मंगलवार, 16 जनवरी 2024

सुचित्रा सेन

#17jan 
#06april
सुचित्रा सेन

🎂जन्म 06 अप्रैल, 1931
जन्म भूमि पबना ज़िला, बंगाल (अब बांग्लादेश)
⚰️मृत्यु 17 जनवरी 2014
मृत्यु स्थान कोलकाता, पश्चिम बंगाल

अभिभावक करुणामॉय दासगुप्ता
संतान पुत्री- मुनमुन सेन
कर्म भूमि मुम्बई, कोलकाता
कर्म-क्षेत्र फ़िल्म अभिनेत्री
मुख्य फ़िल्में 'सात पाके बांधा' (बांग्ला), देवदास, आंधी, ममता, 'दीप जवेले जाई' (बांग्ला) आदि।
पुरस्कार-उपाधि पद्मश्री, बंगो बिभूषण
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी सुचित्रा सेन प्रथम भारतीय अभिनेत्री थीं, जिनको किसी अंतर्राष्ट्रीय चलचित्र महोत्सव में पुरस्कार प्रदान किया गया। उन्होंने 1963 के मॉस्को फ़िल्म फेस्टिवल में अपनी फ़िल्म 'सात पाके बांधा' के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार जीता था।
सुचित्रा सेन
सुचित्रा सेन का जन्म 6 अप्रैल, 1931 को बंगाल के पबना ज़िले में हुआ था, जो अब बांग्लादेश में है। सुचित्रा के पिता करुणामॉय दासगुप्ता एक स्थानीय स्कूल में हेड मास्टर थे। यह भी अजीब विडंबना रही कि सुचित्रा की पहली फ़िल्म 'शेष कथाय (बंगाली)' कभी रिलीज ही नहीं हुई।

कैरियर
सुचित्रा सेन ने अपने कैरियर की शुरुआत 1952 में बंगाली फ़िल्म 'शेष कोठई' से की थी। उन्हें 1955 में बिमल राय की हिन्दी फ़िल्म 'देवदास' में उन्होंने 'पारो' की भूमिका निभाई थी। इसमें उनके साथ दिलीप कुमार थे। दिग्गज अभिनेता उत्तम कुमार और सुचित्रा सेन की जोड़ी को कोई नहीं भुला सकता। दोनों ने 1953 से लेकर 1975 तक 30 फ़िल्मों में साथ काम किया। 1959 की बंगाली फ़िल्म 'दीप जवेले जाई' को सुचित्रा की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्मों में गिना जाता है। 
1975 की फ़िल्म 'आंधी' में सुचित्रा का रोल इंदिरा गांधी से प्रेरित बताया गया था। सुचित्रा ने इतना जबरदस्त अभिनय किया था कि उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के लिए नामित किया गया था। हालांकि सुचित्रा तो सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री नहीं चुनी गई, लेकिन फ़िल्म के उनके साथी कलाकार संजीव कुमार सर्वश्रेष्ठ अभिनेता ज़रूर बन गए। उनकी बेटी मुनमुन सेन भी माँ के नक्शे कदम पर चलते हुए बंगाली फ़िल्मों के साथ हिंदी फ़िल्मों में भी आई। लगभग 25 साल के अभियन कैरियर के बाद उन्होंने 1978 में बड़े पर्दे से ऐसी दूरी बनाई कि उन्होंने लाइमलाइट से खुद को बिल्कुल अलग कर लिया।
बंगाली सिनेमा की 'दिलों की रानी'
सुचित्रा सेन बंगाली सिनेमा की एक ऐसी हस्ती थीं, जिन्होंने अपनी अलौकिक सुंदरता और बेहतरीन अभिनय के दम पर लगभग तीन दशक तक दर्शकों के दिलों पर राज किया और 'अग्निपरीक्षा', 'देवदास' तथा 'सात पाके बंधा' जैसी यादगार फ़िल्में कीं। हिरणी जैसी आंखों वाली सुचित्रा 1970 के दशक के अंत में फ़िल्म जगत को छोड़कर एकांत जीवन जीने लगीं। उनकी तुलना अक्सर हॉलीवुड की ग्रेटा गाबरे से की जाती थी, जिन्होंने लोगों से मिलना-जुलना छोड़ दिया था। कानन देवी के बाद बंगाली सिनेमा की कोई अन्य नायिका सुचित्रा की तरह प्रसिद्धि हासिल नहीं कर पाई। श्वेत-श्याम फ़िल्मों के युग में सुचित्रा के जबर्दस्त अभिनय ने उन्हें दर्शकों के दिलों की रानी बना दिया था। उनकी प्रसिद्धि का आलम यह था कि दुर्गा पूजा के दौरान देवी लक्ष्मी और सरस्वती की प्रतिमाओं के चेहरे सुचित्रा के चेहरे की तरह बनाए जाते थे।

सुचित्रा सेन का शुक्रवार 17 जनवरी 2014 को 82 साल की उम्र में दिल का दौरा पड़ने से कोलकाता के एक अस्पताल में निधन हो गया। सुचित्रा सेन मधुमेह नामक रोग से पीड़ित थीं।

अक्कीनेनी लक्ष्मी वारा प्रसाद रावप्रसिद्ध नाम एल. वी. प्रसाद🎂जन्म 17 जनवरी, 1908जन्म भूमि इलुरु तालुका, आन्ध्र प्रदेश⚰️मृत्यु 22 जून, 1994

#17jan
#22jun 
अक्कीनेनी लक्ष्मी वारा प्रसाद राव
प्रसिद्ध नाम एल. वी. प्रसाद

🎂जन्म 17 जनवरी, 1908
जन्म भूमि इलुरु तालुका, आन्ध्र प्रदेश
⚰️मृत्यु 22 जून, 1994

अभिभावक अक्कीनेनी श्रीरामुलु और बासवम्मा
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र फ़िल्म निर्माता-निर्देशक
मुख्य फ़िल्में 'आलम आरा', 'कालीदास', 'भक्त प्रह्लाद', 'हमराही', 'खिलौना', 'मेरा घर मेरे बच्चे', 'विदाई', 'एक दूजे के लिए', 'शारदा' और 'छोटी बहन' आदि।
पुरस्कार-उपाधि 'दादा साहब फाल्के पुरस्कार' (1982), 'फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड'
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी एल. वी. प्रसाद की फ़िल्म 'छोटी बहन' में लता मंगेशकर द्वारा गाया गया का गीत "भइया मेरे राखी के बंधन को निभाना" बेहद लोकप्रिय हुआ था।
एल. वी. प्रसाद का जन्म 17 जनवरी, 1908 को आन्ध्र प्रदेश के इलुरु तालुका में एक किसान परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम अक्कीनेनी श्रीरामुलु और माता बासवम्मा थीं। एल. वी. प्रसाद का लालन-पालन बहुत ही लाड़-प्यार के साथ हुआ था। वे प्रारम्भ से ही बहुत बुद्धिमान थे, किंतु उनका पढ़ाई में ध्यान बिल्कुल भी नहीं लगता था। कम उम्र में ही वे नाटकों और नृत्य मंडलियों की ओर आकर्षित हो गए थे। इन्हीं सपनों को लेकर वे एक दिन घर छोड़कर मुंबई चले आये। लेकिन उनका ये सफर आसान नहीं रहा और उन्हें तमाम तरह की मुसीबतों का सामना करना पड़ा। दृढ़ निश्चयी एल. वी. प्रसाद ने हार नहीं मानी और अंतत: सफलता ने उनके कदम चूमे।

