मंगलवार, 6 जून 2023

एकता कपूर

*🎂जन्म 7 जून 1975*
एकता कपूर; भारतीय टीवी और फिल्म उद्योग में एक प्रसिद्ध निर्माता का जन्म 7 जून 1975 को भारत में हुआ था। वह मूल रूप से अपनी प्रोडक्शन कंपनी बालाजी टेलीफिल्म्स की रचनात्मक निदेशक और संयुक्त प्रबंध निदेशक हैं। की बेटी हैशोभा कपूरऔर अभिनेता जितेंद्र। तुषार कपूर, उनके भाई भी बॉलीवुड फिल्मों में काम कर रहे हैं। उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई बॉम्बे स्कॉटिश स्कूल माहिम से पूरी की और मीठीबाई कॉलेज गईं।

सुश्री कपूर ने कई शानदार सोप ओपेरा, अविस्मरणीय फिल्में और लंबे समय से याद की जाने वाली टीवी श्रृंखला का निर्माण किया है। कस्तूरी, कभी सौतन कभी सहेली, हम पांच, कसौटी जिंदगी की, कहीं तो होगा, मिया फौज में बीवी मौज में, काव्यांजलि, क्योंकि सास भी कभी बहू थी, कुसुम, कितनी मोहब्बत है, कुटुंब,तेरे लिए, बंदिनी, किस देश में है मेरा दिल, जिंदगी के सपनों का और क्या हुआ तेरा वादा उनके कुछ पसंदीदा सोप ओपेरा हैं। वर्तमान में, वह बड़े अच्छे लगते हैं, पवित्र बंध, में काम कर रही हैं।पवित्र रिश्तातथा ये है मोहब्बतें।

एकता ने 2001 में निर्माता के रूप में अपने बॉलीवुड करियर की शुरुआत क्यो की मैं झूठ नहीं बोलता और कुछ तो है से की थी। उनकी बहुत प्रसिद्ध फिल्म में से एक हैकृष्णा कुटीरकई रिकॉर्ड तोड़े और अभी भी सबसे पसंदीदा बने हुए हैं। वह अपनी ब्लॉक बस्टर फिल्मों वन्स अपॉन ए टाइम इन मुंबई, डर्टी पिक्चर, शूटआउट एट वडाला, वन्स अपॉन ए टाइम इन मुंबई दोबारा, इक विलन, सी कोम्पनी और के लिए भी जानी जाती हैं।एक थी डायन.

नेहा ककड़


*🎂06जून*
*पार्श्वगायिका नेहा कक्कड़ के 🎂जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामनाएं🌹*

नेहा कक्कड़ एक भारतीय पार्श्व गायिका है. वह देखने में बहुत सुन्दर है बॉलीवुड में उन्हें सेल्फी क्वीन के नाम से बुलाते है. वर्तमान में वह देश के लोगों में सबसे पसंदीदा गायिका बनी हुई है. 2006 के टीवी रियलिटी शो इंडियन आइडल 2 में उन्होंने भाग लिया था. 2008 में नेहा ने मीत ब्रदर्स द्वारा कंपोज्ड अलबम नेहा द रॉक स्टार से अपने गाने की शुरुआत की. गाने के साथ ही उनका डांस और मॉडलिंग की तरफ भी झुकाव है. उन्होंने बॉलीवुड में बहुत से हिट गाने को गाया है. वह कई तरह के लाइव शो कर चुकी है और साथ ही वो जगराता में भी गा चुकी है. उनके 1000 से भी ज्यादा लाइव शो है जो उन्होंने किया है ऐसा करने के कारण उनके चाहने वाले उन्हें भारतीय शकीरा नाम से बुलाते है. वह यूटूब पर भी काफ़ी मशहूर है.

नेहा कक्कड़ शुरूआती जीवन

नेहा कक्कड़ का जन्म 6 जून 1988 को भारत के उत्तराखंड राज्य के ऋषिकेश में हुआ था. 29 वर्षीय टैलेंटेड गायिका नेहा जब 4 साल की थी तभी से उन्होंने धार्मिक भजन गाना शुरू कर दिया था. उन्होंने बताया था की उनके परिवार को चलाने के लिए उनके पिता कितनी मेहनत करते थे. साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि वो गाने को लेकर अपनी बड़ी बहन से प्रेरित हुई थी.

नेहा कक्कड़ शिक्षा 

नेहा की शिक्षा – दीक्षा दिल्ली में ही हुई है. उन्होंने दिल्ली के न्यू होली पब्लिक स्कूल से अपनी शुरूआती पढाई लिखाई की है. जब वो 11 वीं में दिल्ली में थी तब उन्होंने एक रियलिटी शो में भाग लिया था, बाद में गाने की तरफ झुकाव और व्यस्तता की वजह से उनकी पढाई पूरी नहीं हो पाई. क्योकि उनके पास समय का आभाव था जिस वजह से वो कॉलेज नहीं जा पाई. 

नेहा कक्कड़ परिवार 

नेहा के परिवार में उनके माता पिता के अलावा उनकी एक बहन और भाई भी है. उनके पिता का नाम ऋषिकेश कक्कड़ है, जोकि एक गैर सरकारी संस्था में काम करते है और माता जी का नाम नीति कक्कड़ है वह एक गृहिणी है. नेहा कक्कड़ के भाई का नाम टोनी कक्कड़ है जोकि एक म्यूजिक डायरेक्टर है. टोनी ने क्रियेचर 3डी, परागुए और हंजू में म्यूजिक दिया हुआ है, और उनकी बहन का नाम सोनू कक्कड़ है, वो भी एक गायिका है.

नेहा कक्कड़ करियर 

नेहा के करियर की शुरुआत रियलिटी शो के माध्यम से हुई थी. वे अपने दम पर टॉप स्थापित गायकों की सूचि में अपने नाम को दर्ज करा चुकी है. नेहा कॉमेडी सर्कस के तानसेन में काम कर चुकी है. वह स्टार प्लस पे आने वाले शो जो जीता वही सुपरस्टार में भी भाग ले चुकी है. वह कलर्स पर आने वाले मशहुर शो का शीर्षक गीत भी गा चुकी है, जिसके बोल थे ‘ना आना इस देश मेरी लाडो’. पंजाबी में उनके दो गाने सबसे ज्यादा पसंद किये गए जिसके बोल थे ‘जैगुआर ते पयार और वे रंजा वे माहिया

