गुरुवार, 1 जून 2023

ख़्वाजा अहमद अब्बास मुल्क़

महान फ़िल्म निर्देशक, पटकथा लेखक, निर्माता एवं पत्रकार ख्वाजा अहमद अब्बास की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि
*🎂जन्म 07जून*
*⚰️01जून*
ख़्वाजा अहमद अब्बास मुल्क़ के उन गिने चुने लेखकों में शामिल हैं जिन्होंने अपने लेखन से पूरी दुनिया को मुहब्बत, अमन और इंसानियत का पैग़ाम दिया। अब्बास ने न सिर्फ फ़िल्मों, बल्कि पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र में भी नए मुक़ाम कायम किए। तरक्क़ीपसंद तहरीक से जुड़े हुए कलमकारों और कलाकारों की फ़ेहरिस्त में ख़्वाज़ा अहमद अब्बास का नाम बहुत अदब से लिया जाता है। आज उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें खिराज़-ऐ-अक़ीदत ~ 🌷

ख्वाज़ा अहमद अब्बास का जन्म 7 जून, 1914 को हरियाणा के पानीपत में हुआ था। उनके दादा ख़्वाजा ग़ुलाम अब्बास 1857 स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख सेनानियों में से एक थे और वह पानीपत के पहले क्रांतिकारी थे, जिन्हें तत्कालीन अंग्रेज़ हुक़ूमत ने तोप के मुँह से बाँधकर शहीद किया था। इस बात का भी शायद ही बहुत कम लोगों को इल्म हो कि ख़्वाज़ा अहमद अब्बास, मशहूर और मारूफ़ शायर मौलाना अल्ताफ हुसैन हाली के परनवासे थे। यानी वतन के लिए कुछ करने का जज्बा और जोश उनके ख़ून में ही था। अदब से मुहब्बत की तालीम उन्हें विरासत में मिली थी।

ख़्वाज़ा अहमद अब्बास की शुरूआती तालीम हाली मुस्लिम हाई स्कूल में और आला तालीम अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में हुई। उनके अंदर एक रचनात्मक बैचेनी नौजवानी से ही थी। 
अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद अब्बास जिस सबसे पहले अख़बार से जुड़े, वह ‘बॉम्बे क्रॉनिकल’ था। इस अखबार में बतौर संवाददाता और फ़िल्म समीक्षक उन्होंने साल 1947 तक काम किया। अपने दौर के मशहूर साप्ताहिक ‘ब्लिट्ज’ से उनका नाता लंबे समय तक रहा। इस अखबार में प्रकाशित उनके कॉलम ‘लास्ट पेज’ ने उन्हें देश भर में काफी शोहरत प्रदान की।
तेज़ी से काम करना, लफ्फाजी और औपचारिकता से परहेज, नियमितता और साफ़गोई ख़्वाजा अहमद अब्बास के स्वभाव का हिस्सा थे। विनम्रता उनकी शख्सियत को संवारती थी। 

कथाकार राजिंदर सिंह बेदी ने अब्बास की शख्सियत के बारे में लिखा है ~

"एक चीज जिसने अब्बास साहब के सिलसिले में मुझे हमेशा विर्त-ए-हैरत (अचंभे का भंवर) में डाला है, वह है उनके काम की हैरतअंगेज ताकतो-कूव्वत। कहानी लिख रहे हैं और उपन्यास भी। कौमी या बैनुल-अकवामी (अंतरराष्ट्रीय) सतह पर फिल्म भी बना रहे हैं और सहाफत को भी संभाले हुए हैं। आगे लिखते हैं, फिर पैंतीस लाख कमेटियों का मेंबर होना सामाजिक जिम्मेदारियों का सबूत है और यह बात मेंबरशिप तक ही महदूद नहीं। हर जगह पहुंचेंगे भी, तकरीर भी करेंगे। पूरे हिंदुस्तान में मुझे इस किस्म के तीन आदमी दिखाई देते हैं-एक पंडित जवाहर लाल नेहरू, दूसरे बंबई के डॉक्टर बालिगा और तीसरे ख्वाजा अहमद अब्बास। जिनकी यह कूव्वत और योग्यता एक आदमी की नही।"

अपनी स्थापना के कुछ ही दिन बाद, इप्टा का सांस्कृतिक आंदोलन जिस तरह से पूरे मुल्क़ में फैला, उसमें ख़्वाजा अहमद अब्बास का अहम हाथ है। अब्बास ने इप्टा के लिए खूब नाटक भी लिखे, कई नाटकों का निर्देशन भी किया। ‘यह अमृता है’, ‘बारह बजकर पांच मिनिट’, ‘जुबैदा’ और ‘चौदह गोलियां’ उनके मक़बूल नाटक हैं।

इप्टा द्वारा साल 1946 में बनाई गई पहली फिल्म ‘धरती के लाल’ ख्वाजा अहमद अब्बास ने ही निर्देशित की थी। कहने को यह फिल्म इप्टा की थी, लेकिन इस फ़िल्म में मुख्य भूमिका अब्बास ने ही निभाई थी। बंगाल के अकाल पर बनी यह फिल्म कई अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में समीक्षकों द्वारा सराही गई। इस फिल्म में जो प्रमाणिकता दिखलाई देती है, वह अब्बास की कड़ी मेहनत का ही नतीजा है। बंगाल के अकाल की वास्तविक जानकारी इक्कट्ठा करने के लिए उन्होंने उस वक़्त बाकायदा अकालग्रस्त इलाक़ों का दौरा भी किया। इस फ़िल्म की कहानी और संवाद ख्वाजा अहमद अब्बास ने ही लिखे थे। 

‘धरती के लाल’ ऐसी फ़िल्म थी जिसमें देश की मेहनतकश अवाम को पहली बार केन्द्रीय हैसियत में पेश किया गया है। पूरे सोवियत यूनियन में यह फिल्म दिखाई गई और कई देशों ने अपनी फ़िल्म लाइब्रेरियों में इसे स्थान दिया है। इंग्लैंड की प्रसिद्ध ग्रंथमाला पेंग्विन ने अपने एक अंक में उसे फिल्म-इतिहास में एक महत्वपूर्ण फिल्म कहा। सच बात तो यह है ‘धरती के लाल’ फिल्म से प्रेरणा लेकर ही विमल राय ने अपनी फिल्म ‘दो बीघा जमीन’ और सत्यजीत रॉय ने ‘पाथेर पांचाली’ में यथार्थवाद का रास्ता अपनाया।  

इसके बाद साल 1951 में उन्होंने ‘नया संसार’ नाम से अपनी खुद की फ़िल्म कंपनी खोल ली। ‘नया संसार’ के बैनर पर उन्होंने कई उद्देश्यपूर्ण और सार्थक फ़िल्में बनाईं। मसलन ‘राही’ (1953), मशहूर अंग्रेजी लेखक मुल्क राज आनंद की एक कहानी पर आधारित थी, जिसमें चाय के बागानों में काम करने वाले श्रमिकों की दुर्दशा को दर्शाया गया था। मशहूर निर्देशक वी. शांताराम की चर्चित फिल्म ‘डॉ. कोटनिस की अमर कहानी’ अब्बास के अंग्रेजी उपन्यास ‘एंड वन डिड नॉट कम बैक’ पर आधारित है।
‘अनहोनी’ (1952) सामाजिक विषय पर एक विचारोत्तेजक फिल्म थी। फिल्म ‘शहर और सपना’ (1963) में फुटपाथ पर जीवन गुजारने वाले लोगों की समस्याओं का वर्णन है, तो ‘दो बूँद पानी’ (1971) में राजस्थान के रेगिस्थान में पानी की विकराल समस्या को दर्शाया गया है।

गोवा की आजादी पर आधारित ‘सात हिंदुस्तानी’ भी उनकी एक उल्लेखनीय फिल्म है। मशहूर निर्माता-निर्देशक राज कपूर के लिए ख्वाजा अहमद अब्बास ने जितनी भी फिल्में लिखी, उन सभी में हमें एक मजबूत सामाजिक मुद्दा मिलता है। चाहे वो ‘आवारा’ हो, ‘जागते रहो’ या फिर ‘श्री 420’। पैंतीस वर्षों के अपने फ़िल्मी करियर में अब्बास ने तेरह फिल्मों का निर्माण किया। लगभग चालीस फिल्मों की कहानी और पटकथाएँ लिखीं, जिनमें ज़्यादातर राज कपूर की फ़िल्में हैं। अब्बास को भले ही फ़िल्मकार के रुप में अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली हो लेकिन बुनियादी तौर पर वे एक अफ़सानानिगार थे। अब्बास एक बेहतरीन अदीब थे। उन्होंने साहित्य की लगभग सभी विधाओं कहानी, उपन्यास, नाटक, रिपोर्ताज में जमकर लिखा। अब्बास की कहानियों की तादाद कोई एक सैंकड़े से ऊपर है। उन्होंने अंग्रेजी, उर्दू और हिंदी तीनों भाषाओं में जमकर लिखा।  

