सोमवार, 18 सितंबर 2023

रूपेश

रूपेश कुमार हिन्दी फ़िल्मों के एक चरित्र अभिनेता थे, जो खलनायक की भूमिका के लिए प्रसिध्द थे। अपनी फ़िल्मी यात्रा के दौरान उन्होने 100 से अधिक फ़िल्मो मे काम किया। वे अभिनेत्री मुमताज़ के चचेरे भाई थे। 

🎂जन्म: 16 जनवरी 1946, मुम्बई
⚰️मृत्यु : 29 जनवरी 1995, मुम्बई
कुमार का जन्म मुंबई में अब्बास फरशाही के रूप में हुआ था। वह अली असगर फरशाही (पुणे शहर, मंडई के असगर सेठ) और मरियम की सबसे बड़ी संतान थे। वह पुणे के दस्तूर स्कूल के छात्र थे। बचपन से ही उन्हें अभिनय में रुचि थी। उनका परिवार पुणे में रेस्तरां और बेकरी व्यवसाय में था लेकिन उन्होंने अभिनेता बनना चुना। कुमार को प्यार से दादाश (फारसी में भाई का अर्थ) के नाम से जाना जाता था। वह अपनी चचेरी बहन अभिनेत्रियों मुमताज और मलिका के बहुत करीब थे । उनकी सबसे बड़ी बेटी की शादी दिलीप कुमार के भतीजे जाहिद खान से हुई है और उनके दो बच्चे हैं।

29 जनवरी 1995 को, एक पुरस्कार समारोह में भाग लेने के दौरान कुमार को दिल का दौरा पड़ा और उन्हें अस्पताल ले जाया गया। 49 वर्ष की आयु में अस्पताल ले जाते समय एम्बुलेंस में उनकी मृत्यु हो गई।

📽️
1995 पापी देवता कुंदन 
1994 आ गले लग जा 
1993 मेरी आन
1990 पति पत्नी और तवायफ़ 
1990 वर्दी 
1989 गुरु रुपेश 
1989 ज़ुर्रत 
1989 मुज़रिम 
1989 दाता जी 
1988 ज़ख्मी औरत राज 
1988 आखिरी अदालत 
1986 जाल 
1986 इंसाफ़ की आवाज़ 
1986 पाले ख़ान 
1986 मुद्दत 
1985 निशान 
1985 हम दोनों 
1985 प्यार झुकता नहीं
1984 आशा ज्योति 
1984 राम तेरा देश 
1984 माटी माँगे खून 
1983 सौतन 
1983 बड़े दिल वाला 
1982 जानवर
1981 महफ़िल 
1980 दो प्रेमी 
1980 हम पाँच 
1980 सबूत 
1980 यारी दुश्मनी 
1979 सावन को आने दो
1979 अमर दीप 
1979 द ग्रेट गैम्बलर 
1979 मुकाबला 
1979 राधा और सीता
1978 खून की पुकार भीमा 
1978 दिल और दीवार 
1977 जय विजय 
1977 चाचा
1977 कर्म 
1977 दिलदार 
1977 कसम कानून की 
1976 शंकर दादा 
1976 नाच उठे संसार 
1975 दफ़ा 302
1975 धोती लोटा और चौपाटी 
1974 पाप और पुण्य 
1973 प्रभात 
1973 लोफर 
1972 सीता और गीता 
1971 चाहत 
1971 कल आज और कल 
1971 अंदाज़ 
1970 माँ और ममता 
1970 नया रास्ता सूरज
1970 जीवन मृत्यु 
1969 जीने की राह
1969 बंधन 
1968 सपनों का सौदागर

शकीला

शकीला एक भारतीय अभिनेत्री और मॉडल हैं, जिन्होंने मुख्य रूप से दक्षिण भारत के सिनेमा में अभिनय किया है। शकीला ने 18 साल की उम्र में एक सहायक अभिनेत्री के रूप में फ़िल्म प्लेगर्स से शुरुआत की।
🎂जन्म की तारीख और समय:01 जनवरी 1935, अफ़ग़ानिस्तान
⚰️मृत्यु की जगह और तारीख: 20 सितंबर 2017, मुम्बई
पति: वाई॰ एम॰ इलियास (विवा. 1963)
बहन: Noorjahan
भांजियां या भतीजियां: तस्नीम काज़ी, फिरदौस काज़ी, कौसर काज़
शकीला का जन्म नेल्लोर स्थित एक रूढ़िवादी मुस्लिम परिवार में हुआ था। उनकी मां चांद बेगम, आंध्र प्रदेश के नेल्लोर की थीं । उनके छह भाई-बहन थे और उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा मद्रास के छह अलग-अलग स्कूलों से की। उसके दादा एक अफगान थे।
शकीला एक भारतीय अभिनेत्री और मॉडल हैं, जिन्होंने मुख्य रूप से दक्षिण भारत के सिनेमा में अभिनय किया है।शकीला ने 18 साल की उम्र में एक सहायक अभिनेत्री के रूप में फ़िल्म प्लेगर्स (1995) से शुरुआत की। वह लगभग 250 फिल्मों में दिखाई दीं, जिनमें से अधिकांश सॉफ्टकोर थीं,जिसने उन्हें 1990 के दशक के अंत और 2000 के दशक की शुरुआत में एक प्रमुख सेक्स सिंबल बना दिया।
उन्होंने कई बी ग्रेड फिल्मों और सॉफ्ट-पोर्न फिल्मों में अभिनय किया।मलयालम में उनकी एक बड़ी हिट किन्नरथुंबिकाल थी, जिसने उन्हें सुर्खियों में ला दिया था और इसके परिणामस्वरूप युवाओं से लेकर बूढ़े तक के लिए उनके मन में एक अनहोनी हो गई थी। अपनी शुरुआती फिल्मों में उन्होंने कुछ विवादास्पद टॉपलेस सीन किए, जब तक कि वे नज़र नहीं आए। उनकी बी-ग्रेड फिल्मों को लगभग सभी भारतीय भाषाओं में डब और रिलीज़ किया गया। उनकी फिल्मों को नेपाली, चीनी और सिंहल जैसी विदेशी भाषाओं में डब किया गया था। कई फिल्मों में अभिनय करने के बाद, भारत में सॉफ्ट-पोर्न फिल्मों को बोलचाल की भाषा में "शकीला फिल्में" कहा जाने लगा।शकीला ने अपने टॉपलेस सीन करने के लिए एक बॉडी डबल सूर्या भानु को हायर किया।

