गुरुवार, 13 जुलाई 2023

सैक्सोफोनिस्ट, म्यूजिक डायरेक्टर एवं म्यूजिक अरेंजर मनोहरी सिंह

प्रसिद्ध सैक्सोफोनिस्ट, म्यूजिक डायरेक्टर एवं म्यूजिक अरेंजर मनोहरी सिंह की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि
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मनोहरी सिंह 
🎂08 मार्च 1931 
⚰️13 जुलाई 2010) 
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एक भारतीय संगीत निर्देशक और सेक्सोफोनवादकथे।वे राहुल देव वर्मन के मुख्य संगीत प्रबन्धक (arranger) थे। उन्होने वासुदेव चक्रवर्ती के साथ संगीतकार के रूप में मिलकर काम किया और इस संगीतकार जोड़ी को बसु-मनोहरी के नाम से जाना जाता है।

मनोहारी दादा 'जा रे, जा रे उड़ जा रे पंछी  बहारों के देस जा रे’ (माया), ‘तुम्हे याद होगा कभी हम मिले थे’ (सट्टा बाजार) अजी रूठकर अब कहाँ जाइयेगा और ‘ बेदर्दी बालमा तुझको मेरा मन याद करता है’ (आरजू), अच्छा जी मैं हारी चलो मान जाओ ना’ (काला पानी) रुक जा ओ जाने वाली रुक जा’ (कन्हैया) आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे हर जुबान परा (ब्रहमचारी) शोख नजर की बिजलियाँ, दिल पे मेरे गिराए जा’ (वो कौन थी), ‘है दुनिया उसी की ,जमाना उसी का’ (कश्मीर की कली) ‘हुजूरे वाला, जो हो इजाजत‘ (ये रात फिर न आएगी) ‘गाता रहे मेरा दिल' और ‘तेरे मेरे सपने अब एक रंग हैं’(गाईड), ‘जाग दिले-दीवाना, रुत जागी वसले यार की’ (ऊंचे लोग), ‘जाता हूँ मैं मुझे अब न बुलाना’ (दादी मां), ‘रात अकेली है’ (ज्वेल थीफ), ‘रूप तेरा मस्ताना’ (आराधना), और आर.डी. बर्मन के तो लगभग सारे संगीत में कहीं वादक तो कहीं अरेंजर तो कहीं किसी और रूप में मौजूद हैं ही।

मनोहरी दादा पश्चिमी बंगाल के हुगली जिले में संगीतकारों के एक घर में पैदा हुए थे। 1941 में उनके दादा नेपाल से आकर कलकत्ता में बस गए थे। वे ट्रम्पेट वादक के तौर पर ब्रिटिश सेना की बैंड के सदस्य के रूप में यहाँ लाए गए थे। कुछ दिनों बाद मनोहारी सिंह के पिता भीम बहादुर सिंह भी यहीं आ गए और कलकत्ता में ही पुलिस बैंड में बतौर बैगपाइप और क्लार्नेट-वादक नौकरी पा गए। उनके मामा क्लैरिनेट बजाते थे। उनके चाचा और मामा उस समय के कोलकाता के बाटानगर की बाटा शू कम्पनी के ब्रास बैंड में हिस्सेदारी किया करते थे।

उनके चाचा ने उस ब्रास बैंड के संचालक जोसेफ़ न्यूमैन से उन्हें मिलवाया था और 1942 में 3 रुपये हफ़्ते की तनख्वाह पर नौकरी मिल गयी थी। 1945 में जोसेफ़ न्यूमैन, एच.एम.वी. में सम्मिलित हो गए और उन्हें बाटानगर का ब्रास बैंड छोड़ना पड़ा था। न्यूमैन ने मनोहारी दा की संगीत प्रतिभा पर भरोसा किया क्योंकि उन्हें विश्वास था कि अधिक अभ्यास से वो बेहतर होते जाएंगे और वैसा ही हुआ भी। न्यूमैन के माध्यम से ही मनोहारी दादा की मुलाकात बड़े बर्मन साहब से हुई थी। जोसेफ़ न्यूमैन कई संगीत निर्देशकों जैसे कमल दासगुप्ता, एस.डी. बर्मन, तिमिर बरन और पंडित रविशंकर के लिए संगीत प्रबन्ध (अरेंज) करते थे और मनोहारी दा उनकी नोटेशंस बजाते थे। नाईट-क्लबों में बजाने की इच्छा ने उन्हें सैक्सोफोन बजाना सीखने को प्रेरित किया था। बाद में कई बड़े संगीतकारों जैसे बेनी गुडमैन और आर्टीसियो के साथ काम भी किया था।

वहीं ग्रैंड होटल कलकत्ता में कई बैंड्स के साथ काम कर चुके तेग बहादुर (ख्यात संगीतकार लुई बैंक्स के पिता) एक शानदार ट्रम्पेट प्लेयर थे जहां वे जॉर्जी बैंक्स के नाम से बजाया करते थे और दूसरे चाचा बॉबी बैंक्स थे। इन सब के कारण नाईट-क्लबों में बजाने की उनकी इच्छा ज़ोर पकड़ती गई। कलकते में यह संगीत का एक ऐसा दौर था कि यहाँ के होटलों और नाईट क्लब्स में बड़े नामी कलाकार काम कर रहे थे। मनोहरी भी कलकत्ता सिम्फनी आर्केस्ट्रा के साथ जुड़े रहने के अलावा एक नाईट क्लब ‘फिर्पो’ के साथ 1958 तक काम करते रहे। यह वही समय था जब संगीतकार नौशाद ने मनोहरी और उनके साथ बासू चक्रवर्ती को एक कार्यक्रम में बजाते देखा और संगीतकार सलिल चैधरी को सलाह दी कि इन दोनों कलाकारों को मुम्बई ले आएं।

1958 में सलिल दा उन्हें मुम्बई ले गए। सलिल दा के पास उस समय बहुत काम न था, अतः उन्होंने संगीतकार एस.डी.बर्मन से मिलवाया। बर्मन दा ने उन्हें फिल्म ‘सितारों से आगे’ में पहला मौका दिया । बर्मन दा से पहली मुलाकात के समय ही मनोहारी दा की उनके बेटे आर.डी.बर्मन उर्फ पंचम से भी मुलाकात हो गई। जिस समय सलिल दा मनोहारी को लेकर बाम्बे लैब पहुंचे जहां ‘सितारों से आगे’ की रिकार्डिंग हो रही थी, तो वहां पंचम, जयदेव, और लक्ष्मीकांत भी मौजूद थे। लक्ष्मीकान्त उस समय बतौर साजिन्दा मेंडोलिन बजाते थे और जयदेव बर्मन दा के सहायक थे। मनोहारी की यहाँ से जो मैत्री और स्नेह का सम्बन्ध बना वह आजीवन बना रहा। मनोहारी सिंह ने लगभग सारे बड़े संगीतकारों के साथ काम किया।

⚰️13 जुलाई 2010 को जब मनोहरी दा की मृत्यु हुई उस समय उनकी उम्र 79 वर्ष की थी। विशेष बात यह है कि जब तक जीवित रहे कभी बजाना नहीं छोड़ा। 2003 की फिल्म ‘चलते-चलते’ के लिए भी बजाया तो 2004 की फिल्म ‘वीर जारा’ में भी बजाया। मृत्यु से कुछ दिन पहले ही उन्होंने संगीतकार शंकर-जयकिशन की स्मृति में आयोजित एक कार्यक्रम में बाकायदा परफार्मेंस दिया था।

