शुक्रवार, 28 मार्च 2025

रथी

*प्राचीन काल के योद्धाओं का युद्ध कौशल के आधार पर उनके स्तर का वर्गीकरण*



*हम सभी ने प्राचीन काल एवम् इतिहास और उनकी युद्ध गाथाओं में योद्धाओं के कौशल स्तर के विषय में अवश्य पढ़ा होगा और सबसे आम शब्द जो इन धर्म ग्रंथों, पुस्तकों में देखने की मिलता है वह है "महारथी"*



*महारथी शब्द का प्रयोग हम जितनी सरलता से करते हैं वास्तविकता में उसकी श्रेणी उससे कई सौ गुना बड़ी होती थी और कुछ चुनिंदा योद्धा हीं महारथी के स्तर प्राप्त किया करते थे*




*आइये आज यहाँ हम जानते हैं की योद्धाओं कि इन “अति उच्च श्रेणियों” को पाने के लिए किन योग्यताओं का होना आवश्यक था।*



*प्राचीन काल के प्रमुख योद्धाओं को मुख्यतः 6 श्रेणियों में बांटा गया है,*



*1_अर्धरथी अर्धरथी एक प्रशिक्षित योद्धा होता था जो अस्त्र-शस्त्रों के सञ्चालन में निपुण होता था। एक अर्धरथी अकेले 2500 सशस्त्र योद्धाओं का सामना कर सकता था।*



*रामायण और महाभारत के विषय में कहें तो इन युद्धों में असंख्य अर्धरथियों ने हिस्सा लिया था।*



*2_रथी एक ऐसा योद्धा जो सभी प्रकार के अस्त्र-शस्त्र के सञ्चालन में निपुण हो तथा 2 अर्धरथियों, अर्थात 5000 सशस्त्र योद्धाओं का सामना एक साथ कर सके।*



 *रामायण रामायण में कई रथियों ने हिस्सा लिया जिनका बहुत विस्तृत वर्णण नहीं मिलता है। राक्षसों में खर,दूषण,तड़का, मारीच, सुबाहु*

*वातापि आदि रथी थे। वानरों में गंधमादन, मैन्द एवं द्विविन्द, हनुमान के पुत्र मकरध्वज, को रथी माना जाता था।*



*महाभारत सभी कौरव, युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव, शकुनि, उसका पुत्र उलूक, उपपांडव (प्रतिविन्ध्य, सुतसोम, श्रुतकर्मा, शतानीक एवं श्रुतसेन), विराट, उत्तर, शिशुपाल पुत्र धृष्टकेतु*

*जयद्रथ, शिखंडी, सुदक्षिण, शंख, श्वेत, इरावान, कर्ण के सभी पुत्र, सुशर्मा, उत्तमौजा, युधामन्यु, जरासंध पुत्र सहदेव, बाह्लीक पुत्र सोमदत्त, कंस, अलम्बुष, अलायुध, बृहदबल आदि की गिनती रथी के रूप में होती थी। दुर्योधन को 8 रथियों के बराबर माना गया है।*



*3-अतिरथी एक ऐसा योद्धा जो सामान्य अस्त्रों के साथ अनेक दिव्यास्त्रों का भी ज्ञाता हो तथा युद्ध में 12 रथियों, अर्थात 60000 सशस्त्र योद्धाओं का सामना एक साथ कर सकता हो।* 



 *रामायण लव, कुश, अकम्पन्न, विभीषण, देवान्तक, नरान्तक, महिरावण, पुष्कल, काल में अंगद, नल, नील, प्रहस्त,अकम्पन, भरत पुत्र पुष्कल, विभीषण, त्रिशिरा, अक्षयकुमार, हनुमान के पिता केसरी अदि अतिरथी थे।*



*महाभारत भीम, जरासंध, धृष्टधुम्न, कृतवर्मा, शल्य, भूरिश्रवा, द्रुपद, घटोत्कच, सात्यिकी, कीचक, बाह्लीक, साम्ब, प्रद्युम्न, कृपाचार्य, शिशुपाल, रुक्मी, सात्यिकी, बाह्लीक, नरकासुर,प्रद्युम्न, कीचक आदि अतिरथी थे।*



*4- महारथी ये संभवतः सबसे प्रसिद्ध पदवी थी और जो भी योद्धा इस पदवी को प्राप्त करते थे वे पूरे जगत में सम्मानित और प्रसिद्ध होते थे। महारथी एक ऐसा योद्धा होता था जो सभी ज्ञात अस्त्र शस्त्रों और कई दिव्यास्त्रों को चलने में समर्थ होता था।युद्ध में महारथी 12 अतिरथियों अथवा 720000 सशस्त्र योद्धाओं का सामना कर सकता था। इसके अतिरिक्त जिस भी योद्धा के पास ब्रह्मास्त्र का ज्ञान होता था (जो गिने चुने ही थे) वो सीधे महारथी की श्रेणी में आ जाते थे।* 



*रामायण भरत, शत्रुघ्न, अंगद, सुग्रीव, अतिकाय, कुम्भकर्ण, प्रहस्त, जामवंत आदि महारथी की श्रेणी में आते हैं। रावण, बाली एवं कर्त्यवीर्य अर्जुन को एक से अधिक महारथियों के बराबर माना गया है।*



*महाभारत अभिमन्यु, बभ्रुवाहन, अश्वत्थामा, भगदत्त, बर्बरीक आदि महारथी थे। भीष्म, द्रोण, कर्ण, अर्जुन एवं बलराम को एक से अधिक महारथियों के बराबर माना गया है।कहीं-कहीं अर्जुन को पाशुपतास्त्र प्राप्त करने के कारण “अतिमहारथी” भी कहा जाता है*



*5-अतिमहारथी इस श्रेणी के योद्धा दुर्लभ होते थे।अतिमहारथी उसे कहा जाता था जो 12 महारथी श्रेणी के योद्धाओं अर्थात 8640000 सशस्त्र योद्धाओं का सामना अकेले कर सकता हो साथ ही सभी प्रकार के दैवीय शक्तियों का ज्ञाता हो।* 



*महाभारत महाभारत काल में केवल भगवान श्रीकृष्ण को अतिमहारथी माना जाता है*



*रामायण रामायण में भगवान श्रीराम अतिमहारथी थे।उनके अतिरिक्त मेघनाद को अतिमहारथी माना जाता है क्यूंकि केवल वही था जिसके पास तीनों महास्त्र - ब्रम्हास्त्र, नारायणास्त्र एवं पाशुपतास्त्र थे। पाशुपतास्त्र को छोड़ कर लक्ष्मण को भी समस्त दिव्यास्त्रों का ज्ञान था अतः कुछ जगह उन्हें भी इस श्रेणी में रखा जाता है।*



*इसके अतिरिक्त भगवान परशुराम और महावीर हनुमान का भी वर्णन कई स्थान पर अतिमहारथी के रूप में किया गया है।*



*भगवान विष्णु के अवतार विशेष कर वाराह एवं नृसिंह को भी अतिमहारथी की श्रेणी में रखा जाता है। कुछ देवताओं जैसे कार्तिकेय, गणेश तथा वैदिक युग के ग्रंथों में इंद्र, सूर्य एवं वरुण देव को भी अतिमहारथी माना जाता है।आदिशक्ति की दस महाविद्याओं, नवदुर्गा एवं रुद्रावतार, विशेषकर वीरभद्र और भैरव को भी अतिमहारथी माना जाता है।*



*6 महामहारथी ये किसी भी प्रकार के योद्धा का उच्चतम स्तर माना जाता है। महामहारथी उसे कहा जाता है जो 24 अतिमहारथियों अर्थात 207360000 सशस्त्र योद्धाओं का सामना कर सकता हो। इसके साथ ही समस्त प्रकार की दैवीय एवं महाशक्तियाँ उसके अधीन हो*

*इन्हे आसानी से परास्त नहीं किया जा सकता।*



*आज तक पृथ्वी पर कोई भी "योद्धा" इस स्तर पर नहीं पहुँचा है। इसका एक कारण ये भी है कि अभी तक 24 अतिमहारथी एक काल में तो क्या पूरे कल्प में भी नहीं हुए हैं। केवल त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु एवं रूद्र) एवं आदिशक्ति को ही इतना शक्तिशाली माना जाता है*



*जय शिव शंभू 🙏🏻🔱*

गुरुवार, 20 मार्च 2025

सती प्रथा या वामपंथी विवाद


सती प्रथा पर विशेष.......... AI और अन्य विद्वानों के सहयोग से
सती प्रथा एक प्राचीन भारतीय प्रथा थी जिसमें एक विधवा अपने पति की चिता पर स्वयं को जलाकर आत्मदाह कर लेती थी। इस प्रथा को 1829 में ब्रिटिश भारत में गैरकानूनी घोषित कर दिया गया था।
सती प्रथा के बारे में कुछ मुख्य बातें:
 प्रारंभ:
    सती प्रथा का पहला अभिलेखीय साक्ष्य 510 ईस्वी के मध्य प्रदेश के एरण स्तंभ लेख से मिलता है।
    कुछ इतिहासकारों का मानना है कि यह प्रथा गुप्त काल में शुरू हुई थी।
    धर्मसूत्रों तथा प्रारम्भिक स्मृतियों से भी सती प्रथा के प्रचलित होने का संकेत नहीं मिलता है । इस प्रकार यह स्पष्ट है कि चतुर्थ ईसा पूर्व तक सती प्रथा का प्रचलन भारतीय समाज में नहीं था |
  भारतीय समाज में सती प्रथा का प्रचलन चतुर्थ शती ईसा पूर्व के बाद किसी समय हुआ होगा ।
हिंदू धर्म में स्थान:
    कुछ लोगों का मानना है कि सती प्रथा हिंदू धर्म का एक अभिन्न अंग थी, जबकि अन्य लोग इसे एक सामाजिक बुराई मानते हैं।
    सती प्रथा को हिंदू धर्म के प्राचीन ग्रंथों में कहीं भी अनिवार्य नहीं बताया गया है।
 अंत:
    1829 में, राजा राममोहन राय जैसे समाज सुधारकों के प्रयासों के कारण, ब्रिटिश सरकार ने सती प्रथा को गैरकानूनी घोषित कर दिया।
   * बंगाल सती विनियमन, 1829: राममोहन राय के अथक प्रयासों के परिणामस्वरूप बंगाल सती विनियमन, 1829 पारित हुआ, जिसमें सती प्रथा को अपराध घोषित किया गया।
 * आडंबर:
   * यह कहना उचित होगा कि सती प्रथा एक सामाजिक आडंबर थी, जो समय के साथ विकसित हुई और महिलाओं के खिलाफ भेदभाव और हिंसा का प्रतीक बन गई।
सती प्रथा के कुछ कारण:
  सामाजिक दबाव
 आर्थिक असुरक्षा
 धार्मिक मान्यताएँ तो नहीं कही जा सकतीं पर कुछ आक्रमण कार्यों की कुदृष्टि से परिवार कुल को बचाने का प्रभाव शाली उपाय जरूर कह सकते हैं। यह सच है कि सती प्रथा को सिर्फ धार्मिक मान्यता कहना पूरी तरह से सही नहीं होगा। इतिहास में ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं जहाँ आक्रमणकारियों के भय से परिवारों और कुल की महिलाओं ने सती प्रथा का सहारा लिया।
आक्रमण का भय:
 प्राचीन और मध्यकाल में, जब युद्ध और आक्रमण आम बात थी, महिलाओं को अक्सर दुश्मनों द्वारा बंदी बना लिया जाता था और उनके साथ दुर्व्यवहार किया जाता था।
  ऐसे में, कुछ परिवारों ने अपनी महिलाओं की रक्षा के लिए उन्हें सती होने के लिए प्रोत्साहित किया।
  यह एक दर्दनाक लेकिन उस समय के हिसाब से परिवार की प्रतिष्ठा और महिलाओं के सम्मान को बचाने का एक तरीका माना जाता था।
विशेष रूप से राजपूत काल में, जब आक्रमणों की संख्या अधिक थी, सती प्रथा का प्रचलन भी बढ़ गया।
  कुल की रक्षा के लिए, महिला का आत्म बलिदान एक उत्तम उपाय था।
सामाजिक परिस्थितियाँ:
  इसके अलावा, विधवा महिलाओं को समाज में कई तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ता था।
 आर्थिक असुरक्षा और सामाजिक बहिष्कार के कारण, कुछ महिलाओं ने सती होना बेहतर समझा।
  कुछ मामलों में, परिवार के लोग भी विधवा महिलाओं को बोझ समझते थे खाना भी उचित नहीं परिवार उन्हें परिस्थिति वश सती होने के लिए मजबूर करते रहे होंगे।
इसलिए, यह कहना सही होगा कि सती प्रथा केवल धार्मिक मान्यता नहीं थी, बल्कि यह उस समय की सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों का भी परिणाम थी। आक्रमणकारियों का भय और सामाजिक असुरक्षा ने इस प्रथा को बढ़ावा दिया।वैसे सती प्रथा एक दुखद और जटिल विषय है। इसके बारे में कई अलग-अलग दृष्टिकोण हैं।

पति की मृत्यु के बाद ही उसकी विधवा को एक कटोरा भांग और धतूरा पिलाकर नशे में मदहोश कर दिया जाता था। जब वह श्मशान की ओर जाती थी, कभी हँसती थी, कभी रोती थी और तो कभी रास्ते में जमीन पर लेटकर ही सोना चाहती थी और यही उसका सहमरण (सती) के लिए जाना था। इसके बाद उसे चिता पर बैठा कर कच्चे बांस की मचिया
बनाकर दबाकर रखा जाता था क्योंकि डर रहता था कि शायद दाह होने वाली नारी दाह की यंत्रणा न सह सके। चिता पर बहुत अधिक राल और घी डालकर इतना अधिक धुआँ कर दिया जाता था कि उस यंत्रणा को देखकर कोई डर न जाए और दुनिया भर के ढोल, करताल और शंख बजाए जाते थे कि कोई उसका चिल्लाना,रोना-धोना,अनुनय-विनय न सुनने पाए। बस यही तो था सहमरण……” सतीप्रथा । सतीप्रथा से छुटकारा दिलाने वाले लोर्ड विलियम बेन्टीक और राजा राममोहन राय को सलाम करते आ रहे हो।
पर कभी जो महिलाएं सती नहीं हुई उनकी सामाजिक आर्थिक स्थिति पर कोई ध्यान ही किसी ने नहीं दिया।जब कि आज के सभ्य कहलाने वाले समाज के परिवार , कुल उनको तानी मार मार जिंदा जला कर दिन में कितनी ही बार सती कर देते हैं।इस के बाद अब तक वो सती होती आरही है।कभी विचार होता ही नहीं है सती प्रथा को केवल एक ऐतिहासिक घटना के रूप में देखना और महिलाओं की सामाजिक-आर्थिक स्थिति की अनदेखी करना एक बड़ी भूल है। आज भी, कई रूपों में, महिलाओं को सती प्रथा के समान पीड़ा से गुजरना पड़ता है।
आधुनिक समाज में सती प्रथा के रूप:
 
 सामाजिक बहिष्कार:
   
आज भी, विधवा महिलाओं को समाज में भेदभाव का सामना करना पड़ता है।
  उन्हें अशुभ माना जाता है और कई सामाजिक और धार्मिक आयोजनों से दूर रखा जाता है।
  आर्थिक असुरक्षा:
    कई महिलाएं अपने पति की मृत्यु के बाद आर्थिक रूप से असहाय हो जाती हैं।
    उन्हें परिवार और समाज से पर्याप्त समर्थन नहीं मिलता है, जिससे उनकी स्थिति और भी खराब हो जाती है।
  मानसिक उत्पीड़न:
    विधवा महिलाओं को अक्सर ताने और अपमान का सामना करना पड़ता है।
 उन्हें उनके जीवन के हर पहलू में दोषी ठहराया जाता है, जिससे उनकी मानसिक स्थिति पर गहरा प्रभाव पड़ता है।
 
 दहेज प्रथा:
   
आज भी दहेज प्रथा महिलाओं के लिए बहुत बड़ी समस्या है। ससुराल में दहेज के लिए प्रताड़ित करना और मार देना भी एक प्रकार से सती प्रथा ही है।
 
घरेलू हिंसा:
   
