सोमवार, 15 जनवरी 2024

कामिनी कौशल

#16jan 

कामिनी कौशल
अन्य नाम उमा कश्यप
🎂जन्म 16 जनवरी, 1927
जन्म भूमि लाहौर, पंजाब, ब्रिटिश भारत
अभिभावक शिवराम कश्यप
पति/पत्नी ब्रह्मस्वरूप सूद
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र अभिनेत्री
मुख्य फ़िल्में 'जेलयात्रा', 'जिद्दी', 'नीचा नगर', 'बिराज बहू', 'हीरालाल पन्नालाल', 'पूरब और पश्चिम', 'लागा चुनरी में दाग', 'शहीद' आदि।
शिक्षा बी.ए. ऑनर्स (अंग्रेज़ी)
विद्यालय 'लेडी मैकक्लैगन हाईस्कूल', 'किन्नेयर्ड कॉलेज', लाहौर
पुरस्कार-उपाधि फ़िल्म 'बिरज बहू' के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का 'फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार'।
नागरिकता भारतीय
संबंधित लेख चेतन आनन्द, दिलीप कुमार
विशेष वर्ष 1946 में बनी फ़िल्म 'नीचा नगर' के संगीतकार पंडित रविशंकर थे। 'कांस फ़िल्म समारोह' में शामिल होने और पुरस्कार हासिल करने वाली ये पहली भारतीय फ़िल्म थी।
अन्य जानकारी प्रसिद्ध निर्देशक चेतन आनंद ने कामिनी कौशल को उनके असली नाम 'उमा कश्यप' की जगह फ़िल्मी नाम 'कामिनी कौशल' दिया था। आगे चलकर वे इसी फ़िल्मी नाम से मशहूर हुईं।
फ़िल्मों की एक ऐसी अभिनेत्री और टीवी कलाकार, जिसने अपनी शालीनता से सभी का दिल जीत लिया। इनका वास्तविक नाम 'उमा कश्यप' था। फ़िल्मी नाम 'कामिनी कौशल' चेतन आनन्द ने दिया और इसी नाम से ये जानी गईं। यूँ तो कामिनी कौशल ने कई यादगार फ़िल्में दी हैं, किंतु फ़िल्म 'नीचा नगर' (1946) और 'बिराज बहू' (1955) में निभाई गई भूमिका के लिए उन्हें ख़ासतौर पर जाना जाता है। इन फ़िल्मों में निभाई गई भूमिका के लिए कामिनी कौशल को पुरस्कार भी प्राप्त हुए थे। अपने समय के ख्याति प्राप्त अभिनेता दिलीप कुमार और राज कपूर के साथ कई फ़िल्में कर चुकीं कामिनी कौशल ने टीवी की दुनिया में कई धारावाहिकों में भी कार्य किया है।
कामिनी के पिता प्रोफ़ेसर शिवराम कश्यप अंतर्राष्ट्रीय स्तर के जाने-माने वनस्पति शास्त्री थे और लाहौर के ही 'गवर्नमेंट कॉलेज' में पढ़ाते थे। लाहौर के मशहूर 'बॉटैनिकल गार्डन' के संस्थापक होने के साथ-साथ वे साईंस कांग्रेस के अध्यक्ष भी थे। दो भाई और तीन बहनों में सबसे छोटी कामिनी कौशल के बड़े भाई डॉक्टर के. एन. कश्यप बतौर सर्जन कई सालों तक पी. जी. आई. चंडीगढ़ से जुड़े रहे। उनके छोटे भाई कर्नल ए. एन. कश्यप को दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान जापान में युद्ध बंदी बना लिया गया था और वे चार साल बाद अचानक तब वापस लौटे थे, जब परिवार की उम्मीदें लगभग समाप्त हो गई थीं।

शिक्षा

कामिनी कौशल का परिवार लाहौर के चौबुर्जी इलाक़े में रहता था। 'लेडी मैकक्लैगन हाईस्कूल' से उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की थी। इसके बाद 'किन्नेयर्ड कॉलेज' से अंग्रेज़ी में बी.ए. ऑनर्स किया। इनके परिवार का माहौल काफ़ी खुला हुआ था। कामिनी कौशल बचपन से ही रेडियो नाटकों में हिस्सा लेती थी, इसके अतिरिक्त घुड़सवारी, तैराकी और साईक्लिंग भी करती थीं।

विवाह

कामिनी कौशल की बहन की असामयिक ही मृत्यु हो गई थी, जिस कारण अपनी भ‍तीजियों के भविष्य की चिंता उन्हें थी। अपनी भतीजियों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए ही कामिनी कौशल ने अपने जीजा ब्रह्मस्वरूप सूद से विवाह कर लिया और मुंबई आ गईं। ब्रह्मस्वरूप सूद पोर्ट ट्रस्ट में काम करते थे। उन्होंने कामिनी को फिल्मों में काम करने की पूरी आज़ादी दे दी थी।

फ़िल्मी शुरुआत

उस समय फ़िल्मों में काम करना अच्छा नहीं माना जाता था। चेतन आनन्द कामिनी के बड़े भाई के क़रीबी दोस्त थे और उन दिनों अपनी पहली फ़िल्म 'नीचा नगर' की तैयारियों में लगे हुए थे। एक रोज़ उन्होंने रेडियो नाटक सुनकर कामिनी को अपनी फ़िल्म की मुख्य भूमिका के लिए लेना चाहा, किंतु कामिनी ने साफ इंकार कर दिया। चेतन आनंद से उनकी अगली मुलाक़ात मुंबई में हुई, जहाँ वह अपनी विवाहिता बड़ी बहन के घर आयी हुई थीं। चेतन आनंद ने एक बार फिर से उन पर अपनी फ़िल्म में काम करने के लिए दबाव डाला, जिसके लिए अपने बड़े भाई के कहने पर कामिनी कौशल को हाँ करना पड़ा। चूंकि चेतन आनंद की पत्नी उमा आनंद भी उस फ़िल्म में एक अहम भूमिका कर रही थीं, इसलिए चेतन आनंद ने कामिनी कौशल को उनके असली नाम उमा कश्यप की जगह फ़िल्मी नाम कामिनी कौशल दिया था। आगे चलकर वे इसी फ़िल्मी नाम से मशहूर हुईं।

