रविवार, 7 जनवरी 2024

विमल राय

#12july
#07jan 
पूरा नाम बिमल राय

🎂जन्म 12 जुलाई, 1909
जन्म भूमि पूर्वी बंगाल (वर्तमान में बांग्लादेश)
⚰️मृत्यु 07 जनवरी, 1966
मृत्यु स्थान मुंबई, महाराष्ट्र
पति/पत्नी मनोबिना
संतान जॉय और रिंकी भट्टाचार्य
कर्म भूमि मुंबई, कोलकाता
कर्म-क्षेत्र फ़िल्म निर्देशक
मुख्य फ़िल्में 'परख', 'दो बीघा ज़मीन', 'बंदिनी', 'सुजाता', 'मधुमती' आदि।
विषय सामाजिक
पुरस्कार-उपाधि फ़िल्मफेयर पुरस्कार निर्देशक (सात बार)
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी बिमल राय को सर्वश्रेष्ठ निर्देशन के लिए सात बार फ़िल्मफेयर पुरस्कार मिला, जो अब तक सबसे अधिक हैं।
फ़िल्मों के महान् फ़िल्म निर्देशक थे। हिंदी सिनेमा में प्रचलित यथार्थवादी और व्यावसायिक धाराओं के बीच की दूरी को पाटते हुए लोकप्रिय फ़िल्में बनाने वाले बिमल राय बेहद संवेदनशील और मौलिक फ़िल्मकार थे। बिमल राय का नाम आते ही हमारे जहन में सामाजिक फ़िल्मों का ताना-बाना आँखों के सामने घूमने लगता है। उनकी फ़िल्में मध्य वर्ग और ग़रीबी में जीवन जी रहे समाज का आईना थीं। चाहे वह 'उसने कहा था' हो, 'परख', 'काबुलीवाला', 'दो बीघा ज़मीन', 'बंदिनी', 'सुजाता' या फिर 'मधुमती' ही क्यों ना हो। एक से बढ़कर एक फ़िल्में उन्होंने फ़िल्म इण्डस्ट्री को दी हैं।
जीवन परिचय
बिमल राय का जन्म 12 जुलाई, 1909 को पूर्व बंगाल (वर्तमान बांग्लादेश) के एक ज़मींदार परिवार में हुआ था। बिमल ने अपना कॅरियर न्यू थियेटर स्टूडियो, कोलकाता में कैमरामैन के रूप में शुरू किया। वे सन 1935 में आई के. एल. सहगल की फ़िल्म देवदास के सहायक निर्देशक थे। बिमल राय के मानवीय अनुभूतियों के गहरे पारखी और सामाजिक मनोवैज्ञानिक होने के कारण उनकी फ़िल्मों में सादगी बनी रही और उसमें कहीं से भी जबरदस्ती थोपी हुई या बड़बोलेपन की झलक नहीं मिलती। इसके अलावा सिनेमा तकनीक पर भी उनकी मज़बूत पकड़ थी जिससे उनकी फ़िल्में दर्शकों को प्रभावित करती हैं और दर्शकों को अंत तक बांध कर रखने में सफल होती हैं। शायद यही वजह रही कि जब उनकी फ़िल्में आईं तो प्रतिस्पर्धा में दूसरा निर्देशक नहीं ठहर सका।
निर्देशन क्षमता
बिमल राय ने अपनी फ़िल्मों में सामाजिक समस्याओं को तो उठाया ही, उनके समाधान का भी प्रयास किया और पर्याप्त संकेत दिए कि उन स्थितियों से कैसे निबटा जाए। 'बंदिनी' और 'सुजाता' फ़िल्मों का उदाहरण सामने है जिनके माध्यम से वह समाज को संदेश देते हैं। देशभक्ति और सामाजिक फ़िल्मों से अपना सफ़र शुरू करने वाले बिमल राय की कृतियों के विषय का फलक काफ़ी व्यापक रहा और वह किसी एक इमेज में बंधने से बच गए। एक ओर वह सामाजिक बुराई का संवेदना के साथ चित्रण कर रहे थे तो दूसरी ओर उनका ध्यान स्त्रियों के सम्मान और उनकी पीड़ा की तरफ भी था। हिंदी फ़िल्मों में नायक केंद्रित कथानकों का ही ज़ोर रहा है, लेकिन बिमल दा ने उसे भी खारिज कर दिया और नायिकाओं को केंद्रित कर बेहद कामयाब फ़िल्में बनाईं। ऐसी फ़िल्मों में मधुमती, बंदिनी, सुजाता, परिणीता बेनजीर, बिराज बहू आदि शामिल हैं।

प्रतिभा के अद्भुत पारखी
बिमल राय स्वयं एक प्रतिभाशाली फ़िल्मकार होने के अलावा वे निस्संदेह प्रतिभा के अद्भुत पारखी भी थे जो कि इस बात से प्रमाणित होता है कि मूल रूप से संगीतकार के रूप में ख्यातिप्राप्त सलिल चौधरी के लेखन की ताकत को उन्होंने पहचाना जिसके फलस्वरूप आज भारत के पास "दो बीघा ज़मीन" जैसा अमूल्य रत्न है। जैसे साहित्य के क्षेत्र में उपन्यास सम्राट प्रेमचन्द के 'गोदान' का नायक 'होरी' अभावग्रस्त और चिर संघर्षरत भारतीय किसान का प्रतीक बन चुका है तो वैसे ही ग्रामीण सामंती व्यवस्था और नगरों के नृशंस पूँजीवाद के बीच पिसते श्रमिक वर्ग के प्रतिनिधि का दर्ज़ा 'दो बीघा ज़मीन' के 'शम्भू' को प्राप्त है। जिन लोगों को यह भ्रम है कि हाल ही के दिनों में एक अंग्रेज़ द्वारा बनाई गयी एक अति साधारण फ़िल्म के ऑस्कर जीतने के बाद ही वैश्विक पटल पर हिंदी सिनेमा को प्रतिष्ठा मिलने का दौर शुरू हुआ है, उनको इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि 'दो बीघा ज़मीन' वर्षों पहले ही अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म समारोहों में अपना डंका बजा चुकी थी। यदि प्रगतिशील साहित्य की तरह "प्रगतिशील सिनेमा" की बात की जाए तो बिमल राय निस्संदेह इसके पुरोधा माने जायेंगे।
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बिमल राय की कुछ प्रसिद्ध फ़िल्में निम्न हैं-

