गुरुवार, 18 जनवरी 2024

अदिति भागवत

#18jan
अदिति भागवत
 🎂जन्म 18 जनवरी 1981 

एक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध कथक और लावणी विशेषज्ञ, अभिनेत्री, नृत्य प्रशिक्षक और कोरियोग्राफर हैं । वह एकल प्रदर्शन के साथ-साथ कई अन्य भारतीय संगीत कलाकारों के साथ मिलकर स्टेज शो में भाग लेने के लिए दुनिया भर में यात्रा करती हैं।
अदिति की संगीत यात्रा जीवन में बहुत पहले ही शुरू हो गई थी, वह अपनी मां रागिनी भागवत, जो एक शास्त्रीय गायिका थीं, से बहुत प्रेरित थीं। जयपुर शैली में उनका प्रारंभिक कथक प्रशिक्षण , रोशन कुमारी और नंदिता पुरी के मार्गदर्शन में था ।झेलम परांजपे के मार्गदर्शन में " ओडिसी " में उनके प्रशिक्षण ने उन्हें अभिनय (अभिव्यक्ति) और अड्डा - सुंदर मुद्रा में निखारने में मदद की है, जिसके लिए अदिति अच्छी तरह से पहचानी जाती हैं। उन्होंने गंधर्व महाविद्यालय (नेशनल स्कूल ऑफ डांस) से नृत्य में मास्टर डिग्री ली है ।

भारतीय शास्त्रीय संगीत और कला की संरचना के भीतर रहते हुए , अदिति ने पारंपरिक नृत्य कला और संगीत को जैज़ और अन्य प्रकार के पश्चिमी संगीत के साथ मिश्रित करने में बड़े पैमाने पर प्रयोग किए हैं और सफल रही हैं। वह फ्रांस में कार्तिक और गोतम: बिजनेस क्लास रिफ्यूजी बैंड के साथ कथक और इलेक्ट्रॉनिक संगीत सहयोग में शामिल थीं। वह न्यूयॉर्क पियानोवादक रॉड विलियम्स के साथ इश्यू प्रोजेक्ट में भी शामिल थीं ।उन्होंने कथक की शैलीगत भंगिमाओं और तत्कार, चक्रधरों और विभिन्न तालों की परिष्कृत लय को अलग-अलग समय चक्रों के साथ डीजेम्बे, ड्रम , घम्बरी, कुआत्रो , सरोद , सितार और कई अन्य वाद्ययंत्रों के साथ खूबसूरती से मिश्रित किया है। भागवत ने कहा है कि बदलाव और प्रयोग एक व्यक्ति को एक कलाकार के रूप में विकसित होने में मदद करते हैं। द हिंदू के अनुसार उनकी कथक नृत्य शैली "मुहावरे में महारत" दर्शाती है ।

अदिति को 2012 में सांस्कृतिक आदान-प्रदान कार्यक्रम 'वन बीट' के तहत प्रतिष्ठित यूनाइटेड स्टेट्स डिपार्टमेंट ऑफ़ स्टेट फ़ेलोशिप से सम्मानित किया गया था ।

उन्होंने नृत्य के विभिन्न पहलुओं पर एमआई मराठी लाइव ई-पेपर में एक कॉलम पेश किया है। श्रृंखला का पहला लेख 13 सितंबर 2015 को प्रदर्शित हुआ, और यह साप्ताहिक फीचर के रूप में जारी रहेगा। 
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ट्रैफिक सिग्नल(हिन्दी मूवी, 2007, विशेष प्रस्तुति)
चालू नवरा भोली बाइको (मराठी फिल्म, 2008)
अदला बादली (मराठी फिल्म, 2008)
माया सज्जना (मराठी फिल्म, 2008)
तहान (मराठी फिल्म, 2008)
सुंबरन(मराठी मूवी, 2009)
म्योहो (हिन्दी मूवी, 2012, विशेष प्रस्तुति)
शासन(मराठी मूवी, 2016)
अरसा (इंटरनेशनल शॉर्ट, 2016)

बुधवार, 17 जनवरी 2024

नफीसा अली

#18jan 
नफीसा अली

🎂जन्म18 जनवरी 1957
कोलकाता , पश्चिम बंगाल , भारत
अन्य नामों
नफीसा अली सोढ़ी
व्यवसाय
अभिनेत्री, मॉडल, राजनीतिज्ञ
सक्रिय वर्ष
1978-वर्तमान
राजनीतिक दल
अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (2021—वर्तमान) 
अन्य राजनीतिक
संबद्धताएँ
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
समाजवादी पार्टी
जीवनसाथी आरएस सोढ़ी
नफीसा अली का जन्म कोलकाता में हुआ था , जो एक बंगाली मुस्लिम व्यक्ति अहमद अली और एंग्लो-इंडियन विरासत की रोमन कैथोलिक महिला फिलोमेना टॉरेसन की बेटी थीं। नफीसा के दादा एस वाजिद अली एक प्रमुख बंगाली लेखक थे। उनकी मौसी (पिता की बहन) ज़ैब-उन-निसा हमीदुल्लाह थीं , जो एक पाकिस्तानी पत्रकार और नारीवादी थीं। नफीसा का संबंध बांग्लादेशी स्वतंत्रता सेनानी और सैनिक बीर प्रतीक अख्तर अहमद से भी है। नफ़ीसा की माँ अब ऑस्ट्रेलिया में बस गयी हैं। 

नफ़ीसा ने ला मार्टिनियर कलकत्ता में भाग लिया , जहाँ वह हाउस कैप्टन थीं। उन्होंने स्वामी चिन्मयानंद द्वारा पढ़ाए गए वेदांत का भी अध्ययन किया है, जिन्होंने चिन्मय मिशन ऑफ वर्ल्ड अंडरस्टैंडिंग केंद्र शुरू किया था।

