शुक्रवार, 20 दिसंबर 2024

मोक्ष

सुत उवाच । अथातः संप्रवक्ष्यामि शुद्धं कैवल्यमुक्तिदम्।। अनुग्रहानमहेशस्य भवदुःखस्य भेषजम् ॥1॥

सूतजी बोले हे शौनकादिको ! इसके बाद अब मैं शुद्ध और कैवल्यमुक्तिदायक संसारके दुःखने में औषधिरूप शिवगीता रत्नको शिवजीके अनुग्रहसे वर्णन करता हूँ।
॥ 

न कर्मणामनुष्ठानैर्न दानैस्तपसपि वा।। कैवल्यं लभते मर्त्यः साक्षात् ज्ञानेन केवलम् ॥2॥

न कर्मों के अनुष्ठान न दान न तप से मनुष्य मुक्ति को प्राप्त होता है किन्नु ज्ञान से ही प्राप्त होता है।॥ २॥ 
गीता ५/- 36-38-39/18/-
भगवद गीता अध्याय: 5
श्लोक 18

श्लोक:
विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः॥

भावार्थ:
वे ज्ञानीजन विद्या और विनययुक्त ब्राह्मण में तथा गौ, हाथी, कुत्ते और चाण्डाल में भी समदर्शी (इसका विस्तार गीता अध्याय 6 श्लोक 32 की टिप्पणी में देखना चाहिए।) ही होते हैं
॥18॥

भगवद गीता अध्याय: 6
श्लोक 32

श्लोक:
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः॥

भावार्थ:
हे अर्जुन! जो योगी अपनी भाँति (जैसे मनुष्य अपने मस्तक, हाथ, पैर और गुदादि के साथ ब्राह्मण, क्षत्रिय, शूद्र और म्लेच्छादिकों का-सा बर्ताव करता हुआ भी उनमें आत्मभाव अर्थात अपनापन समान होने से सुख और दुःख को समान ही देखता है, वैसे ही सब भूतों में देखना 'अपनी भाँति' सम देखना है।) सम्पूर्ण भूतों में सम देखता है और सुख अथवा दुःख को भी सबमें सम देखता है, वह योगी परम श्रेष्ठ माना गया है
॥32॥

भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 36-37

श्लोक:
सुखं त्विदानीं त्रिविधं श्रृणु मे भरतर्षभ।
अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति॥
यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्‌।
तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम्‌॥

भावार्थ:
हे भरतश्रेष्ठ! अब तीन प्रकार के सुख को भी तू मुझसे सुन। जिस सुख में साधक मनुष्य भजन, ध्यान और सेवादि के अभ्यास से रमण करता है और जिससे दुःखों के अंत को प्राप्त हो जाता है, जो ऐसा सुख है, वह आरंभकाल में यद्यपि विष के तुल्य प्रतीत (जैसे खेल में आसक्ति वाले बालक को विद्या का अभ्यास मूढ़ता के कारण प्रथम विष के तुल्य भासता है वैसे ही विषयों में आसक्ति वाले पुरुष को भगवद्भजन, ध्यान, सेवा आदि साधनाओं का अभ्यास मर्म न जानने के कारण प्रथम 'विष के तुल्य प्रतीत होता' है) होता है, परन्तु परिणाम में अमृत के तुल्य है, इसलिए वह परमात्मविषयक बुद्धि के प्रसाद से उत्पन्न होने वाला सुख सात्त्विक कहा गया है
॥36-37॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 38

श्लोक:
विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम्‌।
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्‌॥

भावार्थ:
जो सुख विषय और इंद्रियों के संयोग से होता है, वह पहले- भोगकाल में अमृत के तुल्य प्रतीत होने पर भी परिणाम में विष के तुल्य (बल, वीर्य, बुद्धि, धन, उत्साह और परलोक का नाश होने से विषय और इंद्रियों के संयोग से होने वाले सुख को 'परिणाम में विष के तुल्य' कहा है) है इसलिए वह सुख राजस कहा गया है
॥38॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 39

श्लोक:
यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः।
निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम्‌॥

भावार्थ:
जो सुख भोगकाल में तथा परिणाम में भी आत्मा को मोहित करने वाला है, वह निद्रा, आलस्य और प्रमाद से उत्पन्न सुख तामस कहा गया है
॥39॥

• कैवल्य मुकित देने वाली हैसी मुकानि जैसे गृह सवामी अपने घर मे रहता है इसी प्रकार ईशपूर को अपना घर बजा उसी में वास करना। स्वप्न के टूटते ही जैसे स्वपन कर शरीर पदार्थ य हो जाते है वैसे प्रभू में लय होना कैवल्य मोक्ष है।

मुक्ति के प्रकार और उनकी पहचान:

शास्त्रों में मुक्ति के मुख्यतः पाँच प्रकार बताए गए हैं, जिन्हें पंचविध मुक्तियाँ कहा जाता है। ये इस प्रकार हैं:

1. सालोक्य मुक्ति

परिभाषा: सालोक्य मुक्ति में साधक अपने आराध्य देव के समान ही दिव्य लोक में निवास करता है।

पहचान: इस मुक्ति में भक्त को भगवान के धाम, जैसे विष्णु भक्त के लिए वैकुंठ, शिव भक्त के लिए कैलाश में निवास प्राप्त होता है। वह भगवान के दिव्य लोक में रहता है और उनसे दूर नहीं होता।

2. सामीप्य मुक्ति

परिभाषा: सामीप्य मुक्ति में साधक को भगवान के निकट रहने का सौभाग्य प्राप्त होता है।

पहचान: इसमें भक्त को अपने आराध्य देव के अत्यंत निकट रहने का अधिकार मिलता है। वह उनके समीप रहकर सेवा और उनके सान्निध्य का लाभ प्राप्त करता है।

3. सारूप्य मुक्ति

परिभाषा: सारूप्य मुक्ति में साधक को भगवान के समान रूप और गुण प्राप्त होते हैं।

पहचान: इसमें भक्त का स्वरूप भी भगवान के समान हो जाता है, जैसे वह भी दिव्य और सुंदर स्वरूप धारण करता है। इसमें भगवान और भक्त में एक जैसी दिव्यता दिखाई देती है, जिससे भक्त भगवान के समान दिखता है।

4. सार्ष्टि मुक्ति

परिभाषा: सार्ष्टि मुक्ति में भक्त को भगवान के समान ऐश्वर्य प्राप्त होता है।

पहचान: इसमें भक्त को भगवान के समान शक्तियाँ और सामर्थ्य मिल जाती हैं। वह भी दिव्य गुणों, शक्तियों और ऐश्वर्य का स्वामी बनता है, जिससे उसे अभाव का अनुभव नहीं होता।

5. कैवल्य मुक्ति (सायुज्य मुक्ति)

परिभाषा: कैवल्य मुक्ति में साधक भगवान में पूर्णतया लीन हो जाता है और द्वैत समाप्त हो जाता है।

पहचान: यह सबसे उच्चतम मुक्ति मानी जाती है। इसमें भक्त का आत्मा भगवान के साथ पूर्णतः एकाकार हो जाता है। इसमें कोई भेद नहीं रह जाता और साधक ब्रह्म रूप हो जाता है, जिससे उसे पुनर्जन्म से पूर्ण मुक्ति प्राप्त होती है। इसे मोक्ष भी कहते हैं।

विशेष:

