सोमवार, 7 अगस्त 2023

नंदनी सिंह


नंदिनी सिंह

भारतीय अभिनेत्री

🎂जन्मतिथि: 07-अगस्त -1980

जन्म स्थान: लखनऊ, उत्तर प्रदेश, भारत

व्यवसाय: अभिनेतरी, टेलीविजन और फिल्म
इन्होंने हिंदी फिल्मों और हिंदी धारावाहिकों दोनों में काम किया है। नंदिनी ने छह साल की उम्र में 1986 में फिल्म जुंबिश में एक बाल कलाकार के रूप में अपना करियर शुरू किया, उन्होंने प्लेटफॉर्म (1993) और एक और एक ग्यारह (2003) में काम किया। उन्हें एकता कपूर की लोकप्रिय हिट श्रृंखला केसर में केसर के रूप में प्रसिद्धि मिली , जो 2004 से 2007 तक स्टार प्लस पर प्रसारित हुई और एकता कपूर के एक अन्य भारतीय सोप ओपेरा, काव्यांजलि (2005) में प्रसारित हुई। वह आर्यन्स के एक संगीत वीडियो, "देखा है तेरी आँखों को" में भी दिखाई दीं। अभिनेत्री की सबसे हालिया उपस्थिति फिल्म में थीटीटू एमबीए , लेखक सिमरन के रूप में 2015 में रिलीज़ हुई। उन्होंने सावधान इंडिया के एक एपिसोड में भी काम किया है ।
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प्लेटफ़ॉर्म (1993 फ़िल्म)
एक और एक ग्यारह
कुछ दिल ने कहा
लो मैं आ गया
उपन्यास लेखक सिमरन के रूप में टीटू एमबीए
बा नल्ले मधुचंद्रके कन्नड़ फिल्म
शुभलग्ना कन्नड़ फिल्म
किडनैप कन्नड़ मूवी
भैरव कन्नड़ फिल्म

