शनिवार, 21 अक्टूबर 2023

कादर ख़ान


कादर ख़ान
🎂जन्म 22 अक्तूबर, 1935 बलूचिस्तान, पाकिस्तान
⚰️मृत्यु 31 दिसम्बर 2018टोरंटो, कनाडा
अभिभावक पिता- अब्दुल रहमान ख़ान, माता- इकबाल बेगम
पति/पत्नी अज़रा ख़ान
संतान सरफ़राज़ ख़ान, शाहनवाज़ ख़ान और क्यूडस ख़ान
कर्म भूमि मुम्बई
कर्म-क्षेत्र संवाद लेखक, अध्यापक
मुख्य फ़िल्में 'बाप नंबरी बेटा दस नंबरी', 'सनम तेरी कसम', 'नौकर बीबी का', 'शरारा', 'कैदी', 'घर एक मंदिर', 'वतन के रखवाले', 'खुदगर्ज', 'ख़ून भरी मांग', 'आँखेंं', 'शतरंज', 'कुली नंबर 1', 'हीरो नंबर 1', 'दूल्हे राजा', 'राजा बाबू', 'चालबाज़' आदि।
शिक्षा स्नातकोत्तर
विद्यालय इस्माइल यूसुफ़ कॉलेज, मुम्बई, उस्मानिया विश्वविद्यालय
पुरस्कार-उपाधि फ़िल्मफेयर पुरस्कार सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता (बाप नंबरी बेटा दस नंबरी)
प्रसिद्धि अभिनेता
नागरिकता भारतीय
भाषा ज्ञान उर्दू, हिंदी, अंग्रेज़ी
अन्य जानकारी अमर अकबर एंथोनी, ख़ून पसीना, परवरिश, शालीमार, मुक्कदर का सिकंदर, सुहाग, याराना, लावारिस, सत्ते पे सत्ता, धर्मकांटा, कुली, शराबी आदि फ़िल्मों में संवाद लिखे।
भारतीय सिनेमा जगत् में एक ऐसे बहुआयामी कलाकार के तौर पर जाना जाता है, जिन्होंने सहनायक, संवाद लेखक, खलनायक, हास्य अभिनेता और चरित्र अभिनेता के तौर पर दर्शकों के बीच अपनी पहचान बनाई। खलनायक से लेकर हास्य अभिनेता तक हर किरदार में जान फूंक देने वाले कादर ख़ान अब तक 300 से ज्यादा फ़िल्मों में काम कर चुके हैं, लेकिन उनकी प्रतिभा यहीं नहीं थमती। वह 80 से अधिक लोकप्रिय फ़िल्मों के लिए संवाद लिखकर उस दिशा में भी अपना लोहा मनवा चुके हैं। कादर ख़ान के अभिनय की एक विशेषता यह है कि वह किसी भी तरह की भूमिका के लिए उपयुक्त हैं। फ़िल्म 'कुली' एवं 'वर्दी' में एक ‘क्रूर खलनायक’ की भूमिका हो या फिर ‘कर्ज़ चुकाना है’, ‘जैसी करनी वैसी भरनी’ फ़िल्म में भावपूर्ण अभिनय या फिर ‘बाप नंबरी बेटा दस नंबरी’ और ‘प्यार का देवता’ जैसी फ़िल्मों में हास्य अभिनय इन सभी चरित्रों में उनका कोई जवाब नहीं है।

जीवन परिचय
कादर ख़ान का जन्म 22 अक्टूबर, 1935 को बलूचिस्तान में हुआ था, जो अब पाकिस्तान का हिस्सा है। भारत पाक बंटवारे के बाद उनका परिवार भारत में बस गया। कादर ख़ान ने अपनी स्नातकोत्तर की पढ़ाई उस्मानिया विश्वविद्यालय से पूरी की। इसके बाद उन्होंने अरबी भाषा के प्रशिक्षण के लिये एक संस्थान की स्थापना करने का निर्णय लिया। कादर ख़ान ने अपने कैरियर की शुरुआत एक शिक्षक के तौर पर की। एक बार कॉलेज में हो रहे वार्षिक समारोह में कादर ख़ान को अभिनय करने का मौका मिला। इस समारोह में अभिनेता दिलीप कुमार ने कादर ख़ान के अभिनय से काफ़ी प्रभावित हुए और उन्हें अपनी फ़िल्म ‘सगीना’ में काम करने का प्रस्ताव दिया। यही कारण है कि कादर के अंदर एक शिक्षक, एक संवाद लेखक और एक अभिनेता तीनों एक साथ बसते हैं।

फ़िल्मी कैरियर
महान अभिनेता दिलीप कुमार ने कादर ख़ान को अपनी फ़िल्म ‘सगीना’ में काम करने का प्रस्ताव दिया। वर्ष 1974 में आई फ़िल्म ‘सगीना’ के बाद भी कादर ख़ान को काफ़ी संघर्ष करना पड़ा। इस दौरान उनकी ‘दिल दीवाना’, ‘बेनाम’, ‘उमर कैद’, ‘अनाड़ी’ और बैराग जैसी फ़िल्में प्रदर्शित हुई। लेकिन इन फ़िल्मों से उन्हें कुछ ख़ास फायदा नहीं पहुंचा। वर्ष 1977 में कादर ख़ान की 'खून पसीना' और 'परवरिश' जैसी फ़िल्में प्रदर्शित हुई। इन फ़िल्मों के जरिए वह कुछ हद तक अपनी पहचान बनाने में कामयाब हुए।

