मंगलवार, 17 अक्टूबर 2023

सिम्मी ग्रेवाल

फ़िल्म अभिनेत्री सिमी ग्रेवाल के जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामनाएं
🎂जन्म की तारीख और समय: 17 अक्तूबर 1947, लुधियाना
नामांकन: फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार - सर्वश्रेष्ठ  सहायक अभिनेत्री, ज़्यादा
आंटी: पामेला चोपड़ा
बहन: अमृता गरेवाल
माता-पिता: दर्शी सिंह, जेएस गरेवाल
सिमी ग्रेवाल
🎂जन्म 17 अक्टूबर 1947 एक भारतीय अभिनेत्री और टॉक शो होस्टेस हैं।  वह दो फिल्मफेयर पुरस्कारों की विजेता है  वह दो बदन, साथी मेरा नाम जोकर, सिद्धार्थ, कर्ज़ और उड़ीकाँ (पंजाबी फ़िल्म) में अपने काम के लिए जानी जाती हैं।  उन्होंने एक बंगाली फिल्म में भी अभिनय किया, जिसका नाम अरण्यर दिनरात्रि है, जिसका निर्देशन दिग्गज सत्यजीत रे ने किया था

सिमी ग्रेवाल का जन्म लुधियाना, पंजाब, भारत में हुआ था। उनके पिता, ब्रिगेडियर जे.एस. गरेवाल ने भारतीय सेना में सेवा की  सिमी फिल्म निर्माता यश चोपड़ा की पत्नी पामेला चोपड़ा की चचेरी बहन हैं।  सिमी की मां दर्शी और पामेला के पिता मोहिंदर सिंह भाई-बहन थे। सिमी इंग्लैंड में पली-बढ़ी और अपनी बहन अमृता के साथ न्यूलैंड हाउस स्कूल में पढ़ी

अपना अधिकांश बचपन इंग्लैंड में बिताने के बाद, सिमी ग्रेवाल जब एक किशोरी थीं भारत लौट आयीं अंग्रेजी भाषा में उनके प्रवाह ने अंग्रेजी भाषा की फिल्म टार्जन गोज़ टू इंडिया में भूमिका करने का मौका मिला  15 वर्षीय, ग्रेवाल  ने 1962 में इस फिल्म से फिरोज खान के साथ अपने कैरियर की शुरुआत की। इस  फिल्म में उनका  प्रदर्शन काफी अच्छा था।  1960 और 70 के दशक के दौरान, वह कई उल्लेखनीय भारतीय फिल्मों में काम करने का अवसर मिला  उन्होंने कई प्रमुख निर्देशकों के साथ काम किया  जैसे कि महबूब खान की सन्तान, मेरा नाम जोकर राज कपूर (1970) के साथ अरण्य दिन रात्रि सत्यजीत रे (दिन और रातें जंगल में)  ) के साथ मृणाल सेन के साथ  पदाटिक (द गुरिल्ला फाइटर) और राज खोसला की फ़िल्म  दो बदन उन्होंने कोलंबिया पिक्चर्स बैनर तले फ़िल्म सिद्धार्थ में शशि कपूर के साथ अभिनय किया, जो हर्मन हेस के  उपन्यास पर आधारित एक अंग्रेजी भाषा की फिल्म थी सिमी ग्रेवाल ने इस फिल्म में एक नग्न दृश्य किया, जो भारत में  विवाद का कारण बना भारतीय सेंसर बोर्ड कुछ  कटौती के  बाद इस फ़िल्म को  प्रदर्शन के लिए पास किया बाद में 1970 के दशक के मध्य में, उन्होंने अपने भाई यश चोपड़ा द्वारा बनाई गई लोकप्रिय फिल्म कभी कभी (1976 ) में अभिनय किया, और फिल्म चलते चलते (1976) में भी भूमिका निभाई फ़िल्म  कर्ज़ (1980) में उन्होंने एक वैंप की यादगार भूमिका निभाई  उन्होंने चार्ल्स एलेन की किताब पर आधारित बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री ड्रामा महाराजाज  (1987) में भी अभिनय किया

1980 के दशक की शुरुआत में उनका ध्यान लेखन और निर्देशन की ओर गया।  उन्होंने अपनी खुद की प्रोडक्शन कंपनी सिगा आर्ट्स इंटरनेशनल बनाई।  उन्होंने दूरदर्शन के लिए एक टीवी श्रृंखला इट्स अ वूमन्स वर्ल्ड (983) की मेजबानी, निर्माण और निर्देशन किया  उन्होंने यूके में  चैनल 4 के लिए एक वृत्तचित्र लिविंग लीजेंड राजकपूर (1984)भी बनाया।  इसके बाद राजीव गांधी पर तीन भागों वाली एक डॉक्यूमेंट्री बनाई गई जिसका शीर्षक था इंडियाज राजीव
उन्होंने  एक हिंदी फीचर फिल्म रुखसत को लिखा और निर्देशित किया और टेलीविजन विज्ञापनों का निर्माण किया, जिसके लिए उसने ऑस्ट्रेलिया में 1988 के पेटर पुरस्कार  जीता।

वह आमतौर पर टीवी शो और पुरस्कार समारोहों में अपने हस्ताक्षर युक्त सफेद कपड़े पहनती है, और लोकप्रिय रूप से "द लेडी इन व्हाइट" के रूप में जानी जाती है ग्रेवाल सावा शावा 2008 में एक मेजबान और न्यायाधीश के रूप में दिखाई दी

सिमी ग्रेवाल की अपनी वेबसाइट है जिसका उपयोग वह अपने प्रशंसकों के साथ बातचीत करने के लिए करती है: ।  साइट पर पाठ पढ़ने के लिए उसकी आवाज है। 
 YouTube पर उसका अपना चैनल भी है जहाँ उसके सभी शो और वृत्तचित्र अपलोड किए जाते हैं।  चैनल को 40 मिलियन से अधिक व्यूज मिले हैं।