इन मुक्तियों की मुख्य विशेषता और पहचान यह है कि सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य और सार्ष्टि मुक्ति में भक्त भगवान के धाम और उनके निकट रहता है परन्तु भगवान से अलग रहता है। लेकिन कैवल्य (सायुज्य) में भक्त और भगवान में कोई भेद नहीं रहता, भक्त ब्रह्म में विलीन हो जाता है और उसे जन्म-मरण के चक्र से सदा के लिए मुक्ति प्राप्त होती है।
स्वाभाविक कर्म जिनके द्वारा जीव को परम सिद्धि प्राप्त हो जाती है
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 45

श्लोक:
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः।
स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥

भावार्थ:
अपने-अपने स्वाभाविक कर्मों में तत्परता से लगा हुआ मनुष्य भगवत्प्राप्ति रूप परमसिद्धि को प्राप्त हो जाता है। अपने स्वाभाविक कर्म में लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकार से कर्म करके परमसिद्धि को प्राप्त होता है, उस विधि को तू सुन
॥45॥

भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 43

श्लोक:
शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्‌।
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्‌॥

भावार्थ:
शूरवीरता, तेज, धैर्य, चतुरता और युद्ध में न भागना, दान देना और स्वामिभाव- ये सब-के-सब ही क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं
॥43॥
भगवद गीता अध्याय: 18
श्लोक 44

श्लोक:
कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्‌।
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्‌॥

भावार्थ:
खेती, गोपालन और क्रय-विक्रय रूप सत्य व्यवहार (वस्तुओं के खरीदने और बेचने में तौल, नाप और गिनती आदि से कम देना अथवा अधिक लेना एवं वस्तु को बदलकर या एक वस्तु में दूसरी या खराब वस्तु मिलाकर दे देना अथवा अच्छी ले लेना तथा नफा, आढ़त और दलाली ठहराकर उससे अधिक दाम लेना या कम देना तथा झूठ, कपट, चोरी और जबरदस्ती से अथवा अन्य किसी प्रकार से दूसरों के हक को ग्रहण कर लेना इत्यादि दोषों से रहित जो सत्यतापूर्वक पवित्र वस्तुओं का व्यापार है उसका नाम 'सत्य व्यवहार' है।) ये वैश्य के स्वाभाविक कर्म हैं तथा सब वर्णों की सेवा करना शूद्र का भी स्वाभाविक कर्म है
॥44॥
शम, दम, तप, शौच, क्षान्ति, आर्जव, ज्ञान - विज्ञान तथा आस्तिक्य आदि ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं ।
गीता के अनुसार ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म है.....
.
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं .....

"शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च | ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ||१८:४२||
अर्थात् शम? दम? तप? शौच? क्षान्ति? आर्जव? ज्ञान? विज्ञान और आस्तिक्य ये ब्राह्मण के स्वभाविक कर्म हैं ||
और भी सरल शब्दों में ब्राह्मण के स्वभाविक कर्म हैं ..... मनोनियन्त्रण, इन्द्रियनियन्त्रण, शरिरादि के तप, बाहर-भीतर की सफाई, क्षमा, सीधापन यानि सरलता, शास्त्र का ज्ञान और शास्त्र पर श्रद्धा|
इनकी व्याख्या अनेक स्वनामधन्य आचार्यों ने की है| इनके अतिरिक्त ब्राह्मण के षटकर्म भी हैं, जो उसकी आजीविका के लिए हैं| पर यहाँ हम उन स्वभाविक कर्मों पर ही विचार कर रहे हैं जो भगवान श्रीकृष्ण ने कहे हैं|
जो सिद्धि प्राप्त करवा देते हैं।

