गुरुवार, 28 दिसंबर 2023

मास्टर मदन

मास्टर मदन
#28dic
#05jun 
मदन
🎂28 दिसंबर 1927
खान खाना , शहीद भगत सिंह नगर जिला
⚰️मृत05 जून 1942 (14 वर्ष की आयु)
अन्य नामों
ग़ज़ल सम्राट
पेशा गायक
संगीत कैरियर
शैलियां
ग़ज़ल और गीत
उपकरण
वोकल्स
सक्रिय रहे
1937-1941
स्वतंत्रता-पूर्व युग के भारत के एक प्रतिभाशाली ग़ज़ल और गीत गायक थे। अपने जीवन के दौरान, उन्होंने केवल आठ गाने रिकॉर्ड किए, और ये अब आम तौर पर उपलब्ध हैं। उनका जन्म 28 दिसंबर 1927 को पंजाब के जिला जालंधर (अब नवांशहर ) के एक गांव खान खाना में हुआ था ।  इस गांव की स्थापना अकबर के प्रतिष्ठित दरबारी अब्दुल रहीम खान-ए-खाना ने की थी, जो एक विपुल लेखक थे। 5 जून 1942 को उनकी मृत्यु हो गई, कथित तौर पर शिमला में उनके दूध में पारा विषाक्तता के कारण ।
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उनके गाने हैं:

बागां विच पींगण पइयां ( पंजाबी )
रावी दे पारले कांडेय ( पंजाबी )
यूं ना रह रह कर हमें तरसाए ( उर्दू ग़ज़ल )
हेरात से तक रहे हैं जहां वफ़ा मुझे ( उर्दू ग़ज़ल )
गोरी गोरी बाइयां ( ठुमरी )
मोरी बिनती मानो कान्हा रे ( ठुमरी )
मन की मन ही माही राही ( गुरबानी )
चेतना हे तो चेत ले ( गुरबानी )

ख्वाजा परवेज

ख्वाजा परवेज़
#28dic
#20jun 
ख्वाजा गुलाम मोहिउद्दीन
🎂28 दिसंबर 1930
अमृतसर , ब्रिटिश भारत

⚰️20 जून 2011 (आयु 80 वर्ष)
लाहौर , पाकिस्तान
राष्ट्रीयता पाकिस्तानी
व्यवसाय
फ़िल्म गीतकार , फ़िल्म पटकथा लेखक,

पुरस्कार
1985, 1992, 1993, 1994 और 1995 में 5 निगार पुरस्कार
ख्वाजा गुलाम मुहायुद्दीन, जिन्हें ख्वाजा परवेज़ के नाम से जाना जाता है, का जन्म ब्रिटिश भारत के पंजाब के अमृतसर में एक कश्मीरी मुस्लिम परिवार में हुआ था । 1947 में पाकिस्तान की आज़ादी के बाद उनका परिवार भी लाहौर चला गया। उन्होंने 1954 में दयाल सिंह कॉलेज , लाहौर से स्नातक की उपाधि प्राप्त की

ख्वाजा परवेज के कॉलेज मित्र जफर इकबाल, जो फिल्म निर्देशक वली साहब के बेटे थे, ने उन्हें अपने पिता से मिलवाया, जिन्होंने बाद में उन्हें सहायक के रूप में काम पर रखा। उन्होंने वली साहब के साथ तब काम किया जब वे गुड्डी गुड्डा (1956 फ़िल्म), लुकन मिटी (1959) और सोहनी कुम्हारन (1960) बना रहे थे।

गीतकार के रूप में ख्वाजा परवेज़ की पहली फिल्म 1965 में पाकिस्तान में दिलजीत मिर्जा की रावज थी। उन्हें फिल्म आइना (1966) के गाने "तुम ही हो मेहबूब मेरे" से बड़ी सफलता मिली, जिसे आइरीन परवीन और मसूद राणा ने गाया था , संगीत मंजूर अशरफ ने दिया था, जो बाद में संगीत निर्देशक एम अशरफ के नाम से जाने गए । उनके गीतों में "सुन्न वे बलोरी अख वालेया", "जब कोई प्यार सै बुलाई गा, तुम को ऐक शख़्स याद अई गा", "किसय दा यार ना विचरे", "माही आवे गा, मैं फुल्लन नाल धरती सजावां गी", शामिल हैं। मेरी चीची दा छल्ला माही ला लाया'' और ''दो दिल इक दूजे कोलुं दूर हो गए'', ''तेरे बिना यूं घरियां बीतीं,जैसै साड्डियां बीत गईं'', ''जान-ए-जान तू जो काहे,गाऊं में गीत नाय'', '' दिल-ए- वीरां हाय, तेरी याद हाय, तन्हाई है''...आदि

उन्होंने अपने जीवनकाल में 40 साल से अधिक के करियर में पंद्रह हजार से अधिक फ़िल्मी गीत लिखे थे, जिनमें से पाँच हज़ार से अधिक फ़िल्मी गीत अकेले नूरजहाँ ने गाए थे। वह एक सुप्रसिद्ध और लोकप्रिय फिल्म गीतकार थे और उनके गीत मेहदी हसन , मसूद राणा , अहमद रुश्दी , नाहिद अख्तर , मेहनाज , रूना लैला , माला (पाकिस्तानी गायक) सहित उस समय के लगभग सभी प्रसिद्ध गायकों द्वारा गाए गए थे। , नय्यारा नूर , इनायत हुसैन भट्टी , मुसर्रत नज़ीर और कई अन्य। प्रसिद्ध नुसरत फतेह अली खान द्वारा गाए गए अधिकांश लोकप्रिय कव्वाली गाने ख्वाजा परवेज द्वारा लिखे गए थे ।
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कुछ मशहूर गीत

तुम ही हो मेहबूब मेरे गाया था आइरीन परवीन और मसूद राणा ने

"मेरी चीची दा छल्ला माही ला लाया" गायक थी  नूरजहाँ

जब कोई पियार से बुलाये गा गायक मेहदी हसन

सुन्न वे बलोरी अख वालेया गायक नूरजहाँ

दिल भी दहक दहक पाए धमालां, नाचन लग पाए साह, सोहनिया तेरे जी सदकाय, होरे में आखां की सदकाय 
गायक नूरजहाँ

