शुक्रवार, 27 अक्टूबर 2023

जय श्री

राजश्री शांताराम
🎂08 अक्टूबर 1944
बम्बई , बम्बई प्रेसीडेंसी , ब्रिटिश भारत ब्रिटिश राज
सिटिज़नशिप
अमेरिकन
पेशा
अभिनेत्री
सक्रिय वर्ष
1954
1961-1973
जीवनसाथी
ग्रेग चैपमैन
अभिभावक)
वी. शांताराम (पिता), जयश्री (मां)
राजश्री प्रशंसित भारतीय फिल्म निर्माता वी. शांताराम और अभिनेत्री जयश्री की बेटी हैं , जो वी. शांताराम की दूसरी पत्नी हैं। उनके भाई किरण शांताराम मुंबई के पूर्व शेरिफ थे ।

अमेरिका में राज कपूर के साथ फिल्म अराउंड द वर्ल्ड की शूटिंग के दौरान उनकी मुलाकात अमेरिकी छात्र ग्रेग चैपमैन से हुई। दोनों ने तीन साल बाद एक भारतीय समारोह में शादी की, जो पांच दिनों तक चला। वह अपने पति के साथ स्थायी रूप से अमेरिका में रहने चली गयीं।उनकी एक बेटी है। वे लॉस एंजिल्स में रहते हैं । 

वह पिछले 30 वर्षों से अमेरिका में रह रही हैं और अपने पति के साथ एक बहुत ही सफल कस्टम कपड़ों का व्यवसाय चला रही हैं, जबकि फिल्मों में उनकी रुचि अभी भी बरकरार है। वह हैक-ओ-लैंटर्न , टैंटेड लव और मॉनसून में सहायक निर्देशक थीं और उन्होंने "अशोक बाय अनदर नेम" नामक बच्चों के वीडियो पर कथन भी किया है।
📽️
1954 सुबह का तारा
1961 स्त्री
1963 ग्रहस्थि
1963 घर बसाके देखो
1964 शहनाई
1964 जी चाहता है 
1964 गीत गाया पत्थरों ने
1965 दो दिल 
1965 जानवर
1966 सागाई 
1966 मोहब्बत जिंदगी है 
1967 दिल ने पुकारा
1967 गुनाहों का देवता 
1967 दुनिया भर में रीता 
1968 सुहाग रात 
1968 ब्रह्मचारी
1973 नैना

सोमवार, 23 अक्टूबर 2023

शारदा

शारदा राजन आयंगर जिन्हें केवल शारदा नाम से श्रेय दिया गया, हिन्दी फिल्मों की पार्श्वगायिका रही हैं। 1960 और 70 के दशक में वो सक्रिय रही और 1969 से लेकर 1972 तक फिल्मफेयर पुरस्कारों में उन्हें चार नामांकन प्राप्त हुए, जिसमें से उन्हें जहाँ प्यार मिले के "बात ज़रा है आपस की" के लिये पुरस्कार प्राप्त भी हुआ।

🎂जन्म की तारीख और समय: 25 अक्तूबर 1933, मद्रास प्रैज़िडन्सी
⚰️मृत्यु की जगह और तारीख: 14 जून 2023
बच्चे: शम्मी राजन
शारदा जी को फिल्म सूरज (1966) में उनके गीत "तितली उड़ी" के लिए सबसे ज्यादा याद किया जाता है। 2007 में, उन्होंने अपना एल्बम अंदाज़-ए-बयान और जारी किया , जिसमें मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़लों पर आधारित उनकी अपनी रचनाएँ थीं ।
शारदा भारत के तमिलनाडु के एक अयंगर परिवार से थीं और बचपन से ही उनका रुझान संगीत की ओर था। 
उनकी आवाज़ आखिरी बार कांच की दीवार (1986) में सुनी गई थी।
वैसे 21 जुलाई 2007 को शारदा ने अपना ग़ज़ल एल्बम अंदाज़-ए-बयान और जारी किया , जो मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़लों का संकलन था। यह एल्बम अभिनेत्री शबाना आज़मी के हाथों जुहू जागृति मुंबई में जारी किया गया था ।
14 जून 2023 को 89 वर्ष की आयु में शारदा का निधन हो गया।

