान की भक्ति और सेवा में अपना जीवन समर्पित करते हैं। वे लोग भगवान की पूजा, आराधना, और सेवा में लगे रहते हैं और अपने जीवन को भगवान के लिए समर्पित करते हैं।

अरदासी शब्द का मूल अर्थ है "प्रार्थना करने वाला" या "भगवान की सेवा करने वाला"। अरदासी लोग आमतौर पर भगवान के मंदिरों में रहते हैं और भगवान की सेवा में लगे रहते हैं।

सन्यासी भी अरदासी को अपना गुरु मानते हैं क्योंकि अरदासी लोग भगवान की भक्ति और सेवा में अपना जीवन समर्पित करते हैं और सन्यासी को भी भगवान की सेवा में लगने की प्रेरणा मिलती है।

अरदासी के कुछ गुण हैं:

1. भगवान की भक्ति और सेवा में समर्पण। (गृहस्थी)
2. प्रार्थना और आराधना में लगना।(गृहस्थी कर्तव्य)
3. भगवान के प्रति समर्पण और निष्ठा।(भगति भाव)
4. आत्म-त्याग और सेवा की भावना। (अतिथि देवों भव को चित्रार्थ करने को खुद भूखे रह कर भी अतिथि की सेवा)
5. भगवान के प्रति प्रेम और श्रद्धा।
भगवान में श्रद्धा ही नहीं अटूट विश्वाश

अरदासी की महत्ता:

1. भगवान की सेवा में लगना।
2. सन्यासी और अन्य लोगों को प्रेरणा देना।
3. भगवान की भक्ति और सेवा को बढ़ावा देना।
4. आत्म-शांति और मोक्ष की प्राप्ति।

आगे बढ़ते है 

ग्रस्थ में संन्यास आश्रम भी आता है।
सन्यासी कभी गृहस्थी नहीं बन सकता पर गृहस्थी,संन्यासी बन कर पुनः गृहस्थी बन जाता है। सिर्फ और सिर्फ उसी को यह छूट मिली हुई है।

प्रत्यक्ष में ऐसे जाने:

जब किसी प्रिय की मृत्यु होती है।तब गृहस्थी संन्यासियों जैसे वस्त्र धारण करता है।संन्यासियों जैसा भोजन करता है। जमीन पर सोता है।सब से अलग रहता है। जब आचार्य ब्राह्मण शुद्धि करता है तो तो सन्यासी बना गृहस्थी पुनः गृहस्थ जीवन में आ जाता है।

भगवद  गीता अध्याय: 5
श्लोक 4

श्लोक:
साङ्‍ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः।
 एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्‌॥

भावार्थ:
उपर्युक्त संन्यास और कर्मयोग को मूर्ख लोग पृथक्‌-पृथक् फल देने वाले कहते हैं न कि पण्डितजन, क्योंकि दोनों में से एक में भी सम्यक्‌ प्रकार से स्थित पुरुष दोनों के फलरूप परमात्मा को प्राप्त होता है
 ॥4॥
जिस कर्म का फल परमात्मा को प्राप्त होता है वह निष्काम कर्म कहलाता ।


भगवद  गीता अध्याय: 5
श्लोक 5

श्लोक:
यत्साङ्‍ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्यौगैरपि गम्यते।
 एकं साङ्‍ख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति॥

भावार्थ:
ज्ञान योगियों द्वारा जो परमधाम प्राप्त किया जाता है, कर्मयोगियों द्वारा भी वही प्राप्त किया जाता है। इसलिए जो पुरुष ज्ञानयोग और कर्मयोग को फलरूप में एक देखता है, वही यथार्थ देखता है
 ॥5॥

ज्ञान योगी और कर्म योगी दोनो को मिलने वाला फल एक समान होता है।

भगवद  गीता अध्याय: 5
श्लोक 6

श्लोक:
सन्न्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः।
 योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति॥