मुम्बई आगमन

वर्ष 1946 में बनी फ़िल्म 'नीचा नगर' के संगीतकार पंडित रविशंकर थे। 'कांस फ़िल्म समारोह' में शामिल होने और पुरस्कार हासिल करने वाली ये पहली भारतीय फ़िल्म थी। कामिनी कौशल के अनुसार- "तमाम तारीफ़ें बटोरने के बावजूद शुरूआत में ये फ़िल्म बिक नहीं पाई थी। लेकिन जब आगे चलकर मेरा थोड़ा नाम हुआ और इस फ़िल्म में दो गाने डाले गए, तब कहीं ये फ़िल्म प्रदर्शित हो पाई थी। लेकिन उसके बाद जितने भी प्रस्ताव मुझे मिले, उन सभी को ठुकराकर मैं वापस लाहौर लौट गयी। उस समय तक मैंने मुश्किल से चार-पाँच ही फ़िल्में देखी होंगी, जिनमें से 'प्रभात फ़िल्म कंपनी, पुणे' की गजानन जागीरदार निर्देशित फ़िल्म 'रामशास्त्री' मुझे बेहद पसंद आयी थी। इसीलिए जब गजानन जागीरदार ने अपने प्रोडक्शन की फ़िल्म 'जेलयात्रा' के लिए मुझसे संपर्क किया तो मैं इंकार नहीं कर पायी और मुझे स्थायी रूप से मुंबई आ जाना पड़ा"।[१] कई लोग यह भी कहते हैं कि बड़ी बहन के अचानक गुज़र जाने के बाद उनकी दो छोटी बेटियों की देखभाल के लिए कामिनी कौशल को 1947 में अपने जीजा ब्रह्मस्वरूप सूद से शादी करनी पड़ी थी और इसीलिए वे शादी के बाद स्थायी तौर पर मुंबई आई थीं।

1947 में बनी फ़िल्म 'जेलयात्रा' में कामिनी कौशल के नायक राज कपूर थे, जिनकी बतौर निर्माता-निर्देशक पहली फ़िल्म 'आग' (1948) में भी कामिनी कौशल ने एक अहम भूमिका की। 'फ़िल्मिस्तान स्टूडियो' की फ़िल्म 'दो भाई' (1947) में कामिनी कौशल के नायक उल्हास थे तो इसी बैनर की 'शहीद' और 'नदिया के पार' (1948) में दिलीप कुमार। इन सभी फ़िल्मों में कामिनी कौशल के लिए पार्श्वगायन शमशाद बेगम, गीता दत्त, ललिता देऊलकर और सुरिंदर कौर ने किया था। 'बॉम्बे टॉकीज़' की खेमचंद प्रकाश द्वारा संगीतबद्ध फ़िल्म 'ज़िद्दी' (1948) में उनके लिए लता मंगेशकर ने पहली बार गाने गाए थे। बतौर गायक किशोर कुमार की भी ये पहली फ़िल्म थी, जिसमें उन्होंने माली की एक छोटी सी भूमिका भी की थी। इसके बाद अगले दस वर्षों में कामिनी कौशल ने 'नमूना', 'शबनम', 'शायर' (सभी 1949), 'आरज़ू' (1950), 'बिखरे मोती' (1951), 'पूनम' (1952), 'आंसू', 'आस', 'शहंशाह' (सभी 1953), 'बिराज बहू', 'चालीस बाबा एक चोर', 'संगम' (सभी 1954), 'आबरू' (1956), 'बड़ा भाई', 'बड़े सरकार' (दोनों 1957), 'जेलर', 'नाईट क्लब' (दोनों 1958) और 'बैंक मैनेजर' (1959) जैसी कुल मिलाकर 33 फ़िल्मों में मुख्य भूमिकाएँ निभाईं।

प्रेम प्रसंग
दिलीप कुमार के साथ दो अभिनेत्रियों के प्रेम प्रसंग की बातें भी काफ़ी उड़ीं। इन अभिनेत्रियों में एक थीं 'कामिनी कौशल' और दूसरी 'मधुबाला'। 1948 और 1950 के बीच दिलीप कुमार और कामिनी कौशल ने चार फिल्मों में साथ काम किया था। इनमें 'शहीद' के अलावा अन्य तीन फिल्में 'नदिया के पार', 'शबनम', और 'आरजू' थीं। दर्शकों को इन फिल्मों के प्रणय दृश्य देखकर ही इनके बीच परस्पर प्रेम का अहसास हो जाता था। तब कामिनी कौशल और दिलीप कुमार दोनों ही फिल्मी करियर की बुनियाद डाल रहे थे। कामिनी कौशल ब्याहता थीं, जिन्होंने बहन के निधन के बाद अपने जीजा ब्रह्मस्वरूप सूद से विवाह किया था। इनके पति ने फ़िल्मों में काम करने की आज़ादी दी थी, लेकिन प्रेम की इजाजत भला कैसे देते। दिलीप और कामिनी ने अपने प्रेम को दबाया और वर्षों तक एक-दूसरे के सामने भी नहीं आए।

फ़िल्म निर्माण
'के आर्ट्स' के बैनर में बनी फ़िल्म 'पूनम' और 'चालीस बाबा एक चोर' का निर्माण कामिनी कौशल ने ही किया था। फ़िल्म 'बिरज बहू' के लिए उन्होंने सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का 'फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार' जीता था। फ़िल्म 'बैंक मैनेजर' के बाद उन्हें घरेलू वजहों से कुछ सालों के लिए फ़िल्मों से अलग हो जाना पड़ा। क़रीब पाँच साल बाद कामिनी कौशल अभिनेता राजकुमार के साथ निर्माता-निर्देशक त्रिलोक जेटली की फ़िल्म 'गोदान' (1963) में नज़र आयीं। इस फ़िल्म का संगीत भी पंडित रविशंकर ने तैयार किया था। ये कामिनी कौशल की बतौर नायिका आख़िरी प्रदर्शित फ़िल्म थी।

चरित्र अभिनेत्री

बतौर चरित्र अभिनेत्री कामिनी कौशल के दूसरे फ़िल्मी सफ़र की शुरुआत वर्ष 1965 में बनी फ़िल्म 'शहीद' से हुई। इस फ़िल्म में वे अभिनेता मनोज कुमार द्वारा अभिनीत सरदार भगत सिंह की माँ की भूमिका में नज़र आयी थीं। फ़िल्म 'शहीद' की जबर्दस्त कामयाबी के बाद उन्होंने मनोज कुमार की लगभग सभी फ़िल्मों में उनकी माँ की भूमिका की। कामिनी कौशल बतौर चरित्र अभिनेत्री 40 से भी ज़्यादा सालों तक सक्रिय रहीं। अभिनय के इस दूसरे दौर में उन्होंने 60 से ज़्यादा फ़िल्मों, 1980 के दशक के मध्य में बने अंग्रेज़ी धारावाहिक 'ज्वैल इन द क्राऊन' और "वक़्त की रफ़्तार', 'ऊपरवाली घरवाली', 'संजीवनी', 'शन्नो की शादी' जैसे कुछ हिन्दी धारावाहिकों में अभिनय किया। 2007 में बनी 'लागा चुनरी में दाग' कामिनी कौशल की अभी तक की आख़िरी हिन्दी फ़िल्म है। 2008 में लंदन में बनी उनकी एक अंग्रेज़ी फ़िल्म 'द स्क्वायर रूट 2' भी प्रदर्शित हुई थी।