अब्बास की कहानियां अपने दौर के उर्दू के चर्चित रचनाकारों कृष्ण चंदर, इस्मत चुगताई, राजेन्द्र सिंह बेदी और सआदत हसन मंटो के साथ छपतीं थीं। हालांकि उनकी कहानियों में कहानीपन से ज्यादा पत्रकारिता हावी होती थी, लेकिन फिर भी पाठक उन्हें बड़े शौक से पढ़ा करते थे। अब्बास का अफ़साना ‘जिंदगी’ पढ़ने के बाद पाठक बखूबी उनकी सोच के दायरे और नज़रिए तक पहुंच सकते हैं। ख्वाजा अहमद अब्बास के कई कहानी संग्रह प्रकाशित हुए। जिनमें ‘एक लड़की’, ‘जाफरान के फूल’, ‘पांव में फूल’, ‘मैं कौन हूं’, ‘गेंहू और गुलाब’, ‘अंधेरा-उजाला’, ‘कहते हैं जिसको इश्क’, ‘नई धरती नए इंसान’, ‘अजंता की ओर’, ‘बीसवीं सदी के लैला मजनू’, ‘आधा इंसान’, ‘सलमा और समुद्र’, और ‘नई साड़ी’ प्रमुख कहानी संग्रह हैं। ‘इंकलाब’, ‘चार दिन चार राहें’, ‘सात हिंदुस्तानी’, ‘बंबई रात की बांहों में’ और ‘दिया जले सारी रात’ उनके प्रमुख उपन्यास हैं। ख्वाजा अहमद अब्बास के समस्त लेखन को यदि देखें, तो यह लेखन स्वछन्द, स्पष्ट और भयमुक्त दिखलाई देता है। 

उनकी कहानियों का दायरा पांच दशक तक फैला हुआ है। अब्बास की पहली कहानी ‘अबाबील’ साल 1935 में छपी और उसके बाद यह सिलसिला बीसवीं सदी के आठवें दशक तक चला। जब अब्बास ने अपनी पहली कहानी लिखी, तो उस वक्त उनकी उम्र महज उन्नीस साल थी। उन्नीस साल कोई अधिक उम्र नहीं होती लेकिन जो कोई भी इस कहानी को एक बार पढ़ लेगा, वह अब्बास के जेहन और उनके कहन का दीवाना हुए बिना नहीं रहेगा। इस एक अकेली कहानी से अब्बास रातों-रात देश-दुनिया में मशहूर हो गए।
कई जबानों में इस कहानी के अनुवाद हुए। अंग्रेजी, रूसी, जर्मन, स्वीडिश, अरबी, चीनी वगैरह-वगैरह। जर्मन ज़ुबान में दुनिया की बेहतरीन कहानियों का जब एक संकलन निकला, तो उसमें ‘अबाबील’ को शामिल किया गया।

कहानी में अब्बास ने किसान की जिंदगी का जिस तरह से खाका खींचा है, वह बिना गांव और किसानों की जिंदगी को जिये बिना मुमकिन नहीं। ताज्जुब की बात यह है कि अब्बास को गांव और किसान की जिंदगी का कोई जाती तजुर्बा नहीं था। कहानी लिखते समय किसानों के बारे में उनका इल्म न के बराबर था। एक इंटरव्यू में जब कृष्ण चंदर ने इसके मुतआल्लिक उनसे पूछा, तो अब्बास का बेबाक जवाब था ~

'कोई ज़रूरी नहीं कि हर कहानी अनुभव पर आधारित हो। जिस प्रकार क़ातिल के विषय में लिखने से पहले क़त्ल करना ज़रूरी नहीं। या एक वेश्या के जीवन का वर्णन करने के लिए यह ज़रूरी नहीं है कि लेखक स्वयं भी किसी वेश्या के साथ सो चुका हो।'

शहर और महानगरों का कड़वा यथार्थ अब्बास की कई कहानियों में सामने आया है। ‘अलिफ लैला' और ‘सुहागरात’ ऐसी ही संघर्षों और उसके बीच चल रही जिंदगी की कहानियां हैं। इन्हीं कहानियां का विस्तार उनकी फिल्म ‘शहर और सपना’ है। जो उस वक्त कई अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में सराही गई थी।  

अब्बास एक सच्चे वतनपरस्त और सेक्युलर इंसान थे। उनके सबसे करीबी दोस्तों में शामिल थे, इन्दर राज आनन्द, मुनीष नारायण सक्सेना, वी.पी. साठे, आर. के. करंजिया, राज कपूर, कृष्ण चंदर, अली सरदार जाफ़री आदि। अपनी वसीयत में उन्होंने लिखा था ~

‘मेरा जनाजा यारों के कंधों पर जुहू बीच स्थित गांधी के स्मारक तक ले जाएं, लेजिम बैंड के साथ। अगर कोई खिराज-ए-अकीदत पेश करना चाहे और तकरीर करे तो उनमें सरदार जाफ़री जैसा धर्मनिरपेक्ष मुसलमान हो, पारसी करंजिया हों या कोई रौशनख्याल पादरी हो वगैरह, यानी हर मजहब के प्रतिनिधि हों।’  

ख़्वाजा अहमद अब्बास ने अपनी आखिरी सांस माया नगरी मुंबई में ली। 1 जून 1987 को वे इस दुनिया से जिस्मानी तौर पर दूर चले गए। उन्होंने अपनी वसीयत में लिखा, ‘जब मैं मर जाऊंगा तब भी मैं आपके बीच में रहूंगा। अगर मुझसे मुलाक़ात करनी है तो मेरी किताबें पढ़ें और मुझे मेरे ‘आखिरी पन्नों’, ‘लास्ट पेज’ में ढूंढे, मेरी फिल्मों में खोजें। मैं और मेरी आत्मा इनमें है। इनके माध्यम से मैं आपके बीच, आपके पास रहूँगा, आप मुझे इनमें पायेंगे।’

मोहन कुमार


बॉलीवुड के जानेमाने प्रोड्यूसर डायरेक्टर स्क्रीन राइटर मोहन कुमार के जन्मदिन पर हार्दिक श्रद्धांजलि
मोहन का जन्म 1 जून,1934 को ब्रिटिश इंडिया के दौर में सियालकोट में हुआ था. देश का बंटवारा होने के बाद वो भारत लौट आए और मुंबई आकर उन्होंने अपने करियर की शुरुआत की मोहन कुमार ने  फ़िल्म आस का पंछी 1961,अनपढ़ 1962,आयी मिलन की बेला 1964, आप की परछाईयाँ 1964,अमन 1967, अनजाना 1969, आप आये बहार आयी1971,मोम की गुड़िया, अमीर गरीब 1974, आप बीती 1976, अवतार 1983,आल राउंडर 1984,अमृत 1986 एवं अम्बा 1990 जैसी फिल्में निर्देशित की मोहन ने बॉलीवुड की कई सारी प्रसिद्ध हस्तियों के साथ काम किया.

