शुक्रवार, 3 नवंबर 2023

पूनम सिन्हा

पूनम सिन्हा
जनम 03 नवंबर 1949 हैदराबाद
निवास पटना, बिहार
दूसर नाँव कोमल

पूनम सिन्हा एक अभिनेत्री व अभिनेता, राजनेता शत्रुघ्न सिन्हा की पत्नी और अभिनेत्री सोनाक्षी सिन्हा की माँ हैं। विकिपीडिया
पति: शत्रुघन सिन्हा (विवा. 1980)
दल: समाजवादी पार्टी
बच्चे: सोनाक्षी सिन्हा, लव सिन्हा, कुश सिन्हा
पूनम सिन्हा एक भारतीय अभिनेत्री और राजनीतिज्ञ और अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा की पत्नी हैं। भारतीय सिनेमा के प्रमुख अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा से शादी करने से पहले उनके करियर की गति बहुत कम थी और उन्होंने अपने परिवार के हित में अभिनय को जल्दी छोड़ने का विकल्प चुना। समाजवादी पार्टी से जुड़ने की घोषणा करने तक उन्होंने अभिनेता और राजनेता के लिए अच्छी पत्नी की भूमिका निभाने के लिए अपेक्षाकृत शांत जीवन व्यतीत किया है।

शत्रुघ्न सिन्हान ने पत्नी पूनम सिन्हा (Poonam Sinha) के साथ अपनी लव स्टोरी के बारे में बताया. एक्टर ने खुलासा कि वह पूनम से पहले बार तब मिले थे जब वह फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया में एनरोल होने के लिए पटना से पुणे जा रहे थे. उन्होंने उस समय को भी याद किया जब पूनम के साथ ब्रेकअप कर लिया था. यहां तक बातचीत भी पूरी तरह बंद हो गई थी.

कृष्ण मोहन

कृष्ण मोहन
जन्म 11 अगस्त 1921
लाहौर , पंजाब , ब्रिटिश भारत
मृत 03 नवंबर 1990 (आयु 68 वर्ष)
बम्बई , महाराष्ट्र , भारत
अन्य नामों  मनमोहन कृष्ण
एक लोकप्रिय भारतीय फिल्म अभिनेता और निर्देशक थे, जिन्होंने चार दशकों तक हिंदी फिल्मों में काम किया , ज्यादातर एक चरित्र अभिनेता के रूप में । उन्होंने अपना करियर भौतिकी में प्रोफेसर के रूप में शुरू किया और भौतिकी में मास्टर डिग्री हासिल की। उन्होंने रेडियो शो कैडबरी की फुलवारी , एक गायन प्रतियोगिता की एंकरिंग की। बहुत से लोग नहीं जानते कि मनमोहन कृष्ण ने अपना पहला गाना 'झट खोल दे' अफसर (1950) में गाया था, जो देव आनंद की फिल्म थी, जिसमें एसडी बर्मन का संगीत था ।

वह चोपड़ा बंधुओं के पसंदीदा थे और उन्होंने उनके द्वारा निर्देशित और/या निर्मित फिल्मों में छोटी या बड़ी भूमिकाएँ निभाईं। दीवार , त्रिशूल , दाग , हमराज़ , जोशीला , कानून , साधना , काला पत्थर , धूल का फूल , वक्त और नया दौर इसके कुछ उदाहरण हैं।
उन्होंने चार दशकों तक हिंदी और पंजाबी फिल्मों में काम किया है. उन्होंने 250 से अधिक फिल्मों में काम किया.
मनमोहन कृष्ण बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे. वह बेहतरीन एक्टर होने के साथ ही उम्दा डायरेक्टर, प्रोड्यूसर भी थे. उनके बारें में बहुत कम लोग जानते हैं कि वह बॉलीवुड में बतौर सिंगर अपनी पहचान बनना चाहते थे, लेकिन किस्मत ने उन्हें एक्टर से डायरेक्टर बना दिया।
उन्होंने अपने बॉलीवुड करियर की शुरुआत बतौर एक्टर ‘अंधों की दुनिया’ (1947) से किया था और इस फिल्म के लिए उन्होंने एक गाना भी गाया था. फिल्म में लोगों ने उनकी एक्टिंग और आवाज दोनों की जमकर तारीफें की थी. बतौर डायरेक्टर उनकी डेब्यू फिल्म 1980 में रिलीज हुई फिल्म ‘नूरी’ थी. फिल्म बहुत सफल रही।
मनमोहन कृष्ण की आखिरी फिल्म

