शुक्रवार, 20 अक्टूबर 2023

हेलन

हेलन

हेलन रिचर्डसन खान
प्रसिद्ध नाम हेलन
🎂जन्म 21 अक्टूबर, 1939
जन्म भूमि म्यांमार
कर्म भूमि मुम्बई
कर्म-क्षेत्र अभिनेत्री, नर्तकी
पुरस्कार-उपाधि पद्मश्री, सर्वश्रेष्ठ सहअभिनेत्री के लिए 'फ़िल्मफेयर' पुरस्कार
प्रसिद्धि बॉलीवुड की पहली आइटम गर्ल के तौर पर पहचानी जाने वाली अभिनेत्री हैं।
नागरिकता भारतीय
लोकप्रिय गाने महबूबा महबूबा- शोले (1975), पिया तू अब तो आजा...-कारवां (1971), मेरा नाम चिन चिन चू -हावडा ब्रिज (1958) आदि
अन्य जानकारी हेलन ने अपने पाँच दशक लंबे सिने करियर में लगभग 500 फ़िल्मों में अभिनय किया।

जीवन परिचय

हेलन का वास्तविक नाम हेलन रिचर्डसन खान है। हेलन का जन्म बर्मा (वर्तमान म्यांमार) में 21 अक्तूबर 1939 को हुआ था। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद हेलन और उनका परिवार मुंबई आ गये। हेलन के पिता एंग्लो-इंडियन था, दूसरे विश्व युद्ध में पिता की मृत्यु हो गई और हेलन की माता का नाम बर्मीज था और वह बतौर नर्स कार्य करती थीं। परिवार की आर्थिक स्थिति ख़राब होने के कारण से हेलन ने स्कूल की पढ़ाई छोड़ दी और परिवार के काम में हाथ बंटाने लगी। उन्होंने मणिपुरी, भरतनाट्यम, कथक आदि शास्त्रीय नृत्यों में भी शिक्षा हासिल की।

पहली सफल कोरस डांसर
हेलन सबसे पहले कोरस डांसर के रूप में 1951 में फ़िल्म "शबिस्तां" और "आवारा" में नजर आई थीं। बॉलीवुड की पहली आइटम गर्ल के तौर पर पहचानी जाने वाली अभिनेत्री हेलन ने बॉलीवुड का उस वक्त आइटम नंबर से परिचय कराया जब वो अपने शुरुआती दौर में था। उनको फ़िल्मों में लाने का श्रेय कुक्कू को जाता है, जो स्वयं उन दिनों फ़िल्मों में नर्तकी के रूप में नजर आती थीं। वर्ष 1958 में प्रदर्शित फ़िल्म 'हावडा ब्रिज' हेलन के करियर की अहम फ़िल्म साबित हुई। इस फ़िल्म में उनपर फ़िल्माया यह गीत ‘मेरा नाम चिन-चिन चू’ उन दिनों दर्शकों के बीच काफ़ी मशहूर हुआ।

अभिनेत्री

साठ के दशक में हेलन बतौर अभिनेत्री अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्ष करने लगी। इस दौरान उन्हें अभिनेता संजीव कुमार के साथ फ़िल्म ‘निशान’ में काम करने का मौक़ा मिला, लेकिन दुर्भाग्य से यह फ़िल्म सिनेमा घर में चल नहीं पाई। साठ और सत्तर के दशक मे आशा भोंसले हिन्दी फ़िल्मों की प्रख्यात नर्तक अभिनेत्री हेलन की आवाज़ मानी जाती थी। आशा भोंसले ने हेलन के लिये तीसरी मंज़िल में ‘ओ हसीना जुल्फों वाली’ फ़िल्म कारवां में ‘पिया तू अब तो आजा’ मेरे जीवन साथी में ‘आओ ना गले लगा लो ना’ और डॉन में ‘ये मेरा दिल यार का दीवाना’ गीत गाये।

लोकप्रियता

हेलन ने अपने पाँच दशक लंबे सिने करियर में लगभग 500 फ़िल्मों में अभिनय किया। इतने सालों के बाद भी उनके नृत्य का अंदाज़ भुलाए नहीं भूलता है। वर्ष 1975 में प्रदर्शित फ़िल्म ‘शोले’ में आर. डी. बर्मन के संगीत निर्देशन में हेलन के ऊपर फ़िल्माया गीत ‘महबूबा महबूबा’ आज भी सिनेप्रेमियों को झूमने पर मजबूर कर देता है। हालांकि सत्तर के दशक में नायिकाओं द्वारा ही खलनायिका का किरदार निभाने और डांस करने के कारण हेलन को फ़िल्मों में काम मिलना काफ़ी हद तक कम हो गया।