परख
दो बीघा ज़मीन
बंदिनी
सुजाता
मधुमती
परिणीता
बिराज बहू
काबुलीवाला
उसने कहा था
सर्वश्रेष्ठ निर्देशन के लिए सात बार फ़िल्मफेयर पुरस्कार मिले। इनमें दो बार तो उन्होंने हैट्रिक बनाई। उन्हें 1954 में 'दो बीघा ज़मीन' के लिए पहली बार यह पुरस्कार मिला। इसके बाद 1955 में 'परिणीता', 1956 में 'बिराज बहू' के लिए यह सम्मान मिला। तीन साल के अंतराल के बाद 1959 में 'मधुमती', 1960 में 'सुजाता' और 1961 में 'परख' के लिए उन्हें यह पुरस्कार मिला। इसके अलावा 1964 में 'बंदिनी' के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ निर्देशन का फ़िल्मफेयर का पुरस्कार मिला
फ़िल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ निर्देशक (सात बार)
1954 में दो बीघा ज़मीन के लिए
1955 में परिणीता के लिए
1956 में बिराज बहू के लिए
1959 में मधुमती के लिए
1960 में सुजाता के लिए
1961 में परख के लिए
1964 में बंदिनी के लिए
बिमल राय 'चैताली' फ़िल्म पर काम कर ही रहे थे, लेकिन 1966 में 7 जनवरी को मुंबई, महाराष्ट्र में कैंसर के कारण इनका निधन हो गया। बिमल राय भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उन्होंने फ़िल्मों की जो भव्य विरासत छोड़ी है वह सिनेमा जगत् के लिए हमेशा अनमोल रहेगी।

शनिवार, 6 जनवरी 2024

रीना राय

#07jan 
रीना रॉय
: 🎂07 जनवरी 1957 , मुम्बई
बच्चे: सनम खान
माता-पिता: शारदा रॉय, सादिक अली
भाई: बरखा रॉय, राजा रॉय, अंजू राय
 हिन्दी फ़िल्मों की एक अभिनेत्री हैं। 
उन्होंने 1972 से 1985 तक कई फिल्मों में प्रमुख भूमिकाएं निभाई हैं और उस युग की एक प्रमुख अभिनेत्री थीं। वह अपने समय की सबसे अधिक कमाई वाली अभिनेत्री में से एक थीं। 
रीना रॉय (जन्म: 7 जनवरी, 1957) हिन्दी फ़िल्मों की एक अभिनेत्री हैं। उन्होंने 1972 से 1985 तक कई फिल्मों में प्रमुख भूमिकाएं निभाई हैं और उस युग की एक प्रमुख अभिनेत्री थीं। वह अपने समय की सबसे अधिक कमाई वाली अभिनेत्री में से एक थीं। उन्हें हिन्दी सिनेमा में उनके योगदान के लिए शर्मिला टैगोर के साथ 1998 में फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित किया गया। वह सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार की प्राप्तकर्ता हैं, जो उन्हें फिल्म अपनापन (1977) में उनके प्रदर्शन के लिए दिया गया था। उन्हें नागिन (1976) और आशा (1980) के लिए फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार के लिए नामांकन मिला था।
उनकी दो और बहनें हैं, बरखा और अंजू और एक भाई राजा है। 1983 में, अपनी प्रसिद्धि की ऊँचाई पर, रीना रॉय ने पाकिस्तानी क्रिकेट खिलाड़ी मोहसिन खान से शादी करने के लिए फिल्म उद्योग छोड़ने का फैसला किया। बाद में दोनों ने तलाक ले लिया। रीना ने शुरू में तलाक में अपनी बेटी सनम की कस्टडी खो दी थी। उनके पूर्व पति के पुनर्विवाह करने के बाद, रीना को उनकी बेटी की कस्टडी मिल गई।
फिल्मों में रीना रॉय के करियर की शुरुआत नई दुनिया नये लोग से एक और नवागंतुक डैनी डेन्जोंगपा के साथ हुई। लेकिन इस फिल्म को अस्थायी रूप से बंद कर दिया गया। दोनों अभिनेताओं को फिर से जरूरत (1972) में, एक और नवागंतुक विजय अरोड़ा के साथ लिया गया। इस अवधि के दौरान उनको जैसे को तैसा (1973) से पहचान मिली।