सिमी ग्रेवाल का 17 साल की उम्र में पहला गंभीर रिश्ता जामनगर के महाराजा के साथ बना जो इंग्लैंड में उनके पड़ोसी भी थे

सिमी ग्रेवाल बाद में मंसूर अली खान पटौदी के साथ रिश्ते में रही लेकिन शर्मिला टैगोर से मिलने के बाद उन्होंने उनसे रिश्ता तोड़ लिया

सिमी ग्रेवाल का विवाह पुरानी दिल्ली के चुनामल परिवार के रवि मोहन से हुआ था, लेकिन उनकी शादी बहुत दिनों तक नही चली  और उनका तलाक हो गया
📽️
1988 रुख़सत
1986 लव एंड गॉड
1982 हथकड़ी
1981 बीवी ओ बीवी
1980 कर्ज
1980 द बर्निंग ट्रेन विद्यालय
1979 एहसास
1976 नाच उठे संसार
1976 चलते चलते
1976 कभी कभी
1974 हाथ की सफाई
1973 नमक हराम
1972 अनोखी पहचान
1971 अंदाज़
1970 मेरा नाम जोकर मैरी
1970 अरण्येर दिनरात्रि बंगाली फ़िल्म
1968 साथी
1968 आदमी
1966 दो बदन
1965 तीन देवियाँ

सोमवार, 16 अक्टूबर 2023

समिता पाटिल

स्मिता पाटिल 
हिन्दी फ़िल्मों की एक अभिनेत्री थी। भारतीय संदर्भ में स्मिता पाटिल एक सक्रिय नारीवादी होने के अतिरिक्त मुंबई के महिला केंद्र की सदस्य भी थीं।

🎂जन्म : 17 अक्तूबर 1955, पुणे
⚰️मृत्यु: 13 दिसंबर 1986, मुम्बई
पति: राज बब्बर (विवा. ?–1986)
बच्चे: प्रतीक बब्बर
माता-पिता: शिवाजीराव पाटिल, विद्याताई पाटिल
बहन: अनीता देशमुख, मान्या पाटिल सेठ
पुणे में जन्मी स्मिता के पिता शिवाजीराव पाटिल महाराष्ट्र सरकार मे मंत्री और माता एक सामाजिक कार्यकर्ता थीं। उनकी आरंभिक शिक्षा मराठी माध्यम के एक स्कूल से हुई थी . उनका कैमरे से पहला सामना टीवी समाचार वाचक के रूप हुआ था। हमेशा से थोडी़ विद्रोही रही स्मिता की बडी़ आंखों और सांवले सौंदर्य ने पहली नज़र मे ही सभी का ध्यान अपनी ओर खींच लिया .
कालांतर मे स्मिता पाटिल के प्रेम संबंध राज बब्बर से हो गये जिनकी परिणिति अंतंतः विवाह मे हुई। राज बब्बर जो पहले से ही विवाहित थे और उन्होने स्मिता से शादी करने के लिये अपनी पहली पत्नी को छोडा़ था।

📽️1989 गलियों का बादशाह 
1988 वारिस 
1988 हम फ़रिश्ते नहीं 
1988 आकर्षण विशेष भूमिका 
1987 ठिकाना 
1987 राही 
1987 डांस डांस 
1987 शेर शिवाजी 
1987 सूत्रधार 
1987 आवाम 
1987 नज़राना 
1987 एहसान 
1987 इंसानियत के दुश्मन 
1986 आप के साथ गंगा 
1986 काँच की दीवार 
1986 अमृत कमला
1986 अनोखा रिश्ता 
1986 तीसरा किनारा 
1986 अंगारे 
1986 दहलीज़ 
1986 दिलवाला 
1985 मेरा घर मेरे बच्चे 
1985 आखिर क्यों? 
1985 जवाब 
1985 गुलामी 
1985 मिर्च मसाला 
1984 रावण 
1984 मेरा दोस्त मेरा दुश्मन 
1984 तरंग 
1984 गिद्ध 
1984 पेट प्यार और पाप 
1984 कसम पैदा करने वाले की
1984 फ़रिश्ता 
1984 आनन्द और आनन्द 
1984 शराबी 
1983 मंडी 
1983 अर्द्ध सत्य 
1983 हादसा
1982 सितम  
1982 बाज़ार 
1982 भीगी पलकें 
1982 दर्द का रिश्ता 
1982 नादान
1982 शक्ति 
1982 बदले की आग 
1982 अर्थ 
1982 नमक हलाल 
1981 तजुर्बा 
1981 सद्गति 
1981 चक्र 
1980 भवनी 
1980 अलबर्ट पिन्टो को गुस्सा क्यों आता है 
1980 द नक्सेलाइटस 
1980 आक्रोश 
1978 कोन्दुरा 
1977 भूमिका 
1976 मंथन
1975 निशांत 
1983 घुंघरू

लच्छू महाराज

लच्छू महाराज
🎂जन्म- 16 अक्टूबर, 1944, बनारस 
⚰️मृत्यु- 27 जुलाई, 2016
 भारत के जानेमाने तबला वादक थे।
अभिभावक वासुदेव महाराज
पति/पत्नी टीना (फ़्राँसीसी महिला)
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र भारतीय शास्त्रीय संगीत
प्रसिद्धि तबला वादक
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी सन 1972 में भारत सरकार की ओर से लच्छू महाराज ने 27 देशों का दौरा किया था। 1972 में ही केंद्र सरकार की ओर से उन्हें 'पद्मश्री' से सम्मानित करने का प्रस्ताव किया गया था, किंतु उन्‍होंने 'पद्मश्री' लेने से मना कर दि‍या।
लच्छू महाराज 
 जन्म- 16 अक्टूबर, 1944, बनारस मृत्यु- 27 जुलाई, 2016) भारत के जानेमाने तबला वादक थे। उन्होंने बनारस घराने की तबला बजाने की परम्परा को आगे बढ़ाया था। उनके कई शिष्य देश-विदेश में तबला बजा रहे हैं। लच्छू महाराज बेहद सादगी पसंद व्यक्ति थे, यही कारण था कि उन्होंने कभी कोई सम्मान ग्रहण नहीं किया।

