मंगलवार, 15 अगस्त 2023

नुसरत फातेफ आली खान

नुसरत फ़तेह अली ख़ाँ
संगीत कार गायक
🎂जन्म 13 अक्टूबर 1948
जन्म भूमि फ़ैसलाबाद, पाकिस्तान
⚰️मृत्यु 16 अगस्त, 1997
मृत्यु स्थान लंदन, इंग्लैंड
अभिभावक फ़तेह अली ख़ाँ
कर्म भूमि पाकिस्तान
कर्म-क्षेत्र संगीतकार और गायक
मुख्य रचनाएँ दमादम मस्त क़लन्दर, छाप तिलक सब छीनी रे, तुम्हें दिल्लगी भूल जानी पड़ेगी आदि।
विषय क़व्वाली, ग़ज़ल
प्रसिद्धि सूफ़ी भक्ति संगीत की विधा क़व्वाली के महानतम गायक थे।
सक्रिय वर्ष 1965–1997
वाद्य यंत्र हारमोनियम
अन्य जानकारी फ़तेह अली ख़ाँ की सबसे बड़ी विशेषता उनका सुरीला सृजन और लगातार गाने की विलक्षण क्षमता थी। फ़तेह अली ख़ाँ को दस घंटे तक लगातार गाने के लिए जाना जाता था
नुसरत फ़तेह अली ख़ाँ
जन्म 13 अक्टूबर 1948
जन्म भूमि फ़ैसलाबाद, पाकिस्तान
मृत्यु 16 अगस्त, 1997
मृत्यु स्थान लंदन, इंग्लैंड
अभिभावक फ़तेह अली ख़ाँ
कर्म भूमि पाकिस्तान
कर्म-क्षेत्र संगीतकार और गायक
मुख्य रचनाएँ दमादम मस्त क़लन्दर, छाप तिलक सब छीनी रे, तुम्हें दिल्लगी भूल जानी पड़ेगी आदि।
विषय क़व्वाली, ग़ज़ल
प्रसिद्धि सूफ़ी भक्ति संगीत की विधा क़व्वाली के महानतम गायक थे।
सक्रिय वर्ष 1965–1997
वाद्य यंत्र हारमोनियम
अन्य जानकारी फ़तेह अली ख़ाँ की सबसे बड़ी विशेषता उनका सुरीला सृजन और लगातार गाने की विलक्षण क्षमता थी। फ़तेह अली ख़ाँ को दस घंटे तक लगातार गाने के लिए जाना जाता था

मनीषा कोइराला

मनीषा कोइराला
🎂: 16 अगस्त 1970 (आयु 52 वर्ष), काठमांडू, नेपाल
पति: सम्राट दहल (विवा. 2010–2012)
दादा या नाना: विश्वेश्वर प्रसाद कोइराला, सुशीला कोइराला
माता-पिता: प्रकाश कोईराला, सुषमा कोइराला
भाई: सिद्धार्थ कोइराला
मनीषा कोइराला नेपाली मूल की भारतीय अभिनेत्रीं हैं। वह हिंदी फिल्मों के अलावा के नेपाली, तमिल, तेलुगु मलयालम फिल्मों में सक्रिय हैं। वह भरतनाट्यम और मणिपुरी नृत्य में भी पूर्ण रूप से पारंगत हैं।

पृष्ठभूमि
मनीषा कोइराला का जन्म 16 अगस्त 1970 को नेपाल के काठमांडू में हुआ था। उनके पिता का नाम प्रकाश कोइराला और माँ का नाम सुषमा कोइराला हैं।  इनके पिता नेपाल राजीनीति में कैबिनेट मंत्री हैं। वह नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री बिश्वेश्वर प्रसाद कोइराला की नातिन हैं। इनका एक भाई है- सिद्धार्थ कोइराला-जोकि एक बॉलीवुड अभिनेता है।

पढ़ाई
मनीषा की शुरूआती पढाई वाराणसी के वंसत कन्या महाविद्यालय से हुई हैं। उसके बाद वह सेकंडरी की पढ़ाई करने के लिए आर्मी स्कूल धौलकुआं नई दिल्ली चली गयीं। मनीषा बचपन से डॉक्टर बन दूसरों की सेवा करने की चाहत थी, लेकिन मॉडलिंग ने उनके लिए फ़िल्मी दुनिया के द्वार खोल दिए।

शादी
मनीषा कोइराला की शादी नेपाली बिजनेसमैंन सम्राट दहाल से 19 जून 2010 को हुई थी। लेकिन यह शादी ज्यादा दिन नहीं टिक सकी, और 2012 में इस जोड़ी ने तलाक ले लिया।