1976 वह वर्ष था जिसने रीना को नागिन और कालीचरण (1976) के साथ प्रमुख सफलता दिलाई।[2] सुभाष घई, असफल अभिनेता, अपने निर्देशन की शुरुआत कर रहे थे, और शत्रुघ्न सिन्हा, वह अभिनेता जो अपनी खलनायक भूमिकाओं के लिए जाने जाते थे, नायक के रूप में अपनी पहली पहचान बना रहे थे। लेकिन फिल्म ने सभी की उम्मीदों पर पानी फेर दिया और आश्चर्यजनक रूप से हिट बन गई। रीना और शत्रुघ्न ने अपने अच्छे प्रदर्शन के लिए दर्शकों का ध्यान आकर्षित किया और उन्होंने सुभाष घई की विश्वनाथ (1978), जैसी कई फिल्मों को एक साथ किया। प्रेस ने उनके रिश्ते को भी प्रचारित किया, जो तब समाप्त हुआ जब 1981 में शत्रुघ्न ने पूनम सिन्हा नाम की एक पूर्व अभिनेत्री से शादी की।
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2000 रिफ्युज़ी 
1999 गैर शारदा ओबेरॉय 
1996 अजय दुर्गा 
1996 राजकुमार 
1995 कलयुग के अवतार रीना 
1995 जनम कुंडली रीटा मेहरा 
1993 आदमी खिलौना है गंगा वर्मा 
1993 बेदर्दी प्रीति सक्सेना 
1988 दो वक्त की रोटी 
1986 मंगल दादा लक्ष्मी 
1985 काली बस्ती 
1985 एक चिट्ठी प्यार भरी आरती सक्सेना 
1985 हम दोनों रानी 
1985 गुलामी 
1985 नया बकरा 
1984 यादों की ज़ंजीर ऊषा 
1984 आशा ज्योति आशा 
1984 माटी माँगे खून शारदा 
1984 राज तिलक मधुमती 
1983 अर्पण शोभा 
1983 नौकर बीवी का संध्या 
1983 प्रेम तपस्या देवी 
1983 अंधा कानून मीना श्रीवास्तव 
1982 सनम तेरी कसम निशा 
1982 हथकड़ी रोज़ी 
1982 दर्द का रिश्ता आशा 
1982 मैं इन्तकाम लूँगी माला बाजपेयी 
1982 जीओ और जीने दो रेनू 
1982 कच्चे हीरे रानी 
1982 इंसान सोना 
1982 भागवत 
1982 बदले की आग गीता 
1982 धर्म काँटा बिजली 
1982 दीदार-ए-यार 
1981 बेज़ुबान कल्पना 
1981 लेडीज़ टेलर 
1981 धनवान आशा 
1981 प्यासा सावन मनोरमा 
1981 रॉकी लाजवंती (लच्छी) 
1981 जय यात्रा 
1981 विलायती बाबू बिल्लो 
1981 नसीब जूली 
1980 ख़ंजर निशा/प्रीती 
1980 आशा आशा 
1980 यारी दुश्मनी 
1980 गंगा और सूरज पूनम 
1980 बेरहम किरन 
1980 ज्वालामुखी अंजू 
1980 सौ दिन सास के दुर्गा 
1979 मुकाबला 
1979 गौतम गोविन्दा नर्तकी 
1979 जानी दुश्मन 
1978 डाकू और जवान गंगा 
1978 विश्वनाथ सोनी 
1978 चोर हो तो ऐसा चंपा 
1978 बदलते रिश्ते सावित्री 
1978 आखिरी डाकू 
1978 कर्मयोगी किरन 
1977 सत श्री अकाल 
1977 जय विजय 
1977 ज़मानत 
1977 जाग्रति बर्खा 
1977 जादू टोना वर्षा 
1977 टैक्सी टैक्सी नीलम 
1977 अपनापन कामिनी अग्रवाल 
1977 पापी आशा 
1976 गुमराह रीना 
1976 उधार का सिंदूर रेखा 
1976 बारूद सपना 
1976 नागिन 
1975 अपने दुश्मन 
1975 ज़ख्मी निशा गाँगुली 
1975 उमर कैद 
1975 रानी और लालपरी 
1974 मदहोश 
1973 जैसे को तैसा रूपा 
1972 जंगल में मंगल लीला

सुप्रिया पाठक

#07jan
सुप्रिया पाठक
🎂07 जनवरी 1961, मुम्बई
पति: पंकज कपूर (विवा. 1988)
बच्चे: सनाह कपूर, रूहान कपूर
बहन: रत्ना पाठक
माता-पिता: दीना पाठक, बलदेव पाठक
बच्चे
2
माता-पिता
दीना पाठक (मां)
रिश्तेदार
रत्ना पाठक (बहन)
नसीरुद्दीन शाह (बहनोई)
शाहिद कपूर (सौतेला बेटा)
पुरस्कार
सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री के लिए फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार (1982, 1983 और 2013)
अभिनेत्री दीना पाठक की छोटी बेटी , उन्होंने 1988 में अपने दूसरे पति, अभिनेता पंकज कपूर से शादी की , जिनसे उनकी एक बेटी और एक बेटा है। उनकी बहन अभिनेत्री रत्ना पाठक शाह हैं , जिन्होंने अभिनेता नसीरुद्दीन शाह से शादी की है । अभिनेता शाहिद कपूर उनके सौतेले बेटे हैं।
इनाम: फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार - सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री
22 साल की उम्र में, पाठक ने शादी कर ली लेकिन शादी के एक साल के भीतर ही दोनों अलग हो गए। 1986 में, अगला मौसम (1989) की शूटिंग के दौरान उनकी मुलाकात अपने दूसरे पति पंकज कपूर से हुई। दो साल के प्रेमालाप के बाद, उन्होंने 1988 में शादी कर ली और अब वे एक बेटी और एक बेटे के माता-पिता हैं। 

