मंगलवार, 16 अप्रैल 2024

जी एस नेपाली

प्रसिद्ध गीतकार जी एस नेपाली उर्फ गोपाल सिंह नेपाली के जन्मदिन पर हार्दिक श्रधांजलि
🎂जन्म 11 अगस्त 1911 ई॰ को बिहार के पश्चिमी चंपारण के बेयियास में हुआ था।

⚰️17 अप्रैल 1963 ई॰ को इनका निधन बिहार के भागलपुर रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म संख्या पांच पर हो गया था।

कलम की स्वाधीनता के लिए आजीवन संघर्षरत रहे 'गीतों के राजकुमार' गोपाल सिंह नेपाली लहरों की धारा के विपरीत चलकर हिन्दी साहित्य, पत्रकारिता और फिल्म उद्योग में ऊंचा स्थान हासिल करने वाले छायावादोत्तर काल के विशिष्ट कवि और गीतकार थे।

बिहार के पश्चिम चम्पारण जिले के बेतिया में 11 अगस्त 1911 को जन्मे गोपाल सिंह नेपाली की काव्य प्रतिभा बचपन में ही दिखाई देने लगी थी। एक बार एक दुकानदार ने बच्चा समझकर उन्हें पुराना कार्बन दे दिया जिस पर उन्होंने वह कार्बन लौटाते हुए दुकानदार से कहा- 'इसके लिए माफ कीजिएगा गोपाल पर, सड़ियल दिया है आपने कार्बन निकालकर'। उनकी इस कविता को सुनकर दुकानदार काफी शर्मिंदा हुआ और उसने उन्हें नया कार्बन निकालकर दे दिया।

साहित्य की लगभग सभी विधाओं में पारंगत नेपाली की पहली कविता 'भारत गगन के जगमग सितारे' 1930 में रामवृक्ष बेनीपुरी द्वारा संपादित बाल पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। पत्रकार के रूप में उन्होंने कम से कम 4 हिन्दी पत्रिकाओं- रतलाम टाइम्स, चित्रपट, सुधा और योगी का संपादन किया।

युवावस्था में नेपालीजी के गीतों की लोकप्रियता से प्रभावित होकर उन्हें आदर के साथ कवि सम्मेलनों में बुलाया जाने लगा। उस दौरान एक कवि सम्मेलन में राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' उनके एक गीत को सुनकर गद्गनद् हो गए। वह गीत था-

सुनहरी सुबह नेपाल की, ढलती शाम बंगाल की
कर दे फीका रंग चुनरी का, दोपहरी नैनीताल की
क्या दरस-परस की बात यहां, जहां पत्थर में भगवान है
यह मेरा हिन्दुस्तान है, यह मेरा हिन्दुस्तान है...

नेपालीजी के गीतों की उस दौर में धूम मची हुई थी लेकिन उनकी माली हालत खराब थी। वे चाहते तो नेपाल में उनके लिए सम्मानजनक व्यवस्था हो सकती थी, क्योंकि उनकी पत्नी नेपाल के राजपुरोहित के परिवार से ताल्लुक रखती थीं लेकिन उन्होंने बेतिया में ही रहने का निश्चय किया।

वर्ष 1944 में मुंबई में उनकी मुलाकात फिल्मीस्तान के मालिक सेठ तुलाराम जालान से हुई जिन्होंने नेपाली को 200 रुपए प्रतिमाह पर गीतकार के रूप में 4 साल के लिए अनुबंधित कर लिया। फिल्मीस्तान के बैनर तले बनी ऐतिहासिक फिल्म 'मजदूर' के लिए नेपाली ने सर्वप्रथम गीत लिखे।

फिल्मों में बतौर गीतकार नेपालीजी 1944 से 1962 तक गीत लेखन करते रहे। इस दौरान उन्होंने 60 से अधिक फिल्मों के लिए लगभग 400 से अधिक गीत लिखे। दिलचस्प बात यह है कि इनमें से अधिकतर गीतों की धुनें भी खुद उन्होंने बनाईं। नेपालीजी ने हिमालय फिल्म्स और नेपाली पिक्चर्स फिल्म कंपनी की स्थापना कर नजराना (1949), सनसनी (1951) और खुशबू (1955) जैसी कुछ फिल्मों का निर्माण भी किया।

नेपालीजी को जीते-जी वह सम्मान नहीं मिल सका जिसके वे हकदार थे। अपनी इस भावना को उन्होंने कविता में इस तरह उतारा था-

अफसोस नहीं हमको जीवन में कुछ कर न सके
झोलियां किसी की भर न सके, संताप किसी का हर न सके
अपने प्रति सच्चा रहने का जीवनभर हमने यत्न किया
देखा-देखी हम जी न सके, देखा-देखी हम मर न सके ।

17 अप्रैल 1963 को अपने जीवन के अंतिम कवि सम्मेलन से कविता पाठ करके लौ टते समय बिहार के भागलपुर रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर 2 पर गोपालसिंह नेपाली का अचानक निधन हो गया।

शनिवार, 30 मार्च 2024

मीना कुमारी

आज के फनकार
नाम:- मीना कुमारी
जन्म नाम :- बेगम महजबीन बक्स
निक नेम :- मंजू
🎂जन्म तिथि :- 1 अगस्त 1933
⚰️31 मार्च, 1972
जन्म स्थान :- बॉम्बे, महाराष्ट्र, भारत
ऊंचाई :- 1.6 मी
जीवनसाथी :- अर्रे
मिनी बायो:- महजबीन का जन्म 1 अगस्त, 1932 को बॉम्बे, भारत में डॉ। गद्रे के क्लिनिक में एक मुस्लिम पिता, अली बक्स और एक हिंदू मां, इकबाल बेगम (नी प्रभावती टैगोर) के घर हुआ था। उनकी दो बहनें खुर्शीद और मधु हैं। महजबीन स्कूल में पढ़ना चाहती थी, लेकिन एक बाल कलाकार के रूप में हिंदी फिल्मों में अभिनय करने के लिए मजबूर हो गई, और परिवार की एकमात्र रोटी कमाने वाली बन गई। वह पहली बार 1939 की फिल्म 'लेदरफेस' में दिखाई दी थीं और उन्हें ब्रिटिश भारत में मुख्य रूप से हिंदू फिल्म उद्योग में बेबी मीना के रूप में कास्ट किया गया था, जिसे अभी बॉलीवुड के रूप में देखना बाकी था। मीना कुमारी ने कुल 94 फिल्मों में अभिनय किया, जिनमें से एक करियर जो 1939 से 1972 तक चला। वह 'बैजू बावरा', 'परिणीता', 'साहिब बीवी और गुलाम', 'काजल' में अपने अभिनय के साथ-साथ 'सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री' का पुरस्कार प्राप्त करने के बाद एक घरेलू नाम बन गईं। इन उपाधियों के लिए पुरस्कार। 1952 में उन्होंने कमाल अमरोही से शादी कर ली। शादी सामंजस्यपूर्ण थी और इसके परिणामस्वरूप 'दायरा' और 'पाकीज़ा' नामक संयुक्त फिल्म उद्यम हुआ। न ही यह पता था कि बाद को पूरा होने में 14 साल लगेंगे। शादी के कुछ साल बाद, कमल और मीना के बीच मतभेद होने लगे, और अलग होने लगे, और आखिरकार 1964 के दौरान तलाक हो गया, जिससे 'पाकीज़ा' अधूरी रह गई। 'पाकीज़ा' आखिरकार बन गई 4 फरवरी 1972 को पूरी हुई और रिलीज़ हुई, लेकिन बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप रही। कुछ सप्ताह बाद मीना को सेंट एलिजाबेथ के नर्सिंग होम में अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन 31 मार्च, 1972 को लीवर की समस्या के कारण उनका निधन हो गया। उनके निधन के कुछ ही समय बाद, जनता ने 'पाकीज़ा' में नए सिरे से दिलचस्पी ली और बाद में फिल्म बन गई। एक हिट। शादी सामंजस्यपूर्ण थी और इसके परिणामस्वरूप 'दायरा' और 'पाकीज़ा' नामक संयुक्त फिल्म उद्यम हुआ। न ही यह पता था कि बाद को पूरा होने में 14 साल लगेंगे। शादी के कुछ साल बाद, कमल और मीना के बीच मतभेद होने लगे, और अलग होने लगे, और आखिरकार 1964 के दौरान तलाक हो गया, जिससे 'पाकीज़ा' अधूरी रह गई। 'पाकीज़ा' आखिरकार बन गई 4 फरवरी 1972 को पूरी हुई और रिलीज़ हुई, लेकिन बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप रही। कुछ सप्ताह बाद मीना को सेंट एलिजाबेथ के नर्सिंग होम में अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन 31 मार्च, 1972 को लीवर की समस्या के कारण उनका निधन हो गया। उनके निधन के कुछ ही समय बाद, जनता ने 'पाकीज़ा' में नए सिरे से दिलचस्पी ली और बाद में फिल्म बन गई। एक हिट। शादी सामंजस्यपूर्ण थी और इसके परिणामस्वरूप 'दायरा' और 'पाकीज़ा' नामक संयुक्त फिल्म उद्यम हुआ। न ही यह पता था कि बाद को पूरा होने में 14 साल लगेंगे। शादी के कुछ साल बाद, कमल और मीना के बीच मतभेद होने लगे, और अलग होने लगे, और आखिरकार 1964 के दौरान तलाक हो गया, जिससे 'पाकीज़ा' अधूरी रह गई। 'पाकीज़ा' आखिरकार बन गई 4 फरवरी 1972 को पूरी हुई और रिलीज़ हुई, लेकिन बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप रही। कुछ सप्ताह बाद मीना को सेंट एलिजाबेथ के नर्सिंग होम में अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन 31 मार्च, 1972 को लीवर की समस्या के कारण उनका निधन हो गया। उनके निधन के कुछ ही समय बाद, जनता ने 'पाकीज़ा' में नए सिरे से दिलचस्पी ली और बाद में फिल्म बन गई। एक हिट। न ही यह पता था कि बाद को पूरा होने में 14 साल लगेंगे। शादी के कुछ साल बाद, कमल और मीना के बीच मतभेद होने लगे, और अलग होने लगे, और आखिरकार 1964 के दौरान तलाक हो गया, जिससे 'पाकीज़ा' अधूरी रह गई। 'पाकीज़ा' आखिरकार बन गई 4 फरवरी 1972 को पूरी हुई और रिलीज़ हुई, लेकिन बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप रही। कुछ सप्ताह बाद मीना को सेंट एलिजाबेथ के नर्सिंग होम में अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन 31 मार्च, 1972 को लीवर की समस्या के कारण उनका निधन हो गया। उनके निधन के कुछ ही समय बाद, जनता ने 'पाकीज़ा' में नए सिरे से दिलचस्पी ली और बाद में फिल्म बन गई। एक हिट। न ही यह पता था कि बाद को पूरा होने में 14 साल लगेंगे। शादी के कुछ साल बाद, कमल और मीना के बीच मतभेद होने लगे, और अलग होने लगे, और आखिरकार 1964 के दौरान तलाक हो गया, जिससे 'पाकीज़ा' अधूरी रह गई। 'पाकीज़ा' आखिरकार बन गई 4 फरवरी 1972 को पूरी हुई और रिलीज़ हुई, लेकिन बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप रही। कुछ सप्ताह बाद मीना को सेंट एलिजाबेथ के नर्सिंग होम में अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन 31 मार्च, 1972 को लीवर की समस्या के कारण उनका निधन हो गया। उनके निधन के कुछ ही समय बाद, जनता ने 'पाकीज़ा' में नए सिरे से दिलचस्पी ली और बाद में फिल्म बन गई। एक हिट। पाकीज़ा' आखिरकार पूरी हुई और 4 फरवरी 1972 को रिलीज़ हुई, लेकिन बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप रही। कुछ सप्ताह बाद मीना को सेंट एलिजाबेथ के नर्सिंग होम में अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन 31 मार्च, 1972 को लीवर की समस्या के कारण उनका निधन हो गया। उनके निधन के कुछ ही समय बाद, जनता ने 'पाकीज़ा' में नए सिरे से दिलचस्पी ली और बाद में फिल्म बन गई। एक हिट। पाकीज़ा' आखिरकार पूरी हुई और 4 फरवरी 1972 को रिलीज़ हुई, लेकिन बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप रही। कुछ सप्ताह बाद मीना को सेंट एलिजाबेथ के नर्सिंग होम में अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन 31 मार्च, 1972 को लीवर की समस्या के कारण उनका निधन हो गया। उनके निधन के कुछ ही समय बाद, जनता ने 'पाकीज़ा' में नए सिरे से दिलचस्पी ली और बाद में फिल्म बन गई। एक हिट।
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महान अदाकारा महजबीं बानो उर्फ मीना कुमारी के यौम-ए-विलादत पर दिली खिराज़-ए-अक़ीदत

