सोमवार, 29 जनवरी 2024

गुलशन नंदा

#16nov

जन्म तारीख का पता नही

गुलशन नन्दा
🎂जिनका जन्म सन 1929 ई. को गुजरांवाला (अब पाकिस्तान) ...गुजरावाला महाराजा रणजीत सिंह का राज्य था इनके पारिवारिक सदस्य का बैक ग्राउंड वही से है
⚰️मृत्यु 16 नवम्बर 1985
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गुलशन नन्दा (मृत्यु 16 नवम्बर 1985) हिन्दी के प्रसिद्ध उपन्यासकार तथा लेखक थे। जिनका जन्म सन 1929 ई. को गुजरांवाला (अब पाकिस्तान) में हुआ था। विभाजन से पूर्व ही उनका परिवार दिल्ली (भारत) में आ गया था। गुलशन नन्दा का आरम्भिक जीवन बड़े कष्टों में व्यतीत हुआ। वह दिल्ली के बल्लीमारान बाज़ार में एक चश्मे की दुकान पर मामूली वेतन पर काम करते थे।  गुलशन नंदा की अद्भुत कल्पनाशीलता से प्रभावित पड़ोस के एक बुजुर्ग ने उन्हें उपन्यास लेखन की सलाह दी। जिसे गुलशन नंदा ने गम्भीरता से लिया और वे पूर्ण निष्ठा व ईमानदारी से लेखन की तरफ अग्रसर हुए। उन्हें एन.डी. सहगल नामक प्रकाशक ने पहली बार छपने का मौक़ा दिया। उस वक़्त उन्हें एक उपन्यास के 100 से 200 रुपए मिला करते थे। फिर रफ़्ता-रफ़्ता उनकी कामयाबी बढ़ने लगी और मिलने वाली रकम भी। आगे चलकर एक वक़्त ऐसा आया कि वो जो भी रकम मांगते, उन्हें मिल जाती। बाद में उनकी कहानियों को आधार बनाकर 1960 तथा 1970 के दशकों में कई हिन्दी फ़िल्में बनाई गईं और ज़्यादातर यह फ़िल्में बॉक्स ऑफ़िस में सफल भी रहीं। उन्होंने अपने द्वारा लिखी गई कुछ कहानियों की फ़िल्मों में पटकथा भी लिखी।

गुलशन नंदा के उपन्यासों की विशेषता

गुलशन नंदा के अधिकांश उपन्यासों में प्रेम, मिलन-विरह, धोखा-कपट, मज़बूरियाँ और इनसे उत्पन्न हुए मानवीय भावों-मूल्यों की अभिव्यक्ति ही प्रमुख थी। आंतरिक पारिवारिक रिश्ते, वर्गभेद का मायाजाल, न्याय-अन्याय का अन्तहीन द्वंद्व इनके उपन्यास के कथानक में सर्वत्र दृष्टिगोचर होता था। हिन्दी-उर्दू के शब्दों की चाश्नी में शायराना ढंग से रचे गए लंबे-लंबे संवाद इन उपन्यासों के प्राणबिन्दु हैं। संवादों में जो भावनात्मक अभियक्ति है, वो समस्त पाठकों की संवेदनशील आत्माओं को रुलाने व झकझोरने का माद्दा रखती थी। इन्हीं खूबियों के चलते गुलशन नन्दा जी ने लोकप्रियता के शिखर को छुआ। उन्होंने लेखन से वो रास्ता बनाया, जो फ़िल्मी दुनिया में उनके होने का मज़बूत आधार बना। उनकी कहानियों और उपन्यासों के अनेक भारतीय भाषाओं में अनुवाद भी हुए और दक्षिण भारतीय भाषाओं में भी फ़िल्में बनी—जैसे तमिल में "इंगेरिन्धो वंधल" (1970); "एयर होस्टेस" (1980) तथा मलयालम में "अमरुधा वाहिनी" (1976) आदि।