आपको जानकार हैरानी होगी कि फिल्म इंडस्ट्री में आने से पहले मनमोहन कृष्ण एक प्रोफेसर थे. उन्हें कॉलेज में बच्चों को पढ़ना पसंद था. उन्होंने फिजिक्स से एमएससी किया था. ये बातें उन्होंने खुद एक इंटरव्यू के दौरान बताया था. कॉलेज में 2 साल तक बच्चों को पढ़ाने के बाद उन्होंने बॉलीवुड की तरफ रुख किया क्योंकि उनकी दिलचस्पी हमेशा सिंगर बनने की रही और वह हमेशा से रेडियो ज्वाइन करने चाहते थे. अपने बॉलीवुड करियर में मनमोहन कृष्ण एक सिंगिग रेडियो शो, ‘कैडबरी की फुलवारी’ की भी एंकरिंग की. इसी के साथ इस महान दिग्गज कलाकार को आखिरी बार पर्दे पर साल 1990 में रिलीज हुई फिल्म हलात (Halaat) में देखा गया. इसी साल इस महान दिग्गज एक्टर ने 03 नवंबर 1990को 68 वर्ष की आयु में मुंबई के लोकमान्य तिलक अस्पताल में इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया.
व्यवसाय अभिनेता, निर्देशक

मिलिंद सोमन 

मिलिंद सोमन 

🎂जन्म: 04 नवंबर 1965, 

ग्लासगो, यूनाइटेड किंगडम
पत्नी: अंकिता कुंअर (विवा. 2018), मायलिन जम्पोनई (विवा. 2006–2009)
बहन: मेधा सोमन, नेत्रा सोमन, अनुपमा सोमन
माता-पिता: उषा सोमन, प्रभाकर सोमन
एक भारतीय सुपरमॉडल, अभिनेता, फिल्म निर्माता और फिटनेस प्रोत्साहक है। सोमन का जन्म ग्लासगो, स्कॉटलैंड में हुआ था। उनका परिवार इंग्लैंड चला गया जहां वे सात साल की उम्र तक रहे। 1973 में उनका परिवार वापस भारत आ गया और मुंबई के दादर में बस गया।

मिलिंद सोमन वर्तमान में अंकिता कंवर से विवाहित हैं। उनका रिस्ता मधु सप्रे के साथ भी था, बाद में उनका अलगाव हो गया। उनकी अपनी 2006 की फिल्म, वैली ऑफ फ्लॉवर के सेट पर फ्रांसीसी अभिनेत्री माइलिन जैम्पानो से मुलाकात हुई। जुलाई 2006 में गोवा में एक रिसॉर्ट में दोनो ने विवाह कर लिया। मिलिंद और माइलिन ने 2008 में अलग होने फैसला लिया। दंपति ने 2009 में तलाक ले लिया।