साल 2012 ,में मनीषा लाईलाज बीमारी ओवरी कैंसर से पीड़ित हो गयी। उन्होंने इसका इलाज मुंबई और यूएसए में कराया।  उसके बाद वह इस खतरनाक बिमारी से जीत गयी। 

करियर
मनीषा के फ़िल्मी करियर की शुरुआत साल 1991 में सुभाष घई निर्देशित फिल्म सौदागर से हुई थी। फिल्म में उस समय दो लीजेंड कलाकार राज कुमार- दिलीप कुमार एक साथ बड़े पर्दे पर दिखाई दिए थे। यह फिल्म उस साल की सबसे बड़ी ब्लॉकबस्टर हिट फिल्म साबित हुई थी। पहली ही फिल्म ने कोइराला को रातों रात हिंदी सिनेमा का सुपरस्टार बना दिया था।

मनीषा कोइराला एक गैर-फ़िल्मी परिवार से थीं। उसके बावजूद उन्होंने उस दौर में खुद को अभिनय से हिंदी सिनेमा में सर्वश्रेठ अभिनेत्रीयोँ में शुमार कर लिया था। साल 1996 में पार्थो घोष निर्देशित फिल्म अग्नि साक्षी और निर्देशक संजय लीला भंसाली की फिल्म ख़ामोशी ने मनीषा को इंडस्ट्री की टॉप लीडिंग हीरोइन बना दिया। दोनों ही फिल्मों में मनीषा के दो अलग रूप देखने को मिले। पहली फिल्म अग्नि साक्षी में में मनीषा अपने एक बीमार पति का ध्यान रखते हुए एक पतिव्रता पत्नी के रूप में दर्शायी गयीं। वहींं दूसरी फिल्म खामोशी में वह अपने गूंगे माँ-बाप का ध्यान रखने वाली एक प्यारी सी ऐनी की भूमिका निभाती हुई नजर आयीं। दोनों ही फिल्मों में उनके अभिनय को देख सभी आलोचक दाँतो टेल उँगली दबा गए।

साल 1997 में मनीषा बॉबी देओल और काजोल के अपोजिट फिल्म गुप्त- द हिडन ट्रुथ में नजर आयीं। जो ब्लॉकबस्टर फिल्म साबित हुई थी। इसी साल वह पहली बार बड़े पर्दे पर शाहरुख़ खान के मणि रत्नम की फिल्म दिल से में नजर आयीं।  इस फिल्म ने उन्हें आलोचकों से अच्छी प्रतिक्रिया दिलाई साथ ही उन्हें इस फिल्म के फिल्म फेयर बेस्ट एक्ट्रेस का नामंकन भी मिला।

साल 1999 में वह फिल्म मन और अजय देवगन स्टारर फिल्म कच्चे धागे में नजर आयीं। फिल्म मन उनकी लाजवाब एक्टिंग देख आलोचकों ने उन्हें मीणा कुमार तक की उपाधि दे डाली थी। यह फिल्म उस साल की सबसे बड़ी फिल्मों में से एक फिल्म साबित हुई थी।

साल 2000 में वह मल्टीस्टारर फिल्म लज्जा में नजर आयीं। इस फिल्म में उनका अभिनय काबीले तारीफ था। उसके बाद वह वर्ष 2002 में अजय देवगन स्टारर फिल्म कंपनी में नज़र आयीं। इस फिल्म के लिए उन्हें तीसरा फिल्म फेयर क्रिटिक्स अवार्ड से भी नवाजा गया।

साल 2003 में मनीष काफी लो बजट फिल्मों में नजर ने लगी। इसी साल  केंद्रित फिल्म इस्केप फ्रॉम तालिबान में नज़र आयीं। इस फिल्म के लिए उन्हें बंगाल फिल्म जर्नलिस्ट एसोसिएशन अवार्ड से भी सम्मानित किया गया। उसके बाद वह फिल्म मार्केट में एक जवान बाजारू औरत की भूमिका में दिखाई दी।  इस फिल्म के लिए उन्हें आलोचकों की और बेहद सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली, साथ ही फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर अच्छी कमाई भी की।

कोइराला अभिनेत्री होने के साथ-साथ एक निर्माता भी हैं। उन्होंने फिल्म मेकिंग का डिप्लोमा न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी से किया है। कोइराला ने अपने बैनर के तहत फिल्म पैसा वसूल का निर्माण किया। ऐसी फिल्म जो बॉलीवुड में अब तक नहीं बनी थी। इस फिल्म की लीड हीरोइन सुष्मिता सेन थीं। इस फिल्म की खासियत यह थी कि फिल्म ना तो लव स्टोरी थी और ना ही उसमे कोई भी हीरो था।

