बुधवार, 12 जुलाई 2023

प्राण

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महान खलनायक एवम् चरित्र अभिनेता प्राण की पुण्यतिथि पर हार्दिक 
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प्राण कृष्ण सिकंद हिन्दी फ़िल्मों के जाने माने नायक, खलनायक और चरित्र अभिनेता थे। प्राण ऐसे अभिनेता
थे जिनके चेहरे पर हमेशा मेकअप रहता है और भावनाओं का तूफ़ान नज़र आता है जो अपने हर किरदार में जान डालते हुए यह अहसास करा जाता है कि उनके बिना यह किरदार बेकार हो जाता। उनकी संवाद अदायगी की शैली को आज भी लोग भूले नहीं हैं।

प्राण का जन्म 12 फ़रवरी, 1920 को पुरानी दिल्ली के बल्लीमारान इलाके में बसे एक रईस परिवार में हुआ था। बचपन में उनका नाम 'प्राण कृष्ण सिकंद' था। उनका परिवार बेहद समृद्ध था। प्राण बचपन से ही पढ़ाई में होशियार थे। बड़े होकर उनका फोटोग्राफर बनने का इरादा था। 1940 में जब मोहम्मद वली ने पहली बार पान की दुकान पर प्राण को देखा तो उन्हें फ़िल्मों में उतारने की सोची और एक पंजाबी फ़िल्म “यमला जट” बनाई, जो बेहद सफल रही। फिर क्या था, इसके बाद प्राण ने कभी मुड़कर देखा ही नहीं। 1947 तक वह 20 से ज़्यादा फ़िल्मों में काम कर चुके थे और एक हीरो की इमेज के साथ इंड्रस्ट्री में काम कर रहे थे।हालांकि लोग उन्हें विलेन के रुप में देखना ज़्यादा पसंद करते थे।

अभिनेता प्राण को दशकों तक बुरे आदमी (खलनायक) के तौर पर जाना जाता रहा और ऐसा हो भी क्यों ना, पर्दे पर उनकी विकरालता इतनी जीवंत थी कि लोग उसे ही उसकी वास्तविक छवि मानते रहे, लेकिन फ़िल्मी पर्दे से इतर प्राण असल ज़िंदगी में वे बेहद सरल, ईमानदार और दयालु व्यक्ति थे। समाज सेवा और सबसे अच्छा व्यवहार करना उनका गुण था। 

प्राण की शुरुआती फ़िल्में हों या बाद की फ़िल्में उन्होंने अपने आप को कभी दोहराया नहीं। उन्होंने अपने
हर किरदार के साथ पूरी ईमानदारी से न्याय किया। फिर चाहे भूमिका छोटी हो या बड़ी, उन्होंने समानता ही रखी। प्राण को सबसे बड़ी सफलता 1956 में 'हलाकू' फ़िल्म से मिली जिसमें उन्होंने डकैत हलाकू का सशक्त किरदार निभाया था। प्राण ने राज कपूर निर्मित-निर्देशित 'जिस देश में गंगा बहती है' में राका डाकू की भूमिका निभाई थी जिसमें उन्होंने केवल अपनी आँखों से ही क्रूरता ज़ाहिर कर दी थी। कभी ऐसा वक़्त भी था जब हर फ़िल्म में प्राण नज़र आते थे खलनायक के रूप में। उनके इस रूप को परिवर्तित किया था भारत कुमार यानी मनोज कुमार ने, जिन्होंने अपनी निर्मित-निर्देशित पहली फ़िल्म 'उपकार' में उन्हें मलंग बाबा का रोल दिया। जिसमें वे अपाहिज की भूमिका में थे, भूमिका कुछ छोटी ज़रूर थी लेकिन थी बहुत दमदार। इस फ़िल्म के लिए उनको पुरस्कृत भी किया गया था। उन पर फ़िल्माया गया कस्में वादे प्यार वफा सब बातें हैं बातों का क्या आज भी लोगों के दिलो-दिमाग में छाया हुआ है। भूले भटके जब कभी यह गीत बजता हुआ कानों को सुनाई देता है तो तुरन्त याद आते हैं प्राण। ऐसा ही कुछ अमिताभ बच्चन अभिनीत ज़ंजीर में भी हुआ था। नायक के पठान दोस्त
की भूमिका में उन्होंने अपने चेहरे के हाव भावों और संवाद अदायगी से जबरदस्त प्रभाव छो़डा था। इस फ़िल्म का गीत यारी है ईमान मेरा, यार मेरी ज़िन्दगी सिर्फ़ और सिर्फ़ उनके नृत्य की वजह से याद किया जाता है

प्राण 1942 में बनी ‘ख़ानदान’ में नायक बन कर आए और नायिका थीं नूरजहाँ। 1947 में भारत आज़ाद हुआ और विभाजित भी। प्राण लाहौर से मुंबई आ गए। यहाँ क़रीब एक साल के संघर्ष के बाद उन्हें 'बॉम्बे टॉकीज' की
फ़िल्म ‘जिद्दी’ मिली। अभिनय का सफर फिर चलने लगा। पत्थर के सनम, तुम सा नहीं देखा, बड़ी बहन, मुनीम जी, गंवार, गोपी, हमजोली, दस नंबरी, अमर अकबर एंथनी, दोस्ताना, कर्ज, अंधा क़ानून , पाप की दुनिया, मत्युदाता क़रीब 350 से अधिक फ़िल्मों में प्राण साहब ने अपने अभिनय के अलग- अलग रंग बिखेरे। इसके अतिरिक्त प्राण कई सामाजिक संगठनों से जुड़े रहे और उनकी अपनी एक फुटबॉल टीम बॉम्बे डायनेमस फुटबॉल क्लब भी रही है।