फ़िल्मी शुरुआत
एल. वी. प्रसाद ने भारत की तीन भाषाओं की पहली बोलती फ़िल्मों में काम किया। उन्होंने वर्ष 1931 में प्रदर्शित आर्देशिर ईरानी की फ़िल्म 'आलम आरा' के अतिरिक्त 'कालिदास' और 'भक्त प्रह्लाद' में काम किया। 'आलम आरा' जहाँ हिन्दी की पहली बोलती फ़िल्म थी, वहीं 'कालिदास' पहली तमिल भाषा की बोलती फ़िल्म थी और 'भक्त प्रह्लाद' पहली तेलुगु बोलती फ़िल्म थी।

प्रसिद्ध कलाकारों के साथ कार्य

एल. वी. प्रसाद ने हिन्दी भाषा में कई चर्चित फ़िल्में बनाईं। इन फ़िल्मों में 'शारदा', 'छोटी बहन', 'बेटी बेटे', 'दादी माँ', 'शादी के बाद', 'हमराही', 'मिलन', 'राजा और रंक', 'खिलौना', 'एक दूजे के लिए' आदि शामिल हैं। उनकी फ़िल्में प्राय: सामाजिक उद्देश्यों के साथ स्वस्थ मनोरंजन पर केंद्रित हुआ करती थीं। उन्होंने प्रसिद्ध कलाकारों राज कपूर, मीना कुमारी, संजीव कुमार, कमल हासन, राजेंद्र कुमार, सुनील दत्त, अशोक कुमार, शत्रुघ्न सिन्हा, शशि कपूर, प्राण, मुमताज और राखी जैसे बड़े सितारों के साथ काम किया।

महमूद की हास्य भूमिका
वर्ष 1961 में एल. वी. प्रसाद की फ़िल्म 'ससुराल' से अभिनेता महमूद पूरी तरह कॉमेडियन बन गए। वे अब अधिकांश फ़िल्मों में हास्य भूमिका ही निभाने लगे थे। राजेंद्र कुमार और वी. सरोजा देवी अभिनीत इस फ़िल्म में उनके अपोजिट शुभा खोटे थीं। शुभा खोटे के साथ महमूद की जोड़ी बहुत हिट हुई। यह जोड़ी बाद में फ़िल्म 'दिल तेरा दीवाना', 'गोदान', 'हमराही', 'गृहस्थी', 'भरोसा', 'जिद्दी' और 'लव इन टोकियो' जैसी अनेक फ़िल्मों में भी आई।

फ़िल्म 'छोटी बहन'
निर्माता एल. वी. प्रसाद की वर्ष 1959 में प्रदर्शित फ़िल्म 'छोटी बहन' संभवत: पहली फ़िल्म थी, जिसमें भाई और बहन के प्यार भरे अटूट रिश्ते को रूपहले परदे पर दिखाया गया था। इस फ़िल्म में बलराज साहनी ने बड़े भाई और अभिनेत्री नन्दा ने छोटी बहन की भूमिका निभायी थी। इस फ़िल्म में शैलेन्द्र का लिखा और लता मंगेशकर द्वारा गाया का गीत "भइया मेरे राखी के बंधन को निभाना" बेहद लोकप्रिय हुआ था। रक्षा बंधन के गीतों में इस गीत का विशिष्ट स्थान आज भी बरकरार है। इसके बाद निर्माता-निर्देशक ए. भीम सिंह ने भाई-बहन के रिश्ते पर आधारित दो और फ़िल्में 'राखी' और 'भाई-बहन' बनायी। वर्ष 1962 में प्रदर्शित फ़िल्म 'राखी' में अशोक कुमार और वहीदा रहमान ने भाई-बहन की भूमिका निभायी थी।

पुरस्कार व सम्मान
जीवन के अंतिम दौर तक सार्वजनिक रूप से सक्रिय रहे एल. वी. प्रसाद को कई प्रतिष्ठित सम्मानों से भी नवाजा गया था। उन्हें फ़िल्मों में विशेष योगदान के लिए देश का सर्वोच्च सम्मान "दादा साहब फाल्के पुरस्कार" वर्ष 1982 में प्रदान किया गया था। इसके अतिरिक्त फ़िल्म 'खिलौना' के लिए उन्हें 'फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड' भी दिया गया।

निधन
भारतीय सिनेमा में विशिष्ट योगदान देने वाले एल. वी. प्रसाद का निधन 22 जून, 1994 हुआ। प्रसाद जी ऐसे फ़िल्मकार के रूप में प्रसिद्ध थे, जो एक ही साथ कई विभिन्न भाषाओं में फ़िल्म बनाते रहे। उनकी फ़िल्मों में जहाँ कहानी और संवाद पर विशेष तौर पर काम किया जाता था, वहीं संगीत पक्ष पर भी काफ़ी जोर दिया जाता था। उनकी फ़िल्मों के कई गीत अब भी काफ़ी लोकप्रिय हैं।

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एल. वी. प्रसाद ने एक निर्माता-निर्देशक होने के साथ-साथ कई फ़िल्मों में बतौर अभिनेता भी कार्य किया था। कुछ फ़िल्मों के नाम निम्नलिखित हैं-

बतौर अभिनेता

आलम आरा 1931 
भक्त प्रह्लाद 1931
कालीदास 1931 
सीता स्वयंवर 1933
बोंडम पेल्ली 1940 
चडुवुकुन्ना भार्या 1940
राजा पारवई 1982 

बतौर निर्देशक

ससुराल 1961 
हमराही 1963
मिलन 1967 
राजा और रंक 1968
खिलौना 1970 
उधार का सिन्दूर 1976
ये कैसा इंसाफ 1980 
एक दूजे के लिए 1981
मेरा घर मेरे बच्चे 1985 
स्वाती 1986
बिदाई 1990 
अर्चना 1993
नागपंचमी 1994
 सन्ध्याधरा 1994
मयर कथा 1996 
सुनापुआ 1996

बतौर निर्माता और निर्देशक

शारदा 1957 
छोटी बहन 1957
बेटी बेटे 1964
 दादी माँ 1966
जीने की राह 1969 
शादी के बाद 1972
बिदाई 1974
 जय विजय 1977

कमाल अमरोही

#17jan 
#11feb 
सैयद आमिर हैदर कमाल अमरोही
प्रसिद्ध नाम कमाल अमरोही
जन्म 17 जनवरी, 1918
जन्म भूमि अमरोहा, उत्तर प्रदेश
मृत्यु 11 फरवरी, 1993
पति/पत्नी तीन (बानो, महमूदी, मीना कुमारी)
संतान शानदार, ताज़दार और रुख़सार
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र गीतकार, पटकथा और संवाद लेखक तथा निर्माता एवं निर्देशक
मुख्य फ़िल्में 'महल', 'पाकीज़ा' और 'रज़िया सुल्तान' आदि।
पुरस्कार-उपाधि फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ संवाद पुरस्कार: मुग़ल-ए-आजम
विशेष योगदान कमाल अमरोही ने 1953 में 'कमाल पिक्चर्स' और 1958 में कमालिस्तान स्टूडियो की स्थापना की।
नागरिकता भारतीय
महल, पाकीज़ा और रज़िया सुल्तान जैसी भव्य कलात्मक फ़िल्मों को परदे पर काव्य की रचना करने वाले निर्माता-निर्देशक थे। कमाल अमरोही ने बेहतरीन गीतकार, पटकथा और संवाद लेखक तथा निर्माता एवं निर्देशक के रूप में भारतीय सिनेमा पर अपनी अमिट छाप छोड़ी और उसे एक दिशा देने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। पाकीज़ा उनकी ज़िंदगी का ड्रीम प्रोजेक्ट थी। अपने फ़िल्मी जीवन के आखिरी दौर में वह 'अंतिम मुग़ल' नाम से फ़िल्म बनाना चाहते थे, लेकिन उनका यह ख्वाब अधूरा ही रह गया।
कमाल अमरोही का मूल नाम 'सैयद आमिर हैदर' था। 17 जनवरी 1918 को उत्तर प्रदेश के अमरोहा के ज़मींदार परिवार में जन्मे कमाल अमरोही के मुम्बई तक पहुँचने और फिर सफलता का इतिहास रचने की कहानी किसी फ़िल्मी कहानी की भाँति है। बचपन में अपनी शरारतों से वह पूरे गाँव को परेशान करते थे। एक बार अपनी अम्मी के डाँटने पर उन्होंने वादा किया कि वह एक दिन मशहूर होंगे और उनके पल्लू को चाँदी के सिक्कों से भर देंगे। उनकी शरारतों से तंग होकर एक दिन उनके बड़े भाई ने उन्हें गुस्से में थप्पड़ रसीद कर दिया तो कमाल अमरोही नाराज़गी में घर से भागकर लाहौर पहुँच गए।