गुलशन नन्दा के प्रसिद्ध उपन्यासों में ‘नीलकंठ’, ‘लरज़ते आंसू’, ‘कलंकिनी’, ‘जलती चट्टान’, ‘घाट का पत्थर’, ‘गेलॉर्ड’ आदि उनकी प्रमुख कृतियां रहीं। हिंदी प्रकाशन के इतिहास में ‘झील के उस पार’ (उपन्यास) अद्भुत घटना थी। इस किताब का ‘न भूतो न भविष्यति’ प्रचार हुआ। भारतभर के अखबारों, पत्रिकाओं के साथ-साथ टी.वी., रेडियो, बिल बोर्ड्स का इस्तेमाल हुआ, इस उपन्यास के प्रमोशन में। चौक-चौराहों पर, बस अड्डों, रेलवे  स्टेशनों पर बड़े-बड़े पोस्टर चिपकाए गए। इस बात पर ख़ास ज़ोर दिया गया कि पहली बार हिंदी किताब 'झील के उस पार' का प्रथम संस्करण ही पांच लाख का है। ‘झील के उस पार’ (1973) उपन्यास के साथ ही, इसी नाम से एक फ़िल्म भी आई थी। फिल्मों में उनकी कलम ने और धमाल मचाया। कितनी ही हिट फिल्मों के क्रेडिट में बतौर कहानीकार उनका नाम दर्ज है।

‘काजल’(1965), सावन की घटा’ (1966), ‘पत्थर के सनम’ (1967), ‘नील कमल’ (1968), ‘खिलौना’ (1970),
‘कटी पतंग’ (1970), ‘शर्मीली’ (1970),
‘नया ज़माना’ (1971), ‘दाग़’ (1973),
‘झील के उस पार’ (1973), ‘जुगनू’ (1973), ‘जोशीला’ (1973), ‘अजनबी’ (1974), ‘भंवर’ (1976), ‘महबूबा’ (1976) वगैहरा-वगैहरा। इनमें से ज़्यादातर फ़िल्में बंपर हिट रहीं। नज़राना (1987) उनकी आख़िरी फ़िल्म थी, जो उनकी मौत के बाद रिलीज़ हुई और हिट रही। कुल मिलाके ये कह सकते हैं कि, गुलशन नंदा हिन्दी के वो कामयाब लेखक थे—जिनके दर पर प्रकाशकों की कतारें लगी रहती थी और जिनके आगे फ़िल्म इंडस्ट्री के दिग्गज हाथ जोड़े खड़े रहते थे।

चुनिन्दा उपन्यासों की सूची

काली घटा
तीन इक्के
गुनाह के फूल
शर्मीली
माधवी
डरपोक
एक नदी दो पाट
नीलकमल
पत्थर के होंठ
सूखे पेड़ सब्ज पत्ते
काँच की चुड़ियाँ
मैं अकेली
नीलकंठ
लरज़ते आंसू
कलंकिनी
जलती चट्टान
घाट का पत्थर
गेलॉर्ड
झील के उस पार
सोने की लंका
आवारा बादल
सगुन
अजनबी
चन्दन
वापसी