शिव गीता अध्याय 8



शिव जी का आत्मा अध्याय श्री रामचंद्र बोले पंचभूत के की उत्पत्ति इस सी नवांश किस प्रकार से होता है और इसका स्वरूप क्या है
भगवान विस्तार पूर्वक आप मुझे देख रही श्रीभगवान होली पृथ्वी आदि पंचभूतों बना हुआ यह शरीर भी है इसलिए पृथ्वी प्रधान के और दूसरी दिशा में मिले हुए था सहकार ही झाला
अंदर से राज्य और उद्धृत ये पाँच भौतिक देह ही की चार इतनी और मानसिक प्रगति जो कहलाती है वह पांचवीं है उसे बेहतर कहती हैं उन चारों मिली जहां एक प्रधान ही सर्वप्रथम उसी का हनन करती हूं
इसी तरीके राज पुरुष के बीच से जलाए इसकी उत्पत्ति होती है
जिस समय ऋतुकाल हुई इस स्त्री के गर्भाशय में घुसकर रेलवे प्रवेश करता हूं इस स्त्री का रांची मिले लिखता थी तभी चौड़ाई उस पडती है
इस स्त्री का खर्च अधिक होने से कन्या और भीड़ अधिक होने से ही पुरुष की उत्पत्ति होती है और शुक्र सोने की समान होने में नपुंसक होता है
जब हिस्ट्री ऋतु स्नान कर चुकी तक चौथे दिन से सोलह राष्ट्रीय तक पुलिस काल की अवधि कही है
उनकी मिशन देने वाली पाँच में ही साथ नौवें दिन में इस स्त्री और योग मंदिर में मिली पुरुष की उत्पत्ति होती है
जो सोल्वे राष्ट्रीय ने इस स्त्री के गर्भ में रहता है वरुण चक्रवर्ती राजा उत्पन्न होता है
इसमें संदेह नहीं ऋतु में स्नान करके जो स्त्री कामातुर हो जिस पुरुष का मुख देख सकती है
उसी आकृति का घर होता है
इसी कारण से हिस्ट्री उसने स्वामी का मुफ्त है कि इसी तरीके उधर एक पेशी चमड़ा निर्मित रहता है
उसे जरा खेती ही जिस कारण से शुक्र और शनि का योग उसे गर्म में हिंसा किसी कारण से असली जुलाई कहती हैं
और पक्षी आदि भी अंदाज़ कहलाते हैं
आवश्यक आदि से दर्ज कहलाते हैं
धीरज गुल्म आदि को भी सिखाते हैं और देवऋषि आदि मानव के लातीनी अपने पूर्व जन्म की करम वर्ष पुरानी स्त्री के गर्भाशय में प्राप्त कर शुक्र शनि के मिलने की प्रथम मां मिली शिथिल रहता है कुछ दिनों में थी
धुंध की आकृति होने लगती है कुछ जिलों में झेल लेती हैं
इस कारण में भी ही के समान कुछ गहरा पण आता है
फिर कुछ देर में उसकी पेशी मां बनती है
इस चित्र का शुक्र को सहयोग होते हुए एक माफ हो जाता है
मार्च में मांस पिंड मिलता है
मास में से हाथ आदि उत्पन्न होती हैं
और का आश्रय लेकर रहे चौथे महीने में उत्पन्न होता है तभी घर माता के उधर मिली चलाएं माह होने लगता है
दरअसल पाशा और कन्या वाम पार्श्व में इस स्थित में और नपुंसक उधर के मध्य भाग में स्थित था कि इसका दक्षिण पश्चिम में जन्म लेने के अनन्तर कुक ने वाली शीशी जनता भी को छोड़कर सब अंग
ब्रिटेन के भाग एक सा चौथे माह में जाते ही पुरुष भी गंभीर था इससे आगे धवन और स्त्रियों की चंचलता आदि धर्म चौथे माह में उत्पन्न हो जाती हैं
जिस सूक्ष्म रूप से रहती हैं
डाक घर की स्त्री पुरुषों के मिले हुए धर्म गर्व में उत्पन्न होती हैं और माता के हृदय में सन्निकट इसका हृदय होकर जिस वस्तु की माता इच्छा करती है
उसी वस्तु की यह इच्छा रखता है
इस कारण घर की वृद्धि के लिए मिनिट से माता की इच्छा पूर्ण घर भेजा है और इसीलिए गर्भवती स्त्री को जो हडबडी अर्थ था जो वाली कहती हैं
और उसकी इच्छा पूर्ण न होने से गर्भ में निर्बलता बुद्धिहीनता यंत्र
दोष हो जाती और माता का जिन विषयों में चर्चित होता है उन विषयों में ही और वह पुरुष उठता है
सिलीगुड़ी की इच्छा घूमकर पांचवे महीने ही चित्त बढ़ता है तो माँ से और रखकर पुष्टि होती है
छठे महीने थी इस एनआईए और न न के के इसी तरह शरीर के लोग प्रकट करती हैं
ही माह भर शरीर का भार साल अवयवों की कूदता है और वे घर का भला घुटनों में ही घर हाथों से मेंढक और से व्याकुल होकर बयालीस हुआ था इस सकता है
उस समय को अनेक जन्मों की सुधि हो जाती है
बड़ा दुखी होता है और हा कष्ट की बात है ऐसा कहता हुआ दुखी होता है अपनी आत्मा को विशेषता है
वे रहे और मम्मी में भी आदित्यनाथ को प्राप्त होकर बारह बार कष्ट पाता है
जिसके कारण तपाए रेट में किसी को ढाल तो उसको जो वेदना होती है
ऐसी वेदना को वह प्राप्त होता है
और दुख भोगता है
इसी प्रकार उधर के कीड़े जब काटते ही तो विदित होता है कि के भूख कूद शाल्मली के का के सोमा भी नहीं और यह मुझको अत्यंत प्रेरित करती हैं
घर भी बड़े भारी दुर्गंध और जठराग्नि की ज्वाला थी जो मुझको दुख प्राप्त हुआ है
उस दिन कुमरे पार्क में रखकर दुख कम में मघा रक्त का हो अमंगल पढाती पार करने और घूमते भक्षण करने को मिलती है
शिशिर पदार्थ मल मूत्र आदि में रहने से घर में स्थित अपराधी को पीड़ा ही नहीं चाहती हैं
झूठ घर शैया में पिरोकर मैंने पाया से ये लोग खुद समूह लड़कों में पड़कर प्राप्त नहीं होता इस प्रकार से पूर्व काल में प्राप्त हुई अनेक प्रकार की यातनाओं को स्मरण करता होगा मुक्त होने का उपाय सोचता यही
अभ्यास करता रहता है
आठवें महीने में कक्षा और शक्ति प्राप्त होती है
इसी प्रकार पहुँच इन्द्रिय शक्ति और थी
शरीर के आरंभ करने वाले तथा धातु परिणाम होते होने वाली हृदय की तिथि जो जीवन के मुख्य कारण गई है प्राप्त होती ही कुछ समय तक अदृश्य चंचल होने के कारण किसी समय माता के हृदय में चंचल रूप से
रहता है
कभी गर्भाशय में सफलता को प्राप्त हो जाता है
इसी कारण अष्टम माथुर उत्पन्न हुआ बालक बहुत नहीं जीता कारण कि वे ओछी और तेजी से ही था
छः नौ में मार्क में प्रस्तुति का समय का है
परन्तु शीघ्र प्रसव होने का प्रतिबंधक यह है कि जो कुछ घर की प्रारब्ध कर्म हुए तुमसे और कुछ काल तक घर में रहना पड़ता है
माता की एक रक्तवाहिनी नारी नाभि चक्र की एक नारी से भी हुई है
उसी के द्वारा माता का भक्षण किया घर में पहुंचता है इस प्रकार माता के आहाते पुष्टि को प्राप्त हो घर हो उसी के द्वारा जीवित रहता है
योनि चक्र भी इसकी संपूर्ण अंग थी
कर व्यथित व्यक्ति ही तभी है प्रथम कुक्षी से निकलकर योनि से बाहर आता है