हम बोलेगा तो बोलोगे की बोलता है... यह संवाद प्राण ने ही अपने एक फ़िल्म में कहा था, जो आज उनके अभिनय जीवन के सार पर भी सटीक बैठ रहा है।जीवंत अभिनय तथा बेहतरीन संवाद अदायगी के बलबूते दर्शकों के दिलों में खलनायक का भयावह रुप उकेरने वाले प्राण की अदाकारी को भी शब्दों में नहीं ढ़ाला जा सकता। ऐसे में उन्हें लेकर जितने भी शब्दजाल बिने जाये वो कमतर ही होंगे। तभी उनका डॉयलाग 'हम बोलेगा तो बोलोगे की बोलता है' का ज़िक्र है, जो दर्शाता है कि प्राण ने अपने संवादों को रुपहले पर्दे पर ही नहीं बल्कि जीवन में भी उतारा। प्राण को दादा साहब फाल्के पुरस्कार की घोषणा शायद इस वजह से भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण है कि यह पहली बार परदे पर खलनायक की भूमिका अदा करने वाले एक अभिनेता को मिल रहा है। प्राण सिनेमा के परदे पर खलनायकी के पर्याय हैं। प्राण ने अपने कैरियर की शुरुआत पंजाबी फ़िल्म 'यमला जट' से 1940 में की थी। 1942 वाली हिंदी फ़िल्म 'खानदान' से उनकी छवि रोमांटिक हीरो की बनी। लाहौर से मुंबई आने के बाद 'जिद्दी' से उनके बॉलीवुड कैरियर की शुरुआत हुई। इसके बाद तो वह हिंदी फ़िल्मों के चहेते विलेन ही बन गए। प्राण ने हिंदी सिनेमा की कई पीढ़ियों के साथ अभिनय किया। दिलीप कुमार, देव आनंद और राजकपूर के साथ पचास के दशक में, साठ और सत्तर के दशक में शम्मी कपूर , राजेंद्र कुमार और धर्मेंद्र के साथ उनकी कई फ़िल्में यादगार रहीं। वह जो रोल करते, उसकी आत्मा में उतर जाते। लोग उन्हें विलेन और साधु, दोनों रूपों में सराहने लगे। 'पूजा के फूल' और'कश्मीर की कली' जैसी फ़िल्मों से प्राण ने अपना नाता कॉमेडी से भी जोड़ लिया।
अस्सी के दशक में राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन के साथ उनकी कई यादगार फ़िल्में आईं।उनकी खलनायकी के विविध रूप 'आजाद', 'मधुमती', देवदास , 'दिल दिया दर्द लिया', 'मुनीम जी' और 'जब प्यार किसी से होता है' में देखे जा सकते हैं। उनकी हिट फ़िल्मों की फेहरिस्त भी बड़ी लंबी है। अपने समय की लगभग सभी प्रमुख
अभिनेत्रियों के साथ उनकी फ़िल्में आईं। पंजाब , उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में शिक्षित प्राण किसी भी ज़बान और लहजे को अपना बना लेते थे। उनकी अदा और डायलॉग डिलीवरी रील रोल को रियल बना देती थी। उनका डायलॉग -तुमने ठीक सुना है बरखुरदार, चोरों के
ही उसूल होते हैं खूब चर्चित हुआ। सबसे बड़ी बात यह कि चार सौ से अधिक फ़िल्में करने वाले प्राण ने खुद को कभी दोहराया नहीं। 'पत्थर के सनम' हो या 'जिस देश में गंगा बहती है', 'मजबूर' हो या 'हाफ टिकट' या फिर 'धर्मा', प्राण ने हर फ़िल्म में अपनी मौजूदगी का पूरा अहसास कराया

प्राण के प्रसिद्ध संवाद (डायलॉग) 

(डायलॉग) फ़िल्म 1. इस इलाक़े में नए आए हो बरखुरदार, वरना यहां शेर खान को कौन नहीं जानता! ज़ंजीर 
2. राम ने हर युग में जन्म लिया लेकिन लक्ष्मण फिर पैदा नहीं हुआ उपकार 
3. ये पाप की नगरी है, यहां कंस और दुर्योधन का ठिकाना है उपकार 
4. ज़िंदगी में चढ़ते की पूजा मत करना, डूबते की भी सोचना उपकार 
5. ये फूलों के साथ साथ दिल कब से बेचना शुरू कर दिया है कश्मीर की कली
 6. एक डाकू की लड़की पुलिस वाले से शादी करेगी, गोली मारिए सरदार जिस देश में गंगा बहती है 
7. शेर और बकरी जिस घाट पर एक साथ पानी पीते हों, वो घाट, न हमने देखा है और न देखना चाहते हैं आन बान
 8. पहचाना इस इकन्नी को, यह वही इकन्नी है जिसे बरसों पहले उछालकर तुमने मेरा मज़ाक उड़ाया था। रॉबर्ट सेठ तुम्हारे ही सोने से तुम्हारे ही आदमियों को ख़रीद कर आज मैं तुम्हारी जगह पहुंच गया हूं और तुम मेरे क़दमों में। अमर अकबर एंथनी 
9. क्योंकि मैं रिवॉल्वर हमेशा ख़ाली रखता हूं मजबूर 
10. लेकिन मैं उस क़िस्म का जेलर नहीं हूं। मैं न तो छुट्टी पर जाऊंगा और न तबादले की दरख़्वास्त करूंगा। तुम्हारा वो रिकॉर्ड है, तो हमारा भी एक रिकॉर्ड है। हमारी जेल से संगीन से संगीन क़ैदी जो बाहर गया है उसने तुम्हारे उस दरबार में दुआ मांगी है तो यही दुआ मांगी है कि अगर दोबारा जेल जाए तो रघुवीर सिंह की जेल में न जाए कालिया 
11. समझते हो कि सब समझता हूं इससे बढ़कर इंसान की नासमझी और क्या हो सकती है क्रोधी
 12. शायद तू यह भूल गया कि इस ज़मीन पर फ़तह ख़ां अकेला पैदा नहीं हुआ है, उसके साथ उसकी बला की ज़िद भी पैदा हुई है। कहीं मेरी ज़िद किसी ज़िद पर आ गई तो अपनी बेटी के रास्ते में पड़े हुए बेशुमार कांटों को तो मैं अपने दामन में समेट लूंगा लेकिन तेरे रास्ते दहकते हुए अंगारों से भर दूंगा। सनम बेवफ़ा
 13. आवाज़ तो तेरी एक दिन मैं नीची करूंगा, शेर की तरह गरजने वाला बिल्ली की ज़बान बोलेगा। सनम बेवफ़ा

रोचक तथ्य

पहली फ़िल्म के मिले 50 रुपये प्राण जब मात्र 19 वर्ष के थे तो उन्होंने 'दलसुख पंचोली' के निर्देशन में बनी पंजाबी फ़िल्म ‘यमला जट’ मे हीरो की भूमिका अदा की थी। उन्हें यह फ़िल्म लेखक 'वली मुहम्मद वली' ने उस समय ऑफ़र की थी जब वह 1939 में लाहौर में एक पान की दुकान के बाहर खड़े हुए थे। उन्हें इस भूमिका के लिए 50 रुपये दिए गये