उनके पति पोलो खिलाड़ी और अर्जुन पुरस्कार विजेता सेवानिवृत्त कर्नल आरएस सोढ़ी हैं। शादी के बाद, उन्होंने काम करना बंद कर दिया और अपने तीन बच्चों: बेटियों अरमाना, पिया और बेटे अजीत पर ध्यान केंद्रित करने का फैसला किया।  18 साल के ब्रेक के बाद वह फिल्म उद्योग में लौट आईं।
नफीसा अली को कई क्षेत्रों में उपलब्धियां हासिल हैं। वह 1972 से 1974 तक राष्ट्रीय तैराकी चैंपियन थीं। 1976 में, उन्होंने फेमिना मिस इंडिया का खिताब जीता, मिस इंटरनेशनल प्रतियोगिता में भारत का प्रतिनिधित्व किया और दूसरी रनर-अप घोषित की गईं। अली 1979 में कलकत्ता जिमखाना में जॉकी भी थे।
उन्होंने कई बॉलीवुड फिल्मों में अभिनय किया है, जिनमें शशि कपूर के साथ जुनून (1979) , अमिताभ बच्चन के साथ मेजर साब (1998) , बेवफा (2005), लाइफ इन ए... मेट्रो (2007) और यमला पगला दीवाना (2010) प्रमुख हैं। ) धर्मेंद्र के साथ ।

उन्होंने ममूटी के साथ बिग बी (2007) नामक एक मलयालम फिल्म में भी अभिनय किया है , और एड्स जागरूकता फैलाने के लिए काम करने वाली संस्था एक्शन इंडिया से जुड़ी हैं।

राजनीतिक कैरियर

नफीसा अली ने 2004 का लोकसभा चुनाव दक्षिण कोलकाता से लड़ा लेकिन असफल रहीं । 5 अप्रैल 2009 को, सुप्रीम कोर्ट द्वारा पूर्व दोषसिद्धि के आधार पर संजय दत्त को अयोग्य ठहराए जाने के बाद उन्होंने समाजवादी पार्टी के टिकट पर लखनऊ से लोकसभा चुनाव लड़ा। फिर वह नवंबर 2009 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी में फिर से शामिल हो गईं और कहा कि वह जीवन भर के लिए कांग्रेस में लौट रही हैं।  हालाँकि, वह 2022 गोवा विधान सभा चुनाव से पहले अक्टूबर 2021 में अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गईं ।

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जुनून (1979)
आतंक (1996)
मेजर साब (1998)
ये जिंदगी का सफर (2001)
बेवफ़ा (2005)
बिग बी (2007) मैरी टीचर के रूप में
लाइफ इन ए... मेट्रो (2008)
गुजारिश (2010)
लाहौर (2010)
यमला पगला दीवाना (2011)
साहेब, बीवी और गैंगस्टर 3 (2018) राजमाता यशोधरा के रूप में
बिलाल (2022) मैरी टीचर के रूप में
उंचाई (2022)

मोनिका बेदी

#18jan

मोनिका बेदी 

🎂: 18 जनवरी 1975 , चब्बेवाल

भाई: बॉबी बेदी
माता-पिता: डॉक्टर प्रेम कुमार बेदी, शकुन्तला बेदी
मोनिका ने अबू सलेम से शादी की, अपना धर्म बदलकर इस्लाम अपना लिया, अपना नाम फौजिया रख लिया, भोपाल और हैदराबाद से पासपोर्ट के दो सेट हासिल किए और दोनों 2001 में दुबई, संयुक्त अरब अमीरात में अपने वर्तमान स्थान से पुर्तगाल के लिस्बन में स्थानांतरित हो गए।

एक अभिनेत्री और टेलीविजन प्रस्तुति है। 1990 के दशक के मध्य में उन्होंने हिंदी फिल्मों में शुरुआत की और उनके उल्लेखनीय काम में प्यार इश्क और मोहब्बत और जोड़ी नम्बर वन शामिल हैं। वह बिग बॉस 2 में भाग लेने के बाद और 2013-2014 से स्टार प्लस 'सरस्वतीचंद्र में नकारात्मक चरित्र खेलने के लिए भी जाने जाते हैं। 
2002 में मोनिका को नकली दस्तावेजों के साथ पुर्तगाल जाते समय गिरफ्तार कर लिया गया था। उनके साथ अबू सलेम भी था। 2006 में मोनिका को मामले में दोषी पाया गया और उन्हें जेल की सजा हुई। नवंबर 2010 में वह जेल से छूटीं।

बेदी एक पंजाबी हैं और उनका जन्म पंजाब के होशियारपुर जिले के चब्बेवाल गांव में प्रेम कुमार बेदी और शकुंतला बेदी के घर हुआ था । उनके माता-पिता 1979 में ड्रामेन , नॉर्वे चले गए। उन्होंने 1995 में दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी शिक्षा पूरी की।
बेदी को पहली भूमिका डी. रामानायडू द्वारा निर्मित तेलुगु भाषा की फिल्म ताज महल (1995) में मिली । रामानायडू ने उन्हें शिवय्या और स्पीड डांसर में भी कास्ट किया ।
बेदी टेलीविजन रियलिटी शो बिग बॉस सीजन 2 में प्रतिभागी थीं ।वह रियलिटी शो झलक दिखला जा 3 और देसी गर्ल की प्रतियोगियों में से एक थीं ।

उन्होंने यूनिवर्सल म्यूजिक पर एक आध्यात्मिक संगीत एल्बम के लिए "एकओंकार" मंत्र गाया। 

बेदी ने हरजीत सिंह रिकी द्वारा निर्देशित पंजाबी फिल्म सिरफिरे (2012) में अभिनय किया।

2013 से 2014 तक बेदी ने स्टार प्लस के शो सरस्वतीचंद्र में घुम्मन की नकारात्मक भूमिका निभाई।
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1994 मैं तेरा आशिक 
1995 जो कि सुरक्षा
1995 आशिक मस्ताने
1996 खिलौना
1997 एक फूल तीन कांटे
1997 जियो शान से
1997 तिरछी टोपीवाले
1998 जबाब दिही
1998 ज़ंजीर
1999 कालीचरण
1999 सिकंदर सड़क का 
1999 जानम समझ करो
1999 काल साम्राज्य
1999 लोहपुरुष 
2001 जोड़ी नंबर 1 
2001 प्यार इश्क और मोहब्बत 
2003 टाडा
2012 सिरफिरे सिमरन पंजाबी
2014 रोमियो रांझा रीत कौर पंजाबी
2017 बन्दुकन