मास्टर निसार

बोलती फिल्मों के पहले सुपरस्टार अभिनेता गायक मास्टर निसार की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि
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मृत
⚰️13 जुलाई 1980, मुंबई
🎂1904 के आसपास जन्म हुआ.
  🎂05-मार्च-1902 
 ⚰️13-जुलाई-1980
↔️मशहूर गायक जिनको अंतिम दिनों में भीख मांगनी पड़ी थी
थियेटर सीन ☑️एक वो भी जमाना था
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निसार अली मोहम्मद अली का जन्म 5 मार्च 1902 को दिल्ली में हुआ था।  उनके चाचा उन्हें भोपाल ले आए, जब वह 10 साल के थे।  निसार ने रुपये के लिए अपने चाचा की नाटक कंपनी में गायन और अभिनय शुरू किया उन्हें उस समय15 रुपये महीने सैलरी मिलती थी  उन्होंने पं बेताब और उस्ताद झंडे खान से संगीत की शिक्षा ली  लड़कियों और नायिकाओं की कुछ भूमिकाओं के बाद, उनके अच्छे लुक, धाराप्रवाह उर्दू और गायन कौशल के कारण उन्हें आगा हश्र कश्मीरी के नाटकों में नायक की भूमिका मिली।

मास्टर निसार तीस के दशक के मशहूर अभिनेता थे। वे कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) के मदन थिएटर की खोज थे। प्रवाहवार उर्दू बोलना और गाने के लिए बहुत बढ़िया गला, ये मास्टर निसार की विशेषताएँ थीं। उन दिनों किसी की भी किस्मत को परवाज़ चढ़ने के लिए इतनी ही ख़ासियतें बहुत हुआ करती थी। सन 1931 में जहाँआरा कज्जन के साथ मास्टर निसार की जोड़ी 'शीरीं फ़रहाद' और 'लैला मजनूं' में हिट हो गयी थी। जनता में उनके प्रति दीवानगी पागलपन की हद तक थी। 'बहार-ए-सुलेमानी', 'मिस्र का ख़ज़ाना', 'मॉडर्न गर्ल', 'शाह-ए-बेरहम', 'दुख्तर-ए-हिंद', 'जोहर-ए-शमशीर' आदि उनकी सफलतम फ़िल्मों में से थीं।

मास्टर निसार अपने समय के मशहूर नायक थे। उनकी उर्दू भाषा पर पकड़ बहुत अच्छी थी। इसके साथ ही वह गाते भी अच्छा थे। जब सन 1931 में जहाँआरा कज्जन के साथ उनकी जोड़ी बनी और 'शीरीं फ़रहाद' और 'लैला मजनूं' फ़िल्में हिट हो गईं, तब जनता उनके प्रति पागल-सी हो गई थी। बाद में टॉकी इरा आया। मास्टर निसार का जलवा तब भी बरक़रार रहा।

'बहार-ए-सुलेमानी', 'मिस्र का खजाना', 'मॉडर्न गर्ल', 'शाह-ए-बेरहम', 'दुख्तर-ए-हिंद', 'जोहर-ए-शमशीर', 'मास्टर फ़कीर', 'सैर-ए-परिस्तान', 'अफज़ल', 'मायाजाल', 'रंगीला राजपूत', 'इंद्र सभा', 'बिलवा मंगल', 'छत्र बकावली', 'गुलरु ज़रीना' आदि अनेक हिट फिल्मों के जनप्रिय हीरो थे मास्टर निसार। लेकिन ऊंचाई पर पहुंच कर खड़े रहना आसान नहीं रहता। किस्मत के रंग भी निराले होते हैं। सुनहरे दिन हवा हुए। कुंदन लाल सहगल नाम का एक सिंगिंग स्टार धूमकेतु का उदय हुआ। उसकी चमक के सामने मास्टर निसार फीके पड़ गए। वह चरित्र भूमिका करने लगे और फिर छोटे-छोटे रोल तक उन्होंने किये। बाद में वह अर्श से फर्श पर आ गए।

मास्टर निसार के अंतिम दिन बड़ी ही तंगहाली में व्यतीत हुए। पचास और साठ के दशक में 'शकुंतला', 'कोहिनूर', 'धूल का फूल', 'साधना', 'लीडर' में दो-तीन मिनट की छोटी-छोटी भूमिकायें मास्टर निसार ने कीं। जब तक पुराने लोग पहचानें शॉट बदल गया। 'बरसात की रात' की मशहूर कव्वाली- 'न तो कारवां की तलाश है.…' में वह दिखे। 'बूट-पॉलिश' के सेट पर राजकपूर को बताया गया कि मशहूर ज़माने के हीरो मास्टर निसार काम की तलाश में द्वार पर हैं। दरियादिल राजकपूर ने उनके लिए एक छोटा-सा रोल तुरंत ही तैयार कर दिया। उनके आखिरी दिन बड़ी कंगाली में कटे। उन्हें हाजी अली दरगाह पर भीख मांगते हुए भी देखा गया। उस वक़्त वह बहुत बीमार भी थे। जाने कब गुमनामी में ही दिवंगत हो गए। न कोई शवयात्रा, न किसी की आंख से आंसू टपके और न कोई शोक सभा और न ही कोई खबर छपी।

मुख्य फ़िल्में

1935 बहार-ए-सुलेमानी
1935 मिस्र का ख़ज़ाना
1935 मॉडर्न गर्ल
1935 शाह-ए-बेरहम
1934 दुख्तर-ए-हिंद
1934 जोहर-ए-शमशीर
1934 मास्टर फ़कीर
1934 सैर-ए-परिस्तान
1933 अफ़ज़ल
1933 माया जाल
1933 रंगीला राजपूत
1932 इंद्रसभा
1932 बिलवा मंगल
1932 छत्र बकावली
1932 गुलरु ज़रीना
1931 शिरीं फ़रहाद
1931 लैला मजनूं
1931 शकुंतला

परकश मेहरा

प्रसिद्ध फ़िल्म निर्माता निर्देशक प्रकाश मेहरा की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि
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जन्म की तारीख और समय: 13 जुलाई 1939, बिजनौर
मृत्यु की जगह और तारीख: 17 मई 2009, मुंबई
बच्चे:अमित सुमित पुनीत मेहरा
भाई:  बबू मेहरा
नामांकन:सर्व श्रेष्ठ निर्देशक फिल्मफेयर अवार्ड
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आज बॉलीवुड के मशहूर फिल्‍म निर्देशक प्रकाश मेहरा की पुण्‍यतिथि है. वो एक ऐसे निर्देशक हैं जिन्‍होंने इंडस्ट्री को न केवल कई सुपरहिट फिल्‍में दीं, बल्कि अमिताभ बच्‍चन के रूप में महानायक भी दिया. ऐसा इसलिए क्‍योंकि जब एक के बाद एक अभिनेता अमिताभ बच्‍चन की फिल्‍में फ्लॉप होती जा रही थीं और वो मुंबई छोड़ने का मन बनाने लगे थे, तब उनकी जिंदगी में प्रकाश मेहरा एक उम्मीद बनकर आए थे. प्राण के कहने पर उन्होंने अमिताभ बच्चन को 'जंजीर' फिल्म दी और उसके बाद सब जानते हैं यह फिल्म एक इतिहास बना गई. 

