बुधवार, 19 जुलाई 2023

सिद्धार्थ राय

सिद्धार्थ रे
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🎂जन्म: 19 जुलाई 1963, मुम्बई
⚰️मृत्यू: 08 मार्च 2004, मुम्बई
पत्नी: शांतिप्रिया (विवा. 1999–2004)
बच्चे: शिष्या रे
माता-पिता: चारुशीला शांताराम
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सिद्धार्थ रे एक 80 से लेकर 90 के दशक के जाने-माने अभिनेता थे। कई मूवीज में अपने उल्लेखनीय किरदार से पहचान बना चुके है जैसे 'वंश' 'बाजीगर' आदि। इसके पहले पनाह मूवी में बहुत अच्छा रोल इनका रहा। इन्होंने अपनी दक्षिण और हिंदी फिल्मों की अभिनेत्री शांतिप्रिया से शादी की इसके बाद एक दिन अचानक इनकी असमय मृत्यु हो गयी।
तीन पत्नियों का इकलौता पति
सिद्धार्थ राय कपूर भारतीय निर्माता होने के साथ-साथ यूटीवी मोशन पिक्चर्स के सी.इ.ओ हैं। सिद्धार्थ राय कपूर भारतीय अभिनेत्री विद्या बालन के पति  हैं। 

पृष्ठभूमि 
सिद्धार्थ राय कपूर का जन्म 2 अगस्त 1974 को दिल्ली में हुआ था। सिद्धार्थ एक फ़िल्मी परिवार से ताल्लुक रखते हैं, उनकी माँ शलोमी रॉय कपूर पूर्व मिस इंडिया रह चुकीं हैं। उनके दो भाई हैं- कुणाल रॉय कपूर, आदित्य रॉय कपूर। दोनों ही बॉलीवुड में बतौर फिल्म अभिनेता के रूप में सक्रिय हैं। 

शादी
सिद्धार्थ राय कपूर की तीन शादियां हुई हैं। उनकी पहली शादी उनकी बचपन की दोस्त से हुई, किन्ही कारणों से यह शादी नहीं चल सकी। सिद्धार्थ ने दूसरी शादी एक टीवी निर्माता से की लेकिन यह शादी भी महज़ कुछ साल ही चली। इसके बाद सिद्धार्थ की जिंदगी में आईं विद्या बालन। सिद्धार्थ राय कपूर और विद्या की शादी 14 दिसम्बर 2012 को बांद्रा में हुई। 

करियर
सिद्धार्थ रॉय कपूर ने कई सफल फिल्मों का निर्माण किया है।  जिनमें से फिल्मीस्तान, पान सिंह तोमर, एबीसीडी 2, राजा नटवर लाल, हैदर और चेन्‍नई एक्‍सप्रेस आदि प्रमुख हैं। 
नोट:— अभिनेता आदित्य रॉय कपूर और कुनाल रॉय कपूर सिद्धार्थ के भाई हैं

जुबली कुमार यानी राजिंद्र कुमार

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महान अभिनेता, निर्माता निर्देशक राजेंद्र कुमार की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रधांजलि
🎂जन्म की तारीख और समय: 20 जुलाई 1929, सियालकोट, पाकिस्तान
⚰️मृत्यु की जगह और तारीख: 12 जुलाई 1999, मुम्बई
पत्नी: शुक्ला कुमार (विवा. ?–1999)
नातिन या पोतियां: साची कुमारसिया कुमार
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राजेंद्र कुमार एक फ़िल्म अभिनेता थे। राजेन्द्र कुमार 1960 और 1970 के दशक में फ़िल्मों में सक्रिय थे। राजेंद्र कुमार ने फ़िल्मों में अभिनय करने के अलावा कई फ़िल्मों का निर्माण और निर्देशन भी किया था। हिन्दी फ़िल्मों में अपने सफल अभिनय और बेमिसाल अदाकारी की वजह से राजेन्द्र कुमार ने जो स्थान बनाया है वहां तक पहुंचना हर अभिनेता का सपना होता है। राजेन्द्र
कुमार की हर फ़िल्म इतनी हिट होती थी कि वह कई सालों तक बेहतरीन बिजनेस किया करती थी और यही वजह थी कि लोग उन्हें ‘जुबली कुमार’ के नाम से पुकारते थे। अपने रोमांटिक व्यक्तित्व की उन्होंने सिनेमा जगत में ऐसी छटा बिखेरी की उनकी फ़िल्में एक यादगार बन गईं। फ़िल्म 'आरजू' हो या 'आई मिलन की बेला'हर फ़िल्म में राजेन्द्र कुमार का एक अलग ही स्वरूप दर्शकों ने देखा।