प्राण को शायरी व फ़ोटोग्राफ़ी से बहुत अधिक लगाव था। एक समय में उनका घर उनकी तस्वीरों से भरा हुआ था जो विभिन्न रूपों में खींची गई थीं। प्राण को कबीर , ग़ालिब व फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का लगभग पूरा कलाम याद था और वह सेट पर भी इनकी शायरी पढ़ते थे।ताश खेलना व स्पोर्टस भी उनको पसंद थे। वह और उनकी पत्नी मुंबई के 'क्रिकेट क्लब ऑफ इंडिया' में नियमित जाया करते थे। उन्होंने अनेक सेलीब्रिटी मैचों को स्वर्गीय पी. जयराज के साथ मिलकर आयोजित किया। वह मुंबई की फुटबॉल टीम 'डायनामो' के प्रायोजक भी थे।
सह-अभिनेत्रियाँ प्राण ने अपने ज़माने की लगभग सभी अभिनेत्रियों के साथ काम किया। 'खानदान' (1942) में 13 वर्षीय नूरजहां तो क़द में इतनी छोटी थीं कि उन्हें प्राण के साथ अभिनय करते समय ईटों पर खड़ा होना पड़ता था। वैजयंतीमाला (बहार, 1951) व हेलन
(हलाकू, 1956) ने अपनी पहली फ़िल्म प्राण के साथ ही की थीं। हिन्दी फ़िल्मों के पर्दे पर खलनायक की भूमिका अदा करने वाले प्राण फ़िल्मोद्योग में भद्र व्यक्ति के रूप में जाने जाते थे। वह अपने में मस्त रहते थे और आज तक किसी हीरोइन के साथ उनका स्कैंडल नहीं हुआ। सेट पर वह लतीफ़े सुनाते,शायरी सुनाते, लेकिन जब दृश्य पूरा हो जाता तो वह अपने कमरे में जा कर अपने आप तक सीमित हो जाते।प्रभावी खलनायकी प्राण ने पर्दे पर अक्सर बुरे व्यक्ति की भूमिका की, इसलिए यह अंदाजा लगाना कठिन हो जाता है कि वास्तव में वह कितने अच्छे व्यक्ति हैं। उनकी खलनायकी इतनी प्रभावी थी कि लोगों ने अपने बच्चों का नाम प्राण रखना बंद कर दिया था। उनके तीनों बच्चों पिंकी, अरविंद व सुनील को बहुत शर्मिंदगी होती थी, जब दूसरे बच्चे प्राण को खलनायक कहते थे। उनकी बेटी पिंकी ने एक बार उनसे पूछा था कि वह फ़िल्मों में अच्छी भूमिकाएं क्यों नहीं करते हैं? इसलिए जब 1967 में उन्हें मनोज कुमार ने ‘उपकार’ ऑफ़र की तो उन्होंने उसे फ़ौरन स्वीकार कर लिया। यह हिन्दी सिनेमा में उनकी पहली सकारात्मक भूमिका वाली फ़िल्म थी। 

मुमताज़ की त्वचा बहुत कोमल थी और उस पर आसानी से निशान पड़ जाते थे। चूंकि प्राण के साथ उनकी फ़िल्मों में उन्हें अक्सर पर्दे पर संघर्ष करते हुए दिखाया जाता था तो मुमताज के बदन पर काले व नीले निशान पड़ जाते थे। दृश्य पूरा होने के बाद प्राण को बहुत शर्मिंदगी होती थी और वह मुमताज से माफ़ी मांगा करते थे। हास्य के लिए प्राण का नृत्य प्राण की एक कमज़ोरी यह रही कि वह नृत्य करना नहीं जानते थे। इसलिए जब फ़िल्म में हास्य की स्थिति उत्पन्न करनी होती तो प्राण से नृत्य कराया जाता जैसा कि ‘मुनीम जी’, ‘बल्फ मास्टर’ आदि। नृत्य न करने की वजह से ही उन्होंने 6-7 फ़िल्मों के बाद हीरो की भूमिका करना बंद कर दिया था। फिर भी पर्दे पर गाए उनके गीत बहुत मशहूर हुए जैसे ‘यारी
है ईमान मेरा’ ( ज़ंजीर 1973), ‘राज को राज ही रहने दो’ (धर्मा 1973) या ‘क़समे, वादे, प्यार, वफा सब’ (उपकार 1967)घर के बाहर प्रशंसकों की भीड़ प्राण ने 1950 के दशक में अपना बंगला बांद्रा के यूनियन पार्क में बनवाया। इस जगह को फ़िल्मी दुनिया के लोग मनहूस जगह समझते थे क्योंकि इसमें रहने वाले अनेक कलाकार जैसे कॉमेडियन गोप, निर्माता राम कमलानी व संगीतकार अनिल विश्वास को जबरदस्त प्रोफेशनल घाटा उठाना पड़ा था। लेकिन प्राण ने ऐसे किसी अंधविश्वास को मानने से इंकार कर दिया। उन्हें जगह पसंद आई और उन्होंने अपने बंगले का नाम अपनी बेटी के नाम पर ‘पिंकी’ रख दिया। पालीहिल पर वह पहला मशहूर घर था। प्राण के घर के आगे उनके प्रशंसकों की भीड़ लगी रहती थी। बच्चे भी वहां जमा हो जाते थे। प्राण को बच्चे बहुत पसंद थे और वह उन्हें अपने घर में आमंत्रित करते व उन्हें मिठाई, बिस्किट आदि खिलाते।