10 नवंबर 2017 में मोहन कुमार का निधन हो गया

संगीतकार भाईयों की जोड़ी साजिद वाजिद के वाजिद अली खान

वाजिद खान 🎂जन्म: 10 मार्च दिसंबर81, मंदसौर, मध्य प्रदेश, एक अंत ...
जन्म: वाजिद अली खान; 10 मार्च 1981
कुछ लोगो के अनुसार
वाजिद अली खान 7 अक्टूबर 1977-पैदा हुए
1 जून 2020⚰️सपुर्देखाक किया गया
प्रसिद्ध संगीतकार भाईयों की जोड़ी साजिद वाजिद के वाजिद अली खान की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रधांजलि

वाजिद अली ख़ान भारतीय हिन्दी सिनेमा की प्रसिद्ध संगीतकार जोड़ी 'साजिद-वाजिद' में से एक थे। वाजिद ख़ान कलात्मक जोड़ी 'साजिद-वाजिद' बनाने के लिए अपने बड़े भाई साजिद ख़ान के साथ जुड़ गए थे। उनका एकल अभिनय के रूप में एक अलग गायन कॅरियर भी था और एक पार्श्व कलाकार के रूप में उन्हें कई पुरस्कारों के लिए नामांकित किया गया था। बॉलीवुड में साजिद-वाजिद की जोड़ी काफी मशहूर थी। उन्होंन सबसे पहले 1998 में सलमान ख़ान की फिल्म 'प्यार किया तो डरना क्या' के लिए संगीत दिया था। 1999 में उन्होंने सोनू निगम की एल्बम 'दीवाना' के लिए संगीत दिया, जिसमें "दीवाना तेरा", "अब मुझे रात दिन" और "इस कदर प्यार है" जैसे गाने शामिल थे। उसी साल उन्होंने फिल्म 'हैलो ब्रदर' के लिए संगीत निर्देशकों के रूप में काम किया और 'हटा सावन की घाटा', 'चुपके से कोई और' तथा 'हैलो ब्रदर' जैसे गाने लिखे थे। इसके अलावा वाजिद ख़ान ने कई शो भी जज किये थे।

परिचय

वाजिद अली ख़ान का जन्म 7 अक्टूबर, 1977 को हुआ था। साजिद-वाजिद मशहूर तबला वादक उस्ताद शराफ़त अली ख़ान के बेटे हैं। साजिद-वाजिद की जोड़ी ने सोनू निगम की सुपरहिट ऐल्बम 'दीवाना' का संगीत दिया था। इसके बाद इस जोड़ी ने कई सुपरहिट फिल्मों का संगीत दिया। इनकी जोड़ी को बॉलिवुड के सबसे सफल संगीत डायरेक्टरों की जोड़ी में गिना जाता था। उन्होंने 'दबंग' सहित सलमान ख़ान की कई सुपरहिट फिल्मों में संगीत दिया। वाजिद केवल एक सफल संगीत डायरेक्टर ही नहीं थे बल्कि बेहतरीन गायक भी थे। उन्होंने कई सुपरहिट गानों को अपनी आवाज़ दी थी।

संघर्ष भरा समय

वाजिद ख़ान ने अपने संघर्ष की कहानी खुद ही एक शो के दौरान सुनाई थी। जब इस शो के मेजबान ने संगीतकार जोड़ी साजिद-वाजिद से पूछा कि उन्होंने अपना सफर कैसे शुरू किया तो सवाल के जवाब में वाजिद ने एक घटना बताई। जब उन्होंने एक प्रसिद्ध संगीत निर्देशक के साथ रिहर्सल की थी। इस दौरान उन्हें बेहद अपमानित महसूस हुआ था। वाजिद ने बताया, 'संगीत निर्देशक बनने के हमारे निर्णय के पीछे एक बहुत ही अजीब कहानी है। मैं गजल, जिंगल और एल्बम में गिटार बजाता था। एक दिन, मैं एक लोकप्रिय संगीत निर्देशक के सामने कुछ साज बजाने वाला था और हमारी टीम के किसी व्यक्ति ने गलती की। लेकिन हमारे एक साथी गिटारवादक, जिन्हें मुझसे कुछ समस्या थी उन्होंने संगीत निर्देशक से कहा, वाजिद ने एक गलती की है'।

आगे वाजिद ख़ान ने बात को पूरा करते हुए कहा, 'मैं परेशान हो गया और उनसे कहा, 'सर, मैंने गलती नहीं की, अगर आपको ऐसा लगता है तो सिर्फ मैं आपको बजा के बता सकता हूं'। उन्होंने कहा, 'आपको बहुत कुछ सीखना है, अब आप इस गीत को नहीं चलाएंगे'। मेरे पिता बाहर बैठे थे। यह मेरे लिए बहुत बड़ा अपमान था और मैं बहुत अपमानित महसूस कर रहा था। मैंने अपने साधन को पैक किया, अपने पिता को उनकी आंखों में देखा और मैं चला गया'।

वाजिद ख़ान ने बताया था कि वो इस घटना से परेशान थे और उन्होंने अपने भाई साजिद को इस बारे में बताया कि कैसे इस तरह के लोग किसी व्यक्ति की बात नहीं मानते या उन्हें मौका नहीं देते। साजिद ने उनसे पूछा, 'क्या संगीत निर्देशक एक बड़ी बात है?' जब वाजिद ने सकारात्मक जवाब दिया, तो साजिद ने जवाब दिया, 'ठीक है, फिर हम भी संगीत निर्देशक बन जाते हैं।' बस इस तरह से दोनों की जोड़ी टॉप संगीत डायरेक्टर्स में शुमार हो गई

मुख्य फ़िल्में

साजिद-वाजिद की जोड़ी ने 'प्यार किया तो डरना क्या', 'तुमको ना भूल पाएंगे', 'तेरे नाम', 'गर्व', 'मुझसे शादी करोगी', 'पार्टनर', 'हेलो', 'गॉड तुसी ग्रेट हो', 'वॉन्टेड', 'मैं और मिसेज खन्ना', 'वीर', 'नो प्रॉब्लम' और 'एक था टाइगर' जैसी सुपरहिट फिल्मों में संगीत दिया।

मृत्यु

वाजिद ख़ान का निधन 1 जून, 2020 को हुआ। कहा जा रहा था कि उनका निधन कोरोना वायरस के कारण हुआ था। वाजिद ख़ान के निधन की वजह उनके किडनी की समस्या बताई जा रही थी। इसके साथ ही कहा जा रहा था कि इलाज के दौरान उनका कोरोना टेस्ट भी पॉजिटिव आया था। लेकिन इन खबरों पर वाजिद ख़ान के परिवार ने एक स्टेटमेंट जारी कर विराम लगा दिया था। स्टेटमेंट में बताया गया कि वाजिद ख़ान का निधन कार्डियक अरेस्ट के चलते हुआ।

वाजिद ख़ान के भाई साजिद ख़ान ने अपने इंस्टाग्राम एकाउंट पर एक पोस्ट लिखा था, जिसमें उन्होंने इस बात का खुलासा किया। उन्होंने लिखा- 'हमारे प्यारे वाजिद का निधन 47 साल की उम्र में कार्डियक अरेस्ट के चलते 1 जून को रात साढ़े बारह बजे सुराना सेठिया अस्पताल में हुआ। उनका पिछले साल सफल किडनी ट्रांसप्लांट हुआ था और वह थ्रोट इन्फेक्शन का इलाज करवा रहे थे'। साजिद ख़ान द्वारा लिखी गई पोस्ट में कहीं भी इस बात का जिक्र नहीं था कि उनका निधन कोरोना वायरस के चलते हुआ।

अभिनेता,लेखक,निर्माता आर माधवन

प्रसिद्ध अभिनेता,लेखक,निर्माता आर माधवन के जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामनाएं

आर.माधवन उर्फ़ माधवन एक भारतीय फिल्म अभिनेता,लेखक,निर्माता और टीवी प्रस्तोता हैं। वह दो बार हिंदी सिनेमा में फिल्मफेयर पुरुस्कार जीत चुके हैं। साथ ही उन्हें तमिलनाडु स्टेट अवार्ड्स से भी नवाजा जा चुका है।  

आर.माधवन का जन्म 1 जून 1970 को जमशेदपुर में हुआ था। उनके पिता का नाम रंगनाथन हैं-जोकि टाटा स्टील एक्सिक्यूटिव हैं। उनकी माँ का नाम सरोजा है, जो बैंक ऑफ़ इंडिया में मैनेजर के पद पर कार्यरत हैं। उनकी एक छोटी बहन है- देविका रंगनाथन जोकि यूके में सॉफ्टवेयर इंजीनियर के पद पर कार्यरत हैं।  
माधवन शुरुआत से ही पढ़ाई में बेहद अव्वल थे। उन्हें साल 1988 में अपने स्कूल को बतौर कल्चरल एम्बैसडर के तौर पर कनाडा में रिप्रेजेंट करने का अवसर मिला था। इतना ही नहीं वह अपने कॉलेज के दिनों के दौरान काफी अच्छे कैडेट भी रह चुके हैं, उन्हें महाराष्ट्र बेस्ट कैडेट से नवाजा भी जा चुका है। माधवन कभी भी एक अभिनेता बनने की ख्वाइश नहीं रखते थे, वह एक आर्मी ऑफिसर बनना चाहते थे, वह एक बेस्ट कैडेट भी रह चुके हैं लेकिन जब आर्मी ज्वाइन करने का मौका आया तो उनकी उम्र छ महीने काम निकली उसके बाद उन्होंने अपना रुख पब्लिक स्पीकिंग की और कर दिया।   
वर्ष 1999 में माधवन की शादी उनकी कथित प्रेमिका सरिता बिर्जे से हुई। उनके एक बेटा है-वेदांत। 