📽️
2007 लागा चुनरी में दाग 
2003 चोरी चोरी 
2000 हर दिल जो प्यार करेगा
1992 हमशक्ल 
1989 संतोष
1984 द ज्वैल इन द क्राउन दूरदर्शन धारावाहिक फ़िल्म
1983 पेंटर बाबू 
1981 खुदा कसम 
1980 टक्कर 
1979 बगुला भगत 
1978 हीरालाल पन्नालाल 
1978 आहूति 
1978 दिल और दीवार
1978 स्वर्ग नर्क 
1977 चाँदी सोना 
1976 महा चोर
1976 दस नम्बरी राधा 
1976 भँवर 
1975 दो झूठ 
1975 कैद 
1975 सन्यासी 
1974 रोटी कपड़ा और मकान 
1974 प्रेम नगर 
1973 अनहोनी 
1973 जैसे को तैसा
1972 शोर 
1972 ताँगेवाला 
1971 उपहार अनूप की माँ 
1971 बिखरे मोती 
1970 यादगार 
1970 पूरब और पश्चिम 
1970 इश्क पर ज़ोर नहीं
1969 विश्वास नीना 
1969 मेरी भाभी शांति 
1969 एक श्रीमान एक श्रीमती रमा 
1969 दो रास्ते माधवी गुप्ता 
1969 वारिस रुक्मनी 
1965 शहीद 
1954 बिरज बहू 
1953 चालीस बाबा एक चोर 
1953 आस आशा 
1952 पूनम 
1949 पारस गीता 
1949 शाइर बीना 
1949 शायर 
1948 आग निर्मला 
1948 ज़िद्दी 
1947 जेल यात्रा

कबीर बेदी

#16jan 
कबीर बेदी
🎂16 जनवरी 1946 
Lahore, Punjab, British India
पेशा
ActorTelevision presenter
कार्यकाल
1971–present
जीवनसाथी
Protima Gauri (वि॰ 1969; divorce 1974)
Susan-Humphreys (वि॰ 1980; divorce 1990)
Nikki Bedi (वि॰ 1992; divorce 2005)
Parveen Dosanjh (वि॰ 2016)
बच्चे
3, including पूजा बेदी
माता-पिता
Baba Pyare Lal Singh Bedi

कबीर बेदी का जन्म 16 जनवरी 1946 को ब्रिटिश भारत के पंजाब प्रांत (अब पंजाब, पाकिस्तान में) के लाहौर में एक पंजाबी खत्री सिख परिवार में हुआ था, 

कबीर बेदी एक भारतीय फिल्म अभिनेता हैं, जो सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि यूनाइटेड स्टेट और इटली में भी सक्रिय हैं। कबीर को हिंदी सिनेमा में विलेन की भूमिका के लिए प्रमुख तौर पर जाना जाता है। वह अब तक कई फिल्मों में विलेन की भूमिका निभा चुके हैं, जिनमे खून भरी मांग, मोहन-जोदारो, साहेब बीवी गैंगस्टर प्रमुख है।

निजी जीवन 
कबीर बेदी का जन्म 16 जनवरी 1946 को एक सिख परिवार में हुआ था। उनके पिता बाबा प्यारे लाल सिंह बेदी, एक पंजाबी सिख, एक लेखक और दार्शनिक थे। उनकी मां, फ्रेडा बेदी एक ब्रिटिश महिला थीं जो इंग्लैंड के डर्बी में पैदा हुई थी। कबीर बेदी ने शेरवुड कॉलेज, नैनीताल, उत्तराखंड में अपनी स्कूली शिक्षा और सेंट स्टीफन कॉलेज, दिल्ली से स्नातक की उपाधि प्राप्त की।

शादी 
कबीर बेदी ने चार शादी की हैं, जिनसे उन्हें तीन बच्चे हैं-पूजा, सिद्दार्थ और एडम। कबीर की पहली शादी प्रोतिमा बेदी से हुई थी, जोकि एक ओडिशी डांसर थी, कबीर-प्रोतिमा की बेटी पूजा बेदी हैं, जोकि एक एक कोलमनिस्ट हैं। उनके दूसरे बेटे सिद्धार्थ, जो संयुक्त राज्य अमेरिका में कार्नेगी मेलॉन विश्वविद्यालय पढाई करने गये, जहां उन्हें स्किज़ोफ्रेनिया  बीमारी हो गयी और फिर उन्होंने आत्महत्या कर ली।

प्रोतिमा से शादी के बाद कबीर बेदी और फिल्म एक्ट्रेस परवीन बॉबी के लव अफेयर की अफवाहों ने खूब सुर्खियां बटोरी। वर्ष 1990 में कबीर ने निक्की बेदी से शादी रचाई, जोकि एक टीवी रेडियो प्रेजेंटर थी। दोनों का तलाक वर्ष 2005 में हो गया इसके बाद कबीर परवीन दोसांझ को डेट करने लगे, और उन्होंने अपने 70 वें जन्मदिन पर परवीन से शादी रचाई।

करियर 
कबीर बेदी ने भारतीय थिएटर में अपना करियर शुरू किया और फिर हिंदी फिल्मों में चले गए। बेदी भारत के पहले अंतरराष्ट्रीय कलाकारों में से एक हैं जिन्होंने हिंदी फिल्मों में शुरुआत की, हॉलीवुड की फिल्मों में काम किया और यूरोप में एक बेहतरीन स्टार के रूप में उभरे।

प्रासिद्ध फ़िल्में 
हलचल, सीम, सजा, इश्क इश्क इश्क, कच्चे धागे, अशांति, खून भरी मांग, मेरा शिकार ,आखरी कसम, कुर्बान, यलगार, मोहन-जोदारो,आतंक ही आतंक क्रांति,मै हूं ना, काइट्स, शैब बीवी और गैंगस्टर आदि।