घरेलू हिंसा के रूप में आज भी महिलाओं को प्रताड़ित किया जाता है, जो शारीरिक और मानसिक रूप से सती प्रथा के समान ही है।
विचार करने योग्य बातें:
 हमें यह समझना होगा कि सती प्रथा केवल एक शारीरिक कृत्य नहीं था, बल्कि यह महिलाओं के खिलाफ सामाजिक और आर्थिक हिंसा का प्रतीक था।
आज भी, महिलाओं को उसी तरह की हिंसा का सामना करना पड़ता है, चाहे वह शारीरिक हो या मानसिक।
 हमें महिलाओं की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है।
 * शिक्षा और जागरूकता के माध्यम से, हम समाज में महिलाओं के प्रति दृष्टिकोण को बदल सकते हैं।
यह सच है कि आज भी महिलाओं को विभिन्न रूपों में सती प्रथा के समान पीड़ा से गुजरना पड़ता है। हमें इस वास्तविकता को स्वीकार करना होगा और महिलाओं के सम्मान और अधिकारों की रक्षा के लिए काम करना होगा।
तो अब आइए सत्य भी देखे
सनातन में कुप्रथाएं "एक सफेद झूठ" क्यों लगता है?
क्या सती प्रथा का वास्तविक रूप वही है जैसा आज तक हमने पढ़ा या फिर कुछ और? अगर वास्तविक रूप कुछ और है तो फिर हमें गलत क्यों पढ़ाया गया और हमारी किताबों में गलत लिखा किसने?
सती प्रथा को जानने से पहले हमें यह जानना पड़ेगा कि वामपंथी इतिहासकारोंऔर लेखकों द्वारा इस प्रथा के पीछे क्या तर्क दिया जाता था और क्या-क्या कारण बताए जाते थे, यह जानना ज्यादा जरूरी है।
पहला तर्क: सती प्रथा के पीछे जो तर्क दिया जाता है उसमें पहला तर्क है माता सती का, जिन्होंने स्वयं को यज्ञ की अग्नि में भस्म कर लिया था। इस प्रथा का नाम जिनके नाम पर रखा गया वह थीं माता सती।
महादेव और माता सती:
माता सती भगवान शिव की अर्धांगिनी थीऔर प्रजापति दक्ष की पुत्री थीं। अपने पिताद्वारा भगवान शिव का अपमान किए जाने परमाता सती अत्यंत क्रोधित हो गईं औरक्रोधावश यज्ञ की अग्नि में स्वयं को भस्मकर लिया।
परंतु यहाँ एक बात सोचने की है, कि मातासती के पति यानी भगवान शिव तो जीवितहैं, हालांकि वे भगवान हैं, शंभू (अर्थात स्वयंउत्पन्न होने वाला) हैं, उनका कोई अंत नहींहै, उनकी कोई शुरुआत नहीं है। अब इनवामपंथी इतिहासकारों द्वारा दिया गया तर्कतो तर्कहीन हो गया।
दूसरा, माता सती के साथ किसी नेजबरदस्ती नहीं की थी। उन्होंने पति केअपमान को स्वयं का अपमान मानकरअपनी इच्छा से स्वयं को भस्म किया था।जिस प्रथा के नाम का आधार वामपंथी इतिहासकारों ने माता सती को बनाया था वह आधार ही आधारहीन हो गया।
जब इनका पहला तर्क काम में नहीं आयातो इन्होंने दिया दूसरा तर्क, वह क्या था?
दूसरा तर्क: अंग्रेजी इतिहासकारों द्वारा जो दूसरा तर्क दिया जाता था वह तर्क था जौहर का। पहले के राजघरानों में जब युद्ध करतेवक्त पति की मृत्यु हो जाती थी, तो पत्नी अपने मान सम्मान को दरिंदे आक्रमणकारियों से बचाने के लिए हवनकुंड में कूदकर स्वयं को भस्म कर लेती थी।और यह आक्रमणकारी और कोई नहीं बल्कि अंग्रेज और मुगल ही थे।
रानियों द्वारा किया जाने वाला जौहर राजघराने की स्त्रियों को देखकर समाज की अन्य स्त्रियों ने भी अपने पति की मृत्यु के बाद, अपनी मान मर्यादा को आक्रमणकारियों से बचाने के लिए स्वयं को अग्नि में भस्म करना शुरू कर दिया, वह भी बिना किसी दबाव में अपनी स्वयं की इच्छानुसार।
लेकिन वामपंथी इतिहासकारों ने इस बातका बतंगड़ बना कर, गलत ढंग से पेश कर भारतीयों के दिमाग में डाला कि भारत में स्त्री को जबरदस्ती आग में झोंका जाता है और उसको अपने पति की चिता के साथ जिंदा जलाया जाता है।
परंतु अब इन अंग्रेजी इतिहासकारों से हमें पूछना चाहिए कि जब स्त्रियों की इतनी ही चिंता थी तो अंग्रेजों द्वारा आक्रमण किया ही क्यों जाता था?
युद्ध में उनके पतियों को मारा ही क्यों जाता था?
अब इस तथ्य के भी आधारहीन हो जाने के कारण अंग्रेजी इतिहासकारों द्वारा जो अन्य तर्क दिया जाता था वह देखते हैं क्या था।
तीसरा तर्क: एक अन्य तर्क जो अंग्रेज इतिहासकारों द्वारा दिया जाता है वह है महाराज पांडु और उनकी पत्नी श्रीमती माद्रीजी का।
जब महाराज पांडु की मृत्यु हुई तो उनकीपत्नी माद्री जी ने उनकी मृत्यु का कारण स्वयं को समझा जिसके पश्चाताप में उन्होंने अपने पति की चिता के साथ स्वयं को भस्मकर लिया।
महाराज पांडु को किंदम ऋषि का श्राप थाकि यदि वह कामांध होकर किसी भी स्त्रीका स्पर्श करेगा तो उसकी मृत्यु हो जाएगी।
महाभारत के आदि पर्व के ‘सम्भव पर्व’ केअंतर्गत, अध्याय 124 में पाण्डु की मृत्यु और माद्री की चितारोहण की कथा का वर्णन है।
महाराज पांडु अपनी प्रिय पत्नी माद्री केसाथ वन में घूम रहे थे। पलाश, तिलक,आम, चम्‍पा, पारिभद्रक तथा और भी बहुतसे वृक्ष - फूलों की समृद्धि से भरे हुए थे। जो उस वन की शोभा बढ़ा रहे थे।
नाना प्रकार के जलाशयों तथा कमलों से सुशोभित उस वन की मनोहर छटा देखकर राजा पाण्‍डु के मन में काम का संचार हो गया। जैसे ही उन्होंने कामांध होकर अपनी पत्नी माद्री को स्पर्श किया, वैसे ही उनकी मृत्यु हो गई।
उनकी पत्नी माद्री भी उनसे काफी प्रेम करतीथीं, इसी कारणवश वह विलाप करने लगीं।जब इस बात की खबर कुंती को लगी तो वहभी रोने लगी।
तब माद्री और कुंती, दोनों ने ही अपने पतिके प्रेम के कारण स्वयं को उनकी चिता केसाथ जलाने का निर्णय लिया। हमें दोनों केबीच हुए संवाद को देखना चाहिए!
महं ज्येष्ठा धर्मपत्नी ज्येष्ठं धर्मफलं मम।
अवश्यम्भाविनो भावान्मा मां माद्रि निवर्तय॥23॥
अन्विष्यामीह भर्तारमहं प्रेतवशं गतम्।
उत्तिष्ठत्वं विसृज्यैनमिमान् पालय दारकान्॥24॥
अवाप्य पुत्राँलग्धात्मा वीरपत्नीत्वमर्थये।
कुन्ती ने कहा, “माद्री! मैं इनकी ज्येष्ठ धर्मपत्नी हूँ, अतः धर्म के ज्येष्ठ फल पर भी मेराही अधिकार है। जो भविष्यम्भावी बात है,उससे मुझे मत रोको। मैं मृत्यु के वश में पड़े हुए अपने स्वामी का अनुगमन करूँगी। अब तुम इन्हें छोड़कर उठो और इन बच्चों का पालन करो। पुत्र को पाकर मेरा लौकिक मनोरथ पूर्ण हो चुका है, अब मैं पति के साथदग्ध होकर वीर पत्नी का पद पाना चाहती हूँ।
अहमेवानुयास्यामि भर्तारमपलायिनम्।
न हि तृप्तास्मि कामानां ज्येष्ठामामनुमन्यताम्॥25॥
माद्री बोली- रणभूमि से कभी पीठ न दिखानेवाले अपने पति देव के साथ मैं ही जाऊँगी; क्योंकि उनके साथ होने वाले काम भोग से मैंतृप्त नहीं हो सकी हूँ आप बड़ी बहिन हैं, इसलिये मुझे आपको आज्ञा प्रदान करनीचाहिये।
मां चाभिगम्य क्षीणोऽयं कामाद्भरतसत्तमः।
तमुच्छिन्द्यामस्य कामं कथं नु यमसादने॥26॥
ये भरत श्रेष्ठ मेरे प्रति आसक्त हो मुझसे समागम करके मृत्यु को प्राप्त हुए हैं; अतःमुझे किसी प्रकार परलोक में पहुँचकर उनकी उस काम वासना की निवृत्ति करनी चाहिये।
न चाप्यहं घर्तयन्ती निर्विशेषं सुतेषु ते।
वृत्तिमार्ये चरिष्यामि स्पृशेदेनस्तथा च माम्॥27॥
आर्ये! मैं आपके पुत्रों के साथ अपने सगे पुत्रकी भांति बर्ताव नहीं कर सकूँगी उस दशा में मुझे पाप लगेगा।
तस्मान्मे सुतयोः कुन्ति वर्तितव्यं स्वपुत्रयत्।
मां च कामयमानोऽयं राजा प्रेतवशं गतः॥28॥
(महाभारत, आदि पर्व, अध्याय 124)
अतः आप ही जीवित रहकर मेरे पुत्रों का भीअपने पुत्रों के समान ही पालन कीजियेगा।इसके सिवा ये महाराज मेरी ही कामना रखकर मृत्यु के अधीन हुए हैं।
इसके बाद ऋषि गणों ने उन्हें समझाते हुएकहा कि :-
ऋषयस्तान् समाश्वास्य पाण्डवान्सत्यविक्रमान्।
ऊचुः कुन्तीं च माद्रीं च समाश्वास्यतपस्विनः॥
सुभगे वालपुत्रे तु न मर्तव्यं कथंचन।
पाण्डवांश्चापि नेष्यामः कुरुराष्ट्रंपंग्तपान्॥
अधर्मेष्वर्थजातेषु धृतराष्ट्रश्च लोभवान्।
स कदाचिन्न वर्तेत पाण्डवेषु यथाविधि॥
(महाभारत, आदि पर्व, अध्याय 124)
वैशम्पायन जी कहते हैं, तदनन्तर तपस्वी ऋषियों ने सत्य पराक्रमी पाण्डवों को धीरज बँधाकर कुन्ती और माद्री को आश्वासन देते हुए कहा, “सुभगे ! तुम दोनों के पुत्र अभी बालक हैं, अतः तुम्हें किसी प्रकार देह-त्याग नहीं करना चाहिये। हम लोग शत्रुदमन पाण्डवों को कौरव राष्ट्र की राजधानी में पहुँचा देंगे। राजा धृतराष्ट्र अधर्ममय धन के लिये लोभ रखता है, अतः वह कभी पाण्डवों के साथ यथायोग्य बर्ताव नहीं कर सकता।इसीलिए आपको जीवित रहकर अपने बच्चों की देखभाल करनी चाहिए।
परंतु ऋषि-मुनियों के समझाने के बादमहारानी कुंती तो समझ गईं, लेकिन माद्री नहीं समझी और उन्होंने प्रेम वश महाराज पाण्‍डु की चिता के साथ स्वयं को भस्म कर लिया।
परंतु यहां भी देखा जाए तो उनको किसी नेविवश नहीं किया था और ऋषि-मुनियों केद्वारा समझाने के बाद भी उन्होंने ऐसा कियाक् योंकि वह उनसे प्रेम करती थीं।
परंतु धर्म के ठेकेदारों ने इस बात को गलतढंग से प्रस्तुत किया और सनातन धर्म को बदनाम करने की कोशिश की।
वहीं जब बात रोमियो-जूलियट की आती है, जब बात लैला-मजनू की आती है, जब बातसलीम-अनारकली की आती है, तो प्रेम अंधाहो जाता है क्योंकि इन लोगों ने भी एक दूसरेके लिए प्रेम होने के कारण अपनी जान दीथी। परंतु जब बात सनातन धर्म की आती हैतो प्रेम में भी अंधविश्वास नजर आता है।बड़े तर्कहीन तर्क दे देते थे अंग्रेज, और हमउन्हें बिना सबूतों के आधार पर, बिना पढ़ेमान भी लेते थे, क्योंकि गुलामी की आदततो हम में ही थी ना।
ऊपर दिए गए तर्कों में क्या कहीं भी ऐसालगा की स्त्री को जबरदस्ती उसके पति कीचिता के साथ जलाया जाता था, अपितु वहस्वयं की इच्छा से यह कार्य करती थीं।
परंतु इन वामपंथी इतिहासकारों औरलेखकों द्वारा हमारे वेदों में जो लिखा हैहमारे ग्रंथों में लिखा है वह सब उलट-पुलट करके हमें बताया गया जबकि लिखा कुछ और ही था।
हमने भी यह जानने की कभी कोशिश हीनहीं करी कि आखिर ऐसा क्यों होता था।इसके पीछे का कारण क्या था। हमारेसनातन धर्म में तो ऐसा कहीं पर भी नहींलिखा अपितु यहां तो नारियों का सम्मानकरना ही सिखाया गया है।
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाःक्रियाः॥
(मनुस्मृति 3/56)
अर्थात: जहाँ स्त्रियों की पूजा होती है वहाँदेवता निवास करते हैं और जहाँ स्त्रियों कीपूजा नहीं होती है, उनका सम्मान नहीं होता हैवहाँ किये गये समस्त अच्छे कर्म निष्फल होजाते हैं।
अब देखते हैं कि ऋग्वेद में विधवा नारी केबारे में क्या लिखा है:
उदीर्ष्व नार्यभि जीवलोकं गतासुमेतमुप शेषएहि।
हस्तग्राभस्य दिधिषोस्तवेदं पत्युर्जनित्वमभिसम्बभूथ॥8॥
(ऋग्वेद, 10 वा मंडल, सूक्त 18)
अर्थात: (पति की मृत्यु के बाद उसकीविधवा पत्नी से) उठ! तुझे संसार वापसबुला रहा है, तू किसका पक्ष ले रही है जोमृत शरीर है। जिसने इस संसार में तेरा हाथपकड़ा था और आकर्षित करता था वहमुक्त होकर चला गया।
सनातन धर्म के किसी भी ग्रंथ में इस बात का उल्लेख नहीं मिलता है कि स्त्री को उसकेपति की मृत्यु के बाद उसकी चिता के साथजला देना चाहिए। ना ही भारत के पुरानेइतिहास में ऐसी घटनाएं हुई हैं। आपइतिहास के पन्नों को टटोल कर देख सकतेहैं बशर्ते वह वामपंथी इतिहास ना हो। यहतो अंग्रेजों द्वारा बोला गया एक सफेद झूठथा जिसे भारत के कुछ ठेकेदारों ने बिनासोचे समझे सनातन धर्म को बदनाम करनेके लक्ष्य के साथ अपना लिया।
सनातन धर्म सदैव नारियों का सम्मान करना सिखाता है कोई भी शुभ कार्य बिना स्त्रियों के संपूर्ण नहीं होता और यही बात उन अंग्रेजों को हजम नहीं हुई।
इसीलिए उन्होंने हमारी परंपराओं के साथविक्षेप कर भारत के लोगों को बताया औरउनके मन में सनातन धर्म के प्रति हीन भावनाउत्पन्न की।
जिन अंग्रेजों के यहां Witch Craft Act, 1542 जैसे कानून रहे हैं, जिसके तहत किसीभी नारी को बिना सोचे समझे, चुड़ैल घोषितकरके जिंदा जला दिया जाता था। जिन अंग्रेजों के यहां नारियों को कुर्सी मेज कीतरह वस्तु समझा जाता था।
प्लेटो जैसे महान दार्शनिकों का कहना था कि नारियों में आत्मा नहीं होती इसीलिएअंग्रेजों के यहां नारियों को मताधिकार नहीं था, न्यायालय में उनकी गवाही नहीं सुनीजाती थी।
उस देश के नागरिक भारत को यह ज्ञान देतेहैं कि भारत की नारियां शोषित हैं।
जिस समय अंग्रेजों के यहां यह कानून थे, उस समय भारत में रानी अहिल्याबाई, रानीचेन्नम्मा, रानी दुर्गावती जैसी महान रानियाँरही हैं, जिन्होंने अपने-अपने राज्यों में शासनतक किया है, उस भारत की नारियां कभीपतित नहीं हो सकतीं।
रामायण, महाभारत, गीता, मनुस्मृति कहीं भीइस प्रथा का उल्लेख नहीं मिला, ना तोदशरथ महाराज के पश्चात माँ कौशल्या, सुमित्रा, कैकई ने सती का अवलम्ब किया,ना ही महाभारत में सत्यवती और कुंती नेइसको अपनाया। अपितु वे राजमाता बनकर गौरव से जीवित रही।
इतना सब जानने के बाद यह कहना अनुचितहोगा कि सनातन धर्म में स्त्रियों का शोषणहोता है।
पर मन में एक कौतूहल उठता है किआखिर सती प्रथा का वास्तविक रूप क्या था?
सती शब्द संस्कृत के "सत" शब्द से पैदाहुआ है। जिसका अर्थ है पवित्र। सती प्रथाका नाम माता सती के द्वारा योगाग्नि में स्वयंको भस्म कर पार्वती के रूप में प्राकट्य की घटना से जुड़ा हुआ है। सबसे पहली बात येकी सती ने योगाग्नि में आत्माहुति किसी केदबाव में नहीं दिया था। अपितु स्वेच्छा सेदिया था।
सती शब्द भी सत्यीकरण यानि पवित्रीकरणसे ही निकला है, और पवित्र करने कीप्रक्रिया अग्नि की है। इस शब्द विशेष का किसी विधवा के पति के शव के साथ दाह से कोई संबंध नहीं था।
नवरात्रि के समय जब माता अम्बे जी की आरती होती है तो उस पर ध्यान दीजियेगा। उस आरती की कुछ पंक्तियाँ आपकोदिखाता हूँ :-
सब की बिगड़ी बनाने वाली, लाज बचानेवाली,
सतिओं के सत को संवारती, ओ मैया हमरें तेरी आरती।
यहाँ “सतिओं के सत को संवारती” पंक्तिका अर्थ है कि जब किसी की पत्नी अपनेपति के मृत्यु के बाद सती होती थी तो माताअम्बे उसकी रक्षा करती थीं। माता अम्बे उनकी सात्विकता को बचाए रखती थीं तथा उनकी रक्षा करती थीं। अब अगर स्त्री को जिंदा जला दिया जाता था तो उसकी रक्षाका सवाल ही नहीं उठता। उसकी सात्विकता को कोई कैसे बचाएगा जब वह जिंदा ही नहीं रहती थी। यहाँ विरोधाभास उत्पन्न होता है।
माता अम्बे जी की यह आरती बहुत सालों से बोली जा रही है, अर्थात उस समय महिलाओं को सती के रूप में जलाया नहीं जाता था। वह मंदिर में रहा करतीं थीं जहाँउनकी पूजा की जाती थी। और माता अम्बेस्वयं उनकी रक्षा करती थीं।
गुप्तकाल में 510 ई. के दौरान सती प्रथा का पहला अभिलेखीय साक्ष्य देखा गयाहै। इस अभिलेख में महाराजा भानुगुप्त कावर्णन किया गया है जिनके साथ युद्ध मेंगोपराज भी मौजूद थे। गोपराज वीर गतिको प्राप्त हुए जिसके बाद उनकी पत्नी ने सती होकर अपने प्राण त्याग दिए थे। परन्तुयह किसी दबाव में नहीं अपितु स्वेच्छा का विषय था।
सनातन धर्म किसी को बाधित नहीं करता, अपितु सनातन में सदैव स्त्रियों को ऊपर कादर्जा दिया गया है। और जो आचरण स्त्रियोंके लिए बताया गया है, वही आचरण पुरुषोंको करने के लिए भी कहा है। तुलसीदासजी कहते हैं कि :-
एक नारिब्रतरत सब झारी।
ते मन बच क्रम पतिहितकारी॥
(उत्तर कांड, रामचरितमानस)
अर्थात: यहाँ तुलसीदास जी रामराज्य का वर्णन करते हुए कहते हैं कि राम राज्य में सभी पुरुष और स्त्री सामान थे, अर्थात पुरुष भी एक नारी व्रत का पालन करते थे। यहाँ पुरुष के विशेषाधिकारों को न मानकर दोनोंको समान रूप से एक ही व्रत पालने का आदेश दिया है।
तो क्या अब भी वामपंथी सनातन धर्म पर सवाल उठाएंगे?
जैसा आपने विभिन्न तस्वीरों में देखा होगा, वो गलत रूप है, जो हमें आज तक बतायागया, जिसके कारण अनेकों स्त्रियों की जान गई। भारत के कई आदिवासी इलाकों में (जैसे गोंड समुदाय के लोग, भील समुदायके लोग) सती प्रथा है किंतु इसका प्रकार देखें।
वहाँ विधवा स्त्री संस्कृत में मंत्र पढ़ती हुईपति की चिता के चक्कर काटती है और हरचक्कर में एक प्रश्न अपने हर संबंधी सेकरती है जैसे पुत्र, पुत्री, भाई, समाज, पुरोहित आदि और प्रश्न यह होता है कि क्या आप मेरा भरण पोषण करेंगे, अब मैं विधवा हूँ।
अब यहां कुछ लोग कहेंगे कि आज स्त्रीआत्मनिर्भर है उसे अपने भरण पोषण केलिए किसी पर निर्भर रहने की क्या आवश्यकता?
पर हमें एक बात ध्यान रखनी चाहिए कि आत्मनिर्भरता आध्यात्मिक रूप से सम्भव है परंतु भौतिक रूप से हमें अपने परिजनों परनिर्भर रहना ही पड़ता है। आत्मनिर्भरता काअर्थ यह नहीं कि हम अपने समाज को छोड़कर अपने अंदर निवास करें, हमें समाजमें तो रहना ही पड़ेगा। यदि कोई हाँ कहता हैतो वह प्रदक्षिणा रोक देती है, किंतु जबकोई सहमत नहीं होता तब वह 7 प्रदक्षिणा कर के गाँव के मंदिर जाती है और वहीं ईश्वर चरण में जीवन यापन करती है और इस स्त्री को सती कहते हैं।
यही नहीं जब सारा समाज मन्दिर आता है तब उस स्त्री की भी चरण वंदना करता है और उसे देवी मानकर सम्मान भी दिया जाता है।
यह है वास्तविक सती प्रथा का सत्य।

