सोमवार, 12 फ़रवरी 2024

अदिति सजवान

अदिति सजवान

 🎂जन्म 12 फरवरी 1991 देहरादून, भारत में एक भारतीय 

टेलीविजन अभिनेत्री हैं।
अदिति ने ज़ी टीवी के शो मेरी डोली तेरे अंगना से डेब्यू किया था।
बाद में, उन्होंने मायाशीन की भूमिका निभाने के लिए इमेजिन टीवी के राजकुमार आर्यन में प्रवेश किया।
उन्होंने जय श्री कृष्णा में यशोदा का किरदार निभाया और मीरा में मीरा के किरदार में नजर आईं।
उन्होंने हमारी सास लीला और पिया का घर प्यारा लागे जैसे शो में भी मुख्य भूमिकाएं निभाई हैं।
फिलहाल वह सब टीवी पर 'चिड़ियाघर' कर रही हैं।
अदिति ने मिस सिलवासा (केंद्र शासित प्रदेश दादरा और नगर हवेली के लिए एक प्रतिष्ठित सौंदर्य प्रतियोगिता) का खिताब भी जीता है।
वह एक प्रशिक्षित भरत नाट्यम और कथक नर्तकी भी हैं।
📽️
2007 मेरी डोली तेरे अंगना
2008-2009 जय श्री कृष्णा
2008 राजकुमार आर्यन
2009–2010 मीरा
2010 लक्ष्मी महिमा
2011 हमारी सास लीला
2012 डरावना संचिका 
2012–2014 बाल वीर
2012-2013 पिया का घर प्यारा लगे
2014 एक हसीना थी
2014 सिंहासन बत्तीसी
2014–2017 चिड़िया घर
2015 कभी ऐसे गीत गाया करो
2020 अकबर का बल बीरबल
2021–2022 जय कन्हैया लाल की

प्राण

#12feb
#12july 
प्राण 

🎂जन्म की तारीख और समय: 12 फ़रवरी 1920, बाल्ली मरन, दिल्ली
⚰️मृत्यु की जगह और तारीख: 12 जुलाई 2013, Lilavati Hospital And Research Centre, मुम्बई
पत्नी: शुक्ला सिकन्द (विवा. 1945–2013)
बच्चे: सुनील सिकन्द, पिंकी सिकन्द, अरविन्द सिकन्द
भाई: प्रेम क्रिशन, राज क्रिशन, कृपाल क्रिशन
माता-पिता: लाला केवल कृष्णन सिकन्द, 
प्राण कृष्ण सिकंद हिन्दी फ़िल्मों के जाने माने नायक, खलनायक और चरित्र अभिनेता थे। प्राण ऐसे अभिनेता
थे जिनके चेहरे पर हमेशा मेकअप रहता है और भावनाओं का तूफ़ान नज़र आता है जो अपने हर किरदार में जान डालते हुए यह अहसास करा जाता है कि उनके बिना यह किरदार बेकार हो जाता। उनकी संवाद अदायगी की शैली को आज भी लोग भूले नहीं हैं।

प्राण का जन्म 12 फ़रवरी, 1920 को पुरानी दिल्ली के बल्लीमारान इलाके में बसे एक रईस परिवार में हुआ था। बचपन में उनका नाम 'प्राण कृष्ण सिकंद' था। उनका परिवार बेहद समृद्ध था। प्राण बचपन से ही पढ़ाई में होशियार थे। बड़े होकर उनका फोटोग्राफर बनने का इरादा था। 1940 में जब मोहम्मद वली ने पहली बार पान की दुकान पर प्राण को देखा तो उन्हें फ़िल्मों में उतारने की सोची और एक पंजाबी फ़िल्म “यमला जट” बनाई, जो बेहद सफल रही। फिर क्या था, इसके बाद प्राण ने कभी मुड़कर देखा ही नहीं। 1947 तक वह 20 से ज़्यादा फ़िल्मों में काम कर चुके थे और एक हीरो की इमेज के साथ इंड्रस्ट्री में काम कर रहे थे।हालांकि लोग उन्हें विलेन के रुप में देखना ज़्यादा पसंद करते थे।

अभिनेता प्राण को दशकों तक बुरे आदमी (खलनायक) के तौर पर जाना जाता रहा और ऐसा हो भी क्यों ना, पर्दे पर उनकी विकरालता इतनी जीवंत थी कि लोग उसे ही उसकी वास्तविक छवि मानते रहे, लेकिन फ़िल्मी पर्दे से इतर प्राण असल ज़िंदगी में वे बेहद सरल, ईमानदार और दयालु व्यक्ति थे। समाज सेवा और सबसे अच्छा व्यवहार करना उनका गुण था। 

प्राण की शुरुआती फ़िल्में हों या बाद की फ़िल्में उन्होंने अपने आप को कभी दोहराया नहीं। उन्होंने अपने
हर किरदार के साथ पूरी ईमानदारी से न्याय किया। फिर चाहे भूमिका छोटी हो या बड़ी, उन्होंने समानता ही रखी। प्राण को सबसे बड़ी सफलता 1956 में 'हलाकू' फ़िल्म से मिली जिसमें उन्होंने डकैत हलाकू का सशक्त किरदार निभाया था। प्राण ने राज कपूर निर्मित-निर्देशित 'जिस देश में गंगा बहती है' में राका डाकू की भूमिका निभाई थी जिसमें उन्होंने केवल अपनी आँखों से ही क्रूरता ज़ाहिर कर दी थी। कभी ऐसा वक़्त भी था जब हर फ़िल्म में प्राण नज़र आते थे खलनायक के रूप में। उनके इस रूप को परिवर्तित किया था भारत कुमार यानी मनोज कुमार ने, जिन्होंने अपनी निर्मित-निर्देशित पहली फ़िल्म 'उपकार' में उन्हें मलंग बाबा का रोल दिया। जिसमें वे अपाहिज की भूमिका में थे, भूमिका कुछ छोटी ज़रूर थी लेकिन थी बहुत दमदार। इस फ़िल्म के लिए उनको पुरस्कृत भी किया गया था। उन पर फ़िल्माया गया कस्में वादे प्यार वफा सब बातें हैं बातों का क्या आज भी लोगों के दिलो-दिमाग में छाया हुआ है। भूले भटके जब कभी यह गीत बजता हुआ कानों को सुनाई देता है तो तुरन्त याद आते हैं प्राण। ऐसा ही कुछ अमिताभ बच्चन अभिनीत ज़ंजीर में भी हुआ था। नायक के पठान दोस्त
की भूमिका में उन्होंने अपने चेहरे के हाव भावों और संवाद अदायगी से जबरदस्त प्रभाव छो़डा था। इस फ़िल्म का गीत यारी है ईमान मेरा, यार मेरी ज़िन्दगी सिर्फ़ और सिर्फ़ उनके नृत्य की वजह से याद किया जाता है