भावार्थ:
परन्तु हे अर्जुन! कर्मयोग के बिना संन्यास अर्थात्‌ मन, इन्द्रिय और शरीर द्वारा होने वाले सम्पूर्ण कर्मों में कर्तापन का त्याग प्राप्त होना कठिन है और भगवत्स्वरूप को मनन करने वाला कर्मयोगी परब्रह्म परमात्मा को शीघ्र ही प्राप्त हो जाता है
 ॥6॥
मन, इन्द्रिय और शरीर द्वारा होने वाले सम्पूर्ण कर्मों में कर्तापन का त्याग कर पाना बहुत कठिन है।पर खाते ,पीते, सोते,जागते घूमतेफिरते भगवान का स्मरण कठिन होते हुए भी कढ़िन नहीं होता।
जैसे:
 👉यह शरीर आपका मंदिर है इस में आत्मा रूप में आप परमात्मा हो।बुद्धि सरस्वती माता आप हो।आप के साथ चलने वाले आप के नोकर है। और विषयों के अधीन हो जो खाता,पिता,देखता,सुनता,बोलता,स्पर्श करता हूं आप की पूजा है।निद्रा आप की समाधि,चलना फिरना आप की प्रदक्षिणा है मेरे वचन आप की स्तुति है ऐसे आराधना करते हुए कर्म में लीन होने को भगवान बताते या इशारा करते नजर आते है।👈

भगवद  गीता अध्याय: 5
श्लोक 7

श्लोक:
👉( सांख्ययोगी और कर्मयोगी के लक्षण और उनकी महिमा ) 👈
 
योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः।
 सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते॥

भावार्थ:
जिसका मन अपने वश में है, जो जितेन्द्रिय एवं विशुद्ध अन्तःकरण वाला है और सम्पूर्ण प्राणियों का आत्मरूप परमात्मा ही जिसका आत्मा है, ऐसा कर्मयोगी कर्म करता हुआ भी लिप्त नहीं होता
 ॥7॥
भाव:
इसका भाव यह है कि जो व्यक्ति अपने मन को अपने वश में रखता है, जो अपने इंद्रियों को वश में रखता है और जिसका अन्तःकरण शुद्ध और पवित्र है, वह व्यक्ति सम्पूर्ण प्राणियों में परमात्मा को देखता है और अपने आप को भी परमात्मा का ही एक अंश मानता है।

ऐसा व्यक्ति कर्म करता हुआ भी लिप्त नहीं होता है, अर्थात् वह अपने कर्मों से बंधा नहीं होता है। वह अपने कर्मों को परमात्मा की सेवा के रूप में करता है और अपने आप को परमात्मा के साथ जोड़कर रखता है।
अर्थात 
 जब कोई व्यक्ति अपने मन को अपने वश में रखता है, अपने इंद्रियों को वश में रखता है और अपने अन्तःकरण को शुद्ध और पवित्र रखता है, तो वह निष्काम कर्म की ओर बढ़ता है।

निष्काम कर्म का अर्थ है कि कर्म करने के पीछे कोई व्यक्तिगत लाभ या स्वार्थ नहीं होता है। बल्कि कर्म करने का उद्देश्य परमात्मा की सेवा करना और अपने आप को परमात्मा के साथ जोड़ना होता है।

निष्काम कर्म करने से व्यक्ति को आत्म-संतुष्टि और शांति मिलती है, और वह अपने जीवन को अधिक अर्थपूर्ण और सार्थक बना सकता है।

भगवद  गीता अध्याय: 5
श्लोक 8-9

श्लोक:
नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्ववित्‌।
 पश्यञ्श्रृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपंश्वसन्‌॥
 प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि॥
 इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्‌॥

