सोमवार, 18 दिसंबर 2023

ओमप्रकाश (बक्शी)

ओम प्रकाश बक्शी
🎂जन्म 19 दिसंबर, 1919
जन्म भूमि जम्मू
⚰️मृत्यु 21 फ़रवरी, 1998
मृत्यु स्थान मुम्बई
कर्म भूमि मुम्बई
कर्म-क्षेत्र सिनेमा
मुख्य फ़िल्में 'पड़ोसन', 'जूली', 'दस लाख', 'चुपके-चुपके', 'बैराग', 'शराबी', 'नमक हलाल', 'प्यार किए जा', 'खानदान', 'चौकीदार', 'लावारिस', 'आंधी', 'लोफर', 'ज़ंजीर' आदि।
प्रसिद्धि चरित्र अभिनेता
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी फ़िल्म 'नमक हलाल' का दद्दू और 'शराबी' का मुंशीलाल बनकर ओमप्रकाश ने प्रत्येक भारतीय के दिल में जगह बनाई।
 🎂जन्म: 19 दिसंबर, 1919 जम्मू; 
⚰️मृत्यु: 21 फ़रवरी, 1998 मुम्बई) भारतीय सिनेमा जगत में प्रसिद्ध चरित्र अभिनेता थे। ओमप्रकाश ने लगभग 350 फ़िल्मों में काम किया। उनकी प्रमुख फ़िल्मों में 'पड़ोसन', 'जूली', 'दस लाख', 'चुपके-चुपके', 'बैराग', 'शराबी', 'नमक हलाल', 'प्यार किए जा', 'खानदान', 'चौकीदार', 'लावारिस', 'आंधी', 'लोफर', 'ज़ंजीर' आदि शामिल हैं। उनकी अंतिम फ़िल्म 'नौकर बीवी का' थी। महानायक अमिताभ बच्चन की फ़िल्मों में वे ख़ासे सराहे गए। 'नमक हलाल' का दद्दू और 'शराबी' का मुंशीलाल बनकर ओमप्रकाश ने प्रत्येक भारतीय के दिल में जगह बनाई।
उनकी शिक्षा-दीक्षा लाहौर में हुई। उनमें कला के प्रति रुचि शुरू से थी। लगभग 12 वर्ष की आयु में उन्होंने शास्त्रीय संगीत की शिक्षा लेनी शुरू कर दी थी। 1937 में ओमप्रकाश ने 'ऑल इंडिया रेडियो सीलोन' में 25 रुपये वेतन में नौकरी की थी। रेडियो पर उनका 'फतेहदीन' कार्यक्रम बहुत पसंद किया गया।

अभिनय का प्रारम्भ

उन दिनों ओम प्रकाश 'अविभाजित भारत' के 'लाहौर रेडियो स्टेशन' पर स्थायी कलाकार के रूप में कार्यरत थे, और उनकी आवाज़ के जादू से सारा ज़माना परिचित था। द्वितीय महायुद्ध के समय की बात है। ओमप्रकाश को रावलपिण्डी से लाहौर तक का सफर करना था। फ़ौज़ी जवानों से ठसाठस भरी रेलगाडि़यां, और उस भीड़ के बावजूद यात्रा की अनिवार्यता।

तीसरे दर्जे़ का रेल-टिकट था ओमप्रकाश के पास, और घुसने की जगह थी मात्र पहले दर्जे़ में – और वह भी तीन-चार अंगरेज़ सैनिकों के मध्य। मजबूरन उसी डिब्बे में घुसकर जगह बनाने की कोशिश कर डाली ओमजी ने, और अपने उन प्रयत्नों में उनको किंचित सफलता भी मिली।  सैनिक अधिकारी अपने अनजाने,  अनचीन्हें लहज़े में गिटपिट किये जा रहे थे उस समय, और ओमप्रकाश उनकी उस टामी अंगरेज़ी से सर्वथा अनभिज्ञ यह नहीं समझ पा रहे थे कि आखि़र किस तरह वह उन लोगों की बातचीत में  कोई हिस्सा लें।

तभी उनके दिमाग़ में आया – क्यों न उन लोगों के सामने गूँगे का अभिनय कर डाला जाये? इज़्ज़त तो कम से कम बच ही जायेगी ऐसा करने से। और क़िस्सा -कोताह यह कि खानपान, सुरासेवन आदि के बाद फ़ौज़ी अफ़सरों ने जब ओमप्रकाश से पूछा कि क्या वह जन्म से ही गूंगे हैं तो ओमजी ने इस खबसूरती से अपना सर हिलाया जिससे न यह मालूम हो सकता था कि वह गूंगे हैं और न यही कि वह गूंगे नहीं हैं। सैनिक अधिकारियों के मन में उनके प्रति सहानुभूति जगी. उन्होंने ओमजी को न सिफऱ् भरपूर खिलाया-पिलाया बलिक लेटने के लिये एक पूरी बर्थ भी उनके हवाले कर दी. सुबह होने पर अँग्रेजी ढंग का ब्रेकफ़ास्ट भी उनको मिला और ख़ूब मज़े के साथ उनकी वह यात्रा सम्पन्न हो गयी।

लेकिन लाहौर पहुंचने पर इस अभिनय का पटाक्षेप जब हुआ तो वह सैनिक अधिकारी भी हंसी से सराबोर हो उठे जिन्होंने अपंग समझ कर ओमप्रकाश की इतनी खातिरबाजी की थी। हुआ यह कि जो व्यक्ति ओमजी को लेने स्टेशन आया था उसने पूछ ही लिया – 'कहो बर्खुरदार, सफ़र कैसा कटा?'

