रविवार, 10 दिसंबर 2023

दलीप कुमार

जन्म
मुहम्मद युसुफ खान
*🎂11 दिसम्बर 1922*
पेशावर, ब्रिटिश भारत
मृत्यु
*⚰️07 जुलाई 2021 (उम्र 98)
हिंदूजा हॉस्पिटल मुंबई, महाराष्ट्र, भारत
मृत्यु का कारण
उम्र संबधी बीमारी
राष्ट्रीयता
भारतीय
व्यवसाय
अभिनेता
कार्यकाल
१९४४-१९९९
धार्मिक मान्यता
इस्लाम
जीवनसाथी
सायरा बानो (वि॰ 1966–2021) (मृत्यु तक)
असमा रहमान (वि॰ 1981; वि॰वि॰ 1983)
माता-पिता
पिता:- लाला गुलाम सरवर (जमींदार और फल विक्रेता)

मां:- आयशा
संबंधी
नासिर ख़ान (अभिनेता) (भाई)
बेगम पारा (भाभी)
अयूब खान (अभिनेता) (भतीजा)
पुरस्कार
सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार (सर्वोत्तम 8 बार)
दादासाहेब फाल्के पुरस्कार (1994)

अपने करियर के शुरुआती वर्षों में कई सफल त्रासद या दु:खद भूमिकाएं करने के कारण उन्हें मीडिया में 'ट्रेजिडी किंग' भी कहा जाता था। व्यापार विश्लेषकों के अनुसार उनकी बहुत सी फ़िल्में इसलिए भी कामयाब हुईं क्योंकि जनता सिर्फ़ उनकी अदाकारी देखने आया करती थी फिर चाहे उन चलचित्रों में खास मनोरंजन के तत्व ना भी हों। इस प्रकार के वाक्या और किसी भी अदाकार के साथ नही हुएं हैं। उन्होंने बहुत सी बड़े पैमाने पर कामयाब फ़िल्मों में अदाकारी की है जो आजतक सबसे सफल चलचित्रों में गिनी जातीं हैं जैसे मुग़ल-ए-आज़म (१९६०), गंगा जमना (१९६१), इत्यादि। उन्होंने अपने करियर के दूसरे पड़ाव में भी कई अत्यंत कामयाब फिल्में दीं जब वह वृद्ध किरदार की भूमिका में भी प्रमुख किरदार निभा रहे थे। ऐसा वाक्या भी उनके अतिरिक्त किसी अदाकार के साथ नहीं हुआ है। उन्होंने फिल्मों में अदाकारी को रंगमंच से अलग किया और उसे नई परिभाषा दी जिसका प्रभाव उनके बाद के कलाकारों पर रहा।१९९८ में आई किला उनके करियर की आखिरी फ़िल्म थी। उन्हें वर्ष १९९४ में भारतीय सिनेमा का सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। अपने अभिनय और भारत-पाकिस्तान के रिश्तों में सुधार लाने के लिए उन्हें पाकिस्तान का सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार निशान-ए-इम्तियाज़ दिया गया जिसे प्राप्त करने वाले वे इकलौते भारतीय हैं।

दिलीप कुमार के जन्म का नाम मुहम्मद युसुफ़ खान था। उनका जन्म ब्रिटिश भारत के पेशावर (अब पाकिस्तान मे) में हुआ था। उनके पिता मुंबई आ बसे थे, जहाँ उन्होने हिन्दी फ़िल्मों में काम करना शुरू किया। उनका नाम उस वक्त के चलन के अनुसार बदल कर दिलीप कुमार कर दिया गया ताकि उन्हे हिन्दी फिल्मों में ज़्यादा पहचान मिले और उनका नाम एक हीरो की छवि के ऊपर जच सके।

दिलीप कुमार का 7 जुलाई 2021 को 98 वर्ष की आयु में सुबह 7:30 बजे हिंदुजा अस्पताल, मुंबई में निधन हो गया। लंबी बीमारी के बाद उनका निधन हो गया। वह टेस्टिकुलर कैंसर और फुफ्फुस बहाव के अलावा कई उम्र से संबंधित बिमारियों से पीड़ित थे। महाराष्ट्र सरकार ने उसी दिन जुहू मुस्लिम कब्रिस्तान में राजकीय सम्मान के साथ उनके अंतिम संस्कार को मंजूरी दी।

अपनी संवेदना व्यक्त करते हुए, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक ट्वीट में कहा कि कुमार को एक सिनेमाई किंवदंती के रूप में याद किया जाएगा, जबकि राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने कहा कि "उन्हें उपमहाद्वीप में प्यार किया गया था"। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने भी उनके निधन पर शोक व्यक्त किया और शौकत खानम मेमोरियल कैंसर अस्पताल के लिए एक ट्वीट में धन जुटाने के उनके प्रयासों को याद किया। अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई और बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने भी कुमार और उनके परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त की।

शुक्रवार, 8 दिसंबर 2023

भीष्म साहनी

#11july 
#08aug 
भीष्म साहनी
🎂जन्म 8 अगस्त 1915
जन्म स्थान रावलपिण्डी, भारत
पिता का नाम  हरबंस लाल साहनी
माता का नाम लक्ष्मी देवी
राष्ट्रीयता भारतीय
धर्म हिन्दू
एक हिंदी लेखक, अभिनेता, शिक्षक, अनुवादक और बहुभाषी थे।
⚰️11 जुलाई 2003
उन्हें हिन्दी साहित्य में मुंशी प्रेमचंद की परंपरा का अग्रणी लेखक माना जाता है।

भीष्म साहनी ने कई प्रसिद्ध रचनाएँ की थीं, जिनमें से उनके उपन्यास ‘तमस’ पर वर्ष 1986 में एक फ़िल्म का निर्माण भी किया गया था।

1998 में भारत सरकार ने उन्हे ‘पद्म भूषण’ से नवाजा।
 जीवनी
भीष्म साहनी की प्रारम्भिक शिक्षा घर पर ही हिन्दी व संस्कृत में हुई। उन्होंने स्कूल में उर्दू व अंग्रेज़ी की शिक्षा प्राप्त करने के बाद 1937 में ‘गवर्नमेंट कॉलेज’, लाहौर से अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए. किया

इसके बाद उन्होने 1958 में पंजाब विश्वविद्यालय से पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त की। वर्तमान समय में प्रगतिशील कथाकारों में साहनी जी का प्रमुख स्थान है। भीष्म साहनी हिन्दी और अंग्रेज़ी के अलावा उर्दू, संस्कृत, रूसी और पंजाबी भाषाओं के अच्छे जानकार थे।

करियर
देश के विभाजन से पहले Bhisham Sahniने व्यापार भी किया और इसके साथ ही वे अध्यापन का भी काम करते रहे। तदनन्तर उन्होंने पत्रकारिता एवं ‘इप्टा’ नामक मण्डली में अभिनय का कार्य किया।

