शुक्रवार, 15 सितंबर 2023

विजय पाटिल

विजय पाटिल (मूल नाम)
प्रसिद्ध नाम रामलक्ष्मण
🎂जन्म 16 सितंबर, 1942
जन्म भूमि ?
⚰️मृत्यु 22 मई, 2021
मृत्यु स्थान नागपुर, महाराष्ट्र
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र हिन्दी सिनेमा
मुख्य फ़िल्में 'मैंने प्यार किया', 'हम आपके हैं कौन', 'हम साथ साथ हैं', ‘पत्थर के फूल’, ‘100 डेज’, ‘प्रेम शक्ति’, ‘मेघा’ और ‘तराना’ आदि।
विद्यालय भातखंडे शिक्षण संस्थान
प्रसिद्धि संगीतकार
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी मराठी फिल्ममेकर और अभिनेता दादा कोंडके ने रामलक्ष्मण को अपनी फिल्म 'पांडु हवलदार' के लिए बतौर संगीतकार साइन किया था। इसके बाद सूरज बड़जात्या की फिल्मों में उन्होंने कई हिट गाने दिए।
आप जगत के प्रसिद्ध संगीतकार थे। राजश्री प्रोडक्शंस की ब्लॉकबस्टर फ़िल्में- 'मैंने प्यार किया', 'हम आपके हैं कौन' और 'हम साथ साथ हैं' में किये गये अपने काम के लिए वह विशेषतौर पर जाने जाते हैं। संगीतकार रामलक्ष्मण का असली नाम 'विजय पाटिल'  था। वह संगीतकार जोड़ी राम-लक्ष्मण में से एक लक्ष्मण थे। जबकि उनके जोड़ीदार राम यानी की राम सुरेंद्र थे। राम सुरेंद्र की मृत्यु के बाद विजय पाटिल यानी लक्ष्मण ने अपने नाम के साथ राम भी जोड़ लिया और इस प्रकार वह रामलक्ष्मण के नाम से भी जाने-पहचाने गये। उन्होंने 70 से अधिक फिल्मों में संगीत दिया। हिंदी फिल्मों के अलावा रामलक्ष्मण ने मराठी और भोजपुरी फिल्मों के लिए भी काम किया था। रामलक्ष्मण की मुख्य फिल्मों में ‘मैंने प्यार किया’, ‘पत्थर के फूल’, ‘100 डेज’, ‘प्रेम शक्ति’, ‘मेघा’, ‘तराना’, ‘हम आपके हैं कौन’ और ‘हम साथ साथ हैं’ सहित अन्य हैं।
उन्होंने 70 से फिल्मों में संगीत दिया। उन्होंने अपने पिता और चाचा से संगीत की शिक्षा ली थी। बाद में उन्होंने 'भातखंडे शिक्षण संस्थान' में संगीत का अध्ययन किया। हिंदी फिल्मों के अलावा रामलक्ष्मण ने मराठी और भोजपुरी फिल्मों के लिए भी काम किया था। रामलक्ष्मण पहले इंडस्ट्री में ‘लक्ष्मण’ के नाम से जाने जाते थे। इस बीच उन्होंने एक अन्य संगीतकार 'राम' के साथ मिलकर काम करना शुरू कर दिया। हिंदी सिनेमा जगत में राम-लक्ष्मण मिलकर संगीत देते थे। लेकिन साल 1976 में फिल्म ‘एजेंट विनोद’ (1977) में गाना गाने के बाद अचानक संगीतकार राम का निधन हो गया और इसके बाद संगीतकार लक्ष्मण उर्फ विजय पाटिल ने अपना पूरा नाम रामलक्ष्मण रख लिया।

कॅरियर
रामलक्ष्मण ने करीब 150 फिल्मों में संगीत दिया था, जिसमें हिंदी के अलावा मराठी और भोजपुरी भी शामिल है। मराठी फिल्ममेकर और अभिनेता दादा कोंडके ने उन्हें अपनी फिल्म 'पांडु हवलदार' के लिए बतौर संगीतकार साइन किया था। इसके बाद सूरज बड़जात्या की फिल्मों में उन्होंने कई हिट गाने दिए।  'मैंने प्यार किया' (1989)' के गाने सुपरहिट हुए थे। इसके बाद 'हम आपके हैं कौन (1994)' और 'हम साथ साथ हैं' (1999) में भी उन्होंने संगीत दिया था। इस फिल्म के सारे गाने लोग आज भी बहुत पसंद करते हैं। इसके अलावा उन्होंने 'एजेंट विनोद', 'तराना' और 'अनमोल' जैसी फिल्मों में भी संगीत दिया।