के . एल. सहगल

#11april
#18jan 
कुन्दन लाल सहगल
प्रसिद्ध नाम के.एल. सहगल

🎂जन्म 11 अप्रॅल, 1904
जन्म भूमि जम्मू, जम्मू और कश्मीर
⚰️मृत्यु 18 जनवरी, 1947
मृत्यु स्थान जालंधर, पंजाब

अभिभावक अमरचंद सहगल, केसरीबाई कौर
पति/पत्नी आशा रानी
संतान मदन मोहन (पुत्र), नीना और बीना (पुत्री)
कर्म भूमि मुम्बई, महाराष्ट्र
कर्म-क्षेत्र अभिनेता, गायक
मुख्य फ़िल्में देवदास, पुराण भगत (1933), सूरदास (1942), तानसेन (1943) आदि।
प्रसिद्धि गायक व अभिनेता
नागरिकता भारतीय
लोकप्रियता सहगल की आवाज़ की लोकप्रियता का यह आलम था कि कभी भारत में सर्वाधिक लोकप्रिय रहा रेडियो सीलोन कई साल तक हर सुबह सात बज कर 57 मिनट पर इस गायक का गीत बजाता था।
अन्य जानकारी भारत रत्न सम्मानित लता मंगेशकर सहगल की बड़ी भक्त हैं। वह चाहती थीं कि सहगल की कोई निशानी उनके पास हो। सहगल की बेटी ने रतन जड़ी अंगूठी लता को दी। लता जी ने मरने तक उसे संभाल कर रखा था।

कुंदन लाल सहगल अपने चहेतों के बीच के. एल. सहगल के नाम से मशहूर थे। उनका जन्म 11 अप्रैल 1904 को जम्मू के नवाशहर में हुआ था। उनके पिता अमरचंद सहगल जम्मू शहर में न्यायालय के तहसीलदार थे। बचपन से ही सहगल का रुझान गीत-संगीत की ओर था। उनकी माँ केसरीबाई कौर धार्मिक क्रिया-कलापों के साथ-साथ संगीत में भी काफ़ी रुचि रखती थीं।

शिक्षा
सहगल ने किसी उस्ताद से संगीत की शिक्षा नहीं ली थी, लेकिन सबसे पहले उन्होंने संगीत के गुर एक सूफ़ी संत सलमान युसूफ से सीखे थे। सहगल की प्रारंभिक शिक्षा बहुत ही साधारण तरीके से हुई थी। उन्हें अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ देनी पड़ी थी और जीवन यापन के लिए उन्होंने रेलवे में टाईमकीपर की मामूली नौकरी भी की थी। बाद में उन्होंने रेमिंगटन नामक टाइपराइटिंग मशीन की कंपनी में सेल्समैन की नौकरी भी की।कहते हैं कि वे एक बार उस्ताद फैयाज ख़ाँ के पास तालीम हासिल करने की गरज से गए, तो उस्ताद ने उनसे कुछ गाने के लिए कहा। उन्होंने राग दरबारी में खयाल गाया, जिसे सुनकर उस्ताद ने गद्‌गद्‌ भाव से कहा कि बेटे मेरे पास ऐसा कुछ भी नहीं है कि जिसे सीखकर तुम और बड़े गायक बन सको।

पहली फ़िल्म
वर्ष 1930 में कोलकाता के न्यू थियेटर के बी. एन. सरकार ने उन्हें 200 रूपए मासिक पर अपने यहां काम करने का मौक़ा दिया। यहां उनकी मुलाकात संगीतकार आर.सी.बोराल से हुई, जो सहगल की प्रतिभा से काफ़ी प्रभावित हुए। शुरुआती दौर में बतौर अभिनेता वर्ष 1932 में प्रदर्शित एक उर्दू फ़िल्म ‘मोहब्बत के आंसू’ में उन्हें काम करने का मौक़ा मिला। वर्ष 1932 में ही बतौर कलाकार उनकी दो और फ़िल्में ‘सुबह का सितारा’ और ‘जिंदा लाश’ भी प्रदर्शित हुई, लेकिन इन फ़िल्मों से उन्हें कोई ख़ास पहचान नहीं मिली।

बतौर गायक
वर्ष 1933 में प्रदर्शित फ़िल्म ‘पुराण भगत’ की कामयाबी के बाद बतौर गायक सहगल कुछ हद तक फ़िल्म उद्योग में अपनी पहचान बनाने में सफल हो गए। वर्ष 1933 में ही प्रदर्शित फ़िल्म ‘यहूदी की लड़की’, ‘चंडीदास’ और ‘रूपलेखा’ जैसी फ़िल्मों की कामयाबी से उन्होंने दर्शकों का ध्यान अपनी गायकी और अदाकारी की ओर आकर्षित किया।

देवदास की कामयाबी

चट्टोपाध्याय के उपन्यास पर आधारित पी.सी.बरूआ निर्देशित फ़िल्म ‘देवदास’ की कामयाबी के बाद बतौर गायक-अभिनेता सहगल शोहरत की बुलंदियों पर जा पहुंचे। कई बंगाली फ़िल्मों के साथ-साथ न्यू थियेटर के लिए उन्होंने 1937 में ‘प्रेंसिडेंट’, 1938 में ‘साथी’ और ‘स्ट्रीट सिंगर’ तथा वर्ष 1940 में ‘ज़िंदगी’ जैसी कामयाब फ़िल्मों को अपनी गायिकी और अदाकारी से सजाया। वर्ष 1941 में सहगल मुंबई के रणजीत स्टूडियो से जुड़ गए। वर्ष 1942 में प्रदर्शित उनकी ‘सूरदास’ और 1943 में ‘तानसेन’ ने बॉक्स ऑफिस पर सफलता का नया इतिहास रचा। वर्ष 1944 में उन्होंने न्यू थियेटर की ही निर्मित फ़िल्म ‘मेरी बहन’ में भी काम किया।