रविवार, 16 मार्च 2025

वर्ण जन्म से होता है

वर्ण जन्म से होता है.....।
आजकल कुछ लोग ब्राह्मणों को उपदेश देते है और कर्मणा कर्मणा चिल्लाते है ये पोस्ट उन्हीं के लिए है जिन्हें न तो शास्त्र का ज्ञान है न ही प्रमाण मालूम है समस्त प्रमाण इसीलिए यहां पर डाल दिये गए है जो ब्राह्मण द्रोही और वर्णसंकरता का समर्थक होगा वही शास्त्र प्रमाण कदापि नही मानेगा ।

वर्ण और जाति अलग अलग नहीं हैं। जैसे आपका शरीर समाज का हिस्सा है, और आपके आंख, कान आदि शरीर के अंग। उसमें भी कोशिका, पुतली, रोम आदि अंगों के भी उपांग हैं। वैसे ही सनातन समाज का हिस्सा वर्ण है और फिर उन वर्णों के अंग तदनुरूप जातियां हैं और जातियों में भी उपजातियां हैं।

जैसे घर में अलग अलग कमरे, और कमरों में भी अलग अलग अलमारियों की व्यवस्था है और उनमें भी अलग अलह सांचे बने हैं, वैसे ही समाज रूपी घर में वर्णरूपी कमरे और जातिरूपी अलमारियों की सांचे रूपी उपजातियां हैं। वर्ण समष्टि है और जाति व्यष्टि। कुछ लोग जाति शब्द को संस्कृत का न मानकर यवनों के ‘अल-जात’ शब्द से उसका सम्बन्ध जोड़ देते हैं, उनके भ्रम का निराकरण भी यहीं हो जाएगा।

ब्राह्मणो जन्मना श्रेयान् सर्वेषां प्राणिनामिह ।
(श्रीमद्भागवत महापुराण)
जन्म से ही ब्राह्मण सभी प्राणियों में श्रेष्ठ है।

जन्मनैव महाभागो ब्राह्मणो नाम जायते ।
नमस्य: सर्वभूतानामतिथि: प्रसृताग्रभुक्॥
(महाभारत)
ब्राह्मण जन्म से ही महान् है और सभी प्राणियों के द्वारा पूजनीय है।

बालयोरनयोर्नॄणां जन्मना ब्राह्मणो गुरुः।
(श्रीमद्भागवत महापुराण)
ब्राह्मण जन्म से ही सभी मनुष्यों का गुरु है।

जन्मना जायते शूद्रः संस्काराद्द्विज उच्यते ॥
(स्कन्दपुराण)

यहाँ जन्म से शूद्र इसीलिए कहा क्योंकि असंस्कृत व्यक्ति की शूद्रवत् संज्ञा है। जैसे शूद्र को वेदाध्ययन का अधिकार नहीं, वैसे ही अनुपवीती ब्राह्मण को भी नहीं।

इसीलिए उसी स्कन्दपुराण में फिर कहा :-
ब्राह्मणो हि महद्भूतं जन्मना सह जायते ॥
ब्राह्मण जन्म से ही महान् है।

ब्रह्म को जानने वाला ब्राह्मण है, यह बात सत्य है लेकिन उससे पहले ब्राह्मण माता पिता और गुरु की भी आवश्यकता है। तब वह ब्रह्म को जान पाता है। यहां कॉलेज का सिलेबस खत्म कर नहीं पाते, चले हैं ब्रह्मज्ञान भांजने।

अपि च,

स्त्रीशूद्रबीजबंधूनां न वेदश्रवणं स्मृतम्।
तेषामेवहितार्थाय पुराणानि कृतानि वै।
(औशनस उपपुराण)

स्त्री और शूद्र हेतु वेदश्रवण का निषेध ऊपर के वाक्य से और नीचे के भी प्रमाणों से मिलता है। इसीलिए उनके कल्याण के लिए पुराणों का प्रणयन किया गया।

प्रणवं वैदिकं चैव शूद्रे नोपदिशेच्छिवे।
(परमानन्द तंत्र, त्रयोदश उल्लास)

शूद्राणां वेदमंत्रेषु नाधिकार: कदाचन।
स्थाने वैदिकमंत्रस्य मूलमंत्रं विनिर्दिशेत्॥
(योगिनी तंत्र)

इसीलिए पुनः कहा :-

जन्मना लब्धजातिस्तु
(श्रीमद्देवीभागवत महापुराण)
जाति की प्राप्ति जन्म से ही है।

जन्मना चोत्तमोऽयं च सर्वार्चा ब्राह्मणोऽर्हति॥
(भविष्य पुराण)
ब्राह्मण जन्म से ही उत्तम है, और सबों के द्वारा सम्माननीय है।

जन्मना ब्राह्मणो ज्ञेयः संस्कारैर्द्विज उच्यते।
विद्यया याति विप्रत्वं त्रिभिः श्रोत्रियलक्षणम्॥
(पद्मपुराण, अत्रि संहिता)

जन्मना ब्राह्मणो ज्ञेयः
(पराशर उपपुराण, वैखानस कल्पसूत्र)
जन्म से ब्राह्मण, संस्कार से द्विज, विद्या से विप्र और तीनों से श्रोत्रिय होता है।

क्षत्रियो वाथ वैश्यो वा कल्पकोटिशतेन च ॥
तपसा ब्राह्मणत्वं च न प्राप्नोति श्रुतौ श्रुतम् ।
(श्रीमद्देवीभागवत महापुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण)
क्षत्रिय और वैश्य भी करोड़ों कल्पों तक तपस्या करके भी केवल तपस्या के दम पर ब्राह्मण नहीं बन सकते।

जो लोग विश्वामित्र का उदाहरण देते हैं, वो भी स्मरण रखें कि उन्होंने भी एक जन्म में ब्रह्मत्व प्राप्त नहीं किया। कई बार उनका शरीर बदला, पूरा शरीर नष्ट हो जाता तब केवल तेजरूप में बचते थे, ब्रह्मा जी नया शरीर देते थे। बीच में पक्षी की योनि भी मिली थी उन्हें। तब जाकर ब्राह्मण बने। उसमें भी उन्हें अनेक जन्मों में भी सफलता इसीलिए मिली क्योंकि उनका जन्म जिस चरु के कारण हुआ था वह ब्रह्मवक्तव्य से प्रेरित था।

शुक्लयजुर्वेद की काण्व शाखा के शतपथब्राह्मण में है बृहदारण्यकोपनिषद् , उसका वचन है :-

ब्रह्म वा इदमग्रआसीदेकमेव सृजत क्षत्रं यान्येतानि स नैव व्यभवत् स विशमसृजति स नैव व्यभवत्स शौद्रंवर्णमसृजत्।

अर्थात् सबसे पहले ब्राह्मण वर्ण ही था । उसने क्षत्रिय वर्णका सृजन किया । वह ब्राह्मण क्षत्रिय का सृजन करने के बाद भी अपनी वृद्धिमें सक्षम नही हुआ, तब उसने वैश्य वर्ण का सृजन किया ।

इसके अनन्तर (अर्थात् क्षत्रिय और वैश्यकी रचनाके बाद )भी वह ब्रह्म प्रवृद्ध न हो सका ,तब उसने शूद्र वर्णकी रचना की।

ये तो सिद्ध ही है सभी वर्ण भगवान् से उत्पन्न हुए अब इन वर्णों का विभाग सुनिए ! इन वर्णोंमें जन्म कैसे होता है इस विषय में भगवान् गीता में कहते हैं –
गुणकर्मविभागशः।

अर्थात्, जन्मांतर में किये गए कर्मों और सञ्चित गुणोंके द्वारा विभाग करके ही भगवान् चारों वर्णोंमें जन्म देते हैं !

वर्णाश्रमाश्चस्वकर्मनिष्ठा: प्रेत्य कर्मफलमनुभूय तत: शेषेण विशिष्टदेशजातिकुलधर्मायु: श्रुतिवृत्तवित्तसुखमेधसो जन्म प्रतिपद्यन्ते।
(स्मृतिसन्दर्भ)

अर्थात् अपने कर्मोंमें तत्पर हुए वर्णाश्रमावलम्बी मरकर, परलोकमें कर्मोंका फल भोगकर, बचे हुए कर्मफलके अनुसार श्रेष्ठ देश, काल, जाति, कुल, धर्म, आयु, विद्या, आचार, धन, सुख और मेधा आदिसे युक्त, जन्म ग्रहण करते हैं।

कारणं गुणसंगोस्य सदद्योनिजन्मसु ।
(श्रीमद्भगवद्गीता)

गुणोंमें जो आसक्ति है वही इस भोक्ता पुरुष के अच्छी -बुरी योनियों में जन्म लेने का कारण है ।

जन्मना जायते शूद्रः संस्कारात्‌ भवेत् द्विजः।
वेद पाठात्‌ भवेत्‌ विप्रः ब्रह्म जानातीति ब्राह्मणः।।
अर्थात – व्यक्ति जन्मतः शूद्र है।
संस्कार से वह द्विज बन सकता है। वेदों के पठन-पाठन से विप्र हो सकता है। ब्रह्म को जानने वाला ब्राह्मण होता है।
इसके आधार पर कहते हैं वर्ण कर्म के द्वारा कोई भी बदल सकता है । किन्तु इस श्लोक का ये अर्थ बिल्कुल भी नहीं है । जन्मना जायते शूद्र: से ये नहीं हो जाता कि जन्म से सभी शूद्र हैं; इसका अर्थ है जन्म से सभी शूद्रवत् हैं ,अर्थात् वेद के अनधिकारी हैं किन्तु संस्कार होने से द्विज वेद का अधिकारी होता है ।

ब्राह्मण: सम्भवेनैव देवानामपि दैवतम् ।
प्रमाणं चैव लोकस्य ब्रह्मात्रेव हि कारणम् ॥
(मनुस्मृति)

अर्थात्, जन्मसे ही ब्राह्मण देवताओंका भी देवता होता है और लोक में उसका प्रमाण माना जाता है इसमें वेद ही कारण हैं ।

तपः श्रुतं च योनिश्चेत्येतद् ब्राह्मणककारणम् ।
(महाभाष्य)

जो ब्राह्मण से ब्राह्मणी में उत्पन्न और उपनयनपूर्वक वेदाध्ययन ,तप, विद्यादिसे युक्त होता है ,वही मुख्य ब्राह्मण होता है !

मेरु तन्त्र और पराशर पुराण भी ब्रह्मक्षेत्रं ब्रह्मबीजं आदि श्लोकों से जन्मना महत्व का प्रतिपादन करते हैं।

तप: श्रुताभ्यां यो हीनो जातिब्राह्मण एव स:
(महाभाष्य)

जो तप और विद्यासे हीन है वह केवल जाति से ब्राह्मण होता है ।

विदुरजी व्यासजीके पुत्र थे जो ब्राह्मण हैं और सर्वज्ञ वैष्णवावतार हैं, फिर भी शूद्र योनि में जन्म होने से शूद्र ही रहे । महाभारत में विदुर स्वयं को ब्रह्मविद्याका अनधिकारी बताते हैं जिसके कारण उन्होंने सनत्सुजात जी को ब्रह्मविद्या के लिए बुलाया था ।

विदुर जी कहते हैं
शूद्रयोनावहं जातो नातोऽन्यद् वक्तुमुत्सहे ।
कुमारस्य तु या बुद्धिर्वेद तां शाश्वतीमहम् ॥
(महाभारत)

अर्थात्, मेरा जन्म शूद्रयोनि में हुआ है अतः मैं (ब्रह्मविद्या में अधिकार नहीं होने से ) इसके अतिरिक्त और कोई उपदेश देने का मैं साहस नहीं कर सकता, किन्तु कुमार सनत्सुजात की बुद्धि सनातन है, मैं उन्हें जानता हूँ ।

महर्षि आपस्तम्ब ने धर्मसूत्रों में यह बात कही :-

धर्मचर्य्या जघन्यो वर्णः पूर्वंपूर्वं वर्णमापद्यते जातिपरिवृत्तौ ।
अधर्मचर्य्यया पूर्वोवर्णो जघन्यं वर्णमापद्यते जातिपरिवृत्तौ॥

धर्माचरण से निकृष्ट वर्ण अपने वर्ण से उत्तम वर्ण में जन्म लेता है। अधर्माचरण से पूर्व वर्ण अर्थात् उत्तम वर्ण भी निम्न वर्ण में जन्म लेता है ।

तद्य इह रमणीयचरणाभ्यासो ह यत्ते रमणीयां योनिमापद्येरन् ब्राह्मणयोनिं वा क्षत्रिययोनिं वा वैश्ययोनिं वाथ य इह कपूयचरणाभ्यासो ह यत्ते कपूयां योनिमापद्येरनश्वयोनिं वा शूकर योनिं वा चाण्डालयोनिं वा।
(छान्दोग्योपनिषत्)

अर्थात्, उन में जो अच्छे आचरणवाले होते हैं वे शीघ्र ही उत्तमयोनि को प्राप्त होते हैं । वे ब्राह्मणयोनि, क्षत्रिययोनि अथवा वैश्ययोनि प्राप्त करते हैं तथा अशुभ आचरण वाले होते हैं वे तत्काल अशुभ योनिको प्राप्त होते हैं। वे कुत्ते की योनि, सूकर की योनि अथवा चाण्डालयोनि प्राप्त करते हैं।

उपरोक्त मन्त्र में स्पष्ट उल्लेख है कर्म के द्वारा ही अलग अलग योनियों में अथवा वर्ण में जन्म होता है।

यहां कोई अधिकार के हनन की बात नहीं है। जैसे कि अपनी पत्नी को वस्त्रहीन अवस्था में देख सकते हैं, लेकिन माता को नहीं। यहाँ पुत्र यदि कहे कि यह हमारे अधिकार का हनन है, तो मार खायेगा। वह उसका काम ही नहीं है। और यह ब्राह्मण जन्म ऐसे ही आरक्षण में नहीं मिल गया। ब्राह्मण का काम शूद्र करेगा तो उसे दोष लगेगा, वैसे ही शूद्र का काम ब्राह्मण के लिए वर्जित है।

तिर्यग्योनिगतः सर्वो मानुष्यं यदि गच्छति।
स जायते पुल्कसो वा चाण्डालो वाऽप्यसंशयः॥

पशुयोनि का जीव जब पहली बार मनुष्य बनता है तो म्लेच्छ या चांडाल बनता है।

पुल्कसः पापयोनिर्वा यः कश्चिदिह लक्ष्यते।
स तस्यामेव सुचिरं मतङ्ग परिवर्तते॥

हे मतङ्ग !! फिर वह उसी म्लेच्छ योनि में बहुत जन्मों तक बना रहता है।

ततो दशशते काले लभते शूद्रतामपि।
शूद्रयोनावपि ततो बहुशः परिवर्तते॥

फिर हज़ार जन्मों के काल के बराबर समय बिताकर उसे शूद्रयोनि मिलती हैं जहां फिर वह बहुत से जन्म लेता है।

ततस्त्रिंशद्गुणे काले लभते वैश्यतामपि।
वैश्यतायां चिरं कालं तत्रैव परिवर्तते॥

वहां तीस जन्म बिताकर (यदि वह अपने वर्णगत धर्म का पालन करता रहा, तो) वैश्य वर्ण में जन्म लेता है और पुनः कई जन्मों तक वैश्य ही रहता है।

ततः षष्टिगुणे काले राजन्यो नाम जायते।
ततः षष्टिगुणे काले लभते ब्रह्मबन्धुताम्॥

वहां साठ जन्म बिताकर वह क्षत्रिय कुल में जन्म लेता है और फिर साठ जन्मों तक क्षत्रिय रहकर ब्राह्मण कुल में जन्म लेता है। यहां केवल वह ब्रह्मबन्धुत्व की स्थिति में रहता है, यानि जन्म मिला है, कर्म ब्राह्मण के नहीं हैं।

ब्रह्मबन्धुश्चिरं कालं ततस्तु परिवर्तते।
ततस्तु द्विशते काले लभते काण्डपृष्ठताम्॥

ब्रह्मबन्धुत्व की स्थिति में जब दो सौ जन्म बीतते हैं तब उसका जन्म वेदज्ञानी ब्राह्मण कुल में होता है।

काण्डपृष्ठश्चिरं कालं तत्रैव परिवर्तते।
ततस्तु त्रिशते काले लभते जपतामपि॥

ऐसे कुल में तीन सौ जन्म लेने के बाद वह ब्राह्मण के आचरण और गायत्री आदि के संस्कार से भी युक्त हो जाता है।

तं च प्राप्य चिरं कालं तत्रैव परिवर्तते।
ततश्चतुःशते काले श्रोत्रियो नाम जायते॥
(महाभारत)

इस प्रकार से जन्मना ब्राह्मण होकर कर्मणा भी जब वह ब्राह्मण बनता है, तो ऐसे स्तर के चार सौ जन्मों के बाद इसे ब्रह्मबोध होता है।

यानि जन्मना ब्राह्मण बनने के नौ सौ जन्मों के बाद वह कर्मणा भी ब्राह्मण बन पाता है। ऐसे घूमते फिरते नहीं, कि जब मन किया इसी शरीर से बन गए।

वर्ण देहाश्रित है। देह जन्माश्रित है। वर्ण कर्माश्रित नहीं है क्योंकि कर्म देह की अपेक्षा चिरस्थाई नहीं। वर्ण भौतिक अस्तित्व का परिचायक है और कर्म का आधार। इसीलिए कर्म वर्णाश्रित है, न कि वर्ण कर्माश्रित। कर्म बदलने से यदि वर्ण बदलेगा तो पूजा कराने वाला ब्राह्मण यदि धर्मरक्षा के लिए शस्त्र उठाये तो उसकी क्षत्रिय संज्ञा हो जाती, तो उसे अपनी पत्नी से ही ब्राह्मणीगमन का पाप लग जाता। कर्म वर्ण के ऊपर आश्रित है इसीलिए द्रोणाचार्य और युधिष्ठिर का कर्म उनके वर्ण पर प्रभाव न डाल सका।

यदि इच्छानुसार कर्म बदलने से वर्ण बदलने की स्वतंत्रता होती तो भगवान गीता में क्यों कहते ?
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः।
अपने अपने कर्म में लगे रहकर ही मनुष्य का कल्याण सम्भव है। इसीलिए महाभारत में जाबालि, बृहद्धर्म उपपुराण और पद्मपुराण आदि में कौशिक और नरोत्तम ब्राह्मण आदि को धर्मव्याध नामक कसाई, तुलाधार वैश्य और शुभा नामक स्त्री आदि धर्म का बोध कराते हैं। उनका कल्याण भी अपने अपने कर्म में रहकर ही हुआ।

पहले वर्ण मिलता है, तब उसके अनुरूप कर्म करने का अधिकार।
कोई भी कर्म करके उसके अनुरूप वर्ण चयन करने का अधिकार नहीं है।

उदाहरण :- पहले व्यक्ति आरबीआई का गवर्नर बनेगा फिर नोट छापेगा। पहले पद तब अधिकार। कोई भी व्यक्ति नोट छाप कर ये नहीं कह सकता है कि चूंकि मैं आरबीआई के गवर्नर का काम कर रहा हूँ तो मुझे वही पद दे दो। इसी प्रकार पूर्वजन्म की योग्यता के आधार पर इस जन्म का वर्ण मिलता है, फिर उसके अनुरूप कर्म करने का अधिकार। कर्म चुनने की स्वतंत्रता किसी को भी नहीं है। यदि ऐसा होता तो भिक्षाटन करने (ब्रह्मवृत्ति) के लिए उत्सुक अर्जुन को भगवान नहीं रोकते।