कमाल अमरोही के लिए लाहौर उनके जीवन की दिशा बदलने वाला साबित हुआ। वहाँ उन्होंने 'प्राच्य भाषाओं' में मास्टर की डिग्री हासिल की और फिर एक उर्दू समाचार पत्र में मात्र 18 वर्ष की आयु में ही नियमित रूप से स्तम्भ लिखने लगे। उनकी प्रतिभा का सम्मान करते हुए अख़बार के सम्पादक ने उनका वेतन बढाकर 300 रुपए मासिक कर दिया, जो उस समय क़ाफी बड़ी रकम थी।

कलकत्ता में

अख़बार में कुछ समय तक काम करने के बाद वह कलकत्ता चले गए और फिर वहाँ से मुम्बई आ गए। लाहौर में उनकी मुलाक़ात प्रसिद्ध गायक, अभिनेता कुन्दनलाल सहगल से हुई थी, जो उनकी प्रतिभा को पहचानकर उन्हें फ़िल्मों में काम करने के लिए 'मिनर्वा मूवीटोन' के मालिक निर्माता-निर्देशक सोहराब मोदी के पास ले गये। इसी समय उनकी एक लघु कथा ‘सपनों का महल’ से निर्माता-निर्देशक और कहानीकार 'ख़्वाजा अहमद अब्बास' प्रभावित हुए।

वैवाहिक जीवन

कमाल अमरोही ने तीन शादियां कीं। उनकी पहली बीवी का नाम 'बानो' था, जो नर्गिस की माँ जद्दनबाई की नौकरानी थी। बानो की अस्थमा से मौत होने के बाद उन्होंने 'महमूदी' से निकाह किया। कमाल अमरोही ने तीसरी शादी अभिनेत्री मीना कुमारी से की जो उनसे उम्र में लगभग पंद्रह साल छोटी थीं। दोनों की मुलाकात एक फ़िल्म के सेट पर हुई थी और उनके बीच प्यार हो गया। उस समय कमाल अमरोही 34 साल के थे जबकि मीना कुमारी की उम्र 19 साल थी। 1952 में दोनों ने विवाह कर लिया लेकिन यह संबंध ज्यादा दिन तक नहीं चल पाया और उनका अलगाव हो गया। मीना कुमारी के प्रति कमाल अमरोही का प्रेम शायद आखिर तक बरकरार रहा तभी तो उन्हें मौत के बाद क़ब्रिस्तान में मीना कुमारी की क़ब्र के बगल में दफनाया गया।

सवांद और गीतकार

कमाल अमरोही को पता चला कि सोहराब मोदी को एक कहानी की तलाश है। उनकी कहानी पर आधारित फ़िल्म ‘पुकार’ (1939) सुपर हिट रही। 'नसीम बानो' और 'चंद्रमोहन' अभिनीत इस फ़िल्म के लिए उन्होंने चार गीत लिखे-

धोया महोबे घाट हे हो धोबिया रे..,
दिल में तू आँखों में तू मेनका..,
गीत सुनो वाह गीत सैयां..,
काहे को मोहे छेड़े रे बेईमनवा..
इसके बाद तो फ़िल्मों के लिए कहानी, पटकथा और संवाद लिखने का उनका सिलसिला चल पड़ा और उन्होंने जेलर (1938), मैं हारी (1940), भरोसा (1940), मज़ाक (1943), फूल (1945), शाहजहां (1946), महल (1949), दायरा (1953), दिल अपना और प्रीत पराई (1960), मुग़ले आजम (1960), पाकीज़ा (1971), शंकर हुसैन (1977) और रज़िया सुल्तान (1983), भरोसा (1940) जैसी फ़िल्मों के लिए कहानी, पटकथा और संवाद लिखने का काम किया।

कमाल अमरोही ने बेहद चुनिंदा फ़िल्मों के लिए काम किया लेकिन जो भी काम किया पूरी तबीयत और जुनून के साथ किया। उनके काम पर उनके व्यक्तित्व की छाप रहती थी। यही वजह है कि फ़िल्में बनाने की उनकी रफ़्तार काफ़ी धीमी रहती थी और उन्हें इसके लिए आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ता था।

पाकीज़ा (फ़िल्म)
पाकीज़ा कमाल अमरोही का ड्रीम प्रोजेक्ट थी जिस पर उन्होंने 1958 में काम करना शुरू किया था। उस समय यह ब्लैक एंड व्हाइट में बनने वाली थी। कुछ समय बाद जब भारत में सिनेमास्कोप का प्रचलन शुरू हो गया तो उन्होंने 1961 में इसे सिनेमास्कोप रूप में बनाना शुरू किया लेकिन कमाल अमरोही का अपनी तीसरी पत्नी मीना कुमारी से अलगाव हो जाने के कारण फ़िल्म का निर्माण 1961-69 तक बंद रहा। बाद में किसी तरह उन्होंने मीना कुमारी को फ़िल्म में काम करने के लिए राज़ी कर लिया और आखिरकार 1971 में जाकर यह फ़िल्म पूरी हुई तथा फरवरी 1972 को रिलीज हुई।

बेहतरीन संवाद, गीत-संगीत, दृश्यांकन और अभिनय से सजी इस फ़िल्म ने रिकार्डतोड़ कामयाबी हासिल की और आज यह फ़िल्म इतिहास की क्लासिक फ़िल्मों में गिनी जाती है। उन्होंने इस फ़िल्म के लिए एक गीत मौसम है आशिकाना.. भी लिखा था। जो बेहद मकबूल हुआ था। इस फ़िल्म के बाद कमाल अमरोही का फ़िल्मों से कुछ समय तक नाता टूटा रहा। 1983 में उन्होंने फिर फ़िल्म इंडस्ट्री का रुख़ किया और रज़िया सुल्तान फ़िल्म से अपनी निर्देशन क्षमता का लोहा मनवाया।

निधन
अपने कमाल से दर्शकों को बांध देने वाली यह अजीम शख़्सियत 11 फरवरी 1993 को इस दुनिया को अलविदा कह गयी।
📽️
1. 1938 जेलर कहानी
2. 1939 पुकार लेखन
3. 1940 मैं हारी संवाद
4. 1940 भरोसा 
5. 1943 मज़ाक संवाद
6. 1945 फूल संवाद
7. 1946 शाहजहाँ 
8. 1949 महल निर्देशन
9. 1953 दायरा लेखन, निर्देशन
10. 1960 मुग़ले आजम संवाद
11. 1972 पाकीज़ा लेखन, निर्देशन
12. 1977 शंकर हुसैन संवाद
13. 1979 मजनूं निर्देशन
14. 1983 रज़िया सुल्तान लेखन, निर्देशन