चुनिन्दा फ़िल्मोग्राफ़ी

1963 पुनर्जन्म (कहानी)
1965 काजल (कहानी)
1966 सावन की घटा (पटकथा)/(कहानी)
1967 पत्थर के सनम (कहानी)
1968 नील कमल (कहानी)
1968 वासना (कहानी और पटकथा)
1970 खिलौना (पटकथा) / (कहानी)
1970 इंगेरिन्धो वंधल [लेखक: गुलशन नंदा (कहानी), ए. एल. नारायणन (पटकथा, संवाद) /तमिल फिल्म थी]
1970 कटी पतंग (कहानी और पटकथा)
1971 शर्मीली (कहानी)
1971 नया ज़माना (कहानी)
1973 दाग़: प्रेम की एक कविता (कहानी)
1973 झील के उस पार (उपन्यास)/(परिदृश्य) / (कहानी)
1973 जुगनू (कहानी)
1973 जोशीला (कहानी)
1974 अजनबी (पटकथा)/(कहानी)
1976 भंवर (कहानी)
1976 महबूबा (पटकथा)/(कहानी)
1976 अमरुधा वाहिनी [लेखक: गुलशन नंदा (कहानी); पप्पनमकोडु लक्ष्मणन (पटकथा, संवाद) मलयालम फ़िल्म थी। ]
1977 डार्लिंग डार्लिंग (कहानी)
1978 आज़ाद (कहानी)
1979 दिल का हीरा (कहानी)
1980 दो प्रेमी (कहानी)
1980 एयर होस्टेस [लेखक: गुलशन नंदा (कहानी), एस.एल. पुरम सदानंदन (पटकथा, संवाद) /तमिल फिल्म थी]
1983 बड़े दिल वाला (कहानी)
1983 मैं आवारा हूं [गुलशन नंदा (कहानी), राही मासूम रज़ा (संवाद)]
1984 बिंदिया चमकेगी (कहानी)
1985 बादल (स्क्रीनप्ले)
1985 सलमा (कहानी)
1987 नज़राना (कहानी)
1993 कलंकनी (गुलशन नंदा द्वारा उपन्यास पर आधारित)

शनिवार, 27 जनवरी 2024

श्रुति हसन

#28jan 
श्रुति राजलक्ष्मी हासन,

🎂जन्म 28 जनवरी 1986  चेन्नई
माता-पिता: कमल हासन, सारिका
आंटी: नलिनी रघु
बहन: अक्षरा हासन

 दक्षिण भारतीय फ़िल्मों और बॉलीवुड में अभिनय करने वाली भारतीय अभिनेत्री, गायिका, संगीत रचयिता और नर्तकी हैं। उनके माता-पिता सारिका और कमल हासन नामी फ़िल्मी सितारे हैं। 
अपनी वयस्क प्रथम अभिनय के रूप में एक्शन ड्रामा फ़िल्म लक में अभिनय किया था। इससे पूर्व बाल कलाकार के रूप में फ़िल्मों में काम किया था। 2012 में इन्होने हिन्दी फिल्म दबंग के तेलगु पुनः-निर्मित फ़िल्म गब्बर सिंह में काम किया जो बहुत ज़्यादा सफल रही। तेलगु फिल्मों के साथ-साथ वो हिन्दी फ़िल्मों में भी एक बडी अभिनेत्री के रूप में उभरी हैं।