प्राण 1942 में बनी ‘ख़ानदान’ में नायक बन कर आए और नायिका थीं नूरजहाँ। 1947 में भारत आज़ाद हुआ और विभाजित भी। प्राण लाहौर से मुंबई आ गए। यहाँ क़रीब एक साल के संघर्ष के बाद उन्हें 'बॉम्बे टॉकीज' की
फ़िल्म ‘जिद्दी’ मिली। अभिनय का सफर फिर चलने लगा। पत्थर के सनम, तुम सा नहीं देखा, बड़ी बहन, मुनीम जी, गंवार, गोपी, हमजोली, दस नंबरी, अमर अकबर एंथनी, दोस्ताना, कर्ज, अंधा क़ानून , पाप की दुनिया, मत्युदाता क़रीब 350 से अधिक फ़िल्मों में प्राण साहब ने अपने अभिनय के अलग- अलग रंग बिखेरे। इसके अतिरिक्त प्राण कई सामाजिक संगठनों से जुड़े रहे और उनकी अपनी एक फुटबॉल टीम बॉम्बे डायनेमस फुटबॉल क्लब भी रही है।
हम बोलेगा तो बोलोगे की बोलता है... यह संवाद प्राण ने ही अपने एक फ़िल्म में कहा था, जो आज उनके अभिनय जीवन के सार पर भी सटीक बैठ रहा है।जीवंत अभिनय तथा बेहतरीन संवाद अदायगी के बलबूते दर्शकों के दिलों में खलनायक का भयावह रुप उकेरने वाले प्राण की अदाकारी को भी शब्दों में नहीं ढ़ाला जा सकता। ऐसे में उन्हें लेकर जितने भी शब्दजाल बिने जाये वो कमतर ही होंगे। तभी उनका डॉयलाग 'हम बोलेगा तो बोलोगे की बोलता है' का ज़िक्र है, जो दर्शाता है कि प्राण ने अपने संवादों को रुपहले पर्दे पर ही नहीं बल्कि जीवन में भी उतारा। प्राण को दादा साहब फाल्के पुरस्कार की घोषणा शायद इस वजह से भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण है कि यह पहली बार परदे पर खलनायक की भूमिका अदा करने वाले एक अभिनेता को मिल रहा है। प्राण सिनेमा के परदे पर खलनायकी के पर्याय हैं। प्राण ने अपने कैरियर
की शुरुआत पंजाबी फ़िल्म 'यमला जट' से 1940 में की थी। 1942 वाली हिंदी फ़िल्म 'खानदान' से उनकी छवि रोमांटिक हीरो की बनी। लाहौर से मुंबई आने के बाद 'जिद्दी' से उनके बॉलीवुड कैरियर की शुरुआत हुई। इसके बाद तो वह हिंदी फ़िल्मों के चहेते विलेन ही बन गए। प्राण ने हिंदी सिनेमा की कई पीढ़ियों के साथ अभिनय किया। दिलीप कुमार, देव आनंद और राजकपूर के साथ पचास के दशक में, साठ और सत्तर के दशक में शम्मी कपूर ,राजेंद्र कुमार और धर्मेंद्र के साथ उनकी कई फ़िल्में यादगार रहीं। वह जो रोल करते, उसकी आत्मा में उतर जाते। लोग उन्हें विलेन और साधु, दोनों रूपों में सराहने लगे। 'पूजा के फूल' और'कश्मीर की कली' जैसी फ़िल्मों से प्राण ने अपना नाता कॉमेडी से भी जोड़ लिया।
अस्सी के दशक में राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन के साथ उनकी कई यादगार फ़िल्में आईं।उनकी खलनायकी के विविध रूप 'आजाद', 'मधुमती', देवदास , 'दिल दिया दर्द लिया', 'मुनीम जी' और 'जब प्यार किसी से होता है' में देखे जा सकते हैं। उनकी हिट फ़िल्मों की फेहरिस्त भी बड़ी लंबी है। अपने समय की लगभग सभी प्रमुख
अभिनेत्रियों के साथ उनकी फ़िल्में आईं। पंजाब , उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में शिक्षित प्राण किसी भी ज़बान और लहजे को अपना बना लेते थे। उनकी अदा और डायलॉग डिलीवरी रील रोल को रियल बना देती थी। उनका डायलॉग -तुमने ठीक सुना है बरखुरदार, चोरों के
ही उसूल होते हैं खूब चर्चित हुआ। सबसे बड़ी बात यह कि चार सौ से अधिक फ़िल्में करने वाले प्राण ने खुद को कभी दोहराया नहीं। 'पत्थर के सनम' हो या 'जिस देश में गंगा बहती है', 'मजबूर' हो या 'हाफ टिकट' या फिर 'धर्मा', प्राण ने हर फ़िल्म में अपनी मौजूदगी का पूरा अहसास कराया

प्राण के प्रसिद्ध संवाद (डायलॉग) 

(डायलॉग) फ़िल्म 1. इस इलाक़े में नए आए हो बरखुरदार, वरना यहां शेर खान को कौन नहीं जानता! ज़ंजीर 
2. राम ने हर युग में जन्म लिया लेकिन लक्ष्मण फिर पैदा नहीं हुआ उपकार 
3. ये पाप की नगरी है, यहां कंस और दुर्योधन का ठिकाना है उपकार 
4. ज़िंदगी में चढ़ते की पूजा मत करना, डूबते की भी सोचना उपकार 
5. ये फूलों के साथ साथ दिल कब से बेचना शुरू कर दिया है कश्मीर की कली
 6. एक डाकू की लड़की पुलिस वाले से शादी करेगी, गोली मारिए सरदार जिस देश में गंगा बहती है 
7. शेर और बकरी जिस घाट पर एक साथ पानी पीते हों, वो घाट, न हमने देखा है और न देखना चाहते हैं आन बान
 8. पहचाना इस इकन्नी को, यह वही इकन्नी है जिसे बरसों पहले उछालकर तुमने मेरा मज़ाक उड़ाया था। रॉबर्ट सेठ तुम्हारे ही सोने से तुम्हारे ही आदमियों को ख़रीद कर आज मैं तुम्हारी जगह पहुंच गया हूं और तुम मेरे क़दमों में। अमर अकबर एंथनी 
9. क्योंकि मैं रिवॉल्वर हमेशा ख़ाली रखता हूं मजबूर 
10. लेकिन मैं उस क़िस्म का जेलर नहीं हूं। मैं न तो छुट्टी पर जाऊंगा और न तबादले की दरख़्वास्त करूंगा। तुम्हारा वो रिकॉर्ड है, तो हमारा भी एक रिकॉर्ड है। हमारी जेल से संगीन से संगीन क़ैदी जो बाहर गया है उसने तुम्हारे उस दरबार में दुआ मांगी है तो यही दुआ मांगी है कि अगर दोबारा जेल जाए तो रघुवीर सिंह की जेल में न जाए कालिया 
11. समझते हो कि सब समझता हूं इससे बढ़कर इंसान की नासमझी और क्या हो सकती है क्रोधी
 12. शायद तू यह भूल गया कि इस ज़मीन पर फ़तह ख़ां अकेला पैदा नहीं हुआ है, उसके साथ उसकी बला की ज़िद भी पैदा हुई है। कहीं मेरी ज़िद किसी ज़िद पर आ गई तो अपनी बेटी के रास्ते में पड़े हुए बेशुमार कांटों को तो मैं अपने दामन में समेट लूंगा लेकिन तेरे रास्ते दहकते हुए अंगारों से भर दूंगा। सनम बेवफ़ा
 13. आवाज़ तो तेरी एक दिन मैं नीची करूंगा, शेर की तरह गरजने वाला बिल्ली की ज़बान बोलेगा। सनम बेवफ़ा