प्यारेलाल संतोषी

प्रसिद्ध निर्देशक, लेखक,गीतकार पी एल संतोषी की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि
🎂जन्म: 07 अगस्त 1916
⚰️07 सितंबर 1978 में मुम्बई में उनका निधन हो गया
पी.एल.संतोषी, यानी आज के ख्यातनाम फिल्मकार राजकुमार संतोषी के पिता, अपने दौर के कामयाब लेखक, निर्देशक और गीतकार थे। उनका कमाल यह था कि लोग फिल्म भले याद न रख पाए हों, पर उनके गीत कभी नहीं भूल पाएंगे..
ये जो फिल्मी दुनिया है न, बड़े कमाल की दुनिया है। बहुत सारी बातें तो हम लोग यहीं बैठ कर कर चुके हैं। आपने कुछ और भी सुन रखी होंगी। मतलब कमाल है। कभी अर्श पर तो कभी फर्श पर। और कभी-कभी तो उससे भी बदतर।
पी एल संतोषी अपने दौर के एक ऐसा कामयाब फिल्मसाज थे, जिसकी फिल्मों में सिनेमा घरों की टिकट खिड़की पर दौलत की बरसात हुई, लेकिन एक दिन उन्हें ख़ुद दिवालिया होना पड़ा। जिसने जमाने को अपने हुनर से दीवाना बना दिया था, एक दिन ख़ुद दीवाना बनकर अपनी ख़ुदी को नीलाम कर बैठे
पहले  हम लोग पी एल संतोषी के कुछ ख़ूबसूरत नग्मे  सुन लें।
आना मेरी जान-2, संडे के संडे’ (चितलकर-शमशाद बेगम), ‘जवानी की रेल चली जाए रे’ (गीता राय (दत्त), चितलकर-लता), और ‘मार कटारी मर जाना, वे अंखियां किसी से मिलाना ना’(अमीरबाई कर्नाटकी- फिल्म- शहनाई 1947), ‘किस्मत हमारे साथ है, जलने वाले जला करें’ (खिड़की 48), ‘जब दिल को सताए ग़म-2, छेड़ सखी सरगम’, (लता-सरस्वती राणो) ‘कोई किसी का दीवाना न बने’ (लता), और ‘बाप भला ना भैया, भैया सबसे भला रुपैया’ (सरगम- 1950), ‘जो दिल को सताए, रुलाए, जलाए, ऐसी मोहब्बत से हम बाज आए’ और ‘महफिल में जल उठी शमा परवाने के लिए / प्रीत बनी है दुनिया में जल जाने के लिए’ (लता- निराला-50), ‘तुम क्या जानो, तुम्हारी याद में, हम कितना रोए’, (लता- शिनशिनाकी बूबलाबू-52), ‘अच्छा होता जो दिल में तू आया न होता / हाय रुलाना था गर’ ‘हम पंछी एक डाल के’ (रफी-आशा), ‘लो छुप गया चंद, बहे हवा मंद-मंद’ (आशा भोंसले) और ‘एक से भले दो, दो से भले चार, मंजिल अपनी दूर है, रस्ता करना पार’ (हम पंछी एक डाल के -57), ‘ओ नींद न मुझको आए, दिल मेरा घबराए, चुपके-चुपके कोई आ के, सोया प्यार जगाए’, ‘कोई आ जाए-2, बिगड़ी तक़दीर बना जाए’ और ‘मेरे दिल में है इक बात, कह दो तो भला क्या है’ (सम्राट चंद्रगुप्त -58)।
हम आज श्रद्धांजलि दे रहे है अपने दौर के बेहद कामयाब लेखक, निर्देशक और गीतकार। आज के प्रसिद्ध फिल्मकार राजकुमार संतोषी के पिता
किस्सा थोड़ा पुराना है लेकिन यहां बताना जरूरी है। मध्यप्रदेश के जबलपुर में एक फिल्म की शूटिंग के दौरान एकाएक किसी ऐसे बंदे की जरूरत आन पड़ी जिसे हिंदी आती हो। पता चला पी एल श्रीवास्तव नाम का लड़का है जो लिखने पढ़ने में तेज है। उसे बुलाया गया। लोगों को उसका काम पसंद आया और वह फिल्म यूनिट के साथ बंबई चला आया है। ये बात है सन 1930 के आसपास की। बाद में इस लड़के ने अपने सरनेम से श्रीवास्तव उड़ाया है और बन गया पी एल संतोषी। वही पी एल संतोषी जिन्होंने हिंदी सिनेमा को दिया 1946 में फिल्म ‘हम एक हैं’ में दिया एक नया सितारा, देव आनंद।
बीसवीं सदी का यह एक ऐसा दौर था, जब गूंगे सिनेमा ने नया-नया बोलना सीखा था। इसके बोलने में जादू था। ऐसा जादू जिसकी जद में छोटे-बड़े, अमीर-ग़रीब सब आ चुके थे। संतोषी की मंजिल भी यही थी। वे फिल्मों में अभिनय के साथ लेखक, गीतकार, निर्देशक, निर्माता सब कुछ बनना चाहते थे। उनके सौभाग्य से बंबई में उन्हें नरगिस की मां जद्दन बाई का साथ मिल गया। वे उनके निजी सहायक बन गए।
जद्दन बाई कुछ अरसा पहले ही कलकत्ता छोड़कर बंबई आई थीं। गाने-बजाने का काम छोड़कर फिल्में बनाने और अपने साथ अपनी नन्ही सी बेटी नरगिस, जिसका नाम उस व़क्त था बेबी फातिमा था, का भविष्य बनाने। जद्दन बाई के घर मुल्क के बड़े-बड़े लेखकों, शायरों और हर तरह के फनकारों की महफिलें लगभग हर शाम जमती थीं।
फिल्में भी बन रही थीं। इन्ही में से एक फिल्म ‘मोती का हार’(1937) में संतोषी को भी एक छोटी भूमिका मिल गई। इस फिल्म का संगीत, निर्माण, निर्देशन सब कुछ जद्दन बाई का ही था। फिल्म में नरगिस ने बेबी रानी के नाम से बाल कलाकार की भूमिका निभाई थी और संतोषी ने अभिनय के साथ फिल्म के कुछ गीत भी लिखे थे।
एक गीत था ‘मन के वासी, मन में आओ / मेरे हृदय की वीणा पर ऐसा गीत सुनाओ’ और दूसरा ‘ऐसा बाग़ लगाया, फूलों में जिसके छुपकर, ये मेरा मन मुस्काया’।
इसी साल जद्दन बाई की ही एक और फिल्म ‘जीवन स्वप्न’ के चार गीतों के गीतकार के रूप में संतोषी का नाम मिलता है। इसके बाद वे रणजीत मूवीटोन पहुंच गए। यहां से वे बॉम्बे टाकीज की फिल्मों में गीत लिखने पहुंच गए।