रविवार, 22 अक्टूबर 2023

मीनू मुमताज

मालिकाउन्निसा अली
प्रसिद्ध नाम मीनू मुमताज़
🎂जन्म 26 अप्रॅल, 1942
जन्म भूमि बम्बई 🇮🇳(आज़ादी पूर्व, वर्तमान मुम्बई, महाराष्ट्र)
⚰️मृत्यु 23 अक्टूबर, 2021
मृत्यु स्थान टोरंटो🇨🇦
अभिभावक पिता- मुमताज़ अली
पति/पत्नी सईद अली अकबर
संतान चार
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र भारतीय सिनेमा
मुख्य फ़िल्में ‘चौदहवीं का चांद’, ‘कागज के फूल’, ‘साहिब बीवी और गुलाम’, ‘ताजमहल’, ‘घूंघट’, ‘इंसान जाग उठा’, ‘घर बसाके देखो’ आदि।
प्रसिद्धि अभिनेत्री
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी मीनू मुमताज़ अपने समय के मशहूर कॉमेडियन और सुपर स्टार महमूद अली की बहन थीं। उन्हें मीनू मुमताज़ नाम अभिनेत्री मीना कुमारी ने दिया था।
भारतीय अभिनेत्री थीं। वह अपने समय के मशहूर कॉमेडियन महमूद अली की बहन थीं। भारतीय सिनेमा की दिग्गज अभिनेत्री रहीं मीना कुमारी और मीनू मुमताज़ में काफी गहरी मित्रता थी। सन 1950 से लेकर 1960 के दशक में बतौर डांसर कई फिल्मों में काम करने वाली मीनू मुमताज़ एक डांसर के साथ-साथ कैरेक्टर आर्टिस्ट भी थीं। मीनू मुमताज़ का असली नाम मालिकाउन्निसा अली था। जब फिल्मों में काम करने लगीं तो मीना कुमारी ने उनका नाम बदलकर मीनू मुमताज़ कर दिया था। तब से फिल्म इंडस्ट्री में मीनू मुमताज़ के नाम से मशहूर हो गईं।
परिचय
मीनू मुमताज ने फिल्मी दुनिया में ‘सखी हातिम’ से कदम रखा था। 1950 और 1960 के दशक की कई हिंदी फिल्मों में उन्होंने काम किया। कई बार फिल्मों में वह डांसर के तौर पर भी नजर आई हैं। उनकी सबसे ज्यादा मशहूर फिल्मों में ‘सीआईडी’, ‘नया दौर’, ‘ताज महल’, ‘गबन’ और ‘जमीर’ शामिल हैं। पहली फिल्म ‘सखी हातिम’ में मीनू मुमताज बलराज साहनी जैसे दिग्गज अभिनेता के साथ थीं। उन्होंने गुरुदत्त साहब के साथ भी काम किया। ‘चौदहवीं का चांद’, ‘कागज के फूल’, ‘साहिब बीवी और गुलाम’, ‘ताजमहल’, ‘घूंघट’, ‘इंसान जाग उठा’, ‘घर बसाके देखो’ जैसी कई फिल्मों में उन्होंने काम किया था।

मृत्यु
अभिनेत्री मीनू मुमताज़ की मृत्यु 23 अक्टूबर, 2021 को कनाडा में हुई। वह बीते कई सालों से बीमार थीं और लगभग बीस वर्षों से कनाडा में ही रह रही थीं। मीनू मुमताज़ के निधन के बारे में बात करते हुए उनके भतीजे नौषाद ने कहा, "वह जईफ थीं और उनकी उम्र भी 80 के आसपास थी। अब तक मैं जिस किसी से भी मिला हूं, वह उनमें से सबसे प्यारी इंसान थीं।" अपने बड़े भाई महमूद की तरह मीनू मुमताज़ ने भी अपनी पहचान फिल्मों में बनाने का फैसला किया था।

देवन वर्मा

देवेन वर्मा  

🎂जन्म 23 अक्टूबर, 1937
⚰️मृत्यु 02 दिसम्बर, 2014
मृत्यु स्थान पुणे, महाराष्ट्र
पति/पत्नी रूपा गांगुली
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र बॉलीवुड
मुख्य फ़िल्में 'गोलमाल', 'अंगूर', 'खट्टा मीठा', 'नास्तिक', 'रंग बिरंगी', 'चोरी मेरा काम', 'चोर के घर चोर' आदि।
शिक्षा राजनीति विज्ञान तथा समाजशास्त्र से स्नातक।
पुरस्कार-उपाधि सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता का फ़िल्मफेयर पुरस्कार (तीन बार)
प्रसिद्धि हास्य कलाकार
नागरिकता भारतीय
फ़िल्मों में प्रवेश देवेन वर्मा का फ़िल्मों में प्रवेश 1961 में बी. आर. चोपड़ा के बैनर तले फ़िल्म 'धर्मपुत्र' से हुआ।
अन्य जानकारी देवेन वर्मा बड़े पर्दे पर आख़िरी बार वर्ष 2003 में प्रदर्शित 'कलकत्ता मेल' फ़िल्म में नज़र आए थे। इस फ़िल्म में ये रानी मुखर्जी के दादाजी के किरदार में थे।
देवेन वर्मा भारतीय सिनेमा में हिन्दी फ़िल्मों के प्रसिद्ध हास्य अभिनेता थे। उन्होंने हिन्दी फ़िल्मों में अपने शानदार हास्य अभिनय से सभी का दिल जीत लिया था। देवेन वर्मा ने लगभग 149 फ़िल्मों में काम किया। 'गोलमाल', 'अंगूर', 'खट्टा मीठा', 'नास्तिक', 'रंग बिरंगी' आदि उनके कॅरियर की बड़ी फ़िल्मों में से एक रही थीं। 'बेशर्म' सहित कुछ फ़िल्मों का निर्माण और निर्देशन भी उन्होंने किया था। 'चोरी मेरा काम', 'चोर के घर चोर' तथा 'अंगूर' फ़िल्मों के लिए उन्हें बेस्ट कॉमेडियन के फ़िल्मफेयर अवॉर्ड से भी नवाजा़ गया था।