शकीला 2003 से तमिल, तेलुगु और कन्नड़ भाषा की फिल्मों में पारिवारिक चरित्र भूमिकाओं में दिखाई देने लगीं। उन्होंने अपनी आत्मकथा मलयालम में लिखी, जिसमें उनका परिवार, उनकी पृष्ठभूमि, साथ ही साथ उनके परिचित फिल्मी हस्तियों, राजनेताओं और बचपन के दोस्तों के साथ थे।

जनवरी 2018 में, उसने एक अभिनेता के रूप में अपनी 250 वीं फिल्म शीलवती की घोषणा की, निर्माण शुरू करेगी
2002 में, शकीला ने घोषणा की कि वह अब बी ग्रेड फिल्मों में अभिनय नहीं करेगी। शकीला ने 2013 में अपनी आत्मकथा शकीला: आत्ममाता को रिलीज़ किया।शकीला ने एक ट्रांसजेंडर बेटी थंगम को गोद लिया है।
CID की शकीला का निधन, परियों की रानी के रूप में मशहूर थीं
गुजरे जमाने की मशहूर अभिनेत्री शकीला का निधन हो गया है. वो 82 साल की थी. ब्लैक एंड व्हाइट सिनेमा के दौरान उनका रुतबा किसी सुपरस्टार से कम नहीं था.

रविवार, 17 सितंबर 2023

असित् सेन

असित सेन
🎂जन्म 13 मई, 1917
जन्म भूमि गोरखपुर, उत्तर प्रदेश
⚰️मृत्यु 18 सितम्बर, 1993
पति/पत्नी मुकुल सेन
कर्म भूमि मुम्बई
कर्म-क्षेत्र सिनेमा जगत
मुख्य फ़िल्में '20 साल बाद', 'चांद और सूरज', 'भूत बंगला', 'नौनिहाल', 'ब्रह्मचारी', 'यकीन और आराधना', 'प्यार का मौसम', 'पूरब और पश्चिम' आदि
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी असित सेन ने 200 से अधिक बॉलीवुड फ़िल्मों में हास्य और चरित्र अभिनेता का किरदार निभाकर अपने अभिनय की अलग पहचान बनाई।
असित सेन 

🎂जन्म: 13 मई, 1917, गोरखपुर, उत्तर प्रदेश; 
⚰️मृत्यु: 18 सितम्बर, 1993) 

हिंदी सिनेमा के कॉमेंडी किंग कहे जाते थे। उन्होंने चार दशक तक बॉलीवुड पर चरित्र अभिनेता और हास्य कलाकार के रूप में अपनी खास पहचान बनाकर दर्शकों को अपनी अदाओं से लोट-पोट होने के लिए मजबूर कर दिया। उन्होंने 200 से अधिक बॉलीवुड फ़िल्मों में हास्य और चरित्र अभिनेता का किरदार निभाकर अपने अभिनय की अलग पहचान बनाई। असित सेन ने बांग्ला फ़िल्म 'अमानुष' और 'आनंद आश्रम' सहित अनुसंधान में भी काम किया।

परिचय
असित सेन का जन्म 13 मई, 1917 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर शहर में हुआ था। उन्हें फोटोग्राफी का बहुत शौक था, इसलिए उन्होंने गोरखपुर में सेन फोटो स्टूडियो खोला। असित सेन की पत्नी का नाम मुकुल सेन था, जो कोलकाता की रहने वाली थीं। यहीं पर उनकी तबियत खराब हुई। वह पत्नी को इलाज के लिए बॉम्बे लेकर गए, लेकिन कुछ ही माह के बाद उनकी मौत हो गयी।

असित सेन ने अपने अभिनय की शुरुआत दुर्गाबाड़ी में चलने वाले कई बांग्ला नाटकों में अभिनय से किया। सन 1950 में वह कोलकाता अपने ससुराल गए थे। वहां पर उन्हें एक नाटक कंपनी में एक रोल मिल गया। जब वह प्ले हुआ तो फ़िल्म निर्देशक विमल रॉय उनके अभिनय ने उन्हें खासा प्रभावित हुए और वह उन्हें लेकर मुंबई चले गए।