सैनिक अधिकारी घूर घूर कर ओमजी की ओर देखते जा रहे थे, और ओम थे कि उनकी ज़बान ही सिमटती जा रही थी। तभी, अपने आत्मविश्वास का संचय करते हुए ओमप्रकाश बोल उठे – 'माफ़ कीजिएगा, बिरादरान, आप लोगों की यह लंगड़ी अँग्रेजी मेरे भेजे के अन्दर नहीं घुस पा रही थी, इसीलिये मुझे गूंगे का अभिनय करना पड़ गया। वैसे यह न समझ लीजिएगा कि अँग्रेजी ज़बान मुझे नहीं आती, मैं भी लाहौर यूनिवर्सिटी में पढ़ चुका हूं और उनकी इस बात को सुनते ही उपस्थित लोगों के मध्य हंसी का जो दौर-दौरा शुरू हुआ था उसकी समाप्ति ओमजी के स्टेशन छोड़ने के बाद ही हो पायी।

फ़िल्मी सफ़र
हिन्दी फ़िल्म जगत में ओमप्रकाश का प्रवेश फ़िल्मी अंदाज़में हुआ। वह अपने एक मित्र के यहां शादी में गए हुए थे, जहां पर 'दलसुख पंचोली' ने उन्हें देखा और तार भेजकर उन्हें लाहौर बुलवाया। दलसुख पंचोली ने फ़िल्म ‘दासी’(1950) के लिए ओम प्रकाश को 80 रुपये वेतन पर अनुबंधित कर लिया। यह ओमप्रकाश की पहली बोलती फ़िल्म थीं। संगीतकार सी. रामचंद्र से ओमप्रकाश की अच्छी दोस्ती थी। इन दोनों ने मिलकर ‘दुनिया गोल है’, ‘झंकार’, ‘लकीरे’ आदि फ़िल्मों का निर्माण किया। उसके बाद ओमप्रकाश ने खुद की फ़िल्म कंपनी बनाई और ‘भैयाजी’, ‘गेट वे ऑफ इंडिया’, ‘चाचा ज़िदांबाद’, ‘संजोग’ आदि फ़िल्मों का निर्माण इस कम्पनी के अंतर्गत किया।

हास्य अभिनेता

क्लासिक फ़िल्म 'प्यार किये जा' का वह दृश्य लें जब महमूद और ओम प्रकाश के बीच एक हॉरर फ़िल्म की कहानी सुनाई जाती है। ओम प्रकाश यहाँ निश्चित रूप से एक 'फॉइल' की भूमिका अदा कर रहे हैं और उनके शानदार प्रदर्शन से ही महमूद का कहानी सुनाना जीवंत हो पाता है। ओम प्रकाश की भूमिका यहाँ (बिना किसी संवादों के) एकदम निष्क्रिय सी है लेकिन उनकी प्रतिक्रियाओं की बदौलत ही दृश्य उस चरम तक पहुँच पाता है जब कैमरे के फ़्रेम से परे किसी तीसरी पार्टी की आवाज़ हस्तक्षेप करती है और दोनों एक आकस्मिक नीले रंग की रोशनी से सराबोर हो डर जाते हैं। यहाँ इन दोनों के बीच में एक शानदार लेन-देन है जो इनकी भूमिकाओं को और धार प्रदान करता है। जितना अधिक ओमप्रकाश डरते हैं अर्थात् जितना ज्यादा वे पिटे हुए आदमी का अभिनय करते हैं उतना ही दृश्य में मज़ा आता है। इसी सिलसिले में यह भी प्रचलित है कि जब महमूद को इस फ़िल्म में उनके प्रदर्शन के लिए पुरस्कार दिया गया, तब न सिर्फ़ उन्होंने अपने 'फॉइल' ओम प्रकाश को इसका पूरा श्रेय दिया बल्कि मंच से दर्शकों के बीच जाकर उनके पैर भी छुए। एक हास्य अभिनेता हमेशा अभिनय में सहयोगी के महत्व को समझता है और इसे विनम्रता से स्वीकार करता है।