वे सब तौं सोहनिया, हाय वे मुन मोहनिया 
गायक तसव्वर खानम

अख लारि बड़ो बदी, मौका मिलाय कदी कदी
गायक नूरजहाँ

नैशियन ने सादिया, हुलिया विगारिया गायक मसूद राणा

प्यार भरे दो शर्मीली नैन गायक मेहदी हसन

मेरी वेल दी क़मीज़ अज्ज फट गई ऐ गायक नूरजहाँ

यही है प्यारी जिंदगी, कभी हैं गम कभी खुशी गायक अखलाक अहमद

जय मैं हुंदी ढोलना सोने दी तावीत्री गायक नूरजहाँ

माही आवे गा में फुल्लन नाल धरती सजावन गी गायक नूरजहाँ

मेरा लौंग गवाचा [गायक] मुसर्रत नजीर

सहनूं इक पल चैन न आवे सजना तेरे बिना [गायक]नुसरत फतह अली खान

अखियाँ उड़ीक दियाँ 
गायक नुसरत फतह अली खान

जो ना मिल सके वही बेवफा गायक नूरजहाँ

परवेज़ का 78 वर्ष की उम्र में अस्थमा और मधुमेह की लंबी बीमारी के बाद लाहौर के मेयो अस्पताल में निधन हो गया । वह अपने पीछे दो विधवाएँ, पाँच बेटे, छह बेटियाँ और पाँच निगार पुरस्कार छोड़ गए । उन्हें लाहौर के मियां साहिब कब्रिस्तान में दफनाया गया था, जहां लोक गायक शौकत अली , अभिनेता इफ्तिखार ठाकुर और सोहेल अहमद सहित कई शोबिज हस्तियां उपस्थित थीं । प्रसिद्ध फिल्म निर्माता सैयद नूर और शहजाद रफीक भी उपस्थित थे । उनके साथी शायर रियाज़ उर रहमान सागर ने कहा कि ख्वाजा परवेज़ ने हमेशा दूसरे कलाकारों की मुश्किल घड़ी में मदद की.

हुस्न लाल और भगत राम बॉलीवुड की पहली दिग्गज संगीत निर्देशक जोड़ी


हुस्न लाल और भगत राम बॉलीवुड की पहली दिग्गज संगीत निर्देशक जोड़ी थीं । वे दो भाई हैं,
हुस्न लाल
🎂08 अप्रैल 1920
⚰️28 दिसंबर 1968

भगत राम
🎂1914
⚰️29 नवंबर 1973

हुस्न लाल एक प्रसिद्ध वायलिन वादक, गायक (भारतीय शास्त्रीय संगीत) और संगीतकार भी थे, लेकिन गायक के रूप में उनकी प्रतिभा आमतौर पर ज्ञात नहीं है। भगत राम एक कुशल हारमोनियम वादक माने जाते थे।

भगत राम ने 1930 के दशक में अकेले "भगत राम बातिश" नाम से कुछ फिल्मों के लिए संगीत तैयार किया। 1944 में, वह और हुस्न लाल पहली बार हुस्न लाल - भगत राम नाम से एक फिल्म के लिए संगीत तैयार करने के लिए एकजुट हुए। दोनों भाई 1940 और 1950 के दशक की शुरुआत में लोकप्रिय संगीतकार थे, लेकिन 1955 के बाद उनका करियर ख़राब हो गया।
उनके सबसे पुराने चचेरे भाई पंडित अमरनाथ या अमर नाथ भी 1940 के दशक में एचएमवी और फिल्म संगीत के संगीतकार थे । इन दो महान प्रतिपादकों ने संगीत निर्देशकों शंकर ( शंकर-जयकिशन के ), लक्ष्मीकांत शांताराम कुडालकर ( लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के ), खय्याम , गायक महेंद्र कपूर और गायक-संगीतकार एस. मोहिंदर को प्रशिक्षित किया । भाइयों का जन्म काहमा, पंजाब, ब्रिटिश भारत में हुआ था ।
मशहूर संगीतकार जोड़ी हुस्नलाल भगतराम के हुस्नलाल की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि



भारतीय फिल्म संगीत जगत में अपनी धुनों के जादू से श्रोताओं को मदहोश करने वाले संगीतकार तो कई हुए थे और उनका जादू भी श्रोताओं के सर चढ़कर बोला लेकिन उनमें कुछ ऐसे भी थे, जो बाद में गुमनामी के अंधेरे में खो गए और आज उन्हें कोई याद भी नहीं करता। फिल्म इंडस्ट्री की पहली संगीतकार जोड़ी हुस्नलाल-भगतराम भी ऐसी ही एक प्रतिभा थे। आवाज की दुनिया के बेताज बादशाह मोहम्मद रफी को प्रारंभिक सफलता और पहचान दिलाने में हुस्नलाल-भगतराम का अहम योगदान रहा था। चालीस के दशक के अंतिम वर्षों में जब मोहम्मद रफी फिल्म इंडस्ट्री में बतौर पाश्र्वगायक अपनी पहचान बनाने में लगे थे तो उन्हें काम ही नहीं मिलता था। तब हुस्नलाल-भगतराम की जोड़ी ने उन्हें एक गैर फिल्मी गीत गाने का अवसर दिया था। वर्ष 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद इस जोड़ी ने मोहम्मद रफी को राजेन्द्र कृष्ण रचित गीत ... सुनो सुनो ऐ दुनिया वालो बापू की अमर कहानी... गाने का अवसर दिया।

देशभक्ति के जज्बे से परिपूर्ण यह गीत श्रोताओं में काफी लोकप्रिय हुआ। इसके बाद अन्य संगीतकार भी मोहम्मद रफी की प्रतिभा को पहचानकर उनकी तरफ आकर्षित हुए और अपनी फिल्मों में उन्हें गाने का मौका देने लगे। मोहम्मद रफी हुस्नलाल-भगतराम के संगीत बनाने के अंदाज से काफी प्रभावित थे और उन्होंने कई मौकों पर इस बात का जिक्र भी किया है। मोहम्मद रफी सुबह चार बजे ही इस संगीतकार जोड़ी के घर तानपुरा लेकर चले जाते थे जहां वह संगीत का रियाज किया करते थे। हुस्नलाल भगतराम ने मोहम्मद रफी के अलावा कई अन्य संगीतकारों को पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभाई थी। सुप्रसिद्ध संगीतकार जोड़ी शंकर जयकिशन ने हुस्नलाल-भगतराम से ही संगीत की शिक्षा हासिल की थी।

मशहूर संगीतकार लक्ष्मीकांत भी उन्हीं से वायलिन बजाना सीखा करते थे। छोटे भाई हुस्नलाल का जन्म 1920 में पंजाब में जालंधर जिले के कहमां गांव में हुआ था जबकि बड़े भाई भगतराम का जन्म भी इसी गांव में वर्ष 1914 में हुआ था। बचपन से ही दोनों का रुझान संगीत की ओर था। हुस्नलाल वायलिन और भगतराम हारमोनियम बजाने में रुचि रखते थे। हुस्नलाल और भगतराम ने संगीत की प्रारंभिक शिक्षा अपने बड़े भाई और संगीतकार पंडित अमरनाथ से हासिल की। इसके अलावा उन्होंने पंडित दिलीप चंद बेदी से से भी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ली थी। वर्ष 1930 ..1940 के दौरान संगीत निर्देशक शास्त्रीय संगीत की राग-रागिनी पर आधारित संगीत दिया करते थे लेकिन हुस्नलाल-भगतराम इसके पक्ष में नहीं थे।