प्रमुख फ़िल्में
असित सेन ने 200 से अधिक फ़िल्मों में काम किया। जिसमें उनकी 1963 में बनी फ़िल्म 'चांद और सूरज', 1965 में 'भूत बंगला', 1967 में 'नौनिहाल', 1968 में 'ब्रह्मचारी', 1969 में 'यकीन और आराधना', 'प्यार का मौसम', 1970 में 'पूरब और पश्चिम', 'दुश्मन', 'मझली दीदी', 'बुड्ढा मिल गया' जैसी फ़िल्मों में अभिनय किया। 1971 में 'मेरा गांव मेरा देश', 'आनंद', 'दूर का राही', 'अमर प्रेम' जैसी यादगार फ़िल्मों में अभिनय किया। 1972 में 'बॉन्बे टू गोवा', 'बालिका वधू', 1976 में 'बजरंग बली', 1977 में 'आनंद' आश्रम सहित 200 से अधिक फ़िल्मों में अपने हास्य अभिनय और चरित्र किरदार का लोहा मनवाया।

निधन
हास्य कलाकार टुनटुन, जीतेंद्र, राजेश खन्ना, संजीव कुमार और सदी के महानायक अमिताभ बच्चन से उनका खासा दोस्ताना रहा। यह सभी उनके काफी करीब रहे। इनके साथ उन्होंने कई यादगार फ़िल्मों में काम भी किया। असित सेन हास्य अभिनेता के साथ एक सरल हृदय इंसान भी थे। उनका निधन 18 सितंबर, 1993 को 76 साल की उम्र में हो गया।




शबाना आजमी

शबाना आज़मी
🎂जन्म 18 सितम्बर, 1950
जन्म भूमि हैदराबाद, भारत
अभिभावक पिता- कैफ़ी आज़मी, माता- शौकत आज़मी
पति जावेद अख़्तर
प्रख्यात बॉलीवुड पटकथा लेखक जावेद अख्तर और उनकी पत्नी शबाना आजमी जो एक सामाजिक कार्यकर्ता और प्रसिद्ध अभिनेत्री हैं , के कोई संतान नहीं है ।

कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र हिन्दी सिनेमा
मुख्य फ़िल्में 'अंकुर', 'फ़ायर', 'पार', 'अमर अकबर अंथोनी', 'शतरंज के खिलाड़ी', 'अमरदीप', 'अतिथि', 'अर्थ', 'मासूम' तथा 'स्पर्श' आदि।
पुरस्कार-उपाधि 'गांधी इंटरनेशल अवार्ड फॉर पीस', सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का 'राष्ट्रीय पुरस्कार' (पाँच बार),
प्रसिद्धि अभिनेत्री
विशेष योगदान प्रयोगात्मक सिनेमा के भरण-पोषण में शबाना आज़मी का योगदान उल्लेखनीय है। 'फायर' जैसी विवादास्पद फ़िल्म में शबाना ने बेधड़क होकर अपनी अभिनय प्रतिभा का प्रमाण दिया।
नागरिकता भारतीय

 आज़मी ने 1973 में अपने फ़िल्मी कॅरियर की शुरुआत की। उनकी पहली फ़िल्म थी श्याम बेनेगल की 'अंकुर'। अंकुर जैसी आर्ट फ़िल्म की सफलता ने शबाना आज़मी को बॉलिवुड में जगह दिलाने में अहम भूमिका निभाई।
शबाना आज़मी जन्म- 18 सितम्बर, 1950, हैदराबाद, भारत) हिन्दी सिनेमा की प्रसिद्ध अभिनेत्री हैं। वे एक ऐसी मंझी हुई अदाकारा हैं, जो हर अभिनय के अनुरूप उसी साँचे में ढल जातीं हैं। उन्होंने हिन्दी फ़िल्मों में तरह-तरह के रोल अदा किये हैं। वह आज भी फ़िल्मों में सक्रिय हैं। एक अभिनेत्री होने के साथ-साथ शबाना आज़मी सामाजिक कार्यों में भी समान रूप से जुड़ी रहतीं हैं। शबाना आज़मी हिन्दी सिनेमा के मशहूर लेखक और संगीतकार जावेद अख़्तर की पत्नी हैं। अपने दौर में शबाना आज़मी को स्मिता पाटिल की ही तरह श्रेष्ठ अभिनेत्रियों में गिना जाता था।

परिचय
🎂शबाना आज़मी का जन्म 18 सितंबर, 1950 को हैदराबाद में हुआ था। उनके पिता कैफ़ी आज़मी प्रसिद्ध शायर थे। उनके भाई बाबा आज़मी एक सिनेमेटोग्राफर हैं। शबाना आज़मी का बचपन कलात्मक माहौल में बीता। पिता मशहूर शायर कैफ़ी आज़मी और माँ रंगमंच की अदाकारा शौकत आज़मी के सान्निध्य में शबाना आज़मी का सुहाना बचपन बीता। माँ से विरासत में मिली अभिनय प्रतिभा को सकारात्मक मोड़ देकर शबाना ने हिन्दी फ़िल्मों में अपने सफर की शुरुआत की।

विवाह
शबाना आज़मी ने हिन्दी फ़िल्मों के मशहूर लेखक जावेद अख़्तर से विवाह किया। जावेद पहले से शादी-शुदा थे, लेकिन फिर भी शबाना के प्यार में उन्होंने तलाक लेकर शादी की। पति जावेद अख़्तर के सक्रिय सहयोग ने शबाना आज़मी के हौसले को बढ़ाया और वे फ़िल्मों में अभिनय के रंग भरने के साथ-साथ विभिन्न सामाजिक मंचों पर देश और समाज से जुड़ी अपनी चिंताएं अभिव्यक्त करने लगीं।