अभिनय के साथ-साथ इन्होने गायकी और संगीत निर्देशन भी किया है।

एक बाल कलाकार के रूप में, हासन ने फिल्मों में गाया और 2009 की बॉलीवुड फिल्म लक में अपने वयस्क अभिनय की शुरुआत करने से पहले, अपने पिता के निर्देशन में बनी “हे राम” (2000) में एक अतिथि भूमिका में दिखाई दीं। उन्होंने तेलुगु रोमांटिक कॉमेडी ओह माय फ्रेंड (2011), तेलुगु फंतासी फिल्म अनगनगा ओ धीरुडु (2011), तमिल साइंस फिक्शन एक्शन फिल्म 7aum अरिवु (2011) में प्रमुख भूमिकाओं के साथ पहचान हासिल की। बाद के दो में उनकी भूमिकाओं ने उन्हें सर्वश्रेष्ठ महिला पदार्पण - दक्षिण के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार दिलाया। हासन ने कई व्यावसायिक रूप से सफल फिल्मों के साथ दक्षिण भारतीय सिनेमा में खुद को स्थापित किया, गब्बर सिंह (2012), बालुपु (2013), येवडु (2014), रेस गुर्रम (2014), श्रीमंथुडु (2015 सहित तेलुगु फिल्मों में उनका ब्रेक थ्रू और स्टारडम) ), क्रैक (2021) और तमिल फिल्में वेदालम और एसआई3 (2017)। उन्होंने एक्शन कॉमेडी रेस गुर्रम (2014) के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री - तेलुगु के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार जीता। हासन की हिंदी फिल्म भूमिकाओं में समीक्षकों द्वारा प्रशंसित एक्शन थ्रिलर फिल्म डी-डे (2013), रमैया वस्तावैया (2013), एक्शन फिल्म गब्बर इज बैक (2015) और एक्शन कॉमेडी वेलकम बैक (2015) शामिल हैं। अभिनय के अलावा, हासन एक स्थापित पार्श्व गायक भी हैं। उन्हें सर्वश्रेष्ठ महिला पार्श्व गायिका के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार के लिए नामांकन मिला है - 3 (2012) में "कन्नज़गा कालाज़गा" और पुली (2015) में "येंडी येंडी" गाने के लिए तमिल; और आगाडु (2014) में "जंक्शन लो" के लिए सर्वश्रेष्ठ महिला पार्श्व गायिका - तेलुगु के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार। हासन ने अपने पिता के प्रोडक्शन उन्नीपोल ओरुवन (2009) के साथ एक संगीत निर्देशक के रूप में अपना करियर शुरू किया और तब से अपना खुद का संगीत बैंड बनाया है। उन्हें एडिसन अवार्ड्स में उन्नाइपोल ओरुवन के लिए सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक का पुरस्कार मिला।
📽️
2000 हे राम
2009 लक
2011 दिल तो बच्चा है जी
2013 रमैया वस्तावैया
2013 डी-डे सुरैया
2015 तेवर
2015 गब्बर इज़ बैक
2015 वेलकम बैक
2017 बहन होगी तेरी

सुमन कल्याणपुर

#28jan 

सुमन कल्याणपुर
पूरा नाम सुमन कल्याणपुर
🎂जन्म 28 जनवरी, 1937
जन्म भूमि ढाका, बंगाल (आज़ादी से पूर्व)

अभिभावक पिता- शंकर राव हेमाडी
पति/पत्नी रामानंद कल्याणपुर
कर्म भूमि मुम्बई
कर्म-क्षेत्र गायन
विषय भारतीय शास्त्रीय संगीत, लोक संगीत, भजन, गज़ल
पुरस्कार-उपाधि दादा साहब फाल्के पुरस्कार, 1961
पद्म भूषण, 2023
मियां तानसेन पुरस्कार, 1965 और 1970
लता मंगेशकर पुरस्कार, 2009

प्रसिद्धि पार्श्वगायिका
नागरिकता भारतीय
मुख्य गीत इक जुर्म करके हमने चाहा था मुस्कुराना, परबतों के पेड़ों पर, ये मौसम रंगीन समां, आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे हर जुबान पर
सक्रिय वर्ष 1954–1988
अन्य जानकारी करीब 28 साल के अपने करियर में सुमन कल्याणपुर ने पार्श्वगायन के क्षेत्र में अपना एक सम्मानजनक स्थान बनाया।
सुमन कल्याणपुर
जन्म- 28 जनवरी, 1937, ढाका, बंगाल) भारतीय पार्श्वगायिका हैं। इनकी हिन्दी फ़िल्म संगीत में दशा दोधारी चाकू की तरह रही है, जो दोनों ओर से चीजों को काटता है। अपनी अच्छी आवाज के बावजूद सुमन कल्याणपुर को फ़िल्मों में संगीतकारों ने अधिक अवसर इसलिए नहीं दिए क्योंकि उनकी आवाज हूबहू लता जी से मिलती थी। जब बाज़ार में ऑरिजिनल आवाज उपलब्ध हो, तो डुप्लिकेट को कोई क्यों कर मौका देने लगे। सुमन कल्याणपुर का फ़िल्मों में आगमन भी ऐसे दौर में हुआ, जब लता जी के खनकते कलदार सिक्के चलते थे। कोई संगीतकार लता जी के विरुद्ध सुमन कल्याणपुर से गवाने की हिमाकत कैसे कर सकता था। इसलिए सुमन कल्याणपुर चुपचाप हमेशा दूसरी कतार में खड़ी रहकर अपने नियति को दबे होंठ ताउम्र स्वीकारती रहीं। उन्हें लता जी का क्लोन बना दिया गया।