साहनी जी फ़िल्म जगत् में भाग्य आजमाने के लिए बम्बई आ गये, जहाँ काम न मिलने के कारण उनको बेकारी का जीवन व्यतीत करना पड़ा।

इसके बाद उन्होंने वापस आकर दोबारा अम्बाला के एक कॉलेज में अध्यापन के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय में स्थायी रूप से कार्य किया। इस बीच उन्होंने लगभग 1957 से 1963 तक विदेशी भाषा प्रकाशन गृह मास्को में अनुवादक के रूप में बिताये। यहाँ भीष्म साहनी ने दो दर्जन के क़रीब रशियन भाषायी किताबों, टालस्टॉय, ऑस्ट्रोव्स्की, औतमाटोव की किताबों का हिन्दी में रूपांतर किया।

Bhisham Sahni ने 1965 से 1967 तक “नई कहानियाँ” का सम्पादन किया। साथ ही वे प्रगतिशील लेखक संघ तथा अफ़्रो एशियाई लेखक संघ से सम्बद्ध रहे। वे 1993 से 1997 तक ‘साहित्य अकादमी एक्जिक्यूटिव कमेटी’ के सदस्य भी रहे।

कृतियाँ
कहानी संग्रह
भाग्य रेखा
पहला पाठ
भटकती राख
पटरियाँ
‘वांङ चू’ शोभायात्रा
निशाचर
मेरी प्रिय कहानियाँ
अहं ब्रह्मास्मि
अमृतसर आ गया
चीफ़ की दावत
उपन्यास संग्रह
झरोखे
कड़ियाँ
तमस
बसन्ती
मायादास की माड़ी
कुन्तो
नीलू निलीमा निलोफर
नाटक संग्रह
हानूस
कबिरा खड़ा बाज़ार में
माधवी
गुलेल का खेल (बालोपयोगी कहानियाँ)।
मुआवज़े
अन्य प्रकाशन
पहला पथ
भटकती राख
पटरियाँ
शोभायात्रा
पाली
दया
कडियाँ
आज के अतीत
यशपाल तथा प्रेमचंद का प्रभाव
एक कथाकार के रूप में भीष्म साहनी पर यशपाल और प्रेमचंद की गहरी छाप है। उनकी कहानियों में अन्तर्विरोधों व जीवन के द्वन्द्वों, विसंगतियों से जकड़े मध्य वर्ग के साथ ही निम्न वर्ग की जिजीविषा और संघर्षशीलता को उद्घाटित किया गया है। जनवादी कथा आन्दोलन के दौरान भीष्म साहनी ने सामान्य जन की आशा, आकांक्षा, दु:ख, पीड़ा, अभाव, संघर्ष तथा विडम्बनाओं को अपने उपन्यासों से ओझल नहीं होने दिया।

नई कहानी में उन्होंने कथा साहित्य की जड़ता को तोड़कर उसे ठोस सामाजिक आधार दिया। एक भोक्ता की हैसियत से भीष्म जी ने देश के विभाजन के दुर्भाग्यपूर्ण खूनी इतिहास को भोगा है, जिसकी अभिव्यक्ति ‘तमस’ में हम बराबर देखते हैं। जहाँ तक नारी मुक्ति की समस्या का प्रश्न है, उन्होंने अपनी रचनाओं में नारी के व्यक्तित्व विकास, स्वातन्त्र्य, एकाधिकार, आर्थिक स्वतन्त्रता, स्त्री शिक्षा तथा सामाजिक उत्तरदायित्व आदि उसकी ‘सम्मानजनक स्थिति’ का समर्थन किया है। एक तरह से देखा जाए तो साहनी जी प्रेमचंद के पदचिन्हों पर चलते हुए उनसे भी कहीं आगे निकल गए हैं।

उनकी रचनाओं में सामाजिक अन्तर्विरोध पूरी तरह उभरकर आया है। राजनैतिक मतवाद अथवा दलीयता के आरोप से दूर भीष्म साहनी ने भारतीय राजनीति में निरन्तर बढ़ते भ्रष्टाचार, नेताओं की पाखण्डी प्रवृत्ति, चुनावों की भ्रष्ट प्रणाली, राजनीति में धार्मिक भावना, साम्प्रदायिकता, जातिवाद का दुरुपयोग, भाई-भतीजावाद, नैतिक मूल्यों का ह्रास, व्यापक स्तर पर आचरण भ्रष्टता, शोषण की षड़यन्त्रकारी प्रवृत्तियों व राजनैतिक आदर्शों के खोखलेपन आदि का चित्रण बड़ी प्रामाणिकता व तटस्थता के साथ किया है।

उनका सामाजिक बोध व्यक्तिगत अनुभव पर आधारित था। उनके उपन्यासों में शोषणहीन, समतामूलक प्रगतिशील समाज की रचना, पारिवारिक स्तर, रूढ़ियों का विरोध तथा संयुक्त परिवार के पारस्परिक विघटन की स्थितियों के प्रति असन्तोष व्यक्त हुआ है।

पुरस्कार – भीष्म साहनी की जीवनी
भीष्म साहनी को उनकी “तमस” नामक कृति पर ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ (1975) से सम्मानित किया गया था।
उन्हें ‘शिरोमणि लेखक सम्मान’ (पंजाब सरकार) (1975)
‘लोटस पुरस्कार’ (अफ्रो-एशियन राइटर्स असोसिएशन की ओर से 1970)
‘सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार’ (1983)
1998 में भारत सरकार ने उन्हे पद्म भूषण से नवाजा।
शलाका सम्मान, नयी दिल्ली, 1999
मैथिलीशरण गुप्त सम्मान, मध्य प्रदेश, 2000-01
संगीत नाटक अकादमी अवार्ड, 2001
सर्वोत्तम हिंदी उपन्यासकार के लिए सर सैयद नेशनल अवार्ड, 2002
2002 में भारत के सर्वोच्च साहित्यिक पुरस्कार साहित्य अकादमी फ़ेलोशिप से सम्मानित किया गया।
2004 में राशी बन्नी द्वारा किये गये नाटक के लिए इंटरनेशनल थिएटर फेस्टिवल, रशिया में उन्हें कॉलर ऑफ़ नेशन अवार्ड से सम्मानित किया गया।
31 मई 2017 को भारतीय डाक ने भीष्म साहनी के सम्मान में उनके नाम का एक पोस्टेज स्टेम्प भी जारी किया है।
मृत्यु
भीष्म साहनी की मृत्यु 11 जुलाई  2003 को दिल्ली में हुई थी।

