शनिवार, 25 नवंबर 2023

राखी सावंत

राखी सावंत

25 नवम्बर 1978
राखी सावंत कई बार विवादों में रहीं हैं और उनके विवाद चर्चा का विषय बने हैं। 2018 में एक रेसलिंग कार्यक्रम में उन्हें बतौर मुख्य अतिथि दर्शकों का मनोरंजन करने के लिए बुलाया गया था। वहीं एक महिला पहलवान ने वहां उपस्थित सभी दर्शकों को यह चेलेंज कर दीया कि किसी में दम हो तो मुझे हराकर के दिखाऐ। जब कोई उससे मुकाबले के लिए नहीं आया तो यह चेलैंज राखी सावंत ने स्वीकार कर लीया। राखी रिंग में आ गई, और लडाई के दौरान उस विदेशी महिला पहलवान ने उन्हें उठा लिया और पटखनी दे दी। यह देखकर दर्शक उत्साहित हो गए। तालियां और सीटियां बजने लगीं, लेकिन राखी सावंत की हालत खराब हो गई। राखी सावंत करीब 8 मिनट तक उसी हालत में पड़ी रहीं। रेफरी ने आकर उठने को कहा तो वे उठ न सकीं। क्योंकि उनकी कमर में चोट लगी थी। फिर सिक्योरिटी गार्ड की मदद से उन्हें उठाया गया, लेकिन वे दो कदम न चल सकीं।4 अप्रैल 2017 को भगवान वाल्मीकि के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी करने के मामले में उन्हें बुर्का पहन लुधियाना अदालत में उपस्थित होना पड़ा, उस समय उनके साथ भारतीय जन विकास दल के अध्यक्ष और कांग्रेस नेता राहुल जोगी भी थे, जिसके कारण उनकी काफी आलोचना हुई थी।

अब राखी सावंत को फातिमा दुर्रानी के नाम से भी जाना जाता है ;

सावंत ने 2014 के लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए जय शाह की अध्यक्षता में राष्ट्रीय आम पार्टी नाम से अपनी खुद की राजनीतिक पार्टी लॉन्च की । हालाँकि, चुनाव के बाद, वह रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया (ए) में शामिल हो गईं।

उन्होंने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत 1997 में फिल्म अग्निचक्र से रूही सावंत के नाम से की थी। उन्होंने बॉलीवुड फिल्मों जोरू का गुलाम , जिस देश में गंगा रहता है और ये रास्ते हैं प्यार के में अन्य छोटी भूमिकाएं और डांस नंबर किए 2003 में, उन्होंने बॉलीवुड फिल्म चुरा लिया है तुमने में एक आइटम नंबर के लिए ऑडिशन दिया । हिमेश रेशमिया द्वारा रचित अपने सफल आइटम नंबर "मोहब्बत है मिर्ची" के लिए चुने जाने से पहले उन्होंने लगभग चार बार ऑडिशन दिया । सावंत ने मस्ती और मैं हूं ना सहित फिल्मों में छोटी भूमिकाओं में अभिनय किया ।

2005 में, वह डीजे हॉट रीमिक्स - वॉल्यूम 3 एल्बम के म्यूजिक वीडियो "परदेसिया" में दिखाई दीं ।जून 2006 में, मीका सिंह ने अपने जन्मदिन की पार्टी में उन्हें चूमने का प्रयास किया, जिससे मीडिया में विवाद पैदा हो गया
📽️

1997 अग्निचक्र
1999 दिल का सौदा
चुडैल नंबर 1 
2000 कुरूक्षेत्र 
जोरू का गुलाम 
जिस देश में गंगा रहता है 
2001 एहसास: द फीलिंग 

2002 बदमाश नंबर 1 
गौतम गोविंदा 
ना तुम जानो ना हम
2003 दम 
चुरा लिया है तुमने
ॐ 
बुरे लड़के 
2 अक्टूबर
पथ 
वाह! तेरा क्या कहना 
2004 
पैसा वसूल 
मस्ती: सनम तेरी कसम 
मैं हूं ना
2005 मुंबई एक्सप्रेस 
खामोश... खौफ की रात
2007 लोखंडवाला में गोलीबारी 
यात्रा बंबई से गोवा:लाफ्टर अनलिमिटेड 
बुद्ध मर गया
2008 गुमनाम 
धूम ददक्का
2009 दिल बोले हड़िप्पा
2010 मुंगीलाल रॉक्स
2011 मेरे ब्रदर की दुल्हन
2015 मुंबई कैन डांस साला
2016 एक कहानी जूली की
2019 उपेक्षा

रायचंद बोराल (R.C BORAL)

हिंदी फिल्मों में पार्श्वगायन की शुरुवात करने वाले एवं पहली कार्टून फ़िल्म बनाने वाले महान संगीतकार आर सी बोराल की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रधांजलि

🎂19, अक्तूबर,1903
⚰️ 25 , नवम्बर,1981


बोराल  हिन्दी फ़िल्मों के प्रसिद्ध संगीतकार थे। उन्हें भारतीय सिनेमा में 'पार्श्वगायन' की शुरुआत करने का श्रेय दिया जाता है। इसके साथ ही बोराल जी को पहली संगीतमय कार्टून फ़िल्म बनाने का भी श्रेय प्राप्त है। उनके द्वारा निर्मित तीन कार्टून कथाचित्रों में 'भुलेर शेषे', 'लाख टाका' एवं 'भोला मास्टर' हैं। आर. सी. बोराल को कार्टून फ़िल्म बनाने की प्रेरणा मशहूर हास्य कलाकार चार्ली चैपलिन की फ़िल्म 'ए सिटी लाइट्स' से मिली थी, जिसे उन्होंने 40 बार देखा था। सुप्रसिद्ध गायक कुंदनलाल सहगल की प्रतिभा को तराशने, निखारने एवं उसे भारत की जनता से रू-ब-रू करवाने का श्रेय भी आर. सी. बोराल को ही जाता है। हिन्दी फ़िल्मों में दिये हुए विशिष्ट योगदान के लिए आर. सी. बोराल को वर्ष 1978 में 'संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार' और 1979 में 'दादा साहब फाल्के पुरस्कार' से भी सम्मानित किया गया था।