इज्याध्ययनदानानि विहितानि द्विजन्मनाम्।
जन्मकर्मावदातानां क्रियाश्चाश्रमचोदिताः॥
( श्रीमद्भागवत 7-11-13)

कुछ लोग सूत जी का उदाहरण देते हैं। सूत जी अयोनिज हैं। पृथु जी के यज्ञ में बृहस्पति और इंद्र जी का भाग मिल जाने से यज्ञ कुण्ड से सूत जी की उत्पत्ति हुई।
सूत जी ब्राह्मण ही हैं, सूत उनकी संज्ञा है, न कि सूत जाति। पद्मपुराण और वायुपुराण में उनके प्रादुर्भाव की कथा है।अग्निकुण्डसमुद्भूत: सूतो विमलमानसः। लेकिन उनका पालन पोषण सन्तानहीन सूत परिवार ने किया अतः वे भी उसी से पुकारे गए। जैसे राजा उपरिचर तथा अद्रिका अप्सरा की कन्या सत्यवती तथा ब्राह्मण शक्तिपुत्र पराशर के सहयोग से उत्पन्न व्यास जी ब्राह्मण थे। कैवर्त के द्वारा लालन पालन होने से सत्यवती दाशकन्या नहीं बन गयी। ऋषि कण्व के द्वारा पालन पोषण करने मात्र से शकुंतला ब्राह्मणी नहीं बन गयी।

जैसे सूत रथी के रथ का कुशलता से संचालन करके उसके मार्ग को प्रशस्त करता है, जैसे गुरु शिष्य को मार्गदर्शन देकर उसका मार्ग प्रशस्त करता है, वैसे ही सूत जी ने मार्गदर्शन के माध्यम से ऋषियों का कल्याण किया, इसीलिए उन्हें सूत कहा गया।

वैसे कर्म देखें तो द्रोणाचार्य ने जीवन भर शस्त्र की ही कमाई खाई। लेकिन उन्हें कभी भी कहीं भी क्षत्रिय नहीं कहा गया। विदुर जी ने जीवन भर शास्त्रोपदेश ही किया लेकिन उन्हें किसी ने कभी भी ब्राह्मण नहीं कहा। कृष्ण जी ने अनेकों बार अर्जुन का रथ संचालन किया लेकिन उन्हें कभी किसी ने सूत नहीं कहा।

महर्षि रोमहर्षण जी को ऋषियों ने अपना सूत यानि मार्ग दर्शक स्वीकार किया और बाद में इन्हीं को सूत जी महाराज कहा गया, अल्पज्ञानी लोग सूत जी को सूत जाति से सम्बन्धित कर देते हैं, परन्तु सूत जी का जन्म अग्निकुण्ड से ऋषियों द्वारा यज्ञ के दौरान हुआ, जिनके दर्शन से ऋषियों के रोंगटे खड़े हो गये क्योंकि इनके ललाट पर इतना तेज था। इनका प्रथम नाम रोमहर्षण हुआ । महर्षि श्री सूत जी साक्षात् ज्ञान स्वरूप थे तभी तो शौनकादि ऋषियों ने इन्हें अज्ञानान्धकार का नाश करने वाला सूर्य कहा।
अज्ञानध्वान्तविध्वंसकोटिसूर्यसमप्रभ।
सूताख्याहि कथासारं मम कर्ण रसायनम् ।।

कबीर दास ने कहा :- गुरु कुम्हार सिस कुम्भ है …
तो इसका अर्थ यह नहीं कि सभी गुरु कुम्हार हैं, या सभी कुम्हार गुरु हैं।अपितु यह है कि जैसे अपरिपक्व मिट्टी से कुम्हार अपने मार्गदर्शन से, कभी मार कर, कभी सहलाकर परिपक्व घड़ा बनाता है, वैसे ही अपरिपक्व शिष्य को अपने मार्गदर्शन से गुरु परिपक्व बनाता है। इसीलिए गुरु का कुम्हार के समान होना बताया गया है। जैसे रोमहर्षण जी का सूत के समान वर्णन मिलता है।

कर्म से जाति का निर्धारण होता है, यह निःसंदेह सत्य है | पर क्या आप ६ वर्ष के बालक को देख कर कैसे कह सकते हैं कि वह ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र में क्या बनेगा ? क्योंकि अभी तो उसने तदनुरूप कर्म किया ही नहीं !!

जहां कर्म से जाति का निर्धारण होने की बात है, तो वहाँ पिछले जन्म के कर्मों का संकेत है। पिछले जन्म के कर्म इस जन्म की जाति निर्धारित करते हैं, और इस जन्म के कर्म अगले जन्म की योनि या जाति का निर्धारण करते हैं | यदि ऐसा न होता, तो ब्राह्मणों के समान जीवन जीने वाली माता शबरी को ब्राहमण क्यों नहीं माना गया, और क्षत्रिय के जैसे कर्म करने वाले परशुराम को ब्राह्मण क्यों कहा गया ?

यह बहुत बड़ा भ्रमजाल है | यदि कर्म के आधार पर जाति होती तो फिर संसार में कर्मों का सम्मिश्रण नहीं होता। जैसे पानी पीने के कर्म को करने वाले एक श्रेणी में आते, और खाना खाने वाले दूसरी में। खाने वाले लोग पीते नहीं, और पीने वाले खाते नहीं। ये नियम शाश्वत होता .. लेकिन यह तो विरोधाभास है, क्योंकि यहाँ तो कर्म सम्मिश्रित है …भगवान श्रीकृष्ण जब गाय चराते थे, तो उन्हें क्षत्रिय क्यों कहा गया, वैश्य क्यों नहीं? और भला विदुर जैसे महाज्ञानी तपस्वी को और संजय जैसे साधक को ब्राह्मण क्यों नहीं कहा गया ?

इस जन्म की जाति का निर्धारण पिछले कर्मों से होता है.. इस जन्म में यदि शूद्र धर्माचरण की मर्यादा में रहे, तो उसे अगली योनि में वर्ण में उन्नति मिलेगी, वह वैश्य बनेगा, अन्यथा नीचे गिर कर म्लेच्छ बन जायेगा | इसी प्रकार यदि क्षत्रिय मर्यादानुसार धर्माचरण करे, तो अगले जन्म में इस जन्म के कर्म फल के तौर पर ब्राह्मण बनेगा, और यदि ऐसा नहीं किया, तो अगली योनि में विषय या शूद्र या म्लेच्छ और यहां तक कि पशु भी बन सकता है।

विराट पुरुष के अंगों से जहां वर्णों की उत्पत्ति का वर्णन है, वहां भी अजायत शब्द है, यानि जन्म लिया। ये नहीं कहा कि सभी मनुष्यों को उत्पन्न किया और उसमें जिसने अमुक कर्म को अपनाया उसे ये कहा गया।

और कर्म तो शाश्वत नहीं हैं। मैं यदि साधना कर रहा हूँ, तो मैं अभी ब्राह्मण हूँ। किसी म्लेच्छ का संहार करने समय मैं तो क्षत्रिय बन जाऊँगा, और कृषि करते समय वैश्य और समाज सेवा करते समय शूद्र बन जाऊँगा.. एक ही दिन में मैं कई बार सभी जातियों में घूम जाऊँगा . तो बताईये कि मेरी जाति क्या है ? मैं किस वर्ण की कन्या से विवाह करूंगा ? मैं क्या कहलाऊंगा ?

मनुष्य और कुत्ता दोनों रोटी खाएं तो क्या कुत्ते को मनुष्य और मनुष्य को कुत्ता कहा जा सकता है ? यदि मछली और बतख दोनों जल में तैरें, तो मछली को बतख और बतख को मछली कहा जा सकता है ? पिछले जन्म के कर्म इस जीवन की जाति तय करते हैं…. इस जीवन के कर्म जाति तय नहीं करते। वे अगले जन्म की जाति या योनि तय करते हैं | अतएव जन्मना जाति वर्ण ही वास्तविक है।
जय महादेव जय श्री राम

सोमवार, 24 फ़रवरी 2025

शिव आराधना केवल

शास्त्रों के अनुसार, शिवलिंग शक्ति का प्रतीक है और केवल विवाहित पति पत्नी या कोई पुरुष ही शिवलिंग छू सकता है. इसलिए अगर आप शिवलिंग की पूजा करने जा रहा हैं तो ध्यान रहे कि केवल पुरुष को ही शिवलिंग को स्पर्ष करना है।शिवलिंग शक्ति का प्रतीक है और केवल विवाहित पति पत्नी या कोई पुरुष ही शिवलिंग छू सकता है. इसलिए अगर आप शिवलिंग की पूजा करने जा रहा हैं तो ध्यान रहे कि केवल पुरुष को ही शिवलिंग को स्पर्ष करना है.
परन्तु पूजा के दौरान ज्यादातर महिलाएं ही शिवलिंग को अज्ञानता वश स्पर्श करती देखी जाती हैं.

मान्यता है कि अविवाहित महिलाओं के अलावा विवाहित महिलाओं का शिवलिंग को छूना माता पार्वती को नाराज कर सकता है, जिससे पूजा का विपरित फल मिल सकता है. इसलिए कहा गया है कि महिलाओं को शिव की मूर्ति के रूप में ही पूजा करनी चाहिए.
प्राचीन शास्त्रों के अनुसार इस ब्रह्मांड की उत्पत्ति शिवलिंग से हुई है। कहा जाता है कि जब इस संसार में कुछ भी नहीं था, तब एक विशाल शिवलिंग प्रकट हुआ, जिसने पूरे ब्रह्मांड को प्रकाश और ऊर्जा से भर दिया। उसके बाद ही संपूर्ण आकाश, तारे और ग्रहों का निर्माण हुआ।धार्मिक शास्त्रों के अनुसार शिवलिंग की सबसे पहले पूजा ब्रह्मा देव और विष्णु जी ने की थी और सबसे पहला व्रत माता आदिशक्ति दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती ने रखा था। वैसे तो इस संसार का हर प्राणी शिव की पूजा करता है, क्योंकि शिव जी हर प्राणी के रक्षक हैं। इसीलिए उन्हें पशुपतिनाथ भी कहा जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि अविवाहित महिलाएं शिवलिंग की पूजा नहीं कर सकती हैं? शास्त्रों और पुराणों में शिवलिंग की पूजा से जुड़े कई नियम बताए गए हैं। ज्योतिषाचार्य चिराग दारूवाला से जानिए शिवलिंग पूजा के महत्व के बारे में।हिंदू धर्म में शिवलिंग की पूजा को विशेष महत्व दिया गया है। मान्यता है कि शिवलिंग की पूजा करने से भक्त की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और मनचाहा फल प्राप्त होता है। मान्यता है कि अविवाहित महिलाओं के अलावा विवाहित महिलाओं द्वारा शिवलिंग को छूने से माता पार्वती नाराज हो सकती हैं, जिसके कारण पूजा का विपरीत परिणाम हो सकता है। इसलिए कहा जाता है कि महिलाओं को शिव की मूर्ति के रूप में ही पूजा करनी चाहिए।
महिलाओं को शिवलिंग की पूजा करते समय कुछ गलतियां नहीं करनी चाहिए, अन्यथा पूजा सफल नहीं मानी जाती है और व्यक्ति को दुष्परिणाम भुगतना पड़ सकता है। अविवाहित महिलाओं को इसे छूने की मनाही है। ऐसा कहा जाता है कि भगवान शिव सबसे पवित्र हैं और हमेशा ध्यान में लीन रहते हैं। भगवान शंकर के ध्यान के दौरान इस बात का ध्यान रखा जाता था कि कोई देवी या अप्सरा भगवान के ध्यान में विघ्न न डालें। इसलिए कुंवारी लड़कियों को शिवलिंग को छूने से मना किया जाता है। भगवान शिव की तपस्या में विघ्न डालना अनुचित माना जाता है, इसलिए शास्त्रों में अविवाहित महिलाओं को शिवलिंग को छूने से मना किया गया है।

शास्त्रों के अनुसार, शिवलिंग शक्ति का प्रतीक है और केवल शादीशुदा पति-पत्नी या पुरुष ही शिवलिंग को छू सकता है। इसलिए अगर आप शिवलिंग की पूजा करने जा रहे हैं तो ध्यान रखें कि केवल पुरुष को ही शिवलिंग को छूना है। पवित्र शिवलिंग को सीधे छूना वर्जित है। अगर कोई महिला तिलक लगाने के लिए शिवलिंग को छूना चाहती है तो शिव की मूर्ति को छू सकती है।
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देवों के देव महादेव शिव की आराधना से हर भक्त की मनोकामना पूरी होती है.अपने भगतों पर प्रसन्न रहने वाले शिव पुजारी पर उतने प्रसन्न नहीं होते जितने अपने भगत पर होते है।पुजारी को तो मात्र कर्म फल की प्राप्ति होती है जब कि भगत को शिव अपना स्वरूप भी प्राप्त करवा देते हैं
शिवलिंग की पूजा करते समय महिलाओं को कुछ गलतियां नहीं करनी चाहिए वरना पूजा सफल नहीं मानी जाती और इसके विपरित परिणाम भी मनुष्य को भुगतने पड़ सकते हैं. शास्त्रों के अनुसार, शिवलिंग शक्ति का प्रतीक है और केवल विवाहित पति पत्नी या कोई पुरुष ही शिवलिंग छू सकता है. इसलिए अगर आप शिवलिंग की पूजा करने जा रहा हैं तो ध्यान रहे कि केवल पुरुष को ही शिवलिंग को स्पर्ष करना है.
अविवाहित महिलाओं को शिव लिंग छूने की मनाही होती है.
कहा जाता है कि भगवान शिव सबसे पवित्र और हर समय तपस्या में लीन रहने वाले हैं. भगवान शंकर के ध्यान के समय इस बात की सावधानी रखी जाती थी कि कोई भी देवी या अप्सरा भगवान के ध्यान में विघ्न न डालें. इसलिए कुंवारी कन्याओं को शिवलिंग छूने के लिए मना किया जाता है.

यह मान्यता है कि शिवलिंग के साथ अनजाने में की गई गलती आपके लिए शुभ और अशुभ भी हो सकती  जिस कारण अविवाहित महिलाओं का शिवलिंग को स्पर्श करना मना होता है. शिव जी तपस्या को भंग करना अनुचित माना गया है इसलिए शास्त्रों में अविवाहित महिलाओं को शिवलिंग को स्पर्श करना वर्जित है.
धार्मिक मान्यता के अनुसार कहा गया है कि कुंवारी लड़कियां शिव जी की पूजा माता पार्वती के साथ कर सकती हैं.जो मूर्ति में ही संभव होती है शिव लिंग में नहीं।

इसलिए कहा गया है कि महिलाओं को शिव की मूर्ति के रूप में ही पूजा करनी चाहिए.

लिंगाष्टकम शिव की पूजा के दौरान गाया जाने वाला एक लोकप्रिय 8-सर्ग का भजन है। इसके बोल इस प्रकार हैं ,


ब्रह्मा मुरारि सुरार्चिता लिंगम्


निर्मला भाशिता शोभिता लिंगम


जन्मजा दुःख विनाशक लिंगम्


तत् प्राणमामि सदा शिव लिंगम्


अर्थ: मैं उस सदा शिवलिंग को नमन करता हूँ, जिसकी ब्रह्मा, विष्णु तथा अन्य देवता पूजा करते हैं, जिसकी स्तुति शुद्ध और पवित्र वाणी द्वारा की जाती है तथा जो जन्म-मरण के चक्र को नष्ट कर देता है।


देवमुनि प्रवरार्चिता लिंगम्


कामदहम करुणाकर लिंगम


रावण दर्प विनाशक लिंगम्


तत् प्राणमामि सदा शिव लिंगम्


अर्थ: मैं उस सदा शिव लिंग को नमन करता हूँ, जो इच्छाओं का नाश करने वाला है, जिसकी देवता और ऋषि पूजा करते हैं, जो असीम दयालु है और जिसने रावण के गर्व को दबा दिया था।


सर्व सुगंध सुलेपिथा लिंगम


बुद्धि विवर्धन कारण लिंगम्


सिद्ध सुरासुर वंदिता लिंगम


तत् प्राणमामि सदा शिव लिंगम्


अर्थ: मैं उस सदा शिव लिंग को नमन करता हूँ, जो विविध प्रकार के सुगंधों और सुगंधों से भरपूर है, जो विचार की शक्ति को बढ़ाता है और विवेक की ज्योति को प्रज्वलित करता है, और जिसके आगे सिद्ध, सुर और असुर सभी नतमस्तक होते हैं।


कनक महामणि भूषित लिंगम्


फणीपति वेष्टिथा शोभिता लिंगम्


दक्ष सु यज्ञ विनाशक लिंगम्


तत् प्राणमामि सदा शिव लिंगम्


अर्थ: मैं उस सदा शिवलिंग को प्रणाम करता हूँ, जो दक्ष के यज्ञ का विध्वंस करने वाला है, जो नाना प्रकार के आभूषणों से सुशोभित है, नाना प्रकार के रत्नों और माणिकों से जड़ा हुआ है तथा जिसके चारों ओर सर्पों की माला लिपटी हुई है।


कुमकुमा चंदना लेपिथा लिंगम


पंकजा हारा सुशोभित लिंगम्


संचित पाप विनाशक लिंगम्


तत् प्राणमामि सदा शिव लिंगम्


अर्थ: मैं उस सदा शिव लिंग को नमन करता हूँ, जो केसर और चंदन से लिपटा हुआ है, जो कमल की माला से सुशोभित है और जो सभी संचित पापों को मिटा देता है।


देवागनार्चित सेविथा लिंगम्


भावैर् भक्तिभिरेवच लिंगम्


दिनकर कोटि प्रभाकर लिंगम


तत् प्राणमामि सदा शिव लिंगम्


अर्थ: मैं उस सदा शिव लिंग को नमन करता हूँ, जिसकी पूजा बहुत से देवतागण सच्ची श्रद्धा और भक्ति से करते हैं तथा जिसकी शोभा करोड़ों सूर्यों के समान है।


अष्ट दलोपरी वेष्टिथा लिंगम्


सर्व समुद्भव कारण लिंगम्


अष्ट दरिद्र विनाशक लिंगम्


तत् प्राणमामि सदा शिव लिंगम्


अर्थ: मैं उस सदा शिव लिंग को नमन करता हूँ, जो आठ पहलुओं सहित सभी दरिद्रता और दुख का नाश करने वाला है, जो समस्त सृष्टि का कारण है और जो आठ पंखुड़ियों वाले कमल पर स्थित है।


सुरगुरु सुरवर पूजिता लिंगम


सुरवण पुष्प सदार्चित लिंगम्


परात्परं परमात्माका लिंगम्


तत् प्राणमामि सदा शिव लिंगम्


अर्थ: मैं उस सदा शिव लिंग को नमन करता हूँ, जो दिव्य सत्ता और परमसत्ता है, जिसकी पूजा सभी सुर और उनके गुरु (बृहस्पति) दिव्य उद्यानों से असंख्य पुष्पों से करते हैं।