गुरुवार, 7 दिसंबर 2023

उदय शंकर

उदय शंकर 
#08dic
#26sep 
🎂 जन्म- 8 दिसम्बर, 1900 ई., राजस्थान; 
⚰️मृत्यु- 26 सितम्बर, 1977 ई., कोलकाता) 
भारत के प्रसिद्ध नर्तक, नृत्य निर्देशक और बैले निर्माता थे। उन्हें भारत में 'आधुनिक नृत्य के जन्मदाता' के रूप में भी जाना जाता है। उदय शंकर ने यूरोप और अमेरिका का भारतीय नृत्य और संस्कृति से परिचय करवाया और भारतीय नृत्य को दुनिया के मानचित्र पर प्रभावशाली ढंग से स्थापित किया। उन्होंने ताण्डव नृत्य, शिव-पार्वती, लंका दहन, रिदम ऑफ़ लाइफ़, श्रम और यंत्र, रामलीला और भगवान बुद्ध नाम से नवीन नृत्यों की रचना की थी। इनमें वेशभूषा, संगीत, संगीत-यंत्र, ताल और लय आदि चीजें उन्हीं के द्वारा आविष्कृत थीं। वर्ष 1971 में भारत सरकार ने उन्हें 'पद्मविभूषण' और 1975 में विश्वभारती ने 'देशीकोत्तम सम्मान' प्रदान किये थे।

जन्म तथा परिवार
सुप्रसिद्ध नर्तक उदय शंकर का जन्म 8 दिसम्बर, 1900 ई. को राजस्थान के उदयपुर में हुआ था। वैसे मूलत: वे नरैल (आधुनिक बांगला देश) के एक बंगाली परिवार से ताल्लुक रखते थे। इनके पिता का नाम श्याम शंकर चौधरी और माँ हेमांगिनी देवी थीं। उदय शंकर के पिता अपने समय के प्रसिद्ध वकील थे, जो राजस्थान में ही झालावाड़ के महाराज के यहाँ कार्यरत थे। माँ हेमांगिनी देवी एक बंगाली ज़मींदार परिवार से सम्बन्धित थीं। उदय के पिता को नवाबों द्वारा 'हरचौधरी' की उपाधि दी गई थी, किंतु उन्होंने 'हरचौधरी' में से 'हर' को हटा दिया और अपने नाम के साथ सिर्फ़ 'चौधरी' का प्रयोग करना ही पसन्द किया। उदय शंकर अपने भाइयों में सबसे बड़े थे। इनके अन्य भाइयों के नाम थे- राजेन्द्र शंकर, देवेन्द्र शंकर, भूपेन्द्र शंकर और रवि शंकर। इनके भाई भूपेन्द्र की मौत वर्ष 1926 में ही हो गई थी।

शिक्षा
उदय शंकर के पिता संस्कृत के माने हुए विद्वान् थे। उन्होंने 'कलकत्ता विश्वविद्यालय' से स्नातक की उपाधि प्राप्त की थी। बाद में वे 'ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय' में अध्ययन करने गये और वहाँ वे 'डॉक्टर ऑफ़ फ़िलोसफ़ी' बने। पिता को अपने काम के सिलसिले में बहुत अधिक घूमना पड़ता था, इसलिए परिवार ने अधिकांश समय उदय शंकर के मामा के घर नसरतपुर में उनकी माँ और भाइयों के साथ व्यतीत किया। उदय शंकर की शिक्षा भी विभिन्न स्थानों पर हुई थी, जिनमें नसरतपुर, गाज़ीपुर, वाराणसी और झालावाड़ शामिल हैं। अपने गाज़ीपुर के स्कूल में उदय शंकर ने अपने चित्रकला एवं शिल्पकला के शिक्षक अंबिका चरण मुखोपाध्याय से संगीत और फ़ोटोग्राफ़ी की भी बखूवी शिक्षा हासिल की थी।

विवाह

उदय शंकर, पत्नी अमला शंकर के साथ
उदय शंकर का विवाह अमला शंकर से हुआ और वर्ष 1942 में उनके यहाँ पुत्र आनंद शंकर और वर्ष 1955 में पुत्री ममता शंकर का जन्म हुआ। आनंद शंकर एक संगीतकार और संगीत कम्पोजर थे, जिन्होंने अपने चाचा रवि शंकर की बजाय डॉ. लालमणि मिश्रा से प्रशिक्षण प्राप्त किया था। वे उस समय अपने फ्यूजन संगीत के लिए जाने गए थे, जिसमें पश्चिमी और भारतीय संगीत शैली दोनों को शामिल किया गया था। ममता शंकर अपने माता-पिता की तरह ही नर्तकी थी, जो एक प्रख्यात अभिनेत्री बनीं, जिन्होंने भारत के ख्यातिप्राप्त फ़िल्म निर्माता-निर्देशक सत्यजीत रे और मृणाल सेन की फ़िल्मों में काम किया। ममता शंकर कोलकाता में 'उदयन डांस कंपनी' भी चलाती हैं।

नृत्य का प्रदर्शन
वर्ष 1918 ई. में मात्र अठारह वर्ष की आयु में उदय शंकर को 'जे. जे. स्कूल ऑफ़ आर्ट' और उसके बाद 'गंधर्व महाविद्यालय' में प्रशिक्षण के लिए मुंबई भेज दिया गया। तब तक उनके पिता श्याम शंकर ने भी झालावाड़ में अपने पद से इस्तीफा दे दिया और लंदन चले गए। वहाँ उन्होंने एक श्वेत महिला से विवाह कर लिया और एक शौकिया संयोजक बनने से पहले क़नून की प्रैक्टिस करने लगे। इस दौरान उन्होंने ब्रिटेन में भारतीय संगीत और नृत्य की शुरुआत की। बाद में उदय शंकर अपने पिता के साथ शामिल हो गए और 23 अगस्त, 1920 को सर विलियम रोथेंस्टीन के अधीन चित्रकारी का अध्ययन करने के लिए लंदन के 'रॉयल कॉलेज ऑफ़ आर्ट' प्रवेश लिया। यहीं पर उन्होंने अपने पिता द्वारा लंदन में आयोजित करवाए गए कुछ चैरिटी कार्यक्रमों में नृत्य का प्रदर्शन किया। ऐसे ही एक अवसर पर प्रख्यात रूसी बैले नर्तकी अन्ना पावलोवा भी मौजूद थीं।

नई नृत्य शैली की रचना
उदय शंकर ने 'भारतीय शास्त्रीय नृत्य' के किसी भी स्वरूप में कोई औपचारिक प्रशिक्षण नहीं लिया था। उनकी प्रस्तुतियाँ रचनात्मक थीं। यद्यपि कम उम्र से ही वे भारतीय शास्त्रीय और लोक नृत्य शैलियों के संपर्क में आते रहे थे। यूरोप निवास के दौरान वे बैले नृत्य से इतना अधिक प्रभावित हुए थे कि उन्होंने दोनों शैलियों के तत्वों को मिलाकर नृत्य की एक नयी शैली की रचना करने का फैसला कर लिया, जिसे 'हाई-डांस' कहा गया। उदय शंकर ने ताण्डव नृत्य, शिव-पार्वती, लंकादहन, रिदम ऑफ़ लाइफ़, श्रम और यंत्र, रामलीला और भगवान बुद्ध नाम से नवीन नृत्यों की रचना की। इनमें वेशभूषा, संगीत, संगीत-यंत्र, ताल और लय आदि चीजें उन्हीं के द्वारा आविष्कृत थीं। रामायण पर उन्होंने नृत्य नाटिका की भी रचना की। उन्होंने यूरोप, अमेरिका आदि देशों में अपने नर्तक दल के साथ वर्षों घूमकर भारतीय नृत्यों का प्रदर्शन किया।