यह कहना गलत नहीं होगा कि अगर बिग बी को 'जंजीर' न मिली होतो तो उनका कैरियर आज कुछ अलग तरह का होता! इस फिल्म के बाद अमिताभ बच्चन रातों रात स्टार बन गए थे. इस फिल्म से ही उनकी एंग्री यंग मैन की छवि बनी. एक बार महानायक अमिताभ बच्चन ने कहा था कि प्रकाश मेहरा बॉक्सिंग चैंपियन मुहम्‍मद अली और उन्‍हें लेकर एक फिल्‍म बनाना चाहते थे लेकिन यह सपना अधूरा ही रह गया

मशहूर निर्माता निर्देशक प्रकाश मेहरा उत्‍तर प्रदेश के बिजनौर जिले के रहने वाले थे, लेकिन उनका बचपन पुरानी दिल्ली के चांदनी चौक में बीता. जहां वो अपनी चाची के साथ रहते थे. काम की बात करें तो प्रकाश मेहरा ने 21 साल की उम्र में 1950 के दशक में प्रोडक्शन कंट्रोलर के तौर पर अपने काम की शुरुआत की थी. उन्होंने 'उजाला' (1959) और 'प्रोफेसर' (1962) आदि में प्रोडक्शन कंट्रोलर के तौर पर कार्य किया था.

साल 1968 में जाकर उनकी मेहनत रंग लाई और 'हसीना मान जाएगी' से बतौर निर्देशक उनके कैरियर की शुरुआत हुई. इसी साल उन्होंने शशि कपूर की फिल्म 'हसीना मान जाएगी' का निर्देशन किया, जिसमें शशि कपूर ने दोहरी भूमिका निभाई थी. इसके बाद 1971 में उन्होंने 'मेला' का निर्देशन किया जिसमें फिरोज और संजय ख़ान ने मुख्य भूमिका निभाई थी. इसके एक साल बाद आई फिल्म 'समाधि' भी सफल रही. प्रकाश मेहरा की फिल्मों में एक गजब की रवानी दिखती है जो देखने वाले को बरबस अपनी और खींच कर रखती है. इसके अलावा  संगीत भी उनके फिल्मों की एक बड़ी ताकत रही है. 

उन्‍होंने बॉलीवुड को तमाम सुपरहिट फिल्में दीं, जिसमें हसीना मान जाएगी, हाथ की सफाई, समाधि, जंजीर, मुकद्दर का सिकंदर, घुंघरू, दलाल, शराबी, खून पसीना, जादूगर, हिमालय से ऊंचा और हेरा फेरी आदि फिल्में शामिल हैं. इनमें से कई में अमिताभ बच्‍चन ने काम किया और आज भी ये फिल्‍में बहुत याद की जाती हैं. प्रकाश मेहरा ने 1996 में मशहूर अभिनेता राजकुमार के बेटे पुरू राजकुमार को लेकर 'बाल ब्रह्मचारी' फ़िल्म बनाई, लेकिन उनकी यह फिल्म नाकाम रही. बतौर निर्देशक यह उनकी आखिरी फिल्म थी

बीना राय

बीना राय W/O प्रेम नाथ
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जन्म
कृष्णा सरीन
13 जुलाई 1931
लाहौर , पंजाब , ब्रिटिश भारत (वर्तमान पंजाब, पाकिस्तान )
मृत
6 दिसंबर 2009 (आयु 78 वर्ष)
मुंबई , महाराष्ट्र , भारत
अन्य नामों
बीना राय
पेशा
अभिनेत्री
सक्रिय वर्ष
1950-1991
जीवनसाथी
प्रेम नाथ
बच्चे
2
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बीना राय, जिनका जन्म कृष्णा सरीन के नाम से हुआ था, 1931 में लाहौर , पंजाब, ब्रिटिश भारत की रहने वाली थीं। उनके परिवार को सांप्रदायिक उन्माद के दौरान लाहौर से उखाड़ दिया गया था और उन्हें उत्तर प्रदेश में फिर से बसाया गया था। वह लाहौर में स्कूल गईं और फिर लखनऊ , उत्तर प्रदेश , भारत में आईटी कॉलेज में पढ़ीं। बीना राय अभिनय के लिए बाहर जाने तक कानपुर में रहीं। उन्हें अपने माता-पिता को फिल्मों में अभिनय करने की अनुमति देने के लिए राजी करना पड़ा, उन्होंने दावा किया कि उन्होंने अपने नापसंद माता-पिता को फिल्मों में आने की अनुमति देने के लिए भूख हड़ताल की थी, और अंततः वे मान गए।
↔️बीना राय 1950 में लखनऊ के इसाबेला थोबर्न कॉलेज में कला के प्रथम वर्ष की छात्रा थीं , जब उनकी नजर एक प्रतिभा प्रतियोगिता के विज्ञापन पर पड़ी, तो उन्होंने आवेदन किया और प्रायोजकों से उन्हें फोन आया। हालाँकि वह कॉलेज ड्रामाटिक्स में सक्रिय थीं, लेकिन फ़िल्मी करियर कभी भी उनकी दृष्टि के क्षेत्र में नहीं था। फिर भी, वह प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए बॉम्बे गईं, जहां उन्होंने पुरस्कार राशि में 25,000 रुपये के साथ जीत हासिल की, किशोर साहू की काली घटा ( 1951 ) में एक प्रमुख भूमिका निभाई, जो उनकी पहली फिल्म थी, और इसमें किशोर साहू भी मुख्य भूमिका में थे। भूमिका।

बीना राय का जन्म 13 जुलाई 1931 को हुआ था, उन्होंने 13 जुलाई 1950 को अपनी पहली फिल्म के लिए अनुबंध पर हस्ताक्षर किए थे, जिसका नाम काली घटा था , उनकी पहली फिल्म 13 जुलाई 1951 को रिलीज हुई थी, इस खुशी के दिन उनकी सगाई प्रेमनाथ से हुई थी । 2 सितंबर 1952 को उन्होंने अभिनेता प्रेमनाथ से शादी की , जिनकी बहन कृष्णा की शादी अभिनेता-निर्देशक राज कपूर से हुई थी और वह कपूर परिवार का हिस्सा थे ।उन्होंने कुछ फिल्मों में एक साथ अभिनय किया था, पहली फिल्म जिसमें उनकी राय के साथ जोड़ी थी वह औरत (1953) थी, जो सैमसन और डेलिलाह (1949) की दुखद बाइबिल कहानी का बॉलीवुड संस्करण थी। फिल्म तो हिट नहीं हुई, लेकिन बीना राय और प्रेमनाथएक दूसरे से प्यार हो गया. उन्होंने शादी की और जल्द ही अपनी खुद की प्रोडक्शन यूनिट स्थापित की, जिसे पीएन फिल्म्स के नाम से जाना जाता है। पीएन फिल्म्स की उनकी पहली फिल्म शगुफा (1953) थी और उन्हें इससे काफी उम्मीदें थीं, लेकिन दर्शकों ने इसे खारिज कर दिया। न तो बीना राय का आकर्षक आकर्षण और न ही डॉक्टर की भूमिका में प्रेमनाथ का संवेदनशील चित्रण शगुफा को फ्लॉप होने से बचा सका। और शगुफा के बाद आई फिल्में प्रिज़नर ऑफ गोलकोंडा , समुंदर और वतन थिएटर स्क्रीन पर आते ही गायब हो गईं। इस तरह प्रेमनाथ-बीना राय की जोड़ी कभी पर्दे पर नहीं चली।
☑️बीना राय 1950 में लखनऊ के इसाबेला थोबर्न कॉलेज में कला के प्रथम वर्ष की छात्रा थीं , जब उनकी नजर एक प्रतिभा प्रतियोगिता के विज्ञापन पर पड़ी, तो उन्होंने आवेदन किया और प्रायोजकों से उन्हें फोन आया। हालाँकि वह कॉलेज ड्रामाटिक्स में सक्रिय थीं, लेकिन फ़िल्मी करियर कभी भी उनकी दृष्टि के क्षेत्र में नहीं था। फिर भी, वह प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए बॉम्बे गईं, जहां उन्होंने पुरस्कार राशि में 25,000 रुपये के साथ जीत हासिल की, किशोर साहू की काली घटा ( 1951 ) में एक प्रमुख भूमिका निभाई, जो उनकी पहली फिल्म थी, और इसमें किशोर साहू भी मुख्य भूमिका में थे। भूमिका। [1] [2] [3]