आख़िरी समय
जिस खुले दिल से ओमप्रकाश ने दुनियादारी निभाई थीं इसके ठीक विपरित उनके अंतिम दिन गुजरे। उन्हीं दिनों ओमप्रकाश ने अपने साक्षात्कार में कहा था- 'सभी साथी एक एक करके चले गए। आगा, मुकरी, गोप, मोहनचोटी, कन्हैयालाल, मदनपुरी, केश्टो मुकर्जी आदि चले गए। बड़ा भाई बख्शीजंग बहादुर, छोटा भाई पाछी, बहनोई लालाजी, पत्नी प्रभा सभी तो चले गए...लाहौर में पैदा हुआ. बचपन में चंचल था। रामलीला प्ले में सीता बना करता था। क्लासिकल संगीत की खुजली थीं-10 साल सीखा। रेडियो सीलोन में खुद के लिखे प्रोग्राम पेश किया करता था। मेरा प्रोग्राम बहुत पापुलर हुआ। लोग मुझे देखते तो फतेहदीन नाम से पुकारते थे। असली नाम पर यह नाम हावी होने लगा।

रोचक तथ्य
‘मैंने कई फ़ाकापरस्ती के दिन भी देखे हैं, ऐसी भी हालत आई जब मैं तीन दिन तक भूखा रहा। मुझे याद है इसी हालात में दादर खुदादाद पर खडा था। भूख के मारे मुझे चक्कर से आने लगे ऐसा लगा कि अभी मैं गिर ही पडूंगा। क़रीब की एक होटल में दाखिल हुआ। बढिया खाना खाकर और लस्सी पीकर बाहर जाने लगा तो मुझे पकड लिया गया। मैनेजर को अपनी मजबूरी बता दी और 16 रुपयों का बिल फिर कभी देने का वादा किया। मैनेजर को तरस आ गया वह मान गया। एक दिन 'जयंत देसाई' ने मुझे काम पर रख लिया और 5,000 रुपये दिए। मैंने इतनी बडी रकम पहली बार देखी थीं। सबसे पहले होटल वाले का बिल चुकाया था और 100 पैकेट सिगरेट के ख़रीद लिए।’ -ओम प्रकाश
बहुत कम लोग जानते हैं कि ओमप्रकाश ने ‘कन्हैया’ फ़िल्म का निर्माण भी किया था, जिसमें राज कपूर और नूतन की मुख्य भूमिका थी।
कई रंगारंग व्यक्ति उनके जीवन में आए। इनमें चार्ली चैपलिन, पर्ल एस.बक, सामरसेट मॉम, फ्रेंक काप्रा, जवाहरलाल नेहरू जी भी शामिल हैं।
अओमप्रकाश के समय में हिंदी फ़िल्मों के बडे सितारे मोतीलाल, अशोककुमार, और पृथ्वीराज हुआ करते थे। अपने समय में लोग उन्हें ‘डायनेमो’ कहा करते थे।

रितेश देशमुख

रितेश देशमुख

#17dic 
स्क्रीन नाम रितेश देशमुख
के रूप में जन्मे रितेश विलासराव देशमुख
राष्ट्रीयता/नागरिकता भारतीय
जन्म (देश) भारत
जन्म (शहर, राज्य) लातूर, महाराष्ट्र
जन्म की तारीख 17 दिसंबर 1978
पिता विलासराव देशमुख
माँ वैशाली देशमुख
जीवनसाथी जेनेलिया डिसूजा (विवाह 3 फरवरी 2012)
बेटा रियान (जन्म 25 नवंबर 2014), राहिल (जन्म 1 जून 2016)
बॉलीवुड अभिनेता सलमान खान अभिनेता-निर्माता रितेश देशमुख की मराठी फ़िल्म 'यलो' से इतने ज़्यादा प्रभावित हैं कि वह इसे हिन्दी में बनाना चाहते हैं। सलमान खान ने 'यलो' की स्क्रीनिंग के मौके पर संवाददाताओं को बताया, "हम रितेश देशमुख से यह फिल्म हिन्दी में बनाने के लिए कह रहे हैं।.." सलमान खान ने इस मौके पर यह भी कहा कि फ़िल्म के हिन्दी संस्करण के लिए भी वह फ़िल्म के निर्देशक महेश लिमये और मुख्य कलाकार गौरी गाडगिल को ही लेंगे। 'यलो' में उपेंद्र लिमये, ऐश्वर्य नारकर, उषा नाडकर्णीऔर मृणाल कुलकर्णी मुख्य भूमिकाओं में हैं।
📽️
मरजावां (2019)
तुझे मेरी कसम
अलादीन
आउट ऑफ कंट्रोल
नमस्ते लंदन
अपना सपना मनी मनी
बैंकचोर
हमशकल्स
हाउसफुल
हाउसफुल 2
हाउसफुल 
3 (2016)
हाउसफुल 4 (2019)
ओम शांति ओम
मस्ती
ग्रैंड मस्ती
ग्रेट ग्रैंड मस्ती
मिस्टर या मिस
लयं भारी
वेलकम टु न्युयाॅर्क
बैंजो (2016)
तेरे नाल लव हो गया
हे बेबी
एंटरटेनमेंट (2014)
क्या कुल है हम
क्या सुपर कुल है हम
धमाल
मालामाल विक्ली
डबल धमाल
टोटल धमाल (2019)