वर्ष 1976 में महेश भट्ट के निर्देशन में बनी फ़िल्म ‘लहू के दो रंग’ में अपने दमदार अभिनय के लिए हेलन को सवश्रेष्ठ सहनायिका के फ़िल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया। ‘हेलन की नृत्य शैली’ से प्रभावित बॉलीवुड की मशहूर अभिनेत्री साधना ने एक बार कहा था, "हेलन जैसी नृत्यांगना न तो पहले पैदा हुई है और ना ही बाद में पैदा होगी।"
मेरा नाम चिन चिन चू, रात चांदनी मैं और तू हल्लो मिस्टर हाऊ डू यू डू. . . "- हावडा ब्रिज (1958)
'पिया तू अब तो आजा...'- कारवां (1971)
‘ये मेरा दिल यार का दीवाना’ गीत गाये'- डॉन (1978)
"मूंगडा मूंगडा मैं गुड की ढली, मंगता है तो आजा रसिया नहीं तो मैं ये चली"- इंकार (1978)
"महबूबा महबूबा"-शोले (1975)
उल्लेखनीय फ़िल्में
हेलन के कार्यकाल की कुछ लोकप्रिय फ़िल्में आवारा, मिस कोको कोला, यहूदी, हम हिंदुस्तानी, दिल अपना और प्रीत पराई, गंगा जमुना, वो कौन थी, गुमनाम, ख़ानदान, जाल, ज्वैलथीफ, प्रिस, इंतक़ाम, द ट्रेन, हलचल, हंगामा, उपासना, अपराध, अनामिका, जख्मी, बैराग, ख़ून पसीना, अमर अकबर ऐंथोनी., द ग्रेट गैम्बलर, राम बलराम, शान, कुर्बानी, अकेला, खामोशी, हम दिल दे चुके सनम, मोहब्बते, मैरी गोल्ड आदि हैं।

पुरस्कार

"लहू के दो रंग" (1979)- सर्वश्रेष्ठ सहअभिनेत्री का फ़िल्मफेयर पुरस्कार।
2006 में जैरी पिंटो ने हेलन के ऊपर एक किताब लिखी थी, जिसका शीर्षक था "द लाइफ एण्ड टाइम्स ऑफ इन एच-बोम्बे", जिसने 2007 का सिनेमा की बेहतरीन पुस्तक का राष्ट्रीय फ़िल्म अवार्ड जीता।
2009 में हेलन को पद्मश्री सम्‍मान से भी नवाजा गया है।

कुलभूषण खरबंदा

कुलभूषण खरबंदा
एक भारतीय अभिनेता हैं जो हिंदी और पंजाबी फिल्मों में काम करते हैं।
 
🎂जन्म 21 अक्टूबर 1944  

उन्हें शान (1980) में प्रतिपक्षी शाकाल के रूप में उनकी भूमिका के लिए जाना जाता है , 1960 के दशक में दिल्ली स्थित थिएटर ग्रुप 'यात्रिक' से शुरुआत करके, उन्होंने सई परांजपे के साथ फिल्मों की ओर रुख किया । 1974 में जादू का शंख। उन्होंने मुख्यधारा की हिंदी फिल्म उद्योग में काम करने से पहले कई समानांतर सिनेमा फिल्मों में काम किया। वह महेश भट्ट की क्लासिक अर्थ (1982), एक चादर मैली सी (1986), वारिस (1988), और दीपा मेहता की एलिमेंट्स त्रयी के तीनों भागों : फायर (1996), अर्थ (1998), और में दिखाई दिए। जल (2005)।लगभग दो दशकों के बाद उन्हें विनय शर्मा द्वारा निर्देशित आत्मकथा के निर्माण में कोलकाता के पदातिक थिएटर में थिएटर मंच पर देखा गया था।

व्यक्तिगत जीवन
खरबंदा की शादी माहेश्वरी नामक महिला से हुई है, जिसकी पहले कोटा के महाराजा से शादी हुई थी। राजस्थान के प्रतापगढ़ के महाराजा राम सिंह द्वितीय की बेटी के रूप में जन्मी माहेश्वरी ने 1965 में खरबंदा से शादी की। 

आजीविका
अपनी पढ़ाई के बाद उन्होंने और उनके कॉलेज के कुछ दोस्तों ने "अभियान" नामक एक थिएटर ग्रुप बनाया, और फिर दिल्ली स्थित "यात्रिक" में शामिल हो गए, जो 1964 में निर्देशक जॉय माइकल द्वारा स्थापित एक द्विभाषी थिएटर रिपर्टरी थी ; वह इसके पहले भुगतान प्राप्त कलाकार बन गए, हालांकि कुछ वर्षों के बाद यात्रिक का पतन हो गया क्योंकि निर्देशक अमेरिकी विश्वविद्यालयों में व्याख्यान दे रहे थे।तभी वह 1972 में कोलकाता चले गए और निर्देशक श्यामानंद जालान के अधीन हिंदी थिएटर करने वाले थिएटर ग्रुप "पदातिक" के साथ काम करना शुरू किया । यहां उन्होंने मुंबई और फिल्मों में जाने से पहले कुछ समय तक काम किया।

उन्हें पहली बार श्याम बेनेगल द्वारा निशांत (1974) में देखा गया , जिसके साथ उन्होंने मंथन (1976), भूमिका: द रोल (1977), जुनून (1978), और कलयुग (1980) सहित कई और फिल्मों में काम किया। जल्द ही वह समानांतर सिनेमा निर्देशकों के नियमित सदस्य बन गए , जैसे बी.वी. कारंत के साथ गोधुली (1977) में ।

