मंगलवार, 31 अक्टूबर 2023

ईशान खट्टर

इशान खट्टर 

एक भारतीय अभिनेता हैं। वे पर्दे पर सर्वप्रथम 2005 में फिल्म वाह! लाइफ हो तो ऐसी में एक बच्चे का अभिनय किया था जिसमे शाहिद कपूर. जो की इशान के रिश्ते में भाई लगते है मुख्य मुख्य किरदार में थे ।.

🎂जन्म: 01 नवंबर 1995 , मुम्बई
माता-पिता: नीलिमा अज़ीम, राजेश खट्टर
भाई: शाहिद कपूर
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2005 वाह! लाइफ हो तो ऐसी
2016 उड़ता पंजाब
2017 आधी विधवा
बादलों से परे
2018 धड़क
2020 खाली पीली
2021 ऊपर मत देखो
2022 फोन भूत
2023 फुर्सत

टिस्का चोपड़ा

टिस्का चोपड़ा
🎂 जन्म 01नवंबर 1973
 एक भारतीय अभिनेत्री, लेखिका और फिल्म निर्माता हैं। उन्होंने आमिर खान, प्रकाश झा, मधुर भंडारकर, अभिनय देव, नागेश कुकुनूर और अनूप सिंह जैसे कई प्रतिष्ठित निर्देशकों के साथ विभिन्न भाषाओं में 45 से अधिक फीचर फिल्मों में अभिनय किया है। टिस्का चोपड़ा ने जीवन का एक पूरा चक्र पूरा कर लिया है। उन्होंने अपना करियर अजय देवगन की नायिका के रूप में शुरू किया, फिल्म उद्योग से गायब हो गईं, फिर महात्मा बनाम गांधी, सेल्समैन रामलाल और इंशाह अल्लाह जैसे नाटक किए और अंत में कहानी घर घर की के साथ टेलीविजन से जुड़ गईं। उन्होंने हैदराबाद ब्लूज़ II, लोकनायक जय प्रकाश नारायणन और कर्मा जैसी फिल्मों में भी काम किया है।
चोपड़ा ने कैप्टन संजय चोपड़ा से शादी की, जो एयर इंडिया के पायलट हैं।उनकी एक बेटी, तारा और मुंबई में रहती हैं।वह कई NGO, सहायक शिक्षा और महिलाओं के अधिकारों के साथ काम करती है

इलियाना डी क्रूज

इलियाना डी'क्रूज़

🎂Born 10नंबर1987
Gender Female
Nationality Indian
Height 1.65 M
Parent(s) समिरा डी क्रूज़, , रोनाल्डो डी क्रूज़
Religion ईसाई
Residence मुंबई
Occupation अभिनेत्री मॉडल
इलियाना डी'क्रूज़ एक भारतीय फिल्म अभिनेत्री है, जो मुख्यतः तेलुगू सिनेमा और बॉलीवुड में दिखाई देती है। उन्होने 2006 की तेलुगू फिल्म देवदासू के लिए सर्वश्रेष्ठ महिला अभिनेत्री के लिए फिल्मफेयर अवॉर्ड जीता था। वह पोकीरी (2006), जलासा (2008), किक (2009) और जुलीय (2012) जैसी हिट फिल्मों में दिखाई दी, खुद को तेलुगू सिनेमा की प्रमुख अभिनेत्री के रूप में स्थापित किया।

नीता अंबानी0

नीता मुकेश अंबानी एक भारतीय महिला उद्यमी हैं। वे भारत के सबसे अमीर आदमी मुकेश अंबानी की पत्नी और रिलायंस इंडस्ट्रीज के संस्थापक धीरूभाई अंबानी की पुत्रवधु हैं। नीता अंबानी धीरूभाई अंबानी इंटरनेशनल स्कूल की संस्थापक और चेयरपर्सन हैं।

🎂जन्म: 01 नवंबर 1963, मुम्बई
पति: मुकेश अंबानी (विवा. 1985)
बच्चे: ईशा अम्बानी, अनंत अंबानी, आकाश अम्बानी
माता-पिता: रविन्द्रभाई दलाल, पूर्णिमा दलाल
बहन: ममता दलाल
वे एक मिडिल क्लास फैमिली से थीं। बचपन में नीता का नाम नयनतारा रखा गया था, जिसे बाद में छोटा कर 'नीता' कर दिया गया। मुकेश अंबानी से शादी के बाद अब ये कपल इंडियन बिजनेस वर्ल्ड का सबसे अमीर कपल है।
उनके पिता का नाम रविंद्र भाई दलाल और माता का नाम पूर्णिमा दलाल है।
-  नीता ने ग्रेजुएशन की डिग्री कॉमर्स में ली है। नीता अंबानी की बहन का नाम ममता है, जो धीरूभाई अंबानी इंटरनेशनल स्कूल में पढ़ाती हैं। उन्होंने भरतनाट्यम भी सीखा है।
 नीता का पूरा परिवार 
-  अंबानी परिवार की नेटवर्थ करीब 20 अरब डॉलर है। मुकेश और  नीता अंबानी के तीन बच्चे हैं। आकाश, अनंत और ईशा अंबानी। आकाश और ईशा अपने पिता के कारोबार से जुड़ चुके हैं। ईशा अंबानी अपने भाई आकाश के साथ रिलायंस जियो प्रोजेक्ट को देख रही हैं।

ऐसे हुई मुकेश से शादी
- मुकेश और  नीता  अंबानी  उनकी भरतनाट्यम परफॉर्मेंस को देखने के बाद ही स्वर्गीय धीरूभाई अंबानी ने अपने बेटे मुकेश अंबानी से उनके विवाह का प्रपोजल दिया। 
- मुकेश  और नीता अंबानी की शादी 8 मार्च 1985 को हुई। शादी के समय मुकेश अंबानी 28 साल जबकि नीता अंबानी 22 साल की थीं। 
बचपन में नीता का नाम नयनतारा रखा गया था, जिसे बाद में छोटा कर 'नीता' कर दिया गया। मुकेश अंबानी से शादी के बाद अब ये कपल इंडियन बिजनेस वर्ल्ड का सबसे अमीर कपल है।
नीता अंबानी जी सुबह की चाय 3, लाख रुपए की पीती हैं और एकबार पहने हुए जूते दोबारा इस्तेमाल नहीं करती पूरे दिन का खर्च जो मैंने पढ़ा था 10 , लाख है। ज्यादा भी हो सकता है।
अगर 'हां' कर देतीं तो आज बॉलीवुड हिरोइन होतीं Mukesh Ambani की पत्नी नीता अंबानी, प्रोड्यूसर्स ने दिया था फिल्मों का ऑफर

शनिवार, 28 अक्टूबर 2023

वी शांताराम

राजाराम वांकुडरे शांताराम
अन्य नाम अन्नासाहब वी शांता राम

🎂जन्म 18 नवंबर, 1901
जन्म भूमि कोल्हापुर
⚰️मृत्यु 30 अक्टूबर, 1990
मृत्यु स्थान मुंबई

कर्म भूमि महाराष्ट्र
कर्म-क्षेत्र फ़िल्म निर्देशक, अभिनेता
मुख्य फ़िल्में 'अमर कहानी', 'अमर भूपाली', 'झनक-झनक पायल बाजे', 'दो आँखेंं बारह हाथ', 'नवरंग'।
विषय नृत्य, संवाद, कथानक, संगीत
पुरस्कार-उपाधि 'फ़िल्मफेयर पुरस्कार', 'पद्म विभूषण', 'दादा साहब फाल्के पुरस्कार'
प्रसिद्धि फ़िल्म निर्देशक, फ़िल्मकार, अभिनेता

वी शांताराम

परिचय
महाराष्ट्र के कोल्हापुर में 18 नवंबर, 1901 को एक जैन परिवार में जन्मे राजाराम वांकुडरे शांताराम ने बाबूराव पेंटर की महाराष्ट्र फ़िल्म कम्पनी में छोटे-मोटे काम से अपनी शुरुआत की थी। शांताराम ने नाममात्र की शिक्षा पायी थी। उन्होंने 12 साल की उम्र में रेलवे वर्कशाप में अप्रेंटिस के रूप में काम किया था। कुछ समय बाद वह एक नाटक मंडली में शामिल हो गए।

गीत और संगीत
गीत और संगीत शांताराम की फ़िल्मों का एक और मज़बूत पक्ष होता था। एक फ़िल्मकार के रूप में वह अपनी फ़िल्मों के संगीत पर विशेष ध्यान देते और उनका ज़ोर इस बात पर रहता कि गानों के बोल आसान और गुनगुनाने योग्य हों। शांताराम की फ़िल्मों में रंगमंच का पुट ज़रूर नज़र आता था, लेकिन वह अपनी फ़िल्मों से समाज को एक नई दृष्टि देने में कामयाब रहे। हर फ़िल्म अपने वक़्त की कहानी बयान करती है, लेकिन उन्हें लगता है कि अब शांताराम की 'पड़ोसी' (1940) और 'दो आँखेंं बारह हाथ' जैसी जीवंत फ़िल्में दोबारा नहीं बनाई जा सकतीं। शांताराम की कुछ कृतियों की गुणवत्ता का मुक़ाबला आज भी नहीं किया जा सकता। क़रीब छह दशक लंबे अपने फ़िल्मी सफर में शांताराम ने हिन्दी व मराठी भाषा में कई सामाजिक एवं उद्देश्यपरक फ़िल्में बनाई और समाज में चली आ रही कुरीतियों पर चोट की।

निर्देशक
शांताराम ने फ़िल्मों की बारीकियाँ बाबूराव पेंटर से सीखीं। बाबूराव पेंटर ने उन्हें 'सवकारी पाश' (1925) में किसान की भूमिका भी दी। कुछ ही वर्षों में शांताराम ने फ़िल्म निर्माण की तमाम बारीकियाँ सीख लीं और निर्देशन की कमान संभाल ली। बतौर निर्देशक उनकी पहली फ़िल्म 'नेताजी पालकर' थी।

कंपनी का गठन
इसके बाद उन्होंने वी.जी. दामले, के. आर. धाईबर, एम. फतेलाल और एस. बी. कुलकर्णी के साथ मिलकर 'प्रभात फ़िल्म' कंपनी का गठन किया। अपने गुरु बाबूराव की ही तरह शांताराम ने शुरुआत में पौराणिक तथा ऐतिहासिक विषयों पर फ़िल्में बनाईं। लेकिन बाद में जर्मनी की यात्रा से उन्हें एक फ़िल्मकार के तौर पर नई दृष्टि मिली और उन्होंने 1934 में 'अमृत मंथन' फ़िल्म का निर्माण किया। शांताराम ने अपने लंबे फ़िल्मी सफर में कई उम्दा फ़िल्में बनाईं और उन्होंने मनोरंजन के साथ संदेश को हमेशा प्राथमिकता दी।

फ़िल्मी सफर
हिन्दी सिनेमा के शुरुआती दौर में प्रमुखता से उभरे फ़िल्मकार वी शांताराम उन हस्तियों में थे जिनके लिए फ़िल्में मनोरंजन के साथ सामाजिक संदेश देने का माध्यम थी। अपने लंबे फ़िल्मी सफर में उन्होंने प्रयोगधर्मिता को भी बढ़ावा दिया। डॉ. कोटनिस की अमर कहानी, झनक झनक पायल बाजे, दो आँखें बारह हाथ, नवरंग, दुनिया ना माने जैसी अपने समय की बेहद चर्चित फ़िल्मों में शांताराम ने फ़िल्म निर्माण से जुड़े कई प्रयोग किए। उन्होंने फ़िल्मों के मनोरंजन पक्ष से कोई समझौता किए बिना नए प्रयोग किए जिनके कारण उनकी फ़िल्में न केवल आम दर्शकों बल्कि समीक्षकों को भी काफ़ी प्रिय लगीं। शांताराम ने हिन्दी फ़िल्मों में मूविंग शॉट का प्रयोग सबसे पहले किया। उन्होंने बच्चों के लिए 1930 में रानी साहिबा फ़िल्म बनायी। 'चंद्रसेना' फ़िल्म में उन्होंने पहली बार ट्राली का प्रयोग किया।

रंगीन फ़िल्म
उन्होंने 1933 में पहली रंगीन फ़िल्म 'सैरंध्री' बनाई। भारत में एनिमेशन का इस्तेमाल करने वाले भी वह पहले फ़िल्मकार थे। वर्ष 1935 में प्रदर्शित हुई फ़िल्म 'जंबू काका' (1935) में उन्होंने एनिमेशन का इस्तेमाल किया था। उनकी फ़िल्म डॉ.कोटनिस की 'अमर कहानी' विदेश में दिखाई जाने वाली पहली भारतीय फ़िल्म थी।

राजकमल कला मंदिर
शांताराम ने प्रभात फ़िल्म के लिए तीन बेहद शानदार फ़िल्में बनाई। शांताराम ने 1937 में करुकू (हिन्दी में दुनिया ना माने), 1939 में मानुष (हिन्दी में आदमी) और 1941 में शेजारी (हिन्दी में पड़ोसी) बनाई। शांताराम ने बाद में प्रभात फ़िल्म को छोड़कर राजकमल कला मंदिर का निर्माण किया। इसके लिए उन्होंने 'शकुंतला' फ़िल्म बनाई। इसका 1947 में कनाडा की राष्ट्रीय प्रदर्शनी में प्रदर्शन किया गया। शांताराम की बेहतरीन फ़िल्मों में से एक है डॉ.कोटनिस की अमर कहानी। यह एक देशभक्त डाक्टर की सच्ची कहानी पर आधारित है जो सद्भावना मिशन पर चीन गए चिकित्सकों के एक दल का सदस्य था।

दो आँखें बारह हाथ
मुख्य लेख : दो आँखे बारह हाथ
शांताराम की सर्वाधिक चर्चित फ़िल्म दो आँखें बारह हाथ है। जो 1957 में प्रदर्शित हुई। यह एक साहसिक जेलर की कहानी है जो छह क़ैदियों को सुधारता है। इस फ़िल्म को सर्वश्रेष्ठ फ़ीचर फ़िल्म के लिए राष्ट्रपति के स्वर्ण पदक से सम्मानित किया गया था। इसे बर्लिन फ़िल्म फेस्टिवल में सिल्वर बियर और सर्वश्रेष्ठ विदेशी फ़िल्म के लिए सैमुअल गोल्डविन पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। इस फ़िल्म का गीत ऐ मालिक तेरे बंदे हम... आज भी लोगों को याद है।

झनक झनक पायल बाजे और नवरंग
झनक झनक पायल बाजे और नवरंग उनकी बेहद कामयाब फ़िल्में रहीं। दर्शकों ने इन फ़िल्मों के गीत और नृत्य को काफ़ी सराहा और फ़िल्मों को कई-कई बार देखा।

पिंजरा
शांताराम की आख़िरी महत्त्वपूर्ण फ़िल्म थी पिंजरा। यह फ़िल्म जोसफ स्टर्नबर्ग की 1930 में प्रदर्शित हुई क्लासिक फ़िल्म 'द ब्ल्यू एंजेल' पर आधारित थी। वैसे उनकी आख़िरी फ़िल्म झांझर थी। यह फ़िल्म बॉक्स ऑफ़िस पर कामयाब नहीं हो सकी और सात दशकों तक चले उनके शानदार फ़िल्मी कैरियर का अंत हो गया।

पुरस्कार
शांताराम एक चलते-फिरते संस्थान थे, जिन्होंने फ़िल्म जगत में बहुत सम्मान हासिल किया। फ़िल्म निर्माण की उनकी तकनीक और उनके जैसी दृष्टि आज के निर्देशकों में कम ही नज़र आती है। उन्हें वर्ष 1957 में झनक-झनक पायल बाजे के लिए सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का फ़िल्मफेयर पुरस्कार दिया गया था। उनकी कालजयी फ़िल्म दो आँखेंं बारह हाथ के लिए सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का पुरस्कार प्रदान किया गया। इस फ़िल्म ने बर्लिन फ़िल्म समारोह और गोल्डन ग्लोब अवॉर्ड में भी झंडे गाड़े। अन्नासाहब के नाम से मशहूर शांताराम को वर्ष 1985 में भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े पुरस्कार दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

विनोद मेहरा

विनोद मेहरा

🎂जन्म: 13 फ़रवरी 1945, अमृतसर
⚰️मृत्यु : 30 अक्तूबर 1990, मुम्बई

पत्नी: किरन मेहरा (विवा. 1988–1990), ज़्यादा
बच्चे: रोहन मेहरा, सोनिया मेहरा, Rohan Mehra (born 1991)
बहन: शारदा
विनोद मेहरा ने की थी तीन शादियां

विनोद मेहरा की पहली शादी मीना ब्रोका नाम की लड़की से हुई थी, जो उनकी मां ने पसंद की थी. शादीशुदा होने के बाद उन्हें एक्ट्रेस बिंदिया गोस्वामी से प्यार हुआ और उन्होंने पहली पत्नी को तलाक दिए बिना शादी कर ली, हालांकि बाद में उन्होंने पहली पत्नी को तलाक दे दिया था.

