सोमवार, 26 जनवरी 2026

देश के लिए एक रहो


देश के लिए एक रहोगे , तो नेक रहोगे।
सत्ता के लिए एक रहोगे , तो आपस में लड़ोगे 

यह एक शक्तिशाली दोहा है जो भारतीय राजनीति की कड़वी सच्चाई को उजागर करता है। मैंने इसे आधार बनाकर एक संक्षिप्त लेकिन विचारोत्तेजक लेख तैयार किया है, जो राष्ट्रीय एकता और सत्ता की लालच पर केंद्रित है।
 देश के लिए एक रहोगे, तो नेक रहोगे; सत्ता के लिए एक रहोगे, तो आपस में लड़ोगे
भारतीय राजनीति का एक ऐसा दोहा है जो सदियों पुरानी लोक-चेतना को प्रतिबिंबित करता है: "देश के लिए एक रहोगे, तो नेक रहोगे। सत्ता के लिए एक रहोगे, तो आपस में लड़ोगे।" यह पंक्तियाँ न केवल राजनीतिक दलों की आंतरिक कलह को चित्रित करती हैं, बल्कि हमें सोचने पर मजबूर करती हैं कि क्या हमारा लोकतंत्र सत्ता की भूख में खो गया है? आज जब देश आर्थिक चुनौतियों, सीमा विवादों और सामाजिक ध्रुवीकरण से जूझ रहा है, यह दोहा और भी प्रासंगिक हो जाता है।

सत्ता की लालच: आपसी लड़ाई का मूल कारण

भारतीय राजनीति में सत्ता का मोह हमेशा से विभाजन का कारण रहा है। स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस की एकछत्र सत्ता से लेकर आज के बहुदलीय गठबंधनों तक, हर दौर में नेताओं ने सत्ता के लिए अपनी ही पार्टी को तोड़ने का पाप किया है। उदाहरण लें तो 1977 का आपातकाल के बाद का दौर, जब जनता पार्टी का गठबंधन मात्र 28 महीनों में आपसी ईर्ष्या में बिखर गया। आजकल भी देखें—कई दलों में अध्यक्ष पद, टिकट वितरण या गठबंधन फॉर्मूले को लेकर खुलेआम बगावतें हो रही हैं। क्यों? क्योंकि सत्ता व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा बन जाती है। दोहा सही कहता है:
 *सत्ता के लिए एक होने का मतलब है एक-दूसरे की कमजोरी ढूँढना, क्योंकि विजेता केवल एक ही होता है।*
 देश के लिए एकता: नेकता का आधार
दूसरी ओर, जब राजनीति
 *देश के लिए*
 होती है, तो नेकता स्वाभाविक रूप से उभरती है। 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन या 1971 का बांग्लादेश युद्ध इसका जीवंत प्रमाण हैं, जहाँ विपक्षी नेता भी राष्ट्रहित में एकजुट हुए। आज भी, कोविड-19 महामारी या ऑपरेशन सिंदूर जैसे संकटों में पार्टियाँ एक मंच पर आती हैं। लेकिन यह एकता क्षणिक क्यों रह जाती है? समस्या यह है कि सत्ता की कुर्सी पर बैठते ही नेकता कुर्सी के नीचे दब जाती है। यदि नेता देश को प्राथमिकता दें—जैसे किसान कल्याण, शिक्षा सुधार या जलवायु परिवर्तन पर—तो आपसी लड़ाई की गुंजाइश ही कहाँ बचेगी?

 आगे का रास्ता: नेक राजनीति की जरूरत
समय आ गया है कि राजनीतिक दल इस दोहे को आत्मसात करें। युवा नेतृत्व, आंतरिक लोकतंत्र और पारदर्शी चुनाव प्रक्रिया ही सत्ता-लिप्सा को रोक सकती है। वोटरों को भी जागरूक होना होगा—हम सत्ता के लिए लड़ने वालों को नहीं, देश के लिए एक रहने वालों को चुनें। केवल तभी हम एक मजबूत, नेक भारत का निर्माण कर पाएँगे।

देश के लिए एक, सत्ता के लिए लड़देश के लिए एक रहोगे, तो नेक रहोगे,

सत्ता के मोह में डूबे, आपस में लड़ोगे।
कुर्सी की लालच में भूले राष्ट्र का भला,
भाई-भाई के विरुद्ध, बने शत्रु सदा।

गठबंधन टूटें, वादे हो जाएँ धूल,
सत्ता की भूख में जलें, सबका मन भूल।

एकता का दीपक जला, देशहित में मिलो,
नेक बनकर चलो सब, अन्यथा सब हिलो।

विपक्ष हो या सत्ता, देश ही तो धर्म है,
सत्ता के खेल में मत, राष्ट्र को हरम है।

जब संकट घेरे आये, एक हो जाओ प्राणी,
नेकी का फल मिलेगा, लड़ाई से नहीं भाई।

देश के लिए एक रहोगे, तो नेक रहोगे,
सत्ता के लिए एक रहोगे, तो आपस में लड़ोगे।

मंगलवार, 21 अक्टूबर 2025

हास्य अभिनेता असरानी

असरानी हास्य अभिनेता
जन्म
1 जनवरी 1941 (आयु 84)
जयपुर, राजस्थान
मौत
20-10-2025
शिक्षा
स्नातक
शिक्षा की जगह
राजस्थान महाविद्यालय,
भारतीय फिल्म और टेलिविज़न संस्थान, पुणे
पेशा
अभिनेता, निर्माता
कार्यकाल
1967- 2025
जीवनसाथी
मंजु असरानी
पुरस्कार
फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता पुरस्कार

1977 में असरानी ने फ़िल्म आलाप में दो गाने गाए जो उन्ही पर फ़िल्माए गए थे। अगले साल उन्होंने फ़िल्म फूल खिले हैं गुलशन गुलशन में प्रसिद्ध पार्श्वगायक किशोर कुमार के साथ एक गाना गाया।

असरानी का जन्म सिंधी परिवार में हुआ था। देश के बँटवारे के पश्चात उनका परिवार जयपुर आ गया था। 

निर्देशक के रूप में
1997 उड़ान
1992 दिल ही तो है
1979 सलाम मेमसाब
1977 चला मुरारी हीरो बनने
1974 आम्दाबाद नो रिकशावालो गुजराती फ़िल्म