रमेश सिप्पी द्वारा निर्देशित शान (1980) में गंजे खलनायक शाकाल की भूमिका निभाते हुए , उन्होंने बॉलीवुड की मुख्यधारा में अपना परिवर्तन देखा। खरबंदा शक्ति (1982), घायल (1990), जो जीता वही सिकंदर (1992) , गुप्त (1997), बॉर्डर (1997), यस बॉस (1997) और रिफ्यूजी (2000) में नजर आए । हालाँकि, उन्होंने स्मिता पाटिल और नसीरुद्दीन शाह के साथ चक्र (1981), शबाना आज़मी के साथ अर्थ (1982), बुद्धदेब दासगुप्ता की पहली हिंदी फिल्म अंधी गली (1984) ,  एक चादर जैसी कला फिल्मों में काम करना जारी रखा। मैली सी (1986), हेमा मालिनी के साथ, उत्सव (1984), गिरीश कर्नाड द्वारा , मंडी (1983), त्रिकाल (1985), सुस्मान (1987), श्याम बेनेगल द्वारा, नसीम (1995), सईद अख्तर मिर्जा द्वारा और मॉनसून वेडिंग (2001) मीरा नायर द्वारा निर्देशित ।

उन्होंने शशि कपूर की फिल्मवाला प्रोडक्शंस की ' कलयुग ' में रीमा लागू के पति और राज बब्बर के भाई की भूमिका निभाई । वह जोधा अकबर और लगान जैसी ऐतिहासिक फिल्मों में भी नजर आ चुके हैं । उनकी सबसे हालिया फिल्में आलू चाट और टीम: द फोर्स हैं । उन्होंने कई पंजाबी फिल्मों में काम किया है। उन्होंने प्रसिद्ध फिल्म चैन परदेसी (1980) में नायक की भूमिका निभाई और पंजाबी कॉमेडी महौल ठीक है (1999) में अभिनय किया।

उन्होंने दीपा मेहता की छह फिल्मों और उनकी सभी त्रयी फिल्मों: अर्थ , फायर और वॉटर में अभिनय किया है । उन्होंने 2009 में एक जर्मन फिल्म की थी.

उन्होंने शन्नो की शादी और माही वे जैसे टीवी धारावाहिकों में अभिनय किया है ।

उन्हें तीन फरिश्ते , हत्या एक आकार की , बाकी इतिहास , एक शून्य बाजीराव , गिनी पिग , गिरधड़े , सखाराम बाइंडर और हाल ही में आत्मकथा जैसे नाटकों में मंच पर देखा गया है ।

शम्मी कपूर

शमशेर राज कपूर
प्रसिद्ध नाम शम्मी कपूर
🎂जन्म 21 अक्टूबर, 1931
जन्म भूमि मुम्बई, महाराष्ट्र
⚰️मृत्यु 14 अगस्त, 2011
मृत्यु स्थान मुम्बई, महाराष्ट्र
अभिभावक पृथ्वीराज कपूर, रामसरनी रमा
पति/पत्नी गीता बाली, नीला देवी
संतान पुत्र- आदित्य राज और पुत्री- कंचन देसाई
कर्म भूमि मुम्बई, महाराष्ट्र
कर्म-क्षेत्र अभिनेता
मुख्य फ़िल्में 'ब्रह्मचारी', 'प्रोफेसर', 'चार दिल चार राहें', 'रात के राही', 'चाइना टाउन', 'दिल तेरा दिवाना', 'कश्मीर की कली' और 'ब्लफमास्टर'
पुरस्कार-उपाधि फ़िल्म फेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता (ब्रह्मचारी), फ़िल्म फेयर लाइफ़ टाइम अचीवमेंट अवार्ड, ज़ी सिने लाइफ़ टाइम अचीवमेंट, स्टार स्क्रीन लाइफ़ टाइम अचीवमेंट
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी अपनी विशिष्ट याहू शैली के कारण बेहद लोकप्रिय रहे हिंदी फ़िल्मों के पहले सिंगिंग-डांसिग स्टार शम्मी कपूर रंगमंच के जाने-माने अदाकार और फ़िल्म अभिनेता पृथ्वीराज कपूर के दूसरे बेटे थे।
अद्यतन‎ 
13:13, 14 अगस्त 2013 (IST)
 2011) हिंदी सिनेमा के 1950-60 के दशक में सदाबहार अभिनेता थे। शम्मी का वास्तविक नाम शमशेर राज कपूर था। अपनी विशिष्ट याहू शैली के कारण बेहद लोकप्रिय रहे हिंदी फ़िल्मों के पहले सिंगिंग-डांसिग स्टार शम्मी कपूर रंगमंच के जाने-माने अदाकार और फ़िल्म अभिनेता पृथ्वीराज कपूर के दूसरे बेटे थे।