अफवाह साबित हुई

इंडियन एक्सप्रेस ने पहले बताया था कि टीवी होस्ट तबस्सुम, जो विनोद मेहरा की करीबी दोस्त थीं, ने पुष्टि की थी कि रेखा और विनोद प्यार में थे। हालाँकि, उन्होंने उन खबरों का भी खंडन किया जिनमें दावा किया गया था कि वे शादीशुदा हैं । उन्होंने ज्यादातर फिल्में उनके साथ कीं।

विनोद मेहरा का जन्म 13 फरवरी, 1945 को लाहौर में हुआ। उन्होंने अपने 3 दशक लंबे करियर में करीब 100 से ज्यादा फिल्मों में काम किया।
30 अक्टूबर 1990 को हार्ट अटैक की वजह से विनोद का निधन हो गया था। जब विनोद की मौत हुई तो उनकी बेटी सोनिया की उम्र दो साल से भी कम थी। 1988 को जन्मीं सोनिया, विनोद की तीसरी पत्नी किरण की बेटी हैं। बता दें कि विनोद ने कुल 4 शादियां की थीं। लेकिन इनमें से एक बीवी ऐसी रही, जिसे कभी भी पत्नी होने का दर्जा नहीं मिल पाया।
दरअसल विनोद ने पहली शादी अपनी मां की मर्जी से मीना ब्रोका से की थी।

बिंदिया गोस्वामी उम्र में विनोद मेहरा से 16 साल छोटी हैं। हालांकि कुछ महीनों तक अफेयर के बाद दोनों ने शादी भी कर ली। लेकिन ये रिश्ता सिर्फ चार साल चला

यासीर उस्मान की किताब 'रेखा: एन अनटोल्ड स्टोरी' के मुताबिक, विनोद मेहरा ने रेखा से भी शादी की थी। किताब के मुताबिक, कोलकाता में शादी कर रेखा, जब विनोद मेहरा के घर आईं तो विनोद की मां कमला मेहरा ने गुस्से में आकर चप्पल निकाल ली। जैसे ही रेखा उनके पैर छूने लगीं, तो उन्होंने रेखा को धक्का मारकर दूर हटा दिया। रेखा घर के दरवाजे पर खड़ी थीं और उनकी सास गालियां दे रही थीं। हालांकि, बाद में विनोद मेहरा ने बीच-बचाव किया और मां को किसी तरह समझाया। बाद में विनोद मेहरा ने रेखा से कहा था कि वो अपने घर लौट जाएं और फिलहाल वहीं रहें। हालांकि बाद में ये शादी टूट गई थी।

महज 45 साल की उम्र में विनोद मेहरा की मौत के बाद उनकी पत्नी किरण बच्चों के साथ केन्या शिफ्ट हो गई थीं। बेटी सोनिया का पालन-पोषण उनकी नाना-नानी के घर ही हुआ। केन्या और लंदन से पढ़ीं सोनिया ने 8 साल की उम्र में एक्टिंग की ट्रेनिंग लेनी शुरू कर दी थी। इस दौरान लंदन एकेडमी ऑफ म्यूजिक एंड ड्रामेटिक आर्ट्स के एक्टिंग एग्जामिनेशन में उन्हें गोल्ड मेडल भी मिला था। 17 साल की उम्र में सोनिया मुंबई आ गईं और अनुपम खेर के इंस्टीट्यूट एक्टर प्रीपेयर्स से 3 महीने का कोर्स किया। एक्ट्रेस होने के साथ-साथ सोनिया ट्रेंड डांसर भी हैं।
संक्षिप्त परिचय

विनोद मेहरा का जन्म 13 फरवरी, 1945 को अमृतसर में हुआ था। इन्होंने तीन शादियाँ की थी। मीना ब्रोका इनकी पहली पत्नी थी। बिंदिया गोस्वामी इनकी दूसरी पत्नी जिनके साथ विनोद ने कई फ़िल्मों में काम किया। किरण विनोद मेहरा की तीसरी पत्नी थी। किरण और विनोद की एक बेटी सोनिया और एक बेटा रोहन है।

विनोद मेहरा के फ़िल्म करियर के मौसम को खुशनुमा बनाने में अभिनेत्री मौसमी चटर्जी का योगदान रहा है। शक्ति सामंत की फ़िल्म अनुराग (1972) में मौसमी चटर्जी और विनोद मेहरा पहली बार साथ आए। मौसमी ने एक दृष्टिहीन युवती का रोल संजीदगी के साथ किया था। विनोद एक आदर्शवादी नायक थे और अपने पिता की इच्छा के विरुद्ध वह मौसमी से शादी करना चाहते थे। इसके बाद फ़िल्म उस पार (बसु चटर्जी), दो झूठ (जीतू ठाकुर) तथा स्वर्ग नरक (दसारी नारायण राव) में मौसमी के नायक बने।

अर्जुन बिजलानी

अर्जुन बिज्लानी 
एक भारतीय फिल्म अभिनेता हैं। यह लेफ्ट राइट लेफ्ट, नागिन, मोहे रंग दे, रिमिक्स, कार्तिका, बॉक्स क्रिकेट लीग, मिले जब हम तुम, यह है आशिक़ी, परदेस में मिला कोई अपना, रोड डायरिस, तेरी मेरी लव स्टोरी, काली - एक पुनर अवतार, जो बीवी से करे प्यार और परदेस में है मेरा दिल आदि में कार्य कर चुके हैं।

🎂जन्म : 31 अक्तूबर 1982 , मुम्बई

पत्नी: नेहा स्वामी (विवा. 2013)
माता-पिता: सुदर्शन बिजलानी, शक्ति बिजलानी
अर्जुन और नेहा की शादी को 10 साल हो चुके हैं. दोनों ने 20 मई 2013 को एक दूजे संग सात फेरे लिए थे. कपल का एक बेटा है.
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2004 कार्तिका
2005 रिमिक्स
2006-2008 लेफ़ राइट लेफ्ट
2008 मोहे रंग दे
2008–2010 मिले जब हम तुम
2011 परदेस में मिला कोई अपना
2012 रोड डायरिस
2012 तेरी मेरी लव स्टोरी
2013 काली - एक पुनर अवतार
2013 चिंटू बन गया जैंटलमेन
2013 जो बीवी से करे प्यार
2014 यह है आशिक़ी
2014-2015 बॉक्स क्रिकेट लीग
2015 सीआईडी 
2015 मेरी आशिकी तुम से ही
2015 नागिन 1
2016 परदेस में है मेरा दिल
जिसे एकता कपूर ने बनाया
 लिखा रितु भाटिया ने
आयुष अग्रवाल
निर्देशक  रहे

वास्तविक भाषा हिंदी
एपिसोड की संख्या 170

अनन्या पांडे

अनन्या पांडे 
🎂जन्म 30 अक्टूबर 1998 
एक भारतीय फिल्म अभिनेत्री हैं जो हिन्दी फिल्मों में काम करती हैं।अभिनेता चंकी पांडे की बेटी, उन्होंने 2019 में किशोर फिल्म स्टूडेंट ऑफ़ द ईयर 2 और कॉमेडी पति पत्नी और वो में प्रमुख भूमिकाओं के साथ अभिनय किया।

अनन्या पांडे

पांडे ने 2017 में धीरूभाई अंबानी इंटरनेशनल स्कूल से स्नातक किया। उन्हें 2017 में ला विले लुमिएर, पेरिस में वैनिटी फेयर के ले बाल डेस डेब्यूटेंट्स इवेंट में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया था और वह इस कार्यक्रम की सदस्य थीं।इनके पिता का नाम चंकी पांडे है तथा इनकी माँ का नाम भावना पांडे है। अनन्या पांडे की एक छोटी बहन है जिनका नाम रायसा पांडे है।

हिंदी फिल्म उद्योग में

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उद्योग में भाई-भतीजावाद के लाभार्थी होने के कारण पांडे ने अक्सर नकारात्मक ध्यान और ऑनलाइन ट्रोलिंग का मुकाबला किया है।उन्होंने कहा, "यह उतना आसान नहीं है जितना लोग कहते हैं। यदि आपके पास पहुंच है और इसे समर्थन देने की प्रतिभा नहीं है, तो लोग आप में अपना पैसा निवेश नहीं करेंगे। ऐसा कहने के बाद, मैं मेरा मानना ​​है कि भाई-भतीजावाद मौजूद है और यह सिर्फ बॉलीवुड ही नहीं बल्कि सभी उद्योगों में मौजूद है।"  2019 में, उन्होंने सोशल मीडिया बुलिंग के बारे में जागरूकता पैदा करने, नकारात्मकता को रोकने और एक सकारात्मक समुदाय का निर्माण करने के लिए सो पॉजिटिव नामक एक पहल शुरू की।

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शुक्रवार, 27 अक्टूबर 2023

सौमित्र चटर्जी

सौमित्र चटर्जी 
🎂जन्म: 19 जनवरी, 1935; ⚰️मृत्यु- 15 नवंबर, 2020, कोलकाता, पश्चिम बंगाल) प्रसिद्ध बांग्ला अभिनेता थे। सन 2001 में राष्ट्रीय पुरस्कार को ठुकराने वाले प्रख्यात बांग्ला अभिनेता सौमित्र चटर्जी को सन 2011 में भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान 'दादा साहब फाल्के पुरस्कार' से सम्मानित किया गया था। उन्हें अभिनेता प्राण, मनोज कुमार और अभिनेत्री वैजयंती माला पर वरीयता देते हुए इस पुरस्कार के लिए चुना गया था।सौमित्र चटर्जी प्रथम बांग्ला व्यक्ति थे, जिन्हें दादा साहब फाल्के पुरस्कार मिला था। चटर्जी को राजनेता और साथी कलाकार एक महान सांस्कृतिक प्रतीक, भरोसेमंद दोस्त और विविध क्षेत्रों में रुचि रखने वाले दिग्गज के तौर पर याद कर रहे हैं।

जीवन परिचय
सौमित्र चटर्जी का जन्म 19 जनवरी, 1935 में बंगाल में हुआ था। उन्होंने लंबे समय तक सत्यजीत रे के साथ भी काम किया। सत्यजीत रे की 14 फ़िल्मों में उन्होंने अभिनय किया। सौमित्र चटर्जी ने 1959 में सत्यजीत रे की फ़िल्म ‘अपूर संसार’ से अपना कैरियर शुरू किया था। इसके बाद उन्होंने सत्यजीत रे की फ़िल्म ‘देवी,’ ‘चारुलता’ और ‘घरे बाइरे’ में भी अभिनय किया। फ़िल्मकार सत्यजित रे और अभिनेता सौमित्र चटर्जी की जोड़ी की तुलना हॉलीवुड के प्रसिद्ध अभिनेता-निर्देशक जो़डी अकीरा कुरोसोवा-तोशिरो मिफ्यून और मार्केलो मास्ट्रोइयान्नी-फेडेरिको फेलिनो से की जानी लगी थी।

सौमित्र चटर्जी ने सत्यजित रे के अलावा मृणाल सेन, तपन सिन्हा और तरुण मजुमदार सहित कई अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त निर्देशकों के साथ भी काम किया। 2004 में पद्म भूषण से सम्मानित अभिनेता सौमित्र चटर्जी अपर्णा सेन, गौतम घोष और ऋतुपर्णो घोष जैसे प्रसिद्ध निर्देशकों के साथ भी काम कर चुके थे। वह रंगमंच से भी जु़डे रहे। उनको कला के क्षेत्र का फ्रांस का सर्वोच्च पुरस्कार "द ऑफिसर डेस आर्ट्स एट मेटियर्स" तथा इटली से लाइफ टाइम अचीवमेंट पुस्कार भी मिला।

नाटक मंच से स्नेह
बीबीसी बांग्ला को दिए एक साक्षात्कार में सौमित्र चटर्जी ने कहा था कि कृष्णानगर में बचपन में ही उन्होंने नाटकों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया था। बचपन में हम घर में तख्तों से मंच बनाते थे और बेड शीट से पर्दे बनाते थे। हम भाई-बहनों और दोस्तों के साथ मिलकर नाटक करते थे। इसके लिए घर के बुज़ुर्गों ने भी हमें बहुत हौसला दिया। नाटकों का उनका शौक बाद में भी उनके साथ रहा और वो फ़िल्मों के साथ-साथ मंच पर नज़र आते। बाद में उनके पिता काम के लिए कलकत्ता चले गए, फिर कॉलेज में पढ़ाई करने के लिए सौमित्र भी कलकत्ता चले आए।