फिल्में जिनमें उन्हों ने अभिनय किया

2007 ढोल hindi film
2007 धमाल
2007 शाकालाका बूम बूम
2007 भूल भुलैया
2007 फौज में मौज
2007 फूल एन फाइनल लालवानी
2006 मालामाल वीकली
2006 मैं रॉनी और जॉनी
2006 भागम भाग
2006 चुप चुप के
2005 केज़्स अंग्रेजी फ़िल्म
2005 गरम मसाला मैक के मामा
2005 एलान
2005 क्योंकि
2005 खुल्लम खुल्ला प्यार करें
2005 दीवाने हुए पागल अंधा आदमी
2005 इन्सान
2004 शर्त
2004 सुनो ससुर जी
2004 एक से बढ़कर एक
2004 बॉल एंड चेन पापा अंग्रेजी फ़िल्म
2004 हलचल वकील शर्मा
2003 मुम्बई मैटिनी प्यारेलाल
2003 बाघबान
2003 तुझे मेरी कसम
2002 चलो इश्क लड़ायें पापा
2002 अँखियों से गोली मारे
2002 विस्फोट
2002 दिल विल प्यार व्यार
2002 आवारा पागल दीवाना
2001 ये तेरा घर ये मेरा घर
2001 लज्जा
2001 आमदनी अठन्नी खर्चा रुपइया
2000 आगाज़
2000 कारोबार चंपक
2000 हेरा फेरी बैंक मैनेजर
2000 शिकार
2000 मेला
2000 चल मेरे भाई
2000 हर दिल जो प्यार करेगा
2000 तेरा जादू चल गया
1999 न्यायदाता पंडित तोताराम
1999 हीरालाल पन्नालाल
1999 मदर जॉनी
1999 इन्टरनेशनल खिलाड़ी
1999 हसीना मान जायेगी
1999 कारतूस
1999 राज कुमारुडु पुलिस वाला तेलुगु फ़िल्म
1998 हंसते हंसते
1998 दुल्हे राजा
1998 हीरो हिन्दुस्तानी
1998 मेहंदी
1998 घरवाली बाहरवाली
1998 बड़े मियाँ छोटे मियाँ
1997 मेरे सपनों की रानी
1997 सनम पुलिस इंस्पेक्टर
1997 दो आँखें बारह हाथ
1997 उड़ान
1997 ज़मीर
1997 राजा की आयेगी बारात
1996 छोटा सा घर
1996 शोहरत
1996 विजेता
1995 अनोखा अंदाज़
1995 दिया और तू्फान
1995 तकदीरवाला
1995 किस्मत
1995 इम्तिहान नंदू
1995 गुंडाराज
1995 बाज़ी
1995 राम शस्त्र
1994 घर की इज्जत
1994 आग और चिन्गारी
1994 बेटा हो तो ऐसा
1994 हंसते खेलते
1993 बड़ी बहन बलराम
1993 दिल तेरा आशिक
1993 गीतांजली
1993 मुकाबला
1993 गर्दिश
1993 गुरुदेव
1993 संतान चंपक
1993 संग्राम
1992 आई लव यू
1992 इन्तेहा प्यार की
1992 एक लड़का एक लड़की
1992 इसी का नाम ज़िन्दगी मुनीम
1992 जो जीता वही सिकन्दर
1992 अधर्म
1992 जीना मरना तेरे संग
1991 सपनों का मन्दिर
1991 प्रतिकार
1991 हग तूफान
1991 साथी
1991 धर्म संकट
1991 प्रेम कैदी
1991 कर्ज़ चुकाना है
1990 बाप नम्बरी बेटा दस नम्बरी
1990 इज़्ज़तदार काँस्टेबल
1990 प्यार का कर्ज़
1990 मुकद्दर का बादशाह
1990 जवानी ज़िन्दाबाद बनारसी का बेटा
1990 आज का अर्जुन
1990 प्यार का देवता
1990 प्यार के नाम कुर्बान
1989 नाइंसाफी
1989 रखवाला
1989 घराना
1989 कानून की आवाज़
1989 नफ़रत की आँधी
1989 पाप का अंत
1989 सिक्का प्यारेलाल
1989 मज़बूर पुलिस काँस्टेबल
1989 दोस्त
1989 जैसी करनी वैसी भरनी
1989 बड़े घर की बेटी
1989 हम भी इंसान हैं
1988 गंगा तेरे देश में
1988 मुलज़िम
1988 चरणों की सौगन्ध
1988 शुक्रिया
1988 सोने पे सुहागा
1988 बीवी हो तो ऐसी
1988 तमाचा
1988 दरिया दिल
1988 मर मिटेंगे
1988 कमांडो
1988 अग्नि
1988 प्यार का मंदिर भिखारी
1987 हिम्मत और मेहनत
1987 मर्द की ज़बान
1987 जवाब हम देंगे
1987 मजाल
1987 औलाद राजा
1987 शेर शिवाजी
1987 सिंदूर चुन्नी लाल
1986 दिलवाला
1986 दोस्ती दुश्मनी वकील
1986 आग और शोला
1986 मुद्दत हीरा
1986 स्वर्ग से सुन्दर
1986 धर्म अधिकारी
1986 लव 86 हनुमान
1986 ऐसा प्यार कहाँ कस्तूरी
1986 इंसाफ़ की आवाज़
1985 हकीकत हवलदार महिपाल सिंह
1985 मेरा साथी राम कुमार
1985 सरफ़रोश
1985 सत्यमेव जयते
1985 यादों की कसम
1985 होशियार
1985 देखा प्यार तुम्हारा
1985 तेरी मेहरबानियाँ
1985 संजोग चंदू
1985 आखिर क्यों?
1985 सुर संगम
1985 पाताल भैरवी
1985 प्यार झुकता नहीं जैकी
1985 मेरा घर मेरे बच्चे
1985 वफ़ादार
1985 तवायफ़ काँस्टेबल पाँडया
1984 आज का एम एल ए राम अवतार
1984 लव मैरिज
1984 कैदी शर्मा
1984 नया कदम
1984 मकसद दास
1984 घर एक मन्दिर
1984 ये इश्क नहीं आसां
1984 आशा ज्योति
1984 झूठा सच
1984 मेरा फैसला
1983 वान्टेड
1983 बेकरार
1983 एक बार चले आओ मदन लालबहादुर
1983 हिम्मतवाला भूषण
1983 शुभ कामना
1983 अगर तुम ना होते चंदू
1983 जानी दोस्त
1983 मुझे इंसाफ चाहिये
1983 मवाली
1983 जस्टिस चौधरी अलेक्ज़ेंडर ए एंथनी
1983 अंधा कानून काँस्टेबल असरानी
1983 प्रेम तपस्या
1982 राज महल
1982 आपस की बात
1982 निकाह सैफ़
1982 सितम
1982 मेहंदी रंग लायेगी
1982 संबंध
1982 हमारी बहू अलका
1982 मैं इन्तकाम लूँगी
1981 मेरी आवाज़ सुनो
1981 जमाने को दिखाना है
1981 एक ही भूल
1981 आस पास
1981 एक दूजे के लिये
1980 द बर्निंग ट्रेन
1980 टक्कर प्रीतम
1980 एग्रीमेंट
1980 माँग भरो सजना
1980 बंदिश मुरली
1980 यह कैसा इंसाफ़
1980 स्वयंवर
1979 जाने-ए-बहार
1979 सलाम मेमसाब सुन्दर
1979 बातों बातों में
1979 दो लड़्के दो कड़्के रामू
1979 जुर्माना
1979 सरगम
1979 अहिंसा
1979 हमारे तुम्हारे
1979 ढ़ोंगी
1978 पति पत्नी और वो दुर्रानी
1978 नालायक
1978 बदलते रिश्ते अनूपचंद्र ठाकुर
1978 दिल्लगी
1978 घर
1978 फूल खिले हैं गुलशन गुलशन विशाल का दोस्त
1978 डाकू और जवान
1978 हीरालाल पन्नालाल
1977 चला मुरारी हीरो बनने
1977 कसम कानून की
1977 चोर सिपाही डॉक्टर
1977 अब क्या होगा
1977 पलकों की छाँव में
1977 कलाबाज़ चंगू
1977 छलिया बाबू
1977 आलाप गणेश (गणेशी)
1977 साहेब बहादुर आइनू
1977 अनुरोध
1977 कर्म
1977 ड्रीम गर्ल
1977 जाग्रति
1977 हीरा और पत्थर
1977 आप की खातिर
1977 चाँदी सोना अब्दुल्ला
1977 कोतवाल साब
1977 प्रियतमा
1977 खून पसीना मोहन शर्मा
1977 चक्कर पे चक्कर
1976 भला मानस
1976 फकीरा
1976 बालिका बधू शरत
1976 महबूबा
1976 भँवर
1976 उधार का सिंदूर
1976 तपस्या विनोद सिन्हा
1976 हेरा फेरी
1976 लैला मज़नू
1976 चरस
1976 आप बीती
1975 अपने रंग हज़ार
1975 उलझन
1975 सुनहरा संसार
1975 रफ़ू चक्कर
1975 छोटी सी बात
1975 चुपके चुपके
1975 राजा
1975 चैताली
1975 शोले जेलर
1975 मिली
1975 मज़ाक
1975 उमर कैद
1975 आक्रमण
1975 खुशबू
1974 आम्दाबाद नो रिकशावालो गुजराती फ़िल्म
1974 दुनिया का मेला
1974 त्रिमूर्ति भोला
1974 पाप और पुण्य
1974 चोर मचाये शोर
1974 प्रेम नगर
1974 अजनबी चेतन कुमार
1974 चरित्रहीन
1974 रोटी
1974 हमशक्ल चक्रम
1974 विदाई मुरली व भास्कर दोहरी भूमिका
1974 पैसे की गुड़िया
1974 आप की कसम
1973 अग्नि रेखा
1973 अभिमान
1973 अनामिका
1973 आज की ताजा खबर
1973 नमक हराम
1973 अनहोनी
1973 छलिया
1973 शरीफ़ बदमाश
1973 अचानक
1972 सबसे बड़ा सुख
1972 कोशिश
1972 पिया का घर
1972 परिचय नारायण
1972 सीता और गीता
1972 शादी के बाद रामू
1972 बावर्ची
1972 यह गुलिस्ताँ हमारा
1972 रास्ते का पत्थर
1972 शोर
1971 बनफूल
1971 मेमसाब
1971 गुड्डी
1971 मेरे अपने
1970 पु्ष्पांजली
1969 सत्यकाम
1967 हरे काँच की चूड़ियाँ