बीना राय का जन्म 13 जुलाई 1931 को हुआ था, उन्होंने 13 जुलाई 1950 को अपनी पहली फिल्म के लिए अनुबंध पर हस्ताक्षर किए थे, जिसका नाम काली घटा था , उनकी पहली फिल्म 13 जुलाई 1951 को रिलीज हुई थी, इस खुशी के दिन उनकी सगाई प्रेमनाथ से हुई थी । 2 सितंबर 1952 को उन्होंने अभिनेता प्रेमनाथ से शादी की , जिनकी बहन कृष्णा की शादी अभिनेता-निर्देशक राज कपूर से हुई थी और वह कपूर परिवार का हिस्सा थे ।उन्होंने कुछ फिल्मों में एक साथ अभिनय किया था, पहली फिल्म जिसमें उनकी राय के साथ जोड़ी थी वह औरत (1953) थी, जो सैमसन और डेलिलाह (1949) की दुखद बाइबिल कहानी का बॉलीवुड संस्करण थी। फिल्म तो हिट नहीं हुई, लेकिन बीना राय और प्रेमनाथएक दूसरे से प्यार हो गया. उन्होंने शादी की और जल्द ही अपनी खुद की प्रोडक्शन यूनिट स्थापित की, जिसे पीएन फिल्म्स के नाम से जाना जाता है। पीएन फिल्म्स की उनकी पहली फिल्म शगुफा (1953) थी और उन्हें इससे काफी उम्मीदें थीं, लेकिन दर्शकों ने इसे खारिज कर दिया। न तो बीना राय का आकर्षक आकर्षण और न ही डॉक्टर की भूमिका में प्रेमनाथ का संवेदनशील चित्रण शगुफा को फ्लॉप होने से बचा सका। और शगुफा के बाद आई फिल्में प्रिज़नर ऑफ गोलकोंडा , समुंदर और वतन थिएटर स्क्रीन पर आते ही गायब हो गईं। इस तरह प्रेमनाथ-बीना राय की जोड़ी कभी पर्दे पर नहीं चली।
☑️बीना राय 1950 में लखनऊ के इसाबेला थोबर्न कॉलेज में कला के प्रथम वर्ष की छात्रा थीं , जब उनकी नजर एक प्रतिभा प्रतियोगिता के विज्ञापन पर पड़ी, तो उन्होंने आवेदन किया और प्रायोजकों से उन्हें फोन आया। हालाँकि वह कॉलेज ड्रामाटिक्स में सक्रिय थीं, लेकिन फ़िल्मी करियर कभी भी उनकी दृष्टि के क्षेत्र में नहीं था। फिर भी, वह प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए बॉम्बे गईं, जहां उन्होंने पुरस्कार राशि में 25,000 रुपये के साथ जीत हासिल की, किशोर साहू की काली घटा ( 1951 ) में एक प्रमुख भूमिका निभाई, जो उनकी पहली फिल्म थी, और इसमें किशोर साहू भी मुख्य भूमिका में थे। भूमिका।

बीना राय का जन्म 13 जुलाई 1931 को हुआ था, उन्होंने 13 जुलाई 1950 को अपनी पहली फिल्म के लिए अनुबंध पर हस्ताक्षर किए थे, जिसका नाम काली घटा था , उनकी पहली फिल्म 13 जुलाई 1951 को रिलीज हुई थी, इस खुशी के दिन उनकी सगाई प्रेमनाथ से हुई थी । 2 सितंबर 1952 को उन्होंने अभिनेता प्रेमनाथ से शादी की , जिनकी बहन कृष्णा की शादी अभिनेता-निर्देशक राज कपूर से हुई थी और वह कपूर परिवार का हिस्सा थे ।उन्होंने कुछ फिल्मों में एक साथ अभिनय किया था, पहली फिल्म जिसमें उनकी राय के साथ जोड़ी थी वह औरत (1953) थी, जो सैमसन और डेलिलाह (1949) की दुखद बाइबिल कहानी का बॉलीवुड संस्करण थी। फिल्म तो हिट नहीं हुई, लेकिन बीना राय और प्रेमनाथएक दूसरे से प्यार हो गया. उन्होंने शादी की और जल्द ही अपनी खुद की प्रोडक्शन यूनिट स्थापित की, जिसे पीएन फिल्म्स के नाम से जाना जाता है। पीएन फिल्म्स की उनकी पहली फिल्म शगुफा (1953) थी और उन्हें इससे काफी उम्मीदें थीं, लेकिन दर्शकों ने इसे खारिज कर दिया। न तो बीना राय का आकर्षक आकर्षण और न ही डॉक्टर की भूमिका में प्रेमनाथ का संवेदनशील चित्रण शगुफा को फ्लॉप होने से बचा सका। और शगुफा के बाद आई फिल्में प्रिज़नर ऑफ गोलकोंडा , समुंदर और वतन थिएटर स्क्रीन पर आते ही गायब हो गईं। इस तरह प्रेमनाथ-बीना राय की जोड़ी कभी पर्दे पर नहीं चली।
☑️हालाँकि, मुख्य अभिनेता प्रदीप कुमार के साथ उनकी फ़िल्में उनका सबसे ज्यादा याद किया जाने वाला अभिनय बनी हुई हैं, जहाँ उन्होंने अनारकली (1953), ताज महल और घूंघट में शीर्षक भूमिका निभाई , जिसके लिए उन्होंने सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का फिल्मफेयर पुरस्कार जीता ।

1970 के दशक में, उनके बेटे प्रेम कृष्ण अभिनेता बन गए और उन्हें एक बड़ी सफलता मिली; दुल्हन वही जो पिया मन भाये (1977), लेकिन गति बरकरार नहीं रख सकी, इसलिए वह सिनेविस्टा बैनर के साथ निर्माता बन गए, जिसने कथासागर , गुल गुलशन गुलफाम और जुनून जैसी टीवी श्रृंखला का निर्माण किया । उन्होंने 2002 में अपनी बेटी आकांक्षा मल्होत्रा ​​को अपने होम प्रोडक्शन में एक अभिनेत्री के रूप में लॉन्च किया, उनका दावा था कि वह उन्हें अपनी मां बीना राय की बहुत याद दिलाती है।

बीना राय ने कई साल पहले यह कहते हुए फिल्मों में काम करना बंद कर दिया था कि एक निश्चित उम्र के बाद महिलाओं को अच्छी भूमिकाएँ नहीं मिलतीं। वह अपने पति प्रेमनाथ के बारे में भी गर्मजोशी से बात करती हैं, जिनकी 3 नवंबर 1992 को मृत्यु हो गई थी। 2002 में, उनके बेटे, कैलाश (मोंटी) ने अपने पिता की 10वीं पुण्य तिथि और 86वीं जयंती के अवसर पर, अमर शीर्षक से एक श्रद्धांजलि एल्बम जारी किया । प्रेमनाथ , सारेगामा द्वारा जारी । उनके पोते, सिद्धार्थ मल्होत्रा ​​ने डॉक्टरों पर सफल टीवी श्रृंखला का निर्देशन किया; संजीवनी (2004).