उन्होंने 60 से अधिक भारतीय फिल्मों में अभिनय किया
📽️
1971 हलचल 
1972 राखी और हथकड़ी
1973 कच्चे धागे
1974 मंजिलें और भी हैं 
माँ बहन और बीवी 
इश्क इश्क इश्क
1975 अनाड़ी विक्रम
डाकू डाकू राजू
नागिन उदय
1976 हरफन मौला

जगदीश सेठी

#15jan
#12jun 
जगदीश सेठी

🎂जन्म 15 जनवरी 1903, पंजाबी गली, बम्बई, महाराष्ट्र
⚰️मृत 12,जून,1969 बम्बई

भारतीय अभिनेता , निदेशक थे
माना जाता है कि जगदीश एक ज्योतिषी भी थे।

उनका ओमेश नाम का एक बेटा था। वह इंडियन मर्चेंट नेवी में डेक मास्टर मेरिनर थे, 1993 में कार्डियक अरेस्ट से उनकी मृत्यु हो गई; मृत्यु के समय वह मुश्किल से पचास वर्ष के थे।

जदीश ने करीब 66 फिल्मों में एक्टर, डायरेक्टर, राइटर के तौर पर काम किया है। बतौर निर्देशक उन्होंने पांच फिल्मों दो दिल (1947), रात की रानी (1948), इंसान (1952), जग्गू (1952), पेंशनर (1954) में काम किया है।

उन्होंने लगभग 60 फिल्मों में अभिनेता के रूप में काम किया है; उनकी कुछ प्रसिद्ध रचनाएँ हैं आलम आरा (1931), शेर-ए-अरब (1930), प्रेसिडेंट (1937), कन्हान है मंजिल तेरी (1939)।

उन्होंने फिल्म रात की रानी (1948) में पटकथा लेखक, कहानी लेखक और निर्माता के रूप में भी काम किया है, जो उस समय एक बड़ी सफलता थी। जगदीश एक प्रसिद्ध गीतकार भी थे और उनकी रचनाएँ प्यार की राह दिखा दुनिया को, प्यारी सुरतो मोह भरी मुर्तो, सितम द हज़ारों शुक्र के आज भी वृद्ध लोगों के बीच प्रसिद्ध हैं।

12 जून 1969 को 63 वर्ष की आयु में जदीश सेठी का बुढ़ापे की बीमारी के कारण उनके घर पर निधन हो गया।
📽️
1931 आलम आरा
1931 द्रौपदी
1931 अनंगसेना
1932 शिकारी
1934 अनोखा प्रेम
1935 जोश-ए-इंतेक़ाम
1935 जहाँआरा
1936 भोले भाले   
1936/आई करोदपति 
1936 माया 
1936 पुजारिन
1939 बड़ी दीदी 
1939 जवानी की रीत 
1945 नीलम
1943 आबरू 
1943 इनकार 
1943 नमस्ते 
1943 बिचार 
1942 कीर्ति 
1942 तूफ़ान मेल की वापसी 
1942 स्टेशन मास्टर 
1942 तमन्ना 
1941 घर की लाज 
1941 कुरमई 
1941 सज्जन 
1940 चंबे दी काली 
1940 नर्तकी
1939 कपाल कुंडला 
1938 अधिकार 
1938 धरती माता 
1938 दुश्मन 
1938/आई स्ट्रीट सिंगर
1944 चल चल रे नौजवान 
1944 कादम्बरी 
1944 माँ बाप
1945 नीलम
1950 परदेस 
1949 रात की रानी 
1948 आज़ादी की राह पर 
1947 ज़ंजीर 
1946 फिर भी अपना है 
1946 रंगभूमि 
1945 आम्रपाली 
1945 चाँद तारा
1954 पेंशनभोगी 
1954 वारिस 
1954 इल्ज़ाम 
1952 दो राहा 
1952 जग्गू 
1952 नौ बहार
निर्देशक
1952 इंसान
1952 जग्गू
1947 दो दिल

संगीतकाऱ राजकमल

 
#01sep
#15jan 
संगीतकाऱ राजकमल 
राज कमल 
जन्म की तारीख और समय: 15 जनवरी 1928, मथानिया
मृत्यु की जगह और तारीख: 1 सितंबर 2005, भारत
माता-पिता: तुलसीदास
🎂15 जनवरी 1921 
⚰️ 01 सितंबर 2005

 एक प्रसिद्ध भारतीय संगीतकार थे।  उन्होंने क्लासिकल संगीत की रचना की जैसे कि अविस्मरणीय चश्म-ए-बद्दूर,कहाँ से आये बदरा, काली घोडी द्वार खड़ी, सावन कोई आने  चाँद जैसे मुखडे पे केजे येशुदास, तकदीर से कोई आनंद सी आनंद द्वारा गाया गया गीत, और कई अन्य मशहूर गाने।  उन्होंने बी आर चोपड़ा के क्लासिक टेलीविजन शो महाभारत के लिये संगीत की रचना की

संगीतकार राज कमल का जन्म 15 जनवरी 1921 में राजस्थान के मथानिया नामक गाँव में हुआ था जन्म के बाद उनका नाम दलपत रखा गया, जिसे उन्होंने बाद में बॉलीवुड के लिए राज कमल में बदल दिया।  वह 5 बच्चों में सबसे बड़े थे।  राज कमल अपने पूरे परिवार के साथ बंबई आए;  उनके पिता को उनके भाई, तबला वादक पं0 बंसीलाल भारती के यहाँ रखवा दिया शादी के बाद राज कमल और उनकी पत्नी सागर के 6 बच्चे हुए - चंद्र कमल, सूर्य कमल, विनय कमल, हृदय कमल, शुभ कमल और एक बेटी।  उनके तीन बड़े बेटे सभी संगीतकाऱ हैं।  राज कमल के एक और चाचा, गायक आनंदकुमार सी। भी बॉलीवुड में शामिल हुए और उन्होंने राज कमल की कई रचनाएँ गाईं।

