सोमवार, 24 फ़रवरी 2025

शिव आराधना केवल

शास्त्रों के अनुसार, शिवलिंग शक्ति का प्रतीक है और केवल विवाहित पति पत्नी या कोई पुरुष ही शिवलिंग छू सकता है. इसलिए अगर आप शिवलिंग की पूजा करने जा रहा हैं तो ध्यान रहे कि केवल पुरुष को ही शिवलिंग को स्पर्ष करना है।शिवलिंग शक्ति का प्रतीक है और केवल विवाहित पति पत्नी या कोई पुरुष ही शिवलिंग छू सकता है. इसलिए अगर आप शिवलिंग की पूजा करने जा रहा हैं तो ध्यान रहे कि केवल पुरुष को ही शिवलिंग को स्पर्ष करना है.
परन्तु पूजा के दौरान ज्यादातर महिलाएं ही शिवलिंग को अज्ञानता वश स्पर्श करती देखी जाती हैं.

मान्यता है कि अविवाहित महिलाओं के अलावा विवाहित महिलाओं का शिवलिंग को छूना माता पार्वती को नाराज कर सकता है, जिससे पूजा का विपरित फल मिल सकता है. इसलिए कहा गया है कि महिलाओं को शिव की मूर्ति के रूप में ही पूजा करनी चाहिए.
प्राचीन शास्त्रों के अनुसार इस ब्रह्मांड की उत्पत्ति शिवलिंग से हुई है। कहा जाता है कि जब इस संसार में कुछ भी नहीं था, तब एक विशाल शिवलिंग प्रकट हुआ, जिसने पूरे ब्रह्मांड को प्रकाश और ऊर्जा से भर दिया। उसके बाद ही संपूर्ण आकाश, तारे और ग्रहों का निर्माण हुआ।धार्मिक शास्त्रों के अनुसार शिवलिंग की सबसे पहले पूजा ब्रह्मा देव और विष्णु जी ने की थी और सबसे पहला व्रत माता आदिशक्ति दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती ने रखा था। वैसे तो इस संसार का हर प्राणी शिव की पूजा करता है, क्योंकि शिव जी हर प्राणी के रक्षक हैं। इसीलिए उन्हें पशुपतिनाथ भी कहा जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि अविवाहित महिलाएं शिवलिंग की पूजा नहीं कर सकती हैं? शास्त्रों और पुराणों में शिवलिंग की पूजा से जुड़े कई नियम बताए गए हैं। ज्योतिषाचार्य चिराग दारूवाला से जानिए शिवलिंग पूजा के महत्व के बारे में।हिंदू धर्म में शिवलिंग की पूजा को विशेष महत्व दिया गया है। मान्यता है कि शिवलिंग की पूजा करने से भक्त की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और मनचाहा फल प्राप्त होता है। मान्यता है कि अविवाहित महिलाओं के अलावा विवाहित महिलाओं द्वारा शिवलिंग को छूने से माता पार्वती नाराज हो सकती हैं, जिसके कारण पूजा का विपरीत परिणाम हो सकता है। इसलिए कहा जाता है कि महिलाओं को शिव की मूर्ति के रूप में ही पूजा करनी चाहिए।
महिलाओं को शिवलिंग की पूजा करते समय कुछ गलतियां नहीं करनी चाहिए, अन्यथा पूजा सफल नहीं मानी जाती है और व्यक्ति को दुष्परिणाम भुगतना पड़ सकता है। अविवाहित महिलाओं को इसे छूने की मनाही है। ऐसा कहा जाता है कि भगवान शिव सबसे पवित्र हैं और हमेशा ध्यान में लीन रहते हैं। भगवान शंकर के ध्यान के दौरान इस बात का ध्यान रखा जाता था कि कोई देवी या अप्सरा भगवान के ध्यान में विघ्न न डालें। इसलिए कुंवारी लड़कियों को शिवलिंग को छूने से मना किया जाता है। भगवान शिव की तपस्या में विघ्न डालना अनुचित माना जाता है, इसलिए शास्त्रों में अविवाहित महिलाओं को शिवलिंग को छूने से मना किया गया है।

शास्त्रों के अनुसार, शिवलिंग शक्ति का प्रतीक है और केवल शादीशुदा पति-पत्नी या पुरुष ही शिवलिंग को छू सकता है। इसलिए अगर आप शिवलिंग की पूजा करने जा रहे हैं तो ध्यान रखें कि केवल पुरुष को ही शिवलिंग को छूना है। पवित्र शिवलिंग को सीधे छूना वर्जित है। अगर कोई महिला तिलक लगाने के लिए शिवलिंग को छूना चाहती है तो शिव की मूर्ति को छू सकती है।
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देवों के देव महादेव शिव की आराधना से हर भक्त की मनोकामना पूरी होती है.अपने भगतों पर प्रसन्न रहने वाले शिव पुजारी पर उतने प्रसन्न नहीं होते जितने अपने भगत पर होते है।पुजारी को तो मात्र कर्म फल की प्राप्ति होती है जब कि भगत को शिव अपना स्वरूप भी प्राप्त करवा देते हैं
शिवलिंग की पूजा करते समय महिलाओं को कुछ गलतियां नहीं करनी चाहिए वरना पूजा सफल नहीं मानी जाती और इसके विपरित परिणाम भी मनुष्य को भुगतने पड़ सकते हैं. शास्त्रों के अनुसार, शिवलिंग शक्ति का प्रतीक है और केवल विवाहित पति पत्नी या कोई पुरुष ही शिवलिंग छू सकता है. इसलिए अगर आप शिवलिंग की पूजा करने जा रहा हैं तो ध्यान रहे कि केवल पुरुष को ही शिवलिंग को स्पर्ष करना है.
अविवाहित महिलाओं को शिव लिंग छूने की मनाही होती है.
कहा जाता है कि भगवान शिव सबसे पवित्र और हर समय तपस्या में लीन रहने वाले हैं. भगवान शंकर के ध्यान के समय इस बात की सावधानी रखी जाती थी कि कोई भी देवी या अप्सरा भगवान के ध्यान में विघ्न न डालें. इसलिए कुंवारी कन्याओं को शिवलिंग छूने के लिए मना किया जाता है.

यह मान्यता है कि शिवलिंग के साथ अनजाने में की गई गलती आपके लिए शुभ और अशुभ भी हो सकती  जिस कारण अविवाहित महिलाओं का शिवलिंग को स्पर्श करना मना होता है. शिव जी तपस्या को भंग करना अनुचित माना गया है इसलिए शास्त्रों में अविवाहित महिलाओं को शिवलिंग को स्पर्श करना वर्जित है.
धार्मिक मान्यता के अनुसार कहा गया है कि कुंवारी लड़कियां शिव जी की पूजा माता पार्वती के साथ कर सकती हैं.जो मूर्ति में ही संभव होती है शिव लिंग में नहीं।

इसलिए कहा गया है कि महिलाओं को शिव की मूर्ति के रूप में ही पूजा करनी चाहिए.

लिंगाष्टकम शिव की पूजा के दौरान गाया जाने वाला एक लोकप्रिय 8-सर्ग का भजन है। इसके बोल इस प्रकार हैं ,


ब्रह्मा मुरारि सुरार्चिता लिंगम्


निर्मला भाशिता शोभिता लिंगम


जन्मजा दुःख विनाशक लिंगम्


तत् प्राणमामि सदा शिव लिंगम्


अर्थ: मैं उस सदा शिवलिंग को नमन करता हूँ, जिसकी ब्रह्मा, विष्णु तथा अन्य देवता पूजा करते हैं, जिसकी स्तुति शुद्ध और पवित्र वाणी द्वारा की जाती है तथा जो जन्म-मरण के चक्र को नष्ट कर देता है।


देवमुनि प्रवरार्चिता लिंगम्


कामदहम करुणाकर लिंगम


रावण दर्प विनाशक लिंगम्


तत् प्राणमामि सदा शिव लिंगम्


अर्थ: मैं उस सदा शिव लिंग को नमन करता हूँ, जो इच्छाओं का नाश करने वाला है, जिसकी देवता और ऋषि पूजा करते हैं, जो असीम दयालु है और जिसने रावण के गर्व को दबा दिया था।


सर्व सुगंध सुलेपिथा लिंगम


बुद्धि विवर्धन कारण लिंगम्


सिद्ध सुरासुर वंदिता लिंगम


तत् प्राणमामि सदा शिव लिंगम्


अर्थ: मैं उस सदा शिव लिंग को नमन करता हूँ, जो विविध प्रकार के सुगंधों और सुगंधों से भरपूर है, जो विचार की शक्ति को बढ़ाता है और विवेक की ज्योति को प्रज्वलित करता है, और जिसके आगे सिद्ध, सुर और असुर सभी नतमस्तक होते हैं।


कनक महामणि भूषित लिंगम्


फणीपति वेष्टिथा शोभिता लिंगम्


दक्ष सु यज्ञ विनाशक लिंगम्


तत् प्राणमामि सदा शिव लिंगम्


अर्थ: मैं उस सदा शिवलिंग को प्रणाम करता हूँ, जो दक्ष के यज्ञ का विध्वंस करने वाला है, जो नाना प्रकार के आभूषणों से सुशोभित है, नाना प्रकार के रत्नों और माणिकों से जड़ा हुआ है तथा जिसके चारों ओर सर्पों की माला लिपटी हुई है।


कुमकुमा चंदना लेपिथा लिंगम


पंकजा हारा सुशोभित लिंगम्


संचित पाप विनाशक लिंगम्


तत् प्राणमामि सदा शिव लिंगम्


अर्थ: मैं उस सदा शिव लिंग को नमन करता हूँ, जो केसर और चंदन से लिपटा हुआ है, जो कमल की माला से सुशोभित है और जो सभी संचित पापों को मिटा देता है।


देवागनार्चित सेविथा लिंगम्


भावैर् भक्तिभिरेवच लिंगम्


दिनकर कोटि प्रभाकर लिंगम


तत् प्राणमामि सदा शिव लिंगम्


अर्थ: मैं उस सदा शिव लिंग को नमन करता हूँ, जिसकी पूजा बहुत से देवतागण सच्ची श्रद्धा और भक्ति से करते हैं तथा जिसकी शोभा करोड़ों सूर्यों के समान है।


अष्ट दलोपरी वेष्टिथा लिंगम्


सर्व समुद्भव कारण लिंगम्


अष्ट दरिद्र विनाशक लिंगम्


तत् प्राणमामि सदा शिव लिंगम्


अर्थ: मैं उस सदा शिव लिंग को नमन करता हूँ, जो आठ पहलुओं सहित सभी दरिद्रता और दुख का नाश करने वाला है, जो समस्त सृष्टि का कारण है और जो आठ पंखुड़ियों वाले कमल पर स्थित है।


सुरगुरु सुरवर पूजिता लिंगम


सुरवण पुष्प सदार्चित लिंगम्


परात्परं परमात्माका लिंगम्


तत् प्राणमामि सदा शिव लिंगम्


अर्थ: मैं उस सदा शिव लिंग को नमन करता हूँ, जो दिव्य सत्ता और परमसत्ता है, जिसकी पूजा सभी सुर और उनके गुरु (बृहस्पति) दिव्य उद्यानों से असंख्य पुष्पों से करते हैं।


बुधवार, 19 फ़रवरी 2025

जागो विवाह रिवाज


जागो या जग्गो समारोह का क्या मतलब है? 
इसका मतलब है "जागना"। यह दुल्हन और दूल्हे दोनों के मातृ परिवारों द्वारा शुरू किया गया उत्सव है। परिवार बहुत धूमधाम से शादी स्थल पर पहुंचते हैं।
जागो का अर्थ है जगाना
जग्गो या जागो समारोह जग्गो पंजाबी में जागो शब्द का अर्थ है 'जागना' और यह दोनों परिवारों द्वारा एक साथ मिलकर जश्न मनाने की रात होती है। यह आमतौर पर शादी समारोह से एक या दो दिन पहले आयोजित किया जाता है।जग्गो या जागो पंजाबी परिवारों का एक उत्सव है जिस को पंजाबी परिवार शादी के समय मनाकर नजदीक रहने वालो को जगाते है या पुनः रिमाइंडर देते है कि याद रहे शादी में संलित होने को आ जाना शादी समारोह की जिन मित्र संबंधियों को निमंत्रित करना भूल गए होते है उनको भी इस प्रकार से निमंत्रण दे देते है इसी को जागो कहा गया है।
पहले समय में इस जग्गो या जागो वैवाहिक उत्सव का आरंभ जागो संध्या के दौरान, दूल्हा और दुल्हन (अपने परिवारों के साथ) अपने अलग-अलग घरों में इकट्ठा होते हैं और पूरी रात या कम से कम सुबह तक जागते थे। 

आधुनिक युग में भले ही मानव को हर किस्म की सुविधाएं उपलब्ध हो गई हों लेकिन आधुनिकता के बढ़ रहे प्रभाव ने पंजाब के अमीर विरसे जग्गो या जागो को एक बड़ी चुनौती दे डाली है। पंजाब की संस्कृति में भंगड़े, गिद्दे और गीत-संगीत को भले ही जैसे तैसे किसी भी रूप में फिलहाल संभाला हुआ हो, लेकिन वास्तव में बदलता माहौल पंजाबी संस्कृति के लिए घातक ही साबित होता दिखाई दे रहा है।

ऐसे ही प्रभाव से पीड़ित दिखाई दे रही है जागो की वो रस्म। इसके जरिए लोगों को जगाने का प्रयास होता था। किसी समय विवाह शादी के अवसर पर जागो का विशेष स्थान होता था। आज स्थिति यह है कि जागो के नाम से भी युवा पीढ़ी अंजान दिखाई दे रही है।

कोई समय होता था जब जागो को पंजाब में होने वाली शादियों के दौरान प्रेम-प्यार के इजहार का साधन माना जाता था। विवाह के अवसर पर आने वाली नानका मेल द्वारा निकाली गई जागो का एक अलग ही नजारा होता था। मामी व मौसियों द्वारा सिर पर टिकाई टोकनी (मटके जैसा बर्तन) पर दीप जलाकर मोहल्ले का चक्कर जगाना होता था।
जागो निकालते समय लोगों के साथ छोटे छोटे मजाक करना जागो के दृश्य को अति आनंदमय बना देते थे। जागो निकालते समय यदि किसी का कुछ नुकसान हो हो जाए तो वह उसकी शिकायत किसी से नहीं करता था।

अब जागो भूलती जा रही युवा पीढ़ी।

जागो निकालते समय जट्टा जाग बई हुन जागो आइआ, बल्ले बई हुन जागो आइआ, चुप कर बीबी मसां सवाइआ- लोरी दे दे पाइआ, बई हुन जागो आइआ और एहना नानकियां दी रड़े भंवीरी बोले आदि गीतों से जो माहौल बनता था उसकी मिसाल देना भी मुश्किल है। आजकल अगर कॉलेजों व स्कूलों में जागो के दर्शन भी करवाए जाते है तो सिर्फ खानपूर्ति के लिए। जबकि सच्चाई यह है कि हमारी युवा पीढ़ी को जागो की वास्तविकता तक की जानकारी नहीं है।

आज तो आर्केस्ट्रा ने किया जागो का प्रभाव धीमा

और धीरे-धीरे हमारे पर आरकेस्ट्रा के बढ़ रहे प्रभाव ने जागो के रूझान को धीमा कर दिया है। भले ही कुछ घर परिवारों में आज जागो को जिंदा रखने के लिए थोड़ा प्रयास हो रहा है लेकिन आधुनिकता की होड़ ने लोगों को जगाने वाली जागो को हमसे फिलहाल छीन ही लिया है।

आने वाले भविष्य में इस जागो को लुप्त होती विरासत के रूप में जाना जाएगा

आइये बात करते हैं जागो या जागो समारोह की जिसमें ननिहाल वाले परिवार बहुत धूमधाम से शादी स्थल पर पहुंचते हैं। वे गाते और नाचते भी हैं। महिला रिश्तेदार बारी-बारी से गागर (मोमबत्तियों से जलाया गया एक सजाया हुआ मिट्टी का बर्तन मिट्टी को सनातन परंपरा में शुद्ध गिना गया है और इसका पूजा में महत्व भी है बदलते समय के अनुसार मिट्टी की गागर का स्वरूप अब हल्का और धातु का हो गया है मोमबत्ती और दीपक की जगह आधुनिक चाइनीज लड़ियों ने ले ली है जिनको) लेकर महिला रिश्तेदार नाचती और गाती हैं। मिट्टी के बर्तन के साथ, लोग घंटियों से सजी एक सजी हुई छड़ी के साथ नृत्य करते हैं।

वैसे यह उत्सव ननिहाल पक्ष की ओर से आयोजित होता है।जिसे ननिहाल पक्ष विवाह वाले स्थल पर आकर आयोजित करवाता है।
क्यों कि  आपस में रहते रहते लोगों के आपसी मन मुटाव भी उत्पन हो गए होते है विवाह उत्सव पर उनको दूर कर एक करने की इस प्रक्रिया को ननिहाल पक्ष तीसरे पक्ष की भूमिका में उनके स्थान पर जागो के रूप में मनवाता है कि इनका सौहाद्र प्यार पुनः बना रहे और एक दूसरे के सुख दुख में शामिल होते रहें।इस उद्देश से जागो की रस्म ननिहाल पक्ष लेकर एकता करवाने की रस्म करता है।

पंजाबी विवाह जागो:
 एक परिवारिक पारंपरिक और रंगीन अनुष्ठान है

पंजाबी संस्कृति में विवाह एक महत्वपूर्ण और रंगीन अनुष्ठान है, जिसमें कई पारंपरिक रीति-रिवाज और रस्में शामिल हैं। इनमें से एक महत्वपूर्ण अनुष्ठान है जागो, जो विवाह के एक दिन पहले आयोजित किया जाता है और इसके आयोजक ननिहाल पक्ष के लोग भी प्रमुख होते है। इस लेख में, हम पंजाबी विवाह जागो के बारे में विस्तार से कहने का प्रयास कर रहे है।

जागो का अर्थ और महत्व

जागो का अर्थ है "जागरण" या "जगाना"। यह अनुष्ठान विवाह के एक दिन पहले आयोजित किया जाता है, जिसमें दूल्हे या दुल्हन और  उसके ननिहाल के परिवार के सदस्य और मित्र भाग लेते हैं। जागो का मुख्य उद्देश्य विवाह के लिए दूल्हे और दुल्हन को तैयार करना और उन्हें विवाह के लिए आशीर्वाद देना और पारिवारिक समाजिक एकता बनाए रखना होता है।

जागो की तैयारी

जागो की तैयारी में कई दिन लगते हैं। दूल्हे और दुल्हन के परिवार के सदस्य और मित्र इस अनुष्ठान के लिए विशेष रूप से तैयारी करते हैं। इसमें विशेष भोजन, पेय, और मिठाइयों की व्यवस्था की जाती है। साथ ही, जागो के लिए विशेष रूप से सजावट की जाती है, जिसमें रंगीन पताके, फूल, और अन्य सजावटी सामग्री का उपयोग किया जाता है।

जागो का अनुष्ठान

जागो का अनुष्ठान रात में आयोजित किया जाता है, जब दूल्हे और दुल्हन के परिवार के सदस्य और मित्र अपनी अपनी जगह पर एकत्रित होते हैं। इस अनुष्ठान में, दूल्हे और दुल्हन को उनके परिवार द्वारा विशेष रूप से सजाया जाता है, जिसमें उन्हें नए कपड़े, आभूषण, और अन्य सजावटी सामग्री पहनाई जाती है।

इसके बाद, दूल्हे और दुल्हन को विशेष रूप से उनके स्थानों पर आशीर्वाद दिया जाता है, जिसमें उन्हें विवाह के लिए शुभकामनाएं दी जाती हैं। साथ ही, इस अनुष्ठान में, विशेष रूप से गीत, नृत्य, और अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

जागो का महत्व

जागो का महत्व पंजाबी संस्कृति में बहुत अधिक है। यह अनुष्ठान विवाह के लिए दूल्हे और दुल्हन को तैयार करने और उन्हें आशीर्वाद देने के लिए आयोजित किया जाता है। साथ ही, यह अनुष्ठान पंजाबी संस्कृति की रंगीनता और जीवंतता को प्रदर्शित करता है।

निष्कर्ष

पंजाबी विवाह जागो एक महत्वपूर्ण और रंगीन अनुष्ठान है, जो विवाह के लिए दूल्हे और दुल्हन को तैयार करने के साथ साथ पारिवारिक ,सामाजिक मन मुटाव को मिटा कर दूल्हे दुल्हन को  आशीर्वाद देने के लिए दूल्हे या दुल्हन पक्ष द्वारा दूल्हे दुल्हन के स्थान पर आयोजित किया जाता है। यह अनुष्ठान पंजाबी संस्कृति की रंगीनता और जीवंतता को प्रदर्शित करता है और विवाह के लिए एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