साल 2007 में वह फिल्म अनवर में एक सपोर्टिंग एक्ट्रेस के रूप में नज़र आयीं। उन्होंने हिंदी सिनेमा में फिल्म मुंबई एक्सप्रेस से एक जबरदस्त वापसी की। इस फिल्म में वह इरफ़ान खान के साथ नज़र आई। इस फिल्म में उनके अभिनय से दर्शक तो प्रभावित हुए लेकिन फिल्म की ख़राब मार्केटिंग की वजह से फिल्म को बॉक्स-ऑफिस पर औंधे मुंह की खानी पड़ी।

प्रसिद्ध फ़िल्में
मुम्बई एक्स्प्रेस, 1942: अ लव स्टोरी, इंसानियत के देवत, य़लगार, सौदागर, मिलन, दुश्मनी, अनोखा अंदाज़, यूंही कभी, लाल बादशाह, कच्चे धागे, कारतूस, जय हिन्द, लावारिस, मन, ताजमहल,कंपनी,जानी दुश्मन, लज्जा, चैम्पियन, खौफ़,बाग़ी। 

सैफ अली खान

 सैफ अली खान
🎂16 अगस्त 1970 
पत्नी: करीना कपूर (विवा. 2012), अमृता सिंह (विवा. 1991–2004)
बच्चे: सारा अली खान, इब्राहीम अली खान, जहांगीर अली खान पटौदी
माता-पिता: शर्मिला टैगोर, मंसूर अली ख़ान पटौदी
बहन: सोहा अली ख़ान, सबा अली खान
खान ने अपने अभिनय की शुरुआत परंपरा (1993) से की। वह 90 के दशक में एकल मुख्य फिल्मों के साथ हिट अर्जित करने में असफल रहे और उन्हें केवल मल्टी-स्टारर ये दिल्लगी (1994), मैं खिलाड़ी तू अनाड़ी (1994), कच्चे धागे (1999) और हम साथ-साथ हैं (1999) में दुर्लभ सफलता मिली। . यह 2000 का दशक था जब खान ने स्लीपर हिट क्या कहना (2000) से शुरुआत करके एक स्थापित अभिनेता के रूप में अपनी क्षमता साबित की और रोमांटिक कॉमेडी-ड्रामा दिल चाहता है (2001) और कल हो ना हो (2003) के लिए कई प्रशंसाएं जीतीं। इसके अलावा आलोचनात्मक और व्यावसायिक सफलता हम तुम (2004), परिणीता (2005) से मिली।सलाम नमस्ते (2005) और ता रा रम पम (2007)।

खान ने एक हसीना थी (2004) में एक चालाक व्यवसायी , अंग्रेजी फिल्म बीइंग साइरस (2006) में एक प्रशिक्षु और ओमकारा (2006) में एक खलनायक की भूमिका निभाने के लिए भी आलोचनात्मक प्रशंसा अर्जित की। मुख्य भूमिका में उनकी सबसे बड़ी हिट फिल्मों में रेस (2008), लव आज कल (2009), कॉकटेल (2012) और रेस 2 (2013) शामिल हैं। खराब प्रदर्शन वाले उपक्रमों की एक और श्रृंखला के बाद, खान को नेटफ्लिक्स की पहली मूल भारतीय श्रृंखला सेक्रेड गेम्स (2018) और ऐतिहासिक नाटक तन्हाजी (2020) में मुख्य प्रतिद्वंद्वी के रूप में सराहा गया , जो उनकी सबसे अधिक कमाई वाली रिलीज है।

खान को कई प्रकार की फिल्म शैलियों में उनके प्रदर्शन के लिए जाना जाता है - अपराध नाटकों से लेकर एक्शन थ्रिलर और कॉमिक रोमांस तक। फिल्म अभिनय के अलावा, खान नियमित टेलीविजन प्रस्तोता, स्टेज शो कलाकार और प्रोडक्शन कंपनियों इलुमिनाती फिल्म्स और ब्लैक नाइट फिल्म्स के मालिक हैं।

शास्त्रीय संगीत कार आमिर खान जी

महान शास्त्रीय गायक उस्ताद अमीर खान साहब के जन्मदिन पर हार्दिक श्रधांजलि
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उस्ताद अमीर ख़ाँ भारत के प्रसिद्ध शास्त्रीय संगीत गायक थे। उस्ताद अमीर ख़ाँ को कला के क्षेत्र में भारत सरकार द्वारा, सन 1971 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था।