आर. सी. बोराल  का जन्म 19 अक्टूबर, 1903 को कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) के एक मशहूर संगीत परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम लालचन्द बोराल था, जो शास्त्रीय संगीतकार थे। उन्हें संगीत वाद्य पखावज में प्रसिद्धि प्राप्त थी। घर का माहौल संगीतमय था, इसीलिए बोराल को बचपन से ही सांगीतिक वातावरण मिला था। उन्होंने पंडित विश्वनाथ राव से धमार एवं ग्वालियर घराने के मशहूर सरोद के उस्ताद हाफ़िज़ अली ख़ाँ की सलाह पर उस्ताद माजिद ख़ाँ से तबला बजाने की शिक्षा प्राप्त की।

आर. सी. बोराल के कैरियर के प्रारंभ से ही संगीतकार पंकज मलिक उनके नजदीकी मित्र बन गये थे। इन दोनों ने सन 1928 से ही फ़िल्मों में प्रवेश किया और उस समय की बनने वाली मूक फ़िल्मों के लिए संगीत देने का कार्य किया। बाद में जब हिन्दुस्तान का सवाक सिनेमा 1931 से प्रारंभ हुआ, तो उन्होंने धुनें बनाना भी प्रारंभ कर दिया और गायन के लिए पार्श्वगायन के अवसर उपलब्ध कराए। बतौर संगीतकार बोराल साहब कितने सम्मानित व्यक्ति थे, इसका अंदाज़ा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि एस. के. पाल, खेमचंद्र प्रकाश एवं पन्नालाल घोष जैसे संगीतकार उनसे संगीत की शिक्षा ग्रहण करते थे।

कोलकाता के 'न्यू थियेटर्स' में काम करते हुए आर. सी. बोराल ने वहाँ के साउंड इंजीनियर मुकुल बोस, जो कि नितिन बोस के भाई थे, के साथ एम्पलीफ़्लायर का प्रयोग भी संगीत में प्रारंभ किया। इसी श्रंखला में उन्होंने एक और उपलब्धि हासिल की, वह थी- संगीत वाद्य यंत्रों के साथ ध्वनि प्रभाव देना। वर्ष 1932 में आयी फ़िल्म 'मोहब्बत के आँसू' आर. सी. बोराल की संगीतबद्ध पहली फ़िल्म तो थी ही, इसके साथ ही यह मशहूर कुंदनलाल सहगल के अभिनय से भी सजी थी। सहगल द्वारा ही अभिनीत फ़िल्म 'चंडीदास' (1934) बोराल जी की सबसे कामयाब फ़िल्मों में गिनी जाती है। फ़िल्म 'प्रेसीडेंट' (1937) में कुंदनलाल सहगल द्वारा गाया गया गीत "एक बंगला बने न्यारा" आज तक आर. सी. बोराल और सहगल की सर्वश्रेष्ठ रचनाओं में गिना जाता है।

संगीतकार आर. सी. बोराल, पंकज मलिक और नितिन बोस को भारतीय सिनेमा में पार्श्वगायन की शुरुआत करने का श्रेय दिया जाता है। हिन्दी फ़िल्मों में पार्श्वगायन की शुरुआत से सम्बन्धित एक रोचक घटना है-

"जिस रास्ते से नितिन बोस प्रतिदिन अपने घर से 'न्यू थियेटर्स' जाते थे, उसी रास्ते में संगीतकार पंकज मलिक का घर पड़ता था। इसीलिए नितिन बोस प्रतिदिन पंकज मलिक को उनके घर के पास से उन्हें अपनी कार में बैठाकर स्टूडियो ले जाते और छोड़ जाते। यह सिलसिला चलता रहता था। रोज़ की ही भाँति नितिन बोस पंकज मलिक के दरवाज़े पर अपनी कार का हॉर्न बजा कर उन्हें बुला रहे थे, परन्तु पंकज मलिक पर इसका कोई असर नहीं हो रहा था। नितिन बोस को लगा कि शायद घर में कोई नहीं है। तभी लगातार कार के हॉर्न की आवाज सुन कर पंकज मलिक के पिता ने उनको कमरे में जा कर बताया की गेट पर नितिन बोस बहुत देर से तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं। इतना सुनते ही पंकज मलिक दौड़ते हुए नितिन बोस के पास पहुँचे और कहा- "माफ़ी चाहूँगा, मैं ज़रा अपने पसंदीदा अंग्रेज़ी गानों का रिकॉर्ड सुनते हुये उसके साथ गाने में मशगूल हो गया था। इसीलिए आपके कार के हॉर्न को नहीं सुन सका।

नितिन बोस ने इस घटना की चर्चा 'न्यू थियेटर्स' में आर. सी. बोराल से की और उनसे चर्चा करते हुये उन्हें अपना एक सुझाव दिया- "कि क्यूँ ना हम कुछ नया प्रयोग करें। जैसे पंकज उस गाने के साथ गाये जा रहे थे, उसी तरह गाने को भी पहले रिकॉर्ड किया जा सकता है। इससे हमें अभिनेताओं और अभिनेत्रियों की आवाज़ों के साथ समझौता नहीं करना पड़ेगा। हमारे पास विकल्प यह होगा की हम किसी सुरीले प्रशिक्षित गायक, गायिकायों की आवाज़ में गाने रिकॉर्ड कर सकते हैं और बाद में शूटिंग के समय फ़िल्म में अभिनय कर रहे चरित्र पर चित्रांकन कर सिनेमा को और रोचक बना सकते हैं। आर. सी. बोराल इस विचार से पूरी तरह सहमत हुये। फलस्वरूप उस समय नितिन बोस के ही निर्देशन में बन रही फ़िल्म 'धूप छावँ' (1935) के लिये उन्होंने पहला गाना "मैं खुश होना चाहूँ, खुश हो न सकूँ" रिकॉर्ड किया, जिसमें मुख्य स्वर के. सी. डे का था तथा कोरस में पारुल घोष, सुप्रवा सरकार एवं हरिमति के स्वर थे। इसके रिकोर्डिस्ट मुकुल बोस थे, जो नितिन बोस के ही भाई थे। मुकुल बोस भी 'न्यू थियेटर्स' में बतौर ध्वनि मुद्रक कार्यरत थे। इस प्रकार संगीतकार के तौर पर हिन्दी सिनेमा में पार्श्वगायन की परम्परा का श्रीगणेश करने का श्रेय आर. सी. बोराल को जाता है, जबकि प्रथम पार्श्वगायक होने का श्रेय के. सी. डे दिया गया।