देश के विभाजन के समय प्राण सिकंद मुंबई आए और इतने आत्मविश्वास से भरे थे कि उन्होंने भव्य ताजमहल होटल में कमरा लिया। उन्हें लगा कि कुछ ही दिनों में काम मिलने के बाद अपना फ्लैट ख़रीदेंगे, परंतु उन्हें नए सिरे से संघर्ष करना पड़ा और लाहौर में सफल नायक रहे प्राण को मजबूर होकर ‘गृहस्थी’ (1948) में खलनायक की भूमिका करनी पड़ी, परंतु मीना कुमारी के साथ ‘हलाकू’ नामक फ़िल्म में एक बर्बर, सनकी और वहशी तानाशाह की भूमिका में उन्होंने ऐसा खौफ पैदा किया कि हर बड़ी फ़िल्म में उन्हें खलनायक की भूमिका मिलने लगी। ‘हलाकू’ में प्राण सिकंद ने यह सीखा कि उन्हें अपनी भूमिकाओं के लिए विशेष पोशाक, विग इत्यादि का उपयोग करना चाहिए। उनकी पोशाकें और विग उनके अभिनय का हिस्सा बन गए।प्राण ने लगभग 350 से ज्यादा फ़िल्मों में अभिनय किया, लेकिन वह अपनी फ़िल्मों सहित बमुश्किल ही कोई फ़िल्म देखते थे। प्राण को ‘परिचय’ (1972) में अपनी भूमिका सबसे कठिन प्रतीत हुई, जिसमें उन्होंने एक ज़िद्दी, अनुशासित व्यक्ति की भूमिका अदा की थी। उनकी सबसे पसंदीदा फ़िल्म ‘विक्टोरिया नम्बर 203′ (1972) है जिसका निर्देशन ब्रिज ने किया था। शम्मी कपूर की लगभग सभी फ़िल्मों में प्राण ने खलनायक की भूमिका निभाई। पर्दे की इस दुश्मनी के बावजूद दोनों आपस में गहरे दोस्त थे। दोनों को ही मांसाहारी भोजन व शराब बहुत पसंद थी। प्राण के अन्य अच्छे दोस्तों में दिलीप कुमार व राज कपूर शामिल थे और यह तिकड़ी अक्सर उनके बंगले पर महफिलें जमाती थीं

मशहूर फ़िल्म अदाकार 'प्राण' का निधन हिंदी फ़िल्मों के मशहूर विलेन और चरित्र अभिनेताप्राण की शुक्रवार 12 जुलाई , 2013 को देर शाम मुंबई के लीलावती अस्पताल में मौत हो गई। वो 93 साल के थे। उनके बेटे सुनील ने बीबीसी संवाददाता मधू पाल को बताया कि वो लीलावती अस्पताल में भर्ती थे जहां उनकी मौत देर शाम हुई। समाचार एजेंसी पीटीआई ने प्राण की बेटी पिंकी के हवाले से कहा है, "उनकी मौत लंबी बीमारी के बाद हुई।" उन्हें इस साल दादा साहब फालके पुरस्कार से सम्मानित किया गया था लेकिन वो इस क़दर बीमार थे कि इसे ख़ुद
स्वीकार करने दिल्ली नहीं आ पाए थे। बाद में सूचना और प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने उनके घर जाकर उन्हें यह पुरस्कार दिया। उनके निधन पर दुख जताते हुए बॉलीवुड ने उन्हें भारतीय सिनेमा का बड़ा स्तंभ बताया, जिनका कई सितारों का जीवन बनाने में अहम योगदान था। फ़िल्म इंडस्ट्री के पुराने और युवा अभिनेताओं ने प्राण के निधन पर अपनी संवेदना जताई। सुपरस्टार दिलीप कुमार और अमिताभ बच्चन ने बॉलीवुड के लीजेंड के साथ
जुड़ी अपनी यादें साझा कीं। प्राण के साथ कई फ़िल्मों में काम कर चुके अमिताभ बच्चन ने कहा कि उनके जैसे कद्दावर अभिनेता अब नहीं आते। उन्होंने कहा, 'वह एक बेहतरीन व्यक्ति, प्रशंसनीय सहयोगी, संपूर्ण पेशेवर, निभाये जाने वाले पात्रों को अपने में आत्मसाथ करने वाले, काम के बाद एक दिलचस्प साथी और एक विचारशील मनुष्य थे।' दिलीप साहब ने कहा, 'मैं कभी नहीं भूल सकता कि प्राण कैसे मेरे निकाह में पहुंचे थे। श्रीनगर के खराब मौसम से जूझते हुए, वह वहां शूटिंग कर रहे थे। उन्होंने दिल्ली की फ्लाइट ली, वहां से फिर शाम में मुंबई पहुंचे, बस मेरे निकाह से ठीक पहले मुझे गले लगाने के लिए।'

दारासिंह

महान फ्रीस्टाइल पहलवान एवम् अभिनेता दारा सिंह की पुण्यतिथि  पर हार्दिक श्रधांजलि

🎂दारा सिंह जन्म: 19 नवम्बर , 1928 , ⚰️अमृतसर - मृत्यु: 12 जुलाई , 2012 मुम्बई) अपने ज़माने के विश्व प्रसिद्ध
फ्रीस्टाइल पहलवान और प्रसिद्ध अभिनेता थे। दारा सिंह 2003-2009 तक राज्यसभा के सदस्य भी रहे। दारा सिंह ने खेल और मनोरंजन की दुनिया में समान रुप से नाम कमाया और अपने काम का लोहा मनवाया। यही वजह है कि उन्हें अभिनेता और पहलवान दोनों तौर पर जाना जाता है। उन्होंने 1959 में पूर्व विश्व चैम्पियन जार्ज गार्डीयांका को पराजित करके कॉमनवेल्थ की विश्व चैम्पियनशिप जीती थी।बाद में वे अमरीका के विश्व चैम्पियन लाऊ थेज को पराजित कर फ्रीस्टाइल कुश्ती के विश्व चैम्पियन बन गये।

1966 में दारा सिंह को रुस्तम-ए-पंजाब का ख़िताब से नवाजा गया। 1978 में दारा सिंह को रुस्तम-ए-हिंद के
ख़िताब से नवाजा गया।

दारा सिंह का 84 साल की उम्र में दिल का दौरा पड़ने से 12 जुलाई 2012 को निधन हुआ।इस प्रकार एक सफल पहलवान, एक सफल अभिनेता, निर्देशक और निर्माता के तौर पर दारा सिंह ने अपने जीवन में बहुत कुछ पाया और साथ ही देश का गौरव बढ़ाया।