जीवन परिचय

वह महान् फ़िल्म अभिनेता और थिएटर कलाकार पृथ्वीराज कपूर और रामसरनी 'रमा' मेहरा के दूसरे पुत्र थे। पृथ्वीराज कपूर के दो और बेटे शशि कपूर और राजकपूर थे। शम्मी कपूर के परिवार में पत्नी नीला देवी, बेटा आदित्य राज और बेटी कंचन देसाई हैं।

अभिनय की शुरुआत
शम्मी कपूर ने वर्ष 1953 में फ़िल्म 'ज्योति जीवन' से अपनी अभिनय पारी की शुरुआत की। वर्ष 1957 में नासिर हुसैन की फ़िल्म 'तुमसा नहीं देखा' में जहां अभिनेत्री अमिता के साथ काम किया वहीं वर्ष 1959 में आई फ़िल्म 'दिल दे के देखो' में आशा पारेख के साथ नजर आए। बॉलीवुड के लिहाज़ से हालांकि वह बहुत सुंदर अभिनेता तो नहीं थे बावजूद इसके शम्मी कपूर अपने अभिनय क्षमता के बल पर सबके चहेते बने। वर्ष 1961 में आई फ़िल्म (जंगली) ने शम्मी कपूर को शोहरत की बुलंदियों पर पहुंचा दिया। इस फ़िल्म के बाद ही वह सभी प्रकार की फ़िल्मों में एक नृत्य कलाकार के रूप में अपनी छवि बनाने में कामयाब रहे। 'जंगली' फ़िल्म का गीत 'याहू' दर्शकों को खूब पसंद आया। उन्होंने चार फ़िल्मों में आशा पारेख के साथ काम किया जिसमें सबसे सफल फ़िल्म वर्ष 1966 में बनी 'तीसरी आंख' रही। वर्ष 1960 के दशक के मध्य तक शम्मी कपूर 'प्रोफेसर', 'चार दिल चार राहें', 'रात के राही', 'चाइना टाउन', 'दिल तेरा दीवाना', 'कश्मीर की कली' और 'ब्लफमास्टर' जैसी सफल फ़िल्मों में दिखाई दिए। फ़िल्म 'ब्रह्मचारी' के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फ़िल्म फेयर पुरस्कार भी मिला था।[१]

शुरुआती असफलता के बाद सफलता
'भारत के एल्विस प्रेसली' कहे जाने वाले शम्मी कपूर रुपहले पर्दे पर तब अपने अभिनय की शुरुआत की, जब उनके बड़े भाई राज कपूर के साथ ही देव आनंद और दिलीप कुमार छाए हुए थे। पारिवारिक पृष्ठभूमि होने के बावजूद शम्मी का फ़िल्म जगत में प्रवेश 'रेल का डिब्बा' में मधुबाला, 'शमा परवाना' में सुरैया और 'हम सब चोर हैं' में नलिनी जयवंत के साथ अभिनय करने के बावजूद शुरुआत में सफल नहीं रहा। उनकी शुरुआती फ़िल्में बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप रहीं। उन्होंने पचास के दशक में 'डक-टेल' शैली में अपने बाल कटवाकर 'तुमसा नहीं देखा' के साथ खुद को नए लुक में पेश किया। उसके बाद उन्हें सफलता मिलती गई। 1961 में फ़िल्म 'जंगली' की सफलता के साथ ही पूरा दशक उनकी फ़िल्मों के नाम रहा। दर्शकों के बीच उनकी अपील 'सुकू सुकू', 'ओ हसीना जुल्फों वाली', 'आज कल तेरे-मेरे प्यार के चर्चे' और 'आ जा आ जा मैं हूं प्यार तेरा' जैसे गानों के चलते थी, जिनमें उन्होंने बड़ी ही मस्तमौला शैली में थिरकते हुए अदायगी दी। हालांकि, 'कश्मीर की कली', 'राजकुमार', 'जानवर' और 'एन इवनिंग इन पेरिस' जैसी कुछ फ़िल्मों में उनकी अभिनय क्षमता पर सवाल उठे लेकिन 'जंगली', 'बदतमीज', 'ब्लफ मास्टर', 'पगला कहीं का', 'तीसरी मंजिल' और 'ब्रह्मचारी' की बेहतरीन सफलता के जरिए शम्मी ने अपने आलोचकों के मुंह बंद कर दिए।

रॉकस्टार शम्मी

शम्मी कपूर ने अपनी फ़िल्मों में बग़ावती तेवर और रॉकस्टार वाली छवि से उस दौर के नायकों को कई बंधनों से आज़ाद कर दिया था। हिंदी सिनेमा को ये उनकी बड़ी देन थ। ये बात और है कि उनके जैसे किरदार दूसरा कोई नहीं निभा पाया। शम्मी कपूर बड़े शौकीन मिज़ाज थे। इंटरनेट की दुनिया में आगे रहते थे, तरह-तरह की गाड़ियाँ चलाने का शौक़ वे रखते थे, शाम को गोल्फ़ खेलना, समय के साथ चलना वे बख़ूबी जानते थे। फ़िल्मों में शम्मी कपूर जितने ज़िंदादिल किरदार निभाया करते थे, उतनी ही ज़िंदादिली उनके निजी जीवन में दिखती थी। उनके जीवन में कई मुश्किल दौर भी आए ख़ासकर तब जब 60 के दशक में उनकी पत्नी गीता बाली का निधन हो गया। तब वे अपने करियर के बेहद हसीन मकाम पर थे। शम्मी कपूर के क़दम तब कुछ ठिठके ज़रूर थे पर फ़िल्मी पर्दे के रंगरेज़ शम्मी अपने उसी अंदाज़ में अभिनय से लोगों को मदमस्त करते रहे।[३]