सोमवार, 17 फ़रवरी 2025

विवाह बंधन के नियम

विवाह बंधन के नियम
नियम केवल मनुष्य जाती के लिए होते है।जानवरों के लिए कोई नियम नहीं होता।अतः मनुष्य जानवर ना बनते हुए नियमों का पालन जरूर कर मनुष्य ही बने रहे।

वर-वधू की प्रतिज्ञाएँ

किसी भी महत्त्वपूर्ण पद ग्रहण के साथ शपथ ग्रहण समारोह भी अनिवार्य रूप से जुड़ा रहता है। कन्यादान, पाणिग्रहण एवं ग्रन्थि-बन्धन हो जाने के साथ वर-वधू द्वारा और समाज द्वारा दाम्पत्य सूत्र में बँधने की स्वीकारोक्ति हो जाती है। इसके बाद अग्नि एवं देव-शक्तियों की साक्षी में दोनों को एक संयुक्त इकाई के रूप में ढालने का क्रम चलता है। इस बीच उन्हें अपने कर्त्तव्य धर्म का महत्त्व भली प्रकार समझना और उसके पालन का संकल्प लेना चाहिए। इस दिशा में पहली जिम्मेदारी वर की होती है। अस्तु, पहले वर तथा बाद में वधू को प्रतिज्ञाएँ कराई जाती हैं।

क्रिया और भावना-
वर-वधू स्वयं प्रतिज्ञाएँ पढ़ें, यदि सम्भव  हो, तो आचार्य एक-एक करके प्रतिज्ञाएँ व्याख्या सहित जरूर समझाएँ। क्यों कि इसी के अभाव में गृहस्थ जीवन नर्क भी बन जाता है।mudar sk द्वारा संकलित

वर की प्रतिज्ञाएँ
धमर्पत्नीं मिलित्वैव, ह्येकं जीवनामावयोः। अद्यारम्भ यतो में त्वम्, अर्द्धांगिनीति घोषिता 

आज से धमर्पत्नी को अर्द्धांगिनी घोषित करते हुए, उसके साथ अपने व्यक्तित्व को मिलाकर एक नये जीवन की सृष्टि करता हूँ। अपने शरीर के अंगों की तरह धमर्पतनी का ध्यान रखूँगा।

स्वीकरोमि सुखेन त्वां, गृहलक्ष्मीमहन्ततः। मन्त्रयित्वा विधास्यामि, सुकायार्णि त्वया सह 
प्रसन्नतापूर्वक गृहलक्ष्मी का महान अधिकार सौंपता हूँ और जीवन के निर्धारण में उनके परामर्श को महत्त्व दूँगा।

रूप-स्वास्थ्य-स्वभावान्तु, गुणदोषादीन् सवर्तः। रोगाज्ञान-विकारांश्च, तव विस्मृत्य चेतसः

 रूप, स्वास्थ्य, स्वभावगत गुण दोष एवं अज्ञानजनित विकारों को चित्त में नहीं रखूँगा, उनके कारण असन्तोष व्यक्त नहीं करूँगा। स्नेहपूर्वक सुधारने या सहन करते हुए आत्मीयता बनाये रखूँगा।

सहचरो भविष्यामि, पूणर्स्नेहः प्रदास्यते। सत्यता मम निष्ठा च, यस्याधारं भविष्यति

पत्नी का मित्र बनकर रहूँगा और पूरा-पूरा स्नेह देता रहूँगा। इस वचन का पालन पूरी निष्ठा और सत्य के आधार पर करूँगा।

यथा पवित्रचित्तेन, पातिव्रत्य त्वया धृतम्। तथैव पालयिष्यामि, पतनीव्रतमहं ध्रुवम्

पत्नी के लिए जिस प्रकार पतिव्रत की मर्यादा कही गयी है, उसी दृढ़ता से स्वयं पत्नीव्रत धर्म का पालन करूँगा। चिन्तन और आचरण दोनों से ही पर नारी से वासनात्मक सम्बन्ध नहीं जोडूँगा।

गृहस्याथर्व्यवस्थायां, मन्त्रयित्वा त्वया सह। संचालनं करिष्यामि, गृहस्थोचित-जीवनम्

गृह व्यवस्था में धर्म-पत्नी को प्रधानता दूँगा। आमदनी और खर्च का क्रम उसकी सहमति से करने की गृहस्थोचित जीवनचर्या अपनाऊँगा।

समृद्धि-सुख-शान्तीनां, रक्षणाय तथा तव। व्यवस्थां वै करिष्यामि, स्वशक्तिवैभवादिभि

धमर्पत्नी की सुख-शान्ति तथा प्रगति-सुरक्षा की व्यवस्था करने में अपनी शक्ति और साधन आदि को पूरी ईमानदारी से लगाता रहूँगा।

यतनशीलो भविष्यामि, सन्मागर्ंसेवितुं सदा। आवयोः मतभेदांश्च, दोषान्संशोध्य शान्तितः

अपनी ओर से मधुर भाषण और श्रेष्ठ व्यवहार बनाये रखने का पूरा-पूरा प्रयत्न करूँगा। मतभेदों और भूलों का सुधार शान्ति के साथ करूँगा। किसी के सामने पत्नी को लांछित-तिरस्कृत नहीं करूँगा।

भवत्यामसमथार्यां, विमुखायांच कमर्णि। विश्वासं सहयोगंच, मम प्राप्स्यसि त्वं सदा

 पत्नी के असमर्थ या अपने कर्त्तव्य से विमुख हो जाने पर भी अपने सहयोग और कर्त्तव्य पालन में रत्ती भर भी कमी न रखूँगा।
मुडार sk द्वारा संकलित

कन्या की प्रतिज्ञाएँ
स्वजीवनं मेलयित्वा, भवतः खलु जीवने। भूत्वा चाधार्ंगिनी नित्यं, निवत्स्यामि गृहे सदा

अपने जीवन को पति के साथ संयुक्त करके नये जीवन की सृष्टि करूँगी। इस प्रकार घर में हमेशा सच्चे अर्थों में अर्द्धांगिनी बनकर रहूँगी।

‍शिष्टतापूवर्कं सवैर्ः, परिवारजनैः सह। औदायेर्ण विधास्यामि, व्यवहारं च कोमलम्

पति के परिवार के परिजनों को एक ही शरीर के अंग मानकर सभी के साथ शिष्टता बरतूँगी, उदारतापूर्वक सेवा करूँगी, मधुर व्यवहार करूँगी।

त्यक्त्वालस्यं करिष्यामि, गृहकायेर् परिश्रमम्। भतुर्हर्षर्ं हि ज्ञास्यामि, स्वीयामेव प्रसन्नताम्

आलस्य को छोड़कर परिश्रमपूर्वक गृह कार्य करूँगी। इस प्रकार पति की प्रगति और जीवन विकास में समुचित योगदान करूँगी।

श्रद्धया पालयिष्यामि, धमर्ं पातिव्रतं परम्। सवर्दैवानुकूल्येन, पत्युरादेशपालिका

पतिव्रत धर्म का पालन करूँगी, पति के प्रति श्रद्धा-भाव बनाये रखकर सदैव उनके अनुकूल रहूँगी। कपट-दुराव न करूँगी, निर्देशों के अविलम्ब पालन का अभ्यास करूँगी।

सुश्रूषणपरा स्वच्छा, मधुर-प्रियभाषिणी। प्रतिजाने भविष्यामि, सततं सुखदायिनी

सेवा, स्वच्छता तथा प्रियभाषण का अभ्यास बनाये रखूँगी। ईर्ष्या, कुढ़न आदि दोषों से बचूँगी और सदा प्रसन्नता देने वाली बनकर रहूँगी।

‍मितव्ययेन गाहर्स्थ्य-संचालने हि नित्यदा। प्रयतिष्ये च सोत्साहं, तवाहमनुगामिननि

मितव्ययी बनकर फिजूलखर्ची से बचूँगी। पति के असमर्थ हो जाने पर भी गृहस्थ के अनुशासन का पालन करूँगी।

‍देवस्वरूपो नारीणां, भत्तार् भवति मानवः। मत्वेति त्वां भजिष्यामि, नियता जीवनावधिम्

नारी के लिए पति, देव स्वरूप होता है- यह मानकर मतभेद भुलाकर, सेवा करते हुए जीवन भर सक्रिय रहूँगी, कभी भी पति का अपमान न करूँगी।

पूज्यास्तव पितरो ये, श्रद्धया परमा हि मे। सेवया तोषयिष्यामि, तान्सदा विनयेन च

जो पति के पूज्य और श्रद्धा पात्र हैं, उन्हें सेवा द्वारा और विनय द्वारा सदैव सन्तुष्ट रखूँगी।

विकासाय सुसंस्कारैः, सूत्रैः सद्भाववद्धिर्भिः। परिवारसदस्यानां, कौशलं विकसाम्यहम्

परिवार के सदस्यों में सुसंस्कारों के विकास तथा उन्हें सद्भावना के सूत्रों में बाँधे रहने का कौशल अपने अन्दर विकसित करूँगी।
मुड़ार sk द्वारा आवश्यक निर्णायक संकलन अब

प्रायश्चित होम ध्यान देने योग्य

विवाह पूर्व जाने अनजाने होने वाली गलतियों से मुक्ति हेतु आवश्यक क्यों कि मनुष्य ही गलती का पुतला जो है 

गायत्री मन्त्र की आहुति के पश्चात् पाँच आहुतियाँ प्रायश्चित होम की अतिरिक्त रूप से दी जाती है। वर और कन्या दोनों के हाथ में हवन सामग्री दी जाती है। प्रायश्चित होम की आहुतियाँ देते समय यह भावना दोनों के मन में आनी चाहिए कि दाम्पत्य जीवन में बाधक जो भी कुसंस्कार अब तक मन में रहे हों, उन सब को स्वाहा किया जा रहा है। किसी से गृहस्थ के आदर्शों के उल्लंघन करने की कोई भूल हुई हो, तो उसे अब एक स्वप्न जैसी बात समझकर विस्मरण कर दिया जाए। इस प्रकार की भूल के कारण कोई किसी को न तो दोष दे, न सन्देह की दृष्टि से देखे। इसी प्रकार कोई अन्य नशेबाजी जैसा दुर्व्यसन रहा हो या स्वभाव में कठोरता, स्वार्थपरता, अहंकार जैसी कोई त्रुटि रही हो, तो उसका त्याग कर दिया जाए। साथ ही, उन भूलों का प्रायश्चित करते हुए भविष्य में कोई ऐसी भूल न करने का संकल्प भी करना है, जो दाम्पत्य जीवन की प्रगति में बाधा उत्पन्न करे।

क्रिया और भावना

वर-वधू हवन सामग्री से आहुति करें। भावना करें कि प्रायश्चित आहुति के साथ पूर्व दुष्कृत्यों की धुलाई हो रही है। स्वाहा के साथ आहुति डालें, इदं न मम के साथ हाथ जोड़कर नमस्कार करें।

अब विवाह कितने प्रकार का होता है यह भी जरूर जानलें।

1. ब्रह्म विवाह
दोनों पक्ष की सहमति से समान वर्ग के सुयोज्ञ वर से कन्या का विवाह निश्चित कर देना 'ब्रह्म विवाह' कहलाता है। सामान्यतः इस विवाह के बाद कन्या को आभूषणयुक्त करके विदा किया जाता है। आज का "व्यवस्था विवाह" 'ब्रह्म विवाह' का ही रूप है।

2. दैव विवाह
किसी सेवा कार्य (विशेषतः धार्मिक अनुष्ठान) के मूल्य के रूप अपनी कन्या को दान में दे देना 'दैव विवाह' कहलाता है।

3. आर्य विवाह
कन्या-पक्ष वालों को कन्या का मूल्य दे कर (सामान्यतः गोदान करके) कन्या से विवाह कर लेना 'आर्य विवाह' कहलाता है।

4. प्रजापत्य विवाह
कन्या की सहमति के बिना उसका विवाह अभिजात्य वर्ग के वर से कर देना 'प्रजापत्य विवाह' कहलाता है।

5. गंधर्व विवाह
इच्छायाऽन्योऽन्य संयोग: कन्यायाश्च वरस्य च ।

गान्धर्वस्य तु विज्ञेयो मैथुन्य: कामसम्भव: ।।

परिवार वालों की सहमति के बिना वर और कन्या काम वासना से प्रेरित होकर स्वेच्छा से मैथुन आदि कर के विवाह कर लेना 'गंधर्व विवाह' कहलाता है। दुष्यंत ने शकुन्तला से 'गंधर्व विवाह' किया था। उनके पुत्र भरत के नाम से ही हमारे देश का नाम "भारतवर्ष" बना।

6. असुर विवाह
कन्या को खरीद कर (आर्थिक रूप से) विवाह कर लेना 'असुर विवाह' कहलाता है।

7. राक्षस विवाह
कन्या की सहमति के बिना उसका अपहरण करके जबरदस्ती विवाह कर लेना 'राक्षस विवाह' कहलाता है।

8. पैशाच विवाह
कन्या की मदहोशी (गहन निद्रा, मानसिक दुर्बलता आदि) का लाभ उठा कर उससे शारीरिक सम्बंध बना लेना और उससे विवाह करना 'पैशाच विवाह' कहलाता है।

विवाह बंधन


आइए जानते है आखिर हिंदू विवाह संस्कार के बारे में भाग एक।
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विवाह, जिसे शादी भी कहा जाता है, दो लोगों के बीच एक सामाजिक या धार्मिक मान्यता प्राप्त मिलन है जो उन लोगों के बीच, साथ ही उनके और किसी भी परिणामी जैविक या दत्तक बच्चों तथा समधियों के बीच अधिकारों और दायित्वों को स्थापित करता है।

एक विवाह के समारोह को विवाह उत्सव (वेडिंग) कहते है।

विवाह मानव-समाज की अत्यंत महत्वपूर्ण प्रथा या समाजशास्त्रीय संस्था है। यह समाज का निर्माण करने वाली सबसे छोटी इकाई- परिवार-का मूल है। यह मानव प्रजाति के सातत्य को बनाए रखने का प्रधान जीवशास्त्री माध्यम भी है। और मर्दाना शहादत आदमी का और बलिदान भगवान सेंट जॉर्ज के अनुसार पैदा होना लिंग आदमी और औरत होगा। लिंग पुरुष और महिला और एक अवधारणा सार्वभौमिक दिव्य शाश्वत रसायन शास्त्र गूढ़ धनुर्विद्या धनुर्विद्या आदिम अमर पीढ़ियों से अनंत और विवाह से परे के लिए उत्पन्न किया जा सकता है जीवन का चक्र। विवाहांचे प्रकार अनुरूप विवाह अनुलोम विवाह : तथाकथित उच्च वर्ण का पुरुष और तथाकथित निम्न वर्ण की स्त्री का विवाह आंतरजातीय विवाह आंतरधर्मीय विवाह आर्ष विवाह आसुर विवाह एकपत्‍नीत्व) Monogamy कुंडली मिलाकर विवाह कोर्ट मॅरेज (सिव्हिल मॅरेज) (रजिस्टर्ड लग्न) गर्भावस्था में लग्न गांधर्व विवाह जरठ-कुमारी विवाह जरठ विवाह दैव विवाह (देव से लग्न) निकाह पाट पारंपरिक पद्धती का लग्न इसीको पुरानी पद्धती का लग्न कहते हैं। पालने में लग्न पिशाच्च विवाह पुनर्विवाह प्रतिलोम विवाह : तथाकथित निम्नजातीय वर्ण का पुरुष और तथाकथि उच्च वर्ण की स्त्री का विवाह. प्रजापत्य विवाह प्रेमविवाह बहुपत्‍नीत्व (Polygamy) बालविवाह ब्राह्म विवाह मांगलिक विवाह म्होतूर राक्षस विवाह विजोड विवाह विधवा विवाह वैदिक लग्न वैधानिक विवाह (कायदे अनुसार लग्न) सगोत्र सजातीय विवाह

विवाह और विवाह के शास्त्रीय उदाहरण

1. ब्रह्म विवाह ब्रह्म को जानने वाले व्यक्ति द्वारा ब्रह्म को प्राप्त व्यक्ति वर लिए ब्रह्म वादी हर तत्व में ब्रह्म ईश्वर देखता है । उसे अपनी कन्या लिए या उस कन्या द्वारा वर चुनने में दिक्कत होती है इसलिए इसमें वर योग्यता लिए स्वयमवकर में एक शर्त रख दी जाती है जो उसे पूर्ण करेगा वो विवाह करेगा । जैसे राजा जनक द्वारा सीता लिए योग्य वर हेतु विश्व समक्ष शिव धनुष पर प्रत्ययनजा चढाने की शर्त जो पूर्ण करे वो इसीका है वही इस लिए ईश्वर ब्रह्म है । अन्य उदाहरण द्रोपदी और अर्जुन का विवाह जिसमे मछली की आँख को तीर मार कर विवाह ।

2. दैव विवाह इसमे कन्या ही अपने योग्य वर को पसंद करती है संसार मे जो भी विवाह करना चाहे वो सामने आए यदि कन्या उसे अपने योग्य पाती है तो उसे वर माला गले मे डाल कर जगत से चुन लेती है । उदाहरण : विश्व मोहिनी और नारायण का विवाह, लक्मी और विष्णु का विवाह , शिव सती का विवाह फिर शिव पार्वती का विवाह । सावित्री का जंगल मे सत्यवान को चुन लेना फिर सावित्री और सत्यवान का विवाह ।

3. रमैनी (विवाह) यह विवाह असुर‌ निकंदन रमैनी से सम्पन्न होता है। जिसमें विश्व के सर्व देवी-देव तथा पूर्ण परमात्मा का आह्वान तथा स्तुति- प्रार्थना होती है। [1]यह विवाह लगभग 17 मिनट में सम्पन्न हो जाता है, जिसमें किसी भी प्रकार का ना तो दहेज दिया जाता और ना ही फिजूलखर्ची की जाती है। [2] इस तरह के विवाह कबीर पंथी तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज के शिष्यों के द्वारा किया जाता हैं। [3]इस विवाह को रमैनी भी कहा जाता है

4. आर्श विवाह कन्या-पक्ष वालों को कन्या का मूल्य दे कर (सामान्यतः गौदान करके दोनों के स्वेच्छा और बिना अन्य दबाव के) कन्या से विवाह कर लेना 'अर्श विवाह' कहलाता है। किसी सेवा कार्य या धार्मिक रूप से भले के मूल्य के रूप अपनी कन्या को दान में दे देना या कन्या और वर का आपसी सहमति से विवाह 'दैव विवाह' कहलाता है। किसी पर कृपा कर उनसे विवाह जैसे : श्री कृष्ण ने 16000 कन्या व स्त्रियों से विवाह किया जो नरकासुर की कैद में नरक तुल्य जीवन जी रही थी । श्री कृष्ण द्वारा एक किन्नर अर्यमा से विवाह, तिरुपति बालाजी और पद्मनी का विवाह जिसमे पद्मनी से विवाह करने बालाजी अपनी गायो और कुबेर से धन उद्धार लेकर पद्मनी के पिता को देते है ।

5. प्रजापत्य विवाह कन्या की सहमति के बिना उसका विवाह अभिजात्य वर्ग के वर से कर देना 'प्रजापत्य विवाह' कहलाता है। इसमे प्रजाति राजा या उस कन्या का पिता अपनी मर्जी के वर लेकर चुन कर कन्या का विवाह कर देता है । जैसे : कृष्ण और जामवंती का विवाह , कृष्ण और सत्यभामा का विवाह पोखरण के राजा बाबा रामदेव और मित्तल दे का विवाह

5. गंधर्व विवाह

गान्धर्वस्य तु विज्ञेयो मैथुन्य: कामसम्भव: ।।

परिवार वालों की सहमति के बिना वर और कन्याककाम वासना से प्रेरित होकर स्वेच्छा से मैथुन आदि कर के न्या विवाह कर लेना 'गंधर्व विवाह' कहलाता है। उदाहरण : भीम और हिडिम्बा का विवाह , सुभद्रा और अर्जुन का विवाह, राजा भरत के पिता राजा दुष्यन्त और शकुंतला का विवाह।

6. असुर विवाह कन्या को खरीद कर (आर्थिक रूप से कमजोर को दबा कर) विवाह कर लेना 'असुर विवाह' कहलाता है। जानवरो को धन आदि से जैसे खरीद कर उसका स्वामी बना जाता है जैसे:रावण का मन्दोदरी से विवाह, राजा शांतनु का सत्यवती से विवाह ।

7. राक्षस विवाह कन्या या वर की सहमति के बिना उसका अपहरण करके जबरदस्ती विवाह कर लेना 'राक्षस विवाह' कहलाता है। या उसके माता पिता को डरा , धमका , दबा बल प्रयोग कर बलात्कार आदि कारण विवाह ।

