मंगलवार, 17 अक्टूबर 2023

ओम पुरी



ओम पुरी हिन्दी फिल्मों के एक प्रसिद्ध अभिनेता थे।
🎂जन्म की तारीख और समय: 18 अक्तूबर 1950, अम्बाला
⚰️मृत्यु की जगह और तारीख: 06 जनवरी 2017, अँधेरी
 ओम पुरी का जन्म अम्बाला, पंजाब में हुआ हुआ था जिसे आज कल हरियाणा कहा जाता है। 

इन्होने ब्रिटिश तथा अमेरिकी सिनेमा में भी योगदान किया है। ये पद्मश्री पुरस्कार विजेता भी हैं, जोकि भारत के नागरिक पुरस्कारों के पदानुक्रम में चौथा पुरस्कार है। 
पत्नी: नंदिता पुरी (विवा. 1993–2013), सीमा कपूर (विवा. 1991–1991)
भाई: वेद पुरी
बच्चे: ईशान पुरी
माता-पिता: तारा देवी, Tek Chand Puri
 उनके पिता रेलवे और इंडियन आर्मी में थे। ओम पुरी के पैरेंट्स के पास उनके जन्म का न तो कोई सर्टिफिकेट था और न ही उन्हें उनकी जन्मतिथि याद थी। उनकी मां ने उन्हें बताया था कि वो हिंदू फेस्टिवल दशहरा से दो दिन पहले पैदा हुए थे। जब वो स्कूल जाने लगे, तब उनके अंकल ने उनका बर्थडे 9 मार्च 1950 दर्ज कराया, लेकिन जब ओम पुरी मुंबई पहुंचे, तब उन्होंने देखा कि साल 1950 में दशहरा कब मनाया गया था और उसी हिसाब से उन्होंने खुद की बर्थडेट 18 अक्टूबर लिखी। ओम पुरी का बचपन बहुत गरीबी में बीता था। फिर किस्मत बदली और उन्होंने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में खूब नाम कमाया, लेकिन वो मुश्किल दौर में तब आए, जब दूसरी बीवी संग उनका मनमुटाव हो गया। 
ओमपुरी की विवादों से भरी जिंदगी
ओम पुरी ने ऐसा बचपन जिया था, जिसमें कोई खुशियां नहीं थीं। जब वो 6 साल के थे, उनके पिता रेलवे में कर्मचारी थे, उन पर सीमेंट चोरी का आरोप लगा और उन्हें जेल की सलाखों के पीछे डाल दिया गया था। इसके बाद उनका परिवार बेघर हो गया था। पेट पालने के लिए ओम पुरी के भाई वेद प्रकाश पुरी ने रेलवे में कुली की नौकरी की और ओम पुरी एक दुकान पर चाय बेचने लगे। अपने परिवार को सहारा देने के लिए ओम पुरी ने कई तरह की नौकरी की। वो रेलवे ट्रैक से कोयला भी इकट्ठा करते थे, ताकि घरवालों का पेट पाल सकें। बाद में उनका और उनके भाई के बच्चों का पालन-पोषण एक नौकरानी शांति ने किया।
ओम पुरी ने कई फिल्मों में बेहतरीन एक्टिंग की। उनकी दिल तक जाने वाली आवाज की दुनिया कायल थी। फिल्मों से ज्यादा वो पर्सनल लाइफ को लेकर भी काफी चर्चा में रहे थे। उन्होंने साल 1991 में डायरेक्टर और राइटर सीमा कपूर से शादी की थी, जो एक्टर अन्नू कपूर की बहन हैं। हालांकि, ओम पुरी और सीमा की शादी 8 महीने तक ही चली। इसके बाद 1993 में ओम पुरी ने जर्नलिस्ट नंदिता पुरी संग ब्याह रचाया। कपल को एक बेटा हुआ, जिसका नाम ईशान है। 
साल 2009 की बात है, जब नंदिता ने पति पर एक बायोग्राफी लिखी, जिसका नाम है- Unlikely Hero: The Story of Om Puri। इस बायोग्राफी ने तहलका मचा दिया था, क्योंकि उन्होंने इसमें ऐसे-ऐसे खुलासे किए थे, जिसे सुनकर और पढ़कर लोग दंग रह गए थे। जिस में लिखा था।
नौकरानी संग फिजिकल रिलेशन का जिक्र।

ओम पुरी को सबसे ज्यादा इस बात ने अपसेट किया था कि उनकी वाइफ ने बायोग्राफी में ये लिखा था कि ओम पुरी ने 14 साल की उम्र में अपनी नौकरानी के साथ फिजिकल रिलेशनशिप बनाया था। इसके साथ ही नंदिता ने एक लक्ष्मी नाम की महिला के बारे में भी जिक्र किया था, जिससे ओमपुरी सेक्शुअली और इमोशनल दोनों रूप में इनवॉल्व थे।

ओमपुरी ने मानी थी ये बात
ओम पुरी ने ये भी बताया था कि अपनी वाइफ से उन्होंने सारे डार्क सीक्रेट्स शेयर किए थे, जैसे सभी पति करते हैं, लेकिन उसने उनकी लाइफ के सबसे महत्वपूर्ण और पवित्र हिस्से को घटिया और बेहूदे गॉसिप में बदल दिया। उन्होंने कहा था, 'लक्ष्मी मेरी लाइफ की सबसे महत्वपूर्ण महिलाओं में से एक थीं। जिसने मुझे और मेरे भाई के अनाथ बच्चों को पाला।' हालांकि, उन्होंने इस बात से इनकार नहीं किया था कि उन्होंने लक्ष्मी के साथ फिजिकल रिलेशन बनाया था। उन्होंने इसे खूबसूरत एक्सपीरियंस बताया था।

indo-canadian mudar:
जीवनी
समानांतर सिनेमा एवं मुख्य धारा सिनेमा के प्रसिद्ध अभिनेता ओमपुरी के जन्मदिन पर हार्दिक श्रद्धांजलि

