मंगलवार, 4 जुलाई 2023

रामलाल

⚰️4 जुलाई 2007 में रामलाल का निधन हो गया लगभग भुला दिये गये संगीतकार बांसुरी वादक,शहनाई वादक रामलाल की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि
रामलाल बांसुरी और शहनाई वादन के कारण फिल्म संगीतकार बनने से पहले ही प्रसिद्ध हो गए थे। झांसी की रानी, मुगले आजम, नवरंग जैसी कई फिल्मों में शहनाई-बांसुरी बजाने वाले रामलाल ने ही रानी रूपमती के प्रसिद्ध गीत, ‘आ लौट के आ जा मेरे मीत’ में शहनाई वादन किया था। रामलाल सन 1944 में बंबई आकर पृथ्वी थिएटर्स में संगीतकार राम गांगुली के सहायक रहे। आग के कई गीतों में रामलाल की बजाई बांसुरी गूंजी थी। ‘जिंदा हूं इस तरह’ में उन्होंने पहली बार किसी फिल्मी गीत के लिए बांसुरी बजाई। व्ही. शांताराम ने उन्हें 200 रुपये महीने के पारिश्रमिक पर अपने यहां नियुक्त कर लिया। रामलाल ने शांताराम की सभी फिल्मों में बांसुरी और शहनाई वादन किया। शिवराम, वसंत देसाई, नौशाद, सी. रामचंद्र, आर.सी. बोराल, गुलाम मोहम्मद जैसे कितने संगीतकारों के साथ उन्होंने वादन किया। गूंज उठी शहनाई में बिस्मिल्ला खां से कहीं अधिक उनकी शहनाई बजी थी।

फिल्मों में संगीत देने का सिलसिला उन्होंने संतोषी की राज कपूर, वैजयंतीमाला अभिनीत तांगावाला (1950) से शुरू किया पर यह फिल्म रिलीज नहीं हुई। संगीत-समीक्षक योगेश यादव के अनुसार एक कान में हीरा दूसरे में पन्ना पहनने के कारण रामलाल अपने नाम के साथ-साथ ‘हीरा-पन्ना’ भी लगाते थे। नकाबपोश (1956) और शकीला-महीपाल अभिनीत हुस्नबानो (1956) में संगीतकार के रूप में उनका नाम आया। दरअसल, अप्रदर्शित तांगावाला के गीतों को ही रामलाल ने हुस्नबानो में फिर इस्तेमाल किया था। लता के गाए ‘प्यार करने का आया बहाना’ को लोकप्रियता मिली थी। यह फिल्म कानपुर में 28 हफ्ते चली थी। पर सुधा मल्होत्रा के ‘हम तुम्हारे हैं तलबगार तुम्हें क्या मालूम’, आशा के ‘या नबी सलाम अलैका’ या ‘मुझसे नजरें मिलाना संभाल के’ जैसे गीत असर पैदा करने में विफल रहे। इसी प्रकार धूमी खान के साथ संगीतबद्ध नकाबपोश (1956) के अरबी ऑर्केस्ट्रेशन वाले ‘ओ रे दिलवाले’ (आशा) और हसरत जयपुरी लिखित ‘ऐ रात तेरे साथी हैं चांद और तारे’ (आशा) को खास सफलता नहीं मिली। रामलाल हीरा-पन्ना की संगीतबद्ध बाबूभाई मिस्त्री निर्देशित नागलोक (1957) के ‘जो सबको नचाए’ (लता, साथी), ‘ये अबला करे पुकार’ (लता), ‘चंद्रनाथ नाथ भोले’ (आशा, रफी, साथी), ‘चाहे विधाता बैर निकाले’ (आशा), ‘घर आग सती के लागी’ (आशा) जैसे धार्मिक गीतों को तात्कालिक लोकप्रियता ही मिल पाई। बाबू भाई मिस्त्री की ही माया मच्छेंद्र (1960) में पुन: रामलाल हीरा-पन्ना को संगीतकार लिया गया था। इस फिल्म में लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल उनके सहायक थे! फिल्म में महेंद्र कपूर के गाए ‘यह वह धरती है जहां भगवान मिले’ में चारों धामों के वर्णन, लता के गाए उतार-चढ़ाव वाले गीत, ‘आया रे आया रे मेरे मन का चांद’, ‘जब से नैना ये लड़े हैं’, ‘रुन झुन पायल झनके’ (रफी के साथ), ‘जादू नगरी से नहीं जाना हो रसिया’ (उषा मंगेशकर के साथ) गीत लोकप्रिय नहीं हो सके थे। रामलाल एक ही टेक में गीत रेकॉर्ड करा लेते थे। ‘जब से नैना ये लड़े’ ऐसा ही गीत है।