सुरेश ओबराय

सुरेश ओबेरॉय
(अभिनेता)
#17dic 
सुरेश ओबेरॉय
17 दिसंबर 1946
 में विशाल कुमार ओबेरॉय  के रूप में जन्मे थे
राष्ट्रीयता/नागरिकता इतालवी
लिंग पुरुष
जन्म (देश) भारत
जन्म (शहर, राज्य) क्वेटा, बलूचिस्तान, ब्रिटिश भारत (अब बलूचिस्तान, पाकिस्तान)
जन्म की तारीख 17 दिसंबर 1946
जीवनसाथी यशोधरा ओबेरॉय (1 अगस्त, 1974)
बेटा विवेक ओबेरॉय
बेटी मेघना ओबेरॉय

एक भारतीय अभिनेता और राजनीतिज्ञ हैं हिंदी फिल्मों में नजर आईं। वह 1987सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारके प्राप्तकर्ता हैं। उन्होंने अपना करियर रेडियो शो, मॉडलिंग से शुरू किया और बाद में बॉलीवुडमें चले गए, जिससे वह एक लोकप्रिय चरित्र अभिनेता के पिता हैं। विवेक ओबेरॉय 1980 के दशक में और 1990 के अधिकांश भाग में। वह अभिनेता
ओबेरॉय का जन्म आनंद सरूप ओबेरॉय और करतार देवी के घर 17 दिसंबर 1946 को क्वेटा में हुआ था, फिर पूर्व-विभाजित ब्रिटिश भारत का बलूचिस्तान प्रांत।, पंजाबी, पश्तो वह  के रूप में राष्ट्रपति पुरस्कार जीता। अपने पिता की मृत्यु के बाद जब वह हाई स्कूल से बाहर थे, ओबेरॉय ने अपने भाई के साथ अपनी फार्मेसी श्रृंखला चलाना जारी रखा।बॉय स्काउट राज्य में स्थानांतरित हो गया। जहां उनके परिवार ने मेडिकल स्टोर्स की एक श्रृंखला स्थापित की। ओबेरॉय ने हैदराबाद के सेंट जॉर्ज ग्रामर स्कूल में पढ़ाई की और खेलों में सक्रिय थे। वह एक टेनिस और तैराकी चैंपियन थे, बाद में उन्होंने हैदराबाद विभाजन के कारण एक वर्ष के भीतर, परिवार चार भाइयों और बहनों के साथ भारत आ गया,
1970 के दशक की शुरुआत में, अभिनय में उनकी रुचि और अच्छी आवाज़ के कारण, उन्हें रेडियो शो और स्टेज नाटकों में प्रवेश मिला, जिससे उन्हें फिल्म और टेलीविजन संस्थान में भाग लेने के लिए प्रेरित किया गया। भारतमें पुणे।

मॉडलिंग और रेडियो शो

मुंबई के शुरुआती वर्षों में, उनके पूर्व रेडियो शो अनुभव और उनकी अच्छी आवाज ने उन्हें आगे बढ़ने में मदद की और विज्ञापन एजेंसियों के साथ उनके संपर्क के कारण उन्हें चारमीनार के लिए एक मॉडल के रूप में चुना गया। सिगरेट और लाइफबॉय साबुन ने उन्हें 1970 के दशक के अंत तक अग्रणी मॉडलों में से एक बना दिया।

बॉलीवुड

1977 के अंत में उन्होंने जीवन मुक्त से अपनी शुरुआत की। उन्होंने 1980 में एक बार फिर जैसी फिल्मों में मुख्य भूमिकाएँ निभाईं, लेकिन यह फिल्म व्यावसायिक रूप से सफल नहीं रही। बाद में वह रेडियो कार्यक्रम मुकद्दर का सिकंदर का हिस्सा रहे। फिर उन्होंने कर्तव्य, एक बार कहो, सुरक्षा और खंजर 1979 से 80 के बीच, जो व्यावसायिक रूप से सफल रहे।

उन्हें 1980 की फिल्म फिर वही रात में पुलिस इंस्पेक्टर शर्मा की सहायक भूमिका के लिए राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली, जिसमें ने अभिनय किया था। राजेश खन्ना मुख्य भूमिका में और डैनी डेन्जोंगपा द्वारा निर्देशित, जो समीक्षकों द्वारा प्रशंसित और व्यावसायिक रूप से सफल दोनों थी . इसने उनकी भविष्य की कई फिल्मों में पुलिस इंस्पेक्टर की भूमिका निभाने की नींव भी रखी।

1981 में, फिर उन्हें लावारिस करने का मौका मिला, जिससे उन्हें सहायक भूमिका में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के लिए फिल्मफेयर नामांकन मिला। उनके कुछ प्रदर्शन, छोटी सहायक भूमिकाओं के रूप में, जिन्होंने बहुत बड़ा प्रभाव डाला, नमक हलाल, कामचोर जैसी फिल्मों में आए। और विधाता. इन छोटी भूमिकाओं के बाद, उन्हें बी. आर. चोपड़ा की मज़दूर में मुख्य भूमिका निभाने का प्रस्ताव मिला, जिसमें दिलीप कुमार. चरित्र अभिनेता के रूप में उनका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन आवाज़ में आया, जो 1984 में शक्ति सामंतघर एक मंदिर में अपने अभिनय के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता के फिल्मफेयर पुरस्कार के लिए नामांकन मिला।