रोचक तथ्य

पहली फ़िल्म के मिले 50 रुपये प्राण जब मात्र 19 वर्ष के थे तो उन्होंने 'दलसुख पंचोली' के निर्देशन में बनी पंजाबी फ़िल्म ‘यमला जट’ मे हीरो की भूमिका अदा की थी। उन्हें यह फ़िल्म लेखक 'वली मुहम्मद वली' ने उस समय ऑफ़र की थी जब वह 1939 में लाहौर में एक पान की दुकान के बाहर खड़े हुए थे। उन्हें इस भूमिका के लिए 50 रुपये दिए गये

प्राण को शायरी व फ़ोटोग्राफ़ी से बहुत अधिक लगाव था। एक समय में उनका घर उनकी तस्वीरों से भरा हुआ था जो विभिन्न रूपों में खींची गई थीं। प्राण को कबीर , ग़ालिब व फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का लगभग पूरा कलाम याद था और वह सेट पर भी इनकी शायरी पढ़ते थे।ताश खेलना व स्पोर्टस भी उनको पसंद थे। वह और उनकी पत्नी मुंबई के 'क्रिकेट क्लब ऑफ इंडिया' में नियमित जाया करते थे। उन्होंने अनेक सेलीब्रिटी मैचों को स्वर्गीय पी. जयराज के साथ मिलकर आयोजित किया। वह मुंबई की फुटबॉल टीम 'डायनामो' के प्रायोजक भी थे।
सह-अभिनेत्रियाँ प्राण ने अपने ज़माने की लगभग सभी अभिनेत्रियों के साथ काम किया। 'खानदान' (1942) में 13 वर्षीय नूरजहां तो क़द में इतनी छोटी थीं कि उन्हें प्राण के साथ अभिनय करते समय ईटों पर खड़ा होना पड़ता था। वैजयंतीमाला (बहार, 1951) व हेलन
(हलाकू, 1956) ने अपनी पहली फ़िल्म प्राण के साथ ही की थीं। हिन्दी फ़िल्मों के पर्दे पर खलनायक की भूमिका अदा करने वाले प्राण फ़िल्मोद्योग में भद्र व्यक्ति के रूप में जाने जाते थे। वह अपने में मस्त रहते थे और आज तक किसी हीरोइन के साथ उनका स्कैंडल नहीं हुआ। सेट पर वह लतीफ़े सुनाते,शायरी सुनाते, लेकिन जब दृश्य पूरा हो जाता तो वह अपने कमरे में जा कर अपने आप तक सीमित हो जाते।प्रभावी खलनायकी प्राण ने पर्दे पर अक्सर बुरे व्यक्ति की भूमिका की, इसलिए यह अंदाजा लगाना कठिन हो जाता है कि वास्तव में वह कितने अच्छे व्यक्ति हैं। उनकी खलनायकी इतनी प्रभावी थी कि लोगों ने अपने बच्चों का नाम प्राण रखना बंद कर दिया था। उनके तीनों बच्चों पिंकी, अरविंद व सुनील को बहुत शर्मिंदगी होती थी, जब दूसरे बच्चे प्राण को खलनायक कहते थे। उनकी बेटी पिंकी ने एक बार उनसे पूछा था कि वह फ़िल्मों में अच्छी भूमिकाएं क्यों नहीं करते हैं? इसलिए जब 1967 में उन्हें मनोज कुमार ने ‘उपकार’ ऑफ़र की तो उन्होंने उसे फ़ौरन स्वीकार कर लिया। यह हिन्दी सिनेमा में उनकी पहली सकारात्मक भूमिका वाली फ़िल्म थी। 

मुमताज़ की त्वचा बहुत कोमल थी और उस पर आसानी से निशान पड़ जाते थे। चूंकि प्राण के साथ उनकी फ़िल्मों में उन्हें अक्सर पर्दे पर संघर्ष करते हुए दिखाया जाता था तो मुमताज के बदन पर काले व नीले निशान पड़ जाते थे। दृश्य पूरा होने के बाद प्राण को बहुत शर्मिंदगी होती थी और वह मुमताज से माफ़ी मांगा करते थे। हास्य के लिए प्राण का नृत्य प्राण की एक कमज़ोरी यह रही कि वह नृत्य करना नहीं जानते थे। इसलिए जब फ़िल्म में हास्य की स्थिति उत्पन्न करनी होती तो प्राण से नृत्य कराया जाता जैसा कि ‘मुनीम जी’, ‘बल्फ मास्टर’ आदि। नृत्य न करने की वजह से ही उन्होंने 6-7 फ़िल्मों के बाद हीरो की भूमिका करना बंद कर दिया था। फिर भी पर्दे पर गाए उनके गीत बहुत मशहूर हुए जैसे ‘यारी
है ईमान मेरा’ ( ज़ंजीर 1973), ‘राज को राज ही रहने दो’ (धर्मा 1973) या ‘क़समे, वादे, प्यार, वफा सब’ (उपकार 1967)घर के बाहर प्रशंसकों की भीड़ प्राण ने 1950 के दशक में अपना बंगला बांद्रा के यूनियन पार्क में बनवाया। इस जगह को फ़िल्मी दुनिया के लोग मनहूस जगह समझते थे क्योंकि इसमें रहने वाले अनेक कलाकार जैसे कॉमेडियन गोप, निर्माता राम कमलानी व संगीतकार अनिल विश्वास को जबरदस्त प्रोफेशनल घाटा उठाना पड़ा था। लेकिन प्राण ने ऐसे किसी अंधविश्वास को मानने से इंकार कर दिया। उन्हें जगह पसंद आई और उन्होंने अपने बंगले का नाम अपनी बेटी के नाम पर ‘पिंकी’ रख दिया। पालीहिल पर वह पहला मशहूर घर था। प्राण के घर के आगे उनके प्रशंसकों की भीड़ लगी रहती थी। बच्चे भी वहां जमा हो जाते थे। प्राण को बच्चे बहुत पसंद थे और वह उन्हें अपने घर में आमंत्रित करते व उन्हें मिठाई, बिस्किट आदि खिलाते।