मृत्यु
अपने दो दशक के सिने करियर में सहगल ने 36 फ़िल्मों में अभिनय भी किया। हिंदी फ़िल्मों के अलावा उन्होंने उर्दू, बंगाली और तमिल फ़िल्मों में भी अभिनय किया। सहगल ने अपने संपूर्ण सिने करियर के दौरान लगभग 185 गीत गाए, जिनमें 142 फ़िल्मी और 43 गैर-फ़िल्मी गीत शामिल हैं। अपनी दिलकश आवाज़ से सिने प्रेमियों के दिल पर राज करने वाले के.एल.सहगल 18 जनवरी, 1947 को केवल 43 वर्ष की उम्र में इस संसार को अलविदा कह गए।

मनीषा लाम्बा

#18jan
मिनीषा लाम्बा
🎂18जनवरी 1985एक भारतीय हिन्दी फ़िल्म अभिनेत्री है।
हिंदू हैं 
जीवनसाथी
रियान थाम 2015 से अबतक।
मिनीषा लाम्बा शेरवुड हाई स्कुल में पढ़ाई की और बाद में चेत्तीनाद विद्याश्रम चेन्नई में पढ़ी। 2004में उन्होंने अंग्रेज़ी में स्नातक डिग्री दिल्ली के मिरांडा हाउस से पुरी की।

लाम्बा की इच्छा पत्रकार बनने की थी। दिल्ली में अपनी डिग्री करते वक्त उन्हें एलजी, सोनी, कैडबरी, हाजमोला, एयरटेल, सनसिल्क आदि के विज्ञापनों में काम करने के प्रस्ताव मिले परन्तु वह कैडबरी का विज्ञापन था जिसने उन्हें प्रकाश्ज्योत में ला खड़ा किया। उन्हें बॉलीवुड निर्देशक शूजित सिरकार ने अपनी फ़िल्म यहाँ (२००५) के लिए निमंत्रित किया। उन्होंने इसे स्वीकार कर अभिनय क्षेत्र में यहाँ से कदम रखा। समीक्षकों ने उनके अभिनय को काफ़ी सराहा।

2008में उन्होंने सिद्धार्थ आनंद की फ़िल्म बचना ए हसीनो में बिपाशा बसु, दीपिका पदुकोने और रणबीर कपूर के साथ मुख्य भूमिका अदा की। इस फ़िल्म को यश राज फिल्म्स ने निर्मित किया था। उनका अगला मुख्य किरदार श्याम बेनेगल की फ़िल्म वेल डन अब्बा (2010) में था जिसकी कैनंस फ़िल्म समारोह में काफ़ी तारीफ की गई। उन्होंने कॉर्पोरेट, रॉकी: द रेबेल, अन्थोनी कौन है, हनीमून ट्रेवेल्स प्राइवेट लिमिटेड, अनामिका, शौर्य और दस कहानियाँ में सह सह-अदाकारा की भूमिका निभाई। उन्होंने मैक्सिम इण्डिया के लिए चित्र भी निकलवाया।

लाम्बा फिलहाल शिरीष कुंदर की जोकर में श्रेयस तलपदे के साथ भूमिका अदा की

दुलारी

#18april
#18jan 
दुलारी
अन्य नाम अम्बिका 

🎂जन्म 18 अप्रॅल, 1928
जन्म भूमि नागपुर, महाराष्ट्र
⚰️मृत्यु 18 जनवरी, 2013
मृत्यु स्थान मुम्बई, महाराष्ट्र