1984 के बाद से उन्हें नियमित रूप से एक नई पहेली, कानून क्या करेगा, , ऐतबार, बेपनाह और जवाब . 1985 में मिर्च मसाला में उनके अभिनय के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। Palay जैसी फिल्मों में उनका अभिनय खान, डकैत, तेलुगु फिल्म मराना मृदंगम, तेजाब, दो कैदी, परिंदा, मुजरिम, आज का अर्जुन, प्यार का देवता, तिरंगा, अनाड़ी, विजयपथ, मासूम, राजा हिंदुस्तानी, सोल्जर, सफारी, गदर एक प्रेम कथा, लज्जा, प्यार तूने क्या किया और 23 मार्च 1931 शहीद को दर्शकों द्वारा सराहा गया।

इसके बाद, 2000 के दशक की शुरुआत तक, वह प्रति वर्ष औसतन चार से पांच फिल्मों में दिखाई दिए। उन्होंने 135 से अधिक फिल्में बनाई हैं। उन्होंने "दिल में फिर आज तेरी" गाने में कुछ दोहे पढ़े। फिल्म यादों का मौसम (1990) के लिए अनुराधा पौडवाल के साथ।

2004 में, वह प्राथमिक सदस्य के रूप में भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए।

जॉन अब्राहिम

#17dic 
जॉन अब्राहम
(अभिनेता)

स्क्रीन नाम जॉन अब्राहम

के रूप में जन्मे जॉन अब्राहम
राष्ट्रीयता/नागरिकता भारतीय
लिंग पुरुष
जन्म (देश) भारत
जन्म (शहर, राज्य) मुंबई, महाराष्ट्र
🎂जन्म की तारीख 17 दिसंबर 1972
पिता अब्राहम जॉन
माँ फिरोजा ईरानी
जीवनसाथी प्रिया रूंचुल (जनवरी 2014 से शादी)
स्क्रीन नाम जॉन अब्राहम
के रूप में जन्मे जॉन अब्राहम
राष्ट्रीयता/नागरिकता भारतीय
लिंग पुरुष
जन्म (देश) भारत
जन्म (शहर, राज्य) मुंबई, महाराष्ट्र
🎂जन्म की तारीख 17 दिसंबर 1972
पिता अब्राहम जॉन
माँ फिरोजा ईरानी
जीवनसाथी प्रिया रूंचुल (जनवरी 2014 से शादी)
अब्राहम का जन्म sidhi मुंबई में हुआ, उनके पिता जतिंदर सिंधीऔर माँ पारसी हैं। उनके पिता अलवाए, केरला से एक शिल्पकार हैं; उनकी माँ का नाम फिरोजा ईरानी हैं। अब्राहम का पारसी नाम "फरहान" है, पर उनके पिता, जो एक सिरियन क्रिस्चियन हैं, उन्होंने उनका नाम जॉन रखा। उनका एक छोटा भाई भी है जिसका नाम एलन है। अब्राहम ने बॉम्बे स्कॉटिश स्कूल, माहिम (मुंबई) में अध्ययन किया और मुंबई शैक्षिक ट्रस्ट से एमएमएस किया।
जॉन अब्राहम ने अपने एक्टिंग के दम पर बॉलीवुड में अप लोहा मनवा दिया है उनकी कई बेहतरीन फिल्मे है जैसे कि मद्रास कैफे, सत्यमेव जयत 1 और कई अन्य।

कई विज्ञापनों और कंपनियों के लिए मॉडलिंग करने के बाद, अब्राहम ने जिस्म (2003) से अपना फ़िल्मी सफ़र प्रारंभ किया, जिसने उन्हें फ़िल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ नवागत पुरस्कार नामांकन दिलाया। इसके बाद उन्हें अपनी पहली व्यावसायिक सफलता धूम (2004) के द्वारा मिली उन्हें नकारात्मक भूमिका के लिए दो फ़िल्म फेयर नामांकन प्राप्त हुए, धूम और फिर जिंदा (2006) में बाद में वह एक बड़ी महत्वपूर्ण सफल फिल्म वाटर (2005) में दिखाई दिए। 2007 में फ़िल्म बाबुल के लिए उनका नामांकन फ़िल्म फेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक की श्रेणी में किया गया।

शनिवार, 16 दिसंबर 2023

जॉन अब्राहिम

#17dic 
जॉन अब्राहम
(अभिनेता)