देश के विभाजन के समय प्राण सिकंद मुंबई आए और इतने आत्मविश्वास से भरे थे कि उन्होंने भव्य ताजमहल होटल में कमरा लिया। उन्हें लगा कि कुछ ही दिनों में काम मिलने के बाद अपना फ्लैट ख़रीदेंगे, परंतु उन्हें नए सिरे से संघर्ष करना पड़ा और लाहौर में सफल नायक रहे प्राण को मजबूर होकर ‘गृहस्थी’ (1948) में खलनायक की भूमिका करनी पड़ी, परंतु मीना कुमारी के साथ ‘हलाकू’ नामक फ़िल्म में एक बर्बर, सनकी और वहशी तानाशाह की भूमिका में उन्होंने ऐसा खौफ पैदा किया कि हर बड़ी फ़िल्म में उन्हें खलनायक की भूमिका मिलने लगी। ‘हलाकू’ में प्राण सिकंद ने यह सीखा कि उन्हें अपनी भूमिकाओं के लिए विशेष पोशाक, विग इत्यादि का उपयोग करना चाहिए। उनकी पोशाकें और विग उनके अभिनय का हिस्सा बन गए।प्राण ने लगभग 350 से ज्यादा फ़िल्मों में अभिनय किया, लेकिन वह अपनी फ़िल्मों सहित बमुश्किल ही कोई फ़िल्म देखते थे। प्राण को ‘परिचय’ (1972) में अपनी भूमिका सबसे कठिन प्रतीत हुई, जिसमें उन्होंने एक ज़िद्दी, अनुशासित व्यक्ति की भूमिका अदा की थी। उनकी सबसे पसंदीदा फ़िल्म ‘विक्टोरिया नम्बर 203′ (1972) है जिसका निर्देशन ब्रिज ने किया था। शम्मी कपूर की लगभग सभी फ़िल्मों में प्राण ने खलनायक की भूमिका निभाई। पर्दे की इस दुश्मनी के बावजूद दोनों आपस में गहरे दोस्त थे। दोनों को ही मांसाहारी भोजन व शराब बहुत पसंद थी। प्राण के अन्य अच्छे दोस्तों में दिलीप कुमार व राज कपूर शामिल थे और यह तिकड़ी अक्सर उनके बंगले पर महफिलें जमाती थीं

मशहूर फ़िल्म अदाकार 'प्राण' का निधन हिंदी फ़िल्मों के मशहूर विलेन और चरित्र अभिनेताप्राण की शुक्रवार 12 जुलाई , 2013 को देर शाम मुंबई के लीलावती अस्पताल में मौत हो गई। वो 93 साल के थे। उनके बेटे सुनील ने बीबीसी संवाददाता मधू पाल को बताया कि वो लीलावती अस्पताल में भर्ती थे जहां उनकी मौत देर शाम हुई। समाचार एजेंसी पीटीआई ने प्राण की बेटी पिंकी के हवाले से कहा है, "उनकी मौत लंबी बीमारी के बाद हुई।" उन्हें इस साल दादा साहब फालके पुरस्कार से सम्मानित किया गया था लेकिन वो इस क़दर बीमार थे कि इसे ख़ुद
स्वीकार करने दिल्ली नहीं आ पाए थे। बाद में सूचना और प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने उनके घर जाकर उन्हें यह पुरस्कार दिया। उनके निधन पर दुख जताते हुए बॉलीवुड ने उन्हें भारतीय सिनेमा का बड़ा स्तंभ बताया, जिनका कई सितारों का जीवन बनाने में अहम योगदान था। फ़िल्म इंडस्ट्री के पुराने और युवा अभिनेताओं ने प्राण के निधन पर अपनी संवेदना जताई। सुपरस्टार दिलीप कुमार और अमिताभ बच्चन ने बॉलीवुड के लीजेंड के साथ
जुड़ी अपनी यादें साझा कीं। प्राण के साथ कई फ़िल्मों में काम कर चुके अमिताभ बच्चन ने कहा कि उनके जैसे कद्दावर अभिनेता अब नहीं आते। उन्होंने कहा, 'वह एक बेहतरीन व्यक्ति, प्रशंसनीय सहयोगी, संपूर्ण पेशेवर, निभाये जाने वाले पात्रों को अपने में आत्मसाथ करने वाले, काम के बाद एक दिलचस्प साथी और एक विचारशील मनुष्य थे।' दिलीप साहब ने कहा, 'मैं कभी नहीं भूल सकता कि प्राण कैसे मेरे निकाह में पहुंचे थे। श्रीनगर के खराब मौसम से जूझते हुए, वह वहां शूटिंग कर रहे थे। उन्होंने दिल्ली की फ्लाइट ली, वहां से फिर शाम में मुंबई पहुंचे, बस मेरे निकाह से ठीक पहले मुझे गले लगाने के लिए।'

रविवार, 11 फ़रवरी 2024

शर्लिन चोपड़ा

#11feb 
शर्लिन चोपड़ा

🎂: 11 फ़रवरी 1984  हैदराबाद
माता-पिता: जॉर्ज अमिताभ चोपड़ा, सुसन चोप्रा
भाई: शेरोन चोप्रा, अमिताभ चोपड़ा

जन्म 1983 या 1984
हैदराबाद , भारत
व्यवसायों
निर्माता नमूना ,अभिनेत्री ,गायक
ऊंचाई
5 फीट 8 इंच (1.73 मीटर) 
सौंदर्य प्रतियोगिता का शीर्षक धारक,शीर्षक
मिस आंध्रा 

प्रमुख प्रतियोगिताएं
मिस आंध्रा ब्यूटी पेजेंट
बिग बॉस 3
चोपड़ा का जन्म हैदराबाद , भारत में एक पंजाबी ईसाई पिता, सागर चोपड़ा (मृत्यु 2005), जो पेशे से एक डॉक्टर थे और एक फ़ारसी मुस्लिम माँ, सुज़ैन ( नी आमिर), जो एक फार्मासिस्ट से ब्यूटीशियन बनीं, के घर हुआ था। उनकी एक बहन एमसी के रूप में काम करती है और एक छोटा भाई तकनीशियन इंजीनियर के रूप में न्यूजीलैंड में बस गया है। उसके माता-पिता ने मेडिकल छात्र दौरे पर ईरान में पहला संपर्क किया। घर पर, उनका परिवार हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू बोलता था और एक समय वे मेथोडिस्ट चर्च के सक्रिय सदस्य थे, जहां सुश्री चोपड़ा इतनी धार्मिक थीं कि वे तुरंत मण्डली की उपस्थिति में भजन 119 का शब्दशः पाठ करती थीं।