उस्ताद अमीर ख़ाँ का जन्म 15 अगस्त ,1912 को इंदौर में एक संगीत परिवार में हुआ था। पिता शाहमीर ख़ान भिंडी बाज़ार घराने के सारंगी वादक थे, जो इंदौर के होलकर राजघराने में बजाया करते थे। उनके दादा, चंगे ख़ान तो बहादुर शाह ज़फ़र के दरबार में गायक थे। अमीर अली की माँ का देहान्त हो गया था जब वे केवल नौ वर्ष के थे। अमीर और उनका छोटा भाई बशीर, जो बाद में आकाशवाणी इंदौर में सारंगी वादक बने, अपने पिता से सारंगी सीखते हुए बड़े होने लगे। लेकिन जल्द ही उनके पिता ने महसूस किया कि अमीर का रुझान वादन से ज़्यादा गायन की तरफ़ है। इसलिए उन्होंने अमीर अली को ज़्यादा गायन की तालीम देने लगे। ख़ुद इस लाइन में होने की वजह से अमीर अली को सही तालीम मिलने लगी और वो अपने हुनर को पुख़्ता, और ज़्यादा पुख़्ता करते गए। अमीर ने अपने एक मामा से तबला भी सीखा। अपने पिता के सुझाव पर अमीर अली ने 1936 में मध्य
प्रदेश के रायगढ़ संस्थान में महाराज चक्रधर सिंह के पास कार्यरत हो गये, लेकिन वहाँ वे केवल एक वर्ष ही रहे। 1937 में उनके पिता की मृत्यु हो गई। वैसे अमीर ख़ान 1934 में ही बम्बई (अब मुम्बई ) स्थानांतरित हो गये थे और मंच पर प्रदर्शन भी करने लगे थे। इसी दौरान वे कुछ वर्ष दिल्ली में और कुछ वर्ष कलकत्ता (अब कोलकाता ) में भी रहे, लेकिन देश विभाजन के बाद स्थायी रूप से बम्बई में जा बसे। उस्ताद अमीर ख़ान के गायकी का
जहाँ तक सवाल है, उन्होंने अपनी शैली अख़्तियार की, जिसमें अब्दुल वाहिद ख़ान का विलंबित अंदाज़, रजब अली ख़ान के तान और अमन अली ख़ान के मेरुखण्ड की झलक मिलती है। इंदौर घराने के इस ख़ास शैली में
आध्यात्मिक्ता, ध्रुपद और ख़याल के मिश्रण मिलते हैं। उस्ताद अमीर ख़ान ने "अतिविलंबित लय" में एक प्रकार की"बढ़त" ला कर सबको चकित कर दिया था। इस बढ़त में आगे चलकर सरगम, तानें, बोल-तानें, जिनमें मेरुखण्डी अंग भी है, और आख़िर में मध्यलय या द्रुत लय, छोटा ख़याल या रुबाएदार तराना पेश किया। उस्ताद अमीर ख़ान का यह मानना था कि किसी भी ख़याल कम्पोज़िशन में काव्य का बहुत बड़ा हाथ होता है, इस ओर उन्होंने 'सुर रंग' के नाम से कई कम्पोज़िशन्स ख़ुद लिखे हैं। अमीर ख़ान ने तराना को लोकप्रिय
बनाया। झुमरा और एकताल का प्रयोग अपने गायन में करते थे, और संगत देने वाले तबला वादक से वो साधारण ठेके की ही माँग करते थे