स्क्रीन नाम जॉन अब्राहम
के रूप में जन्मे जॉन अब्राहम
राष्ट्रीयता/नागरिकता भारतीय
लिंग पुरुष
जन्म (देश) भारत
जन्म (शहर, राज्य) मुंबई, महाराष्ट्र
🎂जन्म की तारीख 17 दिसंबर 1972
पिता अब्राहम जॉन
माँ फिरोजा ईरानी
जीवनसाथी प्रिया रूंचुल (जनवरी 2014 से शादी)
स्क्रीन नाम जॉन अब्राहम
के रूप में जन्मे जॉन अब्राहम
राष्ट्रीयता/नागरिकता भारतीय
लिंग पुरुष
जन्म (देश) भारत
जन्म (शहर, राज्य) मुंबई, महाराष्ट्र
🎂जन्म की तारीख 17 दिसंबर 1972
पिता अब्राहम जॉन
माँ फिरोजा ईरानी
जीवनसाथी प्रिया रूंचुल (जनवरी 2014 से शादी)
अब्राहम का जन्म sidhi मुंबई में हुआ, उनके पिता जतिंदर सिंधीऔर माँ पारसी हैं। उनके पिता अलवाए, केरला से एक शिल्पकार हैं; उनकी माँ का नाम फिरोजा ईरानी हैं। अब्राहम का पारसी नाम "फरहान" है, पर उनके पिता, जो एक सिरियन क्रिस्चियन हैं, उन्होंने उनका नाम जॉन रखा। उनका एक छोटा भाई भी है जिसका नाम एलन है। अब्राहम ने बॉम्बे स्कॉटिश स्कूल, माहिम (मुंबई) में अध्ययन किया और मुंबई शैक्षिक ट्रस्ट से एमएमएस किया।
जॉन अब्राहम ने अपने एक्टिंग के दम पर बॉलीवुड में अप लोहा मनवा दिया है उनकी कई बेहतरीन फिल्मे है जैसे कि मद्रास कैफे, सत्यमेव जयत 1 और कई अन्य।

कई विज्ञापनों और कंपनियों के लिए मॉडलिंग करने के बाद, अब्राहम ने जिस्म (2003) से अपना फ़िल्मी सफ़र प्रारंभ किया, जिसने उन्हें फ़िल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ नवागत पुरस्कार नामांकन दिलाया। इसके बाद उन्हें अपनी पहली व्यावसायिक सफलता धूम (2004) के द्वारा मिली उन्हें नकारात्मक भूमिका के लिए दो फ़िल्म फेयर नामांकन प्राप्त हुए, धूम और फिर जिंदा (2006) में बाद में वह एक बड़ी महत्वपूर्ण सफल फिल्म वाटर (2005) में दिखाई दिए। 2007 में फ़िल्म बाबुल के लिए उनका नामांकन फ़िल्म फेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक की श्रेणी में किया गया।

पंडित जसराज

#28jan
#17jeb 
पंडित जसराज भारतीय शास्त्रीय संगीत के विश्व विख्यात गायक है।

🎂जन्म 28 जनवरी 1930 को हिसार, हरियाणा फतेहाबाद के गाँव पीली मंदोरी
⚰️17 अगस्त 2020

हमारे देश में शास्त्रीय संगीत कला सदियों से चली आ रही है।
इस कला को न केवल मनोरंजन का, बल्कि ईश्वर से जुड़ने का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत भी माना गया है।
ऐसे ही एक आवाज़ जिन्होंने सिर्फ 3 वर्ष की छोटी आयु में कठोर वास्तविकताओं की इस ठंडी दुनिया में अपने दिवंगत पिता से विरासत के रूप में मिले और केवल सात स्वरों के साथ क़दम रखा, आज वही सात स्वर उनकी प्रतिभा का इन्द्रधनुष बनकर विश्व-जगत में उन्हें प्रसिद्धि दिला रहे हैं।
उनका जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ जिसे 4 पीढ़ियों तक हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत को एक से बढ़कर एक शिल्पी देने का गौरव प्राप्त है। उनके पिता का नाम पंडित मोतीराम जी था, जो स्वयं मेवाती घराने के एक विशिष्ट संगीतज्ञ थे।

पंडित जी के परिवार में उनकी पत्नी मधु जसराज, बेटा सारंग देव और बेटी दुर्गा हैं।

शिक्षा – पण्डित जसराज की जीवनी
पंडित जसराज को संगीत की प्राथमिक शिक्षा अपने पिता से ही मिली लेकिन जब वे सिर्फ 3साल के थे, तो प्रकृति ने उनके पिता का देहांत हो गया । पंडित मोतीराम जी का देहांत उसी दिन हुआ जिस दिन उन्हें हैदराबाद और बेरार के आखिरी निज़ाम उस्मान अली खाँ बहादुर के दरबार में राज संगीतज्ञ घोषित किया जाना था। उनके बाद परिवार के पालन-पोषण का भार संभाला उनके बडे़ बेटे संगीत महामहोपाध्याय पं० मणिराम जी ने।

इन्हीं की छत्रछाया में पंडित जसराज ने संगीत शिक्षा को आगे बढ़ाया तथा तबला वादन सीखा।