फ़िल्मी कॅरियर
शबाना आज़मी ने 1973 में अपने फ़िल्मी कॅरियर की शुरुआत की। उनकी पहली फ़िल्म थी श्याम बेनेगल की 'अंकुर'। अंकुर जैसी आर्ट फ़िल्म की सफलता ने शबाना आज़मी को बॉलिवुड में जगह दिलाने में अहम भूमिका निभाई। अपनी पहली ही फ़िल्म के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का 'राष्ट्रीय पुरस्कार' हासिल हुआ था। इसके बाद 1983 से 1985 तक लगातार तीन सालों तक उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा गया। 'अर्थ', 'खंडहर' और 'पार' जैसी फ़िल्मों के लिए उनके अभिनय को राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा गया, जो एक बेहतरीन अदाकारा के लिए सम्मान की बात है।

'अमर अकबर एंथोनी', 'परवरिश', 'मैं आजाद हूं' जैसी व्यावसायिक फ़िल्मों में अपने अभिनय के रंग भरकर शबाना आज़मी ने सुधी दर्शकों के साथ-साथ आम दर्शकों के बीच भी अपनी पहुंच बनाए रखी। प्रयोगात्मक सिनेमा के भरण-पोषण में उनका योगदान उल्लेखनीय है। 'फायर' जैसी विवादास्पद फ़िल्म में शबाना ने बेधड़क होकर अपनी अभिनय प्रतिभा का प्रमाण दिया। भारतीय सिनेमा जगत की सक्षम अभिनेत्रियों की सूची में शबाना आज़मी का नाम सबसे ऊपर आता है। जीवन के छठे दशक में प्रवेश करने के बाद भी शबाना आज़मी की ऊर्जा अतुलनीय है। वे आज भी रुपहले पर्दे पर अपनी सक्रिय उपस्थिति दर्ज कराती हैं। '15 पार्क एवेन्यू' और 'हनीमून ट्रैवेल्स प्राइवेट लिमिटेड' जैसी फ़िल्मों में उनका अभिनय नई पीढ़ी की अभिनेत्रियों पर हावी रहा।

प्रयोगात्मक सिनेमा में योगदान
प्रयोगात्मक सिनेमा के भरण-पोषण में शबाना आज़मी का योगदान उल्लेखनीय है। 'फायर' जैसी विवादास्पद फ़िल्म में शबाना ने बेधड़क होकर अपनी अभिनय प्रतिभा का प्रमाण दिया। वहीं, बाल फ़िल्म 'मकड़ी' में वे चुड़ैल की भूमिका निभाती हुई नजर आईं। यदि 'मासूम' में मातृत्व की कोमल भावनाओं को जीवंत किया तो वहीं, 'गॉड मदर' में प्रभावशाली महिला डॉन की भूमिका भी निभाकर लोगो को हैरत मे डाल दिया। भारतीय सिनेमा जगत की सक्षम अभिनेत्रियों की सूची में शबाना आज़मी का नाम सबसे ऊपर आता है।

सम्मान तथा पुरस्कार
मुंबई की झुग्गी बस्ती में रहने वाले लोगों के लिए कार्य करने के लिए शबाना आज़मी को 'गांधी इंटरनेशल अवार्ड फॉर पीस' प्रदान किया गया। वर्ष 1992-1994 तक वह 'चिल्ड्रन्स फ़िल्म सोसाइटी' की सभापति भी रह चुकी हैं। शबाना आज़मी को पांच बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के 'राष्ट्रीय पुरस्कार' से सम्मानित किया गया है, जो एक रिकॉर्ड है। उन्हें पहली बार 1975 में फ़िल्म 'अंकुर', फिर 1983 में 'अर्थ', 1984 में 'खंडहर', 1985 में 'पार' और 1999 में फ़िल्म 'गॉडफादर' के लिए यह सम्मान दिया गया था।

सामाजिक कार्यकर्ता
किसी ने सच ही कहा है कि जब भी कोई अभिनेत्री कामयाबी की मंजिल तक पहुंचती है तो उसके नाम को कई अभिनेताओं के नाम के साथ जोड़ा जाता है; पर बहुत कम ही अभिनेत्रियां ऐसी होती हैं जो बिना किसी की परवाह किए अपने अंदाज़से जिन्दगी को जीती हैं। उन अभिनेत्रियों में से एक नाम शबाना आज़मी का भी है। सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में भी शबाना आज़मी ने अपनी नई पहचान बनाई। एड्स के प्रति जागरुकता फैलाने में उन्होंने अहम भूमिका निभाई। वे 1997 में राज्य सभा की सदस्या मनोनीत की गईं। एक सांसद के रूप में अपनी जिम्मेदारी गंभीरता के साथ निभाने के साथ-साथ उन्होंने स्वयं को किसी राजनीतिक दल से नहीं जोड़ा। किसी भी गंभीर राष्ट्रीय, सामाजिक मुद्दे पर वे अपने विचार को लेकर मुखर रही हैं।

देव कुमार

देव कुमार
Dev Kumar(1930-1990)
देव कुमार का जन्म 1930 में हुआ था। देव कुमार एक अभिनेता और लेखक थे, जो Namak Halaal (1982), Mukti (1977) और Apradhi (1974) के लिए मशहूर थे। उनकी मृत्यु 17 सितंबर 1990 को हुई थी।