नेहा कक्कड़ के गाने 

उनके द्वारा सबसे पहला गाना 2009 में मेहरबानी में ‘हाय रामा’ गाया गया था जो की प्रदर्शित नहीं हुई.
2009 फिल्म ब्लू का गाना उनके द्वारा गाया गया.
2009 में फ़िल्म जेल आई, जिसमे उन्होंने गाना ‘बरेली के बाजार में’ को रिमिक्स में गाया.
फिर 2011 में ‘वोह एक पल’ गाई.
2012 में फ़िल्म आई ‘कॉकटेल’ जिसमें उन्होंने ‘सेकंड हेंड जवानी’ गाना को गाया यह गीत काफी हिट रहा.
2013 में फिल्म ‘फटा पोस्टर निकला हीरो’ के लिए उन्होंने ‘धतिंग नाच’ गाना गाया.
2013 में ही उनके एक और गीत को लोगों ने खूब पसंद किया, जो फिल्म ‘रमैया वस्ताव्वैया’ का था, वह था ‘जादू की झपी’.
2013 की फिल्म परागुए का गाना ‘बोतल खोल’ भी नेहा ने गाया.
2014 में आई फिल्म ‘यारियां’ के गीत ‘सुन्नी सुन्नी सड़कों पे’ गाना गाया यह बहुत लोकप्रिय हुआ था. इसी वर्ष ‘जॉनी हो दफ़ा’ और ‘लन्दन ठुमुक्दा’ भी काफी हिट रहा.            
2015 में आई फिल्म जिसका नाम था ‘एक पहेली लीला’, उसमे इन्होने ‘एक दो तीन चार’ गाना गाया था.
2015 में फिल्म ‘गब्बर इज बैक’ का गाना ‘आओ राजा’ गाया.
2016 में कपूर एंड संस के ‘गीत कर गयी चूल’, ‘सनम रे’ के गीत ‘हमने पी रखी है’, ‘ओ जानिया’ फिल्म ‘फ़ोर्स’, ‘माहि वे’ गाने को अपनी आवाज दी, फिल्म ‘वन नाईट स्टैंड’ के गीत ‘दो पेग मार’, फ़िल्म ‘वजह तुम हो’ के ‘माहि वे’ गाना, ‘फेवर’ फिल्म का गीत ‘मिले हो तुम हमको’, फिल्म ‘बार बार देखो’ का गाना ‘काला चश्मा’ अभी भी लोगों के जुबान पर चढ़ा हुआ है.
2017 में फिल्म ‘बद्री की दुल्हनिया’ का शीर्षक गीत, फ़िल्म ‘मशीन’ का गीत ‘चीज़ बड़ी है मस्त’ गाया.
ये सारे उनके द्वारा गाये हुए गाने उनके करियर और सफलता के किस्सों को बयाँ करते है वह अपना मुकाम बनाने के लिए अनवरत सफलता की सीढियां चढ़ती ही जा रही है. इसके अलावा उन्होंने 2010 में एक फ़िल्म भी की थी, जिसका नाम ‘इसी लाइफ में’ था. 2014 में उनकी अलबम आया ‘रोमियो जूलियट’.

D रामा नायडू

ईई*●▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬●
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*🎂जन्म की तारीख और समय: 6 जून 1936, कारम्चेडू*
*⚰️मृत्यु की जगह और तारीख: 18 फ़रवरी 2015, हैदराबाद*

*पत्नी: दग्गुबती राजेश्वरी (विवा. 1958–2015)*

*बच्चे: दग्गुबाती सुरेश बाबू, लक्ष्मी, दग्गुबाती वेंकटेश*

*पोते या नाती: राना दग्गुबाटि, नागा चैतन्य, मालविका दग्गुबाती,*

*इस संगठन की स्थापना की: सुरेश प्रोडक्शंस*

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उनकी लोकप्रिय हिदी फिल्मों में प्रेम नगर, दिलदार, बंदिश, अनाड़ी, हम आपके दिल में रहते हैं और प्रेम कैदी है। नायडू के अभिनेता पुत्र विक्टरी वेंकटेश ने बताया कि वह पिछले कुछ महीनों से कैंसर से जूझ रहे थे और दोपहर करीब ढाई बजे उनका निधन हो गया। उन्होंने बताया कि गुरुवार को उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा। नायडू कुछ समय के लिए राजनीति में भी सक्रिय रहे। उन्होंने 1999 में तेलुगु देशम टिकट पर लोकसभा का चुनाव जीता था।नायडू की फिल्म निर्माण कंपनी सुरेश प्रोडक्शन ने तेलुगु, तमिल और हिदी समेत 15 भाषाओं में करीब 150 फिल्मों का निर्माण किया। उनका जन्म 1936 में आंध्र के प्रकाशम जिले में हुआ था। 1963 में उनकी पहली फिल्म अनुरागम आई थी। उन्होंने 1964 में सुपरहिट रामुडू-भीमुडू बनाई। इसमें एनटी रामाराव ने अभिनय किया था। 

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*Ş₳ŦเŞ𝓱👸🏻◣🍁💜⃝🇱♥︎2*

प्रेम नगर
https://youtu.be/C4_Jk1Xkrcc

दिलदार

https://youtu.be/vK5vD1OwLDM

बंदिश
https://youtu.be/0yrTZO1fzYo

अनाड़ी
https://youtu.be/xTSc8_-Q65M

हम आपके दिल में रहते हैं
https://youtu.be/yJGmbnAy2N4

 प्रेम कैदी

https://youtu.be/71o3v4wFLaU
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वेद प्रकाश शर्मा

*🎂06जून 1955*
*⚰️मृत्यु17 फ़रवरी, 2017*
प्रसिद्ध उपन्यासकार फ़िल्म पटकथा लेखक वेद प्रकाश शर्मा के जन्मदिन पर हार्दिक श्रद्धांजलि

वेद प्रकाश शर्मा हिंदी के लोकप्रिय उपन्यासकार एवं फ़िल्म पटकथा लेखक थे। इन्होंने सस्ते और लोकप्रिय उपन्यासों की रचना की है। 'वर्दी वाला गुंडा' वेद प्रकाश शर्मा का सफलतम थ्रिलर उपन्यास है। इस उपन्यास की लगभग 8 करोड़ प्रतियाँ बिक चुकी हैं। भारत में जनसाधारण में लोकप्रिय थ्रिलर उपन्यासों की दुनिया में यह उपन्यास "क्लासिक" का दर्जा रखता है।