संगीतकार अनिल विश्वास ने आर. सी. बोराल को भारतीय फ़िल्म जगत् में संगीत के भीष्म पितामह की संज्ञा दी थी। बोराल जी 'न्यू थियेटर्स' के साथ-साथ 'ऑल इंडिया रेडिओ कंपनी' (आकाशवाणी) में भी संगीत के विभागाध्यक्ष नियुक्त थे। उन्होंने मूक सिनेमा के अंतर्गत 'चोशेर मेय' तथा 'चोर काँटें' फ़िल्मों में भी स्टेज आर्केष्ट्रा का संचालन किया था। इन आर्केष्ट्रा में हारमोनियम और वायलिन के साथ-साथ चेलो, बाँसुरी, तथा ऑर्गन का प्रयोग कर उन्होंने स्टेज आर्केष्ट्रा को भी एक नया और आकर्षक रूप प्रदान कर दिया था।

महत्त्वपूर्ण तथ्य

शायद बहुत कम लोग ही यह जानते हैं कि सन 1935 में बनी फ़िल्म 'आफ़्टर द अर्थक्वेक' जो 1934 ई. में बिहार में आये भयानक भूकम्प पर आधारित फ़िल्म थी, इसके संगीतकार आर. सी. बोराल ही थे। इस फ़िल्म के एक गीत को बोराल जी ने केदार शर्मा से गवाया था, जो उन्हीं के लिखे हुये थे। गीत के बोल थे- "आओ री चमेली एक बात बतायें..."। तत्कालीन समय में इस गीत को बहुत प्रसिद्धि मिली थी। यह गीत बिहार की लोक शैली को स्पर्श करता महसूस किया गया था। इस फ़िल्म में एक और ख़ास बात यह थी, की इसमें प्रसिद्ध अभिनेता राजकपूर ने बाल कलाकार की एक रोचक भूमिका अदा की थी।इसी प्रकार वर्ष 1937 में 'न्यू थियेटर्स' के बैनर तले निर्मित फ़िल्म 'विद्यापति' का संगीत भी आर. सी. बोराल ने तैयार किया था, जो बिहार के मिथिला प्रक्षेत्र के राजा शिवसिंह, उनकी पत्नी रानी लक्ष्मी एवं कविवर विद्यापति के बीच प्रेम त्रिकोण पर आधारित थी। इस फ़िल्म के सभी गीत केदार शर्मा ने लिखे थे, जिसे आर. सी. बोराल ने अपने संगीत रस से सजाया था। फ़िल्म 'विद्यापति' के गीत उस समय के सबसे सफल संगीत की श्रेणी में रखे गए थे। यह वही फ़िल्म थी, जिसने कानन देवी को अभिनेत्री से साथ-साथ एक सफल गायिका के रूप में भी स्थापित किया था।

भारतीय सिनेमा में आर. सी. बोराल के अभूतपूर्व योगदान के लिए उन्हें सन 1930 में लखनऊ में हुए संगीत सम्मलेन में 'सारस्वत महामंडल' की उपाधि दी गई थी। वर्ष 1978 में उन्हें 'संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार' तथा 1979 भारतीय सिने संसार के सर्वोच्च सम्मान 'दादा साहब फाल्के पुरस्कार' से भी नवाजा गया था।

भारतीय सिनेमा में बहुमूल्य योगदान देने वाले और एक संगीतकार के रूप में प्रसिद्धि पाने वाले आर. सी. बोराल का निधन कोलकाता में ही 25 नवम्बर, 1981 को हुआ।

सुरेंद्र कौर

पार्श्वगायिका गीत लेखिका सुरिंदर कौर के जन्मदिन पर हार्दिक श्रद्धांजलि

🎂जन्म25 नवंबर 1929, लाहौर, पाकिस्तान
⚰️मृत्यु : 14 जून 2006, न्यू जर्सी, संयुक्त राज्य अमेरिका
पति: जोगिंदर सिंह सोधी (विवा. 1948–1975)
बच्चे: डॉली गुल्लेरिया
बहन: प्रकाश कौर

सुरिन्दर कौर भारतीय गायिका और गीतकार थीं। हालांकि उन्होंने अधिकतर पंजाबी लोक गीत गाये जहाँ उन्हें इस शैली को आगे बढ़ाने और लोकप्रिय बनाने का श्रेय दिया जाता है। कौर ने 1948 और 1952 के बीच कई हिंदी फिल्मों के लिए पार्श्व गायिका के रूप में गीत भी गाये है।


सुरिन्दर कौर भारतीय गायिका और गीतकार थीं। हालांकि उन्होंने अधिकतर पंजाबी लोक गीत गाये जहाँ उन्हें इस शैली को आगे बढ़ाने और लोकप्रिय बनाने का श्रेय दिया जाता है। कौर ने 1948 और 1952 के बीच कई हिंदी फिल्मों के लिए पार्श्व गायिका के रूप में गीत भी गाये है। उन्हें पंजाबी संगीत में उनके योगदान के लिए पंजाब की कोकिला नाम दिया गया, 1984 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और 2006 में पद्मश्री पुरुस्कार से सम्मानित किया गया