जन्म तथा शिक्षा
देवेन वर्मा का जन्म 23 अक्टूबर, 1937 को हुआ था। उनका पालन-पोषण पुणे में हुआ। उन्होंने यहीं से राजनीति विज्ञान तथा समाजशास्त्र में स्नातक की डिग्री प्राप्त की थी। देवेन वर्मा अपने समय के प्रसिद्ध अभिनेता और 'दादा मुनि' के नाम से मशहूर अशोक कुमार के दामाद थे। अशोक कुमार की सबसे छोटी पुत्री रूपा गांगुली से उनका विवाह हुआ था।

फ़िल्मों में प्रवेश
वर्ष 1959 में पढ़ाई समाप्त कर देवेन वर्मा मुम्बई आ गए। फ़िल्मी कॅरियर आरंभ करने में उन्हें ज्यादा परेशानी नहीं हुई। 'दादा मुनि' अशोक कुमार के वे दामाद थे। 'बीआर फ़िल्म्स' और 'यशराज फ़िल्म्स' में लगातार उन्हें काम मिला, क्योंकि इस बैनर से दादा मुनि के अंतरंग सम्बन्ध थे। देवेन वर्मा का फ़िल्मों में प्रवेश 1961 में बी. आर. चोपड़ा के बैनर तले फ़िल्म 'धर्मपुत्र' से हुआ। इसका निर्देशन यश चोपड़ा ने किया था। इस फ़िल्म में उनका छोटा-सा रोल था, जिस पर किसी ने अधिक ध्यान नहीं गया। 1964 में आई फ़िल्म 'सुहागन' में उनके अभिनय पर निर्माताओं की नजरें इनायत हुईं। 'देवर' फ़िल्म में उनका निगेटिव रोल था, तो दूसरी फ़िल्म 'मोहब्बत जिंदगी है' में उन्होंने हास्य भूमिका निभाई। दोनों फ़िल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर सफलता पाई।

यह समय देवेन वर्मा के लिए निर्णायक था। उन्हें कॉमेडी या खलनायकी में से किसी एक को चुनना था। उन्होंने कॉमेडी की ओर अपनी दिलचस्पी दिखाई। देवेन वर्मा के अभिनय की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि वे बड़ी आसानी से किरदार को अपने अंदर उतार लेते थे। वह फ़िल्मी जीवन में सिर्फ अभिनय करने ही नहीं आए थे। उन्हें निर्माता-निर्देशक बनकर अपनी अतिरिक्ति ऊर्जा को भी दर्शाना था।

यादगार भूमिकाएँ
फ़िल्म 'चोरी मेरा काम' (1975) में देवेन वर्मा परवीन भाई पब्लिशर के रूप में परदे पर आते हैं। एक किताब के प्रकाशित होते ही सबका ध्यान उनकी ओर आकर्षित होता है। इसी रोल को कुछ साल बाद 'चोर के घर चोर' (1978) फ़िल्म में और आगे ले जाया गया, जैसा इन दिनों सीक्वेल फ़िल्मों में किया जा रहा है। उनके कॅरियर की यादगार फ़िल्में थीं- 'गोलमाल' (1979), 'अंगूर' (1982) तथा 'रंग बिरंगी' (1983)। बासु चटर्जी, ऋषिकेश मुखर्जी, गुलज़ार जैसे संवेदनशील निर्देशकों की फ़िल्मों में काम करने से देवेन को पुरस्कार भी मिले और प्रतिष्ठा भी। शेक्सपीयर के मशहूर नाटक 'कॉमेडी ऑफ़ एरर्स' पर भारत में कई फ़िल्में बनी हैं, जिनमें गुलज़ार निर्देशित 'अंगूर' सर्वोत्तम मानी जाती है। इन फ़िल्मों के अलावा भी देवेन वर्मा ने कई फ़िल्मों में यादगार भूमिकाएँ निभाईं और दर्शकों को तनाव मुक्त किया। उन्होंने कॉमेडी करने के लिए अश्लीलता का कभी सहारा नहीं लिया और हमेशा अपने संवाद बोलने के अंदाज़और बॉडी लैंग्वेज के जरिये दर्शकों को हंसाया। उनके परदे पर आते ही दर्शक हंसने के लिए तैयार हो जाते थे