दो बच्चे होने के बाद भी मां कहती थीं, पंकज कपूर छोड़कर चला जाएगा!पंकज कपूर ने सुप्रिया से शादी करने से पहले नीलिमा अजीम संग ब्याह रचाया था

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फिल्में
1981 
कलयुग
विजेता
1982
बाज़ार
गांधी
1983
बेकरार 
मासूम
1984 
धर्म और क़ानून 
आवाज़
1885
बहू की आवाज 
मिर्च मसाला 
अकलाथे अंबिली मलयालम फिल्म
अर्जुन सुधा 
झूठी
1986 
दिलवाला
1987 
नकली चेहरा (टीवी मूवी) 
शहादत (टीवी फीचर)
1988 
शहंशाह 
बंगाली रात 
फ़लक (द स्काई) 
1989
आकांक्षा 
कमला की मौत 
राख 
डेटा
1990 
छायायंत्र 
1994 
मदहोश
2002 
जैकपॉट 2 करोड़
2005बेवफ़ा 
सरकार 
2007 
पंगा ना लो
धर्म
2008 
सरकार राज
2009 
दिल्ली 6 
2010 
खिचड़ी: द मूवी
अवस्थी
जागो सिड
2011 
मौसम
2012 
शंघाई
2013 
गोलियों की रासलीला
 राम-लीला
2014 
बॉबी जासूस 
टाइगर्स
सब ठीक है
2015
किस किस को प्यार करूं
यूनिइंडियन
2017
कैरी ऑन 
सरकार 3 
शुभकामनाएँ लालू
2018 
प्रति वर्ग फुट 
अरविंद समिथा वीरा राघव
2019 
गड्डालकोंडा गणेश
खुशी
2020 
जय मम्मी दी
मिमी
रश्मी रॉकेट 
2022 केवटलाल परिवार 
सत्यप्रेम की कथा
2023 
खिचड़ी 2: मिशन पंथुकिस्तान

बिपाशा बासु

#07jan 
बिपाशा बसु 

🎂07 जनवरी 1979 नई दिल्ली

पति: करन सिंह ग्रोवर (विवा. 2016)
माता-पिता: हिराक बासु, ममता बासु
बहन: बिदिशा बसु, बिजोयेता बसु
एक भारतीय फिल्म अभिनेत्री और मॉडल हैं, जो ज्यादातर हिन्दी फिल्मों में काम करती हैं। इसके अलावा तमिल, तेलुगू, बंगाली और अंग्रेजी भाषा की फिल्मों में भी दिखाई दे चुकी हैं। इन्हें कई पुरस्कार भी प्राप्त हो चुके हैं, जिसमें फिल्मफेयर के 6 नामांकन और एक पुरस्कार भी शामिल है। 
इनका जन्म दिल्ली में हुआ और कोलकाता में पली-बढ़ी हैं। इन्होंने 1996 में सुपरमॉडल का कॉन्टेस्ट जीता था, और बाद में फेशन मॉडल के रूप में अपना करियर आगे बढ़ाने लगीं। इसके बाद से इन्हें फिल्मों में काम करने के बहुत से ऑफर आने लगे थे। जिसके बाद इन्होंने अजनबी (2001) में अपने नकारात्मक किरदार के साथ फिल्मों में काम करना शुरू किया था। इस फिल्म के कारण इन्हें सर्वश्रेष्ठ शुरुआत के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिला। इनकी पहली मुख्य भूमिका वाली फिल्म राज़ (2002) थी, जो ब्लॉकबस्टर साबित हुई और इसके कारण इनका सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री हेतु फिल्मफेयर पुरस्कार का नामांकन भी हुआ था।

फिल्मों में अभिनय के अलावा इनकी रुचि सेहत बनाने में भी है। इन्हें कई सारी सेहत बनाने वाली वीडियो में देखा जा सकता है। इसके अलावा इन्होंने कई सारे ब्रांड्स और उत्पादों से जुड़ी हुई हैं। इसके अलावा इन्होंने नारीवाद और जानवरों के अधिकारों को लेकर भी आवाज उठाई है। इनका काफी समय से जॉन अब्राहम के साथ चक्कर चल रहा था, पर 2016 में इन्होंने करन सिंह ग्रोवर से शादी कर ली।

इरफान अल्ली खान

#07jan
#29april 
साहबजादे इरफ़ान अली ख़ान  

🎂जन्म- 07 जनवरी, 1967, टोंक, राजस्थान; 
⚰️मृत्यु- 29 अप्रॅल, 2020, मुम्बई, महाराष्ट्र) भारतीय हिन्दी सिनेमा और टेलीविजन के प्रसिद्ध अभिनेता थे
हिन्दी के साथ ही उन्होंने कई अंग्रेज़ी फ़िल्मों में भी अभिनय किया। उनके चाहने वालों की संख्या लाखों में है। इरफ़ान ख़ान के बारे में कहा जाता है कि "वह अपनी आँखों से ही सारा अभिनय कर देते थे।" उन्होंने 'द वॉरियर', 'मकबूल', 'हासिल', 'द नेमसेक', 'रोग' जैसी फ़िल्मों से अपने अभिनय का लोहा मनवाया। 'हासिल' फ़िल्म के लिये उन्हें वर्ष 2004 का फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ खलनायक पुरस्कार भी प्राप्त हुआ। वे हिन्दी सिनेमा की तीस से ज्यादा फ़िल्मों में अभिनय कर चुके थे। इरफ़ान ख़ान का नाम हॉलीवुड में भी अपनी पहचान रखता है। उन्होंने 'ए माइटी हार्ट', 'स्लमडॉग मिलियनेयर', 'लाइफ ऑफ़ पाई' और 'द अमेजिंग स्पाइडर मैन' आदि फ़िल्मों में अभिनय किया।