1942 में रिलीज हुई बॉम्बे टाकीज की फिल्म ‘बसंत’ के लिए लिखे संतोषी के गीतों ने उस दौर में धूम मचा दी। महान बांसुरी वादक पन्नालाल घोष (पर्दे के पीछे से अनिल बिस्वास भी साथ में) के गीतों ने भारी धूम मचाई। पारुल घोष और साथियों के गाए ‘तुमको मुबारक हो ऊंचे महल ये/ हमको तो प्यारी, हमारी गलियां’, ‘कांटा लागो रे साजनवा, मोसे राह चली न जाय’, ‘आया बसंत सखी, बिरहा का अंत सखी’ जैसे गीत आज भी संगीत रसिकों के लिए कर्णामृत का काम करते हैं।
1946 में पहली बार वे निर्देशक-गीतकार के रूप में सामने आए। फिल्म थी ‘हम एक हैं’। इस फिल्म की ख़ास बात यह है कि इसी फिल्म से देव आनंद, अभिनेता रहमान और अभिनेत्री रेहाना पहली बार पर्दे पर आए थे। इस फिल्म की दूसरी ख़ास बात है गुरु दत्त, जो इस फिल्म में बतौर निर्देशक सतोषी के पांचवें सहायक थे और साथ ही फिल्म की कोरियोग्राफी मतलब नृत्य निर्देशन भी उन्होंने ही किया था।
1947 में फिल्मिस्तान के लिए बनाई ‘शहनाई’ तो सुपरहिट साबित हुई। इसके गीत-संगीत (सी.रामचंद्र और संतोषी) ने तो संगीत का एक नया ट्रेंड ही चालू कर दिया। संतोषी के इन हिट गीतों में बहुत ही चलताऊ शब्दों की भरमार थी, लेकिन उस दौर के साथ इन गीतों का ऐसा तादात्म्य पैदा हुआ कि लोगों में उनका असर आज भी ख़त्म नहीं हुआ है।
आना मेरी जान संडे के संडे’ तो आज भी बहुत लोकप्रिय है। इस गीत की एक और मजेदार बात यह है कि फिल्म ‘शहनाई’ में यह गीत हास्य अभिनेता महमूद के पिता मुमताज अली पर फिल्माया गया है। इसमें वे चार्ली चैप्लिन वाली मुद्राओं में इस गीत को गाते हुए दिखाई देते हैं।
इस फिल्म के 21 साल बाद 1968 में महमूद पर अपने पिता की तरह ही चार्ली चैप्लिन वाले अंदाज में इसी गीत से प्रेरित होकर रची गई सिचुएशन और शब्दों वाला गीत फिल्माया गया है। फिल्म ‘औलाद’ में मन्ना डे-आशा भोंसले का गाया ‘जोड़ी हमारी, जमेगा कैसे जानी’ सुनकर देखें। वही हिंदी-इंगलिश की खिचड़ी, वही मुहावरा। ‘तुमको भी मुश्किल, मुझे भी परेशानी / बात मानो संैया बन जाओ, हिंदुस्तानी’। उधर असल गीत में है ‘मैं धरम करम की नारी / तू नीच विदेसी अभिचारी’।
महमूद और उनके ख़ानदान से संतोषी का बड़ा मजबूत रिश्ता रहा है। संतोषी की फिल्मों में अक्सर मुमताज अली दिखाई दे जाते थे और महमूद ख़ुद उस व़क्त उनके ड्राइवर थे। महमूद की जिंदगी पर संतोषी का हर अच्छा-बुरा असर बाद में दिखाई भी दिया। जिसकी कभी और बात करेंगे।
अभी तो इतना और तो बता ही सकता हूं न कि महमूद ने इस गीत की ही तरह एक और गीत, बल्कि पूरी फिल्म संतोषी के गीत से प्रभावित होकर क्रिएट की। फिल्म ‘सरगम’(50) में संतोषी ने लिखा था ‘बाप भला न भैया, भैया सबसे भला रुपैया’।
महमूद ने 26 साल बाद अपनी फिल्म ‘सबसे बड़ा रुपैया’ में ख़ुद ही गाया ‘ना बीवी न बच्चा, ना बाप बड़ा ना भैया/ द होल थिंग इज दैट कि भैया, सबसे बड़ा रुपैया’। इसके 30 साल बाद इसी गीत को आज के दौर के कामयाब संगीतकार विशाल-शेखर ने उठाकर अपनी फिल्म ‘ब्लफ मास्टर’ में नए सिरे से सजाकर इस्तेमाल किया और इसे अभिषेक बच्चन पर फिल्माया गया है।
इसी तरह अगर आप थोड़ा सा और याद करें, तो आपको याद आएगा कि फिल्म ‘प्यार किए जा’ (66) में महमूद एक जगह अपने डायलॉग में पिता (ओमप्रकाश) से कहता है कि वह एक नहीं अनेक प्रोडक्शन कंपनीज खोलेगा। इनके नाम होंगे ‘हा-हा प्रोडक्शन, हो-हो प्रोडक्शन, ही-ही प्रोडक्शन। संतोषी ने 1955 में इस नाम की एक फिल्म बनाई थी।
ख़ैर तो किस्सा कोताह यह कि शहनाई के पीछे-पीछे ‘खिड़की’ (48), ‘सरगम’ (50) जैसी हिट फिल्में बनाकर संतोषी ने बाजार में अपना सिक्का जमा लिया। निर्माता उसे फिल्में बनाने और गीत लिखने के लिए मुंहमांगे पैसे देते और संतोषी? वे उस पैसे में आग लगा देते। कैसे? अभी दो मिनट बाद बताता हूं। पहले जरा बतौर निर्देशक उनकी कुछ और फिल्मों को याद कर लें।
अपनी छाया’ (50),‘छम छमा छम’(52), शिनशिनाकी बूबलाबू’ (52), चालीस बाबा एक चोर (53), ‘सबसे बड़ा रुपैया’ (55), ‘हा-हा,ही-ही,हू-हू’ (55), ‘हम पंछी एक डाल के’ (57), ‘गरमा गरम’(57), ‘पहली रात’(59), ‘नई मां’(60), ‘बरसात की रात’(60), ‘ऑपेरा हाऊस’ (61), ‘हॉलीडे इन बॉम्बे’ (63), ‘दिल ही तो है’(64), ‘क़व्वाली की रात’ (64) और आखि़र में ‘रूप रुपैया’ (68)। इन फिल्मों में से कुछ में उनके और कुछ में अन्य गीतकारों के गीत थे। पटकथा और संवाद लेखक के तौर पर भी उनकी कई फिल्में हैं।
1941 की अशोक कुमार की ‘झूला’ में शाहिद लतीफ और ज्ञान मुखर्जी के साथ मिलकर पटकथा और संवाद लिखे, तो ‘स्टेशन मास्टर’ (42) की कहानी। इस फिल्म में उन्होंने नौशाद के साथ गीत भी लिखे हैं। बतौर संवाद लेखक मुझे उनकी एक उल्लेखनीय फिल्म और याद आती है- राजश्री पिक्चर्स की 1973 की फिल्म ‘सौदागर’। अमिताभ बच्चन और नूतन की इस फिल्म में अगर आपको याद हों तो कुछ अच्छे संवाद थे।