योगदान
अमला शंकर के साथ नृत्य प्रस्तुती देते उदय शंकर
उदय शंकर ने 'भारतीय शास्त्रीय नृत्य' के स्वरूपों और उनके प्रतीकों को नृत्य रूप प्रदान किया। इसके लिए उन्होंने ब्रिटिश संग्रहालय में राजपूत चित्रकला और मुग़ल चित्रकला की शैलियों का गम्भीर अध्ययन किया। इसके अतिरिक्त ब्रिटेन में अपने प्रवास के दौरान वे नृत्य प्रदर्शन करने वाले कई कलाकारों के संपर्क में आये। बाद में वे फ़्राँसीसी सरकार के वजीफे 'प्रिक्स डी रोम' पर कला में उच्च-स्तरीय अध्ययन के लिए वे रोम चले गए। शीघ्र ही इस तरह के कलाकारों के साथ उदय शंकर का संपर्क बढ़ता चला गया। साथ ही भारतीय नृत्य करने को एक समकालीन रूप देने का उनका विचार भी मजबूत हुआ।

रूसी नर्तकी से मुलाकात
उनकी कामयाबी के रास्ते में क्रांतिकारी परिवर्तन प्रख्यात रूसी बैले नर्तकी अन्ना पावलोवा से एक मुलाक़ात के रूप में आया। अन्ना भारत आधारित विषयों पर सहयोग के लिए कलाकारों की खोज कर रही थीं। इसी कारण हिन्दू विषयों पर आधारित बैले की रचना हुई, जिसमें अन्ना के साथ एक युगल राधा-कृष्ण' और 'हिन्दू विवाह' को अन्ना के प्रोडक्शन 'ओरिएंटल इम्प्रेशंस' में शामिल किया गया। इस बैले का प्रदर्शन लंदन के कोवेंट गार्डन में स्थित रॉयल ओपेरा हाउस में किया गया था। वे स्वयं कृष्ण बने और पावलोवा ने राधा की भूमिका का रोल किया। बाद में भी वे बैले की रचना और कोरियोग्राफ़ी में जुटे रहे, जिनमें से एक अजन्ता की गुफाओं के भित्तिचित्रों पर आधारित थी।

पुरस्कार व सम्मान
उदय शंकर ने 'भारतीय शास्त्रीय नृत्य' और यहाँ की संस्कृति को विश्व के हर कोने में पहुँचाने में विशेष योगदान किया। ये उनकी अथक लगन और कार्य के प्रति समर्पण की भावना ही थी कि भारत की संस्कृति से समूचा विश्व परिचित हो सका। उदय शंकर को उनके अतुलनीय योगदान के लिए कई पुरस्कारों और सम्मानों से नवाजा गया था-

शर्मिला टैगोर

शर्मिला टैगोर
🎂जन्म : 8 दिसंबर 1944  कानपुर
पति: मंसूर अली ख़ान पटौदी (विवा. 1968–2011)
बच्चे: सबा अली खान, सैफ़ अली ख़ान, सोहा अली ख़ान
माता-पिता: गितिन्द्रनाथ टैगोर, इरा बरुहा
बहन: रोमिला टैगोर, टिंकु टैगोर
हिन्दी एवं बांगला सिनेमा की अभिनेत्रियों में से एक हैं।

शर्मिला टैगोर
के पिता गितिन्द्रनाथ टैगोर ब्रिटिश भारत निगम में महाप्रबन्धक थे और उनकी माँ ईरा टैगोर (जन्म बरुवा) थीं। टैगोर के पिता कुलीन बंगाली हिन्दू ठाकुर परिवार से थे और नोबेल विजेता रबीन्द्रनाथ ठाकुर के दूर के सम्बंधी थे जबकि उनकी माँ आसामी हिन्दू परिवार से थीं और बरुवा परिवार से सम्बंधित थी।
शर्मिला टैगौर ने नाम बदलकर आयशा सुल्ताना कर लिया था। लेकिन अधिकतर लोग उन्हें अब भी उन्हें उनके असली नाम से ही पुकारते हैं।
टैगोर ने इस्लाम धर्म अपना लिया, अपना नाम बदलकर बेगम आयशा सुल्ताना रख लिया,और 27 दिसंबर 1968 को पटौदी और भोपाल के नवाब और भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान मंसूर अली खान पटौदी से शादी कर ली । उनके तीन बच्चे थे: बॉलीवुड अभिनेता सैफ अली खान (जन्म 1970); सबा अली खान (बी. 1976), एक आभूषण डिजाइनर; और सोहा अली खान (जन्म 1978), एक बॉलीवुड अभिनेत्री और टीवी हस्ती। मंसूर अली खान पटौदी का 22 सितंबर 2011 को 70 वर्ष की आयु में निधन हो गया।

1991 से 2004 तक सैफ ने अभिनेत्री अमृता सिंह से शादी की थी । उनके दो बच्चे हैं, बेटी सारा अली खान (जन्म 1995), एक अभिनेत्री, और बेटा इब्राहिम अली खान (जन्म 2001)। उनकी दूसरी शादी 2012 में अभिनेत्री करीना कपूर से हुई , जिनसे उनके दो बेटे हैं, तैमूर अली खान (जन्म 2016) और जहांगीर अली खान (जन्म 2021)।  सोहा ने 2015 में अभिनेता कुणाल खेमू से शादी की, और उनकी एक बेटी इनाया नौमी खेमू (जन्म 2017) है। 

स्वागत और विरासत

टैगोर को भारतीय सिनेमा की महानतम अभिनेत्रियों में से एक माना जाता है । टैगोर को एक अभिनेता के रूप में उनकी विविधता, उनकी सुंदरता और उनकी फैशन समझ और शैली के लिए अत्यधिक सम्मान दिया जाता है। 1960 के दशक के अंत और 1970 के दशक की शुरुआत में सबसे अधिक भुगतान पाने वाली अभिनेत्रियों में से एक, वह 1969 और 1973 में बॉक्स ऑफिस इंडिया की "शीर्ष अभिनेत्रियों" में दिखाई दीं ।  फ़र्स्टपोस्ट के सुभाष के. झा ने उन्हें 'शीर्ष अभिनेत्रियों' की संज्ञा दी। "निर्देशन की व्यापक छलाँग" वाली एकमात्र अभिनेत्री और कहा, "शर्मिला के अलावा किसी अन्य बॉलीवुड अभिनेत्री ने शादी के बाद इतनी शानदार पारी नहीं खेली है।" अमेरिकी आलोचक पॉलीन केल ने कहा, "वह उत्कृष्ट, परिपूर्ण हैं - एक ऐसा शब्द जिसका मैं यूं ही उपयोग नहीं करती।"  फेमिना की हेमाछाया डे ने कहा, "शर्मिला टैगोर ने विविध फिल्म शैलियों: आर्टहाउस, क्रॉसओवर और मुख्यधारा को सफलतापूर्वक फैलाया।" 