बुधवार, 19 फ़रवरी 2025

जागो विवाह रिवाज


जागो या जग्गो समारोह का क्या मतलब है? 
इसका मतलब है "जागना"। यह दुल्हन और दूल्हे दोनों के मातृ परिवारों द्वारा शुरू किया गया उत्सव है। परिवार बहुत धूमधाम से शादी स्थल पर पहुंचते हैं।
जागो का अर्थ है जगाना
जग्गो या जागो समारोह जग्गो पंजाबी में जागो शब्द का अर्थ है 'जागना' और यह दोनों परिवारों द्वारा एक साथ मिलकर जश्न मनाने की रात होती है। यह आमतौर पर शादी समारोह से एक या दो दिन पहले आयोजित किया जाता है।जग्गो या जागो पंजाबी परिवारों का एक उत्सव है जिस को पंजाबी परिवार शादी के समय मनाकर नजदीक रहने वालो को जगाते है या पुनः रिमाइंडर देते है कि याद रहे शादी में संलित होने को आ जाना शादी समारोह की जिन मित्र संबंधियों को निमंत्रित करना भूल गए होते है उनको भी इस प्रकार से निमंत्रण दे देते है इसी को जागो कहा गया है।
पहले समय में इस जग्गो या जागो वैवाहिक उत्सव का आरंभ जागो संध्या के दौरान, दूल्हा और दुल्हन (अपने परिवारों के साथ) अपने अलग-अलग घरों में इकट्ठा होते हैं और पूरी रात या कम से कम सुबह तक जागते थे। 

आधुनिक युग में भले ही मानव को हर किस्म की सुविधाएं उपलब्ध हो गई हों लेकिन आधुनिकता के बढ़ रहे प्रभाव ने पंजाब के अमीर विरसे जग्गो या जागो को एक बड़ी चुनौती दे डाली है। पंजाब की संस्कृति में भंगड़े, गिद्दे और गीत-संगीत को भले ही जैसे तैसे किसी भी रूप में फिलहाल संभाला हुआ हो, लेकिन वास्तव में बदलता माहौल पंजाबी संस्कृति के लिए घातक ही साबित होता दिखाई दे रहा है।

ऐसे ही प्रभाव से पीड़ित दिखाई दे रही है जागो की वो रस्म। इसके जरिए लोगों को जगाने का प्रयास होता था। किसी समय विवाह शादी के अवसर पर जागो का विशेष स्थान होता था। आज स्थिति यह है कि जागो के नाम से भी युवा पीढ़ी अंजान दिखाई दे रही है।

कोई समय होता था जब जागो को पंजाब में होने वाली शादियों के दौरान प्रेम-प्यार के इजहार का साधन माना जाता था। विवाह के अवसर पर आने वाली नानका मेल द्वारा निकाली गई जागो का एक अलग ही नजारा होता था। मामी व मौसियों द्वारा सिर पर टिकाई टोकनी (मटके जैसा बर्तन) पर दीप जलाकर मोहल्ले का चक्कर जगाना होता था।
जागो निकालते समय लोगों के साथ छोटे छोटे मजाक करना जागो के दृश्य को अति आनंदमय बना देते थे। जागो निकालते समय यदि किसी का कुछ नुकसान हो हो जाए तो वह उसकी शिकायत किसी से नहीं करता था।

अब जागो भूलती जा रही युवा पीढ़ी।

जागो निकालते समय जट्टा जाग बई हुन जागो आइआ, बल्ले बई हुन जागो आइआ, चुप कर बीबी मसां सवाइआ- लोरी दे दे पाइआ, बई हुन जागो आइआ और एहना नानकियां दी रड़े भंवीरी बोले आदि गीतों से जो माहौल बनता था उसकी मिसाल देना भी मुश्किल है। आजकल अगर कॉलेजों व स्कूलों में जागो के दर्शन भी करवाए जाते है तो सिर्फ खानपूर्ति के लिए। जबकि सच्चाई यह है कि हमारी युवा पीढ़ी को जागो की वास्तविकता तक की जानकारी नहीं है।

आज तो आर्केस्ट्रा ने किया जागो का प्रभाव धीमा

और धीरे-धीरे हमारे पर आरकेस्ट्रा के बढ़ रहे प्रभाव ने जागो के रूझान को धीमा कर दिया है। भले ही कुछ घर परिवारों में आज जागो को जिंदा रखने के लिए थोड़ा प्रयास हो रहा है लेकिन आधुनिकता की होड़ ने लोगों को जगाने वाली जागो को हमसे फिलहाल छीन ही लिया है।

आने वाले भविष्य में इस जागो को लुप्त होती विरासत के रूप में जाना जाएगा

आइये बात करते हैं जागो या जागो समारोह की जिसमें ननिहाल वाले परिवार बहुत धूमधाम से शादी स्थल पर पहुंचते हैं। वे गाते और नाचते भी हैं। महिला रिश्तेदार बारी-बारी से गागर (मोमबत्तियों से जलाया गया एक सजाया हुआ मिट्टी का बर्तन मिट्टी को सनातन परंपरा में शुद्ध गिना गया है और इसका पूजा में महत्व भी है बदलते समय के अनुसार मिट्टी की गागर का स्वरूप अब हल्का और धातु का हो गया है मोमबत्ती और दीपक की जगह आधुनिक चाइनीज लड़ियों ने ले ली है जिनको) लेकर महिला रिश्तेदार नाचती और गाती हैं। मिट्टी के बर्तन के साथ, लोग घंटियों से सजी एक सजी हुई छड़ी के साथ नृत्य करते हैं।

वैसे यह उत्सव ननिहाल पक्ष की ओर से आयोजित होता है।जिसे ननिहाल पक्ष विवाह वाले स्थल पर आकर आयोजित करवाता है।
क्यों कि  आपस में रहते रहते लोगों के आपसी मन मुटाव भी उत्पन हो गए होते है विवाह उत्सव पर उनको दूर कर एक करने की इस प्रक्रिया को ननिहाल पक्ष तीसरे पक्ष की भूमिका में उनके स्थान पर जागो के रूप में मनवाता है कि इनका सौहाद्र प्यार पुनः बना रहे और एक दूसरे के सुख दुख में शामिल होते रहें।इस उद्देश से जागो की रस्म ननिहाल पक्ष लेकर एकता करवाने की रस्म करता है।

पंजाबी विवाह जागो:
 एक परिवारिक पारंपरिक और रंगीन अनुष्ठान है

पंजाबी संस्कृति में विवाह एक महत्वपूर्ण और रंगीन अनुष्ठान है, जिसमें कई पारंपरिक रीति-रिवाज और रस्में शामिल हैं। इनमें से एक महत्वपूर्ण अनुष्ठान है जागो, जो विवाह के एक दिन पहले आयोजित किया जाता है और इसके आयोजक ननिहाल पक्ष के लोग भी प्रमुख होते है। इस लेख में, हम पंजाबी विवाह जागो के बारे में विस्तार से कहने का प्रयास कर रहे है।

जागो का अर्थ और महत्व

जागो का अर्थ है "जागरण" या "जगाना"। यह अनुष्ठान विवाह के एक दिन पहले आयोजित किया जाता है, जिसमें दूल्हे या दुल्हन और  उसके ननिहाल के परिवार के सदस्य और मित्र भाग लेते हैं। जागो का मुख्य उद्देश्य विवाह के लिए दूल्हे और दुल्हन को तैयार करना और उन्हें विवाह के लिए आशीर्वाद देना और पारिवारिक समाजिक एकता बनाए रखना होता है।

जागो की तैयारी

जागो की तैयारी में कई दिन लगते हैं। दूल्हे और दुल्हन के परिवार के सदस्य और मित्र इस अनुष्ठान के लिए विशेष रूप से तैयारी करते हैं। इसमें विशेष भोजन, पेय, और मिठाइयों की व्यवस्था की जाती है। साथ ही, जागो के लिए विशेष रूप से सजावट की जाती है, जिसमें रंगीन पताके, फूल, और अन्य सजावटी सामग्री का उपयोग किया जाता है।

जागो का अनुष्ठान

जागो का अनुष्ठान रात में आयोजित किया जाता है, जब दूल्हे और दुल्हन के परिवार के सदस्य और मित्र अपनी अपनी जगह पर एकत्रित होते हैं। इस अनुष्ठान में, दूल्हे और दुल्हन को उनके परिवार द्वारा विशेष रूप से सजाया जाता है, जिसमें उन्हें नए कपड़े, आभूषण, और अन्य सजावटी सामग्री पहनाई जाती है।

इसके बाद, दूल्हे और दुल्हन को विशेष रूप से उनके स्थानों पर आशीर्वाद दिया जाता है, जिसमें उन्हें विवाह के लिए शुभकामनाएं दी जाती हैं। साथ ही, इस अनुष्ठान में, विशेष रूप से गीत, नृत्य, और अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

जागो का महत्व

जागो का महत्व पंजाबी संस्कृति में बहुत अधिक है। यह अनुष्ठान विवाह के लिए दूल्हे और दुल्हन को तैयार करने और उन्हें आशीर्वाद देने के लिए आयोजित किया जाता है। साथ ही, यह अनुष्ठान पंजाबी संस्कृति की रंगीनता और जीवंतता को प्रदर्शित करता है।

निष्कर्ष

पंजाबी विवाह जागो एक महत्वपूर्ण और रंगीन अनुष्ठान है, जो विवाह के लिए दूल्हे और दुल्हन को तैयार करने के साथ साथ पारिवारिक ,सामाजिक मन मुटाव को मिटा कर दूल्हे दुल्हन को  आशीर्वाद देने के लिए दूल्हे या दुल्हन पक्ष द्वारा दूल्हे दुल्हन के स्थान पर आयोजित किया जाता है। यह अनुष्ठान पंजाबी संस्कृति की रंगीनता और जीवंतता को प्रदर्शित करता है और विवाह के लिए एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

सोमवार, 17 फ़रवरी 2025

विवाह बंधन के नियम

विवाह बंधन के नियम
नियम केवल मनुष्य जाती के लिए होते है।जानवरों के लिए कोई नियम नहीं होता।अतः मनुष्य जानवर ना बनते हुए नियमों का पालन जरूर कर मनुष्य ही बने रहे।

वर-वधू की प्रतिज्ञाएँ

किसी भी महत्त्वपूर्ण पद ग्रहण के साथ शपथ ग्रहण समारोह भी अनिवार्य रूप से जुड़ा रहता है। कन्यादान, पाणिग्रहण एवं ग्रन्थि-बन्धन हो जाने के साथ वर-वधू द्वारा और समाज द्वारा दाम्पत्य सूत्र में बँधने की स्वीकारोक्ति हो जाती है। इसके बाद अग्नि एवं देव-शक्तियों की साक्षी में दोनों को एक संयुक्त इकाई के रूप में ढालने का क्रम चलता है। इस बीच उन्हें अपने कर्त्तव्य धर्म का महत्त्व भली प्रकार समझना और उसके पालन का संकल्प लेना चाहिए। इस दिशा में पहली जिम्मेदारी वर की होती है। अस्तु, पहले वर तथा बाद में वधू को प्रतिज्ञाएँ कराई जाती हैं।

क्रिया और भावना-
वर-वधू स्वयं प्रतिज्ञाएँ पढ़ें, यदि सम्भव  हो, तो आचार्य एक-एक करके प्रतिज्ञाएँ व्याख्या सहित जरूर समझाएँ। क्यों कि इसी के अभाव में गृहस्थ जीवन नर्क भी बन जाता है।mudar sk द्वारा संकलित

वर की प्रतिज्ञाएँ
धमर्पत्नीं मिलित्वैव, ह्येकं जीवनामावयोः। अद्यारम्भ यतो में त्वम्, अर्द्धांगिनीति घोषिता 

आज से धमर्पत्नी को अर्द्धांगिनी घोषित करते हुए, उसके साथ अपने व्यक्तित्व को मिलाकर एक नये जीवन की सृष्टि करता हूँ। अपने शरीर के अंगों की तरह धमर्पतनी का ध्यान रखूँगा।

स्वीकरोमि सुखेन त्वां, गृहलक्ष्मीमहन्ततः। मन्त्रयित्वा विधास्यामि, सुकायार्णि त्वया सह 
प्रसन्नतापूर्वक गृहलक्ष्मी का महान अधिकार सौंपता हूँ और जीवन के निर्धारण में उनके परामर्श को महत्त्व दूँगा।

रूप-स्वास्थ्य-स्वभावान्तु, गुणदोषादीन् सवर्तः। रोगाज्ञान-विकारांश्च, तव विस्मृत्य चेतसः

 रूप, स्वास्थ्य, स्वभावगत गुण दोष एवं अज्ञानजनित विकारों को चित्त में नहीं रखूँगा, उनके कारण असन्तोष व्यक्त नहीं करूँगा। स्नेहपूर्वक सुधारने या सहन करते हुए आत्मीयता बनाये रखूँगा।

सहचरो भविष्यामि, पूणर्स्नेहः प्रदास्यते। सत्यता मम निष्ठा च, यस्याधारं भविष्यति

पत्नी का मित्र बनकर रहूँगा और पूरा-पूरा स्नेह देता रहूँगा। इस वचन का पालन पूरी निष्ठा और सत्य के आधार पर करूँगा।

यथा पवित्रचित्तेन, पातिव्रत्य त्वया धृतम्। तथैव पालयिष्यामि, पतनीव्रतमहं ध्रुवम्

पत्नी के लिए जिस प्रकार पतिव्रत की मर्यादा कही गयी है, उसी दृढ़ता से स्वयं पत्नीव्रत धर्म का पालन करूँगा। चिन्तन और आचरण दोनों से ही पर नारी से वासनात्मक सम्बन्ध नहीं जोडूँगा।

गृहस्याथर्व्यवस्थायां, मन्त्रयित्वा त्वया सह। संचालनं करिष्यामि, गृहस्थोचित-जीवनम्

गृह व्यवस्था में धर्म-पत्नी को प्रधानता दूँगा। आमदनी और खर्च का क्रम उसकी सहमति से करने की गृहस्थोचित जीवनचर्या अपनाऊँगा।

समृद्धि-सुख-शान्तीनां, रक्षणाय तथा तव। व्यवस्थां वै करिष्यामि, स्वशक्तिवैभवादिभि

धमर्पत्नी की सुख-शान्ति तथा प्रगति-सुरक्षा की व्यवस्था करने में अपनी शक्ति और साधन आदि को पूरी ईमानदारी से लगाता रहूँगा।

यतनशीलो भविष्यामि, सन्मागर्ंसेवितुं सदा। आवयोः मतभेदांश्च, दोषान्संशोध्य शान्तितः

अपनी ओर से मधुर भाषण और श्रेष्ठ व्यवहार बनाये रखने का पूरा-पूरा प्रयत्न करूँगा। मतभेदों और भूलों का सुधार शान्ति के साथ करूँगा। किसी के सामने पत्नी को लांछित-तिरस्कृत नहीं करूँगा।

भवत्यामसमथार्यां, विमुखायांच कमर्णि। विश्वासं सहयोगंच, मम प्राप्स्यसि त्वं सदा

 पत्नी के असमर्थ या अपने कर्त्तव्य से विमुख हो जाने पर भी अपने सहयोग और कर्त्तव्य पालन में रत्ती भर भी कमी न रखूँगा।
मुडार sk द्वारा संकलित

कन्या की प्रतिज्ञाएँ
स्वजीवनं मेलयित्वा, भवतः खलु जीवने। भूत्वा चाधार्ंगिनी नित्यं, निवत्स्यामि गृहे सदा

अपने जीवन को पति के साथ संयुक्त करके नये जीवन की सृष्टि करूँगी। इस प्रकार घर में हमेशा सच्चे अर्थों में अर्द्धांगिनी बनकर रहूँगी।

‍शिष्टतापूवर्कं सवैर्ः, परिवारजनैः सह। औदायेर्ण विधास्यामि, व्यवहारं च कोमलम्

पति के परिवार के परिजनों को एक ही शरीर के अंग मानकर सभी के साथ शिष्टता बरतूँगी, उदारतापूर्वक सेवा करूँगी, मधुर व्यवहार करूँगी।

त्यक्त्वालस्यं करिष्यामि, गृहकायेर् परिश्रमम्। भतुर्हर्षर्ं हि ज्ञास्यामि, स्वीयामेव प्रसन्नताम्

आलस्य को छोड़कर परिश्रमपूर्वक गृह कार्य करूँगी। इस प्रकार पति की प्रगति और जीवन विकास में समुचित योगदान करूँगी।

श्रद्धया पालयिष्यामि, धमर्ं पातिव्रतं परम्। सवर्दैवानुकूल्येन, पत्युरादेशपालिका

पतिव्रत धर्म का पालन करूँगी, पति के प्रति श्रद्धा-भाव बनाये रखकर सदैव उनके अनुकूल रहूँगी। कपट-दुराव न करूँगी, निर्देशों के अविलम्ब पालन का अभ्यास करूँगी।

सुश्रूषणपरा स्वच्छा, मधुर-प्रियभाषिणी। प्रतिजाने भविष्यामि, सततं सुखदायिनी

सेवा, स्वच्छता तथा प्रियभाषण का अभ्यास बनाये रखूँगी। ईर्ष्या, कुढ़न आदि दोषों से बचूँगी और सदा प्रसन्नता देने वाली बनकर रहूँगी।

‍मितव्ययेन गाहर्स्थ्य-संचालने हि नित्यदा। प्रयतिष्ये च सोत्साहं, तवाहमनुगामिननि

मितव्ययी बनकर फिजूलखर्ची से बचूँगी। पति के असमर्थ हो जाने पर भी गृहस्थ के अनुशासन का पालन करूँगी।

‍देवस्वरूपो नारीणां, भत्तार् भवति मानवः। मत्वेति त्वां भजिष्यामि, नियता जीवनावधिम्

नारी के लिए पति, देव स्वरूप होता है- यह मानकर मतभेद भुलाकर, सेवा करते हुए जीवन भर सक्रिय रहूँगी, कभी भी पति का अपमान न करूँगी।

पूज्यास्तव पितरो ये, श्रद्धया परमा हि मे। सेवया तोषयिष्यामि, तान्सदा विनयेन च

जो पति के पूज्य और श्रद्धा पात्र हैं, उन्हें सेवा द्वारा और विनय द्वारा सदैव सन्तुष्ट रखूँगी।

विकासाय सुसंस्कारैः, सूत्रैः सद्भाववद्धिर्भिः। परिवारसदस्यानां, कौशलं विकसाम्यहम्

परिवार के सदस्यों में सुसंस्कारों के विकास तथा उन्हें सद्भावना के सूत्रों में बाँधे रहने का कौशल अपने अन्दर विकसित करूँगी।
मुड़ार sk द्वारा आवश्यक निर्णायक संकलन अब

प्रायश्चित होम ध्यान देने योग्य

विवाह पूर्व जाने अनजाने होने वाली गलतियों से मुक्ति हेतु आवश्यक क्यों कि मनुष्य ही गलती का पुतला जो है 

गायत्री मन्त्र की आहुति के पश्चात् पाँच आहुतियाँ प्रायश्चित होम की अतिरिक्त रूप से दी जाती है। वर और कन्या दोनों के हाथ में हवन सामग्री दी जाती है। प्रायश्चित होम की आहुतियाँ देते समय यह भावना दोनों के मन में आनी चाहिए कि दाम्पत्य जीवन में बाधक जो भी कुसंस्कार अब तक मन में रहे हों, उन सब को स्वाहा किया जा रहा है। किसी से गृहस्थ के आदर्शों के उल्लंघन करने की कोई भूल हुई हो, तो उसे अब एक स्वप्न जैसी बात समझकर विस्मरण कर दिया जाए। इस प्रकार की भूल के कारण कोई किसी को न तो दोष दे, न सन्देह की दृष्टि से देखे। इसी प्रकार कोई अन्य नशेबाजी जैसा दुर्व्यसन रहा हो या स्वभाव में कठोरता, स्वार्थपरता, अहंकार जैसी कोई त्रुटि रही हो, तो उसका त्याग कर दिया जाए। साथ ही, उन भूलों का प्रायश्चित करते हुए भविष्य में कोई ऐसी भूल न करने का संकल्प भी करना है, जो दाम्पत्य जीवन की प्रगति में बाधा उत्पन्न करे।