वेदप्रकाश शर्मा का जन्म 6 जून 1955 को हुआ था। उन्हें किशोरावस्था से ही पुस्तकें पढ़ने और लिखने का शौक था। युवावस्था की दहलीज पर कदम रखते ही उन्होंने उपन्यास लेखन शुरू कर दिया था। कुछ ही दिन में वह पाठकों के पसंदीदा लेखक हो गए थे। वेदप्रकाश शर्मा को बचपन से ही उपन्यास पढ़ने का शौक था। उनके इसी शौक ने उन्हें देश भर में पहचान दिलाई। बात 1972 की है। हाईस्कूल की परीक्षा देकर वह गर्मी की छुट्टियों में अपने पैतृक गांव बिहरा (बुलंदशहर) गए थे। उपन्यास के शौकीन वेदप्रकाश अपने साथ दर्जन भर से अधिक किताबें ले गए थे। कुछ ही दिन में उन्होंने सारी किताबें पढ़ डालीं। समय व्यतीत करने के लिए उन्होंने उपन्यास लिखना शुरू कर दिया। पिता को यह बात पता चली, तो उन्हें काफ़ी डांट पड़ी। बाद में पिता ने पढ़ा तो उनके दिल को बेटे की लेखन शैली छू गई। उन्होेंने 250 से अधिक उपन्यास लिखे। उनके लिखे उपन्यास बेहद प्रेरणादायक और उद्देश्य परक होते थे। वर्ष-1993 में उनके उपन्यास 'वर्दी वाला गुंडा' ने उन्हें देशभर में काफ़ी शोहरत दिलाई थी, जिसकी आठ करोड़ से ज्यादा प्रतियां बिक चुकी हैं। बॉलीवुड में भी उनके लेखन के जलवे थे। उनके परिवार में पत्नी मधु शर्मा के अलावा बेटा शगुन और तीन बेटियां हैं।

#फ़िल्म_पटकथा_लेखन

फिल्म 'अनाम' (1993) की पटकथा वेद प्रकाश शर्मा ने लिखी थी। इसका निर्देशन रमेश मोदी ने किया था। इसके बाद रिलीज हुई फिल्म 'सबसे बड़ा खिलाड़ी' (1995) उनके उपन्यास 'लल्लू' पर आधारित थी। इसका निर्देशन उमेश मेहरा ने किया था। इसकी अगली सिरीज इंटरनेशनल खिलाड़ी की भी कहानी वेद प्रकाश शर्मा ने लिखी थी, जो 1999 को रिलीज हुई थी। इसके अलावा उनके प्रसिद्ध उपन्यास 'केशव पंडित' पर वर्ष 2010 में टीवी सीरियल भी बना। यह भी दर्शकों में खूब चर्चित हुआ। 'बहू मांगे इंसाफ' पर शशिलाल नायर के निर्देशन में 'बहू की आवाज' फिल्म बनी। एक बार मेरठ आए सुपरस्टार आमिर खान की जब उनसे मुलाकात हुई थी, तो उन्होंने एक फिल्म के लिए स्क्रिप्ट लिखने का आग्रह किया था और वेद प्रकाश उस पर काम कर रहे थे। उनके उपन्यास छोटे पर्दे पर सीरियल के रूप में भी सामने आए।

#प्रसिद्धि

राजनीतिक के अलावा पुलिस और प्रशासनिक अफसरों में उनके नाम की खूब चर्चा होती थी। आम आदमी की भाषा में लिखने वाले वेद प्रकाश शर्मा देश के बड़े लेखक में शुमार हुए। उनसे जुड़े लोगों के मुताबिक़, एक बार वह बेगमपुल पर घूम रहे थे। तभी वर्दी में एक दरोगा पहुंचते हैं। वह कुछ लोगों पर ऐसे डंडे बरसाते हैं, जैसे बदमाशों को पीट रहे हों। वेद प्रकाश शर्मा वर्दी वाले उस दरोगा को देखते हैं। बाद में उनके मन में जो विचार पनपा, उसी ने उन्हें बड़े मुकाम तक पहुंचा दिया। वर्दी वाला गुंडा उपन्यास में उनके द्वारा लिखी गई घटना को पढ़कर आज भी पुलिस अफसर सीख लेते हैं। वेद प्रकाश शर्मा के उपन्यासों का पाठकों को लंबा इंतजार रहता था। मूवी टिकट की तरह ही शहर के कई बुक स्टॉल पर उनके उपन्यासों की एडवांस बुकिंग होती थी। वर्ष-1993 में प्रकाशित उपन्यास वर्दी वाला गुंडा की पहले ही दिन देशभर में 15 लाख प्रतियां बिक गई थीं। शहर के सभी बुक स्टॉल पर कुछ ही घंटों में उपन्यास की प्रतियां समाप्त हो चुकी थीं। बुकिंग कराने वाले कई लोगों को उपन्यास नहीं मिलने से निराशा हाथ लगी थी।

#चर्चित_उपन्यास

वेद प्रकाश शर्मा ने वर्दी वाला गुंडा, केशव पंडित, बहू मांगे इंसाफ, दहेज में रिवाल्वर, तीन तिलंगे, डायन, भस्मासुर, सुपरस्टार, पैंतरा, सारे जहां से ऊंचा, रैना कहे पुकार के, मदारी, क्योंकि वो बीवियां बदलते हैं, कुबड़ा, चक्रव्यूह, शेर का बच्चा, सबसे बड़ा जासूस, रणभूमि, लाश कहां छुपाऊं, कफ़न तेरे बेटे का, देश न जल जाए, सीआईए का आतंक, हिंद का बेटा, कर्फ्यू, बदसूरत, चकमा, गैंडा, अपराधी विकास, सिंगही और मर्डर लैंड, मंगल सम्राट विकास समेत 250 से अधिक उपन्यास लिखे हैं।

#सम्मान_एवं_पुरस्कार

वेद प्रकाश शर्मा को वर्ष 1992 व 1994 में मेरठ रत्न अवार्ड, वर्ष-1995 में नटराज अवार्ड और वर्ष 2008 में नटराज भूषण अवार्ड नवाजा गया था। इसके अलावा भी उन्हें अपने रचनाकर्म के लिए कई सम्मान मिले।

निधन

वर्दी वाला गुंडा जैसे चर्चित उपन्यासों के जरिये पाठकों के दिलों पर राज करने वाले प्रख्यात उपन्यासकार वेदप्रकाश शर्मा का निधन 17 फ़रवरी, 2017 शुक्रवार को रात करीब 11:50 बजे अपने शास्त्रीनगर स्थित आवास पर हो गया।

प्रीति सागर


प्रसिद्ध पार्श्वगायिका प्रीति सागर के जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामनाएं
प्रीति सागर एक बॉलीवुड पार्श्व गायिका हैं, जिन्होंने 1978 में मंथन के गीत "मेरो गाम कथा पारे" के लिए सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायिका का फिल्मफेयर पुरस्कार जीता था और जूली (1975) के हिट गीत "माय हार्ट इस बीटिंग" के लिए नामांकन प्राप्त किया था।
करियर