🎂जन्म1930 · Bombay, Bombay
 Presidency, British India

⚰️मृत्यु17 सितंबर 1990 · Bombay [now Mumbai], Maharashtra, भारत

उनके तीन बच्चे हैं जो हमारे जीवन में सभी सफल हैं। पहली संतान मनीषा की शादी दक्ष शेट्टी से हुई है। दूसरी बच्ची दिव्या का एक सफल व्यवसाय है। और तीसरे बच्चे रजनी की भी शादी हो चुकी है, उसकी शादी संजीव राजाध्याक्ष से हुई है और उनका एक बच्चा है जो अब 15 साल का उमा राजाध्याक्ष है। रजनी और संजीव दोनों पशु चिकित्सक हैं, उन दोनों का खार में स्मॉल एनिमल क्लिनिक नामक एक क्लिनिक है।
अपने करियर के लिए उनका नाम चमन लाल कोहली से बदलकर देव कुमार कर दिया।
जीवनी
देव कुमार का जन्म 1930 में बॉम्बे, बॉम्बे प्रेसीडेंसी, ब्रिटिश भारत में हुआ था। वह एक अभिनेता और लेखक थे, जिन्हें नमक हलाल (1982), मुक्ति (1977) और अपराध (1974) के लिए जाना जाता है। 17 सितंबर, 1990 को बॉम्बे [अब मुंबई], महाराष्ट्र, भारत में उनका निधन हो गया।
देव का जन्म 1928 में दामेली जिले के गाँव में हुआ था। झेलम (अब पाकिस्तान में है)।

अभिनेता बनने से पहले सेना, पुलिस बल और सीमा शुल्क एंटी स्मगलिंग में काम किया।

आज उनके पोते (पहली शादी से) की उसी जगह पर एक मेडिकल शॉप है (ऑप खन्ना सिनेमा)।

उनकी पहली पत्नी पहाड़गंज दिल्ली (खन्ना सिनेमा के सामने) रहती थी।

हसरत जय पूरी

प्रसिद्ध गीतकार,शायर हसरत जयपुरी के की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि
🎂जन्म 15 अप्रैल 1922, जयपुर
⚰️मृत्यु: 17 सितंबर 1999, मुंबई
बहन: कोसर जहां 
इनाम: फिल्म फेयर पुरस्कार _ सर्व श्रेष्ठ गीत कार
जन्म नाम: इकबाल अहमद मसऊदी
कला के क्षेत्र में विरासत मिलना बहुत आम है लेकिन, बड़े कलाकार वही बन पाते हैं जो विरासत को सजाने-संवारने में ठीक वैसी ही मशक्कत करते हैं जैसे कोई नया शागिर्द करे. यह बात गीतकार हसरत जयपुरी के लिए भी कही जा सकती है.

जयपुर में 15 अप्रैल, 1918 को जन्मे इकबाल हुसैन उर्फ़ हसरत जयपुरी को शायरी विरासत में मिली थी. उनके नाना फ़िदा हुसैन फ़िदा मशहूर शायर थे. लेकिन शेरो-शायरी को अपनी महबूबा की तरह अपने साथ टिकाये रखने के लिए हसरत को जो जद्दोजहद करनी पड़ी वह हर एक के लिए मुमकिन न थी. यह अलग बात है कि शायरी तो उनके जीवन में टिकी रही पर महबूबा या महबूबाएं नहीं.

वह 1940 का दौर था. कई अन्य महत्वपूर्ण गीतकारों, संगीतकारों और फिल्मकारों की तरह हसरत जयपुरी का भी आगमन फिल्म जगत में हुआ था. ‘बरसात’ फिल्म के बाद का वह कालखंड हसरत जयपुरी की जिंदगी का स्वर्णिम काल था जब उन्होंने ‘आह’, ‘अराउंड द वर्ल्ड’, ‘श्री 420’ और ‘मेरा नाम जोकर’ के गीतों से धूम मचा दी थी.

एक शायर से लेकर बस कंडक्टर बनने, मिट्टी के खिलौने बेचने वाले से फैक्ट्री में मजदूरी करने और इस मजदूरी से लेकर आरके बैनर तले आने तक का हसरत जयपुरी का सफ़र बड़ा दिलचस्प है

अहसानमंदी और गैरतमंदी हसरत जयपुरी के व्यक्तित्व के दो सबसे मजबूत पक्ष थे. वे राज कपूर से लेकर अपने जयपुर के बालपन के मित्रों तक के ताउम्र आभारी रहे. राजकपूर ने उन्हें फिल्मों में पहला ब्रेक दिया था तो बाकी दोस्तों ने इससे पहले उनके गुरबत के दिनों में मुंबई आने के किराए से लेकर जूते-चप्पल और कपड़ों तक की व्यवस्था की थी. और इस अहसान को उन्होंने एक फ़िल्मी सिचुएशन में ही सही, पर क्या खूब अदा किया -‘अहसान मेरे दिल पे तुम्हारा है दोस्तो...’ उनके गैरतमंद होने की बात को कुछ यूं समझा जा सकता है कि राज कपूर की मृत्यु के बाद उनके लिए 5000 रुपये का वजीफा तय किया गया था लेकिन, इसे लेने का उनका मन नहीं हुआ तो नहीं हुआ.

एक शायर से लेकर बस कंडक्टर बनने, मिट्टी के खिलौने बेचने वाले से लेकर फैक्ट्री में मजदूरी करने और इस मजदूरी से लेकर आरके बैनर तले आने तक का हसरत जयपुरी का सफ़र बड़ा दिलचस्प है. हसरत ने जितने मन से गीत और शायरी लिखी, उतनी ही दिलचस्पी से वे अपने हर छोटे-बड़े कामों को भी निभाते रहे.