पश्चिम पंजाब के सियालकोट में 20 जुलाई , 1929 को जन्मे राजेन्द्र कुमार बचपन से ही अभिनेता बनने की चाह रखते थे। एक मध्यम वर्गीय परिवार से होने के बावजूद उन्होंने उम्मीदों का दामन नहीं छोड़ा। मुंबई में अपनी किस्मत आजमाने के लिए उन्होंने पिता द्वारा दी गई घड़ी को बेचा था पर मुंबई आकर अपनी किस्मत बदलने का हौसला उन्होंने किसी से नहीं लिया था।राजेन्द्र कुमार सुंदर होने के साथ साथ मानसिक रुप से भी बहुत ही दृढ़ अभिनेता थे। 21 साल की उम्र में ही उन्हें फ़िल्मों में काम करने का पहला मौका मिला। एक अभिनेता के तौर पर पहली बार उन्हें दिलीप कुमार अभिनीत फ़िल्म "जोगन" में एक छोटा-सा किरदार निभाने को मिला था। यहीं से वह लगातार सफलता प्राप्त करते गए। पहली बार फ़िल्म ‘जोगन’ में उन्होंने अभिनय किया और उसके बाद अपने हर रोल में वह खुद ब खुद फिट होते चले गए। इसके बाद ‘गूंज उठी शहनाई’ में पहली बार वह एक अभिनेता के तौर पर दिखे। वर्ष 1957 में प्रदर्शित महबूब खान की फ़िल्म ‘ मदर इंडिया’ में राजेंद्र कुमार ने जो अभिनय किया उसे देख आज भी लोग प्रफुल्लित हो उठते हैं। मदर इंडिया के बाद राजेन्द्र कुमार ने‘धूल का फूल’, ‘मेरे महबूब’, ‘आई मिलन की बेला’, ’संगम’, ‘आरजू’ , ‘सूरज’ आदि जैसे सफल फ़िल्मों में काम किया।

राजेन्द्र कुमार बचपन से ही अभिनेता बनने का सपना देखा करते थे। अपने इसी सपने को साकार करने के लिये पचास के दशक में वह मुंबई आ गये। मुंबई पहुंचने पर उनकी मुलाकात सेठी नाम के एक व्यक्ति से हुयी जिन्होंने उनका परिचय सुनील दत्त से कराया। जो उन दिनों स्वयं अभिनेता बनने के लिए संघर्ष कर रहे थे। इस बीच राजेन्द्र कुमार की मुलाकात जाने माने गीतकार राजेन्द्र कृष्ण से हुई जिनकी मदद से वह 150 रपए मासिक वेतन पर निर्माता, निर्देशक एच.एस. रवेल के सहायक निर्देशक बन
गए। बतौर सहायक निर्देशक राजेन्द्र कुमार ने रवेल के साथ प्रेमनाथ और मधुबाला अभिनीत 'साकी' तथा प्रेमनाथ और सुरैया अभिनीत 'शोखियां' के लिए काम किया। वर्ष 1950 में प्रदर्शित फ़िल्म 'जोगन' बतौर अभिनेता राजेन्द्र कुमार के सिने कैरियर की पहली फ़िल्म साबित हुयी। इस फ़िल्म में उन्हें दिलीप कुमार के साथ अभिनय करने का मौका मिला। इसके बावजूद राजेन्द्र कुमार दर्शकों के बीच अपनी पहचान बनाने में कामयाब रहे। 