सफल फ़िल्में
फ़िल्म ‘खून पसीना’ और ‘परवरिश’ की सफलता के बाद कादर ख़ान को कई अच्छी फ़िल्मों के प्रस्ताव मिलने शुरू हो गए। जिनमें मुकद्दर का सिकंदर, मिस्टर नटवरलाल, सुहाग, अब्दुल्ला, दो और दो पांच, लूटमार, कुर्बानी, याराना, बुलंदी और नसीब जैसी बड़े बजट की फ़िल्में शामिल थी। इन फ़िल्मों की सफलता के बाद कादर ख़ान ने सफलता की नयी बुलंदियों को छुआ और बतौर खलनायक फ़िल्म इंडस्ट्री में स्थापित हो गए। वर्ष 1983 में प्रदर्शित फ़िल्म ‘कुली’ कादर ख़ान के करियर की सुपरहिट फ़िल्मों में शुमार की जाती है। मनमोहन देसाई के बैनर तले बनी इस फ़िल्म में अमिताभ बच्चन ने मुख्य भूमिका निभाई थी। फ़िल्म टिकट खिड़की पर सुपरहिट साबित हुयी। इसके साथ ही कादर ख़ान फ़िल्म इंडस्ट्री के चोटी के खलनायकों की फेहरिस्त में शामिल हो गए। वर्ष 1990 में प्रदर्शित फ़िल्म ‘बाप नंबरी बेटा दस नंबरी’ कादर ख़ान के सिने करियर की महत्त्वपूर्ण फ़िल्मों में से एक है। इस फ़िल्म में कादर ख़ान और शक्ति कपूर ने बाप और बेटे की भूमिका निभाई जो ठग बनकर दूसरों को धोखा दिया करते हैं। फ़िल्म में कादर ख़ान और शक्ति कपूर ने अपने कारनामों के जरिये दर्शकों को हंसाते-हंसाते लोटपोट कर दिया। फ़िल्म में अपने दमदार अभिनय के लिये कादर ख़ान फ़िल्मफेयर पुरस्कार से सम्मानित भी किए गए।

चरित्र अभिनेता
नब्बे के दशक में कादर ख़ान ने अपने अभिनय को एकरूपता से बचाने और स्वयं को चरित्र अभिनेता के रूप में स्थापित करने के लिए अपनी भूमिकाओं में परिवर्तन भी किया। इस क्रम में वर्ष 1992 में प्रदर्शित फ़िल्म ‘अंगार’ में उन्होंने अंडर वर्ल्ड डॉन जहांगीर ख़ान की भूमिका को रूपहले पर्दे पर साकार किया। दशक के अंतिम वर्षो में बतौर ख़लनायक कादर ख़ान की फ़िल्मों को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। इसके बाद कादर ख़ान ने हास्य अभिनेता के तौर पर भी काम करना शुरू कर दिया। इस क्रम में वर्ष 1998 में प्रदर्शित फ़िल्म ‘दूल्हे राजा’ में अभिनेता गोविंदा के साथ उनकी भूमिका दर्शकों के बीच काफ़ी पसंद की गयी।

प्रसिद्ध फ़िल्में
कादर ख़ान ने अपने सिने करियर में लगभग 300 फ़िल्मों में अभिनय किया है। उनकी अभिनीत फ़िल्मों में मुक्ति, ज्वालामुखी, मेरी आवाज सुनो, जमाने को दिख़ाना है, सनम तेरी कसम, नौकर बीबी का, शरारा, कैदी, घर एक मंदिर, गंगवा, जान जानी जर्नादन, घर द्वार, तबायफ़, पाताल भैरवी, इंसाफ़ की आवाज़, स्वर्ग से सुंदर, वतन के रखवाले, खुदगर्ज़, ख़ून भरी मांग, आँखेंं, शतरंज, कुली नंबर 1, हीरो नंबर 1, जुड़वा, बड़े मियां छोटे मियां, दूल्हे राजा, राजा बाबू, चालबाज़, हसीना मान जाएगी, फंटूश आदि।

शक्ति कपूर के साथ जोड़ी
कादर ख़ान के सिने करियर में उनकी जोड़ी अभिनेता शक्ति कपूर के साथ काफ़ी पसंद की गयी। इन दोनों अभिनेताओं ने अब तक लगभग 100 फ़िल्मों में एक साथ काम किया है। उनकी जोड़ी वाली महत्त्वपूर्ण फ़िल्मों में से कुछ इस प्रकार हैं- बाप नंबरी बेटा दस नंबरी, नसीब, लूटमार, हिम्मतवाला, महान, हैसियत, जस्टिस चौधरी, अक्लमंद, मकसद, मवाली, तोहफा, इंकलाब, कैदी, गिरफ्तार, घर संसार, धर्म अधिकारी, सिंहासन, सोने पे सुहागा, मास्टरजी, इंसानियत के दुश्मन, वक्त की आवाज़, जैसी करनी वैसी भरनी, नाचने वाले गाने वाले, राजा बाबू आदि।

संवाद लेखक
कादर ख़ान ने कई फ़िल्मों में संवाद लेखक के तौर पर भी काम किया है। इनमें खेल खेल में, रफूचक्कर, धरमवीर, अमर अकबर एंथोनी, ख़ून पसीना, परवरिश, शालीमार, मुक्कदर का सिकंदर, मिस्टर नटवरलाल, सुहाग, याराना, लावारिस, सत्ते पे सत्ता, देश प्रेमी, सनम तेरी कसम, धर्मकांटा, कुली, शराबी, गिरफ्तार, कर्मा, ख़ून भरी मांग, हत्या, हम, कुली नंबर वन, साजन चले ससुराल जैसी सुपरहिट फ़िल्में शामिल है।