मंगलवार, 11 जुलाई 2023

परवीन डब्बास

परवीन डबास 
🎂जन्म 12 जुलाई 1974
 एक भारतीय अभिनेता, निर्देशक और मॉडल हैं, जो मुख्य रूप से हिंदी और अंग्रेजी भाषा की फिल्मों में काम करते हैं।
निजी जीवन 
परवीन का जन्म 12 जुलाई 1974 बाहरी दिल्ली के कंझवाला इलाके में हुआ था। उन्होंने अपनी पढाई मॉडर्न स्कूल वसंत विहार, नयी दिल्ली और स्नातक हंसराज कॉलेज, दिल्ली यूनीवर्सिटी से पूरी की।

शादी 
परवीन की शादी फिल्म एक्ट्रेस प्रीति झंगानिया से हुई है, दोनों के एक बेटा है- जयवीर।

करियर 
परवीन ने हिंदी सिनेमा में डेब्यू वर्ष 1999 में फिल्म दिल्लगी से किया, उसके बाद उन्होंने दक्षिण भारतीय फिल्मों में अभिनय किया। इसके बाद वह कई अन्य सुपरहिट फिल्मों में नजर आये जिनमे द हीरो: लव स्टोरी ऑफ़ अ स्पाई, मैंने गांधी को नहीं मारा, खोसला का घोसला आदि फिल्में शामिल हैं।

बतौर निर्देशक परवीन ने फिल्म सही धंधे गलत बंदे निर्देशित की, जिसे दर्शकों और क्रिटिक्स द्वारा बेहद पसंद किया गया।

बिमल रॉय

*बिमल राय*

जन्म
🎂12 जुलाई 1909
सुआपुर , पूर्वी बंगाल और असम , ब्रिटिश भारत
(वर्तमान बांग्लादेश )
मृत
⚰️07 जनवरी 1966 (आयु 56 वर्ष)
बम्बई , महाराष्ट्र , भारत
व्यवसाय
निर्माता और निर्देशक
उल्लेखनीय कार्य
दो बीघा जमीन (1953)
परिणीता (1953)
बिराज बहू (1954)
देवदास (1955)
मधुमती (1958)
याहुदी (1958)
सुजाता (1959)
परख (1960)
बंदिनी (1963)
जीवनसाथी
मनोबीना रॉय
बच्चे
रिंकी भट्टाचार्य समेत 4
पुरस्कार
सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म के लिए 4 फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार
सर्वश्रेष्ठ निर्देशक के लिए 7 फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार
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*Ş₳ŦเŞ𝓱👸🏻◣🍁💜⃝🇱♥︎2*
बिमल रॉय (बंगाली: ???? ????; 12 जुलाई 1909 - 8 जनवरी 1966) एक बंगाली भारतीय फिल्म निर्देशक थे।
वह अपनी यथार्थवादी और समाजवादी फिल्मों जैसे दो बीघा जमीन, परिणीता, बिराज बहू, मधुमती, सुजाता, परख और बंदिनी के लिए विशेष रूप से जाने जाते हैं, जो उन्हें हिंदी सिनेमा का एक महत्वपूर्ण निर्देशक बनाती है।
इतालवी नव-यथार्थवादी सिनेमा से प्रेरित होकर, उन्होंने विटोरियो डी सिका की साइकिल थीव्स (1948) देखने के बाद दो बीघा जमीन बनाई।
उनका काम विशेष रूप से उनके मिस एन सीन के लिए जाना जाता है जिसका उपयोग उन्होंने यथार्थवाद को चित्रित करने के लिए किया था।
उन्होंने अपने पूरे करियर में कई पुरस्कार जीते, जिनमें ग्यारह फिल्मफेयर पुरस्कार, दो राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और कान्स फिल्म महोत्सव का अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार शामिल हैं।
मधुमती ने 1958 में 9 फिल्मफेयर पुरस्कार जीते, जो 37 वर्षों तक एक रिकॉर्ड था।
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बिमल रॉय का जन्म 12 जुलाई 1909 को सुआपुर, ढाका में एक बंगाली बैद्य परिवार में हुआ था , जो उस समय ब्रिटिश भारत के पूर्वी बंगाल और असम प्रांत का हिस्सा था और अब बांग्लादेश का हिस्सा है । उन्होंने बांग्ला और हिंदी में कई फिल्मों का निर्माण किया ।

बिमल रॉय आमतौर पर संगीत निर्देशकों सलिल चौधरी और एसडी बर्मन के बीच काम करते थे । उनकी फिल्मों में खूबसूरत और यादगार गाने होते थे, जो उस समय के सभी शीर्ष पार्श्व गायकों द्वारा प्रस्तुत किए जाते थे। रॉय की फ़िल्मों के कुछ उल्लेखनीय गीतों में शामिल हैं:

सुजाता (1959) का गाना "जलते हैं जिसके लिए" , तलत महमूद द्वारा गाया गया
परिणीता (1953) का "चली राधे रानी" , मन्ना डे द्वारा गाया गया
दो बीघा ज़मीन (1953) का "आ री आ निंदिया" , सलिल चौधरी का संगीत, लता मंगेशकर का गाया
देवदास (1955) का "अब आगे तेरी मर्जी" , एसडी बर्मन का संगीत, लता मंगेशकर का गाया
देवदास (1955) का "आन मिलो आन मिलो श्याम सबेरे" , संगीत एसडी बर्मन का, मन्ना डे और गीता दत्त का गाया हुआ गीत
मधुमती (1958) का "दिल तड़प तड़प के कह रहा" , सलिल चौधरी का संगीत, मुकेश और लता मंगेशकर का गाया हुआ गीत
मधुमती (1958) का "सुहाना सफर और ये मौसम हसीन" , सलिल चौधरी का संगीत, मुकेश का गाया
मधुमती (1958) का "आजा रे परदेसी" , सलिल चौधरी का संगीत, लता मंगेशकर का गाया
मधुमती (1958) का "घड़ी घड़ी मोरा दिल धड़के" , सलिल चौधरी का संगीत, लता मंगेशकर द्वारा गाया गया
मधुमती (1958) का "जुल्मी संग आंख लड़ी" , सलिल चौधरी का संगीत, लता मंगेशकर का गाया
परख (1960) का "ओ सजना बरखा बहार" , सलिल चौधरी का संगीत, लता मंगेशकर द्वारा गाया गया
बंदिनी (1963) का "मोरा गोरा अंग लाई ले" , एसडी बर्मन का संगीत, लता मंगेशकर द्वारा गाया गया