22 अप्रैल 2018 को उन्होंने अलिबाग में अंकिता कंवर से विवाह किया।
यद्यपि सोमन के पास इंजीनियरिंग डिप्लोमा है, लेकिन उन्होंने कभी इस क्षेत्र में करियर बनाने का नहीं सोचा। इसलिए, वे 1988 में मॉडलिंग के क्षेत्र में आ गये। सोमन ने अलीशा चिनॉय के संगीत वीडियो, मेड इन इंडिया (1995) में दिखाई दिये। 1990 के दशक के मध्य में मॉडल के रूप में काम करने के कुछ समय बाद, उन्होंने भारतीय विज्ञान कथा टीवी श्रृंखला कैप्टन व्यॉम में मुख्य भूमिका निभाई। इसके बाद 2000 के शुरूआत में उन्होंने अपना ध्यान फिल्मों पर केंद्रित किया। सोमान की फिल्मों में 16 दिसंबर, पचिकिली मुथुचाराम, पायया, अग्नि वर्षा और नियम: प्यार का सुपरहिट फॉर्मूला आदि शामिल हैं। 2007 में वे भ्रम, सलाम भारत और भ्रेजा फ्राई में दिखाई दिए। 2009 में उन्होंने सचिन कुंडलकर की मराठी फिल्म गांधी में अभिनय किया। उन्होंने वैली ऑफ फ्लॉवर और द फ्लैग समेत कई अंग्रेजी भाषा और अन्य विदेशी भाषा फिल्मों और टेलीविजन श्रृंखला में भी अभिनय किया है। स्वीडिश फिल्म अर्न - द नाइट टेम्पलर में उन्होंने अरब और मुसलमानों के सम्मानित 12वीं शताब्दी के कुर्द नेता सलादीन को अभिनित किया था। 2016 में वे हिंदी फिल्म बाजीराव मस्तानी में एक चरित्र भूमिका निभाते नज़र आये थे।[4]

सोमन हिंदी फिल्म नियम: प्यार का सुपरहिट फॉर्मूला (2003) के निर्माता थे। उन्होंने भूत बना दोस्त नामक बच्चों के टेलीविजन धारावाहिक भी प्रस्तुत किया हैं।[5]

2010 में, उन्होंने प्रशिध्द रियलिटी टीवी शो फियर फैक्टर: खतरों के खिलाड़ी (सीज़न 3) में एक प्रतियोगी के रूप में भाग लिया था। वे चौथे स्थान पर आये थे।

2012 में जोड़ी ब्रेकर्स में सोमन ने अभिनय किया था हालांकि इसने बॉक्स ऑफिस पर अच्छा प्रदर्शन नहीं किया था।

20 मई 2012 को वह पर्यावरण जागरूकता फैलाने के लिए ग्रीनथॉन, एनडीटीवी के लिए 30 दिनों में 1,500 किमी चलने का एक लिम्का रिकॉर्ड धारक बने। उसी वर्ष महिलाओं के बीच अच्छे स्वास्थ्य और स्तन कैन्सर जागरूकता को बढ़ावा देने के लिए देश की सबसे बड़ी 'महिलाओं की दौड़' पिंकथोन को उनके मार्गदर्शन में स्थापित किया गया था। 2015 में, मिलिंद ने अपनी पहली कोशिश में 15 घंटे और 19 मिनट में "आयरनमैन" चुनौती पूरी की। इस ट्रायथलॉन में 3.8 किमी की तैराकी, 180.2 किलोमीटर की साइकिल की सवारी और उस क्रम में 42.2 किलोमीटर की दौड़ शामिल होती है, जिसमें प्रतिभागियों को 'आयरनमैन' का खिताब जीतने के लिए 17 घंटे के भीतर पूरा करने की आवश्यकता होती है। 'आयरनमैन' शीर्षक प्रत्येक व्यक्ति को दिया जाता है जो दिए गए समय के भीतर उपलब्धि प्राप्त करता है।

पंडित शंभू महाराज जी

पण्डित शंभू महाराज
अन्य नाम शंभूनाथ मिश्रा
🎂जन्म 16 नवम्बर, 1907
जन्म भूमि लखनऊ, उत्तर प्रदेश
🕯️मृत्यु 4 नवम्बर, 1970
अभिभावक पिता- कालिका प्रसाद
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र शास्त्रीय नृत्य व गायन
पुरस्कार-उपाधि 'संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप' (1967), 'पद्म श्री' (1956)
प्रसिद्धि कत्थक नर्तक
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी शंभू महाराज नृत्य को लय से अधिक भाव-प्रधान के महत्त्व को स्वीकार करते थे। उनकी मान्यता थी कि- "भाव-विहीन लय-ताल प्रधान नृत्य मात्र एक चमत्कारपूर्ण तमाशा हो सकता है, नृत्य नहीं हो सकता।"