भावार्थ:
तत्व को जानने वाला सांख्ययोगी तो देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूँघता हुआ, भोजन करता हुआ, गमन करता हुआ, सोता हुआ, श्वास लेता हुआ, बोलता हुआ, त्यागता हुआ, ग्रहण करता हुआ तथा आँखों को खोलता और मूँदता हुआ भी, सब इन्द्रियाँ अपने-अपने अर्थों में बरत रही हैं- इस प्रकार समझकर निःसंदेह ऐसा मानें कि मैं कुछ भी नहीं करता हूँ
 ॥8-9॥

यहां तो राम राम कहना बनता है

(❤️जैसे यह शरीर आपका मंदिर है इस में आत्मा रूप में आप परमात्मा हो।बुद्धि सरस्वती माता आप हो।आप के साथ चलने वाले आप के नोकर है। और विषयों के अधीन हो जो खाता,पिता,देखता,सुनता,बोलता,स्पर्श करता हूं आप की पूजा है।निद्रा आप की समाधि,चलना फिरना आप की प्रदक्षिणा है मेरे वचन आप की स्तुति है ऐसे आराधना करते हुए कर्म में लीन होना❤️)

भगवद  गीता अध्याय: 5
श्लोक 10

श्लोक:
ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्‍गं त्यक्त्वा करोति यः।
 लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा॥

भावार्थ:
जो पुरुष सब कर्मों को परमात्मा में अर्पण करके और आसक्ति को त्याग कर कर्म करता है, वह पुरुष जल से कमल के पत्ते की भाँति पाप से लिप्त नहीं होता
 ॥10॥

अब तो भगवान भी ऐसा ही कह रहे है।

भगवद  गीता अध्याय: 5
श्लोक 11

श्लोक:
कायेन मनसा बुद्धया केवलैरिन्द्रियैरपि।
 योगिनः कर्म कुर्वन्ति संग त्यक्त्वात्मशुद्धये॥

भावार्थ:
कर्मयोगी ममत्वबुद्धिरहित केवल इन्द्रिय, मन, बुद्धि और शरीर द्वारा भी आसक्ति को त्याग कर अन्तःकरण की शुद्धि के लिए कर्म करते हैं
 ॥11॥
सरल भाव:

कर्मयोगी व्यक्ति अपने कर्मों को बिना किसी मोह या आसक्ति के करता है। वह अपने इंद्रियों, मन, बुद्धि और शरीर का उपयोग करके कर्म करता है, लेकिन वह इन कर्मों से जुड़ा नहीं रहता है।

वह अपने अन्तःकरण की शुद्धि के लिए कर्म करता है, न कि किसी व्यक्तिगत लाभ या स्वार्थ के लिए। इस प्रकार, वह अपने कर्मों को एक साधन के रूप में उपयोग करता है जिससे वह अपने अन्तःकरण को शुद्ध और पवित्र बना सके।

भगवद  गीता अध्याय: 5
श्लोक 12

श्लोक:
युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम्‌।
 अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते॥

भावार्थ:
कर्मयोगी कर्मों के फल का त्याग करके भगवत्प्राप्ति रूप शान्ति को प्राप्त होता है और सकामपुरुष कामना की प्रेरणा से फल में आसक्त होकर बँधता है
 ॥12॥
मैं करता हूं,कर रहा हूं, मैने किया, ऐसी कामना करने वाला बंधता है।

भगवद  गीता अध्याय: 5
श्लोक 13

श्लोक:
(ज्ञानयोग का विषय ) 
 सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी।
 नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्‌॥

भावार्थ:
अन्तःकरण जिसके वश में है, ऐसा सांख्य योग का आचरण करने वाला पुरुष न करता हुआ और न करवाता हुआ ही नवद्वारों वाले शरीर रूप घर में सब कर्मों को मन से त्यागकर आनंदपूर्वक सच्चिदानंदघन परमात्मा के स्वरूप में स्थित रहता है
 ॥13॥

भगवान ने यंत्र, मंत्र,तंत्र ,योग,भोग,रोग ,पाठ चालीसे, आसन ,माला, कंठी कई प्रकार के कठिन कर्मों से मुक्त होने का सरल सा साधन बता दिया।