अभिभावक विट्ठलराव गौतम डाकतार
पति/पत्नी जगन्नाथ भीखाजी जगताप
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र हिन्दी सिनेमा
मुख्य फ़िल्में ‘रोटी’, 'शहनाई', ‘अलबेला’, 'पापी, ‘जीवन ज्योति’, देवदास, ‘आए दिन बहार के’, ‘पड़ोसन’, ‘आराधना’, ‘आया सावन झूम के’, ‘आन मिलो सजना’, ‘कारवां’, ‘सीता और गीता’, ‘हाथ की सफ़ाई’, ‘दीवार’, ‘प्रेम रोग’, ‘अगर तुम न होते’ आदि।
प्रसिद्धि अभिनेत्री
नागरिकता भारतीय
भारतीय सिनेमा की जानीमानी अभिनेत्री थीं। हिंदी सिनेमा में मां का ज़िक़्र होते ही दुर्गा खोटे, ललिता पवार, लीला चिटनिस, निरुपा रॉय, कामिनी कौशल और सुलोचना जैसी अभिनेत्रियों के चेहरे ज़हन में घूमने लगते हैं। इन तमाम अभिनेत्रियों की छवि भले ही फ़िल्मी मां की हो लेकिन हिंदी सिनेमा के सुनहरी दौर के दर्शक इस बात से वाक़िफ़ हैं कि इन सभी ने अपने कॅरियर की शुरुआत बतौर हिरोईन की थी और इनमें से कुछ का शुमार तो अपने दौर की कामयाब हिरोईनों में किया जाता था। इसी सूची में एक नाम है दुलारी का, जिन्हें आमतौर पर दर्शक एक सीधी-सादी और ग़रीब फ़िल्मी मां के तौर पर जानते हैं। दुलारी ने भी शुरुआती कुछ फ़िल्में बतौर हिरोईन और साईड हिरोईन की थीं और ‘आना मेरी जान मेरी जान संडे के संडे’ और ‘जवानी की रेल चली जाए’ जैसे ज़बर्दस्त हिट गीत भी दुलारी पर ही फ़िल्माए गए थे।
दुलारी जी के अनुसार, उनके पूर्वज पीढ़ियों पहले उत्तर प्रदेश के अवध क्षेत्र से आकर नागपुर में बस गए थे। अपने माता-पिता की दुलारी जी पहली संतान थीं और घर में उनसे छोटे दो भाई थे। यूँ तो दुलारी जी का नाम अम्बिका रखा गया था, लेकिन घर में उन्हें सब राजदुलारी कहकर पुकारते थे जो आगे चलकर सिर्फ़ ‘दुलारी’ रह गया। उनके पिता विट्ठलराव गौतम डाकतार विभाग में नौकरी करते थे, लेकिन अभिनय का उन्हें इतना शौक़ था कि अभिनेत्री अरुणा ईरानी के नाना की नाटक कंपनी जब नागपुर आई तो नौकरी छोड़कर वे उस कंपनी के साथ मुंबई आ गए। ये सन 1930 के दशक के शुरू का समय था।नेशनल स्टूडियो’ को सोहराब मोदी की कंपनी ‘मिनर्वा मूवीटोन’ ने ख़रीदा तो उन्होंने दुलारी जी को 7 साल के लिए नौकरी पर रखना चाहा। लेकिन कांट्रेक्ट की कुछ शर्तें मंज़ूर न होने की वजह से दुलारी जी ने उस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। ‘बॉम्बे टॉकीज़’ की फ़िल्म ‘हमारी बात’ में उन्होंने हीरो जयराज की छोटी बहन की भूमिका की तो ‘अमर पिक्चर्स’ की ‘आदाब अर्ज़’ में वे बतौर सहनायिका नज़र आयीं, जिसमें उनके हीरो गायक मुकेश थे। ये दोनों ही फ़िल्में साल 1943 में बनी थीं।
अगले क़रीब 35 सालों में दुलारी जी ‘जब प्यार किसी से होता है’, ‘मुझे जीने दो’ ‘अपने हुए पराए’ ‘आए दिन बहार के’, ‘अनुपमा’, ‘तीसरी क़सम’, ‘पड़ोसन’, ‘आराधना’, ‘आया सावन झूम के’, ‘चिराग़’, ‘इंतक़ाम’, ‘आन मिलो सजना’, ‘हीर रांझा’, ‘जॉनी मेरा नाम’, ‘कारवां’, ‘लाल पत्थर’, ‘बेईमान’, ‘सीता और गीता’, ‘राजा रानी’, ‘अमीर ग़रीब’, ‘हाथ की सफ़ाई’, ‘दीवार’, ‘दो जासूस’, ‘आहुती’, ‘गंगा की सौगंध’, ‘बीवी ओ बीवी’, ‘नसीब’, ‘रॉकी’, ‘प्रेम रोग’, ‘अगर तुम न होते’ और धर्माधिकारी जैसी क़रीब 135 फ़िल्मों में छोटी-बड़ी चरित्र भूमिकाओं में नज़र आयीं। और फिर एक रोज़ उन्होंने ख़ामोशी से फ़िल्मी दुनिया को अलविदा कह दिया।

दुलारी जी का कहना था, "बढ़ती उम्र के साथ बिगड़ती सेहत का असर मेरे काम पर भी पड़ने लगा था। साल 1989 में बनी फ़िल्म ‘सूर्या’ के एक सीन में मुझे 200 जूनियर आर्टिस्टों की भीड़ के साथ दौड़ना था। निर्देशक इस्माईल श्रॉफ़ के एक्शन कहते ही मैंने दौड़ना शुरू किया। लेकिन गठिया की बीमारी की वजह से मैं कुछ ही दूर जाकर गिर पड़ी। जूनियर आर्टिस्टों की भीड़ मेरे पीछे दौड़ी चली आ रही थी। अभिनेता सलीम ग़ौस ने, जो मेरे बेटे की भूमिका में थे, बहुत मुश्किल से मुझे कुचले जाने से बचाया, और इस प्रयास में उन्हें भी हल्की चोटें आयीं। ऐसे में मैंने रिटायरमेंट ले लेना ही बेहतर समझा। फिर कई साल बाद निर्देशक गुड्डू धनोवा के आग्रह पर उनकी फ़िल्म ‘ज़िद्दी’ में एक भूमिका की। इस तरह साल 1997 में रिलीज़ हुई ‘ज़िद्दी’ मेरी आख़िरी फ़िल्म साबित हुई।"
दुलारी जी के पति का निधन साल 1972 में हुआ। उनकी इकलौती बेटी की शादी हो चुकी थी। अभिनय से सन्यास लेने के बाद कुछ समय तो वे मुंबई में अकेली रहीं। फिर साल 2002 में अपनी बेटी के पास इंदौर चली गयीं। उनके ससुराल पक्ष के कई क़रीबी रिश्तेदार और उनकी सबसे अच्छी सहेली अभिनेत्री पूर्णिमा मुंबई में रहते हैं, इसलिए अक्सर उनका मुंबई आना-जाना होता रहता था। दुलारी जी पिछले काफ़ी समय से अल्ज़ाईमर की बीमारी से पीड़ित थीं और महाराष्ट्र के ही किसी शहर में वृद्धाश्रम में रह रही थीं। 85 साल की दुलारी जी को दिसंबर 2012 के आख़िरी सप्ताह में पूना के एक अस्पताल में आई.सी.यू. में दाख़िल कराया गया था, जहां 18 जनवरी, 2013 की सुबह क़रीब 10 बजे उनका देहांत हो गया।