सत्यजीत रे से मित्रता
कॉलेज के अपने दिनों के दौरान उनके एक मित्र ने उनका परिचय सत्यजीत रे से करवाया था। उस वक़्त हुई ये छोटी-सी मुलाक़ात बाद में दोनों के बीच गहरी दोस्ती में बदल गई। सत्यजीत रे की फ़िल्म के साथ शुरुआत करने के बाद उन्होंने उनके साथ कई और फ़िल्मों में काम किया। फ़िल्म आलोचक जीवनी लेखिका मैसी सेटॉन को एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था, "जब सत्यजीत रे ने मुझसे पूछा कि मैं क्या करना चाहता हूं तो मेरे पास कोई उत्तर नहीं था। मुझे उस वक़्त स्टेज पर और फ़िल्मों में ऐक्टिंग के फ़र्क़ के बारे में अधिक जानकारी नहीं थी। मुझे डर था कि मैं ओवरऐक्ट न करूं।" सौमित्र चटर्जी ने फ़िल्मों में कई तरह के किरदार निभाए। 'शोनार किल्ला' में वो शरलॉक होम्स की तरह के एक जासूस के किरदार में नज़र आए, 'देवी' में वो नियमों का पालन करने वाला दूल्हा बने, 'अभिजान' में ग़ुस्से में रहने वाला उत्तर भारतीय टैक्सी ड्राइवर बने तो 'अशनि संकट' में एक शांत रहने वाले पुजारी के किरदार में दिखे। नोबल सम्मान पाने वाले रवींद्रनाथ टैगोर की कहानी 'चारूलता' पर बनी सत्यजीत रे की फ़िल्म में भी उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

सौमित्र चटर्जी, सत्यजीत रे के पसंदीदा एक्टर थे और सत्यजीत उन्हें सिनेमा पर लिखी किताबें पढ़ने के लिए देते थे। रविवार को दोनों साथ मिलकर हॉलीवुड की फ़िल्में देखते थे और चर्चा करते थे। सौमित्र चटर्जी ने एक बार कहा था, "वो जो भी करते थे वो बिना कारण नहीं था, ऐसे नहीं था कि रविवार को मुझे एंटरटेंमेन्ट के लिए साथ में लेकर जाते थे।" सत्यजीत रे का कहना था कि सौमित्र बेहतरीन एक्टर हैं लेकिन अगर उन्हें "बुरी कहानी दी जाएगी तो उनका अभिनय भी वैसा ही होगा।" साल 1992 में सत्यजीत रे की मौत हो गई। उस दौरान सौमित्र ने एक इंटरव्यू में कहा था, "एक भी दिन ऐसा नहीं गुज़रा, जब मैंने सत्यजीत रे को याद न किया हो या उनके बारे में बात न की हो। प्रेरणा के तौर पर मेरी ज़िंदगी में वो हमेशा ही मौजूद रहे हैं। मैं जब भी उनके बारे में सोचता हूं मुझे प्रेरणा मिलती है।"

मृत्यु
सौमित्र चटर्जी की मृत्यु 15 नवंबर, 2020, कोलकाता, पश्चिम बंगाल में हुई। उन्हें 6 अक्टूबर को अस्पताल में कोविड-19 से संक्रमित पाए जाने पर भर्ती कराया गया था। वह संक्रमण से उबर गए लेकिन उनकी सेहत में सुधार नहीं हुआ। न्यूरोलॉजी, नेफ्रोलॉजी, कार्डियोलॉजी, क्रिटिकल केयर मेडिसिन के विशेषज्ञों की एक बड़ी टीम पिछले 40 दिनों में सौमित्र चटर्जी के स्वास्थ्य को फिर पटरी पर लाने का प्रयास कर रही थी, लेकिन कोई भी कोशिश सफल नहीं हो पा रही थी।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सौमित्र चटर्जी के निधन पर शोक प्रकट करते हुए कहा कि- "उनका निधन विश्व सिनेमा के साथ-साथ पश्चिम बंगाल और पूरे देश के सांस्कृतिक जीवन के लिए बहुत बड़ी क्षति है"। मोदी जी ने ट्वीट कर कहा, "श्री सौमित्र चटर्जी का निधन विश्व सिनेमा के साथ-साथ पश्चिम बंगाल और पूरे देश के सांस्कृतिक जीवन के लिए बहुत बड़ी क्षति है। उनके निधन से अत्यंत दु:ख हुआ है। परिजनों और प्रशंसकों के लिए मेरी संवेदनाएं। ओम शांति"।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने वयोवृद्ध अभिनेता के निधन को बंगाल के लिये बड़ी क्षति बताते हुए कहा कि- "सौमित्र चटर्जी एक योद्धा थे, जिन्हें उनके काम के लिये याद किया जाता रहेगा। यह बंगाल और दुनिया भर में उनके प्रशंसकों के लिये दु:खद दिन है"। ममता बनर्जी ने ट्विटर पर उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए लिखा, "फेलूदा नहीं रहे। ‘अपु’ ने अलविदा कह दिया। विदाई, सौमित्र (दा) चटर्जी। वह अपने जीवनकाल में दिग्गज रहे"।

कुणाल कोहली

कुणाल कोहली
🎂जन्म 28 अक्टूबर 1970
व्यवसाय निर्देशक, पटकथा लेखक, निर्माता, अभिनेता
जीवनसाथी रवीना कोहली
बच्चे 1 (बेटी)
रिश्तेदार डेविड धवन (मामा)
वरुण धवन (चचेरा भाई)
रोहित धवन (चचेरा भाई)
कुणाल कोहली बॉलीवुड में एक भारतीय फिल्म निर्देशक, निर्माता, अभिनेता और लेखक हैं । उन्हें हम तुम (2004) और फना (2006) के निर्देशक के रूप में जाना जाता है । वह कुणाल कोहली प्रोडक्शंस के प्रोडक्शन हाउस के भी मालिक हैं , जिसकी पहली फिल्म थोड़ा प्यार थोड़ा मैजिक (2008) थी।
कुणाल कोहली एक भारतीय फिल्म निर्देशक/निर्माता और लेखक हैं, जो हिंदी सिनेमा में अपने बेहतरीन काम के लिए जाने जाते हैं। कुणाल हिंदी सिनेमा में फिल्म हम तुम, फना,आदि के लिए जाने जाते हैं। कुनाल कोहली का अपना प्रोडक्शन हाउस है, जिसके तहत उन्होंने फिल्म थोड़ा प्यार थोड़ा मेजिक निर्देशित की।

 
निजी जीवन 
कुणाल कोहली का जन्म 28 अक्टूबर 1970 को हुआ था।  कुणाल की शादी रवीना कोहली से हुई है, रवीना कॉफी विद करण की निर्देशक रह चुकी हैं। दोनों के एक बेटी भी है- राधा।

करियर 
कोहली ने अपने करियर की शुरुआत बतौर फिल्म क्रिटिक्स से वर्ष 1990 के आखिरी में की थी। फिल्मी दुनिया में बतौर निर्देशक कदम रखने से पहले कुणाल कई म्यूजिक वीडियो को डायरेक्ट कर चुके हैं। कुणाल ने बतौर निर्देशक डेब्यू टीवी शो त्रिकोण से की, इसके बाद उन्होंने यश राज फिल्मस के तहत चार फ़िल्में निर्देशित की, कुनाल की पहली फिल्म मुझसे दोस्ती करोगे थी, जो बॉक्स-ऑफिस पर कुछ खास कमाल ना दिखा सकी। इसके बाद उन्होंने हम तुम निर्देशित की, इस फिल्म के लिए बेस्ट डायरेक्टर के अवार्ड से भी नवाजा गया, साथ ही इस फिल्म ने अन्य 5 अवार्ड भी अपने नाम किये।  इसके बाद कुनाल ने फना, थोड़ा प्यार थोड़ा मेजिक, ब्रेक के बाद जैसी फ़िल्में निर्देशित की।

प्रसिद्ध फिल्में 
मुझसे दोस्ती करोगे, हम तुम, थोड़ा प्यार थोड़ा मेजिक,ब्रेक के बाद, तेरी मेरी कहानी, फिर से

गीतकार अंजान

अंजान (गीतकार)
अंजान
पूरा नाम लालजी पाण्डेय
प्रसिद्ध नाम अंजान
🎂जन्म 28 अक्टूबर, 1930
जन्म भूमि बनारस, उत्तर प्रदेश
⚰️मृत्यु 13 सितम्बर, 1997
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र शेरो-शायरी तथा गीत लेखन
मुख्य फ़िल्में 'मुकद्दर का सिकंदर', 'डॉन', 'खून पसीना', 'बहारें फिर भी आएँगी', 'लावारिस', 'याराना', 'हेराफेरी' आदि।
प्रसिद्धि गीतकार
नागरिकता भारतीय
कॅरियर की शुरुआत अंजान ने अपने कॅरियर की शुरूआत वर्ष 1953 में अभिनेता प्रेमनाथ की फ़िल्म 'गोलकुंडा का कैदी' से की थी। इस फ़िल्म के लिए सबसे पहले उन्होंने 'लहर ये डोले कोयल बोले...' और 'शहीदों अमर है तुम्हारी कहानी...' गीत लिखे थे।
अन्य जानकारी अंजान के पसंदीदा संगीतकार के तौर पर कल्याणजी-आनंदजी का नाम सबसे ऊपर आता है। कल्याणजी-आनंदजी के संगीत निर्देशन में अंजान के गीतों को नई पहचान मिली।
भारतीय हिन्दी फ़िल्मों के मशहूर गीतकार तथा अपने समय के ख्याति प्राप्त शायर थे। इनका वास्तविक नाम 'लालजी पाण्डेय' था। अंजान के लिखे हुए गीत आज भी लोगों की जुबां पर चढ़े हुए हैं। 'खइके पान बनारस वाला', 'ओ साथी रे तेरे बिना भी क्या जीना' और 'रोते हुए आते हैं सब' जैसे न जाने कितने ही सदाबहार गीत अंजान ने लिखे और प्रसिद्धि की ऊँचाईयों को छुआ। अमिताभ बच्चन पर फ़िल्माये गए उनके गीत काफ़ी लोकप्रियता हासिल करते थे। अंजान के पसंदीदा संगीतकार के तौर पर कल्याणजी-आनंदजी का नाम सबसे ऊपर आता है। इनके संगीत निर्देशन में अंजान के गीतों को नई पहचान मिली थी। अंजान साहब के पुत्र समीर भी पिता के समान ही प्रसिद्ध गीतकार हैं।

जन्म
हिन्दी भाषा और साहित्य के करिश्माई व्यक्तित्व अंजान का जन्म 28 अक्टूबर, 1930 को उत्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी बनारस में हुआ था। बचपन के दिनों से ही उन्हें शेरो-शायरी के प्रति गहरा लगाव था।

कवि सम्मेलन तथा मुशायरा
शेरो-शायरी के अपने शौक को पूरा करने के लिए अंजान बनारस में आयोजित सभी कवि सम्मेलनों और मुशायरों में हिस्सा लिया करते थे। हालांकि मुशायरों में वह उर्दू का इस्तेमाल कम ही किया करते थे। जहां हिन्दी फ़िल्मों में उर्दू का इस्तेमाल एक पैशन की तरह किया जाता था, वही अंजान अपने रचित गीतों में हिन्दी पर ही अधिक जोर दिया करते थे।

फ़िल्मी शुरुआत
एक गीतकार के रूप में अंजान ने अपने कॅरियर की शुरूआत वर्ष 1953 में अभिनेता प्रेमनाथ की फ़िल्म 'गोलकुंडा का कैदी' से की। इस फ़िल्म के लिए सबसे पहले उन्होंने 'लहर ये डोले कोयल बोले...' और 'शहीदों अमर है तुम्हारी कहानी...' गीत लिखे थे, लेकिन इस फ़िल्म के जरिये वह कुछ ख़ास पहचान नहीं बना पाए। उन्होंने अपना संघर्ष जारी रखा। इस बीच उन्होंने कई छोटे बजट की फ़िल्में भी कीं, जिनसे उन्हें कुछ ख़ास फायदा नहीं हुआ।

सफलता
कुछ समय बाद अचानक ही उनकी मुलाकात जी. एस. कोहली से हुई, जिनके संगीत निर्देशन में उन्होंने फ़िल्म 'लंबे हाथ' के लिए 'मत पूछ मेरा है मेरा कौन...' गीत लिखा। इस गीत के जरिये वह काफ़ी हद तक अपनी पहचान बनाने में सफल हो गए। लगभग दस वर्ष तक मायानगरी मुंबई में संघर्ष करने के बाद वर्ष 1963 में पंडित रविशंकर के संगीत से सजी प्रेमचंद के उपन्यास गोदान पर आधारित फ़िल्म 'गोदान' में उनके रचित गीत 'चली आज गोरी पिया की नगरिया...' की सफलता के बाद अंजान ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। अंजान को इसके बाद कई अच्छी फ़िल्मों के प्रस्ताव मिलने शुरू हो गए, जिनमें 'बहारें फिर भी आएंगी', 'बंधन', 'कब क्यों और कहां', 'उमंग', 'रिवाज', 'एक नारी एक ब्रह्मचारी', 'हंगामा' जैसी कई फ़िल्में शामिल थीं। इसके बाद अंजान ने सफलता की नई बुलंदियों को छुआ और एक से बढ़कर एक गीत लिखे।

अंजान के सिने कॅरियर पर यदि नजर डाली जाए तो सुपरस्टार अमिताभ बच्चन पर फ़िल्माये गए उनके रचित गीत काफ़ी लोकप्रिय हुआ करते थे। वर्ष 1976 में प्रदर्शित फ़िल्म 'दो अंजाने' के 'लुक छिप लुक छिप जाओ ना...' गीत की कामयाबी के बाद अंजान ने अमिताभ बच्चन के लिए कई सफल गीत लिखे, जिनमें 'बरसों पुराना ये याराना...', 'खून पसीने की जो मिलेगी तो खाएंगे...', 'रोते हुए आते हैं सब...', 'ओ साथी रे तेरे बिना भी क्या जीना...' जैसे कई सदाबहार गीत शामिल हैं।

प्रमुख फ़िल्में
अंजान के पसंदीदा संगीतकार के तौर पर कल्याणजी-आनंदजी का नाम सबसे ऊपर आता है। कल्याणजी-आनंदजी के संगीत निर्देशन में अंजान के गीतों को नई पहचान मिली। सबसे पहले इस जोड़ी का गीत वर्ष 1969 में प्रदर्शित फ़िल्म 'बंधन' में पसंद किया गया। इसके बाद अंजान द्वारा रचित फ़िल्मी गीतों में कल्याणजी-आनंदजी का ही संगीत हुआ करता था। इन दोनों की जोड़ी ने जिन फ़िल्मों के लिए अपना योगदान दिया, वे इस प्रकार थीं-

दो अनजाने - 1976
हेराफेरी - 1976
खून पसीना - 1977
गंगा की सौगंध - 1978
डॉन - 1978
मुकद्दर का सिकंदर - 1978
लावारिस - 1981
याराना - 1981
ईमानदार - 1987
दाता - 1989
जादूगर - 1989
थानेदार - 1990
प्रसिद्ध गीत
गीतकार अंजान द्वारा लिखे गए कुछ प्रसिद्ध गीत निम्नलिखित हैं-