वर्ष 2011 में उन्हें भारत सरकार द्वारा 'पद्मश्री' से सम्मानित किया गया। 60वे राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार-2012 में इरफ़ान ख़ान को फ़िल्म 'पान सिंह तोमर' में अभिनय के लिए श्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार दिया गया। 2017 में प्रदर्शित 'हिंदी मीडियम' फ़िल्म के लिए उन्हें फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता चुना गया। 2020 में प्रदर्शित 'अंग्रेज़ी मीडियम' उनकी प्रदर्शित अंतिम फ़िल्म रही।

जन्म तथा शिक्षा
इरफ़ान ख़ान का जन्म टोंक, राजस्थान में 7 जनवरी, 1967 को हुआ। यहीं के एक स्कूल से उन्होंने अपनी शुरुआती शिक्षा हासिल की। बाद में स्नातक की डिग्री हासिल की। जब इरफ़ान ख़ान अपनी पोस्ट ग्रेजुएश एम.ए. में कर रहे थे, तब उस समय उन्होंने 'नेशनल स्‍कूल ऑफ ड्रामा' में दाखिला ले लिया। कहा जाता है कि उन्होंने इस ड्रामा स्कूल में पढ़ाई करने के लिए छात्रवृत्ति हेतु आवेदन किया था और उनका आवेदन स्वीकार कर लिया गया, जिसके बाद इरफ़ान ख़ान ने दिल्ली स्थित अभिनय के इस कॉलेज में प्रवेश ले लिया।

परिवार

इरफ़ान ख़ान का नाता राजस्थान राज्य के एक पठान परिवार से था। उनकी मां का नाम सईदा बेगम है। मां सईदा बेगम का सम्बंध राजस्थान के टोंक हाकिम परिवार से है। वहीं इरफ़ान के पिता का नाम यासीन अली ख़ान था, जो एक कारोबारी थे और जिनका टायर का व्यापार हुआ करता था। इरफ़ान ख़ान दो भाई और एक बहन है। साल 1995 में इरफ़ान ख़ान ने सुतापा सिकदर से प्रेम विवाह किया। उनके दो बेटे हैं, जिनके नाम- बाबिल और आयन है। कहा जाता है कि इरफ़ान ख़ान की मुलाकात अपनी पत्नी से ड्रामा स्कूल में हुई थी। सुतापा सिकदर भी इरफ़ान की तरह ड्रामा स्कूल की छात्रा थीं और यहां से शुरू हुई इनकी ये दोस्ती प्यार में बदल गई थी।

शुद्ध शाकाहारी
बहुमुखी प्रतिभा के धनी इरफ़ान ख़ान लीक से हटकर चलने वाले लोगों में से एक थे। शायद यही कारण रहा कि वे पठान परिवार से ताल्लुक रखने के बावजूद शुद्ध शाकाहारी थे। इरफ़ान ख़ान ने पठान मुस्लिम परिवार में जन्म होने के बाद भी कभी मीट या मांस नहीं खाया। वह बचपन से ही शाकाहारी थे। यही कारण था कि उनके पिता इरफ़ान को मजाक में कहा करते थे कि- "ये तो पठान परिवार में एक ब्राह्मण पैदा हो गया है।"

इरफ़ान ख़ान के पिता उन्हें शिकार पर भी ले जाया करते थे। जंगल का वातावरण उन्हें काफी रोमांचित भी करता था, लेकिन उन्हें कभी पसंद नहीं आता था, जब मासूम जानवरों का शिकार होता था। इरफ़ान उन जानवरों के साथ खुद को जुड़ा हुआ महसूस करते थे कि आखिर अब इन जानवरों के परिवारों का क्या होगा। वह खुद भी राइफल चलाना जानते थे, लेकिन कभी शिकार नहीं करते थे। गौरतलब है कि नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा में इरफ़ान ख़ान के प्रवेश के कुछ समय बाद ही उनके पिता का निधन हो गया था और घर की तरफ से मिलने वाले पैसे उन्हें मिलना बंद हो गया थे। ड्रामा स्कूल से मिलने वाली फेलोशिप के जरिए उन्होंने अपना कोर्स खत्म किया था। उस मुश्किल दौर में इरफ़ान ख़ान की सहपाठी सुतापा सिकदर ने उनका पूरा साथ दिया। बाद में 23 फ़रवरी, 1995 में दोनों ने विवाह कर लिया था।

कॅरियर
इरफ़ान ख़ान अपनी एक्टिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद मुंबई चले गए और यहां आकर उन्होंने फ़िल्मों में काम खोजना शुरू कर दिया। उनके कॅरियर के शुरुआती दिन काफी संघर्ष भरे थे। उन्हें फ़िल्मों की जगह टी.वी. सीरियल में छोटे मोटे रोल मिलने लगे और इस तरह से इरफ़ान ख़ान के कॅरियर की शुरुआत बतौर एक जूनियर कलाकार से हुई। वह कई हिंदी धारावाहिकों का हिस्सा रह चुके थे और उनके द्वारा किए गए कुछ धारावाहिकों के नाम इस प्रकार हैं

चाणक्य
भारत एक खोज
सारा जहाँ हमारा
बनेगी अपनी बात
चन्द्रकान्ता
श्रीकान्त
स्टार बेस्टसेलर्स
मानो या ना मानो