🎂जन्म की तारीख और समय: 18 अक्तूबर 1950, अम्बाला
⚰️मृत्यु की जगह और तारीख: 6 जनवरी 2017, अँधेरी

ओम राजेश पुरी हिन्दी फ़िल्मों के उन प्रसिद्ध अभिनेताओं में से एक थे, जो अपनी अभिनय क्षमता से किसी भी किरदार को पर्दे पर जीवंत करने में सक्षम थे। वे भारतीय सिनेमा के एक कालजयी अभिनेता थे। उनके अभिनय का हर अन्दाज दर्शकों को प्रभावित करता है। रूपहले पर्दे पर जब ओम पुरी का हँसता-मुस्कुराता चेहरा दिखता है तो दर्शकों को भी अपनी खुशियों का अहसास होता है और उनके दर्द में दर्शक भी दु:खी होते हैं। हिन्दी फ़िल्मों में उनके बहुमूल्य योगदान के लिए उन्हें 'राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार', 'फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार' और 'पद्मश्री' आदि से भी सम्मानित किया गया था। ओम पुरी हिन्दी सिनेमा के वह सितारे थे, जिन्हें लोग हर भूमिका में देखना पसंद करते थे। कलात्मक सिनेमा हो या कमर्शियल सिनेमा, वह सभी जगह अपना प्रभाव छोड़ने में सफल रहे।

परिचय

ओम पुरी का जन्म 18 अक्टूबर, 1950 को पंजाब के अम्बाला शहर में हुआ था। उनके बचपन का अधिकांश समय अम्बाला में ही व्यतीत हुआ। उनके पिता रेलवे में नौकरी करते थे, इसके बावजूद परिवार का गुजारा बामुश्किल चल रहा था। ओम पुरी का परिवार जिस मकान में रहता था। उसके पास एक रेलवे यार्ड था। ओम पुरी को ट्रेनों से काफ़ी लगाव था। रात के वक्त वह अक्सर घर से निकलकर रेलवे यार्ड में जाकर किसी भी ट्रेन में सोने चले जाते थे। यही वह वक्त था, जब ओम पुरी सोचते थे कि में बड़ा होकर एक रेलवे ड्राइवर बनूंगा। बताया जाता है कि आेम के पिता शराब पीने के आदी थे, जिसकी वजह से उनकी माँ उन्हें लेकर पटियाला स्थित अपने मायके सन्नौर चली गई थीं।

अभिनय_में_रुचि

ओम पुरी ने अपने परिवार की समस्या व ज़रूरतों को पूरा करने के लिए एक ढाबे पर नौकरी भी की। कुछ समय बाद ढाबे के मालिक ने उन पर चोरी का आरोप लगाते हुए नौकरी से हटा दिया। फिर कुछ समय बाद ओम पुरी पंजाब के पटियाला में स्थित गांव सन्नौर में अपने ननिहाल चले आए। वहां प्रारंभिक शिक्षा पूरी की। इसी दौरान उनका रुझान अभिनय की ओर हो गया और वे सिनेमा जगत् के लिए जागरूक से होने लगे और धीरे-धीरे नाटकों में हिस्सा लेने लगे। फिर खालसा कॉलेज में दाखिला लिया। उसी दौरान ओम पुरी एक वकील के यहां मुंशी का काम भी करने लगे। अपने एक साक्षात्कार में ओम पुरी ने खुद खुलासा किया था कि- "शुरुआती दिनों में वे चंडीगढ़ में वकील के साथ मुंशी थे। एक बार चंडीगढ़ में उनके नाटक की परफॉर्मेंस थी, लेकिन वकील ने उन्हें तीन छुट्टी देने से मना कर दिया। इस पर ओम पुरी ने कहा- "अपनी नौकरी रख ले, मेरा हिसाब कर दे।" जब कॉलेज के लड़कों को पता चला कि मैंने नौकरी छोड़ दी तो उन्होंने प्रिंसिपल से बात की। इस पर प्रिंसिपल ने प्रोफेसर से कहा- "कॉलेज में कोई जगह है क्या।" इस पर उन्होंने कहा- "है एक लैब असिस्टेंट की, लेकिन ये आज का स्टूडेंट है, इसे क्या पता साइंस के बारे में।" प्रिंसिपल बोले- "कोई बात नहीं, लड़के अपने आप कह देंगे, नीली शीशी पकड़ा दे, पीली शीशी पकड़ा दे।" इस नौकरी के साथ ही ओम पुरी कॉलेज में हो रहे नाटकों में भी हिस्सा लेते रहे।

इसी समय उनकी मुलाकात हरपाल और नीना टिवाना से हुई, जिनके सहयोग से वह 'पंजाब कला मंच' नामक नाट्य संस्था से जुड़ गए। 'फ़िल्म एंड टेलिविजन इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडिया' से स्नातक के बाद ओम पुरी ने देश की राजधानी दिल्ली स्थित 'नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा' (एनएसडी) से अभिनय का कोर्स किया। यहीं पर उनकी मुलाकात नसीरुद्दीन शाह जैसे कलाकार से भी हुई। फिर अभिनेता बनने का सपना लेकर उन्होंने 1976 में 'पुणे फ़िल्म संस्थान' में दाखिला ले लिया।

विवाह

ओम पुरी का निजी जीवन कई बार विवादों के घेरे में आया। उन्होंने दो विवाह किये थे। उनकी पहली पत्नी का नाम 'सीमा' है, किंतु यह दाम्पत्य जीवन अधिक लम्बा नहीं चला और उनका तलाक हो गया। इसके बाद ओम पुरी ने नंदिता पुरी से विवाह किया। नंदिता और ओम पुरी एक पुत्र के माता-पिता भी बने। उनके पुत्र का नाम ईशान है।

