गुरुवार, 12 दिसंबर 2024

अध्याय 15


गीता शास्त्र के अध्याय 15 को "पुरुषोत्तम योग" भी कहा जाता है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जीवन के मूलभूत सिद्धांतों के बारे में बताया है, जो इस प्रकार हैं:

*मुख्य बिंदु:*

1. *विश्व वृक्ष*: भगवान ने जीवन को एक विशाल वृक्ष के रूप में वर्णित किया, जिसकी जड़ें ऊपर और शाखाएँ नीचे हैं।
2. *माया का प्रभाव*: भगवान ने बताया कि माया के कारण जीव आत्मा को भूल जाते हैं और संसार में फंस जाते हैं।
3. *आत्म-ज्ञान*: भगवान ने अर्जुन को आत्म-ज्ञान के महत्व के बारे में बताया, जिससे जीव आत्मा को अपने असली स्वरूप का ज्ञान होता है।
4. *पुरुषोत्तम*: भगवान ने खुद को पुरुषोत्तम कहा, जो सबसे ऊंचा और सर्वशक्तिमान है।
5. *भक्ति और शरणागति*: भगवान ने अर्जुन को अपनी शरण में आने और भक्ति करने के महत्व के बारे में बताया।

*श्लोक 20 का विशेष महत्व:*

श्लोक 20 में भगवान कहते हैं:

"मैं ही ज्ञान का एकमात्र स्रोत हूँ, और मेरी शरण में आने से ही जीव आत्मा को मोक्ष मिलता है।"

इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जीवन के मूलभूत सिद्धांतों और आत्म-ज्ञान के महत्व के बारे में बताया है, जो जीवन के लिए मार्गदर्शक हैं।

👉आइए इसे समझने की कोशिश कर के देखें 👈

भगवद  गीता अध्याय: 15
श्लोक 1

श्लोक:
(संसार वृक्ष का कथन और भगवत्प्राप्ति का उपाय) 
 श्रीभगवानुवाच
 ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्‌।
 छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्‌॥

भावार्थ:
श्री भगवान बोले- आदिपुरुष परमेश्वर रूप मूल वाले (आदिपुरुष नारायण वासुदेव भगवान ही नित्य और अनन्त तथा सबके आधार होने के कारण और सबसे ऊपर नित्यधाम में सगुणरूप से वास करने के कारण ऊर्ध्व नाम से कहे गए हैं और वे मायापति, सर्वशक्तिमान परमेश्वर ही इस संसाररूप वृक्ष के कारण हैं, इसलिए इस संसार वृक्ष को 'ऊर्ध्वमूलवाला' कहते हैं) और ब्रह्मारूप मुख्य शाखा वाले (उस आदिपुरुष परमेश्वर से उत्पत्ति वाला होने के कारण तथा नित्यधाम से नीचे ब्रह्मलोक में वास करने के कारण, हिरण्यगर्भरूप ब्रह्मा को परमेश्वर की अपेक्षा 'अधः' कहा है और वही इस संसार का विस्तार करने वाला होने से इसकी मुख्य शाखा है, इसलिए इस संसार वृक्ष को 'अधःशाखा वाला' कहते हैं) जिस संसार रूप पीपल वृक्ष को अविनाशी (इस वृक्ष का मूल कारण परमात्मा अविनाशी है तथा अनादिकाल से इसकी परम्परा चली आती है, इसलिए इस संसार वृक्ष को 'अविनाशी' कहते हैं) कहते हैं, तथा वेद जिसके पत्ते (इस वृक्ष की शाखा रूप ब्रह्मा से प्रकट होने वाले और यज्ञादि कर्मों द्वारा इस संसार वृक्ष की रक्षा और वृद्धि करने वाले एवं शोभा को बढ़ाने वाले होने से वेद 'पत्ते' कहे गए हैं) कहे गए हैं, उस संसार रूप वृक्ष को जो पुरुष मूलसहित सत्त्व से जानता है, वह वेद के तात्पर्य को जानने वाला है। (भगवान्‌ की योगमाया से उत्पन्न हुआ संसार क्षणभंगुर, नाशवान और दुःखरूप है, इसके चिन्तन को त्याग कर केवल परमेश्वर ही नित्य-निरन्तर, अनन्य प्रेम से चिन्तन करना 'वेद के तात्पर्य को जानना' है)
श्रीभगवान इस श्लोक में संसार को एक विशाल पीपल के वृक्ष के रूप में प्रस्तुत करते हैं। इस संसार वृक्ष की जड़ों को "ऊर्ध्वमूल" यानी ऊँचाई में स्थिर मानते हैं, जो भगवान के रूप में प्रकट होते हैं। यह संकेत करता है कि आदिपुरुष परमेश्वर ही इस संसार के मूल(जड़) हैं और नित्य हैं, जबकि संसार की शाखाएँ और पत्ते इस वृक्ष के विस्तार और विकास को दर्शाते हैं।
ऊर्ध्वमूल: यह शब्द आदिपुरुष परमेश्वर की ओर इशारा करता है, जो संसार के मूल कारण हैं। वे शाश्वत और नित्य हैं। सदा रहने वाले है।जिसका कभी भी नाश नहीं होता।
अविनाशी: संसार का मूल तत्व अविनाशी है, जिसका अर्थ है कि परमात्मा स्वयं अविनाशी हैं और संसार भी उनकी परंपरा से उत्पन्न हुआ है।
पत्ते: वेदों को इस संसार वृक्ष के पत्तों के रूप में दर्शाया गया है, जो यज्ञ और कर्मों के माध्यम से जो सदा संसार की रक्षा और वृद्धि में सहायक होते रहते हैं।
ज्ञान का अर्थ: जो व्यक्ति इस संसार वृक्ष को इस दृष्टिकोण से समझता है और केवल परमेश्वर की ध्यान में रहता है, वह वास्तव में वेद के तात्पर्य को जानने वाला होता है। इसका अर्थ है कि इस संसार के क्षणभंगुर (जो कभी भी नष्ट हो सकता है आज के गुरु कभी भी नष्ट हो सकते है वो दुखद परिस्थिति में सहायक भी नहीं हो सकते) ओर जो इन  दुःखद तत्वों से पार हो कर परमेश्वर की नित्य और शाश्वत स्थिति को जानना सिखा सके   वास्तविक ज्ञान वही है।
इस श्लोक के माध्यम से श्रीभगवान ने संसार की वास्तविकता और भगवत्प्राप्ति के मार्ग को स्पष्ट किया है, और यह भी बताया है कि जीवन में वास्तविक ज्ञान प्राप्त करने के लिए परमात्मा की ओर ध्यान केंद्रित करना आवश्यक होता  है।(जब कि कलयुग में यह गुरु लोग अपनी ओर ही ध्यान आकर्षित करते है)
नोट : प्राप्त इसी भूमिका को लेकर हम आगे बढ़ें गे बिना गीता के मूल भाव से कोई छेड़ छाड़ किए।
15॥1॥
भगवद  गीता अध्याय: 15
श्लोक 2

श्लोक:
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः।
 अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके॥

भावार्थ:
उस संसार वृक्ष की तीनों गुणोंरूप जल के द्वारा बढ़ी हुई एवं विषय-भोग रूप कोंपलोंवाली
 ( शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध -ये पाँचों स्थूलदेह और इन्द्रियों की अपेक्षा सूक्ष्म होने के कारण उन शाखाओं की 'कोंपलों' के रूप में कहे गए हैं।) देव, मनुष्य और तिर्यक्‌ आदि योनिरूप शाखाएँ
 (मुख्य शाखा रूप ब्रह्मा से सम्पूर्ण लोकों सहित देव, मनुष्य और तिर्यक्‌ आदि योनियों की उत्पत्ति और विस्तार हुआ है,इसलिए उनका यहाँ 'शाखाओं' के रूप में वर्णन किया है) 
नीचे और ऊपर सर्वत्र फैली हुई हैं तथा मनुष्य लोक में ( अहंता, ममता और वासनारूप मूलों को केवल मनुष्य योनि में कर्मों के अनुसार बाँधने वाली कहने का कारण यह है कि अन्य सब योनियों में तो केवल पूर्वकृत कर्मों के फल को भोगने का ही अधिकार है और मनुष्य योनि में नवीन कर्मों के करने का भी अधिकार है) 
कर्मों के अनुसार बाँधने वाली अहंता-ममता और वासना रूप जड़ें भी नीचे और ऊपर सभी लोकों में व्याप्त हो रही हैं। 

अहंता-ममता का अर्थ है "मैं" और "मेरा" की भावना। अध्याय 15 के श्लोक में भगवान कृष्ण कहते हैं:

"अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्।
विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते।।"

इस श्लोक का भाव यह है कि जो व्यक्ति अहंता-ममता को त्याग देता है, वह शांत और निर्मम हो जाता है, और वह ब्रह्म की अवस्था में पहुँच जाता है।

अहंता-ममता को त्यागने का अर्थ है कि हमें अपने आप को और अपनी सभी वस्तुओं को भगवान के हाथ में सौंप देना चाहिए,तो विचार योग तथ्य यह है कि गुरु को भी भगवान के हाथों में सौंप कर हमें अपने आप को भगवान के साथ जोड़ लेना चाहिए। यहां फिर सोचना बनता है कि भगवान के साथ हमने खुद को जोड़ना है तो हमें भगवान की ही आज्ञा को मानना भी तो होगा?जिस से स्पष्ट होता है कि भगवान से जुड़ने को किसी गुरु की आज्ञा की आवश्यकता ही नहीं? क्यों कि दो लोगों की आज्ञा का पालन करना उन दो नौकाओं की भांति ही साबित होगा जिन पर एक समय में हम दोनों नौकाओं पर सवार हो जाएं।जिस का परिणाम डूबना ही है? और कहते भी हैं कि दो नौकाओं का सवार डूबता ही है? दो मालिकों का सेवक भी किसी एक मालिक को धोखा कब दे दे कह नहीं सकते?
श्लोक का मूल भाव भी यही है।
उस संसार वृक्ष की तीनों गुणोंरूप जल के द्वारा बढ़ी हुई एवं विषय-भोग रूप कोंपलोंवाली ( शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध -ये पाँचों स्थूलदेह और इन्द्रियों की अपेक्षा सूक्ष्म होने के कारण उन शाखाओं की 'कोंपलों' के रूप में कहे गए हैं।) देव, मनुष्य और तिर्यक्‌ आदि योनिरूप शाखाएँ (मुख्य शाखा रूप ब्रह्मा से सम्पूर्ण लोकों सहित देव, मनुष्य और तिर्यक्‌ आदि योनियों की उत्पत्ति और विस्तार हुआ है, इसलिए उनका यहाँ 'शाखाओं' के रूप में वर्णन किया है) नीचे और ऊपर सर्वत्र फैली हुई हैं तथा मनुष्य लोक में ( अहंता, ममता और वासनारूप मूलों को केवल मनुष्य योनि में कर्मों के अनुसार बाँधने वाली कहने का कारण यह है कि अन्य सब योनियों में तो केवल पूर्वकृत कर्मों के फल को भोगने का ही अधिकार है और मनुष्य योनि में नवीन कर्मों के करने का भी अधिकार है) कर्मों के अनुसार बाँधने वाली अहंता-ममता और वासना रूप जड़ें भी नीचे और ऊपर सभी लोकों में व्याप्त हो रही हैं। 
इस श्लोक में संसार को एक विशाल वृक्ष के रूप में चित्रित किया गया है, जिसकी शाखाएँ तीन गुणों 
(सत्त्व, रजस, और तमस) 
से उत्पन्न होती हैं और ये विषय-भोग के कोंपलों के रूप में व्यक्त होती हैं। इन शाखाओं में शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध जैसे विषय हैं, जो इन्द्रियों के अनुभव की वस्तुएं हैं।
वृक्ष की शाखाएँ देवता (गुरु, मनुष्य(गुरु) और तिर्यक् (पशु) योनियों का प्रतीक हैं, जो इस ब्रह्माण्ड में विभिन्न जीवन रूपों और अवस्थाओं को दर्शाते हैं। यह वृक्ष ऊपर से नीचे तक फैलता है और मनुष्य योनि में कर्मों के अनुसार मनुष्य को जकड़े हुए है।
मुख्य रूप से, इस वृक्ष की जड़ें अहंता, ममता, और वासना रूप में बताई गई हैं। ये जड़ें मनुष्य योनि में कर्मों के अनुसार बंधन की स्थिति को जन्म देती हैं।
(दो मालिकों का नौकर या दो नौकाओं का सवार) 
अन्य योनियों में, जीवन केवल पूर्वकृत कर्मों के फल भोगने तक सीमित होता है, लेकिन मनुष्य योनि में नए कर्म करने का भी नियम ओर अधिकार होता है, जिससे ज्ञान द्वारा ही वे इस वृक्ष के बंधनों से मुक्त हो सकते हैं।
इस प्रकार, यह श्लोक संसार की स्थिति और मनुष्य के कर्मों के बंधनों को स्पष्ट करने का प्रयास करता है और हमें यह समझने में मदद करता है कि कैसे हम इन बंधनों से छुटकारा पा सकते हैं।
इस वृक्ष की शाखाएँ ऊपर तथा नीचे फैली हुई हैं और प्रकृति के तीन गुणों द्वारा पोषित हैं। इसकी टहनियाँ इन्द्रिय विषय हैं। इस वृक्ष की जड़ें नीचे की ओर भी जाती हैं, जो मानव समाज के सकाम कर्मों से बँधी हुई हैं।

तात्पर्य : अश्वत्थ वृक्ष की यहाँ और भी व्याख्या की गई है। इसकी शाखाएँ चतुर्दिक फैली हुई हैं। निचले भाग में जीवों की विभिन्न योनियाँ हैं, यथा मनुष्य, पशु, घोड़े, गाय, कुत्ते, बिल्लियाँ आदि। ये सभी वृक्ष की शाखाओं के निचले भाग में स्थित हैं। लेकिन ऊपरी भाग में जीवों की उच्चयोनियाँ हैं- यथा देव, गन्धर्व तथा अन्य बहुत सी उच्चतर योनियाँ। जिस प्रकार सामान्य वृक्ष का पोषण जल से होता है, उसी प्रकार यह वृक्ष प्रकृति के तीन गुणों द्वारा पोषित होता है। कभी-कभी हम देखते हैं कि जल के आभाव से कोई-कोई भूखण्ड वीरान हो जाता है, तो कोई खण्ड लहलहाता है, इसी प्रकार जहाँ प्रकृति के किन्ही विशेष गुणों का आनुपातिक आधिक्य होता है, वहाँ उसी के अनुरूप जीवों की योनियाँ प्रकट होती हैं।
वृक्ष की टहनियाँ इन्द्रियविषय हैं। विभिन्न गुणों के विकास से हम विभिन्न प्रकार की इन्द्रियों का विकास करते हैं और इन इन्द्रियों के द्वारा हम विभिन्न इन्द्रियविषयों का भोग करते हैं। शाखाओं के सिरे इन्द्रियाँ हैं- यथा कान, नाक, आँख आदि, जो विभिन्न इन्द्रियविषयों के भोग में आसक्त हैं। टहनियाँ शब्द, रूप, स्पर्श आदि इन्द्रिय विषय हैं। सहायक जड़ें राग तथा द्वेष हैं, जो विभिन्न प्रकार के कष्ट तथा इन्द्रियभोग के विभिन्न रूप हैं। धर्म-अधर्म की प्रवृत्तियाँ इन्हीं गौण जड़ों से उत्पन्न हुई मानी जाती हैं, जो चारों दिशाओं में फैली हैं। वास्तविक जड़ तो ब्रह्मलोक में है, किन्तु अन्य जड़ें मर्त्यलोक में हैं। जब मनुष्य उच्चलोकों में पुण्यकर्मों का फल भोग चुकता है, तो वह इस धरा पर उतरता है और उन्नति के लिए सकाम कर्मों का नवीनीकरण करता है। यह मनुष्य लोक तो कर्म क्षेत्र माना जाता है। और मनुष्य को भोग योनि।
15॥2॥
भगवद  गीता अध्याय: 15
श्लोक 3

श्लोक:
न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा।
 अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल मसङ्‍गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा॥

भावार्थ:
इस संसार वृक्ष का स्वरूप जैसा कहा है वैसा यहाँ विचार काल में नहीं पाया जाता 
(इस संसार का जैसा स्वरूप शास्त्रों में वर्णन किया गया है और जैसा देखा-सुना जाता है, वैसा तत्त्व ज्ञान होने के पश्चात नहीं पाया जाता, जिस प्रकार आँख खुलने के पश्चात स्वप्न का संसार नहीं पाया जाता)
 क्योंकि न तो इसका आदि है (इसका आदि नहीं है, यह कहने का प्रयोजन यह है कि इसकी परम्परा कब से चली आ रही है, इसका कोई पता नहीं है) 
और न अन्त है 
(इसका अन्त नहीं है, यह कहने का प्रयोजन यह है कि इसकी परम्परा कब तक चलती रहेगी, इसका कोई पता नहीं है) 

तथा न इसकी अच्छी प्रकार से स्थिति ही है।
 (इसकी अच्छी प्रकार स्थिति भी नहीं है, यह कहने का प्रयोजन यह है कि वास्तव में यह है क्यों कि क्षणभंगुर और नाशवान है)
 इसलिए इस अहंता, ममता और वासनारूप अति दृढ़ मूलों वाले संसार रूप पीपल के वृक्ष को दृढ़ वैराग्य रूप से भाव है।

(ब्रह्मलोक तक के भोग क्षणिक और नाशवान हैं, ऐसा समझकर, इस संसार के समस्त विषयभोगों में सत्ता, सुख, प्रीति और रमणीयता का न भासना ही 'दृढ़ वैराग्यरूप शस्त्र' है) 

शस्त्र द्वारा काटकर 
(स्थावर, जंगम रूप यावन्मात्र संसार के चिन्तन का तथा अनादिकाल से अज्ञान द्वारा दृढ़ हुई अहंता, ममता और वासना रूप मूलों का त्याग करना ही संसार वृक्ष का अवान्तर 'मूलों के सहित काटना' है।)

इस वृक्ष के वास्तविक स्वरूप का अनुभव इस जगत् में नहीं किया जा सकता। कोई भी नहीं समझ सकता कि इसका आदि कहाँ है, अन्त कहाँ है या इसका आधार कहाँ है? लेकिन मनुष्य को चाहिए कि इस दृढ़ मूल वाले वृक्ष को विरक्ति विराग रूप के शस्त्र से काट गिराए। तत्पश्चात् उसे ऐसे स्थान की खोज करनी चाहिए जहाँ जाकर लौटना न पड़े और जहाँ उस भगवान् की ही शरण ग्रहण कर ली जाये, जिससे अनादि काल से प्रत्येक वस्तु का सूत्रपात तथा विस्तार होता आया है।तात्पर्य : अब तक यह स्पष्ट कह दिया गया है कि इस अश्वत्थ वृक्ष के वास्तविक स्वरूप को इस भौतिक जगत् में नहीं समझा जा सकता। चूँकि इसकी जड़ें ऊपर की ओर हैं, अतः वास्तविक वृक्ष का विस्तार विरुद्ध दिशा में होता है। जब वृक्ष के भौतिक विस्तार में कोई फँस जाता है, तो उसे न तो यह पता चल पाता है कि यह कितनी दूरी तक फैला है और न वह इस वृक्ष के शुभारम्भ को ही देख पाता है। फिर भी मनुष्य को उस के कारण की खोज तो करनी ही होती है। " मैं अमुक पिता का पुत्र हूँ, जो अमुक का पुत्र है, आदि " - इस प्रकार खोजने पर अमुक पिता के पिता करने से मनुष्य को अंत में ब्रह्मा प्राप्त होते हैं, जिन्हें गर्भोदकशायी विष्णु ने उत्पन्न किया। इस प्रकार अन्ततः भगवान् तक पहुँचा जाता है, जहाँ सारी गवेषणा का अन्त हो जाता है। मनुष्य को इस वृक्ष के उद्गम, परमेश्वर की खोज ऐसे व्यक्तियों की संगति द्वारा करनी होती है, जिन्हें उस परमेश्वर का पूर्ण ज्ञान प्राप्त हो। ईश्वर का पूर्ण ज्ञान तो पवित्र ग्रंथों से ही संभव हो सकता है जो इस वृक्ष के पत्ते अंग बताए गए है?
इसी प्रकार ज्ञान से मनुष्य धीरे-धीरे वास्तविकता के इस प्रतिबिम्ब से विलग हो जाता है और सम्बन्ध-विच्छेद होने पर वह वास्तव में मूलवृक्ष में ही स्थित हो जाता है।
इस प्रसंग में असङ्ग शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि विषयभोग की आसक्ति तथा भौतिक प्रकृति पर प्रभुता अत्यन्त प्रबल होती है। अतएव प्रामाणिक शास्त्रों पर आधारित आत्म-ज्ञान की विवेचना द्वारा विरक्ति सीखनी चाहिए और ज्ञानी पुरुषों से श्रवण भी करना चाहिए। भक्तों की संगति में रहकर ऐसी विवेचना से भगवान् की प्राप्ति थोड़ी सुगम होजाती है। तब सर्वप्रथम जो करणीय है, वह है भगवान् की शरण ग्रहण करना। यहाँ पर उस स्थान (पद) का वर्णन किया गया है, जहाँ जाकर मनुष्य इस धोखे से  प्रतिबिम्बित इस वृक्ष में कभी वापस नहीं लौटता। 
भगवान् कृष्ण वह आदि मूल हैं, जहाँ से प्रत्येक वस्तु निकली है। उस भगवान् का अनुग्रह प्राप्त करने के लिए केवल उनकी शरण ग्रहण करनी चाहिए, जो श्रवण, कीर्तन आदि द्वारा भक्ति करने के फलस्वरूप प्राप्त होती है। वे ही भौतिक जगत् के विस्तार के कारण हैं। इसकी व्याख्या पहले ही स्वयं भगवान् ने की है। 
अहं सर्वस्य प्रभवः- मैं प्रत्येक वस्तु का उद्गम हूँ। अतएव इस भौतिक जीवन रूपी प्रबल अश्वत्थ के वृक्ष के बन्धन से छूटने के लिए कृष्ण की शरण ग्रहण की जानी चाहिए। कृष्ण (भगवान) की ही शरण ग्रहण करते ही मनुष्य स्वतः इस भौतिक विस्तार से विलग हो जाता है।इस प्रकार, इस संसार वृक्ष को काटने का अर्थ है अपने भीतर के अहंकार, ममता, और वासना के जड़ों को समाप्त करना, जो कि इस संसार के अस्थिरता और नाशवान प्रकृति को समझकर किया जा सकता है।
 15॥3॥
भगवद  गीता अध्याय: 15
श्लोक 4

श्लोक:
ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः।
 तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी॥