अमिताभ को निर्देशित करने की अधूरी तमन्ना
कादर ख़ान की अमिताभ बच्चन को लेकर फ़िल्म बनाने की तमन्ना अब तक पूरी नहीं हो सकी। अभिनेता कादर ख़ान और अमिताभ बच्चन ने एक साथ कई फ़िल्में कीं। अदालत, सुहाग, मुकद्दर का सिकंदर, नसीब और कुली जैसी बेहद कामयाब फ़िल्मों में इन दोनों ने साथ काम किया। इसके अलावा कादर ख़ान ने अमर अकबर एंथनी, सत्ते पे सत्ता और शराबी जैसी फ़िल्मों के संवाद भी लिखे, लेकिन कादर ख़ान अमिताभ बच्चन को लेकर खुद एक फ़िल्म बनाना चाहते थे और उनकी ये तमन्ना अब तक पूरी नहीं हो सकी। कादर ने ये बात एक ख़ास बातचीत में बताई। उन्होंने कहा, मैं अमिताभ बच्चन, जया प्रदा और अमरीश पुरी को लेकर फ़िल्म 'जाहिल' बनाना चाहता था। उसका निर्देशन भी मैं खुद करना चाहता था लेकिन खुदा को शायद कुछ और ही मंजूर था। कादर ख़ान ने बताया कि इसके फौरन बाद फ़िल्म 'कुली' की शूटिंग के दौरान अमिताभ बच्चन को जबरदस्त चोट लग गई और फिर वो महीनों अस्पताल में भर्ती रहे। अमिताभ के अस्पताल से वापस आने के बाद फिर कादर ख़ान अपनी दूसरी फ़िल्मों में बहुत ज्यादा व्यस्त हो गए और इधर अमिताभ बच्चन राजनीति में आ गए। उसके बाद कादर ख़ान और अमिताभ की जुगलबंदी वाली ये फ़िल्म हमेशा के लिए डब्बाबंद हो गई। अमिताभ की तारीफ़ करते हुए कादर ख़ान कहते हैं, वो संपूर्ण कलाकार हैं, अल्लाह ने उनको अच्छी आवाज़, अच्छी जबान, अच्छी ऊंचाई और बोलती आंखों से नवाजा है।

कादर ख़ान कुछ सालों से फ़िल्मों से दूर हो गए थे। इसकी वजह बताते हुए वो कहते हैं, वक्त के साथ फ़िल्में भी बदल गई हैं। अब ऐसे दौर में मैं अपने आपको फिट नहीं पाता। मेरे लिए बदलते दौर के साथ खुद को बदलना संभव नहीं है, तो मैंने अपने आपको फ़िल्मों से अलग कर लिया। कादर ख़ान ने ये भी कहा कि मौजूदा दौर के कलाकारों की भाषा पर पकड़ नहीं है और ये बात उन्हें दुखी करती है। 70 के दशक में अमिताभ बच्चन की कुछ फ़िल्मों जैसे सुहाग, अमर अकबर एंथनी और मुकद्दर का सिकंदर में कादर ख़ान की कलम से लिखे संवाद काफ़ी मशहूर हुए, लेकिन कादर ख़ान को इस बात का दु:ख है कि उन फ़िल्मों में नायक जिस चालू मुंबइया भाषा का इस्तेमाल करता है वही बाद की फ़िल्मों की मुख्य भाषा बन गई और फिर धीरे-धीरे उसकी आड़ में फ़िल्मों की भाषा खराब होती चली गई। वो कुछ दोष अपने आपको भी देते हैं। कादर ख़ान ने 80 के दशक में जीतेंद्र, मिथुन और 90 के दशक में गोविंदा के साथ भी कई फ़िल्में कीं। वो अपने दौर को याद करते हुए भावुक हो जाते हैं। उनके मुताबिक़ असरानी, शक्ति कपूर, गोविंदा, जीतेंद्र और अरुणा ईरानी के साथ की गई उनकी कई फ़िल्में और इन कलाकारों के साथ बिताया वक्त उन्हें बहुत याद आता है। कादर ख़ान ने बताया कि ख़ासतौर पर वो असरानी के जबरदस्त प्रशंसक हैं, जिनके साथ उन्होंने कई फ़िल्में कीं। फिलहाल कादर ख़ान अपने बेटों के थिएटर ग्रुप और उनके प्ले में व्यस्त हैं। उनके बेटे सरफ़राज ख़ान और शाहनवाज ख़ान, अपने पिता के लिखे दो नाटकों का मंचन कर रहे हैं। इन नाटकों के नाम है मेहरबां कैसे-कैसे और लोकल ट्रेन। ये दोनों ही नाटक राजनीतिक व्यंग्य हैं।

निधन
कादर ख़ान के बेटे सरफ़राज़ ने बताया, ‘मेरे पिता हमें छोड़कर चले गए। लंबी बीमारी के बाद 31 दिसम्बर शाम छह बजे (कनाडाई समय) उनका निधन हो गया। वह दोपहर को कोमा में चले गए थे। वह पिछले 16-17 हफ्तों से अस्पताल में भर्ती थे।’ 81 वर्षीय कादर ख़ान लंबे समय से बीमार चल रहे थे। वह कनाडा के एक अस्पताल में भर्ती थे। उनके बेटे ने बताया कि अभिनेता का अंतिम संस्कार भी वहीं किया जाएगा।

सम्मान और पुरस्कार
फ़िल्मफेयर पुरस्कार सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता (फ़िल्म- बाप नंबरी बेटा दस नंबरी)
कादर ख़ान को 1991 को बेस्ट कॉमेडियन का और 2004 में बेस्ट सपोर्टिंग रोल का फिल्म फेयर मिल चुका है।
2013 में, कादर ख़ान को उनके फिल्मों में योगदान के लिए साहित्य शिरोमनी अवार्ड से नवाजा गया।