उन्होंने बॉलीवुड फिल्म जूली में अपने अंग्रेजी गीत, "माय हार्ट इस बीटिंग" के साथ तुरंत प्रसिद्धि प्राप्त की। उन्होंने वर्ष 1975 में उसी के लिए एक फिल्मफेयर पुरस्कार में नामांकन पाया। उन्होंने 1978 में बॉलीवुड फिल्म मंथन के गीत "मेरो गाम कथा पारे" के लिए सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायिका का फिल्मफेयर पुरस्कार जीता। उन्होंने कई गाने गाए हैं, बॉलीवुड फिल्मों में, भारतीय टीवी के लिए और निजी कैसेट्स के लिए। उनका एक पॉप एल्बम, "विद लव", जिसमें 10 गाने थे, को एक साथ 8 भारतीय भाषाओं में रिलीज़ किया गया था।

उन्होंने पॉप गाने, भारतीय शास्त्रीय गीत, भक्ति भजन, लोक गीत, ग़ज़ल आदि गाए हैं। उन्होंने प्रसिद्ध बॉलीवुड फ़िल्म निर्देशकों और संगीत निर्देशकों जैसे राजेश रोशन, श्याम बेनेगल, शशि कपूर, वनीता भाटिया, रवि, बप्पी लहरी, शंकर जयकिशन, जयदेव, अनु मलिक, ताहिर हुसैन, शक्ति सामंत, साई परांजपे, केतन देसाई आदि के लिए काम किया है। वह बेहद लोकप्रिय भारतीय टीवी धारावाहिकों जैसे फूल खिले हैं गुलशन गुलशन, पॉप टाइम्स, फुलवारी बच्चों की, आरोही आदि में दिखाई दी। वह बच्चों के मनोरंजन और शिक्षा उद्योग में उनके योगदान के लिए भी जानी जाती हैं। उन्होंने "सा रे गा मा" (जिसे पहले एचएमवी के रूप में जाना जाता था) के साथ हिन्दी और अंग्रेजी में कई बच्चों की नर्सरी कविता संग्रह के ऑडियो और वीडियो संस्करण बनाने के लिए काम किया था।

निजी जीवन

6 जून को मुंबई में जन्मी और पली-बढ़ी प्रीति ने क्वीन्स मैरी स्कूल से अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की। इसके अलावा, उन्होंने मुंबई के सेंट जेवियर्स कॉलेज से कला में स्नातक की डिग्री हासिल की। 1977 में उन्होंने सोमी सरन से शादी की। वह अपने पति के साथ मुंबई में रहती हैं। उनकी दो बेटियां हैं, अनीशा और आकांक्षा।

लोकप्रिय गीत

जूली (1975) - माय हार्ट इस बीटिंग
निशांत (1975) - पिया बाज पियाला पिया जाए ना
मंथन (1976) - मेरो गाम कथा पारे
भूमिका (1977) - तुम्हारे बिन जी ना लागे
कलयुग (1981) - व्हाट्स यॉर प्रोब्लम
मंडी (1983) - शमशेर भरे न मांग गज़ब
लॉकेट (1986) - जो भी कहना सच है कहना

सुनील दत्त


*🎂06जून*
*⚰️ 25मई*

महान अभिनेता, निर्माता, निर्देशक, राजनीतिज्ञ सुनील दत्त के जन्मदिन पर हार्दिक श्रद्धांजलि

सुनील दत्त भारतीय सिनेमा में एक ऐसे अभिनेता थे जिनको पर्दे पर देख एक आम हिन्दुस्तानी अपनी ज़िंदगी की झलक देखता था। सुनील दत्त 2004-05 के दौरान भारत सरकार में युवा मामलों और खेल विभाग में कैबिनेट मंत्री भी रहे।सुनील दत्त का वास्तविक नाम बलराज रघुनाथ दत्त था।

हिन्दी सिनेमा जगत में सुनील दत्त को एक ऐसी शख़्सियत के तौर पर याद किया जाता है, जिन्होंने फ़िल्म निर्माण, निर्देशन और अभिनय से लगभग चार दशक तक दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया। उनके किरदार वास्तविक जीवन के बहुत क़रीब होते थे और उनका व्यक्तित्व भी उनके किरदार की तरह उज्ज्वल और प्रभावशाली रहा। सुनील दत्त का जन्म 6 जून, 1929 को पंजाब (पाकिस्तान) के झेलम ज़िले के खुर्दी गाँव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। सुनील दत्त बचपन से ही अभिनय के क्षेत्र में जाना चाहते थे। बलराज साहनी फ़िल्म इंडस्ट्री में अभिनेता के रुप में उन दिनों स्थापित हो चुके थे, इसे देखते हुए उन्होंने अपना नाम बलराज दत्त से बदलकर सुनील दत्त रख लिया। उनका बचपन यमुना नदी के किनारे मंदाली गाँव में बीता जो हरियाणा प्रदेश में है। सुनील दत्त इसके बाद लखनऊ चले गये और जहाँ पर वह अख्तर नाम से अमीनाबाद गली में एक मुसलमान औरत के घर पर रहे। कुछ समय बाद अपने सपनों को पूरा करने के लिए वह मुंबई चले गए।

मुम्बई आकर सुनील दत्त ने मुंबई परिवहन सेवा के बस डिपो में चेकिंग क्लर्क के रुप में कार्य किया, जहाँ उनको 120 रुपए महीने के मिलते थे। फ़िल्म इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाने के लिए 1955 से 1957 तक सुनील दत्त संघर्ष करते रहे। हिन्दी सिनेमा जगत में अपने पैर जमाने के लिए वह ज़मीन की तलाश में एक स्टूडियो से दूसरे स्टूडियो भटकते रहे थे। उसके बाद सुनील दत्त ने 'जय हिंद कॉलेज' में पढ़कर स्नातक किया। सुनील दत्त ने रेडियो सिलोन की हिन्दी सेवा के उद्घोषक के तौर पर अपना कैरियर शुरू किया था। जहाँ वह फ़िल्मी कलाकारों का इंटरव्यू लिया करते थे। एक इंटरव्यू के लिए उन्हें 25 रुपये मिलते थे। यह दक्षिण एशिया की पचास के दशक मे सबसे लोकप्रिय रेडियो सेवा थी