वर्ष 1997 में माधवन ने अपने करियर की शुरुआत एक चन्दन के टीवी कमर्शियल ऐड से की थी। उसके बाद निर्देशक मणि रत्नम ने उन्हें अपनी एक फिल्म का ऑफर देकर स्क्रीन टेस्ट के लिये कहा, लेकिन बाद में उन्हें फिल्म से यह कहकर निकल दिया की वो उस रोल के लिए फिट नहीं बैठते। फिर माधवन ने छोटे पर्दे का सहारा लिया कई टेली शोज़ में काम किया। लोगों को उनका काम बेहद पसंद आया और 1998 में माधवन एक इंग्लिश फिल्म इन्फर्नो में इंडियन पुलिस ऑफिसर की भूमिका में नजर आये। लेकिन उन्हें कोई खास प्रसिद्ध नहीं मिली, ना ही वह दर्शकों की ही नजर में आये। उसके बाद माधवन ने कई साउथ की फिल्मों में काम किया। जिसके लिए उन्हें साउथ फिल्म फेयर अवार्ड से भी सम्मानित किया गया।   

माधवन को हिंदी सिनेमा में पहचान फिल्म रहना है तेरे दिल से मिली। यह फिल्म एक लव स्टोरी थी। इस फिल्म में माधवन के अपोजिट दिया मिर्जा नजर आयीं थीं। इस फिल्म ने उस साल बॉक्स-ऑफिस पर काफी व्यापार भी किया था। उसके बाद माधवन को हिंदी सिनेमा में फिल्मों के ऑफर की झड़ी लग गयी। उसके बाद वह फिल्म गुरु में नजर आए। इस फिल्म में अभिषेक बच्चन और ऐश्वर्या राय बच्चन मुख्य भूमिका में नजर आये थे। फिल्म ने बॉक्स-ऑफिस पर काफी अच्छा बिजनस किया था।आलोचकों ने इस फिल्म में माधवन के अभिनय की बेहद तारीफ भी की थी। 

साल 2010 में माधवन राजू हिरानी निर्देशित फिल्म 3 इडियट्स में नजर आये। यह फिल्म चेतन भगत के नॉवेल थ्री मिस्टेक्स ऑफ़ माय लाइफ पर आधारित थी। इस फिल्म में माधवन के अलावा आमिर खान, शरमन जोशी और करीना कपूर मुख्य भूमिका में नजर आई थीं। इस फिल्म ने बॉक्स-ऑफिस पर रिकॉर्ड-तोड़ कमाई की थी।  

इसके बाद साल 2011 में वह फिल्म तनु वेड्स मनु में नजर आये, इस फिल्म में उनके अपोजिट नेशनल अवार्ड विनिंग एक्ट्रेस कंगना राणावत नजर आई थीं । इस फिल्म ने बॉक्स-ऑफिस पर खूब धूम मचाई थी। जिस तरह यह फिल्म हिट हुई, उसी तरह इस फिल्म का सीक्वल भी लोगों को बहुत पसंद आया फिल्म ने बॉक्स-ओफ़िस करोड़ो कमाकर झंडे गाढ़ दिए।  

माधवन के बारे में अनसुनी बातें 

1- माधवन का जन्म 1 जून 1970 को झारखण्ड के जमशेदपुर में हुआ था। इनका पूरा नाम रंगनाथन माधवन है जिसमें 'रंगनाथन' उनके पिता का नाम है। 
2- माधवन को भारत में 'मैडी भाई', 'मैडी पाजी', 'मैडी भाईजान', 'मैडी सर', 'मैडी चेट्टा', 'मैडी अन्ना' के नाम से बुलाया जाता है। 
3- पढ़ाई पूरी करने के बाद माधवन ने एक टीचर के तौर पर कोल्हापुर में काम किया और मुंबई के 'के सी कॉलेज' से माधवन ने 'पब्लिक स्पीकिंग' में पोस्ट ग्रेजुएशन की। 
4- माधवन ने 1996 की शुरुआत में एक चन्दन के पाउडर का विज्ञापन किया था जिसके बाद मशहूर डायरेक्टर मणि रत्नम की फिल्म 'इरुवर' के लिए स्क्रीन टेस्ट भी दिया लेकिन मणि रत्नम ने इस फिल्म में उनका चयन नहीं किया लेकिन बाद में माधवन ने मणि रत्नम के साथ कई फिल्में की जिनमें से एक फिल्म 'गुरु' भी थी। 
5- फिल्मों में आने से पहले माधवन ने 'बनेगी अपनी बात' 'तोल मोल के बोल' और 'घर जमाई' जैसे टीवी सीरियल में काम भी किया था। माधवन की पहली फिल्म थी 'इस रात की सुबह नहीं'।
6- माधवन ने 2001 में रिलीज हुई तमिल फिल्म 'मिनाले' में साउथ की एक्ट्रेस रीमा सेन के साथ काम किया।  यह फिल्म डायरेक्टर मेनन की डेब्यू फिल्म थी और बाद में इसी फिल्म की हिंदी रीमेक फिल्म बनी 'रहना है तेरे दिल में'  जिसमें फिर से माधवन लीड रोल में नजर आए और उनके साथ दिया मिर्जा, और सैफ अली खान मुख्य भूमिका में दिखे। 
7- माधवन ने 'रंग दे बसंती', '3 इडियट्स', 'तनु वेड्स मनु' और हाल ही में 'तनु वेड्स मनु रिटर्न्स' में भी अहम भूमिका निभाई है।

मंगलवार, 30 मई 2023

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सोमवार, 29 मई 2023

आलिया भट्ट


*आलिया भट्ट एक भारत में जन्मी ब्रिटिश अभिनेत्री और गायिका हैं, जो हिंदी फिल्मो में काम करती हैं। उनका जन्म ( डेट ऑफ बर्थ) 15 मार्च 1993 को मुम्बई, महाराष्ट्र, भारत में हुआ। उन्होंने 2012 में हिंदी फिल्म “स्टुडेंट ऑफ़ द ईयर”  से अनपे करियर की शुरुआत की थी। बाद में उन्होंने कई सफल फिल्मे जैसे “हाईवे, 2 स्टेट्स, उड़ता पंजाब, बद्रीनाथ की दुल्हनिया और स्टूडेंट ऑफ द ईयर 2″ आदि फिल्मो में काम किया।*


*व्यक्तिगत जीवन जानकारी*

भट्ट परिवार में जन्मी, आलिया भट्ट फिल्म निर्माता महेश भट्ट और अभिनेत्री सोनी राजदान की बेटी हैं।*

आलिया भट्ट की फिल्म देखे

पूरा नाम आलिया भट्ट |

जन्म दिनांक 15 मार्च 1993

आयु Age 28 साल 2021 के अनुसार

जन्म स्थान मुम्बई, महाराष्ट्र, भारत

मूल निवासी मुम्बई, महाराष्ट्र, भारत

मातृ भाषा हिंदी

धर्म मुस्लिम

राष्ट्रीयता भारतीय

पेशा कमाई का जरिया अभिनय, विज्ञापन और मॉडलिंग

स्कूल जमनाबाई नरसी स्कूल, मुंबई

कॉलेज

शैक्षणिक योग्यता 12वी

वेतन प्रति फिल्म 10 करोड़

वैवाहिक स्थिति अविवाहित

 फिल्म 2012- हिंदी फिल्म “स्टुडेंट ऑफ़ द ईयर”