भावार्थ:
उसके पश्चात उस परम-पदरूप परमेश्वर को भलीभाँति खोजना चाहिए, जिसमें गए हुए पुरुष फिर लौटकर संसार में नहीं आते और जिस परमेश्वर से इस पुरातन संसार वृक्ष की प्रवृत्ति विस्तार को प्राप्त हुई है, उसी आदिपुरुष नारायण के मैं शरण हूँ- इस प्रकार दृढ़ निश्चय करके उस परमेश्वर का मनन और निदिध्यासन करना चाहिए
 इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को एक महत्वपूर्ण शिक्षाएँ दे रहे हैं। वे बताते हैं कि यह संसार एक विशाल वृक्ष के समान है, जिसमें हम सभी जीवन के एक भाग के रूप में जुड़े हुए हैं। इस वृक्ष की उत्पत्ति और विस्तार की प्रक्रिया आदिपुरुष नारायण से हुई है, जो इस विश्व के परमेश्वर हैं।
भगवान श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि हमें इस परमेश्वर को ठीक से खोजने का प्रयास करना चाहिए, जो उस परम पद (अधिकतम स्थिति) का स्वरूप है, जिसमें पहुँचने के बाद जीवात्मा पुनः संसार में लौटती नहीं है। अर्थात, जो परमेश्वर हमे मोक्ष प्राप्त करने के बाद संसार के पुनरागमन से मुक्त करता है।
इस श्लोक के माध्यम से यह सिखाया जा रहा है कि एक व्यक्ति को न केवल भगवान के अस्तित्व को जानना चाहिए, बल्कि उसे ध्यान और भक्ति द्वारा उस परमेश्वर की सच्ची पहचान भी करनी चाहिए। यह ध्यान और ध्यानानंद एक दृढ़ निश्चय के साथ होना चाहिए, जिसमें भगवान नारायण के प्रति पूर्ण विश्वास और समर्पण शामिल हो।इस प्रकार, श्लोक हमें प्रेरित करता है कि हम अपने जीवन में आदिपुरुष नारायण की खोज करें, उनके चरणों में शरण लें और मोक्ष की प्राप्ति के लिए गंभीर प्रयास करें।

15॥4॥

भगवद  गीता अध्याय: 15
श्लोक 5

श्लोक:
निर्मानमोहा जितसङ्गदोषाअध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः।
 द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसञ्ज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्‌॥

भावार्थ:
जिनका मान और मोह नष्ट हो गया है, जिन्होंने आसक्ति रूप दोष को जीत लिया है, जिनकी परमात्मा के स्वरूप में नित्य स्थिति है और जिनकी कामनाएँ पूर्ण रूप से नष्ट हो गई हैं- वे सुख-दुःख नामक द्वन्द्वों से विमुक्त ज्ञानीजन उस अविनाशी परम पद को प्राप्त होते हैं
जो झूठी प्रतिष्ठा, मोह तथा कुसंगति से मुक्त हैं, जो शाश्वत तत्त्व को समझते हैं, जिन्होंने भौतिक काम को नष्ट कर दिया है, जो सुख तथा दुःख के द्वन्द्व से मुक्त हैं और जो मोहरहित होकर परम पुरुष के शरणागत होना जानते हैं, वे उस शाश्वत राज्य को प्राप्त होते हैं।

तात्पर्य : यहाँ पर शरणागति का अत्यन्त सुन्दर वर्णन हुआ है। इसके लिए जिस प्रथम योग्यता की आवश्यकता है, वह है मिथ्या अहंकार से मोहित न होना। चूँकि बद्धजीव अपने को प्रकृति(माया) का स्वामी मानकर गर्वित रहता है, अतएव उसके लिए भगवान् की शरण में जाना कठिन होता है। उसे वास्तविक ज्ञान के अनुशीलन द्वारा यह जानना चाहिए कि वह प्रकृति का स्वामी नहीं है, उसका स्वामी तो परमेश्वर है। जब मनुष्य अहंकार से उत्पन्न मोह से मुक्त हो जाता है, तभी शरणागति की प्रक्रिया प्रारम्भ हो सकती है। जो व्यक्ति इस संसार में सदैव सम्मान की आशा रखता है, उसके लिए भगवान् के शरणागत होना कठिन है। अहंकार तो मोह के कारण होता है, क्योंकि यद्यपि मनुष्य यहाँ आता है, कुछ काल तक रहता है और फिर चला जाता है, तो भी मूर्खतावश यह समझ बैठता है कि वही इस संसार का स्वामी है। इस तरह वह सारी परिस्थिति को जटिल बना देता है और सदैव कष्ट उठाता रहता है। सारा संसार इसी भ्रान्तधारणा के अन्तर्गत आगे बढ़ता है। लोग सोचते हैं कि यह भूमि या पृथ्वी मानव समाज की है और उन्होंने भूमि का विभाजन इस मिथ्या धारणा से कर रखा है कि वे इसके स्वामी हैं। मनुष्य को इस भ्रम से मुक्त होना चाहिए कि मानव समाज ही इस जगत् का स्वामी है। जब मनुष्य इस प्रकार की भ्रान्तधारणा से मुक्त हो जाता है, तो वह पारिवारिक, सामाजिक तथा राष्ट्रीय स्नेह से उत्पन्न कुसंगतियों से मुक्त हो जाता है। ये त्रुटि पूर्ण संगतियाँ ही उसे इस संसार से बाँधने वाली हैं। इस अवस्था के बाद उसे आध्यात्मिक ज्ञान विकसित करना होता है। उसे ऐसे ज्ञान का अनुशीलन करना होता है कि वास्तव में उसका क्या है और क्या नहीं है। और जब उसे वस्तुओं का सही-सही ज्ञान हो जाता है तो वह सुख-दुःख, हर्ष- विषाद जैसे द्वन्द्वों से मुक्त हो जाता है। वह ज्ञान से परिपूर्ण हो जाता है और तब भगवान् का शरणागत बनना सम्भव हो पाता है।इस श्लोक का सार यह है कि एक व्यक्ति जो आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त कर चुका है और जिसने अपने भीतर के बंधनों और इच्छाओं को समाप्त कर लिया है, वह परम शांति और अविनाशी परम पद को प्राप्त कर लेता है। यह अवस्था दिव्य शांति और स्थिरता की होती है, जहाँ व्यक्ति समस्त द्वन्द्वों से मुक्त हो जाता है और सच्चे ज्ञान का अनुभव करता है।
 15॥5॥
भगवद  गीता अध्याय: 15
श्लोक 6

श्लोक:
न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।
 यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥

भावार्थ:
जिस परम पद को प्राप्त होकर मनुष्य लौटकर संसार में नहीं आते उस स्वयं प्रकाश परम पद को न सूर्य प्रकाशित कर सकता है, न चन्द्रमा और न अग्नि ही, वही मेरा परम धाम 
('परम धाम' परम धाम एक आध्यात्मिक अवधारणा है जो भगवान के निवास स्थान को संदर्भित करती है।भगवान तो कण कण में हैं ।परन्तु यह वह स्थान है जिसे शास्त्र कहते है जहां भगवान निवास करते हैं और जहां जीवात्मा को मोक्ष या मुक्ति प्राप्त होती है।वह परम धाम है।परम धाम को विभिन्न धर्मों में और अलग अलग आध्यात्मिक परंपराओं में अलग-अलग तरीकों से वर्णित किया गया है। कुछ लोग इसे एक भौतिक स्थान के रूप में देखते हैं, जबकि अन्य इसे एक आध्यात्मिक अवस्था के रूप में देखते हैं।

हिंदू धर्म में, परम धाम को अक्सर वैकुण्ठ या गोलोक के रूप में वर्णित किया जाता है, जो भगवान विष्णु या भगवान कृष्ण के निवास स्थान हैं।

इस्लाम धर्म में, परम धाम को जन्नत के रूप में वर्णित किया जाता है, जो एक स्वर्गीय स्थान है जहां मुसलमानों को मृत्यु के बाद प्रवेश मिलता है।

बौद्ध धर्म में, परम धाम को अक्सर निर्वाण के रूप में वर्णित किया जाता है, जो एक आध्यात्मिक अवस्था है जहां जीवात्मा को मोक्ष या मुक्ति प्राप्त होती है।

इस प्रकार, परम धाम एक आध्यात्मिक अवधारणा है जो भगवान के निवास स्थान को संदर्भित करती है, और इसका अर्थ विभिन्न धर्मों और आध्यात्मिक परंपराओं में अलग-अलग तरीकों से वर्णित किया गया है।
 15॥6॥
भगवद  गीता अध्याय: 15
श्लोक 7

श्लोक:
(जीवात्मा का विषय) 
 श्रीभगवानुवाच
 ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।
 मनः षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति॥

भावार्थ:
इस देह में यह जीवात्मा मेरा ही सनातन अंश है कोई टुकड़ा नहीं
(जैसे विभागरहित स्थित हुआ भी महाकाश घटों में पृथक-पृथक की भाँति प्रतीत होता है, वैसे ही सब भूतों में एकीरूप से स्थित हुआ भी परमात्मा पृथक-पृथक की भाँति प्रतीत होता है, इसी से देह में स्थित जीवात्मा को भगवान ने अपना 'सनातन अंश' कहा है) 

और वही इन प्रकृति में स्थित मन और पाँचों इन्द्रियों को आकर्षित भी तो करता है।श्रीभगवान ने कहा है कि इस शरीर में स्थित जीवात्मा मेरा ही सनातन अंश है। जैसे कि एक ही आकाश को विभिन्न घटों में विभाजित किया जाता है, लेकिन आकाश स्वयं एक ही होता है, वैसे ही जीवात्मा भी मेरा एक अंश है, जबकि शरीर और मन के माध्यम से यह विभिन्न रूपों में प्रकट होता है। जीवात्मा अपनी प्रकृति के अनुसार, मन और पाँचों इन्द्रियों को आकर्षित करता है और उनके माध्यम से कार्य करता है।
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण यह स्पष्ट कर रहे हैं कि जीवात्मा, जो कि हमारे शरीर में निवास करता है, वह भगवान का ही एक अविभाज्य हिस्सा है। जीवात्मा शाश्वत और अनन्त है, और इसे शरीर में स्थित मन और इन्द्रियों द्वारा संचालित किया जाता है। मन और इन्द्रियाँ जो भी कार्य करती हैं, जीवात्मा उन्हीं के माध्यम से हीअनुभव करता है।भगवान इस श्लोक के माध्यम से हमें यह समझाना चाहते हैं कि जीवात्मा और परमात्मा के बीच एक गहरा सम्बन्ध है। जीवात्मा, जो कि एक दिव्य अंश है, मन और इन्द्रियों के माध्यम से इस भौतिक संसार के साथ जुड़ा रहता है। यह संसार में आकर्षण और विघटन का कारण बनता है, जो कि इस शरीर के माध्यम से अनुभव किया जाता है।
इस प्रकार, श्लोक 7 हमें यह सिखाता है कि हमें अपने भीतर के दिव्य अंश को पहचानना चाहिए और अपने मन और इन्द्रियों को सही दिशा में संकर्षित करना चाहिए ताकि हम आत्मा की वास्तविकता को समझ सकें और आत्मा के साथ परमात्मा के सम्बन्ध को जान सकें।

अपने भीतर के दिव्य अंश को पहचानने के लिए, निम्नलिखित कुछ सुझाव दिए जा सकते हैं:

1. *आत्म-चिंतन*: 
अपने आप के बारे में चिंतन करें। अपने विचारों, भावनाओं और क्रियाओं को समझने की कोशिश करें।

2. *ध्यान*: 
ध्यान के माध्यम से अपने मन को शांत और एकाग्र करने की कोशिश करें। इससे आपको अपने भीतर के दिव्य अंश को पहचानने में मदद मिल सकती है।

3. *प्राकृतिक सौंदर्य का अनुभव*: 
प्राकृतिक सौंदर्य का अनुभव करने से आपको अपने भीतर के दिव्य अंश को पहचानने में मदद मिल सकती है। प्राकृतिक सौंदर्य का अनुभव करने से आपको अपने आप को और ब्रह्मांड को एक दूसरे से जुड़ा हुआ महसूस हो सकता है।

4. *आध्यात्मिक पुस्तकों का अध्ययन*: 
आध्यात्मिक पुस्तकों का अध्ययन करने से आपको अपने भीतर के दिव्य अंश को पहचानने में मदद मिल सकती है। आध्यात्मिक पुस्तकें आपको अपने आप को और ब्रह्मांड को एक दूसरे से जुड़ा हुआ समझने में मदद कर सकती हैं।

5. *गुरु रूपी आध्यात्मिक मार्गदर्शक ग्रंथों की शरण*: 
आध्यात्मिक मार्गदर्शक की शरण में जाने से आपको अपने भीतर के दिव्य अंश को पहचानने में मदद मिल सकती है। गुरु या आध्यात्मिक मार्गदर्शक आपको अपने आप को और ब्रह्मांड को एक दूसरे से जुड़ा हुआ समझने में मदद जरूर कर सकते हैं।
 15॥7॥

भगवद  गीता अध्याय: 15
श्लोक 8

श्लोक:
शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः।
 गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात्‌॥

भावार्थ:
वायु गन्ध के स्थान से गन्ध को जैसे ग्रहण करके ले जाता है, वैसे ही देहादिका स्वामी जीवात्मा भी जिस शरीर का त्याग करता है, उससे इन मन सहित इन्द्रियों को ग्रहण करके फिर जिस शरीर को प्राप्त होता है- उसमें जाता है
 
इस संसार में जीव अपनी देहात्मबुद्धि को एक शरीर से दूसरे में उसी तरह ले जाता है, जिस तरह वायु सुगन्धि को ले जाती है। इस प्रकार वह एक शरीर धारण करता है और फिर इसे त्याग कर दूसरा शरीर धारण करता है।

तात्पर्य : यहाँ पर जीव को ईश्वर अर्थात् अपने शरीर का नियामक कहा गया है। यदि वह चाहे तो अपने शरीर को त्याग कर उच्चतर योनि में जा सकता है और चाहे तो निम्न योनि में जा सकता है। इस विषय में उसे थोड़ी स्वतन्त्रता भी प्राप्त है। शरीर में जो परिवर्तन होता है, वह उस पर निर्भर करता है। मृत्यु के समय वह जैसी चेतना बनाये रखता है, वही उसे दूसरे शरीर तक ले जाती है। यदि वह कुत्ते या बिल्ली जैसी चेतना बनाता है, तो उसे कुत्ते या बिल्ली का शरीर प्राप्त होता है। यदि वह अपनी चेतना दैवी गुणों में स्थित करता है, तो उसे देवता का स्वरूप प्राप्त होता है। और यदि वह कृष्ण भावनामृत में होता है, तो वह आध्यात्मिक जगत में कृष्णलोक को जाता है, जहाँ उसका सान्निध्य कृष्ण से होता है। यह दावा मिथ्या है कि इस शरीर के नाश होने पर सब कुछ समाप्त हो जाता है। आत्मा एक शरीर से दूसरे शरीर में देहान्तरण करता है और वर्तमान शरीर तथा वर्तमान कार्यकलाप ही अगले शरीर 'का आधार बनते हैं। कर्म के अनुसार भिन्न शरीर प्राप्त होता है और समय आने पर यह शरीर त्यागना होता है। यहाँ यह कहा गया है कि सूक्ष्म शरीर, जो अगले शरीर का बीज वहन करता है, अगले जीवन में दूसरा शरीर निर्माण करता है। एक शरीर से दूसरे शरीर में देहान्तरण की प्रक्रिया तथा शरीर में रहते हुए संघर्ष करने को कर्षति अर्थात् जीवन संघर्ष कहते हैं।इस श्लोक में श्री कृष्ण ने जीवन और मृत्यु के चक्र को समझाया है। यह दर्शाया गया है कि जैसे वायु गंध को ले जाती है, वैसे ही आत्मा शरीर को छोड़ने के बाद नई देह को ग्रहण करती है। यह प्रक्रिया पुनर्जन्म की ओर इशारा करती है, जहाँ आत्मा पुरानी देह को छोड़कर नई देह में प्रवेश करती है। यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि जीवन की अस्थिरता और मृत्यु के बाद आत्मा का स्थानांतरण एक निरंतर प्रक्रिया है, और यह हमें जन्म और मृत्यु के रहस्यों को समझने में मदद करता है।
15॥8॥

भगवद  गीता अध्याय: 15
श्लोक 9

श्लोक:
श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च।
 अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते॥

भावार्थ:
यह जीवात्मा श्रोत्र, चक्षु और त्वचा को तथा रसना, घ्राण और मन को आश्रय करके -अर्थात इन सबके सहारे से ही विषयों का सेवन करता है।
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण जीवात्मा की प्रकृति और उसकी संवेदनाओं के माध्यम से विषयों के अनुभव के बारे में बताते हैं।
 श्रोत्रं, चक्षुः, स्पर्शनं - ये तीन इंद्रियाँ हैं जिनके माध्यम से हम सुनते हैं, देखते हैं, और छूते हैं। ये हमारे अनुभवों के प्रारंभिक स्रोत होते हैं।
रसना, घ्राण - रसना का तात्पर्य है स्वाद की अनुभूति, और घ्राण से तात्पर्य है सुगंध की पहचान। ये इंद्रियाँ भोजन और सुगंध का अनुभव करने में सहायक होती हैं।
नोट:व्रत करने वाले के व्रत को भी यही इंद्रियाँ मान,बुद्धि,सुगंध द्वारा भोजन का अनुभव करवा कर व्रत करने वाले के व्रत को भंग कर देती है।
क्यों कि अधिष्ठाय मनश्चायं - जीवात्मा इन सभी इंद्रियों को सहारा लेकर अर्थात् इनकी सहायता से ही अपने मन और बुद्धि को इस शरीर के माध्यम से विभिन्न विषयों का अनुभव करवा ता है।
इस प्रकार, यह श्लोक हमें यह समझाता है कि हमारे इंद्रियाँ और मन किस प्रकार बाहरी संसार से प्राप्त अनुभवों का स्वाद चखते हैं। ये सभी इंद्रियाँ और मन मिलकर हमारे अनुभव को सम्पूर्णता प्रदान करते हैं और हम इनका उपयोग करके विभिन्न विषयों का सेवन करते हैं।

श्री  कृष्ण के इस विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि जीवन में हमारे अनुभवों की समग्रता इंद्रियों और मन की क्रियाओं पर निर्भर करती है।
15॥9॥

भगवद  गीता अध्याय: 15
श्लोक 10

श्लोक:
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम्‌।
 विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः॥

भावार्थ:
शरीर को छोड़कर जाते हुए को अथवा शरीर में स्थित हुए को अथवा विषयों को भोगते हुए को इस प्रकार तीनों गुणों से युक्त हुए को भी अज्ञानीजन नहीं जानते, केवल ज्ञानरूप नेत्रों वाले विवेकशील ज्ञानी ही तत्त्व से जानते हैं।
मूर्ख न तो समझ पाते हैं कि जीव किस प्रकार अपना शरीर त्याग सकता है, न ही वे यह समझ पाते हैं कि प्रकृति के गुणों के अधीन वह किस तरह के शरीर का भोग करता है। लेकिन जिसकी आँखें ज्ञान में प्रशिक्षित होती हैं, वह यह सब देख सकता है। विद्वान डॉक्टर ही बता देता है कि शरीर त्यागने वाला कितने दिनों का मेहमान है।समय तो भगवान के हाथ ही है 

तात्पर्य : ज्ञान-चक्षुषः शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। बिना ज्ञान के कोई न तो यह समझ सकता है कि जीव इस शरीर को किस प्रकार त्यागता है, न ही यह कि वह अगले जीवन में कैसा शरीर धारण करने जा रहा है, अथवा यह कि वह विशेष प्रकार के शरीर में क्यों रह रहा है। इसके लिए पर्याप्त ज्ञान की आवश्यकता होती है, जिसे प्रामाणिक गुरु से भगवद्गीता तथा अन्य ऐसे ही ग्रंथों को सुन कर समझा जा सकता है। जो इन बातों को समझने के लिए प्रशिक्षित है, वह भाग्यशाली है। प्रत्येक जीव किन्हीं परिस्थितियों में शरीर त्यागता है, जीवित रहता है और प्रकृति के अधीन होकर भोग करता है। फलस्वरूप वह इन्द्रियभोग के भ्रम में नाना प्रकार के सुख-दुःख सहता रहता है। ऐसे व्यक्ति जो काम तथा इच्छा के कारण निरन्तर मूर्ख बनते रहते हैं, अपने शरीर-परिवर्तन तथा विशेष शरीर में अपने वास को समझने की सारी शक्ति खो बैठते हैं। वे इसे नहीं समझ सकते। किन्तु जिन्हें आध्यात्मिक ज्ञान हो चुका है,
वे देख पाते हैं कि आत्मा शरीर से भिन्न है और यह अपना शरीर बदल कर विभिन्न प्रकार से भोगता रहता है। ऐसे ज्ञान से युक्त व्यक्ति समझ सकता है कि इस संसार में बद्धजीव किस प्रकार कष्ट भोग रहे हैं। अतएव जो लोग कृष्णभावनामृत में अत्यधिक आगे बढ़े हुए हैं, वे इस ज्ञान को सामान्य लोगों तक पहुँचाने में प्रयत्नशील रहते हैं, क्योंकि उनका बद्ध जीवन अत्यन्त कष्टप्रद रहता है। उन्हें इसमें से निकल कर कृष्णभावनाभावित होकर आध्यात्मिक लोक में जाने के लिए अपने को मुक्त करना होता है।

 इस लिए सच्चे ज्ञानी, जिन्होंने आत्मज्ञान प्राप्त कर लिया है, वे समझते हैं कि आत्मा न तो उत्पन्न होती है और न ही इसका विनाश होता है, यह शरीर के गुणों से परे है। वे आत्मा की अमरता और इसकी वास्तविक स्थिति को पहचानते हैं, जबकि सामान्य लोग केवल शरीर और उसकी गतिविधियों पर ही ध्यान केंद्रित करते हैं। अंत समय में भी उट पटांग ही बोलते रह जाते हैं।
इस प्रकार, इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण हमें यह सिखाते हैं कि सच्चे ज्ञान की प्राप्ति ही आत्मा के वास्तविक स्वरूप को पहचानने की कुंजी है और अज्ञान से मुक्ति की राह है।
नोट: जिसने सारी उम्र ही भगवान को नहीं भजा अंत तक गुरु जी गुरु जी ही करता रहा उसे गुरु भी अपने ही लोक तक ले जाता है जहां से उसे पुनः वापिस ही आना होता है। ब्रह्म लोक तक गया जीव वहां के सुख दुख भोग वापिस यही आता है। और भगवान को भोजने वाला शरीर त्याग भगवान को ही प्राप्त हो जाता है।
 15॥10॥