दर्शकों के मध्य राजेन्द्र कुमार का स्थान महबूब ख़ान की फ़िल्म मदर इंडिया (1957) से बना। फ़िल्म मदर इंडिया में राजेन्द्र कुमार ने नरगिस के बेटे का रोल किया था। मदर इंडिया के बाद राजेन्द्र कुमार ने धूल का फूल (1959), मेरे महबूब (1963), आई मिलन की बेला (1964), संगम (1964), आरजू (1965), सूरज (1966) आदि जैसे सफल फ़िल्मों में काम किया।

यद्यपि राजेन्द्र कुमार 1960 के दशक में भारतीय रजत पट पर छाये रहे,इनकी अनेक फ़िल्मों ने लगातार रजत
जयंती (सिल्वर जुबली) की इसलिए उन्हें जुबली कुमार कहा जाने लगा। (1970 का दशक उनके लिये प्रतिकूल रहा क्योंकि उस दशक में राजेन्द्र कुमार की गंवार
(1970), तांगेवाला (1972), ललकार (1972), गाँव हमारा शहर तुम्हारा (1972), आन बान (1972) आदि फ़िल्में बॉक्स आफिस पर पिट गईं और उनकी मांग घटने लग गई। सन् 1970 से 1977 तक का समय उनके लिये अत्यंत दुष्कर रहा। सन् 1978 में बनी फ़िल्म साजन बिना सुहागन, जिसमें उनके साथ नूतन ने काम किया था, ने फिर से एक बार राजेन्द्र कुमार का समय पलट दिया और वे फिर से दर्शकों के चहेते बन गये। राज कपूर ने अपनी फ़िल्में संगम (1964) और मेरा नाम जोकर (1970) में बतौर सहायक हीरो के उन्हें रोल दिया था। राज कपूर के साथ उन्होंने फ़िल्म दो जासूस (1975) में भी काम किया और उन्हें दर्शकों की सराहना मिली। उनके दौर की फ़िल्मों के शौकीन लोगों के लिए राजेन्द्र कुमार भी उतने ही बड़े ट्रैजेडी किंग थे, जितने बड़े ट्रैजेडी किंग दिलीप कुमार को माना जाता है।

भारतीय फ़िल्म इतिहास में सत्तर के दशक में राजेन्द्र कुमार सबसे सफल अभिनेता साबित हुए। गायक मोहम्मद रफ़ी राजेन्द्र कुमार की पर्दे पर आवाज़ बन गये थे। यह एक ऐसा वक्त था जब एक साथ उनकी छः से ज्यादा फ़िल्में सिल्वर जुबली सप्ताह की सफलता मना
रही थीं। यह एक ऐसी सफलता थी जिसने उन्हें हिंदी फ़िल्मों का 'जुबली कुमार' बना दिया। फ़िल्म 'गूंज उठी शहनाई' के बाद 1959 में यश चोपड़ा निर्देशित 'धूल का फूल' भी बहुत पसंद की गयी। यह यश चोपड़ा के निर्देशन पारी की शुरुआत थी। 1963 में 'मेरे महबूब' के बाद राज कपूर द्वारा निर्देशित और अभिनीत फ़िल्म 'संगम' में भी राजेन्द्र कुमार के अभिनय को पसंद किया गया। इस फ़िल्म के लिए उन्हें फ़िल्म फेयर अवार्ड के लिए नामांकित किया गया। इसके बाद फ़िल्म 'आरजू', 'सूरज', 'गंवार' जैसी फ़िल्म भी उनके कैरियर में अहम् भूमिका निभाई। 