राज कमल की मृत्यु अल्जाइमर रोग से 1 सितंबर 2005 को 84 वर्ष की आयु में हुई,

सरदुल सिकंदर


#15jan
#24feb 
सरदूल सिकंदर
🎂जन्म 15 जनवरी, 1961
जन्म भूमि गांव खेड़ी नौद, पंजाब
⚰️मृत्यु 24 फ़रवरी, 2021
मृत्यु स्थान चंडीगढ़, पंजाब
अभिभावक पिता- सागर मस्ताना
पति/पत्नी अमर नूरी
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र गायिकी
मुख्य फ़िल्में 'जग्गा डाकू', 'पुलिस इन पॉलीवुड' आदि।
प्रसिद्धि पंजाबी गायक व अभिनेता
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी सरदूल सिकंदर ने सिंगिंग कॅरियर में 25 से ज़्यादा अल्बम रिकॉर्ड किए। गायकी में अपने कदम जमाने के बाद उन्होंने दूसरी पारी की शुरुआत सन 1991 में आई फ़िल्म ‘जग्गा डाकू’ से की थी।
पंजाबी भाषा के लोक और पॉप संगीत से जुड़े प्रसिद्ध गायक तथा अभिनेता थे। सन 1980 के दशक में सरदूल सिकंदर ने अपनी पहली अलबम "रोडवेज दी लारी" निकाली थी। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने कई हिट गाने दिए। इसके अलावा फ़िल्मों में भी अपने अभिनय का लोहा मनवाया। सरदूल सिकंदर ने पंजाबी फ़िल्म 'जग्गा डाकू' में शानदार अभिनय से अपनी अभिनय कला से सबका दिल जीत लिया था।

परिचय
पंजाब का फतेहगढ़ ज़िला। उसी का छोटा सा गांव खेड़ी नौद सिंह। 15 जनवरी, 1961 में सागर मस्ताना के घर एक लड़के का जन्म हुआ। नाम रखा गया सरदूल सिकंदर। सरदूल के अलावा सागर मस्ताना के दो बड़े बेटे भी थे। गम्दूर अमन और भरपूर। गम्दूर एक सूफी सिंगर थे। वहीं, भरपूर का वास्ता रहता था तबले से। पेशे से एक तबला वादक थे। खुद इनके पिता सागर मस्ताना अपने समय के महान तबला वादकों में गिने जाते हैं। संगीत से जुड़ी क्रिएटिविटी को सिर्फ सुरों में ही नहीं उतारते थे। बल्कि, नए-नए तबले बनाने की कोशिश में भी लगे रहते थे। इसी कोशिश में एक अलग किस्म का तबला भी ईजाद किया। जिसे बारीक बांस की लड़की से भी बजाया जा सकता था।
30 जनवरी, 1993 को सरदूल सिकंदर की शादी गायिका अमर नूरी से हुई। दोनों लंबे वक्त से साथ गा रहे थे। इसी दौरान प्यार हुआ। सरदूल की तरह अमर ने भी छोटी उम्र से म्यूज़िक सीखना शुरू कर दिया था। नौ साल की उम्र में गाना शुरू किया और 13 साल की उम्र में पहली रिकॉर्डिंग की। आगे चलकर सिंगिंग की दुनिया में खूब नाम कमाया। दोनों पति-पत्नी ने साथ मिलकर कई इंटरनेशनल म्यूज़िक टूर किए। जुगलबंदी ऐसी कि दोनों के सुर लय में दौड़ते। लेकिन इनकी ये केमिस्ट्री सिर्फ स्टेज तक ही नहीं थी। रियल लाइफ में भी उतनी ही मज़बूत थी।

कुछ साल पहले ही इसका नमूना भी देखने को मिला। दरअसल, सरदूल की किडनी में खराबी की वजह से ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ी। यानि किसी को अपनी किडनी उन्हें डोनेट करनी पड़ेगी। दोस्तों, रिश्तेदारों की तरफ देखा। लेकिन सब ने चुपचाप दूरी बना ली। ऐसे मुश्किल वक्त पर करीबियों का ऐसा बर्ताव देखकर सरदूल तनाव में आ गए। चिंता होने लगी कि अब पता नहीं क्या होगा। अमर नूरी ने उन्हें हिम्मत दी। वादा किया कि जब तक मैं हूं, आपको कुछ नहीं होने दूंगी। और फिर अपनी बात साबित करके दिखाई। सरदूल का ब्लड ग्रुप ए पॉज़िटिव था। वहीं, अमर का ब्लड ग्रुप ओ पॉज़िटिव था। ओ पॉज़िटिव को यूनिवर्सल डोनर कहा जाता है। यानि कि वो ब्लड ग्रुप जो किसी को भी डोनेट कर सकता है। अमर को विश्वास था कि जहां दिल मिल सकते हैं, तो क्या किडनियां नहीं मिलेंगी। सुनने में शायद फ़िल्मी लगे। लेकिन उनका ये विश्वास सही साबित हुआ और सरदूल के लिए उन्होंने अपनी किडनी डोनेट की।
कहना गलत नहीं होगा कि सरदूल सिकंदर को संगीत विरासत में मिला। उनकी कई पुश्तें खुद को संगीत के प्रति समर्पित कर चुकी थीं। लेकिन सागर मस्ताना नहीं चाहते थे कि छोटा बेटा भी अपनी पूरी ज़िंदगी संगीत के नाम कर दे। कारण था उस समय में शास्त्रीय संगीत का सिकुड़ा हुआ स्कोप। आज के समय की तरह ना ही इतने संसाधन थे, और ना ही इतना पैसा। उधर, सरदूल का म्यूज़िक से सिर्फ प्यार था। उसकी ओर रुझान नहीं। चाहते थे कि बड़े होकर पायलट बनें। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था। सरदूल के पिता बच्चों को संगीत सिखाते थे। सरदूल को इजाज़त नहीं थी कि वो भी साथ बैठकर सीख सकें। लेकिन मन में संगीत सीखने की इच्छा भी थी। फिर उसे तृप्त करने का जुगाड़ निकाला। जब पिता बच्चों को संगीत सिखा रहे होते, तो उस समय दीवार की आड़ लेकर खुद भी चुपचाप सुनते रहते। ये सिलसिला कई दिनों तक चला।

एक दिन पिता ने बच्चों को नई सरगम सिखाई। सब से उसे दोहराने को कहा। लेकिन एक भी बच्चा सही से नहीं दोहराया पाया। सब के जाने के बाद सरदूल उस सरगम को दोहराने की कोशिश करने लगे। तभी उनके पिता की नज़र पड़ी। सरदूल को लगा कि अब तो जमकर पिटाई होगी। पर ऐसा हुआ नहीं। पिता ने सरदूल से वही सरगम गाने को कहा। डरते-डरते सरदूल ने कोशिश की। इसके बाद पिता ने नन्हें सरदूल को गोद में उठा लिया। क्यूंकि सरदूल ने बिना किसी प्रैक्टिस के सही गाया था। पिता को बेटे का हुनर नज़र आ गया। जिसके बाद सरदूल को संगीत सीखने की इजाज़त दे दी।