सुनील दत्त ने 'मदर इंडिया' फ़िल्म की शूटिंग के दौरान एक आग की दुर्घटना में नर्गिस को अपनी जान की परवाह किये बिना बचाया। इस हादसे में सुनील दत्त काफ़ी जल गए थे तथा नर्गिस पर भी आग की लपटों का असर पड़ा था। उन्हें इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया और उनके स्वस्थ होकर बाहर निकलने के बाद दोनों ने शादी करने का फैसला कर लिया। नर्गिस 11 मार्च, 1958 में सुनील दत्त की जीवन संगिनी बन गई।

सुनील दत्त की पहली फ़िल्म 'रेलवे प्लेटफॉर्म' 1955 में प्रदर्शित हुई, जिसमें उन्होंने अभिनेता के रूप में कार्य किया। अपनी पहली फ़िल्म से उन्हें कुछ ख़ास पहचान नहीं मिली। उन्होंने इस फ़िल्म के बाद 'कुंदन', 'राजधानी', 'किस्मत का खेल' और 'पायल' जैसी कई छोटी फ़िल्मों में अभिनय किया, लेकिन इनमें से उनकी कोई भी फ़िल्म सफल नहीं हुई।

1957 में प्रदर्शित हुई फ़िल्म 'मदर इंडिया' से सुनील दत्त को अभिनेता के रूप में ख़ास पहचान और लोकप्रियता मिली। उन्होंने इस फ़िल्म में एक ऐसे युवक 'बिरजू' की भूमिका निभाई जो गाँव में सामाजिक व्यवस्था से काफ़ी नाराज़ है और इसी की वजह से विद्रोह कर डाकू बन जाता है। साहूकार से बदला लेने के लिए वह उसकी पुत्री का अपहरण कर लेता है लेकिन इस कोशिश में अंत में वह अपनी माँ के हाथों मारा जाता है। इस फ़िल्म में नकारात्मक हीरो का किरदार निभाकर वह दर्शकों के दिल में जगह बनाने में सफल रहे।

सुनील दत्त की सुपरहिट फ़िल्म 'वक़्त' 1965 में प्रदर्शित हुई। उनके सामने इस फ़िल्म में बलराज साहनी, राजकुमार, शशि कपूर और रहमान जैसे नामी सितारे थे, इसके बावज़ूद सुनील अपने दमदार अभिनय से दर्शकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने में सफल रहे। सुनील दत्त के सिने करियर का 1967 सबसे महत्त्वपूर्ण साल साबित हुआ। उस साल उनकी 'मिलन', 'मेहरबान' और 'हमराज़' जैसी सुपरहिट फ़िल्में प्रदर्शित हुई, जिनमें उनके अभिनय के नए रूप देखने को मिले। इन फ़िल्मों की सफलता के बाद वह अभिनेता के रुप में शोहरत की बुलंदियों पर जा पहुंचे।

सुनील दत्त भारतीय सिनेमा के उन अभिनेताओं में से एक है जिनकी फ़िल्मों ने पचास और साठ के दशक में दर्शकों पर अमित छाप छोड़ी। 'मदर इंडिया' की सफलता के बाद उन्हें 'साधना' (1958), 'सुजाता' (1959), 'मुझे जीने दो' (1963), 'ख़ानदान' (1965 ), 'पड़ोसन' (1967 ) जैसी सफल फ़िल्मों से भारतीय दर्शको के बीच एक सफल अभिनेता के रूप में पहचान मिली। सुनील दत्त को निर्देशक बी. आर. चोपड़ा के साथ 'गुमराह' (1963), 'वक़्त' (1965 ) और 'हमराज़' (1967) जैसी फ़िल्मों में निभाई गई यादगार भूमिकाओं ने भी दर्शकों के बीच लोकप्रिय किया।

सुनील दत्त के सिने करियर पर नज़र डालने पर पता लगता है कि वह मल्टी स्टारर फ़िल्मों का अहम हिस्सा रहे है। फ़िल्म निर्माताओं को ऐसी फ़िल्मों में जब कभी अभिनेता की ज़रूरत होती थी वह उन्हें नज़र अंदाज़ नहीं कर पाते थे। सुनील दत्त की मल्टीस्टारर सुपरहिट फ़िल्मों में 'नागिन', 'जानी दुश्मन', 'शान', 'बदले की आग', 'राज तिलक', 'काला धंधा गोरे लोग', 'वतन के रखवाले', 'परंपरा', 'क्षत्रिय' आदि प्रमुख हैं।

1993 में प्रदर्शित फ़िल्म 'क्षत्रिय' के बाद सुनील दत्त लगभग 10 वर्ष तक फ़िल्म अभिनय से दूर रहे। विधु विनोद चोपड़ा के ज़ोर देने पर उन्होंने 2007 में प्रदर्शित फ़िल्म 'मुन्ना भाई एम.बी.बी.एस' में अभिनय किया। फ़िल्म में उन्होंने अभिनेता संजय दत्त के पिता की भूमिका निभाई। पिता-पुत्र की इस जोड़ी को दर्शकों ने काफ़ी पसंद किया। इस फ़िल्म के माध्यम से पहली बार पिता पुत्र (सुनील दत्त और संजय दत्त) एक साथ पर्दे पर नजर आए थे। हालांकि फ़िल्म 'क्षत्रिय' और 'रॉकी' में भी सीनियर और जूनियर दत्त ने साथ काम किया मगर एक भी दृश्य में वे साथ में नहीं थे।

फ़िल्म 'यादें' (1964) के साथ सुनील दत्त ने फ़िल्म निर्देशन में भी क़दम रखा। इस पूरी फ़िल्म में सिर्फ एक युवक की भूमिका थी जो अपने संस्मरण को याद करता रहता है। इस किरदार को सुनील दत्त ने निभाया था। उनकी यह फ़िल्म बहुत सफल नहीं रही, लेकिन भारतीय सिनेमा जगत के इतिहास में अपना नाम दर्ज करा गई।