सुलक्षणा पंडित

🎂जन्म की तारीख और समय: 12 जुलाई 1954 (आयु 68 वर्ष), रायगढ़
भाई: विजयता पंडित, संध्या पंडित, ललित पंडित, जतिन पंडित, मनधीर पंडित, ज़्यादा
माता-पिता: प्रताप नरेन पंडित

↔️एक अभिनेत्री के रूप में सुलक्षणा का करियर 1970 और 80 के दशक की शुरुआत में फैला। एक प्रमुख महिला के रूप में उन्होंने 1970 के दशक के अधिकांश शीर्ष अभिनेताओं जैसे जीतेंद्र , संजीव कुमार , राजेश खन्ना , विनोद खन्ना , शशि कपूर और शत्रुघ्न सिन्हा के साथ काम किया है । उनके अभिनय करियर की शुरुआत 1975 में संजीव कुमार के साथ सस्पेंस थ्रिलर उलझन से हुई। अनिल गांगुली की संकोच (1976) में , जो परिणीता उपन्यास पर आधारित थी , उन्होंने लोलिता का किरदार निभाया था। उनकी अन्य लोकप्रिय फिल्मों में हेरा फेरी , अपनापन , खानदान शामिल हैं ।चेहरे पर चेहरा , धरम कांटा और वक्त की दीवार ।

उन्होंने 1978 में बंगाली फिल्म बैंडी में अभिनय किया , जहां उनकी जोड़ी उत्तम कुमार के साथ थी ।

*सुलक्षणा का एक्टिंग के साथ-साथ सिंगिंग करियर भी था।*
 उन्होंने अपने गायन करियर की शुरुआत एक बाल गायिका के रूप में 1967 की फिल्म तकदीर में लता मंगेशकर के साथ लोकप्रिय गीत "सात समुंदर पार से" गाकर की थी । इसके बाद, उन्होंने किशोर कुमार और हेमंत कुमार जैसे प्रसिद्ध संगीतकारों के साथ रिकॉर्डिंग की । उन्होंने हिंदी, बंगाली, मराठी, उड़िया और गुजराती में गाने गाए। 1980 में, उन्होंने जज़्बात (एचएमवी) नामक एक एल्बम जारी किया , जिसमें उन्होंने ग़ज़लें प्रस्तुत कीं । उन्होंने किशोर कुमार , लता मंगेशकर , मोहम्मद रफी , शैलेन्द्र सिंह , येसुदास जैसे निपुण गायकों के साथ युगल गीत गाये ।महेंद्र कपूर और उदित नारायण . उन्होंने शंकर जयकिशन , लक्ष्मीकांत प्यारेलाल , कल्याणजी आनंदजी , कनु रॉय , बप्पी लाहिड़ी , उषा खन्ना , राजेश रोशन , खय्याम , राजकमल और कई अन्य संगीत निर्देशकों के तहत गाना गाया । 1986 में, सुलक्षणा प्रशंसित संगीत निर्देशकों लक्ष्मीकांत प्यारेलाल और गायक मनहर, शब्बीर कुमार, नितिन मुकेश और अनुराधा पौडवाल के साथ "भारतीय संगीत समारोह" समारोह का जश्न मनाने के लिए लंदन के रॉयल अल्बर्ट हॉल में प्रदर्शन करने वाली गायिकाओं में से एक थीं।

उनकी आवाज आखिरी बार फिल्म खामोशी द म्यूजिकल (1996) के गीत "सागर किनारे भी दो दिल" में एक अलाप में सुनी गई थी , जिसे उनके भाइयों जतिन और ललित ने संगीतबद्ध किया था।

जलाला आगा

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  ꧁।  *जलाला आगा*

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🎂जन्म की तारीख और समय: 11 जुलाई 1945, मुम्बई
⚰️मृत्यु की जगह और तारीख: 5 मार्च 1995, नई दिल्ली
बच्चे: वैनेसा फेवेरस्टीन, सलीम क्रिस्टोफर आग़ा बी
बहन: शहनाज़ वाहनवटी
माता-पिता: आघा
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बॉलीवुड फिल्मों के एक भारतीय अभिनेता और निर्देशक थे।वह लोकप्रिय हास्य अभिनेता आगा के पुत्र थे । जलाल ने पुणे के फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया से अभिनय की पढ़ाई की ।
↔️उन्होंने एक बाल कलाकार के रूप में अपनी शुरुआत की और 1960 की सर्वकालिक हिट फिल्म मुगल-ए-आजम में युवा जहांगीर की भूमिका निभाई  ( एक वयस्क की भूमिका दिलीप कुमार ने निभाई थी)। उन्होंने केए अब्बास की बंबई रात की बाहों में (1967) में एक वयस्क भूमिका के रूप में अपनी शुरुआत की , और 1960 के दशक के अंत से 1990 के दशक की शुरुआत तक 60 से अधिक बॉलीवुड फिल्मों में काम किया, जिनमें से ज्यादातर ने सहायक भूमिकाएँ निभाईं। . उनकी सबसे प्रसिद्ध भूमिका ब्लॉकबस्टर हिट शोले में थी , जहां उन्होंने लोकप्रिय गीत मेहबूबा ओ' मेहबूबा में रुबाब वादक की भूमिका निभाई थी ।उल्लेख के योग्य उनकी अन्य भूमिकाएँ हैंजूली (जूली की मूक प्रेमिका), ने फिल्म घर घर की कहानी में समा है सुहाना सुहाना में गायिका की भूमिका निभाई , थोड़ी सी बेवफाई में शबाना आजमी के भाई , घरौंदा में अमोल पालेकर के दोस्त और रूममेट और दिल आखिर दिल है में नसीरुद्दीन शाह के दोस्त की भूमिका. उन्होंने सात हिंदुस्तानी में प्रमुख भूमिका निभाई।

उन्होंने बॉम्बे टॉकी (1970), गांधी (1982), किम (1984) और द डिसीवर्स (1988) जैसी अंग्रेजी भाषा की फिल्मों में भी अभिनय किया । उन्होंने गूंज नामक एक बॉलीवुड फिल्म लिखी और निर्देशित की , जो 1989 में रिलीज़ हुई।