आपके हसीं रुख पे - बहारें फिर भी आएँगी
खइके पान बनारस वाला - डॉन
दिल तो है दिल - मुकद्दर का सिकंदर
रोते हुए आते हैं सब - मुकद्दर का सिकंदर
ओ साथी रे तेरे बिना भी क्या जीना - मुकद्दर का सिकंदर
प्यार जिंदगी है - मुकद्दर का सिकंदर
मुझे नौलक्खा मंगा दे रे - शराबी
खून पसीने की जो मिलेगी तो खाएंगे - ख़ून पसीना
बरसों पुराना ये याराना
पंसदीदा संगीतकार तथा गायक
वर्ष 1989 में सुल्तान अहमद की फ़िल्म 'दाता' में कल्याणजी-आनंदजी के संगीत निर्देशन में अंजान का रचित यह गीत 'बाबुल का ये घर बहना कुछ दिन का ठिकाना है', आज भी श्रोताओं की आंखों को नम कर देता है। कल्याणजी-आनंदजी के अलावा अंजान के पसंदीदा संगीतकारों में बप्पी लाहिरी, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, ओ. पी. नैयर, राजेश रोशन तथा आर. डी. बर्मन प्रमुख रहे। वहीं उनके गीतों को किशोर कुमार, आशा भोंसले, मोहम्मद रफ़ी तथा लता मंगेशकर जैसे चोटी के गायक कलाकारों ने अपने स्वर से सजाया।

निधन
अंजान ने अपने तीन दशक से भी ज्यादा लंबे सिने कॅरियर में लगभग 200 फ़िल्मों के लिए गीत लिखे। लगभग तीन दशकों तक हिन्दी सिनेमा को अपने गीतों से संवारने वाले अंजान का 67 वर्ष की आयु में 13 सितम्बर, 1997 को निधन हुआ। इनके निधन से फ़िल्मी दुनिया का एक बड़ा सितारा डूब गया। आज भी उनके लिखे गीत दिल को सकूँ देते हैं और हर कोई उन्हें गुनगुनाता है।

सत्यन कप्पू

चरित्र अभिनेता सत्येन कप्पू की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि

सत्येन कप्पू 
सत्येन्द्र कप्पू (जन्म सत्येन्द्र शर्मा ; जिन्हें सत्येन कप्पू के नाम से भी जाना जाता है ; 
🎂जन्म- 07 फरवरी1931, पानीपत; 
⚰️मृत्यु- 27 अक्टूबर, 2007, मुम्बई, महाराष्ट्र) 

भारतीय हिंदी सिनेमा के चरित्र अभिनेता थे। उन्होंने 390 फ़िल्मों में अभिनय किया।

सत्येन कप्पू का जन्म 1931 को पानीपत में हुआ था।
इनका नाम सत्येन्द्र कपूर है।
यह भारतीय सिनेमा के चरित्र अभिनेता थे।
सत्येन कप्पू ने 390 फ़िल्मों में अभिनय किया है।
सत्येन कप्पू ने अपने करियर की शुरूआत 1952 में इंडियन पीपल थियेटर एसोसिएशन से की थी।
इन्होंने अपने समय के सभी नामी गिरामी निर्देशकों और ऐक्टर्स के साथ काम किया था।
राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन, जितेन्द्र के नेतृत्व में कई फ़िल्मों में उनका काम उल्लेखनीय था।
सत्येन कप्पू को 27 अक्टूबर, 2007 शनिवार शाम 4 बजे मुम्बई में दिल का दौरा पड़ने के कारण निधन हो गया।

प्रमुख फ़िल्मों की सूची-
📽️
2002 अखियों से गोली मारे
2000 बेटी नम्बर वन
2000 खौफ़
1999 अनाड़ी नम्बर वन
1999 मन
1999 गैर
1998 मैं सोलह बरस की
1998 दंड नायक
1998 हिटलर
1998 विनाशक
1997 आँखों में तुम हो
1997 मेरे सपनों की रानी
1997 विरासत
1997 दिल के झरोखे में
1997 उफ़ ! ये मोहब्बत
1996 रंगबाज़
1996 शोहरत
1995 तकदीरवाला
1995 हम दोनों
1995 हकीकत
1995 हथकड़ी
1995 राजा
1995 पापी देवता
1994 वादे इरादे
1994 ब्रह्म
1994 गोपी किशन
1994 घर की इज्जत
1994 इंसानियत
1994 अमानत
1993 दिव्य शक्ति
1993 इंसानियत के देवता
1993 साहिबाँ
1993 तहकीकात
1993 दलाल
1993 गुरुदेव
1993 संतान
1993 बड़ी बहन
1993 संग्राम
1992 दिल का क्या कसूर
1992 इन्तेहा प्यार की
1992 हीर राँझा
1992 बेटा
1992 खुले आम
1991 गुनहगार
1991 खेल
1991 कुरबानी रंग लायेगी
1991 फूल और काँटे
1991 प्रतिकार
1991 झूठी शान
1991 कर्ज़ चुकाना है
1991 फ़तेह
1991 पाप की आँधी
1990 दीवाना मुझ सा नहीं
1990 दिल
1990 घर हो तो ऐसा
1990 जवानी ज़िन्दाबाद
1990 प्यार का देवता
1989 नाचे नागिन गली गली
1989 गैर कानूनी
1989 जोशीले
1989 मोहब्बत का पैगाम
1989 जायदाद
1989 अनजाने रिश्ते
1989 तुझे नहीं छोड़ूँगा
1989 जादूगर
1989 कानून अपना अपना
1989 घराना
1989 तौहीन
1989 दाता
1988 घरवाली बाहरवाली
1988 चरणों की सौगन्ध
1988 प्यार मोहब्बत
1988 मोहब्बत के दुश्मन
1988 मर मिटेंगे
1988 तमाचा
1988 सागर संगम
1988 अग्नि
1988 दो वक्त की रोटी
1988 जीते हैं शान से
1988 सोने पे सुहागा
1988 खतरों के खिलाड़ी
1988 ज़ख्मी औरत
1988 बीवी हो तो ऐसी
1987 कुदरत का कानून
1987 जवाब हम देंगे
1987 मजाल
1987 ईमानदार
1987 हिम्मत और मेहनत
1987 मुकद्दर का फैसला
1987 खुदगर्ज़
1986 नसीब अपना अपना
1986 तन बदन
1986 कृष्णा-कृष्णा
1986 प्यार किया है प्यार करेंगे
1986 सवेरे वाली गाड़ी
1986 प्यार के दो पल
1986 चमेली की शादी
1986 पाले ख़ान
1986 मुद्दत
1986 स्वर्ग से सुन्दर
1986 जीवा
1985 पैसा ये पैसा
1985 तेरी मेहरबानियाँ
1985 वफ़ादार
1985 मेरा जवाब
1985 ज़माना
1985 मर्द
1985 बेपनाह
1985 सरफ़रोश
1985 रामकली
1985 साहेब
1985 गिरफ्तार
1985 सत्यमेव जयते
1985 फाँसी के बाद
1985 युद्ध
1985 अलग अलग
1984 एक नया इतिहास
1984 कामयाब
1984 आज का एम एल ए राम अवतार
1984 लैला
1984 नया कदम
1984 ज़मीन आसमान
1984 गृहस्थी
1984 इंकलाब
1984 दुनिया
1984 लव मैरिज
1984 मेरा फैसला
1984 डिवोर्स
1984 शराबी
1984 यह देश
1983 कैसे कैसे लोग
1983 चोर पुलिस
1983 शुभ कामना
1983 हिम्मतवाला
1983 दो गुलाब
1983 वो जो हसीना
1983 कुली
1983 सौतन
1983 जस्टिस चौधरी
1983 मैं आवारा हूँ
1982 तेरी माँग सितारों से भर दूँ
1982 अनोखा बंधन
1982 नमक हलाल
1982 तीसरी आँख
1982 जॉनी आई लव यू
1982 अशान्ति
1982 सम्राट
1982 धर्म काँटा
1981 मैं और मेरा हाथी
1981 वक्त की दीवार
1981 शाका
1981 लावारिस
1981 कुदरत
1981 रॉकी
1981 रक्षा
1981 एक दूजे के लिये
1980 पत्थर से टक्कर
1980 ज्योति बने ज्वाला
1980 द बर्निंग ट्रेन
1979 मंज़िल
1979 सरकारी मेहमान
1979 मिस्टर नटवरलाल
1979 ढ़ोंगी
1979 दिल का हीरा
1979 काला पत्थर
1979 झूठा कहीं का
1978 काला आदमी
1978 सावन के गीत
1978 भोला भाला
1978 नालायक
1978 डॉन
1978 फंदेबाज़
1978 विश्वनाथ
1978 दरवाज़ा
1977 विश्वासघात
1977 दूसरा आदमी
1977 धूप छाँव
1977 चला मुरारी हीरो बनने
1977 जय विजय
1977 ईमान धर्म
1976 ख़ान दोस्त
1976 संतान
1976 उधार का सिंदूर
1976 लगाम
1976 फकीरा
1975 मौसम
1975 कैद
1975 आखिरी दाव
1975 शोले
1975 दीवार
1975 धर्मात्मा
1975 धोती लोटा और चौपाटी
1975 प्रतिज्ञा
1975 रानी और लालपरी
1974 विदाई
1974 हाथ की सफाई
1974 मज़बूर
1974 बेनाम
1974 दूसरी सीता सत्येन कप्पू नाम से
1974 खोटे सिक्के
1974 कसौटी
1974 ईमान
1973 यादों की बारात
1973 कीमत
1973 अनहोनी
1973 अविष्कार
1973 हिन्दुस्तान की कसम
1972 सीता और गीता
1972 रास्ते का पत्थर
1972 अपना देश
1972 अनुराग
1971 अमर प्रेम
1971 जाने अनजाने
1971 लाल पत्थर
1963 बन्दिनी

लक्ष्मीकांत बेर्डे

हास्य अभिनेता लक्ष्मीकांत बेर्डे के जन्मदिवस पर हार्दिक श्रद्धांजलि

लक्ष्मीकांत बेर्डे 
🎂26 अक्टूबर 1954 
⚰️16 दिसंबर 2004

 एक भारतीय अभिनेता थे जो मराठी और कई हिंदी फिल्मों में दिखाई दिए बेर्डे ने प्रोडक्शन कंपनी मराठी साहित्य संघ में एक कर्मचारी के रूप में अपना करियर शुरू किया और फिर कुछ मराठी स्टेज नाटकों में सहायक भूमिकाएँ निभाईं।  1983-84 में, वह पहली बार मराठी प्ले टूर टूर से प्रसिद्ध हुए

मराठी फिल्मों के अलावा, उनकी हास्य मंच भूमिकाएं जैसे शांततेचा कर्ता चालु आहे और बीघाडले स्वर्गेश द्वार भी सफल रहीं।  बेर्डे ने कई बॉलीवुड फिल्मों में अभिनय किया और कॉमिक रोल में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के लिए फिल्मफेयर अवार्ड के लिए चार नामांकन प्राप्त किए।  उन्होंने लगभग 185 हिंदी और मराठी फिल्मों में अभिनय किया।

लक्ष्मीकांत बेर्डे का जन्म 26 अक्टूबर 1954 को बॉम्बे (मुंबई) में हुआ था उनके पांच बड़े भाई-बहन थे और परिवार की आय बढ़ाने के लिए बेर्डे बचपन में ही लॉटरी टिकट बेचने लगे गिरगांव में किए गए गणेश उत्सव समारोह के लिए सांस्कृतिक गतिविधियों के दौरान मंचीय नाटकों में उनकी भागीदारी से उन्हें अभिनय में रुचि मिली उन्होंने इंटर-स्कूल और इंटर-कॉलेज ड्रामा प्रतियोगिताओं में भाग लेने के लिए पुरस्कार जीते।  इसके बाद, बेर्दे ने मुंबई मराठी साहित्य संघ में काम करना शुरू कर दिया

मराठी साहित्य संघ में एक कर्मचारी के रूप में काम करते हुए, लक्ष्मीकांत बेर्डे ने मराठी मंचीय नाटकों में छोटी भूमिकाओं में अभिनय करना शुरू किया।  1983-84 में, उन्होंने पुरुषोत्तम बेर्दे के मराठी स्टेज प्ले टूर टूर में अपनी पहली प्रमुख भूमिका हासिल की जो हिट बन गई और बेर्डे की कॉमेडी की शैली को सराहा गया।

बेर्डे ने अपनी फिल्म की शुरुआत 1984 की मराठी फिल्म लेक चलली ससरला से की इसके बाद, उन्होंने और अभिनेता महेश कोठारी ने फिल्म धूम धड़ाका (1984) और दे दनादन (1987) में एक साथ अभिनय किया।  ये दोनों फिल्में प्रसिद्ध हुईं और बेर्डे ने अपनी ट्रेडमार्क कॉमेडी शैली स्थापित करने में मदद की

ज्यादातर फिल्मों में, उन्होंने कोठारी के साथ या अभिनेता अशोक सराफ के साथ अभिनय किया लक्ष्मीकांत बेर्डे  अशोक सराफ की जोड़ी को भारतीय सिनेमा में एक सफल मुख्य अभिनेता के रूप में पहचाना जाता है बेर्डे ने अशोक सराफ, सचिन पिलगांवकर और महेश कोठारी के साथ मिलकर 1989 की मराठी फिल्म ऐश ही बनवा बनवी में एक साथ अभिनय करने के बाद मराठी फिल्मों में एक सफल चौकड़ी बनाई

उस दशक को मराठी फिल्म उद्योग द्वारा "अशोक-लक्ष्य" युग के रूप में याद किया जाएगा।  बेर्ड की मृत्यु तक दोनों कलाकार सबसे अच्छे दोस्त बने रहे।  ज्यादातर फिल्मों में, बेर्डे की अभिनेत्री उनकी भावी पत्नी प्रिया अरुण ही रही

बेर्डे की पहली हिंदी फिल्म 1989 में सलमान ख़ान द्वारा अभिनीत सूरज बड़जात्या की मैंने प्यार किया थी। उनकी कुछ अन्य लोकप्रिय हिंदी फ़िल्मों में हम आपके हैं कौन ..!, मेरे सपनों  की रानी, ​​आरज़ू, साजन, बेटा, 100 डेज और अनाड़ी शामिल हैं।  बेर्दे हिट मराठी मंच नाटकों जैसे शांता कर्ता चालु आहे और अन्य में मुख्य अभिनेता के रूप में भी काम करते रहे।

1992 में, बेर्डे ने अपने कॉमेडी मोल्ड से अलग होने की कोशिश की और फिल्म एक होता विदुषक में एक गंभीर भूमिका निभाई फिल्म को सफलता नहीं मिलने पर बेर्डे कॉमेडी में वापस आ गए, हालांकि वे फिल्म की असफलता से निराश थे।