उसने स्टेनली गर्ल्स हाई स्कूल में दाखिला लिया , जहाँ वह एक अध्ययनशील छात्रा थी, उसका कोई दोस्त नहीं था और वह एक गीक के रूप में सामने आई थी। वह अपने स्कूल से टॉपर बनकर निकलीं। बाद में, उन्हें सेंट एन्स कॉलेज फॉर विमेन, सिकंदराबाद में प्रवेश मिल गया। 1999 में उन्हें "मिस आंध्रा" का ताज पहनाया गया, जिससे अंततः शोबिज के प्रति उनकी रुचि बढ़ी। चोपड़ा के अनुसार, लंबे समय तक काम के संघर्ष के कारण उद्योग में उनका यौन शोषण हुआ, अंततः वह भारत में "मी टू" आंदोलन की मजबूत आवाज़ों में से एक बन गईं।
चोपड़ा के शुरुआती अभिनय करियर में ज्यादातर बॉलीवुड फिल्मों में विभिन्न सहायक भूमिकाएँ शामिल थीं । वह टाइम पास , रेड स्वस्तिक और गेम जैसी फिल्मों में नजर आईं । उन्होंने अपनी तेलुगु फिल्म की शुरुआत रिचर्ड ऋषि के साथ ए फिल्म बाय अरविंद से की ।  चोपड़ा बिग बॉस के प्रतियोगी भी थे ।उन्हें 27वें दिन शो से बाहर कर दिया गया था।2013 से, उन्होंने रूपेश पॉल द्वारा निर्देशित कामसूत्र 3डी में मुख्य नायिका के रूप में काम किया, और वह ट्रेलर में भी दिखाई दीं, जो 66वें कान्स इंटरनेशनल में जारी किया गया था। चलचित्र उत्सव ।एक दिन की शूटिंग के बाद, सुश्री शर्लिन चोपड़ा कामसूत्र 3डी से बाहर चली गईं।
📽️
2005 
धींगा मुश्ती 
दोस्ती: फ्रेंड्स फॉरएवर  
2006 जवानी दीवानी: 
2006शरारती लड़का
2007 खेल
2007 रकीब
2007 लाल स्वास्तिक
2009 दिल बोले हड़िप्पा!
2014 कामसूत्र 3डी
2016 वजह तुम हो
2017 माया
2018 चमेली

पंडित नरिंदर शर्मा

पंडित नरिंदर शर्मा

#28feb
#11feb
🎂जन्म 28 फ़रवरी , 1913 में उत्तर प्रदेश राज्य के खुर्जा नगर के जहाँगीरपुर नामक स्थान पर हुआ।
⚰️–11 फरवरी1989
हिन्दी के लेखक, कवि तथा गीतकार थे। उन्होने हिन्दी फिल्मों (जैसे सत्यम शिवम सुन्दरम) के लिये गीत भी लिखे।
महान कवि, फ़िल्म गीतकार, लेखक, संपादक महाभारत जैसे धारावाहिक के पटकथा लेख़क
पंडित नरेंद्र शर्मा हिन्दी के प्रसिद्ध कवि, लेखक एवं सम्पादक थे उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से शिक्षाशास्त्र और अंग्रेज़ी में एम.ए. किया। 1934 में प्रयाग में अभ्युदय पत्रिका का संपादन किया। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी स्वराज्य भवन में हिंदी अधिकारी रहे और फिर बॉम्बे टाकीज़ बम्बई में गीत लिखे। उन्होंने फ़िल्मों में गीत लिखे, आकाशवाणी से भी संबंधित रहे और स्वतंत्र लेखन भी किया। उनके 17 कविता संग्रह, एक कहानी संग्रह, एक जीवनी और अनेक रचनाएँ पत्र
पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं।

अल्पायु से ही साहित्यिक रचनायें करते हुए पंडित नरेन्द्र शर्मा ने 21 वर्ष की आयु में पण्डित मदन मोहन मालवीय द्वारा प्रयाग में स्थापित साप्ताहिक" अभ्युदय " से अपनी सम्पादकीय यात्रा आरम्भ की। काशी विद्यापीठ में हिन्दी व अंग्रेज़ी काव्य के प्राध्यापक पद पर रहते हुए 1940 में वे ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रशासन विरोधी गतिविधियों के लिये गिरफ़्तार कर लिये गये और 1943 में मुक्त होने तक वाराणसी , आगरा और देवली में विभिन्न कारागारों में शचीन्द्रनाथ सान्याल,सोहनसिंह जोश, जयप्रकाश नारायण और सम्पूर्णानन्द जैसे ख्यातिनामों के साथ नज़रबन्द रहे और 19 दिन तक अनशन भी किया। जेल से छूटने पर उन्होंने अनेक फ़िल्मों में गीत लिखे और फिर 1953 से आकाशवाणी से जुड़ गये। इस बीच उनका लेखन कार्य निर्बाध चलता रहा। 11 मई , 1947 को मुम्बई में उनका विवाह सुशीलाजी से हुआ और परिवार में तीन पुत्रियों व एक पुत्र का जन्म हुआ।

1931 ई. में पंडित नरेंद्र शर्मा की पहली कविता 'चांद' में छपी। शीघ्र ही जागरूक, अध्ययनशील और भावुक कवि नरेन्द्र ने उदीयमान नए कवियों में अपना प्रमुख स्थान बना लिया। लोकप्रियता में इनका मुकाबला हरिवंशराय बच्चन से ही हो सकता था। 1933 ई. में इनकी
पहली कहानी प्रयाग के 'दैनिक भारत' में प्रकाशित हुई। 1934 ई. में इन्होंने मैथिलीशरण गुप्त की काव्यकृति ' यशोधरा ' की समीक्षा भी लिखी। सन् 1938 ई. में कविवर सुमित्रानंदन पंत ने कुंवर सुरेश सिंह के आर्थिक सहयोग से नए सामाजिक-राजनीतिक, आर्थिक स्पंदनों से युक्त 'रूपाभ' नामक पत्र के संपादन करने का निर्णय लिया। इसके संपादन में सहयोग दिया नरेन्द्र शर्मा ने।
भारतीय संस्कृति के प्रमुख ग्रंथ ' रामायण' और'महाभारत ' इनके प्रिय ग्रंथ थे। महाभारत में रुचि होने के कारण ये 'महाभारत' धारावाहिक के निर्माता बी. आर. चोपड़ा के अंतरंग बन गए। इसलिए जब उन्होंने 'महाभारत' धारावाहिक का निर्माण प्रारंभ किया तो नरेन्द्रजी
उनके परामर्शदाता बने। उनके जीवन की अंतिम रचना भी 'महाभारत' का यह दोहा ही है- "शंखनाद ने कर दिया, समारोह का अंत, अंत यही ले जाएगा, कुरुक्षेत्र पर्यन्त"।