रामलाल की यादगार फिल्मों में रहीं, व्ही. शांताराम की सेहरा (1963) और गीत गाया पत्थरों ने (1964)। यह रामलाल की अंदरूनी संगीत-प्रतिभा का ही कमाल था कि विफलताओं के बावजूद व्ही. शांताराम ने अपनी फिल्म के लिए उन्हें चुना। सेहरा के सभी गीतों के शब्द धुनों के बाद लिखे गए। सेहरा (1963) के ‘पंख होते तो उड़ आती रे’ (लता) से रामलाल अमर हो गए। राग भूपाली के ऊंचे सुरों के इस गीत की गिनती लता के सर्वश्रेष्ठ गीतों में होती है। गीत का प्रारंभ ही आलाप के अद्भुत नियंत्रण से होता है। पूरे गीत में समय-समय पर आलाप और इंटरल्यूड्स में जलतरंग का बेहतरीन उपयोग रामलाल ने किया था। एक ओर भूपाली के बेजोड़ आलाप रूप सुर थे तो दूसरी ओर राग देस में सुरों का उतार-चढ़ाव और हवाईयन (हवाई द्वीप) गिटार के साथ ‘तकदीर का फसाना जाकर किसे सुनाएं’ (लता, रफी) शिद्दत से मन-मस्तिष्क में फैल जाता है। वहीं तीसरी ओर मारू विहाग बड़ी नाजुक-सी रूमानियत के साथ ‘तुम तो प्यार हो सजना’ (लता, रफी) में सदाबहार हो गई है। यदि एक तरफ हेमंत कुमार के स्वर में ‘न घर तेरा न घर मेरा’ की पंक्तियां गहराती चलती हैं तो दूसरी ओर ‘हम हैं नशे में’ (आशा, साथी) के साथ आशा का खुमार मदहोश करता जाता है। शोखी भरे सुरों के साथ ‘जा जा जा रे तुझे हम जान गए’ में लता और रफी के साथ हम सभी झूम उठते हैं। सेहरा इस दशक की बेहतरीन संगीतमय उपलब्धि थी।
सेहरा की सफलता से प्रभावित होकर गीत गाया पत्थरों ने (1964) में शांताराम पुन: रामलाल को लेकर आए और रामलाल ने अपना सिक्का जमा दिया। फिल्म के शीर्षक गीत को राग दुर्गा में कंपोज कर उन्होंने प्रसिद्ध शास्त्रीय गायिका किशोरी अमोणकर से गवाया। इसी गीत को आशा, महेंद्र के स्वरों में भी कंपोज किया। गीत के दोनों वर्जन लोकप्रिय हुए। गूंजते सुरों का प्रभाव पैदा करते, ‘तेरे खयालों में हम’ (आशा) के बोल मेघ मल्हार में भी रामलाल ने बड़ी कुशलता से संवारे थे। इस गीत के अंतरे में भैरव का स्पर्श डालकर रामलाल ने इसे सुंदर रचना बना दिया। फिल्म की विशिष्ट उपलब्धि थी सी.एच. आत्मा से गवाए दो गीत, ‘मंडवे तले गरीब के’ और ‘एक पल को मिला है।’ खमाज आधारित ‘रात नौजवां झूमता समां’ (आशा), ‘जाने वाले ओ मेरे प्यार’ (आशा) और लंबा गीत ‘आइए पधारिए’ (आशा, महेंद्र, साथी) और इस जैसे अन्य कर्णप्रिय गीतों के साथ गीत गाया पत्थरों ने का संगीत सराहा गया और लोकप्रिय भी रहा। विडंबना है कि इसके बावजूद किसी अन्य निर्माता ने रामलाल को संगीतकार के रूप में मौका नहीं दिया। रामलाल ने कन्नड़ फिल्मों में रामलाल ‘सेहरा’ नाम से बलुआ प्रपन्नय मजोड़ी, दाहा और डोमरा कृष्णा में संगीत दिया और एस. जानकी, येसुदास और एस.पी. बाला सुब्रह्मण्यम से गीत गवाए थे। रामलाल को महाराष्ट्र सरकार से सात सौ रुपये मासिक पेंशन मिलती थी। कोलाबा जैसे धनाढ्य इलाके में रहने वाले रामलाल को अंतिम समय खोली में गुजारना पड़ा।