फ़िल्मी_शुरुआत

'नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा' से अभिनय का औपचारिक प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद ओम पुरी ने हिन्दी फ़िल्मों की ओर रूख किया। वर्ष 1976 की फ़िल्म 'घासीराम कोतवाल' में वे पहली बार हिन्दी दर्शकों से रू-ब-रू हुए। 'घासीराम कोतवाल' की संवेदनशील भूमिका में अपनी अभिनय क्षमता का प्रभावी परिचय ओम पुरी ने दिया और धीरे-धीरे वे मुख्य धारा की फ़िल्मों से अलग समानांतर फ़िल्मों के सर्वाधिक लोकप्रिय अभिनेता के रूप में उभरने लगे।
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सफलता

वर्ष 1981 में ओम पुरी को फ़िल्म 'आक्रोश' मिली। 'आक्रोश' में उनके अभिनय की जमकर तारीफ़ हुई। इसके बाद फ़िल्मी दुनिया में उनकी गाड़ी चल निकली। 'भवनी भवई', 'स्पर्श', 'मंडी', 'आक्रोश' और 'शोध' जैसी फ़िल्मों में ओम पुरी के सधे हुए अभिनय का जादू दर्शकों के सिर चढ़कर बोला। किंतु उनके फ़िल्मी सफर में मील का पत्थर साबित हुई- 'अर्धसत्य'। 'अर्धसत्य' में युवा, जुझारू और आंदोलनकारी पुलिस ऑफिसर की भूमिका में वे बेहद जँचे।

धीरे-धीरे ओम पुरी समानांतर सिनेमा की एक बड़ी ज़रूरत बन गए। समानांतर सिनेमा जगत् में अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज कराने के साथ-साथ ओम पुरी ने मुख्य धारा की फ़िल्मों का भी रूख किया। कभी नायक, कभी खलनायक तो कभी चरित्र अभिनेता और हास्य अभिनेता के रूप में वे हर दर्शक वर्ग से रू-ब-रू हुए और उनकी प्रशंसा के पात्र बने।

प्रसिद्ध_कलाकारों_के_साथ_कार्य

नसीरुद्दीन शाह और स्मिता पाटिल के साथ ओम पुरी ने 'भवनी भवई', 'अर्धसत्य', 'मिर्च मसाला' और 'धारावी' जैसी फ़िल्मों में काम किया।

अंतरराष्ट्रीय_पहचान

ओम पुरी हिन्दी फ़िल्मों के उन गिने-चुने अभिनेताओं की सूची में शामिल हैं, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी पहचान बनायी है। 'ईस्ट इज ईस्ट', 'सिटी ऑफ़ ज्वॉय', 'वुल्फ़', 'द घोस्ट एंड डार्कनेस' जैसी हॉलीवुड फ़िल्मों में भी उन्होंने अपने उम्दा अभिनय की छाप छोड़ी है। 'सैम एंड मी', 'सिटी ऑफ़ ज्वॉय' और 'चार्ली विल्सन वार' जैसी अंग्रेज़ी फ़िल्मों समेत उन्होंने लगभग 200 फ़िल्मों में काम किया। 'चार्ली विल्सन' में उन्होंने पाकिस्तान के राष्ट्रपति जिया उल हक की भूमिका निभाई थी। हाल के वर्षों में मकबूल और देव जैसी गंभीर फ़िल्मों में अभिनय करने वाले ओम पुरी अपने सशक्त अभिनय के साथ ही अपनी सशक्त आवाज़ के लिए भी जाने जाते हैं।

हास्य_भूमिकाएँ

जीवन के कई वसंत देख चुके ओम पुरी आज भी हिन्दी फ़िल्मों में अपनी सक्रिय उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। अंतर बस इतना है कि इन दिनों वे नायक या खलनायक नहीं, बल्कि चरित्र या हास्य अभिनेता के रूप में हिन्दी फ़िल्मों के दर्शकों को लुभा रहे हैं। 'चाची 420', 'हेरा फेरी', 'मेरे बाप पहले आप', 'चुपके-चुपके' और 'मालामाल वीकली' में ओम पुरी हँसती-गुदगुदाती भूमिकाओं में दिखे तो 'शूट ऑन साइट', 'महारथी', 'देव' और 'दबंग' में चरित्र अभिनेता के रूप में वे दर्शकों के सामने आये।

कहा जाता है कि ओम पुरी को पहली फ़िल्म के मेहनताने में मूंगफलियां मिली थीं। ओम पुरी के फ़िल्मी कॅरियर की शुरुआत 1976 में मराठी फ़िल्म 'घासीराम कोतवाल' से हुई थी। यह फ़िल्म विजय तेंडुलकर के मराठी नाटक पर आधारित थी। ओम पुरी का कहना था कि तब उन्हें अच्छे काम के लिए मूंगफलियां मिली थीं। ओम पुरी ने एक चरित्र अभिनेता के अलावा निगेटिव किरदार भी निभाए। उनकी कॉमिक टाइमिंग गजब की थी। उन्होंने 'जाने भी दो यारों' जैसी डार्क कॉमिडी से लेकर आज के जमाने की हंसोड़ फ़िल्मों में काम किया। हाल ही में उन्होंने हॉलिवुड एनिमेशन फ़िल्म 'जंगल बुक' में एक किरदार को अपनी आवाज़ भी दी थी। उनकी आखिरी कमर्शल फ़िल्म 'घायल वन्स अगेन' थी। उनकी मशहूर आर्ट फ़िल्मों में 'अर्ध सत्य', 'सद्गति', 'भवनी भवाई', 'मिर्च मसाला' और 'धारावी' आदि शामिल हैं। 'हेराफेरी', 'सिंह इज किंग', 'मेरे बाप पहले आप', 'बिल्लू' जैसी फ़िल्मों में उन्होंने दर्शकों को खूब हंसाया।

पुरस्कार_व_सम्मान

अपने लम्बे फ़िल्मी सफर में ओम पुरी ने सशक्त अभिनय से कई उपलब्धियाँ और पुरस्कार आदि प्राप्त किये हैं-

'फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार' - 1981 - सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेता (फ़िल्म 'आक्रोश')
'राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार' - 1982 - सर्वश्रेष्ठ अभिनेता (फ़िल्म 'आरोहण')
'राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार' - 1984 - सर्वश्रेष्ठ अभिनेता (फ़िल्म 'अर्धसत्य')
'पद्मश्री' - 1990
'फ़िल्म फ़ेयर लाइफ़टाइम अचीवमेंट अवार्ड' - 2009

मृत्यु

अपने बेजोड़ अभिनय से भारतीय सिनेमा में कभी न मिट सकने वाली पहचान बनाने वाले अभिनेता ओम पुरी का निधन 6 जनवरी, 2017 को अंधेरी, मुम्बई में हुआ।

संजय कपूर

संजय कपूर 
हिन्दी फ़िल्मों के एक अभिनेता हैं।
🎂जन्म की तारीख और समय: 17 अक्तूबर 1965 मुम्बई
पत्नी: महीप संधू (विवा. 1997)
बच्चे: शनाया कपूर, जहान कपूर
भाई: अनिल कपूर, बोनी कपूर, रीना कपूर
माता-पिता: सुरिंदर कपूर, निर्मल कपूर
कपूर का जन्म निर्मल कपूर और फिल्म निर्माता सुरिंदर कपूर के घर हुआ था । उनके तीन बड़े भाई-बहन हैं बोनी कपूर , अनिल कपूर और रीना मारवाह।  अभिनेता सोनम कपूर , अर्जुन कपूर , जान्हवी कपूर , मोहित मारवाह और हर्षवर्द्धन कपूर और फिल्म निर्माता रिया कपूर उनके भतीजे और भतीजी हैं। पृथ्वीराज कपूर का कपूर परिवार उनके दूर के रिश्तेदार भी हैं क्योंकि पृथ्वीराज कपूर उनके पिता के चचेरे भाई थे।

कैरियर 

2011 में संजय
फ़िल्मी करियर और कुछ सफलताएँ (1995-वर्तमान) 
कपूर ने 1995 में नवागंतुक तब्बू के साथ फिल्म प्रेम से हिंदी सिनेमा में अपनी शुरुआत की । हालाँकि दोनों नवोदित कलाकारों ने काफी अच्छा प्रदर्शन किया, लेकिन फिल्म में कई वर्षों की देरी हुई क्योंकि यह 1989 से निर्माण में थी। रिलीज होने पर, यह बॉक्स ऑफिस पर असफल रही। कपूर की अगली फिल्म माधुरी दीक्षित के साथ राजा (1995) थी जो बॉक्स ऑफिस पर सफल रही। उन्होंने मुख्य अभिनेता के रूप में औज़ार (1997), मोहब्बत (1997) और सिर्फ तुम (1999) जैसी कई फिल्मों में अभिनय किया। मध्यम रूप से सफल छुपा रुस्तम: ए म्यूजिकल थ्रिलर (2001) के अलावा उन्हें मुख्य अभिनेता के रूप में ज्यादा सफलता नहीं मिली क्योंकि उनकी अधिकांश फिल्में बॉक्स ऑफिस पर असफल रहीं।  2002 में, वह कोई मेरे दिल से पूछे में ईशा देओल के मानसिक रोगी पति की भूमिका निभाते हुए एक खलनायक के रूप में दिखाई दिए । उनके अभिनय की आलोचकों ने सराहना की. 

उन्होंने कयामत: सिटी अंडर थ्रेट (2003), जूली (2004), लक बाय चांस (2009) और शानदार (2015) जैसी फिल्मों में सहायक भूमिकाएँ निभाना शुरू किया ।

उन्होंने 2015 में अपने भतीजे अर्जुन कपूर अभिनीत अपने पहले प्रोडक्शन ' तेवर' के साथ निर्माण की ओर रुख किया । उन्होंने मुबारकां (2017) में पहली बार अपने भाई अनिल के साथ एक कैमियो भूमिका निभाई।

2018 की शुरुआत में, संजय को एंथोलॉजी फिल्म लस्ट स्टोरीज़ में अभिनेत्री मनीषा कोइराला के साथ मुख्य किरदार के रूप में लिया गया था । उसी वर्ष, उन्हें फिल्म " द ज़ोया फैक्टर " में उनकी वास्तविक जीवन की भतीजी सोनम कपूर के ऑन स्क्रीन पिता की भूमिका में लिया गया, और कन्नड़ फिल्म "सीताराम कल्याण"। 2020 में, वह अभिनेत्री दिव्या दत्ता के साथ एक लघु फिल्म "स्लीपिंग पार्टनर" में दिखाई दिए
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2014 कहि है मेरा प्यार
2010 Prince
2009 लक बाई चांस
2007 ओम शांति ओम 
2005 जूली
2004 जूली 
2004 जागो
2003 कयामत 
2003 एल ओ सी कारगिल 
2003 करिश्मा 
2003 डरना मना है
2003 कल हो ना हो 
2002 सोच 
2002 कोई मेरे दिल से पूछे 
2002 शक्ति
2002 छुपा रुस्तम 
1999 सिर्फ तुम
1997 ज़मीर
1997 मोहब्बत
1997 औज़ार 
1997 मेरे सपनों की रानी 
1996 बेकाबू
1996 बेकाबू 
1995 कर्तव्य
1995 राजा 
1995 प्रेम

आसा लता विस्वास

पुराने जमाने की अभिनेत्री आशालता बिस्वास के जन्मदिन पर हार्दिक श्रद्धांजलि
आशा लता विस्वास
🎂जन्म की तारीख और समय: 17 अक्तूबर 1917, भुज
⚰️मृत्यु की जगह और तारीख: 26 मई 1992
पति:  अनिल विस्वास (विवा. 1936–1954)