1970 के शुरूआती दशक में आई फ़िल्मों ने अच्छा व्यवसाय नहीं किया। यह वह समय था जब हिंदी फ़िल्मों में राजेश खन्ना का आगमन हुआ था। राजेन्द्र कुमार के कैरियर का यह कठिन समय था जिसमें 'गंवार' (1970), 'तांगेवाला' (1972), 'गांव हमारा शहर तुम्हारा' (1972), 'आन बान' (1972) आदि फ़िल्में बॉक्स ऑफिस पर असफल हो गयी। इस असफल और मुश्किल भरे वक्त को एक बार राजेन्द्र कुमार ने इंटरव्यू में स्वीकार किया था। यह मुश्किल भरा समय भी बीत गया था। 1978 में उनकी फ़िल्म 'साजन बिना सुहागन' ने बड़ी सफलता हासिल की। इस फ़िल्म में उनकी नायिका नूतन थी। यह फ़िल्म बहुत ही सफल रही। इसके बाद राजेन्द्र कुमार ने मुख्य किरदार के साथ ही चरित्र किरदार भी निभाने लगे। उन्होंने कुछ पंजाबी फ़िल्मों में भी काम किया,जिसमें 'तेरी मेरी एक ज़िंदगी' काफ़ी लोकप्रिय फ़िल्म है। आखिरी बार दीपा मेहता की फ़िल्म 'अर्थ' (1998) में राजेंद्र कुमार नजर आए थे। 

राजेन्द्र कुमार और सुनील दत्त में काफ़ी गहरी दोस्ती थी। इसी दोस्ती को निभाते हुए और अपने बेटे कुमार गौरव के कैरियर को संवारने के लिए उन्होंने सन 1987 में फ़िल्म 'नाम' का निर्माण किया। फ़िल्म बहुत ही सफल रही लेकिन इस फ़िल्म में संजय दत्त के कैरियर को फायदा मिला। राजेन्द्र कुमार के बारे में एक बार सुनील दत्त जी ने इंटरव्यू में कहा कि आज तक राजेन्द्र कुमार को भले ही किसी फ़िल्म के लिए पुरस्कार नहीं मिला है लेकिन वह एक मानवतावादी व्यक्ति हैं। उन दिनों जब संजय दत्त को गिरफ्तार किया गया था और प्रतिदिन हमारे घर की तलाशी होती थी। तब राजेन्द्र कुमार हमारे घर पर आकर रहते थे और इस बात की सांत्वना देते थे कि यह सिर्फ जांच का हिस्सा है। उनको दुनिया की अच्छी समझदारी थी।अपने फ़िल्म स्टार्स के साथ उदारता से पेश आते थे।अपनी इसी विशेष दोस्ती को रिश्ते में बदलते हुए उन्होंने कुमार गौरव का विवाह सुनील दत्त की बेटी नम्रता के साथ किया था। 

बतौर निर्माता-निर्देशक उनकी पहली फ़िल्म थी- लव स्टोरी, जो अपने समय की बड़ी हिट मानी जाती है, इसमें उन्होंने अपने सुपुत्र कुमार गौरव को लिया था। साथ ही उन्होंने फूल, जुर्रत, नाम,लवर्स आदि फ़िल्मों का निर्माण भी किया। उन्होंने मानद मजिस्ट्रेट के तौर पर भी अपनी सेवाएं दीं।

राजेंद्र कुमार ने (1950 और (1960 के दशक में कई कामयाब फ़िल्में दी। इनमें धूल का फूल, मेरे महबूब, संगम और आरजू प्रमुख रहीं। राजेंद्र कुमार को फ़िल्मफेयर पुरस्कार के सर्वश्रेष्ठ अभिनेता की श्रेणी में तीन बार नामांकन मिला, हालांकि उन्हें कभी यह पुरस्कार नहीं मिल पाया क्योंकि वह दौर कई महान अभिनेताओं का था, जो कुछ मामलों में उनसे बीस नजर आए। 1969 में उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया गया। हिन्दी फ़िल्म 'क़ानून' और गुजराती फ़िल्म 'मेंहदी रंग लाग्यो' के लिए उन्हें पं. जवाहरलाल नेहरू के कर-कमलों द्वारा
राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

12 जुलाई 1999 को कैंसर के कारण मुम्बई में राजेंद्र कुमार का निधन हो गया। राजेंद्र कुमार बहुत ही अनुशासित और आरोग्य दिनचर्या के लिए जाने जाते हैं। उनसे जुड़े लोगों का कहना है कि उन्होंने कभी भी जीवन में दवाइयां नहीं लीं।