लगभग 55 फ़िल्मों में 650 गीत एवं 'महाभारत' का पटकथा-लेखन और गीत-रचना की।

पंडित नरेंद्र शर्मा उन्नीसवीं सदी के चौथे दशक में ही मुंबई आ गए थे। बॉम्बे टॉकीज की अधिष्ठार्थी देविका रानी ने युसुफ़ ख़ान नाम वाले किसी पठान युवा को अपनी फ़िल्म ‘ज्वार-भाटा’ का नायक बनाने की बात जब सोची तो उन्होंने पंडित नरेश शर्मा से पूछा, ′इस युवक को किस फ़िल्मी नाम के साथ परदे पर उतारा जाए।′ पंडित नरेंद्र शर्मा ने उन्हें शायद ‘वासुदेव’ के साथ ‘दिलीप कुमार’ नाम सुझाया। देविका रानी को दिलीप कुमार नाम जंच गया और इस तरह युसुफ़ मियां दिलीप कुमार के नाम से ‘ज्वार-भाटा’ फ़िल्म के नायक बनकर रुपहले परदे पर आए। चालीस के दशक में उनका गीत ‘नैया को खेवैया के किया हमने हवाले’ ′ज्वारा भाटा′ के साथ ख़ासा लोकप्रिय हुआ था।
फिल्मों के लिए गीत लिखने के बावजूद उनकी रचनाओं की साहित्यिक गरिमा कायम रही। ‘भाभी की चूड़ियां’ फिल्म का गीत ‘ज्योति कलश छलके’, ‘सत्यम शिवम सुंदरम’ के सभी गीत और शहीदों के लिए लिखा गया उनका ‘समर में हो गए अमर’ गीत आज भी उतने ही लोकप्रिय हैं।
उनके 17 कविता संग्रह, एक कहानी संग्रह, एक जीवनी और अनेक रचनाएँ पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। उनकी प्रमुख रचनाएं निम्नलिखित हैं-

प्रवासी के गीत, मिट्टी और फूल, अग्निशस्य, प्यासा निर्झर, मुठ्ठी बंद रहस्य (कविता-संग्रह) मनोकामिनी, द्रौपदी, उत्तरजय सुवर्णा (प्रबंध काव्य) आधुनिक कवि, लाल निशान (काव्य-संयचन) ज्वाला-परचूनी (कहानी-संग्रह, 1942 में 'कड़वी-मीठी बात' नाम से प्रकाशित) मोहनदास कर्मचंद गांधी : एक प्रेरक जीवनी, सांस्कृतिक संक्राति और संभावना (भाषण)। लगभग 55 फ़िल्मों में 650 गीत एवं 'महाभारत' का पटकथा-लेखन और गीत-रचना।

11 फ़रवरी , 1989 ई. को हृदय-गति रुक जाने से पंडित नरेन्द्र शर्मा का निधन मुम्बई, महाराष्ट्र में हो गया।

टीना मुनीम

#11feb 
प्रसिद्ध अभिनेत्री टीना मुनीम
टीना का जन्म 
🎂11 फरवरी 1955 को गुजराती परिवार में हुआ था। 
पति: अनिल अंबानी (विवा. 1991)
बच्चे: जय अनमोल अंबानी, जय अंशुल अंबानी
माता-पिता: नंदकुमार चुनिलाल मुनीम, मीनाक्षी मुनीम
भाई: भावना मुनीम, नयन मुनीम

उनका बचपन से ही फिल्मी दुनिया की ओर ध्यान था। छोटी उम्र में ही उन्होंने बॉलीवुड में जाने का सपना पाल लिया था। जिसे टीना ने महज 21 साल की उम्र में ही पूरा कर लिया था। उन्होंने 1978 में फिल्म देश- परदेश के साथ अपने करियर की शुरुआत की। इस फिल्म में देव आनंद ने उनके साथ हीरो का रॉल अदा किया था।

टीना को अपने दिनों की सुपरस्टार के रुप में देखा जाता है। उन्होंने अपने फिल्मी करियर में कई बड़े मुकाम हांसिल किए थे।  टीना ने लूटमार, मनपसंद, रॉकी, सौतन, कर्ज जैसी कई हिट फिल्मों में अभिनय किया। इसके साथ 'मन पसंद' , 'बातों बातों में' 'बड़े दिलवाला' , 'इजाजत' में काम किया

फिल्मी कैरियर शुरुआत के पहले टीना को 1975 में 'फेमिना टीन प्रिंसेस' के क्राउन से नवाजा गया था  

टीना मुनील ने 1991 में अनिल अंबानी की लव स्टोरी किसी कहानी से कम नहीं है। अनिल अंबानी की पहली मुलाकात टीना मुनीम से एक शादी में हुई। जब अंबानी ने टीना को पहली बार देखा था। जिसके बाद वे टीना के प्यार में पागल हो गए थे। हालांकि अंबानी परिवार टीना के साथ शादी कराने को लेकर बिल्कुल भी तैयार नहीं था।क्योंकि उन्हें टीना का एक्ट्रेस होना पसंद नहीं था। जिसके बाद दोनों अलग हो गए। 

इसके बाद साल 1989 में अमेरिका में भूकंप भयानक भूकंप आया। जिसके बाद अनिल ने टीना का नंबर खोजकर उन्हें कॉल करके उनका हाल-चाल पूछा। जिसके बाद से दोनों के बीच दोबारा से बातचीत शुरु हो गई। मामला शादी तक पहुंचने लगा। जिसके बाद आखिरकार अनिल की जिद के आगे परिवार को हार माननी पड़ी और साल 1991 में दोनों की शादी करवा दी गई। टीना ने शादी के बाद बॉवीवुड को अलविदा कह दिया। हालांकि इससे पहले उन्होंने 35 सफल फिल्मों में अभिनय करके अपनी खास पहचान बनाई।
📽️
1991 जिगरवाला 
1987 मुकद्दर का फैसला 
1986 समय की धारा 
1986 भगवान दादा
1985 अलग अलग 
1985 बेवफ़ाई 
1983 सौतन 
1983 बड़े दिल वाला
1983 पु्कार 
1983 वान्टेड 
1982 दीदार-ए-यार 
1982 सुराग 
1982 ये वादा रहा 
1982 राजपूत 
1981 रॉकी
1985 युद्ध 
1985 आखिर क्यों?
आखिर क्यों
निर्देशक जे ओम प्रकाश
अभिनेता राजेश खन्ना,राकेश रोशन,स्मिता पाटिल,असरानी,सुजीत कुमार
प्रदर्शन तिथि1985
देशभारत
भाषाहिन्दी
1981 हरजाई 
1981 खुदा कसम 
1980 कर्ज़ 
1980 मन पसन्द 
1980 लूटमार
1980 आप के दीवाने 
1979 बातों बातों में 
1978 देस परदेस (पहली फिल्म थी)
निर्देशक,देव आनन्द
लेखक देव आनंद,सूरज ,सनिम
निर्माता देव आनंद,अमित खन्ना,
नवकेतन,
नवकेतन इंटरनैशनल फिल्म्स
अभिनेता,अजीत,टॉम एल्टर,देव आनन्द,बिन्दू,बीरबल,प्रेम चोपड़ा,ए के हंगल,गजानन जागीरदार,जानकी दास,भरत कपूर,अमज़द ख़ान,सुजीत कुमार,श्रीराम लागू,महमूद,राज मेहरा,इन्द्रानी मुखर्जी,टीना मुनीम,पेंटल,प्राण,कीथ स्टीवेन्सन,सुधीर,
छायाकार फाली मिस्त्री,
डी के प्रभाकर
संगीतकार राजेश रोशन
अमित खन्ना (गीत)
प्रदर्शन तिथि29 जून 1978
देश भारत
भाषा हिन्दी