सुमन का जन्म
🎂28 जनवरी 1937 को ढाका (बंगला देश की वर्तमान राजधानी) में हुआ। पिता बैंक अधिकारी थे। 1943 में मुंबई आने पर पढ़ाई तथा संगीत का प्रशिक्षण यही लिया। अपने गुरु यशवंत देव से बाकायदा संगीत सीखा। उन्होंने ही मराठी फ़िल्म शुक्राची चांदनी में पहली बार गवाया। किस्मत यहां भी दगा दे गई। यह फ़िल्म में शामिल नहीं हुआ। लेकिन संगीतकार मोहम्मद शफी ने सुमन को फ़िल्म मंगू में गाने के अवसर दिए। सन था 1954 और सुमन की उम्र थी 17 साल। फिर किस्मत ने झपट्टा मारा, निर्माता ने संगीतकार को फ़िल्म के अधबीच में बदल लिया। उनका स्थान ओपी नय्यर ने लिया। ओपी को गीता दत्त, आशा भोंसले तथा शमशाद की मोटी आवाज पसंद थी। उन्होंने सुमन का सिर्फ एक गीत फ़िल्म में रखा-कोई पुकारे धीरे से तुझे। इसी साल संगीतकार नाशाद के निर्देशन में फ़िल्म दरवाजा में पांच गीत गाकर अपना पैर मजबूती से जमाया। इस दौर में वह सुमन हेमाड़ी थी। मुंबई के व्यापारी रामानंद कल्याणपुर से शादी के बाद वह सुमन कल्याणपुर हो गईं।

कॅरियर
मुख्य लेख : सुमन कल्याणपुर का फ़िल्मी कॅरियर
एक समय एचएमवी ने 50 प्रेम-गीतों के चार कैसेट्स जारी किए थे। उनमें अधिकतम सात गीत सुमन द्वारा गाए हुए थे। किशोर, रफी, तलत, मन्ना डे, गीता दत्त, हेमंत कुमार सब उनके पीछे थे। कैसेट कवर पर सबके फोटो छापे गए मगर सुमन का फोटो एक कैसेट पर भी नहीं था। यह कुछ उसी तरह की घटना है कि जायज टिकट के बावजूद बस कण्डक्टर मुसाफिर को सरे राह उतार दे। सुमन के पार्श्वगायन के करियर में सत्तर के दशक में बसंती बयार ने शीतल हवा के झोंकों से उन्हें शांति प्रदान की थी। गीतों की रायल्टी को लेकर रफी-लता में मनमुटाव चल रहा था। दोनों ने साथ गाना छोड़ दिया था। सुमन को इस दशक में 170 फ़िल्मों में गाने का मौका मिला। इस दौर में सुमन के उम्दा गीत सामने आए। जैसे- दिल एक मंदिर है (दिल एक मंदिर), अगर तेरी जलवानुमाई न होती (बेटी-बेटे), तुमने पुकारा और हम चले आए (राजकुमार), अजहुं न आए बालमा सावन बीता जाए (सांझ और सबेरा) तथा आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे हर जुबान पर (ब्रह्मचारी), लेकिन बाद में रफी-लता में समझौता होते ही पुरानी स्थिति लौट आई।