जावेद अख्तर

#17jan 
जावेद जान निसार अख़्तर
अन्य नाम जावेद साहब
जन्म 17 जनवरी, 1945
जन्म भूमि ग्वालियर, मध्य प्रदेश
अभिभावक श्री जान निसार अख़्तर और श्रीमती सफिया अख़्तर
पति/पत्नी हनी ईरानी और शबाना आज़मी
संतान फ़रहान अख़्तर और ज़ोया अख़्तर
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र कवि, गीतकार और पटकथा लेखक
मुख्य फ़िल्में ज़ंजीर, दीवार, शोले, त्रिशूल, शान, शक्ति आदि।
शिक्षा स्नातक
विद्यालय साफिया कॉलेज, भोपाल
पुरस्कार-उपाधि पद्म श्री, पद्म भूषण, राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार (5) और फ़िल्मफेयर पुरस्कार (7)
नागरिकता भारतीय
प्रसिद्ध गीत एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा (1942 ए लव स्टोरी), घर से निकलते ही (पापा कहते हैं), संदेशे आते हैं (बार्डर), तेरे लिए (वीर जारा)
एक कवि, गीतकार और पटकथा लेखक के रूप में भारत की जानी मानी हस्ती हैं। पटकथा लेखक के रूप में जावेद अख़्तर ने सलीम खान के साथ मिलकर बॉलीवुड की सबसे कामयाब फ़िल्मों की पटकथा लिखी है। सलीम जावेद की जोड़ी की लिखी फ़िल्मों ने अमिताभ बच्चन जैसे अभिनेता को एक अलग पहचान दिलाई। जावेद अख़्तर ने शोले, दीवार, ज़ंजीर, त्रिशूल, जैसी फ़िल्मों की पटकथा लिखी। सन 2007 में इन्हें कला क्षेत्र में योगदान के लिए पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।
पिता जान निसार अख़्तर प्रसिद्ध प्रगतिशील कवि और माता सफिया अख़्तर मशहूर उर्दू लेखिका तथा शिक्षिका थीं। इनके बचपन का नाम 'जादू जावेद अख़्तर' था। बचपन से ही शायरी से जावेद अख़्तर का गहरा रिश्ता था। उनके घर शेरो-शायरी की महफिलें सजा करती थीं जिन्हें वह बड़े चाव से सुना करते थे। जावेद अख़्तर ने ज़िंदगी के उतार-चढ़ाव को बहुत क़रीब से देखा था, इसलिए उनकी शायरी में ज़िंदगी के फसाने को बड़ी शिद्दत से महसूस किया जा सकता है।
जावेद अख़्तर के जन्म के कुछ समय के बाद उनका परिवार लखनऊ आ गया। जावेद अख़्तर ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा लखनऊ कॉल्विन ताल्लुकेदार कॉलेज से पूरी की। कुछ समय तक लखनऊ रहने के बाद जावेद अख़्तर अलीगढ़ आ गए, जहां वह अपनी खाला के साथ रहने लगे। वर्ष 1952 में जावेद अख़्तर को गहरा सदमा पहुंचा जब उनकी माँ का इंतकाल हो गया। जावेद अख़्तर ने अपनी मैट्रिक की पढ़ाई अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से पूरी की। इसके बाद उन्होंने अपनी स्नातक की शिक्षा भोपाल के “साफिया कॉलेज” से पूरी की, लेकिन कुछ दिनों के बाद उनका मन वहां नहीं लगा और वह अपने सपनों को नया रूप देने के लिए वर्ष 1964 में मुंबई आ गए थे

मुंबई पहुंचने पर जावेद अख़्तर को कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। मुंबई में कुछ दिनों तक वह महज 100 रुपये के वेतन पर फ़िल्मों मे डॉयलाग लिखने का काम करने लगे। इस दौरान उन्होंने कई फ़िल्मों के लिए डॉयलाग लिखे, लेकिन इनमें से कोई फ़िल्म बॉक्स आफिस पर सफल नहीं हुई। इसके बाद जावेद अख़्तर को अपना फ़िल्मी कैरियर डूबता नजर आया, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अपना संघर्ष जारी रखा। धीरे-धीरे मुंबई में उनकी पहचान बनती गई।

ज़ंजीर से बदली क़िस्मत
वर्ष 1973 में उनकी मुलाकात निर्माता-निर्देशक प्रकाश मेहरा से हुई जिनके लिए उन्होंने फ़िल्म “ज़ंजीर” के लिए संवाद लिखे। फ़िल्म ज़ंजीर में उनके द्वारा लिखे गए संवाद दर्शकों के बीच इस कदर लोकप्रिय हुए कि पूरे देश में उनकी धूम मच गई। इसके साथ ही फ़िल्म के जरिए फ़िल्म इंडस्ट्री को अमिताभ बच्चन के रूप में सुपर स्टार मिला। इसके बाद जावेद अख़्तर ने सफलता की नई बुलंदियों को छुआ और एक से बढ़कर एक फ़िल्मों के लिए संवाद लिखे। जाने माने निर्माता-निर्देशक रमेश सिप्पी की फ़िल्मों के लिए जावेद अख़्तर ने जबरदस्त संवाद लिखकर उनकी फ़िल्मों को सफल बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके संवाद के कारण ही रमेश सिप्पी की ज्यादातार फ़िल्में आज भी याद की जाती हैं। इन फ़िल्मों में ख़ासकर “सीता और गीता”( 1972), “शोले” (1975), “शान” (1980), “शक्ति” (1982) और “सागर” (1985) जैसी सफल फ़िल्में शामिल हैं। रमेश सिप्पी के अलावा उनके पसंदीदा निर्माता-निर्देशकों में यश चोपड़ा, प्रकाश मेहरा प्रमुख रहे हैं।
मुंबई में उनकी मुलाकात सलीम खान से हुई, जो फ़िल्म इंडस्ट्री में बतौर संवाद लेखक अपनी पहचान बनाना चाह रहे थे। इसके बाद जावेद अख़्तर और सलीम खान संयुक्त रूप से काम करने लगे। वर्ष 1970 में प्रदर्शित फ़िल्म “अंदाज़” की कामयाबी के बाद जावेद अख़्तर कुछ हद तक बतौर संवाद लेखक फ़िल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने में सफल हो गए। फ़िल्म “अंदाज़” की सफलता के बाद जावेद अख़्तर और सलीम खान को कई अच्छी फ़िल्मों के प्रस्ताव मिलने शुरू हो गए। इन फ़िल्मों में “हाथी मेरे साथी”, “सीता और गीता”, “ज़ंजीर” और “यादों की बारात” जैसी फ़िल्में शामिल हैं। वर्ष 1980 में सलीम-जावेद की सुपरहिट जोड़ी अलग हो गई। इसके बाद भी जावेद अख़्तर ने फ़िल्मों के लिए संवाद लिखने का काम जारी रखा।
फ़िल्म “सीता और गीता” के निर्माण के दौरान उनकी मुलाकात हनी ईरानी से हुई और जल्द ही जावेद अख़्तर ने हनी ईरानी से निकाह कर लिया। हनी इरानी से उनके दो बच्चे फ़रहान अख़्तर और ज़ोया अख़्तर हुए लेकिन हनी ईरानी से उन्होंने तलाक लेकर साल 1984 में प्रसिद्ध अभिनेत्री शबाना आज़मी से दूसरा विवाह किया।