माया गोविंद कवि

#17jan
#06april 
माया गोविंद
 (🎂17 जनवरी 1940 -⚰️06 अप्रैल 2022) 
एक भारतीय गीतकार थे जिन्होंने कई बॉलीवुड फिल्मों के लिए गीत लिखे। उन्होंने "मेरा पिया घर आया", "गेले में लाल ताई", "मैंने पायल है छनकायी", "मैं खिलाड़ी तू अनाड़ी", "आंखों में बसे हो तुम" आदि जैसे लोकप्रिय गीत लिखे थे। उन्होंने आरोप(1974), में खिलाड़ी तू अनाड़ी (1994), टक्कर(1995), याराना (1995), हम तुम्हारे है सनम(2001) आदि फिल्मों में गीत लिखे। उन्होंने 800 से अधिक गाने लिखे हैं। 
🎂जन्म17 जनवरी 1940
⚰️मृत्यु 06 अप्रैल 2022 
हिन्दी सिनेमा में गीतलेखन के क्षेत्र में हमेशा से ही पुरूषों का एकाधिकार रहा है, हालांकि अपवाद के तौर पर कभी कभार महिलाएं भी इस विधा में हाथ आज़माती रहीं| जैसे साल 1936 की फिल्म ‘मैडम फैशन’ में फ़िल्म की निर्मात्री-निर्देशिका-संगीतकार जद्दनबाई या 1958 की फ़िल्म ‘सम्राट चन्द्रगुप्त’ में फ़िल्म की नायिका निरूपा रॉय, या फिर सरोज मोहिनी नैयर, पद्मा सचदेव, रानी मलिक, कौसर मुनीर| ये सभी महिलाएं समय समय पर अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज ज़रूर कराती आयीं लेकिन गीतलेखन की मुख्यधारा में वो कभी भी शामिल नहीं हो पायीं| लेकिन इन सभी के बीच एक नाम ऐसा है जिन्होंने न सिर्फ़ इस क्षेत्र में पुरूषों के वर्चस्व को तोड़ा बल्कि लम्बे समय तक अपना एक सम्मानजनक स्थान भी बनाए रखा| और वो नाम है श्रीमती माया गोविन्द का|

17 जनवरी 1940 को लखनऊ के एक खत्री परिवार में जन्मीं माया जी के पिता श्री हरनाथ वहाल कपड़े के कारोबारी थे| माता पिता की 3 बेटियों में माया जी सबसे बड़ी थीं| वो बताती हैं, “हमारा सरनेम मूलत: ‘बहल’ था जो आगे चलकर वहाल हो गया था| पिताजी का कारोबार अच्छा चल रहा था लेकिन अचानक ही उनकी आंखों की रोशनी चली गयी| हम तीनों बहनें बहुत छोटी थीं| मां एक सीधीसादी गृहिणी थीं| हममें से कोई भी ऐसा नहीं था जो घर-व्यापार को संभाल सके| ऐसे में हमारी सभी 3-4 दुकानों और बंगले पर पिताजी के भाईयों ने कब्ज़ा कर लिया| और हम किराए के मकान में रहने पर मजबूर हो गए|” 

माया जी 5 साल की हुईं तो उनके पिता गुज़र गए| नतीजतन घर के माली हालात और भी बदतर होते चले गए| ऐसे में माया जी की मां के मामा मदद के लिए आगे आये| माया जी बताती हैं, “मां के मामा की दी गयी ढाई सौ रूपये महीने की मदद से हम तीनों बहनें पलींबढ़ी| मैंने वैदिक कन्या पाठशाला से 12वीं करने के बाद महिला कॉलेज से बी.ए. किया और फिर बी.एड. में दाखिला ले लिया| बी.एड. के पहले साल में थी कि मेरी शादी प्रयागराज (तत्कालीन इलाहाबाद) में कर दी गयी| लेकिन उस घर में एक एक दिन बिताना मेरे लिए मुश्किल हो गया| बहुत ही अजीब सा परिवार था| संस्कारों, संस्कृति, साहित्य, संगीत, कला से किसी का कोई रिश्ता नहीं| पीना-पिलाना, रात को देर से घर लौटना, बात बात में गाली गलौज, मारपीट| नतीजतन मैं तीन महीने में ही मां के घर वापस लौट आयी|”

लखनऊ लौटकर माया जी ने बी.एड. के साथ साथ भातखंडे संगीत विद्यालय से 4 साल का संगीत का कोर्स किया| शम्भू महाराज से एक साल कत्थक सीखा| लखनऊ रेडियो की स्टाफ़ आर्टिस्ट के तौर पर कई रेडियो नाटक किये| ‘बाल विद्या मंदिर’ में पढ़ाने लगीं| साथ ही लखनऊ के मशहूर रंगकर्मी कुंवर कल्याण सिंह के नाटकों में भी काम करने लगीं| माया जी बताती हैं, “11-12 साल की उम्र से मैं कविताएं भी लिखने लगी थी| साल 1966 में हमारे स्कूल में अभिनेता भारत भूषण और उनके निर्माता-निर्देशक भाई आर.चंद्रा (रमेश चन्द्र) आए| आर.चंद्रा ने नीरज को अलीगढ़ से बुलाकर फ़िल्म ‘नयी उमर की नयी फ़सल’ के गीत लिखवाए थे| साल 1966 में रिलीज़ हुई इस फ़िल्म से नीरज ने डेब्यू किया था| आर.चंद्रा ने मेरी कविताएं सुनीं जो उन्हें बहुत पसंद आयीं| उन्होंने उसी वक़्त मुझे तीन फिल्मों ‘मेघ मल्हार’, ‘मुशायरा’ और ‘बाप बेटे’ के लिए साईन कर लिया|” 

कुछ समय बाद आर.चंद्रा के बुलावे पर माया जी मुम्बई आयीं| उन्होंने फिल्म ‘मुशायरा’ के लिए 11 गाने लिखे और फिर वापस लखनऊ चली गयीं| इस फ़िल्म में खैयाम का संगीत था| माया जी के लखनऊ लौटने के बाद आशा भोंसले की आवाज़ में इस फ़िल्म के दो मुजरागीत रिकॉर्ड भी हुए| वो गीत थे, ‘सारी रतिया मचावे उत्पात सिपहिया सोने न दे, हाए अम्मा’ और ‘हमें हुक्म था ग़म उठाना पड़ेगा, इसी ज़िद पे हमने जवानी लुटा दी’|  लेकिन तभी अचानक आर.चंद्रा गुज़र गए और तीनों ही फ़िल्में बंद हो गयीं| आगे चलकर आर.चंद्रा के निर्माता बेटे राकेश चंद्रा ने ये दोनों गीत साल 1975 में बनी फ़िल्म ‘मुट्ठी भर चावल’ में इस्तेमाल किये|  