8. पैशाच विवाह

कन्या या पुरुष की मदहोशी (गहन निद्रा, मानसिक दुर्बलता आदि) का लाभ उठा कर उससे शारीरिक सम्बंध बना लेना , उसकी मजबूरी का फायदा उठा कर और उससे विवाह करना 'पैशाच विवाह' कहलाता है। इसमें कन्या या पुरुष के परिजनों की हत्या तक कर दी जाती है।
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सनातन धर्म में सद्गृहस्थ की, परिवार निर्माण की जिम्मेदारी उठाने के योग्य शारीरिक, मानसिक परिपक्वता आ जाने पर युवक-युवतियों का विवाह संस्कार कराया जाता है। भारतीय संस्कृति के अनुसार विवाह कोई शारीरिक या सामाजिक अनुबन्ध मात्र नहीं हैं, यहाँ दाम्पत्य को एक श्रेष्ठ आध्यात्मिक साधना का भी रूप दिया गया है। इसलिए कहा गया है 'धन्यो गृहस्थाश्रमः'। सद्गृहस्थ ही समाज को अनुकूल व्यवस्था एवं विकास में सहायक होने के साथ श्रेष्ठ नई पीढ़ी बनाने का भी कार्य करते हैं। वहीं अपने संसाधनों से ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ एवं सन्यास आश्रमों के साधकों को वांछित सहयोग देते रहते हैं। ऐसे सद्गृहस्थ बनाने के लिए विवाह को रूढ़ियों-कुरीतियों से मुक्त कराकर श्रेष्ठ संस्कार के रूप में पुनः प्रतिष्ठित करना आवश्यक है। युग निर्माण के अन्तर्गत विवाह संस्कार के पारिवारिक एवं सामूहिक प्रयोग सफल और उपयोगी सिद्ध हुए हैं।
विवाह दो आत्माओं का पवित्र बन्धन है। दो प्राणी अपने अलग-अलग अस्तित्वों को समाप्त कर एक सम्मिलित इकाई का निर्माण करते हैं। स्त्री और पुरुष दोनों में परमात्मा ने कुछ विशेषताएँ और कुछ अपूणर्ताएँ दे रखी हैं। विवाह सम्मिलन से एक-दूसरे की अपूर्णताओं को अपनी विशेषताओं से पूर्ण करते हैं, इससे समग्र व्यक्तित्व का निर्माण होता है। इसलिए विवाह को सामान्यतया मानव जीवन की एक आवश्यकता माना गया है। एक-दूसरे को अपनी योग्यताओं और भावनाओं का लाभ पहुँचाते हुए गाड़ी में लगे हुए दो पहियों की तरह प्रगति-पथ पर अग्रसर होते जाना विवाह का उद्देश्य है। वासना का दाम्पत्य-जीवन में अत्यन्त तुच्छ और गौण स्थान है, प्रधानतः दो आत्माओं के मिलने से उत्पन्न होने वाली उस महती शक्ति का निर्माण करना है, जो दोनों के लौकिक एवं आध्यात्मिक जीवन के विकास में सहायक सिद्ध हो सके।
आज विवाह वासना-प्रधान बनते चले जा रहे हैं। रंग, रूप एवं वेष-विन्यास के आकर्षण को पति-पत्नि के चुनाव में प्रधानता दी जाने लगी है, यह प्रवृत्ति बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। यदि लोग इसी तरह सोचते रहे, तो दाम्पत्य-जीवन शरीर प्रधान रहने से एक प्रकार के वैध-व्यभिचार का ही रूप धारण कर लेगा। पाश्चात्य जैसी स्थिति भारत में भी आ जायेगी। शारीरिक आकर्षण की न्यूनाधिकता का अवसर सामने आने पर विवाह जल्दी-जल्दी टूटते-बनते रहेंगे। अभी पत्नी का चुनाव शारीरिक आकर्षण का ध्यान में रखकर किये जाने की प्रथा चली है, थोड़े ही दिनों में इसकी प्रतिक्रिया पति के चुनाव में भी सामने आयेगी। तब असुन्दर पतियों को कोई पत्नी पसन्द न करेगी और उन्हें दाम्पत्य सुख से वंचित ही रहना पड़ेगा।

समय रहते इस बढ़ती हुई प्रवृत्ति को रोका जाना चाहिए और शारीरिक आकर्षण की उपेक्षा कर सद्गुणों तथा सद्भावनाओं को ही विवाह का आधार पूवर्काल की तरह बने रहने देना चाहिए। शरीर का नहीं आत्मा का सौन्दयर् देखा जाए और साथी में जो कमी है, उसे प्रेम, सहिष्णुता, आत्मीयता एवं विश्वास की छाया में जितना सम्भव हो सके, सुधारना चाहिए, जो सुधार न हो सके, उसे बिना असन्तोष लाये सहन करना चाहिए। इस रीति-नीति पर दाम्पत्य जीवन की सफलता निर्भर है। अतएव पति-पतनी को एक-दूसरे से आकर्षण लाभ मिलने की बात न सोचकर एक-दूसरे के प्रति आत्म-समपर्ण करने और सम्मिलित शक्ति उत्पन्न करने, उसके जीवन विकास की सम्भावनाएँ उत्पन्न करने की बात सोचनी चाहिए। चुनाव करते समय तक साथी को पसन्द करने न करने की छूट है। जो कुछ देखना, ढूँढ़ना, परखना हो, वह कार्य विवाह से पूर्व ही समाप्त कर लेना चाहिए। जब विवाह हो गया, तो फिर यह कहने की गुंजाइश नहीं रहती कि भूल हो गई, इसलिए साथी की उपेक्षा की जाए। जिस प्रकार के भी गुण-दोष युक्त साथी के साथ विवाह बन्धन में बँधें, उसे अपनी ओर से कर्त्तव्यपालन समझकर पूरा करना ही एक मात्र मार्ग रह जाता है। इसी के लिए विवाह संस्कार का आयोजन किया जाता है। समाज के सम्भ्रान्त व्यक्तियों की, गुरुजनों की, कुटुम्बी-सम्बन्धियों की, देवताओं की उपस्थिति इसीलिए इस धर्मानुष्ठान के अवसर पर आवश्यक मानी जाती है कि दोनों में से कोई इस कर्तव्य-बन्धन की उपेक्षा करे, तो उसे रोकें और प्रताड़ित करें।

पति-पत्नी इन सम्भ्रान्त व्यक्तियों के सम्मुख अपने निश्चय की, प्रतिज्ञा-बन्धन की घोषणा करते हैं। यह प्रतिज्ञा समारोह ही विवाह संस्कार है। इस अवसर पर दोनों की ही यह भावनाएँ गहराई तक अपने मन में जमानी चाहिए कि वे पृथक् व्यक्तियों की सत्ता समाप्त कर एकीकरण की आत्मीयता में विकसित होते हैं। कोई किसी पर न तो हुकूमत जमायेगा और न अपने अधीन-वशवर्ती रखकर अपने लाभ या अहंकार की पूर्ति करना चाहेगा। वरन् वह करेगा, जिससे साथी को सुविधा मिलती हो। दोनों अपनी इच्छा आवश्यकता को गौण और साथी की आवश्यकता को मुख्य मानकर सेवा और सहायता का भाव रखेंगे, उदारता एवं सहिष्णुता बरतेंगे, तभी गृहस्थी का रथ ठीक तरह आगे बढ़ेगा। इस तथ्य को दोनों भली प्रकार हृदयंगम कर लें और इसी रीति-नीति को आजीवन अपनाये रहने का व्रत धारण करें, इसी प्रयोजन के लिए यह पुण्य-संस्कार आयोजित किया जाता है। इस बात को दोनों भली प्रकार समझ लें और सच्चे मन से स्वीकार कर लें, तो ही विवाह-बन्धन में बँधें। विवाह संस्कार आरम्भ करने से पूर्व या विवाह वेदी पर बिठाकर दोनों को यह तथ्य भली प्रकार समझा दिया जाए और उनकी सहमति माँगी जाए। यदि दोनों इन आदर्शों को अपनाये रहने की हार्दिक सहमति-स्वीकृति दें, तो ही विवाह संस्कार आगे बढ़ाया जाए।
विवाह संस्कार में देव पूजन, यज्ञ आदि से सम्बन्धित सभी व्यवस्थाएँ पहले से बनाकर रखनी चाहिए। सामूहिक विवाह हो, तो प्रत्येक जोड़े के हिसाब से प्रत्येक वेदी पर आवश्यक सामग्री रहनी चाहिए, कर्मकाण्ड ठीक से होते चलें, इसके लिए प्रत्येक वेदी पर एक-एक जानकार व्यक्ति भी नियुक्त करना चाहिए। एक ही विवाह है, तो आचार्य स्वयं ही देख-रेख रख सकते हैं। सामान्य व्यवस्था के साथ जिन वस्तुओं की जरूरत विशेष कर्मकाण्ड में पड़ती है, उन पर प्रारम्भ में दृष्टि डाल लेनी चाहिए। उसके सूत्र इस प्रकार हैं।

वर सत्कार के लिए सामग्री के साथ एक थाली रहे, ताकि हाथ, पैर धोने की क्रिया में जल फैले नहीं। मधुपर्क पान के बाद हाथ धुलाकर उसे हटा दिया जाए। यज्ञोपवीत के लिए पीला रंगा हुआ यज्ञोपवीत एक जोड़ा रखा जाए, यज्ञोपवित जनेऊ कभी भी वस्त्र के ऊपर नहीं पहनाए, अत्यंत अशुभ होता है और वार को जनेऊके लघुशंका, दीर्घशंका के बाद उपयोग करनेकान पर तीन बार लपेटकर उपयोग और बाद में जनेऊ उतारने से पहले हाथ धोना, तीन बारकुल्ला और पैर धोना दोनों बताया जाए। विवाह घोषणा के लिए वर-वधू पक्ष की पूरी जानकारी पहले से ही नोट कर ली जाए। वस्त्रोपहार तथा पुष्पोपहार के वस्त्र एवं मालाएँ तैयार रहें। कन्यादान में हाथ पीले करने की हल्दी, गुप्तदान के लिए गुँथा हुआ आटा (लगभग एक पाव) रखें। ग्रन्थिबन्धन के लिए हल्दी, पुष्प, अक्षत, दुर्वा और द्रव्य हों। शिलारोहण के लिए पत्थर की शिला या समतल पत्थर का एक टुकड़ा रखा जाए। हवन सामग्री के अतिरिक्त लाजा (धान की खीलें) रखनी चाहिए। ‍वर-वधू के पद प्रक्षालन के लिए परात या थाली रखे जाए। पहले से वातावरण ऐसा बनाना चाहिए कि संस्कार के समय वर और कन्या पक्ष के अधिक से अधिक परिजन, स्नेही उपस्थित रहें। सबके भाव संयोग से कमर्काण्ड के उद्देश्य में रचनात्मक सहयोग मिलता है। इसके लिए व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों ही ढंग से आग्रह किए जा सकते हैं। विवाह के पूर्व यज्ञोपवीत संस्कार हो चुकता है। अविवाहितों को एक यज्ञोपवीत तथा विवाहितों को जोड़ा पहनाने का नियम है। यदि यज्ञोपवीत न हुआ हो, तो नया यज्ञोपवीत और हो गया हो, तो एक के स्थान पर जोड़ा पहनाने का संस्कार विधिवत् किया जाना चाहिए। ‍अच्छा हो कि जिस शुभ दिन को विवाह-संस्कार होना है, उस दिन प्रातःकाल यज्ञोपवीत धारण का क्रम व्यवस्थित ढंग से करा दिया जाए। विवाह-संस्कार के लिए सजे हुए वर के वस्त्र आदि उतरवाकर यज्ञोपवीत पहनाना अटपटा-सा लगता है। इसलिए उसको पहले ही पूरा कर लिया जाए। यदि वह सम्भव न हो, तो स्वागत के बाद यज्ञोपवीत धारण करा दिया जाता है। उसे वस्त्रों पर ही पहना देना चाहिए, जो संस्कार के बाद अन्दर कर लिया जाता है। जहाँ पारिवारिक स्तर के परम्परागत विवाह आयोजनों में मुख्य संस्कार से पूर्व द्वाराचार (द्वार पूजा) की रस्म होती है, वहाँ यदि हो-हल्ला के वातावरण को संस्कार के उपयुक्त बनाना चाहिए, तो स्वागत तथा वस्त्र एवं पुष्पोपहार वाले प्रकरण उस समय भी पूरे कराये जा सकते हैं ‍विशेष आसन पर बिठाकर वर का सत्कार किया जाए। फिर कन्या को बुलाकर परस्पर वस्त्र और पुष्पोपहार सम्पन्न कराये जाएँ। परम्परागत ढंग से दिये जाने वाले अभिनन्दन-पत्र आदि भी उसी अवसर पर दिये जा सकते हैं। इसके कमर्काण्ड का संकेत आगे किया गया है। ‍पारिवारिक स्तर पर सम्पन्न किये जाने वाले विवाह संस्कारों के समय कई बार वर-कन्या पक्ष वाले किन्हीं लौकिक रीतियों के लिए आग्रह करते हैं। यदि ऐसा आग्रह है, तो पहले से नोट कर लेना-समझ लेना चाहिए। पारिवारिक स्तर पर विवाह-प्रकरणों में वरेच्छा या बरीक्क्षा, तिलक (शादी पक्की करना), लगुन जिसमें दोनों पक्ष की लगन पत्रिका कुंडली और तीन पीढ़ी के कुल मुखिया का नाम लिया जाता है। लगुन में शास्त्र अनुसार पिता यथाशक्ति स्वेच्छा से कन्या के नए जीवन के परिवार के लिए भेंट अर्पित करता है। फिर हल्दी से शरीर के विभिन्न अंगों की शुद्धि रस्म होती है। कन्या हरिद्रा लेपन (हल्दी चढ़ाना) तथा द्वारपूजन होता हैं। मंडप बसोर समाज बांस से आम की पतली शाखाओं पत्तों से बनाता है। दामाद या बहनोई से मंडप के मध्य खंब लगाने पात्र में, पहले से पीपल के पास की निकाली गई शुद्ध मिट्टी भरवाए जाती और सम्मान नेग दिया जाता है। पारिवारिक नाई विवाह की रस्मे पंडितजी के साथ पूरी करवाता है। अन्य सामाजिक विधानों का भी निर्वाह किया जाता है।
विवाह से पूर्व 'तिलक' का संक्षिप्त विधान इस प्रकार है-

वर पूर्वाभिमुख तथा तिलक करने वाले (पिता, भाई आदि) पश्चिमाभिमुख बैठकर निम्नकृत्य सम्पन्न करें- मंगलाचरण, षट्कर्म, तिलक, कलावा, कलशपूजन, गुरुवन्दना, गौरी-गणेश पूजन, सर्वदेव नमस्कार, स्वस्तिवाचन आदि इसके बाद कन्यादाता वर का यथोचित स्वागत-सत्कार (पैर धुलाना, आचमन कराना तथा हल्दी से तिलक करके अक्षत लगाना) करें। ‍तदुपरान्त 'वर' को प्रदान की जाने वाली समस्त सामग्री (थाल-थान, फल-फूल, द्रव्य-वस्त्रादि) कन्यादाता हाथ में लेकर संकल्प मन्त्र बोलते हुए वर को प्रदान कर दें-

ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य, अद्य श्रीब्रह्मणो द्वितीये पर्राधे श्रीश्वेतवाराहकल्पे, वैवस्वतमन्वन्तरे, भूर्लोके, जम्बूद्वीपे, भारतर्वषे, भरतखण्डे, आर्यावर्त्तैकदेशान्तर्गते, .......... क्षेत्रे, .......... विक्रमाब्दे .......... संवत्सरे .......... मासानां मासोत्तमेमासे .......... मासे .......... पक्षे .......... तिथौ .......... वासरे .......... गोत्रोत्पन्नः ............(कन्यादाता) नामाऽहं ...............(कन्या-नाम) नाम्न्या कन्यायाः (भगिन्याः) करिष्यमाण उद्वाहकमर्णि एभिवर्रणद्रव्यैः ...............(वर का गोत्र) गोत्रोत्पन्नं ...............(वर का नाम) नामानं वरं कन्यादानार्थं वरपूजनपूर्वकं त्वामहं वृणे, तन्निमित्तकं यथाशक्ति भाण्डानि, वस्त्राणि, फलमिष्टान्नानि द्रव्याणि च...............(वर का नाम) वराय समपर्ये।

तत्पश्चात् क्षमा प्राथर्ना, नमस्कार, विसजर्न तथा शान्ति पाठ करते हुए कार्यक्रम समाप्त करें।

विवाह से पूर्व वर-कन्या के प्रायः हल्दी चढ़ाने का प्रचलन है, उसका संक्षिप्त विधान इस प्रकार है- सवर्प्रथम षट्कर्म, तिलक, कलावा, कलशपूजन, गुरुवन्दना, गौरी-गणेश पूजन, सर्वदेवनमस्कार, स्वस्तिवाचन करें। तत्पश्चात् निम्न मंत्र बोलते हुए वर/कन्या की हथेली- अंग-अवयवों में (लोकरीति के अनुसार) हरिद्रालेपन करें-

ॐ काण्डात् काण्डात्प्ररोहन्ती, परुषः परुषस्परि। एवा नो दूवेर् प्र तनु, सहस्त्रेण शतेन च॥ -१३.२०

इसके बाद वर के दाहिने हाथ में तथा कन्या के बायें हाथ में रक्षा सूत्रकंकण (पीले वस्त्र में कौड़ी, लोहे की अँगूठी, पीली सरसों, पीला अक्षत आदि बाँधकर बनाया गया।) निम्नलिखित मन्त्र से पहनाएँ-

ॐ यदाबध्नन्दाक्षायणा, हिरण्य शतानीकाय, सुमनस्यमानाः। तन्मऽआबध्नामि शतशारदाय, आयुष्मांजरदष्टियर्थासम्॥ -३४.५२

तत्पश्चात् क्षमा प्राथर्ना, नमस्कार, विसजर्न, शान्तिपाठ के साथ कायर्क्रम पूर्ण करें।
विवाह हेतु बारात जब द्वार पर आती है, तो सर्वप्रथम 'वर' का स्वागत-सत्कार किया जाता है, जिसका क्रम इस प्रकार है- 'वर' के द्वार पर आते ही आरती की प्रथा हो, तो कन्या की माता आरती कर लें। तत्पश्चात् 'वर' और कन्यादाता परस्पर अभिमुख बैठकर षट्कर्म, कलावा, तिलक, कलशपूजन, गुरुवन्दना, गौरी-गणेश पूजन, सर्वदेवनमस्कार, स्वस्तिवाचन करें। इसके बाद कन्यादाता वर सत्कार के सभी कृत्य आसन, अर्घ्य, पाद्य, आचमन, मधुपर्क आदि (विवाह संस्कार से) सम्पन्न कराएँ। तत्पश्चात्

ॐ गन्धद्वारां दुराधर्षां........... (पृ० .....) से तिलक लगाएँ तथा

ॐ अक्षन्नमीमदन्त ...... (पृ० ....) से अक्षत लगाएँ।

माल्यार्पण एवं कुछ द्रव्य 'वर' को प्रदान करना हो, तो निम्नस्थ मन्त्रों से सम्पन्न करा दें-

माल्यापर्ण मन्त्र-

ॐ मंगलं भगवान विष्णुः ............ (पृ०...)

द्रव्यदान मन्त्र -

ॐ हिरण्यगर्भः समवत्तर्ताग्रे ......... (पृ०...)