आलिया की त्सवीरें


आलिया भट्ट हाइट, वजन और शारीरिक माप

त्वचा का रंग गोरा Fair

आंखों का रंग गहरा भूरा 

बालों का रंग काला 

फिगर 32-26-34

ऊंचाई 5.3 Ft

वजन 52 kg


आलिया भट्ट की सफलता की कहानी

आलिया भट्ट ने अपनी फिल्मी करियर की शुरुआती 6 वर्ष की उम्र में साल 1999 की थ्रिलर फिल्म संघर्ष में एक बाल कलाकार के रूप में किया था, उसके बाद वह साल 2012 में करण जौहर की टीन ड्रामा फिल्म स्टूडेंट ऑफ द ईयर में अपनी करियर की पहली प्रमुख भूमिका वाली फिल्म में काम की।


उनकी पहली फिल्म Student of the Year ने 109 करोड़ की कमाई की और आलिया भट्ट के अभिनय को भी दर्शको ने खूब पसंद किया।


आलिया भट्ट हिंदी सिनेमा की एक सफल अभिनेत्री है। उन्होंने कई सफल फिल्मो में कामकिया है जैसे “2 स्टेट्स, डियर ज़िन्दगी, हम्प्टी शर्मा की दुल्हनियां, बद्रीनाथ की दुल्हनिया, हाईवे और उड़ता पंजाब” आदि।


Watasapp

 

 

रविवार, 28 मई 2023

पुरानी यादें

लक्ष्मी कांत प्यारे लाल
*प्यारेलाल रामप्रसाद शर्मा जी का नाम, बिना लक्ष्मीकान्त जी के नाम के अधूरा है। लक्ष्मीकान्त जी का निधन तो 25 मई 1998 के दिन 60 बरस की उम्र में हो गया था लेकिन प्यारेलाल जी आज भी हमारे साथ बदस्तूर हैं व हर संभव कोशिश से अपना जीवन संगीत में लीन रखते हैं। ज़रा काल के पहिये को पीछे घुमाया जाए तो याद आता है कि प्यारेलाल जी के पिता, ट्रंपेट बजाते थे और उन्हीं की बदौलत प्यारेलाल जी ने म्यूजिक सीखने की शुरुआत की थी। प्यारेलल जी संगीत के प्रति इतने दीवाने थे कि जब उन्होंने वॉइलिन सीखना शुरु किया तो 8 साल की उम्र से ही दिन में 12-12 घंटे प्रैक्टिस करने लगे। उनके भाई गिटार बजाते और प्यारेलाल जी वॉइलिन।*

*लेकिन सन 1952 में जब वो 12 साल के हुए, तो उनके घर आर्थिक संकट मंडराने लगा। इसका उपाये निकालने के लिए प्यारेलल जी ने पढ़ाई से बिल्कुल किनारा कर लिया और स्टूडियो-स्टूडियो जाकर वॉइलिन बजाने लगे। उस वक़्त उनके गुरु एक गोवानी संगीतकार एंथनी गोनज़ालवेज थे। वह बॉम्बे ऑर्केस्ट्रा, कूमी वालिया, मेहील मेहता और उनके बेटे ज़ुबिन मेहता आदि के लिए ऑर्केस्ट्रा में वॉइलिन बजाया करते थे। हालांकि उन दिनों प्यारेलाल जी को इन ऑर्केस्ट्राज़ में बजाने की एवज में कोई बहुत अच्छी धनराशि नहीं मिलती थी, लेकिन गुजर-बसर करने के साथ साथ सुरील कला केंद्र में संगीत सीखने के लिए जाने लायक रुपए कमा लेते थे। ये म्यूजिक अकैडमी मंगेश्कर फैमिली द्वारा चलाई जाती थी।*

*यहीं पर एक रोज़ उनकी मुलाकात लक्ष्मीकान्त जी से हुई, मुलाकात क्या हुई, यूं समझिए एक 12 साल के और एक 16 साल के (लक्ष्मीकान्त जी) लड़के के बीच नियति की ओर से तय की गई दोस्ती हो गई। लक्ष्मीकान्त जी के पिता गुजर चुके थे तो उनकी आर्थिक स्थिति भी बहुत कमज़ोर थी। इस मुफ़लिसी ने उन दोनों को और पक्का दोस्त बना दिया। साथ ही जब लता मंगेश्कर जी को पता चल कि ये दोनों माली रूप से मजबूत नहीं हैं, तो उन्होंने बॉलीवुड के नामी संगीतकारों को अपने ऑर्केस्ट्रा के लिए इन दोनों का नाम भेजना शुरु कर दिया। इन नामी संगीतकारों में नौशाद साहब, सचिन दा, सी राम चंद्रा, कल्याणजी आनंदजी आदि मौजूद थे। लेकिन यहाँ से रोज तो काम मिलता नहीं था, सो ये दोनों स्टूडियो दर स्टूडियो ऑर्केस्ट्रा में बजाने के लिए स्ट्रगल करते ही रहते थे। कोई 13 – 14 साल की उम्र होगी जब प्यारेलाल जी का सब्र जवाब दे गया। वह बोले “लक्ष्मीकान्त जी, मैं अब और यहाँ धक्के नहीं खा सकता। यहाँ तो शो करने के कितने-कितने दिन बाद तक पेमेंट ही नहीं मिलती है। ऐसे कैसे काम चलेगा, मैं सोचता हूँ कि ज़ुबिन मेहता की तरह मैं भी विएना चला जाऊँ और किसी वेस्टर्न ऑर्केस्ट्रा में जा के वॉइलिन बजाऊँ, कम से कम सुकून से रोटी तो मिलेगी” लक्ष्मीकान्त जी जानते थे कि वेस्टर्न म्यूजिक में प्यारेलाल की पकड़ भी बहुत अच्छी है और उस जैसा वॉइलिन भी शायद ही पूरे बॉम्बे शहर में कोई बजा सकता हो। लेकिन फिर भी उन्होंने बड़े भाई की तरह हक़ से मना कर दिया कि नहीं, प्यारेलाल तुम कहीं नहीं जाओगे, तुम हम मिलकर यहीं कुछ कर गुज़रेंगे”*

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*और कोई शख्स होता या आज का ज़माना होता, तो यही लगता कि लक्ष्मीकान्त जी प्यारेलाल की तरक्की से जल रहे हैं इसलिए मना कर रहे हैं पर न तब ऐसी कुंठायें हुआ करती थीं, और न प्यारेलालजी ऐसे शख्स हैं जो बुरा सोचकर रुकते। उन्होंने लक्ष्मीकान्त जी की बात पर भरोसा किया और यहीं रुक गए।*

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*प्यारेलाल जी के स्वभाव की बात उठी है तो मैं ये बात जोड़ता चलूँ कि वो सिर्फ नाम के ही प्यारेलाल नहीं है, मन से भी बहुत प्यारेलाल हैं। उन्होंने कभी मुहम्मद रफी को नाम लेकर नहीं बुलाया, वह हमेशा उन्हें साहब कहकर संबोधित करते हैं। किसी भी सीनियर, समकालीन, या उनके बाद के आए संगीतकारों के प्रति उनकी तरफ से कोई नकारात्मक बात नहीं सुनने को मिली। समकालीन की बात करूँ तो एक वक़्त लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल के अलावा कोई संगीतकार हिट था तो वो पंचम दा यानी आर-डी बर्मन थे, मतलब के तगड़े प्रतिद्वंदी थे पर उसके बावजूद इन दोनों में बैर तो दूर, दोस्ताना माहौल था और पंचम दा फिल्म दोस्ती में इन्हीं के इकरार पर माउथ ऑर्गन भी बजा चुके थे।*

*बहरहाल, बात प्यारेलाल जी के विदेश जाने की हो रही थी जिसे लक्ष्मीकान्त जी ने सिरे से नकार दिया था। धीरे धीरे इन दोनों को बॉलीवुड से ही काम मिलने लगा। सन 1954 किदार शर्मा जी ने जोगन फिल्म बनाई, जिसमें बुलो-सी-रानी का संगीत था, यहाँ पहली बार 14 साल की उम्र में प्यारेलाल जी ने किसी फिल्म के लिए वॉइलिन बजाया।*

*फिर इन दोनों ने कल्याणजी आनंदजी को असिस्ट करना शुरु कर दिया। कोई 7 साल बाद, बाबूभाई मिस्त्री की एक फिल्म पारसमणि (1963) में इन्हें बतौर संगीतकार काम करने का मौका मिला। मज़ा देखिए, बाबूभाई मिस्त्री का हाथ पकड़कर ही इनके गुरु कल्याणजी आनंदजी भी इंडस्ट्री में आए थे।*