परणिति चोपड़ा

परिणीति चोपड़ा

 🎂जन्म 22 अक्टूबर 1988, अम्बाला, हरियाणा) 

एक भारतीय अभिनेत्री है जो हिन्दी फिल्मों में काम करती है। चोपड़ा बैंक निवेशकर्ता बनना चाहती थी लेकिन मैनचेस्टर बिजनेस स्कूल से त्रिक सनद सम्मान (व्यापार, वित्त और अर्थशास्त्र में) प्राप्त करने के बाद वह 2009 की आर्थिक मंदी के दौरान वापस भारत लौट आई और जनसंपर्क सलाहकार के रूप में यश राज फ़िल्म्स से जुड़ गई। बाद में अभिनेत्री के तौर पर तीन फिल्मों में कार्य करन का समझोता किया।
चोपड़ा का जन्म एक पंजाबी परिवार में अम्बाला, हरियाणा में उसके पिता पवन चोपड़ा एक व्यवसायी हैं और अम्बाला कैनटोनमेंट में भारतीय थलसेना के प्रदायक (पूर्तिकर्ता) हैं, उसकी माता का नाम रीना चोपड़ा है। परिणीति की शुरूआती शिक्षा कान्‍वेंट ऑफ जीसस एंड मैरी से हुई थी। 17 साल की उम्र में वे लंदन चली गईं जहां से उन्‍होंने मैंनचेस्‍टर बिजनेस स्‍कूल से बिजनेस, फाइनेंस और इ‍कनॉमिक्‍स में ऑनर्स की डिग्री प्राप्‍त की।
परिणीति चोपड़ा ने अपना एक्टिंग का सफर फिल्म ‘रिकी वर्सेज लेडी बहेल’ से किया था. इसके बाद एक्ट्रेस मेन लीड के तौर पर फिल्म ‘इशकजादे’ में नजर आईं. फिल्म में उनके साथ अर्जुन कपूर थे. फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर अच्छा कलेक्शन किया था. 
एक्ट्रेस परिणीति चोपड़ा ने 24 सितंबर को राघव चड्ढा संग उदयपुर के लीला पैलेस में शादी की थी
पति: राघव चड्ढा (विवा.24 सितंबर 2023)

माता-पिता: पवन चोपड़ा, रीना चोपड़ा
भाई: सरज चोपड़ा, शिवांग चोपड़ा

DN मोधक (दिना नाथ मोधक )

डीएन मधोक

दीना नाथ मधोक
DN मोधक 
🎂जन्म 22 अक्टूबर 1902
गुजरांवाला , ब्रिटिश भारत (अब पाकिस्तान में )
⚰️मृत 09 जुलाई 1982 (आयु 79 वर्ष)
हैदराबाद , भारत
व्यवसाय गीतकार, निर्देशक, पटकथा लेखक, संगीतकार, संवाद लेखक
दीना नाथ मधोक 
 1940 से 1960 के दशक में बॉलीवुड के एक प्रमुख गीतकार थे। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत 1932 में आई फिल्म ' राधे शाम' से की थी । उन्होंने अपने चार दशकों के करियर में 800 से अधिक गीत लिखे और 1940 के दशक में उन्हें शीर्ष गीतकारों में से एक माना जाता था और उन्हें " महाकवि मधोक" का उपनाम मिला। मधोक को किदार शर्मा और कवि प्रदीप के साथ गीतकारों की तीन "पहली पीढ़ी" (1930 से 1950 के दशक) में से एक के रूप में उद्धृत किया जाता है ।गीत लिखने के अलावा, उन्होंने पटकथाएँ लिखीं और फ़िल्मों का निर्देशन किया। उन्होंने बगदाद का चोर (1934), मिर्जा साहिबान (1939), बिवामंगल (1954) और मधुबाला अभिनीत नाता (1955) जैसी लगभग 17 फिल्मों का निर्देशन किया ।

प्रारंभिक जीवन
एक मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ था। उनके पिता प्रथम श्रेणी पोस्ट मास्टर थे। मधोक अपनी बीए की परीक्षा उत्तीर्ण नहीं कर सके लेकिन उन्होंने कई वर्षों तक भारतीय रेलवे में काम किया।

❤️
मधोक 1931 में बंबई पहुंचे। अगले साल उन्होंने फिल्म ' राधे श्याम' के लिए गीत लिखकर बॉलीवुड में डेब्यू किया । उन्होंने उस फिल्म में पटकथा लिखने और एक छोटी भूमिका में अभिनय करने के साथ-साथ 29 गाने लिखे। उन्होंने फिल्म में गाने लिखने में मदद की, हालांकि उन्हें कोई श्रेय नहीं मिला। उसी वर्ष, उन्होंने 3 फिल्मों, ल्यूर ऑफ गोल्ड , फ्लेम ऑफ लव और थ्री वॉरियर्स का निर्देशन किया । 1933 में, उन्होंने खूबसूरत बाला के लिए निर्देशन और गीत लिखे । अगले तीन वर्षों में उन्होंने कई फिल्मों का निर्देशन, पटकथा और संवाद लिखा, लेकिन कोई गीत नहीं लिखा। 1937 में, उन्होंने दो फिल्मों लाहौरी लुटेरा और दिलफरोश के लिए गीत लिखे, जो 1933 में थ्री वॉरियर्स के रूप में रिलीज़ हुईं। इन वर्षों के दौरान उन्होंने हिंदी और पंजाबी फिल्मों का भी निर्देशन किया।