7 सितंबर 1978 में मुम्बई में उनका निधन हो गया

केष्टो मुखर्जी

केष्टो मुखर्जी - वह अभिनेता जो बॉलीवुड के आधिकारिक शराबी का पर्याय बन गया !!
🎂7 अगस्त 1925 
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- 2 मार्च 
_3 मार्च 1982
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 दिलीप कुमार, अमिताभ बच्चन और शाहरुख खान, बॉलीवुड के सुपरस्टार होने के अलावा इन तीनों में एक और बात समान है और वह यह है कि ये तीनों कलाकार शराबी की भूमिका को शानदार ढंग से निभाने के लिए जाने जाते हैं! दिलीप कुमार और शाहरुख खान ने देवदास में अपनी भूमिकाओं के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार जीता है, जबकि शराबी के रूप में अमिताभ बच्चन की महारत को किसी प्रमाणन की आवश्यकता नहीं है! अमर अकबर एंथोनी में उनका मिरर एक्ट उनकी कला के बारे में बहुत कुछ बताता है, लेकिन भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक ऐसा अभिनेता भी है, जिसके शराबी के रूप में अभिनय ने फिल्म प्रेमियों को आश्चर्यचकित कर दिया है - हाँ, आपने सही अनुमान लगाया है - वह कोई और नहीं बल्कि केश्टो मुखर्जी हैं। वह अभिनेता जो बॉलीवुड के आधिकारिक शराबी का पर्याय बन गया !!
आश्चर्यजनक रूप से वास्तविक जीवन में एक शराबी (एक ऐसा व्यक्ति जो कभी शराब का सेवन नहीं करता) केश्टो मुखर्जी ने एक शराबी अभिनय को इतनी भव्यता और अधिकार के साथ चित्रित किया कि अमिताभ बच्चन और शाहरुख खान जैसे अभिनेताओं ने भी उनके अभिनय को सलाम किया और खुले तौर पर उनके प्रदर्शन से प्रेरित होने की बात कबूल की। जिस चीज़ ने केस्टो को शराबी अभिनय के लिए प्रेरित किया, वह थी सहज हँसी के साथ उनकी अविश्वसनीय संवाद अदायगी - अरे अरे ! इसके अलावा, उसकी मासूम अभिव्यक्ति, उसकी आँखों की भेंगापन और उसके चेहरे पर लटकते बालों के पतले कर्ल ने केक पर चेरी जोड़ दी!!!
30 साल के करियर में उन्होंने शोले, पड़ोसन, बॉम्बे टू गाओ, केस्टो, चुपके-चुपके, चाचा भतीजा, आजाद, इंकार, गोल माल, खूबसूरत परिचय, आप की कसम आदि जैसी कई हिट फिल्में कीं। लिस्ट लंबी है।
1950केष्टो मुखर्जी की खोज फिल्म दिग्गज ऋत्विक घटक ने की थी
सत्यजीत रे और मृणाल सेन के साथ भारत में कला सिनेमा में क्रांति लाने वाले बंगाल फिल्म के दिग्गज ऋत्विक घटक ने वर्ष 1952 में केष्टो मुखर्जी की खोज की । यह फिल्म नागरिक, एक बंगाली फिल्म थी, जो भारतीय सिनेमा की पहली कला फिल्म थी। लेकिन अफ़सोस आर्थिक तंगी के कारण फिल्म में देरी हुई और 24 साल बाद 1977 में रिलीज़ हुई!!! इस प्रकार यह फिल्म केष्टो मुखर्जी के लिए बेकार साबित हुई । हालाँकि फ़िल्म रिलीज़ नहीं हुई, लेकिन फ़िल्म प्रतिभा ऋत्विक घटक के साथ काम करने की केष्टो मुखर्जी की योग्यता ने अद्भुत काम किया। फ़िल्म निर्माता उनके साथ सम्मानपूर्वक व्यवहार करते थे!!
केष्टो मुखर्जी की प्रतिभा को हृषिकेश मुखर्जी ने पंख दिये
हृषिकेश मुखर्जी पहले फिल्म निर्माता थे जिन्होंने केष्टो मुखर्जी की कॉमेडी में विश्वास दिखाया और उन्हें अपनी दिलीप कुमार अभिनीत फिल्म मुसाफिर (1953) में एक छोटी सी कॉमेडी भूमिका दी। फिल्म औसत हिट रही लेकिन केष्टो मुखर्जी एक कुशल हास्य अभिनेता के रूप में अपना प्रभाव छोड़ने में सफल रहे। इसलिए हृषिकेश मुखर्जी ने उन्हें अपनी अगली राज कपूर अभिनीत फिल्म आशिक (1962 फिल्म) और देव आनंद अभिनीत असली नकली (1963) में दोहराया। दोनों ही फिल्में हिट रहीं. इस प्रकार हृषिकेश मुखर्जी और केष्टो मुखर्जी की कभी न खत्म होने वाली यात्रा शुरू हुई. दोनों ने मझली दीदी (1967) जैसी कई हिट फिल्मों में एक साथ काम किया।
चुपके चुपके (1975), गोल माल (1979), खुबसूरत (1980) आदि।
1960केष्टो मुखर्जी फिल्म दिग्गज बिमल रॉय के भी पसंदीदा बन गए
हृषिकेश मुखर्जी द्वारा अपनी सामाजिक ड्रामा फिल्मों में केष्टो मुखर्जी को मौका देने के बाद , अनुभवी फिल्म निर्माता बिमल रॉय केष्टो मुखर्जी की महारत और हंसी पैदा करने की उनकी जन्मजात प्रतिभा से बहुत प्रभावित हुए । चूंकि बिमल रॉय गंभीर सामाजिक विषयों पर संजीदा फिल्में बनाते थे इसलिए वह एक अच्छे हास्य अभिनेता की तलाश में थे जो उनकी फिल्म में हंसी का तड़का लगा सके और उसे हल्का बना सके। इस प्रकार केश्टो मुखर्जी को महान अभिनेता मोतीलाल और साधना अभिनीत उनकी फिल्म परख (1960) में फिल्म निर्माता बिमल रॉय के साथ काम करने का सौभाग्य मिला । फिल्म जबरदस्त हिट रही और यहीं से दोनों के रिश्ते की शुरुआत हुईकेष्टो मुखर्जी और बिमल रॉय । दोनों ने प्रेम पत्र (1962) में काम किया।
1970
फिल्म निर्देशक असित सेन ने केष्टो मुखर्जी में 'शराबी' की खोज की
केश्टो मुखर्जी के शराबी के रूप में मशहूर होने से पहले , 50 के दशक में मशहूर हास्य अभिनेता जॉनी वॉकर ने इस कला में महारत हासिल की थी। लेकिन 60 और 70 के दशक के जॉनी वॉकर टॉप के कॉमेडियन बन चुके थे जिन्होंने एक ही फिल्म के लिए धमाका कर दिया था. 70 के दशक की शुरुआत में बंगाल के फिल्म निर्माता असित सेन , जिन्होंने सफर , बैराग , ममता , अनोखी रात और खामोशी जैसी हिट फिल्में बनाईं, नूतन और जीतेंद्र को लेकर सामाजिक पारिवारिक ड्रामा मां और ममता (1970) बना रहे थे । महमूद और जगदीप के बाद सेदोनों प्रसिद्ध हास्य कलाकार अन्य कार्यों में व्यस्त थे इसलिए फिल्म निर्देशक असित सेन ने केष्टो मुखर्जी को एक शराबी की भूमिका की पेशकश की ।
दिलचस्प बात यह है कि केस्टो ने शराबी की भूमिका इतनी दृढ़ता से निभाई कि उसने अपनी हास्यास्पद हरकतों से सिनेमा घर को तहस-नहस कर दिया! इस फिल्म की सफलता के बाद केस्टो मुखर्जी ने हृषिकेश मुखर्जी की फिल्म ' चुपके-चुपके' (1975) में एक और शराबी की भूमिका निभाई । वह दृश्य जहां वह कविता लिखते हैं - आज बाग में खिलेगा एक गुलाब; ऐ सखी पिला दे एक गिलास... केस्टो इस पर अटक गए क्योंकि वह 'गुलाब' का एक आदर्श काफिया (कविता) लिखने में असमर्थ थे, तब धर्मेंद्र ने एक गिलास जुलाब का सुझाव दिया !!! यह दृश्य गुदगुदा देने वाला है!
मनमोहन देसाई ने केष्टो मुखर्जी को उनके नाम पर एक गीत समर्पित करते हुए रूढ़िबद्ध बना दिया
जिस निश्छलता के साथ केस्टो ने अभिव्यंजक आँखों वाले शराबी की भूमिका निभाई और अद्वितीय संवाद अदायगी ने केस्टो मुखर्जी को आजीवन एक शराबी की भूमिका में स्थापित कर दिया। इस हद तक कि फिल्म निर्माता मनमोहन देसाई ने अपनी फिल्म चाचा भतीजा (1977) में केस्टो को अमर बना दिया । इस फिल्म में मनमोहन देसाई ने केस्टो के नाम से एक गाना शामिल किया- गाना था
हे रे लल्ला यहाँ लल्ला झुमो जरा झुमो नाचो जरा
शादी बनाने को 'केश्टो' चला...
यह गाना धर्मेंद्र पर एक सीन में फिल्माया गया था जिसमें केस्टो मुखर्जी और टुन टुन की शादी होती है।महमूद ने केस्टो मुखर्जी में बिना संवादों के हास्य अभिनेता को निकाला
महान हास्य अभिनेता और फिल्म निर्माता महमूद को बधाई , वह उन कुछ फिल्म निर्माताओं में से एक थे जो कॉमेडी की नब्ज जानते थे। जहां अन्य फिल्म निर्माताओं ने केस्टो मुखर्जी को उनके शराबी अभिनय के लिए इस्तेमाल किया, वहीं महमूद ने अपने चेहरे के भाव मात्र से केस्टो मुखर्जी से कॉमेडी निकाल ली । अपनी फिल्म बॉम्बे टू गोवा में केस्टो अपनी लाजवाब कॉमेडी से दर्शकों को झूमने पर मजबूर कर देते हैं । पूरी फिल्म में केस्टो ऊंघते हुए नजर आते हैं लेकिन सोते हुए भी वे कॉमेडी का तड़का लगाते हैं!! यह वास्तव में एक दुर्लभता है जो केवल महान अभिनेता ही कर सकते हैं!!
शोले में कैमियो रोल में केस्टो मुखर्जी ने अमिट छाप छोड़ी !एक सशक्त अभिनेता के रूप में केस्टो मुखर्जी की ताकत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि रमेश सिप्पी की ऐतिहासिक हिट शोले में केस्टो मुखर्जी ने सिर्फ तीन दृश्यों की एक छोटी सी भूमिका निभाई थी! जेलर ( असरानी ) के नाई सह जासूस हरिराम के रूप में, केस्टो ने अपनी मासूम अभिव्यक्ति, अपनी आंखों की भेंगापन और चेहरे पर लटकते बालों के पतले कर्ल के साथ अपनी भूमिका को उल्लेखनीय बना दिया !!
केस्टो मुखर्जी ने तू मुंगला मुंगला गाने में तड़का लगाया
फिल्म इंकार (1997) में हॉट हेलेन पर फिल्माया गया कैबरे गाना तू मुंगला मुंगला मैं गुड की डाली, पृष्ठभूमि में केश्टो की हरकतों की वजह से मसालेदार और मनमोहक बन गया ! उनकी प्रफुल्लित करने वाली अभिव्यक्ति ने दर्शकों को हंसने पर मजबूर कर दिया!
केस्टो मुखर्जी ने अपने क्लासिक ड्रंक एक्ट से  गोलमाल को शाश्वत बना दिया
हृषिकेश मुखर्जी की हर फिल्म में केस्टो मुखर्जी एक स्थायी फीचर थे लेकिन उनकी फिल्म गोलमाल (1977) में केस्टो मुखर्जी को समायोजित करने के लिए कोई दृश्य नहीं था । लेकिन केस्टो मुखर्जी हृषिकेश मुखर्जी के लिए एक भाग्यशाली शुभंकर बन गए थे इसलिए उन्होंने क्लाइमेक्स में एक मिनट के दृश्य में केस्टो को शामिल किया। केस्टो को सलाम क्योंकि उस संक्षिप्त दृश्य में जहां वह पुलिस स्टेशन में उत्पल दत्त के साथ बातचीत करता है, हंगामा मचाने वाला है, विशेष रूप से, वह दृश्य जहां केस्टो अपनी जादुई टोपी से एक बोतल निकालता है, दंगा भड़काने वाला है।
केस्टो मुखर्जी की गुमनाम मौत हो गई
केस्टो मुखर्जी का 3 मार्च 1982 को मुंबई में उनके आवास पर निधन हो गया, लेकिन अफसोस कि न तो मीडिया और न ही फिल्म उद्योग ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। वह एक गुमनाम मौत मर गये।