संगीत रचनाकार अनिल बिस्वास की पहली पत्नी, आशालता बिस्वास, का जन्म 17 अक्टूबर, 1917 को हुआ था उनका मूल नाम मेहरुनिसा था  उन्होंने अपना नाम बदलकर आशालता रख लिया उन्होंने शक्ति मूवीटोन की तीन फ़िल्मों - आज़ादी, सजीव मूर्ति और सती जो 1935 में रिलीज हुई थी इन फिल्मों में काम करने के लिए उन्होंने अपना नाम बदलकर आशालता कर लिया

1940 और 1950 के दशक के हिंदी सिनेमा की दुनिया में एक लोकप्रिय व्यक्तित्व, आशालता को लक्स बाथ साबुन के विज्ञापन में ग्लैमरस सितारों में से एक के रूप में चित्रित किया गया था।  उन्होंने उस समय के प्रमुख स्टूडियो, जैसे बॉम्बे टॉकीज़ (चार आँखे 1944) और प्रभात फिल्म्स (स्वर्णभूमि, 1944) में भी काम किया था

अपने पति के साथ, आशालता बिस्वास ने  वैरायटी पिक्चर्स के बैनर तले लाडली (1949), लाजवाब (1950) और हमदर्द (1953) जैसी फिल्मों का निर्माण भी किया।  उन्होंने 1954 में अनिल बिस्वास से तलाक ले लिया और कुछ साल बाद, अनिल ने मीना कपूर से शादी कर ली, जिन्होंने 1950 के दशक में कुछ फिल्मों के लिए गाना गाया।

26 मई 1992 को आशालता बिस्वास का निधन हो गया। उनके परिवार ने सिनेमाई विरासत को जारी रखा;  उनके बेटे उत्पल विश्वास ने शहंशाह (1988) और मैं आज़ाद हूं (1993) जैसी फ़िल्मों के लिए संगीत तैयार किया, जबकि उनकी पोती पारोमिता वोहरा एक डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म निर्माता हैं

सिम्मी ग्रेवाल

फ़िल्म अभिनेत्री सिमी ग्रेवाल के जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामनाएं
🎂जन्म की तारीख और समय: 17 अक्तूबर 1947, लुधियाना
नामांकन: फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार - सर्वश्रेष्ठ  सहायक अभिनेत्री, ज़्यादा
आंटी: पामेला चोपड़ा
बहन: अमृता गरेवाल
माता-पिता: दर्शी सिंह, जेएस गरेवाल
सिमी ग्रेवाल
🎂जन्म 17 अक्टूबर 1947 एक भारतीय अभिनेत्री और टॉक शो होस्टेस हैं।  वह दो फिल्मफेयर पुरस्कारों की विजेता है  वह दो बदन, साथी मेरा नाम जोकर, सिद्धार्थ, कर्ज़ और उड़ीकाँ (पंजाबी फ़िल्म) में अपने काम के लिए जानी जाती हैं।  उन्होंने एक बंगाली फिल्म में भी अभिनय किया, जिसका नाम अरण्यर दिनरात्रि है, जिसका निर्देशन दिग्गज सत्यजीत रे ने किया था

सिमी ग्रेवाल का जन्म लुधियाना, पंजाब, भारत में हुआ था। उनके पिता, ब्रिगेडियर जे.एस. गरेवाल ने भारतीय सेना में सेवा की  सिमी फिल्म निर्माता यश चोपड़ा की पत्नी पामेला चोपड़ा की चचेरी बहन हैं।  सिमी की मां दर्शी और पामेला के पिता मोहिंदर सिंह भाई-बहन थे। सिमी इंग्लैंड में पली-बढ़ी और अपनी बहन अमृता के साथ न्यूलैंड हाउस स्कूल में पढ़ी

अपना अधिकांश बचपन इंग्लैंड में बिताने के बाद, सिमी ग्रेवाल जब एक किशोरी थीं भारत लौट आयीं अंग्रेजी भाषा में उनके प्रवाह ने अंग्रेजी भाषा की फिल्म टार्जन गोज़ टू इंडिया में भूमिका करने का मौका मिला  15 वर्षीय, ग्रेवाल  ने 1962 में इस फिल्म से फिरोज खान के साथ अपने कैरियर की शुरुआत की। इस  फिल्म में उनका  प्रदर्शन काफी अच्छा था।  1960 और 70 के दशक के दौरान, वह कई उल्लेखनीय भारतीय फिल्मों में काम करने का अवसर मिला  उन्होंने कई प्रमुख निर्देशकों के साथ काम किया  जैसे कि महबूब खान की सन्तान, मेरा नाम जोकर राज कपूर (1970) के साथ अरण्य दिन रात्रि सत्यजीत रे (दिन और रातें जंगल में)  ) के साथ मृणाल सेन के साथ  पदाटिक (द गुरिल्ला फाइटर) और राज खोसला की फ़िल्म  दो बदन उन्होंने कोलंबिया पिक्चर्स बैनर तले फ़िल्म सिद्धार्थ में शशि कपूर के साथ अभिनय किया, जो हर्मन हेस के  उपन्यास पर आधारित एक अंग्रेजी भाषा की फिल्म थी सिमी ग्रेवाल ने इस फिल्म में एक नग्न दृश्य किया, जो भारत में  विवाद का कारण बना भारतीय सेंसर बोर्ड कुछ  कटौती के  बाद इस फ़िल्म को  प्रदर्शन के लिए पास किया बाद में 1970 के दशक के मध्य में, उन्होंने अपने भाई यश चोपड़ा द्वारा बनाई गई लोकप्रिय फिल्म कभी कभी (1976 ) में अभिनय किया, और फिल्म चलते चलते (1976) में भी भूमिका निभाई फ़िल्म  कर्ज़ (1980) में उन्होंने एक वैंप की यादगार भूमिका निभाई  उन्होंने चार्ल्स एलेन की किताब पर आधारित बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री ड्रामा महाराजाज  (1987) में भी अभिनय किया