लच्छू महाराज का जन्म उत्तर प्रदेश की प्रसिद्ध नगरी बनारस में 16 अक्टूबर, सन 1944 में हुआ और वे वहीं पले-बढ़े। इनके पिता का नाम वासुदेव महाराज था। लच्छू महाराज बारह भाई-बहनों में चौथे थे।
एक फ़्राँसीसी महिला टीना से लच्छू महाराज ने विवाह किया था। उनकी एक पुत्री है, जो स्विट्जरलैण्ड में है।
पूरी दुनिया में अपनी पेशेवर प्रस्तुति के अलावा लच्छू जी ने कई बॉलीवुड फ़िल्मों के लिए भी तबला बजाया।
लच्छू महाराज के वादन की विशेषता थी कि उनके पिता वासुदेव महाराज ने विभिन्न घरानों के तबला वादकों की देखभाल करते हुए उनके घरानों की शेष वंदिशों को संग्रहित कर लच्छू महाराज को प्रदान किया।
लच्छू महाराज ने अपने विकट अभ्यास के ज़रिये स्वतंत्र तबला वादक एवं संगत दोनों में ख्याति प्राप्त की। आप गायन, वादन एवं नृत्य तीनों की संगत में निपुण थे।
लच्छू महाराज एक स्वाभिमानी एवं पारंपरिक कलाकार थे, जिन्होंने छोटे मोटे स्वार्थों के लिए कोई भी गलत समझौते नहीं किये।
हिन्दी फ़िल्मों के प्रसिद्ध अभिनेता गोविन्दा लच्छू महाराज के भांजे हैं। उन्होंने बचपन में ही लच्छू महाराज को अपना गुरु मान लिया था। गोविन्दा ने तबला बजाना लच्छू महाराज से ही सीखा। लच्छू महाराज जब कभी भी मुम्बई जाते तो गोविन्दा के घर पर ही रुकते थे।
सन 1972 में भारत सरकार की ओर से लच्छू महाराज ने 27 देशों का दौरा किया था। 1972 में ही केंद्र सरकार की ओर से उन्हें 'पद्मश्री' से सम्मानित करने का प्रस्ताव किया गया था, किंतु उन्‍होंने 'पद्मश्री' लेने से मना कर दि‍या। वे कहते थे- "श्रोताओं की वाह और तालि‍यों की गड़गड़ाहट ही कलाकार का पुरस्‍कार होता है।"
लच्छू महाराज का निधन 27 जुलाई, 2016 को हुआ था। उनकी अंतिम संस्कार बनारस के मणिकर्णिका घाट पर किया गया।
फ़िल्मी सितारे गोविन्दा ने लच्छू महाराज के निधन पर लिखा कि- "पंडित लच्छू महाराज का निधन भारतीय शास्त्री संगीत की दुनिया के लिए बहुत बडी क्षति है। वह लब्ध प्रतिष्ठित तबला वादक थे।" कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने उन्हें तबला के सिरमौरों में एक बताया और उनके शोक संतप्त परिवार के प्रति अपनी संवेदना व्यक्त की। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भी लच्छू महाराज के निधन पर दु:ख प्रकट किया। प्रसिद्ध ठुमरी गायिका गिरिजा देवी ने भी लच्छू महाराज के निधन पर शोक जताया और कहा कि ऐसे कलाकार हमेशा पैदा नहीं होते।

नरींदर चंचल

नरेंद्र चंचल
प्रसिद्धि भजन गायक मातेश्वरी भगत
🎂जन्म 16 अक्टूबर, 1940
जन्म भूमि अमृतसर, पंजाब
⚰️मृत्यु 22 जनवरी, 2021
मृत्यु स्थान दिल्ली

अभिभावक माता- कैलाशवती
पिता- चेतराम खरबंदा

पति/पत्नी नम्रता चंचल
संतान दो बेटे, एक बेटी
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र गायकी
मुख्य फ़िल्में बॉबी, बेनाम, रोटी कपड़ा और मकान, आशा तथा अवतार आदि।
प्रसिद्धि भजन गायक
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी राजेश खन्ना और शबाना आज़मी अभिनीत फिल्म 'अवतार' में महेंद्र कपूर और आशा भोंसले के साथ नरेंद्र चंचल का गाया गीत 'चलो बुलाया आया है माता ने बुलाया है' माता की बेहद प्रसिद्ध भेंटों में शु्मार है। मुख्य रूप से उन्हें माता के भजन गायक के रूप में जाना जाता था। नरेंद्र चंचल ने बहुत-से भजन और हिंदी फिल्म में गीत गाए थे। उनके गीत के बिना हर दुर्गा पूजा अधूरी होती थी। पूरे उत्तर भारत में उनका बड़ा नाम था। नरेंद्र चंचल की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने अमिताभ बच्चन से लेकर शोमैन राज कपूर की फिल्मों के लिए भी गाने गाए। फ़िल्म 'बेनाम' आदि में।
चंचल अपनी माता की वजह से नरेंद्र चंचल की भजनों में रुचि बढ़ी थी। उन्होंने बचपन से ही अपनी मां को माता रानी के भजन गाते सुना था। नरेंद्र चंचल अपनी पहली गुरु अपनी मां को माना करते थे। इसके बाद उन्होंने प्रेम त्रिखा से संगीत सीखा। फिर वह भजन गाने लगे। नरेंद्र चंचल ने 'मिडनाइट सिंगर' नामक एक बायोग्राफी भी जारी की, जो उनके जीवन, संघर्षों और कठिनाइयों को बताती है।