नीरज

गोपालदास सक्सैना 'नीरज'
अन्य नाम नीरज
🎂जन्म 4 जनवरी, 1925
जन्म भूमि पुरावली, इटावा, उत्तरप्रदेश
⚰️मृत्यु 19 जुलाई, 2018
मृत्यु स्थान दिल्ली
अभिभावक बाबू ब्रजकिशोर
पति/पत्नी मनोरमा शर्मा
संतान एक पुत्र
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र साहित्य
मुख्य रचनाएँ दर्द दिया है, प्राण गीत, आसावरी, गीत जो गाए नहीं, बादर बरस गयो, दो गीत, नदी किनारे, नीरज की गीतीकाएँ, नीरज की पाती, लहर पुकारे, मुक्तकी, गीत-अगीत, विभावरी, संघर्ष, अंतरध्वनी, बादलों से सलाम लेता हूँ, कुछ दोहे नीरज के
विषय कविता, अनुवाद
भाषा हिन्दी
शिक्षा स्नातकोत्तर
पुरस्कार-उपाधि पद्म श्री, पद्म भूषण
हिन्दी साहित्यकार, शिक्षक, एवं कवि सम्मेलनों के मंचों पर काव्य वाचक एवं फ़िल्मों के गीत लेखक थे। वे पहले व्यक्ति थे जिन्हें शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में भारत सरकार ने दो-दो बार सम्मानित किया, पहले पद्म श्री से, उसके बाद पद्म भूषण से। यही नहीं, फ़िल्मों में सर्वश्रेष्ठ गीत लेखन के लिये उन्हें लगातार तीन बार फिल्म फेयर पुरस्कार भी मिला।कवि सम्मेलनों में अपार लोकप्रियता के चलते नीरज को बम्बई के फिल्म जगत ने गीतकार के रूप में नई उमर की नई फसल के गीत लिखने का निमन्त्रण दिया जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया। पहली ही फ़िल्म में उनके लिखे कुछ गीत जैसे कारवाँ गुजर गया गुबार देखते रहे और देखती ही रहो आज दर्पण न तुम, प्यार का यह मुहूरत निकल जायेगा बेहद लोकप्रिय हुए जिसका परिणाम यह हुआ कि वे बम्बई में रहकर फ़िल्मों के लिये गीत लिखने लगे। फिल्मों में गीत लेखन का सिलसिला मेरा नाम जोकर, शर्मीली और प्रेम पुजारी जैसी अनेक चर्चित फिल्मों में कई वर्षों तक जारी रहा।

किन्तु बम्बई की ज़िन्दगी से भी उनका मन बहुत जल्द उचट गया और वे फिल्म नगरी को अलविदा कहकर फिर अलीगढ़ वापस लौट आये।

पद्म भूषण से सम्मानित कवि, गीतकार गोपालदास 'नीरज' ने दिल्ली के एम्स में 19 जुलाई 2018 की शाम लगभग 8 बजे अन्तिम सांस ली।

विक्रमजीत विज

विक्रमजीत विर्क 

🎂 जन्म 19 जुलाई 1984

 विक्रमजीत विर्क एक अभिनेता और निर्माता हैं, जो Shobha Somnath Ki (2011), Amar Akbar Anthony (2018) और दी एजेंट (2023) के लिए मशहूर हैं।
↔️जोगिंदर सिंह सेखों और प्रीतम कौर के घर होतीपुर गांव संगरूर पटरान में हुआ था [वह एक पंजाबी सिख किसान परिवार से हैं । विर्क ने अपनी स्कूली शिक्षा करनाल के खालसा सेन सेकेंडरी स्कूल और एसडी सेन सेकेंडरी स्कूल से की ।  एक एथलीट के रूप में, उन्होंने राज्य का प्रतिनिधित्व करते हुए कबड्डी खेली और बास्केटबॉल और वॉलीबॉल भी खेला।
विर्क 2003 में दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई करने के लिए दिल्ली चले आए और इसी समय उन्होंने अपने मॉडलिंग करियर की शुरुआत की। विर्क की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, उन्होंने 19 जुलाई 2003 को फैशन की दुनिया में अपना पहला कदम रखा। उनका पहला असाइनमेंट "लैक्मे इंडिया फैशन वीक" था। उन्होंने प्रसिद्ध फैशन फोटोग्राफरों के साथ-साथ कुछ संगीत वीडियो के साथ कई प्रोजेक्ट किए। विर्क, जो एक कट्टर सिख हैं, कहते हैं कि मॉडलिंग को अपने करियर के रूप में चुनना कठिन था क्योंकि इसका मतलब था कि उन्हें अपने बाल कटवाने होंगे जो सिखों की धार्मिक मान्यताओं के खिलाफ है और उनके माता-पिता भी इसके खिलाफ थे।