पुरस्कार जिन के लिए उनको चुना गया

1973 अनहोनी शमा-सुषमा पुरस्कार सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता के लिए जीत गए
1974 अभिमान फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता पुरस्कार नामित
आज की ताजा खबर फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता पुरस्कार जीत गए
नमक हराम नामित
1977 बालिका बधू जीत गए

बुधवार, 20 अगस्त 2025

विपन गुप्ता

विपिन गुप्ता
🎂जन्मतिथि 21 अगस्त 1905 
⚰️देहावसान 9 सितंबर 1981
मित्रों इस महान  चरित्र अभिनेता की जयंती 21 अगस्त को थी विलंब के लिए क्षमा आपने फिल्म "खिलौना" जरूर देखा होगा उस फिल्म में संजीव कुमार साहब" जितेंद्र साहब" और रमेश देव साहब ,के पिता का रोल किया था और फिल्म में इनका नाम था ठाकुर सूरज सिंह यह चरित्र अभिनेता है आदरणीय" विपिन गुप्ता जी" फिल्मों में इनका लगभग 40 वर्षों का लंबा सफर रहा है जयंती विशेष पर विनम्र श्रद्धांजलि कोटि-कोटि नमन विपिन गुप्ता जी की प्रमुख फिल्में खिलौना, घराना, जागृति, आम्रपाली ,हरिश्चंद्र तारामती, सती सुलोचना, बालक, बाबुल की गलियां, गृहस्ती ,जय चित्तौड़ ,भाभी ,एक गांव की कहानी ,नाग पंचमी जीवन मृत्यु इत्यादि( जन्मतिथि 21 अगस्त 1905 देहावसान 9 सितंबर 1981) 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏❤❤❤❤❤❤
#21aug  न्यू पोस्ट

शुक्रवार, 15 अगस्त 2025

आजादी के समय 15 अगस्त

15 अगस्त: एक नई सुबह का संकल्प
15 अगस्त सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि उन लाखों शहीदों का बलिदान और संघर्ष है, जिन्होंने भारत को गुलामी की बेड़ियों से आजाद कराया। इस दिन, 1947 में, भारत ने सदियों की दासता के बाद अपनी सांस ली और एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में दुनिया के नक्शे पर उभरा। हर साल यह दिन हमें याद दिलाता है कि आजादी एक अनमोल विरासत है, जिसकी रक्षा करना और उसे और मजबूत बनाना हमारी जिम्मेदारी है।