*क्योंकि लक्ष्मीकान्त जी बड़े भी थे और भारतीय संगीत को बहुत अच्छे से समझते भी थे, इसलिए ये तय हुआ कि लक्ष्मीकान्त जी कम्पोज़ करेंगे और प्यारेलाल जी म्यूजिक अरैन्ज करेंगे।*
*इनकी पहली रिलीज़ फिल्म ‘पारसमणि’ के गाने इतने बम्पर हिट हुए कि साथ साथ फिल्म भी सुपरहिट करवा गए। हमेशा की तरह इनके लिए लता मंगेश्कर जी ने पहली फिल्म होते हुए भी गाने से न नुकूर करने की बजाए प्रोत्साहित किया और कम बजट होते हुए भी 6 में से 5 गाने गाए। इन गानों में ‘हँसता हुआ नूरानी चेहरा, काली जुलफ़े रंग सुनहरा’ आपने ज़रूर सुना होगा और आप यकीनन पसंद करते होंगे। साथ ही पहली फिल्म का शगुन करते हुए मोहम्मद रफी साहब ने पहला गाना ‘वो जब याद आए, बहुत याद आए’ के लिए कोई फीस न ली और कह दिया कि इस गाने की फीस आप किसी ज़रूरतमंद को देना। प्यारेलाल जी सौम्यता से बताते हैं कि ये लताजी और साबजी (रफी) का आशीर्वाद था उनके लिए।*

*और यकीनन ये एक ऐसा आशीर्वाद साबित हुआ कि एल-पी के नाम से महशूर होने वाले इस म्यूजिक डूओ ने फिर पीछे मुड़कर देखना तो दूर, तुरंत ही कामयाबी के झंडे गाड़ने शुरु कर दिए। अगले ही साल एक और कमाल हुआ। 1964 में फिर एक लो बजट फिल्म संत ज्ञानेश्वर तैयार होने लगी और लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल को नए होने के चलते फिल्म में काम दिया गया। फिल्म के प्रोड्यूसर मशहूर ट्रेड अनिलिस्ट कोमल नाहटा के पिता रामराज नाहटा थे।*

*फिल्म पहले तीन दिन में ही फ्लॉप डिक्लेयर होने को थी कि चौथे दिन रामराज जी के पास उनका असिस्टेंट दौड़ता हुआ आया और बोला “भाईसाहब, गजब हो गया, फिल्म तो सुपर हिट है ये” रामराज जी ने टोका भी “क्यों बेवकूफ बना रहे हो भाई” तो उसने उसी उत्साह में बताया “अरे नहीं, जैसे ही गाना ‘ज्योत से ज्योत जगाते चलो, प्रेम की गंगा बहाते चलो’ गाना बजता है वैसे ही पब्लिक पागलों की तरह स्क्रीन पर रेजगारी फेंकने लगती है। मैंने आजतक काभी किसी भी सीन, किसी भी गाने के लिए इतनी रेजगारी लुटती नहीं देखी।“ कमाल की बात ये भी है कि यही गीत बिनाका गीत माला में दो साल तक टॉप थ्री में बना रहा था।*

*इसी साल नई स्टार कास्ट के साथ फिल्म ‘दोस्ती’ न सिर्फ इनके गानों की वजह से सुपर-डुपर हिट हुई, बल्कि करिअर के दूसरे ही साल लक्ष्मीकान्त प्यारेलालजी को पहला फिल्मफेयर अवॉर्ड भी मिला। मोहम्मद रफी के गाए गाने ‘राही मनवा दुख की चिंता क्यों सताये रे’ बहुत पसंद किया गया। अब क्योंकि यह दोनों ही* *शंकर-जयकिशन जी का संगीत बहुत पसंद करते थे, इसलिए इनका म्यूजिक स्टाइल भी कुछ लोगों को वैसा ही लगता था। लेकिन समय की करवट देखिए, कुछ सालों बाद शंकर-जयकिशन ने अपनी संगीत शैली में संगीत में फेरबदल कर ली कि लोग ये न कहें कि उनका संगीत लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल की कॉम्पोज़िशन से मिलता है। इसके बाद, फिल्म मिलन में मुकेश का गाना ‘सावन का महिना, पवन करे शोर’ हो या शागिर्द में लता जी का गाना ‘दिल विल प्यार व्ययर मैं क्या जानू रे’ हो, इनका हर गाना रेडियो पर नॉन-स्टॉप बजता मिलता था।*

*फिल्म दो रास्ते, इंतकाम, बॉबी, रोटी कपड़ा और मकान, अमर अकबर एंथनी’ आदि सन 70 की हर बड़ी फिल्म में संगीत लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल जी का संगीत धूम मचा रहा था।*
*इनके गानों की फेरहिस्त यहाँ लगाकर उसका गुणगान करना तो सूरज को दीया दिखाना है, पर अमर अकबर एंथनी की बात आई है तो इतना ज़रूर बताना चाहूँगा कि कि उस वक़्त के चार लिजेंड, टॉप फॉर को एक ही गाने में लाना, ये सिर्फ प्यारेलालजी और लक्ष्मीकान्त जी के बस का काम था। हमको तुमसे हो गया है प्यार क्या  करें, इस गाने में मुकेश, रफी साहब, किशोर कुमार और लता मंगेश्कर भी हैं। ये पहला और आखिरी गाना है जिसमें ये चारों साथ हैं। साथ ही, आपको इस फिल्म का, अमिताभ बच्चन पर फिल्माया वो कॉमेडी सॉन्ग तो याद ही होगा ‘माई नेम इज एंथनी गोनज़ालवेज, मैं दुनिया में अकेला हूँ’। यह गाना प्यारेलाल जी की तरफ से उनके उन्हीं गोवानी उस्ताद एंथनी के लिए समर्पित था। इनके संगीत की ऊँचाइयों की क्या बात करूँ, अस्सी के दशक में तो इन्होंने सत्तर से ज़्यादा कहर ढाया था।*

*फिल्म कर्ज़, एक दूजे के लिए, प्रेम रोग, नाम, नगीना, मिस्टर इंडिया, तेज़ाब, चालबाज़, राम लखन, आदि एक से बढ़कर एक म्यूज़िकल हिट दी। नब्बे में भी सौदागर, खुदा गवाह यहां देखे  खुदा गवाह, खलनायक, दीवाना मस्ताना, आदि सब टॉप क्लास म्यूजिक से सजी ब्लॉकबस्टर फिल्में थीं।*

*फिर धीरे-धीरे लक्ष्मीकान्त जी की सेहत गिरने लगी और प्यारेलाल जी का मन भी संगीत के बदलते तौर से विरक्त होने लगा। लक्ष्मीकान्त जी की डेथ के बाद भी उन्होंने कुछ समय काम किया और एल्बम पर लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल ही लिखा, लेकिन वो बात न रही। पर प्यारेलाल जी सन 1998 से लेकर आज 2021 तक भी संगीत से जुड़े हुए हैं और आज भी म्यूजिक अरेंज में उनका कोई जवाब नहीं है। उनकी सौम्यता का हाल तो क्या बताऊँ साहब, उनके यहाँ 50 साल पहले जो वादक काम करने आते थे, उनकी चौथी पीढ़ियाँ तक अभी भी उनके पास ही आती हैं। वह लता जी से हमेशा टच में रहते थे। मुकेश जी की वह तारीफ करते नहीं थकते। रफी साहब के बारे में तो फख्र से कहते हैं कि रफी साहब कल भी थे, आज भी हैं, हमेशा रहेंगे। सुबह 5 बजे से उनके गाने सुनने शुरु करता हूँ और शाम सात बजे तक सुनता हूँ। सारा दिन साहबजी की संगत में बीत जाता है। ऐसे ही प्यारे, हम सब के दुलारे, संगीत के लिए चौबीस घंटे समर्पित प्यारेलाल जी को हम ने भी*

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*NRI वॉट्सएप की ओर से उनके 80वें जन्मदिन पर बहुत-बहुत शुभकामनाएं प्रेषित  की हैं और आशा करते हैं कि वह स्वस्थ रहें और सदा संगीत से जुड़े रहें।*
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*म्यूजिक कंपोजर लक्ष्मीकांत जी का सफ़रयूजिक कंपोजर लक्ष्मीकांत जी का सफ़र*