उस समय उसका शरीर में लाल रुधिर थे
और यू से अच्छा नहीं रहता है
वे प्राण अत्यंत दुख से पीड़ित हो नीचे को कर जैसे ही उन्हें चक्र से निकलता है
ऐसे ही ऊंचे स्वर रहता है
इस प्रकार घर वाक्य यंत्र से निकलकर दुखी रोकता है
कहीं सुख नहीं मिलता जल लेकर कुछ भी नहीं कर सकता केवल मां के फील्ड के समान पर्दा हटा है तब इसके माता पिता दंड हाथ में लिए थे मिला तो दान वाले जंतुओं से इसकी रक्षा करते ही उस समय है जान
शून्य ही पिता के समान राक्षसों को भी जाता है
पीली रोड्रिग्स की अभिलाषा करता है
तात्पर्य यह है कि बाल अवस्था में भी महान होता था
जब तक सुषुम्ना नाड़ी कब से आच्छादित रहती है
तब तक इस प्रोडक्शन और वचन बोलने को वे समर्थ नहीं होता इसी कारण भी एक घरों में भी रो नहीं सकता पीछे युवावस्था के आने से कामदेव के चलते झेलो अकस्मात ही कभी कुछ कहता है और कभी
पराक्रम कहने लगता है कभी अभिमान से वृक्षों पर जनता कभी शाम अपराधियों को जिस करता कभी काम क्रोध की मदद से अंधा हो किसी को भी नहीं देखता थी मां को और नारी इनकी सेवाएं इस तरह की मरम्मत था
भी और क्या जिसमें ही मेरठ के फायदे हुए पेज के समान दुर्गंध आती है परन्तु तथा उस नहीं सकते हुआ काम बाढ़ से पीड़ित हो अपनी आत्मा को अत्यंत जाता है
थी माँ और शेरा और अच्छा इसके सिवाय इसके कि शरीर में और क्या जो पुरुष स्त्रियों में आसक्त होकर माया से लोड होने के कारण जगत में कुछ भी नहीं देखता एक सभी प्रधान पवन निकट हो जाए
से भी मिनट के से मित्र गांधी का यह विधि व्यथा को प्राप्त होता है और पांचवें दिन बीतने पर फिर भी दिखता भी नहीं का युवा अवस्था में दुख भोगने के उपरांत को वृद्धावस्था का दुख प्रारंभ होता है
माँ निरादर के था जरा को प्राप्त होकर महान दुखी का है
इस का हृदय गति से व्याप्त हो जाता है
और खाया हुआ अन्न भी जीवन नहीं होता ग्राफ गिर पड़ते ही और दुरुस्ती मंद हो जाती है
तथा अनेक प्रकार के रोग होने के कारण घटित टिक
कसाई औषधियों का सेवन करना पड़ता है ज्वाइन से कमर तोड़ी जाती है करतीं गर्दन हाथ जो उनका ये निर्बल हो जाते ही तब से
लोग इसके शरीर में लिपट जाते ही बंधु तिरस्कार करते ही तभी है पवित्रता रहित हो मगर से व्याप्त शरीर होने के कारण नक्षत्र पर्यंत सब शरीरों से ही तब होता है तथा भी ईश्वर का ध्यान नहीं करता
था और शैय्या श्रेष्ठ भोजन आदि जुलम रोगों का ध्यान करता हुआ इससे का ने किसके हाथ पैर कांपने लगते ही सभी इंद्रियों की शक्ति कुंठित हो जाती है
और कुंभ सामर्थ ना रहने के कारण बालक भी इसकी नहीं करते ही फिर के ही मरण काल के लोगों का तो कोई दृष्टांत ही धड़धड़ाती पीड़ा रोग आदि पीड़ा कितनी ही प्राप्त हो उसको कुछ न लिखकर एक
के भाई से सभी भयभीत होते ही बंधुओं से घिरे हुए प्राणी को मृत्यु ने जाती जिस प्रकार समुद्र में प्राप्त हुए
को गर्म हो जाता है
आप भी धन आप उत्तरों इस पर का विलाप करते हुए इस पुरुष को मिली थी इसी प्रकार ले जाता है जैसे स्तर को संपूर्ण ममी स्थानों के टूटने और शरीर के अवयवों की सुंदरियां भव्य होनी थी जो दुख मरने वाले
का है भी मुमुक्षु को स्मरण करना चाहिए
इसके स्मरण करने वाली संसार से वैराग्य रूककर आवागमन से छूटने के निमित्त नारायण के चरणों में ध्यान रखिएगा यमदूतों की दृष्टि आकर्षित करने और चेतना लुप्त हो जाने से कम पाँच में वृद्धि का कोई रक्षक नहीं होता
तब है
ज्ञान से युक्त हो में चित्त में प्रवेश होने से ही नहीं भूलता और झा भरे आदि पुत्र आदि जाति के लोग घाटी उत्तम दांडेकर नेत्रों से देख लगता है
तभी जीव को लो निर्मित काल पाश से यमदूत से ही एक ओर से ही बंद होगा इसलिए खींचता है
तब में कुछ नहीं कर सकता
रूप से देखता है
हिचकी बढ़ने और श्वास रुकनी तरह तालों के सूखने से को मृत्यु के पकड़े हुए का कोई आश्चर्य नहीं होता संसार रूपी चक्र में आरोन हुआ यमदूतों से घिरा का फारसी में वर्धा महान रखी है मैं कहां जाऊं इस प्रकार से
वे जी विचार करता है
क्या करूँ कहां जाऊं क्या का क्या क्या तुम इस प्रकार चिंतन करता कृतज्ञता पिता से मोड हो शीघ्र ही प्राणों को दिया था
मार्ग यमदूतों से घसीटता हुआ यातना की तह में प्राप्त होकर यहां पर जाकर जी
यम यातना का दुख भोगता है उन्हें खेलने को को भर से शरीर को केसर कटोरी चंदन कपूर आदि लगाकर फरार घोषित किया था जिससे अनेक गहनों से शोभित और वस्त्रों से आच्छादित किया था दृश्य है
वायु के निकट घूमते ही छूने के आयोग के और देखने के लिए भी अयोग्य नहीं जाता है
फिर कोई ही को क्षणमात्र न रखकर घर से निकालने लगते ही कभी शरीर का श्रेय जलाकर क्षण मात्र में भस्म कर दिया जाता है
अथवा श्रृंगार ग्रंथ कुत्ते इस को खा जाते फिर ये करोड़ों जन्मों तक खड़ी दृष्टिगोचर नहीं होता जादूगर के समान उत्पन्न जादू तरीके जगह नहीं मेरी माता मेरे पिता मेरे गुरुजन मेरे
ऐसी कौन प्रतिज्ञा करता है जीव के कर्मों को ही लेकर और लोक में जाता है जिसे मार्क मिली पति को के विश्राम के लिए छाया का कोई छा जाता है
ऐसा ही यह है कि लोग है
जिस प्रकार से पक्षी संध्याकाल में वृक्ष पर आकर बसे रख कर लेती और प्रातःकाल उठकर एक दूसरे को त्यागकर अब
अविनाश इस देश में चली जाती ही इस प्रकार दी जाते जाति के पुरुषों का समान भी कर्मानुसार अपने कुटुम्ब आदि भी जन्म लेकर इस फिट होते ही कम समाप्त होते ही अपनी गति को प्राप्त थी थी मनुष्य को
थे कि प्राणियों के समागम को पथिक समाचर के समान भी यह था मृत्यु के बीच से जल्द और जरूर के बीच से मृत्यु होती है
अर्थात जो उत्पन्न हुआ है उसका अवश्य नाश होगा और नाश हुआ अवश्य जहरीले का ये प्लान इसी प्रकार घटी यंत्र के तमाम निरंतर विल्मा करता रहता है
रामचंद्र घर के वीर के प्राप्त होने से इस प्रकार से ब्रांड का जन्म और मृत्यु होती है यह माह हमारा थे
जीवन मरण दोनों में ही माह दुख का भी इस व्याधि को दूर करने के लिए मिनिट मेरे सिवाय दूसरी औषधि नहीं है