परिचय
शंभू महाराज का 
🎂जन्म 16 नवम्बर सन 1907 को लखनऊ, उत्तर प्रदेश में हुआ था। लखनऊ घराने के प्रसिद्ध नर्तकों में उनका विशिष्ट स्थान रहा है। नृत्य के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हें 'नृत्य सम्राट' की उपाधि से विभूषित किया गया था। शंभू महाराज के पिता कालका प्रसाद तथा पितामह दुर्गा प्रसाद के साथ अग्रज अच्छन महाराज भी अपने समय के श्रेष्ठ नृत्यकारों में से एक थे। इस प्रकार नृत्य कला उन्हें विरासत में मिली थी।

शिक्षा
शंभू महाराज को कत्थक नृत्य की शिक्षा सबसे पहले उनके चाचा बिन्दादीन महाराज से और बाद में बड़े भाई अच्छन महाराज से मिली। नृत्य के अतिरिक्त उन्होंने हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत का भी अध्ययन किया। विशेष रूप से ठुमरी का। ठुमरी गायिकी की शिक्षा उन्होंने मुईनुद्दीन खाँ के अनुज रहीमुद्दीन खाँ से प्राप्त की। इस प्रकार शंभू महाराज नृत्य व संगीत के गायन दोनों विधाओं में पारंगत थे।

नृत्य में भाव-प्रधानता के पक्षकार
शंभू महाराज नृत्य को लय से अधिक भाव-प्रधान के महत्त्व को स्वीकार करते थे। उनकी मान्यता थी कि- "भाव-विहीन लय-ताल प्रधान नृत्य मात्र एक चमत्कारपूर्ण तमाशा हो सकता है, नृत्य नहीं हो सकता।" नृत्य कौशल के प्रदर्शन में शंभू महाराज शोक, आशा, निराशा, क्रोध, प्रेम, घृणा आदि भावों को चमत्कारपूर्ण दिखाते थे। बहुत-से प्राचीन बोल, परण तथा टुकड़े उन्हें कंठस्य थे। नृत्य के संग ठुमरी गाकर उसके भावों को विभिन्न प्रकार से इस अदा से शंभू महाराज प्रदर्शित करते थे कि दर्शक मुग्ध हुए बिना नहीं रह सकता था। गायन में ठुमरी के साथ दादरा, गज़ल व भजन भी बड़ी तन्मयता से श्रोताओं को सुनाते थे।

पुरस्कार व सम्मान
शंभू महाराज को 1967 में 'संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप' से तथा 1956 में 'पद्मश्री' से सम्मानित किया गया था।

तब्बू

तब्बू एक 

भारतीय फिल्म अभिनेत्री है। हालांकि उन्होंने कई तमिल, तेलुगू, मलयालम, बंगला भाषा एवं साथ ही एक अमरीकी फिल्म में भी काम किया है, लेकिन मुख्यतः उन्होंने हिंदी फिल्मों में ही अभिनय किया है। 
🎂जन्म : 04 नवंबर 1971, हैदराबाद
माता-पिता: जमाल हाशमी, रिज़वाना हाशमी
बहन: फरहा नाज़
कुछ अपवादों के बावजूद, तब्बू मुख्यतः कलात्मक एवं कम बजट फिल्मों में अपने अभिनय के लिए जानी जाती हैं, जो बॉक्स ऑफिस पर आंकड़े (रुपये) जुटाने की बजाय कहीं अधिक आलोचनात्मक सराहना जुटाती हैं। व्यावसायिक तौर पर सफल फिल्मों में उनकी उपस्थिति कम ही रही है और ऐसी फिल्मों में उनकी भूमिका भी बहुत छोटी रही हैं, मसलन-बॉर्डर (1997), साजन चले ससुराल (1996), बीवी नंबर वन Hum Saath-Saath Hain: We Stand United (1999) आदि फ़िल्में. फिल्म माचिस (1996), विरासत (1997), हु तू तू (1999) अस्तित्व (2000), चांदनी बार (2001), मक़बूल (2003) एवं चीनी कम (2007) में उन्होंने उल्लेखनीय अभिनय किया है। मीरा नायर की अमेरिकी फिल्म 'द नेमसेक ' में भी उनकी मुख्य भूमिका को काफी प्रशंसा मिली। अपनी फिल्मों एवं भूमिकाओं के मामले में काफी चुनिन्दा मानी जाने वाली इस अभिनेत्री का कहना है कि 'मैं वही फ़िल्में करती हूं, जो मुझे भावुक बना दे एवं सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि फिल्म की यूनिट एवं निर्देशक मुझे प्रभावित करने चाहिए।