मंगलवार, 18 जुलाई 2023

अनिता नायर

अनीता नायर 
🎂जन्म 19 जुलाई 1984
अनीता नायर एक भारतीय फिल्म अभिनेत्री/थियेटर आर्टिस्ट और गायिका हैं।   अनीता फिल्म चक दे इंडिया में इंडिया वीमेन नेशनल हॉकी टीम की खिलाड़ी के तौर पर नजर आई थीं।  

निजी जीवन 
अनीता नायर का जन्म 19 जुलाई 1984 को बैंगलोर,कर्नाटक में हुआ था।  अनीता के पिता मलयाली और मां पारसी हैं।  अनीता ने प्रारंभिक पढाई द फ्रैंक एंथोनी पब्लिक स्कूल, बेंगलुरु से पूरी की है, और स्नातक की पढ़ाई बेंगलुरु युनिवर्सिटी और आगे की पढाई करने के लिए वह मुंबई चली गयीं। 

अनीता को हिंदी सिनेमा में पहचान उनकी पहली हिंदी फिल्म चक दे इंडिया से मिली, इस फिल्म में उन्होंने अलिया बोस की भूमिका निभाई थी।   अनीता ने अपने एक्टिंग करियर की शुरुआत मलयालम सिनेमा से की, वह अब तक तीन मलयाली फिल्मों में नजर आ चुकी हैं।  

अनिता ब्रिटिश इंडियन कॉमेडी सीरिज में नजर आ चुकी हैं, जिसमे उन्होंने बिंदिया की भूमिका अदा की थी, अनीता की दूसरी इल्म  श्याम बेंगल द्वारा निर्देशित वेल डन अब्बा थी,इसके अलावा अनिता नागेश कुकुनूर की फिल्म आशायें में नजर आयीं थी, जिसमे उन्होंने एक कैंसर के मरीज की भूमिका अदा की थी।  इसके अलावा अनीता झूठा ही सही और फिल्म दम मारो दम में दिखाई दे चुकी हैं।  

फिल्मों के अलावा अनीता कई विज्ञापनों में काम कर चुकी हैं, जिनमे रणबीर कपूर के साथ वर्जिन मोबाइल का ऐड, डेरी मिल्क सिल्क, एसर, डव, मेडिकल अबोर्शन पिल्स आदि शामिल हैं।