*प्यारेलाल रामप्रसाद शर्मा जी का नाम, बिना लक्ष्मीकान्त जी के नाम के अधूरा है। लक्ष्मीकान्त जी का निधन तो 25 मई 1998 के दिन 60 बरस की उम्र में हो गया था लेकिन प्यारेलाल जी आज भी हमारे साथ बदस्तूर हैं व हर संभव कोशिश से अपना जीवन संगीत में लीन रखते हैं। ज़रा काल के पहिये को पीछे घुमाया जाए तो याद आता है कि प्यारेलाल जी के पिता, ट्रंपेट बजाते थे और उन्हीं की बदौलत प्यारेलाल जी ने म्यूजिक सीखने की शुरुआत की थी। प्यारेलल जी संगीत के प्रति इतने दीवाने थे कि जब उन्होंने वॉइलिन सीखना शुरु किया तो 8 साल की उम्र से ही दिन में 12-12 घंटे प्रैक्टिस करने लगे। उनके भाई गिटार बताते और प्यारेलाल जी वॉइलिन।*

लेकिन सन 1952 में जब वो 12 साल के हुए, तो उनके घर आर्थिक संकट मंडराने लगा। इसका उपाये निकालने के लिए प्यारेलल जी ने पढ़ाई से बिल्कुल किनारा कर लिया और स्टूडियो-स्टूडियो जाकर वॉइलिन बजाने लगे। उस वक़्त उनके गुरु एक गोवानी संगीतकार एंथनी गोनज़ालवेज थे। वह बॉम्बे ऑर्केस्ट्रा, कूमी वालिया, मेहील मेहता और उनके बेटे ज़ुबिन मेहता आदि के लिए ऑर्केस्ट्रा में वॉइलिन बजाया करते थे। हालांकि उन दिनों प्यारेलाल जी को इन ऑर्केस्ट्राज़ में बजाने की एवज में कोई बहुत अच्छी धनराशि नहीं मिलती थी, लेकिन गुजर-बसर करने के साथ साथ सुरील कला केंद्र में संगीत सीखने के लिए जाने लायक रुपए कमा लेते थे। ये म्यूजिक अकैडमी मंगेश्कर फैमिली द्वारा चलाई जाती थी।यहीं पर एक रोज़ उनकी मुलाकात लक्ष्मीकान्त जी से हुई, मुलाकात क्या हुई, यूं समझिए एक 12 साल के और एक 16 साल के (लक्ष्मीकान्त जी) लड़के के बीच नियति की ओर से तय की गई दोस्ती हो गई। लक्ष्मीकान्त जी के पिता गुजर चुके थे तो उनकी आर्थिक स्थिति भी बहुत कमज़ोर थी। इस मुफ़लिसी ने उन दोनों को और पक्का दोस्त बना दिया। साथ ही जब लता मंगेश्कर जी को पता चल कि ये दोनों माली रूप से मजबूत नहीं हैं, तो उन्होंने बॉलीवुड के नामी संगीतकारों को अपने ऑर्केस्ट्रा के लिए इन दोनों का नाम भेजना शुरु कर दिया। इन नामी संगीतकारों में नौशाद साहब, सचिन दा, सी राम चंद्रा, कल्याणजी आनंदजी आदि मौजूद थे। लेकिन यहाँ से रोज तो काम मिलता नहीं था, सो ये दोनों स्टूडियो दर स्टूडियो ऑर्केस्ट्रा में बजाने के लिए स्ट्रगल करते ही रहते थे। कोई 13 – 14 साल की उम्र होगी जब प्यारेलाल जी का सब्र जवाब दे गया। वह बोले “लक्ष्मीकान्त जी, मैं अब और यहाँ धक्के नहीं खा सकता। यहाँ तो शो करने के कितने-कितने दिन बाद तक पेमेंट ही नहीं मिलती है। ऐसे कैसे काम चलेगा, मैं सोचता हूँ कि ज़ुबिन मेहता की तरह मैं भी विएना चला जाऊँ और किसी वेस्टर्न ऑर्केस्ट्रा में जा के वॉइलिन बजाऊँ, कम से कम सुकून से रोटी तो मिलेगी” लक्ष्मीकान्त जी जानते थे कि वेस्टर्न म्यूजिक में प्यारेलाल की पकड़ भी बहुत अच्छी है और उस जैसा वॉइलिन भी शायद ही पूरे बॉम्बे शहर में कोई बजा सकता हो। लेकिन फिर भी उन्होंने बड़े भाई की तरह हक़ से मना कर दिया कि नहीं, प्यारेलाल तुम कहीं नहीं जाओगे, तुम हम मिलकर यहीं कुछ कर गुज़रेंगे”और कोई शख्स होता या आज का ज़माना होता, तो यही लगता कि लक्ष्मीकान्त जी प्यारेलाल की तरक्की से जल रहे हैं इसलिए मना कर रहे हैं पर न तब ऐसी कुंठायें हुआ करती थीं, और न प्यारेलालजी ऐसे शख्स हैं जो बुरा सोचकर रुकते। उन्होंने लक्ष्मीकान्त जी की बात पर भरोसा किया और यहीं रुक गए।प्यारेलाल जी के स्वभाव की बात उठी है तो मैं ये बात जोड़ता चलूँ कि वो सिर्फ नाम के ही प्यारेलाल नहीं है, मन से भी बहुत प्यारेलाल हैं। उन्होंने कभी मुहम्मद रफी को नाम लेकर नहीं बुलाया, वह हमेशा उन्हें साहब कहकर संबोधित करते हैं। किसी भी सीनियर, समकालीन, या उनके बाद के आए संगीतकारों के प्रति उनकी तरफ से कोई नकारात्मक बात नहीं सुनने को मिली। समकालीन की बात करूँ तो एक वक़्त लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल के अलावा कोई संगीतकार हिट था तो वो पंचम दा यानी आर-डी बर्मन थे, मतलब के तगड़े प्रतिद्वंदी थे पर उसके बावजूद इन दोनों में बैर तो दूर, दोस्ताना माहौल था और पंचम दा फिल्म दोस्ती में इन्हीं के इसरार पर माउथ ऑर्गन भी बजा चुके थे।बहरहाल, बात प्यारेलाल जी के विदेश जाने की हो रही थी जिसे लक्ष्मीकान्त जी ने सिरे से नकार दिया था। धीरे धीरे इन दोनों को बॉलीवुड से ही काम मिलने लगा। सन 1954 किदार शर्मा जी ने जोगन फिल्म बनाई, जिसमें बुलो-सी-रानी का संगीत था, यहाँ पहली बार 14 साल की उम्र में प्यारेलाल जी ने किसी फिल्म के लिए वॉइलिन बजाया।फिर इन दोनों ने कल्याणजी आनंदजी को असिस्ट करना शुरु कर दिया। कोई 7 साल बाद, बाबूभाई मिस्त्री की एक फिल्म पारसमणि (1963) में इन्हें बतौर संगीतकार काम करने का मौका मिला। मज़ा देखिए, बाबूभाई मिस्त्री का हाथ पकड़कर ही इनके गुरु कल्याणजी आनंदजी भी इंडस्ट्री में आए थे।क्योंकि लक्ष्मीकान्त जी बड़े भी थे और भारतीय संगीत को बहुत अच्छे से समझते भी थे, इसलिए ये तय हुआ कि लक्ष्मीकान्त जी कम्पोज़ करेंगे और प्यारेलाल जी म्यूजिक अरैन्ज करेंगे।इनकी पहली रिलीज़ फिल्म ‘पारसमणि’ के गाने इतने बम्पर हिट हुए कि साथ साथ फिल्म भी सुपरहिट करवा गए। हमेशा की तरह इनके लिए लता मंगेश्कर जी ने पहली फिल्म होते हुए भी गाने से न नुकूर करने की बजाए प्रोत्साहित किया और कम बजट होते हुए भी 6 में से 5 गाने गाए। इन गानों में ‘हँसता हुआ नूरानी चेहरा, काली जुलफ़े रंग सुनहरा’ आपने ज़रूर सुना होगा और आप यकीनन पसंद करते होंगे। साथ ही पहली फिल्म का शगुन करते हुए मोहम्मद रफी साहब ने पहला गाना ‘वो जब याद आए, बहुत याद आए’ के लिए कोई फीस न ली और कह दिया कि इस गाने की फीस आप किसी ज़रूरतमंद को देना। प्यारेलाल जी सौम्यता से बताते हैं कि ये लताजी और साबजी (रफी) का आशीर्वाद था उनके लिए।