मणिराम जी अपने साथ जसराज को तबला वादक के रूप में ले जाया करते थे।

लेकिन उस समय सारंगी वादकों की तरह तबला वादकों को भी तुच्छ माना जाता था और 14 वर्ष की किशोरावस्था में इस प्रकार के नीच बर्ताव से अप्रसन्न होकर जसराज ने तबला त्याग दिया और प्रण लिया कि जब तक वे शास्त्रीय गायन में निपुणता प्राप्त नहीं कर लेते, अपने बाल नहीं कटवाएँगे। इसकेबाद में उन्होंने मेवाती घराने के दिग्गज महाराणा जयवंत सिंह वाघेला से और आगरा के स्वामी वल्लभदास जी से संगीत विशारद प्राप्त किया।

आवाज़ की विशेषता
पंडित जसराज के आवाज़ का फैलाव साढ़े तीन सप्तकों तक है।

उनके गायन में पाया जाने वाला शुद्ध उच्चारण और स्पष्टता मेवाती घराने की ‘ख़याल’ शैली की विशेषता को दर्शाता है। उन्होंने बाबा श्याम मनोहर गोस्वामी महाराज के सान्निध्य में ‘हवेली संगीत’ पर व्यापक अनुसंधान कर कई नवीन बंदिशों की रचना भी की है।

भारतीय शास्त्रीय संगीत में उनका सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान है।

उनके द्वारा अवधारित एक अद्वितीय एवं अनोखी जुगलबन्दी, जो ‘मूर्छना’ की प्राचीन शैली पर आधारित है।

इसमें एक महिला और एक पुरुष गायक अपने-अपने सुर में कई रागों को एक साथ गाते हैं।

पंडित जसराज के सम्मान में इस जुगलबन्दी का नाम ‘जसरंगी’ रखा गया है।

योगदान
दिग्गज शास्त्रीय गायक पंडित जसराज ने अनूठी उपलब्धि हासिल की है।शास्त्रीय गायक ने हाल में अंटार्कटिका के दक्षिणी ध्रुव पर अपनी प्रस्तुति दी थी । इसके साथ ही वह सातों महाद्वीपों में कार्यक्रम पेश करने वाले पहले भारतीय बन गए हैं। पद्म विभूषण से सम्मानित पंडित जसराज ने बीती 8 जनवरी को अंटार्कटिका तट पर ‘सी स्प्रिट’ नामक क्रूज पर गायन कार्यक्रम पेश किया।।

मशहूर शास्त्रीय गायक पंडित जसराज ने पहली बार सन 2008 में रिलीज़ हिंदी फ़िल्म के एक गीत को अपनी आवाज दी है।  विक्रम भट्ट द्वारा निर्देशित फ़िल्म ‘1920’ के लिए उन्होंने अपनी जादुई आवाज में एक गाना गाया है। पंडित जसराज ने इस फ़िल्म के प्रचार के लिए बनाए गए वीडियो के गीत ‘वादा तुमसे है वादा’ को अपनी दिलकश आवाज दी है।

गाने की शूटिंग मुम्बई के जोगेश्वरी स्थित विसाज स्टूडियो में हुई।

इस गाने को संगीत से सजाया अदनान सामी ने और बोल समीर ने लिखे हैं।

वीडियो के गानों की कोरियोग्राफी राजू खान ने की है।

ए.एस.ए. प्रोडक्शन एंड एंटरप्राइजेज लिमिटेड के निर्माण में बनाई जा रही फ़िल्म ‘1920’ में नए कलाकार काम कर रहे हैं। 1920 के दौर में सजी यह फ़िल्म एक भारतीय लड़के और एक अंग्रेज लड़की की प्रेम कहानी है।

ये दोनों लोगों के भारी विरोधों के बावजूद दोनों एक-दूसरे से शादी कर लेते हैं।

जीवन के 75वें सोपान
“रानी तेरो चिरजियो गोपाल….” 28 जनवरी, 2005 की भोर से ही “रसराज” कहे जाने वाले संगीत मार्तण्ड पं. जसराज के चाहने वालों के होठों पर उनके इस भजन के बोल तैर रहे थे। “रसराज” जसराज ने ऋतुराज की दस्तक के साथ ही अपने जीवन के 75 सोपान तय किए। 75 दीपों की मालिका के साथ दिल्ली के कमानी सभागार में पंडित जसराज के ज्योतिर्मय जीवन की कामना की गई।

पांच साल पहले जब पंडित जी के दिल की सर्जरी हुई थी, तब सबको लगता था कि पता नहीं, उनके मधुर स्वरों की गंगा उसी प्रकार प्रवाहित होती रहेगी या फिर….। पंडित जी के शब्दों में -“वह तो बिल्कुल वैसा ही था, जैसे किसी सितार के तारों में जंग लग जाए और फिर आप उन तारों को बदल दें या मिट्टी के तेल में रुई डुबोकर साफ कर दें।