अध्याय 15 के श्लोक नंबर 11

भगवद  गीता अध्याय: 15
श्लोक 11

श्लोक:
यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम्‌।
 यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः॥

भावार्थ:
यत्न करने वाले योगीजन भी अपने हृदय में स्थित इस आत्मा को तत्त्व से जानते हैं, किन्तु जिन्होंने अपने अन्तःकरण को शुद्ध नहीं किया है, ऐसे अज्ञानीजन तो यत्न करते रहने पर भी इस आत्मा को नहीं जानते।
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण योगियों और साधकों की मनोवृत्तियों की तुलना करते हैं। यहाँ पर, दो प्रकार के साधकों का उल्लेख किया गया है:

योगियों का दृष्टिकोण: इस श्लोक में कहा गया है कि जो लोग योग और साधना में लगे हुए हैं, वे आत्मा को तत्त्व से देखते हैं और उसे अपने हृदय में स्थित मानते हैं। वे आत्मा के शुद्ध स्वरूप को पहचानते हैं, क्योंकि उन्होंने अपनी साधना के माध्यम से अपने अंतरात्मा को साफ किया है और वास्तविकता को जानने की क्षमता प्राप्त की है। उनके लिए आत्मा का दर्शन सहज और स्पष्ट होता है।
अज्ञानी व्यक्तियों का दृष्टिकोण: इसके विपरीत, वे लोग जो साधना में प्रयासरत हैं, लेकिन जिन्होंने अपने अंतःकरण को शुद्ध नहीं किया है, वे आत्मा को नहीं देख पाते। उनका ज्ञान अधूरा और अशुद्ध होता है, इसलिए वे आत्मा के असली स्वरूप को नहीं पहचान पाते। ऐसे लोग केवल बाहरी प्रयास करते हैं, परन्तु उनकी आंतरिक स्थिति सही नहीं होती, इसलिए वे आत्मा के दर्शन में असमर्थ रहते हैं।
इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण ने यह स्पष्ट किया है कि केवल बाहरी क्रियाओं और प्रयासों से आत्मा की सच्चाई का अनुभव नहीं किया जा सकता। इसके लिए अंतरात्मा की गहरी सफाई और शुद्धता आवश्यक है। योग और साधना में सफलता का आधार आत्मा की वास्तविकता को जानने की आंतरिक क्षमता पर निर्भर करता है, न कि केवल बाहरी प्रयासों पर।
👉आत्म-साक्षात्कार को प्राप्त प्रयत्नशील योगीजन यह सब स्पष्ट रूप से देख सकते हैं। लेकिन जिनके मन विकसित नहीं हैं और जो आत्म-साक्षात्कार को प्राप्त नहीं हैं, वे प्रयत्न करके भी यह नहीं देख पाते कि क्या हो रहा है।👈

तात्पर्य : अनेक योगी आत्म-साक्षात्कार के पथ पर होते हैं, लेकिन जो आत्म- साक्षात्कार को प्राप्त नहीं है, वह यह नहीं देख पाता कि जीव के शरीर में कैसे-कैसे परिवर्तन हो रहे हैं। 
इस प्रसंग में योगिनः शब्द महत्त्वपूर्ण है। आजकल ऐसे अनेक तथाकथित योगी हैं और योगियों के तथाकथित संगठन हैं, लेकिन आत्म-साक्षात्कार के मामले में खुद तो शून्य हैं। वे केवल कुछ आसनों में व्यस्त रहते हैं और यदि उनका शरीर सुगठित तथा स्वस्थ हो गया, तो वे सन्तुष्ट हो जाते हैं। उन्हें इसके अतिरिक्त कोई जानकारी नहीं रहती। 
वे यतन्तोऽप्यकृतात्मान: कहलाते हैं। यद्यपि वे तथाकथित योगपद्धति का प्रयास करते हैं, लेकिन वे स्वरूपसिद्ध नहीं हो पाते। ऐसे व्यक्ति आत्मा के देहान्तरण को नहीं समझ सकते। केवल वे ही ये सभी बातें समझ पाते हैं, जो सचमुच योग पद्धति में रमते हैं और जिन्हें आत्मा, जगत् तथा परमेश्वर की अनुभूति हो चुकी है। दूसरे शब्दों में, जो भक्तियोगी हैं, वे ही समझ सकते हैं कि किस प्रकार से सब कुछ घटित होता है।

सांस लेना रोकना और छोड़ना कोई योग नहीं होता यह क्रिया तो सवता:भी होती ही रहती है।

योग तो आत्मा को परमात्मा में जोड़ने की कला है।जो इंद्रियों को अपनी वासनाओं को रोक कर आत्मा परमात्मा में जोड़ने है।

 15॥11॥

भगवद  गीता अध्याय: 15
श्लोक 12

श्लोक:
(प्रभाव सहित परमेश्वर के स्वरूप का विषय) 
 यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम्‌।
 यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम्‌॥

भावार्थ:
सूर्य में स्थित जो तेज सम्पूर्ण जगत को प्रकाशित करता है तथा जो तेज चन्द्रमा में है और जो अग्नि में है- उसको तू मेरा ही तेज जान।
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी दिव्य शक्ति और तेज के बारे में बताया है। इस श्लोक में तीन प्रकार के तेजों का उल्लेख किया गया है:
आदित्य में स्थित तेज़: यहाँ पर सूर्य के तेज़ की बात की जा रही है, जो सम्पूर्ण जगत को प्रकाशित करता है। सूर्य का तेज़ न केवल दिन को उजागर करता है, बल्कि सम्पूर्ण पृथ्वी के जीवन के लिए आवश्यक ऊर्जा भी प्रदान करता है।
चन्द्रमा में स्थित तेज़: चन्द्रमा का प्रकाश भी जीवन के विभिन्न पहलुओं को प्रभावित करता है। यह रात के समय में प्रकाश प्रदान करता है और कई प्राकृतिक प्रक्रियाओं जैसे ज्वारीय लहरों (ज्वार भाटा)को प्रभावित करता है।
 अग्नि में स्थित तेज़: अग्नि, जिसे हम रोजमर्रा के जीवन में उपयोग करते हैं, भी एक प्रकार का तेज़ है। यह जलाने, तपाने और ऊर्जा प्रदान करने में सक्षम है।

 इन तीनों प्रकार के तेज़ों का स्रोत भगवान श्रीकृष्ण की परम शक्ति है। वे बताते हैं कि जो तेज़ सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि में दिखाई देता है, वह वास्तव में उनकी ही शक्ति है। इस प्रकार, इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण अपने दिव्य तेज़ और परम सत्ता का परिचय देते हैं और यह संकेत देते हैं कि सम्पूर्ण सृष्टि में जो भी तेज़ और प्रकाश है, वह उनकी ही शक्ति का प्रतिरूप है।

 भगवान कृष्ण ने अर्जुन को दिव्य तेज़ के बारे में बताया है।

दिव्य तेज़ का अर्थ है भगवान की दिव्य ऊर्जा या प्रकाश। यह भगवान की वह शक्ति है जो सारे ब्रह्मांड को रोशन करती है और जीवन को संचालित करती है।

 भगवान कृष्ण ने दिव्य तेज़ के बारे में निम्नलिखित बातें बताई हैं:

1. _दिव्य तेज़ की उत्पत्ति_: भगवान कृष्ण ने बताया है कि दिव्य तेज़ की उत्पत्ति उनसे ही होती है। यह उनकी दिव्य ऊर्जा है जो सारे ब्रह्मांड को रोशन करती है।

2. _दिव्य तेज़ का स्वरूप_: भगवान कृष्ण ने बताया है कि दिव्य तेज़ का स्वरूप अत्यधिक प्रकाशमय होता है। यह प्रकाश इतना तेज़ होता है कि यह सारे ब्रह्मांड को रोशन कर देता है।

3. _दिव्य तेज़ का कार्य_: भगवान कृष्ण ने बताया है कि दिव्य तेज़ का कार्य सारे ब्रह्मांड को रोशन करना और जीवन को संचालित करना है। यह तेज़ सारे जीवों को ऊर्जा और जीवन प्रदान करता है।

4. _दिव्य तेज़ का महत्व_: भगवान कृष्ण ने बताया है कि दिव्य तेज़ का महत्व अत्यधिक है। यह तेज़ सारे ब्रह्मांड को रोशन करता है और जीवन को संचालित करता है। यह तेज़ सारे जीवों को ऊर्जा और जीवन प्रदान करता है।

संक्षेप में इस प्रकार, गीता के 15वें अध्याय में भगवान कृष्ण ने दिव्य तेज़ के बारे में विस्तार से यही बताया है। यह तेज़ भगवान की दिव्य ऊर्जा है जो सारे ब्रह्मांड को रोशन करती है और जीवन को संचालित करती है।
इस का तात्पर्य : अज्ञानी मनुष्य यह नहीं समझ पाता कि यह सब कुछ कैसे घटित होता है। लेकिन भगवान् ने यहाँ पर जो कुछ बतलाया है, उसे समझ कर ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। प्रत्येक व्यक्ति सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि तथा बिजली देखता है। उसे यह समझने का प्रयास करना चाहिए कि चाहे सूर्य का तेज हो, या चन्द्रमा, अग्नि अथवा बिजली का तेज, ये सब भगवान् से ही उद्भूत हैं। कृष्णभावनामृत का प्रारम्भ इस भौतिक जगत् में बद्धजीव को उन्नति करने के लिए काफी अवसर प्रदान करता है। जीव मूलतः परमेश्वर के अंश हैं और भगवान् यहाँ पर इंगित कर रहे हैं कि जीव किस प्रकार भगवद्धाम को प्राप्त कर सकते हैं।
इस श्लोक से हम यह समझ सकते हैं कि सूर्य सम्पूर्ण सौरमण्डल को प्रकाशित कर रहा है। ब्रह्माण्ड अनेक हैं और सौरमण्डल भी अनेक हैं। सूर्य, चन्द्रमा तथा लोक भी अनेक हैं, लेकिन प्रत्येक ब्रह्माण्ड में केवल एक सूर्य है। भगवद्गीता में (१०.२१) कहा गया है कि चन्द्रमा भी एक नक्षत्र है (नक्षत्राणामहं शशी)। सूर्य का प्रकाश परमेश्वर के आध्यात्मिक आकाश में आध्यात्मिक तेज के कारण है। सूर्योदय के साथ ही मनुष्य के कार्यकलाप प्रारम्भ हो जाते हैं। वे भोजन पकाने के लिए अग्नि जलाते हैं और फैक्टरियाँ चलाने के लिए भी अग्नि जलाते हैं। अग्नि की सहायता से अनेक कार्य किये जाते हैं। अतएव सूर्योदय, अग्नि तथा चन्द्रमा की चाँदनी जीवों को अत्यन्त सुहावने लगते हैं। उनकी सहायता के बिना कोई जीव नहीं रह सकता । अतएव यदि मनुष्य यह जान ले कि सूर्य, चन्द्रमा तथा अग्नि का प्रकाश तथा तेज भगवान् श्रीकृष्ण से उद्भूत हो रहा है, तो उसमें कृष्णभावनामृत का सूत्रपात हो जाता है। चन्द्रमा के प्रकाश से सारी वनस्पतियाँ पोषित होती हैं। चन्द्रमा का प्रकाश इतना आनन्दप्रद है कि लोग सरलता से समझ सकते हैं कि वे भगवान् कृष्ण की कृपा से ही जी रहे हैं। उनकी कृपा के बिना न तो सूर्य होगा, न चन्द्रमा, न अग्नि और सूर्य, चन्द्रमा तथा अग्नि के बिना हमारा जीवित रहना असम्भव है। बद्धजीव में कृष्णभावनामृत जगाने वाले ये ही कतिपय विचार हैं।

सबको प्रकाशित करनेवाली अग्नि, सूर्य आदि ज्योतियां भी किस परमपदको प्रकाशित नहीं कर सकतीं जिस परमपदको को प्राप्त हुए मुमुक्षुजन फिर दुनिया की ओर नहीं आते जैसे घट आदिके आकाश महाकाशके अंश हैं वैसे ही डिग्रीजनित भेदसे विभिन्न हुए जीव जिस परमपदके (कल्पितभावसे) के अंश हैं वह परमपदका सर्वतत्व और सर्व व्यवहार का आधारत्व बतलाने की इच्छा से भगवान के चार श्लोकों द्वारा संक्षिप्तसे विभूतियों का वर्णन किया गया है--जो तेजदीप्ति प्रकाश सूर्यमें स्थित हुआ अर्थात् सूर्यके सशक्त हुआ समस्त जगत को प्रकाशित करता है जो प्रकाश करने वाला तेज शशाक--चंद्रमा में स्थित है और जो अग्नि में भी वर्तमान है उस तेज को तू मुझे विष्णु की अपनी ही ज्योति रूप समझ। या जो तेज अर्थात चैतन्यमय ज्योति सूर्य कहाँ स्थित है? तथा चन्द्रमा एवं अग्नि कहाँ स्थित है? 
उस तेजको तू मुझे विष्णुकी स्वकीय (चेतनमयी) ज्योति समझ।  वह चेतनमयी ज्योति तो चराचर सभी लोको  में समान भाव कहाँ स्थित है फिर यह कैसे बताएं कि कौन तेज सूर्य में स्थित है इत्यादि। --सत्त्व--स्वच्छताकी अधिकतासे उनमें अधिकता संभाव्य होने के कारण यह दोष नहीं है क्योंकि सूर्य आदिमें सत्त्वअत्यन्त प्रकाश अत्यधिकस्वच्छता है मूलतः उनमें ब्रह्मज्योति परम प्रत्यक्ष प्रतिभा विद्यमान है किस कारण से उस की बैटरी बदल गयी है। यह बात नहीं है कि कहीं कुछ बह्मज्योति अधिक है। जैसे दुनिया में देखा गया है कि समान भाव से सम्मुख सामने स्थित होने पर भी काष्ठ या आकृति आदि में मुख का प्रति बिम्ब नहीं दिखता पर दर्पण आदि पदार्थ जो सहजता से स्वच्छ और स्वच्छतर होता है वही तारतम्यसे स्वच्छ और स्वच्छंदतार दिखता है वैसे ही (इस विषय में भी समझो)।
15॥12॥
भगवद  गीता अध्याय: 15
श्लोक 13

श्लोक:
गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा।
 पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः॥

भावार्थ:
और मैं ही पृथ्वी में प्रवेश करके अपनी शक्ति से सब भूतों को धारण करता हूँ और रस स्वरूप अर्थात अमृत मय चन्द्रमा होकर सम्पूर्ण ओषधियों को अर्थात वनस्पतियों को पुष्ट करता हूँ
 
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने बताया है कि कैसे वे सृष्टि के प्रत्येक अंग में अपनी शक्ति का प्रवाह बनाए रखते हैं।

गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा:

यहाँ भगवान कहते हैं कि वे पृथ्वी (गाम) में प्रवेश करके सभी जीवों (भूतानि) को अपनी शक्ति (ओजस) से धारण करते हैं। इसका अर्थ है कि भगवान पृथ्वी में व्याप्त होते हैं और वहां के प्रत्येक जीव और वस्तु को अपने दिव्य शक्ति से संजीवनी प्रदान करते हैं।

पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे चंद्रमा (सोम) के रूप में बनकर सभी वनस्पतियों (ओषधि) को पोषित (पुष्ट) करते हैं। चंद्रमा का रस (रसायन) वनस्पतियों के लिए आवश्यक नमी और पोषण का स्रोत है, जिससे वे फल-फूलते हैं और जीवन में वृद्धि होती है।
इस प्रकार, श्लोक यह स्पष्ट करता है कि भगवान श्रीकृष्ण सृष्टि के प्रत्येक भाग में अपनी उपस्थिति और ऊर्जा बनाए रखते हैं, जिससे सृष्टि का सम्पूर्ण तंत्र सही तरीके से चलता है और जीवन में संतुलन बना रहता है।

15॥13॥

भगवद  गीता अध्याय: 15
श्लोक 14

श्लोक:
अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः।
 प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम्‌॥

भावार्थ:
मैं ही सब प्राणियों के शरीर में स्थित रहने वाला प्राण और अपान से संयुक्त वैश्वानर अग्नि रूप होकर चार 
(भक्ष्य, भोज्य, लेह्य और चोष्य, ऐसे चार प्रकार के अन्न होते हैं, उनमें जो चबाकर खाया जाता है, वह 'भक्ष्य' है- जैसे रोटी आदि। जो निगला जाता है, वह 'भोज्य' है- जैसे दूध आदि तथा जो चाटा जाता है, वह 'लेह्य' है- जैसे चटनी आदि और जो चूसा जाता है, वह 'चोष्य' है- जैसे ईख आदि) 

प्रकार के अन्न को पचाता हूँ
 
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अपने दिव्य स्वरूप का वर्णन कर रहे हैं। वे कहते हैं कि वे स्वयं वैश्वानर अग्नि के रूप में सभी प्राणियों के शरीर में स्थित होते हैं। वैश्वानर अग्नि शरीर के भीतर पाचन क्रिया का कार्य करती है। यह अग्नि प्राण और अपान वायु से मिलकर काम करती है, जो शरीर के भीतर अन्न के पाचन में मदद करती है।
वैश्वानर अग्नि एक प्रकार की आध्यात्मिक अग्नि है जो हमारे भीतर स्थित होती है। यह अग्नि हमारे शरीर के भीतर स्थित होती है और हमारे जीवन को संचालित करने में मदद करती है।

वैश्वानर अग्नि को अक्सर जठराग्नि के रूप में भी जाना जाता है, जो हमारे पेट में स्थित होती है और हमारे भोजन को पचाने में मदद करती है। लेकिन वैश्वानर अग्नि का अर्थ केवल जठराग्नि से ही नहीं है, बल्कि यह हमारे भीतर स्थित एक आध्यात्मिक शक्ति है जो हमारे जीवन को संचालित करने में मदद करती है।

वैश्वानर अग्नि के कुछ प्रमुख कार्य हैं:

1. _भोजन को पचाना_: वैश्वानर अग्नि हमारे भोजन को पचाने में मदद करती है।
2. _शरीर को ऊर्जा प्रदान करना_: वैश्वानर अग्नि हमारे शरीर को ऊर्जा प्रदान करती है।
3. _मन को शुद्ध करना_: वैश्वानर अग्नि हमारे मन को शुद्ध करने में मदद करती है।
4. _आध्यात्मिक विकास में मदद करना_: वैश्वानर अग्नि हमारे आध्यात्मिक विकास में मदद करती है।

वैश्वानर अग्नि को जागृत करने के लिए, हमें निम्नलिखित कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए:

1. _स्वस्थ भोजन_: हमें स्वस्थ भोजन खाना चाहिए जो हमारे शरीर को ऊर्जा प्रदान करे।
2. _नियमित व्यायाम_: हमें नियमित व्यायाम करना चाहिए जो हमारे शरीर को मजबूत बनाए।
3. _ध्यान खाना खाते हुए पहले भगवान को भोग लगवा कर ही ग्रहण करे। नमस्कार करके भोजन ग्रहण करे
4. _आध्यात्मिक अभ्यास_: हमें आध्यात्मिक अभ्यास करना चाहिए जो हमारे आध्यात्मिक शक्ति को बढ़ाने के लिए आप आओ प्रभु मेरे साथ भोजन ग्रहण करें।

अर्थात:  आध्यात्मिक अभ्यास करने के लिए, हमें अपने दैनिक जीवन में कुछ आध्यात्मिक गतिविधियों को शामिल करना चाहिए। यहाँ कुछ और सुझाव दिए जा सकते हैं:

आध्यात्मिक अभ्यास के लिए सुझाव
1. *प्रार्थना और ध्यान*: अपने दिन की शुरुआत प्रार्थना और ध्यान से करें। इससे आपको अपने दिन की शुरुआत सकारात्मक और आध्यात्मिक तरीके से करने में मदद मिलेगी।
2. *आत्म-चिंतन*: अपने दिन के अंत में आत्म-चिंतन करें। इससे आपको अपने दिन की गतिविधियों का मूल्यांकन करने और अपने जीवन में सुधार करने में मदद मिलेगी।
3. *आध्यात्मिक पुस्तकें पढ़ना*: आध्यात्मिक पुस्तकें पढ़ने से आपको अपने आध्यात्मिक ज्ञान को बढ़ाने में मदद मिलेगी।
4. *आध्यात्मिक संगीत सुनना*: आध्यात्मिक संगीत सुनने से आपको अपने मन को शांत और आध्यात्मिक तरीके से जोड़ने में मदद मिलेगी।
5. *प्रभु के साथ संवाद करना*: प्रभु के साथ संवाद करने से आपको अपने आध्यात्मिक जीवन में गहराई और अर्थ प्राप्त करने में मदद मिलेगी। जैसा कि  कहा, "प्रभु मेरे साथ भोजन ग्रहण करें।"
भक्ष्य - जो अन्न चबाकर खाया जाता है, जैसे रोटी।
भोज्य - जो निगला जाता है, जैसे दूध।
लेह्य - जो चाटा जाता है, जैसे चटनी।
चोष्य - जो चूसा जाता है, जैसे ईख।
इस प्रकार, भगवान श्रीकृष्ण यह स्पष्ट कर रहे हैं कि वे ही संपूर्ण पाचन क्रिया के आधार हैं और अन्न के चार प्रकारों को पचाने में मदद करते हैं। यह श्लोक यह भी दर्शाता है कि भगवान की उपस्थिति और क्रियाएँ हर जीव में व्याप्त हैं और उनके बिना कोई भी पाचन प्रक्रिया पूर्ण नहीं हो सकती।

15॥14॥

भगवद  गीता अध्याय: 15
श्लोक 15

श्लोक:
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टोमत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च।
 वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्योवेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्‌॥

भावार्थ:
मैं ही सब प्राणियों के हृदय में अन्तर्यामी रूप से स्थित हूँ तथा मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और अपोहन

 (विचार द्वारा बुद्धि में रहने वाले संशय, विपर्यय आदि दोषों को हटाने का नाम 'अपोहन' )
 होता है और सब वेदों द्वारा मैं ही जानने योग्य 
(सर्व वेदों का तात्पर्य परमेश्वर को जानने का है, इसलिए सब वेदों द्वारा 'जानने के योग्य' एक परमेश्वर ही है) 