मीना कुमारी 
🎂1 अगस्त, 1933
⚰️ 31 मार्च, 1972
 (असल नाम-महजबीं बानो) भारत की एक मशहूर हिन्दी फिल्मों की अभिनेत्री थीं। इन्हें खासकर दुखांत फ़िल्मों में इनकी यादगार भूमिकाओं के लिये याद किया जाता है। मीना कुमारी को भारतीय सिनेमा की ट्रैजेडी क्वीन (शोकान्त महारानी) भी कहा जाता है। अभिनेत्री होने के साथ-साथ मीना कुमारी एक उम्दा शायारा एवम् पार्श्वगायिका भी थीं। इन्होंने वर्ष 1939 से 1972 तक फ़िल्मी पर्दे पर काम किया।

मीना कुमारी का असली नाम महजबीं बानो था और ये बंबई में पैदा हुई थीं। उनके पिता अली बक्श पारसी रंगमंच के एक मँझे हुए कलाकार थे और उन्होंने फ़िल्म "शाही लुटेरे" में संगीत भी दिया था। उनकी माँ प्रभावती देवी (बाद में इकबाल बानो), भी एक मशहूर नृत्यांगना और अदाकारा थी। मीना कुमारी की बड़ी बहन खुर्शीद जुनियर और छोटी बहन मधु (बेबी माधुरी) भी फिल्म अभिनेत्री थीं। कहा जाता है कि दरिद्रता से ग्रस्त उनके पिता अली बक़्श उन्हें पैदा होते ही अनाथाश्रम में छोड़ आए थे चूँकि वे उनके डाॅक्टर श्रीमान गड्रे को उनकी फ़ीस देने में असमर्थ थे।हालांकि अपने नवजात शिशु से दूर जाते-जाते पिता का दिल भर आया और तुरंत अनाथाश्रम की ओर चल पड़े।पास पहुंचे तो देखा कि नन्ही मीना के पूरे शरीर पर चीटियाँ काट रहीं थीं।अनाथाश्रम का दरवाज़ा बंद था, शायद अंदर सब सो गए थे।यह सब देख उस लाचार पिता की हिम्मत टूट गई,आँखों से आँसु बह निकले।झट से अपनी नन्हीं-सी जान को साफ़ किया और अपने दिल से लगा लिया।अली बक़्श अपनी चंद दिनों की बेटी को घर ले आए।समय के साथ-साथ शरीर के वो घाव तो ठीक हो गए किंतु मन में लगे बदकिस्मती के घावों ने अंतिम सांस तक मीना का साथ नहीं छोड़ा।

टैगोर परिवार से संबंध

मीना कुमारी की नानी हेमसुन्दरी मुखर्जी पारसी रंगमंच से जुड़ी हुईं थी। बंगाल के प्रतिष्ठित टैगोर परिवार के पुत्र जदुनंदन टैगोर (1840-62) ने परिवार की इच्छा के विरूद्ध हेमसुन्दरी से विवाह कर लिया। 1862 में दुर्भाग्य से जदुनंदन का देहांत होने के बाद हेमसुन्दरी को बंगाल छोड़कर मेरठ आना पड़ा। यहां अस्पताल में नर्स की नौकरी करते हुए उन्होंने एक उर्दू के पत्रकार प्यारेलाल शंकर मेरठी (जो कि ईसाई था) से शादी करके ईसाई धर्म अपना लिया। हेमसुन्दरी की दो पुत्री हुईं जिनमें से एक प्रभावती, मीना कुमारी की माँ थीं।

शुरुआती फिल्में (1939-52) 

महजबीं पहली बार 1939 में फिल्म निर्देशक विजय भट्ट की फिल्म "लैदरफेस" में बेबी महज़बीं के रूप में नज़र आईं। 1940 की फिल्म "एक ही भूल" में विजय भट्ट ने इनका नाम बेबी महजबीं से बदल कर बेबी मीना कर दिया। 1946 में आई फिल्म बच्चों का खेल से बेबी मीना 13 वर्ष की आयु में मीना कुमारी बनीं। मार्च 1947 में लम्बे समय तक बीमार रहने के कारण उनकी माँ की मृत्यु हो गई। मीना कुमारी की प्रारंभिक फिल्में ज्यादातर पौराणिक कथाओं पर आधारित थीं जिनमें हनुमान पाताल विजय, वीर घटोत्कच व श्री गणेश महिमा प्रमुख हैं।

उभरती सितारा (1952-56)

1952 में आई फिल्म बैजू बावरा ने मीना कुमारी के फिल्मी सफ़र को नई उड़ान दी। मीना कुमारी द्वारा अभिनीत गौरी के किरदार ने उन्हें घर-घर में प्रसिद्धि दिलाई। फिल्म 100 हफ्तों तक परदे पर रही और 1954 में उन्हें इसके लिए पहले फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

1953 तक मीना कुमारी की तीन फिल्में आ चुकी थीं जिनमें : दायरा, दो बीघा ज़मीन और परिणीता शामिल थीं। परिणीता से मीना कुमारी के लिये एक नया युग शुरु हुआ। परिणीता में उनकी भूमिका ने भारतीय महिलाओं को खास प्रभावित किया था चूँकि इस फिल्म में भारतीय नारी की आम जिंदगी की कठिनाइयों का चित्रण करने की कोशिश की गयी थी। उनके अभिनय की खास शैली और मोहक आवाज़ का जादू छाया रहा और लगातार दूसरी बार उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के पुरस्कार के लिए चयनित किया गया।

1954 से 1956 के बीच मीना कुमारी ने विभिन्न प्रकार की फिल्मों में काम किया। जहाँ चाँदनी चौक (1954) और एक ही रास्ता (1956) जैसी फिल्में समाज की कुरीतियों पर प्रहार करती थीं, वहीं अद्ल-ए-जहांगीर (1955) और हलाकू (1956) जैसी फिल्में तारीख़ी किरदारों पर आधारित थीं। 1955 की फ़िल्म आज़ाद, दिलीप कुमार के साथ मीना कुमारी की दूसरी फिल्म थी। ट्रेजेडी किंग और ट्रेजेडी क्वीन के नाम से प्रसिद्ध दिलीप और मीना के इस हास्य प्रधान फ़िल्म ने दर्शकों की खूब वाहवाही लूटी। मीना कुमारी के उम्दा अभिनय ने उन्हें फ़िल्मफ़ेयर ने फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार के लिए नामांकित भी किया। फ़िल्म आज़ाद के गाने "अपलम चपलम" और "ना बोले ना बोले" आज भी प्रचलित हैं।