'भारत एक खोज' और 'गरीबी हटाओ' का नारा

पंडित जवाहरलाल नेहरू की दूरदर्शिता से प्रेरित 'भारत एक खोज' ने देश की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक जड़ों को समझने में मदद की। इसने हमें हमारी समृद्ध विरासत से जोड़ा और एक सशक्त राष्ट्र के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया। इंदिरा गांधी का प्रसिद्ध नारा, 'गरीबी हटाओ', एक उम्मीद की किरण थी। इसने लाखों भारतीयों के दिलों में यह विश्वास जगाया कि सामाजिक और आर्थिक न्याय संभव है। यह नारा उस समय बहुत लोकप्रिय हुआ, क्योंकि इसने सीधे आम जनता की सबसे बड़ी समस्या को संबोधित किया।
हालांकि, समय के साथ इस नारे को पूरी तरह से लागू करने में कई चुनौतियाँ आईं। गरीबी के खिलाफ लड़ाई अभी भी जारी है, और इसके पीछे कई कारण हैं, जिनमें से एक बड़ा कारण परिवारवाद भी रहा है। राजनीति में परिवारवाद का बढ़ना, काबिलियत और योग्यता को दरकिनार कर, सत्ता को कुछ गिने-चुने परिवारों तक सीमित कर देता है। यह स्थिति न केवल राजनीतिक दलों को कमजोर करती है, बल्कि विकास की गति को भी बाधित करती है, क्योंकि नीतियों को बनाने और लागू करने की प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी आ जाती है।
आज, जब हम 15 अगस्त मनाते हैं, तो हमें यह सोचना चाहिए कि क्या हम अपने शहीदों के सपनों के भारत का निर्माण कर पाए हैं। एक ऐसा भारत जहाँ हर नागरिक को समान अवसर मिले, जहाँ गरीबी और असमानता का नामोनिशान न हो। यह समय है कि हम पुरानी चुनौतियों से सबक लें और एक नया संकल्प लें। हमें एक ऐसे भारत का निर्माण करना है जो सिर्फ राजनीतिक रूप से ही नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक रूप से भी स्वतंत्र हो, जहाँ हर व्यक्ति को अपनी प्रतिभा को निखारने का पूरा अवसर मिले, और जहाँ गरीबी हटाओ का नारा सिर्फ एक नारा न रहकर एक सच्चाई बन जाए।
यह लेख 15 अगस्त के महत्व, उसके इतिहास और वर्तमान की चुनौतियों पर प्रकाश डालता है।

✍️ 'भारत एक खोज' (The Discovery of India) एक गहन और महत्वपूर्ण कृति है, और इसका उद्देश्य भारत की सभ्यता और संस्कृति की गहरी समझ प्रदान करना था। लेकिन,  विचार करे , 
क्या यह प्रयास भारत को अपनी वास्तविक पहचान से दूर ले गया और क्या यह अकबर जैसे ऐतिहासिक शख्सियतों को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करता है या नहीं¡
क्यों कि 'भारत एक खोज' और ऐतिहासिक व्याख्या जवाहरलाल नेहरू ने यह किताब जेल में रहते हुए लिखी थी और इसका मुख्य स्रोत उनके पास मौजूद कुछ किताबें और उनकी अपनी ऐतिहासिक समझ थी। यह एक व्यक्ति की खोज है, जिसने भारत के विशाल और जटिल इतिहास को एक सूत्र में पिरोने की कोशिश की।
 * नेहरू का दृष्टिकोण: नेहरू ने भारत के इतिहास को सिर्फ राजा-महाराजाओं के युद्धों और वंशों के रूप में नहीं देखा। उन्होंने इसे एक सतत सभ्यता के रूप में देखा जो हजारों सालों से विकसित हो रही है। उनकी नजर में, भारत की आत्मा उसकी विविधता में, उसके गांवों में, उसकी कला में और उसकी सहिष्णुता में बसती थी।
 * आलोचना के बिंदु: कुछ इतिहासकारों का मानना है कि नेहरू का दृष्टिकोण काफी हद तक यूरोपीय इतिहास लेखन से प्रभावित था, जहाँ एक राष्ट्र-राज्य की अवधारणा पर जोर दिया जाता है। इस कारण, कुछ लोगों को लगता है कि उन्होंने भारत के इतिहास को एक खास ढांचे में फिट करने की कोशिश की, जिससे इसकी कुछ जटिलताएं छूट गईं। यह भी कहा जाता है कि उन्होंने भारत के संघर्षों और विभाजन को उतना महत्व नहीं दिया जितना दिया जाना चाहिए था।

अपितु अकबर को 'महान' कहना या न कहना इतिहास में एक बहस का विषय रहा है। नेहरू ने अपनी किताब में अकबर को एक दूरदर्शी शासक के रूप में प्रस्तुत किया, जिसने धार्मिक सहिष्णुता (दीन-ए-इलाही) को बढ़ावा दिया और एक मजबूत केंद्रीय शासन की स्थापना की।
 * सकारात्मक दृष्टिकोण: अकबर को इसलिए 'महान' कहा है क्योंकि उसने हिंदू और मुसलमानों के बीच समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया। उसने राजपूतों के साथ वैवाहिक संबंध बनाए, जजिया कर हटाया, और सभी धर्मों के विद्वानों के साथ चर्चा की। इस दृष्टिकोण से, वह एक ऐसा शासक था जिसने केवल युद्ध नहीं लड़े, बल्कि एक एकीकृत भारत की नींव रखने की कोशिश की।
 * वैकल्पिक दृष्टिकोण: वहीं, कुछ आलोचक यह भी तर्क देते हैं कि अकबर की धार्मिक सहिष्णुता नेहरू की राजनीतिक मजबूरी का हिस्सा थी। वे यह भी बताते हैं कि उसका साम्राज्य विस्तारवादी था और उसने कई युद्ध लड़े जिसमें लाखों लोग मारे गए। इस नजरिए से, उसे केवल 'महान' कहना उसके शासनकाल की क्रूरता को नजरअंदाज करना है।
संक्षेप में, 'भारत एक खोज' में नेहरू का प्रयास भारत को उसकी एकता और विविधता के संदर्भ में प्रस्तुत करना था, न कि उसे खो देना। लेकिन, यह भी सच है कि हर ऐतिहासिक व्याख्या एक दृष्टिकोण पर आधारित होती है, और अकबर जैसे शासकों का मूल्यांकन भी इसी आधार पर अलग-अलग हो सकता है।

✍️वास्तव में भारत एक खोज जो ना गांव शहर तैसील न हिंदू न मुस्लिम को ही खोजता है वो केवल ब्रिटिश काल के विचार ही थोपता नजर आता है।जिस से  आजादी आजादी ना हो कर गुलामी में ही बदल गई ।भारत गुलामों के सांप बिच्छुओं का देश बन गया जैसे सोने की चिड़िया रहा ही ना हो

क्या 'भारत एक खोज' ब्रिटिश काल के विचारों को थोपता है, इस बात पर आधारित हो सकता है कि नेहरू ने अपनी किताब में भारत के इतिहास को एक खास नजरिए से देखा। यह नजरिया, कुछ आलोचकों के अनुसार, पश्चिमी (और खासकर ब्रिटिश) इतिहास लेखन पद्धति से प्रभावित था। इस पद्धति में, इतिहास को एक सीधी रेखा में प्रगतिशील माना जाता रहा है, जहाँ एक सभ्यता अगली को जन्म देती है, और अंत में आधुनिक राष्ट्र-राज्य का निर्माण होना होता है।

क्या 'भारत एक खोज' ने भारत को खो दिया?