नरेंद्र चंचल ने सालों साल के संघर्ष के बाद 1973 में फिल्म 'बॉबी' के लिए बॉलीवुड गीत 'बेशर्क मंदिर मस्जिद' गाया और फिल्मफेयर बेस्ट मेल प्लेबैक अवार्ड अपने नाम किया। इतना ही नहीं, उन्होंने 'रोटी कपडा और मकान' जैसी बड़ी फ़िल्म के लिए भी गाने गए। उन्होंने भक्ति गीतों की दुनिया में अपनी एक अनोखी पहचान बनाई। नरेंद्र चंचल ने अमेरिकी राज्य जॉर्जिया की नागरिकता भी प्राप्त कर ली थी।
🌹लोकप्रियता🌹
नरेंद्र चंचल पिछले कई दशकों से कीर्तन और जगरातों की दुनिया में सक्रिय थे। उन्होंने राज कपूर की फिल्म 'बॉबी' में 'बेशक मंदिर मस्जिद तोड़ो' गाना गाया। ये गाना आज भी लोगों की जुबान पर रहता है। इस गाने से उन्हें पहचान मिली।
नरेंद्र चंचल ने 1974 में 'बेनाम' फिल्म में 'मैं बेनाम हो गया' गीत गाया। 1974 में ही उन्होंने 'रोटी कपड़ा और मकान' में 'बाकी कुछ बचा तो महंगाई मार गई' गाने को आवाज दी।

फिल्म 'आशा' (1980) में नरेंद्र चंचल ने 'तूने मुझे बुलाया' गीत गाया, जो काफी हिट हुआ था। इसके बाद 1983 में फिल्म 'अवतार' के लिए उन्होंने भजन 'चलो बुलावा आया है' गाया। ये शबाना आज़मी और राजेश खन्ना पर फिल्माया गया था। यह गाना भी बेहद लोकप्रिय हुआ। इसकी लोकप्रियता आज भी बरकरार है। इसके अलावा उन्होंने 1985 में फिल्म 'काला सूरज' के लिए 'दो घूंट पिला दे' और 1994 में फिल्म 'अनजाने' के लिए 'हुए हैं कुछ ऐसे वो हमसे पराए' गीत गाया।

कोरोना पर भजन 

मार्च 2020 में नरेंद्र चंचल का एक वीडियो वायरल हुआ। इसमें वे मां दुर्गा का एक भजन गाते दिखे थे। इसमें उन्होंने कोरोना का भी जिक्र किया था। नरेंद्र चंचल द्वारा जगराते में गाया गया उनका वीडियो लोगों के बीच काफी पॉपुलर हुआ। इसमें उन्होंने गाया कि "डेंगू भी आया और स्वाइन फ्लू भी आया, चिकन गोनिया ने शोर मचाया, कित्थे आया कोरोना?"

मृत्यु
भजन सम्राट नरेंद्र चंचल का दिल्ली के अपोलो अस्पताल में 22 जनवरी, 2021 को निधन हुआ। वह 80 साल के थे। नरेंद्र चंचल पिछले तीन महीने से बीमार थे और उनका इलाज चल रहा था। अस्पताल प्रशासन के मुताबिक़, शुक्रवार के दिन दोपहर करीब 12.30 पर उन्होंने अंतिम सांस ली। गायक नरेंद्र चंचल के ब्रेन में क्लोटिंग थी।

पीएम नरेंद्र मोदी ने भी उनके निधन पर दु:ख जताया। उन्होंने लिखा- "लोकप्रिय भजन गायक नरेंद्र चंचल जी के निधन के समाचार से अत्यंत दु:ख हुआ है। उन्होंने भजन गायन की दुनिया में अपनी ओजपूर्ण आवाज से विशिष्ट पहचान बनाई। शोक की इस घड़ी में मेरी संवेदनाएं उनके परिजनों और प्रशंसकों के साथ हैं। ओम् शांति"।

मेने अपने कनाडा प्रवास के दौरान नरेंद्र चंचल के निधन पर शोक व्यक्त किया। और लिखा- "ये जानकर बहुत दु:ख हुआ कि प्रतिष्ठित और सबसे ज्यादा प्यारे नरेंद्र चंचल हमें छोड़कर चले गए। उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना। उनके परिवार के प्रति हार्दिक संवेदना"।

सैयद वाजिद हुसैन रिज़वी

अभिनेता पटकथा लेखक एवं शायर आगा जानी कश्मीरी के जन्मदिन पर हार्दिक श्रद्धांजलि

सैयद वाजिद हुसैन रिज़वी 
🎂 जन्म 16 अक्टूबर 1908  ⚰️27 मार्च 1998
जिन्हें उनके फ़िल्मी स्क्रीन नाम आगा जानी कश्मीरी के नाम से बेहतर जाना जाता है, एक भारतीय पटकथा लेखक अभिनेता और उर्दू कवि थे

उन्होंने पहली भारतीय सिनेमाई ब्लॉकबस्टर किस्मत (1943) से लेकर पाल्मे डी'ओर नामांकित मुझे जीने दो (1963) और नया जमाना (1971) तक कई क्लासिक फिल्मों के लिए एक लेखक के रूप में बॉलीवुड फिल्मों में काम किया उन्हें साहित्यिक उर्दू में अपने संवाद लिखने के लिए जाना जाता था , जो अंततः 1970 के दशक में सलीम-जावेद द्वारा अधिक बोलचाल की शैली को लोकप्रिय बनाने के बाद प्रचलन से बाहर हो गया