1980 के दशक की शुरुआत में उनका ध्यान लेखन और निर्देशन की ओर गया।  उन्होंने अपनी खुद की प्रोडक्शन कंपनी सिगा आर्ट्स इंटरनेशनल बनाई।  उन्होंने दूरदर्शन के लिए एक टीवी श्रृंखला इट्स अ वूमन्स वर्ल्ड (983) की मेजबानी, निर्माण और निर्देशन किया  उन्होंने यूके में  चैनल 4 के लिए एक वृत्तचित्र लिविंग लीजेंड राजकपूर (1984)भी बनाया।  इसके बाद राजीव गांधी पर तीन भागों वाली एक डॉक्यूमेंट्री बनाई गई जिसका शीर्षक था इंडियाज राजीव
उन्होंने  एक हिंदी फीचर फिल्म रुखसत को लिखा और निर्देशित किया और टेलीविजन विज्ञापनों का निर्माण किया, जिसके लिए उसने ऑस्ट्रेलिया में 1988 के पेटर पुरस्कार  जीता।

वह आमतौर पर टीवी शो और पुरस्कार समारोहों में अपने हस्ताक्षर युक्त सफेद कपड़े पहनती है, और लोकप्रिय रूप से "द लेडी इन व्हाइट" के रूप में जानी जाती है ग्रेवाल सावा शावा 2008 में एक मेजबान और न्यायाधीश के रूप में दिखाई दी

सिमी ग्रेवाल की अपनी वेबसाइट है जिसका उपयोग वह अपने प्रशंसकों के साथ बातचीत करने के लिए करती है: ।  साइट पर पाठ पढ़ने के लिए उसकी आवाज है। 
 YouTube पर उसका अपना चैनल भी है जहाँ उसके सभी शो और वृत्तचित्र अपलोड किए जाते हैं।  चैनल को 40 मिलियन से अधिक व्यूज मिले हैं।

सिमी ग्रेवाल का 17 साल की उम्र में पहला गंभीर रिश्ता जामनगर के महाराजा के साथ बना जो इंग्लैंड में उनके पड़ोसी भी थे

सिमी ग्रेवाल बाद में मंसूर अली खान पटौदी के साथ रिश्ते में रही लेकिन शर्मिला टैगोर से मिलने के बाद उन्होंने उनसे रिश्ता तोड़ लिया

सिमी ग्रेवाल का विवाह पुरानी दिल्ली के चुनामल परिवार के रवि मोहन से हुआ था, लेकिन उनकी शादी बहुत दिनों तक नही चली  और उनका तलाक हो गया
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1988 रुख़सत
1986 लव एंड गॉड
1982 हथकड़ी
1981 बीवी ओ बीवी
1980 कर्ज
1980 द बर्निंग ट्रेन विद्यालय
1979 एहसास
1976 नाच उठे संसार
1976 चलते चलते
1976 कभी कभी
1974 हाथ की सफाई
1973 नमक हराम
1972 अनोखी पहचान
1971 अंदाज़
1970 मेरा नाम जोकर मैरी
1970 अरण्येर दिनरात्रि बंगाली फ़िल्म
1968 साथी
1968 आदमी
1966 दो बदन
1965 तीन देवियाँ

सोमवार, 16 अक्टूबर 2023

समिता पाटिल

स्मिता पाटिल 
हिन्दी फ़िल्मों की एक अभिनेत्री थी। भारतीय संदर्भ में स्मिता पाटिल एक सक्रिय नारीवादी होने के अतिरिक्त मुंबई के महिला केंद्र की सदस्य भी थीं।

🎂जन्म : 17 अक्तूबर 1955, पुणे
⚰️मृत्यु: 13 दिसंबर 1986, मुम्बई
पति: राज बब्बर (विवा. ?–1986)
बच्चे: प्रतीक बब्बर
माता-पिता: शिवाजीराव पाटिल, विद्याताई पाटिल
बहन: अनीता देशमुख, मान्या पाटिल सेठ
पुणे में जन्मी स्मिता के पिता शिवाजीराव पाटिल महाराष्ट्र सरकार मे मंत्री और माता एक सामाजिक कार्यकर्ता थीं। उनकी आरंभिक शिक्षा मराठी माध्यम के एक स्कूल से हुई थी . उनका कैमरे से पहला सामना टीवी समाचार वाचक के रूप हुआ था। हमेशा से थोडी़ विद्रोही रही स्मिता की बडी़ आंखों और सांवले सौंदर्य ने पहली नज़र मे ही सभी का ध्यान अपनी ओर खींच लिया .
कालांतर मे स्मिता पाटिल के प्रेम संबंध राज बब्बर से हो गये जिनकी परिणिति अंतंतः विवाह मे हुई। राज बब्बर जो पहले से ही विवाहित थे और उन्होने स्मिता से शादी करने के लिये अपनी पहली पत्नी को छोडा़ था।

📽️1989 गलियों का बादशाह 
1988 वारिस 
1988 हम फ़रिश्ते नहीं 
1988 आकर्षण विशेष भूमिका 
1987 ठिकाना 
1987 राही 
1987 डांस डांस 
1987 शेर शिवाजी 
1987 सूत्रधार 
1987 आवाम 
1987 नज़राना 
1987 एहसान 
1987 इंसानियत के दुश्मन 
1986 आप के साथ गंगा 
1986 काँच की दीवार 
1986 अमृत कमला
1986 अनोखा रिश्ता 
1986 तीसरा किनारा 
1986 अंगारे 
1986 दहलीज़ 
1986 दिलवाला 
1985 मेरा घर मेरे बच्चे 
1985 आखिर क्यों? 
1985 जवाब 
1985 गुलामी 
1985 मिर्च मसाला 
1984 रावण 
1984 मेरा दोस्त मेरा दुश्मन 
1984 तरंग 
1984 गिद्ध 
1984 पेट प्यार और पाप 
1984 कसम पैदा करने वाले की
1984 फ़रिश्ता 
1984 आनन्द और आनन्द 
1984 शराबी 
1983 मंडी 
1983 अर्द्ध सत्य 
1983 हादसा
1982 सितम  
1982 बाज़ार 
1982 भीगी पलकें 
1982 दर्द का रिश्ता 
1982 नादान
1982 शक्ति 
1982 बदले की आग 
1982 अर्थ 
1982 नमक हलाल 
1981 तजुर्बा 
1981 सद्गति 
1981 चक्र 
1980 भवनी 
1980 अलबर्ट पिन्टो को गुस्सा क्यों आता है 
1980 द नक्सेलाइटस 
1980 आक्रोश 
1978 कोन्दुरा 
1977 भूमिका 
1976 मंथन
1975 निशांत 
1983 घुंघरू