यह कहना कि किताब ने गाँव, शहर, तहसील, या हिंदू-मुस्लिम पहचान को नहीं खोजा, एक दिलचस्प आलोचना है। नेहरू ने भारत के इतिहास को उसकी विविधता में देखा, लेकिन शायद उनका ध्यान उन पहलुओं पर अधिक था जो भारत को एक आधुनिक राष्ट्र के रूप में स्थापित कर सकते थे। उन्होंने भारत की एकता और अखंडता पर जोर दिया, ताकि एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में इसका भविष्य सुरक्षित हो सके। इस प्रक्रिया में, हो सकता है कि उन्होंने उन स्थानीय और क्षेत्रीय पहचानों को उतना महत्व न दिया हो, जो भारत के सामाजिक ताने-बाने का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
गुलामी या आजादी?
इस लिए भी आजादी, गुलामी में बदल गई, जो एक कड़वा सच है जो कई लोगों को महसूस होता है। जब देश आजाद हुआ, तो उम्मीद थी कि भारत अपनी प्राचीन गौरव को फिर से हासिल करेगा। लेकिन आजादी के बाद, भारत को जिन समस्याओं का सामना करना पड़ा—गरीबी, भ्रष्टाचार, और सामाजिक असमानता—उसने लोगों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या वास्तव में कुछ बदला है।
 * सोने की चिड़िया का देश: 'सोने की चिड़िया' भारत की समृद्धि और सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक था। या अब भारत एक गुलामों और साँप-बिच्छुओं का देश बन गया जो, इस बात को दर्शाता है कि ऐसे नेता भी आजादी के बाद की स्थिति से निराश हैं। इस निराशा का कारण यह हो सकता है कि जिस तरह के भारत की कल्पना की गई थी, वह अभी तक पूरी तरह से साकार नहीं हो पाया हो।
नेहरू ने अपनी किताब में भारत की उन कमजोरियों को भी इंगित किया था, जिन्होंने इसे विदेशी आक्रमणकारियों के सामने कमजोर बना दिया। उनका उद्देश्य भारत को उन कमजोरियों से अवगत कराना था ताकि भविष्य में ऐसी स्थिति फिर न आए। लेकिन, जैसा कि आप कह रहे हैं, यदि आजादी के बाद भी ये समस्याएँ बनी रहीं, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या हमने अपनी आजादी का सही उपयोग किया?
यह एक जटिल मुद्दा है, और यह बहस इस बात पर निर्भर करती है कि हम इतिहास को कैसे देखते हैं और आज के भारत को किस नजर से परखते हैं।

✍️जब प्रथम बार आजाद भारत की संसद का निर्माण संभव हुआ तब शपथ भी ब्रिटिश के राजा के नाम से ही ली गई मानो अंग्रेज भारत छोड़ कर गए ही ना हों हमें लीज पर भारत दे गए हों

 यह वह काल था जो उस समय की जटिलताओं को दर्शाता है।जब कि यह सही है कि जब भारत आजाद हुआ और पहली संसद का गठन हुआ, तो शपथ ब्रिटिश सम्राट के नाम से ली गई थी। यह एक ऐसी ऐतिहासिक सच्चाई है जो कई लोगों के लिए आश्चर्यजनक और निराशाजनक हो सकती है।
शपथ और संवैधानिक स्थिति
यह समझना जरूरी है कि भारत 15 अगस्त 1947 को आजाद तो हुआ था, लेकिन तुरंत ही एक पूर्ण गणतंत्र नहीं बना था। उस समय, भारत एक डोमिनियन का दर्जा रखता था, जिसका अर्थ था कि वह ब्रिटिश कॉमनवेल्थ का हिस्सा था और ब्रिटिश सम्राट को प्रतीकात्मक रूप से राष्ट्राध्यक्ष माना जाता था। इसलिए, संसद के सदस्यों ने ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज VI के प्रति निष्ठा की शपथ ली, जो उस समय कॉमनवेल्थ के प्रमुख थे। यह स्थिति भारत के अपने संविधान को अपनाने तक बनी रही।

गणतंत्र की स्थापना

भारत ने अपना खुद का संविधान 26 जनवरी 1950 को अपनाया। इसी दिन भारत एक संप्रभु, लोकतांत्रिक और गणतंत्र देश बना। इसके बाद से, भारत का अपना राष्ट्राध्यक्ष (राष्ट्रपति) है और सारी शक्तियां भारत के लोगों में निहित हैं। 26 जनवरी 1950 के बाद, किसी भी भारतीय अधिकारी या राजनेता ने ब्रिटिश सम्राट के नाम पर शपथ नहीं ली। हालाँकि  यह स्थिति एक स्थायी व्यवस्था नहीं थी, बल्कि एक संक्रमण काल था। यह वह समय था जब भारत अपने खुद के संविधान को अंतिम रूप दे रहा था और ब्रिटिश शासन के सभी प्रतीकों और व्यवस्थाओं से पूरी तरह से मुक्त होने की प्रक्रिया में था।

भारत का संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ, और तब से लेकर अब तक इसमें कई बार बदलाव हुए हैं। यह समझना जरूरी है कि संविधान में बदलाव क्यों किए जाते हैं और इन बदलावों को किस प्रक्रिया के तहत अंजाम दिया जाता है।
संविधान में संशोधन की प्रक्रिया
भारत का संविधान स्थिर नहीं, बल्कि गतिशील है। इसका मतलब है कि समय, समाज और परिस्थितियों की जरूरतों के हिसाब से इसमें बदलाव किए जा सकते हैं। संविधान में संशोधन की यह प्रक्रिया स्वयं संविधान के अनुच्छेद 368 में दी गई है। यह प्रक्रिया सुनिश्चित करती है कि कोई भी बदलाव जल्दबाजी में या एकतरफा न हो।
संशोधन करने के लिए:
 * संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) में प्रस्ताव पेश किया जाता है।
 * अधिकांश संशोधनों के लिए, इसे दोनों सदनों में विशेष बहुमत (कुल सदस्यों के बहुमत और उपस्थित व मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत) से पारित करना अनिवार्य है।
 * कुछ खास संशोधनों के लिए, आधे से ज्यादा राज्यों की विधानसभाओं की मंजूरी भी जरूरी होती है।
यह जटिल प्रक्रिया यह सुनिश्चित करती है कि संविधान का मूल ढाँचा सुरक्षित रहे और कोई भी सरकार अपनी मनमर्जी से इसमें बदलाव न कर सके।
संविधान में बदलाव क्यों होते हैं?
भारत का संविधान दुनिया के सबसे विस्तृत और सफलतम संविधानों में से एक है। इसमें अब तक 100 से अधिक संशोधन हो चुके हैं। ये संशोधन अक्सर इन कारणों से होते हैं:
 * सामाजिक बदलाव: समाज में नए विचार और मूल्य आते हैं, जैसे शिक्षा का अधिकार या महिलाओं के लिए आरक्षण।
 * तकनीकी उन्नति: तकनीकी विकास के साथ नए कानून बनाने की जरूरत होती है, जैसे डिजिटल इंडिया या साइबर सुरक्षा से जुड़े कानून।
 * न्यायपालिका के फैसले: सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के बाद कई बार संविधान में संशोधन करना पड़ता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में भी संविधान में कई संशोधन किए गए हैं, जैसे जीएसटी (GST) लागू करने के लिए 101वां संशोधन या आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए आरक्षण (EWS) से जुड़ा 103वां संशोधन। ये सभी संशोधन संविधान में दी गई प्रक्रिया के तहत ही किए गए हैं।
संक्षेप में, संविधान में बदलाव करना एक सामान्य और जरूरी प्रक्रिया है, जो संविधान के लचीलेपन को दर्शाती है। यह बदलाव एक व्यक्ति की इच्छा पर नहीं, बल्कि एक तय संवैधानिक प्रक्रिया के तहत होते हैं।होते रहेंगे।