आगा जानी कश्मीरी का जन्म 16 अक्टूबर 1908 को लखनऊ , उत्तर प्रदेश, भारत में हुआ था प्रारंभिक बॉलीवुड फिल्म, शान ए सुभान (1933) (विभिन्न नामों से शान ए सुभान और शेन सुभान ) में अभिनय करने के लिए वह अपनी किशोरावस्था में घर से भाग गए थे कुछ हद तक, वह अपने पहले चचेरे भाई, लखनऊ के नवाब कश्मीरी से प्रेरित थे, जो शुरुआती भारतीय सिनेमा में सबसे प्रसिद्ध चरित्र अभिनेता थे, जिन्होंने यहूदी की लड़की (यहूदी की बेटी) जैसी हिट फ़िल्में दीं, जिसमें नवाब ने अभिनय किया था। एक बुजुर्ग यहूदी. इसके बाद, आगा जानी कलकत्ता लौट आए , कुछ छोटी भूमिकाएँ और कुछ मुख्य भूमिकाएँ कीं, जिनमें से दो बेगम अख्तर के साथ थीं । उन्होंने जिन तीन फिल्मों में अभिनय किया उनमें मिस मनोरमा और अनोखी अदा और भाभी थीं - ये तीनों फिल्में 1930 के दशक की थीं। 

उर्दू में उनकी साहित्यिक परवरिश को देखते हुए - वह प्रसिद्ध उर्दू कवि आरज़ू लखनवी के शिष्य थे और उन्होंने उर्दू साहित्य में स्कूली शिक्षा प्राप्त की थी - कश्मीरी फिल्म स्टूडियो बॉम्बे टॉकीज़ में शामिल हो गए, हिमांशु राय के साथ पटकथा लेखन सीखा , और 1930 के दशक की शुरुआत में अपनी पहली फिल्म लिखी। इसका निर्देशन जर्मन निर्देशक फ्रांज ओस्टेन ने किया था , जो उस समय बॉम्बे टॉकीज़ में काम करते थे। वचन (1938) नामक फिल्म सफल साबित हुई और कश्मीरी ने 50 से अधिक फिल्में लिखीं।

बॉम्बे (अब मुंबई ) में वह और उनकी पत्नी अपने बेटों ज़ुहैर कश्मीरी और सरवर कश्मीरी के साथ रहते थे। उन्होंने बॉलीवुड निर्माता-निर्देशकों के लिए लिखा, जिनमें सुबोध मुखर्जी, शशधर मुखर्जी, सुनील दत्त , मेहबूब खान , बॉम्बे टॉकीज के हिमांशु राय , फ्रांज ओस्टेन, प्रमोद चक्रवर्ती शामिल थे ; और अभिनेता अशोक कुमार , वीना, देविका रानी , ​​नूरजहाँ , सुरैया , साधना, सायरा बानो , जॉय मुखर्जी , शम्मी कपूर, दिलीप कुमार, राज कपूर और निम्मी 

आगा जानी कश्मीरी की मृत्यु 27 मार्च 1998 को हुई। उनके बेटे ज़ुहैर कश्मीरी कनाडा में पत्रकार हैं।

फिल्में 

नया ज़माना (1971) (लेखक)
परवाना (1971) (संवाद और पटकथा)
तुमसे अच्छा कौन है (1969) (संवाद) 
लव इन टोक्यो (1966) (संवाद) 
अप्रैल फ़ूल (1964) (संवाद)
ग़ज़ल (1964) (लेखक) 
ज़िद्दी (1964) (संवाद) 
मुझे जीने दो (1963) (लिखित) 
ये रास्ते हैं प्यार के (1963) (लिखित)
जंगली (1961) (संवाद) 
लव इन शिमला (1960) (संवाद पटकथा) 
चोरी चोरी (1956) (संवाद) (पटकथा) 
अमर (1954) (संवाद)
औरत (1953) (पटकथा)
मल्किन (फ़िल्म) (1950) (पटकथा/संवाद)
अनोखी अदा (1948) (पटकथा और संवाद)
चंद्रलेखा (1948) (संवाद)
तक़दीर (1943) (पटकथा/संवाद)
नजमा (1943) (पटकथा/संवाद)
अनमोल घड़ी (1946) (लेखक) 
हुमायूँ (1945) (लेखक)
लाल हवेली (1945) (संवाद) 
वचन (1938) (पटकथा)

बुधवार, 27 सितंबर 2023

पी जयराज

पूरा नाम पैदी जयराज
प्रसिद्ध नाम पी जयराज
🎂जन्म 28 सितम्बर, 1909
जन्म भूमि करीमनगर, आंध्र प्रदेश
⚰️मृत्यु 11 अगस्त, 2000
मृत्यु स्थान मुम्बई, महाराष्ट्र
संतान पाँच (दो पुत्र दिलीप, जयतिलक और तीन पुत्रियाँ जयश्री, दीपा एवं गीता)
कर्म भूमि मुम्बई
कर्म-क्षेत्र अभिनेता, निर्माता-निर्देशक
मुख्य फ़िल्में 'हमारी बात', 'नई कहानी', 'शिकारी', 'रायफल गर्ल', 'भाभी' आदि।
शिक्षा स्नातक
विद्यालय वुड नेशनल कॉलेज, हैदराबाद
पुरस्कार-उपाधि दादा साहब फाल्के पुरस्कार
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी अपने फ़िल्मी कैरियर में बतौर अभिनेता तो लगभग 300 फ़िल्मों में अभिनय किया जिनमें से 160 फ़िल्मों में नायक की भूमिकाएँ निभाई अपने फ़िल्मी कैरियर में बतौर अभिनेता तो लगभग 300 फ़िल्मों में अभिनय किया जिनमें से 160 फ़िल्मों में नायक की भूमिकाएँ निभाईं।
पी. जयराज (पूरा नाम- 'पैदी जयराज', अंग्रेज़ी: Paidi Jairaj, जन्म: 28 सितम्बर, 1909; मृत्यु: 11 अगस्त, 2000) हिन्दी फ़िल्म जगत् के एकमात्र ऐसे अभिनेता थे, जिन्होंने मूक फ़िल्मों के दौर से लेकर वर्तमान दौर तक की अनेक फ़िल्मों में काम किया। हिन्दी सिनेमा के पर्दे पर सर्वाधिक राष्ट्रीय और ऐतिहासिक नायकों को जीवित करने का कीर्तिमान इसी कलाकार के साथ जुड़ा है। नौशाद जैसे महान् संगीतकार को फ़िल्मों में ब्रेक देने का श्रेय भी पी. जयराज को ही जाता है। उनकी ज़िंदगी हिन्दी सिने जगत् के इतिहास के साथ-साथ चलती हुई, एक सिनेमा की कहानी जैसी थी।