जयपुर से मुंबई आने के बाद के आठ साल तक चले बस कंडक्टरी के सफ़र को हसरत बड़े ही दिलचस्प ढंग से और मोह से भरकर लगभग हर इंटरव्यू में याद करते थे. इसकी भी एक खास वजह थी. हसरत जयपुरी खूबसूरत चेहरों के कायल थे और हसीन शक्लों के दीदार के लिए बस से बेहतर जगह और कौन सी हो सकती थी! इनमें वे अपनी जयपुर में छूट चुकी खूबसूरत प्रेमिका राधा के अक्स तलाशते फिरते. यहां उनके भीतर के शायर को भरपूर खाद-पानी मिलता रहता. वे दिन भर बस में कंडक्टरी करते और रातों को जागकर उन हसीन चेहरों की याद में गजलें लिखते. सबसे दिलचस्प बात यह कि बस में चढ़ने वाली खूबसूरत सवारियों से उन्होंने कभी किराया नहीं लिया. शायद इसलिए कि उन शक्लों को देखकर उपजने वाले गीत अमूल्य हुआ करते थे.

पृथ्वीराज कपूर ने किसी मुशायरे में हसरत जयपुरी को अपनी कविता ‘मजदूर की लाश’ पढ़ते हुए सुना था. इसी के बाद उन्होंने राज कपूर को उनका नाम सुझाया था

फिल्म गीतकार होने से बहुत पहले हसरत एक मुकम्मल शायर थे. और उनकी यही खूबी उनको प्रतिष्ठित आरके बैनर में शामिल करने का सबब बनी. पृथ्वीराज कपूर ने किसी मुशायरे में उन्हें अपनी कविता ‘मजदूर की लाश’ पढ़ते सुन लिया था. इसे उन्होंने अपने साथ फुटपाथ पर रात बिताने वाले मित्र की मृत्यु पर लिखा था. उन्होंने ही राज कपूर को मशविरा दिया कि हसरत बहुत अच्छा गीत लिखते हैं और वे चाहें तो उन्हें आरके बैनर में शामिल कर सकते हैं. इसके बाद राज कपूर ने उनकी शायरी सुनी. फिर उस लोकगीत पर आधारित धुन शंकर जयकिशन के माध्यम से उन्हें सुनवाई जिसके बोल थे - ‘अमुवा का पेड़ है, वही मुंडेर है. आजा मोरे बालमा तेरा इंतजार है.’ धुन में बंध लिखने की हसरत जयपुरी की यात्रा यहीं से शुरू हुई. इसी तर्ज पर उनका पहला गीत तैयार हुआ - ‘जिया बेकरार है, छाई बहार है, आजा मोरे बालमा तेरा इंतजार है.’

हसरत के लिए फिल्मों में गीत लिखने की यह शुरुआत थी लेकिन गीत-गजल वे इससे पहले भी लिख रहे थे. इन सब में प्रेम के अलग-अलग रंगों को अलग अंदाज में पिरोया गया था. उनके ये सारे गीत-गजल गायकों की पहली पसंद तो बने ही बने फिल्मों में भी उनका प्रयोग धड़ल्ले से होता रहा - ‘ऐ मेरी जाने गजल, चल मेरे साथ ही चल’, ‘जब प्यार नहीं है तो भुला क्यों नहीं देते’, ‘हम रातों को उठ-उठ के जिनके लिए रोते हैं’ और ‘नजर मुझसे मिलाती हो तो तुम शरमा सी जाती हो’, जैसे खूब प्रसिद्ध हुए गीत-गजल इसका पुख्ता उदाहरण हैं.

खुद उन्होंने भी पहले से अपनी लिखी कविताओं और गीतों का प्रयोग फिल्मों में खूब किया. मुंबई आने से पहले की अपनी कथित प्रेमिका ‘राधा’ के लिए लिखा पहला प्रेम पत्र - ‘ये मेरा प्रेमपत्र पढ़कर…’ जहां संगम फिल्म की जान बना, वहीं तबके नौजवानों के लिए उनके प्रेम का मेनिफेस्टो जैसा कुछ भी. बात यहीं ख़त्म नहीं हुई. इसी फिल्म के दूसरे गाने ‘ मेरे मन की गंगा और तेरे मन की जमुना का...’ में बाकायदा उस पूरे परिदृश्य और नाम ‘राधा’ का भी इस्तेमाल गया. इन गीतों को सुनें तो ऐसा लगता है मानो हसरत ने अपनी जिंदगी के हर क्षण को करीने से संजोकर रखा था और जब भी मौका मिला तो उसे गीत में बदल दिया. इसका एक और उदाहरण बेटे अख्तर के जन्म के बाद उसके लिए लिखा गया गया प्यारा सा गीत –‘तेरी प्यारी-प्यारी सूरत को...’ है. विदेश की किसी पार्टी में किसी को देखकर उनके मन में अचानक ही यह खयाल भी आया था - ‘बदन पे सितारे लपेटे हुए’.

हसरत जयपुरी किसी खास तरह के गाने या फिर खाने के लेखक नहीं थे. उनके पास न साहिर वाली तल्खी थी, न फैज या कैफ़ी वाली गहराई. हां दिलकशी और जिंदादिली भरपूर थी. जिंदगी के बहुत कटु और निम्न कहे जाने वाले जीवन अनुभव थे. यहां घोर कलात्मकता नहीं थी पर वह सादादिली और दिलकशी थी जो कड़वे से भी मीठा कुछ निकाल लेती है. रूमानियत उनका सहज स्वभाव थी.