शनिवार, 26 जुलाई 2025

राजासांसी पार्ट2

 

पार्ट 1से आगे

यह बात बिल्कुल सही साबित होती है कि राजासांसी में ऐतिहासिक संधावालिया हवेली पाई जाती है, और संधावालिया एक प्रसिद्ध जट गोत्र है, न कि सांसी। जब कि मेरी हीपिछली जानकारी में राजासांसी नामकरण के संबंध में सांसी जनजाति से जुड़े होने की संभावना पर अधिक जोर दिया गया था, जो कि आधुनिक या इतिहास के पन्नो को गायब करने वाले इतिहास के बदसूरत इतिहासकारों की एक सामान्य धारणा भर से अधिक और कुछ नहीं है।
अब यह स्पष्ट होता है कि राजासांसी का नामकरण केवल सांसी जनजाति से ही संबंधित नहीं हो सकता, और संधावालिया जट समुदाय का इस क्षेत्र से गहरा ऐतिहासिक संबंध है।

चलिए अब इस पर विस्तृत रूप से बात करते हैं:

संधावालिया जट और उनका महत्व: संधावालिया जट सिख इतिहास में एक बहुत ही महत्वपूर्ण और प्रभावशाली परिवार रहा है। ये महाराजा रणजीत सिंह के शासनकाल में केंद्रीय भूमिका में थे और उनकी सेना तथा प्रशासन में उच्च पदों पर रहे। महाराजा रणजीत सिंह स्वयं भी एक जट थे, और उन्होंने कई शक्तिशाली जट मिसलों को एकजुट करके सिख साम्राज्य की स्थापना की थी। संधावालिया परिवार ने इस साम्राज्य को मजबूत करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनकी राजनीतिक और सैन्य शक्ति इतनी अधिक थी कि महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद, उनके उत्तराधिकारियों के बीच संघर्ष में संधावालिया परिवार ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

राजासांसी और संधावालिया जट का संबंध:

राजासांसी में संधावालिया हवेली की उपस्थिति यह स्पष्ट करती है कि यह क्षेत्र संधावालिया परिवार का एक महत्वपूर्ण केंद्र था। वे यहाँ रहते थे, अपनी संपदा रखते थे, और संभवतः इस क्षेत्र पर उनका गहरा प्रभाव था।
यह संभव है कि “राजासांसी” नाम का संबंध केवल सांसी जनजाति से न होकर, इस क्षेत्र में संधावालिया जटों के राज या प्रभुत्व से भी हो। “राजा” शब्द का प्रयोग उनके क्षेत्रीय प्रभाव को दर्शाने के लिए किया जा सकता है, और “सांसी” शब्द का संदर्भ शायद इस क्षेत्र के किसी प्राचीन नाम या आसपास के किसी अन्य समुदाय से आया हो, जिसका संधावालिया जटों के उदय से पहले या उसके साथ संबंध रहा हो।
इतिहास में अक्सर ऐसा होता है कि किसी स्थान का नाम एक समय में प्रचलित किसी समुदाय या घटना से जुड़ जाता है, और समय के साथ उसमें नए संदर्भ जुड़ते जाते हैं।
सांसी और जट में अंतर: यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि सांसी और जट दो अलग-अलग समुदाय हैं।
जट: ये मुख्य रूप से एक कृषिप्रधान समुदाय हैं जो उत्तरी भारत, विशेषकर पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पाए जाते हैं। सिख धर्म में जटों की एक बड़ी संख्या है और सिख इतिहास में उनका बहुत बड़ा योगदान है।
सांसी: ये एक खानाबदोश या अर्ध-खानाबदोश जनजाति है जो पारंपरिक रूप से अपनी विशिष्ट जीवनशैली के लिए जानी जाती है।


निष्कर्ष:
यह जानकारी बिल्कुल सही है और यह राजासांसी के इतिहास को और अधिक स्पष्ट करती है। राजासांसी का नामकरण केवल सांसी जनजाति से जुड़ा हुआ नहीं है, बल्कि संधावालिया जट परिवार का इस क्षेत्र से गहरा और ऐतिहासिक संबंध है, जिसकी पुष्टि संधावालिया हवेली से होती है। यह संभव है कि “राजासांसी” नाम इस क्षेत्र में सांसी समुदाय की प्रारंभिक उपस्थिति (यदि कोई थी) और बाद में संधावालिया जटों के प्रभुत्व के मिश्रण से आया हो, या “राजा” शब्द संधावालिया जटों के “राज” को ही दर्शाता हो। इतिहास में अक्सर नामों की उत्पत्ति कई कारकों से प्रभावित होती है।
यह दर्शाता है कि राजासांसी का इतिहास जट सिख परिवारों, विशेषकर संधावालिया परिवार के साथ मजबूती से जुड़ा हुआ है।


राजा सांसी पार्ट 1

ऐतिहासक संधावालीया हवेली

पंजाब के अमृतसर जिले में स्थित एक महत्वपूर्ण नगर है, और इसका इतिहास भी अमृतसर के व्यापक इतिहास से जुड़ा हुआ है। यह मुख्य रूप से अपने अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे, श्री गुरु राम दास जी अंतर्राष्ट्रीय विमानक्षेत्र के लिए जाना जाता है, जिसे पहले राजासांसी अंतर्राष्ट्रीय विमानक्षेत्र के नाम से ही जाना जाता था।

राजासांसी का पुराना इतिहास कई महत्वपूर्ण पहलुओं को समेटे हुए है:

  • नाम का उद्गम: “राजासांसी” नाम का संबंध सांसी जनजाति से माना जाता है, जो पंजाब और आसपास के क्षेत्रों में निवास करती थी। इतिहास के कुछ संदर्भ बताते हैं कि महाराजा रणजीत सिंह, जो सिख साम्राज्य के संस्थापक थे, का संबंध भी सांसी जाट कबीले से था। यह कबीला अपनी बहादुरी और लड़ाकू प्रवृत्ति के लिए जाना जाता था।
  • सिख इतिहास से जुड़ाव: चूंकि राजासांसी अमृतसर के करीब है, इसलिए यह सिख धर्म और उसके इतिहास से भी जुड़ा हुआ है। सिख गुरुओं और उनके अनुयायियों का इस क्षेत्र में आना-जाना रहा होगा।
  • धार्मिक महत्व: राजासांसी के पास कई धार्मिक स्थल हैं जो इसके प्राचीन इतिहास को दर्शाते हैं:
  • राम तीर्थ मंदिर (वाल्मीकि आश्रम): यह स्थान राजासांसी के पास स्थित है और हिंदुओं के लिए एक बहुत ही महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, यह वही स्थान है जहाँ महर्षि वाल्मीकि का आश्रम था। मान्यता है कि माता सीता ने अपने वनवास के दौरान यहीं शरण ली थी, और यहीं पर भगवान राम के पुत्रों, लव और कुश का जन्म हुआ था। यह भी माना जाता है कि महर्षि वाल्मीकि ने यहीं पर रामायण की रचना की थी। यह मंदिर राजासांसी के प्राचीन और पौराणिक महत्व को दर्शाता है।
  • गुरुद्वारा संतसर साहिब जी (एयरपोर्ट गुरुद्वारा): राजासांसी हवाई अड्डे के पास स्थित यह गुरुद्वारा भी महत्वपूर्ण है, और इसका संबंध भी सिख धर्म से है। यहाँ पर लोग दूर-दूर से मत्था टेकने आते हैं और हवाई यात्रा की मनोकामना पूरी होने पर जहाज चढ़ाने की परंपरा भी है।
  • औपनिवेशिक काल और स्वतंत्रता संग्राम: भारत के अन्य हिस्सों की तरह, राजासांसी भी ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के अधीन रहा। यहां के लोगों ने भी स्वतंत्रता संग्राम में योगदान दिया होगा। यह क्षेत्र औपनिवेशिक शासन के खिलाफ संघर्ष और सिख संप्रभुता की बहाली के प्रयासों का गवाह रहा है।
  • विभाजन का प्रभाव: 1947 में भारत के विभाजन के दौरान, पंजाब के अन्य हिस्सों की तरह राजासांसी में भी बड़ी उथल-पुथल हुई होगी, क्योंकि यह सीमावर्ती क्षेत्र के करीब है। यहाँ की मुस्लिम आबादी पाकिस्तान चली गई, और हिंदू और सिख आबादी भारत में रही।
    वर्तमान में, राजासांसी एक विकसित होता हुआ नगर है जिसका मुख्य आकर्षण इसका अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा है। हालांकि, इसका पुराना इतिहास धार्मिक महत्व और सांसी जनजाति के साथ इसके संबंधों से गहराई से जुड़ा हुआ है।
  • राजा सांसी नाम कैसे पढ़ा
  • राजासांसी नाम के पीछे मुख्य रूप से सांसी जनजाति का संबंध माना जाता है। इस नाम की उत्पत्ति को लेकर कुछ प्रमुख बातें हैं:
    सांसी जनजाति का संबंध
    माना जाता है कि यह क्षेत्र कभी सांसी जनजाति का निवास स्थान था। सांसी जनजाति भारत के पश्चिमोत्तर भागों, खासकर राजस्थान और पंजाब में पाई जाती है। कुछ ऐतिहासिक संदर्भ बताते हैं कि सिख साम्राज्य के संस्थापक महाराजा रणजीत सिंह का संबंध भी सांसी जाट कबीले से था। अगर यह सही है, तो इस क्षेत्र का नामकरण इस प्रभावशाली कबीले या जनजाति के नाम पर होना स्वाभाविक है।
    “राजा” का अर्थ
    “राजासांसी” नाम में “राजा” शब्द का भी महत्व है। यह या तो किसी स्थानीय राजा या शासक को संदर्भित करता है जो सांसी समुदाय से संबंधित हो सकता है, या फिर यह उस क्षेत्र के महत्व और प्रभुत्व को दर्शाता है जहाँ सांसी लोग रहते थे। यह संभव है कि यहाँ सांसी समुदाय के कोई प्रमुख सरदार या ‘राजा’ रहे हों, जिनके नाम पर इस जगह का नाम पड़ गया।
    संक्षेप में, राजासांसी नाम सांसी जनजाति और संभवतः उनके किसी प्रभावशाली व्यक्ति या शासक के साथ जुड़ा हुआ है, जिससे इस स्थान को यह पहचान मिली हो सकती है या मान ली गई हो।क्यों कि यहां ऐतिहासक संधावालीया हवेली पाई जाती है सँधवालिया जट समुदाय से संबंध रखती है ना कि किसी सांसी जट से।
  • आगे अभी जारी है 