ट्रैजेडी क्वीन

1957 में मीना कुमारी दो फिल्मों में पर्दे पर नज़र आईं। प्रसाद द्वारा कृत पहली फ़िल्म मिस मैरी में कुमारी ने दक्षिण भारत के मशहूर अभिनेता जेमिनी गणेशन और किशोर कुमार के साथ काम किया। प्रसाद द्वारा कृत दूसरी फ़िल्म शारदा ने मीना कुमारी को भारतीय सिनेमा की ट्रेजेडी क्वीन बना दिया। यह उनकी राज कपूर के साथ की हुई पहली फ़िल्म थी। जब उस ज़माने की सभी अदाकाराओं ने इस रोल को करने से मन कर दिया था तब केवल मीना कुमारी ने ही इस रोल को स्वीकार किया था और इसी फिल्म ने उन्हें उनका पहला बंगाल फ़िल्म जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का खिताब दिलवाया।

1958:फिल्म सहारा के लिए (लेखराज भाखरी द्वारा निर्देशित), मीना कुमारी को फिल्मफेयर नामांकन मिला। फ़िल्म यहूदी, बिमल रॉय द्वारा निर्देशित थी जिसमें मीना कुमारी, दिलीप कुमार, सोहराब मोदी, नजीर हुसैन और निगार सुल्ताना ने अभिनय किया। यह रोमन साम्राज्य में यहूदियों के उत्पीड़न के बारे में, पारसी - उर्दू रंगमंच में एक क्लासिक, आगा हाशर कश्मीरी द्वारा यहूदी की लड़की पर आधारित थी। यह फ़िल्म मुकेश द्वारा गाए गए प्रसिद्ध गीत "ये मेरा दीवानापन है" के साथ बॉक्स ऑफिस पर हिट रही। फरिश्ता - मुख्य नायक के रूप में अशोक कुमार और मीना कुमारी ने अभिनय किया। फिल्म को औसत से ऊपर दर्जा दिया गया था। फ़िल्म सवेरा सत्येन बोस द्वारा निर्देशित की गई, जिसमें मीना कुमारी और अशोक कुमार प्रमुख भूमिकाओं में थे।

1959: देवेन्द्र गोयल द्वारा निर्देशित और निर्मित, चिराग कहाँ रोशनी कहाँ में राजेंद्र कुमार और हनी ईरानी के साथ मीना कुमारी दिखीं। यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर हिट रही और मीना कुमारी को उनके अभिनय के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के लिए फिल्मफेयर नामांकन मिला। चार दिल चार राहें का निर्देशन ख्वाजा अहमद अब्बास ने किया, जिसमें स्टार मीना कुमारी, राज कपूर, शम्मी कपूर, कुमकुम और निम्मी थे। फिल्म को आलोचकों से गर्म समीक्षा मिली। शरारात - एक 1959 की रोमांटिक ड्रामा फिल्म थी, जिसे हरनाम सिंह रवैल द्वारा लिखा और निर्देशित किया गया था, जिसमें मीना कुमारी, किशोर कुमार, राज कुमार और कुमकुम मुख्य भूमिकाओं में थे। किशोर कुमार द्वारा गाए गया यादगार गीत "हम मतवाले नौजवान" आज भी याद किया जाता है।

1960: दिल अपना और प्रीत पराई, किशोर साहू द्वारा लिखित और निर्देशित एक हिंदी रोमांटिक ड्रामा थी। इस फिल्म में मीना कुमारी, राज कुमार और नादिरा ने मुख्य भूमिका निभाई। फिल्म एक सर्जन की कहानी बताती है जो एक पारिवारिक मित्र की बेटी से शादी करने के लिए बाध्य है, जबकि उसे एक सहकर्मी नर्स से प्यार है, जिसे मीना कुमारी ने निभाया है। यह मीना कुमारी के करियर के प्रसिद्ध पात्रों में से एक है। फिल्म का संगीत शंकर जयकिशन द्वारा दिया गया है, और हिट गीत, "अजीब दास्तान है ये" लता मंगेशकर द्वारा गाया गया है। 1961 के फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड्स में इसने सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक श्रेणी के लिए नौशाद के लोकप्रिय संगीत महाकाव्य मुग़ल-ए-आज़म को हराकर खलबली मचा दी। बहाना - कुमार द्वारा निर्देशित, मीना कुमारी, सज्जन, अनवर की स्टार कास्ट थी। कोहिनूर - एस. यू. सनी द्वारा निर्देशित मीना कुमारी, दिलीप कुमार, लीला चिटनिस और कुमकुम के साथ बनाई गई फ़िल्म थी। यह एक मज़ाइया फ़िल्म थी और काफी हिट रही। 1961: भाभी की चूड़ीयां एक पारिवारिक ड्रामा थी जिसका निर्देशन सदाशिव कवि ने मीना कुमारी और बलराज साहनी के साथ किया था। यह मीना कुमारी के प्रसिद्ध फिल्मों में से एक है। यह फिल्म लता मंगेशकर के प्रसिद्ध गीत "ज्योति कलश छलके" के साथ भारतीय बॉक्स ऑफिस पर वर्ष की सबसे अधिक कमाई वाली फिल्मों में से एक थी। ज़िन्दगी और ख्वाब - मीना कुमारी और राजेंद्र कुमार अभिनीत एस. बनर्जी निर्देशित भारतीय बॉक्स ऑफ़िस पर हिट रही। प्यार का सागर का निर्देशन मीना कुमारी और राजेंद्र कुमार के साथ देवेंद्र गोयल ने किया था।

1962 और उसके बाद

1962: साहिब बीबी और गुलाम, गुरु दत्त द्वारा निर्मित और अबरार अल्वी द्वारा निर्देशित फिल्म थी। यह बिमल मित्र के बंगाली उपन्यास "साहेब बीबी गोलम" पर आधारित है। फिल्म में मीना कुमारी, गुरु दत्त, रहमान, वहीदा रहमान और नाज़िर हुसैन हैं। इसका संगीत हेमंत कुमार का है और गीत शकील बदायुनी के हैं। इस फिल्म को वी. के. मूर्ति और गीता दत्त द्वारा गाए गए प्रसिद्ध गीत "ना जाओ सईयां छुड़ा के बइयां" और "पिया ऐसो जिया में" के लिए भी जाना जाता है। फिल्म ने चार फिल्मफेयर पुरस्कार जीते, जिसमें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार भी शामिल है। इस फिल्म को 13 वें बर्लिन अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में गोल्डन बियर के लिए नामित किया गया था, जहाँ मीना कुमारी को एक प्रतिनिधि के रूप में चुना गया था। साहिब बीबी और गुलाम को ऑस्कर में भारत की आधिकारिक प्रविष्टि के रूप में चुना गया था। फणी मजूमदार द्वारा निर्देशित आरती में मीना कुमारी, अशोक कुमार, प्रदीप कुमार और शशिकला निर्णायक भूमिका में हैं। कुमारी को इस फिल्म के लिए बंगाल फिल्म जर्नलिस्ट एसोसिएशन की ओर से सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार मिला। मैं चुप रहुंगी - ए. भीमसिंह द्वारा निर्देशित मीना कुमारी और सुनील दत्त के साथ मुख्य भूमिका में, वर्ष की सबसे बड़ी हिट फिल्मों में से एक थी और मीना कुमारी को उनके प्रदर्शन के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के लिए फिल्मफेयर नामांकन मिला।

1963: दिल एक मंदिर, सी. वी. श्रीधर द्वारा निर्देशित थी जिसमें मीना कुमारी, राजेंद्र कुमार, राज कुमार और महमूद मुख्य भूमिका में हैं। फिल्म का संगीत शंकर जयकिशन द्वारा दिया गया है। यह बॉक्स ऑफिस पर एक बड़ी हिट थी। फ़िल्म अकेली मत जाइयो को नंदलाल जसवंतलाल ने निर्देशित किया था। यह मीना कुमारी और राजेंद्र कुमार के साथ एक रोमांटिक कॉमेडी फिल्म है। किनारे किनारे को चेतन आनंद ने निर्देशित किया था और इसमें मीना कुमारी, देव आनंद और चेतन आनंद ने मुख्य भूमिकाओं थे।

1964: सांझ और सवेरा - हृषिकेश मुखर्जी द्वारा निर्देशित एक रोमांटिक ड्रामा फिल्म है, जिसमें मीना कुमारी, गुरुदत्त और महमूद ने अभिनय किया था। यह फ़िल्म गुरु दत्त की अंतिम फ़िल्म थी। बेनज़ीर - एस. खलील द्वारा निर्देशित एक मुस्लिम सामाजिक फिल्म थी, जिसमें मीना कुमारी, अशोक कुमार, शशि कपूर और तनुजा ने अभिनय किया था। मीरा कुमारी, अशोक कुमार और प्रदीप कुमार द्वारा अभिनीत और किदार शर्मा द्वारा निर्देशित चित्रलेखा 1934 के हिंदी उपन्यास पर आधारित थी, जो इसी नाम से भगवती चरण वर्मा द्वारा मौर्य साम्राज्य के अंतर्गत आने वाले बीजगुप्त और राजा चंद्रगुप्त मौर्य (340 ईसा पूर्व -298 ईसा पूर्व) के बारे में थी। फिल्म का संगीत और बोल रोशन और साहिर लुधियानवी के थे और "संसार से भीगे फिरते हो" और "मन रे तू कहे" जैसे गीतों के लिए प्रसिद्ध थे। मीना कुमारी और सुनील दत्त द्वारा अभिनीत वेद-मदन द्वारा निर्देशित गजल एक मुस्लिम सामाजिक फिल्म थी, इसमें साहिर लुधियानवी के गीतों के साथ मदन मोहन का संगीत था, जिसमें मोहम्मद रफ़ी द्वारा गाए गए "रंग और नूर की बारात", लता मंगेशकर द्वारा गाया गया "नगमा ओ ​शेर की सौगात" जैसे उल्लेखनीय फ़िल्म-ग़ज़ल शामिल हैं। मैं भी लड़की हूँ का निर्देशन ए. सी. तिरूलोकचंदर ने किया था। फिल्म में मीना कुमारी नवोदित अभिनेता धर्मेंद्र के साथ हैं।