उस्ताद अमीर ख़ाँ साहब हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के उस ऐसे फ़नकार थे, जिन्हें कभी भुलाया नहीं जा सकता।
इंदौर घराने के उस्ताद अमीर ख़ाँ साहब, जिन्हें ख़याल का अज़ीम-ओ- शान शहंशाह माना जाता है। इसके
बावजूद कि ख़ाँ साहब इंदौर रियासत के आसपास पले-बढ़े, उनके पिता और दादा जी उसी रियासत में संगीत के
रूप में मुलाजिम थे, जिस वजह से उन्होंने अपने घराने को इंदौर का नाम दिया। उनकी गायन शैली में कोई रियासत वाली सोच या प्रोत्साहन नहीं था, बल्कि उनकी शैली में एक ऐसा वैराग्य सुनने में आता है, जिससे आसानी से पता चल जाता है कि असल में और आख़िर तक वे सूफ़ी ही थे। उस्ताद अमीर ख़ाँ रूहानी तौर पर अपने आपको अमीर ख़ुसरो के घराने से जोड़ते थे, एक ऐसी परंपरा, जिसमें गाने-बजाने वाले संगीतकार लोग सूफ़ी संतों के आसपास एक अलौकिक झुंड बनाकर बैठे रहते और उनके काउल और बचन गाते। जहां मौसीकी और संगीत को इबादत का एक जरिया माना जाता। और जैसे-जैसे उस्ताद अमीर ख़ाँ साहब अपने वक़्त के
कलाकारों को सुनने लगे, उन्होंने अपनी ही सोच से एक ऐसी शैली का निर्माण किया, जो रियासत के फंडों से कोसों दूर भाग चली आई, जहां संगीत की परिभाषा ध्यान और इबादत ही थी। यहां राजाओं और महाराजाओं को रिझाने वाली बात न थी, न महाराजा की नजर में दूसरे कलाकारों से बाजी मारने वाली बात। न संगीत के सामान का कोई प्रदर्शन भी। देखा जाए तो गायकी की इस अनोखी खोज को यदि एक शब्द में कहा जाए तो वह शब्द था सादगी, जो सूफियों की भाषा में एक जबर्दस्त पहुंचा हुए शब्द माना जाता है। आवाज़ की अलग-अलग किस्में होती हैं, और इन अलग-अलग किस्मों से ही ख़याल गायकियां बनीं, लेकिन उस्ताद अमीर ख़ाँ साहब की आवाज़ की कोई किस्म ही न थी। वह तो सिर्फ एक अधूरी भाव से बनी। आप गले को फाड़ कर आवाज़ बाहर की तरफ़ न फेंके। आप आवाज़ को अपने अंदर लगाएं, जब तक उसे कोई अंदर से न पकड़ ले। एक बार यह हो जाए, फिर आप की आवाज़ सुनाई दे, जैसे भी सुनाई दे। इस स्वर की कोई शर्त ही नहीं थी। न यह स्वर समझता, न ही सुंदर ही बनाने की कोशिश करता। न यह स्वर कोई ड्रामा करता, न ऊपरी तौर से श्रृंगारिक बनने की कोशिश रखता। इस स्वर से तो कोई गाता रहता और इसी स्वर लगाव से उस्ताद अमीर ख़ाँ, अमीर ख़ाँ बने। सूफ़ियों की भाषा में इसे फ़ना कहते हैं, अपने आप में पहले मिट जाना, फिर उस मिटने में से उसको ज़िंदा रखना। हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के लिए यह गर्व की बात है कि उस्ताद अमीर ख़ाँ साहब के बाद, कई पीढ़ियां- गाने वाले और बजाने वाले- उन्हें पागलपन की हद तक मोहब्बत करने लगे। एक वक़्त ऐसा आया, जब दूरदराज, उनके संगीत को सुने बिना, अब गाना- बजाना ही नामुमकिन हो गया था। सच बात तो यह है कि सुई का कोना पूरी प्रदक्षिणा कर चुका था।