1985 से 2000 तक, बेर्डे ने कई अन्य मराठी ब्लॉकबस्टर्स जैसे आमि दोगे राजा रानी, ​​हमाल दे धमाल, बलचे बाप ब्रह्मचारी, एक पेक्सा एक, भूतच चू, थरथराहट धड़ाकेबाज़ और ज़ापाटेला में अभिनय किया। 

बेर्डे ने मराठी टीवी धारावाहिक नस्ती आफत में अभिनय किया था।

16 दिसंबर 2004 को किडनी की बीमारी के कारण मुंबई में लक्ष्मीकांत बेर्डे की मृत्यु हो गई उनके अंतिम संस्कार में महेश कोठारी अशोक सराफ और सचिन पिलगांवकर जैसी मराठी फिल्म उद्योग की कई उल्लेखनीय हस्तियों ने भाग लिया

अपने जीवन के अंतिम वर्षों में, बेर्डे ने अपना प्रोडक्शन हाउस 'अभिनय आर्ट्स' चलाया, जिसका नाम उनके बेटे अभिनय बेर्डे के नाम पर रखा गया।  बहुत कम लोग जानते हैं कि लक्ष्मीकांत बेर्डे बहुत अच्छे वेंट्रिलक्विस्ट और गिटारवादक थे।

जय श्री

राजश्री शांताराम
🎂08 अक्टूबर 1944
बम्बई , बम्बई प्रेसीडेंसी , ब्रिटिश भारत ब्रिटिश राज
सिटिज़नशिप
अमेरिकन
पेशा
अभिनेत्री
सक्रिय वर्ष
1954
1961-1973
जीवनसाथी
ग्रेग चैपमैन
अभिभावक)
वी. शांताराम (पिता), जयश्री (मां)
राजश्री प्रशंसित भारतीय फिल्म निर्माता वी. शांताराम और अभिनेत्री जयश्री की बेटी हैं , जो वी. शांताराम की दूसरी पत्नी हैं। उनके भाई किरण शांताराम मुंबई के पूर्व शेरिफ थे ।

अमेरिका में राज कपूर के साथ फिल्म अराउंड द वर्ल्ड की शूटिंग के दौरान उनकी मुलाकात अमेरिकी छात्र ग्रेग चैपमैन से हुई। दोनों ने तीन साल बाद एक भारतीय समारोह में शादी की, जो पांच दिनों तक चला। वह अपने पति के साथ स्थायी रूप से अमेरिका में रहने चली गयीं।उनकी एक बेटी है। वे लॉस एंजिल्स में रहते हैं । 

वह पिछले 30 वर्षों से अमेरिका में रह रही हैं और अपने पति के साथ एक बहुत ही सफल कस्टम कपड़ों का व्यवसाय चला रही हैं, जबकि फिल्मों में उनकी रुचि अभी भी बरकरार है। वह हैक-ओ-लैंटर्न , टैंटेड लव और मॉनसून में सहायक निर्देशक थीं और उन्होंने "अशोक बाय अनदर नेम" नामक बच्चों के वीडियो पर कथन भी किया है।
📽️
1954 सुबह का तारा
1961 स्त्री
1963 ग्रहस्थि
1963 घर बसाके देखो
1964 शहनाई
1964 जी चाहता है 
1964 गीत गाया पत्थरों ने
1965 दो दिल 
1965 जानवर
1966 सागाई 
1966 मोहब्बत जिंदगी है 
1967 दिल ने पुकारा
1967 गुनाहों का देवता 
1967 दुनिया भर में रीता 
1968 सुहाग रात 
1968 ब्रह्मचारी
1973 नैना

सोमवार, 23 अक्टूबर 2023

शारदा

शारदा राजन आयंगर जिन्हें केवल शारदा नाम से श्रेय दिया गया, हिन्दी फिल्मों की पार्श्वगायिका रही हैं। 1960 और 70 के दशक में वो सक्रिय रही और 1969 से लेकर 1972 तक फिल्मफेयर पुरस्कारों में उन्हें चार नामांकन प्राप्त हुए, जिसमें से उन्हें जहाँ प्यार मिले के "बात ज़रा है आपस की" के लिये पुरस्कार प्राप्त भी हुआ।

🎂जन्म की तारीख और समय: 25 अक्तूबर 1933, मद्रास प्रैज़िडन्सी
⚰️मृत्यु की जगह और तारीख: 14 जून 2023
बच्चे: शम्मी राजन
शारदा जी को फिल्म सूरज (1966) में उनके गीत "तितली उड़ी" के लिए सबसे ज्यादा याद किया जाता है। 2007 में, उन्होंने अपना एल्बम अंदाज़-ए-बयान और जारी किया , जिसमें मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़लों पर आधारित उनकी अपनी रचनाएँ थीं ।
शारदा भारत के तमिलनाडु के एक अयंगर परिवार से थीं और बचपन से ही उनका रुझान संगीत की ओर था। 
उनकी आवाज़ आखिरी बार कांच की दीवार (1986) में सुनी गई थी।
वैसे 21 जुलाई 2007 को शारदा ने अपना ग़ज़ल एल्बम अंदाज़-ए-बयान और जारी किया , जो मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़लों का संकलन था। यह एल्बम अभिनेत्री शबाना आज़मी के हाथों जुहू जागृति मुंबई में जारी किया गया था ।
14 जून 2023 को 89 वर्ष की आयु में शारदा का निधन हो गया।

रविवार, 22 अक्टूबर 2023

मीनू मुमताज

मालिकाउन्निसा अली
प्रसिद्ध नाम मीनू मुमताज़
🎂जन्म 26 अप्रॅल, 1942
जन्म भूमि बम्बई 🇮🇳(आज़ादी पूर्व, वर्तमान मुम्बई, महाराष्ट्र)
⚰️मृत्यु 23 अक्टूबर, 2021
मृत्यु स्थान टोरंटो🇨🇦
अभिभावक पिता- मुमताज़ अली
पति/पत्नी सईद अली अकबर
संतान चार
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र भारतीय सिनेमा
मुख्य फ़िल्में ‘चौदहवीं का चांद’, ‘कागज के फूल’, ‘साहिब बीवी और गुलाम’, ‘ताजमहल’, ‘घूंघट’, ‘इंसान जाग उठा’, ‘घर बसाके देखो’ आदि।
प्रसिद्धि अभिनेत्री
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी मीनू मुमताज़ अपने समय के मशहूर कॉमेडियन और सुपर स्टार महमूद अली की बहन थीं। उन्हें मीनू मुमताज़ नाम अभिनेत्री मीना कुमारी ने दिया था।
भारतीय अभिनेत्री थीं। वह अपने समय के मशहूर कॉमेडियन महमूद अली की बहन थीं। भारतीय सिनेमा की दिग्गज अभिनेत्री रहीं मीना कुमारी और मीनू मुमताज़ में काफी गहरी मित्रता थी। सन 1950 से लेकर 1960 के दशक में बतौर डांसर कई फिल्मों में काम करने वाली मीनू मुमताज़ एक डांसर के साथ-साथ कैरेक्टर आर्टिस्ट भी थीं। मीनू मुमताज़ का असली नाम मालिकाउन्निसा अली था। जब फिल्मों में काम करने लगीं तो मीना कुमारी ने उनका नाम बदलकर मीनू मुमताज़ कर दिया था। तब से फिल्म इंडस्ट्री में मीनू मुमताज़ के नाम से मशहूर हो गईं।
परिचय
मीनू मुमताज ने फिल्मी दुनिया में ‘सखी हातिम’ से कदम रखा था। 1950 और 1960 के दशक की कई हिंदी फिल्मों में उन्होंने काम किया। कई बार फिल्मों में वह डांसर के तौर पर भी नजर आई हैं। उनकी सबसे ज्यादा मशहूर फिल्मों में ‘सीआईडी’, ‘नया दौर’, ‘ताज महल’, ‘गबन’ और ‘जमीर’ शामिल हैं। पहली फिल्म ‘सखी हातिम’ में मीनू मुमताज बलराज साहनी जैसे दिग्गज अभिनेता के साथ थीं। उन्होंने गुरुदत्त साहब के साथ भी काम किया। ‘चौदहवीं का चांद’, ‘कागज के फूल’, ‘साहिब बीवी और गुलाम’, ‘ताजमहल’, ‘घूंघट’, ‘इंसान जाग उठा’, ‘घर बसाके देखो’ जैसी कई फिल्मों में उन्होंने काम किया था।

मृत्यु
अभिनेत्री मीनू मुमताज़ की मृत्यु 23 अक्टूबर, 2021 को कनाडा में हुई। वह बीते कई सालों से बीमार थीं और लगभग बीस वर्षों से कनाडा में ही रह रही थीं। मीनू मुमताज़ के निधन के बारे में बात करते हुए उनके भतीजे नौषाद ने कहा, "वह जईफ थीं और उनकी उम्र भी 80 के आसपास थी। अब तक मैं जिस किसी से भी मिला हूं, वह उनमें से सबसे प्यारी इंसान थीं।" अपने बड़े भाई महमूद की तरह मीनू मुमताज़ ने भी अपनी पहचान फिल्मों में बनाने का फैसला किया था।

देवन वर्मा

देवेन वर्मा  

🎂जन्म 23 अक्टूबर, 1937
⚰️मृत्यु 02 दिसम्बर, 2014
मृत्यु स्थान पुणे, महाराष्ट्र
पति/पत्नी रूपा गांगुली
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र बॉलीवुड
मुख्य फ़िल्में 'गोलमाल', 'अंगूर', 'खट्टा मीठा', 'नास्तिक', 'रंग बिरंगी', 'चोरी मेरा काम', 'चोर के घर चोर' आदि।
शिक्षा राजनीति विज्ञान तथा समाजशास्त्र से स्नातक।
पुरस्कार-उपाधि सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता का फ़िल्मफेयर पुरस्कार (तीन बार)
प्रसिद्धि हास्य कलाकार
नागरिकता भारतीय
फ़िल्मों में प्रवेश देवेन वर्मा का फ़िल्मों में प्रवेश 1961 में बी. आर. चोपड़ा के बैनर तले फ़िल्म 'धर्मपुत्र' से हुआ।
अन्य जानकारी देवेन वर्मा बड़े पर्दे पर आख़िरी बार वर्ष 2003 में प्रदर्शित 'कलकत्ता मेल' फ़िल्म में नज़र आए थे। इस फ़िल्म में ये रानी मुखर्जी के दादाजी के किरदार में थे।
देवेन वर्मा भारतीय सिनेमा में हिन्दी फ़िल्मों के प्रसिद्ध हास्य अभिनेता थे। उन्होंने हिन्दी फ़िल्मों में अपने शानदार हास्य अभिनय से सभी का दिल जीत लिया था। देवेन वर्मा ने लगभग 149 फ़िल्मों में काम किया। 'गोलमाल', 'अंगूर', 'खट्टा मीठा', 'नास्तिक', 'रंग बिरंगी' आदि उनके कॅरियर की बड़ी फ़िल्मों में से एक रही थीं। 'बेशर्म' सहित कुछ फ़िल्मों का निर्माण और निर्देशन भी उन्होंने किया था। 'चोरी मेरा काम', 'चोर के घर चोर' तथा 'अंगूर' फ़िल्मों के लिए उन्हें बेस्ट कॉमेडियन के फ़िल्मफेयर अवॉर्ड से भी नवाजा़ गया था।

जन्म तथा शिक्षा
देवेन वर्मा का जन्म 23 अक्टूबर, 1937 को हुआ था। उनका पालन-पोषण पुणे में हुआ। उन्होंने यहीं से राजनीति विज्ञान तथा समाजशास्त्र में स्नातक की डिग्री प्राप्त की थी। देवेन वर्मा अपने समय के प्रसिद्ध अभिनेता और 'दादा मुनि' के नाम से मशहूर अशोक कुमार के दामाद थे। अशोक कुमार की सबसे छोटी पुत्री रूपा गांगुली से उनका विवाह हुआ था।

फ़िल्मों में प्रवेश
वर्ष 1959 में पढ़ाई समाप्त कर देवेन वर्मा मुम्बई आ गए। फ़िल्मी कॅरियर आरंभ करने में उन्हें ज्यादा परेशानी नहीं हुई। 'दादा मुनि' अशोक कुमार के वे दामाद थे। 'बीआर फ़िल्म्स' और 'यशराज फ़िल्म्स' में लगातार उन्हें काम मिला, क्योंकि इस बैनर से दादा मुनि के अंतरंग सम्बन्ध थे। देवेन वर्मा का फ़िल्मों में प्रवेश 1961 में बी. आर. चोपड़ा के बैनर तले फ़िल्म 'धर्मपुत्र' से हुआ। इसका निर्देशन यश चोपड़ा ने किया था। इस फ़िल्म में उनका छोटा-सा रोल था, जिस पर किसी ने अधिक ध्यान नहीं गया। 1964 में आई फ़िल्म 'सुहागन' में उनके अभिनय पर निर्माताओं की नजरें इनायत हुईं। 'देवर' फ़िल्म में उनका निगेटिव रोल था, तो दूसरी फ़िल्म 'मोहब्बत जिंदगी है' में उन्होंने हास्य भूमिका निभाई। दोनों फ़िल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर सफलता पाई।

यह समय देवेन वर्मा के लिए निर्णायक था। उन्हें कॉमेडी या खलनायकी में से किसी एक को चुनना था। उन्होंने कॉमेडी की ओर अपनी दिलचस्पी दिखाई। देवेन वर्मा के अभिनय की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि वे बड़ी आसानी से किरदार को अपने अंदर उतार लेते थे। वह फ़िल्मी जीवन में सिर्फ अभिनय करने ही नहीं आए थे। उन्हें निर्माता-निर्देशक बनकर अपनी अतिरिक्ति ऊर्जा को भी दर्शाना था।

यादगार भूमिकाएँ
फ़िल्म 'चोरी मेरा काम' (1975) में देवेन वर्मा परवीन भाई पब्लिशर के रूप में परदे पर आते हैं। एक किताब के प्रकाशित होते ही सबका ध्यान उनकी ओर आकर्षित होता है। इसी रोल को कुछ साल बाद 'चोर के घर चोर' (1978) फ़िल्म में और आगे ले जाया गया, जैसा इन दिनों सीक्वेल फ़िल्मों में किया जा रहा है। उनके कॅरियर की यादगार फ़िल्में थीं- 'गोलमाल' (1979), 'अंगूर' (1982) तथा 'रंग बिरंगी' (1983)। बासु चटर्जी, ऋषिकेश मुखर्जी, गुलज़ार जैसे संवेदनशील निर्देशकों की फ़िल्मों में काम करने से देवेन को पुरस्कार भी मिले और प्रतिष्ठा भी। शेक्सपीयर के मशहूर नाटक 'कॉमेडी ऑफ़ एरर्स' पर भारत में कई फ़िल्में बनी हैं, जिनमें गुलज़ार निर्देशित 'अंगूर' सर्वोत्तम मानी जाती है। इन फ़िल्मों के अलावा भी देवेन वर्मा ने कई फ़िल्मों में यादगार भूमिकाएँ निभाईं और दर्शकों को तनाव मुक्त किया। उन्होंने कॉमेडी करने के लिए अश्लीलता का कभी सहारा नहीं लिया और हमेशा अपने संवाद बोलने के अंदाज़और बॉडी लैंग्वेज के जरिये दर्शकों को हंसाया। उनके परदे पर आते ही दर्शक हंसने के लिए तैयार हो जाते थे