हूँ तथा वेदान्त का कर्ता और वेदों को जानने वाला भी मैं ही हूँ
 
गुरु से भी उत्तम गुरु भगवान खुद ही हैं 

"मैं सभी जीवों के हृदय में, अन्तर्यामी रूप में स्थित हूँ। मेरी ही उपस्थिति से सभी को स्मृति (याद रखने की शक्ति), ज्ञान (सच्चा ज्ञान) और अपोहन (बुद्धि में रहने वाले दोषों का नाश) प्राप्त होता है। अर्थात्, यह सब मेरे द्वारा ही संभव होता है। सभी वेदों द्वारा मैं ही जानने योग्य हूँ, क्योंकि वेदों का परम उद्देश्य मुझे जानना है। मैं वेदान्त (वेदों का अंतिम भाग) का निर्माता और वेदों को जानने वाला भी हूँ।"
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने यह स्पष्ट किया है कि वे सभी प्राणियों के हृदय में स्थित हैं और वे ही स्मृति, ज्ञान और अपोहन के स्रोत हैं। इसके अलावा, वेदों का ज्ञान भी भगवान श्रीकृष्ण पर ही आधारित है, और वेदांत का निर्माता भी वही हैं। यह श्लोक भगवान की सम्पूर्णता और उनकी सार्वभौमिकता को दर्शाता है, जो सभी विद्या और ज्ञान का स्रोत हैं।
15॥15॥

भगवद  गीता अध्याय: 15
श्लोक 16

श्लोक:
(क्षर, अक्षर, पुरुषोत्तम का विषय) 
 द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च।
 क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते॥

भावार्थ:
इस संसार में नाशवान और अविनाशी भी ये दो प्रकार

 (गीता अध्याय 7 श्लोक 4-5 में जो अपरा और परा प्रकृति के नाम से कहे गए हैं तथा अध्याय 13 श्लोक 1 में जो क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के नाम से कहे गए हैं, उन्हीं दोनों का यहाँ क्षर और अक्षर के नाम से वर्णन किया है) 

के पुरुष हैं। इनमें सम्पूर्ण भूतप्राणियों के शरीर तो नाशवान और जीवात्मा अविनाशी कहा जाता है
 
क्षर पुरुष: यह संसार के भौतिक रूप से संबंधित है, जो नाशवान है। इसका मतलब है कि यह सब भौतिक तत्व, प्राणी, और उनके शरीर (शरीर के सभी हिस्से, जीवित और निर्जीव) अस्थायी और बदलने वाले होते हैं। जैसे कि यह दुनिया, हमारे शरीर, और सभी भौतिक वस्तुएं समय के साथ बदलती हैं या नष्ट हो जाती हैं।

अक्षर पुरुष: यह जीवात्मा (आत्मा) का स्वरूप है, जो अविनाशी और शाश्वत होता है। अक्षर पुरुष का मतलब है कि आत्मा, जो कि हमारे वास्तविक स्वभाव का प्रतिनिधित्व करती है, नाशवान नहीं होती। यह स्थायी और अमर है, और इसका अस्तित्व सदा रहता है।

इन दोनों पुरुषों के बीच का अंतर इस बात को दर्शाता है कि भौतिक संसार और आत्मा (आध्यात्मिक संसार) के गुण और स्वभाव बिल्कुल भिन्न होते हैं। भौतिक संसार क्षणिक और परिवर्तनशील है, जबकि आत्मा स्थायी और शाश्वत है।
इस प्रकार, यह श्लोक हमें समझाता है कि संसार में जो कुछ भी भौतिक है, वह अस्थायी है और जो कुछ भी आत्मा का हिस्सा है, वह शाश्वत है। इस तरह, हमें समझना चाहिए कि हम कौन हैं और इस भौतिक संसार की अस्थिरता से परे हमारी वास्तविक पहचान क्या है।
15॥16॥

भगवद  गीता अध्याय: 15
श्लोक 17

श्लोक:
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः।
 यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः॥

भावार्थ:
इन दोनों से उत्तम पुरुष तो अन्य ही है, जो तीनों लोकों में प्रवेश करके सबका धारण-पोषण करता है एवं अविनाशी परमेश्वर और परमात्मा- इस प्रकार कहा गया है।
श्लोक का संदेश: श्रीकृष्ण यहाँ यह स्पष्ट कर रहे हैं कि "उत्तम पुरुष" केवल एक ही है, जो सभी ब्रह्मांडों में व्याप्त है और सभी जीवों का पालन करता है। यह वह परमेश्वर है जो सृष्टि के सभी प्रपंचों से परे है और इसका अस्तित्व कभी समाप्त नहीं होता।
 15॥17॥

भगवद  गीता अध्याय: 15
श्लोक 18

श्लोक:
यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः।
 अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः॥

भावार्थ:
क्योंकि मैं नाशवान जड़वर्ग- क्षेत्र से तो सर्वथा अतीत हूँ और अविनाशी जीवात्मा से भी उत्तम हूँ, इसलिए लोक में और वेद में भी पुरुषोत्तम नाम से प्रसिद्ध हूँ
 
यहां इस प्रकार, भगवान श्रीकृष्ण यह घोषणा कर रहे हैं कि वे संसार और वेदों में ‘पुरुषोत्तम’ अर्थात् सर्वोत्तम पुरुष के रूप में प्रसिद्ध हैं।
इस श्लोक के माध्यम से श्रीकृष्ण यह स्पष्ट करते हैं कि वे न केवल भौतिक संसार की सीमाओं से परे हैं बल्कि आत्मा और परमात्मा के भी पार हैं। वे सम्पूर्ण सृष्टि के सबसे सर्वोच्च तत्व हैं।
15॥18॥
भगवद  गीता अध्याय: 15
श्लोक 19

श्लोक:
यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम्‌।
 स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत॥

भावार्थ:
भारत! जो ज्ञानी पुरुष मुझको इस प्रकार तत्त्व से पुरुषोत्तम जानता है, वह सर्वज्ञ पुरुष सब प्रकार से निरन्तर मुझ वासुदेव परमेश्वर को ही भजता है
 15॥19॥

भगवद  गीता अध्याय: 15
श्लोक 20

श्लोक:
इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ।
 एतद्‍बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत॥

भावार्थ:
हे निष्पाप अर्जुन! इस प्रकार यह अति रहस्ययुक्त गोपनीय शास्त्र मेरे द्वारा कहा गया, इसको तत्त्व से जानकर मनुष्य ज्ञानवान और कृतार्थ हो जाता है
 15॥20॥ 
 
 ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन संवादे पुरुषोत्तमयोगो नाम पञ्चदशोऽध्यायः 
 ॥15॥

बुधवार, 11 दिसंबर 2024

अध्याय 14

✍️भगवद गीता अध्याय 14🪔 जैसा मैने जाना📚🕯️
॥ अथ चतुर्दशोऽध्यायः ~ गुणत्रयविभागयोग ॥
(ज्ञान की महिमा और प्रकृति-पुरुष से जगत्‌ की उत्पत्ति) 

भगवद  गीता अध्याय: 14
श्लोक 1

श्लोक:
(ज्ञान की महिमा और प्रकृति-पुरुष से जगत्‌ की उत्पत्ति) 
 श्रीभगवानुवाच परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानं मानमुत्तमम्‌। 
 यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः॥

भावार्थ:
श्री भगवान बोले- ज्ञानों में भी अतिउत्तम उस परम ज्ञान को मैं फिर कहूँगा, जिसको जानकर सब मुनिजन इस संसार से मुक्त होकर परम सिद्धि को प्राप्त हो गए हैं
 इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए सबसे श्रेष्ठ ज्ञान की महिमा का वर्णन कर रहे हैं। वे कह रहे हैं कि वे अब एक विशेष प्रकार के ज्ञान के बारे में बताने वाले हैं, जो सभी ज्ञानों में सर्वोत्तम है। इस परम ज्ञान को जानकर मुनियों ने संसार के बंधनों से मुक्ति प्राप्त की और सर्वोच्च सिद्धि को प्राप्त किया।
यह श्लोक इस बात को स्पष्ट करता है कि ज्ञान की विभिन्न शाखाओं में कुछ ज्ञान ऐसा भी होता है, जो विशेष रूप से महत्वपूर्ण और उच्चतर होता है। यह परम ज्ञान है, जो आत्मा और ब्रह्मा के वास्तविक स्वरूप को समझने में सहायक होता है। इस ज्ञान को प्राप्त करने पर व्यक्ति सांसारिक बंधनों से मुक्त हो जाता है और दिव्य स्थिति को प्राप्त करता है।
इस प्रकार, यह श्लोक ज्ञान के महत्व को दर्शाता है और बताता है कि सही ज्ञान के माध्यम से ही व्यक्ति जीवन के सबसे ऊँचे लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है।

वैसे तो योगेश्वर श्रीकृष्ण ने गीता के विभिन्न अध्यायों में ज्ञान का स्वरूप स्पष्ट किया है। यहाँ कुछ अध्यायों का उल्लेख किया गया है जहाँ श्रीकृष्ण ने ज्ञान का स्वरूप स्पष्ट किया है:

गीता अध्याय 2: इस अध्याय में श्रीकृष्ण ने आत्मा की अमरता और ज्ञान के महत्व के बारे में बताया है।

गीता अध्याय 4: इस अध्याय में श्रीकृष्ण ने ज्ञान-योग के बारे में बताया है, जिसमें उन्होंने ज्ञान के महत्व और इसके प्राप्त करने के तरीकों के बारे में बताया है।

गीता अध्याय 7: इस अध्याय में श्रीकृष्ण ने ज्ञान के स्वरूप के बारे में बताया है, जिसमें उन्होंने ज्ञान को दो प्रकार का बताया है: अपरा विद्या और परा विद्या।

गीता अध्याय 13: इस अध्याय में श्रीकृष्ण ने क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के बारे में बताया है, जिसमें उन्होंने ज्ञान के स्वरूप के बारे में बताया है।

गीता अध्याय 15: इस अध्याय में श्रीकृष्ण ने पुरुषोत्तम के बारे में बताया है, जिसमें उन्होंने ज्ञान के स्वरूप के बारे में बताया है।
गीता के लगभग सभी अध्यायों में श्रीकृष्ण ने ज्ञान के स्वरूप के बारे में बताया है। यहाँ कुछ और अध्यायों का उल्लेख किया गया है जहाँ श्रीकृष्ण ने ज्ञान के स्वरूप के बारे में बताया है:

गीता अध्याय 3: इस अध्याय में श्रीकृष्ण ने कर्मयोग के बारे में बताया है, जिसमें उन्होंने ज्ञान के महत्व और इसके प्राप्त करने के तरीकों के बारे में बताया है।

गीता अध्याय 5: इस अध्याय में श्रीकृष्ण ने कर्मयोग और ज्ञानयोग के बारे में बताया है, जिसमें उन्होंने ज्ञान के स्वरूप के बारे में बताया है।

गीता अध्याय 6: इस अध्याय में श्रीकृष्ण ने ध्यानयोग के बारे में बताया है, जिसमें उन्होंने ज्ञान के स्वरूप के बारे में बताया है।

गीता अध्याय 8: इस अध्याय में श्रीकृष्ण ने अक्षर ब्रह्म के बारे में बताया है, जिसमें उन्होंने ज्ञान के स्वरूप के बारे में बताया है।

गीता अध्याय 9: इस अध्याय में श्रीकृष्ण ने राजविद्या के बारे में बताया है, जिसमें उन्होंने ज्ञान के स्वरूप के बारे में बताया है।

गीता अध्याय 10: इस अध्याय में श्रीकृष्ण ने विभूतियोग के बारे में बताया है, जिसमें उन्होंने ज्ञान के स्वरूप के बारे में बताया है।

गीता अध्याय 11: इस अध्याय में श्रीकृष्ण ने विश्वरूप के बारे में बताया है, जिसमें उन्होंने ज्ञान के स्वरूप के बारे में बताया है।

गीता अध्याय 12: इस अध्याय में श्रीकृष्ण ने भक्तियोग के बारे में बताया है, जिसमें उन्होंने ज्ञान के स्वरूप के बारे में बताया है।

गीता अध्याय 13-18: इन अध्यायों में श्रीकृष्ण ने ज्ञान के स्वरूप के बारे में बताया है, जिसमें उन्होंने क्षेत्र, क्षेत्रज्ञ, पुरुष, प्रकृति, और अन्य विषयों के बारे में ही बताया है।

पर इस गीता अध्याय 14 में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने तीन गुणों के बारे में विस्तार से बताया है, जो कि सत्व, रज और तम हैं। उन्होंने बताया है कि ये तीन गुण प्रकृति के तीन मुख्य पहलू हैं, और ये हमारे व्यक्तित्व, विचारों और कार्यों को प्रभावित करते हैं।

श्रीकृष्ण ने बताया है कि सत्व गुण से जुड़े व्यक्ति शुद्ध, सात्विक और ज्ञानी होते हैं। रज गुण से जुड़े व्यक्ति सक्रिय, उत्साही और भावुक होते हैं। तम गुण से जुड़े व्यक्ति आलसी, अज्ञानी और विकारी होते हैं।

उन्होंने यह भी बताया है कि जो व्यक्ति इन तीन गुणों से परे होते हैं, वे मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं। उन्होंने यह भी बताया है कि जो व्यक्ति सत्व गुण को बढ़ावा देते हैं, वे ज्ञान और शांति प्राप्त कर लेते हैं।

इस प्रकार, गीता अध्याय 14 में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने तीन गुणों के बारे में विस्तार से बताया है, और यह बताया है कि कैसे हम इन गुणों को समझकर और उन्हें नियंत्रित करके मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं।

वैसे तो सभी अध्यायों में श्रीकृष्ण परम सत्य भगवान के विषय में विस्तार से बताया गया है। अब भगवान स्वयं अर्जुन को और आगे ज्ञान दे रहे हैं। यदि कोई इस अध्याय को ईश्वरीय चिंतन द्वारा भलीभांति समझ ले तो उसे भक्ति का ज्ञान हो जाएगा। त्रैवेन चैप्टर में यह स्पष्ट रूप से बताया गया है कि विनीडेंस ज्ञान का विकास करने से भावबंधन से छूट मिल सकती है। इसमें यह भी बताया गया है कि प्रकृति के गुणों की स्थिरता ही जीव को इस भौतिक जगत में स्थापित करती है। अब इस अध्याय में भगवान स्वयं बताते हैं कि वे प्रकृति के गुण कौन-कौन से हैं, वे किस प्रकार क्रिया करते हैं, किस प्रकार छोड़ते हैं और किस प्रकार मोक्ष प्रदान करते हैं। इस अध्याय में जिस ज्ञान का प्रकाश किया गया है, उसे अन्य पिछले अध्यायों में दिए गए ज्ञान से श्रेष्ठ बताया गया है। इस ज्ञान को प्राप्त करके अनेक मुनियों ने सिद्धि प्राप्त की और वे वैकुण्ठलोक के भागी हुए। अब भगवान उसी ज्ञान को और अच्छे से बताए जा रहे हैं। अभी तक बताया गया यह ज्ञान संपूर्ण ज्ञानयोग से कहीं अधिक श्रेष्ठ है और इसे ग्रहण करने पर कई लोगों को सिद्धि प्राप्त हुई है। मूलतः यह आशा की जाती है कि जो भी इस अध्याय को समझेगा उसे सिद्धि प्राप्त होगी।

तत्त्वज्ञानी पुरुषोंने सौ संचित, वर्तमान और प्रारब्धके भेदसे कर्मकी तीन मन गतियाँ बतलायी हैं। अनेक जन्मोंसे संचय किये हुए पुराने कर्मको 'संचित' कर्म कहते हैं। फिर कर्म भी - ? तीन प्रकारके होते हैं- सात्त्विक, राजस और तामस ।
सत्य पूर्वक किए गए अच्छे या बुरे कर्म वर्तमान जन्म में पुण्य और पाप के रूप में सामने आते हैं। उन्हें तो भोगना ही भोगना है - शास्त्रों में भोगना एक बात है। प्रत्येक जन्म में बद्ध कर्मों का संचय रहता है। जो कर्म क्रियाशील है, उसे 'वर्तमान' कर्म कहते हैं। देहधारी प्राणी अच्छे या बुरे के रूप में कर्म करने लगते हैं। शरीर धारण करने पर वे काल की प्रेरणा से क्रमानुसार कर्म करने लगते हैं। प्रारब्धकर्म ने सीताफल की स्थापना की, जिसका फल भोगने के बाद कुछ शेष नहीं रहता। इसमें संदेह नहीं कि प्रारब्धकर्म में भाग लेना ही है। यह तो निश्चित है कि पूर्वजन्म में प्राप्त अच्छे और बुरे कर्मों का फल वर्तमान जन्म में सामने आता है। उन्हें भोगना आवश्यक हो जाता है।  मनुष्य, देवता, यक्ष, राक्षस, गंधर्व और किन्नर, सभी कर्म के भोग में एक समान सम्मिलित हैं। कर्म ही शरीर धारण करने का मुख्य कारण भी है। जब कर्म पूर्णतया समाप्त हो जाते हैं, किन्तु भूलों का जन्म चक्र समाप्त हो जाता है - इस विषय में तनिक भी संदेह नहीं होना चाहिए।  इन्द्र आदि देवता, दैत्य, यक्ष, गंधर्व - ये सभी कर्म के अधीन हैं। जीवात्मा को जीवन में जो सुख-दुःख भोगने पड़ते हैं, वे पूर्वजन्म के कर्मजन्य प्रारब्ध के कारण ही होते हैं। इससे सिद्ध होता है कि अनेक जन्मों से सम्बन्धित कर्म पंजीकृत हैं, जिनमें से प्रत्येक किसी निश्चित समय पर कर्म-काल से पहले आ चुका है। यही नियम देवताओं पर भी लागू होता है। उन्हें भी प्रारब्ध के समान नियम का फल तो भोगना ही पड़ता है। और मुक्ति ज्ञान से ही संभव है यह भी सत्य है।
14॥1॥
भगवद  गीता अध्याय: 14
श्लोक 2

श्लोक:
इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः। 
 सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च॥

भावार्थ:
इस ज्ञान को आश्रय करके अर्थात धारण करके मेरे स्वरूप को प्राप्त हुए पुरुष सृष्टि के आदि में पुनः उत्पन्न नहीं होते और प्रलयकाल में भी व्याकुल नहीं होते
 इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि जो व्यक्ति इस ज्ञान को आश्रय करता है और इसे धारण करता है, वह मेरे स्वरूप को प्राप्त हो जाता है। ऐसे व्यक्ति सृष्टि के प्रारंभ में जब प्रलय के बाद इस सृष्टि का आरंभ होता है तब ज्ञान का आश्रय लेने वाले जो पुनः जन्म नहीं लेते और प्रलय के समय भी वे परेशान नहीं होते।
यह ज्ञान उस शाश्वत सत्य और आत्मा की पहचान से संबंधित है जो आत्मा को इस संसार के भ्रम और परिवर्तन से परे ले जाता है। जब कोई व्यक्ति इस ज्ञान को अपनाता है, तो वह आत्मा की अमरता और परम सत्य को समझता है, जिससे वह जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाता है।

नोट:आज के बीजे कर्म का फल तब प्राप्त होता है

इस प्रकार, इस ज्ञान के माध्यम से व्यक्ति को न तो सृष्टि के आरंभ में पुनर्जन्म का सामना करना पड़ता है और न ही प्रलय के समय चिंता का अनुभव होता है। यह ज्ञान आत्मा की स्थिरता और शाश्वतता की अनुभूति कराता है, जो कि वास्तविक मुक्ति की ओर ले जाता है।

यानी पूर्ण दिव्य ज्ञान प्राप्त करने के बाद मनुष्य भगवान से गुणात्मक समता प्राप्त कर लेता है और जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है । परन्तु जीवात्मा के रूप में उसका स्वरूप समाप्त नहीं होता। वैदिक धर्मग्रंथों से ज्ञात होता है कि जो मुक्तात्मा वैकुंठ जगत में पहुँचे हैं, वे पवित्र भगवान के चरणकमलों के दर्शन करते हैं, उनकी दिव्य प्रेमाभक्ति में रहते हैं। अतावे मुक्ति के बाद भी समर्थकों का अपना निजी स्वरूप समाप्त नहीं हुआ।
सामान्यतः इस संसार में हम जो भी ज्ञान प्राप्त करते हैं, वह प्रकृति के तीन गुणधर्मों द्वारा संचित रहता है। जो ज्ञान इन समष्टिगत से नहीं होता, वह दिव्य ज्ञान पत्र है। जब किसी व्यक्ति को यह दिव्य ज्ञान प्राप्त होता है, तो वह परमपुरुष के समकक्ष पद तक पहुंच जाता है। जिन लोगों को चिन्मय आकाश का ज्ञान नहीं है, वे मानते हैं कि भौतिक स्वरूपों की कार्यकलापों से मुक्त होने पर यह आध्यात्मिक पहचान बिना किसी विविधता के निराकार हो जाती है। लेकिन जिस प्रकार इस संसार में विविधता है, वही प्रकार आध्यात्मिक जगत में भी है। जो लोग इससे परिचित नहीं हैं, वे सोचते हैं कि आध्यात्मिक जगत इस भौतिक जगत की विविधता से प्रमाणित है। लेकिन वास्तव में ऐसा होता है कि आध्यात्मिक जगत (चिन्मय आकाश) में मनुष्य को आध्यात्मिक रूप प्राप्त होता है। वहां के सभी कार्यकलाप आध्यात्मिक होते हैं और यह आध्यात्मिक स्थिति भक्तिमय जीवन कहलाती है। यह पर्यावरण अदूषित होता है और यहां व्यक्ति विशेष की दृष्टि से भगवान के समकक्ष होता है। ऐसा ज्ञान प्राप्त करने से मनुष्य में समस्त आध्यात्मिक गुण उत्पन्न होते हैं। जो इस प्रकार से आध्यात्मिक गुण उत्पन्न करता है, वह भौतिक जगत के सृजन या उसके विनाश से प्रभावित नहीं होता है।
14॥2॥

भगवद  गीता अध्याय: 14
श्लोक 3

श्लोक:
मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम्‌। 
 सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत॥

भावार्थ:
हे अर्जुन! मेरी महत्‌-ब्रह्मरूप मूल-प्रकृति सम्पूर्ण भूतों की योनि है अर्थात गर्भाधान का स्थान है और मैं उस योनि में चेतन समुदायरूप गर्भ को स्थापन करता हूँ। उस जड़-चेतन के संयोग से सब भूतों की उत्पति होती है
 