⚰️4 जुलाई 2007 में रामलाल का निधन हो गया

कोदुरी मार्कटामणि कीरवानी, एम एम क्रेम

प्रसिद्ध संगीतकार गायक के जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामनाएं

कोदुरी मार्कटामणि कीरवानी जिन्‍हें एम एम क्रेम के नाम से जाना जाता है। एक भारतीय म्‍यूजिक कम्‍पोज़र और प्‍लेबैक सिंगर हैं। जिन्‍होंने अब तक कई तेलगू तमिल कन्‍नड़ मलयालम और हिंदी फिल्‍मों में काम किया है।
उनका जन्‍म 4 जुलाई 1961 को आंध्रप्रदेश के पश्चिमी गोदावरी जिले में हुआ था।

करियर:

केरावनी ने पहली बार 1987 में प्रसिद्ध संगीतकार के चक्रवर्ती के साथ एक सहायक संगीत निर्देशक के रूप में अपने करियर की शुरुआत की। उन्होंने 1980 के दशक के अंत में कलेगोर्गरी अब्बाई और भरतमालो अर्जुनुडु जैसी फिल्मों में सहायता की। इस समय के दौरान, उन्होंने एक वर्ष के लिए अनुभवी गीतकार वेटुरी से मार्गदर्शन भी लिया। हालांकि, यह राम गोपाल वर्मा की ब्लॉकबस्टर फिल्म क्षनाशनम (1991) थी जिसने केरावनी को एक अच्‍छे संगीत निर्देशक के रूप में स्थापित किया। इस फिल्म के सभी गाने चार्टबस्टर बन गए और केरावनी को पूरे दक्षिण भारतीय फिल्म उद्योगों से प्रस्‍ताव आने लगे।

उनकी पहली प्रमुख हिंदी फिल्म क्रिमिनल थी। उन्हें तेलुगु फिल्म उद्योग में अन्नमय्या जैसी हिट फिल्‍म मे उनके पार्श्व गायन के लिए जाना जाता है, उन्होंने हिंदी फिल्मों के लिए संगीत की रचना की है जैसे कि रात की सुबह नहीं (1996), सुर - द मेलोडी ऑफ लाइफ, ज़ख्म, साया, जिस्म, क्रिमिनल, रोग और पहेली। मलयालम में, उन्होंने नीलगिरी (1991), सूर्या मनसम (1992) और देवारागम (1996) जैसी फिल्मों के काम किया है।

पुरस्‍कार:

1997 में, उन्हें तेलुगु फिल्म अन्नामय्या में सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशन के लिये राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया उन्होंने 8 फिल्मफेयर पुरस्कार, ग्यारह राज्य नंदी पुरस्कार और एक तमिलनाडु राज्य फिल्म पुरस्कार जीता

नीना गुप्ता

🎂जन्म 4 जुलाई1959🎂

नीना गुप्ता (जन्म: 4 जुलाई 1959) हिंदी फ़िल्मों की एक अभिनेत्री टीवी कलाकार और फिल्म डायरेक्टर  तथा प्रोड्यूसर हैं।उन्हें वर्ष 1990 में फ़िल्म "वो छोकरी' के लिये बेस्ट सपोर्टिंग अभिनेत्री का फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार मिला। वे अस्सी के दशक में प्रसिद्ध क्रिकेटर विवियन रिचर्ड्स के साथ अपने प्रेम संबंधों के कारण काफ़ी चर्चा में रहीं; और 1989 में उन्होंने विवियन से बिना विवाह किये बेटी मसाबा को जन्म दिया।

*फ़िल्म अभिनेत्री निर्मात्री,निर्देशिका नीना गुप्ता के जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामनाएं*

नीना गुप्ता हिंदी सिनेमा जगत  की एक सफल अभिनेत्री, टीवी कलाकार और फिल्म निर्देशक और निर्माता है।
नीना गुप्ता का जन्म 4 जून 1959 दिल्ली में हुआ था। उनके पिता का नाम आर एन गुप्ता है। नीना गुप्ता ने अपनी आरम्भिक पढ़ाई सनावर लौरेंस स्कूल में शिक्षा ग्रहण की।  

नीना गुप्ता  वेस्ट इण्डीज के प्रसिद्द क्रिकेट खिलाडी विवियन रिचर्ड्स से सम्बन्ध थे, जिससे उन्हें एक बेटी भी है, जिसका नाम है मसाबा गुप्ता। वर्तमान में मसाबा गुप्ता जानी-मानी फैशन डिजायनर है। एक लम्बे अन्तराल के बाद नीना ने वर्ष2008 मे पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट विवेक मेहरा से शादी कर ली।