📽️प्रमुख फ़िल्में
देवेन वर्मा की प्रमुख फ़िल्में
फ़िल्म वर्ष फ़िल्म वर्ष
अनुपमा 1966 खामोशी 1970
गुड्डी 1971 बुड्ढा मिल गया 1971
मेरे अपने 1971 अन्नदाता 1972
धुंध 1973 कोरा कागज 1974
चोरी मेरा काम 1975 कभी कभी 1976
चोर के घर चोर 1978 गोलमाल 1979
लोक परलोक 1979 सौ दिन सास के 1980
जुदाई 1980 कुदरत 1981
ले‍डिस टेलर 1981 सिलसिला 1981
अंगूर 1982 रंग बिरंगी 1983
झूठी 1986 चमत्कार 1992
क्या कहना 2000 खट्टा मीठा 1977
देवेन वर्मा बड़े पर्दे पर आख़िरी बार 'कलकत्ता मेल' फ़िल्म में नजर आए थे। मशहूर कॉमेडी फ़िल्म 'अंदाज़ अपना अपना' में उन्होंने आज के सुपर स्टार आमिर ख़ान के पिता की भूमिका निभाई थी।

सम्मान और पुरस्कार
1975 - 'चोरी मेरा काम' - फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता।
1982 - 'अंगूर' - फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता।
1979 - 'चोर के घर चोरी' - फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता।
1980 - 'जुदाई' - फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता के लिए नामांकित किया गया।
निधन
देवेन वर्मा का निधन 77 वर्ष की आयु में दिल का दौरा पड़ने से #02dic  दिसम्बर, 2014 को हुआ

शनिवार, 21 अक्टूबर 2023

भावना बलसारा

भावना बलसावर हिंदी अभिनेत्री
🎂जन्म तिथि : 21-10-1975 हास्य अभिनेत्रि
भावना की प्रसिद्धि का दावा छोटे पर्दे पर "गुटुर गु" जैसे हिट शो में एक कॉमेडियन के रूप में उनकी बेदाग टाइमिंग है। 21 अक्टूबर 1975 को मुंबई में जन्मशोभा खोटेअपने आप में एक अभिनेत्री, बड़े होने के दौरान अभिनय उनके दिमाग में आखिरी चीज थी। वह एक मेधावी छात्रा थी और आईसीएसई बोर्ड की टॉपर थी, उसने एसएनडीटी कॉलेज में फैशन समन्वय का काम यह दावा करते हुए किया कि वह हमेशा रचनात्मक कला के करीब कुछ करना चाहती थी।

स्टेज अभिनय से उनका परिचय किसी आकस्मिक घटना से कम नहीं था, "बॉटम्स अप" स्टेज प्ले के लिए अपनी माँ के साथ जाने पर, एक अभिनेत्री की अनुपस्थिति के कारण उन्हें एक छोटी भूमिका निभाने का मौका मिला और तब से उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उनकी प्रसिद्ध भूमिकाओं में लोकप्रिय सिटकॉम में सनकी चाची शामिल हैं।देख भाई देखया "ज़बान संभाल के" में तेजस्वी दिल की धड़कन। भावना ने अधिक गंभीर भूमिकाएँ करने में रुचि दिखाई है, जहाँ वह अपने अंतर्मुखी पक्ष के प्रति भी सच्ची हो सकती हैं।
वह एक शौकीन कुत्ता प्रेमी और लेखन उत्साही भी है और उम्मीद करती है कि किसी दिन वह वंशावली के लायक लेखिका बनेगी।
इस जीवनी का एक और संस्करण...
अभिनेताओं के परिवार से आने वाली भावना बलसावर एक फिल्म, टीवी और मंच अभिनेत्री हैं। उनकी मां शोभा खोटे एक बॉलीवुड अभिनेत्री थीं जिन्होंने 4 साल की उम्र में अभिनय करना शुरू कर दिया था। शोभा खोटे के छोटे भाई हैंविजू खोटेजो फिल्म "शोले" में अपनी भूमिका के लिए व्यापक रूप से जाने जाते हैं। भावना के दादा और उनकी बहन, नंदू खोटे औरदुर्गा खोटेक्रमशः थिएटर उद्योग में प्रसिद्ध अभिनेता हैं।

भावना ने टीवी श्रृंखला "" में सरस्वती के रूप में अपनी पहली उपस्थिति दर्ज की। उन्होंने हिंदी सिटकॉम "देख भाई देख" में अभिनय किया, जिसका निर्माण किया गया थाजया बच्चनऔर द्वारा निर्देशितआनंद महेंद्रू. इस श्रृंखला के बाद, भावना एक और हिंदी टीवी श्रृंखला “ज़बान संभालके”, जो एक और सफल सिटकॉम था। बाद में श्रृंखला में, शुभा और विजू खोटे को भी कुछ एपिसोड में दिखाया गया। "हेरी फेरी", "डैम दमा" डैम", "गुटुर गु" (एक मूक शो) और "" सहित लगभग 15 अन्य टेलीविजन श्रृंखलाओं के बाद, वह वर्तमान में ज़ी पर प्रसारित होने वाली श्रृंखला "सतरंगी ससुराल" में हरप्रीत के रूप में अभिनय कर रही हैं। टी.वी. यह श्रृंखला मराठी शो, "होनार सुन मी ह्या घरची" का रूपांतरण है।

भावना ने कुछ फिल्मों और मंच पर भी अभिनय किया। उन्होंने "अंधा युग" नामक नाटक का प्रदर्शन किया। के द्वारा यह लिखा गया थाधर्मवीर भारतीवर्ष 1954 में और यह 1947 के भारत विभाजन के कारण मानव जीवन और नैतिक मूल्यों के विनाश का एक रूपक है। भावना ने फिल्म “धूम धड़ाका'', जो कि एक मराठी कॉमेडी फिल्म है जिसका निर्देशन किया ।

कादर ख़ान


कादर ख़ान
🎂जन्म 22 अक्तूबर, 1935 बलूचिस्तान, पाकिस्तान
⚰️मृत्यु 31 दिसम्बर 2018टोरंटो, कनाडा
अभिभावक पिता- अब्दुल रहमान ख़ान, माता- इकबाल बेगम
पति/पत्नी अज़रा ख़ान
संतान सरफ़राज़ ख़ान, शाहनवाज़ ख़ान और क्यूडस ख़ान
कर्म भूमि मुम्बई
कर्म-क्षेत्र संवाद लेखक, अध्यापक
मुख्य फ़िल्में 'बाप नंबरी बेटा दस नंबरी', 'सनम तेरी कसम', 'नौकर बीबी का', 'शरारा', 'कैदी', 'घर एक मंदिर', 'वतन के रखवाले', 'खुदगर्ज', 'ख़ून भरी मांग', 'आँखेंं', 'शतरंज', 'कुली नंबर 1', 'हीरो नंबर 1', 'दूल्हे राजा', 'राजा बाबू', 'चालबाज़' आदि।
शिक्षा स्नातकोत्तर
विद्यालय इस्माइल यूसुफ़ कॉलेज, मुम्बई, उस्मानिया विश्वविद्यालय
पुरस्कार-उपाधि फ़िल्मफेयर पुरस्कार सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता (बाप नंबरी बेटा दस नंबरी)
प्रसिद्धि अभिनेता
नागरिकता भारतीय
भाषा ज्ञान उर्दू, हिंदी, अंग्रेज़ी
अन्य जानकारी अमर अकबर एंथोनी, ख़ून पसीना, परवरिश, शालीमार, मुक्कदर का सिकंदर, सुहाग, याराना, लावारिस, सत्ते पे सत्ता, धर्मकांटा, कुली, शराबी आदि फ़िल्मों में संवाद लिखे।
भारतीय सिनेमा जगत् में एक ऐसे बहुआयामी कलाकार के तौर पर जाना जाता है, जिन्होंने सहनायक, संवाद लेखक, खलनायक, हास्य अभिनेता और चरित्र अभिनेता के तौर पर दर्शकों के बीच अपनी पहचान बनाई। खलनायक से लेकर हास्य अभिनेता तक हर किरदार में जान फूंक देने वाले कादर ख़ान अब तक 300 से ज्यादा फ़िल्मों में काम कर चुके हैं, लेकिन उनकी प्रतिभा यहीं नहीं थमती। वह 80 से अधिक लोकप्रिय फ़िल्मों के लिए संवाद लिखकर उस दिशा में भी अपना लोहा मनवा चुके हैं। कादर ख़ान के अभिनय की एक विशेषता यह है कि वह किसी भी तरह की भूमिका के लिए उपयुक्त हैं। फ़िल्म 'कुली' एवं 'वर्दी' में एक ‘क्रूर खलनायक’ की भूमिका हो या फिर ‘कर्ज़ चुकाना है’, ‘जैसी करनी वैसी भरनी’ फ़िल्म में भावपूर्ण अभिनय या फिर ‘बाप नंबरी बेटा दस नंबरी’ और ‘प्यार का देवता’ जैसी फ़िल्मों में हास्य अभिनय इन सभी चरित्रों में उनका कोई जवाब नहीं है।

जीवन परिचय
कादर ख़ान का जन्म 22 अक्टूबर, 1935 को बलूचिस्तान में हुआ था, जो अब पाकिस्तान का हिस्सा है। भारत पाक बंटवारे के बाद उनका परिवार भारत में बस गया। कादर ख़ान ने अपनी स्नातकोत्तर की पढ़ाई उस्मानिया विश्वविद्यालय से पूरी की। इसके बाद उन्होंने अरबी भाषा के प्रशिक्षण के लिये एक संस्थान की स्थापना करने का निर्णय लिया। कादर ख़ान ने अपने कैरियर की शुरुआत एक शिक्षक के तौर पर की। एक बार कॉलेज में हो रहे वार्षिक समारोह में कादर ख़ान को अभिनय करने का मौका मिला। इस समारोह में अभिनेता दिलीप कुमार ने कादर ख़ान के अभिनय से काफ़ी प्रभावित हुए और उन्हें अपनी फ़िल्म ‘सगीना’ में काम करने का प्रस्ताव दिया। यही कारण है कि कादर के अंदर एक शिक्षक, एक संवाद लेखक और एक अभिनेता तीनों एक साथ बसते हैं।

फ़िल्मी कैरियर
महान अभिनेता दिलीप कुमार ने कादर ख़ान को अपनी फ़िल्म ‘सगीना’ में काम करने का प्रस्ताव दिया। वर्ष 1974 में आई फ़िल्म ‘सगीना’ के बाद भी कादर ख़ान को काफ़ी संघर्ष करना पड़ा। इस दौरान उनकी ‘दिल दीवाना’, ‘बेनाम’, ‘उमर कैद’, ‘अनाड़ी’ और बैराग जैसी फ़िल्में प्रदर्शित हुई। लेकिन इन फ़िल्मों से उन्हें कुछ ख़ास फायदा नहीं पहुंचा। वर्ष 1977 में कादर ख़ान की 'खून पसीना' और 'परवरिश' जैसी फ़िल्में प्रदर्शित हुई। इन फ़िल्मों के जरिए वह कुछ हद तक अपनी पहचान बनाने में कामयाब हुए।

सफल फ़िल्में
फ़िल्म ‘खून पसीना’ और ‘परवरिश’ की सफलता के बाद कादर ख़ान को कई अच्छी फ़िल्मों के प्रस्ताव मिलने शुरू हो गए। जिनमें मुकद्दर का सिकंदर, मिस्टर नटवरलाल, सुहाग, अब्दुल्ला, दो और दो पांच, लूटमार, कुर्बानी, याराना, बुलंदी और नसीब जैसी बड़े बजट की फ़िल्में शामिल थी। इन फ़िल्मों की सफलता के बाद कादर ख़ान ने सफलता की नयी बुलंदियों को छुआ और बतौर खलनायक फ़िल्म इंडस्ट्री में स्थापित हो गए। वर्ष 1983 में प्रदर्शित फ़िल्म ‘कुली’ कादर ख़ान के करियर की सुपरहिट फ़िल्मों में शुमार की जाती है। मनमोहन देसाई के बैनर तले बनी इस फ़िल्म में अमिताभ बच्चन ने मुख्य भूमिका निभाई थी। फ़िल्म टिकट खिड़की पर सुपरहिट साबित हुयी। इसके साथ ही कादर ख़ान फ़िल्म इंडस्ट्री के चोटी के खलनायकों की फेहरिस्त में शामिल हो गए। वर्ष 1990 में प्रदर्शित फ़िल्म ‘बाप नंबरी बेटा दस नंबरी’ कादर ख़ान के सिने करियर की महत्त्वपूर्ण फ़िल्मों में से एक है। इस फ़िल्म में कादर ख़ान और शक्ति कपूर ने बाप और बेटे की भूमिका निभाई जो ठग बनकर दूसरों को धोखा दिया करते हैं। फ़िल्म में कादर ख़ान और शक्ति कपूर ने अपने कारनामों के जरिये दर्शकों को हंसाते-हंसाते लोटपोट कर दिया। फ़िल्म में अपने दमदार अभिनय के लिये कादर ख़ान फ़िल्मफेयर पुरस्कार से सम्मानित भी किए गए।

चरित्र अभिनेता
नब्बे के दशक में कादर ख़ान ने अपने अभिनय को एकरूपता से बचाने और स्वयं को चरित्र अभिनेता के रूप में स्थापित करने के लिए अपनी भूमिकाओं में परिवर्तन भी किया। इस क्रम में वर्ष 1992 में प्रदर्शित फ़िल्म ‘अंगार’ में उन्होंने अंडर वर्ल्ड डॉन जहांगीर ख़ान की भूमिका को रूपहले पर्दे पर साकार किया। दशक के अंतिम वर्षो में बतौर ख़लनायक कादर ख़ान की फ़िल्मों को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। इसके बाद कादर ख़ान ने हास्य अभिनेता के तौर पर भी काम करना शुरू कर दिया। इस क्रम में वर्ष 1998 में प्रदर्शित फ़िल्म ‘दूल्हे राजा’ में अभिनेता गोविंदा के साथ उनकी भूमिका दर्शकों के बीच काफ़ी पसंद की गयी।