उन्होंने शास्त्रीय संगीत में पंजाबी धुनों का मिश्रण करके अलग तरह का संगीत देने का प्रयास दिया और उनका यह प्रयास काफी सफल भी रहा। हुस्नलाल-भगतराम ने अपने सिने कैरियर की शुरूआत वर्ष 1944 में प्रदर्शित फिल्म चांद से की। इस फिल्म में उनके संगीतबद्ध गीत..दो दिलों की ये दुनिया..श्रोताओं में काफी लोकप्रिय हुए लेकिन फिल्म की असफलता के कारण संगीतकार के रूप में वे अपनी खास पहचान नही बना सके। वर्ष 1948 में प्रदर्शित फिल्म प्यार की जीत में अपने संगीतबद्ध गीत 'एक दिल के टुकड़े हजार हुए की सफलता के बाद हुस्नलाल-भगतराम फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने में कामयाब हो गए। मोहम्मद रफी की आवाज में कमर जलालाबादी रचित यह गीत आज भी रफी के दर्द भरे गीतों में विशिष्ट स्थान रखता है लेकिन दिलचस्प बात यह है कि हुस्नलाल-भगतराम ने यह गीत फिल्म प्यार की जीत के लिए नहीं बल्कि फिल्म सिंदूर के लिए संगीतबद्ध किया था।

सिंदूर के निर्माण के समय जब हुस्नलाल-भगतराम ने फिल्म निर्माता शशिधर मुखर्जी को यह गीत सुनाया तो उन्होंने इसे अनुपयोगी बताकर फिल्म में शामिल करने से मना कर दिया। बाद में निर्माता ओ.पी.दत्ता ने इस गीत को अपनी फिल्म 'प्यार की जीत में इस्तेमाल किया । वर्ष 1950 में प्रदर्शित फिल्म बड़ी बहन में अपने संगीतबद्ध गीत..चुप चुप खड़े हो जरूर कोई बात है..की सफलता के बाद हुस्नलाल-भगतराम फिल्म इंडस्ट्री में चोटी के संगीतकारों में शुमार हो गए। इस गीत से जुड़ा एक रोचक तथ्य है कि उस जमाने में गांवों में रामलीला के मंचन से पहले दर्शकों की मांग पर इसे अवश्य बजाया जाता था। लता मंगेशकर और प्रेमलता द्वारा गाए इस गीत की तासीर आज भी बरकरार है।

साठ के दशक मे पाश्चात्य गीत-संगीत की चमक से निर्माता-निर्देशक अपने आप को नहीं बचा सके और धीरे धीरे निर्देशकों ने हुस्नलाल-भगतराम की ओर से अपना मुख मोड़ लिया। इसके बाद हुस्नलाल दिल्ली चले गए और आकाशवाणी में काम करने लगे, जबकि भगतराम मुंबई में ही रहकर छोटे-मोटे स्टेज कार्यक्रम हिस्सा में लेने लगे। भगतराम 26 नवंबर 1973 को बड़ी ही खामोशी के साथ इस दुनिया को अलविदा कह गए । हुस्नलाल इससे पहले 28 दिसंबर 1968 को चल बसे थे।

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लोक प्रिय गीत

हुस्नलाल भगतराम की कुछ सर्वश्रेष्ठ रचनाओं की एक संक्षिप्त सूची निम्नलिखित है:

चले जाना नहीं ( बारी बहन )
चुप चुप खड़े हो ( बारी बहन )
वो मेरी तरफ यूं चले आ रहे - काफिला
लहरों से पूछ लो - काफ़िला
तेरे नैनों ने चोरी किया ( प्यार की जीत )
क्या यही तेरा प्यार था ( मिर्जा साहिबान )
हाथ सीने पे जो रख दो तो क़रार आ जाए ( मिर्जा साहिबान )
ओ परदेसी मुसाफिर, कैसे करता है इशारे ( बलम ) - लता मंगेशकर और सुरैया के बीच एक दुर्लभ युगल गीत
हमें दुनिया को दिल के जख्म ( आधी रात )
ओ माही ओ दुपट्टा मेरा देदे ( मीना बाजार )
अपना बना के छोड़ नहीं जाना ( मीना बाज़ार )
ऐ सनम, मैं तुझे पुकारूं सनमसनम ( सनम )
शाम ए बहार आई -शमा परवाना
अभी तो मैं जवां हूं ( अफसाना ) - लता मंगेशकर के सर्वश्रेष्ठ गीतों में से एक , यह वर्षों तक रेडियो सीलोन पर इसी नाम के एक लोकप्रिय कार्यक्रम का शीर्षक गीत था।
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उनके श्रेय वाली फ़िल्मों में शामिल हैं:

चांद, 1944, प्रभात फिल्म कंपनी , पुणे द्वारा
मिर्ज़ा साहिबान (1947 फ़िल्म) (इस फ़िल्म का एकमात्र संगीत पंडित अमरनाथ (बड़े चचेरे भाई) और दो भाई हुस्न लाल भगत राम तीनों ने तैयार किया था)
आज की रात (1948)
अमर कहानी , 1949
बड़ी बहन (1949)
बालम (1949)
प्यार की जीत (1948)
आधी रात (1950)
मीना बाज़ार (फ़िल्म) (1950)
अफसाना (1951)
सनम (1951)
काफिला (1952)
शमा परवाना (1954)
अदल-ए-जहाँगीर (1955 फ़िल्म)
शहीद भगत सिंह (1963 फ़िल्म)
मैं जट्टी पंजाब दी (1964) - पंजाबी फिल्म

डेविड

डेविड
#28dic
#01jan 
डेविड
जन्म 01जनवरी 1909_08
डेविड इब्राहिम च्युलकर

मौत
28 दिसम्बर 1981
टोरोंटो, कनाडा
कार्यकाल

जीवनसाथी अविवाहित
डेविड अब्राहम या सिर्फ़ डेविड (1909–28दिसम्बर 1981) जैसा वह जाने जाते थे, हिन्दी फ़िल्म के एक चरित्र अभिनेता थे। चार दशकों के लम्वे व्यवसायी समय में आपने कई यादगार फ़िल्मों में काम किया है जैसे बूट पॉलिश, चुपके चुपके, बातों बातों में इत्यादि।
अभिनेता डेविड अब्राहम चेउलकर की 
खेलों की दुनिया में कोई बड़ा मौका नहीं मिला, वकालत चली नहीं, बस शौक में फिल्मों में अभिनय क्या किया वही उनका कैरियर बन गया। उनका नाम था डेविड। कद तो महज पांच फुट तीन इंच था, लेकिन छोटा कद उन्हें फिल्मों में लंबी पारी खेलने से नहीं रोक पाया।