गुलशन बावरा

गुलशन कुमार मेहता
प्रसिद्ध नाम गुलशन बावरा
🎂जन्म 12 अप्रैल, 1937
जन्म भूमि शेखपुरा, अविभाजित पंजाब[१]
⚰️मृत्यु 07 अगस्त, 2009
मृत्यु स्थान मुम्बई, महाराष्ट्र
कर्म भूमि भारत
मुख्य फ़िल्में 'सट्टा बाज़ार', 'जंजीर', 'उपकार', 'परिवार', 'कस्मे वादे', 'सत्ते पे सत्ता', 'अगर तुम न होते', 'हाथ की सफाई', 'सनम तेरी कसम', 'हकीकत', 'ये वादा रहा' आदि।
पुरस्कार-उपाधि 'फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार' (1967)
प्रसिद्धि हिन्दी फ़िल्म गीतकार।
नागरिकता भारतीय
संबंधित लेख राहुल देव बर्मन, कल्याणजी आनंदजी, मनोज कुमार, किशोर कुमार।
अन्य जानकारी राहुल देव बर्मन गुलशन बावरा के पड़ोसी थे। राहुल जी के साथ उनकी कई यादें जुड़ी हुई थीं। इन यादों को गुलशन बावरा ने 'अनटोल्ड स्टोरीज' नाम की एक सीडी में संजोया था। इसमें उन्होंने पंचम दा की आवाज़ रिकार्ड की थी और कुछ गीतों के साथ जुड़े किस्से-कहानियाँ भी प्रस्तुत किये थे।
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हिन्दी फ़िल्मों के प्रसिद्ध गीतकार थे। उनका मूल नाम गुलशन कुमार मेहता था। उन्हें 'बावरा' का उपनाम फ़िल्म वितरक शांतिभाई पटेल ने दिया था। बाद में यह नाम इतना प्रसिद्ध हुआ कि पूरा फ़िल्म उद्योग उन्हें इसी नाम से पुकारने लगा। अपनी साहित्यिक सोच के कारण ही गुलशन बावरा फ़िल्म संगीत से जुड़े थे। वे पहले रेलवे में कार्यरत थे, लेकिन उनकी कल्पना की उड़ान ने उन्हें फ़िल्म उद्योग के आसमान पर स्थापित कर दिया, जहाँ उनका योगदान ध्रुव तारे के समान अटल और अविस्मर्णीय है।

परिचय

हिन्दी फ़िल्मों के प्रसिद्ध गीतकार थे। उनका मूल नाम गुलशन कुमार मेहता था। उन्हें 'बावरा' का उपनाम फ़िल्म वितरक शांतिभाई पटेल ने दिया था। बाद में यह नाम इतना प्रसिद्ध हुआ कि पूरा फ़िल्म उद्योग उन्हें इसी नाम से पुकारने लगा। अपनी साहित्यिक सोच के कारण ही गुलशन बावरा फ़िल्म संगीत से जुड़े थे। वे पहले रेलवे में कार्यरत थे, लेकिन उनकी कल्पना की उड़ान ने उन्हें फ़िल्म उद्योग के आसमान पर स्थापित कर दिया, जहाँ उनका योगदान ध्रुव तारे के समान अटल और अविस्मर्णीय है।
गुलशन बावरा ने बचपन में ही विभाजन के दौरान रेलगाड़ी से भारत आते वक्त अपने पिता को तलवार से कटते और माँ को सिर पर गोली लगते देखा था। भाई के साथ भागकर वे जयपुर आ गए, जहाँ उनकी बहन ने उनकी परवरिश की। यहाँ पर ये तथ्य उल्लेखनीय है कि इस भयावह त्रासदी की यंत्रणा को झेलने वाले गुलशन बावरा ने इसे अपनी जिंदगी, अपने व्यक्तित्व और अपने लिखे गीतों पर कभी हावी नहीं होने दिया। बाद में भाई को दिल्ली में नौकरी मिलने की वज़ह से वे दिल्ली चले गए। सन 1955 में रेलवे में क्लर्क की नौकरी मिलने पर गुलशन जी मुंबई चले आए। लिखने का शौक उनको बचपन से ही था। बचपन में माँ के साथ भजन मंडली में शिरकत करने की वज़ह से भजन लिखने से उनके लेखन का सफर शुरू हुआ था, जो कॉलेज के दिनों में आते-आते आशानुरूप रुमानी कविताओं में बदल गया। इसीलिए मुंबई में नौकरी करते वक़्त फुर्सत मिलते ही उन्होंने संगीतकार जोड़ी कल्याणजी-आनंदजी के दफ़्तर के चक्कर लगाने नहीं छोड़े। गुलशन बावरा को पहली सफलता इसी जोड़ी के संगीत-निर्देशन में रवींद्र दावे की फ़िल्म "सट्टा बाज़ार" (1957) में मिली, जब उनका लिखा निम्न गीत बेहद लोकप्रिय हुआ

"तुम्हें याद होगा कभी हम मिले थे, मोहब्बत की राहों में मिल कर चले थे,
भुला दो मोहब्बत में हम तुम मिले थे, सपना ही समझो कि मिल कर चले थे।

'बावरा' नामकरण

फ़िल्म 'सट्टा बाज़ार' के निर्माण के दौरान गुलशन जी को उनका नाम 'बावरा' मिला था। फ़िल्म के वितरक शांतिभाई पटेल उनके काम से खासे खुश थे। रंग-बिरंगी शर्ट पहनने वाले लगभग 20 साल के युवक को देखकर उन्होंने कहा था कि- "मैं इसका नाम गुलशन बावरा रखूँगा। यह बावरे (पागल व्यक्ति) जैसा दिखता है।" फ़िल्म प्रदर्शित होने पर उसके पोस्टर्स में सिर्फ़ तीन लोगों के नाम प्रमुखता से प्रदर्शित किए गए थे। एक फ़िल्म के निर्देशक रविंद्र दवे, संगीतकार कल्याणजी-आनंदजी और बतौर गीतकार गुलशन बावरा।

प्रसिद्धि

इसके बाद के आगामी कुछ साल गुलशन जी के लिए मशक्कत वाले रहे और इन सालों में वे कई फ़िल्मों में अभिनय कर अपना गुजारा चलाते रहे। उनके जिस गीत ने पूरे भारत में उनके नाम का सिक्का जमा दिया, उसके लिए सारा श्रेय उनकी गुड्स क्लर्क की नौकरी को देना उचित जान पड़ता है। दरअसल रेलवे के मालवाहक विभाग में गुलशन बावरा अक्सर पंजाब से आई गेहूँ से लदी बोरियाँ देखा करते थे और वहीं उनके मन कभी न भुलाई जा सकने वाली वे पंक्तियाँ बन पड़ीं जो हिन्दी सिनेमा के इतिहास में अमर हो गईं। मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे-मोती, मेरे देश की धरती। जब उन्होंने अपने मित्र मनोज कुमार को ये पंक्तियाँ सुनाईं तो उसी समय मनोज जी ने इसे अपनी फ़िल्म 'उपकार' के लिए चुन लिया। इस गीत ने ही उन्हें सन 1967 में सर्वश्रेष्ठ गीत का 'फ़िल्मफेयर पुरस्कार' दिला गया।[२] कहते हैं कि गुलशन बावरा ने यह गीत राज कपूर की फिल्‍म 'जिस देश में गंगा बहती है' के लिए लिखा था। यह गीत राज कपूर को पसंद भी आया था, लेकिन तब तक वे शैलेंद्र के गीत "होंठों पे सच्‍चाई रहती है, जहां दिल में सफाई रहती है" को फाइनल कर चुके थे। आखिरकार मनोज कुमार ने 'उपकार' में इसका प्रभावशाली उपयोग किया।

सही माएने में फ़िल्म 'उपकार' के इस गीत ने गुलशन बावरा को भारत की जनता से जोड़ दिया। सत्तर की शुरुआत में सबसे पहले 1974 में फ़िल्म 'हाथ की सफाई' में लता मंगेशकर द्वारा गाए उनके गीत "तू क्या जाने बेवफ़ा.." और "वादा कर ले साजना..." बेहद लोकप्रिय रहे। फिर 1975 में आई फ़िल्म 'जंजीर' में उनके गीतों- "दीवाने हैं दीवानों को ना घर चाहिए..." और "यारी है ईमान मेरा यार मेरी ज़िदगी...." ने पूरे देश में धूम मचा दी। इन दोनों ही फ़िल्मों का संगीत कल्याणजी-आनंदजी ने दिया था।