साल 1965-66 में माया जी राम गोविन्द जी के संपर्क में आयीं| समस्तीपुर बिहार के रहने वाले मशहूर लेखक-रंगकर्मी राम गोविन्द जी, जिनका असली नाम गोविन्द अरोड़ा है, अपने नाटकों की मुख्य भूमिका के लिए एक अभिनेत्री की तलाश में थे और इसी सिलसिले में वो लखनऊ आकर माया जी से मिले थे| माया जी ने समस्तीपुर जाकर नाटक में काम किया, राम गोविन्द जी के साथ उनकी दोस्ती हुई, नाटक के बाद राम गोविन्द जी उन्हें छोड़ने लखनऊ आए और फिर लखनऊ के ही होकर रह गए| 1967 में राम गोविन्द जी ने माया जी से शादी कर ली| उन दोनों ने मिलकर लखनऊ की ख्यातिप्राप्त नाट्यसंस्था ‘दर्पण’ की नींव रखी और 1968-69 में इस बैनर के तहत पहला नाटक ‘ख़ामोश अदालत जारी है’ किया| नाटकों से चूल्हा जलना मुश्किल था| रेडियो कार्यक्रमों से माया जी की जो थोड़ी बहुत आय होती थी उसी से गुज़ारा चलता था|

माया जी बताती हैं, “बतौर कवियित्री मेरी ख़ासी पहचान बन चुकी थी| प्रख्यात कवि रामरिख मनहर मुझे अक्सर कवि सम्मेलनों में भाग लेने के लिए आमंत्रित करते थे| 1972 में उन्होंने मुझे मुम्बई में होने वाले कवि सम्मलेन के लिए बुलाया जहां दर्शकों में रामानंद सागर भी शामिल थे| मैंने काव्यपाठ किया जो सबको बेहद पसंद आया| रामरिख मनहर ने मुझे ‘राजश्री प्रोडक्शंस‘ के मालिक ताराचंद बड़जात्या और उनके बेटे राजकुमार बड़जात्या से मिलवाया| उन्होंने प्राइवेट अल्बम के लिए मेरी तीन कविताएं रिकॉर्ड कीं| फिर उन्होंने कवियों और कविताओं पर ढाई घंटे की एक फ़िल्म ‘कवि सम्मेलन’ बनाई जिसमें मुझे भी शामिल किया गया| उसमें मैंने कविता पढ़ी थी, ‘तुम एक बार प्रिय आ जाओ तो आंचलभर सुहाग ओढूं’| उधर रामानंद सागर ने मुझसे फ़िल्म ‘जलते बदन’ में चारों गाने लिखवाए| ये फ़िल्म साल 1973 में रिलीज़ हुई थी|”

रामानंद सागर की फ़िल्म ‘गीत’ (1970) की सिल्वर जुबली पार्टी में माया जी और राम गोविन्द जी की मुलाक़ात गुरूदत्त के भाई आत्माराम से हुई| गुरूदत्त की मृत्यु के बाद ‘गुरूदत्त फ़िल्म्स’ की कमान आत्माराम ने संभाल ली थी| उस बैनर में उन्होंने फ़िल्म ‘शिकार’ (1968) बनाई और फिर बैनर का नाम बदलकर ‘गुरूदत्त फ़िल्म्स कम्बाईन’ कर दिया था| ‘गुरूदत्त फ़िल्म्स कम्बाईन’ के बैनर में ‘चन्दा और बिजली’ (1969), ‘उमंग’ (1970), ‘मेमसाब’ (1972) और ‘ये गुलिस्तां हमारा’ (1972) जैसी कुछ फ़िल्में बनाने के बाद आत्माराम अब फ़िल्म ‘आरोप’ बनाने जा रहे थे| उन्होंने माया जी को इस फ़िल्म के गीत और राम गोविन्द जी को पटकथा लिखने के लिए साईन कर लिया| फ़िल्म ‘आरोप’ साल 1974 की कामयाब फ़िल्मों में से थी| भूपेन हज़ारिका द्वारा संगीतबद्ध इस फ़िल्म के तमाम गीत भी हिट हुए थे|

गोविन्द दंपत्ति ने शुरू के 5 महीने पाली हिल पर (स्व.) गुरूदत्त के फ्लैट में गुज़ारे जहां भूपेन हज़ारिका उनके बगल के कमरे में रहते थे| फिर उन्होंने पाली हिल छोड़कर रोड नम्बर 9 जुहू स्कीम पर किराये का मकान ले लिया| और फिर जल्द ही दोनों ने अपने अपने क्षेत्र में अपनी एक मज़बूत स्थिति बना ली| माया जी बताती हैं, “किराये के उस मकान में हम कुछ साल रहे| उस बीच रोड नम्बर 8 स्थित ‘लोखंडवाला बिल्डर्स’ की मोनालिसा बिल्डिंग में हमने 2 बेडरूम फ्लैट बुक करा लिया था| फ्लैट तैयार हुआ तो बिल्डर सिराज भाई ने वो फ्लैट देने से ये कहते हुए इनकार कर दिया कि मैं आपको 3 बेडरूम वाला फ्लैट दूंगा, बस शर्त ये है कि मेरे लिए आपको एक कवि सम्मेलन करना होगा| हमने सम्मेलन की तैयारी की| स्मारिका के लिए मिले विज्ञापनों से 1.25 लाख रूपये जमा हुए| सिराज भाई ने हमसे मात्र 90 हज़ार रूपये लिए और जुहू स्कीम के एन.एस. रोड नम्बर 10 पर 3 बेडरूम वाला ये फ्लैट हमारे नाम कर दिया| ये साल 1980 की बात है| तब से आज तक यही घर हमारा आशियाना बना हुआ है|”