सुनील दत्त ने 1963 में प्रदर्शित फ़िल्म 'यह रास्ते है प्यार के' के ज़रिए फ़िल्म निर्माण के क्षेत्र में भी क़दम रख दिया। यह फ़िल्म टिकट खिड़की पर ज़्यादा सफल नहीं रही। इस फ़िल्म के बाद सुनील दत्त ने फ़िल्म 'मुझे जीने दो' का निर्माण किया। यह फ़िल्म डाकुओं के जीवन पर आधारित थी। यह फ़िल्म सुपरहिट साबित हुई। इसके बाद उन्होंने अपने भाई सोम दत्त को बतौर मुख्य अभिनेता फ़िल्म 'मन का मीत' में लांच किया। सोम दत्त का फ़िल्मी सफर बहुत सफल नहीं रहा। सुनील दत्त ने 1971 में अपनी महत्वकांक्षी फ़िल्म 'रेशमा और शेरा' का निर्माण और निर्देशन किया। इस फ़िल्म में उन्होंने भूमिका भी निभाई। यह एक पीरियड और बड़े बजट की फ़िल्म थी जिसे दर्शकों ने नकार दिया। निर्माता और निर्देशक बनने के बाद भी सुनील दत्त अभिनय से कभी ज़्यादा समय के लिए दूर नहीं रहे।[1] सुनील दत्त की सत्तर और अस्सी के दशक में बनी फ़िल्में 'प्राण जाए पर वचन ना जाए' (1974), 'नागिन' (1976), 'जानी दुश्मन' (1979) और 'शान' (1980) में उनकी भूमिकाएँ पसंद की गयी। इस समय में सुनील दत्त धार्मिक पंजाबी फ़िल्मों से भी जुड़े रहे। जिनमें 'मन जीते जग जीते' (1973), 'दुख भंजन तेरा नाम' (1974 ), 'सत श्री अकाल' (1977) प्रमुख हैं।

सुनील दत्त ने फ़िल्मों में कई भूमिकाएँ निभाने के बाद समाज सेवा के लिए राजनीति में प्रवेश किया और कांग्रेस के सहयोग से लोकसभा के सदस्य बने। साल 1968 में वह पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किए गए। सुनील दत्त को 1982 में मुंबई का शेरिफ नियुक्त किया गया। हिन्दी फ़िल्मों के अलावा सुनील दत्त ने कई पंजाबी फ़िल्मों में भी अपने अभिनय का जलवा दिखाया। इनमें 'मन जीते जग जीते' 1973, 'दुख भंजन तेरा नाम' 1974 और 'सत श्री अकाल' 1977 जैसी सुपरहिट फ़िल्में शामिल है।

1980 में सुनील दत्त ने अपने बेटे संजय दत्त को फ़िल्म 'रॉकी' में लांच किया। यह एक सुपरहिट फ़िल्म साबित हुई लेकिन फ़िल्म के प्रदर्शित होने के थोड़े समय के बाद ही उनकी पत्नी नर्गिस का कैंसर की बीमारी की वजह से देहांत हो गया। नर्गिस की कैंसर से हुई मृत्यु के कारण उन्हें इस बीमारी के प्रति सामाजिक जागरूकता के प्रति बढ़ने की प्रेरणा मिली। सुनील दत्त ने पत्नी की याद में 'नर्गिस दत्त फाउंडेशन' की स्थापना की। यह वो समय था जब सुनील दत्त सामाजिक कार्यक्रमों में ज़्यादा दिलचस्पी लेने लगे।

सम्मान_और_पुरस्कार

1963 - फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार (मुझे जीने दो)
1965 - फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार (ख़ानदान)
1968 - पद्मश्री
1995 - फ़िल्मफ़ेयर लाइफ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार
1997 - स्टार स्क्रीन लाइफ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार
2001 - ज़ी सिने लाइफ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार
2005 - फाल्के रत्न पुरस्कार

मृत्यु

हिन्दी फ़िल्मों के पहले एंग्री यंग मैन और राजनीतिक तौर पर एक आदर्श नेता सुनील दत्त का 25 मई, 2005 को हृदय गति रुकने के कारण बांद्रा स्थित उनके निवास स्थान पर देहांत हो गया। सुनील दत्त 'मदर इंडिया' के 'बिरजू' के रूप में या एक आदर्श नेता के तौर पर आज भी हमारे बीच मौज़ूद हैं।

राजिंद्र कृष्ण

*🎂जन्म की तारीख और समय: 6 जून 1919,पाकिस्तान जलालपुर जटा*
*⚰️मृत्यु की जगह और तारीख: 23 सितंबर 1987, मुंबई*

महान गीतकार राजेन्द्र कृष्ण के जन्मदिन पर हार्दिक श्रद्धांजलि

फिल्मी दुनिया में राजेन्द्र कृष्ण वे गीतकार हैं, जिन्होंने हिंदी फिल्मों की कहानी, स्क्रिप्ट और संवाद भी लिखे। सभी फील्ड में वे कामयाब रहे। लेकिन राजेन्द्र कृष्ण के चाहने वालों में उनकी पहचान गीतकार की ही है। चार दशक तक उनका फिल्मों में सिक्का चला। इस दरमियान उन्होंने ऐसे नायाब गीत लिखे, जो आज भी उसी तरह से पसंद किए जाते हैं। उनके लिखे गीतों का कोई ज़वाब नहीं। वे सचमुच लाज़वाब हैं। 6 जून, 1919 को अविभाजित भारत के जलालपुर जाटां में जन्मे राजेंद्र कृष्ण का पूरा नाम राजेंद्र कृष्ण दुग्गल था। राजेन्द्र कृष्ण को बचपन से ही शेर-ओ-शायरी का जु़नूनी शौक था। अपना शौक पूरा करने के लिए वे स्कूल की किताबों में अदबी रिसालों को छिपाकर पढ़ते। यह शौक कुछ यूं परवान चढ़ा कि आगे चलकर खुद लिखने भी लगे। पन्द्रह साल की उम्र तक आते-आते उन्होंने मुशायरों में शिरकत करना शुरू कर दिया। जहां उनकी शायरी खूब पसंद भी की गई। शायरी का शौक अपनी जगह और ग़म-ए-रोजग़ार का मसला अलग।

लिहाजा साल 1942 में शिमला की म्युनिसिपल कार्पोरेशन में क्लर्क की छोटी सी नौकरी कर ली। लेकिन उनका दिल इस नौकरी में बिल्कुल भी नहीं रमता था। नौकरी के साथ-साथ उनका लिखना-पढ़ना और मुशायरों में शिरकत करना जारी रहा। यह वह दौर था, जब सांस्कृतिक कार्यक्रम के नाम पर मुशायरों-कवि सम्मेलनों की बड़ी धूम थी। इन मुशायरों की मकबूलियत का आलम यह था कि हजारों लोग इनमें अपने मनपसंद शायरों को सुनने के लिए दूर-दूर से आते थे। शिमला में भी उस वक्त हर साल एक अजीमुश्शान ऑल इंडिया मुशायरा होता था, जिसमें मुल्क भर के नामचीन शायर अपना कलाम पढ़ने आया करते थे। साल 1945 का वाकया है, मुशायरे में दीगर शोअरा हजरात के साथ नौजवान राजेंद्र कृष्ण भी शामिल थे। जब उनके पढ़ने की बारी आई, तो उन्होंने अपनी ग़ज़ल का मतला पढ़ा, ‘‘कुछ इस तरह वो मेरे पास आए बैठे हैं/जैसे आग से दामन बचाए बैठे हैं’’। ग़ज़ल के इस शे’र को खूब वाह-वाही मिली। दाद देने वालों में जनता के साथ-साथ जिगर मुरादाबादी की भी आवाज़ मिली। शायर-ए-आज़म जिगर मुरादाबादी की तारीफ़ से राजेन्द्र कृष्ण को अपनी शायरी पर एतमाद पैदा हुआ और उन्होंने शायरी और लेखन को ही अपना पेशा बनाने का फैसला कर लिया। एक बुलंद इरादे के साथ वे शिमला छोड़, मायानगरी मुंबई में अपनी किस्मत आजमाने जा पहुंचे। 