अरब्रार आलवी

अबरार अल्वी
🎂जन्मतिथि: 19-जुलाई -1927

⚰️मृत्यु तिथि: 18-नवंबर-2009

व्यवसाय: पटकथा लेखक, अभिनेता, फ़िल्म निर्देशक, फ़िल्म अभिनेता

अबरार अल्वी के बारे में। अबरार अल्वी गुरु दत्त के लिए फिल्में लिखते थे। उन्होंने फिल्में भी डायरेक्ट कीं। 'साहब बीवी और गुलाम' पहली फिल्म थी जो उन्होंने डायरेक्ट की। फिल्म के लेकिन फिल्म के साथ एक नया विवाद भी छिड़ गया। लोगों को लगा कि गुरु दत्त ने बिना अपना नाम बताये ये फिल्म डायरेक्ट की है।अब भला सोचिए अबरार की पहली फिल्म का क्रेडिट अगर गुरु दत्त को मिल रहा हो तो उन्हें कैसा महसूस हो रहा होगा। खैर ऐसी बातें क्यों की गई ये भी आपको बता देते हैं। ये फिल्म गुरु दत्त के मिजाज की थी। इसलिए लोगों को लगा कि इसे गुरु दत्त ने छुप-छुपा के बिना अपना नाम बताए डायरेक्ट किया है। दूसरी वजह थी कि फिल्म के कुछ हिस्सों और गानों को गुरु दत्त ने सचमुच डायरेक्ट किया था।
एक लेखक को एक चरित्र को उसी तरह जानना होता है जैसे एक माँ अपने बच्चों को जानती है। जैसे एक माँ जानती है, जब वह मुड़ती है और कमरे के कोने में शरारत कर रहे अपने दो बच्चों को क्रोध भरी आँखों से देखती है, तो उनमें से एक डर के मारे सहम जाएगा और दूसरा उस पर अपनी जीभ फिराएगा, इसलिए लेखक को यह भी पता होना चाहिए कि उसका प्रत्येक पात्र किसी भी स्थिति पर कैसे प्रतिक्रिया देगा।

यह लेखक, निर्देशक और फिल्मी हस्ती अबरार अल्वी का दर्शन था। उन्हें महान निर्देशक, अभिनेता और निर्माता गुरु दत्त की कई फिल्मों के पटकथा लेखक के रूप में जाना जाता था। लेकिन वास्तव में, वह उनके शिष्य, सहयोगी, विश्वासपात्र और करीबी दोस्त थे।

गुरप्रीत घुगी

गुरप्रीत घुग्गी पंजाबी अभिनेता
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गुरप्रीत घुग्गी

भारतीय अभिनेता

🎂जन्मतिथि: 19-जुलाई -1971

जन्म स्थान: गुरदासपुर, पंजाब, भारत

पेशा: अभिनेता
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गुरप्रीत सिंह वड़ैच (जन्म 19 जुलाई 1971), जिन्हें आमतौर पर गुरप्रीत घुग्गी के नाम से जाना जाता है, एक भारतीय अभिनेता, हास्य अभिनेता और राजनीतिज्ञ हैं।
उन्हें पंजाबी और हिंदी फिल्मों में उनके काम के लिए जाना जाता है।
घुग्गी ने अपने करियर की शुरुआत 1990 के दशक की शुरुआत में थिएटर में अभिनय से की, जिसके बाद उन्हें रोनक मेला और सोप ओपेरा पारछावेन जैसी टेलीविजन श्रृंखलाओं में बार-बार भूमिकाएँ मिलीं।
आसा नू मान वतना दा (2004) में पटवारी झिलमिल सिंह के रूप में अभिनय करके अपने फिल्मी करियर की शुरुआत करने से पहले, उन्होंने अपने वीडियो घुग्गी जंक्शन (2003) और घुग्गी शू मंतर (2004) के माध्यम से हास्य प्रमुख भूमिकाओं के साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सार्वजनिक पहचान हासिल की।
उन्होंने फिल्म कैरी ऑन जट्टा (2012) में अभिनय किया, और अरदास (2015) में उनकी सार्थक प्रमुख भूमिका के लिए उनकी प्रशंसा की गई।
↔️पहले सुच्चा सिंह छोटेपुर के साथ रहे फिर आम आदमी पार्टी में
इसके द्वारा सफ़ल हुए
भगवंत मान
गुरप्रीत सिंह वड़ैच
राजनीतिक दल
आम आदमी पार्टी (2014-2017)
जीवनसाथी
कुलजीत कौर
बच्चे
2
अल्मा मेटर
गुरु नानक देव विश्वविद्यालय
पेशा
अभिनेताहास्य अभिनेताराजनीतिक
कॉमेडी करियर
शैलियां
फिल्मेंस्टैंड - अप कॉमेडीटेलीविजन
उल्लेखनीय कार्य एवं भूमिकाएँ
कैरी ऑन जट्टाघुग्गी खोल पिटारीघुग्गी छू मंतरघुग्गी यार गुप्प ना मारघुग्गी दे बाराती

मनुस्मृति

. ................मनुस्मृति.................... जरा सोचिए, अगर आज भारत का कानून यह तय कर दे कि— "एक आम आदमी चोरी करे तो उसे...