अपने चार दशक से अधिक लंबे कॅरियर में उन्होंने हिंदी, मराठी और भोजपुरी में 150 से अधिक फिल्मों के लिए संगीत तैयार किया और मनमोहन देसाई, महेश भट्ट, जीपी सिप्पी, अनिल गांगुली और सूरज बड़जात्या जैसे प्रसिद्ध फिल्म निर्देशकों के साथ काम किया।

रामलक्ष्मण के निधन पर 'स्वर कोकिला' लता मंगेशकर ने भी शोक जताया। दिग्गज गायिका ने संगीतकार लक्ष्मण के निधन पर दु:ख जताते हुए लिखा, 'मुझे अभी पता चला कि बहुत गुणी और लोकप्रिय संगीतकार रामलक्ष्मण जी का स्वर्गवास हो गया है। ये सुन के मुझे बहुत दु:ख हुआ। वो बहुत अच्छे इंसान थे। मैंने उनके कई गाने गाए जो बहुत लोकप्रिय हुए। मैं उनको विनम्रतापूर्ण श्रद्धांजलि अर्पण करती हूं।'

प्रसून जोशी कवि

प्रसून जोशी

🎂जन्म 16 सितम्बर, 1968
जन्म भूमि अल्मोड़ा, उत्तराखंड
अभिभावक देवेन्द्र कुमार जोशी और सुषमा जोशी
कर्म भूमि मुम्बई
कर्म-क्षेत्र गीतकार, लेखक
शिक्षा एम.एस.सी, एम. बी.ए.
पुरस्कार-उपाधि फ़िल्म 'तारे ज़मीं पर' के गाने 'मां...' के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार, शैलेंद्र सम्मान आदि
प्रसिद्धि 'दिल्ली.6’, ‘तारे ज़मीन पर’, ‘रंग दे बस्ती’, ‘हम तुम’ और ‘फना’ जैसी फ़िल्मों में कई सुपरहिट गाने लिखे हैं।
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी प्रसून जोशी विज्ञापन जगत् में "विज्ञापन गुरु" के नाम से विख्यात तो हैं ही इसके साथ ही अन्तर्राष्ट्रीय विज्ञापन कंपनी 'मैकऐन इरिक्सन' में कार्यकारी अध्यक्ष हैं। सिनेमा के प्रसिद्ध गीतकार हैं। प्रसून जोशी विज्ञापन जगत् में 'विज्ञापन गुरु' के नाम से विख्यात तो हैं ही, इसके साथ ही अन्तर्राष्ट्रीय विज्ञापन कंपनी 'मैकऐन इरिक्सन' में कार्यकारी अध्यक्ष हैं। वे इस कंपनी का एशिया महाद्वीप में सजृनात्मक निदेशक की भूमिका निभा रहे हैं। इन व्यवसायिक गतिविधियों के साथ-साथ वे संवेदनशील लेखक, बॉलीवुड में गीत और गज़लों के रचियताओं में उनका नाम शीर्ष पर है। सुपरहिट फ़िल्म ‘तारे ज़मीन पर’ के गाने ‘मां...’ के लिए उन्हें 'राष्ट्रीय पुरस्कार' भी मिल चुका है।
परिचय
प्रसून जोशी का जन्म उत्तराखंड के अल्मोड़ा ज़िले में 16 सितम्बर, 1968 को हुआ था। प्रसून जोशी का पैतृक गाँव दन्या, ज़िला अल्मोड़ा है। प्रसून जोशी के पिता का नाम श्री देवेन्द्र कुमार जोशी और उनकी माता का नाम श्रीमती सुषमा जोशी है। उनका बचपन एवं उनकी प्रारम्भिक शिक्षा  टिहरी, गोपेश्वर, रुद्रप्रयाग, चमोली एवं नरेन्द्रनगर में हुई क्योंकि उनके पिता उत्तर प्रदेश सरकार में 'शिक्षा निदेशक' थे और उनका  कार्यकाल अधिकतर इन्हीं जगहों पर रहा। प्रसून जोशी बचपन से ही प्रकृति, सृष्टि द्वारा सृजित चीजों एवं प्राकृतिक सौन्दर्य के प्रति आकर्षित रहे। इसलिए लेखन उनके स्वभाव में स्वत: ही प्रवेश कर गया। बचपन में वे खुद की हस्तलिखित पत्रिका भी निकालते थे और इस प्रकार लेखन उनका शौक़ बना। जहां तक गीतों की रचना का प्रश्र है उनके माता-पिता संगीत के बहुत ज्ञाता थे। जब उन्होंने उनसे संगीत विरासत में ग्रहण किया और वे उसकी बारिकियों से वाकिफ़ हुए तो फिर वो गीतों के रचनाकार बने। बड़े होकर जब प्रसून जोशी ने व्यवसायिक शिक्षा (एमबीए) पूरी की तब उन्हें लगा कि  उन्हें सृजन को दूसरे माध्यम से भी आगे बढ़ाना चाहिए। यह माध्यम विज्ञापन के अलावा दूसरा नहीं था। काम चाहे लेखन का हो या विज्ञापन का दोनों ही अपनी बात को दूसरों के दिलों तक पहुंचाने का सशक्त माध्यम है।
शिक्षा
प्रसून जोशी की प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा उत्तराखण्ड के गोपेश्वर एवं नरेन्द्रनगर में हुई। उन्होंने एम.एससी., के बाद एम.बी.ए. की पढ़ाई भी की।