वह 1939 में रंजीत मूवीटोन से जुड़े । एक गीतकार के रूप में उनका करियर कई बड़ी सफलताओं के साथ आगे बढ़ा। उन्होंने 1940 और 1950 के दशक में नदी किनारे (1939), मुसाफिर (1940), पागल (1940), उम्मीद (1941), बंसारी (1943), नर्स (1943), बेला (1947) जैसी फिल्मों के लोकप्रिय गीतों के लिए गीत लिखे। , भक्त सूरदास (1942), और तानसेन (1943)। पिछली दो फिल्मों के गाने आज भी लोकप्रिय हैं। तानसेन के दो गाने "बरसो रे" खुर्शीद द्वारा गाए गए और "दीया जलाओ" केएल सहगल द्वारा गाए गए, मधोक के गीतों के साथ 1940-49 के 15 'अनुशंसित गीतों' में उद्धृत किए गए हैं।

भाईचंद पटेल के अनुसार, उन्होंने ऐसे गीत लिखे जो "सरल थे फिर भी सार्वभौमिक अपील वाले थे"। मधोक ने प्रसिद्ध संगीतकार नौशाद को बॉलीवुड से परिचित कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।उन्होंने नौशाद को अपनी निर्देशित पंजाबी फिल्म मिर्जा साहिबान (1939) में सहायक संगीत निर्देशक के रूप में नियुक्त किया । एक स्वतंत्र संगीत निर्देशक के रूप में नौशाद की पहली फिल्म ' प्रेम नगर' (1940) थी। इस बार भी मधोक ने ही उस फ़िल्म के गीतों के बोल लिखे। कुछ अन्य उल्लेखनीय साउंडट्रैक, जिनमें उन्होंने एक गीतकार के रूप में योगदान दिया, वे हैं लगन (1938), प्यास (1941), ज़मीनदार (1942), ज़बान (1943), दासी (1944), प्रीत, धमाकी (1945), अंजुमन, काजल (1948) ), सुनहरे दिन (1949), खिलाड़ी, अनमोल रतन (1950), रसिया (1950), गूंज (1952), दर्द-ए-दिल (1953), मजबूरी (1954), ऊट पतंग (1955), मक्खीचूस (1956) , महारानी पद्मिनी (1964), तस्वीर (1966) समय बड़ा बलवान (1969)।

सहयोग 
नौशाद अली को बॉलीवुड में लाने का श्रेय मधोक को दिया गया । उन्होंने नौशाद की पहली फिल्म प्रेम नगर के लिए गीत लिखे । इसके बाद उन्होंने भारतीय सिनेमा में सफल योगदान देने वाली कई फिल्मों में साथ काम किया। उनकी जोड़ी रतन (1944) में चरम पर पहुंची, जो बॉक्स-ऑफिस पर एक बड़ी सफलता थी, खासकर अपने संगीत के लिए। 

उन्होंने चालीस और पचास के दशक के लगभग हर प्रमुख संगीत निर्देशक जैसे ज्ञान दत्त , एनआर भट्टाचार्य, खेमचंद प्रकाश , एसएन त्रिपाठी , बुलो सी रानी , ​​नौशाद, खुर्शीद अनवर , पंडित अमरनाथ , सार्दुल क्वात्रा , अनिल विश्वास , आरसी बोराल , रॉबिन चटर्जी के साथ काम किया। , सुंदर दास, रशीद अत्रे , सी. रामचन्द्र , सज्जाद हुसैन , गुलाम हैदर , विनोद , गोबिंद राम, हुस्नलाल भगतराम , एआर कुरेशी , रोशन , सरदार मलिक , गुलाम मोहम्मद और हंसराज बहल ।

📽️फिल्मोग्राफी 📽️
गीतकार के रूप में 
चयनित फ़िल्में.

लाहौर में बनी 'राधे श्याम' (1932) पंजाबी फिल्म
फ़िल्म कंपनी कमला मूवीटोन के तहत शुक्रवार, 2 सितंबर 1932 को रिलीज़ हुई

खुबसूरत बाला (1933)
ज्वालामुखी (1936)
अलादीन और जादूई चिराग (1937)
दिलफरोश (1937)
शमा परवाना (1937)
ज़माना (1938)
नदी किनारे (1939)
आज का हिंदुस्तान (1940)
दिवाली (1940)
मुसाफिर (1940)
पागल (1940)
प्रेम नगर (1940)
ढंडोरा (1941)
परदेसी (1941)
ससुराल (1941)
शादी (1941)
उम्मीद (1941)
भक्त सूरदास (1942)
झंकार (1942)
खानदान (1942)
महेमन (1942)
वसंतसेना (1942)
जमींदार (1942)
ज़ेवर (1942)
बंसारी (1943)
भक्तराज (1943)
इशारा (1943)
कानून (1943)
संजोग (1943) पटकथा, गीत और संवाद
तानसेन (1943)
दस्सी (1944)
गीत (1944)
रतन (1944)
पहले आप (1944)
शिरीन फरहाद (1945)
इन्साफ़ (1946)
बेला (1947)
परवाना (1947)
लाल दुपट्टा (1948)
नाओ (1948)
सिंगार (1949)
सुनहरे दिन (1949)
अनमोल रतन (1950)
खिलाड़ी (1950)
सबक (1950)
तराना (1951)
गूंज (1952)
दर्द-ए-दिल (1953)
बिल्वमंगल (1954)
एहसान (1954)
ऊट पतंग (1955)
आबरू (1956)
ढाके की मलमल (1956)
माखी चूज़ (1956)
जीवन साथी (1957)
महारानी पद्मिनी (1964)
सतलुज दे कंधे कहानी केवल (1964) पंजाबी फिल्म
जनम जनम के साथी (1965)
तसवीर (1966)
समय बड़ा बलवान (1969)
निर्देशक के रूप में 
दिलफरोश उर्फ ​​थ्री वॉरियर्स (1932)
शराफी लूट उर्फ ​​ल्यूर ऑफ गोल्ड (1932)
प्यार की लौ (1932)
खुबसूरत बाला (1934)
वतन परस्ता (1934)
मास्टर फकीर (1934)
दीवानी (1934)
बगदाद का चोर (1934)
ज्वालामुखी (1936)
दिल का डाकू (1936)
शराफी लूट (1937)
शमा परवाना (1937)
दिल फ़रोश (1937)
स्नेह लग्न (1938)
मिर्ज़ा साहिबान (1939)
नाओ (1948)
खामोश सिपाही (1950)
बिल्वमंगल (1954)
नाता (1955)