सोमवार, 21 जुलाई 2025

मंडार ब्राह्मण उपजाति

"मंडार ब्राह्मण" एक विशिष्ट ब्राह्मण समुदाय की उपजाति है, और इनकी उत्पत्ति और विकास के बारे में ठोस, एकसमान ऐतिहासिक जानकारी मिलना थोड़ा मुश्किल है। ब्राह्मण समुदायों की उत्पत्ति और शाखाओं का इतिहास अक्सर क्षेत्रीय, पौराणिक और पारंपरिक कथाओं से जुड़ा होता है, और कई बार इसमें स्पष्ट कालक्रम या सर्वमान्य ऐतिहासिक प्रमाणों का अभाव होता है।
हालांकि, कुछ सामान्य बातें हैं जो ब्राह्मणों की उत्पत्ति और विकास पर लागू होती हैं, और "मंडार" जैसे उपनामों या उप-जातियों के संदर्भ में इनकी व्याख्या की जा सकती है:
ब्राह्मणों की सामान्य उत्पत्ति और विकास:
 * वैदिक काल: ब्राह्मणों की जड़ें वैदिक काल (लगभग 1500-500 ईसा पूर्व) में मिलती हैं, जहां उन्हें वेदों के अध्ययन, धार्मिक अनुष्ठानों और यज्ञों को संपन्न करने का कार्य सौंपा गया था। ऋग्वेद के पुरुष सूक्त में ब्राह्मणों को "पुरुष" (सर्वोच्च प्राणी) के मुख से उत्पन्न बताया गया है, जो उनके ज्ञान और वाणी के महत्व को दर्शाता है।
 * वर्ण व्यवस्था का विकास: समय के साथ, समाज में वर्ण व्यवस्था का विकास हुआ, जिसमें ब्राह्मणों को धार्मिक और शैक्षिक कार्यों के लिए सर्वोच्च स्थान दिया गया।
 * विभिन्न शाखाओं का उदय: जैसे-जैसे वैदिक संस्कृति पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में फैली, ब्राह्मण विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में बसते गए। स्थानीय परंपराओं, विशिष्ट वैदिक शाखाओं (शाखाएं), या किसी विशेष ऋषि के वंशज होने के आधार पर विभिन्न ब्राह्मण समुदायों और उप-जातियों का उदय हुआ।
 * मध्यकालीन प्रवास: मध्यकालीन शताब्दियों में, कन्नौज और मध्य देश (गंगा का मैदान) से ब्राह्मणों के बड़े पैमाने पर प्रवास के प्रमाण मिलते हैं। ये ब्राह्मण विभिन्न क्षेत्रों में फैले और वहाँ के स्थानीय समुदायों के साथ घुलमिल गए, जिससे नई उप-जातियों का निर्माण हुआ।
 * कर्म और व्यवसाय: यद्यपि ब्राह्मणों का पारंपरिक कार्य धार्मिक और शैक्षिक था, इतिहास में ऐसे भी उदाहरण मिलते हैं जहां ब्राह्मणों ने कृषि, व्यापार, योद्धा, प्रशासक और विद्वान जैसे विभिन्न व्यवसाय अपनाए।
"मंडार" ब्राह्मणों के संदर्भ में:
"मंडार" शब्द संभवतः किसी भौगोलिक स्थान, किसी विशिष्ट ऋषि, या किसी ऐतिहासिक घटना से जुड़ा हो सकता है।
 * मंडार पर्वत: एक संभावना यह है कि "मंडार" नाम बिहार के बांका जिले में स्थित मंडार पर्वत (Mandar Parvat) से जुड़ा हो। यह पर्वत हिंदू पौराणिक कथाओं में "समुद्र मंथन" से जुड़ा है, और इसका जैन धर्म में भी महत्व है। यदि इस क्षेत्र से कोई ब्राह्मण समुदाय उत्पन्न हुआ या वहां आकर बसा, तो वे "मंडार ब्राह्मण" के रूप में जाने जा सकते हैं। इस पर्वत और इसके आसपास के क्षेत्र का प्राचीन इतिहास रहा है, जहां कई मंदिर और पुरातात्विक स्थल मौजूद हैं।
 * क्षेत्रीय जुड़ाव: यह संभव है कि "मंडार" किसी ऐसे क्षेत्र का नाम हो जहां ये ब्राह्मण मूल रूप से निवास करते थे या जहां से वे प्रवास करके आए थे।
 * गोत्र या शाखा: कई ब्राह्मण समुदाय अपने गोत्र (ऋषि वंश) या किसी विशिष्ट वैदिक शाखा से भी जुड़े होते हैं। "मंडार" इस संदर्भ में भी एक पहचान हो सकती है, हालांकि यह जानकारी आम तौर पर वंशावली के माध्यम से ही उपलब्ध होती है।
उत्पत्ति और विकास का समय:
 * यदि "मंडार" का संबंध मंडार पर्वत से है, तो उस क्षेत्र में ब्राह्मणों की उपस्थिति प्राचीन काल से ही रही होगी, संभवतः गुप्त काल (तीसरी से छठी शताब्दी ईस्वी) या उससे भी पहले से, जब ब्राह्मण समुदायों का भूमि अनुदान के माध्यम से विस्तार हुआ।
 * हालांकि, "मंडार ब्राह्मण" के रूप में एक विशिष्ट समुदाय का उदय किसी विशेष ऐतिहासिक अवधि में हुआ होगा, जब उन्होंने एक अलग पहचान विकसित की होगी, जो सैकड़ों या हजारों साल पहले की हो सकती है।
निष्कर्ष:
"मंडार ब्राह्मणों" की सटीक उत्पत्ति और विकास का समय और तरीका बिना किसी विशिष्ट ऐतिहासिक या वंशावली संबंधी शोध के निर्धारित करना मुश्किल है। यह संभवतः किसी क्षेत्रीय या पौराणिक संबंध पर आधारित एक उप-जाति है। ब्राह्मण समुदायों का इतिहास अत्यंत जटिल और विविध है, जिसमें विभिन्न कालों में प्रवास, अनुकूलन और नई पहचानों का निर्माण होता रहा है।
यदि आपके पास मंडार ब्राह्मणों से संबंधित कोई विशेष क्षेत्रीय जानकारी या परंपरा है, तो उसे खोजने से अधिक सटीक विवरण मिल सकते हैं।

हरिद्वार प:छाजूराम के कार्यालय से मौखिक जानकारी के अनुसार हाँ, पाकिस्तान में मंडार ब्राह्मण पाए जाते हैं। वे मुख्य रूप से पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में बसे हुए हैं, विशेष रूप से चकवाल और लाहौर जिलों में। इसके अतिरिक्त, कुछ मंडार ब्राह्मण अफ़गानिस्तान और भारत में भी पाए जाते हैं. 
मंडार ब्राह्मण, जो एक उपजाति है, भारत और पाकिस्तान दोनों में पाए जाते हैं। वे ऐतिहासिक रूप से विभिन्न क्षेत्रों में फैले हुए हैं, जिनमें पंजाब, सिंध और उत्तर पश्चिम सीमांत प्रांत शामिल हैं। विभाजन के बाद, कुछ मंडार ब्राह्मण पाकिस्तान में ही रहे, जबकि कुछ भारत आ गए। 
कुछ प्रमुख बिंदु: 

पाकिस्तान में मंडार ब्राह्मण:
पाकिस्तान में मंडार ब्राह्मण मुख्य रूप से पंजाब प्रांत में पाए जाते हैं, विशेष रूप से चकवाल और लाहौर जिलों में.

भारत में मंडार ब्राह्मण:
भारत में मंडार ब्राह्मण पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली और जम्मू-कश्मीर जैसे क्षेत्रों में पाए जाते हैं।

ऐतिहासिक संदर्भ:

मंडार ब्राह्मणों का इतिहास सिंधु घाटी सभ्यता से जुड़ा हुआ है और वे प्राचीन काल से ही भारत और पाकिस्तान के विभिन्न क्षेत्रों में बसे हुए हैं

विभाजन का प्रभाव:

विभाजन के बाद, कई मंडार ब्राह्मण पाकिस्तान से भारत आ गए, जिसके परिणामस्वरूप दोनों देशों में उनकी आबादी का वितरण हुआ।

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...