📽️प्रमुख फ़िल्में
देवेन वर्मा की प्रमुख फ़िल्में
फ़िल्म वर्ष फ़िल्म वर्ष
अनुपमा 1966 खामोशी 1970
गुड्डी 1971 बुड्ढा मिल गया 1971
मेरे अपने 1971 अन्नदाता 1972
धुंध 1973 कोरा कागज 1974
चोरी मेरा काम 1975 कभी कभी 1976
चोर के घर चोर 1978 गोलमाल 1979
लोक परलोक 1979 सौ दिन सास के 1980
जुदाई 1980 कुदरत 1981
ले‍डिस टेलर 1981 सिलसिला 1981
अंगूर 1982 रंग बिरंगी 1983
झूठी 1986 चमत्कार 1992
क्या कहना 2000 खट्टा मीठा 1977
देवेन वर्मा बड़े पर्दे पर आख़िरी बार 'कलकत्ता मेल' फ़िल्म में नजर आए थे। मशहूर कॉमेडी फ़िल्म 'अंदाज़ अपना अपना' में उन्होंने आज के सुपर स्टार आमिर ख़ान के पिता की भूमिका निभाई थी।

सम्मान और पुरस्कार
1975 - 'चोरी मेरा काम' - फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता।
1982 - 'अंगूर' - फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता।
1979 - 'चोर के घर चोरी' - फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता।
1980 - 'जुदाई' - फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता के लिए नामांकित किया गया।
निधन
देवेन वर्मा का निधन 77 वर्ष की आयु में दिल का दौरा पड़ने से #02dic  दिसम्बर, 2014 को हुआ

शनिवार, 21 अक्टूबर 2023

भावना बलसारा

भावना बलसावर हिंदी अभिनेत्री
🎂जन्म तिथि : 21-10-1975 हास्य अभिनेत्रि
भावना की प्रसिद्धि का दावा छोटे पर्दे पर "गुटुर गु" जैसे हिट शो में एक कॉमेडियन के रूप में उनकी बेदाग टाइमिंग है। 21 अक्टूबर 1975 को मुंबई में जन्मशोभा खोटेअपने आप में एक अभिनेत्री, बड़े होने के दौरान अभिनय उनके दिमाग में आखिरी चीज थी। वह एक मेधावी छात्रा थी और आईसीएसई बोर्ड की टॉपर थी, उसने एसएनडीटी कॉलेज में फैशन समन्वय का काम यह दावा करते हुए किया कि वह हमेशा रचनात्मक कला के करीब कुछ करना चाहती थी।

स्टेज अभिनय से उनका परिचय किसी आकस्मिक घटना से कम नहीं था, "बॉटम्स अप" स्टेज प्ले के लिए अपनी माँ के साथ जाने पर, एक अभिनेत्री की अनुपस्थिति के कारण उन्हें एक छोटी भूमिका निभाने का मौका मिला और तब से उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उनकी प्रसिद्ध भूमिकाओं में लोकप्रिय सिटकॉम में सनकी चाची शामिल हैं।देख भाई देखया "ज़बान संभाल के" में तेजस्वी दिल की धड़कन। भावना ने अधिक गंभीर भूमिकाएँ करने में रुचि दिखाई है, जहाँ वह अपने अंतर्मुखी पक्ष के प्रति भी सच्ची हो सकती हैं।
वह एक शौकीन कुत्ता प्रेमी और लेखन उत्साही भी है और उम्मीद करती है कि किसी दिन वह वंशावली के लायक लेखिका बनेगी।
इस जीवनी का एक और संस्करण...
अभिनेताओं के परिवार से आने वाली भावना बलसावर एक फिल्म, टीवी और मंच अभिनेत्री हैं। उनकी मां शोभा खोटे एक बॉलीवुड अभिनेत्री थीं जिन्होंने 4 साल की उम्र में अभिनय करना शुरू कर दिया था। शोभा खोटे के छोटे भाई हैंविजू खोटेजो फिल्म "शोले" में अपनी भूमिका के लिए व्यापक रूप से जाने जाते हैं। भावना के दादा और उनकी बहन, नंदू खोटे औरदुर्गा खोटेक्रमशः थिएटर उद्योग में प्रसिद्ध अभिनेता हैं।

भावना ने टीवी श्रृंखला "" में सरस्वती के रूप में अपनी पहली उपस्थिति दर्ज की। उन्होंने हिंदी सिटकॉम "देख भाई देख" में अभिनय किया, जिसका निर्माण किया गया थाजया बच्चनऔर द्वारा निर्देशितआनंद महेंद्रू. इस श्रृंखला के बाद, भावना एक और हिंदी टीवी श्रृंखला “ज़बान संभालके”, जो एक और सफल सिटकॉम था। बाद में श्रृंखला में, शुभा और विजू खोटे को भी कुछ एपिसोड में दिखाया गया। "हेरी फेरी", "डैम दमा" डैम", "गुटुर गु" (एक मूक शो) और "" सहित लगभग 15 अन्य टेलीविजन श्रृंखलाओं के बाद, वह वर्तमान में ज़ी पर प्रसारित होने वाली श्रृंखला "सतरंगी ससुराल" में हरप्रीत के रूप में अभिनय कर रही हैं। टी.वी. यह श्रृंखला मराठी शो, "होनार सुन मी ह्या घरची" का रूपांतरण है।