“बाईपास सर्जरी” से पहले कुछ तकलीफें रहती थीं, उसके बाद सब एकदम निर्मल जल-सा हो गया।”

29 जनवरी को पंडित जसराज अपने अभिनंदन में आयोजित समारोह के लिए दिल्ली पधारे थे।

इस अवसर पर प्रशंसकों से घिरे पंडित जी से उनकी जीवन-यात्रा के अनुभव जानने चाहे तो थोड़ा गंभीर होकर कहा , “सोचता हूं कि आज अगर 35 बरस का होता और 75 बरस के ये अनुभव साथ होते, और उससे आगे 35 बरस की यात्रा करता तो कितना फ़र्क़ होता। संगीत के प्रति यही भावनाएं, श्रद्धा और भक्ति होती तो जीवन कितना सौभाग्यशाली होता।”

सम्मान और पुरस्कार
पंडित जसराज को कई सम्मान और पुरस्कारों से सम्मानित हो किया जा चुका हैं। वे है-

पद्म विभूषण (2001)
पद्म भूषण
पद्म श्री
संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार
मास्टर दीनानाथ मंगेशकर अवार्ड
लता मंगेशकर पुरस्कार
महाराष्ट्र गौरव पुरस्कार
मृत्यु – पण्डित जसराज की नमृत्यु 90 वर्ष की उम्र में 17 अगस्त 2020 को कार्डियक के कारण  हुई।

सिप्पी गिल

#21may 
Sippy Gill 
नाम सिप्पी गिल
अन्य नाम 
टाइगर किंग
🎂जन्म 21 मई 1982
जन्म स्थान रौली, मोगा, लुधियाना, पंजाब
पिता का नाम जोगिंदर सिंह गिल
माता का नाम      —
पत्नी का नाम  अर्लीन सेखोन
राष्ट्रीयता भारतीय
जन्म और परिवार – सिप्पी गिल की जीवनी
सिप्पी गिल एक पंजाबी गायकार है. सिप्पी गिल एक बहुत अच्छे सिंगर है. उनकी लंबाई लगभग 5′6″ है।

एक पंजाबी गायक है. और साथ ही साथ सिप्पी गिल एक अभिनेता, गीतकार और पंजाबी संगीत उद्योग से जुड़े निर्माता हैं।

सिप्पी गिल का जन्म 21 मई 1982 को हुआ था और उनका जन्म रौली, मोगा, लुधियाना, पंजाब में हुआ।

सिप्पी गिल एक बहुत ही फेमस गायकार है.

इन्होंने बहुत ही अच्छे अच्छे गानें गाए है.

🎂जन्म रौली, मोगा, लुधियाना, पंजाब में 21 मई 1982 को हुआ था .

इनकी पीता  का नाम जोगिंदर सिंह गिल है. सिप्पी गिल की शादी हो गयी है। इनकी पत्नी का नाम अर्लीन सेखों है। जो पंजाब जाट परिवार से भी सम्बद्ध रखती है। उनका एक बेटा है, जिसका नाम झुझार सिंह गिल है।

एल्बम
सिप्पी गिल के बहुत ही अच्छे सांग है, नच-नच, जिंदाबाद आशिकी, ’10 मिंट’ , Yaari Te Sardari, रुमाल, चरड़ी कला, है. इनका सबसे पहला गाना झुमका है. इनका सबसे अच्छा गरारी है.

  इनकी बहुत सी फिल्में भी है “टाइगर” और बाद में 2019 में “जद्दी सरदार”. Jatt Boys Putt Jattan De.

#शिक्षा

सिप्पी गिल स्कूली शिक्षा गृहनगर स्कूल से पूरी की है. इन्होनें अपनी डीएम स्नातक की पढ़ाई पूरी की है. इनके कॉलेज का नाम D.M कॉलेज है जो मोगा, पंजाब में है. 

इन्होने 15 साल की उम्र में गाना शुरू कर दिया था. सिप्पी गिल ने मोगा से अपने गुरु सुरिंदर धीर से संगीत कौशल सीखा है.

#करियर

सिप्पी गिल के करियर की शुरूआत पंजाबी संगीत उद्योग में शुरुआत एक पंजाबी गायक के रूप में अपने गीत जिंदावाड़ आशिकी से की थी।

सिप्पी गिल ने 15 साल की उम्र में गाना शुरू कर दिया था. इनके बहुत से रोमांटिक और Sad सोंग प्रसिद्ध है. सिप्पीगिल के पिता कई सालों तक काँग्रेस पार्टी से जुड़े रहें. और उनके भाई उनके गाँव के सरपंच रह चुके है.

सिप्पीगिल का एक बेटा भी है. सिप्पी गिल के बहुत से गानों को लाखों लोगों द्वारा पसंद किया जाता है. सिप्पी गिल की बहुत सी फिल्में भी है जो पंजाबी उनकी अपनी भाषा में है.

मनुस्मृति

. ................मनुस्मृति.................... जरा सोचिए, अगर आज भारत का कानून यह तय कर दे कि— "एक आम आदमी चोरी करे तो उसे...