संघर्ष का समय

एचएमवी उस दौर की बहुत बड़ी म्यूज़िक कंपनी थी। यानि जिस सिंगर को एचएमवी ने साइन कर लिया, उसके तो दिन फिर गए। सरदूल भी ऐसे ही सिंगर्स की लिस्ट में अपना नाम देखना चाहते थे। सरदूल सिकंदर के परिवार की आर्थिक स्थिति ज़्यादा मज़बूत नहीं थी एचएमवी का ऑफिस था दिल्ली में। जाने लायक किराये का जुगाड़ करना भी मुश्किल। थोड़ा बहुत पैसा दोस्तों से उधार ले लेते। फिर भी पूरा नहीं हो पाता। न्यूज़ पेपर वाली वैन दिल्ली तक जाती थी। सोचा कि क्यूं ना उसी से सफर किया जाए। बस के मुकाबले तो कम ही पैसे देने पड़ेंगे। लेकिन न्यूज़ पेपर वैन के साथ एक समस्या थी कि ये सुबह 4:30 बजे दिल्ली पहुंच जाती थी और एचएमवी का ऑफिस खुलता था 10 बजे के बाद। इस बीच सरदूल किसी पार्क में जाकर सो जाया करते। अक्सर गश्त पर निकली पुलिस पार्क में सोए लोगों को उठा देती। डंडे मारती। कहती कि रात को यहां सोते हो और दिन में चोरियां करते हो। पार्क में सोने से सरदूल सिकंदर को एक और नुकसान होता। कपड़े गंदे हो जाते और इन गंदे कपड़ों के साथ जब भी HMV के दफ्तर पहुंचते, तो वापस ही लौटा दिए जाते।

सफलता
सरदूल सिकंदर सिर्फ बेहतरीन गले के ही धनी नहीं थे। बल्कि, वे तुम्बी भी बड़ी अच्छी बजाते थे। अक्सर तुम्बी की रिकॉर्डिंग पर भी जाया करते थे। एक ऐसे ही मौके पर करतार रमला के स्टूडियो में रिकॉर्ड कर रहे थे। रिकॉर्डिंग खत्म कर बाहर निकले और कुछ ऐसे ही गुनगुनाने लगे। उनकी आवाज़ अंदर बैठे म्यूज़िशियन के कानों में पड़ी। जो उठकर बाहर आए। सरदूल सिकंदर से पूछा कि क्या अभी तुम गा रहे थे। सरदूल को लगा कि अंदर रिकॉर्डिंग चल रही थी और उनके गाने से उसमें भंग पड़ गया। म्यूज़िशियन उन्हें सीधा चरणजीत आहूजा के पास ले गए। सरदूल के बारे में उन्हें बताया। चरणजीत ने HMV के मैनेजर को बुलाया। कहा कि इस लड़के को मौका दीजिए। मैनेजर ने साफ इनकार कर दिया। कहा कि नए लड़के के साथ रिस्क नहीं ले सकते।

इसके बाद चरणजीत आहूजा ने खुद सरदूल का पहला अल्बम रिकॉर्ड करवाया जिसका नाम था ‘रोडवेज़ दी लारी’। अल्बम रिलीज़ होते ही लोगों की ज़बान पर इसके गाने चढ़ गए। अल्बम हिट साबित हुआ। इसके लिए सरदूल को 10 हज़ार रुपए मिले। अल्बम हिट होने के बावजूद लोग सरदूल सिकंदर को नहीं पहचानते थे। वजह थी उनकी आवाज़ में वेरिएशन। ज़्यादातर लोगों को लगता था कि ये गाने किसी जमे हुए सिंगर ने गाए हैं। किसी नए सिंगर ने नहीं। लोगों का ये भ्रम भी टूटा। जब सरदूल सिकंदर दूरदर्शन जालंधर के एक प्रोग्राम में परफॉर्म करने पहुंचे। लोग अब जान गए कि ये गाने किसके हैं। उसके बाद कभी सरदूल को पीछे मुड़कर देखने की जरूरत नहीं पड़ी।

24 फ़रवरी, 2021 को सरदूल सिकंदर की मृत्यु हुई। वह मोहाली के फोर्टिस हॉस्पिटल में भर्ती थे। कोरोना विषाणु से पॉज़िटिव पाए जाने के बाद उनकी तबीयत लगातार बिगड़ती चली गई। उससे पहले किडनी ट्रांसप्लांट भी हुआ था। सरदूल सिकंदर को जानने वाले लोग यही कहते हैं कि वो एक ज़िंदादिल इंसान थे। हमेशा ज़मीन से जुड़े रहे। शायद यही कारण था कि जनता के दिलों में ऐसी जगह बना पाए। अपने जाने के बाद ऐसा रिक्त स्थान छोड़ गए, जिसे भरना असंभव है।

पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने सरदूल सिकंदर के निधन पर गहरा दु:ख जताया। अमरिंदर सिंह ने ट्वीट करते हुए लिखा, "महान पंजाबी गायक सरदूल सिकंदर के निधन के बारे में जानकर बहुत दु:ख हुआ। हाल ही में उनकी कोरोना वायरस की जांच की गई थी और उनका इलाज चल रहा था। उनके परिवार और प्रशंसकों के प्रति मेरी हार्दिक संवेदना"।




नील नितिन मुकेश

#15jan 

नील नितिन मुकेश
नील नितिन मुकेश चंद माथुर
प्रसिद्ध नाम 
नील नितिन मुकेश

🎂जन्म 15 जनवरी, 1982
जन्म भूमि मुंबई, महाराष्ट्र

अभिभावक माता - निशि मुकेश माथुर
पिता- नितिन मुकेश माथुर

पति/पत्नी रुक्मिणी सहाय
संतान एक
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र अभिनय
मुख्य फ़िल्में ‘जॉनी गद्दार’, ‘7 खून माफ’, ‘साहो’, 'आ देखे जरा', 'लफंगे परिंदे' और 'तेरा क्या होगा जॉनी' आदि।
शिक्षा कॉमर्स से स्नातक
विद्यालय ग्रीनलान हाईस्कूल, मुंबई
प्रसिद्धि अभिनेता
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी नील नितिन मुकेश ने अपने फ़िल्मी कॅरियर की शुरुआत वर्ष 2007 में बतौर अभिनेता श्रीराम राघवन की एक्शन-थ्रिलर फिल्म 'जॉनी गद्दार' से की थी।