जीवन परिचय

जयराज का जन्म 28 सितम्बर, 1909 को निजाम स्टेट के करीमनगर ज़िले में हुआ था। 'पाइदीपाटी जैरुला नाइडू' उनका आन्ध्रीय नाम था। हैदराबाद में पले बड़े हुए जिससे उर्दू भाषा पर पकड़ अच्छी थी, वो काम आयी। उनके पिताजी सरकारी दफ्तर में लेखाजोखा देखा करते थे। उनकी प्रारंम्भिक शिक्षा हैदराबाद के रोमन कैथोलिक स्कूल में हुई। फिर तीन साल के लिए उन्हें 'वुड नेशनल कॉलेज' के बॉडिंग हाउस में पढ़ाया गया जहां से उन्होंने संस्कृत की शिक्षा ली। फिर हैदराबाद के 'निजाम हाईस्कूल' में उर्दू पढी। बी. एस. सी. करने के बाद नेवी में जाना चाह्ते थे किंतु उनके बडे भाई सुन्दरराज इंजीनिय्ररिंग की पढाई के लिए लंदन भेजना चाह्ते थे। उनकी माताजी बड़े भाई को ज्यादा प्यार देतीं थीं और उनकी इच्छा थी इंग्लैंड जाकर पढाई करने की जिसका परिवार ने विरोध किया जिससे नाराज होकर, युवा जयराज, किस्मत आजमाने के लिए सन् 1929 में मुम्बई आ गये। उस समय उनकी उम्र 19 वर्ष थी।

समुन्दर के साथ पहले से बहुत लगाव था सो, डॉक यार्ड में काम करने लगे ! वहाँ उनका एक दोस्त था जिसका नाम "रंग्या" था उसने सहायता की और तब, पोस्टर को रंगने का काम मिला जिससे स्टूडियो पहुंचे। उनकी मजबूत कद काठी ने जल्द ही उन्हें निर्माता की आंखों में चढ़ा दिया। महावीर फोटोप्लेज़ में काम मिला। उस समय चित्रपट मूक थे। कई जगह काम, ऐक्टर के बदले खड़े डबल का मिला, पर बाद में मुख्य भूमिकाएँ भी मिलने लगीं। भाभा वारेरकर उनके आकर्षक और सौष्ठव शरीर को देखकर उनके व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने अपनी पहली फ़िल्म में नायक की भूमिका के लिए चुन लिया। दुर्भाग्य से यह फ़िल्म बीच में ही बंद हो गई क्योंकि वारेरकर का अपने पार्टनर के साथ मनमुटाव हो गया था।

बतौर सहायक निर्देशक
भायखाला स्थित स्टुडियो में निर्देशक नागेन्द्र मजूमदार के पास उन्हें 'सहायक निर्देशक की नौकरी मिल गई। उनके साथ निर्देशन के अलावा संपादन, सिने-छांयाकन आदि का कार्य भी सीखा। दिलीप कुमार की पहली फ़िल्म "प्रतिमा" का निर्देशन जयराज ने किया था।

बतौर निर्देशक
पी. जयराज ने फ़िल्मों के निर्देशन का काम भी किया जिसमें बतौर निर्देशक पहली फ़िल्म थी-'प्रतिभा', जिसकी निर्मात्री देविका रानी थीं।

अभिनय की शुरूआत
फ़िल्मों में बतौर अभिनेता वर्ष 1929 में नागेन्द्र मजूमदार ने ही प्रथम फ़िल्म 'जगमगाती जवानी' में ब्रेक दिया। जिसमें माधव काले नायक थे और जयराज सहायक चूंकि माधव काले को घुड़सवारी और फाइटिंग नहीं आती थी, लिहाजा जयराज ने मास्क पहनकर उनका भी काम किया। जिसके मुख्य कलाकार माधव केले के स्टंट सीन भी उन्होंने ही किए थे। उसके बाद 'यंग इन्डिया पिक्चर्स' ने 35 रुपये प्रतिमाह, 3 वक्त का भोजन और 4 अन्य लोगों के साथ गिरगाम मुम्बई में रहने की सुविधा वाला काम दिया। अब जीवन की गाड़ी चल निकली। 1930 में "रसीली रानी" फ़िल्म बनी। माधुरी उनकी हिरोइन थीं। उसके बाद जयराज 'शारदा फ़िल्म कम्पनी' से जुड़े। 35 रुपये से 75 रुपये मिलने लगे। जेबुनिस्सा हिरोइन थीं जो हिन्दुस्तानी ग्रेटा के नाम से मशहूर थीं और जयराज जी गिल्बर्ट थे हिन्दुस्तान के। (Anthony Hope's की फ़िल्म 'द प्रिज़नर ऑफ़ जेंडा' ही हिन्दी फ़िल्म "रसीली रानी" के रूप में बनी थी) बतौर नायक उनकी पहली फ़िल्म 'रसीली रानी' 1929 में प्रदर्शित हुई माधुरी उनकी नायिका थीं। 'नवजीवन फ़िल्म्स' के बैनर तले बनी नागेन्द्र मजूमदार द्वारा निर्देशित वह फ़िल्म बहुत सफल रही थी। मूक फ़िल्मों के दौर में वह फ़िल्म कई सिनेमाघरों में पांच सप्ताह चली थी जो उन दिनों बहुत बड़ी बात थी। मूक फ़िल्मों में तो जयराज के नाम की धूम मची हूई थी।