पुरस्कार

फ़िल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ गीतकार पुरस्कार
वर्ष 1994 में प्रदर्शित फ़िल्म “1942 ए लव स्टोरी” के गीत एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा.. के लिए
वर्ष 1996 में प्रदर्शित फ़िल्म 'पापा कहते हैं' के गीत घर से निकलते ही..(1997) के लिए
फ़िल्म 'बार्डर' के गीत संदेशे आते हैं…2000) के लिए
फ़िल्म 'रिफ्यूजी' के गीत पंछी नदिया पवन के झोंके.. (2001) के लिए
फ़िल्म 'लगान' के सुन मितवा.. (2003) के लिए
फ़िल्म 'कल हो ना हो' (2004) कल हो ना हो के लिए
फ़िल्म 'वीर जारा' के तेरे लिए…के लिए

नागरिक सम्मान
पद्मश्री (1999)
पद्मभूषण (2007)

राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार (सर्वश्रेष्ठ गीतकार)
वर्ष 1996 में फ़िल्म 'साज'
वर्ष 1997 में 'बार्डर'
वर्ष 1998 में 'गॉड मदर'
वर्ष 2000 में फ़िल्म 'रिफ्यूजी'
वर्ष 2001 में फ़िल्म 'लगान'

सोमवार, 15 जनवरी 2024

ओपी नयर

#16jan
#28jan 
ओंकार प्रसाद नैय्यर
प्रसिद्ध नाम ओ.पी. नैय्यर
अन्य नाम ओपी

🎂जन्म 16 जनवरी, 1926
जन्म भूमि लाहौर (पाकिस्तान)
⚰️मृत्यु 28 जनवरी, 2007
मृत्यु स्थान मुम्बई, महाराष्ट्र

कर्म भूमि मुम्बई
कर्म-क्षेत्र संगीतकार
मुख्य फ़िल्में 'आर-पार', 'नया दौर', 'तुमसा नहीं देखा', 'कश्मीर की कली', 'सी. आई. डी' आदि।
नागरिकता भारतीय
प्रसिद्ध गीत 'लेके पहला पहला प्यार', 'ये चांद-सा रोशन चेहरा', 'ये है रेशमी ज़ुल्फ़ों का', 'चल अकेला', 'ये देश है वीर जवानों का' आदि।
अन्य जानकारी सिने जगत् के लोगों ने आशा भोंसले को ओ. पी. नैय्यर की ही खोज बताया। ओ. पी. नैय्यर ने लता मंगेशकर जैसी सुर सम्राज्ञी के साथ कभी काम नहीं किया।
हिन्दी फ़िल्मों के एक प्रसिद्ध संगीतकार थे। अपने सुरों के जादू से आशा भोंसले और मोहम्मद रफ़ी जैसे कई पार्श्वगायक और पार्श्वगायिकाओं को कामयाबी के शिखर पर पहुंचाने वाले महान् संगीतकार ओ. पी. नैय्यर के संगीतबद्ध गीत आज भी लोकप्रिय है।

जीवन परिचय

16 जनवरी 1926 को लाहौर (पाकिस्तान) के एक मध्यम वर्गीय परिवार में जन्मे ओंकार प्रसाद नैय्यर उर्फ ओ.पी. नैय्यर का रुझान बचपन से ही संगीत की ओर था। वह पार्श्वगायक बनना चाहते थे। भारत विभाजन के पश्चात् उनका पूरा परिवार लाहौर छोड़कर अमृतसर चला आया। ओंकार प्रसाद ने संगीत की सेवा करने के लिए अपनी पढ़ाई बीच में छोड़ दी। अपने संगीत के सफ़र की शुरूआत इन्होंने आल इंडिया रेडियो से की।

फ़िल्मी सफर

बतौर संगीतकार फ़िल्म इंडस्ट्री में पहचान बनाने के लिये ओ. पी. नैय्यर वर्ष 1949 में मुंबई आ गये। मुंबई मे उनकी मुलाकात जाने माने निर्माता निर्देशक कृष्ण केवल से हुई जो उन दिनों फ़िल्म 'कनीज़' का निर्माण कर रहे थे। कृष्ण केवल उनके संगीत बनाने के अंदाज़से काफ़ी प्रभावित हुये और उन्होंने फ़िल्म के बैक ग्राउंड संगीत देने की पेशकश की। इस फ़िल्म के असफल होने से ओ. पी. नैय्यर बतौर संगीतकार अपनी पहचान बनाने मे भले ही सफल न हो सके लेकिन फ़िल्म इंडस्ट्री मे उनका कैरियर अवश्य ही शुरू हो गया।

वर्ष 1951 में अपने एक मित्र के कहने पर वह मुंबई से दिल्ली चले गये और बाद में उसी मित्र के कहने पर उन्होंने निर्माता पंचोली से मुलाकात की जो उन दिनों फ़िल्म नगीना का निर्माण कर रहे थे। बतौर संगीतकार उन्होंने फ़िल्म 'आसमान' से अपने सिने कैरियर की शुरूआत की। इस फ़िल्म के लिये उन्होंने सी. एच. आत्मा की आवाज में अपना पहला गाना रिकार्ड करवाया। गाने के बोल कुछ इस प्रकार थे 'इस बेवफा जहां में वफा ढूंढते हैं' । इस बीच उनकी छमा छम छम और बाज जैसी फ़िल्में भी प्रदर्शित हुई लेकिन इन फ़िल्मों के असफल होने से उन्हें गहरा सदमा पहुंचा और उन्होंने फ़िल्म इंडस्ट्री छोड़ वापस अमृतसर जाने का निर्णय कर लिया।
वर्ष 1953 पार्श्वगायिका गीता दत्त ने ओ.पी. नैय्यर को गुरुदत्त से मिलने की सलाह दी। वर्ष 1954 में गुरुदत्त ने अपनी निर्माण संस्था शुरू की और अपनी फ़िल्म आरपार के संगीत निर्देशन की जिम्मेदारी ओ. पी. नैय्यर को सौंप दी। फ़िल्म आरपार के ओ .पी.नैय्यर के निर्देशन में संगीतबद्ध गीत सुपरहिट हुए और इस सफलता के बाद ओ. पी. नैय्यर अपनी पहचान बनाने में सफल हो गये। उन्होंने वापस अपने घर जाने का इरादा छोड दिया। इसके बाद गुरुदत्त की ही फ़िल्म 'मिस्टर एंड मिसेज 55' के लिये भी ओ.पी. नैय्यर ने संगीत दिया। फ़िल्म में उनके संगीत निर्देशन में बने गाने 'जाने कहां मेरा जिगर गया जी' और 'ठंडी हवा काली घटा' काफ़ी लोकप्रिय हुए।
आर−पार, सी. आई. डी., तुमसा नहीं देखा आदि एक के बाद एक लगातार हिट फ़िल्में देते हुए ये सिने जगत् में सबसे महंगे संगीतकार बने। 1950 में एक फ़िल्म में संगीत देने के 1 लाख रुपये लेने वाले पहले संगीतकार थे। “नया दौर” इनकी सबसे लोकप्रिय फ़िल्म रही। इस फ़िल्म के लिए उन्हें 1957 में फ़िल्म फेयर अवॉर्ड भी मिला। सिर्फ़ कुछ ही फ़िल्मों में अपनी कला का लोहा मनवा देने वाले ये संगीतकार ज़िद्दी और एकांतप्रिय स्वभाव के कारण भी चर्चा में रहे। कुछ लोग इन्हें घमंडी, दबंग और निरंकुश स्वभाव के भी कहते थे, हालाँकि नये एवं जूझते हुए गायकों के साथ ये बहुत उदार रहे। पत्रकार हमेशा से ही इनके ख़िलाफ़ रहे और इनको हमेशा ही बागी संगीतकार के रूप में पेश किया गया। पचास के दशक के दौरान आल इंडिया रेडियो ने इनके संगीत को आधुनिक कहते हुए उस पर प्रतिबंध लगा दिया और इनके गाने रेडियो पर काफ़ी लंबे समय तक नहीं बजाए गये। इस बात से उन्हें कोई आश्चर्य नहीं हुआ बल्कि वे अपनी धुन बनाते रहे और वे सभी देश में बड़ी हिट रही। उस समय सिर्फ़ श्रीलंका के रेडियो पर ही इनके नये गाने सुने जा सकते थे। बहुत जल्दी ही अंग्रेज़ी अख़बारों में इनकी तारीफ के चर्चे शुरू हो गये और इन्हें हिन्दी संगीत में उस्ताद कहा जाने लगा, तब ये बहुत जवान थे।
गीता दत्त, आशा भोंसले और मोहम्मद रफ़ी के साथ इन्होंने सबसे ज़्यादा काम किया। मोहम्मद रफ़ी से अलग होने के बाद ओपी महेंद्र कपूर के साथ काम करने लगे। महेंद्र कपूर जी ओपी के लिए दिल से गाते थे। उनकी आवाज़ और एहसास की गहराई ने ओपी के गानों में भावनाओं को उभारा और लोगों के दिलों तक ओपी के विचारों की गहराई पहुँचाई। आशा भोंसले के साथ ओपी ने लगभग सत्तर फ़िल्मों में काम किया। सिने जगत् के लोगों ने आशा भोंसले को उनकी ही खोज बताया। ऐसा लगता था कि नैय्यर साहब आशा जी के लिए विशेष धुन बनाते हों, जिन्हें आशा बिना किसी मेहनत के गा लेती। ओपी ने लता मंगेशकर जैसी सुर सम्राज्ञी के साथ कभी काम नहीं किया। ये सिने जगत् में हमेशा ही चर्चा का विषय रहा। ओपी कहते थे कि उनके गाने लता की आवाज़ से मेल नहीं खाते। वे ज़्यादातर पंजाबी धुन के साथ मस्ती भरे गाने बनाते थे। लेकिन मुकेश के द्वारा गाया हुआ बहुत गंभीर गाना ‘चल अकेला, चल अकेला, चल अकेला’ ओ. पी नैय्यर की चहुँमुखी प्रतिभा को दर्शाता है।
📽️
आर-पार
नया दौर
तुमसा नहीं देखा
कश्मीर की कली
मेरे सनम
एक मुसाफिर एक हसीना
फिर वो ही दिल लाया हूँ
सी. आई. डी
सावन की घटा
रागिनी
किस्मत
फागुन
हावड़ा ब्रिज
प्राण जाए पर वचन ना जाए
बहारें फिर भी आयेंगी
संबंध
सोने की चिड़िया
कहीं दिन कहीं रात
ये रात फिर ना आयेगी
मि. & मिसेज 55
नया अन्दाज़