शास्त्रीय संगीत की दीक्षा
गीतकार प्रसून के लिखे गीतों से हम सब वाकिफ हैं, पर बहुत कम लोग जानते है कि वो उन्होंने उस्ताद हफीज़ अहमद खान से शास्त्रीय संगीत की दीक्षा भी ले रखी है। उनके उस्ताद उन्हें ठुमरी गायक बनाना चाहते थे। उन दिनों को याद कर प्रसून बताते हैं कि उनके पास रियाज़ का समय नहीं होता था, तो बाईक पर घर लौटते समय गाते हुए आते थे और उनका हेलमेट उनके लिए "अकॉस्टिक" का काम करता था।
कार्य क्षेत्र
प्रसून संगीत को अपना उपार्जन नहीं बना पाये। उनके पिता उन्हें प्रशासन अधिकारी बनाना चाहते थे, पर ये उनका मिज़ाज नहीं था, तो MBA करने के बाद आखिरकार विज्ञापन की दुनिया में आकर उनकी रचनात्मकता को ज़मीन मिली। बचपन से उन्हें हिन्दी और उर्दू भाषा साहित्य में रुचि थी। उनके शहर रामपुर के एक पुस्तकालय में उर्दू शायरों का जबरदस्त संकलन मौजूद था। मात्र 17 साल की उम्र में उनका पहला काव्य संकलन आया। कविता अभी भी उनका पहला प्रेम है। प्रसून मानते हैं कि यदि संगीत के किसी एक घटक की बात की जाए जो आमो ख़ास सब तक पहुँचता हो और जहाँ हमने विश्व स्तर की निरंतरता बनाये रखी हो तो वो गीतकारी का घटक है। 50 के दशक से आज तक फ़िल्म जगत् के गीतकारों ने गजब का काम किया है। "हम तुम", "फ़ना" और "तारे ज़मीन पर" जैसी फ़िल्मों के गीत लिख कर फ़िल्म फेयर पाने वाले प्रसून तारे ज़मीन पर के अपने सभी गीतों को अपनी बेटी ऐश्निया को समर्पित करते हैं, और बताते हैं कि किस तरह एक 80 साल के बूढे आदमी ने उनके लिखे "माँ" गीत की तारीफ करते हुए उनसे कहा था कि वो अपनी माँ को बचपन में ही खो चुके थे, गाने के बोल सुनकर उन्हें उनका बचपन याद आ गया। ए. आर. रहमान के साथ गजनी में काम कर रहे प्रसून से जब रहमान गीत को आवाज़ देने की "गुजारिश" की तो प्रसून ने बड़ी आत्मीयता से कहा कि जिस दिन आप धाराप्रवाह हिन्दी बोलने लगेंगे उस दिन मैं आपके लिए अवश्य गाऊंगा.देखते हैं वो दिन कब आता है।

उपलब्धियां
राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय विज्ञापनों में पुरस्कार। शुभा मुदगल तथा ‘सिल्क रूट’ के ऊपर चार सुपर हिट ‘एलबम्स’ में धुन रचना के लिए पुरस्कार। फ़िल्म ‘लज्जा’, ‘आँखें’, ‘क्यों’ में संगीत दिया। तीन पुस्तकें प्रकाशित कीं। ‘ठण्डा मतलब कोका कोला’ एवं ‘बार्बर शॉप-ए जा बाल कटा ला’ जैसे प्रचलित विज्ञापनों हेतु अन्तर्राष्ट्रीय मान्यता मिली।