भगवद  गीता अध्याय: 5
श्लोक 14

श्लोक:
न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः।
 न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते।

भावार्थ:
परमेश्वर मनुष्यों के न तो कर्तापन की, न कर्मों की और न कर्मफल के संयोग की रचना करते हैं, किन्तु स्वभाव ही बर्त रहा है
 ॥14॥
पत्ता भी जब हिलता है प्रभु की मर्जी से उसी के बारे में कह रहे हैं 
परमेश्वर मनुष्यों के न तो कर्तापन की, न कर्मों की और न कर्मफल के संयोग की रचना करते हैं, किन्तु स्वभाव ही बर्त रहा है।
इस को समझने को हमे वेदों के नेत्र की आवश्यकता होगी।
गवाह भी तो यही पर भेज रखे हैं भगवान ने।
ज्योतिष को वेदों का नेत्र कहा जाता है और इसकी प्रमाणिकता वेदों और प्राचीन हिंदू ग्रंथों में पाई जाती है।

वेदों में ज्योतिष का उल्लेख:

1. ऋग्वेद (1.164.34) में ज्योतिष को "नेत्र" कहा गया है।
2. यजुर्वेद (23.44) में ज्योतिष को "वेदों का नेत्र" कहा गया है।
3. अथर्ववेद (19.7.1) में ज्योतिष को "ज्योतिषम्" कहा गया है, जिसका अर्थ है "प्रकाश का विज्ञान"।

प्राचीन हिंदू ग्रंथों में ज्योतिष का उल्लेख:

1. महाभारत में ज्योतिष को "ज्योतिष शास्त्र" कहा गया है।
2. मनुस्मृति (1.80) में ज्योतिष को "वेदों का अंग" कहा गया है।
3. ब्रह्मसूत्र (1.1.2) में ज्योतिष को "वेदों का नेत्र" कहा गया है।

ज्योतिष के महत्व को दर्शाने वाले श्लोक:

"ज्योतिषम् वेदों नेत्रम्" (ऋग्वेद 1.164.34)
"वेदों नेत्र ज्योतिषम्" (यजुर्वेद 23.44)

इन प्रमाणों से यह स्पष्ट होता है कि ज्योतिष को वेदों का नेत्र कहा जाता है और इसकी प्रमाणिकता वेदों और प्राचीन हिंदू ग्रंथों में पाई जाती है।

भगवद  गीता अध्याय: 5
श्लोक 15

श्लोक:
नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः।
 अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः॥

भावार्थ:
सर्वव्यापी परमेश्वर भी न किसी के पाप कर्म को और न किसी के शुभकर्म को ही ग्रहण करता है, किन्तु अज्ञान द्वारा ज्ञान ढँका हुआ है, उसी से सब अज्ञानी मनुष्य मोहित हो रहे हैं
 ॥15॥
अज्ञान द्वारा ज्ञान ढँका हुआ है

अज्ञानेनावृतं ज्ञानम्'--स्वरूपका ज्ञान सभी मनुष्योंमें स्वतः सिद्ध है; किन्तु अज्ञानके द्वारा यह ज्ञान ढका हुआ है। उस अज्ञानके कारण जीव मूढ़ताको प्राप्त हो रहे हैं। अपनेको कर्मोंका कर्ता मानना मूढ़ता है (गीता 3। 27)।
भगवद  गीता अध्याय: 5
श्लोक 16

श्लोक:
ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः।
 तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्‌॥

भावार्थ:
परन्तु जिनका वह अज्ञान परमात्मा के तत्व ज्ञान द्वारा नष्ट कर दिया गया है, उनका वह ज्ञान सूर्य के सदृश उस सच्चिदानन्दघन परमात्मा को प्रकाशित कर देता है
 ॥16॥

भगवद  गीता अध्याय: 5
श्लोक 17

श्लोक:
तद्‍बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः।
 गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः॥