लच्छू महाराज

लच्छू महाराज
🎂जन्म- 16 अक्टूबर, 1944, बनारस 
⚰️मृत्यु- 27 जुलाई, 2016
 भारत के जानेमाने तबला वादक थे।
अभिभावक वासुदेव महाराज
पति/पत्नी टीना (फ़्राँसीसी महिला)
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र भारतीय शास्त्रीय संगीत
प्रसिद्धि तबला वादक
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी सन 1972 में भारत सरकार की ओर से लच्छू महाराज ने 27 देशों का दौरा किया था। 1972 में ही केंद्र सरकार की ओर से उन्हें 'पद्मश्री' से सम्मानित करने का प्रस्ताव किया गया था, किंतु उन्‍होंने 'पद्मश्री' लेने से मना कर दि‍या।
लच्छू महाराज 
 जन्म- 16 अक्टूबर, 1944, बनारस मृत्यु- 27 जुलाई, 2016) भारत के जानेमाने तबला वादक थे। उन्होंने बनारस घराने की तबला बजाने की परम्परा को आगे बढ़ाया था। उनके कई शिष्य देश-विदेश में तबला बजा रहे हैं। लच्छू महाराज बेहद सादगी पसंद व्यक्ति थे, यही कारण था कि उन्होंने कभी कोई सम्मान ग्रहण नहीं किया।

लच्छू महाराज का जन्म उत्तर प्रदेश की प्रसिद्ध नगरी बनारस में 16 अक्टूबर, सन 1944 में हुआ और वे वहीं पले-बढ़े। इनके पिता का नाम वासुदेव महाराज था। लच्छू महाराज बारह भाई-बहनों में चौथे थे।
एक फ़्राँसीसी महिला टीना से लच्छू महाराज ने विवाह किया था। उनकी एक पुत्री है, जो स्विट्जरलैण्ड में है।
पूरी दुनिया में अपनी पेशेवर प्रस्तुति के अलावा लच्छू जी ने कई बॉलीवुड फ़िल्मों के लिए भी तबला बजाया।
लच्छू महाराज के वादन की विशेषता थी कि उनके पिता वासुदेव महाराज ने विभिन्न घरानों के तबला वादकों की देखभाल करते हुए उनके घरानों की शेष वंदिशों को संग्रहित कर लच्छू महाराज को प्रदान किया।
लच्छू महाराज ने अपने विकट अभ्यास के ज़रिये स्वतंत्र तबला वादक एवं संगत दोनों में ख्याति प्राप्त की। आप गायन, वादन एवं नृत्य तीनों की संगत में निपुण थे।
लच्छू महाराज एक स्वाभिमानी एवं पारंपरिक कलाकार थे, जिन्होंने छोटे मोटे स्वार्थों के लिए कोई भी गलत समझौते नहीं किये।
हिन्दी फ़िल्मों के प्रसिद्ध अभिनेता गोविन्दा लच्छू महाराज के भांजे हैं। उन्होंने बचपन में ही लच्छू महाराज को अपना गुरु मान लिया था। गोविन्दा ने तबला बजाना लच्छू महाराज से ही सीखा। लच्छू महाराज जब कभी भी मुम्बई जाते तो गोविन्दा के घर पर ही रुकते थे।
सन 1972 में भारत सरकार की ओर से लच्छू महाराज ने 27 देशों का दौरा किया था। 1972 में ही केंद्र सरकार की ओर से उन्हें 'पद्मश्री' से सम्मानित करने का प्रस्ताव किया गया था, किंतु उन्‍होंने 'पद्मश्री' लेने से मना कर दि‍या। वे कहते थे- "श्रोताओं की वाह और तालि‍यों की गड़गड़ाहट ही कलाकार का पुरस्‍कार होता है।"
लच्छू महाराज का निधन 27 जुलाई, 2016 को हुआ था। उनकी अंतिम संस्कार बनारस के मणिकर्णिका घाट पर किया गया।
फ़िल्मी सितारे गोविन्दा ने लच्छू महाराज के निधन पर लिखा कि- "पंडित लच्छू महाराज का निधन भारतीय शास्त्री संगीत की दुनिया के लिए बहुत बडी क्षति है। वह लब्ध प्रतिष्ठित तबला वादक थे।" कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने उन्हें तबला के सिरमौरों में एक बताया और उनके शोक संतप्त परिवार के प्रति अपनी संवेदना व्यक्त की। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भी लच्छू महाराज के निधन पर दु:ख प्रकट किया। प्रसिद्ध ठुमरी गायिका गिरिजा देवी ने भी लच्छू महाराज के निधन पर शोक जताया और कहा कि ऐसे कलाकार हमेशा पैदा नहीं होते।

नरींदर चंचल

नरेंद्र चंचल
प्रसिद्धि भजन गायक मातेश्वरी भगत
🎂जन्म 16 अक्टूबर, 1940
जन्म भूमि अमृतसर, पंजाब
⚰️मृत्यु 22 जनवरी, 2021
मृत्यु स्थान दिल्ली