सभी प्रकार की गीत रचना

गुलशन बावरा ने जीवन के हर रंग के गीतों को अल्फाज दिए। उनके लिखे गीतों में 'दोस्ती, रोमांस, मस्ती, गम' आदि विभिन्न पहलू देखने को मिलते हैं। 'जंजीर' फ़िल्म का गीत 'यारी है ईमान मेरा यार मेरी ज़िन्दगी' दोस्ती की दास्तान बयां करता है, तो 'दुग्गी पे दुग्गी हो या सत्ते पे सत्ता' गीत मस्ती के आलम में डूबा हुआ है। उन्होंने बिंदास प्यार करने वाले जबाँ दिलों के लिए भी 'खुल्ल्म खुल्ला प्यार करेंगे', 'कसमें वादे निभाएंगे हम', आदि गीत लिखे। उनके पास हर मौके के लिए गीत था। पाकिस्तान से आकर बसे बावरा जी ने अपने फ़िल्मी कैरियर की तुलना में यूं तो कम गीत लिखे, लेकिन उनके द्वारा लिखे सादे व अर्थपूर्ण गीतों को हमेशा पसंद किया गया। उन्होंने संगीतकार कल्याणजी-आनंदजी के संगीत निर्देशन में 69 गीत लिखे और आर. डी. बर्मन के साथ 150 गीत लिखे। पंचम दा गुलशन बावरा जी के पड़ोसी थे। पंचम दा के साथ उनकी कई यादें जुड़ी हुई थीं। इन यादों को गुलशन बावरा ने 'अनटोल्ड स्टोरीज' नाम की एक सीडी में संजोया था। इसमें उन्होंने पंचम दा की आवाज़ रिकार्ड की थी और कुछ गीतों के साथ जुड़े किस्से-कहानियां भी प्रस्तुत किये थे।
प्रमुख फ़िल्में तथा गीत
गुलशन बावरा ने अपनी सक्रियता के निरन्तर समय में लगातार लोकप्रिय गीत लिखे। कल्याणजी-आनंदजी से उनकी ट्यूनिंग खूब जमती रही। लगभग सत्तर से भी ज्यादा गाने उन्होंने उनके लिए लिखे। बाद में उनका जुड़ाव राहुल देव बर्मन से भी हुआ। एक बार गुलशन उनकी टीम में क्या आये, गहरे मित्र बन गये। राहुल देव बर्मन को गुलशन सहित उनके तमाम दोस्त पंचम कहकर बुलाया करते थे। इस टीम ने भी अनेक सफल और लोकप्रिय फिल्मों में मधुर और अविस्मरणीय गीतों की रचना की। एक सौ पचास से ज्यादा गाने गुलशन और पंचम की जोड़ी की उपलब्धि है। जिन फिल्मों के लिए गुलशन बावरा ने गीत लिखे उनमें 'सट्टा बाज़ार', 'राज', 'जंजीर', 'उपकार', 'विश्वास', 'परिवार', 'कस्मे वादे', 'सत्ते पे सत्ता', 'अगर तुम न होते', 'हाथ की सफाई', 'पुकार', 'सनम तेरी कसम', 'हकीकत', 'ये वादा रहा', 'झूठा कहीं का', 'जुल्मी' आदि प्रमुख हैं। गुलशन बावरा ने पंचम दा के साथ उनकी फिल्म 'पुकार' और 'सत्ते पे सत्ता' में गानों में भी सुर मिलाए।

गुलशन जी के प्रसिद्ध गीतों में शामिल हैं-

तुमको मेरे दिल ने पुकारा है
किसी पे दिल अगर आ जाए तो क्या होता है
सनम तेरी कसम
आती रहेंगी बहारें
यारी है ईमान मेरा यार मेरी ज़िंदगी
मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे-मोती
हमें और जीने की चाहत न होती, अगर तुम न होते
तू तो है वही
कसमे वादे निभाएंगे हम
वादा कर ले साजना
पीने वालों को पीने का बहाना चाहिए
दीवाने हैं दीवानों को न घर चाहिए
प्यार हमें किस मोड़ पे ले आया
कितने भी तू कर ले सितम
व्यक्तित्व
गुलशन बावरा दिखने में दुबले-पतले शरीर के थे। उनका व्यक्तित्व हंसमुख था, हांलाकि बचपन में विभाजन के समय उन्होंने जो त्रासदी झेली थी वह अविस्मर्णीय है, लेकिन उनके व्यक्तित्व में उसकी छाप कहीं दिखाई नहीं देती थी। वे कवि से ज्यादा कॉमेडियन दिखाई देते थे। इस गुण के कारण कई निर्माताओं ने उनसे अपनी फ़िल्मों में छोटी-छोटी भूमिकाएँ भी अभिनीत करवायीं। विभाजन का दर्द उन्होंने कभी जाहिर नहीं होने दिया। राहुल देव बर्मन उनके करीबी मित्र थे। राहुल जी के संगीत कक्ष में प्राय: सभी मित्रों की बैठक होती थी और खूब ठहाके लगाये जाते थे। गुलशन बावरा उस सर्कस के स्थायी 'जोकर' थे। यहीं से उनकी मित्रता किशोर कुमार से हुई। फिर क्या था अब तो दोनों लोग मिलकर हास्य की नई-नई स्तिथियाँ गढ़ते थे। गुलशन बावरा को उनके अंतिम दिनों में जब 'किशोर कुमार' सम्मान के लिए चुना गया तो उनके चहरे पर अद्भुद संतोष के भाव उभरते दिखाई दिए। उनके लिए यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण क्षण था। एक तरफ़ यह पुरस्कार उनके लिए विभाजन की त्रासदी से लेकर जीवन पर्यंत किये गए संघर्ष का इनाम था, दूसरी ओर अपने पुराने मित्र की स्मृति में मिलने वाला पुरस्कार एक अनमोल तोहफे से कम नहीं था।

मृत्यु
सारा जीवन गुलशन कुमार चुस्त-दुरुस्त रहे। कोई बीमारी न हुई। सुबह-शाम घूमने का खूब शौक था। रात को समय पर खाना खाकर सो जाते थे। उनकी पत्नी अंजू उनका बड़ा ख्याल भी रखती थीं। कैंसर जैसी बीमारी उनको बमुश्किल छह माह पहले हुई और देखते ही देखते इस बीमारी ने उनके जीवन को अचानक ऐसा संक्षिप्त कर दिया कि वे सुबह अचानक चले गये। 7 अगस्त, 2009 को बीमारी के चलते उनका देहांत हो गया। उनकी इच्छानुसार उनके पार्थिव शरीर को जे. जे. अस्पताल को दान कर दिया गया। हिन्दी सिनेमा ही नहीं हिन्दी साहित्य भी गुलशन बावरा जी के अद्भुद योगदान को कभी नहीं भूल पायेगा।