लगभग छह दशकों के करियर में उनके प्रदर्शनों में बुल्ले शाह की पंजाबी सूफी काफियां शामिल थीं। साथ ही नंद लाल नूरपुरी, अमृता प्रीतम, मोहन सिंह और शिव कुमार बटालवी जैसे समकालीन कवियों की कविताएँ से उन्होंने "मावन 'ते धीन", "जुती" जैसे यादगार गीतों को दिया। समय के साथ, उनके विवाह गीत विशेष रूप से "लट्ठे दी चढ़ार", "सुहे वे चीज लहरिया" और "काला डोरिया" पंजाबी संस्कृति का एक अमिट हिस्सा बन गए हैं।

कौर की शादी दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर जोगिंदर सिंह सोढ़ी से हुई थी। दंपति की तीन बेटियां थीं, जिनमें से सबसे बड़ी एक पंजाबी लोक गायिका है। कौर का 2006 में लंबी बीमारी के बाद न्यू जर्सी में निधन हो गया।

सुरिन्दर कौर का जन्म ब्रिटिश भारत में पंजाब की राजधानी लाहौर में सिख परिवार में हुआ था। वह प्रकाश कौर की बहन और डॉली गुलेरिया की मां थी। दोनों ही पंजाबी गायिका हैं। उनकी तीन बेटियाँ हैं जिनमें से डॉली सबसे बड़ी है

सुरिन्दर कौर ने अगस्त 1943 में लाहौर रेडियो पर एक लाइव प्रदर्शन के साथ अपनी पेशेवर शुरुआत की। अगले साल 31 अगस्त 1943 को उन्होंने और उनकी बड़ी बहन, प्रकाश कौर ने अपना पहला गीत, "मावन 'ते ढीन रेन बैथियन" रिकॉर्ड किया। इसे HMV लेबल पे जारी किया गया था और इसने उन्हें भारतीय उपमहाद्वीप में सुपरस्टार के रूप में उभार दिया।

1947 में भारत के विभाजन के बाद कौर और उनके माता-पिता गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश में स्थानांतरित हो गए। 1948 में, उन्होंने प्रोफेसर जोगिंदर सिंह सोढ़ी से शादी की जो दिल्ली विश्वविद्यालय में पंजाबी साहित्य के व्याख्याता थे उनकी प्रतिभा को पहचानते हुए सुरिन्दर के पति उनकी सहायता प्रणाली बन गए और जल्द ही उन्होंने बॉम्बे में हिंदी फिल्म उद्योग में पार्श्व गायिका के रूप में अपना कैरियर शुरू किया। उनकी सहायता इसमें संगीत निर्देशक गुलाम हैदर ने की। उनके तहत उन्होंने 1948 की फ़िल्म शहीद में तीन गाने गाए, जिनमें बदनाम ना हो जाए मोहब्बत का फ़साना, आना है तो आ जाओ, तक़दीर की आंधी… हम कहाँ और तुम कहाँ शामिल हैं। हालांकि उनकी सच्ची रुचि मंचीय प्रदर्शनों और पंजाबी लोक गीतों को पुनर्जीवित करने में थी और अंततः वे 1952 में दिल्ली वापस आ गईं।

1948 में, पुराने ब्रिटिश पंजाब के 1947 के विभाजन के बाद उन्होंने शादी कर ली उनके पति ने उनके गायन करियर का मार्गदर्शन करना जारी रखा"वही थे जिन्होंने मुझे स्टार बनाया," उन्होंने बाद में याद किया। "उन्होंने मेरे द्वारा गाए गए सभी गीतों को चुना और हम दोनों ने हर रचनाओं पर सहयोग किया" सोढ़ी ने उनके लिए पंजाबी लोक क्लासिक्स जैसे चैन कित्थे गुजारी रात, लट्ठे दी चढ़ार, शोंकन मेले दी, गोरी दियां झांझरन और सरके-सरके जंडिये मुटियारे के गाने की व्यवस्था की। ये गीत विभिन्न प्रसिद्ध पंजाबी कवियों द्वारा लिखे गए थे, लेकिन गायिका सुरिन्दर कौर ने इन्हें लोकप्रिय बनाया। दंपति ने पंजाब में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की एक शाखा भारतीय जन नाट्य संघ (IPTA) के सार्वजनिक चेहरे के रूप में भी काम किया। यह पूर्वी पंजाब के सबसे दूरदराज के गांवों में शांति और प्रेम का संदेश फैलाता है। उन्होंने तेजी से लोकप्रियता हासिल करते हुए दुनिया के कई हिस्सों में पंजाबी लोक गीतों के प्रदर्शन किये।

उन्होंने 2,000 से भी अधिक गाने रिकॉर्ड किए जिनमें आसा सिंह मस्ताना, करनैल गिल, हरचरण ग्रेवाल, रंगीला जट्ट और दीदार संधू के साथ युगल शामिल थे। हालाँकि 1976 में अपने शिक्षक पति की मृत्यु के साथ ही उनका सहयोगी और जीवनसाथी समाप्त हो गया। लेकिन उन्होंने अपनी बेटी और अन्य छात्रों के साथ परिवार की रचनात्मक परंपरा को जारी रखा। उनकी बेटी, रुपिंदर कौर गुलेरिया जिसे डॉली गुलेरिया के नाम से जाना जाता है और पोती सुनैनी ने 1995 में एलपी, 'सुरिंदर कौर - द थ्री जेनरेशन' में युगल रिकॉर्ड किया था।

उन्हें 1984 में पंजाबी लोक संगीत के लिए भारत की राष्ट्रीय संगीत, नृत्य और रंगमंच अकादमी, संगीत नाटक अकादमी द्वारा संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ। 2006 में पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। 2002 में सुरिन्दर को कला में उनके योगदान के लिए गुरु नानक देव विश्वविद्यालय से वर्ष 2002 में डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया गया।