1965: काजल ने राम माहेश्वरी द्वारा निर्देशित जिसमें मीना कुमारी, धर्मेंद्र, राज कुमार, पद्मिनी, हेलेन, महमूद और मुमताज़ हैं। यह फिल्म 1965 की शीर्ष 20 फिल्मों में सूचीबद्ध थी। मीना कुमारी ने काजल के लिए अपना चौथा और आखिरी फिल्मफेयर पुरस्कार जीता। फिल्म मूल रूप से गुलशन नंदा के उपन्यास "माधवी" पर आधारित थी। मीना कुमारी, अशोक कुमार और प्रदीप कुमार के साथ कालिदास के निर्देशन में बनी भीगी रात, लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी द्वारा दो अलग-अलग संस्करणों में गाए गए प्रसिद्ध गीत "दिल जो ना कह सका" के साथ वर्ष की सबसे बड़ी हिट में से एक थी। । नरेंद्र सूरी द्वारा निर्देशित फिल्म पूर्णिमा में मुख्य भूमिकाओं में मीना कुमारी और धर्मेंद्र थे।

1966: फूल और पत्थर, ओ. पी. रल्हन द्वारा निर्देशित फ़िल्म, जिसमें मीना कुमारी और धर्मेंद्र ने मुख्य भूमिकाओं में अभिनय किया। यह फिल्म एक स्वर्ण जयंती हिट बन गई और धर्मेंद्र के फिल्मी सफर में मील का पत्थर साबित हुई यह फ़िल्म उस वर्ष की सबसे अधिक कमाई वाली फिल्म थी। फिल्म में मीना कुमारी के प्रदर्शन ने उन्हें उस वर्ष के लिए फिल्मफेयर पुरस्कारों में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री की श्रेणी में नामांकित किया। फिल्म पिंजरे की पंछी का निर्देशन सलिल चौधरी ने किया था, जिसमें मुख्य भूमिकाओं में मीना कुमारी, बलराज साहनी और महमूद थे।

1967: मझली दीदी का निर्देशन हृषिकेश मुखर्जी और मीना कुमारी के साथ धर्मेंद्र ने अभिनय किया। यह फिल्म सर्वश्रेष्ठ विदेशी भाषा फिल्म के लिए 41 वें अकादमी पुरस्कारों में भारत की प्रविष्टि थी। फिल्म बहू बेगम का निर्देशन एम. सादिक ने किया था, जिसमें मीना कुमारी, प्रदीप कुमार और अशोक कुमार थे। फिल्म में संगीत रोशन और गीत साहिर लुधियानवी द्वारा दिया गया है। नूरजहाँ, मोहम्मद सादिक द्वारा निर्देशित, मीना कुमारी और प्रदीप कुमार अभिनीत एक ऐतिहासिक फिल्म थी, जिसमें हेलन और जॉनी वॉकर छोटी भूमिकाओं में थे। इसमें महारानी नूरजहाँ और उनके पति, मुगल सम्राट जहाँगीर की महाकाव्य प्रेम कहानी का वर्णन किया गया है। फिल्म चंदन का पलना इस्माइल मेमन द्वारा निर्देशित किया गया, जिसमें मीना कुमारी और धर्मेंद्र ने अभिनय किया। ग्रहण के बाद (English: After the Eclipse), एस सुखदेव द्वारा निर्देशित 37 मिनट की एक रंगीन डॉक्यूमेंट्री थी जो वाराणसी के उपनगरीय इलाके में शूट की गई, इसमें अभिनेता शशि कपूर की आवाज के साथ मीना कुमारी की आवाज भी थी।

1968: बहारों की मंज़िल एक सस्पेंस थ्रिलर है जिसका निर्देशन याकूब हसन रिज़वी ने किया, जिसमें मीना कुमारी, धर्मेंद्र, रहमान और फरीदा जलाल शामिल हैं। यह फिल्म साल की प्रमुख हिट फिल्मों में से एक थी। फिल्म अभिलाषा का निर्देशन अमित बोस ने किया था। कलाकारों में मीना कुमारी, संजय खान और नंदा शामिल हैं।

70 का दशक 

70 के दशक की शुरुआत में, मीना कुमारी ने अंततः अपना ध्यान अधिक 'अभिनय उन्मुख' या चरित्र भूमिकाओं पर केन्द्रित कर दिया। उनकी अंतिम छह फिल्में- जबाव, सात फेरे, मेरे अपने, दुश्मन, पाकीज़ा और गोमती के किनारे में से केवल पाकीज़ा में उनकी मुख्य भूमिका थी। मेरे अपने और गोमती के किनारे में, हालांकि उन्होंने एक मुख्य नायिका की भूमिका नहीं निभाई, लेकिन उनकी भूमिका वास्तव में कहानी का केंद्रीय चरित्र थी।

1970: फ़िल्म जवाब मीना कुमारी, जीतेंद्र, लीना चंदावरकर और अशोक कुमार द्वारा अभिनीत, रमन्ना द्वारा निर्देशित फिल्म थी। सात फेरे का निर्देशन सुधीर सेन ने किया था, जिसमें मीना कुमारी, प्रदीप कुमार और मुकरी मुख्य भूमिकाओं में थे।

1971: गुलज़ार द्वारा लिखित और निर्देशित, मेरे अपने में मीना कुमारी, विनोद खन्ना और शत्रुघ्न सिन्हा के साथ देवेन वर्मा, पेंटाल, असित सेन, असरानी, ​​डैनी डेन्जोंगपा, केश्टो मुखर्जी, ए. के. हंगल, दिनेश ठाकुर, महमूद और योगिता बाली हैं। दुलाल गुहा द्वारा निर्देशित दुश्मन, जिसमें मुख्य भूमिकाओं में मुमताज के साथ मीना कुमारी, रहमान और राजेश खन्ना हैं। फिल्म बॉक्स ऑफिस पर "सुपर-हिट" रही।

1972: सावन कुमार टाक द्वारा निर्देशित गोमती के किनारे में मीना कुमारी, संजय खान और मुमताज़ ने अभिनय किया। यह फ़िल्म मीना कुमारी की मृत्यु के बाद 22 नवंबर 1972 को रिलीज हुई।

कमाल अमरोही से विवाह 

वर्ष 1951 में फिल्म तमाशा के सेट पर मीना कुमारी की मुलाकात उस ज़माने के जाने-माने फिल्म निर्देशक कमाल अमरोही से हुई जो फिल्म महल की सफलता के बाद निर्माता के तौर पर अपनी अगली फिल्म अनारकली के लिए नायिका की तलाश कर रहे थे।मीना का अभिनय देख वे उन्हें मुख्य नायिका के किरदार में लेने के लिए राज़ी हो गए।दुर्भाग्यवश 21 मई 1951 को मीना कुमारी महाबलेश्वरम के पास एक सड़क दुर्घटना का शिकार हो गईं जिससे उनके बाहिने हाथ की छोटी अंगुली सदा के लिए मुड़ गई। मीना अगले दो माह तक बम्बई के ससून अस्पताल में भर्ती रहीं और दुर्घटना के दूसरे ही दिन कमाल अमरोही उनका हालचाल पूछने पहुँचे। मीना इस दुर्घटना से बेहद दुखी थीं क्योंकि अब वो अनारकली में काम नहीं कर सकती थीं। इस दुविधा का हल कमाल अमरोही ने निकाला, मीना के पूछने पर कमाल ने उनके हाथ पर अनारकली के आगे 'मेरी' लिख डाला।इस तरह कमाल मीना से मिलते रहे और दोनों में प्रेम संबंध स्थापित हो गया।

14 फरवरी 1952 को हमेशा की तरह मीना कुमारी के पिता अली बख़्श उन्हें व उनकी छोटी बहन मधु को रात्रि 8 बजे पास के एक भौतिक चिकित्सकालय (फिज़्योथेरेपी क्लीनिक) छोड़ गए। पिताजी अक्सर रात्रि 10 बजे दोनों बहनों को लेने आया करते थे।उस दिन उनके जाते ही कमाल अमरोही अपने मित्र बाक़र अली, क़ाज़ी और उसके दो बेटों के साथ चिकित्सालय में दाखिल हो गए और 19 वर्षीय मीना कुमारी ने पहले से दो बार शादीशुदा 34 वर्षीय कमाल अमरोही से अपनी बहन मधु, बाक़र अली, क़ाज़ी और गवाह के तौर पर उसके दो बेटों की उपस्थिति में निक़ाह कर लिया। 10 बजते ही कमाल के जाने के बाद, इस निक़ाह से अपरिचित पिताजी मीना को घर ले आए।इसके बाद दोनों पति-पत्नी रात-रात भर बातें करने लगे जिसे एक दिन एक नौकर ने सुन लिया।बस फिर क्या था, मीना कुमारी पर पिता ने कमाल से तलाक लेने का दबाव डालना शुरू कर दिया। मीना ने फैसला कर लिया की तबतक कमाल के साथ नहीं रहेंगी जबतक पिता को दो लाख रुपये न दे दें।पिता अली बक़्श ने फिल्मकार महबूब खान को उनकी फिल्म अमर के लिए मीना की डेट्स दे दीं परंतु मीना अमर की जगह पति कमाल अमरोही की फिल्म दायरा में काम करना चाहतीं थीं।इसपर पिता ने उन्हें चेतावनी देते हुए कहा कि यदि वे पति की फिल्म में काम करने जाएँगी तो उनके घर के दरवाज़े मीना के लिए सदा के लिए बंद हो जाएँगे। 5 दिन अमर की शूटिंग के बाद मीना ने फिल्म छोड़ दी और दायरा की शूटिंग करने चलीं गईं।उस रात पिता ने मीना को घर में नहीं आने दिया और मजबूरी में मीना पति के घर रवाना हो गईं। अगले दिन के अखबारों में इस डेढ़ वर्ष से छुपी शादी की खबर ने खूब सुर्खियां बटोरीं।