फिल्मी दुनिया में काम पाने के लिए राजेन्द्र कृष्ण को ज्यादा जद्दोजहद नहीं करनी पड़ी। उन्हें सबसे पहले फिल्म ‘जनता’ की पटकथा लिखने को मिली। यह फिल्म साल 1947 में रिलीज हुई। उसी साल उनकी एक और फिल्म ‘जंज़ीर’ आई, जिसमें उन्होंने दो गीत लिखे। लेकिन उन्हें असल पहचान मिली फ़िल्म ‘प्यार की जीत’ से। साल 1948 में आई इस फ़िल्म में संगीतकार हुस्नलाल भगतराम का संगीत निर्देशन में उन्होंने चार गीत लिखे। फिल्म के सारे गाने ही सुपर हिट हुए। खास तौर पर अदाकारा सुरैया की सुरीली आवाज से राजेन्द्र कृष्ण के गाने ‘तेरे नैनों ने चोरी किया मेरा छोटा सा जिया परदेसिया’ में जादू जगा दिया। गाना पूरे देश में खूब मकबूल हुआ। साल 1948 में ही राजेन्द्र कृष्ण ने एक और गीत ऐसा लिखा, जिससे वे फिल्मी दुनिया में हमेशा के लिए अमर हो गए। 30 जनवरी, 1948 को महात्मा गांधी की हत्या हुई। बापू की इस हत्या से पूरा देश ग़मगीन हो गया। राजेन्द्र कृष्ण भी उनमें से एक थे। बापू के जानिब अपने जज्बात को उन्होंने एक जज़्बाती गीत ‘सुनो सुनो ऐ दुनिया वालों बापू की ये अमर कहानी’ में ढाला। तकरीबन तेरह मिनट के इस लंबे गीत में महात्मा गांधी का पूरा जिंदगीनामा है। मोहम्मद रफी की दर्द भरी आवाज ने इस गाने को नई ऊंचाइयां पहुंचा दी। आज भी ये गीत जब कहीं बजता है, तो देशवासियों की आंखें नम हो जाती हैं। 

 हिंदी फिल्मों में राजेन्द्र कृष्ण के गीतों की कामयाबी का सिलसिला एक बार शुरू हुआ, तो उन्होंने फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। एक के बाद एक उनकी ऐसी कई फिल्में आईं, जिनके गीतों ने ऑल इंडिया में धूम मचा दी। साल 1949 में फिल्म ‘बड़ी बहन’ में उन्हें एक बार फिर संगीतकार हुस्नलाल भगतराम के संगीत निर्देशन में गीत लिखने का मौका मिला। इस फिल्म के भी सभी गाने हिट हुए। खास तौर पर ‘चुप-चुप खड़े हो जरूर कोई बात है, पहली मुलाकात है ये पहली मुलाकात है’ और ‘चले जाना नहीं..’ इन गानों ने नौजवानों को अपना दीवाना बना लिया। सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर की आवाज ने इन गीतों में वह कशिश पैदा कर दी, जो आज भी दिल पर असर करती है। ‘चुप-चुप खड़े हो जरूर कोई बात है’ की तरह फ़िल्म ‘बहार’ (साल-1951) में शमशाद बेगम का गाया गीत ‘सैंया दिल में आना रे, ओ आके फिर न जाना रे’ भी खूब मकबूल हुआ। इन गानों ने राजेन्द्र कृष्ण को फिल्मों में गीतकार के तौर पर स्थापित कर दिया।

साल 1953 में फिल्म ‘अनारकली’ और साल 1954 में आई ‘नागिन’ में उनके लिखे सभी गाने सुपर हिट साबित हुए। इन गानों की कामयाबी ने राजेन्द्र कृष्ण के नाम को देश के घर-घर तक पहुंचा दिया। फिल्म ‘अनारकली’ में यूं तो उनके अलावा तीन और गीतकारों जांनिसार अख्तर, हसरत जयपुरी शैलेन्द्र ने गीत लिखे थे, लेकिन राजेन्द्र कृष्ण के लिखे सभी गीत खूब पसंद किए गए। ‘जिंदगी प्यार की दो-चार घड़ी होती है..’, ‘जाग दर्दे-ए इश्क जाग’, ‘ये जिंदगी उसी की है’ और ‘मोहब्बत में ऐसे कदम डगमगाए’ उनके लिखे गीतों को हेमंत कुमार और लता मंगेशकर की जादुई आवाज़ ने नई बुलंदियों पर पहुंचा दिया। इसी फिल्म से उनकी जोड़ी संगीतकार सी. रामचंद्रा के साथ बनी। इस जोड़ी ने आगे चलकर कई सुपर हिट फिल्में ‘पतंगा’, ‘अलबेला’, ‘पहली झलक’, ‘आजा़द’ आदि दीं। इन फिल्मों में लता मंगेशकर द्वारा गाये गए गीत खूब लोकप्रिय हुए। 

फिल्म ‘नागिन’ की कामयाबी के पीछे भी राजेन्द्र कृष्ण के गीतों का बड़ा योगदान था। इस फिल्म में उन्होंने एक से बढ़कर एक गीत ‘मन डोले, तन डोले, मेरे दिल का गया क़रार रे’, ‘मेरा दिल ये पुकारे आजा’, ‘जादूगर सैयां छोड़ मोरी बैयां’, ‘तेरे द्वार खड़ा इक जोगी’, ‘ओ ज़िन्दगी के देने वाले, ज़िन्दगी के लेने वाले’ लिखे। संगीतकार हेमंत कुमार के शानदार संगीत और गायिका लता मंगेशकर की आवाज ने इन गीतों को जो जिंदगी दी, वह आज भी इसके चाहने वालों के दिलों में धड़कन की तरह धड़कते हैं। सरल, सहज ज़बान में लिखे राजेन्द्र कृष्ण के गीत लोगों के दिलों में बहुत जल्द ही अंदर तक उतर जाते थे। जहां उन्हें मौका मिलता, उम्दा शायरी भी करते। संगीतकार मदन मोहन के लिए उन्होंने जो गाने लिखे, वह अलग ही नज़र आते हैं।