सुरिन्दर अपने जीवन के आखिरी पड़ाव के दौरान अपनी मिट्टी के करीब जाना चाहती थी। इसलिए वह 2004 में पंचकुला में बस गईं जिसका उद्देश्य चंडीगढ़ के पास ज़ीरकपुर में एक घर बनाने का था। इसके बाद 22 दिसंबर 2005 को उन्हें दिल का दौरा पड़ा और उन्हें पंचकुला के जनरल अस्पताल में भर्ती कराया गया। हालांकि, बाद में वह ठीक हो गईं और व्यक्तिगत रूप से जनवरी 2006 में प्रतिष्ठित पद्म श्री पुरस्कार प्राप्त करने के लिए दिल्ली चली गईं। यह एक और बात है कि वह उन घटनाओं से परिचित थीं जिसके कारण पंजाबी संगीत में उनके अद्वितीय योगदान के बावजूद उन्हें ये पुरस्कार पाने में इतना लंबा समय लगा। लेकिन जब उन्हें यह पुरस्कार मिला तो वह दुखी थीं कि उसके लिए नामांकन हरियाणा से आया था, न कि पंजाब से जिसके लिए उन्होंने पाँच दशकों से अधिक समय तक अथक परिश्रम किया।

2006 में लंबी बीमारी ने उन्हें संयुक्त राज्य अमेरिका में इलाज कराने के लिए प्रेरित किया। 14 जून, 2006 को 77 साल की उम्र में न्यू जर्सी के एक अस्पताल में उनकी मृत्यु हो गई। उनकी तीन बेटियां हैं पंचकुला में रहने वाली गायिका डॉली गुलेरिया जो सबसे बड़ी हैं। बाक़ी दो नंदिनी सिंह और प्रमोद सिंह जग्गी हैं जो दोनों न्यू जर्सी में बस गईं

शुक्रवार, 24 नवंबर 2023

राज कुमार कोहली

#14sep
#24nov
राज कुमार कोहली
🎂जन्म : 14 सितंबर 1930, लाहौर, पाकिस्तान
⚰️मृत्यु: 24 नवंबर 2023
पत्नी: निशि
बच्चे: अरमान कोहली, गोगी कोहली
राजकुमार कोहली (14 सितंबर 1930 - 24 नवंबर 2023)  एक भारतीय फ़िल्म निर्देशक थे। वह कई लोकप्रिय बॉलीवुड फिल्मों जैसे 1966 दुल्ला भट्टी और 1970 के दशक की दारा सिंह और निशी अभिनीत लुटेरा (निशी ने बाद में कोहली से शादी की) का निर्देशन करने के लिए प्रसिद्ध थे। अन्य उल्लेखनीय फिल्मों में नागिन (1976), जानी दुश्मन (1979), बदले की आग , नौकर बीवी का और राज तिलक (1984) जैसी कलाकारों वाली फिल्में शामिल हैं। उनकी फिल्मों में अक्सर सुनील दत्त , धर्मेंद्र , जीतेंद्र , शत्रुघ्न सिन्हा और अभिनेत्री रीना रॉय और अनीता राज जैसे अभिनेता शामिल होते थे ।
1990 के दशक की शुरुआत में, कोहली ने अपने बेटे अरमान कोहली को मल्टी-स्टारर एक्शन फिल्म विद्रोही (1992) में पेश किया। उन्होंने औलाद के दुश्मन (1993) और क़हर (1997) में अपने बेटे को फिर से निर्देशित किया । एक अंतराल के बाद, वह 2002 में लौटे और अपने बेटे को 1970 के दशक की उनकी क्लासिक फिल्मों नागिन और जानी दुश्मन की शैली में एक और फिल्म में रिलीज़ किया, जिसका शीर्षक था जानी दुश्मन: एक अनोखी कहानी । हालाँकि, रिलीज़ होने पर यह बॉक्स ऑफिस पर असफल रही और इसकी भारी आलोचना हुई।

निर्देशक के रूप में

1973 - कहानी हम सब की
1976 - नागिन
1979 - मुक़ाबला
1979 - जानी दुश्मन
1982 - बदले की आग
1983 - नौकर बीवी का
1984 - राज तिलक
1984 - जीने नहीं दूंगा
1987 - इंसानियत के दुश्मन
1988 - इंतेक़ाम
1988 - साज़िश
1988 - बीस साल बाद
1990 - पति पत्नी और तवायफ
1992 - विद्रोही
1993 - औलाद के दुश्मन
1997 - कहार
2002 - जानी दुश्मन: एक अनोखी कहानी

निर्माता के रूप में

गोरा और काला (1972) हिंदी फिल्म
डंका (1969) हिंदी मूवी
दुल्ला भट्टी (1966) पंजाबी मूवी
लुटेरा (1965) हिंदी मूवी
मैं जट्टी पंजाब दी (1964) पंजाबी मूवी
पिंड दी कुरही (1963) पंजाबी मूवी
सपनी (1963) पंजाबी मूवी

सोलिना जेटली

सेलिना जेटली
🎂24 नवंबर 1981
शिमला , हिमाचल प्रदेश , भारत या काबुल , अफगानिस्तान
अल्मा मेटर
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय
व्यवसाय
अभिनेत्री, मॉडल
जीवनसाथी
पीटर हाग ​( एम.  2011 )
बच्चे
4 (1 मृतक)
विभिन्न स्रोतों के अनुसार, सेलिना जेटली का जन्म या तो शिमला , हिमाचल प्रदेश , भारत में हुआ था या काबुल , अफगानिस्तान में, उनके पिता अफगानी हिंदू पिता कर्नल वीके जेटली और अफगानी हिंदू मां थीं। ,मीता, जो भारतीय सेना में एक नर्स थी । जेटली का एक भाई भी सेना में है।