फ़िल्म निर्देशन
बढ़ते मोटापे के कारण शम्मी कपूर को बाद में फ़िल्मों में मुख्य भूमिकाओं से हटना पड़ा, लेकिन वे चरित्र अभिनेता के रूप में फ़िल्मों में काम करते रहे। उन्होंने 'मनोरंजन' और 'बंडलबाज' नामक दो फ़िल्मों का निर्देशन भी किया, लेकिन ये फ़िल्में नहीं चली। चरित्र अभिनेता के रूप में शम्मी कपूर को 1982 में 'विधाता' फ़िल्म के लिए श्रेष्ठ सहायक अभिनेता का पुरस्कार मिला। शम्मी कपूर एक लोकप्रिय अभिनेता ही नहीं हरदिल अजीज इंसान भी थे।

सम्मान और पुरस्कार
सन 1968 में फ़िल्म 'ब्रह्मचारी' के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फ़िल्म फेयर पुरस्कार भी मिला था।
चरित्र अभिनेता के रूप में शम्मी कपूर को 1982 में 'विधाता' फ़िल्म के लिए श्रेष्ठ सहायक अभिनेता का पुरस्कार मिला।
1995 में फ़िल्म फेयर लाइफ़ टाइम अचीवमेंट अवार्ड मिला।
1999 में ज़ी सिने लाइफ़ टाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित किये गये।
2001 में स्टार स्क्रीन लाइफ़ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार से नवाजे गये।
निधन
अपनी ख़ास ‘याहू’ शैली के कारण बेहद लोकप्रिय रहे शम्मी कपूर ने 14 अगस्त, 2011 को मुंबई के ब्रीज कैंडी अस्पताल में सुबह 5:41 बजे अंतिम सांस ली। बॉलीवुड फ़िल्मों में अपने विशिष्ट नृत्य और रोमांटिक अदाओं से अभिनेत्रियों का दिल जीतने वाले दिग्गज कलाकार शम्मी कपूर अपने पीछे ऐसी शैली छोड़ गये हैं, जिसे उनके प्रशंसक हमेशा याद रखेंगे।

गुरुवार, 19 अक्टूबर 2023

कुमार शानू_केदारनाथ भट्टाचार्य

केदारनाथ भट्टाचार्य 
कुमार शानू
🎂जन्म 20 अक्टूबर 1957, 

पेशेवर रूप से इनका नाम कुमार शानू है, 
एक भारतीय पार्श्व गायक हैं जो मुख्य रूप से हिंदी फिल्मी गाने गाते हैं। हिंदी के अलावा, उन्होंने बंगाली , मराठी , नेपाली , असमिया , भोजपुरी , गुजराती , मणिपुरी , तेलुगु , मलयालम , कन्नड़ , तमिल , पंजाबी , उड़िया ,  छत्तीसगढ़ी , उर्दू , पाली , अंग्रेजी और अन्य भाषाओं में भी गाने गाए हैं। पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश दोनों में मूल भाषा बांग्ला । उनके पास 1991 से 1995 तक सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायक के लिए लगातार पांच फिल्मफेयर पुरस्कार जीतने का रिकॉर्ड है। उनके पास 1993 से एक ही दिन में सबसे अधिक गाने रिकॉर्ड करने का गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड है।

भारतीय सिनेमा और संगीत में उनके योगदान के लिए उन्हें 2009 में भारत सरकार द्वारा पद्म श्री से सम्मानित किया गया था । उनके कई ट्रैक बीबीसी के "सभी समय के शीर्ष 40 बॉलीवुड साउंडट्रैक" में शामिल हैं।

प्रारंभिक जीवन 
कुमार शानू के पिता, पशुपति भट्टाचार्य, एक गायक और संगीतकार थे, उनका पैतृक घर और जन्म स्थान ढाका के पास विक्रमपुर (अब बांग्लादेश में ) था। वह आजीविका की तलाश में कलकत्ता चले गए और कुमार सानू का जन्म कलकत्ता में हुआ। दोनों और शानू की बड़ी बहन बिश्वनाथ पार्क के पास कलकत्ता (अब कोलकाता) के सिंथी इलाके में रहती थीं। कुमार शानू उत्तरी कोलकाता के सिंथी इलाके में गोपाल बोस लेन में पंचानन ताला में रहते थे।