डीएन मधोक

बी .एम .व्यास

बृजमोहन व्यास
🎂22 अक्टूबर 1920
चूरू , राजपूताना एजेंसी , ब्रिटिश भारत
⚰️मृत 11 मार्च 2013
कल्याण , महाराष्ट्र, भारत
व्यवसाय अभिनेता, पार्श्व गायक
सक्रिय वर्ष 1946-1995
जीवनसाथी जमना
बच्चे 7
रिश्तेदार भरत व्यास (भाई)
व्यास राजस्थान के चुरू जिले में पुष्करणा ब्राह्मण परिवार से है। संस्कृत में स्नातक की पढ़ाई पूरी करने तक वे राजस्थान में ही रहे, जिसके बाद अपने भाई के कहने पर वे मुंबई चले आये।

उनकी शादी 17 साल की उम्र में हुई थी जब उनकी पत्नी जमना सिर्फ 11 साल की थीं। 2008 में जमना व्यास की मृत्यु से पहले उनका वैवाहिक जीवन 71 साल था। उनकी छह बेटियां और एक बेटा था। विभिन्न भाषाओं में 200 से अधिक फिल्मों में अभिनय करने के बाद, व्यास ने 1990 के दशक की शुरुआत में अभिनय छोड़ दिया।

11 मार्च 2013 को 92 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।

📽️
1946 नीचा नगर 
1949 बरसात 
1951 आवारा
1953 पतीता 
बागी 
1954 सल्तनत  
अलीबाबा और 40 चोर
1956 शेखचिल्ली 
हातिम ताई
1957 दो आंखें बारह हाथ 
तुमसा नहीं देखा 
1961 संपूर्ण रामायण
सारंगा और जब तक
1962 परदेसी ढोला पंजाबी फिल्म
1966 ये रात फिर ना आएगी
1971 एक पहेली 
1975 जय संतोषी मां
1977शिरडी के साई बाबा
1991मां
1992 दौलत की जंग।

अभिनेत्री सईदा खान

अभिनेत्री सईदा खान की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि

सईदा खान का जन्म कलकत्ता में एक मुस्लिम परिवार में साल 1939 में हुआ था. सईदा खान को बचपन से ही फिल्मों में काम करने का शौक था. फिल्म निर्माता निर्देशक एच.एस. रवैल से उनकी मुलाकात हो गई और उन्होंने सईदा खान को फिल्मों में काम दिया

⚰️21 अक्टूबर 1990 अपने पति द्वारा करदी गई थी

सईदा खान की ट्रेजिडी भरी दास्तां सुन कर रूह कांप जाती है। साठ के सालों में एक्ट्रेस होती थीं, सईदा ख़ान। खूबसूरत तो नहीं, मगर दिलकश जरूर थीं और टैलेंटेड भी। उन्होंने किशोर कुमार, राज  कुमार, मनोज कुमार, बिस्वजीत, फ़िरोज़ ख़ान, अजीत आदि प्रसिद्ध एक्टर्स के साथ काम किया।

उनकी पहली फिल्म थी- अपना हाथ जगन्नाथ (1960), जिसमें वो किशोर कुमार की हीरोइन थीं और आखिरी फिल्म थी- ‘वासना’ (1968), जिसमें वो राजकुमार को रिझाने वाली चमेलीबाई के साइड रोल में थीं। इस बीच उन्होंने हनीमून, मॉडर्न गर्ल, कांच की गुड़िया, मैं शादी करने चला, चार दरवेश, सिंदबाद अलीबाबा और अलादीन, ये ज़िंदगी कितनी हसीन है और कन्यादान में अच्छे रोल किये। मगर आठ साल के कैरीयर में मात्र 17-18 फ़िल्में ही उनके हिस्से में आयीं।

शायद इसका कारण उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि रही। दरअसल, वो बदनाम अनवरी बेगम की बेटी थीं। सईदा की कमाई से घर चलता था। मगर तभी उनकी ज़िंदगी में अच्छे पल लेकर प्रोड्यूसर-डायरेक्टर ब्रिज सदाना आये। उन्होंने न केवल उनकी मदद की, बल्कि शादी भी कर ली, इस शर्त पर कि उनकी मां और भाई-बहन के पालन-पोषण का खर्च ब्रिज उठाते रहेंगे।

ये वही बृज सदाना हैं, जिन्होंने साठ और सत्तर के सालों में दो भाई, ये रात फिर न आएगी, उस्तादों के उस्ताद, एक से बढ़ कर एक, विक्टोरिया नंबर 203, नाइट इन लंदन, यक़ीन, प्रोफेसर प्यारेलाल जैसी हिट फ़िल्में दीं। मगर ज़िंदगी में पैसा, शोहरत, प्यार और भावुकता ही काफी नहीं होती, एक-दूसरे पर विश्वास होना भी ज़रूरी है। बृज हमेशा शक़ करते रहे कि सईदा की छोटी बहन शगुफ़्ता वास्तव में उसकी नाजायज़ औलाद है।