क्रिया और भावना

वर-वधू हवन सामग्री से आहुति करें। भावना करें कि प्रायश्चित आहुति के साथ पूर्व दुष्कृत्यों की धुलाई हो रही है। स्वाहा के साथ आहुति डालें, इदं न मम के साथ हाथ जोड़कर नमस्कार करें।

अब विवाह कितने प्रकार का होता है यह भी जरूर जानलें।

1. ब्रह्म विवाह
दोनों पक्ष की सहमति से समान वर्ग के सुयोज्ञ वर से कन्या का विवाह निश्चित कर देना 'ब्रह्म विवाह' कहलाता है। सामान्यतः इस विवाह के बाद कन्या को आभूषणयुक्त करके विदा किया जाता है। आज का "व्यवस्था विवाह" 'ब्रह्म विवाह' का ही रूप है।

2. दैव विवाह
किसी सेवा कार्य (विशेषतः धार्मिक अनुष्ठान) के मूल्य के रूप अपनी कन्या को दान में दे देना 'दैव विवाह' कहलाता है।

3. आर्य विवाह
कन्या-पक्ष वालों को कन्या का मूल्य दे कर (सामान्यतः गोदान करके) कन्या से विवाह कर लेना 'आर्य विवाह' कहलाता है।

4. प्रजापत्य विवाह
कन्या की सहमति के बिना उसका विवाह अभिजात्य वर्ग के वर से कर देना 'प्रजापत्य विवाह' कहलाता है।

5. गंधर्व विवाह
इच्छायाऽन्योऽन्य संयोग: कन्यायाश्च वरस्य च ।

गान्धर्वस्य तु विज्ञेयो मैथुन्य: कामसम्भव: ।।

परिवार वालों की सहमति के बिना वर और कन्या काम वासना से प्रेरित होकर स्वेच्छा से मैथुन आदि कर के विवाह कर लेना 'गंधर्व विवाह' कहलाता है। दुष्यंत ने शकुन्तला से 'गंधर्व विवाह' किया था। उनके पुत्र भरत के नाम से ही हमारे देश का नाम "भारतवर्ष" बना।

6. असुर विवाह
कन्या को खरीद कर (आर्थिक रूप से) विवाह कर लेना 'असुर विवाह' कहलाता है।

7. राक्षस विवाह
कन्या की सहमति के बिना उसका अपहरण करके जबरदस्ती विवाह कर लेना 'राक्षस विवाह' कहलाता है।

8. पैशाच विवाह
कन्या की मदहोशी (गहन निद्रा, मानसिक दुर्बलता आदि) का लाभ उठा कर उससे शारीरिक सम्बंध बना लेना और उससे विवाह करना 'पैशाच विवाह' कहलाता है।

विवाह बंधन


आइए जानते है आखिर हिंदू विवाह संस्कार के बारे में भाग एक।
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विवाह, जिसे शादी भी कहा जाता है, दो लोगों के बीच एक सामाजिक या धार्मिक मान्यता प्राप्त मिलन है जो उन लोगों के बीच, साथ ही उनके और किसी भी परिणामी जैविक या दत्तक बच्चों तथा समधियों के बीच अधिकारों और दायित्वों को स्थापित करता है।

एक विवाह के समारोह को विवाह उत्सव (वेडिंग) कहते है।

विवाह मानव-समाज की अत्यंत महत्वपूर्ण प्रथा या समाजशास्त्रीय संस्था है। यह समाज का निर्माण करने वाली सबसे छोटी इकाई- परिवार-का मूल है। यह मानव प्रजाति के सातत्य को बनाए रखने का प्रधान जीवशास्त्री माध्यम भी है। और मर्दाना शहादत आदमी का और बलिदान भगवान सेंट जॉर्ज के अनुसार पैदा होना लिंग आदमी और औरत होगा। लिंग पुरुष और महिला और एक अवधारणा सार्वभौमिक दिव्य शाश्वत रसायन शास्त्र गूढ़ धनुर्विद्या धनुर्विद्या आदिम अमर पीढ़ियों से अनंत और विवाह से परे के लिए उत्पन्न किया जा सकता है जीवन का चक्र। विवाहांचे प्रकार अनुरूप विवाह अनुलोम विवाह : तथाकथित उच्च वर्ण का पुरुष और तथाकथित निम्न वर्ण की स्त्री का विवाह आंतरजातीय विवाह आंतरधर्मीय विवाह आर्ष विवाह आसुर विवाह एकपत्‍नीत्व) Monogamy कुंडली मिलाकर विवाह कोर्ट मॅरेज (सिव्हिल मॅरेज) (रजिस्टर्ड लग्न) गर्भावस्था में लग्न गांधर्व विवाह जरठ-कुमारी विवाह जरठ विवाह दैव विवाह (देव से लग्न) निकाह पाट पारंपरिक पद्धती का लग्न इसीको पुरानी पद्धती का लग्न कहते हैं। पालने में लग्न पिशाच्च विवाह पुनर्विवाह प्रतिलोम विवाह : तथाकथित निम्नजातीय वर्ण का पुरुष और तथाकथि उच्च वर्ण की स्त्री का विवाह. प्रजापत्य विवाह प्रेमविवाह बहुपत्‍नीत्व (Polygamy) बालविवाह ब्राह्म विवाह मांगलिक विवाह म्होतूर राक्षस विवाह विजोड विवाह विधवा विवाह वैदिक लग्न वैधानिक विवाह (कायदे अनुसार लग्न) सगोत्र सजातीय विवाह

विवाह और विवाह के शास्त्रीय उदाहरण

1. ब्रह्म विवाह ब्रह्म को जानने वाले व्यक्ति द्वारा ब्रह्म को प्राप्त व्यक्ति वर लिए ब्रह्म वादी हर तत्व में ब्रह्म ईश्वर देखता है । उसे अपनी कन्या लिए या उस कन्या द्वारा वर चुनने में दिक्कत होती है इसलिए इसमें वर योग्यता लिए स्वयमवकर में एक शर्त रख दी जाती है जो उसे पूर्ण करेगा वो विवाह करेगा । जैसे राजा जनक द्वारा सीता लिए योग्य वर हेतु विश्व समक्ष शिव धनुष पर प्रत्ययनजा चढाने की शर्त जो पूर्ण करे वो इसीका है वही इस लिए ईश्वर ब्रह्म है । अन्य उदाहरण द्रोपदी और अर्जुन का विवाह जिसमे मछली की आँख को तीर मार कर विवाह ।

2. दैव विवाह इसमे कन्या ही अपने योग्य वर को पसंद करती है संसार मे जो भी विवाह करना चाहे वो सामने आए यदि कन्या उसे अपने योग्य पाती है तो उसे वर माला गले मे डाल कर जगत से चुन लेती है । उदाहरण : विश्व मोहिनी और नारायण का विवाह, लक्मी और विष्णु का विवाह , शिव सती का विवाह फिर शिव पार्वती का विवाह । सावित्री का जंगल मे सत्यवान को चुन लेना फिर सावित्री और सत्यवान का विवाह ।

3. रमैनी (विवाह) यह विवाह असुर‌ निकंदन रमैनी से सम्पन्न होता है। जिसमें विश्व के सर्व देवी-देव तथा पूर्ण परमात्मा का आह्वान तथा स्तुति- प्रार्थना होती है। [1]यह विवाह लगभग 17 मिनट में सम्पन्न हो जाता है, जिसमें किसी भी प्रकार का ना तो दहेज दिया जाता और ना ही फिजूलखर्ची की जाती है। [2] इस तरह के विवाह कबीर पंथी तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज के शिष्यों के द्वारा किया जाता हैं। [3]इस विवाह को रमैनी भी कहा जाता है

4. आर्श विवाह कन्या-पक्ष वालों को कन्या का मूल्य दे कर (सामान्यतः गौदान करके दोनों के स्वेच्छा और बिना अन्य दबाव के) कन्या से विवाह कर लेना 'अर्श विवाह' कहलाता है। किसी सेवा कार्य या धार्मिक रूप से भले के मूल्य के रूप अपनी कन्या को दान में दे देना या कन्या और वर का आपसी सहमति से विवाह 'दैव विवाह' कहलाता है। किसी पर कृपा कर उनसे विवाह जैसे : श्री कृष्ण ने 16000 कन्या व स्त्रियों से विवाह किया जो नरकासुर की कैद में नरक तुल्य जीवन जी रही थी । श्री कृष्ण द्वारा एक किन्नर अर्यमा से विवाह, तिरुपति बालाजी और पद्मनी का विवाह जिसमे पद्मनी से विवाह करने बालाजी अपनी गायो और कुबेर से धन उद्धार लेकर पद्मनी के पिता को देते है ।

5. प्रजापत्य विवाह कन्या की सहमति के बिना उसका विवाह अभिजात्य वर्ग के वर से कर देना 'प्रजापत्य विवाह' कहलाता है। इसमे प्रजाति राजा या उस कन्या का पिता अपनी मर्जी के वर लेकर चुन कर कन्या का विवाह कर देता है । जैसे : कृष्ण और जामवंती का विवाह , कृष्ण और सत्यभामा का विवाह पोखरण के राजा बाबा रामदेव और मित्तल दे का विवाह

5. गंधर्व विवाह

गान्धर्वस्य तु विज्ञेयो मैथुन्य: कामसम्भव: ।।

परिवार वालों की सहमति के बिना वर और कन्याककाम वासना से प्रेरित होकर स्वेच्छा से मैथुन आदि कर के न्या विवाह कर लेना 'गंधर्व विवाह' कहलाता है। उदाहरण : भीम और हिडिम्बा का विवाह , सुभद्रा और अर्जुन का विवाह, राजा भरत के पिता राजा दुष्यन्त और शकुंतला का विवाह।

6. असुर विवाह कन्या को खरीद कर (आर्थिक रूप से कमजोर को दबा कर) विवाह कर लेना 'असुर विवाह' कहलाता है। जानवरो को धन आदि से जैसे खरीद कर उसका स्वामी बना जाता है जैसे:रावण का मन्दोदरी से विवाह, राजा शांतनु का सत्यवती से विवाह ।

7. राक्षस विवाह कन्या या वर की सहमति के बिना उसका अपहरण करके जबरदस्ती विवाह कर लेना 'राक्षस विवाह' कहलाता है। या उसके माता पिता को डरा , धमका , दबा बल प्रयोग कर बलात्कार आदि कारण विवाह ।

8. पैशाच विवाह

कन्या या पुरुष की मदहोशी (गहन निद्रा, मानसिक दुर्बलता आदि) का लाभ उठा कर उससे शारीरिक सम्बंध बना लेना , उसकी मजबूरी का फायदा उठा कर और उससे विवाह करना 'पैशाच विवाह' कहलाता है। इसमें कन्या या पुरुष के परिजनों की हत्या तक कर दी जाती है।
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सनातन धर्म में सद्गृहस्थ की, परिवार निर्माण की जिम्मेदारी उठाने के योग्य शारीरिक, मानसिक परिपक्वता आ जाने पर युवक-युवतियों का विवाह संस्कार कराया जाता है। भारतीय संस्कृति के अनुसार विवाह कोई शारीरिक या सामाजिक अनुबन्ध मात्र नहीं हैं, यहाँ दाम्पत्य को एक श्रेष्ठ आध्यात्मिक साधना का भी रूप दिया गया है। इसलिए कहा गया है 'धन्यो गृहस्थाश्रमः'। सद्गृहस्थ ही समाज को अनुकूल व्यवस्था एवं विकास में सहायक होने के साथ श्रेष्ठ नई पीढ़ी बनाने का भी कार्य करते हैं। वहीं अपने संसाधनों से ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ एवं सन्यास आश्रमों के साधकों को वांछित सहयोग देते रहते हैं। ऐसे सद्गृहस्थ बनाने के लिए विवाह को रूढ़ियों-कुरीतियों से मुक्त कराकर श्रेष्ठ संस्कार के रूप में पुनः प्रतिष्ठित करना आवश्यक है। युग निर्माण के अन्तर्गत विवाह संस्कार के पारिवारिक एवं सामूहिक प्रयोग सफल और उपयोगी सिद्ध हुए हैं।
विवाह दो आत्माओं का पवित्र बन्धन है। दो प्राणी अपने अलग-अलग अस्तित्वों को समाप्त कर एक सम्मिलित इकाई का निर्माण करते हैं। स्त्री और पुरुष दोनों में परमात्मा ने कुछ विशेषताएँ और कुछ अपूणर्ताएँ दे रखी हैं। विवाह सम्मिलन से एक-दूसरे की अपूर्णताओं को अपनी विशेषताओं से पूर्ण करते हैं, इससे समग्र व्यक्तित्व का निर्माण होता है। इसलिए विवाह को सामान्यतया मानव जीवन की एक आवश्यकता माना गया है। एक-दूसरे को अपनी योग्यताओं और भावनाओं का लाभ पहुँचाते हुए गाड़ी में लगे हुए दो पहियों की तरह प्रगति-पथ पर अग्रसर होते जाना विवाह का उद्देश्य है। वासना का दाम्पत्य-जीवन में अत्यन्त तुच्छ और गौण स्थान है, प्रधानतः दो आत्माओं के मिलने से उत्पन्न होने वाली उस महती शक्ति का निर्माण करना है, जो दोनों के लौकिक एवं आध्यात्मिक जीवन के विकास में सहायक सिद्ध हो सके।
आज विवाह वासना-प्रधान बनते चले जा रहे हैं। रंग, रूप एवं वेष-विन्यास के आकर्षण को पति-पत्नि के चुनाव में प्रधानता दी जाने लगी है, यह प्रवृत्ति बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। यदि लोग इसी तरह सोचते रहे, तो दाम्पत्य-जीवन शरीर प्रधान रहने से एक प्रकार के वैध-व्यभिचार का ही रूप धारण कर लेगा। पाश्चात्य जैसी स्थिति भारत में भी आ जायेगी। शारीरिक आकर्षण की न्यूनाधिकता का अवसर सामने आने पर विवाह जल्दी-जल्दी टूटते-बनते रहेंगे। अभी पत्नी का चुनाव शारीरिक आकर्षण का ध्यान में रखकर किये जाने की प्रथा चली है, थोड़े ही दिनों में इसकी प्रतिक्रिया पति के चुनाव में भी सामने आयेगी। तब असुन्दर पतियों को कोई पत्नी पसन्द न करेगी और उन्हें दाम्पत्य सुख से वंचित ही रहना पड़ेगा।

समय रहते इस बढ़ती हुई प्रवृत्ति को रोका जाना चाहिए और शारीरिक आकर्षण की उपेक्षा कर सद्गुणों तथा सद्भावनाओं को ही विवाह का आधार पूवर्काल की तरह बने रहने देना चाहिए। शरीर का नहीं आत्मा का सौन्दयर् देखा जाए और साथी में जो कमी है, उसे प्रेम, सहिष्णुता, आत्मीयता एवं विश्वास की छाया में जितना सम्भव हो सके, सुधारना चाहिए, जो सुधार न हो सके, उसे बिना असन्तोष लाये सहन करना चाहिए। इस रीति-नीति पर दाम्पत्य जीवन की सफलता निर्भर है। अतएव पति-पतनी को एक-दूसरे से आकर्षण लाभ मिलने की बात न सोचकर एक-दूसरे के प्रति आत्म-समपर्ण करने और सम्मिलित शक्ति उत्पन्न करने, उसके जीवन विकास की सम्भावनाएँ उत्पन्न करने की बात सोचनी चाहिए। चुनाव करते समय तक साथी को पसन्द करने न करने की छूट है। जो कुछ देखना, ढूँढ़ना, परखना हो, वह कार्य विवाह से पूर्व ही समाप्त कर लेना चाहिए। जब विवाह हो गया, तो फिर यह कहने की गुंजाइश नहीं रहती कि भूल हो गई, इसलिए साथी की उपेक्षा की जाए। जिस प्रकार के भी गुण-दोष युक्त साथी के साथ विवाह बन्धन में बँधें, उसे अपनी ओर से कर्त्तव्यपालन समझकर पूरा करना ही एक मात्र मार्ग रह जाता है। इसी के लिए विवाह संस्कार का आयोजन किया जाता है। समाज के सम्भ्रान्त व्यक्तियों की, गुरुजनों की, कुटुम्बी-सम्बन्धियों की, देवताओं की उपस्थिति इसीलिए इस धर्मानुष्ठान के अवसर पर आवश्यक मानी जाती है कि दोनों में से कोई इस कर्तव्य-बन्धन की उपेक्षा करे, तो उसे रोकें और प्रताड़ित करें।

पति-पत्नी इन सम्भ्रान्त व्यक्तियों के सम्मुख अपने निश्चय की, प्रतिज्ञा-बन्धन की घोषणा करते हैं। यह प्रतिज्ञा समारोह ही विवाह संस्कार है। इस अवसर पर दोनों की ही यह भावनाएँ गहराई तक अपने मन में जमानी चाहिए कि वे पृथक् व्यक्तियों की सत्ता समाप्त कर एकीकरण की आत्मीयता में विकसित होते हैं। कोई किसी पर न तो हुकूमत जमायेगा और न अपने अधीन-वशवर्ती रखकर अपने लाभ या अहंकार की पूर्ति करना चाहेगा। वरन् वह करेगा, जिससे साथी को सुविधा मिलती हो। दोनों अपनी इच्छा आवश्यकता को गौण और साथी की आवश्यकता को मुख्य मानकर सेवा और सहायता का भाव रखेंगे, उदारता एवं सहिष्णुता बरतेंगे, तभी गृहस्थी का रथ ठीक तरह आगे बढ़ेगा। इस तथ्य को दोनों भली प्रकार हृदयंगम कर लें और इसी रीति-नीति को आजीवन अपनाये रहने का व्रत धारण करें, इसी प्रयोजन के लिए यह पुण्य-संस्कार आयोजित किया जाता है। इस बात को दोनों भली प्रकार समझ लें और सच्चे मन से स्वीकार कर लें, तो ही विवाह-बन्धन में बँधें। विवाह संस्कार आरम्भ करने से पूर्व या विवाह वेदी पर बिठाकर दोनों को यह तथ्य भली प्रकार समझा दिया जाए और उनकी सहमति माँगी जाए। यदि दोनों इन आदर्शों को अपनाये रहने की हार्दिक सहमति-स्वीकृति दें, तो ही विवाह संस्कार आगे बढ़ाया जाए।
विवाह संस्कार में देव पूजन, यज्ञ आदि से सम्बन्धित सभी व्यवस्थाएँ पहले से बनाकर रखनी चाहिए। सामूहिक विवाह हो, तो प्रत्येक जोड़े के हिसाब से प्रत्येक वेदी पर आवश्यक सामग्री रहनी चाहिए, कर्मकाण्ड ठीक से होते चलें, इसके लिए प्रत्येक वेदी पर एक-एक जानकार व्यक्ति भी नियुक्त करना चाहिए। एक ही विवाह है, तो आचार्य स्वयं ही देख-रेख रख सकते हैं। सामान्य व्यवस्था के साथ जिन वस्तुओं की जरूरत विशेष कर्मकाण्ड में पड़ती है, उन पर प्रारम्भ में दृष्टि डाल लेनी चाहिए। उसके सूत्र इस प्रकार हैं।