फ़िल्मी सफर

साल 1988 में आई फ़िल्म ‘सलाम बॉम्बे’ में इरफ़ान को एक छोटा सा रोल मिला था, लेकिन इरफ़ान के इस रोल को फ़िल्म से हटा दिया गया। इस फ़िल्म के बाद इरफ़ान ने कई फ़िल्मों में छोटे-मोटे रोल किये, लेकिन साल 2001 में आई ‘द वारियर’ फ़िल्म ने उनकी जिंदगी बदल दी और इस फ़िल्म से उनको पहचान मिली। ये एक ब्रिटिश फ़िल्म थी, जिसका निर्देशन आसिफ कपाड़िया ने किया था। ये फ़िल्म अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोहों में भी प्रदर्शित की गई थी। इस फ़िल्म के बाद 2004 में आई ‘हासिल’ फ़िल्म में इरफ़ान ख़ान को एक नेगेटिव किरदार में देखा गया और इस किरदार को भी उन्होंने बखूबी निभाया था।

‘रोग’ फ़िल्म में मुख्य भूमिका
साल 2005 में इरफ़ान ख़ान को बतौर लीड रोल अपनी पहली फ़िल्म मिली और इस फ़िल्म का नाम ‘रोग’ था। इस फ़िल्म में इरफ़ान ख़ान ने एक पुलिस ऑफिसर की भूमिका निभाई थी। हालांकि ये फ़िल्म कामयाब फ़िल्म साबित नहीं हुई, लेकिन इरफ़ान ख़ान के अभिनय ने सभी को हैरान कर दिया और हर किसी ने उनके अभिनय की काफी तारीफ की। यह भी कहा गया कि इरफ़ान की आँखेंं भी एक दमदार अभिनय करती हैं। इस फ़िल्म के बाद इरफ़ान ख़ान को कई और फ़िल्मों में कार्य करने का मौका मिला।

2007 में आई मल्टीस्टार फ़िल्म ‘लाइफ इन ए मेट्रो’ का हिस्सा इरफ़ान भी थे और इस फ़िल्म में इरफ़ान द्वारा किए गए अभिनय को फिर से लोगों द्वारा पसंद किया गया। इस फ़िल्म में उनकी जोड़ी कोंकणा सेन के साथ नजर आई थी। इस फ़िल्म के बाद इरफ़ान को 'एसिड फैक्ट्री', 'न्यूयॉर्क', 'पान सिंह तोमर', 'हैदर', 'पीकू', 'तलवार', 'जज्बा', 'हिंदी मीडियम' सहित कई फ़िल्मों में देखा गया और इन फ़िल्मों के लिए उन्हें कई पुरस्कार भी मिले।

हॉलीवुड सिनेमा में योगदान
इरफ़ान ख़ान का नाम उन भारतीय अभिनेताओं में गिना जाता है, जिन्होंने भारतीय सिनेमा के साथ-साथ विदेशी सिनेमा यानी हॉलीवुड में भी कार्य किया। इरफ़ान ने बॉलीवुड सहित कई हॉलीवुड फ़िल्मों में भी दमदार प्रदर्शन किया। उनके द्वारा की गई कुछ हॉलीवुड फ़िल्मों के नाम इस प्रकार हैं-

सच अ लॉन्ग जर्नी (1988)
द नेमसेक (2006)
ए माइटी हार्ट (2007)
दार्जीलिंग लिमिटेड (2007)
स्लमडॉग मिलियनेयर (2008)
लाइफ ऑफ पाई (2012)
द अमेजिंग स्पाइडर मैन (2012)
जुरासिक वर्ल्ड (2015)
इन्फर्नो (2016)

इरफ़ान ख़ान ऐसे इंसान थे, जो भीड़ में तो थे ही अकेलापन भी उन्हें बहुत रास आता था। जब सब साथ में चिल्ल कर रहे होते तो वह अकेले कहीं जाकर बैठ जाते। इरफ़ान ख़ान का बचपन भी फ़िल्मी रहा। उनकी ज्यादतर तस्वीरें बचपन की ऐसी ही हैं, जिनमें फ़िल्म के किसी सीन की नकल करते दिखते हैं। कैंसर के इलाज के दौरान भी इरफ़ान हमेशा मुस्कुरात रहते थे। इतना ही नहीं वह बहादुर इंसान भी थे। इरफ़ान वह सब करते थे, जिसमें उनका दिल लगता था। प्रकृति प्रेमी भी थे। इरफ़ान की जिंदगी एक खूबसूरत यात्रा रही है। जब जहां दिल किया, चल दिए जिंदगी की तलाश में। अपने जीवन के अंतिम दिनों में वह थोड़े दार्शनिक अंदाज़के भी हो गए थे। हालांकि कुछ लोग मानते हैं कि यह अंदाज़शुरू से उनके साथ रहा। वह खुद के भीतर खुद को भी तलाशते थे। इरफ़ान अपने इंस्टा पर बचपन की जो भी यादें शेयर करते, उनमें ज्यादातर तस्वीरें इसी तरह किसी फ़िल्म को देखकर दोस्तों के साथ उसे आजमाते हुए दिखते। जिंदादिल इंसान थे इरफ़ान।

मृत्यु

अभिनेता इरफ़ान ख़ान का निधन 29 अप्रॅल, 2020 को मुंबई के कोकिलाबेन अस्पताल में हुआ। वह काफ़ी लम्बे समय से बीमार चल रहे थे। साल 2018 में ही उन्होंने दुनिया को अपने कैंसर के बारे में जानकारी दी थी। इरफ़ान ख़ान पेट की समस्या से जूझ रहे थे। उन्हें कॉलन संक्रमण (Colon infection) हुआ था।