5 मार्च 1995 को 49 वर्ष की आयु में दिल का दौरा पड़ने से उनकी मृत्यु हो गई। मॉडल वैलेरी परेरा से शादी हुई (जुलाई 1982 में तलाक हो गया)। उनके दो बच्चे थे सलीम क्रिस्टोफर आगा बी (गोवा के सबलाइम बिस्टरो फेम) और वैनेसा बी फ्यूरस्टीन।
↔️
मुगल ए आज़म (1960) यंग जहांगीर (बाल कलाकार) के रूप में
तक़दीर (1967) सुरेश के रूप में
मझली दीदी (1967) कमल - हेमांगिनी के भाई के रूप में
बंबई रात की बाहों में (1968) जॉनी/जोसेफ के रूप में
दिवाकर में सारा आकाश (1969)।
आया सावन झूम के (1969) दीपक के रूप में
सात हिंदुस्तानी (1969) शकराम शिंदे के रूप में
बॉम्बे टॉकी (1970) यंग मैन के रूप में
कॉलेज छात्र के रूप में घर-घर की कहानी (1970)।
ऐसा भी होता है (1971)
लाखों में एक (1971) जीवन - माखनलाल के बेटे के रूप में
कठपुतली (1971) मुरली के रूप में
हम तुम और वो (1971) चरण दास के रूप में
दो बूंद पानी (1971) में गंगा सिंह की भूमिका
धोबी के रूप में 'गोमती के किनारे' (1972)।
जिंदगी जिंदगी (1972) रतन के रूप में
मन जाइये (1972) अशोक के रूप में
दो चोर (1972) बधरू के रूप में
मेरे ग़रीब नवाज़ (1973) यूसुफ के दोस्त के रूप में
यादों की बारात (1973) सलीम के रूप में
हनीमून (1973)
गरम हवा (1974) शमशाद के रूप में
जब अँधेरा होता है (1974) में रमेश के रूप में
कॉल गर्ल (1974)
उस पार (1974) भैरो के रूप में
शिकवा (1974)
जीवन संग्राम (1974)
दो नंबर के अमीर (1974)
अंजान राहें (1974) राकेश कपूर के रूप में
आंग से आंग लागली (1974) शराबी के रूप में
मृग तृष्णा (1975)
जूली (1975) रिचर्ड के रूप में
शोले (1975) गाने "महबूबा ओ'महबूबा" में बैंजो प्लेयर के रूप में
बदनाम (1975) सुरेश के रूप में
खेमरो लोदान (1976)
आज का ये घर (1976) नूतन चंद्रा के रूप में
टैक्सी टैक्सी (1977) आरवी के रूप में
शंकर हुसैन (1977)
साहेब बहादुर (1977) जज के रूप में
घरौंदा (1977)
आधा दिन आधी रात (1977) राजू के रूप में
हम किसी से कम नहीं (1977)
हमारा संसार (1978) भीमसेन के रूप में
गमन (1978) लालूलाल के रूप में
घाटा (1978) सुरेश के रूप में
श्यामला (1979)
जुनून (1979) कादर खान के रूप में
नौकर (1979) जग्गू के रूप में
दूरियाँ (1979) समाचार पत्र विक्रेता के रूप में
दीन और ईमान (1979)
डैम मारो डैम (1980)
थोडिसी बेवफाई (1980) नरेंद्र देशमुख के रूप में
मन पसंद (1980)
कर्ज़ (1980) डॉ. दयाल के रूप में
किस्मत (1980)
नक्सली (1980)
बंबई का महाराजा (1980)
खुदा कसम (1981) पंचम के रूप में
बे-शैक (1981) मिश्रा के रूप में
वो फिर नहीं आये (1981)
रॉकी (1981) स्वयं के रूप में
हम पागल प्रेमी (1982)
चोरनी (1982) किशोर सिन्हा के रूप में
वकील बाबू (1982) अनिल कुमार श्रीवास्तव के रूप में
दिल... आख़िर दिल है (1982) फज़ल मोहम्मद के रूप में
तेरी माँग सितारों से भर दूं (1982) शेरिफ के रूप में। दिलीप कुमार
गांधी (1982) ट्रेन की छत पर यात्री #2 के रूप में
हादसा (1983) लॉरी ड्राइवर के रूप में
कथा (1983) स्वयं के रूप में
नौकर बीवी का (1983) चौकीदार के रूप में
आख़िर (1984)
बाजी (1984) अल्बर्ट के रूप में
किम (1984) बुनार के राजा के रूप में
ये इश्क़ नहीं आसां (1984) क़्वाल के रूप में (बिना श्रेय)
तरंग (1984) रूसी के रूप में
बंद होंथ (1984)
राम तेरे कितने नाम (1985)
अनादि खिलाड़ी (1986)
बात बन जाए (1986) एडवोकेट भरत सिन्हा के रूप में
इतिहास (1987) लोक अभियोजक के रूप में
द डिसीवर्स (1988) द नवाब के रूप में
भारत एक खोज (1988)एपिसोड 37 कंपनी बहादुर ईस्ट इंडिया कंपनी में रॉबर्ट क्लाइव के रूप में
गूँज (1989) नेपोलियन बोनापार्ट गोंसाल्वेस के रूप में
दो कैदी (1989)
जट्ट वैलैटी (1992) पंजाबी मूवी में राज/टाइगर के रूप में
पहला नशा (1993) महेश आहूजा के रूप में
झुमका (1995)
रॉक डांसर (1995)
पुलिसवाला गुंडा (1995)
बदमाश (1998)
⚰️यार मेरी जिंदगी (2008) शंकर के रूप में (फिल्म उनकी मृत्यु के बाद रिलीज़ हुई)

कातिल शफाई

महान शायर क़तील शिफ़ाई की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि
मुहम्मद औरंगज़ेब या क़तील शिफ़ाई 

🎂24 दिसंबर 1919 - 

⚰️11 जुलाई 2001
एक उर्दू भाषा के कवि थे। 

क़तील शिफ़ाई का जन्म 1919 में ब्रिटिश भारत (अब पाकिस्तान) में हुआ था उनका असली नाम मुहम्मद औरंगजेब था। 

उन्होंने 1938 में 'क़तील शिफ़ाई' को अपने कलम नाम के रूप में अपनाया, जिसके तहत उन्हें उर्दू शायरी की दुनिया में जाना जाता था। "क़तील" उनका "तख़ल्लुस" था और "शिफ़ाई" उनके उस्ताद (शिक्षक) हकीम मोहम्मद याहया शिफ़ा ख़ानपुरी के सम्मान में था, जिसे वे अपना गुरु मानते थे। 