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रजस और तमस) के बारे में विस्तृत रूप से वर्णन कर रहे हैं। इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण यह बता रहे हैं कि मेरी महत्-ब्रह्मरूप मौलिक प्रकृति (प्रकृति की मूलस्वरूप) ही सभी जीवों की उत्पत्ति की जननी है। इस महत्-ब्रह्मरूप प्रकृति में मैं एक चेतन तत्व रूपी गर्भ को स्थापित करता हूँ।
यह गर्भ प्रकृति और चेतना के संयोग से संपूर्ण जीवों की उत्पत्ति होती है। यहाँ 'महत्-ब्रह्म' से तात्पर्य उस मूल प्रकृति से है जिसमें सभी जीवों और वस्तुओं का विकास और उत्पत्ति होती है। भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक के माध्यम से यह स्पष्ट कर रहे हैं कि सृष्टि की मूल प्रकृति में ही सारे जीवों की उत्पत्ति का कारण है और यह गर्भ उस उत्पत्ति की प्रक्रिया का आधार है।
इस प्रकार, यह श्लोक हमें बताता है कि सृष्टि की उत्पत्ति और विकास में भगवान की महत्-ब्रह्मरूप प्रकृति की महत्वपूर्ण भूमिका है और इस प्रकृति में भगवान स्वयं एक विशेष रूप से क्रियाशील होते हैं।
इस समग्र भौतिक वस्तु को ब्रह्म कहा गया है- तस्मादेतद् ब्रह्म नामरूपमन्नं च जायते। परमपुरुष वह ब्रह्म को पवित्र के कण के साथ गर्भस्थ करता है। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु आदि चौबीस तत्त्व भौतिक शक्तियाँ हैं और वे ब्रह्म अर्थात् भौतिक प्रकृति के अव्यय हैं। जैसा कि उस अध्याय के अध्याय में बताया गया है कि इससे एक और प्रकृति-जीव-जैसी होती है। भगवान की इच्छा से यह परा- प्रकृति भौतिक (अपरा) प्रकृति में मिलती है, जिसके बाद इस भौतिक प्रकृति से सभी जीव उत्पन्न होते हैं।
बिच्छू अपने अंडा धान के ढेरों में देता है और कभी-कभी यह कहा जाता है कि बिच्छू धान पैदा हुआ है। लेकिन धान बिच्छू के जन्म का कारण नहीं। असल में अंडा माता बिच्छू नीचे दिए गए थे। इस प्रकार भौतिक प्रकृति नाटकों के जन्म का कारण नहीं है। बीज भगवान प्रदत्त होते हैं और वे प्रकृति से उत्पन्न होते हैं। इसी प्रकार प्रत्येक जीव को अपने पूर्वकर्मों के अनुसार भिन्न-भिन्न शरीर प्राप्त होता है, जो यह भौतिक प्रकृति निर्मित होता है, जिस कारण जीव अपने पूर्वकर्मों के अनुसार सुख या दुःख भोगता है। यह भौतिक जगत् के एकमात्र आश्चर्य के कारण भगवान हैं।

14॥3॥

भगवद  गीता अध्याय: 14
श्लोक 4

श्लोक:
सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः। 
 तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता॥

भावार्थ:
हे अर्जुन! नाना प्रकार की सब योनियों में जितनी मूर्तियाँ अर्थात शरीरधारी प्राणी उत्पन्न होते हैं, प्रकृति तो उन सबकी गर्भधारण करने वाली माता है और मैं बीज को स्थापन करने वाला पिता हूँ
 
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को यह समझा रहे हैं कि इस संसार में सभी जीवों की उत्पत्ति प्रकृति के माध्यम से होती है। यहाँ 'प्रकृति' का तात्पर्य सृष्टि के तीन गुण—सत्त्व, रजस, और तमस—से है, जो सभी प्राणियों के जन्म और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
प्रकृति इन गुणों के माध्यम से सभी जीवों की "माता" के रूप में कार्य करती है, क्योंकि यह जीवों के शरीर और उनकी आवश्यकताओं को संजोने का कार्य करती है। वहीं, भगवान श्रीकृष्ण 'बीजप्रदाता' के रूप में कार्य करते हैं। यहाँ 'बीज' का अर्थ है जीवों का सूक्ष्म प्रारूप या आत्मा, जो उनके शरीर के निर्माण और विकास की नींव रखता है।
इस प्रकार, श्रीकृष्ण प्रकृति और जीवों के बीच एक मध्यस्थ के रूप में दिखाए जाते हैं, जहाँ प्रकृति जीवों के शरीर और अनुभव की व्यवस्था करती है और श्रीकृष्ण आत्मा का स्रोत और जीवन की शक्ति प्रदान करते हैं।
इस श्लोक के माध्यम से, भगवान श्रीकृष्ण हमें यह भी समझाते हैं कि जीवन की जड़ें और आधार दोनों ही दिव्य हैं, और वे हमें इस जीवन के मूल तत्वों को समझने की प्रेरणा देते हैं।
इस श्लोक में स्पष्ट बताया गया है कि भगवान श्रीकृष्ण सभी के आदि पिता हैं। सभी जीव-भौगोलिक प्रकृति और आध्यात्मिक प्रकृति के संयोग हैं। ऐसे जीव केवल इस लोक में ही नहीं, ब्रह्मा हर लोक में, यहां तक ​​कि सर्वोच्च लोक में भी, जहां आसीन हैं, पाए जाते हैं। जीव सर्वत्र हैं- पृथ्वी, जल और अग्नि के भीतर भी जीव हैं। ये सभी जीव माता भौतिक प्रकृति और बीजप्रदाता कृष्ण द्वारा प्रकट होते हैं। दार्शनिक यह है कि भौतिक जगत् को गर्भ धारण में धारण करने की आवश्यकता है, जो सृष्टिकाल में अपने पूर्वकर्मों के भिन्न सिद्धांतों के अनुसार प्रकट होते हैं।
14॥4॥

भगवद  गीता अध्याय: 14
श्लोक 5

श्लोक:
(सत्‌, रज, तम- तीनों गुणों का विषय) सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः।
 निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्‌॥

भावार्थ:
हे अर्जुन! सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण -ये प्रकृति से उत्पन्न तीनों गुण अविनाशी जीवात्मा को शरीर में बाँधते हैं
 
प्रकृति: 
दिव्य होने के कारण जीव को इस भौतिक प्रकृति से कुछ भी लेना-देना नहीं है। फिर भी भौतिक जगत द्वारा रचित हो जाने के कारण वह प्रकृति के गुणों के जादू के वशीभूत कार्य करता है। विविधता को प्रकृति की विभिन्न अवस्थाओं के अनुसार भिन्न-भिन्न प्रकार के शरीर मिले हुए हैं, अतएव उसी वे प्रकृति के अनुसार कर्म करने के लिए प्रेरित होते हैं। यही अनेक प्रकार के सुख-दुःख का कारण है।
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने बताया है कि सत्त्व, रजस, और तमस—ये तीन गुण प्रकृति के मूल तत्व हैं और इनका प्रभाव हमारे जीवन पर गहरा होता है। इन गुणों का प्रभाव हमारे व्यवहार, विचार और अनुभव पर सीधा होता है।
सत्त्वगुण: यह गुण प्रकाश, ज्ञान और संतुलन का प्रतिनिधित्व करता है। जब सत्त्वगुण प्रबल होता है, तो व्यक्ति शांतिपूर्ण और समर्पित होता है, और उसके विचार और कार्य में शुद्धता और स्पष्टता होती है।
रजोगुण: यह गुण गतिविधि, क्रिया और इच्छाओं का प्रतिनिधित्व करता है। जब रजोगुण प्रभावी होता है, तो व्यक्ति कर्मशील, महत्वाकांक्षी और ऊर्जावान होता है, लेकिन यह भी उसे सांसारिक इच्छाओं और तनावों से जोड़ता है।
तमोगुण: यह गुण अज्ञानता, आलस्य और निष्क्रियता का प्रतिनिधित्व करता है। जब तमोगुण प्रबल होता है, तो व्यक्ति उदासीन, आलसी और अंधकारमय मानसिक स्थिति में होता है, जिससे ज्ञान और समझ की कमी होती है।
इन तीनों गुणों का प्रभाव व्यक्ति के व्यवहार और जीवन की गुणवत्ता पर सीधा होता है। जब आत्मा इन गुणों के प्रभाव में होती है, तब वह शरीर और मन के बंधनों में बंधी रहती है। भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक के माध्यम से अर्जुन को समझा रहे हैं कि इन गुणों के प्रभाव को पहचानकर और उचित साधना करके आत्मा को इन बंधनों से मुक्ति प्राप्त करनी चाहिए।
14॥5॥
भगवद  गीता अध्याय: 14
श्लोक 6

श्लोक:
तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम्‌।
 सुखसङ्‍गेन बध्नाति ज्ञानसङ्‍गेन चानघ॥

भावार्थ:
हे निष्पाप! उन तीनों गुणों में सत्त्वगुण तो निर्मल होने के कारण प्रकाश करने वाला और विकार रहित है, वह सुख के सम्बन्ध से और ज्ञान के सम्बन्ध से अर्थात उसके अभिमान से बाँधता है
 इस श्लोक में श्रीकृष्ण अर्जुन को सत्त्वगुण के गुणधर्म के बारे में समझा रहे हैं। यहाँ तीन गुणों का वर्णन है: सत्त्व (शुद्धता), रजस (उत्तेजना), और तमस (अज्ञानता)।
सत्त्वगुण: यह गुण शुद्ध और निर्मल होता है। यह प्रकाश और स्पष्टता प्रदान करता है। सत्त्वगुण वाले व्यक्ति के मन में शांति और स्थिरता होती है। इस गुण के प्रभाव में व्यक्ति ज्ञान के प्रति आकर्षित होता है और शारीरिक तथा मानसिक रूप से स्वस्थ रहता है।
प्रकाशक और अनामय: सत्त्वगुण 'प्रकाशक' है, अर्थात यह व्यक्ति के अंदर की चेतना को प्रकाशित करता है, जिससे उसे सही और गलत की पहचान होती है। 'अनामय' का अर्थ है विकार रहित, यानी यह गुण व्यक्ति को बीमारियों और विकारों से मुक्त रखता है।
सुख और ज्ञान से बाँधना: यद्यपि सत्त्वगुण शुद्ध और लाभकारी है, फिर भी यह सुख और ज्ञान से बंधन उत्पन्न करता है। 
इसका अर्थ है कि सत्त्वगुण के प्रभाव में व्यक्ति सुख और ज्ञान का अनुभव तो करता है, परंतु इसी सुख और ज्ञान के अभिमान (अहंकार) में वह बंध भी जाता है। यह बंधन अन्य गुणों की अपेक्षा अधिक सूक्ष्म होता है, फिर भी यह मोक्ष प्राप्ति में बाधक बन सकता है। 
इस प्रकार, सत्त्वगुण सकारात्मक गुण होते हुए भी व्यक्ति को एक सूक्ष्म बंधन में डालता है, जो उसे अंतिम सत्य और मोक्ष से दूर रखता है। इस श्लोक के माध्यम से श्रीकृष्ण अर्जुन को चेताते हैं कि केवल सत्त्वगुण में ही लीन होना भी मोक्ष के मार्ग में बाधक हो सकता है, इसलिए उससे भी आगे बढ़ने की आवश्यकता है।
प्रकृति द्वारा रचित पाये गये जीव कई प्रकार के होते हैं। कोई सुखी है और कोई अत्यधिक व्यावसायिक है,
ब्राह्मण: यदि सतो गुणी पूर्ण ज्ञानी भी है पर पाठ पूजा में भेद भाव रखता है तो मोक्ष के मार्ग में बाधक ही है।
क्षत्रिय: भी पूर्ण ज्ञानी होने पर भी यदि भेद भाव बरते तो वह भी तो मोक्ष के मार्ग में बाधक ही है।
वैश्य भी ज्ञानी होने पर कम तोले,दिखाया मॉल बदल कर दे तो वो भी तो मोक्ष के मार्ग में बाधक ही है।

शूद्र:पूर्ण ज्ञानी होते है सेवा इनका स्वाभाविक कर्म है यदि समान सेवा ना करे तो वो भी अपने मोक्ष मार्ग में बाधक ही है।
14॥6॥
भगवद  गीता अध्याय: 14
श्लोक 7

श्लोक:
रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्‍गसमुद्भवम्‌।
 तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्‍गेन देहिनम्‌॥

भावार्थ:
हे अर्जुन! रागरूप रजोगुण को कामना और आसक्ति से उत्पन्न जान। वह इस जीवात्मा को कर्मों और उनके फल के सम्बन्ध में बाँधता है
 इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को रजोगुण के स्वभाव और उसके प्रभाव के बारे में बता रहे हैं। रजोगुण तीन गुणों में से एक है, जो सृष्टि के संचालन में मुख्य भूमिका निभाते हैं। यहाँ पर भगवान कहते हैं कि रजोगुण रागात्मक है, अर्थात यह इच्छाओं और कामनाओं से भरा हुआ है।

रजोगुण की विशेषताएँ:

रजोगुण इच्छाओं और कामनाओं को जन्म देता है। तृष्णा का अर्थ है कोई चीज़ पाने की तीव्र इच्छा, और आसक्ति का अर्थ है किसी चीज़ से अत्यधिक लगाव। यह मनुष्य को उन वस्तुओं, लोगों, या स्थितियों की ओर खींचता है जिनसे उसे सुख या आनंद की प्राप्ति होती है।
रजोगुण व्यक्ति को निरंतर कर्म करने के लिए प्रेरित करता है, क्योंकि यह उसे विभिन्न इच्छाओं और लक्ष्य प्राप्ति की ओर ले जाता है। यह व्यक्ति को फल की आसक्ति से बाँधता है, जिसके परिणामस्वरूप वह कर्म के बंधन में फंस जाता है।
रजोगुण का स्वभाव क्रियाशीलता है, और यह मनुष्य को लगातार सक्रिय रखता है। जब कोई व्यक्ति रजोगुण के प्रभाव में होता है, तो वह अपने जीवन में विभिन्न प्रकार की इच्छाओं को पूरा करने के लिए सक्रिय रहता है। लेकिन यह गुण व्यक्ति को कर्मों में बांधता है और उसे मोक्ष के मार्ग से दूर ले जाता है, क्योंकि वह अपने कर्मों के फल की इच्छा करता है। इस प्रकार, रजोगुण की उपस्थिति में व्यक्ति की आत्मा का शुद्धिकरण और परमात्मा की प्राप्ति कठिन हो जाती है।
14॥7॥
भगवद  गीता अध्याय: 14
श्लोक 8

श्लोक:
तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम्‌।
 प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत॥

भावार्थ:
हे अर्जुन! सब देहाभिमानियों को मोहित करने वाले तमोगुण को तो अज्ञान से उत्पन्न जान। वह इस जीवात्मा को प्रमाद (इंद्रियों और अंतःकरण की व्यर्थ चेष्टाओं का नाम 'प्रमाद' है), आलस्य (कर्तव्य कर्म में अप्रवृत्तिरूप निरुद्यमता का नाम 'आलस्य' है) और निद्रा द्वारा बाँधता है
 इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को तमोगुण के बारे में समझा रहे हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं, "हे अर्जुन! सब देहाभिमानियों (जो शरीर को ही अपना वास्तविक स्वरूप मानते हैं) को मोहित करने वाले तमोगुण को अज्ञान से उत्पन्न जानो।" यहाँ 'अज्ञान' का अर्थ है सत्य ज्ञान का अभाव, जिससे व्यक्ति अपने वास्तविक आत्मा स्वरूप को भूलकर भौतिक शरीर को ही अपना सबकुछ मानने लगता है।
तमोगुण की प्रकृति है अज्ञानता और भ्रम, और इसका कार्य है जीवात्मा को भ्रमित रखना। यह गुण व्यक्ति को आलसी, प्रमादी और अधिक सोने के लिए प्रेरित करता है।
प्रमाद का अर्थ है इंद्रियों और मन की व्यर्थ चेष्टाएँ, जो व्यक्ति को अपने कर्तव्यों और लक्ष्यों से भटका देती हैं। इसका परिणाम यह होता है कि व्यक्ति अनावश्यक और हानिकारक कार्यों में संलिप्त हो जाता है।
आलस्य कर्तव्य के प्रति अरुचि और निष्क्रियता है। यह व्यक्ति को परिश्रम करने से रोकता है और उसे निष्क्रिय और असंवेदनशील बनाता है।
निद्रा अधिक सोने की प्रवृत्ति है, जो व्यक्ति को मानसिक और शारीरिक रूप से सुस्त बना देती है।
तमोगुण इन तीनों के माध्यम से व्यक्ति को बाँधता है और उसे आत्मा की उन्नति की ओर बढ़ने से रोकता है। यह गुण व्यक्ति को मोह और अज्ञानता में फँसाए रखता है, जिससे वह संसार के भौतिक सुखों में लिप्त रहता है और वास्तविक ज्ञान से वंचित रह जाता है।
इस प्रकार, श्रीकृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि तमोगुण जीवात्मा को अज्ञान, प्रमाद, आलस्य, और निद्रा के बंधनों में बांधता है, जिससे उसे आत्मा की सच्ची प्रकृति का ज्ञान प्राप्त नहीं होता। अतः तमोगुण से मुक्ति पाने के लिए व्यक्ति को ज्ञान और सतोगुण की ओर प्रवृत्त होना चाहिए।
14॥8॥
भगवद  गीता अध्याय: 14
श्लोक 9

श्लोक:
सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत।
 ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत॥

भावार्थ:
हे अर्जुन! सत्त्वगुण सुख में लगाता है और रजोगुण कर्म में तथा तमोगुण तो ज्ञान को ढँककर प्रमाद में भी लगाता है
 अब इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को प्रकृति के तीन गुणों - सत्त्व, रजस, और तमस - के प्रभावों के बारे में समझा रहे हैं।

सत्त्वगुण (सुख में लगाता है):

सत्त्वगुण शुद्धता, ज्ञान, और प्रकाश का प्रतीक है। इसका प्रभाव व्यक्ति के मन और हृदय में शांति, संतोष, और सुख उत्पन्न करता है। जब कोई व्यक्ति सत्त्वगुण के प्रभाव में होता है, तो वह मानसिक शांति और आत्मिक संतुष्टि का अनुभव करता है। ऐसे व्यक्ति को आत्मज्ञान और विवेक प्राप्त होता है, जिससे वह जीवन में सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाता है और स्थायी सुख की खोज करता है।

रजोगुण (कर्म में लगाता है):

रजोगुण क्रियाशीलता, इच्छा, और अस्थिरता का प्रतीक है। यह व्यक्ति को निरंतर क्रियाशील रहने के लिए प्रेरित करता है। जब कोई व्यक्ति रजोगुण के प्रभाव में होता है, तो उसे कार्य करने की, नए लक्ष्य प्राप्त करने की और अपनी इच्छाओं को पूरा करने की प्रबल इच्छा होती है। यह गुण व्यक्ति को बाहरी दुनिया की गतिविधियों में संलग्न रखता है और उसे स्थिरता से दूर करता है।

तमोगुण (प्रमाद में लगाता है):

तमोगुण अज्ञानता, आलस्य, और अंधकार का प्रतीक है। इसका प्रभाव व्यक्ति को ज्ञान से दूर ले जाता है और उसे मानसिक जड़ता और प्रमाद (लापरवाही) में डालता है। जब कोई व्यक्ति तमोगुण के प्रभाव में होता है, तो वह सच्चाई और विवेक से परे होकर भ्रम और अज्ञानता में डूबा रहता है। ऐसे व्यक्ति को न तो कार्य में रुचि होती है, न ही उसे किसी चीज़ की चिंता होती है, और वह जीवन को निष्क्रियता और उदासीनता में बिताता है।

इस प्रकार, भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को यह समझा रहे हैं कि हर व्यक्ति में ये तीन गुण विद्यमान होते हैं और ये गुण उसके व्यवहार, विचार, और जीवन के उद्देश्य को निर्धारित करते हैं। व्यक्ति को इन गुणों के प्रभाव को पहचानकर आत्म-प्रबंधन करना चाहिए और अपने जीवन को संतुलित और सुसंस्कृत बनाने के लिए सत्त्वगुण की ओर अग्रसर होना चाहिए।
14॥9॥

भगवद  गीता अध्याय: 14
श्लोक 10

श्लोक:
रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत।
 रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा॥

भावार्थ:
हे अर्जुन! रजोगुण और तमोगुण को दबाकर सत्त्वगुण, सत्त्वगुण और तमोगुण को दबाकर रजोगुण, वैसे ही सत्त्वगुण और रजोगुण को दबाकर तमोगुण होता है अर्थात बढ़ता है
 सत्त्वगुण का प्रभाव: जब रजोगुण (उत्तेजना) और तमोगुण (अज्ञानता) को दबा दिया जाता है, तब सत्त्वगुण (पवित्रता) प्रबल होता है। इसका अर्थ है कि व्यक्ति में शांति, ज्ञान, और आध्यात्मिक जागरूकता बढ़ती है। इस स्थिति में व्यक्ति को सद्गुणों की ओर आकर्षण होता है और वह सत्य, न्याय, और नैतिकता के मार्ग पर चलता है।
रजोगुण का प्रभाव: जब सत्त्वगुण और तमोगुण को दबा दिया जाता है, तब रजोगुण (उत्तेजना) प्रबल होता है। इस अवस्था में व्यक्ति को क्रियाशीलता, महत्वाकांक्षा, और भौतिक सुखों की ओर अधिक आकर्षण होता है। वह अधिक क्रियाशील, कामुक, और अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए संघर्षरत रहता है।
तमोगुण का प्रभाव: जब सत्त्वगुण और रजोगुण को दबा दिया जाता है, तब तमोगुण (अज्ञानता) प्रबल होता है। इस स्थिति में व्यक्ति में आलस्य, प्रमाद, और अज्ञानता बढ़ जाती है। वह नकारात्मक विचारों में उलझ जाता है, अपने कर्तव्यों से विमुख हो जाता है, और मानसिक रूप से अस्थिर हो सकता है।
इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण यह समझा रहे हैं कि इन तीनों गुणों का व्यक्ति के जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है, और उनके मध्य संतुलन बनाना अत्यंत आवश्यक है। जीवन में सत्त्वगुण को बढ़ावा देकर मनुष्य शांति और संतोष पा सकता है, जबकि रजोगुण और तमोगुण से उसे सावधान रहना चाहिए, क्योंकि ये गुण उसे भौतिक इच्छाओं और अज्ञानता की ओर ले जाते हैं।

जब रजोगुण प्रधान होता है, तो सातो तथा तमोगुण प्रधान होता है। जब सतोगुण प्रधान होता है तो रजो और तमोगुण परास्त हो जाते हैं। जब तमोगुण प्रधान होता है तो रजो और सतोगुण प्रधान हो जाते हैं। यह वैयक्तिकता सुपरमार्केट भंडार है। अतएव जो कृष्णभावनामृत में वास्तव में विकास करने की इच्छा है, उसे इन गुणों में लाघना है। प्रकृति के किसी एक गुण की प्रधानता मनुष्य के आचरण में, उसके कार्यकलापों में, उसके खान-पान आदि में प्रकट होती है। इन बौद्ध धर्म का वर्णन अगले अध्यायों में किया जाएगा। लेकिन अगर कोई इलाज नहीं है तो वह सतोगुण द्वारा अभ्यास विकसित किया जा सकता है और इस प्रकार रजो और तमोगुणों को परास्त किया जा सकता है। इस प्रकार से रजोगुण विकसित होकर तमो तथा सातो गुणों को परास्त किया जा सकता है। या कोई भी पदार्थ हो तो उसमें तमोगुण विकसित होकर जो सतोगुणों को नष्ट कर सकता है। यद्यपि प्रकृति के ये तीन गुण होते हैं, यदि कोई संकल्प कर ले तो उसे सतोगुण का आशीर्वाद मिल ही सकता है और वह इसे लांघ कर शुद्ध सतोगुण में स्थित हो सकता है, जिसे वासुदेव स्तर कहते हैं, जिसमें वह ईश्वर के विज्ञान को शामिल करता है समझ सकते हैं. विशिष्ट कार्य को देखकर ही समझा जा सकता है कि कौन सा व्यक्ति किस गुण में स्थित है।