21 जून 1909 को महाराष्ट्र के ठाणे में जन्मे डेविड अब्राहम एक संपन्न यहूदी परिवार से संबंध रखते थे। उनकी परवरिश मुंबई में हुई, जहां उनके पिता रेलवे में इंजीनियर थे। उन्हें कसरत करने का खासा शौक था और घरवालों की ख्वहिश के चलते कानून की पढ़ाई पूरी की, लेकिन इस दौरान उनकी खेलों में रूचि बढ़ती गयी। वे न सिर्फ वेटलिफ्टिंग करने लगे बल्कि कई प्रतियोगिताएं भी जीतीं। कानून की पढ़ाई के बाद डेविड अदालत में बैठने लगे, मगर कई महीने तक कोई केस ही नहीं मिला। उन्होंने नौकरी ढूंढने की भी जीतोड़ कोशिश की, लेकिन कामयाबी नहीं मिली। खेलों की दुनिया ने उन्हें शोहरत तो जरूर दी लेकिन इतना पैसा नहीं मिला कि खेलों को अपना कैरियर बना पाते।

कालेज के दिनों में डेविड इंडियन पीपुल्स थियेटर से जुड़े थे। उसी दौर के एक दोस्त ने उनके मन में फिल्मों के प्रति दिलचस्पी जगायी। डेविड काम की तलाश में बहुत परेशान थे और कुछ पैसे कमाने के लिए वे फिल्मों में काम करने को राजी हो गए। 1937 में फिल्म ‘जम्बो’ में उन्हें छोटा सा रोल मिला। इसमें युवा डेविड को एक बूढ़े प्रोफेसर का किरदार निभाना पड़ा। इसके बाद एक दो और फिल्मों में उन्होंने कुछ छोटे छोटे रोल किए। फिर फिल्म ‘नया संसार’ (1940) में उन्हें अहम रोल मिला और उनकी पहचान एक अभिनेता के रूप में बनी। 1944 में आई फिल्म ‘द्रौपदी’ में शकुनी का किरदार निभा कर डेविड ने अपने अभिनय की नयी रेंज का प्रदर्शन किया।

संवाद याद करने, कैमरे का सामना करने और फिल्म यूनिट में लोगों के साथ बात चीत करना डेविड को इतना भाता था कि फिर उन्होंने किसी और दूसरे काम के बारे में सोचा ही नहीं। फिल्मी दुनिया को ही उन्होंने हमेश के लिये अपना परिवार बना लिया। डेविड को जो भी रोल मिलते थे, वे स्वीकर कर लेते थे। इससे उनकी अच्छी आमदनी तो हुई ही साथ ही हर तरह के रोल निभाने का मौका भी मिला। फिल्मकार ख्वाजा अहमद अब्बास डेविड के बड़े प्रशंसक थे और अपनी कई फिल्मों में उन्हें मौका दिया।

डेविड एक चरित्र अभिनेता के रूप मे स्थापित हो चुके थे। तभी उनकी जिंदगी में फिल्म ‘बूट पालिश’ (1954) का अध्याय जुड़ा। इस फिल्म में उन्होंने बच्चों से प्यार करने वाले दयालु जॉन चाचा का किरदार निभाया। पर्दे पर उनका गाया गीत ‘नन्हे मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है…’ बरसों तक रेडियो पर बजता रहा। इस फिल्म के लिये डेविड को फिल्म फेयर का सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का पुरस्कार मिला। यह फिल्म उनके जीवन में मील का पत्थर बन गयी। सालों तक लोग उन्हें जॉन चाचा कह कर बुलाते रहे।

डेविड फिल्मों से जरूर जुड़े, लेकिन खेलों के प्रति उनकी दिलचस्पी कम नहीं हुई। वे महाराष्ट्र वेटलिफ्टिंग एसोसिएशन के 30 साल तक अध्यक्ष रहे। 1952 में हेलसिंकी में हुए ओलंपिक में वेटलिफ्टिंग प्रतियोगिता के जज भी बने। बात चीत में तेज तर्रार डेविड ने खेलों की कमेंट्री भी की और फिल्मी प्रशंसकों से अधिक खेल के प्रशंसकों में लोकप्रिय रहे। उन्हें सरकारी और गैरसरकारी कार्यक्रमों के संचालन का काम भी मिलने लगा। फिल्म फेयर के पहले अवार्ड का संचालन डेविड ने ही किया था।

निजी जीवन में भी डेविड का हास्य बोध बहुत जबरदस्त था। डेविड ने सवा सौ से अधिक फिल्मों में काम किया। उनकी चर्चित फिल्मों में हाथी मेरे साथी, बातों बातों में, अभिमान, कालीचरण, गोलमाल, खट्टा मीठा, सत्यकाम और खूबसूरत शामिल हैं। डेविड ने जीवन भर शादी नहीं की। 1979 में डेविड ने इजराइल में बसने का फैसला लिया, इसी सिलसिले में वे अपने रिश्तेदारों के पास टोरंटो गए। 28 दिसंबर 1981 को वहां उनका दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया।

बुधवार, 27 दिसंबर 2023

फारुख शेख

फारुख शेख 
#25march
#28dic 
🎂25 मार्च 1948, वडोदरा
⚰️: 27 और28 दिसंबर 2013, दुबई, संयुक्त अरब अमीरात
पत्नी: रूपा जैन (विवा. ?–2013)
बच्चे: रुबीना शेख, साना शेख, शैस्ता शेख
माता-पिता: फरीदा शेख, मुस्तफा शेख

अभिनय के महारथी थे फारुख शेख।

इसके साथ ही वे एक प्रसिद्ध अभिनेता, समाजसेवी और टेलीविजन प्रस्तोता भी थे।

फिल्म ‘शतरंज के खिलाड़ी’, ‘उमराव जान’, ‘बाजार’, ‘चश्मे बद्दूर’ जैसी कई बेहतरीन फिल्मों में उन्होंने अपनी सादगी से भरे अभिनय से लोगों का दिल जीता।

थिएटर में बेहतरीन परफॉर्मेंस की बदौलत ही उन्हें 1973 में आई फिल्म ‘गरम हवा’ में ब्रेक मिला।

अभिनेत्री दीप्ति नवल के साथ उनकी जोड़ी को दर्शकों ने बेहद पसंद किया।

फिल्म ‘लाहौर’ में अभिनय के लिए उन्हें 2010 में नेशनल अवार्ड से नवाजा गया था।

फ़ारुख़ शेख़ ने रियलिटी शो ‘जीना इसी का नाम है’ में टी.वी. प्रस्तोता की भूमिका भी शारदार तरीक़े से निभाई।
उन्हे 70 और 80 के दशक की फिल्मों में अभिनय के कारण काफी प्रसिद्धि मिली ।

वह सामान्यतः एक कला सिनेमा में अपने कार्य के लिए प्रसिद्ध थे जैसे समांतर सिनेमा भी कहा जाता है उन्होंने सत्यजीत राय और ऋषिकेश मुखर्जी जैसे भारतीय सिनेमा के महान फिल्म निर्देशकों के निर्देशन में भी काम किया।
उनके पिता का नाम मुस्तफा शेख और माता का नाम फरीदा शेख था।