नीना गुप्ता को टीवी की दुनिया में  सबसे बड़ा ब्रेक वर्ष 1985 में टीवी शो "खानदान" से मिला था, जिसके बाद उन्होंने यात्रा(1986) गुलजार मिर्जा साहिब ग़ालिब(1987), टीवी मिनी सीरिज आदि की।  इसके अलावा उन्होंने दर्द (1994 डीडी मेट्रो), गुमराह (1 995 डीडी मेट्रो), सांस (स्टार प्लस), सात फेरे:सलोनी का सफार (2005),चिट्ठी(2003), मेरी बिवी का जवाब नहीं (2004), और कितनी मोहब्बत है (2009) में काम किया।  इसकेअलावा वह जस्सी जैसा कोई नहीं में भी नजर आयीं, इस शो में उनके किरदार को लोगो द्वारा काफी पसंद किया गया था। 

नीना ने अपने हिंदी फिल्मी करियर की शुरुआत वर्ष 1982 में फिल्म 'ये नजदीकियां' से की थी, इसके बाद वह कई अन्य हिंदी फिल्मों में नजर आयीं , जिनमे साथ-साथ ,जाने भी दो यारों, मंडी, त्रिकाल आदि शामिल हैं। इसके अलावा वह हिंदी सिनेमा के प्रसिद्ध गाने "चोली के पीछे क्या है"  के लिए जानी जाती हैं। उन्होंने टेलीफिल्म्स लाजवंती और बाज़ार सीताराम (1993) निर्मित की हैं, जिसमे उन्हेंबेस्ट फर्स्ट गैर फीचर फिल्म के लिए 1993 में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

नीना गुप्ता ने कई अंतरराष्ट्रीय फिल्मों में काम किया है, जिनमे से गांधी(1982) हैं, इसमें उन्होंने महात्मा गांधी की भतीजी का किरदार निभाया था, इसके अलावा वह मर्चेंट आइवरी फिल्म द डीसीवर (1988), मिर्जा गालिब (1989) इन कस्टडी (1993), और कॉटन मैरी (1999) भी शामिल है।

🎂जन्म 4 जुलाई 1959
वर्ष।            फ़िल्म

वर्ष।         फ़िल्म

2018      बधाई हो 
2018           मुल्क 
2005          नज़र 
2004      मेरी बीवी का जवाब नहीं
1997      उफ़ ! ये मोहब्बत
1995       दुश्मनी 
1994       वो छोकरी 
1994         जज़बात 
1993      सूरज का सातवाँ घोड़ा 
1993        इन कस्टडी 
1993         अंत 
1993        खलनायक
1992         कल की आवाज़ 
1992          अंगार 
1992         बलवान 
1992      ज़ुल्म की अदालत 
1992        य़लगार 
1991         आधि मिमांसा 
1990           दृष्टि 
1990।        स्वर्ग 
1989        डैडी 
1989         बटवारा 
1988            रिहाई 
1988        भारत एक खोज 
1985          त्रिकाल 
1984           उत्सव 
1984।           लैला 
1983           जाने भी दो यारों
1983            मंडी 
1982।           साथ साथ 
1982।          ये नज़दीकियाँ 
1981         आदत से मजबूर

जोगिंद्र शैली

जोगिंदर शैली एक भारतीय 
जोगिंदर शैली
जोगिंदर शैली के अन्य नाम: जोगिंदर सिंह
अभिनेता हिंदी    

जोगिंदर शैली हिंदी अभिनेता

🎂जन्मतिथि: 04-07-1949

⚰️मृत्यु तिथि: 15-06-2009

» लेखक» निदेशक» अभिनेता

जोगिंदर शैली एक भारतीय निर्देशक, लेखक, गायक, निर्माता और अभिनेता थे। वह एक गीतकार और वितरक भी थे। उन्होंने रंगा कुश और बिंदिया और बंदूक नामक दो ब्लॉकबस्टर हिंदी फिल्मों का निर्माण और निर्देशन किया। जोगिंदर का जन्म 4 जुलाई 1949 को पंजाब के खानेवाल में हुआ था। उन्होंने अपने काम की नकल करने के लिए फिल्म शोले के निर्माताओं के खिलाफ साहित्यिक चोरी का मुकदमा जीता। रंगा कुश का किरदार फिल्म शोले में गब्बर सिंह के किरदार से मिलता जुलता था।