गुलशन बावरा ने एक साक्षात्कार में कहा था- "मैं गाने लिख-लिखकर रखता था। फिर कहानी सुनने के बाद सिचुएशन के अनुसार गीतों का चयन करता था। कहानी के साथ चलना ज़रूरी है तभी गाने हिट होते हैं। आज किसे फुर्सत है कहानी सुनने की? और कहानी है कहाँ? विदेशी फ़िल्मों की नकल या दो-चार फ़िल्मों का मिश्रण। कहानी और विजन दोनों ही गायब हैं फ़िल्मों से।" गुलशन जी आज के गीत-संगीत से भी विचलित थे। वे कहा करते थे- "गीतों में भावना नहीं है और संगीत में आत्मा। पहले श्रोताओं को ध्यान में रखकर रचना बनती थी। आजकल दर्शकों को जेहन में रखा जाता है। उस जमाने में गीत-संगीत और दृश्यों का उम्दा तालमेल होता था। आजकल मात्र दृश्यों को प्रभावी बनाया जाता है। पंजाबी फ़िल्म 'पुन्नो' में बतौर नायक अभिनय कर चुके गुलशन फ़िल्मों में और अधिक लेखन करना चाहते थे, किन्तु इस शर्त पर कि डायरेक्टर और फ़िल्म अच्छी हो। अंतिम वक्त में उनकी पीड़ा थी- "अब हमें पूछने वाला कौन है? जो प्रतिष्ठा और सम्मान मैंने पुराने गीतों को रचकर हासिल किया था, क्या वह आज चल रहे सस्ते गीत और घटिया धुनों के साथ बरकरार रखा जा सकता है?" लेखन से उनका रिश्ता आजीवन जुड़ा रहा। चाहे फ़िल्मों के लिए नहीं, अपने रचनाकार मन के लिए ही सही। नई फ़िल्मों पर उनकी तल्ख टिप्पणी कि "मेरी बर्दाश्त से बाहर हैं नई फ़िल्में" सोचने को विवश करती हैं।

रविवार, 6 अगस्त 2023

सुरेश वाडेकर

सुरेश वाडेकर
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सुरेश वाडेकर
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सुरेश वाडेकर
जन्म 07 अगस्त, 1955
जन्म भूमि कोल्हापुर, महाराष्ट्र
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र पार्श्वगायन
मुख्य फ़िल्में 'ओंकारा', 'प्रेमरोग', 'राम तेरी गंगा मैली', 'हिना', 'रंगीला', 'माचिस' आदि।
पुरस्कार-उपाधि 'पद्मश्री' (2020), राष्ट्रीय लता मंगेशकर सम्मान (2011)
प्रसिद्धि पार्श्वगायन
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी महज 10 साल की आयु से ही सुरेश वाडेकर ने संगीत की शिक्षा लेना शुरू कर दिया। उन्होंने ना सिर्फ हिंदी, बल्कि मराठी के साथ कई भाषाओं की फिल्मों में गया है।
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सुरेश वाडेकर (अंग्रेज़ी: Suresh Wadkar, जन्म- 7 अगस्त, 1955, कोल्हापुर, महाराष्ट्र) ख्यातिप्राप्त भारतीय गायक हैं। वह भारतीय सिनेमा के शुरुआती गायकों में गिने जाते हैं। सुरेश वाडेकर ने आठ साल की उम्र से ही संगीत की शिक्षा लेनी शुरू कर दी थी। उन्होंने जिन महत्वपूर्ण फिल्मों में अपनी आवाज दी है, उनमें 'ओंकारा', 'प्रेमरोग', 'राम तेरी गंगा मैली', 'हिना', 'रंगीला', 'माचिस' आदि शामिल हैं। सुरेश वाडेकर मुख्य रूप से हिंदी फिल्मों के गायक हैं। उन्होंने बहुत-से हिट गानों में अपनी आवाज़ दी है। हिंदी के अलावा उन्होंने भोजपुरी, मराठी और कोंकणी भाषा में भी बहुत गाने गाये हैं। सुरेश वाडकर के गाने की सूची में धार्मिक और उड़िया गाने भी शामिल हैं।

परिचय
सुरेश वाडेकर का जन्म 7 अगस्त, 1955 को महाराष्ट्र के कोल्हापुर में हुआ था। उन्हें बचपन से ही गायकी का शौक था। उनके पिता ने उनका नाम सुरेश इसलिए रखा, ताकि वह अपने बेटे को बड़ा गायक बनता देख सकें। सुरेश वाडेकर ने कोशिश जारी रखी और आखिरकार उन्होंने अपने पिता का सपना पूरा किया।

कॅरियर
महज 10 साल की आयु से ही सुरेश वाडेकर ने संगीत की शिक्षा लेना शुरू कर दिया। उन्होंने ना सिर्फ हिंदी, बल्कि मराठी के साथ कई भाषाओं की फिल्मों में गया है। इसके साथ उन्होंने कई भजनों के लिए भी अपनी आवाज दी है। रवींद्र जैन ने 'राजश्री प्रोडक्शन' की फिल्म 'पहेली' में पहला फिल्मी गीत 'वृष्टि पड़े टाकुर टुकुर' गवाया था और जयदेव ने उनसे फिल्म 'गमन' का 'सीने में जलन' गाने का मौका दिया, जिसके बाद सभी उन्हें एक प्रतिभाशाली गायक की दृष्टि से देखने लगे।

लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने सुरेश वाडेकर को 1981 की फिल्म 'क्रोधी' में 'चल चमेली बाग में' वाले गाने को लता मंगेशकर के साथ गाने का मौका दिया था। उन्होंने फिल्म 'प्यासा सावन' का मशहूर गीत 'मेघा रे मेघा रे' जैसे खूबसूरत सुपरहिट गाने लता जी के साथ गाये। इसमें उन्होंने 'मेरी किस्मत में तू नहीं शायद', 'मैं हूं प्रेम रोगी' जैसे मधुर गीत गाए। इसके बाद वह इतने प्रसिद्ध हुए कि अब वह घर-घर पहचाने जाने लगे।

गुलज़ार और लता मंगेशकर, सुरेश वाडेकर से बहुत अधिक प्रभावित थे। उन्होंने लंबे समय के बाद अपनी फिल्म 'माचिस' में उनसे 'छोड़ आए हम' और 'चप्पा चप्पा चरखा चले' जैसे गीत गवाए। विशाल भारद्वाज के साथ सुरेश वाडेकर ने फिल्म 'सत्या' और 'ओमकारा' में कुछ बेहद अनोखे गाने गाए। सुरेश वाडेकर ने हिंदी और मराठी गानों के अलावा कुछ गाने भोजपुरी और कोंकणी भाषा में भी गाए हैं। उन्होंने अलग-अलग भाषाओं में कई भक्ति गीत गाए।

संगीत अकादमी
मुंबई और न्यूयॉर्क में सुरेश वाडेकर का अपना संगीत स्कूल है, जहां वह संगीत के विद्यार्थियों को संगीत की शिक्षा देते हैं। उन्होंने संगीत की दुनिया में एक नया अध्याय जोड़ दिया है। उन्होंने 'सुरेश वाडेकर अजिवासन संगीत अकादमी' नामक पहला ऑनलाइन संगीत स्कूल खोला है, जिसके माध्यम से वह नए संगीत महत्वाकांक्षी छात्रों को अपना संगीत ज्ञान और अनुभव देते हैं।