भावना ने कुछ फिल्मों और मंच पर भी अभिनय किया। उन्होंने "अंधा युग" नामक नाटक का प्रदर्शन किया। के द्वारा यह लिखा गया थाधर्मवीर भारतीवर्ष 1954 में और यह 1947 के भारत विभाजन के कारण मानव जीवन और नैतिक मूल्यों के विनाश का एक रूपक है। भावना ने फिल्म “धूम धड़ाका'', जो कि एक मराठी कॉमेडी फिल्म है जिसका निर्देशन किया ।

कादर ख़ान


कादर ख़ान
🎂जन्म 22 अक्तूबर, 1935 बलूचिस्तान, पाकिस्तान
⚰️मृत्यु 31 दिसम्बर 2018टोरंटो, कनाडा
अभिभावक पिता- अब्दुल रहमान ख़ान, माता- इकबाल बेगम
पति/पत्नी अज़रा ख़ान
संतान सरफ़राज़ ख़ान, शाहनवाज़ ख़ान और क्यूडस ख़ान
कर्म भूमि मुम्बई
कर्म-क्षेत्र संवाद लेखक, अध्यापक
मुख्य फ़िल्में 'बाप नंबरी बेटा दस नंबरी', 'सनम तेरी कसम', 'नौकर बीबी का', 'शरारा', 'कैदी', 'घर एक मंदिर', 'वतन के रखवाले', 'खुदगर्ज', 'ख़ून भरी मांग', 'आँखेंं', 'शतरंज', 'कुली नंबर 1', 'हीरो नंबर 1', 'दूल्हे राजा', 'राजा बाबू', 'चालबाज़' आदि।
शिक्षा स्नातकोत्तर
विद्यालय इस्माइल यूसुफ़ कॉलेज, मुम्बई, उस्मानिया विश्वविद्यालय
पुरस्कार-उपाधि फ़िल्मफेयर पुरस्कार सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता (बाप नंबरी बेटा दस नंबरी)
प्रसिद्धि अभिनेता
नागरिकता भारतीय
भाषा ज्ञान उर्दू, हिंदी, अंग्रेज़ी
अन्य जानकारी अमर अकबर एंथोनी, ख़ून पसीना, परवरिश, शालीमार, मुक्कदर का सिकंदर, सुहाग, याराना, लावारिस, सत्ते पे सत्ता, धर्मकांटा, कुली, शराबी आदि फ़िल्मों में संवाद लिखे।
भारतीय सिनेमा जगत् में एक ऐसे बहुआयामी कलाकार के तौर पर जाना जाता है, जिन्होंने सहनायक, संवाद लेखक, खलनायक, हास्य अभिनेता और चरित्र अभिनेता के तौर पर दर्शकों के बीच अपनी पहचान बनाई। खलनायक से लेकर हास्य अभिनेता तक हर किरदार में जान फूंक देने वाले कादर ख़ान अब तक 300 से ज्यादा फ़िल्मों में काम कर चुके हैं, लेकिन उनकी प्रतिभा यहीं नहीं थमती। वह 80 से अधिक लोकप्रिय फ़िल्मों के लिए संवाद लिखकर उस दिशा में भी अपना लोहा मनवा चुके हैं। कादर ख़ान के अभिनय की एक विशेषता यह है कि वह किसी भी तरह की भूमिका के लिए उपयुक्त हैं। फ़िल्म 'कुली' एवं 'वर्दी' में एक ‘क्रूर खलनायक’ की भूमिका हो या फिर ‘कर्ज़ चुकाना है’, ‘जैसी करनी वैसी भरनी’ फ़िल्म में भावपूर्ण अभिनय या फिर ‘बाप नंबरी बेटा दस नंबरी’ और ‘प्यार का देवता’ जैसी फ़िल्मों में हास्य अभिनय इन सभी चरित्रों में उनका कोई जवाब नहीं है।

जीवन परिचय
कादर ख़ान का जन्म 22 अक्टूबर, 1935 को बलूचिस्तान में हुआ था, जो अब पाकिस्तान का हिस्सा है। भारत पाक बंटवारे के बाद उनका परिवार भारत में बस गया। कादर ख़ान ने अपनी स्नातकोत्तर की पढ़ाई उस्मानिया विश्वविद्यालय से पूरी की। इसके बाद उन्होंने अरबी भाषा के प्रशिक्षण के लिये एक संस्थान की स्थापना करने का निर्णय लिया। कादर ख़ान ने अपने कैरियर की शुरुआत एक शिक्षक के तौर पर की। एक बार कॉलेज में हो रहे वार्षिक समारोह में कादर ख़ान को अभिनय करने का मौका मिला। इस समारोह में अभिनेता दिलीप कुमार ने कादर ख़ान के अभिनय से काफ़ी प्रभावित हुए और उन्हें अपनी फ़िल्म ‘सगीना’ में काम करने का प्रस्ताव दिया। यही कारण है कि कादर के अंदर एक शिक्षक, एक संवाद लेखक और एक अभिनेता तीनों एक साथ बसते हैं।