अभिभावक माता- कैलाशवती
पिता- चेतराम खरबंदा

पति/पत्नी नम्रता चंचल
संतान दो बेटे, एक बेटी
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र गायकी
मुख्य फ़िल्में बॉबी, बेनाम, रोटी कपड़ा और मकान, आशा तथा अवतार आदि।
प्रसिद्धि भजन गायक
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी राजेश खन्ना और शबाना आज़मी अभिनीत फिल्म 'अवतार' में महेंद्र कपूर और आशा भोंसले के साथ नरेंद्र चंचल का गाया गीत 'चलो बुलाया आया है माता ने बुलाया है' माता की बेहद प्रसिद्ध भेंटों में शु्मार है। मुख्य रूप से उन्हें माता के भजन गायक के रूप में जाना जाता था। नरेंद्र चंचल ने बहुत-से भजन और हिंदी फिल्म में गीत गाए थे। उनके गीत के बिना हर दुर्गा पूजा अधूरी होती थी। पूरे उत्तर भारत में उनका बड़ा नाम था। नरेंद्र चंचल की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने अमिताभ बच्चन से लेकर शोमैन राज कपूर की फिल्मों के लिए भी गाने गाए। फ़िल्म 'बेनाम' आदि में।
चंचल अपनी माता की वजह से नरेंद्र चंचल की भजनों में रुचि बढ़ी थी। उन्होंने बचपन से ही अपनी मां को माता रानी के भजन गाते सुना था। नरेंद्र चंचल अपनी पहली गुरु अपनी मां को माना करते थे। इसके बाद उन्होंने प्रेम त्रिखा से संगीत सीखा। फिर वह भजन गाने लगे। नरेंद्र चंचल ने 'मिडनाइट सिंगर' नामक एक बायोग्राफी भी जारी की, जो उनके जीवन, संघर्षों और कठिनाइयों को बताती है।

नरेंद्र चंचल ने सालों साल के संघर्ष के बाद 1973 में फिल्म 'बॉबी' के लिए बॉलीवुड गीत 'बेशर्क मंदिर मस्जिद' गाया और फिल्मफेयर बेस्ट मेल प्लेबैक अवार्ड अपने नाम किया। इतना ही नहीं, उन्होंने 'रोटी कपडा और मकान' जैसी बड़ी फ़िल्म के लिए भी गाने गए। उन्होंने भक्ति गीतों की दुनिया में अपनी एक अनोखी पहचान बनाई। नरेंद्र चंचल ने अमेरिकी राज्य जॉर्जिया की नागरिकता भी प्राप्त कर ली थी।
🌹लोकप्रियता🌹
नरेंद्र चंचल पिछले कई दशकों से कीर्तन और जगरातों की दुनिया में सक्रिय थे। उन्होंने राज कपूर की फिल्म 'बॉबी' में 'बेशक मंदिर मस्जिद तोड़ो' गाना गाया। ये गाना आज भी लोगों की जुबान पर रहता है। इस गाने से उन्हें पहचान मिली।
नरेंद्र चंचल ने 1974 में 'बेनाम' फिल्म में 'मैं बेनाम हो गया' गीत गाया। 1974 में ही उन्होंने 'रोटी कपड़ा और मकान' में 'बाकी कुछ बचा तो महंगाई मार गई' गाने को आवाज दी।

फिल्म 'आशा' (1980) में नरेंद्र चंचल ने 'तूने मुझे बुलाया' गीत गाया, जो काफी हिट हुआ था। इसके बाद 1983 में फिल्म 'अवतार' के लिए उन्होंने भजन 'चलो बुलावा आया है' गाया। ये शबाना आज़मी और राजेश खन्ना पर फिल्माया गया था। यह गाना भी बेहद लोकप्रिय हुआ। इसकी लोकप्रियता आज भी बरकरार है। इसके अलावा उन्होंने 1985 में फिल्म 'काला सूरज' के लिए 'दो घूंट पिला दे' और 1994 में फिल्म 'अनजाने' के लिए 'हुए हैं कुछ ऐसे वो हमसे पराए' गीत गाया।

कोरोना पर भजन 

मार्च 2020 में नरेंद्र चंचल का एक वीडियो वायरल हुआ। इसमें वे मां दुर्गा का एक भजन गाते दिखे थे। इसमें उन्होंने कोरोना का भी जिक्र किया था। नरेंद्र चंचल द्वारा जगराते में गाया गया उनका वीडियो लोगों के बीच काफी पॉपुलर हुआ। इसमें उन्होंने गाया कि "डेंगू भी आया और स्वाइन फ्लू भी आया, चिकन गोनिया ने शोर मचाया, कित्थे आया कोरोना?"

मृत्यु
भजन सम्राट नरेंद्र चंचल का दिल्ली के अपोलो अस्पताल में 22 जनवरी, 2021 को निधन हुआ। वह 80 साल के थे। नरेंद्र चंचल पिछले तीन महीने से बीमार थे और उनका इलाज चल रहा था। अस्पताल प्रशासन के मुताबिक़, शुक्रवार के दिन दोपहर करीब 12.30 पर उन्होंने अंतिम सांस ली। गायक नरेंद्र चंचल के ब्रेन में क्लोटिंग थी।

पीएम नरेंद्र मोदी ने भी उनके निधन पर दु:ख जताया। उन्होंने लिखा- "लोकप्रिय भजन गायक नरेंद्र चंचल जी के निधन के समाचार से अत्यंत दु:ख हुआ है। उन्होंने भजन गायन की दुनिया में अपनी ओजपूर्ण आवाज से विशिष्ट पहचान बनाई। शोक की इस घड़ी में मेरी संवेदनाएं उनके परिजनों और प्रशंसकों के साथ हैं। ओम् शांति"।

मेने अपने कनाडा प्रवास के दौरान नरेंद्र चंचल के निधन पर शोक व्यक्त किया। और लिखा- "ये जानकर बहुत दु:ख हुआ कि प्रतिष्ठित और सबसे ज्यादा प्यारे नरेंद्र चंचल हमें छोड़कर चले गए। उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना। उनके परिवार के प्रति हार्दिक संवेदना"।

विश्व गुरु

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