प्रारम्भिक जीवन

तब्बू 1971 में हैदराबाद में पैदा हुई जो जमाल हाशमी व रिजवाना की पुत्री हैं, हालांकि कुछ स्रोतों से उनके जन्म का वर्ष 1970 होने के भी संकेत मिले हैं। उनके जन्म के तुरंत बाद ही उनके माता-पिता का तलाक़ हो गया। उनकी मां एक स्कूल अध्यापिका थीं एवं उनके नाना-नानी, जो एक स्कूल चलाते थे, सेवा-निवृत्त प्राध्यापक थे। उनके नाना, मोहम्मद एहसान, अंकगणित के प्राध्यापक थे और नानी अंग्रेजी साहित्य की प्राध्यापिका थीं। उन्होंने अपनी पढ़ाई हैदराबाद के सेंट एन्स हाई स्कूल में की। 1983 में तब्बू मुंबई चली गयी एवं उन्होनें दो वर्षों तक वहां के सेंट ज़ेवियर्स कॉलेज में पढ़ाई की। 

वे शबाना आज़मी की भतीजी एवं अभिनेत्री फरहा नाज़ की छोटी बहन हैं। उनके घर मुंबई एवं हैदराबाद दोनों जगहों पर हैं।

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तबस्सुम 'तब्बू' हाशमी ने अपने करियर की शुरुआत पंद्रह साल की उम्र में 'हम नौजवान ' (1985) फिल्म से की. इस फिल्म में उन्होंने (देव था आनंद की बेटी) एक दुष्कर्म पीड़िता का किरदार निभाया था , बाद मे देव साहब ने ही इन्हे तब्बू नाम दिया। एक अभिनेत्री के रूप में उनकी पहली भूमिका एक तेलुगू फिल्म, कुली नंबर 1 में थी। दिसम्बर 1987 में, बोनी कपूर ने अपनी दो बड़ी फिल्मों, रूप की रानी चोरों का राजा एवं प्रेम, की शुरुआत की. प्रेम में तब्बू को संजय कपूर के साथ लिया गया। यह फिल्म आठ साल में बनकर तैयार हुई. तब्बू ने एक बार मजाक में कहा "मुझे इस दशक का, सबसे ज्यादा इंतज़ार करने वाली नयी अभिनेत्री का अवॉर्ड मिलना चाहिए." मुख्य किरदार के रूप में हिंदी में उनकी पहली रिलीज़ हुई फिल्म थी पहला पहला प्यार, जो लोगों का ज़रा भी ध्यान आकर्षित नहीं कर पाई.विजयपथ (1994) में अजय देवगन के साथ उनकी भूमिका के बाद वे प्रतिष्ठित हुईं, इस फिल्म के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ महिला नवागंतुक अवॉर्ड हासिल हुआ। इसके बाद भी उनकी कई फ़िल्में आयीं, जो बॉक्स ऑफिस पर कोई कमाल नहीं दिखा पायीं.
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ऋत्विक घटक

ऋत्विक घटक

🎂जन्म 04 नवम्बर, 1925
जन्म भूमि ढाका, बांग्लादेश
⚰️मृत्यु 6 फ़रवरी, 1976
मृत्यु स्थान कोलकाता, पश्चिम बंगाल