वर सत्कार के लिए सामग्री के साथ एक थाली रहे, ताकि हाथ, पैर धोने की क्रिया में जल फैले नहीं। मधुपर्क पान के बाद हाथ धुलाकर उसे हटा दिया जाए। यज्ञोपवीत के लिए पीला रंगा हुआ यज्ञोपवीत एक जोड़ा रखा जाए, यज्ञोपवित जनेऊ कभी भी वस्त्र के ऊपर नहीं पहनाए, अत्यंत अशुभ होता है और वार को जनेऊके लघुशंका, दीर्घशंका के बाद उपयोग करनेकान पर तीन बार लपेटकर उपयोग और बाद में जनेऊ उतारने से पहले हाथ धोना, तीन बारकुल्ला और पैर धोना दोनों बताया जाए। विवाह घोषणा के लिए वर-वधू पक्ष की पूरी जानकारी पहले से ही नोट कर ली जाए। वस्त्रोपहार तथा पुष्पोपहार के वस्त्र एवं मालाएँ तैयार रहें। कन्यादान में हाथ पीले करने की हल्दी, गुप्तदान के लिए गुँथा हुआ आटा (लगभग एक पाव) रखें। ग्रन्थिबन्धन के लिए हल्दी, पुष्प, अक्षत, दुर्वा और द्रव्य हों। शिलारोहण के लिए पत्थर की शिला या समतल पत्थर का एक टुकड़ा रखा जाए। हवन सामग्री के अतिरिक्त लाजा (धान की खीलें) रखनी चाहिए। ‍वर-वधू के पद प्रक्षालन के लिए परात या थाली रखे जाए। पहले से वातावरण ऐसा बनाना चाहिए कि संस्कार के समय वर और कन्या पक्ष के अधिक से अधिक परिजन, स्नेही उपस्थित रहें। सबके भाव संयोग से कमर्काण्ड के उद्देश्य में रचनात्मक सहयोग मिलता है। इसके लिए व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों ही ढंग से आग्रह किए जा सकते हैं। विवाह के पूर्व यज्ञोपवीत संस्कार हो चुकता है। अविवाहितों को एक यज्ञोपवीत तथा विवाहितों को जोड़ा पहनाने का नियम है। यदि यज्ञोपवीत न हुआ हो, तो नया यज्ञोपवीत और हो गया हो, तो एक के स्थान पर जोड़ा पहनाने का संस्कार विधिवत् किया जाना चाहिए। ‍अच्छा हो कि जिस शुभ दिन को विवाह-संस्कार होना है, उस दिन प्रातःकाल यज्ञोपवीत धारण का क्रम व्यवस्थित ढंग से करा दिया जाए। विवाह-संस्कार के लिए सजे हुए वर के वस्त्र आदि उतरवाकर यज्ञोपवीत पहनाना अटपटा-सा लगता है। इसलिए उसको पहले ही पूरा कर लिया जाए। यदि वह सम्भव न हो, तो स्वागत के बाद यज्ञोपवीत धारण करा दिया जाता है। उसे वस्त्रों पर ही पहना देना चाहिए, जो संस्कार के बाद अन्दर कर लिया जाता है। जहाँ पारिवारिक स्तर के परम्परागत विवाह आयोजनों में मुख्य संस्कार से पूर्व द्वाराचार (द्वार पूजा) की रस्म होती है, वहाँ यदि हो-हल्ला के वातावरण को संस्कार के उपयुक्त बनाना चाहिए, तो स्वागत तथा वस्त्र एवं पुष्पोपहार वाले प्रकरण उस समय भी पूरे कराये जा सकते हैं ‍विशेष आसन पर बिठाकर वर का सत्कार किया जाए। फिर कन्या को बुलाकर परस्पर वस्त्र और पुष्पोपहार सम्पन्न कराये जाएँ। परम्परागत ढंग से दिये जाने वाले अभिनन्दन-पत्र आदि भी उसी अवसर पर दिये जा सकते हैं। इसके कमर्काण्ड का संकेत आगे किया गया है। ‍पारिवारिक स्तर पर सम्पन्न किये जाने वाले विवाह संस्कारों के समय कई बार वर-कन्या पक्ष वाले किन्हीं लौकिक रीतियों के लिए आग्रह करते हैं। यदि ऐसा आग्रह है, तो पहले से नोट कर लेना-समझ लेना चाहिए। पारिवारिक स्तर पर विवाह-प्रकरणों में वरेच्छा या बरीक्क्षा, तिलक (शादी पक्की करना), लगुन जिसमें दोनों पक्ष की लगन पत्रिका कुंडली और तीन पीढ़ी के कुल मुखिया का नाम लिया जाता है। लगुन में शास्त्र अनुसार पिता यथाशक्ति स्वेच्छा से कन्या के नए जीवन के परिवार के लिए भेंट अर्पित करता है। फिर हल्दी से शरीर के विभिन्न अंगों की शुद्धि रस्म होती है। कन्या हरिद्रा लेपन (हल्दी चढ़ाना) तथा द्वारपूजन होता हैं। मंडप बसोर समाज बांस से आम की पतली शाखाओं पत्तों से बनाता है। दामाद या बहनोई से मंडप के मध्य खंब लगाने पात्र में, पहले से पीपल के पास की निकाली गई शुद्ध मिट्टी भरवाए जाती और सम्मान नेग दिया जाता है। पारिवारिक नाई विवाह की रस्मे पंडितजी के साथ पूरी करवाता है। अन्य सामाजिक विधानों का भी निर्वाह किया जाता है।
विवाह से पूर्व 'तिलक' का संक्षिप्त विधान इस प्रकार है-

वर पूर्वाभिमुख तथा तिलक करने वाले (पिता, भाई आदि) पश्चिमाभिमुख बैठकर निम्नकृत्य सम्पन्न करें- मंगलाचरण, षट्कर्म, तिलक, कलावा, कलशपूजन, गुरुवन्दना, गौरी-गणेश पूजन, सर्वदेव नमस्कार, स्वस्तिवाचन आदि इसके बाद कन्यादाता वर का यथोचित स्वागत-सत्कार (पैर धुलाना, आचमन कराना तथा हल्दी से तिलक करके अक्षत लगाना) करें। ‍तदुपरान्त 'वर' को प्रदान की जाने वाली समस्त सामग्री (थाल-थान, फल-फूल, द्रव्य-वस्त्रादि) कन्यादाता हाथ में लेकर संकल्प मन्त्र बोलते हुए वर को प्रदान कर दें-

ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य, अद्य श्रीब्रह्मणो द्वितीये पर्राधे श्रीश्वेतवाराहकल्पे, वैवस्वतमन्वन्तरे, भूर्लोके, जम्बूद्वीपे, भारतर्वषे, भरतखण्डे, आर्यावर्त्तैकदेशान्तर्गते, .......... क्षेत्रे, .......... विक्रमाब्दे .......... संवत्सरे .......... मासानां मासोत्तमेमासे .......... मासे .......... पक्षे .......... तिथौ .......... वासरे .......... गोत्रोत्पन्नः ............(कन्यादाता) नामाऽहं ...............(कन्या-नाम) नाम्न्या कन्यायाः (भगिन्याः) करिष्यमाण उद्वाहकमर्णि एभिवर्रणद्रव्यैः ...............(वर का गोत्र) गोत्रोत्पन्नं ...............(वर का नाम) नामानं वरं कन्यादानार्थं वरपूजनपूर्वकं त्वामहं वृणे, तन्निमित्तकं यथाशक्ति भाण्डानि, वस्त्राणि, फलमिष्टान्नानि द्रव्याणि च...............(वर का नाम) वराय समपर्ये।

तत्पश्चात् क्षमा प्राथर्ना, नमस्कार, विसजर्न तथा शान्ति पाठ करते हुए कार्यक्रम समाप्त करें।

विवाह से पूर्व वर-कन्या के प्रायः हल्दी चढ़ाने का प्रचलन है, उसका संक्षिप्त विधान इस प्रकार है- सवर्प्रथम षट्कर्म, तिलक, कलावा, कलशपूजन, गुरुवन्दना, गौरी-गणेश पूजन, सर्वदेवनमस्कार, स्वस्तिवाचन करें। तत्पश्चात् निम्न मंत्र बोलते हुए वर/कन्या की हथेली- अंग-अवयवों में (लोकरीति के अनुसार) हरिद्रालेपन करें-

ॐ काण्डात् काण्डात्प्ररोहन्ती, परुषः परुषस्परि। एवा नो दूवेर् प्र तनु, सहस्त्रेण शतेन च॥ -१३.२०

इसके बाद वर के दाहिने हाथ में तथा कन्या के बायें हाथ में रक्षा सूत्रकंकण (पीले वस्त्र में कौड़ी, लोहे की अँगूठी, पीली सरसों, पीला अक्षत आदि बाँधकर बनाया गया।) निम्नलिखित मन्त्र से पहनाएँ-

ॐ यदाबध्नन्दाक्षायणा, हिरण्य शतानीकाय, सुमनस्यमानाः। तन्मऽआबध्नामि शतशारदाय, आयुष्मांजरदष्टियर्थासम्॥ -३४.५२

तत्पश्चात् क्षमा प्राथर्ना, नमस्कार, विसजर्न, शान्तिपाठ के साथ कायर्क्रम पूर्ण करें।
विवाह हेतु बारात जब द्वार पर आती है, तो सर्वप्रथम 'वर' का स्वागत-सत्कार किया जाता है, जिसका क्रम इस प्रकार है- 'वर' के द्वार पर आते ही आरती की प्रथा हो, तो कन्या की माता आरती कर लें। तत्पश्चात् 'वर' और कन्यादाता परस्पर अभिमुख बैठकर षट्कर्म, कलावा, तिलक, कलशपूजन, गुरुवन्दना, गौरी-गणेश पूजन, सर्वदेवनमस्कार, स्वस्तिवाचन करें। इसके बाद कन्यादाता वर सत्कार के सभी कृत्य आसन, अर्घ्य, पाद्य, आचमन, मधुपर्क आदि (विवाह संस्कार से) सम्पन्न कराएँ। तत्पश्चात्

ॐ गन्धद्वारां दुराधर्षां........... (पृ० .....) से तिलक लगाएँ तथा

ॐ अक्षन्नमीमदन्त ...... (पृ० ....) से अक्षत लगाएँ।

माल्यार्पण एवं कुछ द्रव्य 'वर' को प्रदान करना हो, तो निम्नस्थ मन्त्रों से सम्पन्न करा दें-

माल्यापर्ण मन्त्र-

ॐ मंगलं भगवान विष्णुः ............ (पृ०...)

द्रव्यदान मन्त्र -

ॐ हिरण्यगर्भः समवत्तर्ताग्रे ......... (पृ०...)

तत्पश्चात् क्षमाप्रार्थना, नमस्कार, देवविसर्जन एवं शान्तिपाठ करें।

❤️विवाह संस्कार का विशेष कमर्काण्ड ❤️

विवाह वेदी पर वर और कन्या दोनों को बुलाया जाए, प्रवेश के साथ मंगलाचरण 'भद्रं कणेर्भिः.......' मन्त्र बोलते हुए उन पर पुष्पाक्षत डाले जाएँ। कन्या दायीं ओर तथा वर बायीं ओर बैठे। कन्यादान करने वाले प्रतिनिधि कन्या के पिता, भाई जो भी हों, उन्हें पत्नी सहित कन्या की ओर बिठाया जाए। पत्नी दाहिने और पति बायीं ओर बैठें। सभी के सामने आचमनी, पंचपात्र आदि उपकरण हों। पवित्रीकरण, आचमन, शिखा-वन्दन, प्राणायाम, न्यास, पृथ्वी-पूजन आदि षट्कर्म सम्पन्न करा लिये जाएँ। वर-सत्कार- (अलग से द्वार पूजा में वर सत्कार कृत्य हो चुका हो, तो दुबारा करने की आवश्यकता नहीं है।) अतिथि रूप में आये हुए वर का सत्कार किया जाए। (१) आसन (२) पाद्य (३) अर्ध्य (४) आचमन, टीका माल्यार्पण (५) नैवेद्य पान आदि निर्धारित मन्त्रों से समपिर्त किए जाएँ। कलश पूजन खंब में 33 कोटि अर्थात 33 प्रकार के

दिशा और प्रेरणा वर का अतिथि के नाते सत्कार किया जाता है। गृहस्थाश्रम में गृहलक्ष्मी का महत्त्व सवोर्परि होता है। उसे लेने वर एवं उसके हितैषी परिजन कन्या के पिता के पास चल कर आते हैं। श्रेष्ठ उद्देश्य से सद्भावनापूर्वक आये अतिथियों का स्वागत करना कन्या पक्ष का कर्तव्य हो जाता है। दोनों पक्षों को अपने-अपने इन सद्भावों को जाग्रत् रखना चाहिए।

वर का अर्थ होता है- श्रेष्ठ, स्वीकार करने योग्य समान वर्णाशम का पुरुष। कन्या-पक्ष वर को अपनी कन्या के अनुरूप श्रेष्ठ व्यक्ति मानकर ही सम्बन्ध स्वीकार करें, उसी भाव से श्रेष्ठ भाव रखते हुए सत्कार करें और भगवान से प्रार्थना करें कि यह भाव सदा बनाये रखने में सहायता करें।
वर पक्ष सम्मान पाकर निरर्थक अहं न बढ़ाएँ। जिन मानवीय गुणों के कारण श्रेष्ठ मानकर वर का सत्कार करने की व्यवस्था ऋषियों ने बनाई है, उन शालीनता, जिम्मेदारी, आत्मीयता, सहकारिता जैसे गुणों को इतना जीवन्त बनाकर रखें कि कन्या पक्ष की सहज श्रद्धा उसके प्रति उमड़ती ही रहे।
दहेज, चढ़ावा आदि के नाम पर यदि एक-दूसरे पर दबाव डाले जाते हैं, तो सद्भाव तो समाप्त हो जाती है, स्वेच्छा से वधु का पिता आभूषण श्रृंगार पहनाकर उत्तम वस्त्र रसोई पलंग बर्तन इत्यादि जीवन यापन के प्रथम चरण के आवश्यक सामानों के साथ विवाह संस्कार संपन्न करता है जो पुत्री का स्त्री धन होता है।
निम्न मन्त्र बोलें- ॐ साधु भवान् आस्ताम्। अचर्यिष्यामो भवन्तम्। -पार०गृ० १.३1४

वर दाहिने हाथ में अक्षत स्वीकार करते हुए भावना करें कि स्वागतकत्तार् की श्रद्धा पाते रहने के योग्य व्यक्तित्व बनाये रखने का उत्तरदायित्व स्वीकार कर रहे हैं। बोलें- 'ॐ अचर्य।' आसन- स्वागतकत्तार् आसन या उसका प्रतीक (कुश या पुष्प आदि) हाथ में लेकर निम्न मन्त्र बोलें। भावना करें कि कन्या स्वीकार करने वाले वर को श्रेष्ठता का आधार-स्तर प्राप्त हो। हमारे स्नेह में उसका स्थान बने। ॐ विष्टरो, विष्टरो, विष्टरः प्रतिगृह्यताम्। -पार०गृ०सू० १.३.६ वर, कन्या के पिता के हाथ से विष्टर (कुश या पुष्प आदि) लेकर कहें- ॐ प्रतिगृह्णामि। - पार०गृ०सू० १.३.७ उसे बिछाकर बैठ जाए, इस क्रिया के साथ निम्न मन्त्र बोला जाए- ॐ वष्मोर्ऽस्मि समानानामुद्यतामिव सूयर्ः। इमन्तमभितिष्ठामि, यो मा कश्चाभिदासति॥ - पार०गृ०सू० १.३.८ पाद्य- स्वागतकत्तार् पैर धोने के लिए छोटे पात्र में जल लें। भावना करें कि ऋषियों के आदर्शों के अनुरूप सद्गृहस्थ बनने की दिशा में बढ़ने वाले पैर पूजनीय हैं। कन्यादाता कहें- ॐ पाद्यं, पाद्यं, पाद्यं, प्रतिगृह्यताम्। - पार०गृ०सू०१.३.६ वर कहें- ॐ प्रतिगृह्णामि। - पार०गृ०सू०१.३.७ भावना करें कि आदर्शों की दिशा में चरण बढ़ाने की उमंग इष्टदेव बनाये रखें। पद प्रक्षालन की क्रिया के साथ यह मन्त्र बोला जाए। ॐ विराजो दोहोऽसि, विराजो दोहमशीय मयि, पाद्यायै विराजो दोहः। - पार०गृ०सू० १.३.१२

अर्घ्य- स्वागतकत्तार् चन्दन युक्त सुगन्धित जल पात्र में लेकर भावना करे कि सत्पुरुषाथर् में लगने का संस्कार वर के हाथों में जाग्रत् करने हेतु अघ्यर् दे रहे हैं। कन्यादाता कहे- ॐ अर्घो, अर्घो, अर्घः प्रतिगृह्यताम्। - पार०गृ०सू०१.३.६

जल पात्र स्वीकार करते हुए वर कहे- ॐ प्रतिगृह्णामि। - पार०गृ०सू०१.३.७ भावना करें कि सुगन्धित जल सत्पुरुषार्थ के संस्कार दे रहा है। जल से हाथ धोएँ। क्रिया के साथ निम्न मन्त्र बोला जाए।

ॐ आपःस्थ युष्माभिः, सवार्न्कामानवाप्नवानि। ॐ समुद्रं वः प्रहिणोमि, स्वां योनिमभिगच्छत। अरिष्टाअस्माकं वीरा, मा परासेचि मत्पयः। - पार०गृ०सू० १.३.१३-१४

आचमन- स्वागतकत्तार् आचमन के लिए जल पात्र प्रस्तुत करें। भावना करें कि वर-श्रेष्ठ अतिथि का मुख उज्ज्वल रहे, उसकी वाणी उसका व्यक्तित्व तदनुरूप बने। कन्यादाता कहे- ॐ आचमनीयम्, आचमीयनम्, आचमीनयम्, प्रतिगृह्यताम्॥ ॐ प्रतिगृह्णामि। (वर कहे) -पार०गृ०सू० १.३.६ भावना करें कि मन, बुद्धि और अन्तःकरण तक यह भाव बिठाने का प्रयास कर रहे हैं। तीन बार आचमन करें। यह मन्त्र बोला जाए। ॐ आमागन् यशसा, स सृज वचर्सा। तं मा कुरु प्रियं प्रजानामधिपतिं, पशूनामरिष्टिं तनूनाम्। - पार०गृ०सू० १.३.१५

नैवेद्य- एक पात्र में दूध, दही, शकर्रा (मधु) और तुलसीदल डाल कर रखें। स्वागतकर्त्ता वह पात्र हाथ में लें। भावना करें कि वर की श्रेष्ठता बनाये रखने योग्य सात्विक, सुसंस्कारी और स्वास्थ्यवर्धक आहार उन्हें सतत प्राप्त होता रहे। कन्यादाता कहे- ॐ मधुपकोर्, मधुपकोर्, मधुपर्कः प्रतिगृह्यताम्। - पार०गृ०सू० १.३.६ वर पात्र स्वीकार करते हुए कहे- ॐ प्रतिगृह्णामि। वर मधुपर्क का पान करे। भावना करें कि अभक्ष्य के कुसंस्कारों से बचने, सत्पदार्थों से सुसंस्कार अर्जित करते रहने का उत्तरदायित्व स्वीकार रहे हैं। पान करते समय यह मन्त्र बोला जाए। ॐ यन्मधुनो मधव्यं परम रूपमन्नाद्यम्। तेनाहं मधुनो मधव्येन परमेण, रूपेणान्नाद्येन परमो मधव्योऽन्नादोऽसानि।- पार०गृ०सू० १.३.२०