तत्पश्चात् क्षमाप्रार्थना, नमस्कार, देवविसर्जन एवं शान्तिपाठ करें।

❤️विवाह संस्कार का विशेष कमर्काण्ड ❤️

विवाह वेदी पर वर और कन्या दोनों को बुलाया जाए, प्रवेश के साथ मंगलाचरण 'भद्रं कणेर्भिः.......' मन्त्र बोलते हुए उन पर पुष्पाक्षत डाले जाएँ। कन्या दायीं ओर तथा वर बायीं ओर बैठे। कन्यादान करने वाले प्रतिनिधि कन्या के पिता, भाई जो भी हों, उन्हें पत्नी सहित कन्या की ओर बिठाया जाए। पत्नी दाहिने और पति बायीं ओर बैठें। सभी के सामने आचमनी, पंचपात्र आदि उपकरण हों। पवित्रीकरण, आचमन, शिखा-वन्दन, प्राणायाम, न्यास, पृथ्वी-पूजन आदि षट्कर्म सम्पन्न करा लिये जाएँ। वर-सत्कार- (अलग से द्वार पूजा में वर सत्कार कृत्य हो चुका हो, तो दुबारा करने की आवश्यकता नहीं है।) अतिथि रूप में आये हुए वर का सत्कार किया जाए। (१) आसन (२) पाद्य (३) अर्ध्य (४) आचमन, टीका माल्यार्पण (५) नैवेद्य पान आदि निर्धारित मन्त्रों से समपिर्त किए जाएँ। कलश पूजन खंब में 33 कोटि अर्थात 33 प्रकार के

दिशा और प्रेरणा वर का अतिथि के नाते सत्कार किया जाता है। गृहस्थाश्रम में गृहलक्ष्मी का महत्त्व सवोर्परि होता है। उसे लेने वर एवं उसके हितैषी परिजन कन्या के पिता के पास चल कर आते हैं। श्रेष्ठ उद्देश्य से सद्भावनापूर्वक आये अतिथियों का स्वागत करना कन्या पक्ष का कर्तव्य हो जाता है। दोनों पक्षों को अपने-अपने इन सद्भावों को जाग्रत् रखना चाहिए।

वर का अर्थ होता है- श्रेष्ठ, स्वीकार करने योग्य समान वर्णाशम का पुरुष। कन्या-पक्ष वर को अपनी कन्या के अनुरूप श्रेष्ठ व्यक्ति मानकर ही सम्बन्ध स्वीकार करें, उसी भाव से श्रेष्ठ भाव रखते हुए सत्कार करें और भगवान से प्रार्थना करें कि यह भाव सदा बनाये रखने में सहायता करें।
वर पक्ष सम्मान पाकर निरर्थक अहं न बढ़ाएँ। जिन मानवीय गुणों के कारण श्रेष्ठ मानकर वर का सत्कार करने की व्यवस्था ऋषियों ने बनाई है, उन शालीनता, जिम्मेदारी, आत्मीयता, सहकारिता जैसे गुणों को इतना जीवन्त बनाकर रखें कि कन्या पक्ष की सहज श्रद्धा उसके प्रति उमड़ती ही रहे।
दहेज, चढ़ावा आदि के नाम पर यदि एक-दूसरे पर दबाव डाले जाते हैं, तो सद्भाव तो समाप्त हो जाती है, स्वेच्छा से वधु का पिता आभूषण श्रृंगार पहनाकर उत्तम वस्त्र रसोई पलंग बर्तन इत्यादि जीवन यापन के प्रथम चरण के आवश्यक सामानों के साथ विवाह संस्कार संपन्न करता है जो पुत्री का स्त्री धन होता है।
निम्न मन्त्र बोलें- ॐ साधु भवान् आस्ताम्। अचर्यिष्यामो भवन्तम्। -पार०गृ० १.३1४

वर दाहिने हाथ में अक्षत स्वीकार करते हुए भावना करें कि स्वागतकत्तार् की श्रद्धा पाते रहने के योग्य व्यक्तित्व बनाये रखने का उत्तरदायित्व स्वीकार कर रहे हैं। बोलें- 'ॐ अचर्य।' आसन- स्वागतकत्तार् आसन या उसका प्रतीक (कुश या पुष्प आदि) हाथ में लेकर निम्न मन्त्र बोलें। भावना करें कि कन्या स्वीकार करने वाले वर को श्रेष्ठता का आधार-स्तर प्राप्त हो। हमारे स्नेह में उसका स्थान बने। ॐ विष्टरो, विष्टरो, विष्टरः प्रतिगृह्यताम्। -पार०गृ०सू० १.३.६ वर, कन्या के पिता के हाथ से विष्टर (कुश या पुष्प आदि) लेकर कहें- ॐ प्रतिगृह्णामि। - पार०गृ०सू० १.३.७ उसे बिछाकर बैठ जाए, इस क्रिया के साथ निम्न मन्त्र बोला जाए- ॐ वष्मोर्ऽस्मि समानानामुद्यतामिव सूयर्ः। इमन्तमभितिष्ठामि, यो मा कश्चाभिदासति॥ - पार०गृ०सू० १.३.८ पाद्य- स्वागतकत्तार् पैर धोने के लिए छोटे पात्र में जल लें। भावना करें कि ऋषियों के आदर्शों के अनुरूप सद्गृहस्थ बनने की दिशा में बढ़ने वाले पैर पूजनीय हैं। कन्यादाता कहें- ॐ पाद्यं, पाद्यं, पाद्यं, प्रतिगृह्यताम्। - पार०गृ०सू०१.३.६ वर कहें- ॐ प्रतिगृह्णामि। - पार०गृ०सू०१.३.७ भावना करें कि आदर्शों की दिशा में चरण बढ़ाने की उमंग इष्टदेव बनाये रखें। पद प्रक्षालन की क्रिया के साथ यह मन्त्र बोला जाए। ॐ विराजो दोहोऽसि, विराजो दोहमशीय मयि, पाद्यायै विराजो दोहः। - पार०गृ०सू० १.३.१२

अर्घ्य- स्वागतकत्तार् चन्दन युक्त सुगन्धित जल पात्र में लेकर भावना करे कि सत्पुरुषाथर् में लगने का संस्कार वर के हाथों में जाग्रत् करने हेतु अघ्यर् दे रहे हैं। कन्यादाता कहे- ॐ अर्घो, अर्घो, अर्घः प्रतिगृह्यताम्। - पार०गृ०सू०१.३.६

जल पात्र स्वीकार करते हुए वर कहे- ॐ प्रतिगृह्णामि। - पार०गृ०सू०१.३.७ भावना करें कि सुगन्धित जल सत्पुरुषार्थ के संस्कार दे रहा है। जल से हाथ धोएँ। क्रिया के साथ निम्न मन्त्र बोला जाए।

ॐ आपःस्थ युष्माभिः, सवार्न्कामानवाप्नवानि। ॐ समुद्रं वः प्रहिणोमि, स्वां योनिमभिगच्छत। अरिष्टाअस्माकं वीरा, मा परासेचि मत्पयः। - पार०गृ०सू० १.३.१३-१४

आचमन- स्वागतकत्तार् आचमन के लिए जल पात्र प्रस्तुत करें। भावना करें कि वर-श्रेष्ठ अतिथि का मुख उज्ज्वल रहे, उसकी वाणी उसका व्यक्तित्व तदनुरूप बने। कन्यादाता कहे- ॐ आचमनीयम्, आचमीयनम्, आचमीनयम्, प्रतिगृह्यताम्॥ ॐ प्रतिगृह्णामि। (वर कहे) -पार०गृ०सू० १.३.६ भावना करें कि मन, बुद्धि और अन्तःकरण तक यह भाव बिठाने का प्रयास कर रहे हैं। तीन बार आचमन करें। यह मन्त्र बोला जाए। ॐ आमागन् यशसा, स सृज वचर्सा। तं मा कुरु प्रियं प्रजानामधिपतिं, पशूनामरिष्टिं तनूनाम्। - पार०गृ०सू० १.३.१५

नैवेद्य- एक पात्र में दूध, दही, शकर्रा (मधु) और तुलसीदल डाल कर रखें। स्वागतकर्त्ता वह पात्र हाथ में लें। भावना करें कि वर की श्रेष्ठता बनाये रखने योग्य सात्विक, सुसंस्कारी और स्वास्थ्यवर्धक आहार उन्हें सतत प्राप्त होता रहे। कन्यादाता कहे- ॐ मधुपकोर्, मधुपकोर्, मधुपर्कः प्रतिगृह्यताम्। - पार०गृ०सू० १.३.६ वर पात्र स्वीकार करते हुए कहे- ॐ प्रतिगृह्णामि। वर मधुपर्क का पान करे। भावना करें कि अभक्ष्य के कुसंस्कारों से बचने, सत्पदार्थों से सुसंस्कार अर्जित करते रहने का उत्तरदायित्व स्वीकार रहे हैं। पान करते समय यह मन्त्र बोला जाए। ॐ यन्मधुनो मधव्यं परम रूपमन्नाद्यम्। तेनाहं मधुनो मधव्येन परमेण, रूपेणान्नाद्येन परमो मधव्योऽन्नादोऽसानि।- पार०गृ०सू० १.३.२०

तत्पश्चात् जल से वर हाथ-मुख धोए। स्वच्छ होकर अगले क्रम के लिए बैठे। इसके बाद चन्दन धारण कराएँ। यदि यज्ञोपवीत धारण पहले नहीं कराया गया है, तो यज्ञोपवीत प्रकरण के आधार पर संक्षेप में उसे सम्पन्न कराया जाए। इसके बाद क्रमशः कलशपूजन, नमस्कार, षोडशोपचार पूजन, स्वस्तिवाचन, रक्षाविधान आदि सामान्य क्रम करा लिए जाएँ। रक्षा-विधान के बाद संस्कार का विशेष प्रकरण चालू किया जाए।

❤️विवाह घोषणा❤️

विवाह घोषणा की एक छोटी-सी संस्कृत भाषा की शब्दावली है, जिसमें वर-कन्या के गोत्र पिता-पितामह आदि का उल्लेख और घोषणा है कि यह दोनों अब विवाह सम्बन्ध में आबद्ध होते हैं। इनका साहचर्य धर्म-संगत जन साधारण की जानकारी में घोषित किया हुआ माना जाए। बिना घोषणा के गुपचुप चलने वाले दाम्पत्य स्तर के प्रेम सम्बन्ध, नैतिक, धार्मिक एवं कानूनी दृष्टि से अवांछनीय माने गये हैं। जिनके बीच दाम्पत्य सम्बन्ध हो, उसकी घोषणा सर्वसाधारण के समक्ष की जानी चाहिए। समाज की जानकारी से जो छिपाया जा रहा हो, वही व्यभिचार है। घोषणापूर्वक विवाह सम्बन्ध में आबद्ध होकर वर-कन्या धर्म परम्परा का पालन करते हैं।

स्वस्ति श्रीमन्नन्दनन्दन चरणकमल भक्ति सद् विद्या विनीतनिजकुलकमलकलिकाप्रकाशनैकभास्कार सदाचार सच्चरित्र सत्कुल सत्प्रतिष्ठा गरिष्ठस्य .........गोत्रस्य ........ महोदयस्य प्रपौत्रः .......... महोदयस्य पौत्र.......... महोदयस्य पुत्रः॥ ....... महोदयस्य प्रपौत्री, ........ महोदयस्य पौत्री .........महोदयस्य पुत्री प्रयतपाणिः शरणं प्रपद्ये। स्वस्ति संवादेषूभयोवृर्द्धिवर्रकन्ययोश्चिरंजीविनौ भूयास्ताम्।

❤️मंगलाष्टक ❤️

विवाह घोषणा के बाद, सस्वर मंगलाष्टक मन्त्र बोलें जाएँ। इन मन्त्रों में सभी श्रेष्ठ शक्तियों से मंगलमय वातावरण, मंगलमय भविष्य के निर्माण की प्रार्थना की जाती है। पाठ के समय सभी लोग भावनापूर्वक वर-वधू के लिए मंगल कामना करते रहें। एक स्वयं सेवक उनके ऊपर पुष्पों की वर्षा करता रहे।

ॐमत्पंकजविष्टरो हरिहरौ, वायुमर्हेन्द्रोऽनलः। चन्द्रो भास्कर वित्तपाल वरुण, प्रताधिपादिग्रहाः। प्रद्यम्नो नलकूबरौ सुरगजः, चिन्तामणिः कौस्तुभः, स्वामी शक्तिधरश्च लांगलधरः, कुवर्न्तु वो मंगलम्॥१॥

गंगा गोमतिगोपतिगर्णपतिः, गोविन्दगोवधर्नौ, गीता गोमयगोरजौ गिरिसुता, गंगाधरो गौतमः। गायत्री गरुडो गदाधरगया, गम्भीरगोदावरी, गन्धवर्ग्रहगोपगोकुलधराः, कुवर्न्तु वो मंगलम्॥२॥

नेत्राणां त्रितयं महत्पशुपतेः अग्नेस्तु पादत्रयं, तत्तद्विष्णुपदत्रयं त्रिभुवने, ख्यातं च रामत्रयम्। गंगावाहपथत्रयं सुविमलं, वेदत्रयं ब्राह्मणम्, संध्यानां त्रितयं द्विजैरभिमतं, कुवर्न्तु वो मंगलम्॥३॥

बाल्मीकिः सनकः सनन्दनमुनिः, व्यासोवसिष्ठो भृगुः, जाबालिजर्मदग्निरत्रिजनकौ, गर्गोऽ गिरा गौतमः। मान्धाता भरतो नृपश्च सगरो, धन्यो दिलीपो नलः, पुण्यो धमर्सुतो ययातिनहुषौ, कुवर्न्तु वो मंगलम्॥४॥

गौरी श्रीकुलदेवता च सुभगा, कद्रूसुपणार्शिवाः, सावित्री च सरस्वती च सुरभिः, सत्यव्रतारुन्धती। स्वाहा जाम्बवती च रुक्मभगिनी, दुःस्वप्नविध्वंसिनी, वेला चाम्बुनिधेः समीनमकरा, कुवर्न्तु वो मंगलम्॥५॥

गंगा सिन्धु सरस्वती च यमुना, गोदावरी नमर्दा, कावेरी सरयू महेन्द्रतनया, चमर्ण्वती वेदिका। शिप्रा वेत्रवती महासुरनदी, ख्याता च या गण्डकी, पूर्णाः पुण्यजलैः समुद्रसहिताः, कुवर्न्तु वो मंगलम्॥६॥

लक्ष्मीः कौस्तुभपारिजातकसुरा, धन्वन्तरिश्चन्द्रमा, गावः कामदुघाः सुरेश्वरगजो, रम्भादिदेवांगनाः। अश्वः सप्तमुखः सुधा हरिधनुः, शंखो विषं चाम्बुधे, रतनानीति चतुदर्श प्रतिदिनं, कुवर्न्तु वो मंगलम्॥७॥

ब्रह्मा वेदपतिः शिवः पशुपतिः, सूयोर् ग्रहाणां पतिः, शुक्रो देवपतिनर्लो नरपतिः, स्कन्दश्च सेनापतिः। विष्णुयर्ज्ञपतियर्मः पितृपतिः, तारापतिश्चन्द्रमा, इत्येते पतयस्सुपणर्सहिताः, कुवर्न्तु वो मंगलम्॥८॥

❤️परस्पर उपहार ❤️

वर पक्ष की ओर से कन्या को और कन्या पक्ष की ओर से वर का वस्त्र-आभूषण भेंट किये जाने की परम्परा है। यह कार्य श्रद्धानुरूप पहले ही हो जाता है। वर-वधू उन्हें पहनाकर ही संस्कार में बैठते हैं। यहाँ प्रतीक रूप से पीले दुपट्टे एक-दूसरे को भेंट किये जाएँ। यही ग्रन्थि बन्धन के भी काम आ जाते हैं। आभूषण पहनाना हो, तो अँगूठी या मंगलसूत्र जैसे शुभ-चिह्नों तक ही सीमित रहना चाहिए। दोनों पक्ष भावना करें कि एक-दूसरे का सम्मान बढ़ाने, उन्हें अलंकृत करने का उत्तरदायित्व समझने और निभाने के लिए संकल्पित हो रहे हैं। नीचे लिखे मन्त्र के साथ परस्पर उपहार दिये जाएँ।

ॐ परिधास्यै यशोधास्यै, दीघार्युत्वाय जरदष्टिरस्मि। शतं च जीवामि शरदः, पुरूचीरायस्पोषमभि संव्ययिष्ये। - पार०गृ०सू० २.६.२०

पुष्पोहार (माल्यार्पण) वर-वधू एक-दूसरे को अपने अनुरूप स्वीकार करते हुए, पुष्प मालाएँ अर्पित करते हैं। हृदय से वरण करते हैं। भावना करें कि देव शक्तियों और सत्पुरुषों के आशीर्वाद से वे परस्पर एक दूसरे के गले के हार बनकर रहेंगे। मन्त्रोच्चार के साथ पहले कन्या वर को फिर वर-कन्या को माला पहनाएँ।

ॐ यशसा माद्यावापृथिवी, यशसेन्द्रा बृहस्पती। यशो भगश्च मा विदद्, यशो मा प्रतिपद्यताम्। - पार०गृ०सू० २.६.२१, मा०गृ०सू० १.९.२७

❤️हस्तपीतकरण ❤️

शिक्षा एवं प्रेरणा
कन्यादान करने वाले कन्या के हाथों में हल्दी लगाते हैं। हरिद्रा मंगलसूचक है। अब तक बालिका के रूप में यह लड़की रही। अब यह गृहलक्ष्मी का उत्तरदायित्व वहन करेगी, इसलिए उसके हाथों को पीतवर्ण-मंगलमय बनाया जाता है। उसके माता-पिता ने लाड़-प्यार से पाला, उसके हाथों में कोई कठोर कर्तव्य नहीं सौंपा। अब उसे अपने हाथों को नव-निमार्ण के अनेक उत्तरदायित्व सँभालने को तैयार करना है, अतएव उन्हें पीतवर्ण मांगलिक-लक्ष्मी का प्रतीक-सृजनात्मक होना चाहिए। पीले हाथ करते हुए कन्या परिवार के लोग उस बालिका को यही मौन शिक्षण देते हैं कि उसे आगे सृजन शक्ति के रूप में प्रकट होना है और इसके लिए इन कोमल हाथों को अधिक उत्तरदायी, मजबूत और मांगलिक बनाना है।

क्रिया और भावना
कन्या दोनों हथेलियाँ सामने कर दे। कन्यादाता गीली हल्दी उस पर मन्त्र के साथ मलें। भावना करें कि देव सान्निध्य में इन हाथों को स्वार्थपरता के कुसंस्कारों से मुक्त कराते हुए त्याग परमार्थ के संस्कार जाग्रत् किये जा रहे हैं।

ॐ अहिरिव भोगैः पयेर्ति बाहंु, ज्याया हेतिं परिबाधमानः। हस्तघ्नो विश्वा वयुनानि विद्वान्, पुमान् पुमा सं परिपातु विश्वतः। -२९.५१

शिक्षा एवं प्रेरणा

❤️कन्या दान ❤️

कन्यादान का अर्थ
कन्यादान का अर्थ है, अभिभावकों के उत्तरदायित्वों का वर के ऊपर, ससुराल वालों के ऊपर स्थानान्तरण होना। अब तक माता-पिता कन्या के भरण-पोषण, विकास, सुरक्षा, सुख-शान्ति, आनन्द-उल्लास आदि का प्रबंध करते थे, अब वह प्रबन्ध वर और उसके कुटुम्बियों को करना होगा। कन्या नये घर में जाकर वीरानेपन का अनुभव न करने पाये, उसे स्नेह, सहयोग, सद्भाव की कमी अनुभव न हो, इसका पूरा ध्यान रखना होगा। कन्यादान स्वीकार करते समय-पाणिग्रहण की जिम्मेदारी स्वीकार करते समय, वर तथा उसके अभिभावकों को यह बात भली प्रकार अनुभव कर लेनी चाहिए कि उन्हें उस उत्तरदायित्व को पूरी जिम्मेदारी के साथ निबाहना है। कन्यादान का अर्थ यह नहीं कि जिस प्रकार कोई सम्पत्ति, किसी को बेची या दान कर दी जाती है, उसी प्रकार लड़की को भी एक सम्पत्ति समझकर किसी न किसी को चाहे जो उपयोग करने के लिए दे दिया है। हर मनुष्य की एक स्वतन्त्र सत्ता एवं स्थिति है। कोई मनुष्य किसी मनुष्य को बेच या दान नहीं कर सकता। फिर चाहे वह पिता ही क्यों न हो। व्यक्ति के स्वतन्त्र अस्तित्व एवं अधिकार से इनकार नहीं किया जा सकता, न उसे चुनौती दी जा सकती है। लड़की हो या लड़का अभिभावकों को यह अधिकार नहीं कि वे उन्हें बेचें या दान करें। ऐसा करना तो बच्चे के स्वतन्त्र व्यक्तित्व के तथ्य को ही झुठलाना हो जाएगा।