एक गुण आता है तो दूसरा चला जाता है पर इनका आना जाना स्वाभाविक रूप में लगा रहता है।एक आया दो गायब पर सतोगुण को बढ़ावा देने को सभी कहते है। जिसके लिए जरूरी है कि 
धर्म ग्रंथों में बताया गया है कि सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण का संतुलन बनाए रखने के लिए कुछ उपाय किए जा सकते हैं।

गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं कि सतोगुण को बढ़ावा देने के लिए, हमें अपने जीवन में निम्नलिखित बातों का पालन करना चाहिए:

1. *सत्संग*: सत्संग में रहने से हमारे मन में सतोगुण का विकास होता है।
2. *स्वाध्याय*: स्वाध्याय करने से हमारे मन में ज्ञान और विवेक का विकास होता है।
3. *तपस्या*: तपस्या करने से हमारे मन में आत्म-नियंत्रण और आत्म-शुद्धि का विकास होता है।
4. *सेवा*: सेवा करने से हमारे मन में करुणा और दया का विकास होता है।
5. *ध्यान*: ध्यान करने से हमारे मन में शांति और एकाग्रता का विकास होता है।

इन उपायों को अपनाकर, हम अपने जीवन में सतोगुण को बढ़ावा दे सकते हैं और रजोगुण और तमोगुण को नियंत्रित कर सकते हैं।

इसके अलावा, गीता में भगवान कृष्ण यह भी कहते हैं कि सतोगुण को बनाए रखने के लिए, हमें अपने जीवन में निम्नलिखित बातों का त्याग करना चाहिए:

1. *काम*: काम को त्यागने से हमारे मन में विकारों का विकास नहीं होता है।
2. *क्रोध*: क्रोध को त्यागने से हमारे मन में शांति और धैर्य का विकास होता है।
3. *लोभ*: लोभ को त्यागने से हमारे मन में संतुष्टि और तृप्ति का विकास होता है।
4. *मोह*: मोह को त्यागने से हमारे मन में विवेक और ज्ञान का विकास होता है।
5. *अहंकार*: अहंकार को त्यागने से हमारे मन में विनम्रता और आत्म-नियंत्रण का विकास होता है।

इन बातों का त्याग करके, हम अपने जीवन में सतोगुण को बनाए रख सकते हैं और रजोगुण और तमोगुण को नियंत्रित कर सकते हैं।

 14॥10॥
भगवद  गीता अध्याय: 14
श्लोक 11

श्लोक:
सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते।
 ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत॥

भावार्थ:
जिस समय इस देह में तथा अन्तःकरण और इन्द्रियों में चेतनता और विवेक शक्ति उत्पन्न होती है, उस समय ऐसा जानना चाहिए कि सत्त्वगुण बढ़ा है
 इसकी पहचान बताते हुए भगवान का कहना है।
सतोगुण की अभिव्यक्ति तभी अनुभव की जा सकती है, जब शरीर के सारे द्वार ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशित होते हैं।

शरीर में नौ द्वार हैं- दो कान, दो कान, दो नथुने, मुंह, गुच्छे तथा उपस्थ । जब प्रत्येक द्वार पर सत्त्वगुण के लक्षण अंकित हो जाते हैं, तो सतोगुण विकसित हो जाता है। सतोगुण में सारी वस्तुएँ अपनी सही स्थिति में दिखती हैं, सही-सही बताई गई हैं और सही ढंग से उन वस्तुओं का स्वाद बताती हैं। मनुष्य का अंतः तथा शुद्ध हो जाता है। प्रत्येक द्वार में सुख के लक्षण उत्पन्न होते हैं और यही स्थिति सत्त्वगुण की होती है।
जब मनुष्य के मन, बुद्धि और इन्द्रियों में स्पष्टता, समझ और ज्ञान का संचार होता है, तो यह संकेत है कि उसमें सत्त्वगुण की वृद्धि हो रही है। सत्त्वगुण वह गुण है जो शांति, पवित्रता, और सामंजस्य का प्रतीक है।
इस श्लोक के माध्यम से यह बताया गया है कि सत्त्वगुण की प्रधानता के समय मनुष्य के विचार, कर्म, और दृष्टिकोण में स्पष्टता और शुद्धता आ जाती है। उसके विवेकशीलता में वृद्धि होती है, जिससे वह सही और गलत का भेद स्पष्ट रूप से कर पाता है। इस अवस्था में व्यक्ति की चेतना उन्नत होती है, और वह जीवन के सत्य को समझने की दिशा में अग्रसर होता है।
संक्षेप में: जब हमारे भीतर ज्ञान और विवेक का प्रकाश प्रकट होता है और हमारे मन और इन्द्रियाँ शुद्ध और स्पष्ट हो जाती हैं, तब समझना चाहिए कि हमारे भीतर सत्त्वगुण का विस्तार हो रहा है। यह सत्त्वगुण ही है जो हमें उच्चतर चेतना और आंतरिक शांति की ओर ले जाता है।
14॥11॥
भगवद  गीता अध्याय: 14
श्लोक 12

श्लोक:
लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा।
 रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ॥

भावार्थ:
हे अर्जुन! रजोगुण के बढ़ने पर लोभ, प्रवृत्ति, स्वार्थबुद्धि से कर्मों का सकामभाव से आरम्भ, अशान्ति और विषय भोगों की लालसा- ये सब उत्पन्न होते हैं।
 एक मिल गया पर संतोष नहीं मिला और मिले ऐसा।
अर्थात:
राजोगुणी व्यक्ति कभी भी पहले से प्राप्त पद से परिचित नहीं होता है, वह अपना पद बढ़ाने के लिए लालायित रहता है । यदि उसे मकान मिल जाए, तो वह महल की पहचान के लिए भरसक प्रयास करता है, मानो वह उस महल में सदा रहेगा। वह इंद्रिय-तृप्ति के लिए अत्यंत मूल्यवान लालसा विकसित करती है। इंद्रिय तृप्ति की कोई सीमा नहीं है। वह हमेशा अपने परिवार के बीच और अपने घर में रह कर इंद्रियतृप्ति करना चाहती है। यह कोई अंत नहीं है। इन सभी मिश्रणों को रजोगुण की सुविधा प्रदान की जानी चाहिए।
भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि जब रजोगुण की वृद्धि होती है, तब व्यक्ति में विभिन्न प्रकार के नकारात्मक भाव और प्रवृत्तियाँ उत्पन्न होती हैं। रजोगुण एक ऐसा गुण है जो सक्रियता, जोश, और भौतिक संसार में आसक्ति को प्रकट करता है।
लोभः: रजोगुण बढ़ने पर व्यक्ति में लोभ, अर्थात् लालच उत्पन्न होता है। यह लालच भौतिक वस्त्रों, धन, सम्पत्ति और अधिकारों के प्रति होता है। व्यक्ति हमेशा अधिक पाने की इच्छा में लगा रहता है और उसकी तृष्णा कभी समाप्त नहीं होती।
प्रवृत्तिः: इस गुण के बढ़ने से व्यक्ति सदैव क्रियाशील रहता है। उसकी प्रवृत्ति निरंतर किसी न किसी कार्य में लगी रहती है। वह बिना रुके अपने उद्देश्यों को पाने के लिए प्रयासरत रहता है।
आरम्भः कर्मणाम्: व्यक्ति स्वार्थपूर्ण उद्देश्यों को पूरा करने के लिए नए-नए कार्यों का आरम्भ करता है। उसके सारे कर्म सकाम होते हैं, अर्थात् वह कर्मफल की इच्छा से कार्य करता है।
अशमः: रजोगुण की अधिकता से व्यक्ति के मन में अशान्ति रहती है। वह हमेशा किसी न किसी चिंता, चिंता या तनाव में रहता है। मन का शांत रहना उसके लिए कठिन हो जाता है।
स्पृहा: इसका अर्थ है इच्छा या लालसा। रजोगुण के प्रभाव में व्यक्ति में विषय-भोगों की लालसा बढ़ जाती है। वह इन्द्रियों के सुख में लिप्त रहता है और निरंतर उन सुखों को प्राप्त करने की कोशिश करता है।
संक्षेप में, इस श्लोक में भगवान अर्जुन को समझा रहे हैं कि जब रजोगुण की वृद्धि होती है, तो व्यक्ति के मन में लोभ, अशान्ति, और भौतिक सुखों की इच्छा जैसे नकारात्मक भावनाएँ प्रबल हो जाती हैं। यह ज्ञान व्यक्ति को समझदारी से अपने गुणों को पहचानकर और उन्हें संतुलित करने का प्रयास करने में मदद करता है।
14॥12॥
भगवद  गीता अध्याय: 14
श्लोक 13

श्लोक:
अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च।
 तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन॥

भावार्थ:
हे अर्जुन! तमोगुण के बढ़ने पर अन्तःकरण और इंन्द्रियों में अप्रकाश, कर्तव्य-कर्मों में अप्रवृत्ति और प्रमाद अर्थात व्यर्थ चेष्टा और निद्रादि अन्तःकरण की मोहिनी वृत्तियाँ - ये सब ही उत्पन्न होते हैं
 इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को तमोगुण के लक्षणों के बारे में बता रहे हैं। तमोगुण प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रजस, तमस) में से एक है, जो अज्ञान, आलस्य और प्रमाद का कारण होता है।
अप्रकाश" का अर्थ है प्रकाश का अभाव, अर्थात् अज्ञानता। जब तमोगुण बढ़ता है, तो व्यक्ति की बुद्धि और विवेक पर अज्ञान का अंधकार छा जाता है, जिससे उसे सही और गलत का भान नहीं रहता।
"अप्रवृत्ति" का अर्थ है कर्तव्य कर्मों में अरुचि या निष्क्रियता। तमोगुण से प्रभावित व्यक्ति अपने कर्तव्यों का पालन करने में उदासीन हो जाता है और आलस्य में डूबा रहता है।
"प्रमाद" का अर्थ है लापरवाही या असावधानी, और "मोह" का अर्थ है भ्रम। तमोगुण के बढ़ने से व्यक्ति में भ्रम उत्पन्न होता है और वह अपने जीवन के सही मार्ग से भटक जाता है। वह व्यर्थ चेष्टाओं और मोह में उलझ जाता है, जिससे उसकी प्रगति रुक जाती है और वह संसार के दुखों में फंस जाता है।
इस प्रकार, इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि जब तमोगुण प्रबल होता है, तो व्यक्ति के मन में अज्ञान, निष्क्रियता, आलस्य और भ्रम का संचार होता है। इसे समझकर अर्जुन को तमोगुण से बचने का प्रयास करना चाहिए।
पौराणिक कथा: जहां प्रकाश नहीं होता, वहां ज्ञान भंडार रहता है। तमोगुणी व्यक्ति किसी भी नियम में बंधकर कार्य नहीं करता है। वह अकारण ही अपने सनक के अनुसार कार्य करना चाहता है। हालाँकि कार्य करने की क्षमता होती है, लेकिन भैया परिश्रम नहीं करते। ये मोह है. हालाँकि निजी रहता है, लेकिन जीवन बेघर रहता है। ये हैं तमोगुण के लक्षण।

14॥13॥
भगवद  गीता अध्याय: 14
श्लोक 14

श्लोक:
यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत्‌।
 तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते॥

भावार्थ:
जब यह मनुष्य सत्त्वगुण की वृद्धि में मृत्यु को प्राप्त होता है, तब तो उत्तम कर्म करने वालों के निर्मल दिव्य स्वर्गादि लोकों को प्राप्त होता है
 इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को यह समझा रहे हैं कि जब किसी जीवात्मा का शरीर सत्त्वगुण की वृद्धि के साथ मृत्यु को प्राप्त होता है, तो वह उस अवस्था में होता है जहाँ सत्त्वगुण (ज्ञान, पवित्रता, और सत्यता) अत्यधिक मात्रा में प्रबल होता है। इस प्रकार के व्यक्ति को उत्तम कर्म करने वालों के लिए निर्दिष्ट, निर्मल और दिव्य लोकों की प्राप्ति होती है। ये लोक जैसे कि स्वर्ग आदि, अत्यंत शुद्ध और पवित्र होते हैं, जहाँ आत्मा को उच्चतर आध्यात्मिक सुख और शांति का अनुभव होता है।
सत्त्वगुण की वृद्धि: सत्त्वगुण का अर्थ है पवित्रता, ज्ञान, और शांति। जब यह गुण किसी व्यक्ति में प्रबल हो जाता है, तो वह व्यक्ति अच्छे और धर्मपरायण कर्म करता है।
प्रलय (मृत्यु): जब ऐसे व्यक्ति की मृत्यु होती है, जिसमें सत्त्वगुण की वृद्धि हो चुकी होती है।
उत्तम लोकों की प्राप्ति: सत्त्वगुणी व्यक्ति को मृत्यु के पश्चात श्रेष्ठ, निर्मल, और दिव्य लोकों की प्राप्ति होती है, जहाँ वह आत्मा शांति और सुख का अनुभव करती है।
इस प्रकार, यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि सत्त्वगुण की वृद्धि से हमारे कर्म शुद्ध और अच्छे होते हैं, जो हमें मृत्यु के बाद भी सुखद अनुभव प्रदान करते हैं। यह हमें प्रेरित करता है कि हम अपने जीवन में सत्त्वगुण को बढ़ाने का प्रयास करें।

भाव:जब कोई सतोगुण में मरता है, तो उसे राजसी धारीदार लोकों की प्राप्ति होती है।

सतोगुणी व्यक्ति ब्रह्मलोक या जनलोक जैसे उच्च लोकों को प्राप्त करता है और वहां देवी सुख भोगती है । अमलान शब्द महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ है, "रजो तथा तमोगुणों से मुक्त"। भौतिक जगत् में कलाकृतियाँ हैं, लेकिन सतोगुण सर्वाधिक शुद्ध रूप में हैं। भिन्न भिन्न प्रकार के लोक हैं। जो लोग सतोगुणों में मरते हैं, वे उन लोकों को मिलते हैं, जहां महराजा और महान भक्तगण रहते हैं।
14॥14॥

भगवद  गीता अध्याय: 14
श्लोक 15

श्लोक:
रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्‍गिषु जायते।
 तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते॥

भावार्थ:
रजोगुण के बढ़ने पर मृत्यु को प्राप्त होकर कर्मों की आसक्ति वाले मनुष्यों में उत्पन्न होता है तथा तमोगुण के बढ़ने पर मरा हुआ मनुष्य कीट, पशु आदि मूढ़योनियों में उत्पन्न होता है
 
मनुष्य योनि में भी कुछ कीट, पशु आदि मूढ़ मनुष्यों को देख कर समझा जा सकता है।

इसी प्रकार जब कोई रजोगुण मरता है, तो वह सकाम औषधि के बीच में जन्म ग्रहण करता है और जब कोई तमोगुण मरता है, तो वह पशुयोनि में जन्म ग्रहण करता है।बताया गया है।

कुछ लोगों का विचार है कि एक बार मनुष्य जीवन को आत्मा से प्राप्त करता है, कभी गिरता नहीं। ये ठीक नहीं है. इस श्लोक के अनुसार, यदि कोई तमोगुणी बन जाता है, तो उसे मृत्यु के बाद पशुयोनि प्राप्त होती है। वहां से जीव को विकास कार्यक्रम द्वारा पुनः आरंभ करके मानव जीवन तक लाया जाता है। अतएव जो व्यक्ति मनुष्य जीवन के विषय में सात्विक चिन्तन करते हैं, उन्हें सतोगुणी अवलम्बन चाहिए और अच्छी संगति में स्थिरता योग्यता को लाँघ कर कृष्णभावनामृत में स्थित होना चाहिए। यही मनुष्य जीवन का लक्ष्य है। अन्यथा इसकी कोई निश्चितता नहीं कि मनुष्य को फिर से मनुष्ययोनि प्राप्त हो। क्यों कि मनुष्य खुद ही अपना मित्र और शत्रु होता है।

इस श्लोक के माध्यम से, भगवान श्रीकृष्ण ने यह स्पष्ट किया है कि गुणों का प्रभाव जन्म-मरण के चक्र पर अत्यधिक प्रभाव डालता है। रजोगुण और तमोगुण के प्रभाव से हमारी आत्मा की यात्रा तय होती है और यह जीवन के बाद के जन्मों को निर्धारित करता है। इसलिए, साधना और आत्मा की उन्नति के लिए इन गुणों पर नियंत्रण रखना आवश्यक है।

यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण विषय है! धर्म ग्रंथों में बताया गया है कि सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण का संतुलन बनाए रखने के लिए कुछ उपाय किए जा सकते हैं।

गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं कि सतोगुण को बढ़ावा देने के लिए, हमें अपने जीवन में निम्नलिखित बातों का पालन करना चाहिए:

1. *सत्संग*: सत्संग में रहने से हमारे मन में सतोगुण का विकास होता है।
2. *स्वाध्याय*: स्वाध्याय करने से हमारे मन में ज्ञान और विवेक का विकास होता है।
3. *तपस्या*: तपस्या करने से हमारे मन में आत्म-नियंत्रण और आत्म-शुद्धि का विकास होता है।
4. *सेवा*: सेवा करने से हमारे मन में करुणा और दया का विकास होता है।
5. *ध्यान*: ध्यान करने से हमारे मन में शांति और एकाग्रता का विकास होता है।

इन उपायों को अपनाकर, हम अपने जीवन में सतोगुण को बढ़ावा दे सकते हैं और रजोगुण और तमोगुण को नियंत्रित कर सकते हैं।

इसके अलावा, गीता में भगवान कृष्ण यह भी कहते हैं कि सतोगुण को बनाए रखने के लिए, हमें अपने जीवन में निम्नलिखित बातों का त्याग करना चाहिए:

1. *काम*: काम को त्यागने से हमारे मन में विकारों का विकास नहीं होता है।
2. *क्रोध*: क्रोध को त्यागने से हमारे मन में शांति और धैर्य का विकास होता है।
3. *लोभ*: लोभ को त्यागने से हमारे मन में संतुष्टि और तृप्ति का विकास होता है।
4. *मोह*: मोह को त्यागने से हमारे मन में विवेक और ज्ञान का विकास होता है।
5. *अहंकार*: अहंकार को त्यागने से हमारे मन में विनम्रता और आत्म-नियंत्रण का विकास होता है।

इन बातों का त्याग करके, हम अपने जीवन में सतोगुण को बनाए रख सकते हैं और रजोगुण और तमोगुण को नियंत्रित कर सकते हैं।
14॥15॥

भगवद  गीता अध्याय: 14
श्लोक 16

श्लोक:
कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम्‌।
 रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम्‌॥

भावार्थ:
श्रेष्ठ कर्म का तो सात्त्विक अर्थात् सुख, ज्ञान और वैराग्यादि निर्मल फल कहा है, राजस कर्म का फल दुःख एवं तामस कर्म का फल अज्ञान कहा है
 
*विशेष:*

सुख, ज्ञान और वैराग्यादि का विस्तार से वर्णन करने के लिए, मैं आपको यहां बताऊंगा कि ये तीनों गुण हमारे जीवन में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इन के आधार पर आप जितना चाहें विस्तार कर सकते है।

*सुख*

सुख का अर्थ है आनंद, खुशी और संतुष्टि। यह हमारे जीवन में एक महत्वपूर्ण गुण है, जो हमें जीवन के उद्देश्यों को प्राप्त करने में मदद करता है। सुख के तीन प्रकार हैं:

1. *आध्यात्मिक सुख*: यह सुख हमें आध्यात्मिक ज्ञान और आत्म-साक्षात्कार से प्राप्त होता है।
2. *मानसिक सुख*: यह सुख हमें मानसिक शांति और संतुष्टि से प्राप्त होता है।
3. *भौतिक सुख*: यह सुख हमें भौतिक वस्तुओं और सुविधाओं से प्राप्त होता है।

*ज्ञान*

ज्ञान का अर्थ है जानकारी, समझ और बुद्धिमत्ता। यह हमारे जीवन में एक महत्वपूर्ण गुण है, जो हमें जीवन के उद्देश्यों को प्राप्त करने में मदद करता है। ज्ञान के तीन प्रकार हैं:

1. *आध्यात्मिक ज्ञान*: यह ज्ञान हमें आध्यात्मिक ग्रंथों और गुरुओं से प्राप्त होता है।
2. *व्यावहारिक ज्ञान*: यह ज्ञान हमें व्यावहारिक अनुभव और प्रयोगों से प्राप्त होता है।
3. *वैज्ञानिक ज्ञान*: यह ज्ञान हमें वैज्ञानिक प्रयोगों और अनुसंधानों से प्राप्त होता है।

*वैराग्य*

वैराग्य का अर्थ है विकारों और आसक्तियों से मुक्ति। यह हमारे जीवन में एक महत्वपूर्ण गुण है, जो हमें जीवन के उद्देश्यों को प्राप्त करने में मदद करता है। वैराग्य के तीन प्रकार हैं:

1. *आध्यात्मिक वैराग्य*: यह वैराग्य हमें आध्यात्मिक ज्ञान और आत्म-साक्षात्कार से प्राप्त होता है।
2. *मानसिक वैराग्य*: यह वैराग्य हमें मानसिक शांति और संतुष्टि से प्राप्त होता है।
3. *भौतिक वैराग्य*: यह वैराग्य हमें भौतिक वस्तुओं और सुविधाओं से मुक्ति से प्राप्त होता है।

इन तीनों गुणों को विकसित करने से हम अपने जीवन में सुख, शांति और संतुष्टि प्राप्त कर सकते हैं।

चलिए मूल श्लोक पर चलते है।

पुण्यकर्म का फल शुद्ध होता है और सात्विक गुण होता है। लेकिन रजोगुण में मिले कर्म का फल दुःख होता है और तमोगुण में मिले कर्म मूर्खता में प्रतिफलित होते हैं।