वह बड़ी होकर अपने पिता की तरह सेना में शामिल होना चाहती थी, या तो पायलट या डॉक्टर के रूप में।उनके पिता का पूरे भारत के शहरों और कस्बों में स्थानांतरण होने के कारण उनका अधिकांश बचपन अलग-अलग स्थानों पर बीता - परिणामस्वरूप उन्होंने एक दर्जन से अधिक विभिन्न स्कूलों में पढ़ाई की। उन्होंने सिटी मोंटेसरी स्कूल, स्टेशन रोड, लखनऊ और कैनोसा कॉन्वेंट स्कूल, रानीखेत में पढ़ाई की, जबकि उनका परिवार संबंधित शहरों में था। ब्रह्मपुर, ओडिशा में रहने के दौरान उन्होंने इग्नू ( खल्लिकोट कॉलेज अध्ययन केंद्र) से अकाउंटेंसी (ऑनर्स) के साथ वाणिज्य में डिग्री हासिल की । उनकी मां वहां डीपॉल स्कूल में पढ़ाती थीं। स्नातक स्तर की पढ़ाई के बाद, जेटली ने कुछ समय के लिए कोलकाता , पश्चिम बंगाल में एक सेल फोन कंपनी में मार्केटिंग एक्जीक्यूटिव के रूप में काम किया। परिवार अब महू में बस गया है ।

स्लीम खान

प्रसिद्ध पटकथा लेखक अभिनेता निर्माता सलीम खान के जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामनाएं

🎂जन्म: 24 नवंबर 1935 , बालाघाट
पत्नी: हेलेन (विवा. 1981), सुशीला चरक (विवा. 1964)
बच्चे: सलमान ख़ान, अल्वीरा खान, अर्पिता ख़ान, अरबाज़ ख़ान, ज़्यादा
माता-पिता: अब्दुल रशीद खान
पोते या नाती: अलिज़ेह अग्निहोत्री, अयान अग्निहोत्री, निर्वान खान,

सलीम ख़ान हिन्दी फ़िल्मों के मशहूर लेखक हैं। सलीम खान का जन्म ब्रिटिश भारत में एक रियासत इंदौर राज्य के बालाघाट शहर में (आधुनिक मध्य प्रदेश, भारत) में एक संपन्न परिवार में हुआ था। खान के दादा, अनवर खान, एक अलकोज़ाई पश्तून थे, जिन्होंने 1800 के दशक के मध्य में अफगानिस्तान से भारत की ओर पलायन किया और ब्रिटिश भारतीय सेना की घुड़सवार सेना में सेवा की। खान का परिवार सरकारी सेवा में रोजगार की तलाश में था, और अंततः इंदौर में बस गया

सलीम खान अपने माता-पिता की सबसे छोटी संतान थे, जब सलीम खान 14 साल के थे, तब तक उनके माता-पिता दोनों मृत्यु हो गई। उनके पिता, अब्दुल रशीद खान, भारतीय इंपीरियल पुलिस में शामिल हो गए थे और डीआईजी-इंदौर के रैंक तक पहुंच गए थे, जो ब्रिटिश भारत में एक भारतीय के लिए खुला सर्वोच्च पुलिस रैंक था। सलीम की माँ की मृत्यु हो गई जब वह केवल नौ वर्ष का थे। वह अपनी मृत्यु से पहले चार साल तक तपेदिक से पीड़ित थी, और इसलिए छोटे बच्चों के लिए उसके पास आना या उसे गले लगाना मना था, इसलिए बालक सलीम का अपनी माँ के साथ मृत्यु से पहले भी बहुत कम संपर्क था। उनके पिता की भी मृत्यु जनवरी 1950 में हुई थी, जब वह केवल चौदह वर्ष के थे दो महीने बाद, मार्च 1950 में, सलीम ने अपनी मैट्रिक परीक्षा इंदौर में सेंट रैफल्स स्कूल में प्रतिभाग किया। इस परीक्षा में उन्होंने मामूली रूप से अच्छा किया, और इंदौर के होलकर कॉलेज में दाखिला लिया और बीए पूरा किया। उनके बड़े भाइयों ने परिवार की पर्याप्त संपत्ति से प्राप्त धन के साथ उनका समर्थन किया, इस हद तक कि जब वह एक कॉलेज के छात्र थे तब उन्हें अपनी खुद की एक कार दी गई थी। उन्होंने खेल, विशेष रूप से क्रिकेट में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया, क्रिकेट में उनके उत्कृष्ट प्रदर्शन के कारण उन्हे कॉलेज द्वारा खेल कोटे के अंतरगत मास्टर की डिग्री के लिए नामांकन करने के लिए अनुमति दी गई थी। वह एक प्रशिक्षित पायलट भी थे इन वर्षों के दौरान, वह फिल्मों के प्रति आसक्त हो गए, और सहपाठियों से प्रोत्साहन प्राप्त किया, जिन्होंने उन्हें बताया कि उनके असाधारण अच्छे लगने के साथ, उन्हें फिल्म स्टार बनने की कोशिश करनी चाहिए। वो  प्रसिद्ध कलाकार सलमान खान के पिता है और बहुत ही अच्छे  इंसान है

सलीम खान ने पहला विवाह सुशीला चरक नामक एक मराठी हिन्दू महिला से किया जिन्होंने विवाहोपरान्त अपना नाम सलमा रख लिया सलमा से उन्हें चार सन्ताने क्रमशः तीन पुत्र सलमान खान, अरबाज़ ख़ान , सुहेल ख़ान और एक पुत्री अलवीरा खान उत्पन्न हुयी उन्होने दूसरा विवाह पुर्तगाली ऐग्लोइण्डियन महिला प्रसिद्ध नर्तकी और अभिनेत्री 'हेलन ऐन रिचर्डसन, जिनका फिल्मी नाम हेलेन था, से किया।

फिल्म निर्देशक के. अमरनाथ द्वारा जब उन्हें देखा गया तो उन्हें उनकी आगामी फिल्म बारात में एक सहायक भूमिका की पेशकश की। इसके लिये उन्हें एकमुश्त पारिश्रमिक रु 1000 / - तथा रु 400 / - के मासिक वेतन का भुगतान किया गया। फिल्म बारात का विधिवत निर्माण 1960 में पूर्ण हुआ लेकिन इसमें उनकी भूमिका एक छोटी सी थी। इस प्रकार सलीम खान फिल्मों में मामूली भूमिकाओं में काम करते हुये अभिनेताओं की सामान्य 'संघर्ष' की स्थिति में आ गए और धीरे-धीरे बी-ग्रेड फिल्मों में उतरने लगे]अगले दशक में, उन्होंने लगभग दो दर्जन फिल्मों में छोटी मोटी भूमिकाओं का निर्वहन किया उन्होंने 1970 तक कुल 14 फ़िल्में की, इनमें तीसरी मंज़िल (1966), सरहदी लुटेरा (1966) और दीवाना (1967) प्रमुख रूप से शामिल थीं। उनकी सबसे महत्वपूर्ण भूमिका तीसरी मंजिल थी, जहां उन्होंने नायक के दोस्त की भावपूर्ण भूमिका की।