विवाह उभयपक्षीय समझौता है, जिसे वर और वधू दोनों ही पूरी ईमानदारी और निष्ठा के साथ निर्वाह कर सफल बनाते हैं। यदि कोई किसी को खरीदी या बेची सम्पत्ति के रूप में देखें और उस पर पशुओं जैसा स्वामित्व अनुभव करें या व्यवहार करें, तो यह मानवता के मूलभूत अधिकारों का हनन करना ही होगा। कन्यादान का यह तात्पर्य कदापि नहीं, उसका प्रयोजन इतना ही है कि कन्या के अभिभावक बालिका के जीवन को सुव्यवस्थित, सुविकसित एवं सुख-शान्तिमय बनाने की जिम्मेदारी को वर तथा उसके अभिभावकों पर छोड़ते हैं, जिसे उन्हें मनोयोगपूर्वक निबाहना चाहिए। पराये घर में पहुँचने पर कच्ची उम्र की अनुभवहीन भावुक बालिका को अखरने वाली मनोदशा में होकर गुजरना पड़ता है। इसलिए इस आरम्भिक सन्धिबेला में तो विशेष रूप से वर पक्ष वालों को यह प्रयास करना चाहिए कि हर दृष्टि से वधू को अधिक स्नेह, सहयोग मिलता रहे। कन्या पक्ष वालों को भी यह नहीं सोच लेना चाहिए कि लड़की के पीले हाथ कर दिये, कन्यादान हो गया, अब तो उन्हें कुछ भी करना या सोचना नहीं है। उन्हें भी लड़की के भविष्य को उज्ज्वल बनाने में योगदान देते रहना है। क्रिया और भावना- कन्या के हाथ हल्दी से पीले करके माता-पिता अपने हाथ में कन्या के हाथ, गुप्तदान का धन और पुष्प रखकर संकल्प बोलते हैं और उन हाथों को वर के हाथों में सौंप देते हैं। वह इन हाथों को गंभीरता और जिम्मेदारी के साथ अपने हाथों को पकड़कर स्वीकार-शिरोधार्य करता है। भावना करें कि कन्या वर को सौंपते हुए उसके अभिभावक अपने समग्र अधिकार को सौंपते हैं। कन्या के कुल गोत्र अब पितृ परम्परा से नहीं, पति परम्परा के अनुसार होंगे। कन्या को यह भावनात्मक पुरुषार्थ करने तथा पति को उसे स्वीकार करने या निभाने की शक्ति देवशक्तियाँ प्रदान कर रही हैं। इस भावना के साथ कन्यादान का संकल्प बोला जाए। संकल्प पूरा होने पर संकल्पकर्ता कन्या के हाथ वर के हाथ में सौंप दें।

अद्येति.........नामाहं.........नाम्नीम् इमां कन्यां/भगिनीं सुस्नातां यथाशक्ति अलंकृतां, गन्धादि - अचिर्तां, वस्रयुगच्छन्नां, प्रजापति दैवत्यां, शतगुणीकृत, ज्योतिष्टोम-अतिरात्र-शतफल-प्राप्तिकामोऽहं ......... नाम्ने, विष्णुरूपिणे वराय, भरण-पोषण-आच्छादन-पालनादीनां, स्वकीय उत्तरदायित्व-भारम्, अखिलं अद्य तव पतनीत्वेन, तुभ्यं अहं सम्प्रददे। वर उन्हें स्वीकार करते हुए कहें- ॐ स्वस्ति।

गुप्तदान
कन्यादान के समय कुछ अंशदान देने की प्रथा है। आटे की लोई में छिपाकर कुछ धन कन्यादान के समय दिया जाता है। दहेज का यही स्वरूप है। बच्ची के घर से विदा होते समय उसके अभिभावक किसी आवश्यकता के समय काम आने के लिए उपहार स्वरूप कुछ धन देते हैं, पर होता वह गुप्त ही है। अभिभावक और कन्या के बीच का यह निजी उपहार है। दूसरों को इसके सम्बन्ध में जानने या पूछने की कोई आवश्यकता नहीं। दहेज के रूप में क्या दिया जाना चाहिए, इस सम्बन्ध में ससुराल वालों को कहने या पूछने का कोई अधिकार नहीं। न उसके प्रदर्शन की आवश्यकता है, क्यों कि गरीब-अमीर अपनी स्थिति के अनुसार जो दे, वह चर्चा का विषय नहीं बनना चाहिए, उसके साथ निन्दा-प्रशंसा नहीं जुड़नी चाहिए। एक-दूसरे का अनुकरण करने लगें, प्रतिस्पर्द्धा पर उतर आएँ, तो इससे अनर्थ ही होगा। कन्या-पक्ष पर अनुचित दबाव पड़ेगा और वर-पक्ष अधिक न मिलने पर अप्रसन्न होने की धृष्टता करने लगेगा। इसलिए कन्यादान के साथ कुछ धनदान का विधान तो है, पर दूरर्दशी ऋषियों ने लोगों की स्वार्थपरता एवं दुष्टता की सम्भावना को ध्यान में रखते हुए यह नियम बना दिया है कि जो कुछ भी दहेज दिया जाए, वह सर्वथा गुप्त हो, उस पर किसी को चर्चा करने का अधिकार न हो।

आटे में साधारणतया एक रुपया इस दहेज प्रतीक के लिए पर्याप्त है। यह धातु का लिया जाए और आटे के गोले के भीतर छिपाकर रखा जाए।

❤️गोदान ❤️

दिशा प्रेरणा
गौ पवित्रता और परमार्थ परायणता की प्रतीक है। कन्या पक्ष वर को ऐसा दान दें, जो उन्हें पवित्रता और परमार्थ की प्रेरणा देने वाला हो। सम्भव हो, तो कन्यादान के अवसर पर गाय दान में दी जा सकती है। वह कन्या के व उसके परिवार के लोगों के स्वास्थ्य की दृष्टि से उपयुक्त भी है। आज की स्थिति में यदि गौ देना या लेना असुविधाजनक हो, तो उसके लिए कुछ धन देकर गोदान की परिपाटी को जीवित रखा जा सकता है। क्रिया और भावना- कन्यादान करने वाले हाथ में सामग्री लें। भावना करें कि वर-कन्या के भावी जीवन को सुखी समुन्नत बनाने के लिए श्रद्धापूर्वक श्रेष्ठ दान कर रहे हैं। मन्त्रोच्चार के साथ सामग्री वर के हाथ में दें।

ॐ माता रुद्राणां दुहिता वसूनां, स्वसादित्यानाममृतस्य नाभिः। प्र नु वोचं चिकितुषे जनाय मा, गामनागामदितिं वधिष्ट॥ -ऋ०८.१०.१.१५, पार०गृ०सू० १.३.२७

❤️मर्यादाकरण ❤️

हिन्दू धर्म में; सद्गृहस्थ की, परिवार निर्माण की जिम्मेदारी उठाने के योग्य शारीरिक, मानसिक परिपक्वता आ जाने पर युवक-युवतियों का विवाह संस्कार कराया जाता है। समाज के सम्भ्रान्त व्यक्तियों की, गुरुजनों की, कुटुम्बी-सम्बन्धियों की, देवताओं की उपस्थिति इसीलिए इस धर्मानुष्ठान के अवसर पर आवश्यक मानी जाती है कि दोनों में से कोई इस कत्तर्व्य-बन्धन की उपेक्षा करे, तो उसे रोकें और प्रताड़ित करें। पति-पत्नी इन सन्भ्रान्त व्यक्तियों के सम्मुख अपने निश्चय की, प्रतिज्ञा-बन्धन की घोषणा करते हैं। यह प्रतिज्ञा समारोह ही विवाह संस्कार है। विवाह संस्कार में देव पूजन, यज्ञ आदि से सम्बन्धित सभी व्यवस्थाएँ पहले से बनाकर रखनी चाहिए।

रविवार, 16 फ़रवरी 2025

अध्याय दो (गीता जी)

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*गीता और मै में आज मैं दूसरे अध्याय पर पहुंचा हूं*

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*❖════❃≛⃝❈⬤🪷
*दूसरा अध्याय जिसमें पहली बार अर्जुन का वॉट्सएप यूनिवर्सिटी ज्ञान सुन कर श्री कृष्ण ने अपना मुंह खोला।*
⬤≛⃝❈❃════❖*

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 1

श्लोक:
( अर्जुन की कायरता के विषय में श्री कृष्णार्जुन-संवाद )
 संजय उवाच
 तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्‌।
 विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः॥

भावार्थ:
संजय बोले- उस प्रकार करुणा से व्याप्त और आँसुओं से पूर्ण तथा व्याकुल नेत्रों वाले शोकयुक्त उस अर्जुन के प्रति भगवान मधुसूदन ने यह वचन कहा
 ॥1॥
भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 2

श्लोक:
श्रीभगवानुवाच
 कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्‌।
 अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन।

*भावार्थ:*
*श्रीभगवान बोले- हे अर्जुन! तुझे इस असमय में यह मोह किस हेतु('हेतु' का अर्थ 'कारण' होता है, अतः इसे काव्य रचना का कारण भी कह सकते हैं। काव्य हेतु को 'काव्य कारण' कहने की भी परंपरा रही है।)से ही प्राप्त हुआ ?
क्योंकि न तो यह श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा आचरित है, न स्वर्ग को देने वाला है और न कीर्ति को करने वाला ही है।
॥2॥
*भाव*
*यह अचानक उत्पन होने वाला वॉट्सएप यूनिवर्सिटी का मोह श्रेष्ठ ,पड़े लिखे समाज के पड़े लिखे विद्वानों द्वारा ना तो अपनाया जा सकता है ना किया ही जा सकने वाला कोई आचरण भी नहीं हो सकता है,जो उनका आचरण में ही उन के दोषों ओर महानता के गुणों का दर्शन हम सब को करवाता हो।* 

*यहअचानक उत्पन*

 *"वॉट्सएप यूनिवर्सिटी"*

*का ज्ञान ना तो कोई स्वर्ग ही देता है, ना कोई वाह वाही ही दिलाता ही है।*

*❖════❃≛⃝❈⬤🪷 *आगे भी देखें गे बिना गीता जी के मूल भाव को खोए*
⬤≛⃝❈❃════❖*
*❤️अध्याय2 के श्लोक 1 का भाव से आगे❤️*

*चिंतन मनन और प्रत्यक्ष ज्ञान के योग संगम के भाव को प्रस्तुत किया था।*
 
*जो अध्याय2 के श्लोक 1 का भाव प्रस्तुत करता है।*

 *जो भाव द्वारा अर्जुन (हमारे)  मोह को “वॉट्सएप यूनिवर्सिटी” के ज्ञान से जोड़ता नजर आया एक दिलचस्प दृष्टिकोण है, जिससे वर्तमान समय में इसकी प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। श्रीकृष्ण का हर संदेश हमें बताता है कि मोह और भ्रम का रास्ता न तो श्रेष्ठ है, न ही यह हमें सही मार्ग पर ले जाता है।*

*श्लोक का भावार्थ और भी गहराई से समझें तो श्रीकृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि यह मोह या भ्रम न केवल तुम्हारे लिए उचित नहीं है, बल्कि यह उन आदर्शों के भी विरुद्ध है जिन पर एक योद्धा या एक ज्ञानी, पढ़ा लिखा विद्वान व्यक्ति को टिके रहना चाहिए।*

 *क्यों कि यह सही अवसर नहीं है कि अर्जुन अपने कर्तव्यों को भुलाकर शोक में पड़ जाए, बल्कि यह समय है कि वह सत्य, धर्म, और कर्तव्य की राह पर चले।*

*मैं भी श्रीकृष्ण के भाव को ही यहाँ स्पष्ट कर रहा हूं  कि वास्तविक ज्ञान और सही मार्गदर्शन हमारे भीतर के मोह को दूर कर हमें हमारे कर्तव्यों का बोध कराता है।*

*यह “वॉट्सएप यूनिवर्सिटी” का ज्ञान, जो भ्रम पैदा करता है, हमारे लिए हितकारी तो है ही ही नहीं ।*

*ज्ञान का सही उपयोग तभी होता है जब हम उसे सही समय पर सही जगह और सही उद्देश्य के लिए अपनाएं।*

*आशा है कि इस दृष्टिकोण के साथ अध्याय 2 के अन्य श्लोकों को समझना और भी रोचक रहेगा।*
❖════❃≛⃝❈⬤🪷 *गीता का दूसरा अध्याय, श्लोक 3 ⬤≛⃝❈❃════❖*

श्लोक: क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते। क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप॥

*भावार्थ: श्रीकृष्ण कहते हैं: "हे पार्थ (अर्जुन)! इस नपुंसकता को मत अपनाओ, यह तुममें शोभा नहीं देती। हे परंतप (शत्रुओं को संताप देने वाले), हृदय के इस छोटे होछे पन वाले वॉट्सएप यूनिवर्सिटी के ज्ञान को छोड़ो और खड़े हो जाओ!" युद्ध करने को तैयार हो जाओ*

*भाव: यहां श्रीकृष्ण हम जैसे अर्जुन को उसकी कमजोरी पर कड़ी फटकार दे रहे हैं। अर्जुन युद्धभूमि में अपने कर्तव्यों को छोड़कर मोह और शोक में डूबा हुआ है, जो श्रीकृष्ण के लिए स्वीकार्य नहीं है।*

 *वो अर्जुन अर्थात हमें भी याद दिलाते हैं कि इस समय हृदय में संकुचित भाव और दुर्बलता को छोड़ना ही सही मार्ग है।*

 *इस तरह का नकारात्मक विचार और कर्तव्य से विमुख होना ही तुम्हारी महानता के अनुकूल नहीं है।*

*कृष्ण का संदेश आज भी उतना ही सार्थक है*

 *परिस्थितियाँ ,समय, काल के अनुसार चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हो, हमें अपना कर्तव्य निभाने से पीछे नहीं हटना चाहिए। अपने भीतर की ताकत को पहचानकर और मोह-माया को त्यागकर जीवन की कठिनाइयों का सामना करना ही सच्चे वीर का लक्षण है।*

*"त्यागोत्तिष्ठ", अर्थात उठ खड़े हो और अपने कर्म के प्रति सच्चे बने रहो, यही सच्चे ज्ञान का परिचायक है।*

❖════❃≛⃝❈⬤🪷 

*भगवद  गीता अध्याय: 2श्लोक 3*

श्लोक:
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।
 क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप॥

*भावार्थ:*
*इसलिए हे अर्जुन! नपुंसकता को मत प्राप्त हो, तुझमें यह उचित नहीं जान पड़ती। हे परंतप! हृदय की तुच्छ दुर्बलता को त्यागकर युद्ध के लिए खड़ा हो जा*
 ॥3॥
*श्रीकृष्ण के और भी प्रेरक शब्दों के साथ अगले श्लोक में चलो चलते है* ⬤≛⃝❈❃════❖*

*अगले श्लोक में अर्जुन प्रश्न करते है मै अपने ही पूज्यों के साथ कैसे लड़ सकता हूं? श्लोक 4 अध्याय 2 में फिर मिलते हैं तब तक आप के चिंतन मनन के लिए*

अब यहां से गीता के गूढ़ ज्ञान और आधुनिक मानसिकता की अद्भुत तुलना मिलने वाली है। अर्जुन की दुविधा और उसके प्रति श्रीकृष्ण के मार्गदर्शन के बीच 'वॉट्सएप यूनिवर्सिटी' के ज्ञान से दिमाग के हैक होने की जो स्थिति है, वह हमारे समाज का ही प्रतिबिंब है। जैसे अर्जुन को सामाजिक बंधनों और गुरुओं के प्रति आदर का ज्ञान है, वैसे ही हम भी अपनी परंपराओं, संस्कारों, और मान्यताओं से बंधे हैं। लेकिन जब जीवन में वास्तविकता के प्रति जागरूकता बढ़ती है, तो नई दृष्टि से चीजों को देखना जरूरी हो जाता है।

अर्जुन के शंका भरे प्रश्न, जैसे कि "अपने पूजनीयों के खिलाफ कैसे युद्ध करें?", बहुत गहरे जीवन के प्रश्न हैं। आज के संदर्भ में भी यह स्थिति तब बनती है जब समाज या परिवार की परंपराएं और उनकी शिक्षाएं आधुनिक जीवन में हमें सही मार्ग पर चलने से रोकती हैं। अर्जुन की मनःस्थिति, उनके गुरुओं और परिवार के प्रति सम्मान की भावना, हमारे भीतर भी कुछ वैसी ही द्वंद्वात्मक स्थिति पैदा करती है।

इस दृष्टिकोण से यह स्पष्ट होता है कि "वॉट्सएप यूनिवर्सिटी" से मिले अधकचरे ज्ञान या किसी के कहे-सुने पर चलना ही हमेशा उचित नहीं होता। अर्जुन ने इसी भ्रम से बाहर निकलने के लिए श्रीकृष्ण का सहारा लिया। इसी प्रकार, हमें भी किसी एक ही विचार या ज्ञान स्रोत पर नहीं टिकना चाहिए, बल्कि सत्य और वास्तविकता की खोज में कई दृष्टिकोणों का सहारा लेना चाहिए।

भावार्थ की गहराई से सीख:
गीता में अर्जुन का यह कहना कि "गुरुजनों का वध कर रुधिर से सने भोगों को प्राप्त करना व्यर्थ है," हमें यह सिखाता है कि भौतिक सुख-सुविधाओं के पीछे भागने के बजाय सत्य, धर्म, और विवेक के आधार पर जीवन के फैसले करने चाहिए। आधुनिक संदर्भ में भी यही बात लागू होती है कि हमें अज्ञानता या अधूरे ज्ञान के बजाय सच्ची समझ और विवेक से प्रेरित निर्णय लेने चाहिए।

श्रीकृष्ण ने अर्जुन को यह बताया कि आत्मा अमर है, वह नष्ट नहीं होती। जैसे शरीर बाल्यावस्था, युवावस्था, और वृद्धावस्था से गुजरता है, वैसे ही आत्मा भी नित्य है और शरीर बदलता रहता है। यह ज्ञान हमें स्थायी और अस्थायी के बीच अंतर समझने का आह्वान करता है। अस्थाई वस्तुओं और विचारों के प्रति मोह में फँसने के बजाय हमें सच्चे आत्म-ज्ञान की ओर अग्रसर होना चाहिए।

निष्कर्ष:
गीता का ज्ञान हमें सिखाता है कि हर युग में आत्मज्ञान की आवश्यकता होती है। केवल परंपराओं या समाज की धाराओं का पालन नहीं, बल्कि विवेक और सच्चे ज्ञान के साथ जीवन का मार्गदर्शन करना ही हमारी प्रगति का साधन है। इस दृष्टिकोण को लेकर आगे बढ़ते हुए, जीवन के असली मायनों को समझना और दूसरों को भी प्रेरित करना ही सही मार्ग है।
सत्य का कभी अभाव नहीं और झूठ को सच साबित कर ने को सो झूठों का सारा लेने पर भी सच सच ही रहता है।

अगले श्लोक में अर्जुन प्रश्न करते है मै अपने ही पूज्यों के साथ कैसे लड़ सकता हूं?