हसरत जयपुरी के शोखी-शरारत भरे चुलबुले शब्द मुकेश की आवाज और राज कपूर की शख्सियत पर कुछ ऐसे फबते थे जैसे परदे पर कोई जादू सा साकार हो रहा हो. इस तिकड़ी में कोई ऐसा तिलिस्म था कि भाव, शब्द आवाज और अदाकारी एक हो जाते थे. उदाहरण के तौर पर - ‘हां मैंने भी प्यार किया...’, ‘ये चांद खिला, ये तारे हंसे…’ जैसे न जाने कितने गीत याद आते हैं.

हसरत साहब की खासियत थी कि उनके एकल गीतों में भी यह जादू खोया नहीं. ‘आंसू भरी हैं ये जीवन की राहें...’, ‘जाऊं कहां बता ऐ दिल...’, ‘दीवाना मुझ को लोग कहें...’, ‘दुनिया बनानेवाले क्या तेरे मन समाई...’, ‘हम छोड़ चले हैं महफ़िल को..’ ये और ऐसे ही कई गीत हर दर्द और तकलीफ में हमें सहज ही याद आते हैं या इन्हें सुनते हुए हम अपनी तकलीफें याद कर लेते हैं.

किसी भी धारा में बहकर और बटकर न लिखने वाला यह लेखक शब्दों से खेलते हुए किसी कुम्हार की तरह नए-नए प्रयोग रचता रहा. वह चाहे शब्दों में तोड़मोड़ हो या अपनी परंपरा से छूट लेकर किए जाने वाले प्रयोग. पहेलियों और लोक-कथाओं के आधार पर रचा गया ‘मेरा नाम जोकर’ का यह गीत - ‘तीतर के दो आगे तीतर, तीतर के दो पीछे तीतर...’ या फिर ‘ईचक दाना बीचक दाना दाने ऊपर दाना...’ सब इसी नया गढ़ने का कौतुक थे.

फिल्मी दुनिया में हसरत जयपुरी के बारे में एक धारणा बन गई थी वे जिस फिल्म का शीर्षक गीत लिखेंगे उसका बेशुमार सफल होना तय है

यही नहीं जो शब्द अब तक कहीं अस्तित्व ही नहीं रखते थे, उन्हें भी गीतों में पिरोकर हसरत जयपुरी ने न सिर्फ उन्हें नए अर्थ दिए बल्कि उनमें मिठास घोल दी. क्या हममें से कोई, ‘रम्मैया वस्तावैया’ या फिर ‘शाहेखुबा’ या ‘जाने-जनाना’ का कोई मुकम्मल अर्थ जानता है? पर गीतों में ये शब्द सार्थक और सजीव हो जाते हैं. दाग के इस मिसरे - ‘तुम मेरे साथ होते हो, गोया कोई दूसरा नहीं होता’ में जब हसरत ‘शाहे खुबा’ और ‘जाने-जनाना’ का तड़का लगाते हैं तो वह कुछ और ही हुआ जाता है. शायद आम लोगों के हिस्से का कुछ. बाद इसके भी कभी जब कहीं शास्त्रीय रचने की जरूरत हुई तो - ‘अजहूं न आए बालमां, सावन बीता जाए…’ और ‘दाग न लग जाए...’ जैसे कई अविस्मरणीय गीत भी उनके ही खाते में आए

फिल्मों के लिए शीर्षक गीत लिखना सबसे कठिन माना जाता है पर हसरत जयपुरी ने इस मुश्किल को कुछ इस सादगी से अंजाम दिया कि एक धारणा सी बन गई थी कि हसरत जिस फिल्म का शीर्षक गीत लिखेंगे उसका बेशुमार सफल होना तय है. यह बस यूं ही नहीं था.ऐसे गीतों का एक लंबा सिलसिला था जिसमें - दीवाना मुझको लोग कहें (दीवाना), दिल एक मंदिर है (दिल एक मंदिर), रात और दिन दिया जले (रात और दिन), एक घर बनाऊंगा (तेरे घर के सामने), दो जासूस करें महसूस (दो जासूस), एन ईवनिंग इन पेरिस (एन इवनिंग इन पेरिस) जैसे न जाने कितने गीत शामिल थे.

1971 तक आरके बैनर की यह मंडली (राज कपूर, हसरत जयपुरी, शैलेन्द्र और शंकर जयकिशन) बदस्तूर चलती रही. कहा जाता है कि एक ही म्यान में दो तलवारें कभी नहीं होती. संगीतकारों और फिल्म लेखकों की जोड़ियां बनना तो हमारे यहां परंपरा सरीखा है लेकिन आरके के बैनर की म्यान में दो गीत लेखकों (तलवारों) का साथ होना किसी अजूबे से कम नहीं था. शैलेंद्र और हसरत जयपुरी दोनों ही टक्कर के प्रतिभाशाली थे और हद दर्जे के संवेदनशील भी. राज कपूर की छतरी के अंदर और बाहर भी वे बार-बार आमने-सामने होते रहे. जैसे ‘हरियाली और रास्ता में’- ‘बोल मेरी तकदीर में क्या है... (हसरत)’, इब्तिदाये इश्क में हम… (शैलेन्द्र)’ , ‘अराऊंड दि वर्ल्ड’ में – ‘दुनिया की सैर कर लो… (शैलेन्द्र)’, ‘चले जाना जरा ठहरो…(हसरत)’. ‘संगम’ – ‘हर दिल जो प्यार करेगा…(शैलेन्द्र)’, ‘ये मेरा प्रेमपत्र पढकर… (हसरत)’. ऐसे और भी मौके आए लेकिन इन दोनों के लिए यह गलाकाट प्रतिस्पर्धा नहीं थी. यदि हम इनके गीतों को देखों तो लगता है कि कहीं न कहीं दोनों ने एक दूसरे को और बेहतर लिखने के लिए ही प्रेरित किया होगा. यह रिश्ता किसी भी क्षेत्र के दो प्रतिस्पर्धियों के लिए एक आदर्श कहा जा सकता है.