उस्ताद अमीर ख़ाँ की प्रतिभा के अस्वीकार का आरंभ तो उसी समय हो गया था, जब वे शास्त्रीय संगीत के एक
दक्ष गायक बनने के स्वप्न से भरे हुए थे और रायगढ़ दरबार में एक युवतर गायक की तरह अपनी अप्रतिम प्रतिभा के वलबूते संगीत-संसार में एक सर्वमान्य जगह बनाने में लगे हुए थे। एक बार उनके आश्रयदाता ने उन्हें मिर्जापुर में सम्पन्न होने वाली एक भव्य-संगीत सभा में प्रतिभागी की बतौर भेजा, ताकि वे वहाँ जाकर अपनी गायकी की एक प्रभावकारी उपस्थिति दर्ज करवा के
लौटें। लेकिन, उन्होंने जैसे ही अपना गायन शुरू किया चौतरफा एक खलबली-सी होने लगी और रसिकों के
बीच से उनके विरोध के स्वर उठने लगे, जो जल्द ही शोरगुल में बदल गये। उस संगीत- सभा में प्रसिद्ध गायक इनायत खाँ, फैयाज ख़ाँ और केशरबाई भी अपनी
प्रस्तुतियाँ देने के लिए मौजूद थे।हालाँकि इन वरिष्ठ गायकों ने समुदाय से आग्रह करके उनको सुने जाने
की ताक़ीद भी की लेकिन असंयत-श्रोता समुदाय ने उनके उस निवेदन की सर्वथा अनसुनी कर दी। इस घटना से हुए अपमान-बोध ने युवा गायक अमीर ख़ाँ के मन में ‘अमीर‘ बनने के दृढ़ संकल्प से साथ दिया। वे जानते थे, एक गायक की‘सम्पन्नता‘, उसके ‘स्वर‘ के साथ ही साथ
‘कठिन साधना‘ भी है। नतीजतन, वे अपने गृह नगर इन्दौर लौट आये, जहाँ उनकी परम्परा और पूर्वजों की पूँजी दबी पड़ी थी। उनके पिता उस्ताद शाहमीर ख़ाँ थे, जिनका गहरा सम्बन्ध भिण्डी बाजार घराने की प्रसिद्ध
गायिका अंजनीबाई मालपेकर के साथ था। वे उनके साथ सारंगी पर संगत किया करते थे। पिता की यही
वास्तविक ख्वाहिश भी थी कि उनका बेटा अमीर ख़ाँ अपने समय का एक मशहूर सारंगी वादक बन जाये। उन्हें
लगता था, यह डूबता इल्म है। क्योंकि,सारंगी की प्रतिष्ठा काफ़ी क्षीण थी और वह केवल कोठे से जुड़ी महफिलों का अनिवार्य हिस्सा थी, लेकिन वे यह भी जानते थे कि मनुष्य के कण्ठ के बरअक्स ही सारंगी के स्वर हैं। और उनके पास की यह पूँजी पुत्र के पास पहुँच कर अक्षुण्ण हो जाएगी। बहरहाल, पुत्र की वापसी से उन्हें एक किस्म की तसल्ली भी हुई कि शायद वह फिर से अपने पुश्तैनी वाद्य की ओर अपनी पुरानी और परम्परागत आसक्ति बढ़ा ले। लेकिन, युवा गायक ‘अमीर‘ के अवचेतन जगत में मिर्जापुर की संगीत- सभा में हुए अपमान की तिक्त-स्मृति थी, ना भूली जा सकने किसी ग्रन्थि का रूप धर चुकी थी, जिसके चलते वह कोई बड़ा और रचनात्मक-जवाब देने की जिद पाल चुका था। वह अपने उस ‘अपमान’ का उत्तर ‘वाद्य’ नहीं, ‘कण्ठ’ के जरिये ही देना चाहता था। बहरहाल, यह एक युवा सृजनशील-मन के गहरे आत्म- संघर्ष का कालखण्ड था, जहाँ उसे अपने ही भीतर से कुछ ‘आविष्कृत’ कर के उसे विराट बनाना था। नतीजतन, उसने स्वर-साधना को अपना अवलम्ब बनाया, और ऐसी साधना ने एक दिन उसको उसकी इच्छा के निकट लाकर छोड़ दिया। शायद इसी की वजह रही कि बाद में, जब अमीर खाँ साहब देश के सर्वोत्कृष्ट गायकों की कतार में खड़े हो गये तो बड़े-बड़े आमंत्रणों और प्रस्तावों को वे बस इसलिए अस्वीकार कर दिया करते थे कि ‘वहाँ आने-जाने में उनकी ‘रियाज‘ का बहुत ज़्यादा नुक़सान हो जायेगा।

फ़िल्म संगीत में भी उस्ताद अमीर ख़ान का योगदान उल्लेखनीय है। ' बैजू बावरा', 'शबाब', 'झनक झनक पायल बाजे', 'रागिनी', और 'गूंज उठी शहनाई'
जैसी फ़िल्मों के लिए उन्होंने अपना स्वरदान किया। बंगला फ़िल्म'क्षुधितो पाशाण' में भी उनका गायन सुनने को मिला था।

एक सड़क दुर्घटना में उस्ताद अमीर ख़ाँ साहब को 13 फ़रवरी , 1974 के दिन हम से हमेशा हमेशा के लिए विदा हो गये।

प्रमोद चक्रवर्ती

प्रसिद्ध फ़िल्म निर्देशक प्रमोद चक्रवर्ती के जन्मदिन पर हार्दिक श्रद्धांजलि
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प्रमोद चक्रवर्ती 
🇮🇳15 अगस्त 1929 
⚰️12 दिसंबर 2004
एक भारतीय हिंदी फिल्म निर्माता और निर्देशक थे।
प्रमोद चक्रवर्ती का जन्म 15 अगस्त 1929 को पश्चिम बंगाल, भारत में हुआ था।  वह 1958 में फिल्म 12 ओ'क्लॉक के साथ निर्माता बने