टैगोर को व्यापक रूप से "60 और 70 के दशक के स्टाइल आइकन" के रूप में जाना जाता था और उन्हें एक सेक्स प्रतीक के रूप में जाना जाता था ।बीहाइव हेयरडू और विंग्ड आईलाइनर टैगोर के कुछ स्टाइल स्टेटमेंट थे जो आज भी फैशन की दुनिया में प्रासंगिक हैं और उन्हें "नाटकीय आंखों के मेकअप की रानी" की उपाधि मिली।  प्रियंका चोपड़ा और दीपिका पादुकोण सहित कई अभिनेत्रियां उनकी शैली से प्रेरित हैं। उनकी बहू अभिनेत्री करीना कपूर ने कहा, "मुझे अपनी सास शर्मिलाजी का ड्रेसिंग सेंस ऑन और ऑफ-स्क्रीन दोनों जगह पसंद है।"  टैगोर को उनकी फिल्मों अपुर संसार और कश्मीर की कली के लिए Rediff.com की "सर्वश्रेष्ठ बॉलीवुड डेब्यू" सूची में दूसरा स्थान दिया गया था । टैगोर को देवी , नायक , आराधना , सफर , अमर प्रेम , दाग और मौसम जैसी चुनौतीपूर्ण भूमिकाएँ निभाने के लिए जाना जाता था ।  फिल्मफेयर ने मौसम में उनके प्रदर्शन को बॉलीवुड के "80 प्रतिष्ठित प्रदर्शनों" की सूची में शामिल किया। उन्हें टाइम्स ऑफ इंडिया की "50 खूबसूरत चेहरों" की सूची में भी रखा गया था। 

2022 में, उन्हें आउटलुक इंडिया की 75 सर्वश्रेष्ठ बॉलीवुड अभिनेत्रियों की सूची में रखा गया । टैगोर को एक ऐसी अभिनेत्री के रूप में जाना जाता था जो हमेशा अपने समय से आगे रहती थीं। वह अपनी फिल्म एन इवनिंग इन पेरिस (1967) के लिए ऑन-स्क्रीन बिकनी पहनने वाली पहली भारतीय अभिनेत्री बनीं। टैगोर को अब तक की सबसे हॉट बॉलीवुड अभिनेत्रियों में से एक माना जाता है।  वह अपने विभिन्न प्रकार के किरदारों के लिए जानी जाती थीं - सबसे पारंपरिक भूमिकाओं से लेकर सबसे बिंदास भूमिकाओं तक। द संडे गार्जियन के सुरेंद्र कुमार ने कहा, "उन्होंने अपने दो अवतारों को खूबसूरती से संतुलित किया - यथार्थवादी बंगाली फिल्मों का गंभीर व्यक्तित्व, और बॉक्स ऑफिस पर सफलता पर केंद्रित गीत-और-नृत्य दृश्यों वाली फिल्मों का बॉलीवुड व्यक्तित्व।" फिल्म इतिहासकार संजय मुखोपाध्याय ने कहा, "भारतीय सिनेमा में टैगोर का सबसे महत्वपूर्ण योगदान गरिमा और अनुग्रह की भावना है - वहीदा रहमान के बाद, वह अपने समय की एकमात्र अभिनेत्री थीं जिन्होंने इसे प्रदर्शित किया।" आदित्य चोपड़ा की 2008 की फिल्म रब ने बना दी जोड़ी के गाने " फिर मिलेंगे चलते-चलते " में , अभिनेत्री प्रीति जिंटा ने टैगोर को श्रद्धांजलि देने के लिए अपने बालों को अपने प्रसिद्ध मधुमक्खी के छत्ते से सजाया था।

राहुल भट्ट

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राहुल भट्ट एक भारतीय अभिनेता हैं 
🎂जन्म: 07 दिसंबर 1977  श्रीनगर
पत्नी: शारिका शर्मा भट
बच्चे: रयान भट, रोनिन भट

जो हिंदी फिल्मों में काम करते हैं। उन्होंने अपना करियर एक फैशन मॉडल के रूप में शुरू किया और 1998 में ग्रेविएरा मिस्टर इंडिया प्रतियोगिता में भाग लिया और बाद में कई विज्ञापनों और संगीत वीडियो में काम किया। उन्होंने 1998 से 2003 तक टेलीविजन धारावाहिक हीना में अपनी प्रमुख भूमिका के लिए प्रसिद्धि प्राप्त की। फिल्मों येह में अभिनय करने के बाद मोहब्बत है (2002) और नयी पड़ोसन (2003), उन्होंने अभिनय से विश्राम लिया और टेलीविजन धारावाहिकों का निर्माण शुरू किया , जिसमें मेरी डोली तेरे अंगना (2007-2008) और तुम देना साथ मेरा
भट का जन्म श्रीनगर, जम्मू और कश्मीर में हुआ था , भारत एक कश्मीरी पंडित परिवार में।

भट ने अपना करियर एक फैशन मॉडल के रूप में शुरू किया। 1998 में, उन्होंने ग्रेविएरा मिस्टर इंडिया प्रतियोगिता में भाग लिया, जहां उन्होंने मिस्टर फोटोजेनिक पुरस्कार जीता।उन्होंने तालाबों के लिए विज्ञापन किये। ब्रीज़ डिटर्जेंट,और " जैसे संगीत वीडियो में दिखाई दिए; सोनी लग गई'' पाकिस्तानी गायक सज्जाद अली, और "पंजाबी मुंडा" के साथ टिप्स इंडस्ट्रीज के लिए।उन्होंने विपरीत भूमिका के लिए लोकप्रियता हासिल की सिमोन सिंह हिना में, एक टॉप-रेटेड सोप ओपेरा हीना जो 1998 से 2003 तक पांच वर्षों तक प्रसारित हुआ।सोनी एंटरटेनमेंट टेलीविजन

भट ने अपनी पहली फ़िल्म भूमिका 2002 में रोमांटिक ड्रामा ये मोहब्बत है में निभाई थी, जिसका निर्देशन ने किया था। उमेश मेहरा.फिल्म को अच्छी प्रतिक्रिया नहीं मिली, लेकिन ने उन्हें "ईमानदार" पाया और तरण आदर्श का बॉलीवुड हंगामा का मानना ​​है कि उन्होंने "सभ्य शुरुआत" की है।अगले वर्ष, उन्होंने कॉमेडी नयी पड़ोसन में अभिनय किया, जिसमें उन्होंने एक तमिल व्यक्ति और एक डॉन की दोहरी भूमिकाएँ निभाईं।