उनके पिता मुस्तफा शेख एक जाने माने वकील थे।

वे एक जमीदार परिवार से थे और फारुख शेख अपने पांच भाइयों में सबसे बड़े थे।

कॉलेज के दिनों में उनकी मुलाकात रूपा जैन से हुई, जो आगे चल कर उनकी जीवन संगिनी बनीं।

फ़ारुख़ और रूपा ने नौ साल तक एक-दूसरे से मेल-मुलाकातों के बाद शादी का फैसला लिया था।

दोनों ही परिवार उनकी दोस्ती से वाकिफ थे और किसी ने विरोध नहीं किया।

हालांकि रूपा के परिजन इस बात से ज़रूर थोड़ा चिंतित थे कि फारुख, जो उन दिनों एक उभरते ऐक्टर थे और ज्यादातर रंगमंच पर काम करते थे, उनकी बेटी का खयाल कैसे रख पाएंगे।

लेकिन फ़ारुख़ को जल्द ही मिली कामयाबी के बाद वे निश्चिंत हो गए।फारुख शेख ने प्रारम्भिक शिक्षा मुंबई के सेंट मैरी स्कूल से ग्रहण करने के साथ ही उन्होंने यहां के सेंट जेवियर्स कॉलेज में आगे की पढ़ाई की। फारुख शेख के जीवन पर उनके पिता का गहरा प्रभाव पड़ा यही कारण था कि उन्होंने वकालत की पढ़ाई की ।

उनका मकसद पिता की विरासत को आगे ले जाना था।

मुंबई के सिद्धार्थ कॉलेज ऑफ लॉ से उन्होंने कानून की पढ़ाई की।

लेकिन वकील बनने के बाद जल्द ही उन्हें महसूस हुआ कि यह पेशा उनके जैसे इंसान के लिए ठीक नहीं है।

उनका कहना था कि ज्यादातर मामलों के फैसले अदालत में नहीं बल्कि पुलिस थानों में तय होते हैं।

इसके बाद ही उन्होंने एक्टिंग को तवज्जो देनी शुरू कर दिया।

फ़ारुख़ कॉलेज के दिनों में नाटकों में काम किया करते थे और यहां शबाना आज़मी उनकी अच्छी दोस्त थीं।

दोनों ने कई नाटक साथ किए थे।

कॉलेज के बाद शबाना जब फ़िल्म इंस्टीट्यूट में पढ़ाई के लिए पूना जाने लगीं तो उन्होंने फ़ारुख़ से भी चलने को कहा।

परंतु उन्हें वकालत की पढ़ाई करनी थी।

फ़ारुख़ स्कूली दिनों से न केवल क्रिकेट के दीवाने थे, बल्कि अच्छे क्रिकेटर भी थे। उन दिनों भारत के विख्यात टेस्ट क्रिकेटर वीनू मांकड़ सेंट मैरी स्कूल के दो सर्वश्रेष्ठ क्रिकटरों को हर साल कोचिंग देते थे और हर बार उनमें से एक फ़ारुख़ हुआ करते थे।

जब वह सेंट जेवियर कॉलेज में पढ़ने गए तो उनका खेल और निखरा। सुनील गावस्कर का शुमार फ़ारुख़ के अच्छे दोस्तों मे होता है।
वकालत से नाता तोड़ने के बाद उन्होने एक्टिंग के अपना करियर बनाने की और ध्यान देने लगे उन्होंने अपनी पहली फिल्म ‘गरम हवा’ में मुफ्त में काम करने को हामी भरी।

इस फिल्म को रमेश सथ्यू बना रहे थे और उन्हें ऐसे कलाकार की जरूरत थी, जो बिना फीस लिए तारीखें दे दें।लेकिन बाद में  इस फ़िल्म के लिए फ़ारुख़ शेख़ को 750 रुपये मिले, वह भी पांच साल में।

फ़ारुख़ शेख़ के वकालत छोड़ कर फ़िल्मों में काम करने से उनके माता-पिता को आश्चर्य तो हुआ लेकिन उन्होंने बेटे के फैसला का विरोध नहीं किया। वे उनके साथ खड़े रहे।

फ़ारुख़ के अनुसार उन दिनों तक यह बात ख़त्म हो चुकी थी कि फ़िल्मों में काम करना बुरा है। ‘गरम हवा’ की रिलीज के बाद फ़ारुख़ के पास दूसरी फ़िल्मों के ऑफर आने लगे।
विख्यात निर्देशक सत्यजित रे को उनका काम काफी पसंद आयातो उन्होने अपनी फ़िल्म ‘शतरंज के खिलाड़ी’ में उन्हें एक रोल ऑफर कर दिया। जब सत्यजित रे ने फोन किया तो फ़ारुख़ कनाडा में थे।

उन्होंने कहा कि मुझे लौटने में एक महीने का वक्त लगेगा। सत्यजित रे ने कहा कि वे इंतजार करेंगे

भारतीय अभिनेता, समाजसेवी और टेलीविजन प्रस्तोता रहे फ़ारुख़ शेख़ ने अपने करियर की शुरुआत थियेटर से की थी। उन्होंने सागर सरहदी के साथ मिलकर कई नाटक भी किए हैं।

बॉलीवुड में उनकी पहली बड़ी फ़िल्म ‘गरम हवा’ थी जो 1973 में आई थी। फिर उसके बाद महान् फ़िल्मकार सत्यजित रे के साथ ‘शतरंज के खिलाड़ी’ की।
1979 के बाद
शुरुआती सफलता मिलने के बाद फ़ारुख़ शेख़ को आगे भी फ़िल्में मिलने लगीं जिसमें 1979 में आई ‘नूरी’, 1981 की चश्मे बद्दूर जैसी फ़िल्में शामिल हैं।

दीप्ति नवल और फ़ारुख़ शेख़ की जोड़ी सत्तर के दशक की सबसे हिट जोड़ी रही।

दर्शक इन्हें फ़िल्मों में एक साथ देखना चाहते थे। इन दोनों ने एक साथ मिलकर कई फ़िल्में की इसमें चश्मे बद्दूर, साथ-साथ, कथा, रंग-बिरंगी आदि प्रमुख हैं।

फ़ारुख़ शेख़ अपने किरदारों में जुझारू, मध्यमवर्गीय और मूल्यजीवी इन्सान के साथ-साथ मनुष्य की फितरत को भी अभिव्यक्त करने के लिए जाने जाते हैं।

उनकी आखिरी कुछ फ़िल्मों में सास बहू और सेंसेक्स, एक्सीडेंट ऑन हिल रोड और लाहौर जैसी फ़िल्में रहीं। इन फ़िल्मों में भी एक बार फिर उनकी परिपक्व छवि दिखी।