✍️सतोगुण में मिले पुण्यकर्मों का शुद्ध फल होता है, अतेव वे मुनिगण, जो मोह से मुक्त होते हैं, सुखी रहते हैं। लेकिन रजोगुण में मिले कर्म दुःख के कारण हैं। भौतिक सुख के लिए जो भी कार्य करता है, उसकी असफलता निश्चित होती है। उदाहरणार्थ, यदि कोई गगनचुम्बी प्रसाद बांडाना चाहता है, तो उसके बनने के लिए पूर्व अतिमहत्वपूर्ण सुविधा का निर्माण किया जाता है। मालिक को धन-संग्रह के लिए उद्यम लगाया जाता है और प्रसाद बनाने वाले श्रमिकों को शारीरिक श्रम करना होता है। इस प्रकार कष्ट तो होते ही हैं। अतएव भगवद्गीता का वर्णन है कि रजोगुण के अंतर्गत जो भी कर्म किए जाते हैं, वे निश्चित रूप से महान संकट भोगने होते हैं। इससे यह मानसिक तुष्टि हो सकती है कि मैंने यह मकान बनाया या इतना धन कमाया, लेकिन यह कोई वास्तविक सुख नहीं है। जहां तक ​​तमोगुण का संबंध है, कर्ता को कुछ ज्ञान नहीं रहता, अतएव उसके सारे कार्य उस समय दुःखदायी होते हैं और बाद में उसे पशु जीवन में जाना होता है। पशुओं का जीवन हमेशा दुःखमय होता है, हालाँकि माया के वशीभूत वे इसे समझ नहीं पाते। मित्र का वध भी तमोगुण के कारण होता है। पशु-वधिक यह नहीं पता कि भविष्य में इस जानवर को ऐसा शरीर प्राप्त होगा, जिससे वह अपना वध कर सकेगा। यही प्रकृति का नियम है। मानव समाज में यदि किसी भी मनुष्य का वध कर दे तो उसे प्राणदंड दिया जाता है। यह राज्य का नियम है। अज्ञानवश लोग यह अनुभव नहीं करते कि ईश्वर एक पूर्ण राज्य है। प्रत्येक जीवित प्राणी की संतान है और उन्हें एक चींटी तक का मारा जाना उचित नहीं है। इसके लिए मनुष्य को दंड भोगना पड़ता है। अतएव स्वाद के लिए पशु वध में चूहा सुनना घोर अज्ञान है। मनुष्य को किसी भी चीज़ की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि ईश्वर ने अनेक अच्छी वस्तुएँ उपलब्ध करायी हैं। यदि कोई किसी कारण से मांसाहार करता है, तो उसे यह बताना चाहिए कि वह ऐसा अज्ञानतावश कर रहा है और अपने भविष्य को अंधकारमय बना रहा है। सभी प्रकार के समुद्र में से गोवध सबसे अधिक अधम है, क्योंकि गाय हमें दूध देने वाले सभी प्रकार का सुख प्रदान करने वाली है। गोवध एक प्रकार से सबसे अधम कर्म है। वैदिक साहित्य में (ऋग्वेद 9.4.64) गोभी: प्रीणित मत्सरम् से पता चलता है कि जो व्यक्ति दूध पीकर गाय को चाहता है, वह सबसे बड़ा अज्ञान में रहता है। वैदिक वैदिकों में (विष्णु पुराण 1.19.65) एक प्रार्थना भी है, जो इस प्रकार है-

नमो ब्रह्मण्यदेवाय गोब्राह्मणहिताय च।
जगद्धिताय कृष्णाय गोविंदाय नमो नमः॥

"हे प्रभु! आप ब्राह्मणों और ब्राह्मणों के हितैषी हैं और आप सभी मानव समाज और विश्व के हितैषी हैं।" इस प्रार्थना में धार्मिक और ब्राह्मणों की रक्षा का विशेष उल्लेख है। ब्राह्मण आध्यात्मिक शिक्षा के प्रतीक और गाए महत्वपूर्ण भोजन की, अतावेव दोनों धार्मिक, ब्राह्मणों और धार्मिक लोगों को पूरी तरह से सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिए। येशी सभ्यता की वास्तविक प्रगति है। आधुनिक मानव समाज में आध्यात्मिक ज्ञान की अनदेखी की जाती है और गोवध को मंजूरी दी जाती है। इससे यही ज्ञात होता है कि मानव समाज विपरीत दिशाओं में जा रहा है और अपने भारतवर्ष का पथ पुनः प्राप्त कर रहा है। जो पशु-पक्षी अगले जन्मों में अपने-अपने राष्ट्रों के लिए मार्गदर्शक बन जाते हैं, वे निश्चित रूप से मानव-साहित्य के रूप में नहीं होते। निसानदेह, आधुनिक मानव-सभ्यता रजोगुण तथा तमोगुण के कारण कुमार्ग पर जा रही है। यह अत्यंत घातक युग है और सभी राष्ट्रों को मानवता को महानतम संकट से बचाने के लिए कृष्णभावनामृत की सरलतम विधि प्रदान करनी चाहिए।

भाव यह है कि 

यह एक प्रसिद्ध श्लोक है, जो भगवान कृष्ण की महिमा का वर्णन करता है। इस श्लोक का भाव यह है:

"मैं भगवान कृष्ण को नमन करता हूँ, जो ब्रह्मा के समान हैं, जो गौ और ब्राह्मणों के हित के लिए कार्य करते हैं, जो जगत के हित के लिए कार्य करते हैं, और जो गोविंद के रूप में पूजे जाते हैं।"

इस श्लोक में भगवान कृष्ण की महिमा का वर्णन किया गया है, और उनकी कृपा और दया के लिए प्रार्थना की गई है। यह श्लोक भगवान कृष्ण के प्रति भक्ति और समर्पण की भावना को व्यक्त करता है।

श्लोक 16 का वाचन हमें कर्मों के विभिन्न गुणों और उनके परिणामों के बारे में बताता है। इस श्लोक में तीन प्रमुख गुण—सात्त्विक, राजस और तमस—के कर्मफल की चर्चा की गई है।

सात्त्विक कर्म: इस गुण से संबंधित कर्मों का फल शुद्ध और निर्मल होता है। ये कर्म आमतौर पर सुख, ज्ञान, और वैराग्य (रूप और भौतिक सुखों से विरक्ति) को जन्म देते हैं। सात्त्विक कर्म ऐसे होते हैं जो स्वार्थरहित होते हैं और दूसरों के लाभ के लिए किए जाते हैं। इनके परिणामस्वरूप व्यक्ति की आत्मा को शांति मिलती है और वह मानसिक रूप से संतुलित रहता है।

14॥16॥

भगवद  गीता अध्याय: 14
श्लोक 17

श्लोक:
सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च।
 प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च॥

भावार्थ:
सत्त्वगुण से ज्ञान उत्पन्न होता है और रजोगुण से निःसन्देह लोभ तथा तमोगुण से प्रमाद (इसी अध्याय के श्लोक 13 में देखना चाहिए) और मोह (इसी अध्याय के श्लोक 13 में देखना चाहिए।) उत्पन्न होते हैं और अज्ञान भी होता है

सतोगुण से ज्ञान प्रकट होता है।
रजोगुण से लोभ प्रकट होता है।
तमोगुण से प्रमाद प्रकट होता है।
यह पैमाना हमारे अंदर के गुणों को मापने के लिए एक बहुत ही उपयोगी तरीका है। आइए इसे विस्तार से समझने की कोशिश करें:

सतोगुण
सतोगुण से ज्ञान प्रकट होता है। जब हमारे अंदर सतोगुण प्रबल होता है, तो हमें ज्ञान और समझ की प्राप्ति होती है। हमारे मन में शांति और संतुष्टि की भावना उत्पन्न होती है, और हम अपने जीवन में सही निर्णय लेने में सक्षम होते हैं।

रजोगुण
रजोगुण से लोभ प्रकट होता है। जब हमारे अंदर रजोगुण प्रबल होता है, तो हमें लोभ और आसक्ति की भावना उत्पन्न होती है। हम अपने जीवन में अधिक से अधिक सुख और सुविधा प्राप्त करने की कोशिश करते हैं, और हमारे मन में असंतुष्टि और अशांति की भावना उत्पन्न होती है।

तमोगुण
तमोगुण से प्रमाद प्रकट होता है। जब हमारे अंदर तमोगुण प्रबल होता है, तो हमें प्रमाद और आलस्य की भावना उत्पन्न होती है। हम अपने जीवन में उदासीनता और निराशा की भावना महसूस करते हैं, और हमारे मन में अशांति और असंतुष्टि की भावना उत्पन्न होती है।
और मोह भी तमोगुण की श्रेणी में आता है। तमोगुण के प्रभाव से व्यक्ति को मोह, अज्ञान और आलस्य की भावना उत्पन्न होती है। मोह के कारण व्यक्ति अपने लक्ष्यों और उद्देश्यों से भटक जाता है और अपने जीवन में अशांति और असंतुष्टि का अनुभव करता है।
इस प्रकार, यह पैमाना हमें अपने अंदर के गुणों को समझने और उन्हें सुधारने के लिए एक उपयोगी तरीका भी प्रदान करता है।

वर्तमान पौराणिक कथाओं के लिए अधिक उपयुक्त नहीं है, अतावे उनके लिए कृष्णभावनामृत की संस्तुति की जाती है। कृष्णभावनामृत के माध्यम से समाज में सतोगुण विकसित होगा। सतोगुण विकसित हो जाने पर लोग विद्या को वास्तविक रूप में देखते हैं। तमोगुण में रहने वाले लोग पशु-तुल्य होते हैं और वे वस्तुओं को स्पष्ट रूप में नहीं देखते हैं। उदाहरणार्थ, तमोगुण में रहने के कारण लोग यह नहीं देखते कि जिस पशु का वे वध कर रहे हैं, उसी से वे अगले जन्म में मारे जायेंगे। वास्तविक ज्ञान की शिक्षा न मिलने के कारण वे अनुत्तरित बन जाते हैं। इस उच्छृंखलता पर रोक लगाने के लिए जनता में सतोगुण उत्पन्न करने वाली शिक्षा देना आवश्यक है। 

हत्या अपराध है पर भोजन की भी 3श्रेणियां है सात्विक,राजस, और तामस,जिनका वर्णन अध्याय 18 में होगा।

इस लिए किसी भी बात का निर्णय करने से पहले देखना समझना चाहिए कि उसमें स्वार्थ की बू ना आए।इस प्रकार हम,सतोगुण में शिक्षित हो जाने पर वे अचंभित और विभूतियों को उनके सही रूप में जान लेते हैं। तब लोग सुखी और प्रभावशाली हो जाते हैं। वैसे ही अधिकांश लोग सुखी और समृद्ध न बन पाते हैं, लेकिन यदि जनता का कुछ भी अंश कृष्णभावनामृत विकसित हो जाता है और सतोगुणी बन जाता है, तो सारे विश्व में शांति और समृद्धि की दुर्लभता भी नहीं हो सकती, अगर विश्व के लोग रजोगुण और तमोगुण में लगे रहेंगे तो शांति और समृद्धि नहीं रहेगी। रजोगुण में लोग लोभी बन जाते हैं और इन्द्रिय-भोग की उनकी लालसा की कोई सीमा नहीं होती। कोई भी यह देख सकता है कि भले ही किसी के पास प्रचुर धन हो और इंद्रिय तृप्ति के लिए पर्याप्त साधन हो,तभी तो वो भाई अपनी पत्नी के रहते भी पराई नारी को कुदृष्टि से देखता और पाने का हर यतन करता है।
लेकिन उसे न तो इस से कोई सुख मिलता है, न मनःशांति को ही प्राप्त होता है।
 ऐसा संभव भी नहीं है, क्योंकि वह रजोगुण में स्थित है। यदि कोई रंचमात्र भी सुख चाहता है, तो धन उसकी सहायता नहीं कर सकता, उसे कृष्णभावनामृत के अभ्यास से अपने सतोगुण में स्थित करना होगा। जब कोई रजोगुण में चूहा रहता है, तो वह मानसिक रूप से ही अप्रसन्न नहीं रहता, उसकी प्रवृत्ति और उसका व्यवसाय भी अत्यंत अहितकारी होता है। उसे अपनी सीमाएँ बनाए रखने के लिए अनेकानेक योजना बनानी होती हैं। यह सब अभिवंचक है। तमोगुण में लोग पागल हो जाते हैं। स्वार्थ  से बंध कर दूध त्याग कर के मद्य सेवन की शरण ग्रहण करते हैं और इस प्रकार वे अज्ञान के गर्त में अधिकाधिक स्तर के होते हैं। जीवन में उनका भविष्य - जीवन अंधकारमय होता है।इस प्रकार, सत्त्वगुण से ज्ञान उत्पन्न होता है, रजोगुण से लोभ उत्पन्न होता है, और तमोगुण से प्रमाद और मोह उत्पन्न होते हैं। इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण यह स्पष्ट करते हैं कि इन गुणों का व्यक्ति की मानसिक स्थिति और उसकी प्रवृत्तियों पर गहरा प्रभाव पड़ता है।
14 ॥17॥
भगवद  गीता अध्याय: 14
श्लोक 18

श्लोक:
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः।
 जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः॥

भावार्थ:
सत्त्वगुण में स्थित पुरुष स्वर्गादि उच्च लोकों को जाते हैं, रजोगुण में स्थित राजस पुरुष मध्य में अर्थात मनुष्य लोक में ही रहते हैं और तमोगुण के कार्यरूप निद्रा, प्रमाद और आलस्यादि में स्थित तामस पुरुष अधोगति को अर्थात कीट, पशु आदि नीच योनियों को तथा नरकों को प्राप्त होते हैं
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने बताया है कि व्यक्ति का गुण उसके जीवन की दिशा और परिणाम को कैसे प्रभावित करता है। सत्त्वगुण से व्यक्ति ऊँचाई की ओर बढ़ता है, राजसगुण से मनुष्य लोक में रहता है, और तमोगुण से नीच स्थितियों को प्राप्त होता है।
 14॥18॥
भगवद  गीता अध्याय: 14
श्लोक 19

श्लोक:
(भगवत्प्राप्ति का उपाय और गुणातीत पुरुष के लक्षण) नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति।
 गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति॥

भावार्थ:
जिस समय दृष्टा तीनों गुणों के अतिरिक्त अन्य किसी को कर्ता नहीं देखता और तीनों गुणों से अत्यन्त परे सच्चिदानन्दघनस्वरूप मुझ परमात्मा को तत्त्व से जानता है, उस समय वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।

जब कोई यह अच्छी तरह से जान लेता है कि सभी कार्यों में प्रकृति के स्तर के गुणों के अतिरिक्त कोई अन्य पात्र नहीं है और जब वह भगवान को जान लेता है, जो इन गुणवत्ता के गुणों से परे है, तो उसे मेरे दिव्य स्वभाव को प्राप्त होता है।

प्राकृतिक : प्राकृतिक महापुरुषों से केवल समझा कर और चरित्र से सीख कर मनुष्य प्रकृति के गुणों के साथ सभी कार्यकलापों को सीखा जा सकता है। वास्तविक गुरु कृष्ण और वे अर्जुन को यह दिव्य ज्ञान प्रदान कर रहे हैं। इसी प्रकार जो लोग पूर्णतया कृष्ण भावना से भावित हैं, वे प्रकृति के गुणों से भरपूर हैं, इस ज्ञान को सीखना होता है। अन्यथा मनुष्य का जीवन कुमार्ग में चलता है। प्रामाणिक गुरु के उपदेश (चाहे बच्चा हो मूर्ख हो प्राकृतिक वस्तु ऋतु, बंधु,बांधव,ही क्यों ना हो उस का चरित्र कैसा भी हो कभी कभी कोई पते की बात गुरु उपदेश में बता ही जाता है। उसे देखने की दृष्टि शुद्ध करनी होती है)

उस से जीव अपनी आध्यात्मिक स्थिति, अपना भौतिक शरीर, अपनी इंद्रियाँ, तथा प्रकृति के गुणों के बारे में अपनी सीख प्राप्त कर सकता है। 

वह इन दस्तावेजों में से एक है, लेकिन अपनी वास्तविक स्थिति को देखते हुए वह दिव्य स्तर प्राप्त कर सकता है, जिसमें आध्यात्मिक जीवन के लिए अवकाश होता है। अन्योन्याश्रित जीव विभिन्न कर्मों का कर्ता नहीं होता। उसका खोया हुआ कार्य करना है, क्योंकि वह विशेष प्रकार के शरीर में स्थित रहता है, जिसका ऑपरेशन प्रकृति का कोई गुण ही है। जब तक मनुष्य को किसी भी दार्शनिक वैज्ञानिक की सहायता नहीं मिलती, तब तक वह यह नहीं समझ पाता कि वह वास्तव में कहाँ स्थित है। प्रामाणिक गुरु की संगति से वह अपनी वास्तविक स्थिति को समझ सकता है और उसे समझने पर वह पूर्ण कृष्णभावनामृत में स्थिर हो सकता है।
कृष्णभावनाभावित व्यक्ति कभी भी प्रकृति के गुणों से परिपूर्ण तो होता नहीं क्यों कि प्रकृति का नियम ही परिवर्तन होता है। ऐसा ही चौथे अध्याय में बताया गया है कि जो कृष्ण की शरण में जाता है, वह प्रकृति के कार्य से मुक्त हो जाता है। जिस किसी वस्तु को यथारूप में देखा जा सकता है, उस पर प्रकृति का प्रभाव क्रमशः घटता ही जाता है। और आत्म ज्ञान मजबूत होता जाता है।
 
इस प्रकार, इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने हमें यह सिखाया है कि आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिए हमें गुणों के परे जाकर स्वयं को पहचानना ही होगा और सच्चे परमात्मा का अनुभव करना होगा।
14॥19॥
भगवद  गीता अध्याय: 14
श्लोक 20

श्लोक:
गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान्‌।
 जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते॥

भावार्थ:
यह पुरुष शरीर की (बुद्धि, अहंकार और मन तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच भूत, पाँच इन्द्रियों के विषय- इस प्रकार इन तेईस तत्त्वों का पिण्ड रूप यह स्थूल शरीर प्रकृति से उत्पन्न होने वाले गुणों का ही कार्य है, इसलिए इन तीनों गुणों को इसी की उत्पत्ति का कारण कहा है) उत्पत्ति के कारणरूप इन तीनों गुणों को उल्लंघन करके जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और सब प्रकार के दुःखों से मुक्त हुआ परमानन्द को प्राप्त होता है
 यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण और विस्तृत विषय है। आइए इसे एक-एक करके समझने की कोशिश करें:

शरीर की रचना और तत्त्व
हमारा शरीर कई तत्त्वों से मिलकर बना होता है, जिनमें से कुछ प्रमुख तत्त्व हैं:

1. *बुद्धि*: 
बुद्धि हमारी सोच और समझ की क्षमता है। यह हमें निर्णय लेने और समस्याओं का समाधान करने में मदद करती है।
2. *अहंकार*: 
अहंकार हमारी आत्म-चेतना और आत्म-सम्मान की भावना है। यह हमें अपने बारे में जानने और अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद करता है।
3. *मन*: 
मन हमारी भावनाओं और विचारों का केंद्र है। यह हमें अपने विचारों और भावनाओं को नियंत्रित करने में मदद करता है।
4. *पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ*: 
ज्ञानेन्द्रियाँ हमें बाहरी दुनिया के बारे में जानने में मदद करती हैं। ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं: 
आँखें, 
कान, 
नाक, 
जीभ ,
 त्वचा।
5. *पाँच कर्मेन्द्रियाँ*: 
कर्मेन्द्रियाँ हमें कार्य करने और बाहरी दुनिया के साथ बातचीत करने में मदद करती हैं। ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं: 
हाथ, 
पैर, 
मुँह, 
गुदा 
और जननांग।
6. *पाँच भूत*: 
भूत हमारे शरीर के मूल तत्त्व हैं। ये पाँच भूत हैं: 
पृथ्वी, 
जल, 
अग्नि, 
वायु 
और आकाश।
7. *पाँच इन्द्रियों के विषय*: इन्द्रियों के विषय हमारी इन्द्रियों के द्वारा अनुभव किए जाने वाले वस्तु हैं। ये पाँच इन्द्रियों के विषय हैं: 
रूप, 
शब्द, 
गंध, 
रस 
और स्पर्श।

तीनों गुणों का प्रभाव
अब, आइए देखें कि तीनों गुणों - सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण - का हमारे शरीर और मन पर क्या प्रभाव पड़ता है:

*सतोगुण*
सतोगुण का प्रभाव हमारे शरीर और मन पर शांति, संतुष्टि और ज्ञान की प्राप्ति के रूप में पड़ता है। सतोगुण के प्रभाव से हमारी बुद्धि और मन शांत और स्थिर होते हैं।

*रजोगुण*
रजोगुण का प्रभाव हमारे शरीर और मन पर उत्तेजना, चंचलता और लोभ की प्राप्ति के रूप में पड़ता है। रजोगुण के प्रभाव से हमारी बुद्धि और मन उत्तेजित और चंचल होते हैं।

*तमोगुण*
तमोगुण का प्रभाव हमारे शरीर और मन पर आलस्य, प्रमाद और अज्ञान की प्राप्ति के रूप में पड़ता है। तमोगुण के प्रभाव से हमारी बुद्धि और मन आलसी और अज्ञानी होते हैं।

निष्कर्ष
इस प्रकार, हम देख सकते हैं कि तीनों गुणों - सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण - का हमारे शरीर और मन पर अलग-अलग प्रभाव पड़ता है। सतोगुण का प्रभाव शांति और ज्ञान की प्राप्ति के रूप में पड़ता है, जबकि रजोगुण और तमोगुण का प्रभाव उत्तेजना, चंचलता और आलस का उत्पादन केंद्र है।
गुणों की प्रकृति को पार करना यानी इनके प्रभावों से परे होना ही मोक्ष की ओर ले जाता है। जब व्यक्ति इन गुणों के प्रभाव से मुक्त हो जाता है, तब वह वास्तविक सुख, शांति और अमृत का अनुभव करता है। यह श्लोक इस बात की ओर इशारा करता है कि आत्मज्ञान और योग के माध्यम से इन गुणों को पार करके ही शाश्वत आनंद और मुक्ति प्राप्त की जा सकती है।अभी मुक्ति प्राप्त नहीं हुई मान कर चलें। जब मुक्ति प्राप्त हो जाए गी तो वह कुछ बताने को वापिस ही क्यों आएगा?
जब देहधारी जीव भौतिक शरीर से सम्बद्ध इन मापदंडों को लाघने में सक्षम होता है, तो वह जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा और उनके कष्टों से मुक्त हो सकता है और इसी जीवन में अमृत का भोग कर सकता है।