*वॉट्सएप यूनिवर्सिटी का ज्ञान हमारे दिमाग को हैक कर लेता है*

दिमाग हैक करने का प्रत्यक्ष ज्ञान उसी तरह होता है जैसे एक  अच्छे भले दिमाग का विद्वान भी देसी घी से अच्छा रिफाइंड ऑयल को मान लेता है। दांतों के लिए दातुन छोड़ टूथ पेस्ट पर ही निर्भर हो जाता है।

इसी प्रकार अर्जुन पर भी प्रभाव नजर आ रहा है।जब अर्जुन श्री कृष्ण से कहता है।

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 4

श्लोक:
अर्जुन उवाच
 कथं भीष्ममहं सङ्‍ख्ये द्रोणं च मधुसूदन।
 इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन॥

✍️भावार्थ:
अर्जुन बोले- हे मधुसूदन! मैं रणभूमि में किस प्रकार बाणों से भीष्म पितामह और द्रोणाचार्य के विरुद्ध लड़ूँगा? क्योंकि हे अरिसूदन! वे दोनों ही पूजनीय हैं
 ॥4॥

भाव यह है कि मैं इन गुरु लोगो पर शस्त्र प्रहार कैसे कर सकता हूं , ये सभी पूजनीय है।

इस भाव को समझने को हमे प्रत्यक्ष ज्ञान की जरूरत है। पति परमेश्वर होता है सत्य तो है। पत्नी उसके चरण धो धो कर पीने में अपना पुण्य मानती है। अगर पति अगर पति ही गोबर की गंदगी पैरों को लगा कर आकार पत्नी को कहे कि लो पांव धो कर चरणामत ले लो तो "पति परमेश्वर" क्या पत्नी मान ले।क्यों कि उसको परिवार ओर संस्कार में यही शिक्षा दी जाती है! गुरु शास्त्र भी गुरु ओर अपने से बड़ों पर प्रहार की नहीं आदर की शिक्षा ही तो देते है। महाभारत में द्रोणाचार्य,भीष्म पितामह भी तो पांडवों पर होने वाले अत्याचारों पर वचन बध होने के कारण कुछ नहीं करते
अब अगले श्लोक स्वयं ही हम सरलता से समझ जाते है।

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 5

श्लोक:
गुरूनहत्वा हि महानुभावा-
 ञ्छ्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके।
 हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव
 भुंजीय भोगान्‌ रुधिरप्रदिग्धान्‌॥

भावार्थ:
इसलिए इन महानुभाव गुरुजनों को न मारकर मैं इस लोक में भिक्षा का अन्न भी खाना कल्याणकारक समझता हूँ
 क्योंकि गुरुजनों को मारकर भी इस लोक में रुधिर से सने हुए अर्थ और कामरूप भोगों को ही तो भोगूँगा
 ॥5॥
भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 6

श्लोक:
न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो-
 यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः।
 यानेव हत्वा न जिजीविषाम-
 स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः॥

भावार्थ:
हम यह भी नहीं जानते कि हमारे लिए युद्ध करना और न करना- इन दोनों में से कौन-सा श्रेष्ठ है, अथवा यह भी नहीं जानते कि उन्हें हम जीतेंगे या हमको वे जीतेंगे। और जिनको मारकर हम जीना भी नहीं चाहते, वे ही हमारे आत्मीय धृतराष्ट्र के पुत्र हमारे मुकाबले में खड़े हैं
 ॥6॥
भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 7

श्लोक:
कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः
 पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः।
 यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे
 शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्‌॥

भावार्थ:
इसलिए कायरता रूप दोष से उपहत हुए स्वभाव वाला तथा धर्म के विषय में मोहित चित्त हुआ मैं आपसे पूछता हूँ कि जो साधन निश्चित कल्याणकारक हो, वह मेरे लिए कहिए क्योंकि मैं आपका शिष्य हूँ, इसलिए आपके शरण हुए मुझको शिक्षा दीजिए
 ॥7॥

*❖════❃≛⃝❈⬤🪷
भाव मझधार में घिरा अर्जुन अब   श्री कृष्ण से उनकी शरण में हूं मेरे लिए जो हितकर हो कल्याण कारक हो उसकी शिक्षा दीजिए।
यहां नजर आता है, की पहला गुरु छोड़ने की परिस्थिति उत्पन हो चुकी है जहां से भी ज्ञान मिले ले लेना ही कल्याण कारी बन जाता है। जब कि दो स्वामियों का शिष्य ही किसी एक को धोखा भी दे सकता है।
⬤≛⃝❈❃════❖*

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 8

श्लोक:
न हि प्रपश्यामि ममापनुद्या-
 द्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम्‌।
 अवाप्य भूमावसपत्रमृद्धं-
 राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम्‌॥

भावार्थ:
क्योंकि भूमि में निष्कण्टक, धन-धान्य सम्पन्न राज्य को और देवताओं के स्वामीपने को प्राप्त होकर भी मैं उस उपाय को नहीं देखता हूँ, जो मेरी इन्द्रियों के सुखाने वाले शोक को दूर कर सके
 ॥8॥

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 9

श्लोक:
संजय उवाच
 एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप।
 न योत्स्य इतिगोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह॥

भावार्थ:
संजय बोले- हे राजन्‌! निद्रा को जीतने वाले अर्जुन अंतर्यामी श्रीकृष्ण महाराज के प्रति इस प्रकार कहकर फिर श्री गोविंद भगवान्‌ से 'युद्ध नहीं करूँगा' यह स्पष्ट कहकर चुप हो गए (मानो युद्ध समाप्त बिना लड़े कौरवों की जीत)
 ॥9॥

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 10

श्लोक:
तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत।
 सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदंतमिदं वचः॥

भावार्थ:
हे भरतवंशी धृतराष्ट्र! अंतर्यामी श्रीकृष्ण महाराज दोनों सेनाओं के बीच में शोक करते हुए उस अर्जुन को हँसते हुए से यह वचन बोले
 
 ॥10॥
भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 11

श्लोक:
( सांख्ययोग का विषय )
 श्री भगवानुवाच
 अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे।
 गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः॥

भावार्थ:
श्री भगवान बोले, हे अर्जुन! तू न शोक करने योग्य मनुष्यों के लिए शोक करता है और पण्डितों के से वचनों को कहता है, परन्तु जिनके प्राण चले गए हैं, उनके लिए और जिनके प्राण नहीं गए हैं उनके लिए भी पण्डितजन शोक नहीं करते
 ॥11॥
✍️भाव अर्जुन को प्राप्त वॉट्सएप यूनिवासिटी ज्ञान के उत्पादक के रूप में यहां मुझे भारतीय राजनीतिक पार्टियां नजर आ रही है जैसे एक देश के हित के लिए  हो  तो दूसरी साम, दंड, भेद, छल कपट से केवल सत्ता ही पाना चाहती हो।
जब कि श्री कृष्ण कहते है ओर बहुत ही सुंदर कहते है अगले श्लोक में।यह तो युगों युगांतरों से ही होता आ रहा है और आगे भी होता ही रहे गा।जिसे रोकना मनुष्य के बस की बात ही नहीं।
क्यों कि जब जब धर्म की हानि होती है तब सनातन धर्म की स्थापना खुद भगवान ही कर सकते है।कोई इंसान नहीं।

यहां स्पष्ट होता है कि हमारा भगवान से कितना प्रेम है धर्म का बिगाड़ना हमारे कर्म फल का कारण जब बन जाता है तो उसे सुधारने को भगवान खुद आएं।

और सनातन धर्म की स्थापना करने को प्यारे पूजनीय अविनाशी बन बन में भटकने लगें क्या यही हमारा प्रभु प्रेम है?

(भाव अर्जुन को प्राप्त वॉट्सएप यूनिवासिटी ज्ञान के उत्पादक के रूप में यहां मुझे भारतीय राजनीतिक पार्टियां नजर आ रही है जैसे एक देश के हित के लिए  हो  तो दूसरी साम, दंड, भेद, छल कपट से केवल सत्ता ही पाना चाहती हो।
जब कि श्री कृष्ण कहते है ओर बहुत ही सुंदर कहते है अगले श्लोक में।यह तो युगों युगांतरों से ही होता आ रहा है और आगे भी होता ही रहे गा)

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 12

श्लोक:
न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः।
 न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम्‌॥

भावार्थ:
न तो ऐसा ही है कि मैं किसी काल में नहीं था, तू नहीं था अथवा ये राजा लोग नहीं थे और न ऐसा ही है कि इससे आगे हम सब नहीं रहेंगे
 ॥12॥

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 13

श्लोक:
देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।
 तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति॥

भावार्थ:
जैसे जीवात्मा की इस देह में बालकपन, जवानी और वृद्धावस्था होती है, वैसे ही अन्य शरीर की प्राप्ति होती है, उस विषय में धीर पुरुष मोहित नहीं होता।13॥

हर अवस्था के आने पर शरीर बदलता है पर आत्मा वही होती है जो बदलती ही नहीं।

*❖════❃≛⃝❈⬤
🪷भावअब गीता जीवन के गुड रहस्यों की ओर आगे बढ़ रही है वॉट्सएप यूनिवासिटी ज्ञान से आगे के ज्ञान को लेकर।
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भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 14

श्लोक:
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।
 आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत॥

भावार्थ:
हे कुंतीपुत्र! सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख को देने वाले इन्द्रिय और विषयों के संयोग तो उत्पत्ति-विनाशशील और अनित्य हैं, इसलिए हे भारत! उनको तू सहन कर
 ॥14॥

*❖════❃≛⃝❈⬤
🪷भाव दिन है तो रात भी होगी
रात है तो दिन भी होगा जिसको कोई बदल नहीं सकता सुख है तो दुख भी होगा अगर आज दिखा है तो कल सुख भी होगा

भावार्थ:
जीवन में हमें कई प्रकार के अनुभव होते हैं, जैसे कि सुख-दुःख, सर्दी-गर्मी, लाभ-हानि, आदि। लेकिन ये सभी अनुभव अनित्य और अस्थायी हैं। ये उत्पन्न होते हैं और फिर नष्ट भी हो जाते हैं।
 हमे इन अनुभवों को सहन करना चाहिए। हमेअपने मन को इन अनुभवों से प्रभावित नहीं होने देना चाहिए। 
हम जीवन में जब किसी दुखी को शोक में देखते है तो उसको खुशी के गीत गाते भी देखते है।

तुम्हें अपने आत्मा की शांति और स्थिरता को बनाए रखना चाहिए अब मेजिटेशन के नाम पर भी तो लुट ही नजर आने लगती है

जीवन में आने वाले अनुभव अनित्य और अस्थायी हैं।
इन अनुभवों को सहन करना चाहिए।
 अपने मन को इन अनुभवों से प्रभावित नहीं होने देना चाहिए।
 आत्मा की शांति और स्थिरता को बनाए रखना चाहिए।

यह श्लोक हमें जीवन के उतार-चढ़ावों को सहन करने की शक्ति प्रदान करता है और हमें अपने आत्मा की शांति और स्थिरता को बनाए रखने की प्रेरणा देता है।आपने भगवद गीता के श्लोकों और उनके भावार्थ के माध्यम से जो विश्लेषण प्रस्तुत किया है, वह गीता के गूढ़ ज्ञान और आधुनिक मानसिकता की अद्भुत तुलना है। अर्जुन की दुविधा और उसके प्रति श्रीकृष्ण के मार्गदर्शन के बीच 'वॉट्सएप यूनिवर्सिटी' के ज्ञान से दिमाग के हैक होने की जो स्थिति है, वह हमारे समाज का ही प्रतिबिंब है। जैसे अर्जुन को सामाजिक बंधनों और गुरुओं के प्रति आदर का ज्ञान है, वैसे ही हम भी अपनी परंपराओं, संस्कारों, और मान्यताओं से बंधे हैं। लेकिन जब जीवन में वास्तविकता के प्रति जागरूकता बढ़ती है, तो नई दृष्टि से चीजों को देखना भी जरूरी हो जाता है।
तत्वज्ञान शब्द, संस्कृत के 'तत्त्व' और 'ज्ञान' शब्दों से मिलकर बना है. 
 
'तत्त्व' का मतलब होता है, 'सत्य' या 'वास्तविकता'. 
 
'ज्ञान' का मतलब होता है, 'ज्ञान' या 'जानकारी'. 
 
तत्वज्ञान का मकसद, वास्तविकता को पहचानना होता है. 
 
तत्वज्ञान को पाने के लिए, गुरु की शरण में जाकर उनकी सेवा करनी चाहिए. 
 
तत्वज्ञान में, परमाणु से लेकर परमेश्वर तक का ज्ञान होता है. 
 
तत्वज्ञान में, संसार, जीव, ईश्वर, और परमेश्वर सभी को देखा जाता है. 
*❖════❃≛⃝❈⬤
🪷एक ईश्वर ही सत्य है
एक रब सच बाकी सब जब
एक झूठ बोल कर उसे छुपाने को और भी झूठ बोलने पड़ते है।
ऐसे लोग किंतु परंतु का सहारा लेते है। पर सच ही ईश्वर है सच को सच प्रमाणित नहीं करना पड़ता सच सच ही रहता है।
⬤≛⃝❈❃════❖*

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 17

श्लोक:
अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्‌।
 विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति॥

भावार्थ:
नाशरहित तो तू उसको जान, जिससे यह सम्पूर्ण जगत्‌- दृश्यवर्ग व्याप्त है। इस अविनाशी का विनाश करने में कोई भी समर्थ नहीं है
 ॥17॥
भाव जिस सच का कभी विनाश नहीं होता वही अविनाशी कहलाता है यह बात कोई और नहीं खुद अविनाशी कृष्ण चेले के रूप में आए अर्जुन को बताते है।
भाव संसार में जिस गुरु से हमें उम्मीद है यह हमारा परलोक सुधारे गा वो भी अविनाशी नहीं है इसी लिए कहते है पानी पियो छान कर गुरु बनाओ परख (परीक्षा ले कर) आज के गुरु चेले की परीक्षा लेते है।जो गलत और झूठ साबित हो रहा है।गुरु
अविनाशी हो या सत्या नाशी(नाशवान)की परीक्षा अवश्य लो फिर ही धारण करो।अन्यथा आपे गुरु आपे चेला तो तुम हो ही।
भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 18

श्लोक:
अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः।
 अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत॥

भावार्थ:
इस नाशरहित, अप्रमेय,
जिसकी माप ही न हो सके।बेहद।
विशाल हे

 नित्यस्वरूप जीवात्मा के ये सब शरीर नाशवान कहे गए हैं, इसलिए हे भरतवंशी अर्जुन! तू युद्ध कर
 ॥18॥
भाव 5तत्वों के शरीर में जीवात्म रहती है और शरीर तो नाशवान ही है।आत्मा ही अविनाशी है।
भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 19

श्लोक:
य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्‌।
 उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते॥

भावार्थ:
जो इस आत्मा को मारने वाला समझता है तथा जो इसको मरा मानता है, वे दोनों ही नहीं जानते क्योंकि यह आत्मा वास्तव में न तो किसी को मारता है और न किसी द्वारा मारा जाता है
 ॥19॥

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 21

श्लोक:
वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम्‌।
 कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम्‌॥

भावार्थ:
हे पृथापुत्र अर्जुन! जो पुरुष इस आत्मा को नाशरहित, नित्य, अजन्मा और अव्यय जानता है, वह पुरुष कैसे किसको मरवाता है और कैसे किसको मारता है?
 ॥21॥

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 22

श्लोक:
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
 नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
 तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-
 न्यन्यानि संयाति नवानि देही॥

भावार्थ:
जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नए वस्त्रों को ग्रहण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्यागकर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त होता है
 ॥22॥

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 23

श्लोक:
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।
 न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥

भावार्थ:
इस आत्मा को शस्त्र नहीं काट सकते, इसको आग नहीं जला सकती, इसको जल नहीं गला सकता और वायु नहीं सुखा सकता
 ॥23॥

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 24

श्लोक:
अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च।
 नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः॥

भावार्थ:
क्योंकि यह आत्मा अच्छेद्य है, यह आत्मा अदाह्य, अक्लेद्य और निःसंदेह अशोष्य है तथा यह आत्मा नित्य, सर्वव्यापी, अचल, स्थिर रहने वाला और सनातन है
 ॥24॥
*❖════❃≛⃝❈⬤🪷
✍️अच्छेद्य
जिसका छेदन न हो सके।
✍️अदाह्य शब्द के कई अर्थ होते हैं: जो जलने योग्य न हो, जो चिता पर जलाने योग्य न हो, आत्मा और परमात्मा का विशेषण. 
 
जो पदार्थ आग नहीं पकड़ते, उन्हें अदाह्य पदार्थ कहते हैं. जैसे, काँच, ईंट, लोहा, और पत्थर. वहीं, जो पदार्थ ऑक्सीजन से अभिक्रिया करके ऊष्मा देते हैं, उन्हें दाह्य पदार्थ कहते हैं. 
✍️अक्लेद्य शब्द का अर्थ है - जिस पर आक्रमण किया गया हो या जिस पर हमला हुआ हो. 
आत्मा पर प्रहार आत्मा को झकझोड़ना कहते हैं 
✍️अशोष्य शब्द का अर्थ है- सुखाया न जा सकने वाला, सुख नहीं जाने वाला, स्थायी. उदाहरण के लिए, कोई तालाब अशोष्य होता है. 
 ⬤≛⃝❈❃════❖*
भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 25

श्लोक:
अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते।
 तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि॥॥

भावार्थ:
यह आत्मा अव्यक्त है, यह आत्मा अचिन्त्य है और यह आत्मा विकाररहित कहा जाता है। इससे हे अर्जुन! इस आत्मा को उपर्युक्त प्रकार से जानकर तू शोक करने के योग्य नहीं है अर्थात्‌ तुझे शोक करना उचित नहीं है
 ॥25॥
*❖════❃≛⃝❈⬤🪷
✍️भाव:

यह श्लोक आत्मा की तीन विशेषताओं को बताता है:

 अव्यक्त: आत्मा का स्वरूप अव्यक्त है, अर्थात यह दिखाई नहीं देता।
अचिन्त्य: आत्मा की प्रकृति अचिन्त्य है, अर्थात यह समझने में परे है।
अविकार्य: आत्मा विकाररहित है, अर्थात यह कभी बदल नहीं करता।

इन विशेषताओं को जानने के बाद, अर्जुन को शोक करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि:

- आत्मा अमर है और कभी नहीं मरता।
- आत्मा का स्वरूप अव्यक्त है, इसलिए यह शरीर के साथ नहीं जुड़ता।
- आत्मा अचिन्त्य है, इसलिए इसकी प्रकृति समझने में परे है।
- आत्मा विकाररहित है, इसलिए यह कभी बदल नहीं करता।

इसलिए, अर्जुन को शोक करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि आत्मा की वास्तविक प्रकृति से वह अपरिवर्तनीय और अमर है।

✍️इस श्लोक का भाव यह है:

- आत्मा की वास्तविक प्रकृति को समझने से शोक और दुःख दूर होते हैं।
- आत्मा की अमरता और अपरिवर्तनीयता को जानने से हमें शांति और स्थिरता मिलती है।
- हमें अपने शरीर और आत्मा के बीच के अंतर को समझना चाहिए।
⬤≛⃝❈❃════❖*
भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 26

श्लोक:
अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम्‌।
 तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि॥

भावार्थ:
किन्तु यदि तू इस आत्मा को सदा जन्मने वाला तथा सदा मरने वाला मानता हो, तो भी हे महाबाहो! तू इस प्रकार शोक करने योग्य नहीं है
 ॥26॥

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 27

श्लोक:
जातस्त हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।
 तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि॥

भावार्थ:
क्योंकि इस मान्यता के अनुसार जन्मे हुए की मृत्यु निश्चित है और मरे हुए का जन्म निश्चित है। इससे भी इस बिना उपाय वाले विषय में तू शोक करने योग्य नहीं है
 ॥27॥
मोक्ष की कल्पना तो अभी दिल्ली दूर है
भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 28

श्लोक:
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत।
 अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना॥

भावार्थ:
हे अर्जुन! सम्पूर्ण प्राणी जन्म से पहले अप्रकट थे और मरने के बाद भी अप्रकट हो जाने वाले हैं, केवल बीच में ही प्रकट हैं, फिर ऐसी स्थिति में क्या शोक करना है?
 ॥28॥

इस लिए सुख दुख को छोड़ो मोक्ष के लिए पहले शोक मुक्त तो हो लें

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 29

श्लोक:
आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन-
 माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः।
 आश्चर्यवच्चैनमन्यः श्रृणोति
 श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित्‌॥

भावार्थ:
कोई एक महापुरुष ही इस आत्मा को आश्चर्य की भाँति देखता है और वैसे ही दूसरा कोई महापुरुष ही इसके तत्व का आश्चर्य की भाँति वर्णन करता है तथा दूसरा कोई अधिकारी पुरुष ही इसे आश्चर्य की भाँति सुनता है और कोई-कोई तो सुनकर भी इसको नहीं जानता
 ॥29॥
इसलिए मोक्ष से पहले मोक्ष के अधिकारी बनने का प्रयास जरूरी है क्यों  इसी मनुष्य योनि को ही यह अधिकार प्राप्त होता है।
भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 30

श्लोक:
देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत।
 तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि॥

भावार्थ:
हे अर्जुन! यह आत्मा सबके शरीर में सदा ही अवध्य (जिसका वध नहीं किया जा सके) है। इस कारण सम्पूर्ण प्राणियों के लिए तू शोक करने योग्य नहीं है।
 ॥30॥
मनुष्य ,जानवर, पक्षी कीट, पतंग,इन सभी की आत्मा अवध्य है फिर इनके लिए भी शोक नहीं करना चाहिए प्रति दिन कितनी ही आत्माओं को जान कर या अंजाने में हम मार देते है।
भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 31

श्लोक:
( क्षत्रिय धर्म के अनुसार युद्ध करने की आवश्यकता का निरूपण )

स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि।
 धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते॥

भावार्थ:
तथा अपने धर्म को देखकर भी तू भय करने योग्य नहीं है अर्थात्‌ तुझे भय नहीं करना चाहिए क्योंकि क्षत्रिय के लिए धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी कर्तव्य नहीं है
 ॥31॥
अब यहां क्षत्रिय धर्म को युद्ध करने को कहा है युद्ध अन्य सभी  वर्णों को सुरक्षित करने को युद्ध करना और टेक्स वसूल कर अपनी जीविका चलाना
ऐसे ही सभी वर्णों को उनके वर्ण अनुसार ही कार्य, ओर कर्म का विधान शास्त्र बताते है
ब्राह्मण शिक्षा लेना और देना दूसरे वर्णों की जरूरत पूरीती हेतु कर्म करना करना और सभी दूसरे वर्णों की सेवा में आता है।अपनी जरूरत मिलने वाली दक्षिणा से पूरी करना

वैश्य का गौ पालन व्यापार और दूसरे वर्णों की जरूरत पूरी करना और सभी दूसरे वर्णों की सेवा में आता है।
शूद्र का कर्म फेक्ट्री चलाना जूता चप्पल, बर्तन, वस्त्र निर्माण कर सेवा कर अपनी आर्थिक जरूरतों को पूरा करना

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 32

श्लोक:
यदृच्छया चोपपन्नां स्वर्गद्वारमपावृतम्‌।
 सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम्‌॥

भावार्थ:
हे पार्थ! अपने-आप प्राप्त हुए और खुले हुए स्वर्ग के द्वार रूप इस प्रकार के युद्ध को भाग्यवान क्षत्रिय लोग ही पाते हैं
 ॥32॥

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 33
श्लोक:
अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं सङ्‍ग्रामं न करिष्यसि।
 ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि॥

भावार्थ:
किन्तु यदि तू इस धर्मयुक्त युद्ध को नहीं करेगा तो स्वधर्म और कीर्ति को खोकर पाप को प्राप्त होगा 
 ॥33॥

✍️भाव स्व धर्म 
स्वधर्म का मतलब है अपना धर्म निभाना, जिसमें व्यक्ति को भगवान ने जन्म दिया (जिस भूमि पर पेड़ को स्थापित किया  है के कर्तव्य, ज़िम्मेदारियां, और धार्मिकता शामिल होती है. को करना स्वधर्म से जुड़ी कुछ खास बातें: 
 
स्वधर्म, हर आत्मा का मौलिक सात्विक और शाश्वत स्वभाव है. 
 