सम्मान और पुरस्कार
मशहूर गीतकार प्रसून जोशी को इस क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए आज यहां 'शैलेंद्र सम्मान' प्रदान किया गया। युवा गीतकार प्रसून ने ‘दिल्ली.6’, ‘तारे ज़मीन पर’, ‘रंग दे बस्ती’, ‘हम तुम’ और ‘फना’ जैसी फ़िल्मों के लिए कई सुपरहिट गाने लिखे हैं। यह सम्मान पाने के बाद प्रसून कैफ़ी आज़मी और गुलज़ार की कतार में शामिल हो गये। इन लोगों को पहले शैलेंद्र सम्मान मिल चुका है।
उन्होंने कई हिंदी फ़िल्मों के लिए गाने भी लिखे हैं। सुपरहिट फ़िल्म ‘तारे ज़मीन पर’ के गाने ‘मां...’ के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।

डाली सोही

डॉली सोही धनोवा एक भारतीय टेलीविजन अभिनेत्री हैं, जिन्हें भाभी, कलश जैसे शो में मुख्य भूमिका निभाने के लिए जाना जाता है।मेरी आशिकी तुम से ही और खूब लड़ी मर्दानी झाँसी की रान जैसे शो के साथ डॉली ने टेलीविजन पर वापसी की।
🎂जन्म की तारीख और समय: 15 सितंबर 1975 

जसपाल भट्टी

जसपाल भट्टी हिन्दी टेलिविज़न और सिनेमा के एक जाने-माने हास्य अभिनेता, फ़िल्म निर्माता एवं निर्देशक थे।उन्होंने पंजाब इंजिनियरिंग कॉलेज से विद्युत अभियांत्रिकी की डिग्री ली, लेकिन बाद में वे नुक्कड़ थिएटर आर्टिस्ट बन गए.
🎂जन्म: 03 मार्च 1955, अमृतसर
⚰️मृत्यु: 25 अक्तूबर 2012, शाहकोट
पत्नी: सविता भट्टी (विवा. 1985–2012)
बच्चे: जसराज भट्टी, राबिया भट्टी
माता-पिता: सरदार नरिंदर सिंह भट्टी, मंजित कौर कैलर

हिन्दी टेलिविज़न और सिनेमा के एक जाने-माने हास्य अभिनेता, फ़िल्म निर्माता एवं निर्देशक थे।उन्होंने पंजाब इंजिनियरिंग कॉलेज से विद्युत अभियांत्रिकी की डिग्री ली  लेकिन बाद में वे नुक्कड़ थिएटर आर्टिस्ट बन गए. व्यंग-चित्रकार (कार्टूनिस्ट) जसपाल भट्टी, 80 के दशक के अंत में दूरदर्शन की नई प्रातःकालीन प्रसारण सेवा में उल्टा-पुल्टा कार्यक्रम के माध्यम से प्रसिद्ध हुए थे।उनके इस सबसे लोकप्रिय फ़्लॉप शो को उनकी उनकी पत्नी सविता भट्टी ने प्रोड्यूस किया साथ ही उसमें अभिनय भी किया| इस शो से इससे पहले जसपाल भट्टी चण्डीगढ़ में द ट्रिब्यून नामक अख़बार में व्यंग्य चित्रकार के रूप में कार्यरत थे। एक व्यंग्य चित्रकार होने के नाते इन्हे आम आदमी से जुड़ी समस्याओं और व्यवस्था पर व्यंग्य के माध्यम से चोट करने का पहले से अनुभव था। अपनी इसी प्रतिभा के चलते उल्टा-पुल्टा को जसपाल भट्टी बहुत रोचक बना पाए थे। 90के दशक के प्रारम्भ में जसपाल भट्टी दूरदर्शन के लिए एक और टेलीविज़न धारावाहिक, फ्लॉप शो लेकर आए जो बहुत प्रसिद्ध हुआ और इसके बाद जसपाल भट्टी को एक कार्टूनिस्ट की बजाय एक हास्य अभिनेता के रूप में जाना जाने लगा। 25 अक्टूबर 2012 को सुबह 3बजे जालंधर, पंजाब में एक सड़क दुर्घटना में उनका निधन हो गया।
📽️
2006 फ़ना 
2005 कुछ मीठा हो जाये 
2003 कुछ ना कहो 
2003 तुझे मेरी कसम 
2002 जानी दुश्मन 
2002 कोई मेरे दिल से पूछे 
2002 शक्ति 
2002 ये है जलवा 
2000 हमारा दिल आपके पास है 
2000 खौफ़ 
1999 जानम समझा करो 
1999 काला साम्राज्य 
1999 आ अब लौट चलें 
1999 कारतूस

प्रतिमा पूरी

जन्म
प्रतिमा पुरी हिमाचल प्रदेश के शिमला में एक गोरखा परिवार मे हुआ। उनका जन्म का असली नाम विद्या रावत था। प्रतिमा पुरी छोटे परदे पर आने वाली पहली महिला थी.