कैरियर 

मुख्य लेख: कुमार शानू डिस्कोग्राफी और फिल्मोग्राफी
सानू ने अपने पार्श्व करियर की शुरुआत 1983 से सानू भट्टाचार्य के रूप में की। 1986 में, वह शिबली सादिक द्वारा निर्देशित बांग्लादेशी फिल्म तीन कन्या , में थे। उनका पहला प्रमुख बॉलीवुड गाना हीरो हीरालाल (1988) में था।

1989 में, जगजीत सिंह ने सानू को मुंबई के विमल बंगले में कल्याणजी से मिलवाया। उनके सुझाव पर, सानू ने अपना प्रारंभिक नाम "सानू भट्टाचार्य" से बदलकर अपने आदर्श किशोर कुमार के नाम पर "कुमार शानू" कर लिया। इसके बाद सानू मुंबई आ गए , जहां कल्याणजी-आनंदजी ने उन्हें फिल्म जादूगर में गाने का मौका दिया ।

1990 की फिल्म आशिकी के लिए सानू ने एक को छोड़कर सभी गाने गाए। उन्होंने सर्वश्रेष्ठ पुरुष पार्श्वगायक के रूप में अपना पहला रिकॉर्ड लगातार पांच फिल्मफेयर पुरस्कार जीता। उनका अगला फिल्मफेयर पुरस्कार साजन (1991), दीवाना (1992), बाजीगर (1993)1942: ए लव स्टोरी (1994) फिल्मों के गानों के लिए आया । उन्होंने 1990 से 1994 के बीच गायन के लिए लगातार 5 फिल्मफेयर पुरस्कार जीते।दो-दो शादी कर चुके हैं कुमार सानू, इस दिलकश हसीना के साथ भी जुड़ा था कुमार सानू ने पहली शादी रीता भट्टाचार्य से की थी. कहा जाता है कि उनकी पहली मुलाकात कोलकाता (तक कलकत्ता) में हुई थी. धीरे-धीरे दोनों एक-दूसरे को पसंद करने लगे और मुंबई में दोनों ने शादी कर ली.1988 में कुमार सानू के घर बेटे जस्सी का जन्म हुआ. वहीं, कुछ समय बाद दो और बेटे जीको और जान हुए.कुछ समय बाद कुमार सानू की जिंदगी में अभिनेत्री मीनाक्षी शेषाद्रि आईं. करीब तीन साल तक दोनों एक-दूसरे को डेट करते रहे. उस दौरान रीता ने कुमार सानू को तलाक दे दिया.जब मीनाक्षी शेषाद्रि और कुमार सानू अलग हो गए. इसके बाद गायक ने बीकानेर की सलोनी भट्टाचार्य से शादी की.अपनी लव लाइफ में भले ही कुमार सानू विवादों में घिरे रहे, लेकिन फिलहाल वह निजी जिंदगी में बेहद खुश हैं.

किरण कुमार

किरण कुमार
जन्म दीपक धर
🎂20 अक्टूबर 1953 
बम्बई , बम्बई राज्य , भारत
शिक्षा भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान, डेली कॉलेज इंदौर
पेशा अभिनेता
माता-पिता जीवन (पिता)

उन्होंने कई हिंदी , भोजपुरी और गुजराती टेलीविजन और फिल्म निर्माण में काम किया है। नाटक में उनका नवीनतम काम चार्ली 2 है ।

व्यक्तिगत जीवन 

कुमार एक कुलीन कश्मीरी पंडित परिवार से आते हैं; उनके परदादा एक रईस व्यक्ति थे जिन्होंने गिलगित एजेंसी को वज़ीर-ए-वज़ारत के रूप में शासित किया था।वह अनुभवी अभिनेता जीवन के बेटे हैं ।

कैरियर
उन्होंने इंदौर के एक बोर्डिंग स्कूल डेली कॉलेज में दाखिला लिया , मुंबई के बांद्रा में आरडी नेशनल कॉलेज में दाखिला लिया और बाद में पुणे में फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (एफटीआईआई) में शामिल हो गए । वह अपने दोस्तों के बीच भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान में "दीपक धर" के नाम से जाने जाते थे । कुमार ने 1971 में दो बूँद पानी में अभिनय किया और कई और फिल्मों में मुख्य भूमिकाएँ निभाईं। कुमार ने अपने करियर को जंगल में मंगल जैसी फिल्मों की रिलीज के साथ प्रभावित होते देखा । राकेश रोशन की खुदगर्ज ने उन्हें हिंदी सिनेमा में वापस ला दिया, जिसमें तेजाब और खुदा गवाह जैसी फिल्मों में नकारात्मक भूमिकाओं ने उन्हें एंटी हीरो के रूप में प्रशंसा दिलाई।

📽️
2002 आप मुझे अच्छे लगने लगे
2002 मुझसे दोस्ती करोगे
2001 दिल ने फिर याद किया
1997 दिल कितना नादान है 
1997 कालिया 
1997 लोहा 
1994 ईना मीना डीका 
1993 चोर और चाँद 
1992 पनाह 
1992 माशूक 
1988 ज़ुल्म को जला दूँगा 
1995 बेवफ़ा सनम 
2000 धड़कन