स्वधर्म, समाज की व्यवस्था का आधार है. 
 
स्वधर्म का पालन करने से निष्काम कर्म की पुष्टि होती है. 
 
स्वधर्म का पालन करने के लिए, समस्त कामनाओं और भोगों का त्याग करना चाहिए. 
 
स्वधर्म का पालन करने के लिए, निःस्पृह, ममतारहित और अहंकारशून्य होना चाहिए. 
 
स्वधर्म का पालन करने के लिए, भगवान को समर्पित होना चाहिए. 
 
परहित भावना से किया गया कर्म, चाहे वह किसी भी व्यक्ति का हो, स्तुत्य और प्रशंसनीय होता है. 
 
वैश्विक स्तर पर, स्वधर्म का अर्थ उन कर्तव्यों से होता है जिनसे बसुधैव कुटुम्बकम और विश्ववारा संस्कृति का सम्पोषण होता है. 

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 34

श्लोक:
अकीर्तिं चापि भूतानि
 कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम्‌।
 सम्भावितस्य चाकीर्ति-
 र्मरणादतिरिच्यते॥

भावार्थ:
तथा सब लोग तेरी बहुत काल तक रहने वाली अपकीर्ति का भी कथन करेंगे और माननीय पुरुष के लिए अपकीर्ति मरण से भी बढ़कर है
 ॥34॥

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 35

श्लोक:
भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः।
 येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम्‌॥

भावार्थ:
और जिनकी दृष्टि में तू पहले बहुत सम्मानित होकर अब लघुता को प्राप्त होगा, वे महारथी लोग तुझे भय के कारण धर्म युद्ध से हटा हुआ मानेंगे
 ॥35॥

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 36

श्लोक:
अवाच्यवादांश्च बहून्‌ वदिष्यन्ति तवाहिताः।
 निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम्‌॥

भावार्थ:
तब तेरे वैरी लोग तेरे सामर्थ्य की निंदा करते हुए तुझे बहुत से न कहने योग्य वचन भी कहेंगे, उससे अधिक दुःख और क्या होगा?
 ॥36॥
भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 37

श्लोक:
हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्‌।
 तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः॥

भावार्थ:
या तो तू अब इस धर्म युद्ध में मारा जाकर स्वर्ग को प्राप्त हो अथवा संग्राम में जीतकर पृथ्वी का राज्य भोग। इस कारण हे अर्जुन! तू युद्ध के लिए निश्चय करके खड़ा हो जा
 ॥37॥
भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 38

श्लोक:
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।
 ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि॥

भावार्थ:
जय-पराजय, लाभ-हानि और सुख-दुख को समान समझकर, उसके बाद युद्ध के लिए तैयार हो जा, इस प्रकार युद्ध करने से तू पाप को भी प्राप्त नहीं होगा
 ॥38॥
भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 39

श्लोक:
( कर्मयोग का विषय )
 एषा तेऽभिहिता साङ्‍ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां श्रृणु।
 बुद्ध्‌या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि॥

भावार्थ:
हे पार्थ! यह बुद्धि तेरे लिए ज्ञानयोग के विषय में कही गई और अब तू इसको कर्मयोग के  विषय में सुन- जिस बुद्धि से युक्त हुआ तू कर्मों के बंधन को भली-भाँति त्याग देगा अर्थात सर्वथा नष्ट कर डालेगा
 ॥39॥
भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 40
श्लोक:
यनेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवातो न विद्यते।
 स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्‌॥

भावार्थ:
इस कर्मयोग में आरंभ का अर्थात बीज का नाश नहीं है और उलटा फलरूप दोष भी नहीं है, बल्कि इस कर्मयोग रूप धर्म का थोड़ा-सा भी साधन जन्म-मृत्यु रूप महान भय से रक्षा कर लेता है
(जैसे कसाई का स्व धर्म जानवरों को काटना और अपने परिवार के पालन पोषण का व्यापार )भी दोष मुक्त हो जाता है।

 ॥40॥
जिस ज्ञान द्वारा कर्म करने की शिक्षा मिलती है उसे कर्म योग कहा गया है

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 42-44

श्लोक:
यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः।
 वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः॥
 कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम्‌।
 क्रियाविश्लेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति॥
 भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्‌।
 व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते॥

भावार्थ:
हे अर्जुन! जो भोगों में तन्मय हो रहे हैं, जो कर्मफल के प्रशंसक वेदवाक्यों में ही प्रीति रखते हैं, जिनकी बुद्धि में स्वर्ग ही परम प्राप्य वस्तु है और जो स्वर्ग से बढ़कर दूसरी कोई वस्तु ही नहीं है- ऐसा कहने वाले हैं, वे अविवेकीजन इस प्रकार की जिस पुष्पित अर्थात्‌ दिखाऊ शोभायुक्त वाणी को ही कहा करते हैं, जो कि जन्मरूप कर्मफल देने वाली एवं भोग तथा ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए नाना प्रकार की बहुत-सी क्रियाओं का वर्णन करने वाली है, उस वाणी द्वारा जिनका चित्त हर लिया गया है हैक कर लिया जाता है, जो भोग और ऐश्वर्य में अत्यन्त आसक्त हैं, उन पुरुषों की परमात्मा में निश्चियात्मिका बुद्धि भी नहीं होती
 ॥42-44॥

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 45
श्लोक:
त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।
 निर्द्वन्द्वो नित्यसत्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्‌॥

भावार्थ:
हे अर्जुन! वेद उपर्युक्त प्रकार से तीनों गुणों के कार्य रूप समस्त भोगों एवं उनके साधनों का प्रतिपादन करने वाले हैं, इसलिए तू उन भोगों एवं उनके साधनों में आसक्तिहीन, हर्ष-शोकादि द्वंद्वों से रहित, नित्यवस्तु परमात्मा में स्थित योग (अप्राप्त की प्राप्ति का नाम 'योग' है।) क्षेम (प्राप्त वस्तु की रक्षा का नाम 'क्षेम' है।) को न चाहने वाला और स्वाधीन अन्तःकरण वाला हो
 ॥45।।

✍️सरल भावार्थ:

हे अर्जुन! वेदों में तीनों गुणों (सत्व, रज, तम) 
सत्व
सात्विक (सत्व गुण, प्रकृति के तीन गुणों में से एक है. यह गुण सच्चाई, अच्छाई, पवित्रता, ज्ञान, सामंजस्य, संतुलन, और शांति से जुड़ा होता है. सत्व गुण को शुद्धता, प्रकाश, और उत्तमता का गुण भी कहा जाता है. सत्व गुण से जुड़ी कुछ खास बातेंः 
 
सत्व गुण, आध्यात्मिक लोगों का गुण होता है. 
 
सत्व गुण वाले व्यक्ति को सात्विक कहा जाता है. 
 
सत्व गुण वाले व्यक्ति में खुशी, शांति, कल्याण, स्वतंत्रता, प्रेम, करुणा, समभाव, ध्यान, आत्म-नियंत्रण, संतुष्टि, कृतज्ञता, निर्भयता, और निस्वार्थता होती है. 
 
सत्व गुण वाले व्यक्ति हमेशा वैश्विक कल्याण के लिए काम करते हैं. 
 
सत्व गुण वाले व्यक्ति हमेशा मेहनती और सतर्क होते हैं. 
 
सत्व गुण वाले व्यक्ति पवित्र जीवन जीते हैं. 
 
सत्व गुण वाले व्यक्ति को ईश्वर पर भरोसा होता है. 
 
सत्व गुण वाले व्यक्ति सिर्फ़ देना जानते हैं. 
 
सत्व गुण वाले व्यक्ति बिना किसी भेदभाव के हर व्यक्ति के लिए त्याग कर सकते हैं. 
 
सत्व गुण के अलावा, प्रकृति के दो और गुण हैं - रजोगुण और तमोगुण. इन तीनों गुणों को त्रिगुण भी कहा जाता है. इन गुणों का प्रभाव सभी प्राणियों पर होता है. 
इसी प्रकार रजोगुण
रजोगुण का अर्थ है, प्रकृति का वह स्वभाव जिससे जीव-धारियों में भोग-विलास और दिखावे की रुचि पैदा होती है. सांख्य दर्शन के मुताबिक, रजोगुण, प्रकृति के तीन गुणों में से एक है. रजोगुण से जुड़ी कुछ खास बातेंः 
 
रजोगुण को गति, परिवर्तन, कर्म, और इच्छा का गुण कहा जाता है. 
 
रजोगुण के प्रभाव में व्यक्ति कामना, लालसा, और अहंकार की ओर प्रेरित होता है. 
 
रजोगुण की उत्पत्ति असीम आकांक्षाओं से होती है. 
 
रजोगुण से लोभ, अत्यधिक आसक्ति, और अनियंत्रित इच्छा पैदा होती है. 
 
रजोगुणी व्यक्ति खाने-पीने, आराम, मौज-शौक वाला होता है. 
 
रजोगुणी व्यक्ति टीवी, मोबाइल, मनोरंजन में समय, मन, और धन लगा देता है. 
 
रजोगुण का फल अंततोगत्वा दुख कारक होता है. 
 
रजोगुण, सांसारिक इच्छाओं और स्नेहों से उत्पन्न होता है. 
 
रजोगुण, सकाम कर्मों से आसक्ति के ज़रिए आत्मा को बांधता है. 
अब तमोगुण 
तमोगुण का अर्थ है - अंधकार, अज्ञान, और असंवेदनशीलता. तमोगुण, प्रकृति के तीन गुणों में से एक है. ये तीन गुण हैं - सतोगुण, रजोगुण, और तमोगुण. इन तीनों गुणों का योगदान ही सृष्टि को अस्तित्व में लाने में रहा है. तमोगुण से जुड़ी कुछ और बातेंः 
 
तमोगुण में लिप्त व्यक्ति अलसी, भ्रष्ट, विषादी, आलस्यमय, निंदक, शोकी, अशक्त, दुर्बल, दुष्ट, असत्यवादी, विवादास्पद, धृष्ट, अनभिज्ञ, असंयत, अनैतिक, विषयासक्त, अन्यायपरायण, अधर्मपरायण, ब्रह्मवादी और निंदक होता है. 
 
तमोगुण में किए गए कर्म का फल अज्ञान कहा गया है. 
 
तमोगुण की वृद्धि होने पर मृत्यु को प्राप्त मनुष्य पशु-पक्षियों आदि नीच योनियों में नरक को प्राप्त करता है. 
 
तमोगुण, दूषित और निकृष्ट माना गया है. 
 
तमोगुण, अंधकार, भ्रम, क्रोध, दुःख आदि का कारण होता है. 
 
जब कि स्तो रजो और तमो गुण सभी पुरुषों में एक समान होते है एक गुण आता है तो बाकी दो कुछ समय के लिए हट कर पुनः प्रकट होकर बल पूर्वक अपना कर्म भी करवा ही लेते है तो मनुष्य अपना उद्धार कैसे कर सकता है? 

गीता जिसे ज्योतिष विज्ञान वेदों का नेत्र बता है वही इस गीता के मार्ग दर्शक होना भी कहता है। और गीता ही अंधे की लाठी भी बन जाती है।

साक्षी (गवाह) 
गुरु मान्यो ग्रंथ जिस का मार्ग भी गीता जैसे पवित्र ग्रंथों में ही है
इन्हीं के आधार पर संसार के सभी भोगों और साधनों का वर्णन है। लेकिन तुम इन भोगों और उनके साधनों में आसक्त मत हो। 
द्वंद्वों (जैसे हर्ष-शोक, सुख-दुख) से ऊपर उठो, 
सदा स्थिर बुद्धि के साथ परमात्मा में स्थित रहो। तुम्हें न तो किसी वस्तु की प्राप्ति की चिंता होनी चाहिए (योग) और न ही प्राप्त की हुई वस्तु की सुरक्षा की। 
आत्मनिर्भर बनो और अपने मन को सच्चे आत्मज्ञान में स्थिर करो।
" सब ज्ञान को सीखने वालों को हुक्म है, 
"गुरु मानेओ ग्रंथ" 
वास्तव में 10वें सिख गुरु , गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1708 में अपनी मृत्यु से कुछ समय पहले, पवित्र ग्रंथ आदि ग्रंथ को अपने उत्तराधिकारी के रूप में पुष्टि करने पर दिया था यह उन्हीं का एक बयान है। इस कथन का अर्थ है कि "सभी सिखों(ज्ञान सीखने वालों  को ग्रंथ को ही गुरु के रूप में लेना चाहिए।)

केवल ग्रंथ पड़ने से भी कुछ होने वाला नहीं

प्रत्यक्ष ज्ञान का सहारा ही ले लेते है

जब हम अपनी पाठ शाला में किसी पाठ का अध्ययन करते है तो अंत में अभ्यास भी होता है जिस में कुछ प्रश्न होते है जिन को जान कर ही पाठ को समझा जा सकता है।

यहां तो अर्जुन की वृति ही प्रश्न करने की है अतः मनुष्य अर्जुन बनो अपने प्रश्नों को ग्रंथों के माध्यम या अपने अंदर के अंतःकरण से प्राप्त करो गीता पड़ो आगे बढ़ो

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 46

श्लोक:
यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके।
 तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः॥

भावार्थ:
सब ओर से परिपूर्ण जलाशय के प्राप्त हो जाने पर छोटे जलाशय में मनुष्य का जितना प्रयोजन रहता है, ब्रह्म को तत्व से जानने वाले ब्राह्मण का समस्त वेदों में भी उतना ही प्रयोजन रह जाता है शुद्ध झील के किनारे रह कर पानी पीने को कोई मूर्ख ही कुआं खोदे गा
 ॥46॥
भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 47

श्लोक:
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
 मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि॥

भावार्थ:
तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तू कर्मों के फल हेतु मत हो तथा तेरी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो
 ॥47॥
*❖════❃≛⃝❈⬤🪷
⬤≛⃝❈❃════❖*
भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 48

श्लोक:
योगस्थः कुरु कर्माणि संग त्यक्त्वा धनंजय।
 सिद्धयसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥

भावार्थ:
हे धनंजय! तू आसक्ति (अर्थात
मन का लगाव।प्रेम, अनुराग।)
 को त्यागकर तथा सिद्धि(.सफलता।निश्चय।
 और असिद्धि(अपूर्णता या विफलता)में समान बुद्धिवाला होकर योग में स्थित हुआ कर्तव्य कर्मों को कर, समत्व (जो कुछ भी कर्म किया जाए, उसके पूर्ण होने और न होने  की चिंता ना कर भी उसके फल में समभाव समभाव का अर्थ है शांति या संतुलन. रहने का नाम 'समत्व' है।) ही योग कहलाता है
 ॥48॥
✍️सकाम कर्म:जो काम हम किसी इच्छा या कामना से करते हैं, उसे सकाम कर्म कहते हैं. सकाम कर्म में हमारी कामना होती है कि इस कर्म को करने से हमें कोई फल मिलेगा. उदाहरण के लिए, स्त्री, पुत्र, धन आदि के लिए किए गए कर्म सकाम कर्म हैं. 
 
भगवत गीता के अनुसार, कर्म करने में ही अधिकार है, लेकिन उसके फल में नहीं. कर्म के फल की चाहत को अपना उद्देश्य नहीं बनाना चाहिए. भगवत गीता में निष्काम कर्म के बारे में बताया गया है. निष्काम कर्म में सिर्फ़ कर्म करने की इच्छा होती है, उसके फल में नहीं. निष्काम कर्म में कोई अपेक्षा नहीं होती और न ही यश-अपयश की चिंता होती. 
 
भगवत गीता में कर्म के बारे में कुछ और बातें:
मनुष्य को सकारात्मक भावना से लगातार कर्मशील रहना चाहिए. 
 
मनुष्य को कर्म अकर्म विक्रम से श्रेष्ठ मानना चाहिए. 
 
(कर्म से मनुष्य का जीवन, मोक्ष, और बंधन सब कुछ निर्धारित होता है. 
 कर्म करने के माध्यम से ही शुभ-अशुभ, पाप-पुण्य, धर्म-अधर्म तय होता है. )

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 49

श्लोक:
दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनंजय।
 बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः॥

भावार्थ:
इस समत्वरूप बुद्धियोग से सकाम कर्म अत्यन्त ही निम्न श्रेणी का है। इसलिए हे धनंजय! तू समबुद्धि में ही रक्षा का उपाय ढूँढ अर्थात्‌ बुद्धियोग का ही आश्रय ग्रहण कर क्योंकि फल के हेतु बनने वाले अत्यन्त दीन हैं
 ॥49॥

✍️संबद्धि युक्त:
समबुद्धियुक्त पुरुष पुण्य और पाप, दोनों को इसी लोक में त्याग देता है, यानी उनसे मुक्त हो जाता है। समत्व ही योग है और कर्मबंधन से छूटने का उपाय है। समता गीता की आत्मा है। जिनका मन समभाव में स्थित है, उन्होंने मानो जीवित अवस्था में संपूर्ण संसार को जीत लिया है क्योंकि परमात्मा निर्दोष और सम है।

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 50

श्लोक:
बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।
 तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्‌॥

भावार्थ:
समबुद्धियुक्त पुरुष पुण्य और पाप दोनों को इसी लोक में त्याग देता है अर्थात उनसे मुक्त हो जाता है। इससे तू समत्व रूप योग में लग जा, यह समत्व रूप योग ही कर्मों में कुशलता है अर्थात कर्मबंध से छूटने का उपाय है
 ॥50॥

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 51

श्लोक:
कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः।
 जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम्‌॥

भावार्थ:
क्योंकि समबुद्धि से युक्त ज्ञानीजन कर्मों से उत्पन्न होने वाले फल को त्यागकर जन्मरूप बंधन से मुक्त हो निर्विकार परम पद को प्राप्त हो जाते हैं (अहम ब्रह्म आसमी)

भाव अहं ब्रह्मास्मि' एक संस्कृत मंत्र है जिसका अर्थ है, 'मैं ब्रह्म हूं'. यह प्राचीन हिंदू ग्रंथ उपनिषद का एक महावाक्य है. यह अद्वैत परंपरा का मंत्र है. 'अहं ब्रह्मास्मि' के बारे में कुछ और बातेंः 
 
'अहं ब्रह्मास्मि' का उल्लेख सबसे पहले शुक्ल यजुर्वेद के बृहदारण्यक उपनिषद में मिलता है. 
 
'अहं ब्रह्मास्मि' में 'अहं' का मतलब है मनुष्य की आत्मा और 'ब्रह्म' का मतलब है सर्वव्यापी चेतना से है . 
 
'अस्मि' शब्द से ब्रह्म और जीव की एकता का बोध होता है. 
 
जब जीव परमात्मा का अनुभव कर लेता है, तब वह उसी का रूप हो जाता है. 
 
'अहं ब्रह्मास्मि' का मतलब है कि जिस भगवान ने ब्रह्मांड बनाया, उसका मैं अंश हूं. कोई टुकड़ा नहीं।
 
'अहं ब्रह्मास्मि' का मतलब है कि दूसरे को भी उस ब्रह्म की तरह समझना चाहिए. 
 