प्रतिमा पुरी
जन्म
विद्या रावत
शिमला,पंजाब प्रांत,ब्रिटिश भारत (वर्तमान हिमाचल परदेश, भारत)

⚰️मृत29 जुलाई 2007राष्ट्रीयता भारतीय

पेशा दूरदर्शन पर समाचार एंकर

बच्चे राजा पुरी
योगदान
जब महिलाओं को घूंघट में रखा जाता था। तब प्रतिमा अपनी मधुर और तेज आवाज में देश में घटित खबरों को सुनाती थी। उन्होंने लंबे समय तक दूरदर्शन में काम किया। बाद में वह न्यूज़रीडर बनाने के इच्छुक लोगों के लिए भी प्रशिक्षण देने लगी। इतना ही नहीं उन्हें महान विभूतियों के साक्षात्कार के लिए भी जाना जाता है। जिसमें रूस के यूरी गागरिन का नाम भी शामिल है जो अंतरिक्ष में जाने वाले सबसे पहले व्यक्ति थे।
टेलीविजन की शुरुआत
15 सितंबर 1959 को पहली बार दिल्ली में टेलीविजन की शुरुआत हुई ।
इस ऐतिहासिक दिन के बाद कई बहुत-सी चीज जो बदल गई। संचार और माध्यम का पूरा दृष्टिकोण बदल गया है। जहां जनता को सूचना और मनोरंजन का साधन मिला, वही देश में एक बड़ा उद्योग तैयार हुआ। आज भी यह उद्योग देश की अर्थव्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है .
लेकिन जब भारत में टीवी की शुरुआत हुई थी। तब केवल दूरदर्शन ही एकमात्र चैनल था। जिसे ऑल इंडिया रेडियो की  तहत शुरु किया गया। 15 अगस्त 1965 को आकाशवाणी भवन के स्टूडियो सभागार में नियमित दूरदर्शन प्रसारण शुरू किया गया.
देश का पहला समाचार बुलेटिन पूरे 5 मिनट का था और इसे प्रतिमा पुरी द्वारा प्रस्तुत किया गया था.
ऐसा कहा जाता है कि प्रतिमा ने शिमला में ऑल इंडिया रेडियो स्टेशन से मीडिया में कदम रखा लेकिन बाद में उन्हें दिल्ली भेज दिया गया।
1960 में स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस कार्यक्रम ओबीएन (आउटडोर ब्रॉडकासट) की मदद के बिना शुरू हुआ। स्टूडियो के सभी व्यवस्थाएं प्रधानमंत्री के भाषण स्थल तक पहुंचाई गई और इसी बीच फोर्ड फाउंडेशन की एक सर्वेक्षण टीम भारत में अकादमिक टेलीविजन कार्यक्रम के प्रसारण के संभावना तलाशने के लिए यहां आई थी।
1961 में भारत के पहले स्कूल टीवी प्रसारण सेवा 24 अक्टूबर को शुरू हुई। दिल्ली नगर निगम के तत्वाधान में संचालित सेवा ने विज्ञान से संबंधित कार्यक्रमों का प्रसारण किया।
1962 में टीवी सेट का स्वामित्व केवल 41 लोगों के पास ही था।
1965 में मूल रूप से दूरदर्शन पर 15 अगस्त को प्रसारित आकाशवाणी भवन के स्टूडियो सभागार में शुरू हुई। प्रतिमा पुरी पहली भारतीय टीवी उद्घोषक बनी। हिंदी समाचार सेवा की शुरुआत के साथ टीवी उत्पादकों के दबाव में मनोरंजक कार्यक्रम भी प्रसारित किए गए। टीवी स्टूडियो जर्मनी के सहयोग से स्थापित किया गया था.
1966 में कृषि दर्शन  जैसे कार्यक्रमों की शुरुआत के साथ भारतीय टेलीविजन गांव तक पहुंचाया गया। दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश में ग्रामीणों द्वारा 80 टेलीविजन दर्शक कल्बों स्थापित किए गए थे.
1968 में टीवी प्रतिदिन 2 घंटे की प्रसारण अवधि तक पहुंचाया गया .
1969 में नासा और आणविक ऊर्जा विभाग के साथ एक संयुक्त उद्यम ने भारतीय दर्शकों के लिए उपग्रहीय दिल्ली प्रसारण सेवा को ध्यान में रखते हुए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए.