उन्होंने बहुत सारी फिल्मों का निर्माण और निर्देशन किया। उनकी ज्यादातर फिल्मों को बॉक्स ऑफिस पर कोई पहचान नहीं मिली. यहां तक ​​कि उन्हें सबसे खराब निर्देशकों की सूची में भी रखा गया था. जोगिंदर ने कई खराब कलाकारों वाली फिल्मों का निर्देशन और निर्माण किया। उनकी अधिकांश फिल्में खराब तरीके से बनाई और निर्देशित की गईं, जिनमें असमान कलाकार, अजीब संवाद और खराब कथानक तत्व शामिल थे। जब उन्होंने फिल्म बिंदिया और बंदूक का निर्देशन और निर्माण किया तो उन्हें सफलता मिली। बिंदिया और बंदूक और रंगा कुश की सफलता के बाद जोगिंदर ने फिल्म बिंदिया और बंदूक का सीक्वल बनाने का फैसला किया।

यह फिल्म जेपी दत्ता की एलओसी पर रिलीज हुई थी। फिल्म बुरी तरह असफल रही और बॉक्स ऑफिस पर ज्यादा सफलता नहीं कमा पाई, हालांकि उन्होंने फिल्म में मैं हूं बॉटल बैंड शराब नाम का एक हिट गाना दिया। उसके बाद, जोगिंदर कभी बड़े पर्दे पर नहीं लौटे और छोटे बजट की फिल्मों और पंजाबी टीवी धारावाहिकों का निर्माण और अभिनय किया। उनकी फिल्म, रंगा कुश को बार-बार संसद भवन में प्रदर्शित किया गया। जोगिंदर एक प्रशिक्षित पायलट भी थे। अभिनेता बनने से पहले वह इंदिरा गांधी के साथ काम करते थे। जोगिंदर ने कई फिल्मों में काम किया है।

उनके उल्लेखनीय कार्यों में खूनी तांत्रिक, मेरी जंग का एलान, गंगा और रंगा, कौन करे कुर्बानी, द रिवेंज: गीता मेरा नाम, जागो हुआ सवेरा और कई अन्य फिल्में शामिल हैं। जोगिंदर किडनी और लीवर की समस्याओं से पीड़ित थे और 15 जून 2009 को उनकी मृत्यु हो गई। उनके दो बेटे, एक बेटी और एक पत्नी जीवित हैं।
जोगिंदर शैली एक शानदार निर्देशक थे जिन्हें बी और सी ग्रेड फिल्मों का राजा कहा जाता था। एक कर्णधार होने के अलावा, उन्होंने एक अभिनेता, निर्माता, लेखक और वितरक के रूप में भी काम किया। व्यावसायिक रूप से सफल फिल्म निर्माता को मुख्य रूप से बिंदिया और बंदूक, बिंदिया और बंदूक पार्ट II और रंगा खुश के लिए जाना जाता है। 4 जुलाई 1949 को शैली का जन्म खानेवाल, पंजाब (वर्तमान में पाकिस्तान) में हुआ था। उनके अपने शब्दों में, उन्होंने फिल्म उद्योग में कदम रखने से पहले इंदिरा गांधी के लिए पायलट के रूप में काम किया था। उन्होंने 1960 की फिल्म हम हिंदुस्तानी और हीर रांझा, पूरब और पश्चिम, बचपन, हंगामा, वफ़ा आदि जैसी अन्य फिल्मों से एक अभिनेता के रूप में शुरुआत की। शेली को बड़ा ब्रेक फिल्म बिंदिया और बंदूक से मिला, जहां उन्होंने डाकू रंगा का किरदार निभाया। फिल्म और उनका किरदार दोनों सुपर-हिट थे, जिसमें बच्चे रंगा की पागल हंसी और आंखें घुमाने की नकल करते थे। उपरोक्त फिल्म में दो शब्दों के संवाद के कारण जोगिंदर ने रंगा खुश नामक एक और फिल्म का निर्माण किया, जिसमें उन्होंने रंगा की भूमिका निभाई। बाद में उन्होंने बिंदिया और बंदूक का सीक्वल बिंदिया और बंदूक पार्ट II निर्देशित किया। फिल्म ने अपने हिट गाने 'मैं हूं बॉटल बैंड' से ध्यान खींचा। जोगिंदर ने पंडित और पठान, फौजी, प्यासा शैतान, कसम दुर्गा की जैसी अन्य फिल्मों की पटकथा, निर्देशन और अभिनय किया। उन्होंने सन ऑफ ड्रैकुला, भोजपुरी फिल्म हम तो हो गई नी तोहार, जंगल और मेरी गंगा की सौगंध जैसी फिल्मों में काम किया। प्यासा शैतान, कसम दुर्गा की। उन्होंने सन ऑफ ड्रैकुला, भोजपुरी फिल्म हम तो हो गई नी तोहार, जंगल और मेरी गंगा की सौगंध जैसी फिल्मों में काम किया। प्यासा शैतान, कसम दुर्गा की। उन्होंने सन ऑफ ड्रैकुला, भोजपुरी फिल्म हम तो हो गई नी तोहार, जंगल और मेरी गंगा की सौगंध जैसी फिल्मों में काम किया।