पति/पत्नी सुरमा घटक
संतान रिताबन घटक (पुत्र), संहिता घटक, सुचिस्मिता घटक (पुत्री)
कर्म-क्षेत्र फ़िल्म निर्माता-निर्देशक, नाट्य निर्देशक और पटकथा लेखक
मुख्य फ़िल्में 'नागोरिक' (1952), 'अजांत्रिक' (1958), 'मेघे ढाका तारा' (1960), 'कोमल गंधार' (1961) और 'सुबर्णरिखा' (1962) आदि।
पुरस्कार-उपाधि पद्म श्री, राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी नाटकों का लेखन, निर्देशन और अभिनय के अलावा उन्होंने बेर्टेल्ट ब्रोश्ट और गोगोल को बांग्ला में अनुवाद भी किया। 1957 में उन्होंने अपना अंतिम नाटक ज्वाला (द बर्निंग) लिखा और निर्देशित किया।

जीवन परिचय
ऋत्विक घटक का जन्म 4 नवंबर, 1925 को तत्कालीन पूर्वी बंगाल के ढाका में हुआ। बाद में उनका परिवार कोलकाता आ गया। यही वह काल था जब कोलकाता शरणार्थियों का शरणस्थली बना हुआ था। चाहे 1943 में बंगाल का अकाल, चाहे 1947 में बंगाल के विभाजन हो या फिर 1971 के बांग्लादेश मुक्ति युद्ध, इस दौर का विस्थापन ने ऋत्विक घटक के जीवन को काफ़ी प्रभावित किया। यही कारण है कि सांस्कृतिक विच्छेदन और निर्वासन उनकी फ़िल्मों में बखूबी दिखता है। 1948 में ऋत्विक घटक ने अपना पहला नाटक 'कालो सायार' (द डार्क लेक) लिखा और ऐतिहासिक नाटक ‘नाबन्ना के पुनरुद्धार” में हिस्सा लिया। 1951 में वे इंडियन पीपल्स थिएटर एसोसिएशन के साथ जुड़ गए। नाटकों का लेखन, निर्देशन और अभिनय के अलावा उन्होंने बेर्टेल्ट ब्रोश्ट और गोगोल को बंगला में अनुवाद भी किया। 1957 में, उन्होंने अपना अंतिम नाटक ज्वाला (द बर्निंग) लिखा और निर्देशित किया। निमाई घोष के चिन्नामूल (1950) में बतौर अभिनेता और सहायक निर्देशक के रूप में ऋत्विक घटक ने फ़िल्मी दुनिया में प्रवेश किया। उनकी पहली पूर्ण फ़िल्म नागरिक (1952) आई, दोनों ही फ़िल्में भारतीय सिनेमा के लिए मील का पत्थर थीं। अजांत्रिक (1958) ऋत्विक घटक की पहली व्यावसायिक फ़िल्म थी। फ़िल्म मधुमती (1958) के पटकथा लेखक के रूप में ऋत्विक घटक की सबसे बड़ी व्यावसायिक सफलता थी, जिसकी कहानी के लिए फ़िल्मफेयर पुरस्कार में नामांकित हुए। ऋत्विक घटक ने क़रीब आठ फ़िल्मों का निर्देशन किया। उनकी सबसे प्रसिद्ध फ़िल्में, मेघे ढाका तारा (1960), कोमल गंधार (1961) और सुबर्णरिखा (1962) थीं। 1966 में ऋत्विक घटक पुणे चले गए जहां वे भारतीय फ़िल्म और टेलीविजन संस्थान में अध्यापन करने लगे। 1970 के दशक में ऋत्विक घटक फ़िल्म निर्माण में फिर वापस लौटे। लेकिन तब तक वे खुद को अत्यधिक शराब के सेवन में डुबो चुके थे। उनका स्वास्थ्य खराब हो चुका था। उनकी आख़िरी फ़िल्म आत्मकथात्मक थी जिसका नाम था ‘जुक्ति तोक्को आर गोप्पो” (1974) थी। 6 फ़रवरी 1976 को उनका निधन हो गया।