शौकत आज़मी

शौक़ीन कैफ़ी - वफ़ा
शौकत कैफ़ी 

🎂21 अक्टूबर 1926 
⚰️22 नवंबर 2019,  

शौकत आज़मी के नाम से भी जानी जाती हैं , एक भारतीय थिएटर और फिल्म अभिनेत्री हैं। उनके पति अरबी कवि और फिल्म लेखक कैफ़ी आज़मी थे। यह दंपत्ति इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन (आईपीटीए) और प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन (एआईडब्ल्यूए) के प्रमुख कलाकार थे, जो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सांस्कृतिक मंच थे ।

जीवनी

शौकत कैफ़ी का जन्म हैदराबाद राज्य में उत्तर प्रदेश प्रवासियों के एक शिया मुस्लिम परिवार में हुआ था । वह भारत के औरंगाबाद में पली बढ़ीं । छोटी उम्र में ही उन्हें उर्दू शायर कैफ़ी आज़मी से प्यार हो गया और उन्होंने शादी कर ली । उनके दो बच्चे थे. उनके बेटे, बाबा आज़मी , एक कैमरामैन और अब फिल्म निर्देशक हैं। उन्होंने मशहूर अभिनेत्री उषा किरण की बेटी तन्वी आजमी से शादी की है । शौकत और कैफ़ी की बेटी, शबाना आज़मी (जन्म 1950), भारतीय सिनेमा की सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्रियों में से एक हैं। उन्होंने मशहूर शायर और फिल्म गीतकार जावेद अख्तर से शादी की है ।

शादी के बाद मुंबई में बस गईं शौकत और कैफी ने जिंदगी में कई उतार-चढ़ाव झेले। कैफ़ी कम्युनिस्ट पार्टी के एक प्रतिबद्ध सदस्य थे, इस हद तक कि, उनके अनुरोध पर, उनकी मृत्यु के बाद उनके पार्टी सदस्यता कार्ड को उनके साथ दफनाया गया था।

उन्होंने इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन (आईपीटीए) और प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन (पीडब्ल्यूए) के लिए कड़ी मेहनत की और उनकी शादी के बाद कई वर्षों तक उनकी आय पार्टी से मिलने वाले अल्प वजीफे से होती थी। कई वर्षों तक, दंपति अपने दो बच्चों के साथ भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा उपलब्ध कराए गए कम्यून आवास में रहते थे , जो तीन अन्य परिवारों के साथ साझा किए गए अपार्टमेंट में एक शयनकक्ष था। चूंकि बाकी सभी परिवार भी कम्युनिस्ट थे और थिएटर या सिनेमा से जुड़े थे, इसलिए शौकत को भी थिएटर के कीड़े ने काट लिया। अभिनय के लिए पैसा उनके लिए एक और प्रोत्साहन था, और जब उनके दो बच्चे स्कूल जाने लगे तो दंपति के लिए पैसे की कमी हो गई।

1950 के दशक के मध्य में, कैफ़ी ने एक लेखक और गीतकार के रूप में मुंबई फिल्म उद्योग में काम की तलाश शुरू की। उन्होंने काफ़ी समय तक संघर्ष किया और उन फ़िल्मों के लिए यादगार गीत लिखे जो फ्लॉप रहीं। इसके बाद कैफ़ी को एक गीतकार के रूप में सफलता मिली और परिवार की किस्मत चमक गई। कुछ ही वर्षों में, वे मुंबई के पॉश इलाके जुहू में एक अपार्टमेंट खरीदने में सक्षम हो गए । उनके पति के फिल्म उद्योग से जुड़ाव ने शौकत को फिल्मों में भूमिकाएँ निभाने में भी मदद की।

वह लगभग एक दर्जन फिल्मों में दिखाई दीं, जिनमें ( गरम हवा और उमराव जान ) जैसी प्रमुख प्रस्तुतियों में महत्वपूर्ण भूमिकाएँ थीं । थिएटर में, वह एक दर्जन नाटकों में दिखाई दीं। यह सब वह अपने घरेलू कर्तव्यों के साथ-साथ सफलतापूर्वक कर सकती थी।

2002 में कैफ़ी आज़मी के निधन के बाद, शौकत आज़मी ने एक आत्मकथा, कैफ़ी और मैं लिखी , जिसे एक उर्दू नाटक कैफ़ी और मैं में रूपांतरित किया गया , जिसमें शबाना ने उनकी माँ की भूमिका निभाई। इसका प्रीमियर 2006 में कैफ़ी आज़मी की चौथी बरसी पर मुंबई में हुआ था ।

📽️फिल्मोग्राफी📽️
वर्ष पतली परत भूमिका
2002 साथिया बुआ
1988 सलाम बॉम्बे! वेश्यालय मालिक
1986 मांडली ( अंजुमन ) 
1984 लोरी 
1982 बाजार हाजन बी
1982 रास्ता प्यार के शायमा की माँ
1981 उमराव जान खानम जान
1977 धूपछाँव पंडित की पत्नी
1974 फ़सलाह पार्वती एस. चंद्रा
1974 चिलचिलाती हवाएँ ( गर्म हवाएँ ) जमीला, ईसाई मिर्ज़ा की पत्नी
1974 जुर्म और सज़ा राजेश की माँ
1974 वो मैं नहीं 
1973 स्वीकर -सुशीला, नौकरानी
1973 नैना शशि कपूर की चाची
1970 हीर रांझा 
1964 Haqeeqat 
1964 कोहरा