पति से अलगाव और शराब की लत संपादित करें
अपनी शादी के बाद, कमाल अमरोही ने मीना कुमारी को अपने फ़िल्मी करियर को जारी रखने की अनुमति दी, लेकिन इस शर्त पर कि वे अपने मेकअप रूम में उनके मेकअप आर्टिस्ट के अलावा किसी और पुरूष को नहीं बुलाएंगी और हर शाम 6:30 बजे तक केवल अपनी कार में ही घर लौटेंगी| मीना कुमारी सभी शर्तों से सहमत थीं, लेकिन समय बीतने के साथ वे उन्हें तोड़ती रहीं। साहिब बीबी और गुलाम के निर्देशक अबरार अल्वी ने सुनाया कि कैसे कमाल अमरोही अपने जासूस और दाएं हाथ के आदमी बाकर अली को मेकअप रूम में मीना पर निगाह रखने के लिए रखते थे, और एक शाम जब एक शॉट पूरा करने के लिए शेड्यूल से परे काम कर रही थी, तब उन्हें बिलखती हुई मीना का सामना करना पड़ा था।

1963 में, साहिब बीबी और गुलाम को बर्लिन फिल्म समारोह में भारतीय प्रविष्टि के रूप में चुना गया और मीना कुमारी को एक प्रतिनिधि के रूप में चुना गया। तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री सत्य नारायण सिन्हा ने दो टिकटों की व्यवस्था की, एक मीना कुमारी के लिए और दूसरा उनके पति के लिए, लेकिन कमाल अमरोही ने अपनी पत्नी के साथ जाने से इनकार कर दिया जिस कारण बर्लिन की यात्रा कभी नहीं हुई। इरोस सिनेमा में एक प्रीमियर के दौरान, सोहराब मोदी ने मीना कुमारी और कमाल अमरोही को महाराष्ट्र के राज्यपाल से मिलवाया। सोहराब मोदी ने कहा "यह प्रसिद्ध अभिनेत्री मीना कुमारी हैं, और यह उनके पति कमाल अमरोही हैं"। बधाई देने से पहले, कमाल अमरोही ने कहा, "नहीं, मैं कमाल अमरोही हूं और यह मेरी पत्नी, प्रसिद्ध अभिनेत्री मीना कुमारी हैं"। यह कहते हुए कमाल अमरोही सभागार से चले गए। मीना कुमारी ने अकेले प्रीमियर देखा। मीना कुमारी को उनकी शादी में शारीरिक शोषण का शिकार होना पड़ा। उनकी जीवनी के लेखक विनोद मेहता बताते हैं कि हालांकि अमरोही ने इस तरह के आरोपों से बार-बार इनकार किया, उन्होंने छह अलग-अलग स्रोतों से जाना कि वह वास्तव में एक पीड़ित थी। 1972 में उनकी मृत्यु के बाद, साथी अभिनेत्री नरगिस ने उनके बारे में एक निबंध लिखा, जो एक उर्दू पत्रिका में प्रकाशित हुआ था। नरगिस ने उल्लेख किया कि मैं चुप राहुंगी के एक आउटडोर शूट पर, जब वे दोनों बगल के कमरे साझा कर रहीं थीं, उन्होंने स्वयं भी बगल के कमरे से शोर सुना। अगले दिन, वह एक सूजी हुई आंखों वाली कुमारी से मिली, जो शायद पूरी रात रोई थी। इस तरह की अफवाहों को फ़िल्म पिंजरे के पंछी के मूहर्त पर उनका आधार मिला। 5 मार्च 1964 को, कमाल अमरोही के सहायक, बाकर अली ने मीना कुमारी को थप्पड़ मार दिया जब उन्होंने गुलज़ार को अपने मेकअप रूम में प्रवेश करने की अनुमति दी। कुमारी ने तुरंत अमरोही को फिल्म के सेट पर आने के लिए बुलाया लेकिन वह कभी नहीं आए। इसके बजाय, अमरोही ने मीना को घर आने के लिए कहा ताकि वे तय कर सकें के आगे क्या करना है। इसने न केवल मीना कुमारी को नाराज़ किया बल्कि उनके पहले से तनावपूर्ण संबंधों में अंतिम तिनके के रूप में भी काम किया। मीना सीधे अपनी बहन मधु के घर गईं। जब कमाल अमरोही उन्हें वापस लाने के लिए वहां गए, तो बार-बार मनाने के बाद भी उन्होंने अमरोही से बात करने से इनकार कर दिया। उसके बाद, न तो अमरोही ने मीना वापस लाने की कोशिश की और न ही मीना कुमारी वापस लौटीं। कुमारी की मृत्यु के बाद अपने कार्यक्रम फूल खिले हैं गुलशन गुलशन पर जब तबस्सुम ने कमाल अमरोही से मीना कुमारी के बारे में पूछा तब अमरोही ने मीना को "एक अच्छी पत्नी नहीं बल्कि एक अच्छी अभिनेत्री के रूप में याद किया, जो खुद को घर पर भी एक अभिनेत्री मानती थी।"

लेकिन स्वछंद प्रवृति की मीना अमरोही से 1964 में अलग हो गयीं। उनकी फ़िल्म पाक़ीज़ा को और उसमें उनके रोल को आज भी सराहा जाता है। शर्मीली मीना के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं कि वे कवियित्री भी थीं लेकिन कभी भी उन्होंने अपनी कवितायें छपवाने की कोशिश नहीं की। उनकी लिखी कुछ उर्दू की कवितायें नाज़ के नाम से बाद में छपी।

मृत्यु 

फ़िल्म पाक़ीज़ा के रिलीज़ होने के तीन हफ़्ते बाद मीना कुमारी की तबीयत बिगड़ने लगी। 28 मार्च 1972 को उन्हें बम्बई के सेंट एलिज़ाबेथ अस्पताल में दाखिल करवाया गया।

31 मार्च 1972, गुड फ्राइडे वाले दिन दोपहर 3 बजकर 25 मिनट पर महज़ 38 वर्ष की आयु में मीना कुमारी ने अंतिम सांस ली। पति कमाल अमरोही की इच्छानुसार उन्हें बम्बई के मज़गांव स्थित रहमताबाद कब्रिस्तान में दफनाया गया। मीना कुमारी इस लेख को अपनी कब्र पर लिखवाना चाहती थीं:

"वो अपनी ज़िन्दगी को
एक अधूरे साज़,

एक अधूरे गीत,

एक टूटे दिल,

परंतु बिना किसी अफसोस

के समाप्त कर गयी

मीना के पति कमाल अमरोही की GB 11 फरवरी 1993 को मृत्यु हुई और उनकी इच्छनुसार उन्हें मीना के बगल में दफनाया गया।

सम्मान और श्रद्धांजलि 

उनकी मृत्यु के कुछ समय बाद, साथी अभिनेत्री नरगिस ने एक उर्दू पत्रिका में एक निजी निबंध लिखा - शमा , जिसका शीर्षक है मीना - मौत मुबारक हो । अक्टूबर 1973 में, उन्होंने मीनाजी की याद में मीना कुमारी मेमोरियल फॉर द ब्लाइंड की स्थापना की और इस ट्रस्ट की वे अध्यक्ष भी थीं।

1979 में, मीना कुमारी की अमर कहानी , दिवंगत अभिनेत्री को समर्पित एक फिल्म थी। सोहराब मोदी द्वारा इसे निर्देशित किया गया था और राज कपूर और राजेंद्र कुमार जैसे विभिन्न फिल्मी हस्तियों के विशेष साक्षात्कार लिए गए थे। फिल्म के लिए संगीत खय्याम द्वारा संगीतबद्ध किया गया था।

अगले वर्ष, शायरा (वैकल्पिक रूप से साहिरा शीर्षक) जारी की गई थी। यह मीना कुमारी पर एक लघु वृत्तचित्र थी और एस सुख देव द्वारा गुलज़ार के साथ निर्देशित की गई थी। इस डॉक्यूमेंट्री का निर्माण कांता सुखदेव ने किया था।

उनके सम्मान में अंकित मूल्य 500 पैसे का एक डाक टिकट 13 फरवरी 2011 को भारतीय डाक द्वारा जारी किया गया था।

मई 2018 में, जयपुर के जवाहर कला केंद्र के रंगायन सभागार में, मीना कुमारी के जीवन को दर्शाने वाले नाटक, अजीब दास्तां है ये का मंचन किया गया था।