बोलती फ़िल्मों का नया दौर
1931 में जब 'आलम आरा' से बोलती फ़िल्मों का दौर शुरू हुआ तो उन्होंने भी बोलती फ़िल्मों के अनुरूप खुद को ढाला। उनकी पहली बोलती फ़िल्म थी 'शिकारी'। 1932 में प्रदर्शित इस फ़िल्म में जयराज ने एक बौद्ध भिक्षुक की भुमिका निभाई थी और सांप, बाघ, शेर जैसे हिंसक जानवरों के साथ लड़ने के दृश्य दिए। बोलती फ़िल्म के साथ संगीत शुरू हुआ। कई कलाकार प्ले बैक भी देने लगे पर 1935 से दूसरे गाते और कलाकार सिर्फ़ होंठ हिलाते जिससे आसानी हो गयी। अब सिनेमा संगीतमय हो गया। हमजोली फ़िल्म में नूरजहाँ और जयराज जी ने काम किया था। राइफल गर्ल, हमारी बात आदि फ़िल्म मिलीं। जयराज की लोकप्रियता देखकर 'बाम्बे टॉकीज' के मालिक हिमांशु राय ने अपनी कंपनी की फ़िल्म 'भाभी' के लिए उन्हें बतौर नायक अनुबंधित किया, जिससे फ़िल्म-जगत् में सनसनी फैल गई। तब 'बाम्बे टॉकीज' बाहर के कलाकारों को अपनी फ़िल्म में काम नहीं देता था। फांज आस्टिन द्वारा निर्देशित वह फ़िल्म 'भाभी' बहुत सफल रही। मुम्बई में उस फ़िल्म ने रजत जयंती मनाई थी तो कलकत्ता में वह 80 सप्ताह चली थी। फिर आयी 'स्वामी' फ़िल्म, जिसमें सितारा देवी थीं। हातिम ताई, तमन्ना, उस समय के सिनेमा थे। जयराज ने मराठी, गुजराती फ़िल्म भी कीं। अपने फ़िल्मी कैरियर में बतौर अभिनेता तो लगभग 300 फ़िल्मों में अभिनय किया जिनमें से 160 फ़िल्मों में नायक की भूमिकाएँ निभाईं। बतौर नायक उनकी अंतिम फ़िल्म थी-खूनी कौन मुजरिम कौन', जो वर्ष 1965 में प्रदर्शित हुई थी। उसके बाद उन्होंने उम्र की मांग के अनुसार चरित्र भूमिकाएँ निभानी शुरु कर दीं। महात्मा गांधी की हत्या पर आधारित अमरीकी फ़िल्म- 'नाईन आवर्स टू रामा', मार्क रोब्सन निर्मित में जी. डी. बिड़ला की भूमिका निभाने का भी अवसर मिला जो आज तक हिन्दुस्तान में प्रदर्शित नहीं हो पायी है। माया फ़िल्म में आई. एस. जौहर के साथ काम किया। यह दोनों अमरीकी फ़िल्में हैं। इन्डो-रशियन फ़िल्म 'परदेसी' में भी काम किया। दो बार दुर्घट्ना ग्रस्त हो जाने के कारण चलने फिरने में तकलीफ होने लगी तो फ़िल्मों से दूरी बनानी शुरु कर दी।

बतौर निर्माता
एक फ़िल्म जयराज जी ने बनाना शुरू किया था जिसमें नर्गिस, भारत भूषण और ख़ुद वे काम कर रहे थे। फ़िल्म का नाम था सागर। उनका बहुत नाम था सिने जगत में और कई सारे निर्माता, निर्देशक, कलाकार उन्हें जन्मदिन की बधाई देने सुबह से उनके घर पहुँचते थे। 1951 में सागर फ़िल्म बनायी, जो लॉर्ड टेनिसन की "इनोच आर्डेन" पर आधारित कथा थी। वह निष्फल हुई क्योंकि जयराज ने अपना खुद का पैसा लगाया था और उन्होंने कुबूल किया था कि व्यवासायिक समझ उनमें नहीं थी।

परिवार
1939 में अपने घनिष्ठ मित्र पृथ्वीराज कपूर के कहने पर उन्होंने सावित्री नाम की युवती से विवाह कर लिया। तब उन्होंने ही सावित्री के कन्यादान की रस्म निभाई थी। 1942 में उनका वेतन 200 रुपये प्रतिमाह से बढ़कर 600 रुपये प्रतिमाह हो गया। उनकी 5 संतान थीं, दो पुत्र, दिलीप राज व जयतिलक और तीन पुत्रियाँ, जयश्री, दीपा एवं गीता। सबसे बड़े दिलीप राज, जो ऐक्टर बने। उनके द्वारा अभिनीत के. ए. अब्बास की फ़िल्म "शहर और सपना" को राष्ट्रपति पुरस्कार मिला था। जयराज का दूसरा पुत्र अमेरिका में रहता है। दूसरी बेटी थीं जयश्री, उनका विवाह राजकपूर की पत्नी कृष्णा के छोटे भाई भूपेन्द्रनाथ के साथ हुआ था। तीसरी बेटी थीं दीपा, फिर थी गीता सबसे छोटी।