प्रसिद्ध फ़िल्में
कादर ख़ान ने अपने सिने करियर में लगभग 300 फ़िल्मों में अभिनय किया है। उनकी अभिनीत फ़िल्मों में मुक्ति, ज्वालामुखी, मेरी आवाज सुनो, जमाने को दिख़ाना है, सनम तेरी कसम, नौकर बीबी का, शरारा, कैदी, घर एक मंदिर, गंगवा, जान जानी जर्नादन, घर द्वार, तबायफ़, पाताल भैरवी, इंसाफ़ की आवाज़, स्वर्ग से सुंदर, वतन के रखवाले, खुदगर्ज़, ख़ून भरी मांग, आँखेंं, शतरंज, कुली नंबर 1, हीरो नंबर 1, जुड़वा, बड़े मियां छोटे मियां, दूल्हे राजा, राजा बाबू, चालबाज़, हसीना मान जाएगी, फंटूश आदि।

शक्ति कपूर के साथ जोड़ी
कादर ख़ान के सिने करियर में उनकी जोड़ी अभिनेता शक्ति कपूर के साथ काफ़ी पसंद की गयी। इन दोनों अभिनेताओं ने अब तक लगभग 100 फ़िल्मों में एक साथ काम किया है। उनकी जोड़ी वाली महत्त्वपूर्ण फ़िल्मों में से कुछ इस प्रकार हैं- बाप नंबरी बेटा दस नंबरी, नसीब, लूटमार, हिम्मतवाला, महान, हैसियत, जस्टिस चौधरी, अक्लमंद, मकसद, मवाली, तोहफा, इंकलाब, कैदी, गिरफ्तार, घर संसार, धर्म अधिकारी, सिंहासन, सोने पे सुहागा, मास्टरजी, इंसानियत के दुश्मन, वक्त की आवाज़, जैसी करनी वैसी भरनी, नाचने वाले गाने वाले, राजा बाबू आदि।

संवाद लेखक
कादर ख़ान ने कई फ़िल्मों में संवाद लेखक के तौर पर भी काम किया है। इनमें खेल खेल में, रफूचक्कर, धरमवीर, अमर अकबर एंथोनी, ख़ून पसीना, परवरिश, शालीमार, मुक्कदर का सिकंदर, मिस्टर नटवरलाल, सुहाग, याराना, लावारिस, सत्ते पे सत्ता, देश प्रेमी, सनम तेरी कसम, धर्मकांटा, कुली, शराबी, गिरफ्तार, कर्मा, ख़ून भरी मांग, हत्या, हम, कुली नंबर वन, साजन चले ससुराल जैसी सुपरहिट फ़िल्में शामिल है।

अमिताभ को निर्देशित करने की अधूरी तमन्ना
कादर ख़ान की अमिताभ बच्चन को लेकर फ़िल्म बनाने की तमन्ना अब तक पूरी नहीं हो सकी। अभिनेता कादर ख़ान और अमिताभ बच्चन ने एक साथ कई फ़िल्में कीं। अदालत, सुहाग, मुकद्दर का सिकंदर, नसीब और कुली जैसी बेहद कामयाब फ़िल्मों में इन दोनों ने साथ काम किया। इसके अलावा कादर ख़ान ने अमर अकबर एंथनी, सत्ते पे सत्ता और शराबी जैसी फ़िल्मों के संवाद भी लिखे, लेकिन कादर ख़ान अमिताभ बच्चन को लेकर खुद एक फ़िल्म बनाना चाहते थे और उनकी ये तमन्ना अब तक पूरी नहीं हो सकी। कादर ने ये बात एक ख़ास बातचीत में बताई। उन्होंने कहा, मैं अमिताभ बच्चन, जया प्रदा और अमरीश पुरी को लेकर फ़िल्म 'जाहिल' बनाना चाहता था। उसका निर्देशन भी मैं खुद करना चाहता था लेकिन खुदा को शायद कुछ और ही मंजूर था। कादर ख़ान ने बताया कि इसके फौरन बाद फ़िल्म 'कुली' की शूटिंग के दौरान अमिताभ बच्चन को जबरदस्त चोट लग गई और फिर वो महीनों अस्पताल में भर्ती रहे। अमिताभ के अस्पताल से वापस आने के बाद फिर कादर ख़ान अपनी दूसरी फ़िल्मों में बहुत ज्यादा व्यस्त हो गए और इधर अमिताभ बच्चन राजनीति में आ गए। उसके बाद कादर ख़ान और अमिताभ की जुगलबंदी वाली ये फ़िल्म हमेशा के लिए डब्बाबंद हो गई। अमिताभ की तारीफ़ करते हुए कादर ख़ान कहते हैं, वो संपूर्ण कलाकार हैं, अल्लाह ने उनको अच्छी आवाज़, अच्छी जबान, अच्छी ऊंचाई और बोलती आंखों से नवाजा है।

कादर ख़ान कुछ सालों से फ़िल्मों से दूर हो गए थे। इसकी वजह बताते हुए वो कहते हैं, वक्त के साथ फ़िल्में भी बदल गई हैं। अब ऐसे दौर में मैं अपने आपको फिट नहीं पाता। मेरे लिए बदलते दौर के साथ खुद को बदलना संभव नहीं है, तो मैंने अपने आपको फ़िल्मों से अलग कर लिया। कादर ख़ान ने ये भी कहा कि मौजूदा दौर के कलाकारों की भाषा पर पकड़ नहीं है और ये बात उन्हें दुखी करती है। 70 के दशक में अमिताभ बच्चन की कुछ फ़िल्मों जैसे सुहाग, अमर अकबर एंथनी और मुकद्दर का सिकंदर में कादर ख़ान की कलम से लिखे संवाद काफ़ी मशहूर हुए, लेकिन कादर ख़ान को इस बात का दु:ख है कि उन फ़िल्मों में नायक जिस चालू मुंबइया भाषा का इस्तेमाल करता है वही बाद की फ़िल्मों की मुख्य भाषा बन गई और फिर धीरे-धीरे उसकी आड़ में फ़िल्मों की भाषा खराब होती चली गई। वो कुछ दोष अपने आपको भी देते हैं। कादर ख़ान ने 80 के दशक में जीतेंद्र, मिथुन और 90 के दशक में गोविंदा के साथ भी कई फ़िल्में कीं। वो अपने दौर को याद करते हुए भावुक हो जाते हैं। उनके मुताबिक़ असरानी, शक्ति कपूर, गोविंदा, जीतेंद्र और अरुणा ईरानी के साथ की गई उनकी कई फ़िल्में और इन कलाकारों के साथ बिताया वक्त उन्हें बहुत याद आता है। कादर ख़ान ने बताया कि ख़ासतौर पर वो असरानी के जबरदस्त प्रशंसक हैं, जिनके साथ उन्होंने कई फ़िल्में कीं। फिलहाल कादर ख़ान अपने बेटों के थिएटर ग्रुप और उनके प्ले में व्यस्त हैं। उनके बेटे सरफ़राज ख़ान और शाहनवाज ख़ान, अपने पिता के लिखे दो नाटकों का मंचन कर रहे हैं। इन नाटकों के नाम है मेहरबां कैसे-कैसे और लोकल ट्रेन। ये दोनों ही नाटक राजनीतिक व्यंग्य हैं।

निधन
कादर ख़ान के बेटे सरफ़राज़ ने बताया, ‘मेरे पिता हमें छोड़कर चले गए। लंबी बीमारी के बाद 31 दिसम्बर शाम छह बजे (कनाडाई समय) उनका निधन हो गया। वह दोपहर को कोमा में चले गए थे। वह पिछले 16-17 हफ्तों से अस्पताल में भर्ती थे।’ 81 वर्षीय कादर ख़ान लंबे समय से बीमार चल रहे थे। वह कनाडा के एक अस्पताल में भर्ती थे। उनके बेटे ने बताया कि अभिनेता का अंतिम संस्कार भी वहीं किया जाएगा।

सम्मान और पुरस्कार
फ़िल्मफेयर पुरस्कार सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता (फ़िल्म- बाप नंबरी बेटा दस नंबरी)
कादर ख़ान को 1991 को बेस्ट कॉमेडियन का और 2004 में बेस्ट सपोर्टिंग रोल का फिल्म फेयर मिल चुका है।
2013 में, कादर ख़ान को उनके फिल्मों में योगदान के लिए साहित्य शिरोमनी अवार्ड से नवाजा गया।

परणिति चोपड़ा

परिणीति चोपड़ा

 🎂जन्म 22 अक्टूबर 1988, अम्बाला, हरियाणा) 

एक भारतीय अभिनेत्री है जो हिन्दी फिल्मों में काम करती है। चोपड़ा बैंक निवेशकर्ता बनना चाहती थी लेकिन मैनचेस्टर बिजनेस स्कूल से त्रिक सनद सम्मान (व्यापार, वित्त और अर्थशास्त्र में) प्राप्त करने के बाद वह 2009 की आर्थिक मंदी के दौरान वापस भारत लौट आई और जनसंपर्क सलाहकार के रूप में यश राज फ़िल्म्स से जुड़ गई। बाद में अभिनेत्री के तौर पर तीन फिल्मों में कार्य करन का समझोता किया।
चोपड़ा का जन्म एक पंजाबी परिवार में अम्बाला, हरियाणा में उसके पिता पवन चोपड़ा एक व्यवसायी हैं और अम्बाला कैनटोनमेंट में भारतीय थलसेना के प्रदायक (पूर्तिकर्ता) हैं, उसकी माता का नाम रीना चोपड़ा है। परिणीति की शुरूआती शिक्षा कान्‍वेंट ऑफ जीसस एंड मैरी से हुई थी। 17 साल की उम्र में वे लंदन चली गईं जहां से उन्‍होंने मैंनचेस्‍टर बिजनेस स्‍कूल से बिजनेस, फाइनेंस और इ‍कनॉमिक्‍स में ऑनर्स की डिग्री प्राप्‍त की।
परिणीति चोपड़ा ने अपना एक्टिंग का सफर फिल्म ‘रिकी वर्सेज लेडी बहेल’ से किया था. इसके बाद एक्ट्रेस मेन लीड के तौर पर फिल्म ‘इशकजादे’ में नजर आईं. फिल्म में उनके साथ अर्जुन कपूर थे. फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर अच्छा कलेक्शन किया था. 
एक्ट्रेस परिणीति चोपड़ा ने 24 सितंबर को राघव चड्ढा संग उदयपुर के लीला पैलेस में शादी की थी
पति: राघव चड्ढा (विवा.24 सितंबर 2023)

माता-पिता: पवन चोपड़ा, रीना चोपड़ा
भाई: सरज चोपड़ा, शिवांग चोपड़ा

DN मोधक (दिना नाथ मोधक )

डीएन मधोक

दीना नाथ मधोक
DN मोधक 
🎂जन्म 22 अक्टूबर 1902
गुजरांवाला , ब्रिटिश भारत (अब पाकिस्तान में )
⚰️मृत 09 जुलाई 1982 (आयु 79 वर्ष)
हैदराबाद , भारत
व्यवसाय गीतकार, निर्देशक, पटकथा लेखक, संगीतकार, संवाद लेखक
दीना नाथ मधोक 
 1940 से 1960 के दशक में बॉलीवुड के एक प्रमुख गीतकार थे। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत 1932 में आई फिल्म ' राधे शाम' से की थी । उन्होंने अपने चार दशकों के करियर में 800 से अधिक गीत लिखे और 1940 के दशक में उन्हें शीर्ष गीतकारों में से एक माना जाता था और उन्हें " महाकवि मधोक" का उपनाम मिला। मधोक को किदार शर्मा और कवि प्रदीप के साथ गीतकारों की तीन "पहली पीढ़ी" (1930 से 1950 के दशक) में से एक के रूप में उद्धृत किया जाता है ।गीत लिखने के अलावा, उन्होंने पटकथाएँ लिखीं और फ़िल्मों का निर्देशन किया। उन्होंने बगदाद का चोर (1934), मिर्जा साहिबान (1939), बिवामंगल (1954) और मधुबाला अभिनीत नाता (1955) जैसी लगभग 17 फिल्मों का निर्देशन किया ।

प्रारंभिक जीवन
एक मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ था। उनके पिता प्रथम श्रेणी पोस्ट मास्टर थे। मधोक अपनी बीए की परीक्षा उत्तीर्ण नहीं कर सके लेकिन उन्होंने कई वर्षों तक भारतीय रेलवे में काम किया।

❤️
मधोक 1931 में बंबई पहुंचे। अगले साल उन्होंने फिल्म ' राधे श्याम' के लिए गीत लिखकर बॉलीवुड में डेब्यू किया । उन्होंने उस फिल्म में पटकथा लिखने और एक छोटी भूमिका में अभिनय करने के साथ-साथ 29 गाने लिखे। उन्होंने फिल्म में गाने लिखने में मदद की, हालांकि उन्हें कोई श्रेय नहीं मिला। उसी वर्ष, उन्होंने 3 फिल्मों, ल्यूर ऑफ गोल्ड , फ्लेम ऑफ लव और थ्री वॉरियर्स का निर्देशन किया । 1933 में, उन्होंने खूबसूरत बाला के लिए निर्देशन और गीत लिखे । अगले तीन वर्षों में उन्होंने कई फिल्मों का निर्देशन, पटकथा और संवाद लिखा, लेकिन कोई गीत नहीं लिखा। 1937 में, उन्होंने दो फिल्मों लाहौरी लुटेरा और दिलफरोश के लिए गीत लिखे, जो 1933 में थ्री वॉरियर्स के रूप में रिलीज़ हुईं। इन वर्षों के दौरान उन्होंने हिंदी और पंजाबी फिल्मों का भी निर्देशन किया।

वह 1939 में रंजीत मूवीटोन से जुड़े । एक गीतकार के रूप में उनका करियर कई बड़ी सफलताओं के साथ आगे बढ़ा। उन्होंने 1940 और 1950 के दशक में नदी किनारे (1939), मुसाफिर (1940), पागल (1940), उम्मीद (1941), बंसारी (1943), नर्स (1943), बेला (1947) जैसी फिल्मों के लोकप्रिय गीतों के लिए गीत लिखे। , भक्त सूरदास (1942), और तानसेन (1943)। पिछली दो फिल्मों के गाने आज भी लोकप्रिय हैं। तानसेन के दो गाने "बरसो रे" खुर्शीद द्वारा गाए गए और "दीया जलाओ" केएल सहगल द्वारा गाए गए, मधोक के गीतों के साथ 1940-49 के 15 'अनुशंसित गीतों' में उद्धृत किए गए हैं।