भारतीय अभिनेता हैं। वह मुख्यतः हिंदी फिल्मों में नजर आते हैं। एक अभिनेता होने के साथ-साथ वह लेखक और प्रोड्यूसर भी हैं। नील नितिन मुकेश के पिता नितिन मुकेश थे जो हिन्दी फिल्मों के प्रसिद्ध गायक हैं। यही नहीं नील नितिन मुकेश अपने समय के ख्यातिप्राप्त गायक मुकेश के पोते हैं। इन्होंने ‘जॉनी गद्दार’, ‘7 खून माफ’, ‘साहो’ जैसी फिल्में की हैं। ‘बाईपास रोड’ नाम की एक फिल्म को नील नितिन मुकेश ने प्रोड्यूस किया था।वह बॉलीवुड के मशहूर गायक मुकेश के पोते हैं। उनके पिता का नाम नितिन मुकेश माथुर हैं, जो हिंदी सिनेमा में पार्श्वगायक हैं। उनकी माँ का नाम निशि मुकेश माथुर है।

नील नितिन मुकेश ने अपनी शुरुआती पढ़ाई ग्रीनलान हाईस्कूल मुंबई से पूर्ण की। वह कॉमर्स से ग्रेजुएट हैं। उनका पूरा परिवार संगीत से ताल्लुकात रखता है, उसके बाद भी उन्होंने एक्टिंग में अपना कॅरियर चुना। उन्होंने अपने एक इंटरव्यू में कहा कि संगीत मेरा शौक है, लेकिन एक्टिंग मेरा पैशन है। एक अच्छा अभिनेता बनने के लिए नील ने नमित कपूर के एक्टिंग स्कूल से अभिनय में चार महीने प्रशिक्षण भी प्राप्त किया है। इसके अलावा उन्होंने बॉलीवुड के मंझे हुए अभिनेता अनुपम खेर से भी एक्टिंग के गुर सीखे हैं।

नील नितिन मुकेश ने अपने फ़िल्मी कॅरियर की शुरुआत वर्ष 2007 में बतौर अभिनेता श्रीराम राघवन की एक्शन-थ्रिलर फिल्म 'जॉनी गद्दार' से की थी। इस फिल्म में उनके अभिनय को आलोचकों द्वारा काफी सराहा गया था। साथ ही वह इस फिल्म के फिल्मफेयर अवार्ड्स के लिए सर्वश्रेष्ठ नवोदित कलाकार के लिए नामंकित भी हुए थे। साल 2009 में वह फिल्म 'आ देखे जरा' में नजर आये। इस फिल्म में उनके अपोजिट बिपाशा बासु नजर आयीं थीं। फिल्म ने बॉक्स-ऑफिस पर औसत व्यापार किया था। इस फिल्म के लिए नील को आलोचकों से मिली-जुली प्रतिक्रिया मिली थी।

इसके बाद वह निर्देशक कबीर खान की फिल्म न्यूयॉर्क में नजर आये। इस फिल्म में उनके अलावा कैटरीना कैफ और जॉन अब्राहम भी दिखाई दिए थे। फिल्म की पृष्ठकथा आंतकवादी गतिविधियों पर आधारित थी। इस फिल्म में नील सहायक अभिनेता के तौर पर नजर आये थे, जिसे दर्शकों और आलोचकों द्वारा बेहद सराहा गया था। इस फिल्म के लिए नील को उनका दूसरा सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता के तौर फिल्मफेयर अवार्ड्स में नामंकन मिला था। फिर मधुर भंडारकर निर्देशित फिल्म 'जेल' में नील नितिन मुकेश नजर आये। इस फिल्म में वह न्यूड नजर आये थे। जो काफी विवादित भी रहा था। हालांकि यह फिल्म बॉक्स-ऑफिस पर बुरी तरह असफल साबित हुई थी, लेकिन नील को आलोचकों द्वारा उनकी बेहतरीन भूमिका के लिए काफी अच्छी प्रतिक्रिया मिली।
साल 2010 में नील नितिन मुकेश फिल्म 'लफंगे परिंदे' और 'तेरा क्या होगा जॉनी' में नजर आये थे। दोनों ही फ़िल्में बॉक्स-ऑफिस पर औंधे मुंह गिरी थीं। साल 2011 तक उन्होंने कई फिल्मों में काम किया, लेकिन कोई भी फिल्म उन्हें हिंदी सिनेमा में कोई खास मुकाम हासिल नहीं करा सकी। साल 2015 में नील नितिन मुकेश सूरज बड़जात्या की फिल्म 'प्रेम रत्न धन पायो' में सलमान ख़ान के संग नजर आये। इस फिल्म में वह सौतेले भाई की भूमिका में थे।

सजन लाल पुरोहित

#15jan
#17may 
सज्जन लाल पुरोहित
🎂15 जनवरी 1921
जयपुर , जयपुर राज्य , ब्रिटिश भारत

⚰️17 मई 2000 
मुंबई , महाराष्ट्र , भारत

सज्जन फिल्म अभिनेता, मंच अभिनेता, गीतकार थे.

उन्होंने 1950 से 1980 के दशक तक कई नाटकों और फिल्मों में अभिनय किया।
उनकी सबसे प्रसिद्ध फिल्में बीस साल बाद, चलती का नाम गाड़ी, अप्रैल फूल, रेल का डिब्बा और झुमरू हैं।
साजन का जन्म 15 जनवरी 1921 को जयपुर में एक कश्मीरी पंडित परिवार में हुआ था। उनका पूरा नाम सज्जन लाल पुरोहित था, लेकिन भारतीय फिल्म उद्योग में उन्हें उनके पहले नाम से ही जाना जाता था । सज्जन ने जोधपुर के जसवन्त कॉलेज से स्नातक की उपाधि प्राप्त की । उनकी इच्छा वकील बनने की थी, लेकिन अभिनेता बनने की नहीं।
1941 में, वह कलकत्ता पहुंचे और ईस्ट इंडिया कंपनी की एक प्रयोगशाला में प्रशिक्षु के रूप में काम किया । फिल्मों में उनकी प्रारंभिक सफलता मासूम (1941) और चौरंगी (1942) जैसी फिल्मों में एक अतिरिक्त कलाकार के रूप में थी । द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सज्जन ने कलकत्ता छोड़ दिया और मुंबई पहुँचे जहाँ उन्होंने प्रसिद्ध निर्देशक किदार शर्मा के सहायक के रूप में काम किया । उस समय महान शोमैन राज कपूर भी शर्मा के सहायक थे। उन्होंने गजानन जागीरदार और वकील साहब के सहायक के रूप में भी काम किया और वेतन के रूप में 35 रुपये प्राप्त किये।