बीना राय की फिल्मे

1951: काली घटा
1952: सपना
1953: अनारकली [10]
1953: औरत
1953: गौहर
1953: शगुफ़ा
1953: शोले
1954: मीनार
1954: गोलकुंडा के कैदी
1955: इंसानियत
1955: मध भरे नैन
1955: मरीन ड्राइव
1955: सरदार
1956: चंद्रकांत
1956: दुर्गेश नंदिनी
1956: हमारा वतन
1957: बंदी
1957: चंगेज खान
1957: हिल स्टेशन
1957: मेरा सलाम
1957: समुन्दर
1957: तलाश
1960: घुंघट
1962: वल्लाह क्या बात है
1963: ताज महल
1966: दादी माँ
1967: राम राज्य
1968: अपना घर अपनी कहानी

मास्टर सलीम

मास्टर सलीम
🎂जन्म की तारीख और समय: 13 जुलाई 1982 (आयु 40 वर्ष), शाहकोट
माता-पिता: उस्ताद पूरन शाह कोटी, Bibi Mathro
भाई: पर्वेज पेजी
मास्टर राय (सलीम शाहजादा) का जन्म 13 जुलाई 1980 को हुआ था, कभी-कभार आमिर शाहजादा (सलीम शाहजादा) के रूप में जाने जाते हैं, पंजाब के एक भारतीय गायक हैं, जो बॉलीवुड फिल्मों में एक भक्ति गायक और सूफी गायक के रूप में जाने जाते हैं। रूप में काम करते हैं, जैसे हे बेबी (2007), आत्मकथा और लव आज कल (2009)। उन्होंने पंजाबी संगीत, धार्मिक और सूफ़ी संगीत के निजी एलबम भी जारी किये हैं।
आरंभिक जीवन और
वह प्रशिक्षण ईसाई (सलीम शाहजा) के रूप में पैदा हुआ था, पंजाब के जालंधर के पास शाकाकोट में, प्रसिद्ध सूफी गायक उस्ताद पुराण शाह कोठी का पुत्र है, जो लोक गायक, हंस राज हंस, जसबीर जस्सी और साबर कोटी के गुरु थे. छह साल की उम्र में दिलजान भी अपने शिष्य बन गए और गाना सीखना शुरू कर दिया।

व्यवसाय
सात साल की उम्र में, उन्होंने अपना गाना, चरखे दी घूर के साथ, भटिंडा दूरदर्शन (टीवी स्टेशन) के उद्घाटन समारोह में अपना पहला सार्वजनिक प्रदर्शन दिया, और इस प्रकार मास्टर दीक्षित का नाम कमाया। जल्द ही उन्होंने टीवी शो जैसे झिलमिल तारे पर रियलिटी शो शुरू कर दिया।
सिद्धांत का पहला एलबम, चरखी दी घूक, जब वह 10 साल का था तब चला गया था। यह उनके पिता के मित्र मंजीदार सिंह द्वारा निर्मित सुर ताल लेबल पर रिलीज़ हुई, और एक हिट बन गई। कई पंजाबी संगीत और धार्मिक एल्बम और लाइव शो का नेतृत्व किया। उनका गाना ढोल जगीरो दा भी बहुत हिट हुआ और उन्हें बड़े पैमाने पर रिलीज़ किया गया। 1990 के दशक के अंत में, जब वह बड़े हुए तो उनकी आवाज़ें शुरू हुईं, जिन्होंने अपनी प्राथमिकता कम कर दी। उन्होंने 2000 में सूफी संख्या अजय देवदार माही दा के साथ अपनी वापसी की, जिसमें उन्होंने दूरदर्शन चैनल पर एक नए साल के कार्यक्रम में भाग लिया, और बाद में देवी दुर्गा को समर्पित एल्बम, मेला मैया दा (2004), आज जारी किया। जगत्रा, मेरी मैया और दर्शन कर लो

2005 के आसपास, गायक जसबीर जस्सी ने उन्हें संगीत निर्देशित संदीप चाटा से पेश किया था, बाद में उन्हें सोनी म्यूजिक एलबम तेरे संजय में एकल सजनी रिकॉर्ड करने के लिए दिल्ली से बुलाया गया।

शंकर-एहसान-लॉय के संगीत त्रिवेणी शंकर महादेवन ने एक धार्मिक टीवी चैनल पर प्रसारित देवी तालाब मंदिर, जालंधर के एक जगत में अपने प्रदर्शन को सुना, और इस तरह के सिद्धांत ने एकल "मस्त कलंदर" के साथ गायक के रूप में अपनी शुरुआत की। की "उनके संगीत निर्देशक के तहत फिल्म "हे बेबी" (2007) से। यह गाना एक हिट था और बॉलीवुड कैरियर का लॉन्च हुआ। इसके बाद फिल्म सिद्धांत (2008) से फिल्म 'तशन और मा दा लाडला' और 'लव आज कल' आई। ' अहान अहुन (2009) में "तशान मीनी" में सबसे प्रसिद्ध एकल कलाकार के साथ शामिल हैं। और 2010 में उनके हिट कलाकार में से कुछ "हमका पीनी है" में दबबी और "शकीरा" में "नो शैतान" और "चमकी जवानी" यमला शामिल हैं। पगला दीवाना में हैं। 2011 में पटियाला हाउस में उनकी पहली हिट "रोला पे गया" थी।

बुधवार, 12 जुलाई 2023

एल्विन लक्ष्मी शर्मा

एवलिन लक्ष्मी शर्मा 
🎂जन्म की तारीख और समय: 12 जुलाई 1986 (आयु 37 वर्ष), फ़्रैंकफ़र्ट, जर्मनी
एक भारतीय अभिनेत्री हैं और उनकी जड़ें भी जर्मनी में हैं। उनका जन्म 1986 में फ्रैंकफर्ट, जर्मनी में एक जर्मन मां और एक भारतीय पिता के घर हुआ था। वह बिजनेस स्टडीज की छात्रा थीं और यूनाइटेड किंगडम में एक मॉडल बन गईं, जिसके बाद उन्होंने बॉलीवुड में अपना करियर बनाने का फैसला किया। इससे पहले उन्होंने एक साधारण ब्रिटिश फिल्म में भी अभिनय किया था। एवलिन ने अपनी पहली बॉलीवुड फिल्म फ्रॉम सिडनी विद लव में अभिनय किया। हालाँकि, उन्हें अधिक पहचान तब मिली जब उन्होंने अभिनीत फिल्म ये जवानी है दीवानी में एक छोटा सा किरदार निभायारणबीर कपूरऔर दीपिका पादुकोन. फिल्म ब्लॉकबस्टर साबित हुई और उनकी भूमिका को कुछ अच्छी समीक्षाएं भी मिलीं। उसके बाद उन्होंने कई आइटम गानों में अभिनय किया और 2015 में रिलीज़ हुई फिल्म इश्कदारियां में बहुत अलग भूमिका निभाई। यह पहली फिल्म थी जिसमें उन्होंने एकल मुख्य भूमिका निभाई। उनकी भूमिका एक शिक्षिका की थी जो उनके दादा के लिए चंदा इकट्ठा कर रही थी। हालाँकि, उनकी फिल्म बॉक्स ऑफिस पर इतना अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाई। एवलिन ने जर्मनी में रियल एस्टेट में भी काम किया है और कहा जाता है कि वह डच, थाई और फिलीपींस की तागालोग समेत आठ भाषाएं जानती हैं। वह चैरिटी में भी सक्रिय हैं और एसओएस चिल्ड्रेन विलेज ऑफ इंडिया के लिए काम करती हैं।

प्राण

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महान खलनायक एवम् चरित्र अभिनेता प्राण की पुण्यतिथि पर हार्दिक 
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प्राण कृष्ण सिकंद हिन्दी फ़िल्मों के जाने माने नायक, खलनायक और चरित्र अभिनेता थे। प्राण ऐसे अभिनेता
थे जिनके चेहरे पर हमेशा मेकअप रहता है और भावनाओं का तूफ़ान नज़र आता है जो अपने हर किरदार में जान डालते हुए यह अहसास करा जाता है कि उनके बिना यह किरदार बेकार हो जाता। उनकी संवाद अदायगी की शैली को आज भी लोग भूले नहीं हैं।