प्रमुख फिल्में

अभिनेता  के रूप में

1966 सरहदी लुटेरा
1966 तीसरी मंज़िल
1967 दीवाना

लेखक के रूप में

2007 शोले
2006 डॉन
1996 मझधार
1996 दिल तेरा दीवाना
1994 आ गले लग जा
1991 मस्त कलंदर
1991 अकेला
1991 पत्थर के फूल
1990 ज़ुर्म
1989 तूफान
1988 कब्ज़ा
1987 मिस्टर इण्डिया
1986 नाम
1982 शक्ति
1981 क्रांति
1980 दोस्ताना
1980 शान
1979 काला पत्थर
1978 त्रिशूल
1978 डॉन
1977 ईमान धर्म
1977 चाचा भतीजा
1977 मनुशुलु चेसिना डोंगुलु
1975 शोले
1975 दीवार कथा, पटकथा एवं संवाद
1974 मजबूर
1973 ज़ंजीर
1973 यादों की बारात
1972 सीता और गीता
1971 हाथी मेरे साथी

निर्माता  के रूप में

2000 बिल्ला नम्बर 786
1993 इंसानियत के देवता
1989 आखिरी गुलाम

गुरुवार, 23 नवंबर 2023

भपपी लहड़ी

#27nov
#16feb 
बप्पी लाहिड़ी
पूरा नाम बप्पी लाहिड़ी
प्रसिद्ध नाम बप्पी दा
अन्य नाम अलोकेश लाहिड़ी (मूल नाम)
🎂जन्म 27 नवम्बर, 1952
जन्म भूमि कोलकाता, पश्चिम बंगाल
⚰️मृत्यु 16 फ़रवरी, 2022
मृत्यु स्थान मुम्बई, महाराष्ट्र
अभिभावक पिता- अपरेश लाहिड़ी
माता- बंसरी लाहिड़ी

पति/पत्नी चित्रणी लाहिड़ी
संतान रेमा (पुत्री), बाप्पा (पुत्र)
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र भारतीय हिन्दी सिनेमा
प्रसिद्धि गायक व संगीतकार
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी बप्पी लाहिड़ी और मिथुन चक्रवर्ती की जोड़ी ने बॉलिवुड में ऐसी धूम मचाई थी कि सब डांस और डिस्को म्यूजिक के दीवाने हो गए थे।
बप्पी लाहिड़ी (अंग्रेज़ी: Bappi Lahiri, जन्म- 27 नवम्बर, 1952; मृत्यु- 16 फ़रवरी, 2022) प्रसिद्ध भारतीय गायक और संगीतकार थे। उनका वास्तविक नाम 'अलोकेश लाहिड़ी' था। सोने के गहनों से लदे बप्पी लाहिड़ी के संगीत में अगर डिस्को की चमक-दमक नज़र आती थी तो उनके कुछ गाने सादगी और गंभीरता से परिपूर्ण हैं। 'बप्पी दा' के नाम से मशहूर बप्पी लाहिड़ी ने सन 1970 से 1990 के दशक के दौरान भारतीय सिनेमा को 'आई एम ए डिस्को डांसर', 'जिमी जिमी', 'पग घुंघरू', 'इंतेहान हो गई', 'तम्मा तम्मा लोगे', 'यार बिना चैन कहां रे' और 'चलते चलते' जैसे बहतरीन डिस्को गीत दिए थे।
परिचय
बप्पी लाहिड़ी का जन्म 27 नवंबर, 1952 को कोलकाता में हुआ था। वह एक धनाढ्य संगीत घराने से ताल्लुक रखते थे। उनके पिता अपरेश लाहिड़ी एक प्रसिद्ध बंगाली गायक थे। उनकी माता बांसरी लाहिड़ी भी बांग्ला संगीतकार थीं। बप्पी दा अपने माता-पिता की अकेली संतान थे। बचपन से ही उन्होंने विश्व प्रसिद्ध होने के सपने देखना शुरू कर दिया था। तीन साल की उम्र में तबला सीखने के साथ उन्होंने संगीत की शिक्षा लेनी शुरू की। संगीतकार किशोर कुमार और एस. मुखर्जी उनके संबंधी थे। उन्होंने संगीत अपने माता-पिता से ही सीखा और 19 साल की उम्र में पहली बार उन्हें बंगाली फिल्म 'दादु' में गाना गाने के लिए चुना गया।

बप्पी लाहिड़ी अपने हिट नंबरों के लिए उतने ही प्रसिद्ध थे, जितने सोने के प्रति उनके आकर्षण के लिए। बप्पी लाहिड़ी को 80 और 90 के दशक के 'डिस्को किंग' के रूप में जाना जाता था। 'नमक हलाल', 'डिस्को डांसर' और 'डांस डांस' जैसी फिल्मों में उनके गितों ने न केवल भारत में बल्कि विदेशों में भी प्रसिद्धि हासिल की थी। 2000 के दशक में बप्पी लाहिड़ी ने 'द डर्टी पिक्चर' के लिए 'ऊह ला ला', 'गुंडे' के लिए 'तूने मारी एंट्री', 'बद्रीनाथ की दुल्हनिया' के लिए 'तम्मा तम्मा' और हाल ही में 'शुभ मंगल ज्यादा सावधान' के लिए 'अरे प्यार कर ले' जैसे गाने गाए। उन्होंने आखिरी बार 2020 की फिल्म 'बागी 3' के लिए गीत की रचना की थी।