अभिनेता फ़ारुख़ शेख़ ऐसे कलाकारों में शुमार हैं जो बड़े और असाधारण श्रेणी के फ़िल्मकारों की फ़िल्मों में एक ख़ास किरदार के लिए पहचाने जाते हैं या फिर उसी ख़ास किरदार के लिए बने हैं।

ऐसे अभिनेता पर्दे पर केवल अभिनय नहीं करते बल्कि उस अभिनय को जीते हैं। ऐसे किरदार ही आपके जहन में इतना प्रभाव छोड़ जाते हैं कि आप उन्हें लम्बे समय तक याद रखते हैं।

सहज और विनम्र से दिखाई देने वाले फ़ारुख़ शेख़ ने अपने समय के चोटी के निर्देशकों के साथ काम किया है। उन्होंने सत्यजित रे, मुजफ्फर अली, ऋषिकेश मुखर्जी, केतन मेहता, सई परांजपे, सागर सरहदी जैसे फ़िल्मकारों का अपने अभिनय की वजह से दिल जीत लिया।
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प्रसिद्ध फिल्म
 कथा -1983 किसी से न कहना -1983 रंग बिरंगी -1983
एक बार चले आओ -1983 बाज़ार -1982 साथ साथ -1982
चश्‍मे बद्दूर -1981 उमराव जान -1981 नूरी -1979
गमन -1978 शतरंज के खिलाड़ी -1977 मेरे साथ चल -1974
गरम हवा-1974 वफ़ा -1990 तूफ़ान -1989
घरवाली बाहरवाली -1989 बीवी हो तो ऐसी -1988 खेल मोहब्‍बत का -1988
पीछा करो -1988 महानंदा -1987 एक पल -1986
फासले – 1985 सलमा -1985 लोरी -1985
यहां वहां -1984 लाखों की बात -1984 अब आएगा मजा -1984
क्‍लब 60 -2013 ये जवानी है दीवानी – 2013 लिसन… अमाया – 2013
द बास्‍टर्ड चाइल्‍ड -2013 शंघाई – 2012 टेल मी ओ खुदा -2011
लाहौर-2010 एक्सिडेंट ऑन हिल रोड -2009- छोटी सी दुनिया -2009
सास बहू और सैंसेक्‍स-2008 मोहब्‍बत -1997 अब इंसाफ होगा -1995
माया मेमसाब -1993 जान-ए-वफ़ा -1990

सलमान खान

#27dic 
वर्तमान युग के प्रसिद्ध अभिनेता सलमान खान के जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामनाएं
🎂जन्‍म 27 दिसम्बर, 1965 को इंदौर, मध्‍य प्रदेश
सलमान ख़ान  हिन्‍दी फ़िल्‍मों के मशहूर अभिनेता तो हैं हीं, इसके साथ-साथ वे निर्माता, टेलीविजन पर्सनालिटी और समाजसेवी भी हैं। उन्‍होंने अपने कॅरियर में कई छोटी-बड़ी फ़िल्‍मों में काम किया और धीरे धीरे उनके प्रशंसकों की संख्‍या लगातार बढ़ती गई। उन्‍होंने फ़िल्म इंडस्‍ट्री में अपना एक अलग मुकाम स्‍थापित किया है और वे हिंदी सिनेमा के अग्रणी अभिनेताओं में से एक हैं। मौजूदा समय में उन‍के चाहने वालों का ये आलम है कि उनके घर (गैलेक्‍सी अपार्टमेंट्स) के बाहर उनकी भीड़ लगी रहती है। उनके फैंस की दीवानगी कुछ ऐसी है कि उनकी एक झलक पाने के लिए उनके प्रशंसक बेताब रहते हैं। कई बार तो ऐसा हुआ है कि उनको अपने फैंस से काफ़ी दिक्‍कतों का भी सामना करना पड़ा है। टाइम्स सेलेबेक्‍स बॉलीवुड ऐक्‍टर्स इंडेक्‍स रेटिंग में वे बराबर टॉप पर रहते हैं। लोग उन्‍हें प्‍यार से सल्‍लू भाई, भाई जान आदि नामों से पुकारते हैं

परिचय
सलमान ख़ान का जन्‍म 27 दिसम्बर, 1965 को इंदौर, मध्‍य प्रदेश में हुआ था। उनके पिता का नाम सलीम ख़ान है, जो कि मशहूर फ़िल्‍म लेखक रहे हैं। उनकी माँ का नाम सुशीला चरक है। उनके पिता जम्मू कश्मीर से हैं और उनकी माँ महाराष्ट्रीयन हैं। पूर्व अभिनेत्री हेलेन उनकी सौतेली माँ हैं। उनके दो भाई भी हैं जिनका नाम अरबाज ख़ान और सोहेल ख़ान है। अरबाज की शादी अभिनेत्री मलाइका अरोड़ा ख़ान से हुई है। सलमान की दो बहनें भी हैं जिनका नाम अलवीरा और अर्पिता है।

शिक्षा

सलमान ख़ान की पढ़ाई सिंधिया स्‍कूल, ग्वालियर से हुई, जहां वे अपने भाई अरबाज ख़ान के साथ पढ़ते थे। इसके बाद की पढ़ाई उन्‍होंने मुम्बई के बांद्रा इलाके में स्थित सेंटस्‍टैनिसलॉस हाईस्‍कूल से की।

व्यक्तिगत जीवन

सलमान ख़ान की सौतेली माँ हेलन बॉलीवुड के बीते ज़माने की एक मशहूर अभिनेत्री हैं, जिन्होंने उनके साथ 'खामोशी' (1996) और 'हम दिल दे चुके सनम' (1999) में सह-कलाकार के रूप में कार्य किया था। ये एक समर्पित बॉडीबिल्डर हैं। वे प्रतिदिन मेहनत करते हैं और मूवी तथा स्टेज शो में अपनी कमीज उतारने के लिए प्रसिद्ध हैं। अमेरिका की पीपुल पत्रिका द्वारा वर्ष 2004 में इन्हें दुनिया का 7वां सबसे सुंदर पुरुष और भारत के सबसे सुंदर पुरुष का खिताब मिला। बहुत-सी अभिनेत्रियों के साथ रोमांस और अपनी पूर्व प्रेमिका ऐश्वर्या राय, सोमी अली और संगीता बिजलानी के साथ संबंधों के बावजूद सलमान भारतीय मीडिया जगत में बालीवुड के सबसे चहेते कुंवारे अभिनेता बनते रहे हैं। अपने कैरियर में वह विभिन्न धर्मार्थ संस्थाओं से जुड़े हुए हैं।