आत्मकथाएँ 

मीना कुमारी पर पहली जीवनी अक्टूबर 1972 में विनोद मेहता द्वारा उनकी मृत्यु के बाद लिखी गई थी। कुमारी की आधिकारिक जीवनी, इसे मीना कुमारी - द क्लासिक बायोग्राफी शीर्षक दिया गया था। जीवनी मई 2013 में फिर से प्रकाशित हुई थी।
मोहन दीप द्वारा लिखा गया निंदनीय सिम्पली सकेन्डलॉस लेख 1998 में प्रकाशित एक अनौपचारिक जीवनी थी। यह मुंबई के हिंदी दैनिक दोपहर का सामना में एक धारावाहिक के रूप में प्रकाशित किया गया था।
मीना कुमारी की एक और जीवनी, आखरी अधाई दिन को मधुप शर्मा ने हिंदी में लिखा था। पुस्तक 2006 में प्रकाशित हुई थी।

मीना कुमारी हमेशा बड़े पैमाने पर फिल्म निर्माताओं के बीच रुचि का विषय रही हैं। 2004 में, उनकी फिल्म साहिब बीबी और गुलाम का एक आधुनिक रूपांतर प्रीतीश नंदी कम्युनिकेशंस द्वारा किया जाना था, जिसमें ऐश्वर्या राय और बाद में प्रियंका चोपड़ा को उनकी छोटी बहू की भूमिका को चित्रित करना था। हालांकि, फिल्म को निर्देशक ऋतुपॉर्नो घोष द्वारा बाद में इसे एक धारावाहिक के रूप में बनाया गया, जिसमें अभिनेत्री रवीना टंडन ने इस भूमिका को निभाया।

2015 में, यह बताया गया कि तिग्मांशु धूलिया को हिंदी सिनेमा की ट्रेजेडी क्वीन पर एक फिल्म बनानी थी, जो विनोद मेहता की किताब "मीना कुमारी - द क्लासिक बायोग्राफी" का स्क्रीन रूपांतरण होना था। अभिनेत्री कंगना रनौत को कुमारी को चित्रित करने के लिए संपर्क किया गया था, लेकिन प्रामाणिक तथ्यों की कमी और मीना कुमारी के सौतेले बेटे ताजदार अमरोही के कड़े विरोध के बाद फिल्म को फिर से रोक दिया गया था।

2017 में, निर्देशक करण राजदान ने भी उन पर एक आधिकारिक बायोपिक निर्देशित करने का फैसला किया। इसके लिए, उन्होंने माधुरी दीक्षित और विद्या बालन से फ़िल्मी पर्दे पर मीना कुमारी की भूमिका निभाने के लिए संपर्क किया, लेकिन कई कारणों के कारण, दोनों ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। बाद में उन्होंने अभिनेत्री सन्नी लियोन की ओर रुख किया, जिन्होंने इस किरदार में बहुत दिलचस्पी दिखाई। ऋचा चड्ढा, जया प्रदा और जान्हवी कपूर सहित कई अन्य अभिनेत्रियों ने भी शानदार आइकन की भूमिका निभाने की इच्छा व्यक्त की।

2018 में, निर्माता और पूर्व बाल कलाकार कुट्टी पद्मिनी ने गायक मोहम्मद रफ़ी और अभिनेता-निर्देशक जे पी चंद्रबाबू के साथ एक वेब श्रृंखला के रूप में मीना कुमारी पर एक बायोपिक बनाने की घोषणा की। पद्मिनी ने मीना कुमारी के साथ फिल्म दिल एक मंदिर में काम किया है और इस बायोपिक के साथ दिवंगत अभिनेत्री को सम्मानित करना चाहती हैं।
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मंगलवार, 12 मार्च 2024

फिल्मीस्तान: स्नेहल भटकर

#17july
#29may 
 
स्नेहल भटकर असली नाम वासुदेव गंगाराम भटकर, बी वासुदेव; 
🎂17जुलाई 1919-29 मई 2007
⚰️29 मई 2007  मुंबई 

स्नेहल भटकर का जन्म 17 जुलाई 1919 को मुंबई में एक मराठी भाषी परिवार में हुआ था। वह 18 महीने के थे जब उनके पिता का निधन हो गया। उनकी माँ एक गायिका और शिक्षिका दोनों थीं और उन्होंने उनसे संगीत की बुनियादी बातें सीखीं। मैट्रिक पास करने के बाद उन्होंने दादर के एक संगीत संस्थान में संगीत की शिक्षा ली। 87 साल की उम्र में 29 मई 2007 को मुंबई में उनके घर पर उनका निधन हो गया। उनके तीन बच्चे स्नेहलता भटकर, अविनाश भटकर और हैं रमेश भटकर, एक प्रसिद्ध मराठी अभिनेता (अब रामकृष्ण बर्डे से विवाहित)। वासुदेव गंगाराम भटकर, बी., जिन्हें स्नेहल भटकर के नाम से जाना जाता है, मुंबई, भारत के एक प्रसिद्ध हिंदी और मराठी फिल्म संगीतकार थे। उन्हें 2004 में लता मंगेशकर पुरस्कार दिया गया, जिसकी स्थापना महाराष्ट्र सरकार ने की थी।

अनुबंध के उल्लंघन से बचने के लिए एचएमवी संगीतकार के रूप में औपचारिक रूप से काम करते समय उन्होंने कई छद्म शब्दों का इस्तेमाल किया। बी. वासुदेव और "स्नेहल" उनमें से थे, लेकिन "स्नेहल भटकर" ही एकमात्र विकल्प रह गए। यह नाम उनकी बेटी स्नेहलता के नाम पर रखा गया था, जो उस समय पैदा हुई थी। 1947 में, उन्होंने नील कमल की रिलीज़ के साथ अपने फ़िल्मी करियर की शुरुआत की। भटकर और गीतकार किदार नाथ शर्मा ने मिलकर कभी तन्हाइयों में (हमारी याद आएगी) जैसे लोकप्रिय गीत का निर्माण किया, जिसे अक्सर भटकर के करियर के शिखर के रूप में उद्धृत किया जाता है। उन्होंने फरियाद (1964), दीपक (1981), पहला कदम (1963) और हमारी याद आएगी (1961) सहित फिल्मों के लिए संगीत निर्देशक के रूप में काम किया।

नाना पालिश्कर

#20may
#01jun 

Nana Palsikar 

🎂जन्म 20 मई 1908 

को हुआ था।Nana Palsikar एक अभिनेता थे, जो Kanoon (1960), Jhanak Jhanak Payal Baaje (1955) और Gandhi (1982) के लिए मशहूर थे।

⚰️मृत्यु 01 जून 1984 
को हुई थी।
1907, महाराष्ट्र में जन्मे, नाना पलसीकर एक भारतीय फिल्म अभिनेता थे, जिन्होंने 80 से अधिक हिंदी फिल्मों में अभिनय किया। उन्होंने सुमेर चटर्जी की धुवंधर के साथ अपनी शुरुआत कीलीला चिटनिस1935 में। उन्होंने 1939 में कंदन और दुर्गा में दो और फिल्मों में काम किया, जो आखिरी दो मोशन पिक्चर्स द्वारा निर्देशित थीं।फ्रांज ऑस्टेन, एक जर्मन निर्देशक। 1940 में 14 साल के ब्रेक के दौरान उन्होंने केवल एक फिल्म बहुरानी में काम किया। अभिनेताओं के साथ बिमल रॉय की फिल्म दो बीघा ज़मीन में धांगू महतो की भूमिका के साथ नाना पर्दे पर वापस आएनिरूपा रायऔरबलराज साहनी. फिल्म एक बड़ी सफलता साबित हुई और इसने विभिन्न राष्ट्रीय और वैश्विक सम्मान जीते।

उन्होंने अन्य प्रसिद्ध फिल्मों जैसे डॉक्टर के रूप में सोंभु मित्रा की जगते रहो, साधु के रूप में वी. शांताराम की झनक पायल बाजे, जुआरी के रूप में राज कपूर की श्री 420, ईविल प्रीस्ट के रूप में हृषिकेश मुखर्जी की अनारी और स्ट्रीट सिंगर के रूप में बिमल रॉय की देवदास में सहायक भूमिका निभाई। पलसीकर ने 1960 में कालिया के रूप में बीआर चोपड़ा द्वारा एक हत्या के मामले सहित एक अदालती नाटक फिल्म कानून में काम किया। सहायक अभिनेता के रूप में उनके उत्कृष्ट प्रदर्शन ने उन्हें पहली बार फिल्मफेयर पुरस्कार दिलाया। द हिंदू अखबार ने मोशन पिक्चर के दूसरे भाग में उनके शानदार अभिनय पर टिप्पणी की।

वह फिल्म शहर और सपना में दिखाई दिए, जो एक सामाजिक फिल्म हैख्वाजा अहमद अब्बास1963 में, जिसे सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और राष्ट्रपति का स्वर्ण पदक पुरस्कार मिला। जॉनी के रूप में उनके प्रदर्शन ने उन्हें दूसरी बार सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का फिल्मफेयर पुरस्कार दिलाया और बंगाल फिल्म पत्रकार संघ द्वारा हिंदी में सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता के रूप में मान्यता दी गई। 1966 में, पलसीकर ने जॉन बेरी की चलचित्र माया में साजिद खान के पिता की भूमिका निभाई। बाद में 1969 में, उन्हें कास्ट किया गयाजेम्स आइवरीविदेशी सह-निर्माण फिल्म - द गुरु में। आइवरी ने कहा कि वह पलसीकर के अभिनय के बारे में ज्यादा नहीं जानते थे, लेकिन फिर भी उन्होंने उनके साथ काम करने का फैसला किया।