शिव गीता अध्याय 7(विराट स्वरूप)


विराट स्वरूप शिव गीता

शीर्ष गीता का आत्मा तिहाई श्रीरामचंद्र बोली हे भगवन जो कुछ मैंने प्रश्न किया गया तो उसी प्रकार फिर है महेश है
आपने इस विषय का कोई उत्तर नहीं दिया है महेश है आपका नहीं पर छिन्न परमाणु अर्थात यकता करने के योग्य हैं
सब संसार की उत्पत्ति पालन न करते तो इसी प्रकार अपने अपने अधिकार के पालन करने वाले इंद्र वरुण आदि सब देवता तुम्हारी से में कहती रहती हैं और वे सब देवता और चौदह भुवन कि मैं ही हूं
ऐसा जो तुम कहते कहते कहते हो अर्थात जब तक उपाधि है तब तक जी ईश्वर आदि का अभी
संभावित नहीं होता हो
झड़प पंच महाभूतों में चेतना का ताजा टर्म में संभावित नहीं भेद नहीं आपसे सुनना परंतु संदेह नहीं जाता है
एक शिष्ट का निश्चय ही उस अंधे की दूर करने को आप ही समर्थ श्रीभगवान बोली सूक्ष्म के बीच में जिस स्त्री का महान गुटका सदा रहता है
और उसी ही भी
निकल भी था है
यदि ऐसा न हो तो बताओ यह रच कहां से आता है
इसी प्रकार मेरे सूक्ष्म शरीर सब भूतों का पालन और नाश होता है
जिस प्रकार से जल के बीच में स्वयं ही का खंड डालने से वे उस में विलीन हो जाता है और दिखता नहीं फिर जल को अगली में गर्म करने से व पूर्वक प्राप्त हो जाता है
अर्थात जैसी पवित्र दिन सूरज प्रकाश उत्पन्न होता और संध्या में विलीन जाता है
इसी प्रकार मुक्ति जगह से उत्पन्न होकर जुड़ी नहीं जाता है
और मुझे में ही स्थित रहता है
सुहृद रहा तुम्हें ऐसा हो श्री रामचंद्र बोली हे भगवन आपने दृष्टांत से प्रतिपादन किया परन्तु जिस प्रकार दिशाओं के भ्रम वाले को उतर आते दिशाओं का भ्रम हो जाता है इसी प्रकार मुझे ग्राम हो गया है
वह निवृत नहीं गुप्ता मैं क्या करूं
श्री भगवान बोली हे लाभ जिस प्रकार यह चराचर जगत मुझे वर्तमान में सो मैं तुमको दिखाता हूँ परन्तु तुम उसे देखने में समर्थ नहीं इसी कारण उसके देखने को मैं तुम्हें दिव्य नेत्र लेता उन्नीस
भी भय त्याग कर तुमने रहा दिव्य स्वरूप देखो न रहें या देवता इस मेरे टेस्टबुक को मेरे बिना अनुग्रह के चर्म चक्षुओं से ही नहीं देख सकती तो जी कहते हैं ऐसा कहकर शिवजी ने रामचंद्र को दिव्य नेत्र
ही और पास साल की समान भरा विस्तृत मुख रामचंद्र दिखाया करोड़ों बिजली के समान प्रकाशमान अतिशय दायक भयंकर उस रूप को देखते ही रामचंद्र जंघाओं के बल से कुछ भी नहीं बैठ गई
घृणा और दंडवत करके शिव जी को बार बार प्रकटन करने लगी फिर महाबली रामचंद्र उठकर जब देखते हैं तब तक तिरुपुर घाटी शिव जी के मुख में करोड़ों ब्रह्मांड प्रलय काल की अग्नि में व्याप्त होकर चटका पक्षी थी
पंखों के समान की सुनहरी मंदराचल विंध्याचल पर्वत साथ समुद्र चंद्र सूर्य आदि संपर्क रहे पाँच महाभूत और शिव जी के साथ आए हुई सब देवता भगवान भरे बड़े पर चौदह चौवन इस प्रकार रामचंद्र नहीं
प्रत्येक ब्रह्मांड को भी कर उन्हें पूर्व काल में हुआ देवता और असुरों का संग्राम देखा विश्व के दस था और उनके कर्तव्य कर्म सुबाथू रावण वध आदि युद्ध में देवताओं की पराजय शिव जी का त्रिपुरासुर को मार
वरना इसी प्रकार उत्पन्न हुई संपूर्ण जीवों का लाइनें कर रामचंद्र भयभीत हो बार बार प्रणाम कर भी न कि यद्यपि रामचंद्र को तत्त्वज्ञान भी हो गया था तथापि वे गए
तब उपनिषदों का कहा और अर्थ रूप भारी श्री शिव जी की स्तुति करने की श्री रामचंद्र बोली हे विशेष
शरणागत दुख नाशक एक शेखर प्रसन्न भी और संसार के भाई दी मुझे अनाथ की रक्षा की थी
शंकर यह भूमि और इस पर उत्पन्न होने वाले वृक्ष आदि सब से ही उत्पन्न भी यह सब भेजते आप ही में इस चित्र थी
अंत में इस तरह आप ही में इससे हो जाती हैं ब्रह्मा इंद्र एकादश रूद्र मरोडकर गंधर्व यक्ष असुर से गंगा आदि नदियां सागर ये सब शूल धारण करने वाली आपके मुंह में
दिखती है
चंद्रमोहन तुम्हारी माया से कल्पित हुआ यह दृश्य तुम्हारे ही स्वरूप में कृति था है
इस भ्रांति युक्त होकर पुरुष इस प्रकार से दी ही जिस प्रकार भी शक्ति में रक्षक का और रस्सी में स्तर का भ्रम उत्पन्न होता है
वे भ्रांति ऐसी नहीं है
यह जैसी भ्रांति होती है वे पदार्थ अन्यत्र फिर होता है
और नहीं भी होता जैसे शक्ति रजत की भ्रांति हुई परन्तु रूप पदार्थ दूसरे स्थान में वृद्धि के वैसी करते हैं तुम्हारे रूप से बचकर अन्यत्र नहीं दिखता इसी से लोग इस को शिफ्टिंग का रजत व दुगना हो
मांगते ही आप अपने पीसी सब जगह व्याप्त और प्रकाशित करते ही ढेर थी
आपके प्रकाश के बिना तो सम्पूर्ण जगत क्षण मात्र में अदृश्य जाए जिस प्रकार भी राज्यों में के भ्रांति सहायक होती है यद्यपि वहाँ वास्तव में कर खुद उत्पन्न नहीं होता और भ्रम के नाश होने पर स्तर का
नाश नहीं होता यह था कि है कि जो उत्पन्न नहीं हुआ उसका नाश नहीं होता परन्तु यह भय देने वाला होता है
इसी प्रकार तुम्हारी माया से जिसका अस्तित्व प्राप्त हुआ से ऐसे ही जगत मिथ्या भ्रांति के कार्य को सत्य उत्पन्न करता है
जिन्हें तुम्हारा शरीर जगत का आधारभूत दिखता नहीं यदि विचार दृष्टि से देखा जाए तो यह ज्ञान दृष्टि की कल्पना भी कारण कि तुम सच्चिदानंद स्वरूप को और सर्वत्र को कहना है तो कर्मकांड पड़ता
तक सर्व शक्ति व्यर्थ नहीं और ऐसा नहीं के इस सपूत उदाहरण अध्ययन आदि कर्मों का फल चूककर्ता को देखती हूँ ये कर्मकांड पर विश्वास रखने का फरमान के पर
महापुण्य के उदय से जो ब्रह्म का साक्षात्कार होता है
और ये सब प्रपंच तुम से अभिन्न दिखने लगता तब तुम क्यों कर्मों का फल थे
था नहीं देती तब कर्मकांड प्रतिपादक कथा प्रसिद्ध हो जाती है
ज्ञान ही अविचारी पुरुष ही पूजा यज्ञ आदि भाई करम से ही संतुष्ट होते हैं
ऐसा कहते ही परन्तु यह ठीक नहीं कहा कि जो अमूर्तन परमाणु रहे हैं
और अनंत है उसको रोक की इच्छा नहीं थी इसी प्रकार किंचित बेलपत्र पत्र यह चुल्लू भर जल से रीति से ही आपको देता है
विपरीत स्वीकार करके आप उसी राज्य पद्धिति तो ये भी माया से ही करती थी
ऐसा मेरा है
तुम ही एक पुराना पुरुष संपूर्ण दिशा विदिशा और विश्व में व्याप्त हो इस जगत की नाश होने में भी तुम्हारी हानि हो सकती जिस प्रकार घटकर नाश होने से घट में व्याप्त आकाश की हानि नहीं हो सकती
इसी प्रकार जगत के से तुम्हारी कुछ आनी ही जिस प्रकार आकाश में एक ही सूर्य का वेब जन भरे हुई छोटे पात्रों में अनेक भक्त को प्राप्त होता है
था अनेक रूप देखते ही इसी प्रकार भी आप एक होकर भी सबके अन्तः करण में अनेक रूप से विराजती है
संसार की उत्पत्ति पालन और नाश होने में भी तुम्हारा कुछ कर्तव्य नहीं है कि अनाज थे देहधारियों के कर्मानुसार शॉर्ट फिल्म को तुम सब कार्य करते
श्रमिक के बाद भी और पृथ्वी के समान अंतर ही थी
इस छूट और सूची दोनों जल्द हूँ में आत्मतत्त्व के सिवाय दूसरा चैतन्य आयुष नहीं है
सुख दुख जो दोनों देश को होती ही उनके कहने वाले शिल्पी केवल आपको में आरोप करती है
विवेक नहीं हे भगवान सच्चिदानंद स्वरूप और समुद्र में हम लोग नील कंठ काल सरूरपुर भक्त जनों के संपूर्ण पाठक दूर करने वाली और सबके साक्षी आपके घर के सूची कहते हैं इस प्रकार
विशेषकर को प्रणाम कर हाथ जोड वीडियो रामचंद्र पर में शिवजी से ली
श्री रामचंद्र भले ही विश्वासमत यह अपना भविष्य रोग का उपचार हारकर ही ही शंकर आपके अलग है से आप में खतरे स्थित सब जगत को देख कर मुझे प्रतीति नही श्री भगवान होली हे महाभोज राम
देखो मुझसे दूसरा कोई नहीं थे
जी कहते हैं ऐसा कहकर शिवजी ने अपने देश से देवता आदि को गुप्त किया तथा विश्वरूप छुपा लिया आंखो फिर जो
रामचंद्र प्रसन्न होकर देखते ही इतनी ही समय में पर्वत के रंग पर जाकर चरम पर स्थित पंचमुखी नीलकण्ठ से
शिव जी को देखा जो व्याघ्र चर्म का रोडे
शरीर ही ड्यूटी लगाई गई
सबके कंगन टहनी नाथ का यज्ञोपवीत धारण ज्यादा
हम का ही वस्त्र रही बिजली के शर्मा पीवी चर्चा धारण की अकेले मस्तक पर चंद्रमा धारण की श्रेष्ठ भक्तों की दुहाई देने वाली चार भुजा शत्रु नाशक पशुधन धारण की मेरा हाथ में ली सब जगत के पति शिव जी को थी
उनकी आज्ञा में मन लगाएं प्रणाम करके रामचंद्र स्थित हुई तब शिवजी राम चंद्र भी झूठी तुम्हारे पूछने की इच्छा है
तुम सब पूछो है
मेरे सिवाय दूसरा कोई तुम्हारा गुरु ही