जिस तरह की भूमिकाएं उन्हें ऑफर की जा रही थीं, उससे निराश होकर भट्ट ने अभिनय से कुछ समय का अवकाश ले लिया।इसके बजाय उन्होंने अपना खुद का प्रोडक्शन शुरू किया कंपनी फिल्मटोनिक एंटरटेनमेंट, जिसके तहत उन्होंने मेरी डोली तेरे अंगना (2007-2008), जैसे टेलीविजन सोप ओपेरा का निर्माण किया। छूकर मेरे मन को(2007), और तुम देना साथ मेरा(2009).उन्होंने इस दौर के बारे में कहा है, ''मैंने अभिनय छोड़ दिया क्योंकि मैं गुस्से में था। मैं बी और सी ग्रेड प्रोजेक्ट नहीं करना चाहता था. मैं अच्छी स्क्रिप्ट और प्रतिबद्ध फिल्म निर्माताओं के साथ काम करना चाहता था। लेकिन मेरे रास्ते में कुछ नहीं आया और इससे मैं दुखी हो गया।"

फिल्म निर्माता अनुराग कश्यप ने अपनी थ्रिलर फिल्म में एक संघर्षरत अभिनेता की भूमिका निभाने के लिए भट्ट से संपर्क किया, जिसकी बेटी का अपहरण कर लिया जाता है बदसूरत (2013). अपनी भूमिका की तैयारी के लिए, भट्ट ने भारी मात्रा में शराब का सेवन करना शुरू कर दिया और अपने चरित्र के चेहरे के चारों ओर काले घेरे बनाने के लिए खुद को नींद से वंचित कर लिया।एक दृश्य के लिए, जहां भट्ट को रोना था, कश्यप तीन घंटे तक उनसे बात करते रहे और आख़िरकार वह टूट गए और रोने लगे। उस दौरान कैमरा चलता रहा।बदसूरत का प्रीमियर निदेशक' 2013 कान्स फिल्म महोत्सव का पखवाड़ा खंड जहां इसे स्टैंडिंग ओवेशन मिला।इसे न्यूयॉर्क इंडियन फिल्म फेस्टिवललॉस एंजिल्स का भारतीय फिल्म महोत्सव।इंडिया टुडे के अरुणव चटर्जी को बुलाया गया ने आगे कहा कि भट "कुछ कठिन कथानकों और सत्ता परिवर्तन के माध्यम से अपने चरित्र में परिवर्तन लाने के लिए विशेष रूप से प्रभावशाली काम करता है"।स्क्रीन एनार्की  एक "अनूठा अपराध कथा" और इसमें भट्ट को "उत्कृष्ट" पाया।बदसूरत

तीन साल बाद 2016 में, भट्ट ने रोमांटिक ड्रामा फितूर में कैटरीना कैफ के साथ एक भूमिका निभाई। और प्रियंका चोपड़ा के साथ अपराध फिल्म जय गंगाजल में .बाद वाली फिल्म की समीक्षा में, श्रीजना मित्रा दास टाइम्स ऑफ इंडिया ने लिखा कि एक छोटी सी भूमिका में भी उन्होंने अपने किरदार के ''कट्टरपंथ'' को बखूबी निभाया था।

अगले वर्ष, भट की यूनियन लीडर में प्रमुख भूमिका थी, जो एक रासायनिक फैक्ट्री पर्यवेक्षक के बारे में एक भारतीय-कनाडाई नाटक था जो इस मुद्दे को उठाता है। सहानुभूतिहीन प्रबंधन के खिलाफ कार्यकर्ता के स्वास्थ्य और सुरक्षा के बारे में। अन्ना एम. एम. वेटिकाड ने लिखा कि भट्ट अपने प्रदर्शन में "एक्स फैक्टर" लेकर आए थे। जो पटकथा की सीमाओं को पार कर गया।

भट ने सुधीर मिश्रा के रोमांटिक ड्रामा दास देवशरत चंद्र चट्टोपाध्याय' के उपन्यास देवदास का पुनर्कथन उत्तर प्रदेश के राजनीतिक परिदृश्य पर आधारित, जिसमें उन्होंने अदिति राव हैदरी और . 2019 में, वह चड्ढा और कोर्टरूम ड्रामा में सेक्शन 375। उन्होंने बलात्कार के आरोपी एक बॉलीवुड निर्देशक की भूमिका निभाई। राजीव मसंद ने लिखा कि वह "अहंकारी निर्देशक के रूप में अच्छा काम करते हैं"।

2021 में, भट्ट ने मैन नेकेड में अभिनय किया, जो एक प्रयोगात्मक सिंगल-शॉट लघु फिल्म थी।भट 2022 में अनुराग कश्यप के साथ दोबारा में फिर से जुड़े, जो स्पैनिश रहस्य फिल्म मिराज, अभिनीत तापसी पन्नू।अनुपमा चोपड़ा ने भट्ट को "सबसे उल्लेखनीय चरित्र" पाया। फिल्म में और जोड़ा गया कि उनका "अच्छे लुक्स और थका हुआ अंदाज फिल्म में एक बेहद जरूरी कॉमिक धार पैदा करता है।"।

2023 में, कश्यप की नवीनतम फिल्म कैनेडी का प्रीमियर कान्स फिल्म फेस्टिवल में हुआ और इसे जबरदस्त प्रतिक्रिया मिली। तब से इसे सिडनी फिल्म फेस्टिवल और बिफान में प्रदर्शित किया गया है।
📽️
2002 ये मोहब्बत है
2003 नयी पड़ोसन
2013 कुरूप 
2016 फितूर
2016 जय गंगाजल 
2017 संघ के नेता
2018 दास देव 
2019 धारा 375
2021 आदमी नंगा लघु फिल्म
2022 दोबारा
2023 कैनेडी

बुधवार, 6 दिसंबर 2023

श्रीनिवास अय्यर रामस्वामी

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#07dic 

पूरा नाम श्रीनिवास अय्यर रामस्वामी
प्रसिद्ध नाम चो रामस्वामी
🎂जन्म 05 अक्टूबर, 1934
जन्म भूमि मद्रास
⚰️मृत्यु 07 दिसम्बर, 2016
मृत्यु स्थान चेन्नई, तमिलनाडु
कर्म भूमि भारत
प्रसिद्धि अभिनेता, नाटककार, सम्पादक, राजनीतिक व्यंग्यकार, फ़िल्म निर्देशक तथा अधिवक्ता।
नागरिकता भारतीय
विशेष बाबूराव पटेल की 'मदर इंडिया' की तर्ज पर चो रामस्वामी ने तमिल में राजनीतिक व्यंय की पहली पत्रिका शुरू की और इसका नाम 'तुग़लक़' रखा था।
अन्य जानकारी तमिलनाडु जब द्रविड़ वैचारिकता की गिरफ्त में आ गया था, तब श्रीनिवास अय्यर रामस्वामी यानी चो रामस्वामी विरोध की अकेली आवाज़ थे। लेकिन उन्होंने हरसंभव कोशिश की कि उनकी आवाज़ को उनके तीखेपन में नहीं, बल्कि व्यंग्य की पैनी और रचनात्मक शैली में सुना जाए।
चो रामस्वामी (अंग्रेज़ी: Cho Ramaswamy, जन्म- 5 अक्टूबर, 1934, मद्रास; मृत्यु- 7 दिसम्बर, 2016, तमिलनाडु) भारतीय अभिनेता, हास्य कलाकार, चरित्र अभिनेता, संपादक, राजनीतिक व्यंग्यकार, नाटककार, संवाद लेखक, फ़िल्म निर्देशक और अधिवक्ता थे। उनका पूरा नाम 'श्रीनिवास अय्यर रामस्वामी' था। बाबूराव पटेल की 'मदर इंडिया' की तर्ज पर चो रामस्वामी ने तमिल में राजनीतिक व्यंय की पहली पत्रिका शुरू की थी और इसका नाम 'तुग़लक़' रखा था। द्रविड़ आंदोलन और कांग्रेस का एक भी नेता उनके व्यंग्य के निशाने से नहीं बच पाया। इससे तुग़लक़ के पाठकों में यह विश्वास पनपा कि चो रामस्वामी की मारक लेखनी से कोई बच नहीं सकता। असंख्य लोग व्यग्यों के जरिये सामाजिक बदलाव लाने के चो रामस्वामी के काम को प्रशंसा और सम्मान की दृष्टि से देखते थे। तमिलनाडु की मुख्यमंत्री रहीं जयललिता के चो रामस्वामी गहरे मित्र थे।