तत्पश्चात् जल से वर हाथ-मुख धोए। स्वच्छ होकर अगले क्रम के लिए बैठे। इसके बाद चन्दन धारण कराएँ। यदि यज्ञोपवीत धारण पहले नहीं कराया गया है, तो यज्ञोपवीत प्रकरण के आधार पर संक्षेप में उसे सम्पन्न कराया जाए। इसके बाद क्रमशः कलशपूजन, नमस्कार, षोडशोपचार पूजन, स्वस्तिवाचन, रक्षाविधान आदि सामान्य क्रम करा लिए जाएँ। रक्षा-विधान के बाद संस्कार का विशेष प्रकरण चालू किया जाए।

❤️विवाह घोषणा❤️

विवाह घोषणा की एक छोटी-सी संस्कृत भाषा की शब्दावली है, जिसमें वर-कन्या के गोत्र पिता-पितामह आदि का उल्लेख और घोषणा है कि यह दोनों अब विवाह सम्बन्ध में आबद्ध होते हैं। इनका साहचर्य धर्म-संगत जन साधारण की जानकारी में घोषित किया हुआ माना जाए। बिना घोषणा के गुपचुप चलने वाले दाम्पत्य स्तर के प्रेम सम्बन्ध, नैतिक, धार्मिक एवं कानूनी दृष्टि से अवांछनीय माने गये हैं। जिनके बीच दाम्पत्य सम्बन्ध हो, उसकी घोषणा सर्वसाधारण के समक्ष की जानी चाहिए। समाज की जानकारी से जो छिपाया जा रहा हो, वही व्यभिचार है। घोषणापूर्वक विवाह सम्बन्ध में आबद्ध होकर वर-कन्या धर्म परम्परा का पालन करते हैं।

स्वस्ति श्रीमन्नन्दनन्दन चरणकमल भक्ति सद् विद्या विनीतनिजकुलकमलकलिकाप्रकाशनैकभास्कार सदाचार सच्चरित्र सत्कुल सत्प्रतिष्ठा गरिष्ठस्य .........गोत्रस्य ........ महोदयस्य प्रपौत्रः .......... महोदयस्य पौत्र.......... महोदयस्य पुत्रः॥ ....... महोदयस्य प्रपौत्री, ........ महोदयस्य पौत्री .........महोदयस्य पुत्री प्रयतपाणिः शरणं प्रपद्ये। स्वस्ति संवादेषूभयोवृर्द्धिवर्रकन्ययोश्चिरंजीविनौ भूयास्ताम्।

❤️मंगलाष्टक ❤️

विवाह घोषणा के बाद, सस्वर मंगलाष्टक मन्त्र बोलें जाएँ। इन मन्त्रों में सभी श्रेष्ठ शक्तियों से मंगलमय वातावरण, मंगलमय भविष्य के निर्माण की प्रार्थना की जाती है। पाठ के समय सभी लोग भावनापूर्वक वर-वधू के लिए मंगल कामना करते रहें। एक स्वयं सेवक उनके ऊपर पुष्पों की वर्षा करता रहे।

ॐमत्पंकजविष्टरो हरिहरौ, वायुमर्हेन्द्रोऽनलः। चन्द्रो भास्कर वित्तपाल वरुण, प्रताधिपादिग्रहाः। प्रद्यम्नो नलकूबरौ सुरगजः, चिन्तामणिः कौस्तुभः, स्वामी शक्तिधरश्च लांगलधरः, कुवर्न्तु वो मंगलम्॥१॥

गंगा गोमतिगोपतिगर्णपतिः, गोविन्दगोवधर्नौ, गीता गोमयगोरजौ गिरिसुता, गंगाधरो गौतमः। गायत्री गरुडो गदाधरगया, गम्भीरगोदावरी, गन्धवर्ग्रहगोपगोकुलधराः, कुवर्न्तु वो मंगलम्॥२॥

नेत्राणां त्रितयं महत्पशुपतेः अग्नेस्तु पादत्रयं, तत्तद्विष्णुपदत्रयं त्रिभुवने, ख्यातं च रामत्रयम्। गंगावाहपथत्रयं सुविमलं, वेदत्रयं ब्राह्मणम्, संध्यानां त्रितयं द्विजैरभिमतं, कुवर्न्तु वो मंगलम्॥३॥

बाल्मीकिः सनकः सनन्दनमुनिः, व्यासोवसिष्ठो भृगुः, जाबालिजर्मदग्निरत्रिजनकौ, गर्गोऽ गिरा गौतमः। मान्धाता भरतो नृपश्च सगरो, धन्यो दिलीपो नलः, पुण्यो धमर्सुतो ययातिनहुषौ, कुवर्न्तु वो मंगलम्॥४॥

गौरी श्रीकुलदेवता च सुभगा, कद्रूसुपणार्शिवाः, सावित्री च सरस्वती च सुरभिः, सत्यव्रतारुन्धती। स्वाहा जाम्बवती च रुक्मभगिनी, दुःस्वप्नविध्वंसिनी, वेला चाम्बुनिधेः समीनमकरा, कुवर्न्तु वो मंगलम्॥५॥

गंगा सिन्धु सरस्वती च यमुना, गोदावरी नमर्दा, कावेरी सरयू महेन्द्रतनया, चमर्ण्वती वेदिका। शिप्रा वेत्रवती महासुरनदी, ख्याता च या गण्डकी, पूर्णाः पुण्यजलैः समुद्रसहिताः, कुवर्न्तु वो मंगलम्॥६॥

लक्ष्मीः कौस्तुभपारिजातकसुरा, धन्वन्तरिश्चन्द्रमा, गावः कामदुघाः सुरेश्वरगजो, रम्भादिदेवांगनाः। अश्वः सप्तमुखः सुधा हरिधनुः, शंखो विषं चाम्बुधे, रतनानीति चतुदर्श प्रतिदिनं, कुवर्न्तु वो मंगलम्॥७॥

ब्रह्मा वेदपतिः शिवः पशुपतिः, सूयोर् ग्रहाणां पतिः, शुक्रो देवपतिनर्लो नरपतिः, स्कन्दश्च सेनापतिः। विष्णुयर्ज्ञपतियर्मः पितृपतिः, तारापतिश्चन्द्रमा, इत्येते पतयस्सुपणर्सहिताः, कुवर्न्तु वो मंगलम्॥८॥

❤️परस्पर उपहार ❤️

वर पक्ष की ओर से कन्या को और कन्या पक्ष की ओर से वर का वस्त्र-आभूषण भेंट किये जाने की परम्परा है। यह कार्य श्रद्धानुरूप पहले ही हो जाता है। वर-वधू उन्हें पहनाकर ही संस्कार में बैठते हैं। यहाँ प्रतीक रूप से पीले दुपट्टे एक-दूसरे को भेंट किये जाएँ। यही ग्रन्थि बन्धन के भी काम आ जाते हैं। आभूषण पहनाना हो, तो अँगूठी या मंगलसूत्र जैसे शुभ-चिह्नों तक ही सीमित रहना चाहिए। दोनों पक्ष भावना करें कि एक-दूसरे का सम्मान बढ़ाने, उन्हें अलंकृत करने का उत्तरदायित्व समझने और निभाने के लिए संकल्पित हो रहे हैं। नीचे लिखे मन्त्र के साथ परस्पर उपहार दिये जाएँ।

ॐ परिधास्यै यशोधास्यै, दीघार्युत्वाय जरदष्टिरस्मि। शतं च जीवामि शरदः, पुरूचीरायस्पोषमभि संव्ययिष्ये। - पार०गृ०सू० २.६.२०

पुष्पोहार (माल्यार्पण) वर-वधू एक-दूसरे को अपने अनुरूप स्वीकार करते हुए, पुष्प मालाएँ अर्पित करते हैं। हृदय से वरण करते हैं। भावना करें कि देव शक्तियों और सत्पुरुषों के आशीर्वाद से वे परस्पर एक दूसरे के गले के हार बनकर रहेंगे। मन्त्रोच्चार के साथ पहले कन्या वर को फिर वर-कन्या को माला पहनाएँ।

ॐ यशसा माद्यावापृथिवी, यशसेन्द्रा बृहस्पती। यशो भगश्च मा विदद्, यशो मा प्रतिपद्यताम्। - पार०गृ०सू० २.६.२१, मा०गृ०सू० १.९.२७

❤️हस्तपीतकरण ❤️

शिक्षा एवं प्रेरणा
कन्यादान करने वाले कन्या के हाथों में हल्दी लगाते हैं। हरिद्रा मंगलसूचक है। अब तक बालिका के रूप में यह लड़की रही। अब यह गृहलक्ष्मी का उत्तरदायित्व वहन करेगी, इसलिए उसके हाथों को पीतवर्ण-मंगलमय बनाया जाता है। उसके माता-पिता ने लाड़-प्यार से पाला, उसके हाथों में कोई कठोर कर्तव्य नहीं सौंपा। अब उसे अपने हाथों को नव-निमार्ण के अनेक उत्तरदायित्व सँभालने को तैयार करना है, अतएव उन्हें पीतवर्ण मांगलिक-लक्ष्मी का प्रतीक-सृजनात्मक होना चाहिए। पीले हाथ करते हुए कन्या परिवार के लोग उस बालिका को यही मौन शिक्षण देते हैं कि उसे आगे सृजन शक्ति के रूप में प्रकट होना है और इसके लिए इन कोमल हाथों को अधिक उत्तरदायी, मजबूत और मांगलिक बनाना है।

क्रिया और भावना
कन्या दोनों हथेलियाँ सामने कर दे। कन्यादाता गीली हल्दी उस पर मन्त्र के साथ मलें। भावना करें कि देव सान्निध्य में इन हाथों को स्वार्थपरता के कुसंस्कारों से मुक्त कराते हुए त्याग परमार्थ के संस्कार जाग्रत् किये जा रहे हैं।

ॐ अहिरिव भोगैः पयेर्ति बाहंु, ज्याया हेतिं परिबाधमानः। हस्तघ्नो विश्वा वयुनानि विद्वान्, पुमान् पुमा सं परिपातु विश्वतः। -२९.५१

शिक्षा एवं प्रेरणा

❤️कन्या दान ❤️

कन्यादान का अर्थ
कन्यादान का अर्थ है, अभिभावकों के उत्तरदायित्वों का वर के ऊपर, ससुराल वालों के ऊपर स्थानान्तरण होना। अब तक माता-पिता कन्या के भरण-पोषण, विकास, सुरक्षा, सुख-शान्ति, आनन्द-उल्लास आदि का प्रबंध करते थे, अब वह प्रबन्ध वर और उसके कुटुम्बियों को करना होगा। कन्या नये घर में जाकर वीरानेपन का अनुभव न करने पाये, उसे स्नेह, सहयोग, सद्भाव की कमी अनुभव न हो, इसका पूरा ध्यान रखना होगा। कन्यादान स्वीकार करते समय-पाणिग्रहण की जिम्मेदारी स्वीकार करते समय, वर तथा उसके अभिभावकों को यह बात भली प्रकार अनुभव कर लेनी चाहिए कि उन्हें उस उत्तरदायित्व को पूरी जिम्मेदारी के साथ निबाहना है। कन्यादान का अर्थ यह नहीं कि जिस प्रकार कोई सम्पत्ति, किसी को बेची या दान कर दी जाती है, उसी प्रकार लड़की को भी एक सम्पत्ति समझकर किसी न किसी को चाहे जो उपयोग करने के लिए दे दिया है। हर मनुष्य की एक स्वतन्त्र सत्ता एवं स्थिति है। कोई मनुष्य किसी मनुष्य को बेच या दान नहीं कर सकता। फिर चाहे वह पिता ही क्यों न हो। व्यक्ति के स्वतन्त्र अस्तित्व एवं अधिकार से इनकार नहीं किया जा सकता, न उसे चुनौती दी जा सकती है। लड़की हो या लड़का अभिभावकों को यह अधिकार नहीं कि वे उन्हें बेचें या दान करें। ऐसा करना तो बच्चे के स्वतन्त्र व्यक्तित्व के तथ्य को ही झुठलाना हो जाएगा।

विवाह उभयपक्षीय समझौता है, जिसे वर और वधू दोनों ही पूरी ईमानदारी और निष्ठा के साथ निर्वाह कर सफल बनाते हैं। यदि कोई किसी को खरीदी या बेची सम्पत्ति के रूप में देखें और उस पर पशुओं जैसा स्वामित्व अनुभव करें या व्यवहार करें, तो यह मानवता के मूलभूत अधिकारों का हनन करना ही होगा। कन्यादान का यह तात्पर्य कदापि नहीं, उसका प्रयोजन इतना ही है कि कन्या के अभिभावक बालिका के जीवन को सुव्यवस्थित, सुविकसित एवं सुख-शान्तिमय बनाने की जिम्मेदारी को वर तथा उसके अभिभावकों पर छोड़ते हैं, जिसे उन्हें मनोयोगपूर्वक निबाहना चाहिए। पराये घर में पहुँचने पर कच्ची उम्र की अनुभवहीन भावुक बालिका को अखरने वाली मनोदशा में होकर गुजरना पड़ता है। इसलिए इस आरम्भिक सन्धिबेला में तो विशेष रूप से वर पक्ष वालों को यह प्रयास करना चाहिए कि हर दृष्टि से वधू को अधिक स्नेह, सहयोग मिलता रहे। कन्या पक्ष वालों को भी यह नहीं सोच लेना चाहिए कि लड़की के पीले हाथ कर दिये, कन्यादान हो गया, अब तो उन्हें कुछ भी करना या सोचना नहीं है। उन्हें भी लड़की के भविष्य को उज्ज्वल बनाने में योगदान देते रहना है। क्रिया और भावना- कन्या के हाथ हल्दी से पीले करके माता-पिता अपने हाथ में कन्या के हाथ, गुप्तदान का धन और पुष्प रखकर संकल्प बोलते हैं और उन हाथों को वर के हाथों में सौंप देते हैं। वह इन हाथों को गंभीरता और जिम्मेदारी के साथ अपने हाथों को पकड़कर स्वीकार-शिरोधार्य करता है। भावना करें कि कन्या वर को सौंपते हुए उसके अभिभावक अपने समग्र अधिकार को सौंपते हैं। कन्या के कुल गोत्र अब पितृ परम्परा से नहीं, पति परम्परा के अनुसार होंगे। कन्या को यह भावनात्मक पुरुषार्थ करने तथा पति को उसे स्वीकार करने या निभाने की शक्ति देवशक्तियाँ प्रदान कर रही हैं। इस भावना के साथ कन्यादान का संकल्प बोला जाए। संकल्प पूरा होने पर संकल्पकर्ता कन्या के हाथ वर के हाथ में सौंप दें।

अद्येति.........नामाहं.........नाम्नीम् इमां कन्यां/भगिनीं सुस्नातां यथाशक्ति अलंकृतां, गन्धादि - अचिर्तां, वस्रयुगच्छन्नां, प्रजापति दैवत्यां, शतगुणीकृत, ज्योतिष्टोम-अतिरात्र-शतफल-प्राप्तिकामोऽहं ......... नाम्ने, विष्णुरूपिणे वराय, भरण-पोषण-आच्छादन-पालनादीनां, स्वकीय उत्तरदायित्व-भारम्, अखिलं अद्य तव पतनीत्वेन, तुभ्यं अहं सम्प्रददे। वर उन्हें स्वीकार करते हुए कहें- ॐ स्वस्ति।

गुप्तदान
कन्यादान के समय कुछ अंशदान देने की प्रथा है। आटे की लोई में छिपाकर कुछ धन कन्यादान के समय दिया जाता है। दहेज का यही स्वरूप है। बच्ची के घर से विदा होते समय उसके अभिभावक किसी आवश्यकता के समय काम आने के लिए उपहार स्वरूप कुछ धन देते हैं, पर होता वह गुप्त ही है। अभिभावक और कन्या के बीच का यह निजी उपहार है। दूसरों को इसके सम्बन्ध में जानने या पूछने की कोई आवश्यकता नहीं। दहेज के रूप में क्या दिया जाना चाहिए, इस सम्बन्ध में ससुराल वालों को कहने या पूछने का कोई अधिकार नहीं। न उसके प्रदर्शन की आवश्यकता है, क्यों कि गरीब-अमीर अपनी स्थिति के अनुसार जो दे, वह चर्चा का विषय नहीं बनना चाहिए, उसके साथ निन्दा-प्रशंसा नहीं जुड़नी चाहिए। एक-दूसरे का अनुकरण करने लगें, प्रतिस्पर्द्धा पर उतर आएँ, तो इससे अनर्थ ही होगा। कन्या-पक्ष पर अनुचित दबाव पड़ेगा और वर-पक्ष अधिक न मिलने पर अप्रसन्न होने की धृष्टता करने लगेगा। इसलिए कन्यादान के साथ कुछ धनदान का विधान तो है, पर दूरर्दशी ऋषियों ने लोगों की स्वार्थपरता एवं दुष्टता की सम्भावना को ध्यान में रखते हुए यह नियम बना दिया है कि जो कुछ भी दहेज दिया जाए, वह सर्वथा गुप्त हो, उस पर किसी को चर्चा करने का अधिकार न हो।

आटे में साधारणतया एक रुपया इस दहेज प्रतीक के लिए पर्याप्त है। यह धातु का लिया जाए और आटे के गोले के भीतर छिपाकर रखा जाए।

❤️गोदान ❤️

दिशा प्रेरणा
गौ पवित्रता और परमार्थ परायणता की प्रतीक है। कन्या पक्ष वर को ऐसा दान दें, जो उन्हें पवित्रता और परमार्थ की प्रेरणा देने वाला हो। सम्भव हो, तो कन्यादान के अवसर पर गाय दान में दी जा सकती है। वह कन्या के व उसके परिवार के लोगों के स्वास्थ्य की दृष्टि से उपयुक्त भी है। आज की स्थिति में यदि गौ देना या लेना असुविधाजनक हो, तो उसके लिए कुछ धन देकर गोदान की परिपाटी को जीवित रखा जा सकता है। क्रिया और भावना- कन्यादान करने वाले हाथ में सामग्री लें। भावना करें कि वर-कन्या के भावी जीवन को सुखी समुन्नत बनाने के लिए श्रद्धापूर्वक श्रेष्ठ दान कर रहे हैं। मन्त्रोच्चार के साथ सामग्री वर के हाथ में दें।

ॐ माता रुद्राणां दुहिता वसूनां, स्वसादित्यानाममृतस्य नाभिः। प्र नु वोचं चिकितुषे जनाय मा, गामनागामदितिं वधिष्ट॥ -ऋ०८.१०.१.१५, पार०गृ०सू० १.३.२७

❤️मर्यादाकरण ❤️

हिन्दू धर्म में; सद्गृहस्थ की, परिवार निर्माण की जिम्मेदारी उठाने के योग्य शारीरिक, मानसिक परिपक्वता आ जाने पर युवक-युवतियों का विवाह संस्कार कराया जाता है। समाज के सम्भ्रान्त व्यक्तियों की, गुरुजनों की, कुटुम्बी-सम्बन्धियों की, देवताओं की उपस्थिति इसीलिए इस धर्मानुष्ठान के अवसर पर आवश्यक मानी जाती है कि दोनों में से कोई इस कत्तर्व्य-बन्धन की उपेक्षा करे, तो उसे रोकें और प्रताड़ित करें। पति-पत्नी इन सन्भ्रान्त व्यक्तियों के सम्मुख अपने निश्चय की, प्रतिज्ञा-बन्धन की घोषणा करते हैं। यह प्रतिज्ञा समारोह ही विवाह संस्कार है। विवाह संस्कार में देव पूजन, यज्ञ आदि से सम्बन्धित सभी व्यवस्थाएँ पहले से बनाकर रखनी चाहिए।

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...