भरत व्यास

#06jan 

#04july

भरत व्यास हिन्दी फ़िल्मों के प्रसिद्ध गीतकार थे। 


🎂06 जनवरी 1918

⚰️04 जुलाई 1982 को मुंबई में उनका निधन हो गया।


 जाति से पुष्करना ब्राह्मण थे। मूल रूप से चुरू (राजस्थान का एक जिला) के थे। बचपन से ही इनमे कवि प्रतिभा दिखने लगी थी। उन्होंने 17_18वर्ष की उम्र तक लेखन शुरू कर दिया था। चुरू से मैट्रिक करने के बाद वे कलकत्ता चले गए। उनका लिखा पहला गीत था — आओ वीरो हिलमिल गाए वंदे मातरम। उनके द्वारा "रामू चन्ना " नामक नाटक भी लिखा गया। 1942 के बाद वे बम्बई आ गए उन्होंने कुछ फ़िल्मों में भी भूमिका निभाई लेकिन प्रसिद्धि गीत लेखन से मिली।


हिंदी फिल्मों में उनका पहला ब्रेक फ़िल्म "दुहाई" के लिए था, जो 1943 में रिलीज़ हुई थी, और संगीत निर्देशन का श्रेय संयुक्त रूप से पन्नालाल घोष, रफ़ीक गज़नवी और शांति कुमार को दिया गया था। गीत नूरजहाँ और शांता आप्टे द्वारा गाए गए थे। व्यास नाटकों और रिकॉर्ड के लिए राजस्थानी गीत लिखते थे। यह भी उल्लेख है कि उन्होंने बंबई (अब मुंबई) में फिल्मों में आने से पहले कलकत्ता (अब कोलकाता) में पढ़ाई पूरी की। उन्हें फिल्म निर्देशन में भी दिलचस्पी थी और वास्तव में उन्होंने करियर की शुरुआत में ही एक फिल्म का निर्देशन किया था। उन्होंने 1940 के दशक में कुछ शुरुआती फिल्मों में अभिनय और गीत भी गाए। मुंबई आने के बाद, उनकी काव्य रचनाएँ लोकप्रिय हुईं।


उनकी मृत्यु 1982 मे हुई थी। उनके लिखे कुछ प्रमुख गीतों की फिल्मों के नाम हैं:— सारंगा, संत ज्ञानेश्वर, तूफ़ान और दिया, रानी रूपमती, गूंज उठी शहनाई, दो आँखे बारह हाथ, नवरंग, बूँद जो बन गई मोती, पूर्णिमा, आदि-आदि फ़िल्मों के यादगार/अमर गीत रचे थे।

दौलत के झूठे नशे में जो चूर (फ़िल्म: ऊँची हवेली)

आ लौट के आजा मीत (फ़िल्म: रानी रूपमती)

निर्बल से लडाई बलवान की (फ़िल्म: तूफ़ान और दिया)

ऐ मलिक तेरे बंदे हम (फ़िल्म: दो आंखें बारह हाथ)

सांझ हो गई प्रभु (फ़िल्म: जय चित्तौड़)

मैने पीना सीख लिया (फ़िल्म: गूंज उठी शहनाई)

तेरे सुर और मेरे गीत (फ़िल्म: गूंज उठी शहनाई)

कह दो कोई न करे यहाँ प्यार (फ़िल्म: गूंज उठी शहनाई)

दिल का खिलौना हाय टूट गया (फ़िल्म: गूंज उठी शहनाई)

हाँ दीवाना हूं मैं (फ़िल्म: सारंगा)

सारंगा तेरी याद में (फ़िल्म: सारंगा)

तू छुपी है कहाँ (फ़िल्म: नवरंग)

आधा है चन्द्रमा (फ़िल्म: नवरंग)

तुम मेरे मैं तेरी (फ़िल्म: नवरंग)

आज मधुउत्सव डोले (फ़िल्म: स्त्री)

ओ निर्दय प्रीतम (फ़िल्म: स्त्री)

रैन भये सो जा रे पंची (फ़िल्म: राम राज्य)

ज्योत से ज्योत जगाते चलो (फ़िल्म: संत ज्ञानेश्वर)

तुम गगन के चन्द्रमा हो (फ़िल्म: सती सावित्री)

जीवन डोर तुम्ही संग बाँधी (फ़िल्म: सती सावित्री)

मन की गहराई

4 जुलाई 1982 को मुंबई में उनका निधन हो गया। उनके छोटे भाई अभिनेता बृजमोहन व्यास (1920-2013) थे।


जिन फिल्मों के लिए उन्होंने गीत रचे:


मन की जीत' (1944; इस फ़िल्म के लिए दो गीत रचे; संगीत: एस.के. पाल ने दिया था।)

गुलामी (1945; फ़िल्म में व्यास ने पांच गाने लिखे, बाकी जोश मलीहाबादी ने; संगीत: एस.के. पाल ने दिया था।)

पृथ्वीराज संयुक्ता (1946; पृथ्वीराज कपूर मुख्य भूमिका में थे, और भरत व्यास ने फिल्म के लिए अभिनय किया और गाया; संगीत: एस.के. पाल ने दिया था।)

मीराबाई (1947)

चंद्रलेखा (1948; गीत बहुत लोकप्रिय थे, व्यास ने खुद एक गीत गाया ( संगीत: एस. राजेश्वर राव ने दिया था।) इस फ़िल्म में व्यास ने केवल दो गीत लिखे थे।

अंजना (1948)

रंगीला राजस्थान (1949; भरत व्यास ने इस फ़िल्म का निर्देशन किया था।)