प्राण का जन्म 12 फ़रवरी, 1920 को पुरानी दिल्ली के बल्लीमारान इलाके में बसे एक रईस परिवार में हुआ था। बचपन में उनका नाम 'प्राण कृष्ण सिकंद' था। उनका परिवार बेहद समृद्ध था। प्राण बचपन से ही पढ़ाई में होशियार थे। बड़े होकर उनका फोटोग्राफर बनने का इरादा था। 1940 में जब मोहम्मद वली ने पहली बार पान की दुकान पर प्राण को देखा तो उन्हें फ़िल्मों में उतारने की सोची और एक पंजाबी फ़िल्म “यमला जट” बनाई, जो बेहद सफल रही। फिर क्या था, इसके बाद प्राण ने कभी मुड़कर देखा ही नहीं। 1947 तक वह 20 से ज़्यादा फ़िल्मों में काम कर चुके थे और एक हीरो की इमेज के साथ इंड्रस्ट्री में काम कर रहे थे।हालांकि लोग उन्हें विलेन के रुप में देखना ज़्यादा पसंद करते थे।

अभिनेता प्राण को दशकों तक बुरे आदमी (खलनायक) के तौर पर जाना जाता रहा और ऐसा हो भी क्यों ना, पर्दे पर उनकी विकरालता इतनी जीवंत थी कि लोग उसे ही उसकी वास्तविक छवि मानते रहे, लेकिन फ़िल्मी पर्दे से इतर प्राण असल ज़िंदगी में वे बेहद सरल, ईमानदार और दयालु व्यक्ति थे। समाज सेवा और सबसे अच्छा व्यवहार करना उनका गुण था। 

प्राण की शुरुआती फ़िल्में हों या बाद की फ़िल्में उन्होंने अपने आप को कभी दोहराया नहीं। उन्होंने अपने
हर किरदार के साथ पूरी ईमानदारी से न्याय किया। फिर चाहे भूमिका छोटी हो या बड़ी, उन्होंने समानता ही रखी। प्राण को सबसे बड़ी सफलता 1956 में 'हलाकू' फ़िल्म से मिली जिसमें उन्होंने डकैत हलाकू का सशक्त किरदार निभाया था। प्राण ने राज कपूर निर्मित-निर्देशित 'जिस देश में गंगा बहती है' में राका डाकू की भूमिका निभाई थी जिसमें उन्होंने केवल अपनी आँखों से ही क्रूरता ज़ाहिर कर दी थी। कभी ऐसा वक़्त भी था जब हर फ़िल्म में प्राण नज़र आते थे खलनायक के रूप में। उनके इस रूप को परिवर्तित किया था भारत कुमार यानी मनोज कुमार ने, जिन्होंने अपनी निर्मित-निर्देशित पहली फ़िल्म 'उपकार' में उन्हें मलंग बाबा का रोल दिया। जिसमें वे अपाहिज की भूमिका में थे, भूमिका कुछ छोटी ज़रूर थी लेकिन थी बहुत दमदार। इस फ़िल्म के लिए उनको पुरस्कृत भी किया गया था। उन पर फ़िल्माया गया कस्में वादे प्यार वफा सब बातें हैं बातों का क्या आज भी लोगों के दिलो-दिमाग में छाया हुआ है। भूले भटके जब कभी यह गीत बजता हुआ कानों को सुनाई देता है तो तुरन्त याद आते हैं प्राण। ऐसा ही कुछ अमिताभ बच्चन अभिनीत ज़ंजीर में भी हुआ था। नायक के पठान दोस्त
की भूमिका में उन्होंने अपने चेहरे के हाव भावों और संवाद अदायगी से जबरदस्त प्रभाव छो़डा था। इस फ़िल्म का गीत यारी है ईमान मेरा, यार मेरी ज़िन्दगी सिर्फ़ और सिर्फ़ उनके नृत्य की वजह से याद किया जाता है

प्राण 1942 में बनी ‘ख़ानदान’ में नायक बन कर आए और नायिका थीं नूरजहाँ। 1947 में भारत आज़ाद हुआ और विभाजित भी। प्राण लाहौर से मुंबई आ गए। यहाँ क़रीब एक साल के संघर्ष के बाद उन्हें 'बॉम्बे टॉकीज' की
फ़िल्म ‘जिद्दी’ मिली। अभिनय का सफर फिर चलने लगा। पत्थर के सनम, तुम सा नहीं देखा, बड़ी बहन, मुनीम जी, गंवार, गोपी, हमजोली, दस नंबरी, अमर अकबर एंथनी, दोस्ताना, कर्ज, अंधा क़ानून , पाप की दुनिया, मत्युदाता क़रीब 350 से अधिक फ़िल्मों में प्राण साहब ने अपने अभिनय के अलग- अलग रंग बिखेरे। इसके अतिरिक्त प्राण कई सामाजिक संगठनों से जुड़े रहे और उनकी अपनी एक फुटबॉल टीम बॉम्बे डायनेमस फुटबॉल क्लब भी रही है।

हम बोलेगा तो बोलोगे की बोलता है... यह संवाद प्राण ने ही अपने एक फ़िल्म में कहा था, जो आज उनके अभिनय जीवन के सार पर भी सटीक बैठ रहा है।जीवंत अभिनय तथा बेहतरीन संवाद अदायगी के बलबूते दर्शकों के दिलों में खलनायक का भयावह रुप उकेरने वाले प्राण की अदाकारी को भी शब्दों में नहीं ढ़ाला जा सकता। ऐसे में उन्हें लेकर जितने भी शब्दजाल बिने जाये वो कमतर ही होंगे। तभी उनका डॉयलाग 'हम बोलेगा तो बोलोगे की बोलता है' का ज़िक्र है, जो दर्शाता है कि प्राण ने अपने संवादों को रुपहले पर्दे पर ही नहीं बल्कि जीवन में भी उतारा। प्राण को दादा साहब फाल्के पुरस्कार की घोषणा शायद इस वजह से भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण है कि यह पहली बार परदे पर खलनायक की भूमिका अदा करने वाले एक अभिनेता को मिल रहा है। प्राण सिनेमा के परदे पर खलनायकी के पर्याय हैं। प्राण ने अपने कैरियर की शुरुआत पंजाबी फ़िल्म 'यमला जट' से 1940 में की थी। 1942 वाली हिंदी फ़िल्म 'खानदान' से उनकी छवि रोमांटिक हीरो की बनी। लाहौर से मुंबई आने के बाद 'जिद्दी' से उनके बॉलीवुड कैरियर की शुरुआत हुई। इसके बाद तो वह हिंदी फ़िल्मों के चहेते विलेन ही बन गए। प्राण ने हिंदी सिनेमा की कई पीढ़ियों के साथ अभिनय किया। दिलीप कुमार, देव आनंद और राजकपूर के साथ पचास के दशक में, साठ और सत्तर के दशक में शम्मी कपूर , राजेंद्र कुमार और धर्मेंद्र के साथ उनकी कई फ़िल्में यादगार रहीं। वह जो रोल करते, उसकी आत्मा में उतर जाते। लोग उन्हें विलेन और साधु, दोनों रूपों में सराहने लगे। 'पूजा के फूल' और'कश्मीर की कली' जैसी फ़िल्मों से प्राण ने अपना नाता कॉमेडी से भी जोड़ लिया।
अस्सी के दशक में राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन के साथ उनकी कई यादगार फ़िल्में आईं।उनकी खलनायकी के विविध रूप 'आजाद', 'मधुमती', देवदास , 'दिल दिया दर्द लिया', 'मुनीम जी' और 'जब प्यार किसी से होता है' में देखे जा सकते हैं। उनकी हिट फ़िल्मों की फेहरिस्त भी बड़ी लंबी है। अपने समय की लगभग सभी प्रमुख
अभिनेत्रियों के साथ उनकी फ़िल्में आईं। पंजाब , उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में शिक्षित प्राण किसी भी ज़बान और लहजे को अपना बना लेते थे। उनकी अदा और डायलॉग डिलीवरी रील रोल को रियल बना देती थी। उनका डायलॉग -तुमने ठीक सुना है बरखुरदार, चोरों के
ही उसूल होते हैं खूब चर्चित हुआ। सबसे बड़ी बात यह कि चार सौ से अधिक फ़िल्में करने वाले प्राण ने खुद को कभी दोहराया नहीं। 'पत्थर के सनम' हो या 'जिस देश में गंगा बहती है', 'मजबूर' हो या 'हाफ टिकट' या फिर 'धर्मा', प्राण ने हर फ़िल्म में अपनी मौजूदगी का पूरा अहसास कराया