अन्य अभिनय क्रेडिट में डुप्लिकेट शोले, जीने नहीं दूंगी, कौन करेगा इंसाफ, मेमसाब नंबर 1, महारानी, ​​एक लुटेरा, बिंदिया मांगे बंदूक, जंगल टार्ज़न आदि शामिल हैं। उन्होंने भाई ठाकुर में लाखन सिंह, मेरी जंग का एलान में ठाकुर दिलावर सिंह और द रिवेंज: गीता मेरा नाम में शैतान सिंह की भूमिका निभाई। 2000 की फिल्म मीता दे बिंदिया उठा दे बंदूक में उन्होंने डाकू जग्गावर का किरदार निभाया था। उन्होंने गंगा और रंगा में रंगा, इंसानियत के देवता में तिलकधारी और पुलिस और मुजरिम में जग्गा की भूमिका निभाई। उनके निर्देशन में बिंदिया और बंदूक पार्ट II, बिंदिया मांगे बंदूक, ये हैं बस्ती बदमाशों की, हिंद की बेटी, गंगा और रंगा और आदमखोर शामिल हैं।

उन्होंने वो फिर नहीं आए, तीन एक्के, श्यामला, यारी जिंदाबाद आदि जैसी अन्य फिल्मों का भी निर्देशन किया। शैली ने टेलीविजन श्रृंखलाओं में अभिनय किया।हातिम ताई, ज़िम्बो,मिर्ज़ा ग़ालिब: द प्लेफुल म्यूज़, और फिर वही आवाज़ दो। जोगिंदर शैली 15 जून 2009 को जुहू, मुंबई में लीवर और किडनी की बीमारी के कारण इस दुनिया को छोड़कर चले गए। बहुमुखी अभिनेता के रूप में उनकी बेटी और दो बेटे जीवित हैं।

गायिका श्रद्धा पंडित

श्रद्धा पंडित हिंदी अभिनेत्री
🎂जन्मतिथि: 04-07-1982
»🎤 पार्श्व गायिका

जन्म नाम
श्रद्धा पंडित
के रूप में भी जाना जाता है
सपा
जन्म
4 जुलाई 1982 (उम्र 40)
मुंबई , महाराष्ट्र , भारत
मूल
भारतीय
शैलियां
भारतीय शास्त्रीय संगीत , पार्श्व गायक , पॉप और बॉलीवुड
व्यवसाय
गायक, गीतकार
उपकरण
गायक
सक्रिय वर्ष
1996-वर्तमान

श्रद्धा मुंबई में पली बढ़ीं और प्रचलित वाद्ययंत्रवादियों, गायकों, संगीत रचनाकारों और कलाकारों के एक बड़े परिवार से हैं। उन्होंने अपने दादा, संगीत आचार्य पूर्व श्री से हिंदुस्तानी पारंपरिक मेलोडी का अध्ययन किया है
पंडित प्रताप नारायण. श्रद्धा ने कई उत्पादक संगीत संगीतकारों के लिए गाया हैअमित त्रिवेदी, सलीम-सुलेमान, एआर रहमान, बादशाह, और कई अन्य। उनकी सर्वकालिक सफलताएँ हैं "जिगर दा टुकड़ा", "ऐ शिवानी", "रंग दीनी", "रब राखा", "मनचंद्रे नू", और "बैंड बाजा बारात"। उनकी नवीनतम हिट आज रात का सीन और पानी वाला डांस हैं। श्रद्धा ने 2008 में सोनी म्यूजिक से तेरी हीर नामक एक रिकॉर्ड भी प्रकाशित किया है, जहां उन्होंने गीत लिखे और सभी ट्रैक खुद लिखे। उनके दो भाई-बहनों का बॉलीवुड व्यवसाय में समृद्ध व्यवसाय है, जहां उनकी बहन,श्वेता पंडितएक प्रसिद्ध पार्श्व गायक और उनके भाई भी हैंयश पंडितएक फिल्म और टीवी स्टार हैं.