मुख्य फ़िल्में
सन् 1938 - रायफल गर्ल
सन् 1939 - भाभी
सन् 1942 - खिलौना
सन् 1942 - मेरा गाँव
सन् 1943 - नई कहानी
सन् 1954 - बादबान
सन् 1954 - मुन्ना
सन् 1956 - अमरसिंह राठौड़
सन् 1956 - हातिमताई
सन् 1957 - परदेसी
सन् 1959 - चार दिल चार राहें
सन् 1962 - रजिया सुल्तान
पुरस्कार
50 के दशक में पी. जयराज को लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड से नवाजा गया। 1982 में उन्हें दादा साहेब फाल्के पुरस्कार भी मिला।

निधन
जयराज का निधन लीलावती अस्पताल, मुम्बई में ⚰️11 अगस्त सन् 2000 को हुआ और हिन्दी सिने संसार का मूक फ़िल्मों से आज तक का मानो एक सेतु ही टूट कर अदृश्य हो गया। 11 मूक चित्रपट और 200 बोलती फ़िल्मों से हमारा मनोरंजन करने वाले एक समर्थ कलाकार ने इस दुनिया से विदा ले ली

गुरुवार, 21 सितंबर 2023

अजरा

#अज़रा
#जन्म21सितम्बरमुम्बई
अभिभावक पिता- नानूभाई वक़ील, माता- सरोजिनी।
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र हिन्दी सिनेमा
मुख्य फ़िल्में 'मदर इण्डिया', 'जंगली', 'गंगा यमुना', 'भारत की बेटी’, ‘संसार नैया’, ‘दीपक महल’, ‘संस्कार’, ‘ताजमहल’, ‘नया ज़माना’ और ‘सर्कस किंग’ आदि।
प्रसिद्धि भारतीय अभिनेत्री

 1958 में अज़रा जी की फ़िल्म 'टैक्सी 555' प्रदर्शित हुई। प्रदीप कुमार और शकीला की मुख्य भूमिकाओं वाली इस फ़िल्म में वह सहनायिका थीं। 1959 में बनी फ़िल्म ‘घर घर की बात’ में वे नायिका बनीं। इस फ़िल्म का निर्माण उनके मौसा और सलीम शाह के पिता रमणीकलाल शाह ने किया था।
दिल्ली के रहने वाले शेख इमामुद्दीन और उनकी पत्नी मुनव्वर जहां के सात बच्चों में से दो बेटियां रोशनजहां उर्फ़ रानी और उनसे छोटी इशरतजहां 1930 और 1940 के दशक की फ़ैंटेसी फ़िल्मों की स्टार अभिनेत्रियां थीं। रोशनजहां का स्क्रीननेम ‘सरोजिनी’ था। साल 1934 में प्रदर्शित हुई फ़िल्म ‘दीवानी’ से फ़िल्मों में कदम रखने वाली सरोजिनी ने क़रीब 12 साल के कॅरियर में ‘भारत की बेटी’, सुंदरी’, ‘मधु बंसरी’, ‘संसार नैया’, ‘सन ऑफ़ अलादीन’, ‘दीपक महल’, ‘हातिमताई की बेटी’, ‘जादुई कंगन’, ‘संस्कार’, ‘जादुई बंधन’, ‘ताजमहल’, ‘फ़रमान’, ‘नया ज़माना’, ‘श्रीकृष्णार्जुन युद्ध’ और ‘सर्कस किंग’ जैसी फ़िल्मों में काम किया। उसी दौरान उन्होंने फैंटेसी फ़िल्मों के लिए मशहूर निर्माता-निर्देशक नानूभाई वक़ील के साथ गुप्त विवाह भी कर लिया था। अज़रा इन्हीं सरोजिनी और नानूभाई वक़ील की बेटी हैं। अज़रा जी के पिता नानूभाई वकील का निधन 19 दिसम्बर 1980 को हुआ और उनकी मां सरोजिनी 1993 में गुज़रीं।

उधर ‘इंदुरानी’ के नाम से 1936 में बनी मराठी फ़िल्म ‘सावित्री’ से कॅरियर शुरू करने वाली इशरतजहां ने अगले 12 सालों में ‘बुलडॉग’, ‘मेरी भूल’, ‘मि.एक्स’, ‘सुनहरा बाल’, ‘भेदी कुमार’, ‘चश्मावाली’, ‘मिडनाईट मेल’, ‘स्वास्तिक’, ‘हातिमताई की बेटी’, ‘जादुई कंगन’, ‘थीफ़ ऑफ़ तातार’, ‘अलादीन लैला’, ‘बुलबुले बग़दाद’, ‘ताजमहल’ और ‘ज़ेवर’ जैसी कई फ़िल्में कीं। इंदुरानी का विवाह निर्माता-निर्देशक रमणीकलाल शाह से हुआ था। सलीम शाह इन्हीं इंदुरानी के बेटे हैं।
अजरा छठवीं तक की पढ़ाई  सांताक्रुज़ के सेंट टेरेसा कॉन्वेन्ट हाईस्कूल से की और फिर साल 1950 में मैं अपनी नानी के पास दिल्ली चली गयी। क़रीब 5 साल दिल्ली में रहकर उन्होंने पहाड़ी भोजला-चितलीक़बर-जामा मस्जिद के सेंट फ़्रांसिस स्कूल से स्कूली पढ़ाई पूरी की और फिर 1954-1955 में वापस मुम्बई लौट आयी।"

मनुस्मृति

. ................मनुस्मृति.................... जरा सोचिए, अगर आज भारत का कानून यह तय कर दे कि— "एक आम आदमी चोरी करे तो उसे...