शिव गीता अध्याय 6

शिव गीता अध्याय 6

शिव का छठा अध्याय श्री रामचंद्र बोली हे भगवन आप कहते हो कि मैं ही जगत की उत्पत्ति और पालन करता हूं इसलिए मुझे बड़ा आश्चर्य है
स्फटिक मणि के समान जिनका शरीर और टीम ने तरह मस्तक पर चंद्रमा ऐसे पर झील और उड़ीसा करते मूर्ति धारण करती हो और पार्वती सहित प्रमुख ही घरों के साथ यही विहार करती हो फिर आपने
होता है भी इस चराचर जगत कैसे उत्पन्न किया है
जगपती जो आपके मुझ पर कृपा हो तो आप इसे कहीं श्री भगवान बोली हे महाभाग रामचंद्र शुरू जो देवताओं की भी बुद्धि में नहीं आता मैं में यत्न पूर्वक तुम से कहता हूं
जिस बिंदु अनायास ही संसार के बाहर जाओ कि जो कुछ ये पंच महाभूत चौदह ओवर समुद्र पर वास्तु देवता राक्षस और ऐसी दिखती ही चौदह वन भू भुव हा हा हा
जंहा तरफा सत्य ईसा पूर्व के लोग धन विठ्ठल सुतल रसातल तलाश दल महानता और पाता था तो अधोलोक मिलकर चौदह लोग भी तथा और स्थावर जंगम गणधर
थी और लाभ देखते ही ये सब मेरी बुद्धि प्रथम ब्रह्मा आदि देवता मेरा रूप देखने की लिमिट मेरे प्रिय मंदराचल पर ही देवता हाथ जो मेरे आगे स्थित हुई तब मैंने देवताओं को लीला
से व्याकुल चित्त जानकर और ब्रह्मा आदि देवताओं का ज्ञान लिया वे तत्काल ही ज्ञान रहे हो हम से बोली तुम कौन हो तुम मैंने देवताओं से कहा मेरी ही पुरातन ही
दृष्टि से पहले में ही था वर्तमान में ही हूं और अंत में भी मैं इन होगा इस लोक में मेरे सिवाय और कुछ नहीं रेशे मुझसे अतिरिक्त और कुछ वस्तु नहीं नृत्य अमित भी नहीं
तथा में पाप रहित जी और ब्रह्मा का भी थी
मैं ही लक्ष्य होता है
पश्चिम हूं
ऊपर नीचे दिशा विदिशा में ही सावित्री गायत्री इस स्त्री पुरुष नपुंसक दृश्यों को जगती अनुस्यूत और पंक्ति छंद भी ने
धर्म में ही तीनों वेदों में वर्णन किया गया हूँ मैं भी सत्यस्वरूप माया के विकास से रहित जो शब्द शाम दक्षिणा दक्षिण घर पर रहते हुए भी यही तीन अगली स्वरूप हो
घर गुरु में गुप्ता वाणी कर रहे थे
हक और जगत का पति में ही में सबसे श्रेष्ठ सब देवताओं से श्रेष्ठ ज्ञानियों में पहुंचे कर्मचारियों का पति सागर भी में ही में अर्थों के योग की शर्त घूम ऐश्वर्य संपन्न थी
टॉप और उसकी आठ वायु भी मैं ही हूँ मैं ही ऋग्वेद यजुर्वेद सामवेद और अथर्ववेद में ही हो
भारत आदि इतिहास ब्रह्मपुरा आदि को रहा हूँ
उनका प्रवर्तक बोधायन आदि रिशी नासमझी नामक रुद्र की प्रतिपादक मुख्य तत्व की उत्पादन करने वाली का था उपासना कहा उपनिषद ये सब
में ही लोग सांख्य योग आदि सूत्र व्याख्यान अनु व्याख्या गंधर्व का विद्यार्थी यज्ञ में आहुति गाय हाथी दान के प्रधान देना ये लोग अविनाशी पर लोग छड़ प्राणिमात्र के
हृदय में वास करने वाला इंद्रिय निग्रह मनो लिखे ख़त जीवन भी नहीं सफेद
शो में घूमने भी में ही निर्जन स्थान वासी भी मैं हूं
जन्म रहित भी में ही पवित्र पुष्कर सबके मन थे और बाहर भीतर अविनाशी मैं ही हूँ
तेज अंधकार इन्द्रिय इन्द्री के गुण बुद्धि अहंकार और शब्द आदि विषय में ही ब्रह्मा विष्णु महेश उमा
घर पति ए हिंद
बिंदु या निकलती हूँ भाई को भी ईशा भू गोवा चूहा महा जंहा टप्पा सकते ये सात लोग पृथ्वी जल वायु आकाश सोनी चंद्र नक्षत्र गिरे हैं
फिलहाल कारण मृत्यु अमरत भूत प्राणी ये सब ने ही भूत वर्तमान और भविष्य में ही सम्पूर्ण विश्व सवरूप भी मैं ही हूँ ओमकार के आदि और मंत्री बुआ सोहा में ही
गायत्री शीशी जपने वालों का विनाश यूं भी में ही भक्त हैं वहां रथ अकरा ते तरफ पर अखबार में ही और सबका आश्रय में ही को में ही रखा है
अक्षर सूक्ष्म ढिबरी प्रजापति पवित्र देव था
तिराहे पर तो का अर्थ नहीं हूं मैं ही सबका उपचार करने वाला में ही परमभक्त सागर इत्यादि गुरु वस्तु और पहले कालिख अगली सूर्य आदित्य इंसा पदार्थों में विद्यमान हूँ मैं ही सब प्राणियों के
हृदय भी ढेर था और पुराना रूप से स्थित हो जिसका अर्थ है इस पर संजय वन उत्तर को और जिसके पास हो कोशी संख्या में व दक्षिण को और जिसके अंतर्गत अंतर संघर्ष हुआ
मध्य में है
ऐसा फिल्म देखकर साक्षात ओम का मैं हूं
जिस कारण से के में जब करने वालों को सजाती लोग को में जाता हूं
पोलिथीन पुरुषों को नीचे नहीं जाता इस कारण में एक निरंतरता नहीं थी सनातन कारण हो या के कारण भी ब्रह्मा नामक प्रेरित होकर रह है
और शाम के मंत्र को देखता हूँ इस कारण में ही पूर्ण सहयोग को तात्पर्य है कि सब कुछ मैं ही हूँ
झील से घनत्व तेल आदि दिन ही ग्राम से महफ़िल में व्याप्त होकर भक्षण करने वाले की सकते हैं को व्याप्त करते ही इसी का सब लोकों में अधिष्ठान रूप से व्याप्त होकर मैं सर्वव्यापी लोग ब्रह्मा हर ही