बॉलीवुड गीत निर्माण में श्रद्धा की शुरुआत एक बाल कलाकार के रूप में फिल्म खामोशी के गीत "मौसम के सरगम" से हुई, जिससे उन्हें वर्ष 1998 में तुरंत प्रसिद्धि मिली और उनकी समृद्ध यात्रा आज तक जारी है। एक पार्श्व एकल कलाकार का जीवन ऐसा ही होता है! यदि आपको कोई ऐसी धुन नहीं मिलती जो आपको विशिष्ट बनाती है, तो आप पर कभी ध्यान नहीं दिया जाता। कोई नहीं देखता कि आप कौन हैं और आप कितने विविध तरीकों से गुनगुना सकते हैं। ख़ुशी है कि उन्हें सलीम-सुलेमान के साथ काम करने का मौका मिला और उन्होंने उनके साथ लगभग 80-100 प्रस्तुतियाँ की हैं। विचार यह था कि प्रदर्शन में राग को बहुत भारतीय और आधुनिक बनाया जाए। सलीम-सुलेमान ने केवल 15 मिनट में गाना तैयार किया। आम तौर पर, आइटम गानों के साथ, यह माना जाता है कि आप खुद को एक निश्चित रूपरेखा के भीतर रखते हैं, दर्शकों का ध्यान खींचने के लिए सामान्य हथकंडे अपनाते हैं, आदि।

लेकिन अइयो जी के साथ, वह अपनी आवाज़ को नियंत्रित करने, हरकतें करने और बनारस घराने का प्रतीक बनने में सक्षम थीं। गायिका को उम्मीद है कि यह धुन उन रचनाकारों के लिए एक चेतावनी होगी, जिन्हें लगता है कि वह केवल एक विशिष्ट तरीके से ही इसका जाप कर सकती हैं। जब वह बहुत छोटी थीं, तब उन्होंने उस्ताद ज़ाकिर हुसैन द्वारा लिखित साज़ के लिए गाना गाया था। यहीं पर सलीम ने उनकी प्रतिभा को देखा। भाइयों ने उसकी क्षमता पर भरोसा किया था और एन्कोडिंग और संगीत निर्माण के क्रम को भी समझाया था। उन्होंने कुछ साल पहले उसके एल्बम को भी आकार दिया था। चूंकि उनकी परवरिश पूरी तरह से शास्त्रीय रही है, लेकिन किसी तरह उन्हें तब तक नजरअंदाज किया जाता रहा जब तक कि सलीम-सुलेमान और एआर रहमान ने उनके काम को पहचान नहीं ली।

वीणा ताजौर सुलतान

वीणा ताजौर सुलतान
🎂जन्म04 जुलाई 1926
क़्वेटा, बलूचिस्तान, ब्रितानी भारत
(अभी पाकिस्तान)
मौत
⚰️14 नवम्बर 2004 (उम्र 78)
मुंबई, महाराष्ट्र, भारत
राष्ट्रीयता
भारतीय
पेशा
अभिनेत्री
कार्यकाल
1939–1983
संबंधी
इफ्तेखार (भाई)

वीणा के नाम से मशहूर ताजौर सुल्ताना एक खूबसूरत भारतीय अभिनेत्री हैं जिन्होंने हिंदी फिल्म उद्योग में काम किया है। 4 जुलाई, 1926 को क्वेटा, बलूचिस्तान (अब पाकिस्तान में) में जन्मी, उन्होंने 16 साल की उम्र में अपनी शुरुआत की। उनकी पहली फिल्म का नाम 'गरीब' था, जिसे वर्ष 1942 में मेहबूब खान प्रोडक्शन के तहत निर्मित किया गया था। बाद में उन्होंने 'नजमा,' 'फूल,' 'हुमायूं' सहित कई फिल्मों में अभिनय किया। ये सभी फ़िल्में विभाजन से पहले रिलीज़ हुईं और इस तरह वह विभाजन-पूर्व हिंदी और उर्दू फ़िल्मों में अपनी भूमिकाओं के लिए प्रसिद्ध हो गईं।