न्यूयॉर्क पत्रिका से, जूडिथ क्रिस्ट ने फिल्म में गुरु के गुरु के रूप में उनकी छोटी भूमिका को "एक अविस्मरणीय कैमियो" के रूप में वर्णित किया। पलसीकर कई फिल्मों में एक पिता के हिस्से का चित्रण करते रहे, उदाहरण के लिए, 1977 में यारों का यार और धुंड द्वारा बीआर चोपड़ा द्वारा नाटक द अनपेक्षित गेस्ट के प्रकाश में बनाया गयाअगाथा क्रिस्टी1973 में। हालांकि, ये भाग मामूली रूप से मामूली थे और इन्हें सराहा नहीं गया था, उदाहरण के लिए, 1972 में ज्वार भाटा में एक न्यायाधीश के रूप में उनका चरित्र।

उन्होंने फिल्म आक्रोश में ओम पुरी के पिता की भूमिका भी निभाईगोविंद निहलानी1980 में। उनकी अंतिम वास्तविक भूमिका महाकाव्य फिल्म गांधी में थी, जिसका निर्देशन रिचर्ड एटनबरो ने किया था, जो 1982 में एक ग्रामीण की छोटी भूमिका, मोहनदास गांधी के जीवन पर आधारित एक सच्ची जीवन फिल्म थी। मौत कानून क्या करेगा, मुकुल द्वारा निर्देशित थी। एस आनंद, एक माता पिता के रूप में। नाना पलसीकर 77 साल की उम्र में 1 जून 1984 को मुंबई में दुनिया को अलविदा कह गए
नाना पलशिकर
अधिक जानकारी वर्ष, फ़िल्म ...
वर्ष फ़िल्म चरित्र टिप्पणी
1984 कानून क्या करेगा
1981 अग्नि परीक्षा दीनानाथ शर्मा
1980 द नक्सेलाइटस चारू मजूमदार
1980 स्वयंवर
1980 आक्रोश
1980 द बर्निंग ट्रेन
1978 पति पत्नी और वो
1977 कर्म
1974 प्रेम नगर पूरन काका
1973 धुंध जज
1972 दास्तान
1972 शोर
1972 दुश्मन गंगा दीनदयाल
1972 जोरू का गुलाम
1971 उपहार
1969 डोली गनपत लाला
1969 संबंध
1969 द गुरु
1968 दुनिया गिरधारी
1967 बूँद जो बन गयी मोती
1967 बहारों के सपने भोलानाथ
1967 हमराज़
1964 दोस्ती शर्मा
1964 गीत गाया पत्थरों ने
1964 पूजा के फूल
1964 संगम नत्थू
1964 दूर गगन की छाँव में
1963 गुमराह
1963 नर्तकी प्रोफेसर वर्मा
1963 भरोसा
1962 मैं चुप रहूँगी नारायण
1960 कानून
1960 जिस देश में गंगा बहती है ताऊ
1959 अनाड़ी
1959 चार दिल चार राहें
1957 बारिश गोपाल दादा
1956 जागते रहो डॉक्टर
1956 शतरंज
1955 रेलवे प्लेटफ़ॉर्म
1955 श्री ४२०
1955 झनक झनक पायल बाजे साधू
1955 देवदास
1953 दो बीघा ज़मीन
1939 कंगन
नामांकन और पुरस्कार
फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार
1965 - फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता पुरस्कार - शहर और सपना
1962 - फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता पुरस्कार - कानून

BN SHARMA

#23aug 

बद्री नाथ शर्म
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पंजाबी कलाकार BN Sharma 
🎂जन्म की तारीख और समय: 23 अगस्त 1965
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बी एन शर्मा एक भारतीय अभिनेता हैं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत जालंधर दूरदर्शन पर एक पंजाबी धारावाहिक जेब कटेरे और कॉमेडी धारावाहिक फ्लॉप शो से की। उन्हें महाल ठीक है, जट्ट एंड जूलियट और कैरी ऑन जट्टा जैसी फिल्मों में उनकी भूमिकाओं के लिए जाना जाता है।

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बीएन शर्मा (बद्री नाथ शर्मा) पंजाबी फिल्म उद्योग में एक अभिनेता हैं। उनका जन्म रोपड़ में हुआ था और उनका पालन-पोषण दिल्ली में मूल रूप से गुजरांवाला के एक परिवार में हुआ था । हालाँकि उनके माता-पिता चाहते थे कि वह इंजीनियरिंग में अपना करियर बनायें, लेकिन वह 1972 में चंडीगढ़ चले गये और थिएटर के प्रति प्रेम विकसित करने के बाद अभिनय में अपना करियर बनाते हुए पंजाब पुलिस विभाग में सेवा की। एक कांस्टेबल के रूप में अपनी सेवा के दौरान उन्होंने 40-45 फिल्में पूरी कीं। उनके 3 बेटे (ट्रिप्लेट) और एक बेटी है।
उन्होंने अपने अभिनय करियर की शुरुआत 1985 में जालंधर दूरदर्शन के पंजाबी धारावाहिक जेब कतरे ( पॉकेट पिकर्स ) में एक नकारात्मक किरदार से की।  उनकी पहली फिल्म वैसाखी (1987) थी, जो हिट रही। उन्होंने 1989 में हिट श्रृंखला फ्लॉप शो में एक आवर्ती और अलग चरित्र के रूप में काम किया। बाद में उन्होंने उल्टा पुल्टा और फुल टेंशन जैसे अन्य उद्यमों में जसपाल भट्टी के साथ सहयोग किया। भ्रष्टाचार विरोधी कॉमिक फिल्म महौल ठीक है (1999) में उनकी एक छोटी भूमिका थी, जिसके बाद 70 से अधिक पंजाबी फिल्मों में प्रमुख भूमिकाएँ निभाईं। उनकी हालिया हिट फिल्मों में जट एंड जूलियट , अर्ध-सीक्वल जट एंड जूलियट 2 और शामिल हैंजट्टा जारी रखो . शर्मा ने पीटीसी पंजाबी फिल्म अवार्ड्स में कॉमिक रोल में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार जीता। 

अपने काम में परफेक्शन के लिए उन्हें निर्देशकों द्वारा सराहा गया है।
🌹शर्मा ने पंजाबी मेनिया को बताया, "मैं अभिनय से इतना रोमांचित था कि मैं किसी भी कीमत पर इसका हिस्सा बनना चाहता था।" "मुझे याद है जब मैं बच्चा था (स्कूल जाना शुरू करने से पहले भी), मैं एक गुब्बारे बेचने वाले से बांसुरी खरीदता था और उसे बजाता था। अब मुझे एहसास हुआ कि यह एक कला थी। चूंकि मेरे पिता काफी कठोर थे इसलिए मुझे इसे लेना पड़ा यह बहुत बड़ा कदम है और अब कड़ी मेहनत और सभी के प्यार से मैं अच्छा कर रहा हूं।"

पंजाबी मेनिया के साथ एक साक्षात्कार के दौरान, शर्मा ने यह भी कहा: "मुझे लगता है कि पंजाब सरकार को पंजाबी सिनेमा के लिए भी कुछ उपयोगी काम करना चाहिए, जैसे वे खेलों को बढ़ावा देने के लिए कर रहे हैं, जो एक अच्छी बात है। पंजाबी सिनेमा अब अद्भुत काम कर रहा है और हमारा सरकार को इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध बनाने के लिए कुछ योगदान देना चाहिए।

ममता कुलकर्णी

#,20april 
ममता कुलकर्णी
जन्म की तारीख और समय: 20 अप्रैल 1972, मुम्बई
पति: विक्की गोस्वामी (विवा. 2013)
माता-पिता: मुकुंद कुलकर्णी
ममता कुलकर्णी ( 20 अप्रैल , 1972 - जीवित) एक पूर्व मराठी अभिनेत्री हैं, जिन्होंने हिंदी फिल्मों में काम किया। उनकी बहनें मिथिला और मोलिना हैं। साल 1993 में ममता अचानक उस वक्त चर्चा में आ गईं, जब स्टारडस्ट पत्रिका में उनकी आधी बिना सेंसर वाली तस्वीर प्रकाशित हुई। हालाँकि, वह 2002 से फिल्मों में काम नहीं किया है। फिल्मों में उनकी भूमिकाएं ज्यादातर कामुक प्रकृति की थीं। वह पहले विक्की गोस्वामी नाम के शख्स के साथ दुबई और फिर केन्या गई।
फिलहाल वह केन्या में अपने पार्टनर के साथ रहती हैं। उनकी पत्नी का नाम विजयगिरि आनंदगिरी गोस्वामी उर्फ ​​विक्की गोस्वामी है। यह शख्स कुख्यात ड्रग माफिया है। उनका दुबई में एक होटल है। 14 नवंबर 2014 को उन्हें केन्याई पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया और कैद कर लिया। विक्की के साथ पुलिस ने केन्या के प्रमुख ड्रग माफिया बरकत आकाश, उसके भाई और पाकिस्तानी ड्रग तस्कर गुलाम हुसैन को भी गिरफ्तार किया है। गिरफ्तारी को अंतरराष्ट्रीय तस्कर और आतंकी दाऊद इब्राहिम के इशारे पर माना जा रहा है। ममता कुलकर्णी को 9 नवंबर 2014 को हिरासत में लिया गया था, लेकिन पूछताछ के बाद रिहा कर दिया गया।