प्राण के प्रसिद्ध संवाद (डायलॉग) 

(डायलॉग) फ़िल्म 1. इस इलाक़े में नए आए हो बरखुरदार, वरना यहां शेर खान को कौन नहीं जानता! ज़ंजीर 
2. राम ने हर युग में जन्म लिया लेकिन लक्ष्मण फिर पैदा नहीं हुआ उपकार 
3. ये पाप की नगरी है, यहां कंस और दुर्योधन का ठिकाना है उपकार 
4. ज़िंदगी में चढ़ते की पूजा मत करना, डूबते की भी सोचना उपकार 
5. ये फूलों के साथ साथ दिल कब से बेचना शुरू कर दिया है कश्मीर की कली
 6. एक डाकू की लड़की पुलिस वाले से शादी करेगी, गोली मारिए सरदार जिस देश में गंगा बहती है 
7. शेर और बकरी जिस घाट पर एक साथ पानी पीते हों, वो घाट, न हमने देखा है और न देखना चाहते हैं आन बान
 8. पहचाना इस इकन्नी को, यह वही इकन्नी है जिसे बरसों पहले उछालकर तुमने मेरा मज़ाक उड़ाया था। रॉबर्ट सेठ तुम्हारे ही सोने से तुम्हारे ही आदमियों को ख़रीद कर आज मैं तुम्हारी जगह पहुंच गया हूं और तुम मेरे क़दमों में। अमर अकबर एंथनी 
9. क्योंकि मैं रिवॉल्वर हमेशा ख़ाली रखता हूं मजबूर 
10. लेकिन मैं उस क़िस्म का जेलर नहीं हूं। मैं न तो छुट्टी पर जाऊंगा और न तबादले की दरख़्वास्त करूंगा। तुम्हारा वो रिकॉर्ड है, तो हमारा भी एक रिकॉर्ड है। हमारी जेल से संगीन से संगीन क़ैदी जो बाहर गया है उसने तुम्हारे उस दरबार में दुआ मांगी है तो यही दुआ मांगी है कि अगर दोबारा जेल जाए तो रघुवीर सिंह की जेल में न जाए कालिया 
11. समझते हो कि सब समझता हूं इससे बढ़कर इंसान की नासमझी और क्या हो सकती है क्रोधी
 12. शायद तू यह भूल गया कि इस ज़मीन पर फ़तह ख़ां अकेला पैदा नहीं हुआ है, उसके साथ उसकी बला की ज़िद भी पैदा हुई है। कहीं मेरी ज़िद किसी ज़िद पर आ गई तो अपनी बेटी के रास्ते में पड़े हुए बेशुमार कांटों को तो मैं अपने दामन में समेट लूंगा लेकिन तेरे रास्ते दहकते हुए अंगारों से भर दूंगा। सनम बेवफ़ा
 13. आवाज़ तो तेरी एक दिन मैं नीची करूंगा, शेर की तरह गरजने वाला बिल्ली की ज़बान बोलेगा। सनम बेवफ़ा

रोचक तथ्य

पहली फ़िल्म के मिले 50 रुपये प्राण जब मात्र 19 वर्ष के थे तो उन्होंने 'दलसुख पंचोली' के निर्देशन में बनी पंजाबी फ़िल्म ‘यमला जट’ मे हीरो की भूमिका अदा की थी। उन्हें यह फ़िल्म लेखक 'वली मुहम्मद वली' ने उस समय ऑफ़र की थी जब वह 1939 में लाहौर में एक पान की दुकान के बाहर खड़े हुए थे। उन्हें इस भूमिका के लिए 50 रुपये दिए गये

प्राण को शायरी व फ़ोटोग्राफ़ी से बहुत अधिक लगाव था। एक समय में उनका घर उनकी तस्वीरों से भरा हुआ था जो विभिन्न रूपों में खींची गई थीं। प्राण को कबीर , ग़ालिब व फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का लगभग पूरा कलाम याद था और वह सेट पर भी इनकी शायरी पढ़ते थे।ताश खेलना व स्पोर्टस भी उनको पसंद थे। वह और उनकी पत्नी मुंबई के 'क्रिकेट क्लब ऑफ इंडिया' में नियमित जाया करते थे। उन्होंने अनेक सेलीब्रिटी मैचों को स्वर्गीय पी. जयराज के साथ मिलकर आयोजित किया। वह मुंबई की फुटबॉल टीम 'डायनामो' के प्रायोजक भी थे।
सह-अभिनेत्रियाँ प्राण ने अपने ज़माने की लगभग सभी अभिनेत्रियों के साथ काम किया। 'खानदान' (1942) में 13 वर्षीय नूरजहां तो क़द में इतनी छोटी थीं कि उन्हें प्राण के साथ अभिनय करते समय ईटों पर खड़ा होना पड़ता था। वैजयंतीमाला (बहार, 1951) व हेलन
(हलाकू, 1956) ने अपनी पहली फ़िल्म प्राण के साथ ही की थीं। हिन्दी फ़िल्मों के पर्दे पर खलनायक की भूमिका अदा करने वाले प्राण फ़िल्मोद्योग में भद्र व्यक्ति के रूप में जाने जाते थे। वह अपने में मस्त रहते थे और आज तक किसी हीरोइन के साथ उनका स्कैंडल नहीं हुआ। सेट पर वह लतीफ़े सुनाते,शायरी सुनाते, लेकिन जब दृश्य पूरा हो जाता तो वह अपने कमरे में जा कर अपने आप तक सीमित हो जाते।प्रभावी खलनायकी प्राण ने पर्दे पर अक्सर बुरे व्यक्ति की भूमिका की, इसलिए यह अंदाजा लगाना कठिन हो जाता है कि वास्तव में वह कितने अच्छे व्यक्ति हैं। उनकी खलनायकी इतनी प्रभावी थी कि लोगों ने अपने बच्चों का नाम प्राण रखना बंद कर दिया था। उनके तीनों बच्चों पिंकी, अरविंद व सुनील को बहुत शर्मिंदगी होती थी, जब दूसरे बच्चे प्राण को खलनायक कहते थे। उनकी बेटी पिंकी ने एक बार उनसे पूछा था कि वह फ़िल्मों में अच्छी भूमिकाएं क्यों नहीं करते हैं? इसलिए जब 1967 में उन्हें मनोज कुमार ने ‘उपकार’ ऑफ़र की तो उन्होंने उसे फ़ौरन स्वीकार कर लिया। यह हिन्दी सिनेमा में उनकी पहली सकारात्मक भूमिका वाली फ़िल्म थी। 