विभाजन से पहले उनकी आखिरी फिल्म साल 1946 में 'राजपूतानी' थी, जिसके बाद उन्होंने भारत में ही रहने का फैसला किया। बाद में उन्होंने 'चलती का नाम गाड़ी', 'कागज के फूल', 'पाकीज़ा' आदि फिल्मों में प्रमुख भूमिकाएँ निभाईं। वीना ने फिल्म 'ताजमहल' में अपनी भूमिका के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री का फिल्मफेयर पुरस्कार जीता। साल 1963. फिल्म 'के बादरजिया सुल्तानरजिया सुल्तान भारतीय इतिहास की शैली से संबंधित हैं>>और पढ़ें...रजिया सुल्तान'वर्ष 1983 में, उन्होंने फिल्म उद्योग से संन्यास ले लिया और दो दशकों से अधिक समय तक सुर्खियों से दूर एक शांत जीवन व्यतीत किया। वीना की लंबी बीमारी से पीड़ित होने के बाद 2004 में मुंबई, भारत में मृत्यु हो गई।

वीना त्रिपाठी

🎂जन्म की तारीख और समय: 4 जुलाई 1979  नई दिल्ली
पति: हेमंत टिकू (विवा. 2013)
दल: भारतीय जनता पार्टी
शिक्षा: हिंदू कॉलेज–दिल्ली विश्वविद्यालय (एचसी–डीयू)

वाणी त्रिपाठी पूर्व हिंदी अभिनेत्री और अब भाजपा की राष्ट्रीय सचिव हैं। वह वर्तमान में गोवा में आयोजित होने वाले भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (आईएफएफआई) के जूरी पैनल में हैं। इससे पहले वह साढ़े तीन महीने तक IFFI की संचालन समिति में काम कर चुकी थीं. फिलहाल उन्होंने गोवा में हो रहे IFFI के इंडियन पैनोरमा सेक्शन में तीसरी संस्कृत फीचर फिल्म 'प्रियमानसम' की स्क्रीनिंग को हरी झंडी दे दी थी, जिस पर विवाद खड़ा हो गया था. पिछले साल, आईएफएफआई की संचालन समिति के सदस्य के रूप में, उन्होंने घोषणा की थी कि फिल्म महोत्सव ब्रिटिश फिल्म निर्माता रिचर्ड एटनबरो को विशेष श्रद्धांजलि देगा, जो अपनी अकादमी-पुरस्कार विजेता फिल्म 'गांधी' के लिए जाने जाते हैं। वाणी अब सीबीएफसी बोर्ड सदस्य (सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन) भी हैं। इस साल की शुरुआत में गोविंद निहलानी के भाई पंकज निहलानी ने... सीबीएफसी के अध्यक्ष बने. वाणी अब भाजपा के वफादार हैं और उनके पास सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से जुड़े महत्वपूर्ण विभाग हैं। इससे पहले इस एक्ट्रेस ने हिंदी फिल्म 'दुश्मन' से डेब्यू किया था, जिसमें मुख्य कलाकार काजोल थीं।

बाद में, वह शाहरुख खान की दो फिल्मों जैसे "चलते चलते" और ""। जिसके बाद, उन्हें कुछ और फिल्मों जैसे 'दिल से पूछ किधर जाना है' (2006) आदि में देखा गया। फिल्मों में अभिनय के बल पर, उन्हें भाजपा में शामिल होने का मौका मिला और बाद में उन्होंने 2013 में कश्मीरी बिजनेसमैन हेमंत टिकू से शादी कर ली। यह अभिनेत्री कुछ सालों तक ही फिल्मों में सक्रिय रही और उन्होंने जैसे दिग्गज निर्देशकों के साथ काम किया।महेश भट्ट, तनुजा चंद्रन, औरकुन्दन शाह

फिल्मे
2006 दिल से पूछ...किधर जाना है आलिया हिंदी 
2004 इंतेक़म: बिल्कुल सही गेम वाणी ट्रैपथी हिंदी 
2003 चलते चलते हिंदी
2000 फिर भी दिल है हिंदुस्तानी छोटा हिंदी 
1998 दुश्मन सुननदा त्रिपाठी हिंदी 
1997 नेल प्रोफोंडो पेसे स्ट्रानियरो प्रोस्टिटुटा इंडियाना हिंदी

अमरीकी ट्रंप

ट्रंप चले थे ईरान हराने , खुद अभी बने पप्पू  राहुल बने थे शेर ट्रंप के बल , खुद मुंह के बल गिरे।  दोनों हो रह बेइज्जत दुनिया हुई...