फ़िल्मी कैरियर
महान अभिनेता दिलीप कुमार ने कादर ख़ान को अपनी फ़िल्म ‘सगीना’ में काम करने का प्रस्ताव दिया। वर्ष 1974 में आई फ़िल्म ‘सगीना’ के बाद भी कादर ख़ान को काफ़ी संघर्ष करना पड़ा। इस दौरान उनकी ‘दिल दीवाना’, ‘बेनाम’, ‘उमर कैद’, ‘अनाड़ी’ और बैराग जैसी फ़िल्में प्रदर्शित हुई। लेकिन इन फ़िल्मों से उन्हें कुछ ख़ास फायदा नहीं पहुंचा। वर्ष 1977 में कादर ख़ान की 'खून पसीना' और 'परवरिश' जैसी फ़िल्में प्रदर्शित हुई। इन फ़िल्मों के जरिए वह कुछ हद तक अपनी पहचान बनाने में कामयाब हुए।

सफल फ़िल्में
फ़िल्म ‘खून पसीना’ और ‘परवरिश’ की सफलता के बाद कादर ख़ान को कई अच्छी फ़िल्मों के प्रस्ताव मिलने शुरू हो गए। जिनमें मुकद्दर का सिकंदर, मिस्टर नटवरलाल, सुहाग, अब्दुल्ला, दो और दो पांच, लूटमार, कुर्बानी, याराना, बुलंदी और नसीब जैसी बड़े बजट की फ़िल्में शामिल थी। इन फ़िल्मों की सफलता के बाद कादर ख़ान ने सफलता की नयी बुलंदियों को छुआ और बतौर खलनायक फ़िल्म इंडस्ट्री में स्थापित हो गए। वर्ष 1983 में प्रदर्शित फ़िल्म ‘कुली’ कादर ख़ान के करियर की सुपरहिट फ़िल्मों में शुमार की जाती है। मनमोहन देसाई के बैनर तले बनी इस फ़िल्म में अमिताभ बच्चन ने मुख्य भूमिका निभाई थी। फ़िल्म टिकट खिड़की पर सुपरहिट साबित हुयी। इसके साथ ही कादर ख़ान फ़िल्म इंडस्ट्री के चोटी के खलनायकों की फेहरिस्त में शामिल हो गए। वर्ष 1990 में प्रदर्शित फ़िल्म ‘बाप नंबरी बेटा दस नंबरी’ कादर ख़ान के सिने करियर की महत्त्वपूर्ण फ़िल्मों में से एक है। इस फ़िल्म में कादर ख़ान और शक्ति कपूर ने बाप और बेटे की भूमिका निभाई जो ठग बनकर दूसरों को धोखा दिया करते हैं। फ़िल्म में कादर ख़ान और शक्ति कपूर ने अपने कारनामों के जरिये दर्शकों को हंसाते-हंसाते लोटपोट कर दिया। फ़िल्म में अपने दमदार अभिनय के लिये कादर ख़ान फ़िल्मफेयर पुरस्कार से सम्मानित भी किए गए।

चरित्र अभिनेता
नब्बे के दशक में कादर ख़ान ने अपने अभिनय को एकरूपता से बचाने और स्वयं को चरित्र अभिनेता के रूप में स्थापित करने के लिए अपनी भूमिकाओं में परिवर्तन भी किया। इस क्रम में वर्ष 1992 में प्रदर्शित फ़िल्म ‘अंगार’ में उन्होंने अंडर वर्ल्ड डॉन जहांगीर ख़ान की भूमिका को रूपहले पर्दे पर साकार किया। दशक के अंतिम वर्षो में बतौर ख़लनायक कादर ख़ान की फ़िल्मों को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। इसके बाद कादर ख़ान ने हास्य अभिनेता के तौर पर भी काम करना शुरू कर दिया। इस क्रम में वर्ष 1998 में प्रदर्शित फ़िल्म ‘दूल्हे राजा’ में अभिनेता गोविंदा के साथ उनकी भूमिका दर्शकों के बीच काफ़ी पसंद की गयी।

प्रसिद्ध फ़िल्में
कादर ख़ान ने अपने सिने करियर में लगभग 300 फ़िल्मों में अभिनय किया है। उनकी अभिनीत फ़िल्मों में मुक्ति, ज्वालामुखी, मेरी आवाज सुनो, जमाने को दिख़ाना है, सनम तेरी कसम, नौकर बीबी का, शरारा, कैदी, घर एक मंदिर, गंगवा, जान जानी जर्नादन, घर द्वार, तबायफ़, पाताल भैरवी, इंसाफ़ की आवाज़, स्वर्ग से सुंदर, वतन के रखवाले, खुदगर्ज़, ख़ून भरी मांग, आँखेंं, शतरंज, कुली नंबर 1, हीरो नंबर 1, जुड़वा, बड़े मियां छोटे मियां, दूल्हे राजा, राजा बाबू, चालबाज़, हसीना मान जाएगी, फंटूश आदि।