परिचय
चो रामस्वामी का जन्म 05 अक्टूबर सन 1934 को ब्रिटिशकालीन भारत में मद्रास में हुआ था। 

तमिलनाडु के कद्दावर नेताओं को भी यह पता था कि चो रामस्वामी किसी आलोचना से परे नहीं हैं। इसमें कोई शक नहीं कि व्यंग्यकार, पत्रकार, नाटककार, अभिनेता और राजनीतिक सलाहकार चो रामस्वामी का राजनीतिक झुकाव दक्षिणपंथ की ओर था। इसके बावजूद जो भी पार्टी सत्ता में रही हो, जब भी मीडिया की आज़ादी या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात उठी, वे मोर्चे पर सबसे आगे रहे। देश के कई नेताओं के साथ रामस्वामी के अच्छे व्यक्तिगत संबंध थे। तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता से भी उनकी काफ़ी अच्छी दोस्ती थी। जब चो रामस्वामी गंभीर रूप से बीमार पड़े, तब जयललिता के अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी उनसे मिलने के लिए पहुंचे थे।

फ़िल्मों व रंगमंच में ठहराव
पचास वर्ष पहले तमिलनाडु जब द्रविड़ वैचारिकता की गिरफ्त में आ गया था, तब श्रीनिवास अय्यर रामस्वामी यानी चो रामस्वामी विरोध की अकेली आवाज थे। लेकिन उन्होंने हरसंभव कोशिश की कि उनकी आवाज़ को उनके तीखेपन में नहीं, बल्कि व्यंग्य की पैनी और रचनात्मक शैली में सुना जाए। वर्ष 1967 में जब द्रमुक को तमिलनाडु की सत्ता मिली, तब रामस्वामी करीब पैंतीस साल के थे। वकालत का पेशा छोड़ने के बाद फिल्मों और रंगमंच में उन्हें ठहराव मिला। दो सौ के करीब फ़िल्मों में हालांकि उन्होंने मसखरे की भूमिका ही निभाई, पर कुल तेईस नाटकों के जरिये रामस्वामी ने अपनी अलग पहचान बना ली, क्योंकि इनमें विदूषक की भूमिका निभाते हुए संवाद उनके लिए हुए थे; लिहाजा रंगमंच पर उनकी मसखरी में भी संदेश निहित होता था। उनके शुरुआती नाटक सामाजिक व्यंग्य थे। द्रविड़ पार्टी के सत्ता में आने के बाद उनके नाटक राजनीतिक होते गए, जिनमें नए उभरते द्रविड़ नेताओं पर करारा व्यंग्य होता था।

निजी क्षेत्र के समर्थक
एक पारंपरिक कांग्रेसी परिवाद से आने के कारण चो रामस्वामी राजाजी और कामराज के प्रशंसक थे। मुक्त बाज़ार अर्थव्यवस्था और निजी क्षेत्र के समर्थक होने के कारण नेहरू से भी अधिक वह राजाजी को पसंद करते थे। वर्ष 1969 में कांग्रेस को विभाजित कर इंदिरा गांधी ने जब तमिलनाडु में द्रमुक के साथ गठजोड़ किया, तब चो रामस्वामी उन थोड़े लोगों में थे, जो राजाजी और कामराज का समर्थन कर रहे थे।

व्यंग्य पत्रिका 'तुग़लक़'
चो रामस्वामी का नाटक 'मोहम्मद बिन तुग़लक़' एक व्यंग्य नाटक था, इसमें तुग़लक़ भारत का प्रधानमंत्री बन जाता है। यह नाटक तत्कालीन प्रधानमंत्री इदिरा गांधी के क्रियाकलापों पर पैरोडी था। बाबूराव पटेल की 'मदर इंडिया' की तर्ज पर चो रामस्वामी ने तमिल में राजनीतिक व्यंय की पहली पत्रिका शुरू की और इसका नाम 'तुग़लक़' रखा। उन्होंने इसे अंग्रेज़ी में भी 'पिकविक' नाम से शुरू किया, पर यह प्रयोग सफल नहीं रहा। अलबत्ता तुग़लक़ सफलता की नई ऊंचाई छू रही थी। जब चुनाव में राज्य के मतदाताओं ने इंदिरा और द्रमुक के पक्ष में थोक में वोट डाले, तब तुग़लक़ विरोधियों की आवाज बनी। सत्ता में बैठे ताकतवरों को निशाना बनाते उनके दुस्साहसी व्यंग्यों ने उभरते मध्य और उच्च मध्य वर्ग को प्रभावित किया। करुणानिधि सरकार ने सता और कानून के जरिये चो रामस्वामी को डराने की कोशिश की, पर वे और लोकप्रिय बनकर भरे।

राजनीतिक गतिविधि
आपातकाल चो रामस्वामी की रचनात्मकता का स्वर्ग युग था। सेंसर की मार उनकी पत्रिका पर भी पड़ी। वह सामान्य मुद्दों को भी राजनीतिक रंग देने में सफल होते थे। द्रविड़ आंदोलन और कांग्रेस का एक भी नेता उनके व्यंग्य के निशाने से नहीं बच पाया। इससे तुग़लक़ के पाठकों में यह विश्वास पनपा कि चो रामस्वामी की मारक लेखनी से कोई बच नहीं सकता। लेकिन 80 और 90 में खोजी पत्रकारिता के दौर में तुग़लक़ की लोकप्रियता कम होने लगी। भाजपा और हिंदुत्व के उभार के दौरान चो रामस्वामी उनके साथ हो गए। अब वह राजनीति में मध्यस्थ की भूमिका भी निभाने लगे। जयललिता के बचपन का मित्र होने के बावजूद चो रामस्वामी ने 1996 में उन्हें सत्ता से बाहर करने के लिए द्रमुक और तमिल मनीला कांग्रेस के बीच गठबंधन बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पर 2004 के बाद उन्होंने जयललिता के प्रति नरमी दिखाई और द्रमुक का विरोध किया। वर्ष 1999 से 2005 तक वह राज्य सभा में रहे।