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आदिवासी जीवन पर पहली बार ऋत्विक घटक ने डाक्यूमेंट्री बनायी थी। बिहार सरकार का यह प्रयास था। ऋत्विक की उम्र तब यही कोई 25 के आस-पास थी। इप्टा से जुड़ चुके थे और नाटक लिखना भी शुरू कर दिया था। झारखंड से उनका परिचय हो चुका था। उन्होंने अपने कैरियर की शुरुआत ‘बेदिनी’ फ़िल्म से की थी। 1952 में फ़िल्म यूनिट को लेकर घाटशिला आये और स्वर्णरेखा नदी के किनारे 20 दिनों तक रहे और शूटिंग की। हालांकि यह फ़िल्म रिलीज नहीं हो सकी। ऋत्विक घटक आदिवासी समाज को सत्यजीत राय की तरह नहीं देखते थे। उन्होंने ‘आदिवासी जीवन के स्रोत’ एवं ‘उरांव’ बनायी, तो आदिवासी समाज को, उनकी संस्कृति को निकट से देखने की कोशिश की। फ़िल्मकार मेघनाथ के शब्दों में, “वे आई-लेवल से देख रहे थे।” यानी, यह दृष्टि समानता की थी, संवेदना की थी। दोनों डाक्यूमेंट्री की शूटिंग रांची और आस-पास और नेतरहाट क्षेत्र में की गयी थी। ‘आदिवासी जीवन के स्रोत’ की जब शूटिंग कर रहे थे, तो बीच में अपनी व्यस्त दिनचर्या से थोड़ा समय निकालकर अपनी पत्‍नी को पत्र लिखते। एक पत्र 22 फ़रवरी 1955 का है। लिखा है, “उरांव-मुंडा के साथ सारा दिन बीत रहा है। इनके साथ रहकर मिट्टी की गंध मिल रही है। इनका अपूर्व गान हमें मदहोश कर दे रहा है।” आदिवासियों के सामाजिक जीवन की विसंगतियों की ओर भी ध्यान दिलाते हैं। लिखते हैं, “आदिवासियों में बचने की इच्छा है। यहां की सुंदरता भी इतनी अपार है कि इसका बूंद मात्र ही कैमरे में कैद कर पा रहा हूं।” वे उरांव नृत्य पर भी मोहित होते हैं।

इस अपूर्व सौंदर्य को कैद करने के लिए ऋत्विक घटक फिर रांची आये और अपनी ‘अजांत्रिक’ फ़िल्म की शूटिंग रांची, रामगढ़ रोड आदि क्षेत्रों में की। यह फ़िल्म बांग्ला में है, लेकिन पहली बार उरांव यानी कुड़ुख भाषा में संवाद और नृत्य को इस फीचर फ़िल्म में दिखाया गया है। उनके नृत्य से ऋत्विक घटक काफ़ी भाव-विभोर थे। इसलिए इसमें सरना झंडे भी लहरा रहे थे। आदिवासी जीवन की सरलता, लावण्यता का अनुभव किया। फ़िल्मकार मेघनाथ कहते हैं कि अजांत्रिक मानुष और मशीन के बीच संबंधों की कहानी हैं। हास्य का पुट है। लेकिन यह हंसी हूक भी पैदा करती है। बहरहाल, ऋत्विक घटक को झारखंड काफ़ी पसंद था। इसे वे कभी भूले नहीं। जब 1962 में सुबर्णरिखा बनायी, तब भी नहीं।
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विजय मेहता

विजया मेहता

🎂जन्म 04 नवम्बर, 1934
जन्म भूमि बड़ौदा, गुजरात
पति/पत्नी हरिन खोटे, फ़ारुख मेहता
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र भारतीय सिनेमा तथा रंगमंच
शिक्षा स्नातक
विद्यालय 'मुम्बई विश्वविद्यालय'
पुरस्कार-उपाधि सहायक अभिनेत्री का 'राष्ट्रीय पुरस्कार' (1986), 'संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार' (1975)
प्रसिद्धि फ़िल्मकार
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी विजया मेहता की जिस फ़िल्म से हिन्दी फ़िल्म-जगत में सही अर्थों में पहचान बनी, वह थी- 'राव साहब'। सन 1986 में प्रदर्शित यह फ़िल्म बतौर निर्देशिका उनकी पहली फ़िल्म थी।
 भारतीय सिनेमा की एक उच्च श्रेणी की महिला फ़िल्मकार हैं। उन्होंने कई फ़िल्मों में अभिनय भी किया है। विजया मेहता रंगमंच से फ़िल्मी दुनिया में आई थीं। फ़िल्म माध्यम पर उनकी गहरी पकड़ है।