चक्रवर्ती को हिंदी फिल्म क्लासिक्स जैसे ज़िद्दी, लव इन टोक्यो, तुमसे अच्छा कौन है जैसे रोमांटिक शैली की फिल्में और जुगनू (1973), जागीर और शत्रु जैसी एक्शन फिल्मों के निर्देशन के लिए जाना जाता है।  उन्होंने गुरु दत्त और जॉनी वॉकर के साथ 12 ओ क्लॉक जैसी सस्पेंस फिल्मों का निर्देशन भी किया और मधुबाला और प्रदीप कुमार के साथ पासपोर्ट जैसी थ्रिलर का भी निर्देशन किया।  उन्होंने धर्मेंद्र और हेमा मालिनी को जुगनू, नया ज़माना, ड्रीम गर्ल और आज़ाद फ़िल्मों में रोमांटिक जोड़ी के रूप में निर्देशित किया गंगू (1962), दीदार, और बारूद (1998) को अपवाद स्वरूप छोड़ दिया जाए तो उनकी अधिकांश निर्देशन वाली फिल्में  हिट थी  1976 में, उन्होंने राजेश खन्ना, परवीन बाबी और शोमा आनंद के साथ फिल्म चमत्कार की शूटिंग शुरू कर दी थी, लेकिन 45 प्रतिशत की शूटिंग के बाद फिल्म को निर्माताओं द्वारा बीच में ही रोक दिया गया था।  बाद में उन्हें भारत बांग्लादेशी फ़िल्म शत्रु (1986) में शबाना के साथ राजेश खन्ना को निर्देशित करने का अवसर मिला।  उन्होंने 1975 में वारंट में देव आनंद और जीनत अमान का निर्देशन भी किया था। वह निर्देशक हैं जिन्होंने पहली बार अक्षय कुमार को दीदार के साथ मुख्य नायक के रूप में साइन किया था, भले ही सौगंध अक्षय की पहली रिलीज़ फ़िल्म थी।  अभिनेता प्राण प्रमोद चक्रवर्ती द्वारा निर्देशित लगभग सभी फिल्मों में शामिल रहते थे।  उनके निर्देशन में बनी 16 फिल्में बॉक्स ऑफिस पर हिट रहीं।

अशोक मेहता

प्रसिद्ध सिनेमैटोग्राफर अशोक मेहता की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि
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अशोक मेहता 
🎂1947 
⚰️15 अगस्त 2012
एक प्रसिद्ध राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार विजेता भारतीय फिल्म छायाकार थे, जिन्हें बैंडिट क्वीन (1994), 36 चौरंगी लेन (1981) और उत्सव (1984) जैसी फिल्मों के लिए जाना जाता है।उन्होंने दो बार सर्वश्रेष्ठ सिनेमैटोग्राफी के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीता, फ़िल्म 36 चौरंगी लेन (1981) और मोक्ष (2000) के लिये
 बाद में उन्होंने फ़िल्म निर्देशन भी किया।

उन्होंने सुभाष घई (राम लखन (1989), सौदागर (1991)) और राजीव राय (गुप्त (1997), मुकुल आनंद (त्रिमूर्ति (1995)) जैसे मुख्यधारा के बॉलीवुड के निर्देशकों के साथ-साथ समानांतर सिनेमा निर्देशकों के साथ काम किया जैसे श्याम बेनेगल (त्रिकाल (1985), मंडी (1983)), अपर्णा सेन (36 चौरंगी लेन (1981), परोमा (1984))।  उन्होंने शेखर कपूर की बैंडिट क्वीन (1994), गिरीश कर्नाड की उत्सव (1984), गुलज़ार की इजाज़त (1987) और एमएफ हुसैन की गज गामिनी (2000) सहित कई फिल्मों में भी काम किया।