उन्हें बताया गया था कि शगुफ़्ता को अनवरी बेगम ने गोद लिया था। फ़िल्म इंडस्ट्री में सईदा और शगुफ़्ता को लेकर तरह-तरह की बातें भी होती थीं। शगुफ़्ता की सूरत में सईदा की छाया है और सईदा उसका कुछ ज़्यादा ही ख़्याल रखती है। ब्रिज ये सब देखा-सुना करते थे। इसी बात को लेकर उनका सईदा से अक्सर झगड़ा होता रहा।

और आख़िर 21 अक्टूबर 1990 को वो हुआ, जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी। पूरी फिल्म इंडस्ट्री कांप उठी। उस दिन ब्रिज ने ज़रूरत से ज़्यादा नशा कर लिया। घर आये, जहां बेटे कमल की बीसवीं सालगिरह मनाई जा रही थी। अपनी लाइसेंसी रिवाल्वर से सईदा, बेटी नम्रता और बेटे कमल पर गोली चला दी। और, फिर खुद को भी गोली मार दी। सबको अस्पताल पहुंचाया गया। मगर तब तक सब ख़त्म हो चुका था। संयोग से कमल बच गया। शायद उसकी नियति में लिखा था कि वो दुनिया को बताये कि उसके पिता ने अच्छा काम नहीं किया था।

कमल सदाना को संभलने में काफी वक़्त लगा। वो काजोल की पहली फ़िल्म ‘बेख़ुदी’ के हीरो रहे। उन्हें चाकलेटी हीरो कहा जाता था। मगर बदकिस्मती उनके पीछे भी पड़ी रही। रंग, बाली उमर को सलाम, रॉक डांसर, कर्कश आदि एक के बाद एक फ्लॉप हो गयीं। उन्होंने पिता ब्रिज की ‘विक्टोरिया नंबर 203 का रीमेक भी बनाया लेकिन बात बनी नहीं।

मगर अभी कहानी ख़त्म नहीं हुई। सईदा की हत्या के बाद उसकी छोटी बहन शगुफ़्ता रफ़ीक़ अकेली पड़ गयीं। मां और भाई के लिए उन्हें पहले बार-गर्ल बनना पड़ा, जिस्म का सौदा भी करना पड़ा। मगर शगुफ़्ता बहुत स्ट्रांग थी। इसीलिए जल्दी ही इस दलदल से निकल आयी। तक़दीर ने भी साथ दिया। महेश भट्ट ने उसे आसरा दिया। ज़िंदगी के कड़वे तजुर्बों को उसने कलमबद्ध किया। मा21 अक्टूबर 1990लूम हो कि वो लम्हे, आवारापन, राज़ 2, राज़ 3, जिस्म 2, मर्डर 2, आशिक़ी, हमारी अधूरी कहानी शगुफ़्ता ने ही लिखी हैं। कुछ ज़िंदगियां ऐसे ही चलती हैं, ट्रेजिक फिल्म की तरह।

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बृज सदाना

निर्माता निर्देशक बृज सदाना की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि

बृजमोहन सदनह

🎂06 अक्टूबर 1933

⚰️21 अक्टूबर 1990

ब्रिटिश भारत में पैदा हुए, जिन्हें बृजमोहन या बस बृज के नाम से  जाता था, वह एक दिग्गज भारतीय फिल्म निर्माता और निर्देशक थे जो हिंदी सिनेमा में कई हिट्स फिल्में देने के लिए जाने जाते थे।  उन्होंने 1960 से 1980 के दशक में  कई  यादगार बॉक्स ऑफिस हिट फिल्में दी जैसे दो भाई, ये रात फिर ना आएगी, उस्तादों  के उस्ताद, नाईट इन लंदन  विक्टोरिया नंबर 203, चोरी मेरा नाम, एक से  बढ़कर एक, यकीन , और प्रोफेसर प्यारेलाल
उनकी आखिरी सफल फिल्म मर्दों वाली बात थी।  उन्होंने लगातार कल्याणजी आनंदजी को अपनी फिल्मों के संगीत निर्देशक के रूप में चुना।

उन्होंने हिंदी फिल्म अभिनेत्री सईदा खान से शादी की थी।  उनके दो बच्चे, बेटी नम्रता और बेटा कमल थे।

1980 के दशक की शुरुआत में, उन्हें एक बड़ा झटका लगा, जब उनकी कुछ फ़िल्में बॉक्स ऑफिस पर  फ्लॉप हो गयीं जैसे ऊंचे लोग, बॉम्बे 405 माइल्स और मगरूर तकदीर और मर्दों वाली बात  की सफलता के साथ फ्लॉप फिल्मों का दौर समाप्त हो गया।

सदाना की 21 अक्टूबर 1990 को मुंबई में मृत्यु हो गई।  उन्होंने अपनी पत्नी और बेटीे हत्या करने के बाद अपने निवास पर खुद को गोली मार ली।  संयोग से, उस दिन उनके बेटे कमल सदाना का जन्मदिन था।
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#06oct

शुक्रवार, 20 अक्टूबर 2023

D.K सप्रू

दया किशन सप्रू 

🎂16 मार्च 1916 - 
⚰️20 अक्टूबर 1979

 एक भारतीय अभिनेता थे जो हिंदी सिनेमा में विभिन्न प्रकार की चरित्र भूमिकाओं के लिए प्रसिद्ध थे , विशेष रूप से अपराध थ्रिलर और नाटकों में खलनायक, न्यायाधीश और अभिजात वर्ग की भूमिकाओं के लिए। उनका सबसे उल्लेखनीय प्रदर्शन 1950 के दशक के अंत और 1970 के दशक की शुरुआत के बीच की बॉलीवुड प्रस्तुतियों में था, जिनमें साहिब बीबी और गुलाम , हीर रांझा , पाकीजा , काला पानी , दूज का चांद , तेरे मेरे सपने , हमजोली , ज्वेल थीफ और दीवार शामिल हैं ।