1935 में अपने पिता की मृत्यु के कारण, कतील को अपनी उच्च शिक्षा छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा। उन्होंने अपने खेल के सामान की दुकान शुरू की। अपने व्यवसाय में असफल होने के कारण, उन्होंने अपने छोटे शहर से रावलपिंडी जाने का फैसला किया, जहाँ उन्होंने एक ट्रांसपोर्ट कंपनी के लिए काम करना शुरू किया और बाद में 1947 में फिल्म गीतकार के रूप में पाकिस्तानी फिल्म उद्योग में शामिल हो गए। "उनके पिता एक व्यापारी थे और उनके परिवार में शायर-ओ-शायरी की कोई परंपरा नहीं थी। शुरू में, उन्होंने सुधार और सलाह के लिए हकीम याह्या शिफा खानपुरी को अपनी कविता दिखाई। कतील ने उनसे उनका काव्य उपनाम 'शिफाई' निकाला। बाद में, वह अहमद नदीम कासमी के शिष्य बन गए जो उनके दोस्त और पड़ोसी थे। "

"1946 में, उन्हें 1936 के बाद से प्रकाशित होने वाली साहित्यिक पत्रिका 'आदाब-ए-लतीफ' के सहायक संपादक के रूप में काम करने के लिए नजीर अहमद द्वारा लाहौर बुलाया गया था। उनकी पहली गज़ल लाहौर के साप्ताहिक स्टार" एडिट "में प्रकाशित हुई थी। क़मर अजनाली द्वारा। " 

जनवरी 1947 में, क़तील को लाहौर के एक फिल्म निर्माता, दीवान सरदारी लाल द्वारा फिल्म के गीत लिखने के लिए कहा गया। पहली फिल्म के लिए उन्होंने पाकिस्तान में तेरी याद (1948) के बोल लिखे।बाद में, कुछ प्रसिद्ध कवियों / समय (1948 से 1955 के समय के गीतकारों) के सहायक गीतकार के रूप में कुछ समय तक काम करने के बाद,वे अंततः पाकिस्तान के एक अत्यंत सफल फिल्म गीतकार बन गए और कई पुरस्कार जीते 

11 जुलाई 2001 को पाकिस्तान के लाहौर में क़तील शिफाई की मृत्यु हो गई।

कविता के 20 से अधिक संग्रह और पाकिस्तानी और भारतीय फिल्मों के लिए 2,500 से अधिक फिल्मी गीत प्रकाशित हुए। उन्होंने 201 पाकिस्तानी और भारतीय फिल्मों के लिए गीत लिखे। उनकी प्रतिभा सीमाओं को पार कर गई। उनकी कविता का हिंदी, गुजराती, अंग्रेजी, रूसी और चीनी सहित कई भाषाओं में अनुवाद किया गया है। 2012 में कतेल शिफाई की 11 वीं पुण्यतिथि पर, एक प्रमुख समाचार पत्र को दिए एक साक्षात्कार में, एक प्रमुख साहित्यकार डॉ सलाउद्दीन दरवेश ने कहा, "शिफाई 20 वीं सदी के उन महान कवियों में से एक थे जिन्होंने अंतर्राष्ट्रीय पहचान हासिल की थी।" 

क़तील शिफ़ाई को 1994 में पाकिस्तान सरकार द्वारा साहित्य में उनके योगदान के लिए 'प्राइड ऑफ़ परफॉरमेंस अवार्ड', 'अदमजी अवार्ड', 'नक़ोश अवार्ड', 'अब्बासिन आर्ट्स काउंसिल अवार्ड' सभी पाकिस्तान में दिए गए। भारत में बहुत प्रतिष्ठित 'अमीर खुसरो पुरस्कार' दिया गया।  1999 में, उन्हें पाकिस्तान फिल्म उद्योग में उनके जीवन भर के योगदान के लिए 'स्पेशल मिलेनियम निगार अवार्ड' मिला।

1970 में क़तील शिफ़ाई ने अपनी मातृ भाषा में एक फिल्म का निर्माण किया- हिंडको — 1970 में। यह पहली हिंदो फिल्म थी, जिसे "किस्सा ख्वानी" नाम दिया गया था। फिल्म 1980 में रिलीज़ हुई थी। 11 जुलाई 2001 को लाहौर में उनका निधन हो गया। जिस गली में वह लाहौर में रहते थे उसका नाम कतील शिफाई स्ट्रीट रखा गया है। हरिपुर शहर का एक सेक्टर भी है जिसका नाम उनके नाम पर रखा गया है - मोहल्ला क़तील शिफ़ाई।

फिल्में 

इसमें पाकिस्तानी और भारतीय दोनों फिल्में शामिल हैं।

बड़े दिलवाला (1999) (गीतकार)
ये है मुंबई मेरी जान (1999) (गीतकार)
औज़ार (1997) (गीतकार)
तमन्ना (1996) (क़तील शिफ़ाई के रूप में)
नाजायज़ (1995) (गीतकार) (क़ैतेल शिफाई के रूप में)
नाराज़ (1994) (क़तील शिफ़ाई के रूप में)
हम हैं बेमिसाल (क़तील शिफ़ाई के रूप में)
सर (1993) (गीतकार) (क़तील शिफ़ाई के रूप में)
फिर तेरी कहानी याद आई (1993) (आपकी यादें लौट आईं) (गीतकार) (क़तील शिफ़ाई के रूप में)
तहकीकात (1993) (गीतकार) (क़तील शिफ़ाई के रूप में)
पेंटर बाबू (1983) (गीतकार)
शीरीं फ़रहाद (1975) (गीतकार)
नैला (1965) (गीतकार)
हवेली (1964) (गीतकार)
ज़हर-ए-इश्क (1958) (गीतकार)
इंतेज़ार (1956) (गीतकार)
कातिल (1955) (गीतकार)
गुमनाम (1954) (जूनियर गीतकार के रूप में हकीम अहमद शुजा की सहायता)
गुलनार (1953) (सहायक गीतकार)
तेरी याद (1948) (सहायक गीतकार) - (आपकी यादें - अंग्रेजी में समतुल्य फिल्म का शीर्षक) (पाकिस्तानी फिल्म उद्योग में पहली बार रिलीज हुई फिल्म)

मनुस्मृति

. ................मनुस्मृति.................... जरा सोचिए, अगर आज भारत का कानून यह तय कर दे कि— "एक आम आदमी चोरी करे तो उसे...