मुमताज़ की त्वचा बहुत कोमल थी और उस पर आसानी से निशान पड़ जाते थे। चूंकि प्राण के साथ उनकी फ़िल्मों में उन्हें अक्सर पर्दे पर संघर्ष करते हुए दिखाया जाता था तो मुमताज के बदन पर काले व नीले निशान पड़ जाते थे। दृश्य पूरा होने के बाद प्राण को बहुत शर्मिंदगी होती थी और वह मुमताज से माफ़ी मांगा करते थे। हास्य के लिए प्राण का नृत्य प्राण की एक कमज़ोरी यह रही कि वह नृत्य करना नहीं जानते थे। इसलिए जब फ़िल्म में हास्य की स्थिति उत्पन्न करनी होती तो प्राण से नृत्य कराया जाता जैसा कि ‘मुनीम जी’, ‘बल्फ मास्टर’ आदि। नृत्य न करने की वजह से ही उन्होंने 6-7 फ़िल्मों के बाद हीरो की भूमिका करना बंद कर दिया था। फिर भी पर्दे पर गाए उनके गीत बहुत मशहूर हुए जैसे ‘यारी
है ईमान मेरा’ ( ज़ंजीर 1973), ‘राज को राज ही रहने दो’ (धर्मा 1973) या ‘क़समे, वादे, प्यार, वफा सब’ (उपकार 1967)घर के बाहर प्रशंसकों की भीड़ प्राण ने 1950 के दशक में अपना बंगला बांद्रा के यूनियन पार्क में बनवाया। इस जगह को फ़िल्मी दुनिया के लोग मनहूस जगह समझते थे क्योंकि इसमें रहने वाले अनेक कलाकार जैसे कॉमेडियन गोप, निर्माता राम कमलानी व संगीतकार अनिल विश्वास को जबरदस्त प्रोफेशनल घाटा उठाना पड़ा था। लेकिन प्राण ने ऐसे किसी अंधविश्वास को मानने से इंकार कर दिया। उन्हें जगह पसंद आई और उन्होंने अपने बंगले का नाम अपनी बेटी के नाम पर ‘पिंकी’ रख दिया। पालीहिल पर वह पहला मशहूर घर था। प्राण के घर के आगे उनके प्रशंसकों की भीड़ लगी रहती थी। बच्चे भी वहां जमा हो जाते थे। प्राण को बच्चे बहुत पसंद थे और वह उन्हें अपने घर में आमंत्रित करते व उन्हें मिठाई, बिस्किट आदि खिलाते।

देश के विभाजन के समय प्राण सिकंद मुंबई आए और इतने आत्मविश्वास से भरे थे कि उन्होंने भव्य ताजमहल होटल में कमरा लिया। उन्हें लगा कि कुछ ही दिनों में काम मिलने के बाद अपना फ्लैट ख़रीदेंगे, परंतु उन्हें नए सिरे से संघर्ष करना पड़ा और लाहौर में सफल नायक रहे प्राण को मजबूर होकर ‘गृहस्थी’ (1948) में खलनायक की भूमिका करनी पड़ी, परंतु मीना कुमारी के साथ ‘हलाकू’ नामक फ़िल्म में एक बर्बर, सनकी और वहशी तानाशाह की भूमिका में उन्होंने ऐसा खौफ पैदा किया कि हर बड़ी फ़िल्म में उन्हें खलनायक की भूमिका मिलने लगी। ‘हलाकू’ में प्राण सिकंद ने यह सीखा कि उन्हें अपनी भूमिकाओं के लिए विशेष पोशाक, विग इत्यादि का उपयोग करना चाहिए। उनकी पोशाकें और विग उनके अभिनय का हिस्सा बन गए।प्राण ने लगभग 350 से ज्यादा फ़िल्मों में अभिनय किया, लेकिन वह अपनी फ़िल्मों सहित बमुश्किल ही कोई फ़िल्म देखते थे। प्राण को ‘परिचय’ (1972) में अपनी भूमिका सबसे कठिन प्रतीत हुई, जिसमें उन्होंने एक ज़िद्दी, अनुशासित व्यक्ति की भूमिका अदा की थी। उनकी सबसे पसंदीदा फ़िल्म ‘विक्टोरिया नम्बर 203′ (1972) है जिसका निर्देशन ब्रिज ने किया था। शम्मी कपूर की लगभग सभी फ़िल्मों में प्राण ने खलनायक की भूमिका निभाई। पर्दे की इस दुश्मनी के बावजूद दोनों आपस में गहरे दोस्त थे। दोनों को ही मांसाहारी भोजन व शराब बहुत पसंद थी। प्राण के अन्य अच्छे दोस्तों में दिलीप कुमार व राज कपूर शामिल थे और यह तिकड़ी अक्सर उनके बंगले पर महफिलें जमाती थीं

मशहूर फ़िल्म अदाकार 'प्राण' का निधन हिंदी फ़िल्मों के मशहूर विलेन और चरित्र अभिनेताप्राण की शुक्रवार 12 जुलाई , 2013 को देर शाम मुंबई के लीलावती अस्पताल में मौत हो गई। वो 93 साल के थे। उनके बेटे सुनील ने बीबीसी संवाददाता मधू पाल को बताया कि वो लीलावती अस्पताल में भर्ती थे जहां उनकी मौत देर शाम हुई। समाचार एजेंसी पीटीआई ने प्राण की बेटी पिंकी के हवाले से कहा है, "उनकी मौत लंबी बीमारी के बाद हुई।" उन्हें इस साल दादा साहब फालके पुरस्कार से सम्मानित किया गया था लेकिन वो इस क़दर बीमार थे कि इसे ख़ुद
स्वीकार करने दिल्ली नहीं आ पाए थे। बाद में सूचना और प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने उनके घर जाकर उन्हें यह पुरस्कार दिया। उनके निधन पर दुख जताते हुए बॉलीवुड ने उन्हें भारतीय सिनेमा का बड़ा स्तंभ बताया, जिनका कई सितारों का जीवन बनाने में अहम योगदान था। फ़िल्म इंडस्ट्री के पुराने और युवा अभिनेताओं ने प्राण के निधन पर अपनी संवेदना जताई। सुपरस्टार दिलीप कुमार और अमिताभ बच्चन ने बॉलीवुड के लीजेंड के साथ
जुड़ी अपनी यादें साझा कीं। प्राण के साथ कई फ़िल्मों में काम कर चुके अमिताभ बच्चन ने कहा कि उनके जैसे कद्दावर अभिनेता अब नहीं आते। उन्होंने कहा, 'वह एक बेहतरीन व्यक्ति, प्रशंसनीय सहयोगी, संपूर्ण पेशेवर, निभाये जाने वाले पात्रों को अपने में आत्मसाथ करने वाले, काम के बाद एक दिलचस्प साथी और एक विचारशील मनुष्य थे।' दिलीप साहब ने कहा, 'मैं कभी नहीं भूल सकता कि प्राण कैसे मेरे निकाह में पहुंचे थे। श्रीनगर के खराब मौसम से जूझते हुए, वह वहां शूटिंग कर रहे थे। उन्होंने दिल्ली की फ्लाइट ली, वहां से फिर शाम में मुंबई पहुंचे, बस मेरे निकाह से ठीक पहले मुझे गले लगाने के लिए।'

मनुस्मृति

. ................मनुस्मृति.................... जरा सोचिए, अगर आज भारत का कानून यह तय कर दे कि— "एक आम आदमी चोरी करे तो उसे...