माधुरी दीक्षित सेे विवाह प्रसंग
उन दिनों गायक सुरेश वाडेकर का बोलबाला था। मराठी परिवारों में उनकी अच्छी धाक थी। माधुरी दीक्षित को भी वह बहुत पसंद थे। उन दिनों माधुरी का संगीत और नृत्य में रुझान देखकर उनके एक पारिवारिक मित्र ने उन्हें सलाह दी कि सुरेश वाडकर के लिए लड़की देखी जा रही है और माधुरी उनके लिए परफेक्ट रहेगी। माधुरी के परिवार वालों को भी यह रिश्ता जंच गया। जब रिश्ते की बात करने परिवार के सदस्य सुरेश वाडकर के घर गए तो सुरेश ने एक बार माधुरी से मिलने की इच्छा जताई। माधुरी को देखने के बाद वाडेकर परिवार ने यह कहकर रिजेक्ट कर दिया कि लड़की बहुत दुबली पतली है।

सम्मान और पुरस्कार
वर्ष 2007 में महाराष्ट्र सरकार ने सुरेश वाडेकर को 'महाराष्ट्र प्राइड अवार्ड' से सम्मानित किया था और साल 2011 में उन्हें मराठी फिल्म 'ई एम सिंधुताई सपकल' के लिए सर्वश्रेष्ठ गायक का 'राष्ट्रीय पुरस्कार' मिला। मध्य प्रदेश में उन्हें प्रतिष्ठित 'राष्ट्रीय लता मंगेशकर सम्मान' से भी सम्मानित किया गया था। सुरेश वाडेकर को 2020 में ‘पद्मश्री' से भी नवाजा गया।

शनिवार, 5 अगस्त 2023

आदित्य नारायण

🎂जन्म: 6 अगस्त 1987,मुम्बई
पत्नी: श्वेता अग्रवाल (विवाह. 2020)
माता-पिता: उदित नारायण
आदित्य नारायण एक भारतीय फिल्म अभिनेता, संगीतकार व गायक हैं, जो बॉलीवुड गायक उदित नारायण और दीपा नारायण के पुत्र हैं। इन्होंने पहले रंगीला नामक फिल्म में गाना गया था। उसके बाद 1995 में अपने पिता के साथ "अकेले हम और अकेले तूम" में काम किया।
इन्होंने अपने गायिका का सफर 1995 में "रंगीला" नामक फिल्म से शुरू किया। इसके बाद "अकेले हम और अकेले तुम" में अपने पिता के साथ काम किया। इस फिल्म में संगीत निर्देशक अनु मलिक थे।इनका अभिनय का सफर भी 1995 में शुरू हुआ। तब यह बाल कलाकार थे और निर्माता व निर्देशक सुभाष घई इन्हें फिल्मफेयर पुरस्कार समारोह के दौरान देखा था। इसके बाद सुभाष ने इन्हें अपने आगामी फिल्म "परदेश" के लिए चुन लिया। इसके बाद "जब प्यार किसी से होता है" फिल्म में भी इन्होंने काम किया। इस फिल्म के लिए 1999 में इनका नामांकन ज़ी सिने पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता के लिए हुआ था।

बाल कलाकार के रूप में इन्होंने 100 से अधिक गाने गाये हैं। इनका सबसे अधिक प्रसिद्ध गाना "छोटा बच्चा जान के" है, जो 1996 के मासूम फिल्म का है। इन्हें सबसे पहला फिल्म पुरस्कार 1997 में स्क्रीन पुरस्कार के तरह से सर्वश्रेष्ठ बाल गायक का पुरस्कार मिला था। इसी गाने के लिए इन्हें स्क्रीन पुरस्कार की ओर से एक और पुरस्कार मिला था।

२०१३  गोलियों की रासलीला  रामलीला पार्श्वगायक  संजय लीला भंसाली
२०१० शापित   अभिनेता, संगीत निर्देशक, पार्श्वगायक चिरंतन भट्ट
२००९ चल चलें   पार्श्वगायक

दीपिका ककड़

फ़ैज़ा इब्राहिम , जिन्हें पहले दीपिका कक्कड़ के नाम से जाना जाता था.
भारतीय अभिनेत्री तथा मॉडल है। इन्होंने 2017 तक कलर्स चैनल के धारावाहिक ससुराल सिमर का में सिमर का किरदार निभाया है। वह बिग बॉस 12 की विजेता भी रही।
🎂जन्म: 6 अगस्त 1986 पुणे
पति: शोएब इब्राहिम, रौनक मेहता (विवा. 2011–2015)
माता-पिता: रेणु ककर
नामांकन: गोल्डन पेटल अवार्ड्स फॉर मोस्ट संस्कारी व्यक्तित्व, ज़्यादा
फ़िल्में: पल्टन
दीपिका का जन्म 6 अगस्त 1986 को पुणे, भारत में हुआ था।कक्कड़ ने केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा आयोजित स्कूल स्तर की परीक्षा पूरी की और फिर मुंबई विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि प्राप्त की । अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद वह लगभग 3 वर्षों तक जेट एयरवेज में फ्लाइट अटेंडेंट के रूप में काम करने लगीं । कुछ स्वास्थ्य समस्याओं के कारण, उन्होंने इस्तीफा दे दिया और मनोरंजन उद्योग में शामिल हो गईं। 
कक्कड़ ने मुंबई में तीन साल तक एयर होस्टेस के रूप में अपना करियर शुरू किया। फिर, उन्होंने 2010 में नीर भरे तेरे नैना देवी से टेलीविजन पर अपनी शुरुआत की, जहां उन्होंने लक्ष्मी की भूमिका निभाई। इसके बाद वह अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो में रेखा के रूप में दिखाई दीं। 

2011 से 2017 तक, उन्होंने कलर्स टीवी के ससुराल सिमर का में सिमर भारद्वाज का किरदार निभाया ।2015 में, कक्कड़ ने सेलिब्रिटी डांस रियलिटी शो झलक दिखला जा 8 में भाग लिया । 2017 में, उन्होंने शोएब इब्राहिम के साथ स्टार प्लस के नच बलिए 8 में भाग लिया । वह अगली बार एंटरटेनमेंट की रात में दिखाई दीं ।

अक्टूबर 2018 में कक्कड़ ने बिग बॉस 12 में हिस्सा लिया था .30 दिसंबर 2018 को, वह सीज़न की विजेता बनकर उभरीं। 

2019 और 2020 में, उन्होंने स्टार प्लस के कहां हम कहां तुम में करण ग्रोवर के साथ सोनाक्षी रस्तोगी की भूमिका निभाई । 
इन्हों ने 📽️ 2018 पल्टन में कैप्टन पृथ्वी सिंह डागर की मंगेतर  ,कैमिया का रोल किया 
दीपिका की पहली शादीबहुत कम लोग जानते हैं कि एक्ट्रेस बनने से पहले दीपिका एयर होस्टेस के तौर पर काम कर चुकी हैं. उन्होंने मुंबई यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन किया. अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने जेट एयरवेज संग करीब 3 साल काम किया. हालांकि बाद में हेल्थ इश्यूज की वजह से उन्होंने नौकरी छोड़ दी और टीवी की दुनिया में हाथ आजमाया. बताया जाता है कि जब दीपिका जेट एयरवेज संग काम कर रही थीं उनकी मुलाकात पायलट रौनक सैमसन से हुई और बाद में दोनों ने शादी करने का फैसला किया. इस तरह दीपिका की पहली शादी साल 2011 में रौनक से हुई थी. हालांकि ये शादी लंबे वक्त तक नहीं टिक पाई और 2015 में दोनों अलग हो गए.

मनुस्मृति

. ................मनुस्मृति.................... जरा सोचिए, अगर आज भारत का कानून यह तय कर दे कि— "एक आम आदमी चोरी करे तो उसे...