मलाल
संगीतकार नौशाद के निर्देशन में फिल्म 'दरवाजा' में सुमन कल्याणपुर को पांच गीत गाने का मौका मिला, जिसके बाद सुमन ने इंडस्ट्री में मजबूती से अपने पैर जमाए। हालांकि, 'ए मेरे वतन के लोगों' न गा पाने का उन्हें मलाल रहा। एक बार एक एक बातचीत के दौरान सुमन कल्याणपुर ने खुद 'ए मेरे वतन के लोगो' गीत को लेकर बड़ा खुलासा किया था।

उन्होंने बताया था कि पंडित जवाहरलाल नेहरू के सामने यह गीत गाने के लिए मुझे बुलाया गया था, रिहर्सल भी हुई थी, लेकिन मंच के पास पहुंचते ही मुझे इस गाने की बजाय दूसरा गाना गाने के लिए कहा गया। सुमन कल्याणपुर ने यह भी कहा कि इस बात का अब तक पता नहीं लगा कि आखिर यह गाना उनसे क्यों छीना गया? उनका कहना था कि 'पंडित नेहरू के सामने 'ए मेरे वतन के लोगो' गीत गाने का मौका मिला तो खुशी का ठिकाना नहीं रहा। लेकिन जब कार्यक्रम के दौरान गाना गाने के लिए मंच के पास पहुंची तो मुझे रोका गया और कहा गया कि वे इस गाने की बजाय दूसरा गाना गाएं। यह गाना मुझसे छीन लिया गया था, यह मेरे लिए बड़ा सदमा था। वह बात आज भी चुभती है।

पुरस्कार
मुख्य लेख : सुमन कल्याणपुर को पुरस्कार
करीब 28 साल के अपने कॅरियर में सुमन कल्याणपुर ने न सिर्फ पार्श्वगायन के क्षेत्र में अपना एक सम्मानजनक स्थान बनाया बल्कि 'रसरंग' (नासिक) का 'फाल्के पुरस्कार' (1961), सुर सिंगार संसद का 'मियां तानसेन पुरस्कार' (1965 और 1970) आदि हासिल किए।

पद्म भूषण, 2023

कमलेश्वर

#06jan
#27jan 
कमलेश्वर

🎂 06 जनवरी, 1932
⚰️27 जनवरी, 2007 को फ़रीदाबाद, हरियाणा

उपन्यास के लेखक उपन्यासकार, लेखक, आलोचक, फ़िल्म पटकथा लेखक 
इनाम: पद्म भूषण, फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार - सर्वश्रेष्ठ पटकथा
शिक्षा: इलाहाबाद विश्वविद्यालय
आंदोलन: नई कहानी

कमलेश्वर बीसवीं शती के सबसे सशक्त लेखकों में से एक हैं। कहानी, उपन्यास, पत्रकारिता, स्तंभ लेखन, फ़िल्म पटकथा जैसी अनेक विधाओं में उन्होंने अपनी लेखन प्रतिभा का परिचय दिया। इन्होंने अनेक हिन्दी फ़िल्मों के लिए पटकथाएँ लिखीं तथा भारतीय दूरदर्शन शृंखलाओं के लिए दर्पण, चन्द्रकान्ता, बेताल पच्चीसी, विराट युग आदि लिखे। भारतीय स्वातंत्रता संग्राम पर आधारित पहली प्रामाणिक एवं इतिहासपरक जन-मंचीय मीडिया कथा ‘हिन्दुस्तां हमारा’ का भी लेखन किया।

पूरा नाम 'कमलेश्वर प्रसाद सक्सेना' का जन्म उत्तर प्रदेश के मैनपुरी में 6 जनवरी, 1932 को हुआ था। प्रारम्भिक पढ़ाई के पश्चात् कमलेश्वर ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से परास्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण की। कमलेश्वर बहुआयामी रचनाकार थे। उन्होंने सम्पादन क्षेत्र में भी एक प्रतिमान स्थापित किया। ‘नई कहानियों’ के अलावा ‘सारिका’, ‘कथा यात्रा’, ‘गंगा’ आदि पत्रिकाओं का सम्पादन तो किया ही ‘दैनिक भास्कर’ के राजस्थान अलंकरणों के प्रधान सम्पादक भी रहे। कश्मीर एवं अयोध्या आदि पर वृत्त चित्रों तथा दूरदर्शन के लिए ‘बन्द फ़ाइल’ एवं ‘जलता सवाल’ जैसे सामाजिक सरोकारों के वृत्त चित्रों का भी लेखन-निर्देशन और निर्माण किया।