शनिवार, 10 फ़रवरी 2024

पारबती घोष

#28march
#12feb 
पारबती घोष 

(जन्म चपला नायक ; 🎂28 मार्च 1942 - ⚰️12 फरवरी 2018)  

एक भारतीय अभिनेत्री, फिल्म निर्देशक और फिल्म निर्माता थीं ।घोष ओडिशा राज्य की पहली महिला फिल्म निर्माता थीं ।

पारबती घोष

उल्लेखनीय कार्य
लक्ष्मी (1962 फ़िल्म)
का (1965 फ़िल्म)
स्त्री (1968 फ़िल्म)
जीवनसाथी
गौर प्रसाद घोष
घोष, जो आठ भाई-बहनों में से एक थे, का जन्म चपला नायक के रूप में 28 मार्च 1933 को ब्रिटिश भारत के ओडिशा के कटक जिले के मानसिंघपटना में हुआ था । उनके पिता, बासुदेव नाइक, एक प्रमुख पुस्तक प्रकाशक , मनमोहन प्रेस का प्रबंधन करते थे । घोष ने सनत नलिनी गर्ल्स हाई स्कूल में पढ़ाई की। उन्होंने केलुचरण महापात्र , दयाल शर्मा और सुरेश राउत्रे से एक नर्तकी के रूप में भी प्रशिक्षण लिया ।
घोष ने ऑन-स्क्रीन फिल्म भूमिकाओं में बदलाव से पहले ऑल इंडिया रेडियो पर एक बाल आवाज अभिनेता के रूप में अपना करियर शुरू किया । उन्होंने अपने फ़िल्मी करियर की शुरुआत 1949 की फ़िल्म, श्री जगन्नाथ में चरित्र नीला माधव के बाल कलाकार के रूप में की । उन्हें बड़ा ब्रेक 1953 की फिल्म अमारी गान झुआ ( हमारी गांव की लड़की ) में मिला, जहां उन्हें मुख्य महिला अभिनेत्री के रूप में चुना गया। अमारी गान झुआ, जिसने बाल विवाह की विवादास्पद प्रथा की खोज की , को सकारात्मक समीक्षा मिली।

1956 में, घोष सफल उड़िया भाषा की फिल्म, भाई भाई में मुख्य अभिनेत्री के रूप में अपने भावी पति, गौर प्रसाद घोष , जो निर्माता भी थे, के साथ दिखाई दीं। भाई भाई , जिसने मुख्य अभिनेत्री के रूप में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया, ने भारतीय फिल्म उद्योग में अपना प्रोफ़ाइल बढ़ाया। इससे उनकी फिल्म निर्देशन और निर्माण में भी रुचि पैदा हुई। इसके बाद घोष 1959 में माँ में नज़र आये , जिसका निर्माण भी गौर प्रसाद घोष ने किया था।

पारबती घोष और उनके पति ने लक्ष्मी (1962) , का (1965) , स्त्री (1968) का निर्माण, सह-निर्देशन और अभिनय किया । इन तीन फिल्मों ने निर्देशक और निर्माता के रूप में उनके काम के लिए तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीते। कुछ साल बाद, उन्होंने 1986 में छ मन अथा गुंथा का निर्माण और निर्देशन किया । उन्होंने 'प्रश्न' और 'सोपान' जैसी हिंदी और बंगाली भाषा की टेलीफिल्मों में काम किया था। वह 1971 में संसार में भी दिखाई दीं। 

निर्देशक और निर्माता के रूप में उनकी आखिरी फिल्म 1998 में सालाबेगा थी ।
⚰️घोष का 12 फरवरी 2018 को 84 वर्ष की आयु में भुवनेश्वर में निधन हो गया । ओडिशा की राज्य सरकार ने उनके सम्मान में राजकीय अंत्येष्टि आयोजित की। [22] [23] उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने पारबती घोष और स्थानीय और राष्ट्रीय फिल्म उद्योग में उनके योगदान को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि "वह एक ही समय में एक अभिनेता, निर्देशक और निर्माता थीं। शुरुआती दिनों में उन्होंने अपने दम पर उड़िया सिनेमा को एक नए स्तर पर पहुंचाया। उन्हें महिला सशक्तिकरण का प्रतीक माना जाता है, जब सशक्तिकरण जैसा विचार अनसुना था। उनका जाना हमारे उद्योग और सिल्वर स्क्रीन की दुनिया के लिए एक बड़ी क्षति है । वह उड़िया सिनेमा में उनके योगदान के लिए हमेशा याद किया जाएगा।"

📽️
श्री जगन्नाथ (1949) (बाल कलाकार)
अमारी गान झुआ (1953)
भाई भाई (1956)
माँ (1959) (निर्मित)
लक्ष्मी (1962) (निर्मित, सह-निर्देशित और अभिनय)
का (1965) (निर्मित, सह-निर्देशित और अभिनय)
स्त्री (1968) (निर्मित, सह-निर्देशित और अभिनय)
संसार (1971)
छ मन अथा गुन्था (1986) (निर्मित और निर्देशित)
सालाबेगा (1998) (निर्मित और निर्देशित)
प्रश्न (टेलीफिल्म)
सोपान (टेलीफिल्म)

रवि टंडन

#17feb
#11feb 
रवि टंडन
अभिनेत्री रवीना टंडन के पिता

🎂जन्म 17 फ़रवरी, 1935
जन्म भूमि आगरा, उत्तर प्रदेश
⚰️मृत्यु 11 फ़रवरी, 2022

मृत्यु स्थान मुम्बई, महाराष्ट्र
संतान पुत्र- राजीव टंडन
पुत्री- रवीना टंडन

कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र भारतीय हिन्दी सिनेमा
मुख्य फ़िल्में 'नजराना', 'मुकद्दर', 'मजबूर', 'खेल खेल में', 'अनहोनी', 'खुद्दार', 'जिंदगी', आदि।
प्रसिद्धि फ़िल्म निर्देशक व प्रोड्यूसर
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी फिल्म ‘लव इन शिमला’ और ‘ये रास्ते हैं प्यार के’ में फिल्म निर्देशन की बारीकियां सीखने के बाद रवि टंडन ने अपनी पहली फिल्म बतौर निर्देशक ‘अनहोनी’ बनाई।
रवि टंडन (अंग्रेज़ी: Ravi Tandon, जन्म- 17 फ़रवरी, 1935; मृत्यु- 11 फ़रवरी, 2022) जानेमाने भारतीय फ़िल्म निर्देशक थे। वह हिन्दी फ़िल्मों की प्रसिद्ध अभिनेत्री रवीना टंडन के पिता थे। संजीव कुमार के करीबी मित्रों में शामिल रहे रवि टंडन ने फिल्म निर्देशक आर. के. नय्यर के सहायक के रूप में काम शुरू किया था। 'इन्क्रेडिबल इंडिया फाउंडेशन' की ओर से फिल्म निर्देशक रवि टंडन को साल 2020 में 'ब्रज रत्न अवार्ड' से सम्मानित किया गया था।