कामिनी कौशल

#16jan 

कामिनी कौशल
अन्य नाम उमा कश्यप
🎂जन्म 16 जनवरी, 1927
जन्म भूमि लाहौर, पंजाब, ब्रिटिश भारत
अभिभावक शिवराम कश्यप
पति/पत्नी ब्रह्मस्वरूप सूद
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र अभिनेत्री
मुख्य फ़िल्में 'जेलयात्रा', 'जिद्दी', 'नीचा नगर', 'बिराज बहू', 'हीरालाल पन्नालाल', 'पूरब और पश्चिम', 'लागा चुनरी में दाग', 'शहीद' आदि।
शिक्षा बी.ए. ऑनर्स (अंग्रेज़ी)
विद्यालय 'लेडी मैकक्लैगन हाईस्कूल', 'किन्नेयर्ड कॉलेज', लाहौर
पुरस्कार-उपाधि फ़िल्म 'बिरज बहू' के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का 'फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार'।
नागरिकता भारतीय
संबंधित लेख चेतन आनन्द, दिलीप कुमार
विशेष वर्ष 1946 में बनी फ़िल्म 'नीचा नगर' के संगीतकार पंडित रविशंकर थे। 'कांस फ़िल्म समारोह' में शामिल होने और पुरस्कार हासिल करने वाली ये पहली भारतीय फ़िल्म थी।
अन्य जानकारी प्रसिद्ध निर्देशक चेतन आनंद ने कामिनी कौशल को उनके असली नाम 'उमा कश्यप' की जगह फ़िल्मी नाम 'कामिनी कौशल' दिया था। आगे चलकर वे इसी फ़िल्मी नाम से मशहूर हुईं।
फ़िल्मों की एक ऐसी अभिनेत्री और टीवी कलाकार, जिसने अपनी शालीनता से सभी का दिल जीत लिया। इनका वास्तविक नाम 'उमा कश्यप' था। फ़िल्मी नाम 'कामिनी कौशल' चेतन आनन्द ने दिया और इसी नाम से ये जानी गईं। यूँ तो कामिनी कौशल ने कई यादगार फ़िल्में दी हैं, किंतु फ़िल्म 'नीचा नगर' (1946) और 'बिराज बहू' (1955) में निभाई गई भूमिका के लिए उन्हें ख़ासतौर पर जाना जाता है। इन फ़िल्मों में निभाई गई भूमिका के लिए कामिनी कौशल को पुरस्कार भी प्राप्त हुए थे। अपने समय के ख्याति प्राप्त अभिनेता दिलीप कुमार और राज कपूर के साथ कई फ़िल्में कर चुकीं कामिनी कौशल ने टीवी की दुनिया में कई धारावाहिकों में भी कार्य किया है।
कामिनी के पिता प्रोफ़ेसर शिवराम कश्यप अंतर्राष्ट्रीय स्तर के जाने-माने वनस्पति शास्त्री थे और लाहौर के ही 'गवर्नमेंट कॉलेज' में पढ़ाते थे। लाहौर के मशहूर 'बॉटैनिकल गार्डन' के संस्थापक होने के साथ-साथ वे साईंस कांग्रेस के अध्यक्ष भी थे। दो भाई और तीन बहनों में सबसे छोटी कामिनी कौशल के बड़े भाई डॉक्टर के. एन. कश्यप बतौर सर्जन कई सालों तक पी. जी. आई. चंडीगढ़ से जुड़े रहे। उनके छोटे भाई कर्नल ए. एन. कश्यप को दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान जापान में युद्ध बंदी बना लिया गया था और वे चार साल बाद अचानक तब वापस लौटे थे, जब परिवार की उम्मीदें लगभग समाप्त हो गई थीं।

शिक्षा

कामिनी कौशल का परिवार लाहौर के चौबुर्जी इलाक़े में रहता था। 'लेडी मैकक्लैगन हाईस्कूल' से उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की थी। इसके बाद 'किन्नेयर्ड कॉलेज' से अंग्रेज़ी में बी.ए. ऑनर्स किया। इनके परिवार का माहौल काफ़ी खुला हुआ था। कामिनी कौशल बचपन से ही रेडियो नाटकों में हिस्सा लेती थी, इसके अतिरिक्त घुड़सवारी, तैराकी और साईक्लिंग भी करती थीं।

विवाह

कामिनी कौशल की बहन की असामयिक ही मृत्यु हो गई थी, जिस कारण अपनी भ‍तीजियों के भविष्य की चिंता उन्हें थी। अपनी भतीजियों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए ही कामिनी कौशल ने अपने जीजा ब्रह्मस्वरूप सूद से विवाह कर लिया और मुंबई आ गईं। ब्रह्मस्वरूप सूद पोर्ट ट्रस्ट में काम करते थे। उन्होंने कामिनी को फिल्मों में काम करने की पूरी आज़ादी दे दी थी।