हिंदी के नाम और अन्य फिल्मों में अभिनय किया

अनोखा प्रेमयुद्ध
अशांत
अहंकार
आंदोलन
आशिक आवारा
कभी तुम कभी हम
करण अर्जुन
किला
किस्मत (नवा)
क्रांतिवीर
बदमाश
घटक
घातक
चंदामामा (मलयाली)
चायना गेट
छुपा रुस्तम
जाने जिगर
जीवन का युद्ध
दिव्य मंदिर खजुराहो
डोंगा पोलीस (तेलुगू)
तिरंगा
दिलबर
नसीब
नानबर्गल (तमिल)
पुलिस वाला गुंडा है
प्रेमशिखरम (तेलुगू)
बाजी (नवा)
बेकाबू
बेताब बादशाह
भूकंप
मेरा दिल तेरे लिये
राजा और रंगीली
वक्त हमारा है
वंशाधार (बंगाली)
वादे इरादे
सबसे बडा खिलाडी
सेंसर
इत्यादि

श्रद्धा कपूर


Shardha kpoor

*🎂जन्म 3 मार्च 1987 को मुंबई*

श्रद्धा कपूर बॉलीवुड अभिनेत्री है I श्रद्धा बहुत ही जल्दी अपने हार्ड वर्क से बॉलीवुड में अपना नाम बनाने में सफलता पाने वाली अभिनेत्रियों में से एक है I

श्रद्धा कपूर का जन्म 3 मार्च 1987 को मुंबई में हुआ I इनके पिता का नाम शक्ति कपूर है जो की बॉलीवुड जगत के दिग्गज कलाकारों में से एक है इनकी माता जी का नाम शिवांगी कपूर है I इनके बड़े भाई का नाम सिद्धांत कपूर है इनकी grand aunt लता मंगेशकर और आशा भोसले जी है I

श्रद्धा ने अपनी स्कूल की पढ़ाई जमना बाई नरसी स्कूल , मुंबई से की है I उन्होंने अपने स्नातक (ग्रेजुएशन ) की पढ़ाई के लिए बोस्टन यूनिवर्सिटी, USA में दाखिला भी लिया था पर उन्होंने इसे बिच में ही छोड़ दिया और अभिनेत्री बनने का फैसल किया I

श्रद्धा कपूर एक भारतीय फ़िल्म अभिनेत्री हैं। ये  मुख्य रूप से आशिकी 2 में अपने अभिनय और गानों के कारण जानी जाती हैं। इन्होंने अपने अभिनय की शुरुआत वर्ष 2010 में तीन पत्ती नामक फ़िल्म से की, जिसमें अमिताभ बच्चन, बेन किंगसले और आर माधवन अन्य अभिनेता थे। उन्होंने एक कॉलेज छात्रा की भूमिका निभाई। और इस फिल्म  मे उनका नाम अपर्णा खन्ना था। उन्हें फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ महिला अभिनेत्री के पुरस्कार के लिए नामांकन किया गया था पर वह बॉक्स ऑफिस पर उनकी फिल्म नहीं चली।

उसके बाद उन्होंने यश राज फिल्मस के साथ तीन फ़िल्में करने का सौदा किया। और तीन कॉमेडी- लव का दी एंड में दिखाई दी। श्रद्धा ने एक किशोर कॉलेज छात्रा की भूमिका निभाई जिस में वह अपने प्रेमी के खिलाफ साज़िश रचती हैं क्योंकि उसने उसे धोखा दिया था। यह फिल्म भी बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं हुई। इस फिल्म के लिये मिश्रित समीक्षा मिली पर श्रद्धा कपूर को सकारात्मक समीक्षा मिली। उनकी इस अभिनय के लिए उन्हें स्टारबस्ट सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार मिला। औरंगज़ेब नामक फिल्म में यश राज ने मुख्य भूमिका निभाने की प्रस्तुति दी। लेकिन उन्होंने महेश भट्ट की आशिकी २ में काम करने का निर्णय किया जिसके दौरान यश राज फिल्मस के साथ तीन फिल्मों का अनुबंध रद्द हो गया।

अभिनय

श्रद्धा कपूर ने प्रथम प्रवेश तीन पत्ती के साथ किया जिसमें अमिताभ बच्चन, बेन किंगसले और आर माधवन अन्य अभिनेता थे। उन्होंने एक कॉलेज छात्रा की भूमिका निभाई। और इस चलचित्र में उनका नाम अपर्णा खन्ना था। उन्हें फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ महिला अभिनेत्री के पुरस्कार के लिए नामांकन किया गया था पर वह बॉक्स ऑफिस पर उनकी चलचित्र नहीं चली। उनके प्रथम प्रवेश के बाद उन्होंने यश राज फिल्मस के साथ तीन चलचित्र करने का सौदा किया। और टीन कॉमेडी- लव का दी एंड में दिखाई दी। श्रद्धा ने एक किशोर कॉलेज छात्रा की भूमिका निभाई जिस में वह अपने प्रेमी के खिलाफ साज़िश रचती हैं क्योंकि उसने उसे धोखा दिया था। यह चलचित्र भी बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं हुई। इस चलचित्र के लिये मिश्रित समीक्षा मिली पर श्रद्धा कपूर को सकारात्मक समीक्षा मिली। उनकी निष्पदन के लिए उन्हें स्टारबस्ट सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार मिला। औरंगज़ेब नामक चलचित्र में यश राज ने मुख्य भूमिका निभाने की प्रस्तुति दी। लेकिन उन्होंने महेश भट्ट की आशिकी २ करने का निर्णय किया जिसके दौरान यश राज फिल्मस के साथ तीन फिल्मों का अनुबंध रद्द हो गया।

२०१३ में रोमांटिक संगीत नाटक आशिकी २, १९९१ के क्लासिक आशिकी की अगली कड़ी में श्रद्धा दिखी गई। इस कहनी में वे आरोही केशव शिरके की भूमिका निभाती हैं जो एक छोटे शहर की बार गायिका है। पर एक मशहूर गायक राहुल जयकर की मदद से एक बहुत बड़ी सफल पार्श्व गायिका बनती हैं। इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर बहुत सफलता पाई और सौ करोड़ से ज़्यादा कमाई की और बॉक्स ऑफिस द्वारा "ब्लॉकबस्टर" फिल्म घोषित की गई। इसी साल में श्रद्धा और एक चलचित्र- गोरी तेरे प्यार में में दिखाई दी। इस फिल्म में वे इमरान खान की मँगेतर की भूमिका निभाते हुए दिखाई दीं।


रोचक जानकारियाँ

o   श्रद्धा कपूर आधी मराठी और आधी पंजाबी हैं, क्योंकि उनके पिता शक्ति कपूर पंजाबी हैं और उनकी मां शिवांगी मराठी हैं।

o   श्रद्धा बचपन के दिनों में एक (Tomboyish) लड़की थीं।

o   वह बहुत मेहनती लड़की थीं, उन्होंने अपनी 12 वीं कक्षा की परीक्षा में करीब 95% अंक प्राप्त किए थे।

o   अपने विद्यालय के दिनों में वह लगभग सभी चीजों जैसे कि अध्ययन, नृत्य, गायन, नाटक, खेल और अन्य गतिविधियों में भली प्रकार परिपूर्ण थीं।

o   स्कूल के दिनों में उनके बड़े भाई सिद्धार्थ, श्रद्धा के लिए काफी सुरक्षात्मक थे।

o   महज 16 साल की उम्र में, सलमान ने श्रद्धा को बोस्टन विश्वविद्यालय में एक नाटक का मंचन करते हुए देखा था, फिर उन्होंने श्रद्धा को फिल्मों में कार्य करने के लिए एक भूमिका की पेशकश की, परन्तु श्रद्धा उस समय अभिनय करने के लिए तैयार नहीं थीं।

o   वह ऋतिक रोशन की बहुत बड़ी प्रसंशक है, जब से उन्होंने ऋतिक की पहली फिल्म “कहो ना प्यार है” (2000) देखी है तब से वह उनके प्रति और भी आकर्षित हो गईं हैं। उनके पास ऋतिक की फोटो और पोस्टरों का एक विशाल संग्रह है।

o   वह एक प्रशिक्षित गायक भी हैं, क्योंकि उनकी मां और नाना शास्त्रीय गायन में बहु-प्रशिक्षित हैं।

o   उन्हें जूते इकट्ठा करने का बहुत शौक है।

o   उनके पास एक ल्हासा अप्सो नस्ल का पालतू कुत्ता है, जिसका नाम शिलोह है।

o   वह अभिनेत्री श्रीदेवी को अपना अराध्य (idol) मानती हैं।

o   वह चाय की बहुत आदी है।

o   वह ऑनलाइन शॉपिंग की बहुत आदी है।

o   वह एक प्रमाणित स्कूबा गोताखोर (Scuba Diver) हैं।

o   वह हाइपोर्मेट्रोपिया (दूर दृष्टि दोष) से ग्रस्त हैं, जिसके कारण वह घर पर भी चश्मा और लेंस का प्रयोग करती हैं।

o   श्रद्धा को खाने में फिश करी और जलेबी बहुत पसंद है I

o   -फेवरेट एक्टर की बात करे तो शक्ति कपूर ह्रितिक रोशन आमिर खान अमिताभ बच्चन उनकी पहली पसंद है I

o   -फेवरेट एक्ट्रेस में नूतन, पद्मिनी कोल्हापुरे, माधुरी दीक्षित और वहीदा रेहमान पसंद है I

o   -बॉलीवुड मूवी में प्यासा (1957 ) और हॉलीवुड फिल्मो में मॉन्स्टर और The Godfather उनको बहुत पसंद है I

o   -रंगो की बात करे तो उनको पर्पल और येलो कलर बहुत अच्छा लगता है I

o   -उनकी घूमने की पसंदीदा जगह पेरिस है I

भारत ईरान संबंध

भारत-ईरान संबंध भारत गणराज्य और ईरान इस्लामी गणराज्य के बीच द्विपक्षीय संबंध हैं । स्वतंत्र भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को राजनयिक संबंध ...