फ़िल्मी कॅरियर

सलमान ख़ान ने अपने अभिनय कॅरियर की शुरुआत 1988 में सहायक अभिनेता के तौर पर फ़िल्‍म 'बीवी हो तो ऐसी' से की थी। 1989 में मुख्‍य अभिनेता के तौर पर उनकी पहली फ़िल्‍म 'मैंने प्‍यार किया' थी जो कि सुपरहिट रही थी। यह फ़िल्म भारत की सर्वाधिक कमाई वाली फ़िल्मों में से एक बन गई। इस फ़िल्म के लिए उन्हें फ़िल्मफ़ेयर का सर्वश्रेष्ठ नए अभिनेता का पुरस्कार मिला एवं फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के पुरस्कार के लिए नामांकन भी प्राप्त हुआ। उनकी फ़िल्‍म 'हम आपके हैं कौन' ने सभी का दिल जीता तो वहीं फ़िल्‍म 'तेरे नाम' में उनके अभिनय की काफ़ी प्रशंसा हुई और अपने अभिनय से उन्‍होंने सभी को भावुक कर दिया था। इसके बाद उन्‍होंने कई फ़िल्‍मों में काम किया, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से उनके प्रशंसकों में इसलिए भी इजाफा हुआ क्‍योंकि उन्‍हें एक्‍शन फ़िल्‍मों में ज्‍यादा पसंद किया गया। फ़िल्‍म 'वांटेड' के बाद से उन्‍होंने लगातार हिट फ़िल्‍मों की झड़ी लगा दी है

वर्ष 2000 में इन्होंने छ: फ़िल्मों में काम किया जो आलोचकों की दृष्टि में व्यापार करने में असफल रहीं, इनमें से दो फ़िल्में जैसे 'हर दिल जो प्यार करेगा' और 'चोरी चोरी चुपके चुपके' कुछ सफल रहीं। इन दोनों में रानी मुखर्जी और प्रिटी जिन्टा इनकी सह कलाकार थीं। वर्ष 2001 तक देर से रिलीज होने वाली इनकी फ़िल्म 'चोरी चोरी चुपके चुपके' में इनके प्रदर्शन की सराहना की गई। सरोगेट चाइल्ड बर्थ के मुद्दे को सुलझाने वाली बालीवुड की यह पहली फ़िल्म थी जिसमें सलमान ने एक धनी उद्योगपति की भूमिका निभाई थी। वर्ष 2002 में इन्होंने फ़िल्म 'हम तुम्हारे हैं सनम' में काम किया जो बॉक्स ऑफिस पर सेमी हिट रही। उन्होंने 2003 में 'तेरे नाम' फ़िल्म से अपनी वापसी की।

सलमान ने 'मुझसे शादी करोगी' (2004) और 'नो एन्ट्री' (2005) जैसी हास्य फ़िल्मों के द्वारा बॉक्स ऑफिस पर अपनी सफलता जारी रखी। वर्ष 2006 इनकी फ़िल्में 'जान-ए-मन' और 'बाबुल' दोनों ही बॉक्स ऑफिस पर असफल रहीं। सलमान ने वर्ष 2007 की शुरुआत में इनकी फ़िल्म 'सलाम ए इश्क' आयी जो बॉक्स ऑफिस पर कुछ अच्छा न कर सकी। उसके बाद अगली फ़िल्म 'पार्टनर' का बॉक्स ऑफिस पर अच्छा प्रदर्शन रहा और इन्हें ब्लॉकबस्टर की छवि दिलवाई। इसके बाद वे हॉलीवुड की एक फ़िल्म में मैरीगोल्ड (Marigold: An Adventure in India) अमरीकी महिला कलाकार अली लार्टर के साथ दिखाई दिए। वर्ष 2008 में सलमान अपनी गेम शो 'दस का दम' के साथ छोटे परदे पर उतरे जो अंतरराष्ट्रीय शो पॉवर ऑफ़ टेन पर आधारित था।

क़ानूनी विवाद

सलमान ख़ान पर एक से अधिक क़ानूनी केस हो चुके हैं जिनमें से कुछ का निपटारा हो गया है और कुछ मामले अभी भी विचाराधीन हैं। इनमें से मुख्य निम्न हैं[2]–

28 सितम्बर, 2002 को सलमान के खिलाफ लापरवाही से गाड़ी चलाते हुए फुटपाथ पर सोये हुए व्यक्ति की मृत्यु के सम्बन्ध में केस दायर किया गया जिस पर लम्बे समय तक चली। सुनवाई के बाद इन्हें दोषी नहीं पाया और इस केस में कुछ और पहलुओं के लिए जाँच अभी लंबित है। यह केस 'हिट एंड रन' (hit and run case) के नाम से जाना जाता है।
17 फ़रवरी, 2006 को एक दुर्लभ प्रजाति के हिरन चिंकारा के शिकार के सम्बन्ध में उन्हें अदालत ने दोषी पाया और एक साल की सजा सुनाई लेकिन बाद में उच्च न्यायालय में अपील करने के बाद सजा पर रोक लगा दी गयी। यह मामला 'काले हिरन के शिकार' के नाम से मशहूर है। सलमान ने छह दिन जेल में भी बिताए, जहाँ से उन्हें 31 अगस्त, 2007 को जमानत मंजूर किये जाने के कारण इन्हें रिहा कर दिया गया।

नवोदित कलाकारों की परख

सलमान ख़ान इंडस्ट्री के एक ऐसे अकेले सुपरस्टार हैं, जो हमेशा अपने दोस्तों को साथ में लेकर चलने में विश्वास रखते हैं। इसके साथ उन्होंने ऐसे कई एक्टर और एक्ट्रेस के करियर को संभाला हैं, जो एक खास मौके की तलाश में रहते हैं। बिपाशा और सलमान की दोस्ती भी सालों पुरानी है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि सलमान दोस्ती के मामले में दरियादिल इंसान हैं। उन्होंने अब तक कई लोगों के नाम के आगे अपना नाम जोड़ा है, जिनमें से कुछ इस प्रकार हैं

कैटरीना कैफ़- फ़िल्म बूम से कैटरीना कैफ़ ने अपने करियर की शुरुआत की थी। लेकिन एक साइड एक्टर की तरह इंडस्ट्री ने उन्हें नकार दिया था। ऐसे में उनकी मदद के लिए सलमान ख़ान ने हाथ आगे बढ़ाया। उन्होंने 'मैंने प्यार क्यों किया' और 'पार्टनर' फ़िल्म से कैटरीना को इंडस्ट्री में फिर लांच किया।
जैकलीन फर्नांडिस- अलादीन और मर्डर जैसी फ़िल्मों में जैकलीन का करियर कुछ खास रंग नहीं जमा पा रहा था। ऐसे में उनके कॅरियर को सलमान ख़ान ने अपनी फ़िल्म 'किक' से एक अच्छी हिट दी। इसके बाद वह 'ब्रदर्स' और 'हाउसफुल 3' जैसी फ़िल्मों का हिस्सा बनने लगीं।
सोनाक्षी सिन्हा- मशहूर एक्टर शत्रुघ्न सिन्हा की बेटी होने के बावजूद सोनाक्षी सिन्हा के लिए हिंदी सिनेमा में एंट्री के दरवाजे खोलने का रास्ता उनके परिवार को नहीं मिल रहा था। ऐसे में सलमान ख़ान की नजर सोनाक्षी पर पड़ी। उन्होंने अपनी सबसे लोकप्रिय फ़िल्म 'दबंग' की हिरोइन के तौर पर सोनाक्षी को कास्ट कर लिया। यह सिलसिला 'दबंग 2' में भी कायम रहा। वर्तमान में सोनाक्षी इतनी सक्षम हैं कि वह अपने बलबूते पर किसी भी फिल्म की जिम्मेदारी उठा सकती हैं।