फ़िल्मी शुरुआत

उस समय फ़िल्मों में काम करना अच्छा नहीं माना जाता था। चेतन आनन्द कामिनी के बड़े भाई के क़रीबी दोस्त थे और उन दिनों अपनी पहली फ़िल्म 'नीचा नगर' की तैयारियों में लगे हुए थे। एक रोज़ उन्होंने रेडियो नाटक सुनकर कामिनी को अपनी फ़िल्म की मुख्य भूमिका के लिए लेना चाहा, किंतु कामिनी ने साफ इंकार कर दिया। चेतन आनंद से उनकी अगली मुलाक़ात मुंबई में हुई, जहाँ वह अपनी विवाहिता बड़ी बहन के घर आयी हुई थीं। चेतन आनंद ने एक बार फिर से उन पर अपनी फ़िल्म में काम करने के लिए दबाव डाला, जिसके लिए अपने बड़े भाई के कहने पर कामिनी कौशल को हाँ करना पड़ा। चूंकि चेतन आनंद की पत्नी उमा आनंद भी उस फ़िल्म में एक अहम भूमिका कर रही थीं, इसलिए चेतन आनंद ने कामिनी कौशल को उनके असली नाम उमा कश्यप की जगह फ़िल्मी नाम कामिनी कौशल दिया था। आगे चलकर वे इसी फ़िल्मी नाम से मशहूर हुईं।

मुम्बई आगमन

वर्ष 1946 में बनी फ़िल्म 'नीचा नगर' के संगीतकार पंडित रविशंकर थे। 'कांस फ़िल्म समारोह' में शामिल होने और पुरस्कार हासिल करने वाली ये पहली भारतीय फ़िल्म थी। कामिनी कौशल के अनुसार- "तमाम तारीफ़ें बटोरने के बावजूद शुरूआत में ये फ़िल्म बिक नहीं पाई थी। लेकिन जब आगे चलकर मेरा थोड़ा नाम हुआ और इस फ़िल्म में दो गाने डाले गए, तब कहीं ये फ़िल्म प्रदर्शित हो पाई थी। लेकिन उसके बाद जितने भी प्रस्ताव मुझे मिले, उन सभी को ठुकराकर मैं वापस लाहौर लौट गयी। उस समय तक मैंने मुश्किल से चार-पाँच ही फ़िल्में देखी होंगी, जिनमें से 'प्रभात फ़िल्म कंपनी, पुणे' की गजानन जागीरदार निर्देशित फ़िल्म 'रामशास्त्री' मुझे बेहद पसंद आयी थी। इसीलिए जब गजानन जागीरदार ने अपने प्रोडक्शन की फ़िल्म 'जेलयात्रा' के लिए मुझसे संपर्क किया तो मैं इंकार नहीं कर पायी और मुझे स्थायी रूप से मुंबई आ जाना पड़ा"।[१] कई लोग यह भी कहते हैं कि बड़ी बहन के अचानक गुज़र जाने के बाद उनकी दो छोटी बेटियों की देखभाल के लिए कामिनी कौशल को 1947 में अपने जीजा ब्रह्मस्वरूप सूद से शादी करनी पड़ी थी और इसीलिए वे शादी के बाद स्थायी तौर पर मुंबई आई थीं।

1947 में बनी फ़िल्म 'जेलयात्रा' में कामिनी कौशल के नायक राज कपूर थे, जिनकी बतौर निर्माता-निर्देशक पहली फ़िल्म 'आग' (1948) में भी कामिनी कौशल ने एक अहम भूमिका की। 'फ़िल्मिस्तान स्टूडियो' की फ़िल्म 'दो भाई' (1947) में कामिनी कौशल के नायक उल्हास थे तो इसी बैनर की 'शहीद' और 'नदिया के पार' (1948) में दिलीप कुमार। इन सभी फ़िल्मों में कामिनी कौशल के लिए पार्श्वगायन शमशाद बेगम, गीता दत्त, ललिता देऊलकर और सुरिंदर कौर ने किया था। 'बॉम्बे टॉकीज़' की खेमचंद प्रकाश द्वारा संगीतबद्ध फ़िल्म 'ज़िद्दी' (1948) में उनके लिए लता मंगेशकर ने पहली बार गाने गाए थे। बतौर गायक किशोर कुमार की भी ये पहली फ़िल्म थी, जिसमें उन्होंने माली की एक छोटी सी भूमिका भी की थी। इसके बाद अगले दस वर्षों में कामिनी कौशल ने 'नमूना', 'शबनम', 'शायर' (सभी 1949), 'आरज़ू' (1950), 'बिखरे मोती' (1951), 'पूनम' (1952), 'आंसू', 'आस', 'शहंशाह' (सभी 1953), 'बिराज बहू', 'चालीस बाबा एक चोर', 'संगम' (सभी 1954), 'आबरू' (1956), 'बड़ा भाई', 'बड़े सरकार' (दोनों 1957), 'जेलर', 'नाईट क्लब' (दोनों 1958) और 'बैंक मैनेजर' (1959) जैसी कुल मिलाकर 33 फ़िल्मों में मुख्य भूमिकाएँ निभाईं।

प्रेम प्रसंग
दिलीप कुमार के साथ दो अभिनेत्रियों के प्रेम प्रसंग की बातें भी काफ़ी उड़ीं। इन अभिनेत्रियों में एक थीं 'कामिनी कौशल' और दूसरी 'मधुबाला'। 1948 और 1950 के बीच दिलीप कुमार और कामिनी कौशल ने चार फिल्मों में साथ काम किया था। इनमें 'शहीद' के अलावा अन्य तीन फिल्में 'नदिया के पार', 'शबनम', और 'आरजू' थीं। दर्शकों को इन फिल्मों के प्रणय दृश्य देखकर ही इनके बीच परस्पर प्रेम का अहसास हो जाता था। तब कामिनी कौशल और दिलीप कुमार दोनों ही फिल्मी करियर की बुनियाद डाल रहे थे। कामिनी कौशल ब्याहता थीं, जिन्होंने बहन के निधन के बाद अपने जीजा ब्रह्मस्वरूप सूद से विवाह किया था। इनके पति ने फ़िल्मों में काम करने की आज़ादी दी थी, लेकिन प्रेम की इजाजत भला कैसे देते। दिलीप और कामिनी ने अपने प्रेम को दबाया और वर्षों तक एक-दूसरे के सामने भी नहीं आए।

फ़िल्म निर्माण
'के आर्ट्स' के बैनर में बनी फ़िल्म 'पूनम' और 'चालीस बाबा एक चोर' का निर्माण कामिनी कौशल ने ही किया था। फ़िल्म 'बिरज बहू' के लिए उन्होंने सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का 'फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार' जीता था। फ़िल्म 'बैंक मैनेजर' के बाद उन्हें घरेलू वजहों से कुछ सालों के लिए फ़िल्मों से अलग हो जाना पड़ा। क़रीब पाँच साल बाद कामिनी कौशल अभिनेता राजकुमार के साथ निर्माता-निर्देशक त्रिलोक जेटली की फ़िल्म 'गोदान' (1963) में नज़र आयीं। इस फ़िल्म का संगीत भी पंडित रविशंकर ने तैयार किया था। ये कामिनी कौशल की बतौर नायिका आख़िरी प्रदर्शित फ़िल्म थी।