KK कृष्ण कांत

पुराने जमाने के चरित्र अभिनेता कृष्कान्त उर्फ़ के.के 
के जन्मदिन पर हार्दिक श्रद्धांजलि
🎂जन्म 15 सितंबर 1922
⚰️मृत्यु24 अक्टूबर 2016
कृष्कान्त उर्फ़ के के एक चरित्र अभिनेता थे जिन्होंने  पतिता(1953), डिटेक्टिव (1958) और शर्मीली (1971) जैसी यादगार फिल्मों में काम किया 

कृष्णकांत का जन्म 15 सितंबर 1922 को हावड़ा, बंगाल में हुआ था। जिन्होंन गुजराती और हिंदी सिनेमा दोनों में कई दशकों तक काम किया।  वह फिल्मों से संन्यास लेने के बाद सूरत में रहते थे और उन्हें शहर के गौरव के रूप में जाना जाता था।

1940 में अपनी इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल करने के बाद, कृष्णकांत नवंबर 1942 में बॉम्बे आए और साउंड डिपार्टमेंट में रूपतारा स्टूडियो से जुड़ गए।  उनका इरादा एक अभिनेता बनने का था और कई चरित्र भूमिकाएं कीं, विशेषकर पिता के रूप में।

उन्होंने फिल्म निर्माता नितिन बोस (न्यू थियेटर्स से) के साथ पांच साल तक सहायक के रूप में काम किया  हावड़ा में पले-बढ़े होने के कारण नितिन बोस कृष्कान्त पर काफी  विश्वास करते थे।  बोस ने कृष्णकांत को अपनी फिल्म मशाल (1950) में एक छोटी सी भूमिका दी, फनी मजुमदार के आंदोलन (1951) में किशोर कुमार के साथ काम किया जिससे कृष्कान्त को एक अभिनेता के रूप में पहचान मिली

उन्होंने कई सुपरहिट हिंदी फिल्मों जैसे पतिता (1953), हावड़ा ब्रिज (1958), हाथी मेरे साथी (1971) और शर्मीली(1971) में काम किया।  कृष्णकांत की गुजराती फिल्मों में भी महत्वपूर्ण भूमिकाएँ थीं जैसे गण सुंदरी  घर संसार (1972)।  उन्होंने गुजराती मंच पर काम करने के साथ-साथ भारतीय राष्ट्रीय रंगमंच पर मंच के दिग्गज प्रवीण जोशी के साथ काम किया।  उनके सबसे प्रसिद्ध नाटकों में से एक था कारागार(मनुष्य की मानसिक जेल)।

वयोवृद्ध अभिनेत्री सरिता जोशी, जिन्होंने मानसिक शरण अधीक्षक के डॉक्टर के रूप में dhummasनाटक में उनके साथ काम किया, ने याद किया कि वह फिल्मों में अपने काम के साथ-साथ थिएटर में भी काफी सक्रिय थे उन्होंने दिवंगत अभिनेता के बारे में कहा, “केके बहुत खास थे, वह एक बेहतरीन अभिनेता थे।  वह सभ्य और शिक्षित इंसान थे।  आपने कभी नहीं सोचा होगा कि वह शो व्यवसाय से है। सरिता जोशी की बेटी केतकी दवे ने कृष्णकांत द्वारा निर्देशित फ़िल्म प्रेम लगन (1982) अपने सिने कैरियर की शुरुआत की 

कृष्णकांत ने गुजराती सिनेमा में अपने निर्देशन की शुरुआत की, जिसमें लेखक हरकृष्णा मेहता के उपन्यास प्रवाहा पलताव्यो पर आधारित फिल्म डाकुरानी गंगा (1976) बनाई जिसमे उन्होंने नई अभिनेत्री रागिनी शाह को इंट्रोड्यूस किया।  उन्होंने सुपरहिट Visamo(1977) को अपने करियर की सर्वश्रेष्ठ फिल्म बताया।  अमिताभ बच्चन अभीनीत रवि चोपड़ा द्वारा निर्देशित फिल्म  बागबान (2003) भी इसी नाटक पर आधारित फिल्म थी

बाद के वर्षों में, उन्होंने अंग्रेजी और हिंदी दोनों में टेलीविजन शो में काम किया।  सरिता जोशी बताया  कि कृष्णकांत ने एक टेलीविजन धारावाहिक में अपनी पहली प्रस्तुति में युवा माधुरी दीक्षित को निर्देशित किया था।  बीरेन कोठारी द्वारा संकलित कृष्णकांत के संस्मरणों को उनके जीवन और कैरियर का एक बड़ा वृतांत माना जाता है।