शक्ति कपूर के साथ जोड़ी
कादर ख़ान के सिने करियर में उनकी जोड़ी अभिनेता शक्ति कपूर के साथ काफ़ी पसंद की गयी। इन दोनों अभिनेताओं ने अब तक लगभग 100 फ़िल्मों में एक साथ काम किया है। उनकी जोड़ी वाली महत्त्वपूर्ण फ़िल्मों में से कुछ इस प्रकार हैं- बाप नंबरी बेटा दस नंबरी, नसीब, लूटमार, हिम्मतवाला, महान, हैसियत, जस्टिस चौधरी, अक्लमंद, मकसद, मवाली, तोहफा, इंकलाब, कैदी, गिरफ्तार, घर संसार, धर्म अधिकारी, सिंहासन, सोने पे सुहागा, मास्टरजी, इंसानियत के दुश्मन, वक्त की आवाज़, जैसी करनी वैसी भरनी, नाचने वाले गाने वाले, राजा बाबू आदि।

संवाद लेखक
कादर ख़ान ने कई फ़िल्मों में संवाद लेखक के तौर पर भी काम किया है। इनमें खेल खेल में, रफूचक्कर, धरमवीर, अमर अकबर एंथोनी, ख़ून पसीना, परवरिश, शालीमार, मुक्कदर का सिकंदर, मिस्टर नटवरलाल, सुहाग, याराना, लावारिस, सत्ते पे सत्ता, देश प्रेमी, सनम तेरी कसम, धर्मकांटा, कुली, शराबी, गिरफ्तार, कर्मा, ख़ून भरी मांग, हत्या, हम, कुली नंबर वन, साजन चले ससुराल जैसी सुपरहिट फ़िल्में शामिल है।

अमिताभ को निर्देशित करने की अधूरी तमन्ना
कादर ख़ान की अमिताभ बच्चन को लेकर फ़िल्म बनाने की तमन्ना अब तक पूरी नहीं हो सकी। अभिनेता कादर ख़ान और अमिताभ बच्चन ने एक साथ कई फ़िल्में कीं। अदालत, सुहाग, मुकद्दर का सिकंदर, नसीब और कुली जैसी बेहद कामयाब फ़िल्मों में इन दोनों ने साथ काम किया। इसके अलावा कादर ख़ान ने अमर अकबर एंथनी, सत्ते पे सत्ता और शराबी जैसी फ़िल्मों के संवाद भी लिखे, लेकिन कादर ख़ान अमिताभ बच्चन को लेकर खुद एक फ़िल्म बनाना चाहते थे और उनकी ये तमन्ना अब तक पूरी नहीं हो सकी। कादर ने ये बात एक ख़ास बातचीत में बताई। उन्होंने कहा, मैं अमिताभ बच्चन, जया प्रदा और अमरीश पुरी को लेकर फ़िल्म 'जाहिल' बनाना चाहता था। उसका निर्देशन भी मैं खुद करना चाहता था लेकिन खुदा को शायद कुछ और ही मंजूर था। कादर ख़ान ने बताया कि इसके फौरन बाद फ़िल्म 'कुली' की शूटिंग के दौरान अमिताभ बच्चन को जबरदस्त चोट लग गई और फिर वो महीनों अस्पताल में भर्ती रहे। अमिताभ के अस्पताल से वापस आने के बाद फिर कादर ख़ान अपनी दूसरी फ़िल्मों में बहुत ज्यादा व्यस्त हो गए और इधर अमिताभ बच्चन राजनीति में आ गए। उसके बाद कादर ख़ान और अमिताभ की जुगलबंदी वाली ये फ़िल्म हमेशा के लिए डब्बाबंद हो गई। अमिताभ की तारीफ़ करते हुए कादर ख़ान कहते हैं, वो संपूर्ण कलाकार हैं, अल्लाह ने उनको अच्छी आवाज़, अच्छी जबान, अच्छी ऊंचाई और बोलती आंखों से नवाजा है।