अशोक मेहता 14 साल की उम्र में घर से भाग गये और मुंबई आ गये  बिना पैसे, किसी परिचित और आश्रय के उनके पास कुछ भी नहीं था और जीवित रहने के लिए उन्होंने उबले अंडे, फल आदि सामान बेचना शुरू कर दिया। बॉलीवुड में उनकी यात्रा एक कैंटीन बॉय, ऑफिस बॉय और फिर एक कैमरा अटेंडेंट के रूप में शुरू हुई।  भारतीय फिल्म उद्योग में एक दशक के लंबे संघर्ष के बाद, वह आखिरकार डीओपी बन गए।  सिनेमैटोग्राफर के रूप में उन्हें पहला ब्रेक 25 साल की उम्र में राज मार्ब्रोस की द विटनेस में मिला।  वह अपने वास्तविक करियर को बढ़ावा देने का श्रेय 1970 के दशक के स्टार शशि कपूर को देते हैं।  शशि कपूर, जो मेहता द्वारा शूट की जा रही एक फिल्म में अभिनय कर रहे थे, उनके काम से बहुत प्रभावित हुए और भले ही फिल्म अंततः नहीं बनी, मगर  मेहता को शशि कपूर ने अपने अगले प्रोडक्शन, 36 चौरंगी लेन की पेशकश की।  मेहता के लिए अगला कदम खुद को मुख्यधारा के सिनेमा में स्थापित करना था और यह अवसर अभिनेत्री राखी के माध्यम से आया।  परोमा के फिल्मांकन के दौरान ही राखी अशोक मेहता और उनके काम से परिचित हुई, लेकिन यह सालों बाद हुआ  जब लोकप्रिय फिल्म निर्देशक सुभाष घई अपने मेगा-प्रोजेक्ट राम लखन के लिए एक कैमरामैन की तलाश में थे रखी ने मेहता का नाम सुझाया।  इसके बाद अशोक मेहता ने लोकप्रिय फिल्म दृश्य पर कदम रखा और घई के सहयोग से, लोकप्रिय सिनेमा में रोशनी और शॉट लेने की एक पूरी तरह से अलग शैली अपनायी  उन्हें प्यार से बॉलीवुड में "गाइडिंग लाइट" के रूप में जाना जाता है।

2012 की शुरुआत में, उन्हें फेफड़ों के कैंसर का पता चला था।  जब वे फेफड़ों के कैंसर का इलाज करा रहे थे, तब उन्हें ब्रेन ट्यूमर का पता चला था।  सर्जरी और कैंसर के बावजूद, उन्होंने फिल्मों के रूप में काम करना कभी नहीं छोड़ा और सिनेमैटोग्राफी उनका जुनून और पहला प्यार था।  उन्होंने 15 अगस्त 2012 को 64 वर्ष की आयु में मुंबई में कैंसर के कारण उनका निधन हो गया

सिंपल कपाड़िया

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फ़िल्म अभिनेत्री कॉस्ट्यूम डिजायनर सिंपल कपाड़िया के जन्मदिन पर हार्दिक श्रधांजलि
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सिंपल कपाड़िया 
🎂15 अगस्त 1958 
⚰️10 नवंबर 2009
एक हिंदी फिल्म अभिनेत्री और कॉस्ट्यूम डिजाइनर थीं, जो 1987 से  2009 अपनी मृत्यु तक फ़िल्म इंडस्ट्री में  सक्रिय रहीं।

सिंपल का जन्म 15 अगस्त 1958 में हुआ उनके पिता का नाम चुन्नीभाई और माता का नाम बेटी कपाड़िया था।  तीन भाई-बहनों के साथ उनकी परवरिश हुई  बड़ी बहन डिंपल कपाड़िया, छोटी बहन रीमा कपाड़िया (जो ड्रग के अधिक सेवन से मर गईं) और एक भाई  सुहैल (मुन्ना) कपाड़िया है

सिंपल कपाड़िया ने अपने अभिनय कैरियर की शुरुआत 1977 में 18 साल की उम्र में  फिल्म अनुरोध में सुमेर माथुर की भूमिका से अपने जीजा, अभिनेता राजेश खन्ना के साथ की उन्होंने जीतेन्द्र के साथ शक्का और चक्रव्यूह में अभिनय किया

उन्होंने लुटमार, ज़माने को दिखाना है, जीवन धारा और दूल्हा बिकता है में सहायक भूमिकाएँ निभाईं1985 में उन्होंने शेखर सुमन के साथ कला फिल्म रहगुज़र में अभिनय किया।  उनका आखिरी अभिनय 1987 में परख के लिए एक आइटम गीत था

अपने अंतिम अभिनय के बाद, वह एक कॉस्ट्यूम डिजाइनर बन गईं, और सनी देओल, तब्बू, अमृता सिंह, श्रीदेवी और प्रियंका चोपड़ा सहित अभिनेताओं के लिए कॉस्ट्यूम  डिज़ाइन किया 

1994 में उन्होंने रुदाली में अपनी पोशाक डिजाइन के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार जीता  बाद में उन्होंने रो सको तो रोक लो और शहीद सहित भारतीय फिल्मों के लिए भी कॉस्ट्यूम डिज़ाइन किया

सिंपल कपाड़िया को 2006 में कैंसर का पता चला था लेकिन दर्द के बावजूद काम करना जारी रखा 10 नवंबर 2009 को अंधेरी, मुंबई में 51 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।

मनुस्मृति

. ................मनुस्मृति.................... जरा सोचिए, अगर आज भारत का कानून यह तय कर दे कि— "एक आम आदमी चोरी करे तो उसे...