और यकीनन ये एक ऐसा आशीर्वाद साबित हुआ कि एल-पी के नाम से महशूर होने वाले इस म्यूजिक डूओ ने फिर पीछे मुड़कर देखना तो दूर, तुरंत ही कामयाबी के झंडे गाड़ने शुरु कर दिए। अगले ही साल एक और कमाल हुआ। 1964 में फिर एक लो बजट फिल्म संत ज्ञानेश्वर तैयार होने लगी और लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल को नए होने के चलते फिल्म में काम दिया गया। फिल्म के प्रोड्यूसर मशहूर ट्रेड अनिलिस्ट कोमल नाहटा के पिता रामराज नाहटा थे।फिल्म पहले तीन दिन में ही फ्लॉप डिक्लेयर होने को थी कि चौथे दिन रामराज जी के पास उनका असिस्टेंट दौड़ता हुआ आया और बोला “भाईसाहब, गजब हो गया, फिल्म तो सुपर हिट है ये” रामराज जी ने टोका भी “क्यों बेवकूफ बना रहे हो भाई” तो उसने उसी उत्साह में बताया “अरे नहीं, जैसे ही गाना ‘ज्योत से ज्योत जगाते चलो, प्रेम की गंगा बहाते चलो’ गाना बजता है वैसे ही पब्लिक पागलों की तरह स्क्रीन पर रेजगारी फेंकने लगती है। मैंने आजतक काभी किसी भी सीन, किसी भी गाने के लिए इतनी रेजगारी लुटती नहीं देखी।“ कमाल की बात ये भी है कि यही गीत बिनाका गीत माला में दो साल तक टॉप थ्री में बना रहा था।इसी साल नई स्टार कास्ट के साथ फिल्म ‘दोस्ती’ न सिर्फ इनके गानों की वजह से सुपर-डुपर हिट हुई, बल्कि करिअर के दूसरे ही साल लक्ष्मीकान्त प्यारेलालजी को पहला फिल्मफेयर अवॉर्ड भी मिला। मोहम्मद रफी के गाए गाने ‘राही मनवा दुख की चिंता क्यों सताये रे’ बहुत पसंद किया गया। अब क्योंकि यह दोनों ही शंकर-जयकिशन जी का संगीत बहुत पसंद करते थे, इसलिए इनका म्यूजिक स्टाइल भी कुछ लोगों को वैसा ही लगता था। लेकिन समय की करवट देखिए, कुछ सालों बाद शंकर-जयकिशन ने अपनी संगीत शैली में संगीत में फेरबदल कर ली कि लोग ये न कहें कि उनका संगीत लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल की कॉम्पोज़िशन से मिलता है। इसके बाद, फिल्म मिलन में मुकेश का गाना ‘सावन का महिना, पवन करे शोर’ हो या शागिर्द में लता जी का गाना ‘दिल विल प्यार व्ययर मैं क्या जानू रे’ हो, इनका हर गाना रेडियो पर नॉन-स्टॉप बजता मिलता था।फिल्म दो रास्ते, इंतकाम, बॉबी, रोटी कपड़ा और मकान, अमर अकबर एंथनी’ आदि सन 70 की हर बड़ी फिल्म में संगीत लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल जी का संगीत धूम मचा रहा था।इनके गानों की फेरहिस्त यहाँ लगाकर उसका गुणगान करना तो सूरज को दीया दिखाना है, पर अमर अकबर एंथनी की बात आई है तो इतना ज़रूर बताना चाहूँगा कि कि उस वक़्त के चार लिजेंड, टॉप फॉर को एक ही गाने में लाना, ये सिर्फ प्यारेलालजी और लक्ष्मीकान्त जी के बस का काम था। हमको तुमसे हो गया है प्यार क्या  करें, इस गाने में मुकेश, रफी साहब, किशोर कुमार और लता मंगेश्कर भी हैं। ये पहला और आखिरी गाना है जिसमें ये चारों साथ हैं। साथ ही, आपको इस फिल्म का, अमिताभ बच्चन पर फिल्माया वो कॉमेडी सॉन्ग तो याद ही होगा ‘माई नेम इज एंथनी गोनज़ालवेज, मैं दुनिया में अकेला हूँ’। यह गाना प्यारेलाल जी की तरफ से उनके उन्हीं गोवानी उस्ताद एंथनी के लिए समर्पित था। इनके संगीत की ऊँचाइयों की क्या बात करूँ, अस्सी के दशक में तो इन्होंने सत्तर से ज़्यादा कहर ढाया था।फिल्म कर्ज़, एक दूजे के लिए, प्रेम रोग, नाम, नगीना, मिस्टर इंडिया, तेज़ाब, चालबाज़, राम लखन, आदि एक से बढ़कर एक म्यूज़िकल हिट दी। नब्बे में भी सौदागर, खुदा गवाह, खलनायक, दीवाना मस्ताना, आदि सब टॉप क्लास म्यूजिक से सजी ब्लॉकबस्टर फिल्में थीं।फिर धीरे-धीरे लक्ष्मीकान्त जी की सेहत गिरने लगी और प्यारेलाल जी का मन भी संगीत के बदलते तौर से विरक्त होने लगा। लक्ष्मीकान्त जी की देथ के बाद भी उन्होंने कुछ समय काम किया और एल्बम पर लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल ही लिखा, लेकिन वो बात न रही। पर प्यारेलाल जी सन 1998 से लेकर आज 2021 तक भी संगीत से जुड़े हुए हैं और आज भी म्यूजिक अरेंज में उनका कोई जवाब नहीं है। उनकी सौम्यता का हाल तो क्या बताऊँ साहब, उनके यहाँ 50 साल पहले जो वादक काम करने आते थे, उनकी चौथी पीढ़ियाँ तक अभी भी उनके पास ही आती हैं। वह लता जी से हमेशा टच में रहते हैं। मुकेश जी की वह तारीफ करते नहीं थकते। रफी साहब के बारे में तो फख्र से कहते हैं कि रफी साहब कल भी थे, आज भी हैं, हमेशा रहेंगे। सुबह 5 बजे से उनके गाने सुनने शुरु करता हूँ और शाम सात बजे तक सुनता हूँ। सारा दिन साहबजी की संगत में बीत जाता है। ऐसे ही प्यारे, हम सब के दुलारे, संगीत के लिए चौबीस घंटे समर्पित प्यारेलाल जी को हम मायापुरी मैगजीन की ओर से उनके 80वें जन्मदिन पर बहुत-बहुत शुभकामनाएं प्रेषित करते हैं और आशा करते हैं कि वह स्वस्थ रहें और सदा संगीत से जुड़े रहें।सिद्धार्थ अरोड़ा ‘सहर’ फिल्म - मिलन (1967) संगीत - लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल गीतकार - आनंद बक्षी गायक - लता मंगेशकर, मुकेश हम तुम युग-युग से ये गीत मिलन के गाते रहे हैं गाते रहेंगे हम तुम जग में जीवन साथी बन के आते रहे हैं आते रहेंगे जब-जब हमने जीवन पाया जब-जब ये रूप सजा सजना हर बार तुम्हीं ने माँग भरी तुमने ही पहनाया कँगना हम फूल बने या राख हुए पर साथ नहीं छूटा अपना हर बार तुम्हीं तुम आन बसे इन आँखों में बनके सपना हम तुम युग-युग... सावन में जब कभी भी ये बादल गगन पे छाये बिजली से डर गए तुम डर कर करीब आये फिर क्या हुआ बताओ बरसात थम न जाए बरसात थम न जाए हम तुम युग-युग... जग ये बंधन ना तोड़ सका हम तोड़ के हर दीवार मिले इस जनम-जनम की नदिया के इस पार मिले, उस पार मिले भगवान ने पूछा मांगो तो तुमको सारा संसार मिले पर हमने कहा संसार नहीं हमको साजन का प्यार मिले हम तुम युग-युग... हम आज कहें तुमको अपना हम तुम किस रोज़ पराये थे बाहों के हार तुम्हें हमने बरसों पहले पहनाए थे दुनिया समझी हम बिछड़ गये ऐसे भी ज़माने आये थे लेकिन वो जुदा होने वाले हम नहीं, हमारे साये थे हम तुम युग-युग.*

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...