कादर ख़ान कुछ सालों से फ़िल्मों से दूर हो गए थे। इसकी वजह बताते हुए वो कहते हैं, वक्त के साथ फ़िल्में भी बदल गई हैं। अब ऐसे दौर में मैं अपने आपको फिट नहीं पाता। मेरे लिए बदलते दौर के साथ खुद को बदलना संभव नहीं है, तो मैंने अपने आपको फ़िल्मों से अलग कर लिया। कादर ख़ान ने ये भी कहा कि मौजूदा दौर के कलाकारों की भाषा पर पकड़ नहीं है और ये बात उन्हें दुखी करती है। 70 के दशक में अमिताभ बच्चन की कुछ फ़िल्मों जैसे सुहाग, अमर अकबर एंथनी और मुकद्दर का सिकंदर में कादर ख़ान की कलम से लिखे संवाद काफ़ी मशहूर हुए, लेकिन कादर ख़ान को इस बात का दु:ख है कि उन फ़िल्मों में नायक जिस चालू मुंबइया भाषा का इस्तेमाल करता है वही बाद की फ़िल्मों की मुख्य भाषा बन गई और फिर धीरे-धीरे उसकी आड़ में फ़िल्मों की भाषा खराब होती चली गई। वो कुछ दोष अपने आपको भी देते हैं। कादर ख़ान ने 80 के दशक में जीतेंद्र, मिथुन और 90 के दशक में गोविंदा के साथ भी कई फ़िल्में कीं। वो अपने दौर को याद करते हुए भावुक हो जाते हैं। उनके मुताबिक़ असरानी, शक्ति कपूर, गोविंदा, जीतेंद्र और अरुणा ईरानी के साथ की गई उनकी कई फ़िल्में और इन कलाकारों के साथ बिताया वक्त उन्हें बहुत याद आता है। कादर ख़ान ने बताया कि ख़ासतौर पर वो असरानी के जबरदस्त प्रशंसक हैं, जिनके साथ उन्होंने कई फ़िल्में कीं। फिलहाल कादर ख़ान अपने बेटों के थिएटर ग्रुप और उनके प्ले में व्यस्त हैं। उनके बेटे सरफ़राज ख़ान और शाहनवाज ख़ान, अपने पिता के लिखे दो नाटकों का मंचन कर रहे हैं। इन नाटकों के नाम है मेहरबां कैसे-कैसे और लोकल ट्रेन। ये दोनों ही नाटक राजनीतिक व्यंग्य हैं।

निधन
कादर ख़ान के बेटे सरफ़राज़ ने बताया, ‘मेरे पिता हमें छोड़कर चले गए। लंबी बीमारी के बाद 31 दिसम्बर शाम छह बजे (कनाडाई समय) उनका निधन हो गया। वह दोपहर को कोमा में चले गए थे। वह पिछले 16-17 हफ्तों से अस्पताल में भर्ती थे।’ 81 वर्षीय कादर ख़ान लंबे समय से बीमार चल रहे थे। वह कनाडा के एक अस्पताल में भर्ती थे। उनके बेटे ने बताया कि अभिनेता का अंतिम संस्कार भी वहीं किया जाएगा।

सम्मान और पुरस्कार
फ़िल्मफेयर पुरस्कार सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता (फ़िल्म- बाप नंबरी बेटा दस नंबरी)
कादर ख़ान को 1991 को बेस्ट कॉमेडियन का और 2004 में बेस्ट सपोर्टिंग रोल का फिल्म फेयर मिल चुका है।
2013 में, कादर ख़ान को उनके फिल्मों में योगदान के लिए साहित्य शिरोमनी अवार्ड से नवाजा गया।

परणिति चोपड़ा

परिणीति चोपड़ा

 🎂जन्म 22 अक्टूबर 1988, अम्बाला, हरियाणा) 

एक भारतीय अभिनेत्री है जो हिन्दी फिल्मों में काम करती है। चोपड़ा बैंक निवेशकर्ता बनना चाहती थी लेकिन मैनचेस्टर बिजनेस स्कूल से त्रिक सनद सम्मान (व्यापार, वित्त और अर्थशास्त्र में) प्राप्त करने के बाद वह 2009 की आर्थिक मंदी के दौरान वापस भारत लौट आई और जनसंपर्क सलाहकार के रूप में यश राज फ़िल्म्स से जुड़ गई। बाद में अभिनेत्री के तौर पर तीन फिल्मों में कार्य करन का समझोता किया।
चोपड़ा का जन्म एक पंजाबी परिवार में अम्बाला, हरियाणा में उसके पिता पवन चोपड़ा एक व्यवसायी हैं और अम्बाला कैनटोनमेंट में भारतीय थलसेना के प्रदायक (पूर्तिकर्ता) हैं, उसकी माता का नाम रीना चोपड़ा है। परिणीति की शुरूआती शिक्षा कान्‍वेंट ऑफ जीसस एंड मैरी से हुई थी। 17 साल की उम्र में वे लंदन चली गईं जहां से उन्‍होंने मैंनचेस्‍टर बिजनेस स्‍कूल से बिजनेस, फाइनेंस और इ‍कनॉमिक्‍स में ऑनर्स की डिग्री प्राप्‍त की।
परिणीति चोपड़ा ने अपना एक्टिंग का सफर फिल्म ‘रिकी वर्सेज लेडी बहेल’ से किया था. इसके बाद एक्ट्रेस मेन लीड के तौर पर फिल्म ‘इशकजादे’ में नजर आईं. फिल्म में उनके साथ अर्जुन कपूर थे. फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर अच्छा कलेक्शन किया था. 
एक्ट्रेस परिणीति चोपड़ा ने 24 सितंबर को राघव चड्ढा संग उदयपुर के लीला पैलेस में शादी की थी
पति: राघव चड्ढा (विवा.24 सितंबर 2023)

माता-पिता: पवन चोपड़ा, रीना चोपड़ा
भाई: सरज चोपड़ा, शिवांग चोपड़ा

मनुस्मृति

. ................मनुस्मृति.................... जरा सोचिए, अगर आज भारत का कानून यह तय कर दे कि— "एक आम आदमी चोरी करे तो उसे...