सावन आया रे (1949)

बिजली (1950)

आंखें (1950)

हमारा घर (1950)

राज मुकुट (1950)

श्री गणेश जन्म (1951)

नखरे (1951)

भोला शंकर (1951)

तमाशा (1952)

अपनी इज़्ज़त (1952)

नौलखा हार (1953)

धर्मपत्नी  (1953)

परिणीता (1953)

श्री चैतन्य महाप्रभु (1954)

जगदुरु शंकराचार्य (1955)

अंधेर नगरी चौपट राजा (1955)

ऊँची हवेली (1955)

तूफ़ान और दिया (1956)

द्वारिकाधीश (1956)

दो आँखें बारह हाथ (1957)

जनम जनम के फेरे (1957)

सम्राट चन्द्रगुप्त (1958)

सहारा (1958)

सुवर्णा सुंदरी (1958)

कवि कालिदास (1959)

सम्राट पृथ्वीराज चौहान (1959)

बेदर्द ज़माना क्या जाने (1959)

फैशनेबल पत्नी (1959)

गूंज उठी शहनाई (1959)

नवरंग (1959; गीत बहुत लोकप्रिय थे, व्यास ने खुद एक गीत गाया था।)

रानी रूपमती (1959)

चंद्रमुखी (1960)

अंगुलिमाल (1960)

हम हिंदुस्तानी (1960)

सम्पूर्ण रामायण (1961)

स्त्री (1961)

सारंगा (1961)

पिया मिलन की आस (1961)

जय चित्तौड़ (1961)

प्यार की प्यास (1961)

कण कण में भगवान (1963)

सती सावित्री (1964)

दाल में काला (1964)

चा चा चा (1964)

भारत मिलाप (1965)

पूर्णिमा (1965)

महाभारत (1965)

गोपाल-कृष्ण (1965)

राम राज्य (1967)

बून्द जो बन गई मोती (1967)

सती सुलोचना (1969)

लव कुश (1974)

तू ही राम तू ही कृष्णा (1976)

कर्म (1977)

दो चेहरे (1977)

मान अपमान (1979)

मुकद्दर (वर्ष ज्ञात नहीं/Year not known)

जन्माष्टमी (वर्ष ज्ञात नहीं/Year not known)

मौसी (वर्ष ज्ञात नहीं/Year not known)


ए आर रहमान

#06jan
AR रहमान
अल्लाह रक्खा रहमान लोकप्रिय रूप से ए॰ आर॰ रहमान
जन्म नाम
A. S. Dileep Kumar

🎂जन्म 06 जनवरी, 1967

भारतीय फिल्मों के प्रसिद्ध संगीतकार हैं, जिन्होंने मुख्य रूप से हिन्दी और तमिल फिल्मों में संगीत दिया है। इनका जन्म 6 जनवरी, 1967 को चेन्नई, तमिलनाडु, भारत में हुआ। जन्मतः उनका नाम ‘अरुणाचलम् शेखर दिलीप कुमार मुदलियार’ रखा गया। धर्मपरिवर्तन के पश्चात उन्होंने अल्लाह रक्खा रहमान नाम धारण किया। ए. आर. रहमान उसीका संक्षिप्त रूप है। रहमान ने अपनी मातृभाषा तमिल के अतिरिक्त हिंदी तथा कई अन्य भाषाओं की फिल्मों में भी संगीत दिया है। टाइम्स पत्रिका ने उन्हें मोजार्ट ऑफ मद्रास की उपाधि दी। रहमान गोल्डन ग्लोब अवॉर्ड से सम्मानित होने वाले पहले भारतीय व्यक्ति हैं।ए. आर. रहमान ऐसे पहले भारतीय हैं जिन्हें ब्रिटिश भारतीय फिल्म स्लम डॉग मिलेनियर में उनके संगीत के लिए दो ऑस्कर पुरस्कार प्राप्त हुए है।इसी फिल्म के गीत 'जय हो' के लिए सर्वश्रेष्ठ साउंडट्रैक कंपाइलेशन और सर्वश्रेष्ठ फिल्मी गीत की श्रेणी में दो ग्रैमी पुरस्कार भी मिले।
12मार्च 1995 को चेन्नई में रहमान का सायरा बानो से विवाह संपन्न हुआ। उनके दो बेटीयाँ खदिजा, रहीमा और एक बेटा अमीन हैं। रहमान की पत्नी सायरा बानो की सगी बहन के पति, जिनका नाम भी रहमान है, वे एक दक्षिण भारतीय अभिनेता है। रहमान के भाँजे जी. वी. प्रकाश कुमार भी एक प्रतिथयश संगीतकार हैं । वे रहमान की ज्येष्ठ भगिनि ए. आर. रेहाना के सुपुत्र हैं ।
रहमान को संगीत अपने पिता से विरासत में मिली है। उनके पिता राजगोपाल कुलशेखर (आर. के. शेखर) मलयालम फ़िल्मों में संगीतकार थे। रहमान ने संगीत की शिक्षा मास्टर धनराज से प्राप्त की। मात्र 11 वर्ष की उम्र में अपने बचपन के मित्र शिवमणि के साथ रहमान बैंड रुट्स के लिए की-बोर्ड (सिंथेसाइजर) बजाने का कार्य करते थे। वे इलैयराजा के बैंड के लिए भी काम करते थे। चेन्नई के "नेमेसिस एवेन्यू" बैंड की स्थापना का श्रेय रहमान को ही जाता है। वे की-बोर्ड, पियानो, हारमोनियम और गिटार भी बजा लेते है।

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...