सम्मान और पुरस्कार

2016 में फ़िल्म 'बजरंगी भाईजान' के लिए राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार (बतौर निर्माता- सर्वश्रेष्ठ लोकप्रिय एवं मनोरंजक फ़िल्म)
2012 में फ़िल्म 'चिल्लर पार्टी' के लिए राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार (बतौर निर्माता- सर्वश्रेष्ठ बाल फ़िल्म )
15 जनवरी, 2008 को लंदन के मैडम तुसाद संग्रहालय में सलमान खान की आदमकद मोम की प्रतिमा लगाई गई और इस तरह संग्रहालय में मोम की प्रतिमा के रूप में दिखाई देने वाले वे चौथे भारतीय अभिनेता बन गए।
1990 में फ़िल्म 'मैंने प्यार किया' के लिए सर्वश्रेष्ठ नवोदित कलाकार का पुरस्कार।
1999 में फ़िल्म 'कुछ कुछ होता है' के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता।

मिर्जा गालिब


मिर्ज़ा असदुल्लाह बेग ख़ान
🎂: 27 दिसंबर 1797, आगरा
⚰️मृत्यु : 15 फ़रवरी 1869, गली कासिम जन, दिल्ली
दफ़नाने की जगह: Mazar-e-Ghalib
पत्नी: उमराव बेगम (विवा. 1810–1869)
माता-पिता: मिर्ज़ा अब्दुल्ला बेग ख़ां, इज्जत-उत-निसा बेगम
उल्लेखनीय काम: दीवान-ए-ग़ालिब

मिर्ज़ा असदुल्लाह बेग ख़ान, जो अपने तख़ल्लुस ग़ालिब से जाने जाते हैं, उर्दू एवं फ़ारसी भाषा के एक महान शायर थे। इनको उर्दू भाषा का सर्वकालिक महान शायर माना जाता है और फ़ारसी कविता के प्रवाह को हिन्दुस्तानी जबान में लोकप्रिय करवाने का श्रेय भी इनको दिया जाता है। यद्दपि इससे पहले के वर्षो में मीर तक़ी "मीर" भी इसी वजह से जाने जाता है। ग़ालिब के लिखे पत्र, जो उस समय प्रकाशित नहीं हुए थे, को भी उर्दू लेखन का महत्वपूर्ण दस्तावेज़ माना जाता है। ग़ालिब को भारत और पाकिस्तान में एक महत्वपूर्ण कवि के रूप में जाना जाता है। उन्हे दबीर-उल-मुल्क और नज़्म-उद-दौला का ख़िताब मिला।
ग़ालिब का जन्म आगरा में एक सैनिक पृष्ठभूमि वाले परिवार में हुआ था। उन्होने अपने पिता और चाचा को बचपन में ही खो दिया था, ग़ालिब का जीवनयापन मूलत: अपने चाचा के मरणोपरांत मिलने वाले पेंशन से होता था (वो ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी में सैन्य अधिकारी थे)। ग़ालिब की पृष्ठभूमि एक तुर्क परिवार से थी और इनके दादा मध्य एशिया के समरक़न्द से सन् 1750 के आसपास भारत आए थे। उनके दादा मिर्ज़ा क़ोबान बेग ख़ान अहमद शाह के शासन काल में समरकंद से भारत आये। उन्होने दिल्ली, लाहौर व जयपुर में काम किया और अन्ततः आगरा में बस गये। उनके दो पुत्र व तीन पुत्रियां थी। मिर्ज़ा अब्दुल्ला बेग ख़ान व मिर्ज़ा नसरुल्ला बेग ख़ान उनके दो पुत्र थे।

मिर्ज़ा अब्दुल्ला बेग (ग़ालिब के पिता) ने इज़्ज़त-उत-निसा बेगम से निकाह किया और अपने ससुर के घर में रहने लगे। उन्होने पहले लखनऊ के नवाब और बाद में हैदराबाद के निज़ाम के यहाँ काम किया। 1802 में अलवर में एक युद्ध में उनकी मृत्यु के समय ग़ालिब मात्र 5 वर्ष के थे।

जब ग़ालिब छोटे थे तो एक नव-मुस्लिम-वर्तित ईरान से दिल्ली आए थे और उनके सान्निध्य में रहकर ग़ालिब ने फ़ारसी सीखी।

ग़ालिब की प्रारम्भिक शिक्षा के बारे में स्पष्टतः कुछ कहा नहीं जा सकता लेकिन ग़ालिब के अनुसार उन्होने 11 वर्ष की अवस्था से ही उर्दू एवं फ़ारसी में गद्य तथा पद्य लिखना आरम्भ कर दिया था। उन्होने अधिकतर फारसी और उर्दू में पारम्परिक भक्ति और सौन्दर्य रस पर रचनाये लिखी जो गजल में लिखी हुई है। उन्होंने फारसी और उर्दू दोनो में पारंपरिक गीत काव्य की रहस्यमय-रोमांटिक शैली में सबसे व्यापक रूप से लिखा और यह गजल के रूप में जाना जाता है।

वैवाहिक जीवन

13 वर्ष की आयु में उनका विवाह नवाब ईलाही बख्श की बेटी उमराव बेगम से हो गया था। विवाह के बाद वह दिल्ली आ गये थे जहाँ उनकी तमाम उम्र बीती। अपने पेंशन के सिलसिले में उन्हें कोलकाता कि लम्बी यात्रा भी करनी पड़ी थी, जिसका ज़िक्र उनकी ग़ज़लों में जगह–जगह पर मिलता है।

1850१८५० में शहंशाह बहादुर शाह ज़फ़र द्वितीय ने मिर्ज़ा ग़ालिब को दबीर-उल-मुल्क और नज़्म-उद-दौला के ख़िताब से नवाज़ा। बाद में उन्हे मिर्ज़ा नोशा का ख़िताब भी मिला। वे शहंशाह के दरबार में एक महत्वपूर्ण दरबारी थे। उन्हे बहादुर शाह द्वितीय के पुत्र मिर्ज़ा फ़ख़रु का शिक्षक भी नियुक्त किया गया। वे एक समय में मुग़ल दरबार के शाही इतिहासविद भी थे।

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...