'विहान' जैसी पत्रिका का 1954 में संपादन आरंभ कर कमलेश्वर ने कई पत्रिकाओं का सफल संपादन किया जिनमें 'नई कहानियाँ' (1963-66), 'सारिका' (1967-78), 'कथायात्रा' (1978-79), 'गंगा' (1984-88) आदि प्रमुख हैं। इनके द्वारा संपादित अन्य पत्रिकाएँ हैं- 'इंगित' (1961-63) 'श्रीवर्षा' (1979-80)। हिंदी दैनिक 'दैनिक जागरण'(1990-92) के भी वे संपादक रहे हैं। 'दैनिक भास्कर' से 1997 से वे लगातार जुड़े हैं। इस बीच जैन टीवी के समाचार प्रभाग का कार्य भार संभाला। सन 1980-82 तक कमलेश्वर दूरदर्शन के अतिरिक्त महानिदेशक भी रहे। कमलेश्वर का नाम नई कहानी आंदोलन से जुड़े अगुआ कथाकारों में आता है। उनकी पहली कहानी 1948 में प्रकाशित हो चुकी थी परंतु 'राजा निरबंसिया' (1957) से वे रातों-रात एक बड़े कथाकार बन गए। कमलेश्वर ने तीन सौ से ऊपर कहानियाँ लिखी हैं। उनकी कहानियों में 'मांस का दरिया,' 'नीली झील', 'तलाश', 'बयान', 'नागमणि', 'अपना एकांत', 'आसक्ति', 'ज़िंदा मुर्दे', 'जॉर्ज पंचम की नाक', 'मुर्दों की दुनिया', 'क़सबे का आदमी' एवं 'स्मारक' आदि उल्लेखनीय हैं।

फ़िल्म और टेलीविजन के लिए लेखन के क्षेत्र में भी कमलेश्वर को काफ़ी सफलता मिली है। उन्होंने सारा आकाश, आँधी, अमानुष और मौसम जैसी फ़िल्मों के अलावा 'मि. नटवरलाल', 'द बर्निंग ट्रेन', 'राम बलराम' जैसी फ़िल्मों सहित 99 हिंदी फ़िल्मों का लेखन किया है। कमलेश्वर भारतीय दूरदर्शन के पहले स्क्रिप्ट लेखक के रूप में भी जाने जाते हैं। उन्होंने टेलीविजन के लिए कई सफल धारावाहिक लिखे हैं जिनमें 'चंद्रकांता', 'युग', 'बेताल पचीसी', 'आकाश गंगा', 'रेत पर लिखे नाम' आदि प्रमुख हैं। भारतीय कथाओं पर आधारित पहला साहित्यिक सीरियल 'दर्पण' भी उन्होंने ही लिखा। दूरदर्शन पर साहित्यिक कार्यक्रम 'पत्रिका' की शुरुआत इन्हीं के द्वारा हुई तथा पहली टेलीफ़िल्म 'पंद्रह अगस्त' के निर्माण का श्रेय भी इन्हीं को जाता है। तकरीबन सात वर्षों तक दूरदर्शन पर चलने वाले 'परिक्रमा' में सामाजिक-सांस्कृतिक समस्याओं पर खुली बहस चलाने की दिशा में साहसिक पहल भी कमलेश्वर जी की थी। वे स्वातंत्र्योत्तर भारत के सर्वाधिक क्रियाशील, विविधतापूर्ण और मेधावी हिंदी लेखक थे