लेखन में ईमानदार
चो रामस्वामी के ईमानदार और निष्पक्ष आलोचक होने की छवि पर तब ग्रहण लगा, जब प्रशांत भूषण ने दस्तावजों के जरिये यह साबित किया कि चो रामस्वामी उस वक्त जयललिता की अनेक तथाकथित फर्जी कंपनियों के निदेशक थे, जब उनके अपनी दोस्त शशिकला नटराजन से रिश्ते खराब हो गए थे। द्रमुक को निरंतर व्यंग्य के अपने अचूक तीर से बेधते रहने के बावजूद करुणानिधि से चो रामस्वामी के दोस्ताना रिश्ते थे। सिर्फ करुणानिधि ही क्यों, व्यक्तिगत तौर पर उन्होंने उन सबसे बेहतर संबंध रखे, जिन्हें वह अपनी पत्रिका में निशाना बनाते थे। अपने लेखन में वह इतने ईमानदार और साहसी थे कि तब भी अपनी भावनाएं नहीं छिपाते थे, जब उन्हें पता होता था कि राजनीतिक तौर पर वह गलत हैं। स्त्री विमर्श और महिलाओं के सार्वजनिक पदों पर आसीन होने के वह विरोधी तो थे ही, समाजवाद और तर्कवाद के भी वह विरोधी थे, और इसे छिपाते नहीं थे।

निधन
चो रामस्वामी का निधन 7 दिसम्बर, 2016 को चेन्नई, तमिलनाडु में हुआ। तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता के निधन के दो दिन बाद ही चो रामस्वामी ने भी अंतिम सांस ली। चो रामस्वामी का लंबे समय से अस्पताल में इलाज चल रहा था। उनके परिवार में पत्नी, एक बेटा और बेटी हैं। उन्होंने उस दौर में दक्षिणपंथी अनुदारवाद का प्रतिनिधित्व किया, जब यह धारा इतनी मजबूती से नहीं उभरी थी। इसके बावजूद उनकी छवि पर ख़ास फर्क नहीं पड़ता था। असंख्य लोग व्यग्यों के जरिये सामाजिक बदलाव लाने के उनके काम को प्रशंसा और सम्मान की दृष्टि से देखते थे।

शेखर सुमन

#07dic 

शेखर सुमन
🎂07 दिसंबर 1962 
पटना , बिहार , भारत 
पेशा अभिनेता
सक्रिय वर्ष
-वर्तमान
जीवनसाथी
अलका सुमन ​( एम.  1983 )
बच्चे
आयुष सुमन (जन्म 1994), अध्ययन सुमन
शेखर सुमन ने 04 मई 1983 को अलका सुमन से शादी की और उनका एक बेटा अध्ययन सुमन है , जो बॉलीवुड फिल्म अभिनेता है। एक बड़े बेटे, आयुष की 11 साल की उम्र में दिल की बीमारी से मृत्यु हो गई। 
सुमन ने शशि कपूर द्वारा निर्मित और गिरीश कर्नाड द्वारा निर्देशित फिल्म उत्सव से फिल्मों में डेब्यू किया । उन्होंने मानव हत्या , नाचे मयूरी , संसार , अनुभव , त्रिदेव , पति परमेश्वर और रणभूमि सहित लगभग 35 फिल्मों में काम किया है । 

उन्होंने 1984 में वाह जनाब से टेलीविजन पर डेब्यू किया , जिसमें उन्होंने किरण जुनेजा के साथ अभिनय किया । उनके टेलीविजन करियर में देख भाई देख , रिपोर्टर , कभी इधर कभी उधर , छोटे बाबू , अंदाज , अमर प्रेम , विलायती बाबू , मूवर्स एन शेकर्स , सिंपली शेखर और कैरी ऑन शेखर जैसे शो शामिल हैं । उन्होंने फरवरी 2006 तक स्टार वन पर फिल्म दीवाने, द ग्रेट इंडियन कॉमेडी शो की मेजबानी की और सहारा टीवी पर डायल वन और जीतो के कुछ एपिसोड में दिखाई दिए । उन्होंने ज़ी टीवी पर नीलम घर , स्टार वन पर ही-मैन और स्टार न्यूज़ पर पोल खोल सहित क्विज़ शो की भी मेजबानी की है । 2015 में, उन्होंने आजतक पर अबकी बारी शेखर बिहारी की मेजबानी शुरू की । 

वह नवजोत सिंह सिद्धू के साथ द ग्रेट इंडियन लाफ्टर चैलेंज के जजों में से एक थे , उन्होंने अपने सह-मेजबान के साथ मतभेदों के कारण तीन सीज़न के बाद इसे छोड़ दिया था। उन्होंने सोनी टीवी पर कॉमेडी सर्कस और सब टीवी पर कॉमेडी सुपरस्टार जैसे कई अन्य कॉमेडी शो में जज के रूप में काम किया । उन्होंने सब टीवी पर शो जब खेलो सब खेलो की मेजबानी की और सोनी टीवी पर प्रसारित लोकप्रिय डांस रियलिटी शो झलक दिखला जा के चौथे सीज़न में भाग लिया।

उन्होंने अपने गायन की शुरुआत कुछ ख्वाब ऐसे नाम के एक संगीत एल्बम से की , जो आठ प्रेम गीतों का संग्रह था, जिसका संगीत आदेश श्रीवास्तव ने दिया था और गीत श्याम राज ने लिखे थे। दिसंबर 2009 में, वह पिछले जीवन के प्रतिगमन पर आधारित रियलिटी टीवी श्रृंखला, राज़ पिछले जन्म का में एक प्रतिभागी के रूप में दिखाई दिए । सुमन ने 2014 की फिल्म, हार्टलेस से अपने निर्देशन की शुरुआत की । 

सुमन ने मई 2009 में कांग्रेस के टिकट पर पटना साहिब से लोकसभा चुनाव लड़ा और भाजपा के शत्रुघ्न सिन्हा से हार गए और तीसरे स्थान पर रहे। 
📽️
2017 भूमि 
2014 बेरहम
2011 चालु 
2004 एक से बढ़कर एक
2002 चोर मचाये शोर  
1998 घर बाजार 
1994 इन्साफ अपने लहू से 
1993 प्रोफेसर की पड़ोसन
1991 रणभूमि
1991वक़्त के ज़ंजीर 
1991पति परमेश्वर 
1991अनजाने रिश्ते
1989 त्रिदेव
1989 तेरे बिना क्या जीना
1988 आखिरी निश्चय 
1988खरीदार 
1988वो फिर आएगी 
1988 रजिया
1987 संसार 
1987यातना 
1987अनुभव  
1987नाचे मयूरी 
1985 रहगुज़ार
1984 उत्सव

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...