भावार्थ:
जिनका मन तद्रूप हो रहा है, जिनकी बुद्धि तद्रूप हो रही है और सच्चिदानन्दघन परमात्मा में ही जिनकी निरंतर एकीभाव से स्थिति है, ऐसे तत्परायण पुरुष ज्ञान द्वारा पापरहित होकर अपुनरावृत्ति को अर्थात परमगति को प्राप्त होते हैं
 ॥17॥

भाव तद्रूप
तद्रूप शब्द का प्रयोग किसी वस्तु के ही जैसा होने के स्पष्टीकरण के लिए किया जाता है. उदाहरण के लिए, 'जैसी यह दुर्गा की मूर्ति है उसी के अनुरूप की अन्य मूर्तियां भी बना दें'. 
 या 
समान
सद्दश
वैसा ही
उसी प्रकार का
तदाकार या तदनुरूप
उसी के समान या अनुरूप 
 
भगवद गीता अध्याय 5, श्लोक 18 का भाव यह है:

वे ज्ञानीजन विद्या और विनययुक्त ब्राह्मण में तथा गौ, हाथी, कुत्ते और चाण्डाल में भी समदर्शी होते हैं।

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि:

- ज्ञानीजन सभी जीवों में समानता देखते हैं।
- वे विद्या और विनययुक्त ब्राह्मण में भी और गौ, हाथी, कुत्ते और चाण्डाल में भी समदर्शी होते हैं।
- ज्ञानीजन की दृष्टि में सभी जीव समान होते हैं।
- ज्ञानीजन की दृष्टि में न कोई उच्च होता है और न कोई नीच।

इस श्लोक का विस्तार अध्याय 6, श्लोक 32 में दिया गया है:

यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं अधिघमिष्ठो भूतेषु च गतेषु च।

भाव:

जो व्यक्ति मुझे सभी में देखता है और सभी को मुझमें देखता है, वह मुझे हर जगह और हर समय में पाता है, चाहे वह जीवित हो या मृत।

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि:

- जो व्यक्ति भगवान को सभी में देखता है, वह भगवान के साथ एकता को प्राप्त करता है।
- जो व्यक्ति सभी को भगवान में देखता है, वह भगवान की सर्वव्यापकता को समझता है।
- भगवान हर जगह और हर समय में विद्यमान हैं।

भगवद  गीता अध्याय: 5
श्लोक 19

श्लोक:
इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः।
 निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद् ब्रह्मणि ते स्थिताः॥

भावार्थ:
जिनका मन समभाव में स्थित है, उनके द्वारा इस जीवित अवस्था में ही सम्पूर्ण संसार जीत लिया गया है क्योंकि सच्चिदानन्दघन परमात्मा निर्दोष और सम है, इससे वे सच्चिदानन्दघन परमात्मा में ही स्थित हैं
 ॥19॥

भगवद  गीता अध्याय: 5
श्लोक 20

श्लोक:
न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम्‌।
 स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थितः॥

भावार्थ:
जो पुरुष प्रिय को प्राप्त होकर हर्षित नहीं हो और अप्रिय को प्राप्त होकर उद्विग्न न हो, वह स्थिरबुद्धि, संशयरहित, ब्रह्मवेत्ता पुरुष सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्मा में एकीभाव से नित्य स्थित है
 ॥20॥

भगवद  गीता अध्याय: 5
श्लोक 21

श्लोक:
बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम्‌।
 स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते॥

भावार्थ:
बाहर के विषयों में आसक्तिरहित अन्तःकरण वाला साधक आत्मा में स्थित जो ध्यानजनित सात्विक आनंद है, उसको प्राप्त होता है, तदनन्तर वह सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्मा के ध्यानरूप योग में अभिन्न भाव से स्थित पुरुष अक्षय आनन्द का अनुभव करता है
 ॥21॥

भगवद  गीता अध्याय: 5
श्लोक 22

श्लोक:
ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते।
 आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः॥