उपन्यासकार के रूप में ‘कितने पाकिस्तान’ ने इन्हें सर्वाधिक ख्याति प्रदान की और इन्हें एक कालजयी साहित्यकार बना दिया। हिन्दी में यह प्रथम उपन्यास है, जिसके अब तक पाँच वर्षों में, 2002 से 2008 तक ग्यारह संस्करण हो चुके हैं। पहला संस्करण छ: महीने के अन्तर्गत समाप्त हो गया था। दूसरा संस्करण पाँच महीने के अन्तर्गत, तीसरा संस्करण चार महीने के अन्तर्गत। इस तरह हर कुछेक महीनों में इसके संस्करण होते रहे और समाप्त होते रहे।

कमलेश्वर को उनकी रचनाधर्मिता के फलस्वरूप पर्याप्त सम्मान एवं पुरस्कार मिले। 2005 में उन्हें ‘पद्मभूषण’ अलंकरण से राष्ट्रपति महोदय ने विभूषित किया। उनकी पुस्तक ‘कितने पाकिस्तान’ पर साहित्य अकादमी ने उन्हें पुरस्कृत किया।

27 जनवरी, 2007 को फ़रीदाबाद, हरियाणा में कमलेश्वर का निधन हो गया।

उनकी कहानियाँ

कमलेश्वर ने तीन सौ से अधिक कहानियाँ लिखीं। उनकी कुछ प्रसिद्ध कहानियाँ हैं -

राजा निरबंसिया
मांस का दरिया
नीली झील
तलाश
बयान
नागमणि
अपना एकांत
आसक्ति
ज़िंदा मुर्दे
जॉर्ज पंचम की नाक
मुर्दों की दुनिया
कस्बे का आदमी
स्मारक
नाटक

उन्होंने तीन नाटक लिखे -

अधूरी आवाज़
रेत पर लिखे नाम
हिंदोस्ता हमारा

उपन्यास -

एक सड़क सत्तावन गलियाँ- 1957
तीसरा आदमी- 1976
डाक बंगला -1959
समुद्र में खोया हुआ आदमी-1967
काली आँधी-1974
आगामी अतीत -1976
सुबह...दोपहर...शाम-1982
रेगिस्तान-1988
लौटे हुए मुसाफ़िर-1961
वही बात-1980
एक और चंद्रकांता
कितने पाकिस्तान-2000
 अंतिम सफर
पटकथा एवं संवाद

कमलेश्वर ने ९९ फ़िल्मों के संवाद, कहानी या पटकथा लेखन का काम किया। कुछ प्रसिद्ध फ़िल्मों के नाम हैं-

१. सौतन की बेटी(१९८९)-संवाद
२. लैला(१९८४)- संवाद, पटकथा
३. यह देश (१९८४) -संवाद
४. रंग बिरंगी(१९८३) -कहानी
५. सौतन(१९८३)- संवाद
६. साजन की सहेली(१९८१)- संवाद, पटकथा
७. राम बलराम (१९८०)- संवाद, पटकथा
८. मौसम(१९७५)- कहानी
९. आंधी (१९७५)- उपन्यास
संपादन

अपने जीवनकाल में अलग-अलग समय पर उन्होंने सात पत्रिकाओं का संपादन किया -

विहान-पत्रिका (१९५४)
नई कहानियाँ-पत्रिका (१९५८-६६)
सारिका-पत्रिका (१९६७-७८)
कथायात्रा-पत्रिका (१९७८-७९)
गंगा-पत्रिका(१९८४-८८)
इंगित-पत्रिका (१९६१-६८)
श्रीवर्षा-पत्रिका (१९७९-८०)

मनुस्मृति

. ................मनुस्मृति.................... जरा सोचिए, अगर आज भारत का कानून यह तय कर दे कि— "एक आम आदमी चोरी करे तो उसे...