जड़ी-बूटी: इस श्लोक में बताया गया है कि किस प्रकार के शरीर में कृष्णभावना भावित दिव्य दिव्य स्थिति में आ सकता है। संस्कृत शब्द देही का अर्थ देहधारी है। यद्यपि मनुष्य इस भौतिक शरीर के भीतर रहता है, लेकिन अपने आध्यात्मिक ज्ञान के विकास के द्वारा वह प्रकृति के गुणों के प्रभाव से मुक्त हो सकता है। वह इसी शरीर में आध्यात्मिक जीवन का सुखोपभोग कर सकता है, क्योंकि इस शरीर के बाद उसका वैकुंठ जाना निश्चित है। लेकिन वह इसी तरह शरीर में आध्यात्मिक सुख उठा सकता है। दूसरे शब्दों में, कृष्णभावनामृत में भक्ति करना भव-पाश से मुक्ति का संकेत है और अध्याय आठवें में इसका श्लोक है। जब मनुष्य की प्रकृति के गुणों का प्रभाव मुक्त हो जाता है, तो वह भक्ति में प्रविष्ट हो जाती है।
 यह श्लोक गीता के अध्याय 8 में आता है, जो इस प्रकार है:

"अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः।।"

इस श्लोक की व्याख्या इस प्रकार है:

"हे पार्थ! जो मुझे नित्य स्मरण करता है, जिसकी चेतना मुझमें नित्य लगी रहती है, वह मुझे बहुत ही आसानी से प्राप्त कर लेता है।"

जब मनुष्य की प्रकृति के गुणों का प्रभाव मुक्त हो जाता है, तो वह भक्ति में प्रविष्ट हो जाता है।

भक्ति करने से मनुष्य की प्रकृति के गुणों का प्रभाव मुक्त हो जाता है, क्योंकि भक्ति करने से मनुष्य की चेतना भगवान में लग जाती है, और वह अपने आप को भगवान के साथ जोड़ लेता है।

इस प्रकार, भक्ति करने से मनुष्य की प्रकृति के गुणों का प्रभाव मुक्त हो जाता है, और वह भगवान के साथ एकता का अनुभव करने लगता है।
गुणों की प्रकृति को पार करना यानी इनके प्रभावों से परे होना ही मोक्ष की ओर ले जाता है। जब व्यक्ति इन गुणों के प्रभाव से मुक्त हो जाता है, तब वह वास्तविक सुख, शांति और अमृत का अनुभव करता है। यह श्लोक इस बात की ओर इशारा करता है कि आत्मज्ञान और योग के माध्यम से इन गुणों को पार करके ही शाश्वत आनंद और मुक्ति प्राप्त की जा सकती है।
14॥20॥
भगवद  गीता अध्याय: 14
श्लोक 21

श्लोक:
अर्जुन उवाच कैर्लिङ्‍गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो।
 किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते॥

भावार्थ:
अर्जुन बोले- इन तीनों गुणों से अतीत पुरुष किन-किन लक्षणों से युक्त होता है और किस प्रकार के आचरणों वाला होता है तथा हे प्रभो! मनुष्य किस उपाय से इन तीनों गुणों से अतीत होता है?
 अब अर्जुन ने इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण से तीन गुणों (सत्त्व, रजस और तमस) के पार जाने वाले व्यक्ति के लक्षणों और उनके आचरण के बारे में प्रश्न किया है।
सत्त्व, रजस, और तमस ये तीन गुण प्रकृति के मूल तत्व हैं जो सभी जीवों और वस्तुओं में विद्यमान होते हैं। इन गुणों का प्रभाव हमारे कार्यों, स्वभाव, और व्यक्तित्व पर पड़ता है।
अर्जुन यहां यह जानना चाहते हैं कि जो व्यक्ति इन गुणों से अतीत होता है, उसके व्यवहार और आचरण में क्या विशेषताएँ होती हैं। इस सवाल के माध्यम से अर्जुन यह भी जानना चाहते हैं कि एक साधक या साधक इस स्थिति को कैसे प्राप्त कर सकता है और इन गुणों के प्रभाव से मुक्त हो सकता है।
और वो श्लोक का यह प्रश्न गहराई से समझने का प्रयास भी करता है कि आदर्श स्थिति में पहुँचने के लिए व्यक्ति को क्या विशेषताएँ अपनानी चाहिए और किस प्रकार के आचरण को अपनी दिनचर्या में शामिल करना चाहिए ताकि वह इन गुणों से परे जाकर आत्म-साक्षात्कार और मोक्ष की ओर बढ़ सके।

इस श्लोक में अर्जुन के प्रश्न अत्यंत उपयुक्त हैं। वह उस पुरुष के लक्षण जानना चाहता है, जिसने भौतिक गुणों को लाँघ लिया है। पहली बार वह ऐसे दिव्य पुरुष के रहस्योद्घाटन के विषय में जिज्ञासा व्यक्त करता है कि कोई कैसे समझे कि वह प्रकृति के गुणों का प्रभाव ला रहा है? 
उनका दूसरा प्रश्न है कि ऐसा व्यक्ति किस प्रकार रहता है और उसका कार्यकलाप क्या है? 
वे नियमित रूप से क्या होते हैं, या उपज? 
फिर अर्जुन उन संगीतकार के विषय में पूछते हैं, जिससे दिव्य प्रकृति (प्रकृति) प्राप्त की जा सके। यह अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब तक किसी प्रत्यक्ष संगीतकार को पता नहीं चला, रेनॉल्ट वह हमेशा दिव्य पद पर स्थित रही, तब तक दवा के दर्शन का प्रश्न ही नहीं। अतेव अर्जुन द्वारा पूछे गए ये सारे प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण हैं और भगवान उनके उत्तर देते हैं।
14॥21॥

भगवद  गीता अध्याय: 14
श्लोक 22

श्लोक:
श्रीभगवानुवाच प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव।
 न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्‍क्षति॥

भावार्थ:
श्री भगवान बोले- हे अर्जुन! जो पुरुष सत्त्वगुण के कार्यरूप प्रकाश (अन्तःकरण और इन्द्रियादि को आलस्य का अभाव होकर जो एक प्रकार की चेतनता होती है, उसका नाम 'प्रकाश' है) को और रजोगुण के कार्यरूप प्रवृत्ति को तथा तमोगुण के कार्यरूप मोह (निद्रा और आलस्य आदि की बहुलता से अन्तःकरण और इन्द्रियों में चेतन शक्ति के लय होने को यहाँ 'मोह' नाम से समझना चाहिए) को भी न तो प्रवृत्त होने पर उनसे द्वेष करता है और न निवृत्त होने पर उनकी आकांक्षा करता है। (जो पुरुष एक सच्चिदानन्दघन परमात्मा में ही नित्य, एकीभाव से स्थित हुआ इस त्रिगुणमयी माया के प्रपंच रूप संसार से सर्वथा अतीत हो गया है, उस गुणातीत पुरुष के अभिमानरहित अन्तःकरण में तीनों गुणों के कार्यरूप प्रकाश, प्रवृत्ति और मोहादि वृत्तियों के प्रकट होने और न होने पर किसी काल में भी इच्छा-द्वेष आदि विकार नहीं होते हैं, यही उसके गुणों से अतीत होने के प्रधान लक्षण है)
 भगवान अर्जुन से कहते हैं कि जो व्यक्ति सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण के कार्यरूपों को इस प्रकार समझता है कि प्रकाश (सत्त्वगुण), प्रवृत्ति (रजोगुण) और मोह (तमोगुण) को वह न तो प्रवृत्त होने पर द्वेष करता है और न ही निवृत्त होने पर उनकी आकांक्षा करता है, वह गुणातीत होता है।
यह श्लोक उन गुणातीत व्यक्तियों की विशेषता का वर्णन करता है जो त्रिगुणमयी माया से परे होकर परमात्मा में स्थित होते हैं। ऐसे व्यक्ति का अन्तःकरण कभी भी तीनों गुणों के कार्यरूप प्रकाश, प्रवृत्ति और मोह की स्थिति पर न तो आकर्षित होता है और न ही इनमें कोई द्वेष करता है।
इस प्रकार, गुणातीत व्यक्ति का मन इन गुणों की स्थिति को लेकर किसी भी प्रकार की भावना या विकार से मुक्त रहता है। यह श्लोक हमें बताता है कि सच्चे योगी का मन इन तीनों गुणों के प्रभावों से अछूता रहता है और इस प्रकार वह आत्मा के वास्तविक स्वरूप को समझने में सक्षम होता है।
भगवान ने कहा- हे पाण्डुपुत्र! जो प्रकाश, आस्तिक और मोह के उपस्थित होने पर न तो अपनी घृणा करता है और न ही लुप्त हो जाता है पर अपनी इच्छा पूरी करता है, जो भौतिक गुणों के समग्र लक्ष्यों से निश्छल और अविचलित रहता है और यह जानना कि केवल गुण ही क्रियाशील हैं, नट और दिव्य बना रहता है, जो आपके भीतर स्थित है और सुख और दुःख को एक समान दर्शाता है, जो मिट्टी के ढेले, पत्थर और सोने के टुकड़ों को समान दृष्टि से देखता है, जो अनुरूप और विपरीत के प्रति समान बना हुआ है, जो धीर है और प्रशंसा तथा बुराई, मनुष्य और अपमान में समान व्यवहार से रहता है, जो शत्रु और मित्र के साथ समान व्यवहार करता है और जो सभी भौतिक कार्यों का परित्याग करता है, उस व्यक्ति को प्रकृति के गुणों से समान व्यवहार कहा जाता है।

भगवान कृष्ण से अर्जुन ने तीन प्रश्न पूछे और उन्होंने क्रमशः एक-एक का उत्तर दिया । इन श्लोकों में कृष्ण पहले यह संकेत देते हैं कि जो व्यक्ति दिव्य पद पर स्थित है, वह न तो किसी से चाहत रखता है और न ही किसी वस्तु के लिए लालायित रहता है। जब कोई जीव इस संसार में भौतिक शरीर से युक्त रहता है, तो यह भरा होना चाहिए कि वह प्रकृति के तीन गुणों में से किसी एक के वश में है। जब वह इस शरीर से बाहर हो जाता है, तो वह प्रकृति के गुणों से मुक्त हो जाता है। परन्तु जब तक वह शरीर से बाहर न जाए, तब तक उस पर ध्यान न दिया जाए। उसे भगवान की भक्ति में लगना चाहिए, जिससे भौतिक देह से उसका ममत्व स्वतः विस्मृत हो जाए। जब मानव भौतिक शरीर की प्रति जागृति रखता है तो वह केवल इंद्रिय तृप्ति के लिए कर्म करता है, लेकिन जब वह अपनी भौतिक शरीर की प्रति जागृति रखता है, तो इंद्रिय तृप्ति स्वतः रुक जाती है। मनुष्य को इस भौतिक शरीर की आवश्यकता नहीं है और उसे इस भौतिक शरीर का पालन करने की आवश्यकता नहीं है। शरीर के भौतिक गुण कार्य करेंगे, लेकिन आत्मा ऐसे कार्यों से अलग रहेगी। वह किस प्रकार का पृथक्करण होता है? वह न तो शरीर का भोग करना चाहता है, न कोई बाहर जाना चाहता है। इस प्रकार दिव्य पद पर स्थित भक्त स्वयंमेव मुक्त हो जाता है। उसे प्रकृति के गुणों के प्रभाव से मुक्त होने के लिए किसी भी प्रयास की आवश्यकता नहीं रह जाती है।
अगला प्रश्न दिव्य पद पर आसीन व्यक्ति के व्यवहार से संबंधित है। भौतिक पद पर स्थित किसी व्यक्ति के शरीर से मिलने वाले कथित मान और अपमान से प्रभावित नहीं होता है, लेकिन दिव्य पद पर स्थित किसी व्यक्ति के शरीर से मिलने वाले कथित मान और अपमान से प्रभावित नहीं होता है। वह कृष्णभावनामृत में अपना कर्तव्य निभाती है और इसकी चिंता यह नहीं करती कि कोई व्यक्ति उसका सम्मान करता है या उसका अपमान करता है। वह जिन बातों को स्वीकार कर लेता है, जो कृष्णभावनामृत में उसके कर्तव्य के अनुकूल हैं, अन्यथा उसे किसी भौतिक वस्तु की आवश्यकता नहीं रहती, खोखला वह पत्थर हो या सोना। वह प्रत्येक व्यक्ति को जो कृष्णभावनामृत के सम्पादन में उसकी सहायता करता है, अपना मित्र चिन्हित करता है और वह अपने कथित शत्रु से भी घृणा नहीं करता है। वह समभाव वाला होता है और सारि कब्रगाह को एक ही बार में देखा जाता है, क्योंकि उसे यह भलीभाँति पता चलता है कि उसे इस संसार से कुछ भी लेना-देना नहीं है। उन्हें सामाजिक और राजनीतिक विषय तनिक से भी प्रभावित नहीं किया गया, क्योंकि उन्होंने उद्घाटित-विषयों और उत्पदों की स्थिति को देखा है। वह अपने लिए कोई कर्म नहीं करता। कृष्ण के लिए वह कुछ भी कर सकता है, लेकिन अपने लिए वह किसी भी प्रकार का प्रयास नहीं करता है। ऐसे आचरण से मनुष्य वास्तव में दिव्य पद पर स्थित हो सकता है।

 14॥22॥
भगवद  गीता अध्याय: 14
श्लोक 23

श्लोक:
उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते।
 गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्‍गते॥

भावार्थ:
जो साक्षी के सदृश स्थित हुआ गुणों द्वारा विचलित नहीं किया जा सकता और गुण ही गुणों में बरतते (त्रिगुणमयी माया से उत्पन्न हुए अन्तःकरण सहित इन्द्रियों का अपने-अपने विषयों में विचरना ही 'गुणों का गुणों में बरतना' है) हैं- ऐसा समझता हुआ जो सच्चिदानन्दघन परमात्मा में एकीभाव से स्थित रहता है एवं उस स्थिति से कभी विचलित नहीं होता।
उदासीनवदासीनो: इस शब्द का अर्थ है "साक्षी के समान निष्कलंक रहना"। इसका तात्पर्य है कि एक व्यक्ति उन गुणों से प्रभावित नहीं होता और गुणों के बदलते प्रभावों से परे रहता है। तटस्थ रहता है
गुणैर्यो न विचाल्यते: इसका मतलब है कि वह व्यक्ति गुणों द्वारा विचलित नहीं होता। इसका संकेत है कि इस व्यक्ति का स्वभाव इतनी स्थिरता और जागरूकता से भरा होता है कि वह गुणों के स्वभाविक बदलाव से अप्रभावित रहता है। डांवाडोल नहीं होता
गुणा वर्तन्त इत्येव: यह वाक्यांश दर्शाता है कि गुण अपने-अपने स्वरूप में रहते हैं। अर्थात्, सत्त्व, रजस और तमस अपने-अपने गुणों के अनुसार कार्यरत रहते हैं और यही उनकी स्वाभाविक स्थिति है।ज्ञान प्राप्ति के बाद भी जैसा है वैसा ही रहता है।कभी बदलता नहीं।
योऽवतिष्ठति नेङ्‍गते: इसका अर्थ है कि जो व्यक्ति इन गुणों के स्वभाव को जानकर परमात्मा में स्थित रहता है, वह इन गुणों के परिवर्तन से विचलित नहीं होता। वह स्थिरता और शांति की स्थिति में रहता है।
अर्थात, जब कोई व्यक्ति इस सच्चाई को समझता है कि गुण केवल माया के अभिव्यक्तियाँ हैं और स्वयं परमात्मा में स्थित रहता है, तो वह सभी भौतिक गुणों और उनके प्रभावों से अछूता और स्थिर रहता है। इस प्रकार, वह शाश्वत और शुद्ध ब्रह्म के साथ एकीकृत हो जाता है, और गुणों के प्रभावों से खुद को मुक्त ही रखता है।
14॥23॥
भगवद  गीता अध्याय: 14
श्लोक 24

श्लोक:
समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः।
 तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः॥

भावार्थ:
जो निरन्तर आत्म भाव में स्थित, दुःख-सुख को समान समझने वाला, मिट्टी, पत्थर और स्वर्ण में समान भाव वाला, ज्ञानी, प्रिय तथा अप्रिय को एक-सा मानने वाला और अपनी निन्दा-स्तुति में भी समान भाव वाला है
 इस श्लोक में भगवद गीता के अध्याय 14 के अंतर्गत प्रकृति के तीन गुणों के संदर्भ में आत्मा के गुणों का वर्णन किया गया है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण एक व्यक्ति के गुणों का वर्णन करते हैं जो उसे गुण और कर्म के प्रति दृष्टिकोण में स्थिर बनाए रखते हैं।
समदुःखसुखः स्वस्थः: यह व्यक्ति जो सुख और दुःख को समान दृष्टि से देखता है। उसके लिए दुःख और सुख एक ही हैं, जिससे वह मानसिक और भावनात्मक रूप से संतुलित रहता है।
समलोष्टाश्मकाञ्चनः: यह व्यक्ति मिट्टी, पत्थर और स्वर्ण को समान मानता है। उसकी दृष्टि में, भौतिक वस्तुओं की महत्ता और मूल्य में कोई अंतर नहीं है। यह गुण उसकी अद्वितीयता और तटस्थता को दर्शाता है।
तुल्यप्रियाप्रियो धीरः: यह व्यक्ति प्रिय और अप्रिय वस्तुओं को समान मानता है। उसके लिए किसी चीज़ की प्रियता या अप्रियता का कोई महत्व नहीं है; वह सभी परिस्थितियों में स्थिर रहता है।
तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः: यह व्यक्ति अपनी निन्दा और स्तुति को समान रूप से स्वीकार करता है। उसकी आंतरिक स्थिति न तो निन्दा से प्रभावित होती है और न ही स्तुति से। यह गुण उसे एक स्थिर और संतुलित व्यक्ति बनाता है।
इस प्रकार, इस श्लोक में वर्णित व्यक्ति वह है जो जीवन की अस्थिरताओं और भौतिक वस्तुओं की क्षणिकता से परे एक स्थिर, संतुलित और समझदार दृष्टिकोण अपनाता है। यह आत्मज्ञान की ओर एक महत्वपूर्ण कदम को दर्शाता है, जहाँ व्यक्ति बाहरी परिस्थितियों से अप्रभावित रहते हुए आंतरिक शांति प्राप्त करता है।
14॥24॥
भगवद  गीता अध्याय: 14
श्लोक 25

श्लोक:
मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः।
 सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः सा उच्यते॥

भावार्थ:
जो मान और अपमान में सम है, मित्र और वैरी के पक्ष में भी सम है एवं सम्पूर्ण आरम्भों में कर्तापन के अभिमान से रहित है, वह पुरुष गुणातीत कहा जाता है
 14॥25॥
भगवद  गीता अध्याय: 14
श्लोक 26

श्लोक:
मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते।
 स गुणान्समतीत्येतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते॥

भावार्थ:
और जो पुरुष अव्यभिचारी भक्ति योग (केवल एक सर्वशक्तिमान परमेश्वर वासुदेव भगवान को ही अपना स्वामी मानता हुआ, स्वार्थ और अभिमान को त्याग कर श्रद्धा और भाव सहित परम प्रेम से निरन्तर चिन्तन करने को 'अव्यभिचारी भक्तियोग' कहते हैं) द्वारा मुझको निरन्तर भजता है, वह भी इन तीनों गुणों को भलीभाँति लाँघकर सच्चिदानन्दघन ब्रह्म को प्राप्त होने के लिए योग्य बन जाता है
 इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि जो व्यक्ति अव्यभिचारी भक्ति योग से उनकी पूजा करता है, वह तीनों गुणों (सत्व, रजस और तमस) को पार कर ब्रह्म के स्तर तक पहुँच जाता है।
अव्यभिचारी भक्ति योग का अर्थ है सच्चे प्रेम और श्रद्धा के साथ भगवान की सेवा करना, जिसमें किसी भी प्रकार के स्वार्थ, अभिमान, या भौतिक लाभ की कामना नहीं होती। यह भक्ति पूरी तरह से भगवान की ओर समर्पित होती है और उनके प्रति अनन्य प्रेम की भावना से प्रेरित होती है।
ऐसे भक्त, जो इस अव्यभिचारी भक्ति योग को अपनाते हैं, वे इन तीनों गुणों की सीमाओं को पार कर सकते हैं। सत्व गुण का प्रभाव ज्ञान और प्रकाश का होता है, रजस का प्रभाव कर्म और कार्य का होता है, और तमस का प्रभाव अज्ञान और आलस्य का होता है। भक्ति योग के माध्यम से, जब व्यक्ति भगवान के प्रति पूरी निष्ठा और समर्पण रखता है, तो वह इन गुणों के प्रभाव से ऊपर उठ जाता है और परम सत्य, जिसे 'सच्चिदानन्दघन ब्रह्म' कहते हैं, को प्राप्त करने के लिए तैयार हो जाता है।
इस प्रकार, श्लोक 26 यह सिखाता है कि सच्ची भक्ति और समर्पण के माध्यम से व्यक्ति उन गुणों के बंधनों को पार कर सकता है जो उसे सांसारिक जीवन की सीमाओं में बांधते हैं और उसे आत्मा की उच्चतम स्थिति में पहुंचा सकते हैं।
14॥26॥
भगवद  गीता अध्याय: 14
श्लोक 27

श्लोक:
ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च।
 शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च॥

भावार्थ:
क्योंकि उस अविनाशी परब्रह्म का और अमृत का तथा नित्य धर्म का और अखण्ड एकरस आनन्द का आश्रय मैं हूँ
 इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने बताया है कि वे ही ब्रह्म (अपरिवर्तनीय परब्रह्म) का आधार हैं, वे ही अमृत और अव्यय (नाश से परे) हैं। वे ही शाश्वत धर्म (अनन्त धर्म) और सुख (शाश्वत सुख) का स्रोत भी हैं। यहां श्रीकृष्ण यह स्पष्ट कर रहे हैं कि ब्रह्मा, विष्णु और शिव जैसी परम शक्ति के रूप में भगवान श्रीकृष्ण स्वयं ही हर चीज के अस्तित्व का आधार हैं। उनके बिना कोई भी शक्ति, धर्म या सुख सम्भव नहीं है।
श्लोक में यह भी कहा गया है कि श्रीकृष्ण ही सच्चे सुख का स्थायी स्रोत हैं और उन्होंने यह भी स्पष्ट किया है कि वे अनंत और अविनाशी हैं। इस प्रकार, श्लोक यह संज्ञान दिलाता है कि भगवान श्रीकृष्ण की उपासना से हम अनन्त सुख और शाश्वत धर्म की प्राप्ति कर सकते हैं।भगवान श्रीकृष्ण का यह संदेश हमें यह समझने में मदद करता है कि भगवान की उपासना और उनके गुणों का स्मरण हमारे जीवन में स्थायित्व, शाश्वत सुख और सही दिशा प्रदान कर सकता है। यह श्लोक आत्मा की अमरता और परमात्मा के अद्वितीय अस्तित्व की पुष्टि करता है।
14॥27॥ 
 
 ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायांयोगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे गुणत्रयविभागयोगो नामचतुर्दशोऽध्यायः
 अध्याय॥14॥ समाप्त

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