 24 अक्टूबर 2016 में सूरत में उनका निधन हो गया

शरत चंद्र चटोपाध्या

देवदास जैसे उपन्यास के लेखक शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय के जन्मदिन पर हार्दिक श्रधांजलि
🎂जन्म 15 सितम्बर सन् 1876ई 
⚰️मृत्यु 16 जनवरी सन् 1938 ई
शरत चंद्र चट्टोपाध्याय बांग्ला के अमर कथाशिल्पी और सुप्रसिद्ध उपन्यासकार थे। इनका जन्म 15 सितम्बर सन् 1876 ई. को हुगली ज़िले के एक देवानंदपुर गाँव में हुआ था। शरतचंद्र अपने माता-पिता की नौ संतानों में एक थे। शरतचंद्र ने अठ्ठारह साल की उम्र में बारहवीं पास की थी। शरतचंद्र ने इन्हीं दिनों 'बासा' (घर) नाम से एक उपन्यास लिख डाला, पर यह रचना प्रकाशित नहीं हुई कॉलेज की पढ़ाई को बीच में ही छोड़कर वे तीस रुपए मासिक के क्लर्क होकर बर्मा (वर्तमान म्यांमार) पहुँच गए। शरत चंद्र चट्टोपाध्याय की कथा-साहित्य की प्रस्तुति जिस रूप-स्वरूप में हुई, लोकप्रियता के तत्त्व ने उनके पाठकीय आस्वाद में वृद्धि ही की है। शरत चंद्र चट्टोपाध्याय अकेले ऐसे भारतीय कथाकार भी हैं, जिनकी अधिकांश कालजयी कृतियों पर फ़िल्में बनीं तथा अनेक धारावाहिक सीरियल भी बने। इनकी कृतियाँ देवदास, चरित्रहीन और श्रीकान्त के साथ तो यह बार-बार घटित हुआ है।

शरत चंद्र चट्टोपाध्याय यथार्थवाद को लेकर साहित्य क्षेत्र में उतरे थे। यह लगभग बंगला साहित्य में नई चीज़ थी। शरत चंद्र चट्टोपाध्याय ने अपने लोकप्रिय उपन्यासों एवं कहानियों में सामाजिक रूढ़ियों पर प्रहार किया था, पिटी-पिटाई लीक से हटकर सोचने को बाध्य किया था।

शरतचंद्र की प्रतिभा उपन्यासों के साथ-साथ उनकी कहानियों में भी देखने योग्य है। उनकी कहानियों में भी उपन्यासों की तरह मध्यवर्गीय समाज का यथार्थ चित्र अंकित है। शरतचंद्र प्रेम कुशल के चितेरे थे। शरतचंद्र की कहानियों में प्रेम एवं स्त्री-पुरुष संबंधों का सशक्त चित्रण हुआ है। इनकी कुछ कहानियाँ कला की दृष्टि से बहुत ही मार्मिक हैं। ये कहानियाँ शरत के हृदय की सम्पूर्ण भावनाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं। उन्होंने कहानियाँ अपने बालपन के संस्मरण से और अपने संपर्क में आये मित्र व अन्य जन के जीवन से उठाई हैं। ये कहानियाँ जैसे हमारे जीवन का एक हिस्सा है ऐसा प्रतीत होता है।

महात्मा गांधी ने कहा था- "पाप से घृणा करो, पापी से नहीं।" विश्वविख्यात बांग्ला कथाशिल्पी शरत चंद्र चट्टोपाध्याय ने गांधी जी के उपरोक्त कथन को अपने साहित्य में उतारा था। उन्होंने पतिता, कुलटा, पीड़ित दहबी-कुचली और प्रताड़ित नारी की पीड़ा को अपनी रचनाओं में स्वर दिया

शरतचंद्र के मन में नारियों के प्रति बहुत सम्मान था वे नारी हृदय के सच्चे पारख़ी थे। उनकी कहानियों में स्त्री के रहस्यमय चरित्र, उसकी कोमल भावनाओं, दमित इच्छाओं, अपूर्ण आशाओं, अतृप्त आकांक्षाओं, उसके छोटे-छोटे सपनों, छोटी-बड़ी मन की उलझनों और उसकी महत्त्वकांक्षाओं का जैसा सूक्ष्म, सच्चा और मनोवैज्ञानिक चित्रण-विश्लेषण हुआ है, वह अन्यत्र दुर्लभ है