जो शब्द अब तक कहीं अस्तित्व ही नहीं रखते थे, उन्हें भी गीतों में पिरोकर हसरत जयपुरी ने न सिर्फ उन्हें नए अर्थ दिए बल्कि उनमें मिठास घोल दी, जैसे - रम्मैया वस्तावैया

1971 से इस चौकड़ी में बिखराव शुरू हो गया. शैलेन्द्र ने ‘तीसरी कसम’ बनाई लेकिन फिल्म बॉक्स ऑफिस पर नहीं चली. शैलेंद्र इसी सदमे में चल बसे. फिर एक बीमारी के चलते जयकिशन की भी मौत हो गई. हसरत जयपुरी को इसका सबसे ज्यादा धक्का लगा. अब चुप्पी उन पर हावी होने लगी थी

उधर ‘मेरा नाम जोकर’ की असफलता ने राज कपूर को भी हिलाया था पर वे फिर उठ खड़े हुए थे. लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और आनंद बक्षी की नई टीम बनाकर वे फिर फिल्मी दुनिया को रंगने लगे थे. मुकेश का जाना भी इसी दरम्यान हुआ.

इस दौर में हसरत के शब्द जैसे चुक गए थे. ‘राम तेरी गंगा मैली’ का शीर्षक गीत उनके हाथ नहीं आया. इसके लिए उन्होंने ‘सुन साहिबा सुन...’ जरूर लिखा था. फिर तकरीबन दस साल के बाद उनके पास शीर्षक गीत लिखने का मौका आया. आरके स्टूडियो की फिल्म हिना के लिए उन्होंने ‘मैं हूं खुशरंग हिना...’ लिखा था. उनके लिखे तमाम शीर्षक गीतों की तरह इस फिल्म और गीत ने फिर कामयाबी का वही इतिहास दुहराया. बाद में भी उन्होंने कुछेक फिल्मों के लिए गाने लिखे लेकिन यह दौर उनका नहीं था. फिर भी जो कुछ वे अपने दौर में फिल्म संगीत के लिए लिख गए वह हमेशा कायम रहने वाला है.

हसरत जयपुरी ने तीन दशक लंबे अपने सिने कैरियर में 300 से अधिक फिल्मों के लिये लगभग 2000 गीत लिखे। अपने गीतों से कई वर्षो तक श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करने वाला यह शायर और गीतकार 17 सिंतबर 1999 को संगीतप्रेमियों को अपने एक गीत की इन पंक्तियों ...तुम मुझे यूं भूला ना पाओगे...

जब कभी भी सुनोगे गीत मेरे
संग संग तुम भी गुनगुनाओगे ..

की स्वर लहरियों में छोड़कर इस दुनिया को अलविदा कह दिया।

शुक्रवार, 15 सितंबर 2023

एम एस सुब्बा लक्ष्मी

एम एस सुब्बुलक्ष्मी

जन्म नाम मदुरै शनमुखावदिवु सुब्बुलक्ष्मी
🎂जन्म 16 सितंबर 1916
मदुरै , मद्रास प्रेसीडेंसी , ब्रिटिश भारत

⚰️मृत 11 दिसंबर 2004
चेन्नई , तमिलनाडु , भारत

शैलियां भारतीय शास्त्रीय संगीत
व्यवसाय शास्त्रीय गायक
आप ने छोटी आयु से संगीत का शिक्षण आरंभ किया और दस साल की उम्र में ही अपना पहला डिस्क रिकॉर्ड किया। इसके बाद आपनी मा शेम्मंगुडी श्रीनिवास अय्यर से कर्णाटक संगीत में, तथा पंडित नारायणराव व्यास से हिंदुस्तानी संगीत में उच्च शिक्षा प्राप्त की। आपने सत्रह साल की आयु में चेन्नई ही विख्यात 'म्यूज़िक अकाडमी' में संगीत कार्यक्रम पेश किया। इसके बाद आपने मलयालम से लेकर पंजाबी तक भारत की अनेक भाषाओं में गीत रिकॉर्ड किये।
अभिनय
श्रीमती सुब्बुलक्ष्मी ने कई फ़िल्मों में भी अभिनय किया। इनमें सबसे यादगार है १९४५ के मीरा फ़िल्म में आपकी मुख्य भूमिका। यह फ़िल्म तमिल तथा हिन्दी में बनाई गई थी और इसमें आपने कई प्रसिद्ध मीरा भजन गाए।

मनुस्मृति

. ................मनुस्मृति.................... जरा सोचिए, अगर आज भारत का कानून यह तय कर दे कि— "एक आम आदमी चोरी करे तो उसे...