तोहफ़ा मोहब्बत का’ के बाद माया जी और रामगोविंद जी ने गोविंदा, जीतेंद्र, जयाप्रदा को लेकर फ़िल्म ‘तांडव’ का निर्माण शुरू किया था| लेकिन हालात कुछ ऐसे बने कि 13 रील बन जाने के बावजूद वो फ़िल्म पूरी नहीं हो पायी| इससे हुए आर्थिक नुकसान की वजह से गोविन्द दम्पत्ति को अपना बैनर ‘बहार पिक्चर्स’ हमेशा के लिए बंद कर देना पड़ा| लेकिन बतौर गीतकार माया जी के करियर ने अपनी ऊंचाईयां बनाए रखीं| उनकी अभी तक की आख़िरी फ़िल्म ‘बाज़ार-ए-हुस्न’ साल 2014 में रिलीज़ हुई थी| इस फिल्म के संगीतकार खैयाम थे| चार दशकों के अपने करियर में उन्होंने दर्जनों हिट गीत लिखे जैसे – 
वादा भूल न जाना’ (जलते बदन), ‘नैनों में दर्पण है’ (आरोप), ‘यहां कौन है असली कौन है नक़ली, ये तो राम जाने’ (क़ैद), ‘तेरी मेरी प्रेम कहानी किताबों में भी न मिलेगी’ (पिघलता आसमान), ‘कजरे की बाती अंसुअन के तेल में’ (सावन को आने दो), ‘चार दिन की ज़िंदगी है’ (एक बार कहो), ‘लो हम आ गए हैं फिर तेरे दर पर’ (खंज़र’), ‘मोरे घर आए सजनवा’ (ईमानदार), ‘ठहरे हुए पानी में कंकर न मार सांवरे’ (दलाल), ‘दरवज्जा खुल्ला छोड़ आयी नींद के मारे’ (नाजायज़), ‘प्रेम का ग्रन्थ पढ़ाओ सजनवा’ (तोहफ़ा मोहब्बत का), ‘आंखों में बसे हो तुम तुम्हें दिल में छुपा लूंगा’ (टक्कर), ‘शुभ घड़ी आयी रे’ (रज़िया सुल्तान), ‘हम दोनों हैं अलग अलग हम दोनों हैं जुदा जुदा’ (मैं खिलाड़ी तू अनाड़ी), ‘चन्दा देखे चन्दा तो चन्दा शरमाए’ (झूठी), ‘मेरी पायल बोले छम...छमछम’ (गजगामिनी), ‘मुझे ज़िन्दगी की दुआ न दे’ (गलियों का बादशाह), डैडी कूल कूल कूल’ (चाहत) और ‘देखो कान्हा नहीं मानत बतियां’ (पायल की झंकार)|

साल 1993 में रिलीज़ हुई फ़िल्म ‘दलाल’ के गीत ‘गुटुर गुटुर अरे चढ़ गया ऊपर रे अटरिया पे लोटन कबूतर’ को लेकर माया जी पर अश्लील लेखन के आरोप लगे थे| इस विवाद ने लम्बे अरसे तक उनका पीछा नहीं छोड़ा था| क़रीब 15 साल पहले साप्ताहिक ‘सहारा समय’ (हिन्दी) के अपने कॉलम ‘बाकलम ख़ुद’ के लिए हुई बातचीत के दौरान जब मैंने माया जी से इस गीत के बारे में बात करनी चाही तो उन्होंने खीझे हुए स्वर में कहा था, “लोटन कबूतर तो तुम्हें याद रहा, ‘देखो कान्हा नहीं मानत बतियां’ के बारे में क्या कहोगे? वो भी मेरा ही लिखा हुआ है|” उनकी बात सुनकर मुझे ख़ामोश हो जाना पड़ा था| इस बार जब मैंने उन्हें ये वाकया याद दिलाया तो उन्होंने कहा, “उस गीत को लेकर हो रही आलोचनाओं से मैं बहुत तंग आ गयी थी| मेरे लिखे अच्छे और काव्यात्मक गीत कोई याद ही नहीं करना चाहता था| लोगों की प्रतिक्रिया सुनकर ऐसा लगने लगा था जैसे उस एक गीत ने मेरी तमाम स्तरीय रचनाओं पर पानी फेर दिया हो| जबकि उस गीत के बोलों में कुछ भी अश्लील नहीं था| रहा सवाल गीत के पिक्चराईज़ेशन का, तो क्या उसके लिए मैं ज़िम्मेदार हूं|”

माया जी की बात सौ फ़ीसदी सही थी| उत्तर भारत में तो शादीब्याह के अवसर पर मस्ती और छेड़छाड़भरे ऐसे लोकगीत गाये जाने का प्रचलन बेहद आम है| अगर हम ‘लोटन कबूतर’ के पिक्चराईज़ेशन को नज़रअंदाज़ करके सिर्फ़ इसके बोलों पर गौर करें तो ये भी एक मस्ती और छेड़छाड़भरा आम लोकगीत सा ही नज़र आएगा|

उनके 11 काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं| साथ ही वो ‘फ़िल्म जर्नलिस्ट अवार्ड (उत्तर प्रदेश)’, राष्ट्रभाषा परिषद (मुम्बई) का ‘महादेवी वर्मा पुरस्कार’, सुरसिंगार परिषद का ‘स्वामी हरिदास पुरस्कार’, ‘उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान’,  भारती प्रसार परिषद का ‘गौरव भारती पुरस्कार’, महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी का ‘छत्रपति शिवाजी राष्ट्रीय एकता पुरस्कार’ जैसे दर्जनों सम्मान भी हासिल कर चुकी हैं उनके परिवार में पति राम गोविन्द जी के अलावा इंजीनियर बेटा, बहू , एक पोता और एक पोती शामिल हैं|

06 अप्रैल 2022 को 82 वर्ष की आयु में दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया।

मनुस्मृति

. ................मनुस्मृति.................... जरा सोचिए, अगर आज भारत का कानून यह तय कर दे कि— "एक आम आदमी चोरी करे तो उसे...