शरतचंद्र का सम्पूर्ण साहित्य नारी के उत्थान से पतन और पतन से उत्थान की करुण कथाओं से भरा पड़ा है। शरतचंद्र अपनी कहानियों में केवल पीडित-प्रताड़ित नारी की पतनगाथा नहीं गाते, सिर्फ़ उसके पतिता और कुलटा हो जाने की कथा नहीं कहते, उसके स्नेह, त्याग, बलिदान ममता और प्रेम की पावन-कथा भी सुनाते हैं। शरतचंद्र की कहानियों में नारी के नीचतम और महानतम दोनों रूपों के एक साथ दर्शन होते हैं। जब शरतचंद्र नारी के अधोपतन की कथा कहते-कहते उसी नारी के उदात्त और उज्ज्वल चरित्र को उद्घाटित करते हैं, तो पाठक सन्न रह जाता है। उसने मन में यह प्रश्न कहीं गहरे घर कर जाता है कि एक ही स्त्री के दो रूप कैसे हो सकते हैं और वह यह नहीं समझ पाता कि आख़िर वह नारी के किस रूप को स्वीकार करे। शरतचंद्र अपनी कहानियों में नारी हृदय की गांठों और गुत्थियों को जिस कुशलता से खोलते हैं, उनकी रचनाओं में नारी का जो बहुरूप सामने आता है, वैसी झलक विश्व-साहित्य में कहीं नहीं मिलती

शरतचंद्र ने अनेक उपन्यास लिखे हैं जिनमें पंडित मोशाय, बैकुंठेर बिल, मेज दीदी, दर्पचूर्ण, अभागिनी का स्वर्ग, श्रीकांत, अरक्षणीया, निष्कृति, मामलार फल, अनुपमा का प्रेम, गृहदाह, शेष प्रश्न, दत्ता, देवदास, ब्राह्मण की लड़की, सती, विप्रदास, देना पावना आदि प्रमुख हैं। इन्होंने बंगाल के क्रांतिकारी आंदोलन को लेकर 'पथेर दावी' उपन्यास लिखा था। कई भारतीय भाषाओं में शरत के उपन्यासों के अनुवाद हुए हैं। शरतचंद्र के कुछ उपन्यासों पर आधारित हिन्दी फ़िल्में भी कई बार बनी हैं। 1974 में इनके उपन्यास 'चरित्रहीन' पर आधारित फ़िल्म बनी थी। उसके बाद देवदास को आधार बनाकर देवदास फ़िल्म का निर्माण तीन बार हो चुका है। पहली देवदास (1936) कुन्दन लाल सहगल द्वारा अभिनीत, दूसरी देवदास (1955) दिलीप कुमार, वैजयन्ती माला द्वारा अभिनीत तथा तीसरी देवदास (2002) शाहरुख़ ख़ान, माधुरी दीक्षित, ऐश्वर्या राय द्वारा अभिनीत है। इसके अतिरिक्त 1974 में चरित्रहीन, परिणीता 1953 और 2005 में भी बनी थी, बड़ी दीदी (1969) तथा मँझली बहन, आदि पर भी चलचित्रों के निर्माण हुए हैं।

शरतचंद्र बाबू ने मनुष्य को अपने विपुल लेखन के माध्यम से उसकी मर्यादा सौंपी और समाज की उन तथाकथित परम्पराओं को ध्वस्त किया, जिनके अन्तर्गत नारी की आँखें अनिच्छित आँसुओं से हमेशा छलछलाई रहती हैं। शरत बाबू ने समाज द्वारा अनसुनी रह गई वंचितों की विलख-चीख और आर्तनाद को परख़ा और यह जाना कि जाति, वंश और धर्म आदि के नाम पर एक बड़े वर्ग को मनुष्य की श्रेणी से ही अपदस्थ किया जा रहा है। उन्होंने अपने लेखन के माध्यम से इस षड्यन्त्र के अन्तर्गत पनप रही तथाकथित सामाजिक 'आम सहमति' पर रचनात्मक हस्तक्षेप किया, जिसके चलते वह लाखों करोड़ों पाठकों के चहेते शब्दकार बने। नारी और अन्य शोषित समाजों के धूसर जीवन का उन्होंने चित्रण ही नहीं किया, बल्कि उनके आम जीवन में आच्छादित इन्दधनुषी रंगों की छटा भी बिखेरी थी। शरत का प्रेम को आध्यात्मिकता तक ले जाने में विरल योगदान है। शरत-साहित्य आम आदमी के जीवन को जीवंत करने में सहायक जड़ी-बूटी सिद्ध हुआ है

प्रसिद्ध उपन्यासकार शरत चंद्र चट्टोपाध्याय की मृत्यु 16 जनवरी सन् 1938 ई. को हुई थी। शरतचंद्र चट्टोपाध्याय को यह गौरव हासिल है कि उनकी रचनाएँ हिन्दी सहित सभी भारतीय भाषाओं में आज भी चाव से पढ़ी जाती हैं। लोकप्रियता के मामले में बंकिम चंद्र चटर्जी और शरतचंद्र रवीन्द्रनाथ टैगोर से भी आगे हैं।

मनुस्मृति

. ................मनुस्मृति.................... जरा सोचिए, अगर आज भारत का कानून यह तय कर दे कि— "एक आम आदमी चोरी करे तो उसे...