भावार्थ:
जो ये इन्द्रिय तथा विषयों के संयोग से उत्पन्न होने वाले सब भोग हैं, यद्यपि विषयी पुरुषों को सुखरूप भासते हैं, तो भी दुःख के ही हेतु हैं और आदि-अन्तवाले अर्थात अनित्य हैं। इसलिए हे अर्जुन! बुद्धिमान विवेकी पुरुष उनमें नहीं रमता
 ॥22॥

भगवद  गीता अध्याय: 5
श्लोक 23

श्लोक:
शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात्‌।
 कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः॥

भावार्थ:
जो साधक इस मनुष्य शरीर में, शरीर का नाश होने से पहले-पहले ही काम-क्रोध से उत्पन्न होने वाले वेग को सहन करने में समर्थ हो जाता है, वही पुरुष योगी है और वही सुखी है
 ॥23॥

भगवद  गीता अध्याय: 5
श्लोक 24

श्लोक:
योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः।
 स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति॥

भावार्थ:
जो पुरुष अन्तरात्मा में ही सुखवाला है, आत्मा में ही रमण करने वाला है तथा जो आत्मा में ही ज्ञान वाला है, वह सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्मा के साथ एकीभाव को प्राप्त सांख्य योगी शांत ब्रह्म को प्राप्त होता है
 ॥24॥

भगवद  गीता अध्याय: 5
श्लोक 25

श्लोक:
लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः।
 छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः॥

भावार्थ:
जिनके सब पाप नष्ट हो गए हैं, जिनके सब संशय ज्ञान द्वारा निवृत्त हो गए हैं, जो सम्पूर्ण प्राणियों के हित में रत हैं और जिनका जीता हुआ मन निश्चलभाव से परमात्मा में स्थित है, वे ब्रह्मवेत्ता पुरुष शांत ब्रह्म को प्राप्त होते हैं
 ॥25॥

भगवद  गीता अध्याय: 5
श्लोक 26

श्लोक:
कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम्‌।
 अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम्‌॥

भावार्थ:
काम-क्रोध से रहित, जीते हुए चित्तवाले, परब्रह्म परमात्मा का साक्षात्कार किए हुए ज्ञानी पुरुषों के लिए सब ओर से शांत परब्रह्म परमात्मा ही परिपूर्ण है
 ॥26॥

भगवद  गीता अध्याय: 5
श्लोक 27-28

श्लोक:
( भक्ति सहित ध्यानयोग का वर्णन ) 
 स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः।
 प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ॥
 यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः।
 विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः॥

भावार्थ:
बाहर के विषय-भोगों को न चिन्तन करता हुआ बाहर ही निकालकर और नेत्रों की दृष्टि को भृकुटी के बीच में स्थित करके तथा नासिका में विचरने वाले प्राण और अपानवायु को सम करके, जिसकी इन्द्रियाँ मन और बुद्धि जीती हुई हैं, ऐसा जो मोक्षपरायण मुनि (परमेश्वर के स्वरूप का निरन्तर मनन करने वाला।) इच्छा, भय और क्रोध से रहित हो गया है, वह सदा मुक्त ही है
 ॥27-28॥
मुक्त जिस के लिए शेष कोई काम ही नहीं रहा।

भगवद  गीता अध्याय: 5
श्लोक 29

श्लोक:
भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्‌।
 सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति॥

भावार्थ:
मेरा भक्त मुझको सब यज्ञ और तपों का भोगने वाला, सम्पूर्ण लोकों के ईश्वरों का भी ईश्वर तथा सम्पूर्ण भूत-प्राणियों का सुहृद् अर्थात स्वार्थरहित दयालु और प्रेमी, ऐसा तत्व से जानकर शान्ति को प्राप्त होता है
 ॥29॥ 
 🪔🪔🪔🪔🪔🪔
 ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मसंन्यासयोगो नाम पंचमोऽध्यायः
 ॥5॥
🪔🪔🪔🪔🪔🪔

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