वहां और वो दूसरे जे वो भी मेरा आठ आदि और अंत नहीं जानते इस कारण से में अनंत हो घर वहां जन ज्यादा मृत्यु से भरे संसार सागर से ही में भक्तों को चाहता हूँ इस कारण मेरा नाम था
रखें
ज़रा इंच से ढांचे अंदाजे अधिक जी इन चार प्रकार के देशों में में जीव रूप से वास करता हूं
और इनके हृदय काशी सूक्ष्म रूप होकर वास करता हूं
इससे ने सूक्ष्म कहलाता हूँ
महान कार्य में मगन हुए भक्तों को उद्धार करने के निमित्त बिजली के समान दीप्तिमान निरुपम तेज हो प्रकट करता हूं
इस कारण में विशिष्ट रूप हो
जिस कारण थी कि में एक ही लोगों को पं
अनुसार करके लोग का अंतर है पहुंचाता हूं और ग्रहण करता हूं
इस कारण से मुझे स्वतंत्र और एक ईश्वर कहती प्रलय काल में कोई दूसरा स्थित नहीं रहता केवल मैं ही तीन गुणों से परे सोएं ड्रम रुद्र स्वरूप सब प्राणियों को अपने में लेकर कि इससे होता हूँ जो कि
सब लोग होगी इसलिए अर्थात सब लोकों को स्वाधीन रखने वाली शक्तियों से साथ ही लगता हूँ
कौन भूल सकता चलाता हूं
इसी का सिर्फ रिश्ता सबका शो में ईशा कहलाता हूँ
में थे और सब प्राणियों का सरदारशहर सब
विद्याओं का अधिपति अर्थात सर्व ईश्वर शक्ति संपन्न हो इससे महिला की शान आना सार्थक है
थे और अदालत पदार्थों को आत्म ज्ञान से देखता हूं
इसी का साधन संपन्न पुरुषों आत्मज्ञान रूप में योग का उपदेश करता हूं
पर में व्याप्त नहीं थी मैं भगवान हूँ ऐश्वर्य वाहन को मिली है था सब लोकों की उत्पत्ति पालन और संहार करता हूं
इस कारण मुझे महेश खेती ही महज पुरुषों में आत्मदया और अष्टांग योग से जो महिमा विधान के
जब पदार्थों को उत्पन्न कर की रक्षा करता है
मैं वहां से में ही में शुद्ध प्रतिपादित एक भी संपूर्ण दिशा में वर्तमान में सबसे प्रथम घर में वास करने वाला घर से निकलने वाला और पीछे उत्पन्न होने वाला हूँ
मैं ही सम्पूर्ण लोकों पर सब दिशाओं में भी ना ही भूखे सर्वत्र मेरे मित्र सर्वत्र मेरा मुख सर्वत्र मेरी भुजा और सर्वत्र में चरण ही में ही भोजन और चेहरों से शहर और भूमि को
कटा हुआ एक देश को के अग्रभाग की संभावना सूक्ष्म रूप हृदय में रहने वाला विश्व व्यापक प्रकाश श्रेष्ठ आत्मस्वरूप ने
जो पुरुष तत्व मनुष्य आदि वाक्यों के ज्ञान से कि वे है
ऐसी उपाधि क्या कर जीव और ब्रह्म को एकता से देखते ही अर्थ था एक स्वरूप जानते ही वहीं निरंतर मोक्ष को प्राप्त होते ही दूसरी नहीं
पीसीबी जो रजत बुद्धि है वे भ्रम ही है
परंतु ग्रह के भ्रम का आधार शक्ति यथार्थ थे
उसी प्रकार मेरे तरफ घूमी रोकने वाला जगत मिथ्या है परन्तु उसका आधा में तथा एक रूप में ही ये पंचभूत आत्मक जगत धारण ही
मुझे ईश्वर के स्वरूप में जो विवेक करेगा उसको अनंत शांति और था मुक्ति की प्राप्ति होगी
ग्रहण का ही अंतर मन है वहां छुडा पिपासा और तृष्णा ही इसी से शुभ अशुभ फल प्राप्ति का कारण जो धर्म अधर्म है उसके कारण विशेष कृष्णा को कर और निश्चयात्मक थी मुझे अंतः
रंग लगाकर जो मेरा ध्यान करते हैं
उनको निरंतर शांति और मोक्ष प्राप्त होता है
दूसरों को नहीं जहां वीणा की गति नहीं जहाँ मन नहीं पहुँच सकता इसी प्रकार धमके
ब्राह्मणों को मेरी जानने वाले को कई से रहे प्राप्त नहीं होता इस कारण था मेरे वचन जो कि आत्म ज्ञान के दिन ही ठीक है
मेरे नाम का जप करके मेरे ज्ञान पर आए हैं वे देहांत मिली जिसका हो मेरे स्टाइल को प्राप्त हो गई
जो खुशी यह प्रधान देखते ही ये सब मेरी होती है
यह सब बस तो मुझसे ही पहनने और मुझे नहीं प्रतिष्ठित थे
और अंत में मुझे में ही ले जाती है
मैं अद्वैत ब्रह्म हो ने सूची से भी अति सूक्ष्म महान से महान में ही भविष्य निधि पुरातन पुरुष सर्वेक्षण में और सिद्धू को मेरे हरचरण ही और सब कुछ कर सकता हूं
मेरी शक्ति किसी के ध्यान में नहीं आती मेरे भौतिक नेत्र नहीं है तथापि सब कुछ लिखता हूँ
कान नहीं ही सब कुछ था
अपने था तब तक तो सब विचार को जानता हूं मेरा एकांत रूप से मेरा जानने वाला कोई नहीं मैं सदा चिंतन
संपूर्ण वेदों में में ही योग्य होगी
वेदान्त का करता और वेद का जानने वाला भी नहीं मुझे पाप और पुण्य नहीं मेरा नाशी तथा जल नहीं मैं सदा चैतन्य को संपूर्ण जो भी में ही जानने योग्य वेदान्त का करता
और वैध का जानने वाला हूँ मैं ही हूँ
मुझे भी पाप और पुण्य नहीं मेरा नाशी तथा पूजन में ही मुझे दे ही रहे और बुद्धि का संबंध नहीं है
भूमि जल तेज वायु आकाश विषय में लिप्त नहीं हूं
प्रकाश सिंह पंच को शासनों गुहा में निवास करने वाला निर्विकार संग्रहित सर्व साक्षी कार्य कारण भेद ने परमात्मा जो मुझको इस प्रकार से जानते हैं वे मेरी शील्ड परमार्थ चेहरों को मिला
थी
हे महाबाहो बुद्धिमान रामचंद्र इस प्रकार जो मुझे तब तो से झांकता थे वहीं संसार से मुक्त होता है
दूसरा नहीं