🎂जन्म 04 नवम्बर, 1934 

को ब्रिटिश शासन काल में बड़ौदा (गुजरात) में हुआ था। उन्होंने 'मुम्बई विश्वविद्यालय' से स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण की थी। इसके बाद उन्होंने दिल्ली में इब्राहीम अलकाज़ी के साथ थियेटर का अध्ययन किया।

विवाह

विजया मेहता का प्रथम विवाह हरिन खोटे के साथ हुआ था, जो अपने समय की जाने मानी अभिनेत्री दुर्गा खोटे के पुत्र थे। लेकिन कुछ समय बाद ही हरिन खोटे का निधन हो गया। इसके बाद विजया मेहता ने फ़ारुख मेहता के साथ दूसरा विवाह कर लिया।

फ़िल्म निर्देशन

रंगमंच से मंझकर आई विजया मेहता की फ़िल्म-माध्यम पर गहरी पकड़ है। उनकी यह पकड़ कितनी पुख्ता है, यह उनकी फ़िल्म्स देखकर जाना जा सकता है। विजया मेहता की जिस फ़िल्म से हिन्दी फ़िल्म-जगत में सही अर्थों में पहचान बनी, वह थी- 'राव साहब'। सन 1986 में प्रदर्शित यह फ़िल्म बतौर निर्देशिका उनकी पहली फ़िल्म थी।

फ़िल्म 'राव साहब' परम्परा और आधुनिकता के द्वंद्व को कई पहलुओं से उकेरती है। यह उस काल (1910-1920 ई.) की कहानी है, जब महाराष्ट्र के ठेठ परम्परावादी माहौल में कई युवक इंग्लैंड से शिक्षा ग्रहण कर स्वदेश लौट रहे थे। वहां के आधुनिक समाज से क्रांति के बीज वे अपने साथ लेकर आए थे। लेकिन यहां की मिट्टी उनके लिये उपयुक्त नहीं थी। अत: उनकी यह क्रांतिकारिता कोरी वैचारिक थी। कामकाज या कहें कृत्य उनके परम्परावादी ही थे। ऐसा ही एक विचार था- 'विधवा विवाह', जिसका वे खुलकर समर्थन नहीं कर सकते थे। फ़िल्म 'राव साहब' जयंत दलवी के प्रसिद्ध मराठी नाटक 'बैरिस्टर' पर आधारित थी। इस नाटक का रंगमंच पर असफलतापूर्वक मंचन स्वयं विजया मेहता कर चुकी हैं। मंच पर बैरिस्टर की भूमिका विक्रम गोखले ने की थी, जबकि फ़िल्म में अनुपम खेर ने भूमिका निभाई थी। इसी नाटक में युवा विधवा की भूमिका सुहास जोशी ने निभाई, जबकि फ़िल्म में तन्वी आकामी ने निभाई थी।

पुरस्कार व सम्मान

नाटक और फ़िल्म दोनों ही जगह विधवा मौसी की भूमिका स्वयं निर्देशिका विजया मेहता ने की थी। उल्लेखनीय है कि 'राव साहब' को न सिर्फ दर्शकों और समीक्षकों की सराहना मिली, बल्कि राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह बहुप्रशंसित और पुरस्कृत भी हुई थी। इस फ़िल्म के लिए विजया को सहायक अभिनेत्री का 'राष्ट्रीय पुरस्कार' (1986) मिला था। इससे पहले वर्ष 1975 में उन्हें 'संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार' का पुरस्कार भी मिला था।

अमरीकी ट्रंप

ट्रंप चले थे ईरान हराने , खुद अभी बने पप्पू  राहुल बने थे शेर ट्रंप के बल , खुद मुंह के बल गिरे।  दोनों हो रह बेइज्जत दुनिया हुई...