मिसाल के तौर पर फिल्म ‘अदालत’ में राजेन्द्र कृष्ण ने एक से बढ़कर एक बेमिसाल ग़ज़लें ‘उनको ये शिकायत है कि हम कुछ नहीं कहते’, ‘जाना था हमसे दूर बहाने बना लिये’ और ‘यूं हसरतों के दाग़ मुहब्बत में धो लिये’ लिखीं। अपनी मखमली आवाज से पहचाने जाने वाले सिंगर तलत महमूद के जो सुपर हिट गीत हैं, उनमें से ज्यादातर राजेन्द्र कृष्ण के लिखे हुए हैं। यकीं न हो तो खुद ही देखिए ‘ये हवा ये रात ये चान्दनी तेरी इक अदा पे निसार है’ (फिल्म-संगदिल), ‘बेरहम आसमाँ मेरी मंज़िल बता है कहां’ (फिल्म-बहाना), ‘हमसे आया न गया, तुमसे बुलाया न गया’ (फिल्म-देख कबीरा रोया), ‘इतना न मुझ से तू प्यार बढ़ा’, ‘आंसू समझ के क्यूं मुझे आँख से तुमने गिरा दिया’ (फिल्म-छाया), ‘फिर वही शाम वही ग़म वही तनहाई है’, ‘मैं तेरी नज़र का सुरूर हूं, तुझे याद हो के न याद हो’ (फिल्मत-जहाँआरा)। 

संगीतकार हेमंत कुमार के साथ भी राजेन्द्र कृष्ण की जोड़ी अच्छी जमी। फिल्म ‘नागिन’ के अलावा ‘मिस मैरी’, ‘लगन’, ‘पायल’, ‘दुर्गेश-नन्दिनी’ वगैरह फिल्मों में इस जोड़ी ने अनेक नायाब नग्में दिए। फिल्म की हर सिचुएशन पर राजेन्द्र कृष्ण को गीत लिखने की महारत हासिल थी। जिंदगी के हर रंग और हर भाव पर उन्होंने गीत लिखे। ये सभी गीत सुपर हिट हुए। उनके सुपर हिट गीतों की एक लंबी फेहरिस्त है, जो कभी भुलाए नहीं जाएंगे। ‘कौन आया मेरे मन के द्वारे पायल की झंकार लिए’ ‘चल उड़ जा रे पंछी कि अब ये देश हुआ बेगाना’ (फ़िल्म-भाभी), ‘तुम्हीं हो माता, पिता तुम्हीं हो, तुम्हीं हो बन्धु सखा तुम्हीं हो’ (फ़िल्म-मैं चुप रहूंगी), ‘जहां डाल डाल पर सोने की चिड़ियां करती हैं बसेरा’ (फ़िल्म- सिकन्दर-ए-आज़म)। राजेन्द्र कृष्ण ने फिल्मों में कई कॉमेडी और अनूठे गीत भी रचे। जो अपनी ज़बान और अलबेले अंदाज की वजह से अलग ही पहचाने जाते हैं। मिसाल के तौर पर उनके लिखे गए इन गीतों पर एक नज़र डालिए ‘शाम ढले खिड़की तले तुम सीटी बजाना छोड़ दो’ (फिल्म-अलबेला), ‘मेरे पिया गये रंगून, वहां से किया है टेलिफ़ून’ (फिल्म-पतंगा), ‘ओ मेरी प्यारी बिन्दु’, ‘इक चतुर नार करके सिंगार’ (फिल्म-पड़ोसन), ‘ईना मीना डीका’ (फिल्म-आशा)।

गीतकार राजेंद्र कृष्ण ने तकरीबन 300 फ़िल्मों के लिए एक हज़ार से ज्यादा गीत लिखे। सौ से ज्यादा फिल्मों की कहानी, संवाद और पटकथा लिखीं। जिसमें उनके द्वारा लिखी कुछ प्रमुख फ़िल्में ‘पड़ोसन’, ‘छाया’, ‘प्यार का सपना’, ‘मनमौजी’, ‘धर्माधिकारी’, ‘मां-बाप’, ‘साधु और शैतान’ हैं। एक वक्त ऐसा भी था, जब राजेन्द्र कृष्ण उन्हीं फिल्मों में गीत लिखते थे, जिसमें उनके संवाद और पटकथा होती थी। अपने फ़िल्मी लेखन के बारे में राजेन्द्र कृष्ण की एक इंटरव्यू में कैफियत थी, ‘‘आम तौर पर एक फ़िल्म में छः या सात गीत होते हैं। जिसमें रोमांटिक सिचुएशन ज़्यादा होती है। उसमें तो कोई पैग़ाम नहीं दिया जा सकता। मगर क्योंकि मैं स्क्रिप्ट राइटर भी हूं, संवाद भी लिखता हूं तो इसलिये कोई न कोई सिचुएशन ऐसी निकाल लेता हूं जिसमें देशभक्ति, भजन, या समाजवाद की बात हो या ग़ज़ल हो जाए।’’

बहरहाल, राजेन्द्र कृष्ण को जब भी मौका मिला, उन्होंने अपने गीतों और संवादों से देशवासियों को सरल शब्दों में एक संदेश दिया। सीधे-सच्चे लफ्जों और सादा अंदाज में वे ऐसे गीत लिखते थे, जो दिलों में गहरे तक उतर जाते थे। अपने शानदार गीतों  के लिए राजेन्द्र कृष्ण कई पुरस्कारों और सम्मान से भी नवाजे गए। साल 1965 में उन्हें ‘तुम्ही मेरे मंदिर, तुम्हीं मेरी पूजा’ (फिल्म-खानदान) गीत के लिए सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फ़िल्म फेयर पुरस्कार मिला। उन्होंने चार दशक तक अपने गानों से फिल्मी दुनिया में राज किया। एक शानदार जिंदगी बिताई। 23 सितम्बर, 1988 को गीतकार राजेन्द्र कृष्ण ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया और उस अनजानी दुनिया के सफर पर निकल गए, जहां से कोई वापस लौटकर नहीं आता।

अमरीकी ट्रंप

ट्रंप चले थे ईरान हराने , खुद अभी बने पप्पू  राहुल बने थे शेर ट्रंप के बल , खुद मुंह के बल गिरे।  दोनों हो रह बेइज्जत दुनिया हुई...