परिचय
रवि टंडन का जन्म 17 फ़रवरी, 1935 को उत्तर प्रदेश में आगरा शहर के माइथान में एक पंजाबी फैमिली में हुआ था। वह बॉलीवुड के जाने-माने डायरेक्टर और प्रोड्यूसर थे। उन्होंने बॉलीवुड में कई सुपर हिट फिल्में बनाई थीं। उनके कॅरियर में 'नजराना', 'मुकद्दर', 'मजबूर', 'खेल खेल में', 'अनहोनी', 'खुद्दार', 'जिंदगी', आदि फिल्में शामिल हैं। रवि टंडन ने वीना टंडन से शादी की थी, जिससे उनके दो बच्चे हैं। एक बेटा राजीव जो एक्टर है और एक बेटी रवीना टंडन, जो बॉलीवुड अभिनेत्री हैं। संजीव कुमार के करीबी मित्रों में शामिल रहे रवि टंडन ने फिल्म निर्देशक आर. के. नय्यर के सहायक के रूप में काम शुरू किया था।

फ़िल्म निर्देशन
फिल्म ‘लव इन शिमला’ और ‘ये रास्ते हैं प्यार के’ में फिल्म निर्देशन की बारीकियां सीखने के बाद रवि टंडन ने अपनी पहली फिल्म बतौर निर्देशक ‘अनहोनी’ बनाई। इस फिल्म में संजीव कुमार के अभिनय की तारीफ अब तक होती है। इसके बाद उन्होंने ऋषि कपूर को लेकर फिल्म ‘खेल खेल में’ बनाई। इसी की रीमेक के तौर पर अक्षय कुमार की फिल्म ‘खिलाड़ी’ बनी।

ब्रज रत्न पुरस्कार
रवीना टंडन, रवि टंडन के साथ
'इन्क्रेडिबल इंडिया फाउंडेशन' की ओर से फिल्म निर्देशक रवि टंडन को साल 2020 में 'ब्रज रत्न अवार्ड' से सम्मानित किया गया था। स्वास्थ्य ठीक नहीं होने के कारण रवि टंडन आगरा नहीं आ सके थे। फाउंडेशन के अध्यक्ष पूरन डाबर के अनुसार, रवि के छोटे भाई रज्जू टंडन ने अवार्ड लिया था। डाबर का कहना था कि ब्रज रत्न अवार्ड मिलने पर रवि टंडन ने कहा था कि मेरे शहर ने मुझे जो अवार्ड दिया है, वह मेरे जीवन के खास अवार्ड में से एक है। मुंबई में रहते हुए भी ब्रज रत्न अवार्ड मुझे मेरे शहर की खुशबू से हमेशा महकाता रहेगा।

सावन की परिक्रमा
फिल्म निर्देशक रवि टंडन के मकान के पास रहने वाले रक्षा मंत्रालय से सेवानिवृत्त वरिष्ठ लेखाधिकारी विष्णु नारायण टंडन को 1950 में माइथान, आगरा की गलियों में खेले जाने वाले क्रिकेट मैचों की याद ताजा थी। उन्होंने बताया था कि काली टोपी, लाल रुमाल में रवि टंडन ने जब अभिनय किया था तो मेरे पास फोन आया था। उस समय ट्रंक काल चलते थे। मैं उस समय काफी खुश हुआ था। घर पास-पास था, इसलिए उनसे भाई जैसा रिश्ता हो गया था। विष्णु नारायण टंडन बताते हैं कि एक बार मेरे बड़े भाई सावन में बल्केश्वर महादेव की परिक्रमाम लगाने गए। रवि टंडन नहीं जा सके। वह खूब रोए। इसके बाद मां के कहने पर मैं उन्हें बसंत टॉकीज पर भल्ला खिलाकर वापस लौटा लाया। मां को बता दिया कि परिक्रमा पूरी हो गई।

पिता की जन्मस्थली देख खुश हुई थी रवीना
रवीना टंडन के साथ रवि टंडन
माइथान में रहने वाले भारतभूषण गप्पी के अनुसार, काफी कम लोगों को यह मालूम है कि रवीना का जन्म मुंबई में हुआ था। चार साल पहले एक कार्यक्रम में आईं रवीना टंडन से जब मैंने पूछा कि माइथान के बारे में कितना जानती हैं। उस पर उन्होंने कहा था कि माइथान मेरे पिता की वो जमीं हैं जहां से उनकी जीवन की सफलता की कहानी शुरू होती है। पापा मुझे माईथान की गलियों के बारे में बताते हैं, तो काफी उत्सुक हो जाती हूं। उन्होंने कहा था कि पिता की जन्मस्थली पर आकर गौरवान्वित महसूस करती हैं।

मृत्यु
फ़िल्म निर्देशक रवि टंडन की मृत्यु 11 फ़रवरी, 2022 को मुम्बई, महाराष्ट्र में हुई। उन्होंने मुंबई के जुहू स्थित घर पर सुबह अंतिम सांसें लीं। वह बढ़ती उम्र संबधी बीमारियों से जूझ रहे थे। उनके निधन की जानकरी उनकी बेटी रवीना टंडन ने अपने सोशल मीडिया पर पोस्ट शेयर कर दी थी। पिता का अंतिम संस्कार रवीना ने ही किया।
📽️

1987 नजराना
1986 एक मैं और एक तू
1985 जवाब
राही बदल गए
बांड 303
1984 आन और शान
1982 ख़ुद-दार
1981 वक़्त की दीवार
1979 झूठा कहीं का
1978 चोर हो तो ऐसा
मुकद्दर
1976 जिंदगी
1975 अपने रंग हज़ार
खेल-खेल में
1974 मजबूर

निर्माण
1973 अनहोनी
निर्माता के रूप में
1986 एक मैं और एक तू
1975 अपने रंग हज़ार
1973 अनहोनी

सहायक निदेशक के रूप में
1963 ये रास्ते हैं प्यार के मुख्य

सहायक निदेशक
1960 शिमला में प्यार सहायक
लेखक के रूप में
1973 अनहोनी कहानी

अभिनेता के रूप में
1960 शिमला में प्यार

अमरीकी ट्रंप

ट्रंप चले थे ईरान हराने , खुद अभी बने पप्पू  राहुल बने थे शेर ट्रंप के बल , खुद मुंह के बल गिरे।  दोनों हो रह बेइज्जत दुनिया हुई...