चारों वेदों में चार महावाक्य हैं: 
 
ऋग्वेद में - प्रज्ञानं ब्रह्म 
 
यजुर्वेद में - अहं ब्रह्मास्मि 
 
सामवेद में - तत्त्वमसि 
 आधारवेद भी ऐसा ही कहता है

तत्वमसि इस वेद के महावाक्य का क्या अर्थ हुआ?
इसका सीधा अर्थ है तुम और हम दो नहीं एक हैं।

विज्ञान भी अब मांगता है कि डीएनए स्तर पर दो आदमियों के बीच के डीएनए का अंतर नगण्य होता है।

आत्मा परमात्मा का कोई स्पष्ट साक्ष्य उपलब्ध नहीं है।

पर विज्ञान के अवसर पर यह पता चला है कि सभी चीजों का विकास बहुत बड़े लंबे समय अंतराल में हुआ है

एक एक तत्व को बनाने में अनगिनत तार लगे हुए हैं

जिन तत्वों से जाकर यह निर्जीव और सजीव संसार बना रहे।

कई भौतिक शक्तियां लगी हुई हैं इस संसार को बनाने में पर एक गैर भौतिक शक्ति भी है जिसे प्रेम कहते हैं यह कैसे उत्पन्न होता है और इसके पीछे का रहस्य क्या है इसी में शायद आत्मा और परमात्मा का निचोड़ छिपा होगा।

मैंने कोई बहुत ज्ञान अध्ययन तो नहीं किया है पर ऊपरी तौर पर मैं जब भी कई धार्मिक पुस्तकें पढ़ता हूं तुम मुझे उन विषयों पर संशय ही पैदा होता है।

एक भी मर कर लौटा होता तो भेद खुलता लेकिन मरने के बाद कोई भी वापस नहीं आया यही सत्य है।

और हम लोग इस विचित्र विशाल संसार को अपने-अपने ढंग से व्याख्या कर रहे हैं।

हम लोग सभी के भीतर एक टाइम घड़ी डाल दी गई है जीवन का शुरुआत हुआ है तो अंत भी जरूर होगा यही सत्य है।

मरने के बाद क्या होगा यह कोई नहीं बता सकता शायद हम जिन तत्वों से बने हैं वे तत्व किसी और तत्व में मिल जाएंगे पर हमें तो यह नही लगता कि कोई और स्वर्ग नर्क जैसी कोई चीज होती होगी

हां भगवान पर विश्वास करने से दुखी मन को थोड़ा सहारा तो जरूर मिलता है और लगता है कि शायद कोई इंसाफ करेगा कोई सहायता करेगा कोई दुष्टों का नाश करेगा।

पर सचमुच में भगवान होता है इसका कोई प्रमाण आधुनिक ज्ञान में उपस्थित नहीं है।

अब प्रत्यक्ष ज्ञान से देखे जो सभी के साथ कभी ना कभी घटित होता ही रहता है।
जैसे कोई काम जिसे हम मान ही लेते है कि होना असंभव है पर समय आने पर वो हो कैसे जाता है उस असाध्य काम को करने वाला परमात्मा ही होता है।।
॥51॥

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 52

श्लोक:
यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति।
 तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च॥

भावार्थ:
जिस काल में तेरी बुद्धि मोहरूपी दलदल को भलीभाँति पार कर जाएगी, उस समय तू सुने हुए और सुनने में आने वाले इस लोक और परलोक संबंधी सभी भोगों से वैराग्य को प्राप्त हो जाएगा
 ॥52॥
(भाव: ज्ञान से भगति और भगति से वैराग्य उत्पन होता है। किसी एक के प्राप्त होने से तीनों प्राप्त हो जाते है।।

वैराग्य सारा सार विवेक से आयी हुईं एक अंतरिक मानसिक स्थिति एक अंतर्मुख अवस्था है। वैराग्य व्यक्ति का सद सद विवेक जागने पर उत्पन्न होता है। वैराग्य संसार की जीवन की क्षणभंगुरता नश्वरता समझ में आने के बाद अंतर में स्वत घटने वाली एक घटना है।

वैराग्य शांति का जन्म दाता है। संसार के दुःख कष्ट और मृत्यु की याद वैराग्य उत्पन्न करने में सहायक होते हैं। संसार असत्य है दुःख दर्दों से भरा हुआ है। यहां की वास्तविकता यह है कि यहां केवल एक ईश्वर सत्य है। ऐसी और इस प्रकार के समझ की विकसित होने पर अंतर्मन में वैराग्य उत्पन्न होता है। जब नश्वरता का क्षणभंगुरता का अंतर्मन में पुरी तरह से एहसास हो जाता है तो वैराग्य उत्पन्न हो जाता है।

संसार है दो दिन का मेला,

और शरीर दो क्षण का बुलबुला जब बात समझ आ गई तो वैराग्य हो जाता है।

वैराग्य में तीव्रतम वैराग्य श्रेष्ठ है। यह अध्यात्मिकता में हाई वे का काम करता है। जिसके अंतर्मन में यह तीव्रतम वैराग्य उत्पन्न हो गया, जिसको जीवन की क्षणभंगुरता समझ में आ गयी वह आत्मज्ञान को भी उपलब्ध हो जाता है।

जब हम संसार के दुःख दर्दों को, जन्म मृत्यु को, चिंता बीमारियों को,भय और निराशा को अपनी विवेक विचार से, गंभीरता से सोचते हैं। उसपर विचार करते हैं तो अंतर्मन में वैराग्य उत्पन्न होता है।

जब हम हाड़ मांस हड्डियों की थैली यानी हमारा नाशवान शरीर और नाशवान प्रकृति को अपने विवेक से समझते हैं तो अंतर्मन में वैराग्य उत्पन्न होता है।
इस शरीर का कुछ भी पवित्र नहीं होता
आंखों की गिद्ध, लार, मल,मूत्र, कुछ भी पवित्र नहीं होता

(इस वैराग्य में तीव्रतम वैराग्य श्रेष्ठ है और यही अध्यात्मिकता का आत्मज्ञान का मूल है पहली सीढ़ी है। इस आत्मज्ञान की राह पर जब तक हमारे अंतर्मन में वैराग्य नहीं होता हम कही नहीं पहुंचते।)
भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 53

श्लोक:
श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला।
 समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि॥

भावार्थ:
भाँति-भाँति के वचनों(सतसंगों) को सुनने से विचलित हुई तेरी बुद्धि जब परमात्मा में अचल और स्थिर ठहर जाएगी, तब तू योग को प्राप्त हो जाएगा अर्थात तेरा परमात्मा से नित्य संयोग हो जाएगा
 ॥53॥
भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 54

श्लोक:
( स्थिरबुद्धि पुरुष के लक्षण और उसकी महिमा )
 अर्जुन उवाच
 स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव।
 स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्‌॥

भावार्थ:
अर्जुन बोले- हे केशव! समाधि में स्थित परमात्मा को प्राप्त हुए स्थिरबुद्धि पुरुष का क्या लक्षण है? वह स्थिरबुद्धि पुरुष कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है?
 ॥54॥
भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 55

श्लोक:
श्रीभगवानुवाच
 प्रजहाति यदा कामान्‌ सर्वान्पार्थ मनोगतान्‌।
 आत्मयेवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥

भावार्थ:
श्री भगवान्‌ बोले- हे अर्जुन! जिस काल में यह पुरुष मन में स्थित सम्पूर्ण कामनाओं को भलीभाँति त्याग देता है और आत्मा से आत्मा में ही संतुष्ट रहता है, उस काल में वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है
 ॥55॥

स्थितप्रज्ञ: स्थितप्रज्ञ का अर्थ है, जिसकी विवेकबुद्धि स्थिर हो. स्थिरप्रज्ञ व्यक्ति के बारे में कुछ और बातेंः
वह समस्त मनोविकारों से रहित होता है. 
 
वह आत्मा द्वारा आत्मा में ही संतुष्ट रहता है. 
 
वह सदा संतुष्ट और आनंदित रहता है. 
 
वह सुख-दुख, हानि-लाभ, मोह-विरक्ति, अपना-पराया, सभी स्थिति में न्यायपूर्ण व्यवहार करता है. 
 
वह अपने भीतर से सत्य का अनुभव कर लेता है. 
 
श्रीमद्भागवत गीता में स्थिर बुद्धि वाले व्यक्ति के लक्षण बताए गए हैं. इसमें बताया गया है कि ऐसे विकसित आत्मा के क्या गुण हैं, जो दिव्य चेतना में दृढ़ता से स्थित है. 
भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 56

श्लोक:
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।
 वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥

भावार्थ:
दुःखों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में उद्वेग नहीं होता, सुखों की प्राप्ति में सर्वथा निःस्पृह है तथा जिसके राग, भय और क्रोध नष्ट हो गए हैं, ऐसा मुनि स्थिरबुद्धि कहा जाता है
 ॥56॥
उद्वेग:तीव्र वेग, तेज़ी ,आवेश, और जोश
भाव:उद्वेग का भाव है, चित्त की किसी वृत्ति की तीव्रता. उद्वेग के कुछ और अर्थ: विरह जन्य चिंता, दुःख, किसी विकट या चिंताजनक घटना के कारण लोगों को होने वाला भय, तेज़ गति, जोश. आदि
निःस्पृह:इच्छारहित, वासनारहित।निर्लोभ (जैसे—निस्पृह प्राणी)।
भाव:निस्पृह का भाव है, किसी तरह की इच्छा या स्पृहा न होना. निस्पृह शब्द के कुछ और अर्थ: कामना रहित, भय रहित, लोभ या लालसा न होने का भाव!इस श्लोक में स्पष्ट एवं सरलता से श्री कृष्ण कह रहे है देखे 

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 57

श्लोक:
यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्‌।
 नाभिनंदति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥

भावार्थ:
जो पुरुष सर्वत्र स्नेहरहित हुआ उस-उस शुभ या अशुभ वस्तु को प्राप्त होकर न प्रसन्न होता है और न द्वेष करता है, उसकी बुद्धि स्थिर है
 ॥57॥
✍️विश्लेषण
इस श्लोक का सरल भाव यह है:
जैसे कछुआ अपने अंगों को समेट लेता है, वैसे ही जब मनुष्य अपनी इंद्रियों को विषयों से हटा लेता है, तो उसकी बुद्धि स्थिर और एकाग्र हो जाती है।

इसका अर्थ यह है कि:

- हमें अपनी इंद्रियों को विषयों से हटाना चाहिए।
- हमें अपनी इंद्रियों को नियंत्रित करना चाहिए।
- जब हम अपनी इंद्रियों को नियंत्रित करेंगे, तो हमारी बुद्धि स्थिर और एकाग्र होगी।

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि कैसे अपनी इंद्रियों को नियंत्रित करके अपनी बुद्धि को स्थिर और एकाग्र बना सकते हैं।

यह श्लोक हमें निम्नलिखित बातें सिखाता है:

- आत्म-नियंत्रण की महत्ता
- इंद्रियों को नियंत्रित करने की आवश्यकता
- बुद्धि की स्थिरता और एकाग्रता की महत्ता
प्रश्न क्या ऐसा करना सरल है अगर हां तो किसी गुरुमंत्र के जप,तप,आदिको एकाग्रता से कर पाना ही सरल होगा बिना एकाग्रता के तो समाधि भी नहीं लगती 
जब मनुष्य सो जाता है तो ही एकाग्र मन की स्थिति उत्पन होती है। सोते हुए भी मनुष्य राम राम ही जप रहा होता है।
इंद्रियां अपना कार्य कर रही है और करती भी रहेगी कोई इनको रोक नहीं सकता जब इंद्रिय काम करना बंद करती है तो देह मिट्टी हो जाती है।मन से जुड़ कर ही इंद्रिय भले बुरे कर्म करवा कर कर्म फल त्यार करवा ने में माहिर है।

(महात्म्यं देवदेवस्य येन सर्वं प्रवर्तते ॥25॥

सूतजी बोले-हे ब्रह्मवादी ऋषियो! तुम सावधान होकर सुनो हम उन देवदेव आदि पुरुषका माहात्म्य कहते हैं जिनसे यह सम्पूर्ण जगत् प्रवृत हुआ है।।२५।।

नहं तपोभिर्विविधिर्न दानैर्नापि चेज्यया।। शक्यो हि पुरुषैर्ज्ञातुमृते भक्तिमनुत्तमम् ॥26॥

शिवजी बोले-अनेक प्रकारके तप ज्ञान दान और यज्ञसे पुरुष मुझे इस प्रकार नहीं जान सकते जिस प्रकार श्रेष्ठ भक्ति करनेवाले मुझको जाननेको समर्थ होते हैं इससे केवल श्रेष्ठ भक्ति करनेवाले मुझे शीघ्र जान सकते हैं।॥२६॥ 
भगति से ज्ञान ज्ञान से वैराग्य उत्पन होता है।
इंद्रियों को रोक पाना कठिन ही नहीं असंभव भी है।
सांसे रोक कर योग करने वाले हठ योगी भी जानते है । कुछ क्रियाएं करने या ना करने से भी इंद्रियां अपना कार्य स्वाभाविक रूप में करती ही रहती है।जिनको रोकना साधारण मनुष्य के बस में ही नहीं
तुम देखो ना देखो नेत्र दिखा ही दे गे 
नाक गंध सुगंध का अहसास करवा ही देगी 
भाव इंद्रियों नियंत्रित करना संभव नहीं जितना आसानी से कह दिया जाता है।
चिंता की कोई बात नहीं गीता जी मार्ग दर्शन के रूप में तो हर ही।

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 59

श्लोक:
विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः।
 रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्टवा निवर्तते॥

भावार्थ:
इन्द्रियों द्वारा विषयों को ग्रहण न करने वाले पुरुष के भी केवल विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, परन्तु उनमें रहने वाली आसक्ति निवृत्त नहीं होती। इस स्थितप्रज्ञ पुरुष की तो आसक्ति भी परमात्मा का साक्षात्कार करके निवृत्त हो जाती है
 ॥59॥
भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 60

श्लोक:
यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः।
 इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः॥

भावार्थ:
हे अर्जुन! आसक्ति का नाश न होने के कारण ये प्रमथन स्वभाव वाली इन्द्रियाँ यत्न करते हुए बुद्धिमान पुरुष के मन को भी बलात्‌ हर लेती हैं
 ॥60॥
भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 61

श्लोक:
तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः।
 वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥

भावार्थ:
इसलिए साधक को चाहिए कि वह उन सम्पूर्ण इन्द्रियों को वश में करके समाहित चित्त हुआ मेरे परायण होकर ध्यान में बैठे क्योंकि जिस पुरुष की इन्द्रियाँ वश में होती हैं, उसी की बुद्धि स्थिर हो जाती है
 ॥61॥

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 62

श्लोक:
ध्यायतो विषयान्पुंसः संगस्तेषूपजायते।
 संगात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥

भावार्थ:
विषयों का चिन्तन करने वाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है, आसक्ति(मनका लगाव)ओर इस से उन विषयों की कामना उत्पन्न होती है और कामना में विघ्न पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है
 ॥62॥
भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 63

श्लोक:
क्रोधाद्‍भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः।
 स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥

भावार्थ:
क्रोध से अत्यन्त मूढ़ भाव उत्पन्न हो जाता है, मूढ़ भाव से स्मृति में भ्रम हो जाता है, स्मृति में भ्रम हो जाने से बुद्धि अर्थात ज्ञानशक्ति का नाश हो जाता है और बुद्धि का नाश हो जाने से यह पुरुष अपनी स्थिति से गिर जाता है
 ॥63॥
भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 64

श्लोक:
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्‌।
 आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति॥

भावार्थ:
परंन्तु अपने अधीन किए हुए अन्तःकरण वाला साधक अपने वश में की हुई, राग-द्वेष रहित इन्द्रियों द्वारा विषयों में विचरण करता हुआ अन्तःकरण की प्रसन्नता को प्राप्त होता है
 ॥64॥
✍️अंतःकरण:
भाव 
अंतःकरण, हिन्दू दर्शन में मन की समग्रता को कहते हैं. इसमें सोचने की क्षमता, अहंकार, और विवेक करने की क्षमता शामिल होती है. अंतःकरण शब्द का अर्थ है 'आंतरिक अंग', 'आंतरिक कार्य', या 'आंतरिक साधन'. अंतःकरण के बारे में कुछ और बातेंः
अंतःकरण को चार भागों में बांटा गया है: 
 मन या निचला मन 
 बुद्धि या उच्च मन 
 चित्त या स्मृति 
 अहंकार या मैं-निर्माता 
 अंतःकरण को मध्यम और उच्च मन के बीच की कड़ी माना जाता है. 
 योग में अंतःकरण का मतलब है मानसिक प्रक्रियाएं, मानसिक शुद्धि, और आंतरिक शांति. 
 अंतःकरण को अंतश्चेतना भी कहा जाता है. 
 
अंतःकरण से जुड़ी कुछ और बातेंः

(अंतःकरण की स्वतंत्रता का मतलब है कि सभी को अपने धर्म को मानने, अभ्यास करने, और प्रचार करने की आज़ादी हो।केवल मूर्ख बनाने का वॉट्सएप यूनिवासिटी ज्ञान भर है।)
 
शुद्ध अंतःकरण का मतलब है कि मन साफ़ हो और उसमें कोई बुराई न हो.सब का साथ हो सब का विकास हो।
भगवान ने जिस धर्म में जन्म दिया उसी के अनुरासर 
खाना
बाना (पहरावा)
और बानी हो
सम्मान सभी का हो
✍️भाव एक नदी
हिंदू, मुस्लिम,सिख,ईसाई,सभी को अपना जल पिला मन को शीतलता प्रदान करती है।
जिस जगह चारों धर्म मिल कर बैठते हे गर्मी से बचने को किसी वृक्ष के नीचे वही पर भगवान हाजिर होते है।
यहां तो तेरा घर मेरा घर होता है

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 65

श्लोक:
प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते।
 प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते॥

भावार्थ:
अन्तःकरण की प्रसन्नता होने पर इसके सम्पूर्ण दुःखों का अभाव हो जाता है और उस प्रसन्नचित्त वाले कर्मयोगी की बुद्धि शीघ्र ही सब ओर से हटकर एक परमात्मा में ही भलीभाँति स्थिर हो जाती है
 ॥65॥
भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 66

श्लोक:
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।
 न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्‌॥

भावार्थ:
न जीते हुए मन और इन्द्रियों वाले पुरुष में निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती और उस अयुक्त मनुष्य के अन्तःकरण में भावना भी नहीं होती तथा भावनाहीन मनुष्य को शान्ति नहीं मिलती और शान्तिरहित मनुष्य को सुख कैसे मिल सकता है?
 ॥66॥
भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 67

श्लोक:
इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते।
 तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि॥

भावार्थ:
क्योंकि जैसे जल में चलने वाली नाव को वायु हर लेती है, वैसे ही विषयों में विचरती हुई इन्द्रियों में से मन जिस इन्द्रिय के साथ रहता है, वह एक ही इन्द्रिय इस अयुक्त पुरुष की बुद्धि को हर लेती है
 ॥67॥

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 68

श्लोक:
तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः।
 इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥

भावार्थ:
इसलिए हे महाबाहो! जिस पुरुष की इन्द्रियाँ इन्द्रियों के विषयों में सब प्रकार निग्रह की हुई हैं, उसी की बुद्धि स्थिर है
 ॥68॥

भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 69

श्लोक:
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।
 यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः॥

भावार्थ:
सम्पूर्ण प्राणियों के लिए जो रात्रि के समान है, उस नित्य ज्ञानस्वरूप परमानन्द की प्राप्ति में स्थितप्रज्ञ योगी जागता है और जिस नाशवान सांसारिक सुख की प्राप्ति में सब प्राणी जागते हैं, परमात्मा के तत्व को जानने वाले मुनि के लिए वह रात्रि के समान है
 ॥69॥
काली रात अज्ञानता को दर्शाती है रात भर उल्लू की तरह जागने को नहीं।
भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 70

श्लोक:
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं-
 समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्‌।
 तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे
 स शान्तिमाप्नोति न कामकामी॥

भावार्थ:
जैसे नाना नदियों के जल सब ओर से परिपूर्ण, अचल प्रतिष्ठा वाले समुद्र में उसको विचलित न करते हुए ही समा जाते हैं, वैसे ही सब भोग जिस स्थितप्रज्ञ पुरुष में किसी प्रकार का विकार उत्पन्न किए बिना ही समा जाते हैं, वही पुरुष परम शान्ति को प्राप्त होता है, भोगों को चाहने वाला नहीं
 ॥70॥
भगवद  गीता अध्याय: 2
श्लोक 71

श्लोक:
विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः।
 निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति॥

भावार्थ:
जो पुरुष सम्पूर्ण कामनाओं को त्याग कर ममतारहित, अहंकाररहित और स्पृहारहित हुआ विचरता है, वही शांति को प्राप्त होता है अर्थात वह शान्ति को प्राप्त है
 ॥71॥
पहले श्लोक में 47 श्लोक
दूसरे अध्याय में कुल 72 श्लोक मिले
इन्हीं पर पूरी गीता की जानकारी समाई हुई है इनको अच्छे से समझ लेने से पूरी गीता समझ में आ जाती है।
........ 🕯️दूसरा अध्याय समाप्त
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अध्याय 2 समाप्त

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