चरित्र अभिनेत्री

बतौर चरित्र अभिनेत्री कामिनी कौशल के दूसरे फ़िल्मी सफ़र की शुरुआत वर्ष 1965 में बनी फ़िल्म 'शहीद' से हुई। इस फ़िल्म में वे अभिनेता मनोज कुमार द्वारा अभिनीत सरदार भगत सिंह की माँ की भूमिका में नज़र आयी थीं। फ़िल्म 'शहीद' की जबर्दस्त कामयाबी के बाद उन्होंने मनोज कुमार की लगभग सभी फ़िल्मों में उनकी माँ की भूमिका की। कामिनी कौशल बतौर चरित्र अभिनेत्री 40 से भी ज़्यादा सालों तक सक्रिय रहीं। अभिनय के इस दूसरे दौर में उन्होंने 60 से ज़्यादा फ़िल्मों, 1980 के दशक के मध्य में बने अंग्रेज़ी धारावाहिक 'ज्वैल इन द क्राऊन' और "वक़्त की रफ़्तार', 'ऊपरवाली घरवाली', 'संजीवनी', 'शन्नो की शादी' जैसे कुछ हिन्दी धारावाहिकों में अभिनय किया। 2007 में बनी 'लागा चुनरी में दाग' कामिनी कौशल की अभी तक की आख़िरी हिन्दी फ़िल्म है। 2008 में लंदन में बनी उनकी एक अंग्रेज़ी फ़िल्म 'द स्क्वायर रूट 2' भी प्रदर्शित हुई थी।

📽️
2007 लागा चुनरी में दाग 
2003 चोरी चोरी 
2000 हर दिल जो प्यार करेगा
1992 हमशक्ल 
1989 संतोष
1984 द ज्वैल इन द क्राउन दूरदर्शन धारावाहिक फ़िल्म
1983 पेंटर बाबू 
1981 खुदा कसम 
1980 टक्कर 
1979 बगुला भगत 
1978 हीरालाल पन्नालाल 
1978 आहूति 
1978 दिल और दीवार
1978 स्वर्ग नर्क 
1977 चाँदी सोना 
1976 महा चोर
1976 दस नम्बरी राधा 
1976 भँवर 
1975 दो झूठ 
1975 कैद 
1975 सन्यासी 
1974 रोटी कपड़ा और मकान 
1974 प्रेम नगर 
1973 अनहोनी 
1973 जैसे को तैसा
1972 शोर 
1972 ताँगेवाला 
1971 उपहार अनूप की माँ 
1971 बिखरे मोती 
1970 यादगार 
1970 पूरब और पश्चिम 
1970 इश्क पर ज़ोर नहीं
1969 विश्वास नीना 
1969 मेरी भाभी शांति 
1969 एक श्रीमान एक श्रीमती रमा 
1969 दो रास्ते माधवी गुप्ता 
1969 वारिस रुक्मनी 
1965 शहीद 
1954 बिरज बहू 
1953 चालीस बाबा एक चोर 
1953 आस आशा 
1952 पूनम 
1949 पारस गीता 
1949 शाइर बीना 
1949 शायर 
1948 आग निर्मला 
1948 ज़िद्दी 
1947 जेल यात्रा

कबीर बेदी

#16jan 
कबीर बेदी
🎂16 जनवरी 1946 
Lahore, Punjab, British India
पेशा
ActorTelevision presenter
कार्यकाल
1971–present
जीवनसाथी
Protima Gauri (वि॰ 1969; divorce 1974)
Susan-Humphreys (वि॰ 1980; divorce 1990)
Nikki Bedi (वि॰ 1992; divorce 2005)
Parveen Dosanjh (वि॰ 2016)
बच्चे
3, including पूजा बेदी
माता-पिता
Baba Pyare Lal Singh Bedi

कबीर बेदी का जन्म 16 जनवरी 1946 को ब्रिटिश भारत के पंजाब प्रांत (अब पंजाब, पाकिस्तान में) के लाहौर में एक पंजाबी खत्री सिख परिवार में हुआ था, 

कबीर बेदी एक भारतीय फिल्म अभिनेता हैं, जो सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि यूनाइटेड स्टेट और इटली में भी सक्रिय हैं। कबीर को हिंदी सिनेमा में विलेन की भूमिका के लिए प्रमुख तौर पर जाना जाता है। वह अब तक कई फिल्मों में विलेन की भूमिका निभा चुके हैं, जिनमे खून भरी मांग, मोहन-जोदारो, साहेब बीवी गैंगस्टर प्रमुख है।

निजी जीवन 
कबीर बेदी का जन्म 16 जनवरी 1946 को एक सिख परिवार में हुआ था। उनके पिता बाबा प्यारे लाल सिंह बेदी, एक पंजाबी सिख, एक लेखक और दार्शनिक थे। उनकी मां, फ्रेडा बेदी एक ब्रिटिश महिला थीं जो इंग्लैंड के डर्बी में पैदा हुई थी। कबीर बेदी ने शेरवुड कॉलेज, नैनीताल, उत्तराखंड में अपनी स्कूली शिक्षा और सेंट स्टीफन कॉलेज, दिल्ली से स्नातक की उपाधि प्राप्त की।

शादी 
कबीर बेदी ने चार शादी की हैं, जिनसे उन्हें तीन बच्चे हैं-पूजा, सिद्दार्थ और एडम। कबीर की पहली शादी प्रोतिमा बेदी से हुई थी, जोकि एक ओडिशी डांसर थी, कबीर-प्रोतिमा की बेटी पूजा बेदी हैं, जोकि एक एक कोलमनिस्ट हैं। उनके दूसरे बेटे सिद्धार्थ, जो संयुक्त राज्य अमेरिका में कार्नेगी मेलॉन विश्वविद्यालय पढाई करने गये, जहां उन्हें स्किज़ोफ्रेनिया  बीमारी हो गयी और फिर उन्होंने आत्महत्या कर ली।

प्रोतिमा से शादी के बाद कबीर बेदी और फिल्म एक्ट्रेस परवीन बॉबी के लव अफेयर की अफवाहों ने खूब सुर्खियां बटोरी। वर्ष 1990 में कबीर ने निक्की बेदी से शादी रचाई, जोकि एक टीवी रेडियो प्रेजेंटर थी। दोनों का तलाक वर्ष 2005 में हो गया इसके बाद कबीर परवीन दोसांझ को डेट करने लगे, और उन्होंने अपने 70 वें जन्मदिन पर परवीन से शादी रचाई।

करियर 
कबीर बेदी ने भारतीय थिएटर में अपना करियर शुरू किया और फिर हिंदी फिल्मों में चले गए। बेदी भारत के पहले अंतरराष्ट्रीय कलाकारों में से एक हैं जिन्होंने हिंदी फिल्मों में शुरुआत की, हॉलीवुड की फिल्मों में काम किया और यूरोप में एक बेहतरीन स्टार के रूप में उभरे।

प्रासिद्ध फ़िल्में 
हलचल, सीम, सजा, इश्क इश्क इश्क, कच्चे धागे, अशांति, खून भरी मांग, मेरा शिकार ,आखरी कसम, कुर्बान, यलगार, मोहन-जोदारो,आतंक ही आतंक क्रांति,मै हूं ना, काइट्स, शैब बीवी और गैंगस्टर आदि।

उन्होंने 60 से अधिक भारतीय फिल्मों में अभिनय किया
📽️
1971 हलचल 
1972 राखी और हथकड़ी
1973 कच्चे धागे
1974 मंजिलें और भी हैं 
माँ बहन और बीवी 
इश्क इश्क इश्क
1975 अनाड़ी विक्रम
डाकू डाकू राजू
नागिन उदय
1976 हरफन मौला

मनुस्मृति

. ................मनुस्मृति.................... जरा सोचिए, अगर आज भारत का कानून यह तय कर दे कि— "एक आम आदमी चोरी करे तो उसे...