हमीदा बानो

हमीदा बानो
 हमीदा बानो बेगम
🎂जन्म 19 अक्टूबर 1928
लाहौर , पंजाब , ब्रिटिश भारत
⚰️मृत 09 नवंबर 2006
लाहौर , पाकिस्तान
व्यवसायों 
अभिनेत्रीगायकनिर्माता
सक्रिय वर्ष 1935 – 1971
बच्चे 1

हमीदा बानो एक भारतीय शास्त्रीय गायिका और पार्श्व गायिका होने के साथ-साथ 1930 से 1960 के दशक तक भारतीय सिनेमा की ग़ज़ल गायिका भी थीं।

प्रारंभिक जीवन 

हमीदा का जन्म 19 अक्टूबर 1928 को ब्रिटिश भारत के दौरान लाहौर में हुआ था ।  हमीदा और उनकी छोटी बहन को गाना पसंद था और तभी एक व्यक्ति ने उन्हें सलाह दी कि उन्हें बॉम्बे चले जाना चाहिए और फिल्मों में गाने की कोशिश करनी चाहिए।

इसके बाद हमीदा और उनका परिवार बंबई चले गए, लेकिन उन्हें काम नहीं मिला, इसलिए उनका परिवार कलकत्ता चला गया, जहां उन्होंने पृथ्वी थिएटर में स्टेज ड्रामा और थिएटर नाटकों में अभिनय और गाना शुरू किया ।पृथ्वीराज कपूर की नज़र उन पर पड़ी , उन्हें उनका गाना पसंद आया और उन्होंने अपने नाटकों में उनका गाना गाया। एक स्टेज प्ले के दौरान उनकी मुलाकात राज कपूर से हुई और उन्होंने उनसे कहा कि उनकी आवाज अच्छी है और उन्हें फिल्मों में अभिनय करना चाहिए, फिर उन्होंने कुछ फिल्मों में अभिनय किया। 

उन्होंने और शशि कपूर ने स्टेज नाटकों और नाटकों में एक साथ काम किया, जो आगा हशर कश्मीरी द्वारा लिखे गए थे ।

कैरियर 

हमीदा ने स्टेज नाटकों में ग़ज़लें और गीत भी गाए और बाद में उन्होंने फिल्मों में ग़ज़लें गाना शुरू कर दिया।फिर उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो पर गाना शुरू किया।

बाद में अभिनेता भगवान दादा ने निर्देशक सी.रामचंद्र से उनकी सिफारिश की, बाद में उन्होंने फिल्म संजोग में कौन गली का छोरा पुकारे गाया, इस गाने को नौशाद ने संगीतबद्ध किया था । 

फिर उन्होंने रौनक (1944), नगमा-ए-सहारा (1945), अमर राज (1946), दुनिया एक सराय (1946) ज़ेवरत (1949), चोर (1951), राजपूत (1951) फिल्मों में काम किया। 

1945 में उन्होंने और सुरैया ने फिल्म मैं क्या करूं में एक ड्यूट गाना गाया ।1948 में उन्होंने फिल्म पराई आग में पार्श्व गायन किया जिसमें उन्होंने कुछ भी ना कहा गाया , इस गीत की रचना गुलाम मोहम्मद ने की थी। 1951 में उन्होंने राजपूत में एक युगल गीत गाकर गीता दत्त के साथ काम किया , बाद में उन्होंने फिल्म बिखरे मोती में डोनो हैं मजबूर प्यारे गाकर पार्श्व गायन किया , यह गीत गुलाम मोहम्मद द्वारा संगीतबद्ध किया गया था । 

1956 में वह पाकिस्तान चली गईं और वहां उन्होंने रेडियो लाहौर पाकिस्तान में काम किया, बाद में उन्होंने पीटीवी पर प्रसारित होने वाले संगीत कार्यक्रमों में गाने गाना शुरू कर दिया। 

निर्माता के रूप में

1967 में उन्होंने फिल्म प्यार की बाजी में एक निर्माता के रूप में काम किया और फिर 1971 में उन्होंने फिल्म गहरा राज में निर्माता के रूप में काम किया । 

1971 के अंत में वह सेवानिवृत्त हो गईं और अपने बेटे के साथ लाहौर में रहने चली गईं ।

व्यक्तिगत जीवन

हमीदा शादीशुदा थी और उसका एक बेटा था।

मृत्यु 
⚰️09 नवंबर, 2006 को लाहौर , पाकिस्तान में उनकी मृत्यु हो गई ।

मनुस्मृति

. ................मनुस्मृति.................... जरा सोचिए, अगर आज भारत का कानून यह तय कर दे कि— "एक आम आदमी चोरी करे तो उसे...