दिल से कवि सज्जन ने अपनी प्रतिभा तब दिखाई जब उन्होंने मीना (1944) के लिए संवाद और दूर चलें (1946) और धन्यवाद (1948) के लिए गीत लिखे। उन्होंने पृथ्वी थिएटर में छोटी भूमिकाओं में भी अभिनय किया । उनकी अभिनय की पहली फिल्म धन्यवाद थी । उसके बाद 1950 में बॉम्बे थिएटर की मुकद्दर रिलीज़ हुई। नायिका थीं नलिनी जयवंत ।

तब तक सज्जन फिल्मों में अच्छी तरह स्थापित हो चुके थे। 1950 और 1960 के दशक में उन्होंने सैयां , रेल का डिब्बा , बहना , शीशा , मालकिन , निर्मोही , कस्तूरी , मेहमान , लगन , गर्ल स्कूल , परिधान , 00 दूल्हे , घर-घर में जैसी फिल्मों में हीरो या साइड हीरो के रूप में काम किया। दियोअली , हा-हा-ही-ही-हू-हू , पूनम झांझर और हल्ला-गुल्ला । नायक के रूप में, उनकी आखिरी फिल्में काबुलीवाला और दो चोर थीं , और एक कलाकार के रूप में वह आखिरी बार 1986 में रिलीज हुई फिल्म शत्रु में राजेश खन्ना के साथ दिखाई दिए ।

150 से ज्यादा फिल्मों के कलाकार सज्जन ने टीवी सीरियल्स में भी काम किया। विक्रम और बेताल में उन्होंने बेताल का किरदार निभाया था । उनका दूसरा सीरियल लेना-देना था .
📽️
1948 मजबूर 
1948 धन्यावद 
1949 इम्तिहान 
1949 लड़कियों का स्कूल
1950 संग्राम 
1950 मुकद्दर 
1950 अपनी छाया 
1951 तूफान 
1951 सैयान 
1951 कश्मीर
1951 कश्मीर 
1951 हम लोग 
1952 नज़रिया 
1952 शीशा 
1952 पूनम
1953 रेल का डिब्बा 
1953 मेहमान 
1953 मॉल्किन 
1954 परिचय 
1954 कस्तूरी 
1954 हल्ला गुल्ला 
1955 डूबा हुआ जहाज़ 
1955 हूर-ए-अरब 
1955 हा हा ही ही ही हो हो
1955 घर घर में दिवाली 
1955 दुल्हे करो 
1955 बंदिश
1956 परिवार 
1956 ढाके की मलमल 
1957 श्री एक्स 
1957 सशुल्क अतिथि 
1957 बड़े सरकार 
1958 चलती का नाम गाड़ी 
1958 तलाक
1958 हथकड़ी 
1959 तूफ़ानी तिरंदाज़ 
1959 महारानी पद्मिनी 
1959 चंद
1959 दीदी
1960 सरहद
1960 बारात 
1960 बहाना
1961 काबुलीवाला 
1961 मेरा सुहाग 
1961 झुमरू
1962 बीस साल बाद 
1963 ये दिल किसको दूं
1964 दाल में काला 
1964 इशारा
1964 दूर गगन की छाँव पुरुष 
1964 पहली अप्रैल को बनाया गया मूर्ख
1965 चांद और सूरज 
1965 आधी रात के बाद
1966 तसवीर 
1966 सावन की घटा
1966 लाल बंगला 
1966 दिल दिया दर्द लिया 
1967 राम और श्याम
1967 रुस्तम सोहराब 
1967 हमारे गम से मत खेलो 
1967 फर्ज़
1967 अनीता 
1967 एक आदमी 
1968 आंखें
1968 आशीर्वाद
1968 आँचल के फूल 
1969 'संबंध' 
1969 तलाश
1970 सौ साल बीत गए 
1970 प्रेम पुजारी
1970 पगला कहीं का कैदी 
1970 एक नन्हीं मुन्नी लड़की थी 
1971 जाने-अनजाने
1971 पतंगा 
1971 लड़की पसंद है
1971 दुश्मन 
1971 करो बूंद पानी हरि
1972 कामना 
1972 भावना 
1972 यार मेरा
1972 राजा जानी
1972 परछाइयां
1972 एक खिलारी बावन पत्ते
1972 एक बार मूसकुरा दो 
1972 चोर करो 
1972 बुनियाद 
1973 जय हनुमान 
1973 छिपा रुस्तम 
1973 यौवान
1973 सूरज और चंदा 
1973 समझौता
1973 फागुन 
1973 छलिया 
1973 अग्नि रेखा 
1974 क्षितिज
1972 दो बच्चे दस हाथ
1974 जब अंधेरा होता है
1974 अमीर गरीब 
1974 रेशम की डोरी
1974 मजबूर 
1974 ज़हरीला इंसान 
1974 प्रेम शास्त्र
1975 संध्या 
1975 Samasya 
1975 कैद 
1975 फ़रार 
1975 तूफान 
1975 सलाखें
1976 दस नंबरी 
1976 चरस (1976 फ़िल्म)
1976 सज्जो रानी
1977 ममता 
1977 इमान धरम
1977 दरिंदा 
1977 डार्लिंग डार्लिंग
1977 खेल खिलारी का
1977 चालू मेरा नाम 
1977 आफत 
1978 चोर के घर चोर
1979 ढोंगी 
1980 धन दौलत
1980 दो और दो पांच
1980 दोस्ताना  
1981 क्रोधी 
1981 हक़दार 
1981 प्रेम गीत 
1981 कालिया
1981 रक्षा
1981 प्रोफेसर प्यारेलाल 
1981 नई इमारत
1980 टैक्सी चोर 
1982  हाथकड़ी (1982 फ़िल्म)
1982 ख़ुद-दार 
1982 लोग क्या कहेंगे
1980 कातिल कौन
1983 अच्छा बुरा 
1983/आई कुली
1984 हम दो हमारे दो 
1984 प्रेम विवाह 
1985 आँधी-तूफ़ान
1985 फिर आई बरसात 
1986 मकार 
1986 शत्रु 
1987 मेरा करम मेरा धरम
1996 मुट्ठी भर ज़मीन 
1996 आतंक
📺
1985-1988 विक्रम और बेताल (टीवी श्रृंखला) बेताल

मनुस्मृति

. ................मनुस्मृति.................... जरा सोचिए, अगर आज भारत का कानून यह तय कर दे कि— "एक आम आदमी चोरी करे तो उसे...