व्यक्तित्व
बप्पी लाहिड़ी की बात हो और उनके स्टाइल पर नजर ना जाए ऐसा हो ही नहीं सकता। महंगे और सोने के गहने पहनने वाले बप्पी लाहिड़ी हमेशा रॉकस्टार की लुक में नजर आते थे। बातचीत के ढंग से भी वह एक ऐसा मिश्रण लगते थे जिसमें भारतीय रंग रूप के साथ अधिक मात्रा में विदेशी फैशन हो। उनके पहनावे में अधिकतर ट्रैकसूट या कुर्ता पायजामा होता था। इसके साथ ही बप्पी लाहिड़ी अपने धूप के चश्मों को गर्मी हो या सर्दी कभी नहीं छोड़ते थे।

कॅरियर
बप्पी लाहिड़ी 19 साल की उम्र में ही बॉलिवुड में नाम कमाने के लिए मुंबई चले गए थे। साल 1973 में उन्हें हिन्दी फिल्म 'नन्हा शिकारी' में गाना गाने का मौका मिल गया। हालांकि उन्हें बॉलिवुड में असली पहचान 1975 की फिल्म “जख्मी” से मिली। इस फिल्म में उन्होंने मोहम्मद रफ़ी और किशोर कुमार जैसे महान गायकों के साथ गाना गाया। इसके बाद तो जैसे बप्पी दा का गाना सबकी जुबान पर छाने लगा। इसके बाद दौर आया बप्पी लाहिड़ी और मिथुन चक्रवर्ती की जोड़ी का। इस दोनों की जोड़ी ने बॉलिवुड में ऐसी धूम मचाई कि सब डांस और डिस्को म्यूजिक के दीवाने हो गए। उन्होंने मिलकर 'डिस्को डांसर', 'डांस डांस', 'कसम पैदा करने वाले की' जैसी फिल्मों को अपने गानों से ही हिट बना दिया।

बॉलिवुड में गायकों का एक अलग ही मुकाम रहा है। हर गायक का एक अलग ही तरीका होता है। लेकिन कई बार इन्हीं गायकों में से कोई गायक अपना एक ऐसा स्थान बनाता है जो बाकियों से बिलकुल जुदा होता है। ऐसे ही गायकों में से एक थे 'बप्पी दा' यानि बॉलिवुड के पहले रॉक स्टार बप्पी लाहिड़ी। हिन्दी सिनेमा में बिना हिन्दी से छेड़छाड़ किए बप्पी दा ने संगीत को नई दिशा दी। उन्होंने अपने एलबमों में अशोक कुमार और आशा भोंसले की आवाज का बखूबी इस्तेमाल किया। एलिशा चिनॉय और ऊषा उथुप के साथ मिलकर उन्होंने कई हिट नंबर दिए। हालांकि उन पर कई बार विदेशी धुनों को भी चुराने का आरोप लगा, पर उन्होंने आगे बढ़ने पर ही जोर दिया। 1990 के दशक में बप्पी दा फिल्मों से पूरी तरह अलग होकर अपने एलबमों पर ही काम करने लगे थे।

सोने से प्रेम
बप्पी लाहिड़ी की एक और खासियत उनके गहने थे। गले में सोने की मोटी चेन और भारी-भारी अंगूठियां पहने बप्पी लाहिड़ी को देखने वाले सोने की दुकान तक कहते थे। लेकिन सच तो यह था कि बप्पी लाहिड़ी को सोने से बेहद लगाव था और वह सोने को अपने लिए लकी मानते थे।

कुछ खास गाने
बप्पी लाहिड़ी के हिट गानों में से कुछ निम्न हैं-

याद आ रहा है तेरा प्यार -
आई एम ए डिस्को डांसर
बॉम्बे से आया मेरा दोस्त - आप की खातिर
ऐसे जीना भी क्या जीना है - कसम पैदा करने वाले की
तुम्हारा प्यार चाहिए मुझे जीने के लिए - मनोकामना
रात बाकी - नमक हलाल
यार बिना चैन कहां रे - साहब
ऊ ला ला ऊ ला ला - द डर्टी पिक्चर
पॉप का तड़का
बप्पी लाहिड़ी ने बॉलिवुड में गीतों को पॉप का तड़का लगाया और भारतीय दर्शकों को एक नया स्वाद प्रदान किया। भारतीय संगीत जगत में एक समय ऐसा भी था जब बप्पी लाहिड़ी का नाम आते ही लोगों के जहन में झुमते हुए गानें और बेहतरीन म्यूजिक घूमता था।

मृत्यु
बप्पी लाहिड़ी का निधन 16 फ़रवरी, 2022 को मुम्बई, महाराष्ट्र में हुआ। उन्होंने मुंबई में जुहू के क्रिटी केयर अस्पताल में रात 11 बजे आखिरी सांस ली। दिग्गज गायक बप्पी लाहिड़ी काफी लंबे समय से बीमार चल रहे थे। वह कोरोना वायरस से भी संक्रमित हो गए थे, जिसके चलते उनकी मुसीबत और बढ़ गई थी। वहीं बप्पी दा का इलाज कर रहे डॉक्टर्स ने कहा था- 'बप्पी जी करीब एक महीने से अस्पताल में भर्ती थे और उन्हें 14 फ़रवरी को अस्पताल से छुट्टी दे दी गई थी, लेकिन 15 फ़रवरी के दिन अचानक उनकी सेहत काफी बिगड़ गई और उनके परिवार ने हमारे एक डॉक्टर को घर बुलाया और उन्हें तुरंत अस्पताल लाया गया। बप्पी लाहिड़ी को स्वास्थ्य संबंधी कई दिक्कतें थीं जिसके चलते उनका देर रात ओएसए ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एप्निया के कारण उनका निधन हो गया।

अमरीकी ट्रंप

ट्रंप चले थे ईरान हराने , खुद अभी बने पप्पू  राहुल बने थे शेर ट्रंप के बल , खुद मुंह के बल गिरे।  दोनों हो रह बेइज्जत दुनिया हुई...