1916 में कश्मीरी पंडित माता-पिता के घर जन्मे सप्रू ने बॉलीवुड में अपनी शुरुआत चाँद (1944) से की, जिसमें एक अन्य कश्मीरी पंडित अभिनेता प्रेम अदीब ने अभिनय किया। 1970 के दशक की शुरुआत तक, सप्रू अपराध थ्रिलरों में एक खलनायक के रूप में प्रसिद्ध हो गए थे। हालाँकि 1979 में उनकी मृत्यु हो गई, फिर भी वे 1980 के दशक में रिलीज़ हुई कई फिल्मों में दिखाई देते रहे, जिनमें क्रोधी (1981) भी शामिल थी।
उनके चेहरे को देखते हुए और सामान्य परिचय के बाद, वी शांताराम ने अपनी अगली फिल्म राम शास्त्री में एक भूमिका के लिए नीली आंखों वाले दया किशन सप्रू को साइन किया। उनके द्वारा निभाए गए पेशवा के किरदार को लोगों ने खूब सराहा और फिल्म बड़ी हिट साबित हुई। .. उन्हें कंपनी द्वारा 3000/= रुपये के मासिक वेतन पर मुख्य नायक के रूप में अनुबंधित किया गया था, जो उन दिनों के दौरान किसी भी नायक को सबसे अधिक भुगतान किया गया था। यह एक बड़ी रकम थी जिसने उन्हें उन दिनों एक राजसी जीवन जीने में सक्षम बनाया। यह लगभग 1945-46 के आसपास की बात है।

बाद में फिल्मों की झड़ी लग गई। उन्होंने रोमियो एंड जूलियट (नरगिस के साथ) में अभिनय किया। नरगिस की मां जद्दन बाई ने सप्रू की बहुत प्रशंसा की। फिल्म का निर्माण नरगिस के भाई अख्तर हुसैन ने किया था।)झांसीकी रानी, ​​कालापानी, हम हिंदुस्तानी, साहिब बीबी और गुलाम, मुझे जीने दो, लीडर और शहीद। साहिब बीबी और गुलाम में मझले सरकार (चौधरी) के रूप में उनकी भूमिका किसे याद नहीं है। मुझे जीने दो में जमींदार के रूप में फिर से वह काफी लोकप्रिय हो गए। हमने उन्हें नया दौर, प्रेम पुजारी, ज्वेल थीफ़, क्रोधी, कुदरत, धर्म वीर, ड्रीम गर्ल, ज़ंजीर, पाकीज़ा और ऐसी कई फिल्मों में कुछ अद्भुत भूमिकाओं में देखा। यह वह दौर था जब कहानीकार उनके लिए एक चरित्र बनाते थे। कहानी या स्क्रिप्ट. उनकी बाद की अधिकांश फिल्मों में उन्हें या तो जमींदार या पुलिस कमिश्नर या जज के रूप में देखा गया।

उन्होंने कुल मिलाकर 350 से ज्यादा फिल्मों में काम किया होगा और जिनमें से 50 से ज्यादा फिल्मों में उन्होंने मुख्य भूमिका निभाई। उन्होंने कुछ गुजराती और पंजाबी फिल्मों में भी मुख्य भूमिकाएँ निभाईं।
📽️

1981 Kudrat
1981 Krodhi 
1980 Jyoti Bane Jwala 
1978 Chor Ke Ghar Chor 
1978 Naya Daur 
(1978 film) Hotel Manager Sapru
1978 Vishwanath 
1978 Phaansi Chhaya's 
1978 Ram Kasam 
1977 Rangaa Aur Raja 
1977 Mukti 
1977 Guru Manio Granth 
1977 Chhaila Babu 
1977 Alibaba 
1977 Dharam Veer 
1977 Dream Girl 
1977 Gayatri Mahima 
1977 Jai Ambe Maa 
1976 Charas 
1976 Adalat 
1975 Faraar Defence 
1975 Pratigya (1975 film) Purohit 
1975 Rafoo Chakkar 
1975 Deewaar 
1975 Lafange 
1974 Majboor 
1974 Benaam 
1974 Haath Ki Safai 
1974 Resham Ki Dori 
1974 Patthar Aur Payal  
1974 5 Rifles 
1974 Kasauti 
1974 Do Chattane 
1974 Imtihaan 
1974 Chowkidaar 
1974 Dukh Bhanjan Tera Naam  
1974 Paise Ki Gudiya 
1974 Prem Shastra 
1974 Shaitan 
1973 Zanjeer 
1972 Bhai Ho To Aisa 
1972 Pakeezah Hakim Saab Sapru
1971 Gambler 
1971 Shri Krishna 
1970 Prem Pujari 
1970 Heer Ranjha Sapru
1969 Sajan 
1969 Satyakam 
1968 Humsaya 
1967 Hare Kanch Ki Chooriyan 
1967 Jewel Thief 
1966 Dil Diya Dard Liya 
1965 Johar-Mehmood in Goa 
1965 Shaheed 
1964 Leader 
1963 Mujhe Jeene Do 
1962 Sahib Bibi Aur Ghulam 
1962 Sangeet Samrat Tansen  
1960 Hum Hindustani 
1958 Kalapani 
1955 Waman Avtar 
1953 Jhansi Ki Rani 
1948 Lal Dupatta 
1947 Romeo And Juliet 
1944 Chand

मनुस्मृति

. ................मनुस्मृति.................... जरा सोचिए, अगर आज भारत का कानून यह तय कर दे कि— "एक आम आदमी चोरी करे तो उसे...