शिव गीता अध्याय 5

आर्काइव

शिव  जी कहते हैं इसके उपरान्त उसे स्थान में एक आठ का बड़ा रख प्रादुर्भूत हुआ जिसकी अनेक रतनी किसी क्रांति से सब दिशाएं चित्र विचित्र हो गई थी
नदी के किनारे के पंख में जिसके चारों चक्र स्थित थी मोतियों की झाला और सैकड़ों से क्षेत्र से युक्त ली
की खुमारी हुए चार गोलों से शोभित मोतियों की झालर और चंदू भी शोभायमान जिसके ध्वजा में वर्ष का था जिसके निकट एक वक्त नहीं चाहती थी जिस पर रेशम की गड्डियां बिछाई थी
पाँच भूतों के अधिष्ठाता देवताओं से शोभित गई पारिजात वृक्ष के फूलों की मालाओं से कच्चे तेल होगा न रखना भी थे
उत्पन्न हुई कटोरी के मधुबाला का और अगर धूप खिल उठे हुए घर से बोरों को आकर्षित करने वाला प्रलय काल के समान समुदाय बाद अनेक प्रकार के बाजू से युक्त ही बिना बिंदु मधुर बातचीत और किन्नर गुणों से युक्त
वह रस था
इस प्रकार की शेष राशि को देखकर वृषभ से उत्तर शिवजी पार्वती सहित वस्त्र की शैय्या वाली उस रस के स्थान में प्रविष्ट हुई उसमें देवांगना शेष चमार और बेसन के चलाने से ही शिवजी को प्रसन्न कर भी लगी
शब्दार्थ बाद कंकालों की धोनी और निर्मल मंजूरी के शव कहीं जीना वीरों के ही से मानो लोग को पूर्ण रही थी
तोतों के वाक्य की मधुरता और फिर कबूतरों के शब्द से जगह शब्द गायब हो गया
प्रसन्नता रहेगी अपने फन उठाए हुए शिवजी के भूषण रोग शरीर में लिखती सड़कों को देख कर करोड़ों महिलाओं और पुरुषों को अपनी शहर का दिखाते हुए नजर अधिकार भी लगी
जी प्रणाम करते हुए राम को उठाकर प्रसन्न मन से ही रह गई आई और भी डिग्री कमंडल के जल से सावधान को आचमन कर रामचंद्र को आचमन आया और अपनी गोद में बिठाया इसके उपरांत रामचंद्र को
दिव्य धनुष से अक्षर रखकर और माह पाशुपतास्त्र प्रदान किया और रामचंद्र ने यह मेरा उग्र जगत का नाश करने वाला है इस कारण सामान्य युद्ध में इसका प्रयोग नहीं करना इसका निवारण
करने वाला त्रिलोकी में दूसरा नहीं है इस कारण ही रहा प्राण संकट उपस्थित होने पर ही इसका प्रयोग करना उचित है
दूसरे समय इसका प्रयोग करने से जगत का नाश जाता है
देवताओं में श्रेष्ठ लोकपालों को बुला प्रसन्न मन होली रामचंद्र को सबको अपने अपने अस्त्र प्रधान करून यह रामचंद्र उन राष्ट्रों से ही राहुल को हुआ रहेगी
कारण कि मैंने उसको व भैया है किन्तु देवताओं भी हमारे था इस कारण तुम सब युद्ध में भयंकर कम करने वाले वाहनों का शरीर धारण करके इनकी सहायता करो
इससे तुम सुखी हो कि शिव जी की आज्ञा को सिर पर धारण कर परिणाम का हाथ जरूर देवताओं ने शिव जी के चरणों में प्रणाम कर अपने अपने श्री श्रीराम खुद ही विषयों में नारायण
अहमदाबाद ब्रह्मा ने मोहम्मद उक्त अवधि में आग्नेयास्त्र दिया यमराज ने या में विकृति में मोहनदास वरुण ने रहा वाह वाही उन्हें वाइफ यहां
कुबेर ने सौम्या ईशांत ने रुद्राक्ष सूर्य चन्द्रमा ने सौम्या विश्व सेवा पर्व का आठों में वाह वाह पत्र प्रदान किया था वेश्या कुमार राम
चंद्र प्रसन्न हो शिव जी को प्रणाम कर हाथ जोड़े खड़े हो भक्तिपूर्वक में श्री रामचंद्र बोली हे भगवान मनुष्य से दो चार पुत्र उल्लंघन नहीं किया जाएगा और लंका दूर भेजा था तहत दानवों को भी दुर्गम
और वहां करोड़ लोग बड़ी राक्षस रहते ही भेजा जितेन्द्रिय वेद पाठ करने में तत्पर और आपके हफ्ते ही अनेक प्रकार की माया जानने वाले बुद्धिमान अग्निहोत्री ही केवल में और भ्राता लक्ष्मण
युद्ध में को कैसे जीत सकेंगे
शिवजी बोले ही रामचंद्र राव और राक्षसों के मामले में ही विचार कर दें कि कुछ आवश्यकता नाही का
कि उसका काम आ गया
था और ब्राह्मण का दुख देने भी अगर हम में प्रवेश हुआ है
सो रहे थे इसी कारण उसकी आयु और लक्ष्मी का छः
गया है
राज्य स्तरीय जानकी जी की अवमानना की है
इस कारण तुम भी सहज भाषा को की कहा कि वह इस समय मध्य पाने में असमर्थ रहता है
धर्म में वृद्धि करने वाला शत्रु भाग्य से ही प्राप्त होता है
वेद शास्त्र पड़ा हो और सदा धर्म में प्रीति करता हो वह विनाशकाल आने पर धर्म का त्याग कर देता है
जो काफी सदा देवता ब्रह्मा और शिव को दुख देता है उसका नाश स्वयं होता है
घेराव किष्किन्धा नामक नगर में देवताओं के अंश से बहुत से महाबली और तुझे वाला उत्पन्न हुए थी वे सब तुम्हारी सहायता करेंगी
उनके द्वारा ढोल सागर पर से तो मंगवाना अनेक पर वोट लाकर वे मामला पुल की उस पर सपा उधर जाएंगी
इस प्रकार राहुल को उसके साथियों सहित मारकर वहां से अपनी प्रिया खो दिया जहां संग्राम में शस्त्र से ही जब प्राप्त होने की संभावना हो वहां उत्तरों का प्रयोग न करना और जिनके पास आजकल नहीं हैं अथवा शब्द
तरह तथा जो भाग रहे हैं ऐसे पुरुषों के ऊपर दिव्यास्त्र का प्रयोग करने वाला स्वयं नष्ट हो जाता है
बहुत कहने से क्या हाला यह संस्था जो मेरा ही की याद में ही इसका पहला और में ही इसका शाह करता हूं
मैं ही एक जगत की मृत्यु का भी मृत्यु रूप को ही राज्य में ही इस चराचर जगत का भक्षण करने वाला हूँ
यंत्र जुमा सब राक्षस तो मेरे मुख में प्राप्त हो चुके हैं
तुम निमित्त मात्र होकर संग्राम मिली होगी

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...