भाईचंद पटेल के अनुसार, उन्होंने ऐसे गीत लिखे जो "सरल थे फिर भी सार्वभौमिक अपील वाले थे"। मधोक ने प्रसिद्ध संगीतकार नौशाद को बॉलीवुड से परिचित कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।उन्होंने नौशाद को अपनी निर्देशित पंजाबी फिल्म मिर्जा साहिबान (1939) में सहायक संगीत निर्देशक के रूप में नियुक्त किया । एक स्वतंत्र संगीत निर्देशक के रूप में नौशाद की पहली फिल्म ' प्रेम नगर' (1940) थी। इस बार भी मधोक ने ही उस फ़िल्म के गीतों के बोल लिखे। कुछ अन्य उल्लेखनीय साउंडट्रैक, जिनमें उन्होंने एक गीतकार के रूप में योगदान दिया, वे हैं लगन (1938), प्यास (1941), ज़मीनदार (1942), ज़बान (1943), दासी (1944), प्रीत, धमाकी (1945), अंजुमन, काजल (1948) ), सुनहरे दिन (1949), खिलाड़ी, अनमोल रतन (1950), रसिया (1950), गूंज (1952), दर्द-ए-दिल (1953), मजबूरी (1954), ऊट पतंग (1955), मक्खीचूस (1956) , महारानी पद्मिनी (1964), तस्वीर (1966) समय बड़ा बलवान (1969)।

सहयोग 
नौशाद अली को बॉलीवुड में लाने का श्रेय मधोक को दिया गया । उन्होंने नौशाद की पहली फिल्म प्रेम नगर के लिए गीत लिखे । इसके बाद उन्होंने भारतीय सिनेमा में सफल योगदान देने वाली कई फिल्मों में साथ काम किया। उनकी जोड़ी रतन (1944) में चरम पर पहुंची, जो बॉक्स-ऑफिस पर एक बड़ी सफलता थी, खासकर अपने संगीत के लिए। 

उन्होंने चालीस और पचास के दशक के लगभग हर प्रमुख संगीत निर्देशक जैसे ज्ञान दत्त , एनआर भट्टाचार्य, खेमचंद प्रकाश , एसएन त्रिपाठी , बुलो सी रानी , ​​नौशाद, खुर्शीद अनवर , पंडित अमरनाथ , सार्दुल क्वात्रा , अनिल विश्वास , आरसी बोराल , रॉबिन चटर्जी के साथ काम किया। , सुंदर दास, रशीद अत्रे , सी. रामचन्द्र , सज्जाद हुसैन , गुलाम हैदर , विनोद , गोबिंद राम, हुस्नलाल भगतराम , एआर कुरेशी , रोशन , सरदार मलिक , गुलाम मोहम्मद और हंसराज बहल ।

📽️फिल्मोग्राफी 📽️
गीतकार के रूप में 
चयनित फ़िल्में.

लाहौर में बनी 'राधे श्याम' (1932) पंजाबी फिल्म
फ़िल्म कंपनी कमला मूवीटोन के तहत शुक्रवार, 2 सितंबर 1932 को रिलीज़ हुई

खुबसूरत बाला (1933)
ज्वालामुखी (1936)
अलादीन और जादूई चिराग (1937)
दिलफरोश (1937)
शमा परवाना (1937)
ज़माना (1938)
नदी किनारे (1939)
आज का हिंदुस्तान (1940)
दिवाली (1940)
मुसाफिर (1940)
पागल (1940)
प्रेम नगर (1940)
ढंडोरा (1941)
परदेसी (1941)
ससुराल (1941)
शादी (1941)
उम्मीद (1941)
भक्त सूरदास (1942)
झंकार (1942)
खानदान (1942)
महेमन (1942)
वसंतसेना (1942)
जमींदार (1942)
ज़ेवर (1942)
बंसारी (1943)
भक्तराज (1943)
इशारा (1943)
कानून (1943)
संजोग (1943) पटकथा, गीत और संवाद
तानसेन (1943)
दस्सी (1944)
गीत (1944)
रतन (1944)
पहले आप (1944)
शिरीन फरहाद (1945)
इन्साफ़ (1946)
बेला (1947)
परवाना (1947)
लाल दुपट्टा (1948)
नाओ (1948)
सिंगार (1949)
सुनहरे दिन (1949)
अनमोल रतन (1950)
खिलाड़ी (1950)
सबक (1950)
तराना (1951)
गूंज (1952)
दर्द-ए-दिल (1953)
बिल्वमंगल (1954)
एहसान (1954)
ऊट पतंग (1955)
आबरू (1956)
ढाके की मलमल (1956)
माखी चूज़ (1956)
जीवन साथी (1957)
महारानी पद्मिनी (1964)
सतलुज दे कंधे कहानी केवल (1964) पंजाबी फिल्म
जनम जनम के साथी (1965)
तसवीर (1966)
समय बड़ा बलवान (1969)
निर्देशक के रूप में 
दिलफरोश उर्फ ​​थ्री वॉरियर्स (1932)
शराफी लूट उर्फ ​​ल्यूर ऑफ गोल्ड (1932)
प्यार की लौ (1932)
खुबसूरत बाला (1934)
वतन परस्ता (1934)
मास्टर फकीर (1934)
दीवानी (1934)
बगदाद का चोर (1934)
ज्वालामुखी (1936)
दिल का डाकू (1936)
शराफी लूट (1937)
शमा परवाना (1937)
दिल फ़रोश (1937)
स्नेह लग्न (1938)
मिर्ज़ा साहिबान (1939)
नाओ (1948)
खामोश सिपाही (1950)
बिल्वमंगल (1954)
नाता (1955)

डीएन मधोक

बी .एम .व्यास

बृजमोहन व्यास
🎂22 अक्टूबर 1920
चूरू , राजपूताना एजेंसी , ब्रिटिश भारत
⚰️मृत 11 मार्च 2013
कल्याण , महाराष्ट्र, भारत
व्यवसाय अभिनेता, पार्श्व गायक
सक्रिय वर्ष 1946-1995
जीवनसाथी जमना
बच्चे 7
रिश्तेदार भरत व्यास (भाई)
व्यास राजस्थान के चुरू जिले में पुष्करणा ब्राह्मण परिवार से है। संस्कृत में स्नातक की पढ़ाई पूरी करने तक वे राजस्थान में ही रहे, जिसके बाद अपने भाई के कहने पर वे मुंबई चले आये।

उनकी शादी 17 साल की उम्र में हुई थी जब उनकी पत्नी जमना सिर्फ 11 साल की थीं। 2008 में जमना व्यास की मृत्यु से पहले उनका वैवाहिक जीवन 71 साल था। उनकी छह बेटियां और एक बेटा था। विभिन्न भाषाओं में 200 से अधिक फिल्मों में अभिनय करने के बाद, व्यास ने 1990 के दशक की शुरुआत में अभिनय छोड़ दिया।

11 मार्च 2013 को 92 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।

📽️
1946 नीचा नगर 
1949 बरसात 
1951 आवारा
1953 पतीता 
बागी 
1954 सल्तनत  
अलीबाबा और 40 चोर
1956 शेखचिल्ली 
हातिम ताई
1957 दो आंखें बारह हाथ 
तुमसा नहीं देखा 
1961 संपूर्ण रामायण
सारंगा और जब तक
1962 परदेसी ढोला पंजाबी फिल्म
1966 ये रात फिर ना आएगी
1971 एक पहेली 
1975 जय संतोषी मां
1977शिरडी के साई बाबा
1991मां
1992 दौलत की जंग।

अभिनेत्री सईदा खान

अभिनेत्री सईदा खान की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि

सईदा खान का जन्म कलकत्ता में एक मुस्लिम परिवार में साल 1939 में हुआ था. सईदा खान को बचपन से ही फिल्मों में काम करने का शौक था. फिल्म निर्माता निर्देशक एच.एस. रवैल से उनकी मुलाकात हो गई और उन्होंने सईदा खान को फिल्मों में काम दिया

⚰️21 अक्टूबर 1990 अपने पति द्वारा करदी गई थी

सईदा खान की ट्रेजिडी भरी दास्तां सुन कर रूह कांप जाती है। साठ के सालों में एक्ट्रेस होती थीं, सईदा ख़ान। खूबसूरत तो नहीं, मगर दिलकश जरूर थीं और टैलेंटेड भी। उन्होंने किशोर कुमार, राज  कुमार, मनोज कुमार, बिस्वजीत, फ़िरोज़ ख़ान, अजीत आदि प्रसिद्ध एक्टर्स के साथ काम किया।

उनकी पहली फिल्म थी- अपना हाथ जगन्नाथ (1960), जिसमें वो किशोर कुमार की हीरोइन थीं और आखिरी फिल्म थी- ‘वासना’ (1968), जिसमें वो राजकुमार को रिझाने वाली चमेलीबाई के साइड रोल में थीं। इस बीच उन्होंने हनीमून, मॉडर्न गर्ल, कांच की गुड़िया, मैं शादी करने चला, चार दरवेश, सिंदबाद अलीबाबा और अलादीन, ये ज़िंदगी कितनी हसीन है और कन्यादान में अच्छे रोल किये। मगर आठ साल के कैरीयर में मात्र 17-18 फ़िल्में ही उनके हिस्से में आयीं।

शायद इसका कारण उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि रही। दरअसल, वो बदनाम अनवरी बेगम की बेटी थीं। सईदा की कमाई से घर चलता था। मगर तभी उनकी ज़िंदगी में अच्छे पल लेकर प्रोड्यूसर-डायरेक्टर ब्रिज सदाना आये। उन्होंने न केवल उनकी मदद की, बल्कि शादी भी कर ली, इस शर्त पर कि उनकी मां और भाई-बहन के पालन-पोषण का खर्च ब्रिज उठाते रहेंगे।

ये वही बृज सदाना हैं, जिन्होंने साठ और सत्तर के सालों में दो भाई, ये रात फिर न आएगी, उस्तादों के उस्ताद, एक से बढ़ कर एक, विक्टोरिया नंबर 203, नाइट इन लंदन, यक़ीन, प्रोफेसर प्यारेलाल जैसी हिट फ़िल्में दीं। मगर ज़िंदगी में पैसा, शोहरत, प्यार और भावुकता ही काफी नहीं होती, एक-दूसरे पर विश्वास होना भी ज़रूरी है। बृज हमेशा शक़ करते रहे कि सईदा की छोटी बहन शगुफ़्ता वास्तव में उसकी नाजायज़ औलाद है।

उन्हें बताया गया था कि शगुफ़्ता को अनवरी बेगम ने गोद लिया था। फ़िल्म इंडस्ट्री में सईदा और शगुफ़्ता को लेकर तरह-तरह की बातें भी होती थीं। शगुफ़्ता की सूरत में सईदा की छाया है और सईदा उसका कुछ ज़्यादा ही ख़्याल रखती है। ब्रिज ये सब देखा-सुना करते थे। इसी बात को लेकर उनका सईदा से अक्सर झगड़ा होता रहा।

और आख़िर 21 अक्टूबर 1990 को वो हुआ, जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी। पूरी फिल्म इंडस्ट्री कांप उठी। उस दिन ब्रिज ने ज़रूरत से ज़्यादा नशा कर लिया। घर आये, जहां बेटे कमल की बीसवीं सालगिरह मनाई जा रही थी। अपनी लाइसेंसी रिवाल्वर से सईदा, बेटी नम्रता और बेटे कमल पर गोली चला दी। और, फिर खुद को भी गोली मार दी। सबको अस्पताल पहुंचाया गया। मगर तब तक सब ख़त्म हो चुका था। संयोग से कमल बच गया। शायद उसकी नियति में लिखा था कि वो दुनिया को बताये कि उसके पिता ने अच्छा काम नहीं किया था।

कमल सदाना को संभलने में काफी वक़्त लगा। वो काजोल की पहली फ़िल्म ‘बेख़ुदी’ के हीरो रहे। उन्हें चाकलेटी हीरो कहा जाता था। मगर बदकिस्मती उनके पीछे भी पड़ी रही। रंग, बाली उमर को सलाम, रॉक डांसर, कर्कश आदि एक के बाद एक फ्लॉप हो गयीं। उन्होंने पिता ब्रिज की ‘विक्टोरिया नंबर 203 का रीमेक भी बनाया लेकिन बात बनी नहीं।

मगर अभी कहानी ख़त्म नहीं हुई। सईदा की हत्या के बाद उसकी छोटी बहन शगुफ़्ता रफ़ीक़ अकेली पड़ गयीं। मां और भाई के लिए उन्हें पहले बार-गर्ल बनना पड़ा, जिस्म का सौदा भी करना पड़ा। मगर शगुफ़्ता बहुत स्ट्रांग थी। इसीलिए जल्दी ही इस दलदल से निकल आयी। तक़दीर ने भी साथ दिया। महेश भट्ट ने उसे आसरा दिया। ज़िंदगी के कड़वे तजुर्बों को उसने कलमबद्ध किया। मा21 अक्टूबर 1990लूम हो कि वो लम्हे, आवारापन, राज़ 2, राज़ 3, जिस्म 2, मर्डर 2, आशिक़ी, हमारी अधूरी कहानी शगुफ़्ता ने ही लिखी हैं। कुछ ज़िंदगियां ऐसे ही चलती हैं, ट्रेजिक फिल्म की तरह।

#21oct

बृज सदाना

निर्माता निर्देशक बृज सदाना की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि

बृजमोहन सदनह

🎂06 अक्टूबर 1933

⚰️21 अक्टूबर 1990

ब्रिटिश भारत में पैदा हुए, जिन्हें बृजमोहन या बस बृज के नाम से  जाता था, वह एक दिग्गज भारतीय फिल्म निर्माता और निर्देशक थे जो हिंदी सिनेमा में कई हिट्स फिल्में देने के लिए जाने जाते थे।  उन्होंने 1960 से 1980 के दशक में  कई  यादगार बॉक्स ऑफिस हिट फिल्में दी जैसे दो भाई, ये रात फिर ना आएगी, उस्तादों  के उस्ताद, नाईट इन लंदन  विक्टोरिया नंबर 203, चोरी मेरा नाम, एक से  बढ़कर एक, यकीन , और प्रोफेसर प्यारेलाल
उनकी आखिरी सफल फिल्म मर्दों वाली बात थी।  उन्होंने लगातार कल्याणजी आनंदजी को अपनी फिल्मों के संगीत निर्देशक के रूप में चुना।

उन्होंने हिंदी फिल्म अभिनेत्री सईदा खान से शादी की थी।  उनके दो बच्चे, बेटी नम्रता और बेटा कमल थे।

1980 के दशक की शुरुआत में, उन्हें एक बड़ा झटका लगा, जब उनकी कुछ फ़िल्में बॉक्स ऑफिस पर  फ्लॉप हो गयीं जैसे ऊंचे लोग, बॉम्बे 405 माइल्स और मगरूर तकदीर और मर्दों वाली बात  की सफलता के साथ फ्लॉप फिल्मों का दौर समाप्त हो गया।

सदाना की 21 अक्टूबर 1990 को मुंबई में मृत्यु हो गई।  उन्होंने अपनी पत्नी और बेटीे हत्या करने के बाद अपने निवास पर खुद को गोली मार ली।  संयोग से, उस दिन उनके बेटे कमल सदाना का जन्मदिन था।
#21oct
#06oct

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...