सोमवार, 26 जनवरी 2026

देश के लिए एक रहो


देश के लिए एक रहोगे , तो नेक रहोगे।
सत्ता के लिए एक रहोगे , तो आपस में लड़ोगे 

यह एक शक्तिशाली दोहा है जो भारतीय राजनीति की कड़वी सच्चाई को उजागर करता है। मैंने इसे आधार बनाकर एक संक्षिप्त लेकिन विचारोत्तेजक लेख तैयार किया है, जो राष्ट्रीय एकता और सत्ता की लालच पर केंद्रित है।
 देश के लिए एक रहोगे, तो नेक रहोगे; सत्ता के लिए एक रहोगे, तो आपस में लड़ोगे
भारतीय राजनीति का एक ऐसा दोहा है जो सदियों पुरानी लोक-चेतना को प्रतिबिंबित करता है: "देश के लिए एक रहोगे, तो नेक रहोगे। सत्ता के लिए एक रहोगे, तो आपस में लड़ोगे।" यह पंक्तियाँ न केवल राजनीतिक दलों की आंतरिक कलह को चित्रित करती हैं, बल्कि हमें सोचने पर मजबूर करती हैं कि क्या हमारा लोकतंत्र सत्ता की भूख में खो गया है? आज जब देश आर्थिक चुनौतियों, सीमा विवादों और सामाजिक ध्रुवीकरण से जूझ रहा है, यह दोहा और भी प्रासंगिक हो जाता है।

सत्ता की लालच: आपसी लड़ाई का मूल कारण

भारतीय राजनीति में सत्ता का मोह हमेशा से विभाजन का कारण रहा है। स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस की एकछत्र सत्ता से लेकर आज के बहुदलीय गठबंधनों तक, हर दौर में नेताओं ने सत्ता के लिए अपनी ही पार्टी को तोड़ने का पाप किया है। उदाहरण लें तो 1977 का आपातकाल के बाद का दौर, जब जनता पार्टी का गठबंधन मात्र 28 महीनों में आपसी ईर्ष्या में बिखर गया। आजकल भी देखें—कई दलों में अध्यक्ष पद, टिकट वितरण या गठबंधन फॉर्मूले को लेकर खुलेआम बगावतें हो रही हैं। क्यों? क्योंकि सत्ता व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा बन जाती है। दोहा सही कहता है:
 *सत्ता के लिए एक होने का मतलब है एक-दूसरे की कमजोरी ढूँढना, क्योंकि विजेता केवल एक ही होता है।*
 देश के लिए एकता: नेकता का आधार
दूसरी ओर, जब राजनीति
 *देश के लिए*
 होती है, तो नेकता स्वाभाविक रूप से उभरती है। 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन या 1971 का बांग्लादेश युद्ध इसका जीवंत प्रमाण हैं, जहाँ विपक्षी नेता भी राष्ट्रहित में एकजुट हुए। आज भी, कोविड-19 महामारी या ऑपरेशन सिंदूर जैसे संकटों में पार्टियाँ एक मंच पर आती हैं। लेकिन यह एकता क्षणिक क्यों रह जाती है? समस्या यह है कि सत्ता की कुर्सी पर बैठते ही नेकता कुर्सी के नीचे दब जाती है। यदि नेता देश को प्राथमिकता दें—जैसे किसान कल्याण, शिक्षा सुधार या जलवायु परिवर्तन पर—तो आपसी लड़ाई की गुंजाइश ही कहाँ बचेगी?

 आगे का रास्ता: नेक राजनीति की जरूरत
समय आ गया है कि राजनीतिक दल इस दोहे को आत्मसात करें। युवा नेतृत्व, आंतरिक लोकतंत्र और पारदर्शी चुनाव प्रक्रिया ही सत्ता-लिप्सा को रोक सकती है। वोटरों को भी जागरूक होना होगा—हम सत्ता के लिए लड़ने वालों को नहीं, देश के लिए एक रहने वालों को चुनें। केवल तभी हम एक मजबूत, नेक भारत का निर्माण कर पाएँगे।

देश के लिए एक, सत्ता के लिए लड़देश के लिए एक रहोगे, तो नेक रहोगे,

सत्ता के मोह में डूबे, आपस में लड़ोगे।
कुर्सी की लालच में भूले राष्ट्र का भला,
भाई-भाई के विरुद्ध, बने शत्रु सदा।

गठबंधन टूटें, वादे हो जाएँ धूल,
सत्ता की भूख में जलें, सबका मन भूल।

एकता का दीपक जला, देशहित में मिलो,
नेक बनकर चलो सब, अन्यथा सब हिलो।

विपक्ष हो या सत्ता, देश ही तो धर्म है,
सत्ता के खेल में मत, राष्ट्र को हरम है।

जब संकट घेरे आये, एक हो जाओ प्राणी,
नेकी का फल मिलेगा, लड़ाई से नहीं भाई।

देश के लिए एक रहोगे, तो नेक रहोगे,
सत्ता के लिए एक रहोगे, तो आपस में लड़ोगे।

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